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मस्तानी -एक ऐतिहासिक उपन्यास

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सोलह कला और सोलह शिंगार

नाना साहिब के विवाह के बाद सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। बाजी राव और मस्तानी कभी कभार कोथरूड़ से ससवाद भी आने लग जाते हैं। रफ्ता रफ्ता मस्तानी बाजी राव के परिवार में फिर से घुलने मिलने लग जाती है। दोनों ननदें और नाना साहिब की पत्नी गोपिका बाई के साथ मस्तानी की बहुत बनने लग जाती है। तीनों ही सहेलियों की भाँति सारा दिन घर और बागों में खेलतीं, हँसी-मजाक करतीं, झूले झूलतीं रहती हैं। इसके अलावा महिलाओं वाले काम जैसे सिलाई, कढ़ाई, खाना पकाना और अन्य घरेलू कामों में भी मस्तानी उनका हाथ बंटाती रहती है। फुर्सत के समय सभी लड़कियों को एकत्र करके मस्तानी गीत गाकर सुनाती है या नृत्य करके उनका मनोरंजन भी कर देती है।

एक दिन गोपिका बाई मस्तानी को नृत्य करते देखकर पूछ लेती है, “ताई साहिबा(बड़ी बहन), आप हर काम जानते हो। जैसे मेंहदी लगाना, शर्बत और शराब बनाना, पगड़ी बांधना, खाना पकाना, सिलाई, कढ़ाई, शस्त्र चलाना, घुड़सवारी और तैराकी वैगरह। आप यूँ सोलह कला सम्पूर्ण कैसे बन गए ?“

मस्तानी आ रही खांसी को रोककर बोलती है, “नहीं, छुटकी बहिन, यह सारे काम तो सब स्त्रियों को आने चाहिएं और बहुत सी स्त्रियाँ जानती भी हैं। इसको सोलह कला सम्पूर्ण नहीं कहते। दरअसल कोई भी इन्सान सोलह कला सम्पूर्ण नहीं हो सकता। क्योंकि यदि सोलह कला सम्पूर्ण हो गया, वह तो भगवान बन जाता है। भगवान राम भी सोलह कला सम्पूर्ण नहीं थे। उनमें भी केवल चैदह कलायें थीं और वह अंश अवतार माने जाते हैं। आखि़री के दो अर्थात पंद्रहवीं और सोलहवीं कला स्वरूपावासतिष्ट भाव सम्पूर्ण ज्ञान और असली रूप छिपाकर भेष बदलना, बहिरूप होना हुआ करती हैं। ये दो भगवान राम ने मातलोक में अवतार धारण करते समय छोड़ दी थीं ताकि रावण को शिवजी द्वारा दिया वरदान कि भगवान उसको मारेगा, पूरा हो सके। भगवान विष्णु ने राम बनकर इन्सानी जामा धारण किया और दो कलायें जानबूझ कर त्यागकर रखी थीं, रावण को मारने के लिए। हाँ, भगवान कृष्ण सोलह कलाओं में सम्पूर्ण थे। वह जीव और ब्रह्म दोनों रूपों में विचरते थे। वह दार्शनिक भी थे, छलिया भी, कपटी, राजनीतिज्ञ, प्रेमी, संगीतकार, योद्धा, चोर, धार्मिक, तपस्वी आदि सब कलायें उनके अंदर थीं। एक आदमी में इतने गुण होना संभव नहीं हैं।“

“वाहिनी साहिबा, ये कलायें क्या होती हैं ?“ भिहू बाई प्रश्न करती है।

“वणसा (ननद), कलायें आध्यात्मिक और रूपक स्तर पर होती हैं। इन्सान के प्रगट होने वाले गुणों को कलायें कहा जाता है। वह कहा करते हैं न कि ‘बारह कला सूरज और सोलह कला चन्द्रमा’। इसका तात्पर्य है कि सूरज की बारह और चन्द्रमा की सोलह कलायें होती हैं। सूरज की बारह कलाओं के नाम हैं - तपनी, तपानी, धरूमा, मारछी, ज्वालिनी, रूची, सूक्ष्मना, भोगदा, विश्वा, बोधनी, धारणी और क्षमा। इस तरह इन कलाओं के दौरान सूरज का प्रताप और प्रकोप बढ़ता घटता रहता है। इसी प्रकार चन्द्रमा के सोलह दिनों में आकर परिवर्तन को सोलह कलाओं का नाम दिया गया है। प्रकाश पक्ष से चन्द्रमा हर रोज़ पन्द्रह दिनों तक थोड़ा थोड़ा बढ़ता रहता है और नित्य नई कला चाँद की हमें देखने को मिलती है। चन्द्रमा सोलहवें दिन जाकर पूरा हो जाता है। उस सम्पूर्ण चन्द्रमा वाले दिन पूर्णमासी होती है। पूर्णमासी के बाद चन्द्रमा फिर नित्य एक एक दजऱ्ा अमावस तक घटता चला जाता है। चन्द्रमा की सोलह कलायें अमृता, मानदा, पुष्पा, पुष्टी, तुष्टी, धृति, शाषनी, राशनी (रति), चंद्रिका, कांति, ज्योतस्ना, श्री, प्रीति, अंगदा, पूर्णता और पूर्णामृता हैं। ब्रह्मवैवरत पुराण में ईश्वर के अवतारों के सोलह गुण दजऱ् हैं। वे सोलह कलायें अर्थात सोलह शक्तियाँ हैं - अनन्य माया, प्राणायाम माया, मनोमाया, विज्ञान्य माया, आनन्दय माया, आतिशयानी माया, विपर्यानविमी, संकरामनी, प्रभावी, कुंठीनी, विकासनी, मर्यादनी, सनहालायदीनी, अलादीनी, प्रीपूर्णन्य, स्वरूप अवस्थी।“

अनु बाई अपनी बेसमझी का प्रकटीकरण करती है, “क्यों भटका रहे हो। सरल सा करके बताओ, इनका क्या अर्थ होता है ?“

मस्तानी अपनी ओढ़नी का पल्ला संभाल कर विद्वता झाड़ने लग पड़ती है, “ज्ञान, ध्यान, शुभ कर्म, हठ, संयम, धर्म, दान। वि़द्या, भजन, सुप्रेम, जत, अध्यात्म, सतनाम। दया, नेम और चतुरता, बुध सुध यह जान। सरल भाषा में ज्ञान हासिल करना, ध्यान लगाने के लिए समाधि अवस्था में जाना, शुभ और नेक कर्म करना, आवश्यकता पड़ने पर डट कर खड़े होना अर्थात हठ करना और अपनी जि़द प्रकट करना, मितव्यय और संयम को कायम रखकर जीवन में संतुलन पैदा करना, धर्म के मार्ग पर चलना, दान और पुण्य के कार्य करना, आवश्यक विद्या प्राप्त करना, प्रभु का सिमरन अर्थात तप करना, जीव जन्तुओं से प्रेम करना, जत कायम रखना और पराई स्त्री या पुरुष के साथ संबंध न बनाना, अध्यात्म भावना को जीवित रखना और सच पर पहरा देना। ब्रह्मवैवरत पुराण में दिए कलाओं के क्रम के अनुसार इनमें से पहले पाँच गुण तो मनुष्य में होते हैं और अगले तीन अभ्यास से ग्रहण किए जा सकते हैं। परंतु नौवें गुण प्रभावी को प्राप्त करने वाला मनुष्य ब्रह्म में लीन हो जाता है। समस्त सोलह गुण सम्पूर्ण व्यक्ति फिर इन्सान नहीं रता। बल्कि ईश्वर का अवतार बन जाता है। हमारे शास्त्र बताते हैं कि ब्रह्मा ने इन्सान का शरीर पृथ्वी, आकाश, हवा, आग और पानी - इन पाँच तत्वों से बनाया है और ये पाँच तत्व भगवान शब्द में हैं। जैसे भगवान का ‘भ’ भूमि का सूचक है, ‘ग’ गगन का, ‘व’ वायु का, ‘आ’ यानी अग्नि का और ‘न’ नीर का। सब इन्सान भगवान ने पाँच तत्वों से बनाये हैं। जिस मनुष्य में जितनी अधिक कलायें हों, उसको उतना उŸाम और सर्वोŸाम माना जाता है।“

“हूँ... वाह ! शस्त्र और शास्त्र विद्या तो आपने फिर पहले ही सीख ली थी। आपको यह कहाँ पता था कि आपको पंडितों की बहू बनना है ?“ राधा बाई मंद मंद मुस्कराती है।

“नहीं माता श्री, इतना तो हर चेतन व्यक्ति को धर्म के बारे में ज्ञान होना ही चाहिए। स्व रक्षा के लिए शस्त्र विद्या भी प्रत्येक प्राणी को सीखनी चाहिए।“

गोपिका बाई फिर मस्तानी का ध्यान आकर्षित करने के लिए छेड़ती है, “मस्तानी ताई, शस्त्र विद्या तो चलो स्व रक्षा के लिए आपने सीखी। पर आपने नृत्यकला और गायन क्यों सीखा ? इसकी क्या आवश्यकता थी ? यह तो नर्तकों के काम होते हैं।“

धैर्यवान मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “नहीं, विदेशी लोगों की कथा के अनुसार एकबार पुरुष और नारी का एक सुंदर सरोवर में मिलन हुआ। दोनों एक दूसरे के करीब आने के लिए तैरते हुए आगे बढ़ने लगे। दोनों ने अनुभव किया कि पानी में हाथ पैर मारने से कुछ मधुर सुर उपज रहे हैं। उन्हें प्रेम तरंगे छिड़ती महसूस हुईं। इसके साथ उन्हें एक आंतरिक प्रेरणा मिली, उनके अंदर एक दूसरे में समा जाने के भाव उत्पन्न हुए। दोनों आपस में घुलमिल गए और उन्होंने जल स्वरों का पूर्ण आनंद प्राप्त किया। इस प्रकार नृत्य परम्परा की नींव पड़ी। औरत मर्द का संभोग करना भी तो एक नृत्य ही है।... हवा के साथ दरख़्तों के पŸाों टहनियों का हिलना भी एक नृत्य ही है। हमारा सांस लेना भी हमारे धड़कते दिल का नृत्य है। बादशाह अकबर कहा करता था कि आदमी का दिल बहलाने के सब काम औरत को आने चाहिएँ। यदि औरत सज संवर कर रहे और पति का नृत्य, गायन के साथ चिŸा लगाये रखे तो उसका मर्द कभी किसी दूसरी औरत की ओर आकर्षित नहीं होता है।“

गोपिका बाई अपने और नाना साहिब के ताज़ा अनमने और डावांडोल संबंधों के बारे में सोचती हुई बोलती है, “अच्छा ? यह बात है तो आप मुझे सोलह शिंगार करना और नृत्य गायन अवश्य सिखाओ।“

“क्यों ? क्या नाना साहिब को तुम्हारा नाट्यशाला जाना अच्छा नहीं लगता ?“ मस्तानी गोपिका बाई की दुखती रंग पर हाथ रख देती है।

गोपिका बाई गंभीर और उदास हो जाती है। मस्तानी उसके बिना कुछ कहे ही सब कुछ गोपिका के चेहरे पर से पढ़ लेती है, “ठीक है, मैं तुम्हें पहनने, सजने की ढंग, रूप सज्जा, वेशभूषा का सलीका, नृत्य और गायन कला सिखाऊँगी। स्त्री को सदा संतनी ही नहीं बने रहना चाहिए और काम भावनाओं में ग्रस्त होकर अपने नायक पति के पास खुद चली जाना चाहिए। उसको क्रीड़ा के लिए उकसाना चाहिए। गोपिका जब तुम इन कलाओं में निपुण हो गई, देखना तेरे नवरे (पति) की क्या मजाल है कि वह कंचनियों, नायिकाओं, गणिकाओं और अभिनेत्रियों के पास चला जाए।“

“सच ?“ गोपिका बाई की आँखों में एकदम चमक उभर आती है।

“पढ़े लिखे को फारसी क्या और हाथ कंगन को आरसी क्या ! खुद ही अनुभव करके देख लेना। यदि मेरा कहा गलत हुआ तो मुझे मस्तानी न कहना। गोपिका बहिन, मैं तुझे सोलह शिंगार करने सिखाऊँगी। देख, सोलह शिंगार रूप को सजाने के लिए किए जाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। पहली प्रकार के शिंगार प्राकृतिक होते हैं जिनके साथ प्रभु ने हर स्त्री को स्वयं शिंगारित किया है। जैसे कहा करते हैं न कि ‘त्रै काले, दो उजले, पतले पंज प्रकार। चार पुष्ट, दो कठन हैं, ये सोलह शिंगार।’ सिर के केश, आँखों की पलकें और स्तनों के चूचक, इन्हें त्रैकाल कहा जाता है। दो उजले नाखून और दंत। पाँच पतले का अर्थ है - होंठ, नाक, गर्दन, कमर और उंगलियाँ। चार पुष्ट से भाव है - दो बांहांे की भुजाएँ और दो टांगों की जांघें। दो कठन योनि के दोनों अधर है या योनि और नितम्ब। पर कुछ ग्रंथों में दो कठन छाती पर स्तनों की स्थिति को माना गया है। इसके बिना शेष सोलह शिंगार बनावटी होते हैं, जो हर स्त्री अपने प्रिय पुरुष को भरमाने के लिए कर सकती है। इनसे दूसरी किस्म के शिंगारों के साथ शरीर के सोलह अंगों को सुंदर बनाने का यत्न किया जाता है। अर्थात शरीर पर वटना मलना, स्वच्छ जल में स्नान करना, सुंदर वस्त्र धारण करना, मांग में सिंदूर भरना, बालों को संवारना, माथे पर बिंदी लगाना, मुँह पर तिल का निशान बनाना, शरीर पर सुगंधित पदार्थ लगाना, पान खाना, गले में हार पहनना, महावर रचाना और केशों में फूल टांकना। ये पुरुष को रिझाने के लिए स्त्री के लिए करने आवश्यक समझे जाते हैं। ये शिंगार शरीर की शोभा बढ़ाते हैं। रसिक प्रिया में लिखा है, ‘प्रथम सकल सुचि मजन अमलवास। जावक सुदेस केस पाश को सुधारबो। अमगरास भूषण विविध मुखवास रंग। कजल कलित लोल लोचन निहारबो। बोलन हसन मृदलोचन चितौन चार। पल पल पतिव्रत प्रीति प्रतिपारबो। केशोदास सविलास करहो कुवरि राधे। इह विधि सोरहि शिंगारन सिंगारबो।“

“आपको क्या लगता है कि यदि मैं भी ये सोलह शिंगार करूँ तो यह (नाना साहिब) बाहर मुँह मारने से हट जाएँगे ?“ गोपिका बाई शंका निवृति के लिए पूछती है।

“लो, और नहीं तो क्या ? उसका तो बाप भी हट जाएगा।“ मस्तानी गोपिका बाई की जांघ पर हाथ रखकर उसको आँख मारती हुई हँस पड़ती है।

“यह बात है तो मुझे अभी से नृत्य सिखाना प्रारंभ कर दो ताकि मैं भी आपकी तरह अपने नवरे (पति) को अपनी उंगलियों पर नचा सकूँ और वह ज़ोरू का गुलाम बनकर रह जाए।“

मस्तानी बड़े प्रेमपूर्वक समझाती है, “इतना सरल काम नहीं है यह। नृत्य के लिए अभ्यास की अत्यंत आवश्यकता है और जीवन को समर्पित करना पड़ता है। मेरे उस्तादों ने छडि़याँ मार मारकर मुझे सिखाया था और घंटों मैं पताशों पर नाचा करती थी। जब तक सारे पताशे चूर चूर नहीं हो जाते थे, मैं हटती नहीं थी। यूँ ही तो नहीं लोग मेरी मोरों जैसी चाल देखकर कहते हैं कि मस्तानी पताशे चूरा करती जाती है।“

“मुझे भी फिर चाल से पताशे चूरा करना सिखाओ ताई साहिबा।“

“हाँ हाँ! पताशे क्या, मैं तो ठरक पीसना भी सिखा दूँगी। मैं तुझे ठोकपीट कर हर कला में निपुण बना दूँगी। संस्कृत में रचे ऋषि वात्सयान और कोका पंडित के कोक शास्त्र का ज्ञान भी तुझे दूँगी। काम सुख एक अद्भुत आनंद का अनुभव है, जिसमें शरीर की पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ (त्वचा, कान, आँख, जीभ और नाक) एकसुर हो जाती हैं। संभोग तन और मन की तृप्ति का सबसे बड़ा साधन है। संभोग सुख को दुगना करने की विधि भी तुझे सिखाऊँगी। कैसे नाखूनों से नोच-खरोंच प्रेम करते समय की जाती है। दाँतों से हल्के हल्के काटना(Love bites)... अश्लील वार्तालाप( Lusty conversation)... कामुक सिसकियाँ(Moaning & Groaning)...हस्तमैथुन(Masturbation)... हवशमयी होकर चाटना और नोंचना(Snoging, Licking, Kissing, Biting)...मौखिक काम (Oral Sex ), विलाशी स्पर्श(Tender Touch)... बाहों और टांगों में जकड़ना... आदि के सारे गुर तुझे दूँगी। औरत और मर्द भगवान द्वारा बनाई गई वो श्रेष्ठ कला रचना है जो जब आलिंगनबद्ध होकर एक दूसरे में समा जाते हैं तो यह मूर्ति सम्पूर्ण होती है। स्त्री और पुरुष की देहों की बनावट और काम अंगों की रचना प्रभु ने की ही इसीलिए हैं। इसलिए लज्जा और संकोच त्याग कर संभोग का मदहोश होकर जी भरकर आनंद लेना चाहिए। नाना साहिब के ऊपर लेटकर कभी क्रीड़ा की है ?“

“नहीं। कभी नहीं। मुझे तो बहुत अधिक लज्जा आती है। मैं तो चेहरे पर ओढ़नी लेकर आँखें मींचकर पड़ी रहती हूँ।“

“बस, यही तो तू गलती कर जाती है। पागल लड़की, जब नाचने लग पड़े, फिर घूँघट कैसा। अपितु निसंगता से साथ दे अपने पति के संभोग में।“

“ऊँ...! मैं नहीं, मुझे तो लज्जा आती है।“

“जिसने की शरम, उसके फूटे करम।“

उस दिन से गोपिका, मस्तानी से नृत्य और गायकी की शिक्षा लेने लग जाती है और इस प्रकार उनके मध्य बहुत अधिक निकटता और सखीपना उत्पन्न हो जाता है। उनके बीच गुरू और शिष्या का रिश्ता बन जाता है।

 


अंगूठी

मस्तानी आए दिन नये वस्त्र, नये गहने पहने होती है। हर बार जब वह ससवाद आती तो सिर से पैरों तक का हार-शिंगार और वस्त्र उसके सदैव बदले हुए होते हैं। यदि कुछ नहीं बदलता तो मस्तानी के बायें हाथ की तर्जनी में पहनी हीरे की अंगूठी कभी नहीं बदलती। हर बार वही अंगूठी देखकर एक दिन मस्तानी की ननद भिहू बाई पूछ लेती है, “वाहिनी साहिबा (भाभी), आपके बाकी तो सब जेवर नित्य बदले हुए होते हैं परंतु आप कभी यह अंगूठी नहीं उतारते।“

“नहीं, वनसा(ननद)। कभी नहीं।“ मस्तानी मुस्कराकर उतार देती है।

अनू बाई भी उत्सुक हो जाती है, “स्नान करते समय या रात को सोते समय भी नहीं ?“

“नहीं, कभी भी नहीं।“ मस्तानी इन्कार में सिर हिलाती है।

गोपिका बाई की भी अंगूठी में दिलचस्पी जाग्रत हो जाती है, “ऐसी क्या विशेषता है इस अंगूठी में ?“

“इसमें तो मेरी जान बसी हुई है और यह हमारी बुंदेलों की इज्ज़त आबरू की रक्षक है। एकबार पहनने के बाद बुंदेलों की लड़कियों की उंगली में से अंगूठी जीते जी नहीं उतरती। बस, उनकी मृत्यु के बाद ही उतारी जाती है।“ मस्तानी गंभीर हो जाती है।

“हमें भी तो कुछ बताइये न, इस अंगूठी का रहस्य ?“ दूर बैठी उनकी बातें सुन रही काशी बाई वार्तालाप में अपनी टांग अड़ाती है।

मस्तानी खंखारते हुए इतिहास की कहानी शुरू कर देती है, “बुंदेलखंड वतन के वासी हम बुंदेल अपनी आन, बान और शान के लिए अपने रक्त की एक एक बूँद बहा देते हैं। हम मित्रों के लिए खून देना भी जानते हैं और शत्रु का खून लेना भी हमें आता है। लहू की अन्तिम बूँद देने और लेने की खासियत के कारण हमें बुंदेल कहा जाता है। अर्थात् रक्त की बूँदें बहाने यानी लेने देने का, रक्त के कतरों का व्यापार करने वाले लोगों की जाति। हम तो अपनी कुल देवी विद्यावासिनी को भी रक्त की बूँदें ही भेंट में चढ़ाते हैं। हमें तो गुढ़ती भी नंगी तलवार पर रक्त की बूँदें लगाकर दी जाती है। मेरी दादीसा यानी काकाजू महाराजा छत्रसाल जी की धर्म माता जी सारंधा(महाराजा छत्रसाल की सौतेली माँ) रानी बड़ी बहादुर और दिलेर स्त्री थी। हमारा कुल अयोध्या के राजा भगवान राम चंदर के बेटे कुश से चलता है। दादीसा मेरे दादासा राजा चंपत राय की सबसे प्यारी रानी अर्थात् पटरानी थी। दादीसा का एक भाई था अनरुद्ध सिंह, वह अपनी पत्नी शीतला देवी को बहुत प्रेम करता था। एक बार तुर्कों के साथ युद्ध में पराजित होकर वह अपनी जान बचाकर रणक्षेत्र से भाग आया। घर आए अनिरुद्ध को सारंधा ने तलवार म्यान में से खींच कर उसको ललकारा कि या तो विजयी होकर आता, नहीं तो शहीद हो जाता। कायरों की तरह रणभूमि में पीठ दिखाकर आने के लिए अपने भाई को दादीसा ने लाहनतें दीं और कहा कि वह खुद उसको मौत की सज़ा देगी। अनिरुद्ध सिंह का स्वाभिमान जाग उठा और वह उन्हीं पैरों से वापस लौट गया और छह महीने पश्चात जंग जीतकर घर लौटा। दादीसा के साथ बाद में सीतला देवी, उनकी भाभीसा बहुत लड़ी और ताना मारती हुई बोली कि जान से जीत अधिक प्यारी थी तो जब तुम्हारा विवाह हुआ था, तब अपने पति को भेज कर देखती। मेरे पति को क्यों भेजा ? दादीसा ने कहा, “अगर ऐसी स्थिति आ गई तो पति क्या, वह अपने पुत्र के साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगी।“

“वाह ताई साहिबा ! बड़े जिगर वाली थी आपकी आजी (दादी) फिर तो।“ गोपिका बाई प्रभावित हो जाती है।

मस्तानी को भी अपनी दादी की वीर गाथा सुनाने में आनन्द आने लग पड़ता है। काशी बाई पर प्रभाव डालने के उद्देश्य से वह स्वयं ही आगे का किस्सा बयान करने लग जाती है, “दादासा अपनी पाँच रानियों में से सब से अधिक प्रेम सारंधा दादीसा को करते थे। दादासा की बहादुरी के विषय में सुनकर दिल्ली दरबार से शहजादा दारा शिकोह ने दादासा को नौ लाख की काल्पी (Kalpi is a city and a municipal board in Jalaun district in the Indian State of Uttar Pradesh. It is on the right bank of the Yamuna) की जागीर और मंत्री पद की पेशकश कर दी। दादासा बुंदेलखंड की राजगद्दी अपने भाई पहाड़ सिंह को सौंप कर दिल्ली दरबार में चल गए। दादासा अपनी बहादुरी से आए दिन ईनाम और जागीरें बादशाह से प्राप्त करते चले गए। परंतु दादीसा का मन प्रसन्न नहीं होता था। वह एक दिन दादासा से बोलीं कि कहाँ हम ओरशा के राजा थे और कहाँ आप बादशाह के हुक्म बजाने वाले गुलाम बन गए हैं ? यह सुनकर दादासा ने सब कुछ त्याग दिया। वह वापस ओरशा आ गए।“

राधा बाई बीच में टोक देती है, “और फिर अपके आजोबा(दादा) ने अपना राज वापस ले लया था ?“

“हाँ ! उन्होंने अपने भाई पहाड़ सिंह को तो अस्थायी तौर पर ही राजा बनाया था। उसको दादासा ने दूसरी रियासत देकर वहाँ का राजा बना दिया। पर समय बड़ा बलवान होता है। राजाओं से भीख मंगवा देता है और रंक को राजा बना देता है।“ मस्तानी का स्वर गमगीन हो जाता है।

सभी स्त्रियाँ एकदम कान खड़े कर लेती हैं और उनके मुँह से एकसाथ निकल जाता है, “फिर क्या हुआ ?“

मस्तानी गहरा निश्वास लेते हुए कहती है, “दिल्ली का बादशाह शाहजहां बीमार होकर बिस्तर पर पड़ गया। उसके पुत्रों में राजगद्दी के लिए जंग छिड़ गई। शहजादा मुराद और शहजादा मुहीद-उद-दीन ने बागी होकर दक्खिन से दारा शिकोह के विरुद्ध आक्रमण करने के लिए दादासा चंपत राय से मदद मांगी। दादासा ने दारा शिकोह के साथ पुराने संबंध होने के कारण इन्कार कर दिया। लेकिन दादीसा ने उन्हें यह कहकर मना लिया कि दर पर आए सवाली को खाली हाथ नहीं लौटाया करते। दादासा रज़ामंद हो गए और दारा शिकोह की फौजों के साथ हुई भयानक जंग में दादीसा खुद भी लड़ी थीं। एक जगह युद्धभूमि में दादीसा की मुठभेड़ विरोधी सेना के सिपहसालार वली बहादुर खान के साथ हो गई। दादीसा ने वली बहादुर खान को बुरी तरह घायल कर दिया। वह घोड़े पर से नीचे गिर पड़ा। दादीसा को उसका अरबी घोड़ा पसंद आ गया और दादीसा ने सिपाहियों को उस घोड़े को कब्ज़े में लेने का आदेश दे दिया। युद्ध की विजय के उपरांत शहजादा मुहीद-उद-दीन तख़्त पर बैठकर आलमगीर औरंगजेब बन गया। दारा शिकोह का सिपहसलार वली बहादुर खान कपटी था। वह औरंगजेब की शरण में जाकर उसका वफ़ादार बन गया। बादशाह औरंगजेब ने उसको क्षमा करके अपनी सेवा के लिए रख लिया। उसने वली बहादुर को उच्च पद और जागीरें प्रदान कीं। दादासा चंपत राय को आलमगीर ने ओरशा से बनारस और बनारस से यमुना नदी तक के इलाके दिए और बारह हज़ार घुड़सवार फौज का मनसब बना दिया। बारह हज़ारी मनसब बनने के पश्चात एकबार फिर दादासा बादशाह और दिल्ली दरबार के अधीन हो गए।“ यह बताते हुए मस्तानी खामोश हो कर ख़यालों की बाढ़ में बह जाती है।

शांत हो गई मस्तानी को गोपिका बाई कुरेद कर पूछती है, “फिर वे दुबारा राजा कैसे बने ?“

मस्तानी सभी के चेहरों की ओर गौर से निहारती है, “दादीसा रानी सारंधा जैसी स्त्री से हार जाने के कारण वली बहादुर दादासा के साथ खुंदक रखने लग पड़ा। सीधा पंगा तो वह नहीं ले सकता था पर आए दिन कोई न कोई इल्लत अवश्य करता रहता। काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय अभी बाल्यावस्था में ही थे। एकबार काकाजू वली बहादुर खान के घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे। वली बहादुर ने देखकर काकाजू से वह घोड़ा छीन लिया। जब दादीसा रानी सारंधा को पता चला तो वह काकाजू पर बहुत गुस्सा हुईं और कहने लगी कि घोड़े के छिन जाने का दुख नहीं है, पर तुम मुँह लटकाकर खाली हाथ घर लौटने की अपेक्षा वली बहादुर को सबक सिखाकर आते तो वह दुबारा कभी बुंदेलों की किसी वस्तु पर आँख नहीं रख सकता था। दादीसा ने झिड़का कि क्या तुम्हारी रगों में बुंदेलों का खून नहीं दौड़ता ? काकाजू महाराज छत्रसाल उस समय बहुत छोटे थे। दादीसा उसी समय बीस-पच्चीस घुड़सवारों के साथ गए और उन्होंने वली बहादुर को आलमगीर औरंगजेब के दरबार में जा ललकारा। दादीसा ने व्यंग्य करते हुए कहा, “वाह रे खान, चम्बल की घाटी में खाई मार भूल गया जो तूने दुबारा बुंदेलों से पंगा ले लिया? तुझे शर्म नहीं आई, एक बच्चे से घोड़ा छीनते हुए ?“ वली बहादुर खान के हिमायती उठ खड़े हुए। दोनों पक्षों के बीच तलवारें चलने लग पड़ीं। औरंगजेब को पता चला। वह दादीसा से बोला, “आपने इससे घोड़ा छीना था। इसने आपसे छीन लिया है। हिसाब बराबर।“ इस पर दादीसा बोली, “नहीं, हिसाब बराबर नहीं। जंग का उसूल है, हारने वाले के माल-असबाब को विजयी द्वारा अपने कब्जे़ में लेना। पर वली बहादुर ने बच्चे से घोड़ा छीनकर चोरी-डकैती की है। हम अपना घोड़ा हर कीमत पर वापस लेंगे।“ आलमगीर औरंगजेब ने वली बहादुर से पूछा कि क्या करना है ? वह बोला, “ये कोई दूसरा जो चाहे घोड़ा ले लें। यह घोड़ा मुझे प्यारा है, मैं इसे नहीं दूँगा।“

इस पर दादीसा बोलीं, “घोड़ा तो हमें भी प्यारा है और हमें यही लेना है। दूसरा घोड़ा लेकर हम क्या करेंगे ? हमारे पास क्या घोड़े नहीं हैं ?“

वली बहादुर बोला, “ मैं यह घोड़ा नहीं दे सकता। बेशक घोड़े के वजन के बराबर सोने की मोहरे तौलकर मुझसे ले लें।“ उधर हमारी दादीसा हठ पर थीं कि हमें हर हालत में यही घोड़ा चाहिए। आप जो चाहे कीमत ले लो। आलमगीर ने दादीसा से पूछा कि आप क्या कीमत दे सकते हैं ? दादीसा झट बोलीं कि तमाम जागीरें और मनसबी इस घोड़े पर कुरबान करते हैं। बादशाह औरंगजेब पूछने लगा कि आप एक घोड़े के पीछे ओहदे और जागीरें तक छोड़ने को तैयार हो ? दादीसा ने बताया कि घोड़े के लिए नहीं, स्वाभिमान और इज्ज़त से सिर ऊँचा करके जीने के लिए हम हर बलिदान देने के लिए तैयार हैं। दादासा की मनसबी और जागीरें लेकर बादशाह ने घोड़ा दे दिया। दादासा और दादीसा ओरशा लौट आए।“

“फिर तो बड़ी बददिमाग थी आपकी दादी। एक घोड़े के बदले जागीरें और रुतबे ठुकराकर घाटे वाला सौदा कमाया उसने !“ काशी नाक चढ़ाती है।

मस्तानी काशी बाई की ओर कड़ी नज़र से देखती है, “घाटे का नहीं, मुनाफे का। इज्ज़त मान धन से नहीं खरीदे जाते। इन्सान के पास स्वाभिमान ही न रहा तो पीछे क्या बचा फिर ?“

“वाहिनी साहिबा, आगे क्या हुआ यह बताओ न ?“ भिहू बाई मस्तानी की साड़ी का पल्लू खींचती है।

“औरंगजेब की वली बहादुर खान अक्सर चापलूसी करता रहता था और बुंदेलखंड पर कब्ज़ा करने के लिए उकसाता रहता था। औरंगजेब ने अपनी सेना भेजकर दादासा पर चढ़ाई कर दी। पूरे तीन साल युद्ध होते रहे। कई लड़ाइयाँ दादासा जीतते रहे और कई हारते रहे। एकबार ओरशा के किले का घेरा लम्बा हो गया और दादासा की तबीयत बहुत खराब हो गई। वह चिंतित हो गए कि शत्रु से लड़ने के योग्य नहीं रहे और हार कर बंदी बनना उन्हें स्वीकार नहीं था। दादासा को वज़ीरों ने चोर दरवाजे से किला छोड़कर भाग जाने का परामर्श दिया। दादासा मान गए, पर दादीसा रानी सारंधा अड़ गईं। दादासा कहने लगे- जीवत रहेंगे तो लड़ सकेंगे, नहीं मारे जाएँगे। दादीसा बोली - कायरता के साथ जीने से बहादुरी के साथ मरना लाख गुना बेहतर है। दादासा की हालत बीमारी के कारण बहुत बिगड़ गई। लड़ना तो दूर की बात रही, वह अपने आप बिस्तर पर से उठने योग्य भी न रहे। उन्होंने दादीसा से विनती की कि वह उन्हें मार दें ताकि वह शत्रु के हाथों अपमानित होकर मरने की अपेक्षा इज्ज़त की मौत मर सकें। दादीसा ने तलवार से दादासा का गला काटकर और अपनी अंगूठी का हीरा चाटकर उसी समय दादासा के साथ आत्महत्या करके मौत को गले लगा लिया। उन्हें मरना स्वीकार था, पर इज्ज़त-आबरू पर दाग लगना बर्दाश्त नहीं था।“ मस्तानी गर्व से सिर ऊँचा कर लेती है।

“अच्छा तो मस्तानी तेरी अंगूठी का हीरा चाटने से भी मृत्यु हो सकती है ?“ राधा बाई समीप बैठी बोल उठती है।

मस्तानी अंगूठी को सहलाने लग जाती है, “हाँ, माताश्री। इसलिए काकाजू ने मुझे यह उपहार में दी थी। जब मैं अल्हड़ लड़की से नवयौवना होकर स्त्री बनी थी तो मेरे काकाजू, महाराजा छत्रसाल ने मुझसे कहा था कि पुत्री, तू जवान हो गई है। कई बार सुन्दरता का वरदान इन्सान का सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है। काकाजू ने यह अंगूठी देते हुए कहा था कि मर जाना, पर कभी इज्ज़त को दाग न लगने देना। यह अंगूठी तेरी रक्षा करेगी।“

“अंगूठी कैसे आपकी रक्षा करेगी ?“ गोपिका बाई भोले पन में प्रश्न कर देती है।

मस्तानी अंगूठे के नाखून की मदद से अंगूठी के हीरे को ऊपर उठाकर खोलते हुए उस में पड़ा सफेद रंग का बुरादा दिखलाती है, “यह देखो, यह विष है। देखने में यह ज़रा-सा लगता है, पर किसी शत्रु की जान लेने या खुद के मरने के लिए पर्याप्त है।“

“क्या ?“ सब स्त्रियों की आँखें फटी की फटी रह जाती हैं। मस्तानी अंगूठी के हीरे को पुनः बंद कर लेती है।

 


झड़प

मस्तानी को बाजी राव के जीवन में आए दो वर्ष का समय बीत चुका होता है। 1730 ई. के मध्य में बाजी राव अहमदाबाद की जंग में उलझा होने के कारण मुगलों के साथ भिड़ने के लिए चला जाता है और पीछे मस्तानी अकेली रह जाती है। दिन रात वह बाजी राव की यादों में खोई रहती है।

चिमाजी अप्पा प्रायः मस्तानी से मिलने के लिए कोथरूड़ आता रहता है और उसकी आवश्यकता की वस्तुएँ देकर चला जाया करता है। लेकिन एक दिन चिमाजी अप्पा मस्तानी से मिलने जाता है तो रात में वहीं ठहर जाता है।

चिमाजी अप्पा उस दिन बहुत उदास होता है और दोपहर से ही निरंतर शराब पीने के कारण शाम तक बहुत अधिक शराबी हो जाता है। शराब पीते पीते चिमाजी अप्पा अचानक ज़ोर ज़ोर से रोने लग पड़ता है। मस्तानी उसका रुदन सुनकर उसके पास जाती है। अतिथिगृह के द्वार में प्रवेश करते ही मस्तानी देखती है कि चिमाजी अप्पा हाथ में जाम लिए गलीचे पर लेटा पड़ा होता है। मस्तानी ने ऐसी अवस्था मेें चिमाजी अप्पा को पहले कभी नहीं देखा होता।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा को उठाकर बिठाती है, “देवरसा, यह आज आपको क्या हो गया है ?“

चिमाजी अप्पा मस्तक पर बल डालकर बड़ी कठिनाई से आँखें खोलता है, “वाहिनी सा...हि...बा ! मुझे रोको नहीं। मैं आज मदिरा पी पीकर मर जाऊँगा।“

“क्यों मरना है ? यह कैसी बातें कर रहे हैं आप ?“ मस्तानी, चिमाजी अप्पा के करीब ही गलीचे पर बैठ जाती है।

चिमाजी अप्पा की शराब उतरने लग जाती है।

“मैं ठीक कह रहा हूँ। यह भी कोई जि़न्दगी है। स्त्री के बिना पुरुष का क्या हाल होता है ? यह मैं ही जानता हूँ। आज आपकी देवरानी रकमा बाई की बहुत याद आ रही है। रकमा को मरे दो महीने हो चले हैं(उसकी मृत्यु अगस्त 1730 ई. में हुई थी)। महीने भर के सदाशिव राव (चिमाजी अप्पा और उसकी पत्नी रकमा बाई का पुत्र) को मेरे पास छोड़कर वह भगवान के पास चली गई। मैं बहुत अकेला रह गया हूँ...।“

“ईश्वर की करनी को कौन टाल सकता है ? मुझे आपके साथ पूरी सहानुभूति है। आप दूसरा विवाह कर लें।“ मस्तानी अप्पा को दिलासा देती है।

“आई तो बहुत कह रही है कि मैं अनपूर्णा बाई से विवाह करवा लूँ, पर...।“

“पर क्या ?“

“ले, वो बच्ची सी मेरी क्या ज़रूरतें पूरी करेगी ? मुझे तो कोई दूसरी खेली खाई नखरैली औरत चाहिए।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के चेहरे पर अपनी दृष्टि गड़ा लेता है।

मस्तानी अपनी नज़रें झुका लेती है, “दूसरी कौन ? कौन सी औरत ?“

“वही जो मुर्गाबी की तरह चलती है...जिसकी सुराही जैसी बिलांद भर लम्बी गर्दन है...जो मोरांे की तरह ठुमक ठुमक कर नृत्य करती है... कोयल की तरह सुरीला गाती है... लौटे जैसी जिसकी कमर है...जंगी हाथी की भाँति हमेशा झूल झूलकर मस्त चाल से चलती है...बस, वही मृगनैनी चाहिए हमें तो चिŸा बहलाने के लिए...।“ चिमाजी अप्पा मस्तानी के समीप खिसक जाता है।

मस्तानी, चिमाजी अप्पा की बदनीयत भाँपकर दूर खिसक जाती है, “यह क्...क्या कह रहे हो ? किसकी बात करते हैं अ...आप ?“

“अभी भी नहीं समझी। मस्तानी, मैं तेरी बात करता हूँ। कंजरी, तू दिन रात आँखों में रड़कती है।“ चिमाजी अप्पा झपटकर मस्तानी को बांह से पकड़कर खींचता है और अपने आलिंगन में लेकर चूमने लग पड़ता है।

“नही...। मुझे छोड़ दो।“ मस्तानी उसकी पकड़ से छूटने के लिए ज़ोर लगाती है।

परंतु अप्पा उसको अपनी बाहों में और अधिक कसकर भींचते हुए फर्श पर गिरा लेता है और उसके ऊपर चढ़ जाता है, “तवायफ़ ! तवायफ़ों की तरह पेश आ। अधिक शरीफ़जादी बनने कोशिश न कर। तेरे ये नखरे मेरे सामने नहीं चलने वाले।“

चिमाजी अप्पा की पकड़ में से आज़ाद होने का संघर्ष करती मस्तानी अपनी कमर में बंधा छुरा निकालकर चिमाजी की छाती पर वार कर देती है और उसको धक्का देकर दूर फेंकती हुई उठ खड़ी होती है, “अप्पा, अपनी औकात में रह। मुझे कमज़ोर स्त्री न समझना। मस्तानी हूँ मैं, मस्तानी। बुंदेलखंड की राजपूतनी। फाड़कर रख दूँगी।“

चिमाजी अप्पा द्वारा मोटे वस्त्र पहने होने के कारण छाती पर छुरे से मामूली सा चीरा आता है। चिमाजी अपने ज़ख़्म को स्पर्श करते हुए छुरा लिए खड़ी मस्तानी की ओर देखता हुआ उठने का यत्न करता है, “मुझे भी निजाम न समझना। मराठा हूँ, मराठा ! मस्तानी, देखना मराठे ही करेंगे तेरे दांत खट्टे। दो कौड़ी की वेश्या और ये तेवर ? देख लूँगा तुझ बड़ी वेश्या को... अभी बनाता हूँ तुझे बंदी, कंजरी कहीं की।“

चिमाजी अप्पा तीव्र गति से मस्तानी पर झपट पड़ता है। मस्तानी, चिमाजी अप्पा के हाथ आने से पहले ही भागकर दीवार पर ढाल से टंगी तलवार खींच लेती है, “अप्पा, पहली और आखिरी बार कह रही हूँ। मेरी ओर दुबारा आँखें उठाकर भी देखा तो आँखें निकाल लूँगी और तेरा वो हश्र करूँगी जो वारंगल की रानी तेलंगाना ने उसकी अस्मत को हाथ डालने वाले नवाब का किया था। तेरी भलाई इसी में है कि तू चुपचाप यहाँ से चला जा और दुबारा मेरी नज़रों के सामने न आना, नहीं तो मैं बहुत बुरा करूँगी।“

मस्तानी चंडी का रूप धारण किए खड़ी होती है। चिमाजी अप्पा अवसर की नज़ाकत को समझ जाता है और लज्जित सा होकर वहाँ से चला जाता है।

मस्तानी, बाजी राव से अप्पा के साथ हुई इस झड़प के विषय में कोई बात नहीं करती। लेकिन इस घटना के बाद मस्तानी हर समय बाजी राव के अंग-संग रहने का निश्चय कर लेती है और युद्धों के दौरान भी बाजी राव के संग ही जाने का मन बना लेती है।

 
हैदराबाद और निज़ाम-उल-मुलक

हैदराबाद के इर्द गिर्द वाले क्षेत्र में गोलकुंडा (Shephered’s Hill) पर 624 ई. से 1075 ई. तक चालुक्या वंशियों ने राज किया था। 1158 ईसवी के बाद कल्याण के चालुक्या का साम्राज्य टूटकर बिखर गया। उनके एक भाग में से वारंगल के काकतिया शासक हुए थे। दूसरे भाग में से द्वारसमुंदर के होएसल, तीसरे देवगिरी के यादव। फिर 1190 ई. से 1310 ई0 तक काकतिया वंश, वारांगल (वर्तमान हैदराबाद, आंध्र प्रदेश से 148 किलोमीटर उŸार-पूर्व की ओर) से सिंहासन पर बैठकर राज करते रहे। काकतिया को अपना राज्य कायम रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ा था।

प्रोलराज दातिया के समय काकतियों की प्रसिद्धि बहुत बढ़ी। प्रोलराज दातिया के पोते गणपति ने साम्राज्य का कांची तक विस्तार किया। गणपति की पुत्री रुद्रमा ने अपनी विलक्षण शासननीति से उल्लेखनीय इतिहास रचा। प्रताप रुद्रदेव (प्रथम), दातिया और काकतिया राजाओं की दिल्ली के सुल्तानों के साथ ठनाठनी होती रही थी। हमला करने के लिए अल्ला-उद-दीन खिलजी द्वारा भेजी सेना को प्रताप रुद्रदेव (प्रथम) के हाथों 1303 ई. में पराजित होकर वापस लौटना पड़ा था। चार वर्ष बाद यादवों की पराजय से उत्साहित होकर मुसलमान हुक्मरान फिर काकतिया नरेश पर हमला बोलने आ गए। दिल्ली का सुल्तान वारंगल से धन-दौलत लूटना और कर के रूप में निरंतर आमदनी चाहता था। सुल्तान ने अपने सेनापति मलिक काफूर को फौज देकर प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) को अपने अधीन करने के लिए भेजा। प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) ने वारंगल के किले में से डटकर मुकाबला किया। सफल घेरा डालकर मलिक काफूर ने 1310 ई. में काकतिया नरेश को संधि के लिए विवश कर दिया। संधि में काकतिया नरेश ने मलिक काफूर को 100 हाथी, 7000 घोड़े, असंख्या हीरे-जवाहरात, रत्न और ढाले हुए सिक्के दिए। इसके अतिरिक्त राजा ने दिल्ली के सुल्तान को वार्षिक कर देना भी स्वीकार कर लिया।

1310 ई. से 1321 ई. तक खिलजी वंश ने गोलकुंडा और वारंगल पर शासन किया। गोलकुंडा की कोयला खानों में से इसी समय अल्लाउद्दीन खिलजी कोहेनूर हीरा लूटकर दिल्ली ले गया। अल्लाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के पश्चात अराजकता फैल गई और प्रताप रुद्रदेव(प्रथम) दातिया ने कर देना बंद करके अपने राज्य की सीमाओं को फैलाना प्रारंभ कर दिया। तुगलक वंश के गियासउद्दीन ने अपने पुत्र मुहम्मद जौना को सेना देकर वारंगल पर कब्ज़ा करने भेज दिया। हिंदू राजाओं ने बहादुरी के साथ मुकाबला किया और उसको डराकर भगा दिया। करीब चार महीने बाद भारी लश्कर के साथ फिर आक्रमण हुआ तो युद्ध में काकतिया नरेश को अपने परिवार और सरदारों सहित आत्मसमर्पण करना पड़ा।

1325 ई. में वारंगल पर इस प्रकार तुगलक वंश का नियंत्रण हो गया और जौना ने वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर रख दिया। 1347 ई. में मुहम्मद बिन तुगलक के सिपहसालार अल्लाउद्दीन बाहम शाह ने बगावत कर दी और अपनी बाहम शाही सल्तनत दक्खिनी पठार में कायम करके गुलबर्ग (वर्तमान हैदराबाद से 200 किलोमीटर पश्चिम में) को अपनी राजधानी बना लिया। गोलकुंडा के शासक सुल्तान कौली कुतब शाह ने बाहमनी सल्तनत के विरुद्ध विद्रोह करके कुतब शाही राज 1518 ई. में स्थापित किया। 1687 ई. (21 सितम्बर) में गोलकुंडा सल्तनत मुगल बादशाह औरंगजेब के अधीन आ गई। कब्ज़े वाले इलाके को उसने डेकन (दक्खिन) सूबे का नाम दे दिया और अपनी राजधानी गोलकुंडा से औरंगाबाद (हैदराबाद से 550 किलोमीटर उŸार-पश्चिम की ओर) में परिवर्तित कर ली।

1713 ई. में फर्खशियार मुगल बादशाह ने आसिफ़ जाह (प्रथम) को डेकन(दक्खिन) का राज्य प्रतिनिधि यानी निजाम-उल-मुल्क बना दिया। 1724 ई. में आसिफ़ जाह ने मुबारिज खान को पराजित करके दक्खिनी सूबे को अपने अधिकार में ले लिया और आसिफ़ जाह वंश का प्रारंभ किया। दक्खिन को उसने हैदराबाद दक्खिन कहना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार, पुनः आसिफ़ जाह निज़ाम यान हैदराबादी निज़ामों का शासन चल पड़ा।

हैदराबाद में बैठा निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन (20 अगस्त 1671 - 1 जून 1748), आसिफ़ जाह(प्रथम) दक्खिनी भारत का दिल्ली के बादशाह द्वारा स्थापित किए राज का प्रतिनिधि बनकर अपने पैर जमाने लग पड़ा था। तुर्क आसिफ़ जाह समरकंद (वर्तमान में उजबेकिस्तान) से था। उसका दादा ख्वाजा आबिद, बुखारा रियासत के समरकंद के अधीन पड़ने वाले नगर अलीआबाद का था। लेकिन उसका पिता सहाबुद्दीन खान, आलम शेख और सूफी मत का होने के कारण अधिकांश समय सुहरावर्द, खुरासान (वर्तमान में कुद्रीस्तान) में ही रहा। उसकी ननिहाल सैयद मीर हमदान, समरकंद वाले के खानदान में से थे। (प्रसिद्ध सूफी संत शेख शहाबुद्दीन सुहराववर्दी भी इन्हीं के वंश में ही हुआ है)।

ख्वाज़ा आबिद, काज़ी और शेख-उल-इस्लाम था। वह मक्का में हज करने जाते समय 1655 ई. में शाहजहाँ के शासनकाल के समय हिंदुस्तान में आया था। बादशाह ने दरबार में आमंत्रित करके भारी सम्मान, खिल्लत और उच्च पदों की पेशकश की थी। जिसे उसने हज से लौटकर 1657 ई. मंे औरंगजेब की सेवा में उपस्थिति होकर स्वीकार किया। उस समय औरंगजेब दक्खिन में अपने पिता शाहजहाँ द्वारा बनवाये मयूर राज के सिंहासन (The Peacock Throne : Mayurasana, Thakt-e-Tavus was a famous jeweled throne that was the seat of the Mughal emperors of India. It was commissioned in the early 17th century by Emperor Shah Jahan and was located in the Red Fort of Delhi. The original throne was subsequently captured and taken as a war trophy in 1739 by the Persian king Nader Shah, and has been lost ever since. A 2000 report by The Tribune, estimated the value of the Peacock Throne at $810 million USD Rs. 4.5 billion) पर विराजमान होने के लिए हाथ-पांव मार रहा था। ख्वाजा आबिद ने धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन के अतिरिक्त शस्त्र विद्या भी सीखी हुई थी। औरंगजेब ने उसको अपनी फौज में भर्ती करके ‘इक खाना’ की उपाधि प्रदान की थी। उसके पास फौज में उच्च पद, 3000 पैदल सिपाही और 500 घुड़सवार थे। कुछ छोटे मोटे युद्धों के बाद औरंगजेब ने उसको पहले अजमेर का सूबेदार और फिर मुल्तान का सरपरस्त बना कर ‘खिलचे खाना’ की उपाधि दी थी।

30 जनवरी 1687 ई. को गोलकुंडा के कुतबशाही शासक के साथ हुए युद्ध में ख्वाजा आबिद की अपनी ही तोप का गोला फंस जाने से मृत्यु हो गई थी। उसके पाँच पुत्र थे। जिनमें से सबसे बड़ा शहाबुद्दीन खान उर्फ़ गाज़ी-उद-दीन खान, शाह जहां के महा मंत्री सदाउद्ौला खान की पुत्री साफिया खानुम से ब्याहा हुआ था और बादशाह के दरबार में उच्च अधिकारी था। गाज़ी-उद-दीन खान के पैदा होने वाला पुत्र कमर-उद-दीन, निज़ाम-उल-मुल्क और आसिफ़ जाह वंश का संस्थापक बना था।

निज़ाम-उल-मुल्क कमर-उद-दीन ने बड़ी चतुरता के साथ अपने क्षेत्र में बादशाह की पकड़ ढीली करके अपनी पकड़ मज़बूत की और धीरे धीर विद्रोही तेवर अपना लिया। शासन के नशे में निज़ाम-उल-मुल्क ने चीकलथान में 1721 ई. में हुई दिल्ली दरबार और मराठों की संधि को भी तोड़ दिया। संधि की शर्तों के अनुसार दक्खिन के छह सूबों की चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का हक मराठों को था। निज़ाम-उल-मुल्क मराठों द्वारा चैथ उगाहने के हक का विरोध करने लग पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क आहिस्ता आहिस्ता अपनी शक्ति बढ़ाता गया और 1722 ई. में उसने बादशाह मुहम्मद शाह के विरुद्ध विद्रोह का झंडा खुलेआम ऊपर उठा लिया। उसके उपरांत निज़ाम ने अपना स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की घोषणा कर दी। औरंगाबाद से बदलकर हैदराबाद को उसने अपनी राजधानी बना लिया। सन 1724 ई. तक निज़ाम-उल-मुल्क दक्खिन में गुजरात और मालवा पर कब्ज़ा करने के पश्चात स्वतंत्र होकर शासन करने लग पड़ा था। उसने अहमदाबाद का राज्यपाल अपने मामा हमीद खां को बना दिया। सरबुलंद खान उस समय काबुल में था। उसने अपने स्थान पर सुजामत खान को अपना उतराधिकारी नियुक्त कर दिया। हमीद खान डर कर अपना अधिकार छोड़ने को तैयार हो गया था। परंतु उन्हीं दिनों खंडो राव दाभाड़े के सहयोगी पिलाजी गायकवाड़ की तरह कंठाजी कदमबांडे भी गुजरात से कर वसूल किया करता था। हमीद खान ने कंठाजी की मदद से सुजामत खान को मरवा दिया। सुजामत खान का भाई रुस्तम अली सूरत का फौजदार था। उसने पिलाजी गायकवाड़ के साथ मिलकर हमीद खान पर हमला कर दिया। हमीद खान के पक्ष में मराठों को देखकर गायकवाड़ भी उनके साथ जा मिला और रुस्तम अली मारा गया। उसके बाद कदमबांडे और गायकवाड़ में चैथ वसूली को लेकर झगड़े होने लगे। तब हमीद खान ने उनकी लड़ाई समाप्त करने के लिए इलाकों का बंटवारा कर दिया कि मही नदी के पश्चिम की तरफ से कदमबांडे और पूर्वी दिशा से दाभाड़े चैथ वसूल किया करेगा।

निज़ाम-उल-मुल्क की धोखाधड़ी से तैश में आकर बादशाह ने अपने सिपहसालार मुबरेज खान को एक सेना की टुकड़ी देकर निज़ाम-उल-मुल्क को सबक सिखाने के लिए भेजा। लेकिन मुबरेज खान को उस के साथ निपटने के लिए मराठों की आवश्यकता पड़ गई। दिल्ली के बादशाह ने मराठों की शर्तें मान कर उनसे सहायता की पुकार की। छत्रपति शाहू ने बाजी राव को इस कार्य की जिम्मेदारी सौंप दी। बाजी राव 1724 ई. को अपना लश्कर लेकर शाही फौज की सहायता के लिए शकरखेड़ा के मैदान में पहुँच गया।

लेकिन युद्ध में से निज़ाम-उल-मुल्क बचकर निकल गया और उसने मराठों की शक्ति को चूर करने के लिए मराठों के बीच फूट डालने की योजनाएँ बनानी प्रारंभ कर दीं।

1726 ई. में बाजी राव कर्नाटक गया हुआ था। उस समय निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठा प्रतिनिधि श्रीपदराव को बरार की जागीर देकर अपनी ओर कर लिया। दरअसल, श्रीपदराव बाजी राव से ईष्र्या करता था। उसके उपरांत निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को प्रसन्न करने के लिए पूणे में मराठा राज स्थापित कर दिया। इसके बाद निज़ाम ने श्रीपदराव के माध्यम से शाहू के साथ संधि कर ली जिसके अनुसार शाहू ने हैदराबाद की चैथ और सरदेशमुखी को छोड़ना था और चैथ के बदले निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति को एक सुनिश्चित वार्षिक रकम देनी थी। सरदेशमुखी के एवज में इंदापुर के निकट की जागीर भी निज़ाम-उल-मुल्क ने छत्रपति शाहू को देने का वायदा किया।

जब बाजी राव कर्नाटक से लौटकर आया तो उसको यह संधि उचित प्रतीत न हुई और इस मामले को लेकर बाजी राव और श्रीपदराव के बीच झगड़ा हो गया।

निज़ाम ने कोहलापुर के संभाजी (द्वितीय) को भड़काकर छत्रपति की गद्दी के लिए दावेदार बना दिया और चंद्रसेन यादव, उदाजी चवन, राव रंभा निभबालकर जैसे मराठा योद्धे छत्रपति शाहू से भिड़ा दिए। निज़ाम-उल-मुल्क ने चाल चलकर छत्रपति को संदेश भेजा कि कोहलापुर में केवल शाहू के व्यक्ति ही नहीं अपितु संभाजी के कारिंदे भी चैथ वसूलते हैं। इसलिए पहले निर्णय कर लिया जाए कि कौन छत्रपति है और चैथ वसूलने का अधिकारी। जब तक यह निर्णय नहीं होता, वह किसी को अपने इलाके में चैथ एकत्र करने की अनुमति नहीं देगा।

निज़ाम-उल-मुल्क का संदेश सुनकर छत्रपति शाहू क्रोध में आ गया। उसने बाजी राव को निज़ाम पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। बाजी राव ने जालना प्रांत से बहुत सारा धन उगाहा और फिर फुर्ती के साथ जाकर औरंगाबाद से बुराहनपुर पर धावा बोलने की अफ़वाह फैला दी। जब कि वास्तव में बाजी राव उस समय खानदेश की ओर गया हुआ था। गुजरात से मराठा निडर होकर वसूली किए जा रहे थे।

बुराहनपुर पर मराठों के हमले का समाचार सुनकर निज़ाम-उल-मुल्क अपनी फौज के साथ बुराहनपुर पहुँच गया। वहाँ पहुँकर निज़ाम को पता चला कि असल में बाजी राव उसके क्षेत्र गुजरात में लूटमार करने चला गया था। निज़ाम-उल-मुल्क को दिशा बदलनी पड़ी। लेकिन निज़ाम बाजी राव के दांत खट्टे करने के लिए मचलने लग पड़ा।

1727 ई. में पेशवा बाजी राव दक्खिन से चैथ उगाहने के लिए गया हुआ था तो निज़ाम-उल-मुल्क ने अवसर का लाभ उठाने के उद्देश्य से पूणे पर हमला कर दिया। निज़ाम-उल-मुल्क के दबाव और संभाजी की राजगद्दी हथियाने की नीयत के कारण सतारा के लिए भी ख़तरा पैदा हो गया था और छत्रपति शाहू को ससवाद के निकट पुरानधर के किले में शरण लेनी पड़ी थी।

जब चैथ एकत्र करके बाजी राव को निज़ाम-उल-मुल्क द्वारा पूणे पर किए हमले की जानकारी मिली तो वह तुरंत पूणे की ओर लौट आया। निज़ाम-उल-मुल्क पहले ही वहाँ अपनी विशाल सेना लिए बैठा पेशवा बाजी राव की प्रतीक्षा कर रहा था।

बाजी राव बहुत दूरंदेशी, चतुर और शत्रु से सदैव एक कदम आगे चलने वाला योद्धा था। उसने भारी फौज के साथ उलझकर अपना नुकसान करवाना उचित नहीं समझा। बाजी राव ने विशेष युद्धनीति तैयार की और जलणा, खानदेश और बुरहानपुर जैसे जो निज़ाम-उल-मुल्क के अधीन थे, इलाकों में लूटमार करनी प्रारंभ कर दी। चारों ओर मुगलों में हाहाकार मच गई। बाजी राव का उकसाया हुआ निज़ाम-उल-मुल्क अपनी आधी सेना पूणा में छोड़कर बाकी दस्ते के साथ बाजी राव की ओर चल दिया। बाजी राव अपनी चाल में सफल हो गया और निज़ाम की शक्ति दो हिस्सों में विभाजित हो गई। रास्ते के मध्य में पालखेड़ (औरंगाबाद के निकट) के मैदान में पेशवा ने निज़ाम-उल-मुल्क को उसकी सेना सहित घेरे में ले लिया। निज़ाम के लिए स्थिति उस समय और अधिक चिंताजनक हो गई जब बाजी राव ने उसको मिलने वाली बाहरी मदद रोकर रसद भी बंद कर दी। भोजन और पानी तक भी बाजी राव ने निज़ाम-उल-मुल्क की फौज तक कई दिन न पहुँचने दिया। निज़ाम-उल-मुल्क को विवश होकर घुटने टेकने पड़े और पेशवा के साथ 6 मार्च 1728 ई. में मूंगीशेव गांव में संधि करनी पड़ी थी। संधि की शर्तों के अनुसार निज़ाम-उल-मुल्क ने मराठों के चैथ उगाहने का हक मंजूर कर लिया और छत्रपति के तौर पर शाहू जी को स्वीकार कर लिया। निज़ाम ने संभाजी (द्वितीय) के साथ भविष्य में कोई सम्पर्क न रखने का वचन भी दिया।

अक्तूबर 1728 ई. को बाजी राव ने अपने लश्कर सहित मालवा पर चढ़ाई कर दी। इस युद्ध में बाजी राव का भाई चिमाजी अप्पा, तानोजी शिंदे, मल्हार राव होलकर और ओदाजी पवार आदि योद्धा भी डटकर लड़े। मराठों ने मुगलों को करारी पराजय देते हुए मौत के घाट उतार दिया और बहुत सारे मुगलों को बंदी बना लिया। इस प्रकार बहुत ही कम समय में मराठों ने मालवा पर अपना कब्ज़ा कर लिया।

उससे कुछ अरसे बाद मुगलों ने अपनी हार का बदला लेने और मराठों से मालवा छीनने के लिए अंबर के सवाई जैय सिंह और मुहम्मद खान बंगस को अपना प्रतिनिधि बनाकर मराठों से उन्हें भिड़वा दिया। परंतु मराठों के हाथों इन दोनों को भारी नुकसान उठाना पड़ा।

मुगल बादशाह के राजपाल मुहम्मद खान बंगस ने 1727 ई. में मराठों और बुंदेलों के साथ अनेक झड़पें कीं। लेकिन उसको कोई विशेष सफलता नहीं मिली। इसी वर्ष मुहम्मद खान बंगस ने बुंदेलखंड के महाराजा छत्रसाल को निशाना बनाकर उस पर हल्ला बोल दिया। महाराजा छत्रसाल ने छत्रपति शाहू से मदद मांगी। लेकिन छत्रपति, मराठा फौज के कहीं दूसरी तरफ के युद्ध में लगी होने के कारण समय पर अपनी सहायता न भेज सका। बुंदेलों ने जैतपुर के किले से बहादुरी के साथ कई दिनों तक मुकाबला किया, परंतु अंत में महाराजा छत्रसाल को विवश होकर हार स्वीकार करनी पड़ी और बंगस द्वारा बंदी बनाये जाने के बाद संधि करनी पड़ी।

1729 ई. में मुहम्मद खान के दमन से आज़ाद होने के लिए बुंदेलखंड नरेश महाराजा छत्रसाल ने बगावत कर दी। मुहम्मद खान बंगस ने फिर जैतपुर के किले को फरवरी 1730 ई. में अपनी सेना सहित आ घेरा। महाराजा छत्रसाल ने मराठों से युद्ध में सहायता मांगी। उस समय बाजी राव बुंदेलखंड के करीब की गराह, मालवा में ही था। छत्रपति का आदेश सुनते ही वह महाराजा छत्रसाल की सहायता के लिए जैतपुर की ओर चल पड़ा। मुगलों के जरनैल बंगस को बाजी राव ने जैतपुर में आकर शिकस्त दी और उसकी सहायता के लिए आ रहे उसके पुत्र को भी बंदी बनाकर क़त्ल कर दिया। मुहम्मद खान बंगस ने महाराजा छत्रसाल को भविष्य में कोई नुकसान न पहुँचाने का वायदा करते हुए दिल्ली जाने के लिए राह छोड़ने की विनती की और अपनी जान बचाई। पेशवा बाजी राव के सहयोग से खुश होकर महाराजा छत्रसाल ने बाजी राव को अपनी पुत्री मस्तानी का रिश्ता करने के साथ साथ अपने दो पुत्रों जगतराम और हृदय शाह के बराबर अपनी जागीर में से तीसरा हिस्सा अर्थात सागर, बांदा और झांसी की जागीरंे प्रदान कीं। बाजी राव ने बुंदेलखंड की अपनी जागीर का सरपरस्त गोबिंद पंत बुंदेल को बना दिया।

उस समय गुजरात की राजसी व्यवस्था डगमगा रही थी। बहुत सारे हाकिम स्वतंत्र होकर अपनी मनमर्जी कर रहे थे। इनमें से कई मराठे अथवा मराठों के समर्थक ही थे। जिनमें पिलाजी गायकवाड़ और कंठाजी कदमबांडे प्रमुख थे। इन दोनों का संसारपति खंडो राव दाभाड़े के साथ गठबंधन था जो कि गुजरात में काफी दबदबा रखता था। मराठा सेनापति खंडो राव दाभाड़े को छत्रपति शाहू जी ने गुजरात की चैधराहट बख़्शी थी। 27 सितंबर 1729 ई. को खंडो राव के निधन के पश्चात उसके पुत्र तिंबरकर दाभाड़े ने सेनापति बनकर अपने पिता वाला कार्य संभाला। इनके अलावा गुजरात में हामिद खान भी सक्रिय पदाधिकारी था जिसको निज़ाम-उल-मुल्क की छत्रछाया और समर्थन प्राप्त था।

मुगल बादशाह ने सरबुलंद खान को जब जुलाई 1724 ई. में गुजरात का प्रबंध अपने अधीन करने के लिए भेजा था तो उसने लड़ाई की अपेक्षा कंठाजी कदमबांडे के साथ संधिनामा करके उसको माही दरिया से उतर के इलाके की चैथ वसूलने का अधिकार दे दिया था। बाजी राव ने गुजरात की चैथ एकत्र करने की सरबुलंद खान से ओदेजी पवार के माध्यम से स्वीकृति मांगी तो सरबुलंद खान ने इन्कार कर दिया। बाजी राव ने गुस्से में आकर अपने भाई चिमाजी अप्पा को गुजरात के पेटलड और ढोकलां शहरों में लूटमार करने के लिए भेज दिया। सरबुलंद खान एक ही समय में बांडे और पेशवा की फौज से निपटने में असमर्थ था। इसलिए अपनी परेशानियों को कम करने के लिए उसने न चाहते हुए भी बाजी राव के साथ 1730 ई. में संधि करके पेशवा को गुजरात की चैथ और सरदेशमुखी के हक दे दिए। परंतु सूरत का समुद्री तट इस संधि में शामिल नहीं किया।

1730 ई. में दक्खिनी सूबे की सरदेशमुखी और निज़ामों से चैथ वसूलने के लिए छत्रपति महाराजा शाहू ने बाजी राव को मुहिम पर जाने का आदेश दिया तो मस्तानी भी संग जाने की हठ करने लगी। क्योंकि वह बाजी राव के अनुपस्थिति में पीछे अकेली नहीं रहना चाहती थी।

बाजी राव ने मस्तानी से पीछा छुड़ाना चाहा, “मैं तो चैथ वसूलने जा रहा हूँ। तुम वहाँ जाकर क्या करोगी?“

“मैं निज़ामों का खूबसूरत शहर हैदराबाद देखना चाहती हूँ।“

“पर वहाँ जंग भी हो सकती है। मैं सैर-सपाटे के लिए नहीं, फौजी कार्रवाई करने जा रहा हूँ।“

“मैं क्या जंग से डरती हूँ ? देखा नहीं था बुंदेलखंड में मुझे लड़ते हुए ? अब तो जीना मरना तुम्हारे साथ ही है। इसलिए मैं हर जंग मंे आपके साथ ही जाया करूँगी।“

मस्तानी ने नखरा दिखाया तो बाजी राव उसको संग ले जाने के लिए सहमत हो गया।

मस्तानी खुश हो गई, “हाय मेरे मराठा ! मस्तानी को तुम्हारी इन्हीं अदाओं ने ही तो मार रखा है।“

वैसे भी बाजी राव को निज़ाम आसिफ जाह के साथ जंग लड़ने का कोई खास अंदेशा नहीं होता। आसिफ़ जाह वृद्ध होने के कारण बिना कोई देरी किए मराठों के साथ संधि करने के लिए तैयार हो गया। बाजी राव, निज़ाम को मिलने लाठोर के निकट रोहे-रामेश्वर में मिलता है। निज़ाम, बाजी राव को दक्खिनी सूबों की सरदेशमुखी और चैथ देना कबूल कर लेता है और एक आलीशान दावत देता है।

मुगलों से पहले कुतब वंश ने दक्खिनी सूब पर एक सदी राज किया था। पाँचवे कुतब सुल्तान मुहम्मद कौली कुतल शाह द्वारा हैदराबाद में बनवाये चारमिनार और मक्का मस्जिद दिखाने के बाद घोड़ों पर बैठकर पूने की ओर रवाना होते हुए बाजी राव मस्तानी से पूछता है, “हाँ मेरी रानी ! कैसा लगा हैदराबाद ?“

“बहुत ही खूबसूरत है यह शहर।“

“इस शहर का भी बहुत दिलचस्प इतिहास है। जानती हो, कैसे बसा है यह हैदराबाद ?“

“नहीं, तुम ही बताओ। मुझे क्या पता ?“ मस्तानी कंधे उचका देती है।

“मुहम्मद कौली कुतब शाह ने इस हैदराबाद शहर की नींव 1591 ई. में रखी थी। इसका पहला नाम उसने भागनगर रखा था। गोलकुंडा के हुक्मरान सुल्तान इब्राहिम कौली कुतब शाह का पुत्र, मुहम्मद कौली कुतब शाह भागमती नाम की हिंदू नर्तकी को बहुत प्रेम करता था। उसको भागमती का नृत्य देखे बिना चैन नहीं आता था। वह प्रतिदिन भागमती के गांव चिचलम, मूसी नदी पार करके उसका नृत्य देखने जाया करता था। भागमती से मुहम्मद कुतब शाह का ध्यान हटाने के लिए उसके पिता सुल्तान इब्राहिम ने मुहम्मद कुतब शाह को अनेक भारतीय, अरबी और अन्य देशों से मंगवाकर खूबसूरत स्त्रियाँ पेश कीं। पर कुतब शाह के मन को कोई नहीं भाई। तुर्क कुतब शाह और हिंदू कंचनी भागमती के संबंधों को लेकर विरोध उत्पन्न हो गया और कुतब शाह को भागमती के साथ मिलने पर उसके पिता ने पाबंदी लगा दी।“

“फिर तो अपनी वाली कहानी ही थी उन बेचारों की भी।“ मस्तानी हँसने का ढोंग करती हुई गंभीर हो जाती है।

बाजी राव बराबर वाले घोड़े पर जा रही मस्तानी का हाथ पकड़ लेता है, “एक दिन बहुत बरसात हो रही थी और नदी में बाढ़ आई हुई थी। घरों के घर बाढ़ के पानी में तबाह हो गए। मुहम्मद कुतब शाह को भागमती की चिंता सताने लगी। वह भागमती से मिलने के लिए तड़प उठा। इस भयानक तूफानी हालत में भी कुतब शाह अपनी प्रेमिका भागमती से मिलने घोड़े पर चला गया। लोग उसको बहुत रोकते रहे। पर वह न माना और भागमती से मिलने के लिए घोड़े सहित नदी में कूद पड़ा। उसका घोड़ा नदी के पानी में ही कहीं डूब गया। परंतु जैसे तैसे मुहम्मद कुतब शाह सही सलामत दूसरे किनारे पर पहुँच गया और उसने भागमती को खोज लिया। सारा चिचलम गांव बाढ़ की मार से तबाह हो गया था। कुतब शाह के पिता सुल्तान इब्राहिम ने अपने पुत्र की भागमती से मिलने की जिद को देखकर मूसी नदी पर पत्थरों का मजबूत पुल बना दिया जिसे पुराना पुल कहते हैं। गांव फिर से आबाद हो गया। मुहम्मद कुतब शाह उसी पुल से होकर अपनी प्रेमिका भागमती से नित्य मिलने जाता। दिन व्यतीत होते गए। फिर...।“ बाजी राव सांस लेने के लिए चुप हो गया।

मस्तानी बहुत उत्सुक हो गई, “फिर क्या हुआ ?“

बाजी राव अपनी बात को आगे बढ़ाता है, “फिर प्लेग की बीमारी फैल गई। इस महामारी से भागमती के गांव के सभी लोग मरने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह भागमती को गोलकुंडा अपने पास ले गया और बाद में कुतब शाह ने भागमती के नाम पर मूसी नदी के तट पर भागनगर नाम का नया शहर बसा दिया। पिता के बाद राजगद्दी पर बैठने के बाद मुहम्मद कुतब शाह ने भागमती का धर्म परिवर्तन करवाकर उसके साथ विवाह करवा लिया और उसका नाम हैदर महल रख दिया। कुतब शाह ने अपने एक पुत्र का नाम हैदर शाह (शेर बहादुर) रखा। हैदर शाह ने भागमती नगर का विस्तार करके इसको बागों, उपवनों से सजा दिया। इस शहर का नाम लोग भागनगर से बागनगर अर्थात बागों का नगर प्रचारित करने लग पड़े। मुहम्मद कुतब शाह ने इसलिए इसका नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया था यानी हैदर के लिए आबाद किया गया शहर ताकि उसकी पत्नी के नाम से यह शहर जुड़ा रहे।“

“क्या मेरे नाम पर आप भी कभी किसी जगह का नाम रखोगे ?“ अकस्मात मस्तानी प्रश्न कर देती है।

“हाँ, तेरे लिए हम भी कुछ ऐसा बनाएँगे जिसको दुनिया देखती रह जाएगी। पर समय आने पर ही तुम्हें बताएँगे मेरी जान।“ बाजी राव मुस्कराकर मस्तानी की ओर देखता है और वह अपनी मंजि़ल की ओर बढ़ने लग जाते हैं।
 


शाही कल्लोल

मस्तानी और बाजी राव का प्रेम नीलगगन की उड़ानें भरने लग जाता है।... छोटी-बड़ी जंगें होती रहती हैं। मस्तानी बाजी राव के साथ साधारण सैनिकों की तरह युद्ध में शामिल होती रहती है। देखते ही देखते, मस्तानी मराठा इतिहास के पृष्ठों पर बादल की भाँति छा जाती है। बाजी राव और मस्तानी का इश्क किसी के मुँह से नगमा बनकर गूंजता है और किसी के अधरों पर चुगली बनकर नाचता है। किंतु दिन आनंदपूर्वक व्यतीत होते रहते हैं।

एक दिन पूरी दोपहर तलवारबाजी का अभ्यास करने के उपरांत मस्तानी हमाम की ओर स्नान के लिए चली जाती है। कनीज़ स्त्रियाँ मस्तानी के वस्त्र उतारकर उसको चबूतरे पर लिटा लेती हैं। एक कनीज़ पैरों की ओर बैठकर मस्तानी के पैरों के तलुवे झसते हुए उंगलियों के पटाखे निकालने लग पड़ती है। दूसरी दासी सिरहाने बैठकर मस्तानी के गज़-गज़ भर लम्बें केशों को आंवले, शिकाकाई, नारियल और अरीठे डालकर बनाये गए चमेली के तेल से तर करने लग पड़ती है। तीसरी सेविका हल्दी, चंदन, केसर, बादाम, दूध, दही, मक्खन के बने मिश्रण का लेप मस्तानी के पूरे नग्न शरीर पर मलने लग पड़ती है। मस्तानी आँखें बंद किए आराम से शारीरिक अंगों पर होती मालिश का आनन्द उठाती लेटी रहती है।

“आलीजा, आप हर समय तेल मालिश ही क्यों करवाते रहते हो ?“ एक कनीज़ प्रश्न करती है।

मस्तानी अंगड़ाई लेती है, “नफ़ा पर बेचता हूँ, छिड़क कर सौदा ख़सारे का... मतलब कि सस्ता सौदा पानी छिड़कने से मंहगे दाम में बिक जाता है।“

मस्तानी की लटों को तेल लगाती हुई बांदी बोलती है, “हुजूरेआली ! बुजुर्गों से सुना करते थे कि मलिका नूरजहाँ के केश धरती को छूते थे। पर मैंने कभी किसी के इतने लम्बे बाल देखे नहीं थे। आपके घुटनों तक आते घने और चमकदार बाल देखकर आश्चर्य होता है। जब किसी को हम बताती हैं तो सुनने वाला यकीन नहीं करता। जब आप केश फैलाते हो तो निरा आबशार ही लगते हैं।“

“कुंवरसा, मेरे दादासा ज्योतिषी थे। मैंने थोड़ी-बहुत ज्योतिष विद्या सीखी है। आपके फूलों जैसे कोमल पैरों की रेखाओं का अध्ययन करने के पश्चात मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि ये किसी साधारण स्त्री के पैर नहीं हैं। आप विशेष और अहम शख्सियत हो। मेरे हाथों में आज वो पैर हैं जिन्हांेने हिंदुस्तान के इतिहास में अपने निशान छोड़ने हैं।“ पैर झसती हुई सेविका बताती है।

दूसरी दासी बयान करती है, “मुगलों से सुना है कि कोह-ए-काफ़ की हूरें बहुत सुंदर होती थीं। पर मुझे नहीं लगता हमारी मस्तानी सरकार से हसीन भी कोई हो सकती है। फिरंगियों जैसा गोरा रंग, बिल्लौरी आँखें, तीखे नक्श, सुडौल गठीला बदन, खुदा द्वारा नाप तोलकर सही अनुपात में बनाया हर अंग, रेशम जैसी चमकती रूई की मानिंद नरम मुलायम चमड़ी।“

मस्तानी हुस्न के गुमान में आकर बीच में ही टोक देती है, “यूँ ही नहीं बना यह चमकीला और लचकीला बदन... बचपन से ही मैंने दूध, मलाइयों के साथ पाला है इस बदन को। बटने मल मलकर नहाती रही हूँ। मेरी अम्मी मुझे इत्र वाले संदली जल से स्नान करवाया करती थी।“

“यह तो प्रत्यक्ष ही दिखाई देता है। परियाँ भी देखें तो बेहोश होकर गिर पड़ें। आपके अंगों से तो बंदे की निगाह फिसलती है।“ मस्तानी के स्तनों पर देसी घी की मालिश करती हुई सेविका शरारत से एक स्तन दबा देती है।

मस्तानी की चीख निकल जाती है, “हा...य...! आहिस्ता.... प्यार से मालिश कर कमजात ! मारेगी मुझको ?“

“मार तो आपने दिया है पेशवा सरकार को, अपने हुस्न की कटारी से। पूरे पूना में धूम मची हुई है कि मराठे, मस्तानी से पटे ! मस्तानी सरकार आपके रूप के सारे हिंदुस्तान में डंके बजे पड़े हैं।“ मस्तानी के हाथों की उंगलियों के पटाखे बजाती सेविका फरमाती है।

पंखी से हवा कर रही दासी भी बोल उठती है, “हमारे पेशवा सरकार भी कौन सा कम हैं ?... जब लाखा जंगी लिबास और चमड़े का जे़रे-बख्तर पहनकर बादल घोड़े पर निकलते हैं तो निज़ामों की नारियाँ और मुगलानियाँ हमारे नीली आँखों वाले सांवले राजकुमार को पर्दों की ओट से ऐडि़याँ उठा उठाकर देखने लग पड़ती हैं। एकबार तो नवाब को जब पेशवा जी मिलने गए तो उसके हरम की सभी स्त्रियाँ पर्दों से बाहर पेशवा जी का दीदार करने आ गई थीं और गियास खान मुँह फाड़े देखता रह गया था। श्रीमंत और मस्तानी बेगम आपकी जोड़ी तो बिल्कुल राम-सीता की जोड़ी लगती है। राधा-कृष्ण की तरह आपकी प्रीत अमर हो जाएगी, मेरी बात याद रखना।“

मस्तानी यह सुनकर आँखें खोल लेती है और एक गहरा निःश्वास उसके अंदर से निकलता है, “हाँ, शायद इसी कारण भाग्य की कैकेयी हमें बनवास दिलाने पर तुली बैठी है।“

“आलीजा, दुख महान व्यक्तियों पर ही आया करते हैं। भगवान इन्सान को उतना ही कष्ट देता है जितनी तकलीफ़ें वह झेल सकता होता है। ग़म मनुष्य को शक्तिशाली बनाने के लिए सहायक सिद्ध होते हैं। जीवन का संघर्ष व्यक्ति को मजबूत बनाता है। बस, आप भी लव-कुश जैसी जोड़ी पैदा कर लो। एक सन्तान की ही कमी है आपके रिश्ते में। बच्चा होने पर ससुराल में औरत की कद्र बढ़ जाती है। देखना, सब ठीक हो जाएगा। आप भट्ट परिवार को अपने जैसा सुंदर और श्रीमंत जैसा बहादुर योद्धा बेटा पैदा करके दो। बस, एक मुल्गा(लड़का) नन्हा-मुन्ना सा पेशवा।“

मस्तानी का चेहरा लज्जा की लाली से गुलाबी हो जाती है, “मुल्गा ?... वाह, नन्हा-मुन्ना सा पेशवा ! बात तो तेरी सोलह आने सही है। पर डर जाती हूँ कि इन ब्राह्मणों के परिवार ने तो मुझे ही स्वीकार नहीं किया, मेरी सन्तान को कैसे स्वीकार कर लेंगे ?“

चंदन की लकडि़यों से बने कोयलों का सेक देकर मस्तानी के बालों को भाप देती एक वृद्ध कनीज़ फूट पड़ती है, “इस दुनिया में आने वाला हर इन्सान अपना भाग्य विधाता से लिखवा कर लाता है जी। यह आपका वहम है, सरकार। जब बड़े पेशवा विश्व नाथ जी का अन्तिम समय करीब आया था तो उन्हांेने मृत्यु से पहले बाजी राव जी के हाथ में भिक्खू जी का हाथ थमाकर उसका खयाल रखने की जिम्मेदारी सौंपी थी। आप स्वयं ही देख लो। पेशवा सरकार उतना अपने सगे भाई चिमाजी अप्पा का नहीं करते, जितना भिखू जी से प्यार करते हैं। उसको कभी महसूस ही नहीं होने दिया कि सौतेला है। फिर यह तो पेशवा बाजी राव की अपनी सन्तान होगी। मुझे आशा है कि नाना साहिब से अधिक लाड़ करेंगे सभी घर वाले। पुरुष के मेल से स्त्री पूर्ण होती है और सन्तान पैदा करके सम्पूर्ण हो जाती है।“

मस्तानी मुस्कराती है, “अच्छा तो यह बात है ? ले फिर मस्तानी तो आँधी ला देगी। तुम बच्चों को खिलाने वाली बनो।“ अलफ़ नग्न मस्तानी उठकर गुलाब जल और इत्रों भरे हमाम में प्रवेश कर जाती है।

पेशवा बाजी राव आता है और दासियाँ उसके वस्त्र उतार देती हैं। निर्वस्त्र होकर बाजी राव मस्तानी के साथ जलकुंड में नहाने लग जाता है। गुनगुने पानी में वे दोनों मस्तियाँ करने लग पड़ते हैं। मस्तानी, बाजी राव को आलिंगन में भरकर उसकी गाल पर अपनी लटें घुमाती हुई पेशवा के कान में फुसफुसाती है, “मैंने सुना है, जल में किया संभोग महायज्ञ के समान होता है।“

पेशवा बाजी राव, मस्तानी की कमर को अपनी बांहों में घेरे में लेकर कस लेता है और उसकी आँखों में छलकती काम वासना को देखता है। वह अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाता। वह मस्तानी को चूमने के लिए तेज़ी से झपटता है जैसे रणभूमि में निज़ामों पर हमला किया करता है। पेशवा की ओर से की गई चुम्बनों की बरसात और प्रेम स्पर्शों का मस्तानी भी डटकर उŸार देती हुई उसके संग जलकुंड में ही आलिंगनबद्ध हो जाती है।

मस्तानी की शरारती आँखों में शरारत नृत्य कर रही होती है, “देखते हैं, आज प्रेम युद्ध में एक मराठा जीतता है या यह बुंदेलन।“

“जीत तो मराठा की ही होगी, मस्तानी, मेरी जान ! मराठा युद्ध में से यूँ ही पीछे नहीं हटा करता। तूने कहावत नहीं सुनी। मरहटा...मर के हटा या मार के हटा...।“ बाजी राव वेग में आकर मस्तानी को और अधिक शिद्दत से भोगने लग जाता है।

जल में हलचल मचाते बाजी राव और मस्तानी की प्रेमभाव को प्रकट करती आवाज़ें हमाम में गूंजने लग जाती हैं...“हूँ...हँ...हा....ऊँ...आ... हँ...अ...!!!“

हमाम का पानी किनारों से इस प्रकार टकराने लग जाता है मानो किसी सागर में भूचाल आया होता है।

...और फिर संभोग के शिखर पर पहुँचकर तूफान समाप्त होने के बाद मस्तानी और बाजी राव पानी में निढ़ाल होकर यूँ गिर पड़ते हैं जैसे घायल सिपाहियों की लाशें रणभूमि में पड़ी होती हैं।

मस्तानी मोह के साथ बाजी राव के बालों में हाथ फिराती है, “उफ्फ मेरे मराठे! जान निकालकर ही हटा।“

“क्या बताऊँ मस्तानी ! नशा करवाकर शरीर में से सारी जान ही निकाल लेती हो। सारा ज़ोर लग गया। देह बेजान हुई पड़ी है। पर तुझे छोड़ने को चित नहीं करता। मन करता है, और संभोग करूँ। सारी सारी रात तुझे भोगकर भी मन नहीं भरता। और बातों को छोड़, तू एकबार नज़ारा ही ला देती है। मेरी जान, आनन्द आ गया। ऐसा लगता है मानो दिल्ली के किले पर केसरी मराठा परचम गाड़ दिया हो।“

“और कौन सा झंडा गाड़ने की कसर छोड़ी है ? औरत के दिल से बड़ी कोई सल्तनत नहीं होती। जो वहाँ झंडा गाड़ लिया, समझो उसने दुनिया फतह कर ली !“ मस्तानी, बाजी राव को कसकर छाती से लगा लेती है।

“मस्तानी, जब तू मुझे आलिंगन में लेकर भींचती है या मेरे ऊपर सवार होकर क्रीड़ा करती हुई अपना लचकीला बदन पतली टहनी की भाँति मरोड़ती है न, धर्म से सच जान, मैं तो आनन्द के सरूर में मरने जैसा हो जाता हूँ।... कहाँ से सीखी है इतनी उतम और आनन्द प्रदान करने वाली यह संभोग कला ?... अवश्य खजराहो(जिला-छत्रपुर, मध्य प्रदेश) के मंदिरों की कामुक मूर्तियों को देखती रही होगी, तभी तेरे अंदर इतना काम समाया हुआ है। मैं तो कईबार सोचा करता हूँ कि मूर्तिकारों ने ये मूर्तियाँ तुझे देख देखकर ही निर्मित की होंगी। भई, खूब लुच्चे हो तुम बुंदेली लोग तो। मंदिरों में भी लुच्चापन बिखेरे फिरते हो।“

मस्तानी, बाजी राव को बांहों में कसती हुई कहती है, “नहीं, मेरे पेशवा सरकार, फिर तो आपको खजराहो के मंदिरों में कामग्रस्त मुद्राओं में बनी नग्न और काम उकसाऊ मूर्तियों के विषय में कोई ज्ञान ही नहीं है।“

“चल, तुम करवा दो ज्ञान, प्रिय !“ बाजी राव मस्तानी की गोरी गर्दन को चूमने लग जाता है।

“वास्तव में, खजराहो चंदेलों की राजधानी थी। यह संस्कृत के शब्द खजूरवखा का बिगड़ा रूप है। खज यानी खजूर और वखा, उसको ढोने वाला। खजूर गरम होती है और मनुष्य के अंदर काम भावनाओं को पैदा करती है। खजूर खाया करिए आप भी।“

“मेरे अंदर तो मस्तानी तुझे देखकर ही विलासी भावनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। हर समय मस्तिष्क में काम का भूत चढ़ा रहाता है।“

“हटो, झूठे कहीं के। अच्छा... मैं बता रही थी कि चंदेलों ने खजराहो में महादेव, लक्ष्मण, चतर्भुज आदि लगभग 85 मंदिरों का निर्माण किया था, इसलिए आज भी वहाँ हिंदू और जैन मंदिर भारी संख्या में देखने को मिलते हैं। पुरातन कथा के अनुसार हेमावती नाम की एक ब्राह्मण कन्या को चंद्रमा ने जबरन पकड़कर भोगा और फिर उसके एक बेटा हुआ। उसका नाम उसने चंद्रवर्मन रखा। इस चंद्रवर्मन से ही चंद्रवंशी चंदेलों के वंश का आगमन होता है। चंदेलों के शासन के समय युवक मठों में विद्या ग्रहण करने के लिए जाया करते थे और उन्हें ब्रह्मचर्य का पालन करवाया जाता था। इसलिए वे ग्रहस्थ जीवन से कोरे रह जाते थे। उनके अंदर काम जाग्रत करने और संभोग की शिक्षा देने के लिए चंदेलों ने क्रीड़ा मुद्राओं वाली मूर्तियाँ बनवाई थीं। फिर इन्हें मंदिरों के बाहर स्थापित इसलिए किया था कि लोग काम पर नियंत्रण रखकर काम से ऊपर उठ सकें। इसी में ग्रसित न रहें। यदि मंदिर मंे प्रवेश करने से पूर्व आपका उन उकसाऊ मूर्तियों को देखकर मन भटकता है तो इसका अर्थ है कि आपको अभी और साधना की आवश्यकता है। आप अभी प्रभु को प्राप्त करने की अवस्था में नहीं पहुँचे हो और मंदिर में जाने के योग्य नहीं हो। वरना उन मूर्तियों को उद्देश्य अश्लीलता का प्रदर्शन करना नहीं है।“

“अच्छा ! चल आ अब पहले एक भरपूर संभोग करते हैं और काम से ऊपर उठते हैं।“ बाजी राव अपनी बांहों में मस्तानी को उठाकर हमाम के कुंड में से बाहर आ जाता है।

पानी से बाहर निकलते ही पेशवा और मस्तानी के गीली देहों को सेविकाएँ सुंगधित वस्त्रों से पोंछ देती हैं। दोनों जन निर्वस्त्र ही एक दूजे से आलिंगनबद्ध होकर आरामगाह की ओर चले जाते हैं। बाजी राव गोल सिरहानों की टेक लगाकर शराब और हुक्का पीने लग जाता है। मस्तानी अफीम का टुकड़ा खाकर बाजी राव को पान परोसती है। बाजी राव गीत सुनने की इच्छा प्रकट करता है। मस्तानी गाती हुई नग्न नृत्य करने लग जाती है। दोनों पूरी रात एकसाथ दारू पीते और रंग रास में व्यस्त एक-दूसरे को प्रेम करते रहते हैं।

कई कई महीने ऐसी रंग रास की महफि़लों का सिलसिला चलता रहता है। बाजी राव और मस्तानी शराब के नशे में धुत होकर एक दूजे को प्यार करते हुए रंगरेलियों का आनन्द उठाते रहते हैं।

दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासियाँ और शाही काम कल्लोलें करते हुए हुए बाजी राव का समय बहुत हसीन गुज़रता है। इस प्रकार के संभोग यज्ञ में आठों पहर, वार, सप्ताह, पखवाड़े, महीने और वर्ष मशरूफ होकर मस्तानी भी बाजी राव के इश्क में कुल आलम को भूल जाती है।

 


संग्राम

चिमाजी अप्पा अपने मन-मस्तिष्क में मस्तानी के विरुद्ध एक गुप्त जंग का बिगुल बजा देता है और मस्तानी को तंग करने के लिए राजनीतिक चालंे चलनी प्रारंभ कर देता है। सर्वप्रथम वह मस्तानी के विरुद्ध पाँचवे छत्रपति महाराजा शाह के पास जाकर उनके कान भरने का प्रयत्न करता है, “देखो महाराज, हमारे योद्धे को क्या हो गया है ? बस एक मामूली सी नर्तकी ने उसको अपनी उंगलियों के इशारों पर नचा रखा है। यदि हमने अवसर को न संभाला तो हमारा मराठों का भविष्य बहुत धुंधला हो जाएगा।“

छत्रपति शाहू, चिमाजी अप्पा की बात सुनकर बहुत देर तक चुप रहने के पश्चात बोलते हैं, “ऐश करने दो, अप्पा। यूँ ही व्यर्थ की चिंता न कर। चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं। बाजी राव बहुत समझदार है।“

चिमाजी अप्पा अपनी बात नीचे लगती देखकर और ज़ोर लगाता है, “इससे पहले कि एक कंजरी हमारी गौरवशाली मराठा इतिहास का अंग बन जाए, हमें कुछ करना चाहिए। इस प्रकार मूक दर्शक बनकर तमाशा देखने से काम नहीं चलेगा।... बाजी राव की जगह रणभूमि में है, न कि एक मुसलमानी के नृत्य मंच पर ! वह तो दिन रात उसी के पल्लू से बंधा रहता है। आपकी बात बाजी राव कभी अनसुनी नहीं कर सकता। आपने उसको पेशवाई प्रदान की है। इसलिए आप ही उसको समझाकर सीधे रास्ते पर डालें ताकि वह इस मस्तानी का पीछा छोड़कर युद्धकार्यों की ओर ध्यान दे सके। हम समस्त भारतवश मंे मराठा राज फैला सकें। एक स्वतंत्र हिंदू राज पैदा करने का छत्रपति शिवाजी ने जो स्वप्न देखा था, उसको हम कैसे पूरा करेंगे ?“

“पेशवा बाजी राव के काम से कोई शिकायत नहीं है और यह उनका पारिवारिक मामला है। जिसमें छत्रपति द्वारा किसी प्रकार की दख़लअंदाजी करना उचित नहीं होगा। मेरे विचार में तुम्हें चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।... और हाँ, अप्पा, गुस्से में कुछ ऐसा न कर देना जिसके लिए बाद में तुम्हें पछताना पड़े। याद रखना, मस्तानी की ओर आग करोगे तो सेक सबसे पहले बाजी राव को लगेगा। बाजी राव बहुत चाहता है मस्तानी को। हाँ, कमबख्त, सुंदर भी बहुत है।“ महाराजा शाहू अपने सिर खुजलाता हुआ चिमाजी अप्पा को टाल देता है और चले जाने कहता है।

छत्रपति द्वारा इन्कार किए जाने पर चिमाजी अप्पा धर्म गुरू महाराज ब्रह्ममहिंदरा स्वामी के पास अपनी शिकायत लेकर जाता है। चिमाजी अप्पा जानता है कि महाराज शाहू के बाद केवल गुरू ब्रह्ममहिंदरा ही एक ऐसा व्यक्ति है जिसका कहा बाजी राव कभी नहीं टाल सकता। बाजी राव धार्मिक मार्गदर्शन के लिए प्रायः आचार्य ब्रह्ममहिंदरा के पास जाता रहता है।

चिमाजी अप्पा गुरू महाराज को उकसाने का बहुत यत्न करता है, लेकिन उन्होंने भी बाजी राव और मस्तानी के रिश्ते के बारे में कोई एतराज न किया और चिमाजी अप्पा को कह दिया, “बाजी राव ने उसके साथ विवाह करवाया है। वह उसकी पत्नी है। वे दोनों एक-दूसरे को पसंद करते हैं। फिर हम कौन होते हैं, उनके गृहस्थ जीवन मंे खलल डालने वाले ?“

चिमाजी अप्पा इन दोनों पुरुषों से निराश होकर दूसरे षड्यंत्र घड़ने लग जाता है। कई बार जो काम पेशेवर पुरुष भी न कर सकें, वह काम घरेलू स्त्रियाँ कर दिया करती हैं। चिमाजी अप्पा अपनी माँ राधा बाई के पास जाता है और उसको भावुक करने का यत्न करता है, “आई(माँ), अपने हँसते-खेलते घर को तो जैसे किसी बुरे की नज़र लग गई है। भाऊ बाजी राव को पता नहीं इस मुसलमानी ने क्या सुंघाया हुआ है ? हर समय मस्तानी के नाम की ही माला जपता रहता है और उसकी सांसों में सांस लेता है। औरत को, और वह भी एक रखैल को इतना सिर पर नहीं चढ़ाना चाहिए। स्त्री की गर्दन के पीछे अक्ल होती है। शीघ्र ही पगला जाती है। मुझे तो भय है कि यह कलयोगिन कहीं हमारा सारा खानदान ही न तबाह करके रख दे।“

“हाँ पुत्र, मेरे से अधिक उसकी किसे चिंता है ? मैं तो स्वयं उठते-बैठते बहुत चिंता करती हूँ। मुनड़ा, वह तो हम सभी को भुलाये बैठा है। दिन रात मस्तानी की बगल में से नहीं निकलता और उसके पास पड़ा शराब पीता रहता है। पता नहीं, क्या तावीत घोलकर पिलाये हैं उस जादूगरनी ने ? भगवान सुमति दे मेरे राव को। मैं तो महादेव के मंदिर में हवन करवाऊँगी।“

चिमाजी अप्पा जलती आग पर और तेल डालता है, “हाँ, माताश्री, मैं तो छोटा होने के कारण कुछ कह नहीं सकता। पर आप यदि थोड़े कान खींचो तो शायद भाऊ कुछ संभल जाए।“

“मैं तो बहुत ज़ोर लगाकर हाँफ गई हूँ, ज़ोरू के गुलाम पर। कोई भड़ुआ मेरी माने भी सही। जब भी सामने पड़ता है, मैं तो तभी कलपती हूँ। भई अक्ल की राह पकड़। अब तुम्हें और अक्ल तो आने से रही। बच्चा हो तो दो हाथ मारकर टिका दूँ। बराबर का है, अब बता क्या करूँ, पुत्र ? मैं तो असमर्थ और विवश हूँ। दूसरी उपस्त्री तो तुम्हारे पिता ने भी रखी थी। पर उसने ये करतूतें नहीं की थीं। परदे में भीखू की माँ के पास जाया करता था और मुँह लपेट कर तड़के को मेरे पास चला आता था। पर बाजी राव ने तो लक्षण ही उलटे पकड़ लिए। ये स्त्रियाँ तो महाभारत करवा देती है बेटा। रावण की सोने की लंका एक स्त्री के पीछे ही राख हो गई थी।“

“मेरा वश चले तो उस मस्तानी कंजरी को चुटिया से पकड़कर नर्बदा नदी में गोते लगवाऊँ। शराब तो भाऊ पहले भी पीता था, पर तब ऐसा नहीं करता था जैसा अब हर समय मदहोश हुआ रहता है। ईश्वर जाने, ये बुंदेलखंड वाले क्या डालकर दारू निकालते हैं ? भाऊ की तो कतई बुद्धि भ्रष्ट कर रखी है। भाऊ को सदैव दारू में धुत किए रखती है। दो बार मेरे हाथों मरते बच गई। एकबार पहाड़े के कातिल को भेजा थो, वो नाकाम रहा और अपनी जान गवां बैठा। दूसरी बार दासी के माध्यम से ज़हर वाली अफ़ीम दी, साली ने मुँह में ही नहीं धरी। लगता है, मुझे ही कुछ करना पड़ेगा।“ चिमाजी अप्पा क्रोध में दांत पीसता है।

संयोगवश उस समय महाराजा छत्रसाल द्वारा भेजे शर्बतों के मटकों के पहुँचने का संदेश आ जाता है। चिमाजी अप्पा को अपनी भड़ास निकालने का एक और बहाना मिल जाता है। वह सारे शर्बतों वाले घड़े ले जाकर नदी में उलटवा देता है। जब मस्तानी को इस बारे में पता चलता है तो उसको बहुत दुख होता है। वह बाजी राव के पास रोष प्रकट करती है, “उन्हें बिखेरना क्यांे था ? यदि स्वीकार नहीं करने थे तो लौटा देते। शर्बत था, कोई ज़हर तो नहीं था। किसी गरीब के मुँह में पड़ता।“

क्रोध में बाजी राव जाकर चिमाजी अप्पा से इसकी पूछताछ करता है। चिमाजी अप्पा बड़ी चुस्ती के साथ अपना पक्ष प्रस्तुत करता है, “हाँ, ज़हर ही था वो।... शर्बत नहीं, वह शराब थी शराब। भाऊ आपकी बुद्धि पर तो दारू पिला पिलाकर उस दो टके की नर्तकी ने पर्दा डाल दिया है। आपको हर समय मदिरा पिला कर वह मदहोश किए रखती है। शराबों कबाबों के साथ आपकी बुद्धि मारी गई है। आप कभी होश में हो तो आपको पता चले। पक्का शराबी बना दिया है उसने आपको।“

बाजी राव अप्पा पर भड़क पड़ता है, “मस्तानी ने हमंे मांस खाने और मदिरापान करने की राह नहीं डाला। अपितु हमने उसको शराब पीने की लत लगाई है। उसका प्राणामी धर्म तो मांस और मदिरा के प्रयोग की मनाही करता है। तुम अच्छी प्रकार जानते हो, हम तो मस्तानी के आने से बहुत पहले से इन वस्तुओं का सेवन करते आ रहे हैं।... तुम तो यूँ ही रस्सियों को सांप बनाये जा रहे हो। वह तो महज शर्बत था। केसर, कुमकुम और मेवों वाला लाल, पीला रंग-बिरंगा। जिसे तुमने मदिरा समझकर बिखरवा दिया है। गर्मियों में मेहदे को ठंडक देता है यह शर्बत। तुम्हें शराब और शर्बत में अन्तर नहीं पता ? तुम तो खुद दारू पीते हो। कम से कम सूंघकर तो देख लेते, यदि पीकर नहीं देखना था। तुम्हें ज्ञान हो जाता कि वे घड़े शर्बत के थे या शराब के।“

“भाऊ, आपके तो दिमाग पर काम का पर्दा डाला हुआ है। आप मस्तानी के विरुद्ध कुछ सुनना ही नहीं चाहते। हम भूले नहीं शर्बतों को। यह वही कुंवरसा मस्तानी के शर्बत हैं जिन्हें पीकर आप कई कई दिन मदहोश पड़े रहते हो।“

बाजी राव, अप्पा से बहस करता है, “मैं तुम मूर्खों को कैसे समझाऊँ ? चलो, मैं मस्तानी को अभी बुलाकर उससे शर्बत बनवाकर दिखाता हूँ। तुम अपनी आँखों से देख लो।“

बाजी राव, मस्तानी को बुलवाकर समस्त परिवार को एकत्र कर लेता है। बाजी राव के आदेश से मस्तानी गुड़ और कुमकुम डालकर शर्बत बनाती है और अपनी सास राधा बाई को एक प्याला पेश करती है, “लो माताश्री, पीकर बताओ कैसा है ? कुमकुम डाला होने के कारण इसका रंग ही लाल शराब जैसा लगता है। लेकिन एकदम मीठा है और इसको पीने से कोई नशा नहीं होता। बल्कि पीने वाले की प्यास बुझती है।“

राधा बाई ने नाक चढ़ाते हुए एक घूंट भरा तो शरबत उसको सच में बहुत स्वादिष्ट लगा और वह पूरा प्याला पीने से स्वयं को रोक न सकी, “वाह ! लाजवाब है। पहले कभी यह चीज़ क्यों नहीं पिलाई, मस्तानी ?“

“आई, आप मौका ही कब देते हो मस्तानी को ?“ बाजी राव प्रसन्न होकर सबको मस्तानी का बनाया शरबत बांटने लग जाता है। सब मस्तानी की प्रशंसा करते हैं तो चिमाजी अप्पा पहले से भी अधिक जलभुन जाता है।

चिमाजी अप्पा अपनी इस पराजय को लेकर मन ही मन विष घोलने लग जाता है। अब चिमाजी अप्पा के पास एक अन्तिम शस्त्र बाजी राव की पहली पत्नी काशी बाई रह जाती है। वह काशी बाई को मस्तानी के विरुद्ध भड़काना प्रारंभ कर देता है, “वाहिनी साहिबा(भाभी), मुझसे आपका दुख देखा नहीं जाता। भाऊ ने तो आपको बिल्कुल ही आँखों से ओझल कर रखा है। उसको तो वह वेश्या मुसलमानी ही हर तरफ दिखाई देती है। पता नहीं क्या सिर में डाला है उस मस्तानी भूतनी ने ?“

काशी बाई के अंदर से मानसिक पीड़ा उछलकर बाहर आ जाती है, “मुझे भी लगता है जैसे उस तवायफ मस्तानी ने कोई जादू-टोना कर रखा हो। यह तो मेरी ओर आँख उठाकर भी नहीं देखते।“

चिमाजी अप्पा आग को और अधिक हवा देता है, “मुझ तो बताते हुए भी लज्जा आती है... यह अंगूठी देखो। आपके मायके वालों ने जो भाऊ को उपहार में दी थी, एक मल्लाह को भाऊ ने उठाकर दे दी।“

अंगूठी देखकर काशी बाई को सातों कपड़ों में आग लग जाती है, “लेकिन यह आपके पास कैसे आई ?“

“भाऊ ने मस्तानी से मिलने जाने के लिए नदी पार करनी थी और किश्ती में नदी पार करवाने वाले मल्लाह को मेहताने के रूप में यह अंगूठी दे दी। कल वह दरबार में आकर यह अंगूठी देकर धन ले गया है। मैंने जब भाऊ से इस बारे में पूछा तो कहने लगा कि नदीं में तूफान आया हुआ था। मल्लाह जाना नहीं चाहता था। मेरा मस्तानी के पास जाना आवश्यक था। मैंने लालच देने के लिए अंगूठी देकर कहा था कि बहुत सारा धन दूँगा। दरबार में आकर ले जाना। उस समय मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं था।... वाहिनी साहिबा, आप ही सोचो भला कोई प्रेम की निशानी भी ऐसे खैरात में बांटता है ? इतनी क्या आफ़त आ पड़ी थी, प्रलय में जाने की ? मस्तानी कहीं भाग चली थी ?“

चिमाजी अप्पा की इतनी भर वार्ता सुनकर काशी बाई की रूलाई फूट पड़ती है और वह रोती हुई अपने कक्ष में चली जाती है। चिमाजी अप्पा अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर मुस्कराता है। उसको विश्वास हो जाता है कि उसका तीर सही निशाने पर जा लगा है।

बाजी राव घर में आता है तो गुस्से में फनफनाती काशी बाई उसके साथ लड़ पड़ती है, “मैं सारी उम्र परमेश्वर मान कर आपको पूजती रही हूँ। आपको एक होनहार पुत्र पैदा करके दिया है और आपके बचपन की साथी हूँ। आप पल में ही उस कंचनी के होकर बैठ गए ?“

बाजी राव को गुस्सा आ जाता है और वह गुस्से में एक थप्पड़ काशी बाई को मार देता है, “खामोश ! तेरी बिलांद भर की जो जुबान चलती है, काटकर रख दूँगा। मस्तानी भी मेरी पत्नी है। दूसरे लोगों के साथ अब तू भी मुझे ताने मारने लगी है।“

“मुझे तो चुप करवा लोेगे। लेकिन प्रजा को कैसे चुप करवाओेगे ? सारे पूणे में लोग तरह तरह की बातें करते फिरते हंै।“ काशी बाई सिसक सिसककर रोने लग जाती है।

बाजी राव उसके समीप पलंग पर बैठकर उसको अपनी छाती से लगा लेता है, “काशी, तू तो जानती है कि मैं पेशवाई को सलामत रखने के लिए कितना संघर्ष कर रहा हूँ। जैसे महाभारत में अर्जुन को केवल चिडि़या की आँख ही दिखाई देती थी, वैसे ही मुझे भी केवल दिल्ली ही दिखाई देती है। देख, महाराजा छत्रसाल की बेटी का रिश्ता स्वीकार करना मेरे लिए राजनीतिक समझौता था। अगर हवस होती तो मैं मस्तानी का डोला भी स्वीकार कर सकता था। परंतु फिर मुझे मस्तानी के पिता की जागीर में से न तो उसके भाइयों के बराबर हिस्सा मिलता, न अपने कर्ज़ चुकाने और युद्धों के लिए माली इमदाद और न ही हमारी दिल्ली पर मध्य रास्ते बुंदेलखंड में छावनी बन पाती। क्या तू नहीं चाहती कि तेरा पति दिन दुगनी, रात चैगुनी प्रगति करे और समस्त भारतवर्ष में मराठा हिंदू स्वराज और साम्राज्य स्थापित करे ? हम अपने धार्मिक स्थान मुगलों से स्वतंत्र करवायें ताकि हमारे हिंदुओं को अपने तीर्थ स्थानों पर अपनी इच्छा से जाने की छूट हो और अपने धर्म का पालन करने के लिए मुसलमान हाकिमों को जजि़या न देना पड़े। मुसलमान हमारे मंदिरों को खंडहर बना रहे हैं। मूर्तियाँ तोड़ रहे हैं। जबरन हिंदुओं को मुसलमान बना रहे हैं। हमारा धन, हमारी संपŸिायाँ और हमारी अस्मतों को लूट रहे हैं। हिंदुस्तान देश हमारा है और शासन मुसलमान कर रहे हैं। तू नहीं चाहती कि इस सबकी रोकथाम की जाए ? मुगलों को नथ डाली जाए ? छत्रपति शिवाजी ने (30 मार्च 1645 ई.) व्रत रखकर स्वतंत्र हिंदवी राज्य की नींव रखी थी। जिसको कायम और सुरक्षित रखना मेरा धर्म है।“ इतना कहकर बाजी राव शांत हो जाता है और काशी बाई की प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा करने लग पड़ता है।

धार्मिक विचारों की होने के कारण काशी बाई ढीली पड़ जाती है, “स्वामी, मुझे तो आप शांत करवा लोगे, लोगों और भाईचारे का मुँह कैसे बंद करोगे। ?“

मस्तानी के साथ रहने के बाद बाजी राव को ढंग आ चुका है कि स्त्री की कब कौन सी रग दबानी चाहिए। बाजी राव सोच विचार मंे डूबी और हिचकियाँ भरती काशी बाई की गाल को चूम लेता है, “प्रिय काशी, एकबार एक बाप और बेटा गधा खरीद कर ला रहे होते हैं। रास्ते में उन्हंे कोई मिलता है और ताना कसता है - देखो तो, ये बाप बेटे भी गधे हैं। गधे को साथ साथ चलाये जा रहे हैं। बाप को इतनी भी अक्ल नहीं कि बच्चे को गधे पर बिठा दे। यह सुनकर बाप अपने बेटे को गधे पर बिठा देता है। कुछ आगे जाने पर कोई अन्य कहता है -कितना बदतमीज बच्चा है। बूढ़ा बाप पैदल जा रहा है और बेटा मौज से गधे पर चढ़ा बैठा है। लड़का फौरन उतरकर गधे पर बाप को बिठा देता है। फिर कोई अन्य उसके करीब से निकलने वाला राहगीर कह देता है -सयाना होकर भी बाप गधे पर बैठा है और बेटे को पैदल चला रहा है। अब दोनों ही गधे पर बैठ जाते हैं। आगे जाने पर कोई अन्य आता है और कहता है - कितने निर्दयी हैं। एक जानवर पर जुल्म ढा रहे हैं। ईश्वर ने अच्छी भली टांगें दी है। चल नहीं सकते ? यह सुनकर दोनों गधे पर से उतर जाते हैं और गधे की टांगे बांधकर उसको एक डंडे पर लटका कर चल पड़ते हैं। इस पर सभी लोग देखकर हँसते हैं। इस कहानी का यह सार निकलता है कि सुनो सबकी, पर करो अपने मन की। जितने मुँह उतनी ही बातें। लोगों की कोई जुबान तो पकड़ नहीं सकता। लोग तो कल को कहंेगे कि कुएँ में छलांग लगाओ तो तुम छलांग लगा दोगे ?“

“पर जिस समाज में हम रहते हैं, उसका आदर-सम्मान तो करना ही बनता है। मैंने कल मंदिर में सुना था कि ब्राह्मणों में आपके और मस्तानी के संबंधों को लेकर पंथक मसला बहुत गरमाया हुआ है। शायद वे कल दरबार में भी आपके पास आएँ।“ काशी बाई अपने पति बाजी राव को कसकर आलिंगन में ले लेती है।

“आ जाने दो, मैं अकेले अकेले को देख लूँगा। देशास्था ब्राह्मणों को पेशवाई छिनने का दुख है। वे सोचते हैं कि चितपवन भट्टांे ने मुनीमी (बाजी राव का पिता पेशवा बनने से पूर्व मुनीम था) करते पेशवाई कैसे प्राप्त कर ली। यूँ ही बात का बतंगड़ बनाते हैं और हमें नीचा दिखाने के बहाने खोजते रहते हैं। मैं उनकी सब चालंे समझता हूँ। मैंने अब तक युद्ध ही लड़े हैं। डरता नहीं मैं किसी से।“ बाजी राव क्रोध में आ जाता है।

काशी बाई आँखों में उमड़ते आँसू बहाती हुई बोलती है, “रोना तो पतिदेव इसी बात का है कि आप गृहस्थ जीवन के साथ भी युद्धभूमि वाला व्यवहार ही कर रहे हो। बाहर के युद्ध तो आपने बहुत लड़े और जीते, काश ! कभी पारिवारिक जंग भी जीत कर देखो तो आपको पता चले। आप तो हर समय मुझसे दूर ही रहे हो।... कभी जंग लड़ने, कभी सियासत में हिस्सा लेने के बहाने और कभी चैथ एकत्र करते घूमते हो। पति के वियोग में तड़पती नारी की अवस्था आप क्या समझो। भगवान ने तो नारी का सिर्फ़ बुत बनाया है। लेकिन पुरुष जब उसका स्पर्श करता है तो उसमे प्राण पड़ते हैं और वह देह का बुत उस समय पत्थर से जीती जागती स्त्री का रूप धारण करता है। रामायण में एक कथा आती है - अहल्या राम चंद्र भगवान अर्थात पुरुष के स्पर्श से ही वास्तव में पत्थर से स्त्री बनती है। एक युद्ध स्त्री के अंतःकरण में भी चलता रहता है। कभी मेरे साथ वह युद्ध लड़कर मुझे सेज संग्राम में पराजित करो तो मैं आपको असली मर्द मराठा योद्धा मानूं और मुहब्बत की सल्तनत पर आपकी पेशवाई को स्वीकार करके अपने चुम्बनों की चैथ देती हुई अपने बदन की सरदेशमुखी आपको समर्पित कर दूँ।“

बाजी राव, काशी बाई की ठोढ़ी पकड़कर उसका झुका हुआ चेहरा ऊपर उठाता है और उसकी आँखों में आँखें डालकर देखता है। उसका काशी बाई बहुत संुदर लगने लग पड़ती है। बाजी राव काशी को बिस्तर पर लिटाकर चूमने लग पड़ता है और काशी बाई की नौ गज़ की सूती साड़ी खुलकर पलंग के नीचे जा गिरती है।...

 


कचेहरी

काशी बाई के पास चंद दिन रहकर उसको शारीरिक संबंधों से संतुष्ट करने के बाद बाजी राव मस्तानी के पास चला जाता है। मस्तानी के साथ कुछ रातें व्यतीत करने के पश्चात वह काशी के पास अपनी उपस्थिति दजऱ् करवाने आ जाता। इस प्रकार, कुछ अरसे बाद बाजी राव ससवाद में आकर काशी को शांत करके पुनः मस्तानी के पास रहने के लिए कोथरूड़ चला जाता। बाजी राव के जीवन के दिन और रातें काशी और मस्तानी के बीच बंटने लग जाती हैं। वह किश्ती की तरह एक किनारे से दूसरे किनारे सफ़र करता हुआ अपने परिवार और मस्तानी के साथ अपना रिश्ता निभाते हुत अपने जीवन में संतुलन बनाये रखने का यत्न करता रहता है।

समय इस प्रकार अपनी गति चलता रहता है। बाजी राव के मस्तानी के साथ रिश्ते का लेकर विवादों के अलाव सुलगते रहते हैं। फिर अचानक ऐसी हवा बहती है कि वह अलाव प्रचंड अग्नि का रूप धारण करते हुए एक विस्फोटक ज्वालामुखी बन जाते हैं। उनमें से ऊँची-ऊँची लपटें उठने लग पड़ती हैं।

मस्तानी के विषय को लेकर भाईचारे में हो रही भिन्न-भिन्न प्रकार की बातों के चक्रवात समस्त पूणे में घूमकर पेशवा के दरबार तक पहुँच जाते है। अप्पा स्वामी के प्रोत्साहन से पंडितों का एक दल पेशवा के दरबार में हंगामा खड़ा करने के लिए आ धमकता है। बाजी राव अपने सिंहासन पर से उठकर आदर सहित उनका स्वागत करता है, “आओ आचार्य, आसन ग्रहण करो।“

ब्राह्मणों को बिठाकर उनके विरोध के लिए स्वयं को तैयार करता हुआ बाजी राव सोच रहा होता है कि काशी के ब्राह्मणों ने तो छत्रपति शिवाजी को भी नहीं बख़्शा था। शिवाजी महाराज का भी नाक में दम किए रखा था। 1673 ई. में जब उन्होंने सार्वजनिक राज्याभिषेक का मुद्दा उठाया था तो रूढ़ीवादी ब्राह्मणों ने शिवाजी को क्षत्रिय मानने से इन्कार कर दिया था। फिर मैं महज एक पेशवा इनके सम्मुख किस खेत की मूली हूँ।

ब्राह्मणों की मंडली में से एक उनका मुखिया मुद्दा उठाता है, “श्रीमंत आप पेशवा हो, हमारे शासक। मराठा योद्धाओं और आने वाली पीढि़यों के लिए प्रेरणा-स्रोत आपको ही बनना है। इतिहास के सुनहरी पन्नों ने आपने नाम को दजऱ् करवाना है। आपके द्वारा किए अधार्मिक कार्य केवल आपका या भट्ट खानदान का ही नहीं, अपितु समूचे चितवन ब्राह्मणों का सिर लज्जा से झुका सकते हैं और भविष्य में मराठों को अपमान और लज्जा का सामना करना पड़ सकता है।“

“आप तो वेदों के श्लोकों से भी अधिक उलझी भाषा का प्रयोग करने लग गए हो। मुझे तो आपकी संस्कृत बिल्कुल समझ में नहीं आती। कृपा करके बुझारतें न डालें और मुझे सरल भाषा में बतायें, जो आप कहना चाहते हैं? मैंने कभी कोई गलती नहीं की।“ बाजी राव खंखारते हुए रौबीली आवाज़ में बोलता है।

पंडितों की मंडली में से अन्य कोई बोलता है, “पेशवा जी, नादान न बनो। इन्सान तब सिरे से गलत होता है जब वह सोचने लग जाए कि वह गलत नहीं है। आप हमारे इस दरबार मंे यूँ आने का कारण भलीभाँति जानते हैं...। चलिए, फिर भी हम खुलकर बताते हैं। हमंे तो उल्लेख करते हुए भी लज्जा आती है।“

“यदि विषय आपको लज्जित करता है, तो क्या वैद ने कहा है कि उस पर अवश्य बात करनी ही है ?“

“हाँ... और आप वह कुकर्म बेझिझक खुलआम कर रहे हो।“ एक और पंडित जोश में आकर बोलता है।

बाजी राव पूरे संयम और धैर्य में रहता है, “कौन सा कुकर्म किया है हमने ?“

“जैसे आप कुछ जानते ही नहीं। भोले न बनिये। आपके आचरण में आई गिरावट को सारा जग जानता है। आप एक मुसलमान कंचनी को सरेआम अपने घर में रखकर उसके साथ अवैध संबंध स्थापित किए हुए हैं। हम आपकी रखैल मस्तानी की बात कर रहे हैं।“

“आचार्य जी, वह रखैल नहीं। हमारी बेगम...हमारी बायिको(पत्नी) है। हमने बाकायदा उसक साथ विवाह किया हुआ है।“

“हमने तो किसी ने आपका विवाह होते देखा नहीं। कोई है गवाह आपके पास ?“

“अग्नि साक्षी है। इससे बड़ी और क्या बात हो सकती है ? हमारे कई सरदार उस समय वहाँ उपस्थित थे, जब मस्तानी ने हमारी तलवार के साथ अग्नि के इर्द-गिर्द फेरे लिए थे।“

ब्राह्मणों का मुखिया गरम हो जाता है, “श्रीमंत हम ऐसे विवाह को स्वीकार नहीं करते। यह तो शास्त्रों और विधि विधान का घोर उल्लंघन है। जीवत प्राणी के अवसर पर उपस्थिति होते हुए वस्तु के साथ शादी नहीं की जा सकती। हम इस विवाह को नहीं मानते। कुल पुरोहितों से कुंडलियाँ मिलवाकर लगन के लिए शगुन निकाला जाता है। हल्दी बटना होता है और पवित्र नदी केे जल से पवित्र होकर माला बढ़ाई जाती है। कन्यादान होता है। अग्निकुंड के चारों तरफ फेरे लेकर दुल्हन को मंगलसूत्र पहनाया जाता है। क्या आप भूल गए कि मराठों के विवाह कैसे हुआ करते हैं, श्रीमंत ? यह भी कोई विवाह हुआ, जैसा आपने मस्तानी के संग रचाया है ?... मस्तानी पर्दा नहीं करती। आपके साथ सुना है, रणभूमि में भी जाती है। पालकी की बजाय आपके बराबर घोड़े की सवारी करती है।“

“द्रोपदी पांडवों के साथ अज्ञातवास और माता सीता भी तो भगवान राम के साथ बनवास में हर समय साथ रहने के लिए गई थीं। बनवास तो केवल राम चंद्र को मिला था, सीता माता को नहीं।“ बाजी राव तर्क देता है।

एक अन्य ब्राह्मण की आवाज़ उभरती है, “हम कुछ नहीं जानते। उसको देखकर कल हमारी बहू-बेटियाँ भी बागी हो जाएँगी और बेपर्दा होकर मुजरे करने लगेंगी। हम यह सहन नहीं कर सकते। हमको आपके पियादे गणेश बाबू ने सब बताया है कि मस्तानी अप्सराओं की भाँति नृत्य करती है और गाती है।“

“नृत्य तो मन की उमंग है। भगवान कृष्ण की भक्तिन मीरा बाई भी तो यही सब करती थी। प्रभु भक्ति में लीन होकर नाचती, गाती थी। नृत्य का तो आविष्कार ही भगवान भोले शंकर शिवजी महाराज ने किया, स्त्रियों के लिए लास्य और पुरुषों के लिए तांडव की रचना करके। क्या आप नहीं जानते कि शिवजी भगवान पार्वती माता को प्रश्न करने के लिए नृत्य का सहारा लिया करते थे ? दूसरी से आठवीं सदी के मध्य रचे गए नाट्य शास्त्र में भरतमुनि वर्णन करता है कि सतयुग के सुनहरी युग के बाद त्रेता का युग आया तो सृष्टि में अहम परिवर्तन हुए। देवताओं ने अपने सिरमौर देव इंद्र देवता को सृष्टि रचियता ब्रह्मा के पास भेजा। नाट्य शास्त्र के प्रथम कांड के ग्यारहवें बारहवें श्लोक में आता है कि इंद्र ने ब्रह्मा से कहा कि हे सृष्टि के सृजनहार ! विश्व में दुख बहुत बढ़ गए हैं। कोई ऐसा यत्न करें कि मानवजाति को आनंद और मनोरंजन प्राप्त हो सके। कोई ऐसा उपाय निकालें जिससे आँखों और कानों को तृप्ति मिले। चार वेद केवल उच्च श्रेणियों के लिए आरक्षित हैं। इसलिए कोई पाँचवा वेद रचो जिसका शूद्र भी रसानंद ले सकें और वह सबका साझा हो। ब्रह्मा अंतध्र्यान हो गए और उन्होंने ऋग्वेद मंे से शब्द, सामवेद में से संगीत, यजुर्वेद में से अभिनय और अथर्ववेद में से रस प्राप्त करके पाँचवे वेद की रचना की। ब्रह्मा ने नाट्य वेद की शिक्षा भरतमुनि को दी और भरतमुनि ने आगे अपने सौ पुत्रों को इसका ज्ञान करवाया। इस प्रकार नाट्य वेद इंद्रपुरी से उतरकर मातृलोक में आया। इस तरह नाट्य, नृत्य और संगीत के सुमेल वाला यह ग्रंथ विश्व में स्वीकृत हुआ है। ये चीजे़ं तो हमारे धर्म के साथ ही चली हैं। हमारे प्राचीन गं्रथों में वर्णन आता है कि एक बार शिव पार्वती को सुनहरी तख़्त पर बिठाकर उसकी सुंदरता के अमृत को अपनी निरंतर दृष्टि से पी रहे थे। जितना शिव इस अमृत को पीते जाते, उतना ही वह बढ़ता जाता। शिव पार्वती के सौन्दर्य पर मोहित होकर उसकी संुदरता के जाम से खुद को मदहोश करने लग पड़े। शिव ने सुरूर में आकर पार्वती को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करना शुरू कर दिया। यह देखकर देवी-देवता और परियाँ एकत्र हो गईं। लक्ष्मी गाने लग पड़ी। सरस्वती ने वीणा, इंद्र ने वेणु, विष्णु ने मृदंग और ब्रह्मा ने खड़तालें बजानी प्रारंभ कर दीं। शिव से यह नृत्य उसके शिष्य तंडू ने सीखा और इसको सुधारकर तांडव का नाम दिया। भगवान विष्णु भी तो वृंदावन में गोपियों के साथ नाचते-गाते रासलीला रचाया करते थे। कृष्ण जी बचपन से नर्तक थे। क्या वह यमुना नदी के तट पर चाँद की चाँदनी मंे गोपियों और ग्वालिनों के साथ नृत्य नहीं करते थे। उनके नृत्य में मुजरे की तरह शिंगार रस की अधिकता होती थी। भगवत पुराण की दसवी पोथी में ऋषि वेदव्यास ने इस नृत्य पर पाँच कांड रचे हैं। जब कृष्ण जी अपनी बंसरी से मधुर धुनें बजाते थे तो यह संगीत गोपियों को खींच लाता था। ग्वालिनों को कृष्ण बंसरी के सुर इतना मंत्रमुग्ध करते थे कि वे जहाँ भी होतीं, सभी काम छोड़ कर सरेआम कृष्ण के पास आ जाती। उनके पति भी उनको न रोक पाते। रात रातभर यमुना तट पर रास-नृत्य होता रहता। कहते हैं जब कृष्ण गोपियों के संग नृत्य करते तो हर गोपी के साथ एक अलग ही कृष्ण नृत्य करता दिखाई देता। इस नृत्य में रूहानियत शामिल हो जाती और वह आध्यात्मिक मिलन का माध्यम बन जाता। नृत्य को तो धार्मिक स्वीकृति भी प्राप्त है। सदियों से नृत्य को पूजा की एक विधि के रूप में स्वीकारा जाता रहा है। शिव मानस में इसका उल्लेख है। मंदिरों की नर्तकियों को देवदासियाँ कहा जाता है। हमारे भात के प्राचीन मंदिरों में नृत्य मुद्राओं वाली सुशोभित मूर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं। नृत्य तो मन की स्व के साथ एक संवाद रचाने वाली अवस्था है। जिस प्रकार हम नदी में स्नान करके शारीरिक मैल से मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार नृत्य रूपी व्यायाम करते हुए जब हमें पसीना आता है तो उससे इन्सान पवित्र हो जाता है। तन के रोमछिद्रों से अंदर की सारी मैल बाहर निकल कर शरीर को भी धो देती है। फिर नृत्य स्नान तो नदी स्नान की अपेक्षा उतम ही हुआ जो मनुष्य के शरीर को अंदर और बाहर से स्वच्छता प्रदान करता है। फिर क्या बुराई है नृत्य करने में ? नृत्य प्रेम के प्रकटीकरण का सुंदर माध्यम है। वास्तव में प्रेम भाव ही नृत्य की अंतरात्मा है जो शारीरिक स्तर से आध्यात्मिक मंडलों में प्रवाहित होता है। शेष, राम आपका भला करे, जो गायन की बात है, क्या आप आरती करते हुए भजन गायन और मंत्रों का उच्चारण नहीं करते ?“

एक अन्य पंडित बोलता है, “हमारी बात और है। वह ग़ज़ल गाती है जो कि एक अरबी विधा है। ग़ज़ल के तो शाब्दिक अर्थ ही है - प्रेमी की प्रंशसा करना। इसको अय्यास लोग सुनते हैं। मस्तानी मुजरा करती है। मुजरा वो नाच है जो मुगल अपनी ऐशपरस्ती के लिए ईरान और अफ़गानिस्तान से हिंदुस्तान में लेकर आए थे। वह विदेशी संस्कृति हम पर थोप रही है। हम अपनी संस्कृति को कतई पतित नहीं होने देंगे।“

बाजी राव अपना तर्क प्रस्तुत करता है, “अधिक कट्टर न बनो। आप अरबी घोडि़यों की सवारी क्यों करते हो ? प्रसाद में काबुल के पिस्ते और बादाम क्यों प्रयोग करते हो ? ईरान के बने वस्त्र क्यों पहनते हो ? बदखशन के फल और खाड़़ी देश के अनार क्यों खाते हो ? नृत्य और संगीत कला के रूप मंे हंै और कला सीमाओं की कै़द में नहीं रहती। हम हिंदुस्तानी भजन गायन और तांडव, कत्थक और भरत नाट्यम आदि नृत्यों को धर्मप्रचार के लिए प्रयोग करते थे और मुगल मुजरा नृत्य को निजी मनोरंजन के लिए प्रयोग करते थे। सूफियों में बेपरवाह नृत्य करके मुर्शद मनाने की प्रथा है। प्रभु भक्ति में भी कोई आत्मा भी लीन होगी, जब वह खुशी और हर्षातिरेक की अवस्था में रहेगी। जीवन के दुखों और कष्टों से मुक्ति पाने के लिए मनोरंजन भी परम आवश्यक है और नृत्य-मुजरा एक मनोरंजन का माध्यम है। मस्तानी हमारा मन बहलाने के लिए जो मुजरा शैली का नृत्य करती है तो यह कोई गुनाह तो नहीं है ?“

“हमने तो सुना है, वह भारतवर्ष की ही नहीं है। कहीं बाहरी दूर देश की पैदावार है और वह भाषा भी कोई परायी ही बोलती है।“ उनमें से सबसे कम आयु का ब्राह्मण चोट करता है।

बाजी राव हँसकर बहस करने लगता है, “हाँ, उचित फरमाते हैं आप। उसकी भाषा आपसे भिन्न है और वह मनुष्यता के भले के लिए बोली बोलती है। एक इन्सान को दूसरे से जोड़ने वाली भाषा का मस्तानी प्रयोग करती है। उसकी सरल बोली जीव, जंतु, पंछी और पौधे भी समझते हंै। क्योंकि उसकी बोली में धार्मिक पक्षपात तत्व नहीं है और वह आपकी तरह कट्टर नहीं है। मस्तानी को अनेक भाषाओं का ज्ञान है। उसने पढ़ने लिखने की शिक्षा पाई है। इसलिए वह मराठी के अतिरिक्त राजस्थानी, सिंधी, फारसी, गुजराती, उर्दू, अरबी, हिंदी और संस्कृत के शब्दों का सहज ही प्रयोग कर लेती है। वह स्वामी प्राणनाथ के प्राणामी मत को मानती है और उनकी धार्मिक पुस्तक ‘कुलसम स्वरूप’ को पढ़ा होने के कारण यह स्वाभाविक ही है कि उसके द्वारा मराठी बोलते हुए दूसरी भाषाओं के शब्दों का प्रयोग हो जाता है। रही बात विदेशी होने की, तो मस्तानी महाराजा छत्रसाल की संतान है। बुंदेलखंड केसरी महाराजा छत्रसाल अस्सी-इक्यासी बरस पहले ( 4 मई 1649 ई.) को कर्च कचनई में जन्मे राजपूत हैं। सारी उम्र वह मुगलों से लड़ते रहे हैं और कट्टर हिंदू हैं। भूल गए कि महाराजा छत्रसाल ने अपनी सेवाएँ छत्रपति शिवाजी को भी दी थीं ? शायद आपको ज्ञान नहीं है कि 1684 ई. में बुंदेलपति केसरी महाराजा छत्रसाल ने जजि़या लेने आये मौलणियों के सिर कलम करके कुरान के पतरों में लपेटकर मुगल बादशाह को भेजे थे। वह सदैव औरंगजेब द्वारा(9 अपै्रल) 1669 ई. में जारी किए गए आदेश ‘काफर कफूर’ का भारी विरोध करते रहे हैं। महाराजा छत्रसाल के पिता चंपत राय ने बहुत पहले ही मुगलों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया था और वह मुगलों के साथ लड़ते हुए बादशाह के चहेते अब्बू फजल को मारकर भगवान को प्यारे हो गए थे। मुगलों और पठानों के साथ बुंदेल पिछले पचास वर्षों से भिड़ते आ रहे हैं। इस विद्रोह के बदले उनके अनेक मंदिरों का अपमान हुआ, लाखों योद्धाओं को शहीद किया गया, बच्चों-बूढ़ों को कै़द किया गया और असंख्य स्त्रियों के साथ घोर अत्याचार भी हुए। परंतु फिर भी बुंदेल साहस के साथ लड़ रहे हैं। बुंदेलों के वंश की उत्पति भगवान विष्णु से होती है। पवारों और धंदरों की भाँति वे सूर्यवंशी हैं और कमल पुष्प उनका राजसी चिह्न है। विद्यावासिनी देवी की वे उपासना करते हैं। आप उनकी बेटी मस्तानी को विदेशी कैसे कह सकते हैं ?“

“मुगलों की तरह राजपूतों में भी बहु-विवाह और रखैले रखने की प्रथा है। मुसलमान होने के कारण क्या मालूम, मस्तानी की माँ का हिंदू महाराजा छत्रसाल के जनानखाने में क्या रुतबा है ? मस्तानी की माँ तो मुसलमानी है न ?“ तीसरा ब्राह्मण फुंकारता है।

बाजी राव अपनी दलील देता है, “मस्तानी की अम्मा का दजऱ्ा और धर्म कुछ भी हो, उसका पिता तो एक हिंदू है न ? उससे भी बढ़कर वह बुंदेलखंड का महाराजा है जो मस्तानी के शाही रक्त होने का साक्षी है। वह कोई ऐरी गैरी और साधारण स्त्री नहीं है। हमारे शास्त्र कहते हैं कि वंश पुरुष के साथ चलते हैं। बच्चा जब जन्म लेता है तो उसका गोत्र और धर्म वही होता है जो उसके पिता का हो। मैं चितपवन ब्राह्मण भट्ट खानदान का वंशज कहलाता हूँ क्योंकि मेरे बाप दादा का एक वंश था। न कि माता का। मेरे माताश्री देशास्था ब्राह्मण घराने से आए हैं। मैं चितपवन ब्राह्मण कहलाता हूँ, देशास्था नहीं। मुझे बताओ, आप अपने पिता के नाम से जाने जाते हों या माँ के नाम से ?“

“कुछ लोग तो कहते हैं कि मस्तानी महाराजा छत्रसाल की असली संतान नहीं है। मस्तानी का असली पिता जहानत खान था। वह छत्रसाल द्वारा गोद ली गई पुत्री अथवा सौतेली बेटी है।“

“लोगों का क्या है, वे तो बहुत कुछ कहेंगे। जितने मुँह, उतनी ही बातें। बुंदलपति केसरी महाराज छत्रसाल बहुत जिम्मेदार और सुलझे हुए इन्सान हैं। वह सौतेली बेटी को सगी कहकर क्यों हमारे साथ ब्याहेंगे ? यदि ऐसी बात होती तो वह मस्तानी को धर्मपुत्री भी बता सकते थे।“

“पर वह नमाज पढ़ती है और रोजे़ रखती है और वह भी कट्टर हिंदू पेशवा परिवार के घर में रहते हुए। राम...राम...राम।“ पंडितों का मुखिया प्रश्न दाग देता है।

बाजी राव पेट में हँसता है, “अनशन यानि कुछ समय के लिए अस्थाई तौर पर जानबूझ कर अन्न का त्याग करने की प्रथा सिद्धों, नाथों और योगियों ने शरीर को आरोग्य रखने और अन्न की किल्लत को पूरा करने के लिए चलाई थी। अन्न त्याग कर फाका रखने को व्रत कह लो अथवा रोज़ा। अर्थ और उद्ेश्य तो उसके एक जैसे ही हैं। आपको मस्तानी के नमाज़ अदा करने के बारे में ज्ञान है। परंतु इसका इल्म नहीं है कि वह आरती भी करती है और कृष्ण भगवान की भक्ति में भजन गायन भी। वास्तव में, जैसे मैं पहले बता चुका हूँ कि मस्तानी स्वामी प्राण नाथ के प्राणामी मत को मानती है। प्राणामी हिंदू और इस्लाम धर्म की अच्छी बातों को अपनाने का संदेश देते हैं। छत्रपति शिवाजी महाराज ने भी स्वराज का सपना देखा था और बादशाह अकबर ने हिंदुत्व और इस्लाम को एक करने के लिए दीन-ए-इलाही चलाया था। धर्म का काम होता है - जोड़ना। मनुष्य को मनुष्य से तोड़ना नहीं। एक धर्म का पालन करना ही बहुत कठिन होता है। मैं तो मस्तानी पर बलिहारी जाता हूँ कि वह एक समय में दो दो धर्मों का पालन कर रही है। हमारे हिंदुओं में तैंतीस करोड़ देवता हैं। क्या कभी किसी ने शिव भक्त को दुर्गा देवी की पूजा करने से रोका है ? या ब्रह्मा की भक्ति करने वाले को रोका है कि वह विष्णु या महेश की आराधना न करे ? कभी किसी ने काली देवी के उपासक को गणपति को मानने से रोका है ? बस, यह समझ लो कि मस्तानी के तैंतीस करोड़ पर एक देवी-देवता हैं। इसलिए वह नमाज़ भी पढ़ती है। ईश्वर एक है और धर्म उसकी प्राप्ति के अलग अलग रास्ते हैं। शायद आप धर्म शास्त्र और धर्म व्याकरण को समझ नहीं सके।“

यह सुनते ही वे सभी ब्राह्मण जो अभी तक चुप बैठे थे, भी भड़क उठते हैं, “धर्म क्या है, अब हम पंडितों को आपसे सीखना पड़ेगा ? पेशवा जी, आपने अनेक युद्ध लड़े हैं और जीते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि धर्म को आप अपनी मनमजऱ्ी से तोड़-मरोड़कर प्रयोग किए जाओ। आप कौन होते हैं, धार्मिक फैसले करने वाले ?“

“किसी के निजी जीवन में दख़ल देने वाले आप कौन होते हैं ? फिर भी आप हमारे दरबार में चले आए हो, हम आपका सम्मान करते हैं और चाहते हैं कि इस विवाद का यही समाप्त कर दिया जाए। हमने मस्तानी को अपनी पत्नी बनाया है और यह एक अटल सच्चाई है। हम उसको नहीं छोड़ सकते। आपके हृदय को शांत करने का कोई राह है तो आप ही हमें इस चक्रव्यूह से निकलने का मार्ग बतायें ?“ बाजी राव नम्रता से बोलता है।

“श्रीमंत, अब आप हमारी बोली बोलने लगे हैं... हिंदू पेशवाई में मुसलमान स्त्री से संबंध अधर्म है। एक काम हो सकता है।... प्रायश्चित करके मस्तानी का शुद्धिकरण कर लिया जाए और उसको ब्राह्मण बना दिया जाए।“

“प्रायश्चित ? किस बात का प्रायश्चित ? प्रायश्चित तो पापों का किया जाता है। क्या हमारे संग प्रेम करने से मस्तानी ने कोई पाप या गुनाह किया है जो वह प्रायश्चित करे ? मस्तानी कर्म से क्षत्रिय है और क्षत्रिय ही रहेगी। उसकी आत्मा गंगा जल की तरह साफ और पवित्र है, पवन की तरह निर्मल है और हवन की आहुति की भाँति शुद्ध है। फिर आप उसका क्या शुद्धीकरण करोगे ?“ बाजी राव तिलमिला उठता है।

“आपको धार्मिक रीति-रिवाजों पर किंतु-परंतु करने का कोई अधिकार नहीं है। हम कैसे विश्वास कर लें कि आपकी मस्तानी के साथ शादी हुई है ? मस्तानी का जीवन ढंग इस्लामी है। यदि आप उसके साथ शादी करवाकर उसका रहन-सहन, उसका तौर-तरीका, जीवन जीने की दृष्टि, मानसिक सोच विचार अर्थात समस्त जीवन शैली परिवर्तित कर सकते हो तो हमें कोई आपŸिा नहीं, आपके और उसके रिश्ते को लेकर।“ ब्राह्मणों का मुखिया अपना निर्णय सुना देता है।

“मेरे और मस्तानी के जीवन में खलल डालने और हमारे रिश्ते पर कीचड़ उछालने का तो आपको भी हक नहीं है। प्रेम करते समय खुद को बदला जाता है और प्रेमी को उसके उसी रूप में स्वीकारना होता है जिसमें वह हो। उसे बदला नहीं जाता। यही इश्क का उसूल है। हमारा विवाह जब बुंदेलखंड में हुआ था तो उसमें हमारी सेना के अनेक सरदार उपस्थित थे। नर्बदा नदी के तट पर उस विवाह को अन्तिम स्पर्श दिया गया था। यदि आपको इससे राहत नहीं मिलती तो हम दुबारा से इस आने वाले वसंत उत्सव में मस्तानी के साथ विवाह रचाएँगे। आप सभी आकर उसके साक्षी बन सकते हैं।“ बाजी राव खीझ कर सभा विसर्जित कर देता है और क्रोध में दरबार से उठकर चला जाता है।

ब्राह्मण शांत होकर अपने अपने घरों को चले जाते हैं।

बहरहाल, उसी वर्ष 1730 ई. के अंत में बाजी राव मस्तानी के साथ दुबारा विवाह रचा लेता है।

इस विवाह में उसकी माँ राधा बाई और पत्नी काशी बाई को छोड़कर शेष सभी सम्मिलित होते हैं। विवाह के अवसर पर बाजी राव मस्तानी के लिए ब्राह्मण देवकी नंदन पाठक को गीत गोबिंद व्याख्या सहित लिखने और एक बारांदरी बनाने का आदेश देता है।

 
शनिवार वाड़ा

बाजी राव और मस्तानी का प्रेम कोथरूड़ बाग (पूणे का एक इलाका) के एकांतमयी वातावरण में पलने लग पड़ता है। बाजी राव दिन रात मस्तानी के साथ अय्यासी मंे डूबा रहने लगता है। दिन भर मस्तानी, बाजी राव के साथ घुड़सवारी और युद्ध अभ्यास करती रहती है। कभी कभी तो बाजी राव के संग शनिवार वाड़ा में शिकार खेलने भी चली जाती है। संध्या समय वह बाजी राव के बराबर बैठकर मदिरापान करती, नृत्य दिखलाती और अपनी सुरीली आवाज़ में गीत-ग़ज़लें भी सुनाती है। मस्तानी बड़ी निपुणता से अनेक साज बजाना जानती है। शाइरी करने के शौक के कारण मस्तानी ने पढ़ना-लिखना भी सीखा हुआ है। वह अनेक भाषाओं का ज्ञान रखती है। रात्रि में नृत्य करते हुए मस्तानी को बाजी राव अपनी बाहों में उठाकर उसके होंठों से अपने होंठ जब जोड़ लेता है तो यूँ लगता है मानो कृष्ण बंसरी बजा रहे हों। मस्तानी भी बाजी राव के साथ इस प्रकार आलिंगनबद्ध हो जाती है जैसे चंदन के वृक्ष से नाग लिपटा होता है।

मस्तानी बहुमूल्य गहनों और रेशमी वस्त्रों में सदैव सज धज कर रहती है। सबसे बड़ी बात वह जवान और अति सुशील है। मस्तानी बाजी राव से आयु में दस वर्ष छोटी है। गोरी-चिट्टी और लम्बी छरहरी भरपूर यौवना मस्तानी के हुस्न का जादू बाजी राव के सिर चढ़कर बोलने लग पड़ता है। मस्तानी के प्रेम में बाजी राव सब रिश्ते-नाते और दुनियादारी बिसरने लग जाता है। बाजी राव का संसार सिमटकर रह जाता है जो मस्तानी से शुरू होकर मस्तानी पर ही खत्म हो जाता है।

ससवाद (करहा नदी के तट पर बसा पूणे का एक क्षेत्र) से दूर कोथरूड़ में रहने के कारण बाजी राव का रिश्ता लगभग अपने परिवार से टूट ही गया होता है। वह ससवाद एक जिम्मेदारी पूरी करने ही आता-जाता है। परंतु उसका मन वहाँ नहीं लगता। बाजी राव का मन तो मस्तानी के पास ही बहलता है।

बाजी राव मस्तानी को वेल नदी के पास पाबल (श्रीरर तुलका का पूणे से 39.94 किलोमीटर दूर पड़ता एक पंचायती गांव) के नागेश्वसर महादेव मंदिर को दिखाने ले जाता है। मस्तानी भिन्न भिन्न नृत्य मुद्राओं वाली नर्तकियों की मूर्तियों वाले मंदिर की सुंदरता देखकर मोहित हो उठती है। वहाँ के एकांत में मस्तानी मंदिर के पुजारी से मंदिर के विषय में पूछती है।

पुजारी उन्हें बताता है, “इस मंदिर में दूर दूर से लोग अपने प्रेम की प्राप्ति और रिश्तों के लम्बे निभने की मन्नतें मांगने आते हैं। आपके जैसी प्रेमी युगलों का तो यहाँ तांता लगा रहता है। इस मंदिर को कन्नू राजा पाठक ने अपनी महबूब नर्तकी के लिए चैहदवीं सदी में बनवाया था।“

मस्तानी मजाक में बाजी राव से पूछ लेती है, “शाहजहाँ ने मुमताज महल के लिए ताज महल बनवाया था। क्या कभी मेरे लिए भी आप ऐसा जगह कुछ बनवाओगे ? आप तो कहते थे, कुछ बनवाऊँगा जिसको देखकर सारी दुनिया दंग रह जाएगी। कब बनवाओगे ?“

बाजी राव उतर में कुछ नहीं कहता और मस्तानी को बांह से पकड़कर वहाँ से ले जाता है। जब वह मुल्ला-मूथा दरिया के निकट पहुँचते हैं तो बाजी राव मस्तानी से प्रश्न करता है, “मस्तानी, एक बात बता, कैसा लगा तुम्हें हमारा पूणाका (पूणे) ? तेरा यहाँ चित लगा कि नहीं ? मराठों की मातृभूमि बढि़या है कि बुंदेलखंड ?“

मस्तानी हँसती हुई उतर देती है, “स्वामी, विश्व में सर्वोतम तो वही जगह होती है जहाँ आप जन्मे, पले और बड़े हुए होते हो। लेकिन जहाँ वर्तमान समय में रह रहे हो और आने वाली वहाँ आयु बितानी हो तो जड़े जमाने के लिए उस धरती को भी प्यार करना पड़ता है। नहीं तो इन्सान सदा उखड़ा रहता है।“

“नरबादा (मस्तानी), मेरा छत्रपति महाराज शाहू की राजधानी सतारा से अपना केन्द्र बदलने से बहुत पहले से विचार बना हुआ है। मुझे हर काम में शाहू जी की दखलअंदाजी नहीं भाती। मैं भी बिना रोक टोक मुगलों की तरह ऐश परस्ती करना चाहता हूँ। अब पूरा जीवन मैं लड़ मरकर तो व्यतीत नहीं कर दूँगा न?... कभी पूणा एक छोटा सा गांव हुआ करता था। अब यह एक बड़ा शहर बन चुका है। मराठा राजनीति का गढ़ कह लें तो कोई अतिकथनी नहीं होगी। इसके कई पेठ (नगर) हैं और प्रत्येक पेठ में अनेक वाड़े(Residence Complex½) हैं। पर मैं एक दूसरा ही वाड़ा बसाने की सोच रहा हूँ। मस्तानी वाड़ा।“

“वाह ! बहुत सुंदर योजना है। पर कहाँ बनाओगे नया वाड़ा ?“

“यहीं, कस्बा पेठ के समीप मुल्ला-मूथा दरिया के किनारे ही। और कहाँ ? महाराज शाहू जी ने लाल महल वाली यह जागीर मुझे प्रदान की हुई है। मेरा लक्ष्य एक एक ऐसा वाड़ा बनाने का है जो बाकी सभी वाड़ों से खूबसूरत और आलीशान हो। किले की भाँति सुरक्षित हो। वाड़े का हर मकान केवल दो मंजि़ला हो। छत पर सोने के लिए शयन कक्ष। निचली मंजि़ल पर कोई खिड़की न हो ताकि अंदर बसने वाले पर्दे में रह कर अपना जीवन अपनी इच्छानुसार व्यतीत कर सकें।“ बाजी राव अपनी कल्पना में बसा नक्शा खींच देता है।

मस्तानी यह सुनकर उमंगित हो उठती है, “ठीक है। मैं इस कार्य में आपका पूरा सहयोग करूँगी। मेरी ओर से चाहे आज से ही तैयारियाँ प्रारंभ कर दो।“

बाजी राव, मस्तानी के साथ एक नया संसार निर्मित करने के लिए ज्योतिष्यिों को 10 जनवरी 1730 ई. के दिन बुलाकर मुहूर्त निकलवाता है तो शनि देव की कृपा वाला शनिवार का शुभ दिन निकल आता है। मस्तानी के नाम के वाड़े का एकदम विरोध न हो, इसलिए बाजी राव मस्तानी के परामर्श पर उस नये वाड़े का नाम शनिवार वाड़ा यह सोचकर रख देता है कि बाद में उस नाम को बदल दिया जाएगा। सात दिन बाद 17 जनवरी 1730 ई. को नवीन और आधुनिक सुविधाओं वाले शनिवार वाड़े का बाजी राव नींव पत्थर रखकर निर्माण कार्य आरंभ करवा देता है।

राजस्थान के प्रसिद्ध ऐतिहासिक कुम्मवत खत्री को भवन निर्माण का उŸारदायित्व सौंपते हुए बाजी राव समझाता है, “यह वाड़ा पूणे के सब वाड़ों से उŸाम होना चाहिए। समीप के इलाके जूनर के जंगल से सागौन वृक्षों की लकडि़याँ, चिचवड़ से पत्थर, जूजेरी के नींबू बूटों का प्रयोग करके इस को जितना संभव हो सकता है, हमारे रहने के लिए तैयार कर दो।“

कुम्मवत कागज-कलम तैयार कर लेता है, “चिंता न करिये, श्रीमंत। मैं दिन रात एक कर दूँगा। आप इसकी योजना मुझे बता दो एकबार, फिर मंैं जानूँ या मेरा काम जाने। आपकी कल्पना को साकार करके रख दूँगा। ऐसा शानदार वाड़ा तैयार करूँगा कि लोग मुँह में उंगलियाँ दबाकर देखते रह जाएँगे।“

“हम इसके पाँच द्वार बनाना चाहते हैं। सबसे बड़ा मुख्य दरवाज़ा उतर दिशा मंें दिल्ली की ओर खुलता हो ताकि जब भी हम शनिवार वाड़े से बाहर कदम रखें तो दिल्ली पर राज करने का लक्ष्य हमें स्मरण रहे। इसका नाम भी हम दिल्ली दरवाज़ा ही रखेंगे। इस दरवाज़े की मजबूती छातीची होनी चाहिए, माटीची नहीं। मेरा आशय यह है कि दरवाज़ा बहादुर मराठा मर्दों की छाती जैसा मजबूत हो। मिट्टी की तरह भुर जाने वाला नहीं। दरवाज़ा कम से कम इतना बुलंद हो कि होडा (पालकी) सहित हाथी आसानी से इसमें से निकल सके। शत्रु का हाथी टक्कर मारकर इसे ध्वस्त न कर सके। इसलिए दरवाज़े में पचास-साठ तीखे नुकीले बांहों बराबर कील जड़ दो। पूरा दरवाज़ा सख्त लोहे से ढका हो।“

“बेफिक्र रहें, श्रीमंत। पूरा दरवाज़ा लोहे की चादर से मढ़ा होगा। जंगी हाथी के माथे की सीध में आधे आधे गज़ के बहतर कील लगाएँगे। साधारण व्यक्ति के निकलने के लिए छोटा-सा दरवाज़ा लगाएँगे ताकि हमला होने की सूरत मंे फौज जल्दी अंदर प्रवेश न कर सके।“ कुम्मवत खत्री दरवाज़े की तस्वीर बनाकर दिखाता है।

“हाँ, दरवाज़े से निकलते ही रास्ता एकदम बायीं ओर मुड़ना चाहिए ताकि हमलावर को आगे बढ़ने में कठिनाई पेश आए और हमारी सेना आगे बढ़ने वालो को ढेर करती जाए।... एक दरवाज़ा मस्तानी के लिए विशेष तौर पर बनाया जाए। उस ‘मस्तानी दरवाजे़’ (मस्तानी के पोते अली बहादुर के कारण इसको अली बहादुर दरवाज़ा भी कहते हैं) को सिर्फ़ मस्तानी ही अंदर-बाहर जाने के लिए इस्तेमाल किया करेगी। तीसरा दरवाज़ा सुरक्षा की दृष्टि से बनाया जाएगा - खिड़की दरवाज़ा। चैथा दक्षिणी गणेश दरवाज़ा भगवान गणेश रंग महल और कस्बा गणपति मंदिर की ओर जाते हुए रास्ते में बनाया जाए। इस दरवाज़े के द्वारा वाड़े की स्त्रियाँ मंदिर जाया करेंगी। पाँचवा जमभुल दरवाज़ा (कई वर्ष बाद बाजी राव के पोते पेशवा नारायण राव की अर्थी के इस दरवाजे़ सेे श्मसान भूमि को जाने के बाद अब इस दरवाजे़ को नारायण दरवाज़ा कहा जाने लगा है) एक खास मकसद के लिए गुप्त सा बनाया जाए। हमारे वंशजों के मनोरंजन के लिए लुकछिप कर पर्दे में आने वाली रखैलें और कंचनियाँ इस दरवाज़े का प्रयोग किया करेंगी।“

“ये तो दरवाजे़ हो गए। बीच मंे कैसे और कौन से भवन बनाये जाने हैं ?“

“इसमें हमारी प्रिय मस्तानी के लिए विशेष ‘मस्तानी महल’ बनाया जाए। एक थोरलिया रायनचा दीवानखाना (Marathi : The court reception hall of the eldest royal, meaning Baji Rao-I) जहाँ हम दरबार लगाया करेंगे। नृत्य दीवानखाना (Dance Hall) हमारे मुजरे देखने के लिए होगा और जूना आरसा (पुराना आरसी) महल (Old Mirror Hall) फुर्सत के समय वक्त बिताने के लिए होगा जो सारा का सारा शीशों से जड़ा हो...। और हम क्या कहें, आप खुद समझदार और अच्छे कारीगर हो।“ बाजी राव मोहरों की अनेक थैलियाँ कुम्मवत खत्री को इस कार्य के लिए दे देता है।

मोहरों को देखकर कुम्मवत खत्री अवाक और प्रसन्न हो जाता है, “बस, मैं समझ गया सब। आप देखते चलें, मैं आपको क्या करके दिखाता हूँ, हुजूर !“

वाड़े के निर्माण कार्य युद्धस्तर पर प्रारंभ हो जाते हैं।
 
प्रेम पौधा

मुगल बादशाह को जब सरबुलंद खान द्वारा 1730 ई. में बाजी राव के साथ चैथ और सरदेशमुखी को लेकर की गई संधि के बारे में पता चला तो उसको यह फैसला पसंद नहीं आया। बादशाह ने सरबुलंद खान को पद से हटाकर जोधपुर के अजीत सिंह के पुत्र अभय सिंह को जिम्मेदारी सौंप दी। परंतु अभय सिंह को भी बाजी राव के साथ समझौता करना पड़ा, क्योंकि वह अकेला बहुत सारे खुदमुख्तारों के साथ नहीं निपट सकता था। ये समझौते मराठा सेनापति तिंबर्क दाबड़े को स्वीकार नहीं थे। वह गुजरात के सब मामलों को वसूलने का अपना हक़ समझता था। वह पहले से ही पेशवा के साथ खार खाता था। उसका कारण यह था कि छत्रपति के बाद दूसरा बड़ा पद पेशवा का होने के कारण वह बाजी राव के साथ उसकी योग्यता के कारण घृणा करता था। दूसरी ओर पेशवा पुराने लोगों की अपेक्षा होलकर, शिंदे और पवार जैसे नौजवानों को पदों पर आसीन करके प्रसन्न होता था।

शिंदे, पवार, गायकवाड़ और होलकर घरानों का उभार भी बाजी राव की कृपा से हुआ था। शिंदे, सतारा जि़ला के कोरेगांव ताल्लुक के कंनेरखेड गांव के वासी थे। इनके पुरखों को इनाम के तौर पर इस गांव की जागीर मिली थी। बाजी राव के पिता बालाजी विश्वनाथ की सेना में राणो जी शिंदे नाम का कारीगर था। उसकी ईमानदारी को देखकर बाजी राव ने उसको अपना निजी सेवक और अंगरक्षक बना दिया था। उरी हिंदुस्तान के युद्धों में लड़ने के पश्चात इसको बाजी राव ने एक बड़ा फौजी दल देकर उसका मुखिया बना दिया था।

होलकर घराने के लोग नीरा नदी क तट पर बसे जंजोरी नगर के निकट पड़ते होल गांव के रहने वाले थे। इस घराने का संस्थापक मलहार राव होलकर था, वह भेड़ें चराकर अपना गुज़ारा किया करता था। बाद में यह किलेदार बन गया। किलेदारी करते हुए इसने युद्ध विद्या सीखी और बाजी राव के साथ अनेक युद्धों में अपने जौहर दिखाये। उसकी बहादुरी को देखते हुए बाजी राव ने उसको पाँच हज़ार सैनिकों का सेनापति बना दिया था।

पवार राजपूतों का वंश बहुत पुराना है। इनकी महिमा धार प्रदेश से ही अधिक हुई। राजा विक्रमादित्य और राजा भोज, धार में बसते रहे थे। विक्रमादित्य ने तो उज्जैन से बदलकर अपने राजधानी धार को बना लिया था। असल राजपूत और मराठा पवार वंश का संस्थापक उदाजी राव पवार को माना जाता है। 1729 ई. में बाजी राव द्वारा उसको धार की जागीर छत्रपति से प्रदान करवाई थी।

गायकवाड़ घराने का आगाज़ भी लगभग शिंदे और होलकर घरानों के साथ ही हुआ था। झिंगोजी राव गायकवाड़ के पुत्र पिलाजी राव गायकवाड़ ने गुजरात में अपनी धाक जमा के 1721 ई. मंे अपना राज स्थापित किया और वड़दोरा (ठंतवकं) को अपना राजधानी बनाया। 1726 ई. में उसने सोनागाड के जि़ले का निर्माण करवाया। इसको पेशवा बाजी राव की ओर से ‘सीना खास खेल’ का खिताब बख्शा गया था। (14 मई 1732 ई. को उसकी मृत्यु के बाद उसके पुत्र धमाजी राव गायकवाड़ ने राज संभाला था)।

छत्रपति द्वारा मराठा सरदारों खंडो राव और दाभड़े को यह विश्वास दिलाया गया था कि यदि वे गुजरात जीत लेंगे तो वहाँ की जागीर उन्हें ईनाम के तौर पर दी जाएगी। खंडो राव ने तभी से ही गुजरात में कर वसूलना प्रारंभ कर दिया। सिद्धी हुसैनी ने उस के साथ दो बार युद्ध किया लेकिन वह हार गया। छत्रपति ने इस पर प्रसन्न होकर खंडो राव को सेनापति बना दिया। इसी खंडो राव का साथी दमाजी गायकवाड़ (पिलाजी राव गायकवाड़ का पुत्र) था। वह बड़ा महान योद्धा था। इसलिए छत्रपति ने गायकवाड़ को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि से नवाजा था। बहुत सारे युद्धों में भी ये सब बाजी राव के संग चला जाया करते थे। गुजरात मामला सुलझाने की अपेक्षा दिन-प्रतिदिन भड़कता ही गया। संसारपति तिंबर्क दाभड़े ने पेशवा बाजी (द्वितीय) (बाजी राव का पुत्र नाना साहिब) पर दाभड़े परिवार और छत्रपति शाहू के मध्य हुए अहदनामी का उल्लंघन करने का दोष मढ़ दिया। संसारपति ने बाजी राव के साथ सख्ती से सीधे ही निपटने के लिए धार की जंग छेड़ ली।

अपै्रल 1731 ई. को धोबाई में हुई इस लड़ाई में तिंबर्क दाभड़े और संभाजी का पुत्र पिलाजी गायकवाड़ मारे गए। इस जंग में बागी हुए उदाजी पवार और चिमनाजी दामोदर को बाजी राव ने बंदी बनाकर युद्ध जीत लिया।

युद्ध से लौटकर आने के उपरांत 2 अपै्रल 1731 ई. को देवकी नंदन का लिखा बाजी राव को एक ख़त मिलता है। उस में बारांदरी और गीत गोबिंद के तैयार हो जाने की सूचना दी गई होती है।

शनिवार वाड़े का निर्माण आरंभ होने से दो वर्ष बाद शनिवार वाड़ा( वाड़े की किलेबंदी और दीवारें, फव्वारे, बाग और ऊँचे बुर्ज़ का काम बाद में बाजी राव के पुत्र नाना साहिब ने 1746 ई. में पूरा करवाया था।) तैयार हो जाता है। शेरू (ब्लचतमेे ज्तमम) के तनों की शहतीरें, छतों के नीचे सहारे के लिए डाली जाती हैं। भवनों की दीवारों पर जयपुर के मोराजी पत्थरवत भोजराजा और चित्रकार रागो द्वारा रामायण और महाभारत के चित्र बनाये जाते हैं।

22 जनवरी, 1732 ई. शनिवार वाले दिन को हिंदू रीति के अनुसार पूजा और हवन करवाकर बाजी राव और उसके समूचे परिवार द्वारा ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़े में गृह-प्रवेश किया जाता है। इस शुभ दिन पंद्रह रुपये पचास पैसे का दान बाजी राव मस्तानी के हाथों करवाता है। वाड़ा तैयार करने वाले कारीगरों, कुम्मवत खत्री, मोराजी पत्थरवत भोजराजा, शिवराम कृष्णा, देवाजी, कोंडाजी सूत्र आदि को बाजी राव द्वारा नायक (छंपा उमंदे डंेजमत) का खिताब और भारी ईनाम देकर नवाज़ा जाता है। वाड़े पर कुल लागत 16,100.10 रुपये आ चुकी होती है।

बेशक पेशवा का समस्त परिवार शनिवार के दिन वाड़े में एकत्र होता है, परंतु सभी सदस्य मस्तानी से अपनी एक सीमित दूरी बनाकर रखते हैं। यहाँ तक कि मस्तानी के प्रयोग के लिए कुआँ भी पृथक होता है। रहने के लिए महल भी अलग और वाड़े से बाहर जाने के लिए दरवाज़ा और मंदिर भी अलहदा ही होते हैं। मस्तानी के राह में से निकलने पर भी भट्ट परिवार कन्नी कतराता है। बाजी राव को महज दिखावा करने के लिए ही वे मस्तानी के साथ न चाहते हुए भी तालमेल रखते हैं। वरना मस्तानी का उल्लेख सुनना भी उनको अच्छा नहीं लगता। विशेषकर काशी के मन में से न कभी मस्तानी के लिए नफ़रत गई थी और न ही जा सकती है। मस्तानी को अपने साथ होते पक्षपाती व्यवहार और अस्वीकारे जाने का दुख तो होता है, पर वह अपने मन की भड़ास किसी के सामने नहीं निकालती। सब कुछ अपने अंदर ही समाहित करके बाजी राव के प्रेम में मस्त हुई रहती है।

पेशवा का सारा खजाना वाड़े के निर्माण पर ही खर्च हो चुका होता है। महीना पहले 20 दिसम्बर 1731 ई. को महाराजा छत्रसाल की मृत्यु हो जाने के कारण बाजी राव को बुंदेलखंड से भी आर्थिक सहायता आनी बंद हो जाती है। मस्तानी के भाई शहजादा जगतराज का भेजा पत्र बाजी राव को मिलता है जिसमें उसने लिखा होता है कि महाराजा छत्रसाल की मौत के बाद वह राज को संभालने और सभी साठ भाई-बहनों को उनका हक, हिस्से और जागीरें बांटने में व्यस्त है। जैसे ही वह अपने घरेलू मामलों को निपटा लेगा तो फुर्सत पाकर वह पूणे आएगा और पेशवा को अपने स्वर्गीय पिता की वसीयत के अनुसार बनने वाला तीसरा हिस्सा सौंप देगा।

बाजी राव अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत करने के लिए नये क्षेत्रों पर कब्जा करने के लिए निकल पड़ता है। हर मुहिम में मस्तानी दिन रात बाजी राव के संग संग रहती है। जब कभी युद्ध से फुर्सत मिलती है तो वह शनिवार वाड़े में जाकर आराम करते हैं। पेशवा के शेष सभी परिवार के अलावा अन्य जान-पहचान वाले और सगे-संबंधी भी ससवाद छोड़कर शनिवार वाड़ा में आकर रहने लग पड़ते हैं।

मौसम बदलते रहते हैं। पतझर...सावन...बसंत...बहार...।

वर्ष 1732 ई. में काशी की कोख से बाजी राव को एक पुत्र रामचंद्र की प्राप्ति होती है। लेकिन वह बीमार होकर कुछ महीने बाद ही ईश्वर को प्यारा हो जाता है। उससे अगले वर्ष 1733 ई. में मस्तानी का मामा अनवर खान पूणे में आकर मस्तानी की अम्मी के निधन की ख़बर सुनाता है। मस्तानी कुछ दिन माँ का शोक मनाने के बाद अपने जीवन में पुनः व्यस्त हो जाती है।

इसी वर्ष काशी बाई का एक और गर्भ गिर जाता है। उन दिनों में ही बहुत सारे मराठा सैनिक भी जंग में मारे जाते हैं। पेशवा का परिवार इन सभी मौतों का दोष मस्तानी के सिर मढ़ कर उसको अशुभ मानने लग जाता है।

सिद्धियों के साथ नित्य होती छोटी-मोटी झड़पों को बाजी राव एकबार भयंकर रूप में युद्ध करके समाप्त कर देने पर तुल जाता है। 1733 ई. में सिद्धी नवाब रसूल याकूत की मृत्यु हो जाती है तो उसके पद की दावेदारी को लेकर उसके भाइयों और पुत्रों के बीच झगड़ा उत्पन्न हो जाता है।

बाजी राव ने इस अवसर का लाभ उठाने के लिए जिंज़र को समुद्र की ओर से घेरा डाल लिया। जिंज़र का किला बहुत खस्ता हालत में था और ऐन वक्त पर सेखोजी की अचानक मौत हो गई। सेखोजी के भाई संभाजी के साथ तालमेल न बनने के कारण बाजी राव वापस लौट आया।

बाजी राव के साथ पाँच वर्ष लगातार दिन रात रहने के बावजूद मस्तानी गर्भवती नहीं होती, जबकि काशी को बाजी राव कभी कभार मिलने पर ही गर्भवती करके चला जाता है। यह अलग बात है कि उसके गर्भ में बीच में ही व्यवधान पड़ जाता है। मस्तानी को बांझ कहकर ताने-उलाहने कसे जाने लगते हैं। मस्तानी अपने और बाजी राव के प्रेम पौधे को फल लगा देखने के लिए तत्पर हो जाती है। वह सब तरफ से ध्यान हटाकर शराब छोड़ देती है और संतान प्राप्ति के यत्न प्रारंभ कर देती है।

एक दिन एकदम मस्तानी की तबीयत खराब हो जाती है। बाजी राव उपचारक को बुलाता है। दासियाँ मस्तानी की कलाई पर धागा बांधकर वैद को पकड़ा देती हैं। वैद धाना कानों से लगाकर मस्तानी की नब्ज़ सुन लेता है और मुस्कराता है, “चिंता करने की कोई बात नहीं श्रीमंत सरकार। मुबारक हो। पेशवा परिवार का चश्म चिराग आ रहा है।“

खुशख़बरी सुनकर बाजी राव उपचारक का धन्यवाद करता है और अपने गले में से उतारकर एक कीमती माला वैद को बतौर ईनाम दे देता है। मस्तानी के पास जाकर खुशी में पागल हुआ बाजी राव मस्तानी के चैड़े मस्तक को चूमते हुए कहता है, “मुझे तेरे जैसा सुंदर-सुशील और मेरे जैसा जांबाज मराठा शेर पुत्र चाहिए।“

“हाय अल्ला ! मुझे तो यकीन ही नहीं आता कि मैं माँ बनने वाली हूँ।“ मस्तानी बिस्तर पर पड़ी छुईमुई की तरह सिकुड़ जाती है।

“नित्य जो सागर मंथन करते थे, उसके परिणाम स्वरूप हीरा, मोती, लाल, माणक तो बाहर निकलना ही था। चलो, बधाई हो। एक का नींव पत्थर रखा गया है। ऐसे ही हम मेहनत करके एक विशाल लश्कर पैदा कर लेंगे।“ बाजी राव मूंछों को मरोड़ा देता है।

मस्तानी नखरा करती है, “न बाबा। जान से मारना है मुझे गरीबन को ? यदि फौज बनानी है तो आप बच्चा पैदा करके दिखाओ ?“

“अगर यह संभव होता तो तेरी खातिर हम यह भी कर देते मेरी प्रिय।“ बाजी राव मंद मंद हँसता है।

बाजी राव गरीबों को दान करके अपने परिवार को मस्तानी के गर्भवती होने का शुभ समाचार सुना देता है। काशी बाई को जब मस्तानी के गर्भवती होने के बारे में सूचना मिलती है तो वह तड़प उठती है। वह बहाने से अपनी सास राधा बाई को भड़का कर मस्तानी को बाजी राव से जुदा कर देती है। मस्तानी को जनेपे के लिए शनिवार पेठ के सरदार रसटाका के वाड़े मंे भेजकर खास दाइयाँ और दासियाँ उसकी सेवा में लगा दी जाती हैं। भट्ट पेशवा परिवार की सभी स्त्रियों को गर्भावस्था में वहीं ठहराया जाता है, क्यांेकि वहाँ सभी प्रकार की सुविधायें धरती की सतह पर ही उपलब्ध हैं। चैबारों पर चढ़ने उतरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

काशी बाई को बाजी राव के साथ समय व्यतीत करने का खुला समय मिल जाता है। दिन रात बाजी राव काशी के पास रहता है। कुछ ही दिनों में काशी भी गर्भवती हो जाती है। मस्तानी और काशी बाई दोनों सौतनें रसटाका वाड़े में एकसाथ हो जाती हैं।

मार्च 1734 ई. में मस्तानी पुत्र को जन्म देती है। चितपवन ब्राह्मणों की रीति के अनुसार बच्चे के जन्म से छह दिन बाद पूजन और बारहवें दिन नामकरण की रस्म होती है। मस्तानी के पुत्र के लिए विशेष पूजा नहीं की जाती और बिना कोई रस्म किए बाजी राव मस्तानी की कृष्ण भक्ति को मुख्य रखकर अपने और मस्तानी के पुत्र का नाम कृष्ण रख देता है। लेकिन बाजी राव के परिवार वाले कृष्ण नाम के साथ सिनहा उपनाम जोड़ देते हैं। मस्तानी का पुत्र कृष्ण सिनहा के नाम से जाना जाने लगता है। न बाजी राव और न ही मस्तानी को उस समय यह ज्ञान होता है कि पुरातन परंपरा के अनुसार बच्चे के नाम के साथ सिनहा जोड़ने का अर्थ बच्चे को अधिकारों से वंचित रखना होता है। सिनहा शब्द का प्रयोग पेशवा के खानदान में अवैध संतान के लिए किए जाने की प्रथा होती है।

कृष्ण सिनहा के जन्म से कुछ माह बाद 18 अगस्त 1734 ई. को उसी वर्ष काशी बाई के रघुनाथ राव नाम का दूसरा पुत्र पैदा होता है। रघुनाथ राव के लिए सभी रस्में बाजी राव के विरोध के बावजूद निभाई जाती हैं। परंतु मस्तानी उनका बुरा नहीं मनाती। मस्तानी के मन को दुख अवश्य होता है, पर वह अपनी पीड़ा की अभिव्यक्ति किसी के सम्मुख नहीं करती।

बाहरी और घरेलू युद्धों से जूझता हुआ बाजी राव अपनी जीवन यात्रा तय किए जाता है। मस्तानी पेशवा के पारिवारिक सदस्यों के षड्यंत्रों से निपटती हुई बाजी राव के साथ हर मैदान में परछाई की तरह साथ रहती है। कृष्ण सिनहा और रघुनाथ राव बड़े होने लगते हैं। काशी बाई के एक अन्य पुत्र जनार्धन (जनोबा दादा) पैदा होता है।

रघुनाथ राव के बड़े होते ही मुंडन करवाकर ब्राह्मणी प्रथा का प्रतीक जनेऊ पहनने की रस्म की तैयारियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। बाजी राव जब कृष्ण सिनहा के भी जनेऊ डालने की बात करता है तो एकबार फिर समस्या उठ खड़ी होती है। काशी बाई बवाल खड़ा कर देती है, “लो, जनेऊ नहीं तो और कुछ ? कल की भूतनी और श्मसान का आधा। आज जनेऊ की रस्म में शरीक करो, कल को पेशवाई पर अधिकार मांगेंगे। मुझसे और मेरे पुत्रों से सारे अधिकार छीनकर मस्तानी पर ही सब कुछ लुटा दो।“

“पर कृष्ण सिनहा मेरा बेटा है और हिंदू रीति के अनुसार उसको भी जनेऊ धारण करना चाहिए।“

बाजी राव के तर्क को चिमाजी अप्पा काटता है, “पर वह मुसलमानी का भी पुत्र है। वह क्या जाने जनेऊ का क्या महत्व होता है ? हमारी हिंदू मर्यादाओं का पालन उससे कहाँ हो पाएगा ?“

बाजी राव समस्त परिवार से बहुत माथा पच्ची करता है, पर बाजी राव की कोई एक नहीं चलने देता। मस्तानी के धैर्य का प्याला टूट जाता है। मस्तानी भी खीझकर समस्त पेशवा परिवार को खरी खोटी सुनाती है, “चाट लो अपने ब्राह्मणवाद को। मेरे पुत्र का नाम भी हिंदू नहीं रहेगा। छत्रपति द्वारा जंग में अकेले वीरता दिखाने वाले को ‘शमसेर बहादुर’ की उपाधि दी जाती है। मेरा पुत्र भी अब अकेला ही अपनी जंग लड़ेगा और आज से मैं अपने पुत्र का ब्राह्मणी नाम भी बदल कर राजपूतों और मुसलमानों वाला नाम शमशेर बहादुर रखती हूँ। जैसे आप चलोगे, मैं भी वैसे ही चलूँगी।“

कृष्ण सिनहा प्राणामी धर्म स्वीकार करके कृष्ण सिनहा से शमसेर बहादुर बन जाता है और हिंदू तथा इस्लाम धर्म का पालन करने लग जाता है। बाजी राव पाबल(। अपससंहम सपमे वद जीम समजि ;दवतजीद्ध इंदा व िजीम टमस त्पअमतण् च्ंइंस पे 39ण्34 ज्ञउ ंित तिवउ जीम कपेजतपबजष्े उंपद बपजल व िच्नदम ) वाले महल की मरम्मत करवाकर उसको मस्तानी महल का नाम दे देता है और मस्तानी के नाम कर देता है।

एक नये बने अन्य वाड़े रावरखेड़ी, पाबल में बाजी राव मस्तानी के प्रेम में लीन रहकर मनमर्जी का विलासमयी जीवन व्यतीत करने लग जाता है। वह राजनीतिक कामों और शासन प्रबंध तथा अन्य मामलों जैसे जंगों-युद्धों की तरफ ध्यान देना बहुत कम कर देता है। दिन रात मस्तानी बाजी राव के साथ शराब पीती और उसका चित बहलाने के लिए मुजरे करती रहती है। बाजी राव हाथों में जाम पकड़कर मस्तानी के परोसे पान को मुँह में चबाता हुआ अफ़ीम के नशे में हुक्के की गुड़गुड़ में सारे संसार को बिसार देता है। मस्तानी महल में बाजी राव और मस्तानी के प्रेम का पौधा फलता फूलता रहता है।...
 
जंगनामा

1735 ई. तक मराठों ने समस्त गुजरात और मालवा क्षेत्र पर अधिकार जमा लिया। परंतु कुछ स्थानों पर मुगल ओहदेदारों और जमींदारों ने मराठों का शासन स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी चैथ और सरदेशमुख की सनद मराठों के हवाले करने से कतराता था। बाजी राव ने बादशाह को मिलने के अनेक संदेशे भेजे। पर कोई सफलता प्राप्त न हो सकी। मराठों ने अपनी शक्ति दिखाने के लिए मुगलों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले राजपूताने (राजस्थान) में लूटमार शुरू कर दी।

मुगलों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए मीर बख्शी खान और वजीर कमर-उद-दीन की कमान के अधीन दो फौजी टुकडि़याँ मराठों को कुचलने के लिए भेज दीं। लेकिन मराठों के सरदारों ने उन्हें पराजित करके उल्टे पांव लौटा दिया। पिलाजी यादव ने वज़ीर खान की सेना के दांत खट्टे किए और राणोजी शिंदे तथा मलहार राव होलकर ने मीर बख्शी के दल के साथ लोहा लेकर उनके घुटने टिकवा दिए।

सिद्धी अब्दुल रहिमान अपनी दावेदारी के लिए बाजी राव से सहायता लेने आया और बाजी राव ने उसको अपना समर्थन दिया। इसके एवज में सिद्धी के पुराने इलाके जैसे कि रायगढ़, रीवास और चैल आदि संधि के अनुसार 1736 ई. में मराठों के हवाले कर दिए गए। उसके उपरांत दूसरे सिद्धियों ने भी अपने अधिकार क्षेत्र मराठों को सौंप दिए। सिद्धियों के पास केवल जिंज़र, अनजानवल और गोवालकोट आदि छोटे इलाके ही रह गए थे। सिद्धी सत भी हाथी वाले मसले को लेकर हुई जंग में चिमाजी अप्पा के हाथों मारा जा चुका था।

पेशवा ने मुगल बादशाह को सबक सिखाने के उद्देश्य से दिल्ली की ओर दिसंबर 1737 ई. में अपने भारी लश्कर के साथ कूच कर दिया। दो दलों में विभाजित इस सेना की एक टुकड़ी की कमान बाजी राव ने संभाली। दूसरी के सिपहसालार पिलाजी यादव और मलहार राव होलकर बने। आगरा के गवर्नर और उदय के नवाब सआदत खान की भारी सेना ने दिल्ली के बाहर ही होलकर की टुकड़ी को तबाह कर दिया। मलहार राव होलकर जैसे तैसे अपनी जान बचाकर बाजी राव की टुकड़ी के साथ जा मिला। सआदत खान को बाजी राव के लश्कर के बारे में ज्ञान न होने के कारण उसने सोचा कि अब मराठों से उसको कोई ख़तरा नहीं होगा। उसने मराठों को नष्ट करने की खुशख़बरी दिल्ली के बादशाह को भेज दी। विजय की ख़बर सुनते ही अन्य कई मुगल जरनैल दिल्ली छोड़कर सआदत खान के साथ जश्न मनाने चले गए।

बाजी राव को जब अपने गुप्तचरों द्वारा इसकी ख़बर मिली तो उसके कदम तेज़ी से दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। 28 मार्च 1737 ई. को दस दिनों की यात्रा केवल 48 घंटे में पूरी करके बाजी राव अपनी सेना के साथ दिल्ली की सरहदों के अंदर पहुँच गया। दिल्ली में प्रवेश करते ही बाजी राव की फौज ने दिल्ली में दहशत पैदा करने के लिए लूटमार प्रारंभ कर दी। मुगल बादशाह लाल किले के अंदर ही छिपा रहा और बाहर आकर बाजी राव के साथ लड़ने का साहस न कर सका। बाजी राव ने पूरी दिल्ली में कोहराम मचा दिया। 8000 की सेना लेकर मीर हुसैन कोका ने बाजी राव का राह रोकने का यत्न किया, पर बाजी राव ने उसकी एक न चलने दी। मीर हुसैन बुरी तरह घायल हो गया।

बाजी राव दो-तीन महीने निरंतर लूटमार करता रहा और उसने मुगलों के नाक में दम किए रखा। दिल्ली को बुरी तरह भयभीत करने के बाद बहुत सारा माल-असबाब और धन दौलत लूटकर बाजी राव 31 मार्च 1737 ई. को दक्षिण को लौट गया।

दिल्ली को अच्छी तरह हिलाकर पूणे जाते हुए केन्द्रीय भारत में बाजी राव अपने मराठा योद्धाओं के लिए रास्ते में अनेक छावनियाँ स्थापित करता गया। दया बहादुर के बाद जयपुर का राजा सवाईं जय सिंह मालवे का सूबेदार बना। यह स्वयं एक कट्टर हिंदू होने के कारण मराठों की सहायता करना चाहता था। मालवा में हर वर्ष शिंदे, होलकर और पवार चैथ और सरदेशमुखी वसूल किया करते थे। परंतु उन्हंे बादशह की ओर से कोई सहायता प्रदान नहीं की गई। 1737 ई. में बाजी राव ने मालवा की सनद प्राप्त करने के लिए उŸार की ओर कूच किया। उसने सवाई जय सिंह के माध्यम से प्रयत्न किए। बादशाह ने बाजी राव को पैगाम भेजा कि वह मालवा की आमदनी में से 13 लाख देने के लिए तैयार है और सनद बाजी राव को दे दी जाएगी। बादशाह ने यह भी कहा कि यदि मराठा राजपूत राजाओं से कर वसूल करेंगे तो दिल्ली दरबार की ओर से उसमें कोई दख़लअंदाजी नहीं की जाएगी। बादशाह ने अपने अधिकारियों के हाथ उपरोक्त शर्तों की सूची और सनदें भी भेजी थीं। लेकिन अपने अधिकारियांे को बादशाह ने यह भी हिदायत दी हुई थी कि यदि मराठा शर्तों को न माने तो सनदंे उनके हवाले न की जाएँ।

यह बात बाजी राव को पता चली तो गुस्से में आकर उसने अपनी मांगे बढ़ा दीं। बाजी राव ने बादशाह से मांग की कि पूरे मालवा की जागीर, धान, मांडु, रसीन और चंबल नदी के दक्खिन का सारा राज, 800 बंगाल के गांवों में चैथ और सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार, 50 लाख रुपये, इलाहाबाद, मथुरा, गया, दक्खिन के 6 प्रांतों की सरदेशमुखी वसूलने का अधिकार दिया जाए।

बादशाह ने अन्तिम मांग को छोड़कर शेष सभी स्वीकार कर ली थीं। पर इसके साथ ही उसने मराठों की अकड़ भग्न करने के लिए अपनी सेना भी भेज दी। बाजी राव को पहले ही सूचना मिल गई कि वज़ीर खंडो राव और कमर-उद-दीन खां फौज लेकर मथुरा की ओर आ रहे हैं। यह ख़बर प्राप्त करते ही वह तेज़ी से उतर की ओर बढ़ा। उधर दुआब मंे कर वसूल कर रहे मलहार राव होलकर को अयोद्धया के नवाब सआदत खां ने भगा दिया।

बाजी राव उतर से मराठों को एकत्रित करता हुआ दिल्ली पहुँच गया। बाजी राव का इरादा तो शांतिपूर्वक वार्ता करना था। परंतु मुगलों ने मराठों पर धावा बोल दिया। खूब घमासान लड़ाई हुई और मराठे जीत गए।

दूसरी ओर मथुरा की ओर जाते हुए सआदत खां, बंगस और खंडो राव इस युद्ध की सूचना मिलते ही तेज़ी के साथ दिल्ली की ओर मुड़ गए। बाजी राव उनके साथ रास्ते में ही निपटना चाहता था। इसलिए वह दुआब पहुँच गया। बाजी राव ने अपने भाई चिमाजी अप्पा को यह संदेश भेज दिया कि वह निज़ाम-उल-मुल्क को नर्बदा पार करके उतर की ओर न आने दे। परंतु बाजी राव अपने मंसूबे में सफल न हो और उसको दक्खिन की ओर लौटना पड़ा। फिर भी बाजी राव को बादशाह की ओर से 13 लाख रुपये वार्षिक की राशि प्राप्त करने की स्वीकृति मिल गई थी।

बाजी राव के आक्रमण से घबराकर बादशाह ने मराठों को नथ डालने के लिए निज़ाम को दिल्ली बुलाकर मालवा और गुजरात उसके बेटे गाज़ी-उद-दीन के अधीन कर दिए। बादशाह ने गाज़ी से वचन लिया कि वह उन क्षेत्रों में से मराठों को भगा देगा। मुगल बादशाह दिल्ली में बाजी राव द्वारा मचाये गए कोहराम का बदला लेने के लिए तड़प रहा था। उसके द्वारा निज़ाम-उल-मुल्क के साथ दुबारा दोस्ताना संबंध स्थापित करने का उद्देश्य ही मराठों को धूल चटाने का था। बादशाह ने निज़ाम को मुगल फौज का मुख्य सेनापति बना दिया।

निज़ाम-उल-मुल्क मराठों पर चढ़ाई करने चल पड़ा तो राह में और भी अनेक मुगल समर्थक दल उनके साथ जुड़ते चले गए। जब मुगल सेना भोपाल पहुँची तो उनकी संख्या एक लाख के करीब थी। परंतु मुगलों की यह सारी कोशिश व्यर्थ गई क्यांेकि बाजी राव और अप्पा स्वामी पहले ही तैयारी करके मुगलों के आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने शाही मुगल फौज को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। निज़ाम को हाथ खड़े करके मराठों के साथ समझौता करना पड़ा।

निज़ाम-उल-मुल्क ने कई राजपूत और बंुदेल राजाओं को अपने अधीन करके अपना रुख मराठों की ओर मोड़ लिया। उसके साथ उसका तोपखाना सिरौंज भी था।

निज़ाम-उल-मुल्क के मंसूबों की भनक पड़ते ही बाजी राव उतर में पहुँच गया। मराठा फौज को देखकर भयभीत हुआ निज़ाम भोपाल में पीछे हटने लग पड़ा। मराठे उसका पीछा करते हुए वहाँ पहुँच गए। निज़ाम-उल-मुल्क भोपाल के किले में छिप गया। मराठों ने किले को घेरकर उसकी रसद बंद कर दी। विवश होकर निज़ाम-उल-मुल्क ने भोपाल और इस्लाम गढ़ के किले मराठों को सौंप दिए और स्वयं तोपखाने की आड़ में वहाँ से खिसकने लगा। मराठों ने निज़ाम को दबोच लिया। जिसके फलस्वरूप हार मानकर निज़ाम-उल-मुल्क ने बाजी राव के आगे हाथ खड़े कर दिए। संधि की शर्तों के अलावा निज़ाम-उल-मुल्क ने वायदा किया कि वह बादशाह से मराठों को मालवा प्रांत की सनद, निरमाण और चंबल नदियों के मध्य का सारा राज और फौज के खर्च के लिए 50 लाख रुपये दिलवायेगा। (इस अवसर पर 7 जनवरी 1738 ई. को दोरा (सराई) में हुई संधि को इतिहास ‘भोपाल संधि’ के तौर पर जाना जाता है।) मुगलों ने समस्त मालवा, नर्बदा और चंबल के मध्य के क्षेत्र मेें मराठों का राज स्वीकार करके 50 लाख जंगी हर्जाना भरकर मराठों से अपनी जान छुड़ाई।

बाजी राव को मुसलमानों के अतिरिक्त पुर्तगेजि़यों के साथ भी युद्ध करने पड़े। पंद्रहवीं सदी के आरंभ में आए पुर्तगेजि़यों ने तेज़ी के साथ पश्मिमी किनारे से अपना राज्य स्थापित कर लिया था। यह भी मुसलमानों की तरह सफल होने के लिए जनता पर अमानवीय अत्याचार करने से नहीं हिचकते थे। जब बाजी राव को उनके अत्याचारों का पता चला तो उसने सिद्धियों से फुर्सत पाते ही अपने भाई चिमाजी अप्पा को कोकण में लश्कर सहित भेज दिया।

चिमाजी अप्पा ने सालसती दीप, थाना, बेलपुर, बेसवी आदि स्थानों को कब्ज़े में करने के उपरांत शंकराजी केशव और खंडोजी मानकर को कोकण की रक्षा का उतरदायित्व सौंप दिया। स्वयं चिमाजी अप्पा पूणे वापिस लौट गया। चिमाजी के लौटते ही पुर्तगेजि़यों ने पुनः सिर उठाने शुरू कर दिए और लोगों को सताने लग पड़े। बाजी राव ने रामचंद्र हरि पटवर्धन को माही और केलवे जीतने के लिए भेज दिया। यह मंतव्य सफल न हो सका। फिर बाजी राव ने 1738 ई. में शिंदे और होलकर को कोकण भेजा। तब तक पुर्तगेजि़यों को जनरल लिस्बन से सहायता प्राप्त हो गई थी। लेकिन फिर भी पुर्तगेजि़यों को भारी नुकसान मराठों ने पहुँचाया और उनका गोवा का गवर्नर मारा गया।

इधर बसाई से पुर्तगेज़ा का दमन करने के लिए चिमाजी भी कोकण में पहुँच गया। शेष स्थानों पर कब्ज़ा करते हुए फरवरी 1739 ई. को अप्पा ने बसाई को चारों ओर से घेर लिया। तीन महीने की कोशिशों के बाद मराठों ने बसाई पर विजय प्राप्त की।

जिस समय बाजी राव भोपाल में निज़ाम को घेरे खड़ा था, उसी समय नागपुर के भौंसले ने इलाहाबाद में घुसकर दहशत फैला दी थी। तभी रघुजी ने पूर्व में आक्रमण करके कटक को लूट लिया। भौंसले और रघुजी ने मराठों के साथ उक्त दोनों मुहिमों में सफलता पाई थी।

बाजी राव को यह अच्छा न लगा और उसने भौंसले को काबू मंे करने के लिए आवाजी काबड़े को भेजा। असल में इस कार्य को पूरा करने के लिए बाजी राव स्वयं जाना चाहता था, पर ऐन वक्त ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला करके लूटपाट शुरू कर दी थी। बाजी राव हिंदू मुसलमानों को एकत्र करके नादिर शाह के साथ टक्कर लेने की तैयारी कर ही रहा था कि उसको नादिर शाह के ईरान लौट जाने का समाचार मिला।

बाजी राव को मराठा साम्राज्य की सीमाओं को फैलाने और मराठियों की धाक जमाने के लिए उम्र भर कड़ा संघर्ष करना पड़ा था। लेकिन कभी भी वह बड़ी से बड़ी मुसीबत देखकर घबराया नहीं था। हर युद्ध मंे सबसे आगे कूदकर उसने सदैव अपनी बहादुरी का प्रमाण दिया था। इसलिए सभी मराठे बाजी राव को श्रेष्ठ ‘रणपुरुष’ मानते थे।

एक तरफ मराठों ने सिद्धियों के साथ जिंज़रा में जंग छेड़ रखी थी और दूसरी ओर पश्चिमी घाट पर पुर्तगेजि़यों और अंग्रेजों को भी वह सबक सिखा रहे थे जो कि मराठा राज के लिए नित्य नई चुनौतियाँ उत्पन्न कर रहे थे। पुर्तगेज़ी व्यापार के बहाने भारत में प्रवेश करके अपना अधिकार जमाने लग पड़े थे। बाजी राव ने कोकण के मनाजी अंगारे के लिए खतरा पैदा कर रहे पुर्तगेजि़यों को अपने नियंत्रण में कर लिया था। इसके शुक्राने के तौर पर पेशवा अंगारे ने 7000 रुपये की सलाना रकम देना स्वीकार कर लिया।

बाजी राव, पुर्तगेजि़यों से सालसती टापू के मसले को लेकर काफ़ी नाराज़ था। बम्बई (अब मुम्बई) के इस हिस्से में मराठा कारखाना लगाना चाहते थे जिसमें पुर्तगेज़ी विघ्न डाल रहे थे। इस मसले से निपटने के लिए बाजी राव के भाई चिमाजी अप्पा ने मार्च 1738 ई. में पुर्तगेजि़यों पर बम्बई के निकट हमला कर दिया। चिमाजी अप्पा ने थाने, परसिक, बेलपुर, धारवी, अरनाला और वर्सोवा आदि इलाकों पर फरवरी 1739 ई. तक पुनः कब्ज़ा करके मई 1739 ई. को इस मुहिम का बेसन(वसाई) को जीतकर अंत कर दिया।

बाजी राव ने दुबारा दिल्ली को घेरने के बारे में सोचकर निज़ाम-उल-मुल्क के क्षेत्र में से गुज़रने की सहायता मांगी तो निज़ाम-उल-मुल्क के पुत्र नासिर जंग ने भोपाल संधि को भुलाकर कोरा जवाब दे दिया। निज़ाम-उल-मुल्क ने संधि की शर्तों को पूरा न किया तो बाजी राव को गुस्सा आ गया और उसने निज़ाम-उल-मुल्क पर हमला करने की तैयारी कर ली। औरंगाबाद में नासिर जंग को घेर लिया। नासिर जंग की फौज बाजी राव की सेना से दो-तीन गुणा अधिक थी। दोनों पक्षों में काफी समय तक डटकर मुकाबला हुआ। आखिर मराठों को हावी होता देखकर नासिर जंग झुक गया। बाजी राव ने उसको 28 फरवरी 1740 ई0 को औरंगाबाद में बंदी बना लिया। बाजी राव से अपनी जान की सलामती के लिए नासिर जंग ने हांडिया, खरगौन, बरगौन जि़ले और नर्बदा के दक्षिणी इलाके बाजी राव के हवाले कर दिए। उसने बाजी राव के साथ दुबारा 1740 ई. में संधि कर ली। संधि के अनुसार दोनों दलों ने अमन, शांति कायम रखने तथा प्रजा को कोई कष्ट न देने का वायदा किया।(दुर्भाग्य से यह बाजी राव का अन्तिम युद्ध था)।
 
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