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मस्ती एक्सप्रेस_Masti Express COMPLETE

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सुनीता की कहानी

अब सुनीता की बारी थी। सुनीता ने कहा:

मेरा पहला और आखिरी सेक्स बस राकेश से ही है। लेकिन मैं अपनी कहानी तब कहूँगी जब राकेश यहां से चले जायेंगे।

राकेश ने जाने से मना कर दिया। सब लोगो के जोर देने पर आखिर राकेश को वहां से जाना ही पड़ा।

सुनीता ने कहना शुरू किया:

राकेश से मेरी मुलाकात की शुरूआत देखने दिखाने के सिलसिले मैं औपचारिक रूप से हुई थी। हम लोग एक ही शहर में रहते थे। बाद में मेरी एक सहेली के जरिये जो उनकी कालोनी में रहती थी हम लोंगों का संपर्क बन गया था। हम लोग मिलते रहते थे लेकिन एक दूसरे को बांहों में लेने या चुंबन लेने से आगे नहीं बढ़े थे। मैंने ही नहीं बढ़ने दिया था।

यह प्रसंग मेरी और राकेश की शादी का ही है। राकेश के रिश्तेदार और दोस्त इकट्ठे हो गये थे। मेरे यहां भी मेरी सहेलियां और मेहमान जमा थे। विवाह के पहले के नेग हो रहे थे।

बारात आने के एक दिन पहले सहेली के जरिये मुझे राकेश का एक गुप्त नोट मिला- “आज रात होटल ताज के इस रूम में जरूर से हमसे मिलो…”

हल्दी बगैरह चढ़ने के बाद मैं घर से कैसे निकल सकती थी लेकिन जरूर मिलो की खबर सुनकर जाना तो था ही। बड़ी मुश्किल से अकेले कमरे में आराम करने का बहाना करके सहेली की सहायता से छुप छुपा कर बाहर निकल पाई। होटल पहुँची तो सिहरन होने लगी। ऐसा लग रहा था कि इस राकेश से मैं पहली बार मिलने जा रही हूँ। मिलन की कामना से शरीर गरम हो गया। कमरे में पहुँची तो शर्म से दुहरी हो रही थी। गहने और शादी के जोड़े के अलावा मैं सब तरह से दुल्हन थी।

कमरे में पहुँचते ही राकेश ने मुझे दबोच लिया और कसकर होंठों पर अपने होंठ रख दिये। मैंने भी उसे कस कर जकड़ लिया। वैसे ही ले जाकर उसने मुझे बेड पर गिरा दिया और खुद मेरे ऊपर गिर गया। ब्लाउज़ के ऊपर से ही दायें उरोज पर उसने मुँह रख दिया और बांयें को मुट्ठी में दबोच लिया। मुझे न करने की इच्छा ही नहीं हुई। वह धीरे-धीरे बात करता रहा और मेरे बटन और हुक खोलता रहा। फिर उसने जो बताया मैं शर्म से गड़ गई।

दो दिन पहले मेरे यहां मेंहदी की रश्म हुई थी। मैं एक चौकी पर बैठी मेंहदी लगवा रही थी घुटनों पर हथेलियां फैलाये, तभी राकेश और उसके दोस्त वहां आ गये थे। उस दिन रिवाज के अनुसार मैंने लहंगा पहना था। आदत न होने के कारण लहंगे का ऊपर का हिस्सा मुड़े हुये घुटनों के ऊपर चढ़ गया था और नीचे का हिस्सा जमीन पर गिर गया था। टांगों के बीच का नजारा साफ दिख रहा था। मैंने गुलाबी सिल्क की पैंटी पहन रखी थी। शायाद मैं आने वाली रंगीनियों को याद करके बहुत गरमा रही थी क्येांकि पैंटी पर चूत के ठीक ऊपर एक बड़ा गीला धब्बा फैला हुआ था।

उसके सब दोस्तों ने उसको देखा। मेंहदी लगाने वाला भी बार-बार वहां देख रहा था। राकेश ने आँखों से इशारा किया लेकिन मैंने ध्यान ही नहीं दिया था। राकेश ने उठे लहंगे को नीचे करने की कोशिश भी की थी लेकिन सबके सामने छू भी नहीं सकता था और सबने देख तो लिया ही था।

यह सही है कि इन दिनों दिमाग में राकेश की याद करके मेरी चूत रिस रही थी और मैं लगवाने के लिये बेकरार थी। मैंने राकेश से कहा- “मुझे माफ कर दो मैं…”

पूरा बोलने के पहले ही राकेश कहने लगा- “डार्लिंग, क्या बात करती हो… तुमने जानबूझ कर थोड़ी किया। चलो उसी बहाने दोस्तों को भी मजा मिल गया, वैसे तो तुम दिखाती नहीं…”

मैंने कहा- “धत्त बेशरम…”

राकेश फिर बोला- “एक बात है कि उस दिन मेरा लण्ड एकदम खड़ा हो गया था और अब रोज खड़ा हो जाता है। उसी का इलाज करने के लिये तुम्हें बुलाया है…”

मैंने कहा- “कल शादी की रश्म तो पूरी हो जाने दो…”

राकेश ने प्रश्न किया- “मान लो मैं तुमको आज करना ही चाहूँ तो?”

मैंने सहज भाव से कहा- “मैं तुम्हारी हूँ, यह शरीर तुम्हारा है, जो चाहे करो। लेकिन रीति निभाने के लिये एक दिन का सब्र रखो न…”

तब राकेश ने कलावती और दोस्तों की सब बात मुझे बता दी और कहा- “मैं तुमसे पहले किसी को नहीं भोगूंगा। सुहागरात तो तुम्हारे साथ ही मनेगी। बोलो क्या कहती हो?”

मैंने बाहें और टांगें फैला दी और कहा- “लो मनाओ अपनी सुहागरात…”

राकेश धीरे-धीरे चूमता हुआ आगे बढ़ने लगा।

मैंने उसके कान में कहा- “मुझे जल्दी से जल्दी वापिस पहुँच जाना चाहिये। मैं तो तैयार ही हूँ। मेरी यह गीली ही बनी रहती है। लगा दो न इसमें…”

राकेश ने एक झटके में पेटीकोट और साड़ी खींच दी। फिर अपने कपड़े उतार फेंके। मैं उसके मजबूत लण्ड से खेलना चाहती थी, वह भी मेरी चूचियों से और चूत से खिलबाड़ करना चाहता था लेकिन समय नहीं था।

मैंने उसका लण्ड पकड़ करके चूत से सटाया और जैसे ही उसने जोर लगाया मैं चिल्ला उठी। मेरी तबीयत हो रही थी, लेकिन लण्ड का घुसना इतना आसान नहीं था जितना मैं समझ रही थी। जब भी वह लगाता मैं चिल्ला उठती और वह हटा लेटा।

मैं कहने लगी- “बस रहने दो लण्ड चूत का मिलना तो हो ही गया है…”

इस बार राकेश ने अपने थूक से लण्ड को गीला किया, अपने हाथ से पकड़कर घुमाकर सुपाड़ा थोड़ा छेद में फँसाया और मेरी कमर पकड़ करके पूरे जोर से पेल दिया। मैं चिल्लाती रही लेकिन वह रुका नहीं… जब तक पूरा लण्ड अंदर तक नहीं घुस गया। मैं रोने लग गई थी।

उसने मेरे आंसू पोंछते हुये कहा- “डार्लिंग तुमको जो सजा देना हो दे लो…”

लण्ड के आगे पीछे होने से अब भी चूत के भीतर छुरी जैसी चल रही थी। मैंने कहा- “अब और मत सताओ…”

वह बोला- “अच्छा…” और घुसे हुये लण्ड पर ही जोर लगाकर अपनी इच्छा शक्ति से उसने पानी छोड़ दिया। पानी निकलने के पहले उसने अपना लण्ड बाहर निकाल लिया।

जब मैं उठी तो बेड पर ख़ून देखकर घबड़ा उठी। राकेश ने समझाया कोई बात नहीं होटल वाले को वह चादर के पैसे दे देगा और उसने वह चादर लपेटकर अपने पास रख ली जो आज भी हमारे पास है। जब मैं होटल से निकली तो शादी के पहले ही लुट चुकी थी।

कुमुद की भावना अब राकेश के बारे में बदल चुकी थी। वह उसे और भी सराहने लगी थी।

सुनीता ने आगे कहा:

जहां तक कलावती का सवाल है, कलावती ने खुद सुनीता को सब बता दिया और कभी अपना हक नहीं जताया। सुनीता उसकी सहायता करती रहती थी। तीज त्योहार पर उसको साड़ी गहने आदि भी देती रहती थी। होली दिवाली वह राकेश के साथ मनाती थी। उस समय वह राकेश से चुदवाती भी थी। एक होली को जब राकेश उसको चोद रहा था तो राकेश का लण्ड फच्च-फच्च कर रहा था।

राकेश ने पूछा- “क्या बात है?”

तो कलावती ने बताया- “यहां आने के पहले उसने अपने मर्द से होली मनाई की जो अंदर ही झड़ गया था…”

राकेश ने कहा- “अगली बार से वह होली दिवाली उसके संग पहले मनाये फिर अपने मर्द के साथ…”

आखिरी बारी मिसेज़ संगीता अग्रवाल की थी।


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मिसेज़ संगीता अग्रवाल की कहानी:

यह घटना शादी के काफी बाद की है। शादी के पहले मैं गाँव में पली बढ़ी। वहां ऐसा कुछ खास नहीं घटा सिवाये इसके कि मेरी बगल में एक लड़का रहता था। जब मैं छत पर जाती थी तो वह अपना लण्ड खोलकर के खड़ा हो जाता था। शादी होने के बाद मैं शहर में आ गई। संयुक्त परिवार था।

सास ससुर थे, दो जिठानियां थीं। मैं सबसे छोटी थी, सबसे सुंदर और सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी। परिवार मैं सब लोग मेरी सुनते, थे लाड़ भी करते थे, खासतौर पर बड़ी जेठानी। पति भी बात मान लेते थे क्योंकी चुदाई में मैं उनको खुश कर देती थी। मैं बहुत सेक्सी थी। सेक्स की कहानियां पढ़कर मन बहलाती थी। मैं काफी दबंग हो गई थी। जो चाहती थी कर लेती थी।

गर्मियों के दिन थे। बड़ी जेठानी के मैके में उनके छोटे भाई की शादी थी। बड़ी जेठानी मैके जाने के लिये बहुत उत्साहित थीं। उनको लिवाने उनके भाई आ रहे थे। हमारे यहां का रिवाज था कि शादी व्याह के मौके पर खास रिश्तेदारों को लिवाने के लिये उनके मैके से कोई आता था। उनका वही भाई आया जिसका व्याह था। ऊँचा अच्छा खासा गबरू जवान, नाम था प्रदीप। मैके जाने के उत्साह मैं सीढ़ियां उतरते हुये जेठानी का पैर फिसला और उनके पैर की हड्डी टूट गई। अब वह तो जा नहीं सकतीं थीं, इसलिये तय हुआ कि उनकी जगह मैं जाऊँगी।

हम लोगों के यहां यह भी रिवाज है बल्की इसको अच्छा भी माना जाता है। इससे यह भावना बनती है कि परिवार की सब बहुयें बहनें हैं। उनका अपना घर ही मायका नहीं है बल्की देवरानियों जिठानियों के घर भी उनके मायके हैं।

ट्रेन का लंबा सफर था। ग्वालियर से दोपहर में ट्रेन चलती थी और दूसरे दिन दोपहर में जबलपुर पहुँचती थी। मेरे मन में शरारत सुझी कि क्यों न सफर का मजा लिया जाये। सबसे पहले मैंने संबोधन ठीक किया। कहा- “मैं तुमसे छोटी होऊँगी, मुझे संगीता कहकर पुकारो…” और खुद मैं उसे प्रदीप जी कहने लगी।

टू-टियर में हम दोंनों का रिजर्वेशन था लेकिन दिन में तो हम लोग नीचे की बर्थ पर ही बैठे। जगह ज्यादा थी फिर भी मैं उससे सटकर बैठी। गरमी होने का बहाना करके मैंने अपना पल्लू गिरा दिया। सामने की बर्थ पर बूढ़े आदमी औरत बैठे थे जो आराम कर रहे थे। वैसे भी मुझे उनकी चिंता नहीं थी। मेरे बड़े-बड़े मम्मे ब्लाउज़ को फाड़ते हुये खड़े थे। मैंने नीचे तक कटा ब्लाउज़ पहन रखा था जिसमें से मेरी गोलाइयां झांक रही थीं। वह दबी आँखों से मेरे गले के अंदर झांक रहा था। मुझे छका कर मजा आ रहा था। सामान उठाने रखने के लिये झुकने के बहाने मैं अपनी चूचियां उससे चिपका देती थी।

पहले तो वह सिमट जाता था। पर थोड़ी देर में प्रदीप की झिझक जाती रही कि मैं उसकी बहन की देवरानी हूँ और उसकी बहन की जगह जा रही हूँ। उससे मेरी रिश्तेदारी तो थी नहीं। उसे भी मजा आने लगा और वह अपनी बांहों से ही मेरी चूचियां रगड़ने लगा। सोने का बहाना कर उसने आँखें बंद कर रखी थीं।

उसकी आँखें खोलने के लिये मैंने कहा- “ओह कितनी गरमी है…” और ब्लाउज़ के ऊपर का बटन खोल दिया। अब मेरे फूले-फूले चूचुक भी दिखाई देने लगे थे।

वह टकटकी लगाकर मेरे हिलते हुये मम्मे देख रहा था। उसकी टांगों के बीच में भी हलचल दिखाई दे रही थी। और ज्यादा चिढ़ाने के लिये मैंने कहा- “प्रदीप जी मैं तो अंदर तक भीग गई हूँ…” और उसके सामने ही साड़ी में हाथ डालकर चड्ढी बाहर खींच ली।

वह अचकचा गया। गोद में हाथ रखकर उसने अपने लण्ड के उठान को छुपा लिया।

मैं भी मानने वाली नहीं थी। जब उसने हाथ हटा लिये तब हाथ में पकड़ी मैगजीन को उसकी गोद में गिराकर उठाने के बहाने उसके मोटे लण्ड को अच्छी तरह टटोल लिया। अब स्थिति साफ थी। उसके खड़े पोल से टेंट जैसा बन गया। मैंने इशारा करते हुये कहा- “ये क्या है? अपने को काबू में भी नहीं रख सकते, ऐसी बेशरमी करते हो…”

झेंपने के बजाये उसने चट से जवाब दिया- “जब उसकी अपनी चीज़ सामने हो तो मिलने को बेकरार तो होगा ही…”

मैंने चोट की- “उसकी चीज़ 16 तारीख तक दूर है…” 16 तारीख को उसकी शादी थी।

उसने कहा- “उससे भी अच्छी चीज़ सामने है…”

मैंने कहा- “मुँह धोकर रखो…”

लेकिन हम छूने छुलाने का उपक्रम करते रहे। रात के करीब आठ बजे गाड़ी बीना पहुँची। प्रदीप सामान उठाते हुये बोला- “यहां उतरना है…”

मैंने सोचा यहां ट्रेन बदलानी है। हम लोग नीचे उतर आये। कुली से सामान दूसरे प्लेटफार्म पर ले जाने की बाजाये प्रदीप सामान स्टेशन से बाहर निकाल ले गया। एक आटो से हम लोग कहीं चल दिये। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। जब आटो एक होटल के सामने रूका तो मेरी समझ में कुछ आया।

प्रदीप बोला- “आज की रात यहीं रुकेंगे…” उसने अचानक प्रोग्राम बदल दिया था। नहले पर दहला लगा दिया था। कहां तो मैं मजा चखा रही थी अब वह मजा चखा रहा था।

मैंने पूछा- “यहां क्यों रुक गये हैं?”

तो मुश्कुराके बोला- “तुमको ज्यादा गरमी लग रही है, उसको निकालना है…”

मैं तो सोच भी नहीं सकती थी कि प्रदीप ऐसा कर सकता है। कमरा उसने मिस्टर और मिसेज़ प्रदीप के नाम से बुक कराया। खाना कमरे में ही मंगाया। अपने लिये शराब भी।

मैंने शराब के लिये मना कर दिया। मैंने कहा- “मैं नहा लूं…”

तो बोला- “संगीता डार्लिंग एक राउंड नहाने के पहले हो जाये फिर नहाने के बाद में। आज तो रात भर जश्न मनायेंगे…” फिर मुझे पकड़कर मम्मे दबाते हुये बोला- “तुम्हारे इन रस कलसों ने ट्रेन में बड़ा तड़पाया है इनसे तृप्ति तो कर लूं…”

उसने मेरा ब्लाउज़ और अंगिया उतार फेंकी। कस-कस के चूची मर्दन करने लगा। मैं धीमी धीमी आवाजें करने लगी। चूचियां मेरी कमजोरी हैं। उन पर मुँह रखते ही मैं काबू में नहीं रहती। कोई भी मेरी इस कमजोरी को जानकर मुझे चोद सकता है। प्रदीप ने मेरे चूचुक मुँह में लिये तो मैं उत्तेजना से ‘उंह उंह’ करने लगी और उसका लण्ड थाम लिया। उसने नाड़ा खींचकर मुझे पूरा नंगा कर दिया। और खुद ही अपने सब कपड़े उतार फेंके।


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मिसेज़ संगीता अग्रवाल की कहानी - cond...

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मिसेज़ संगीता अग्रवाल की कहानी - cond...

उसका लण्ड देखकर मैं दंग रह गई। खीरे की तरह मोटा और लंबा तना हुआ खड़ा था। अग्रवाल साहब से दोगुना। कमर में हाथ डालकर वह मुझे बेड पर ले गया। चित्त लिटाकर मेरी टांगें खोल दीं। मैंने सोचा अब वह डालेगा। मैं लेने को उत्सुक हो गई।

लेकिन वो मेरी चूत की तरफ देखता ही रह गया। उसके मुँह से निकला- “ओ माई गाोड क्या डबलरोटी की तरह फुद्दी है और ये चूतड़ों की गोलाइयां… मैंने तुम्हारी जैसी औरत देखी ही नहीं है…”

मैंने पूछा- “प्रदीप जी, कितनी देखी है इस तरह?”

वह हँसने लगा- “होने वाली बीवी की देखी है, दो भाभियों की देखी है और ऐसी ही एक दो और देखी हैं…”

संगीता जान गई कि वह खेला खाया हुआ है।

मैंने इस बीच उसका लण्ड पकड़ लिया था जो मुट्ठी में भी नहीं आ रहा रहा था। चूत की तरफ उसे खींचा तो वह बोला- “इसकी पहली जगह तो यहां है…” और उसने लण्ड उसके होठों से सटा दिया।

मैंने मुँह एक तरफ फेर लिया, बोली- “यहां नहीं लूंगी…”

प्रदीप बोला- “चलो तुम नहीं लेकिन मैं तो अमृतपान करूंगा…” वह बेड के नीचे ही बैठ गया। दोनों टांगें कंधों पर धर लीं और अपना मुँह मेरी चूत के छेद पर रख दिया। मुझे उसकी भी आदत नहीं थी। मैंने उसका मुँह हटाना चाहा तो उसने और जोर से चिपका लिया।

मैं छुड़ाने के लिये टांगें उसकी पीठ पर मारने लगी और कहा- “ये मत करो…”

वह मार सहता गया। उसने मेरी क्लिटोरिस को अपने होठों में दबोच लिया और चूसने लगा।

मैं एकदम आनंद में भर गई। टांगों का मारना बंद हो गया। मैं बुदबुदाये जा रही थी- “ओ माँ इस तरह मत करो… ओ प्रदीप इस तरह…”

मेरे शब्दों का उल्टा ही मतलब था। मैं आनंद में भरी हुई थी और चाहती थी कि वह करता ही रहे। उसने अपनी जीभ छेद में डाल दी तो मैंने चूत हवा में उठा दी। प्रदीप के सिर पर हाथ रख के कसके दबा लिया और अपनी चूत उसके मुँह से रगड़ने लगी। मेरे सारे शरीर में करेंट दौड़ रहा था। मैं बोले जा रही थी- “प्रदीप चाटो इसे और कस के चाटो… पूरी जीभ अंदर कर दो… करते रहो न…”

प्रदीप ने जीभ निकाल के एक उंगली अंदर पूरी डाल दी और अंदर बाहर करने लगा।

मैं एकदम से झड़ गई, चिल्ला उठी- “ओओह्ह… माँआं… क्या कर दियाआ?” बड़ी देर तक झड़ती रही। यह मेरा पहला अनुभव था। मैं खलास हो चुकी थी। प्रदीप का अभी भी तना हुआ था।

प्रदीप मेरी बगल में आकर लेट गया। उसने मेरी चूची पर हाथ रखा तो मैंने हटा दिया। अब मेरी तबीयत नहीं थी। मैं एक रात में एक बार ही चुदाई कराती थी। प्रदीप ने धीरे-धीरे बाताना चालू किया कि किस तरह उसने अपनी बड़ी भाभी की ली थी। जब कहानी चरम पर पहुँची तो मैंने महसूस किया कि मेरी चूत में सुरसुरी होने लगी है और मैं प्रदीप के लण्ड से खेल रही हूँ।

प्रदीप चाहता था कि मैं उसके लण्ड से खेलती रहूँ। लेकिन मैं उसके उस बड़े हथियार को अपनी चूत में लगवाना चाहती थी जो बड़ा गरम हो रहा था। आखिर वह मान गया। मैंने घुटने मोड़कर टांगें इतनी फैला लीं जितनी फैल सकती थीं। हाथ से पकड़कर सुपाड़ा चूत के अंदर किया तो बड़ी मुश्किल से घुसा। उसने जोर लगाया तो थोड़ा और अंदर घुसा। मैं मना कर रही की कि प्रदीप ने और धकेल दिया। लेकिन लण्ड पूरा न जाकर बीच में फँस गया। यह चूत कितनी बार चुद चुकी थी लेकिन उस लण्ड को नहीं ले पा रही थी। उसका लण्ड खूब गरम हो रहा था। मुझे तकलीफ हो रही थी लेकिन मैं झेलने को तैयार थी।

मैंने कहा- “क्या देखते हो राजा कर दो पूरा अंदर एक बार में…”

और कहने की जरूरत नहीं थी। प्रदीप ने मेरे घुटने थामे और एक झटके में जड़ तक घुसेड़ दिया। मैं चाहती थी कि वह थोड़ा ठहरे लेकिन उसने मौका ही नहीं दिया। उसने निकाला और फिर अंदर कर दिया। चूत की दीवालों को रगड़ता हुआ उसका लण्ड घुसता था तो मैं आनंद से भर जाती थी। निकलता था तो फिर लेने के लिये चूत उठा देती थी। वह धकाधक पेल रहा था। मैं उसे उत्साहित कर रही थी।

हर चोट पर मेरी सीत्कार निकल जाती थी- “ऊंऊंह्ह ऊंह्ह… माँ… इतने जोर से क्यों मारते हो?”

वह भी कहता- “ले ऐऐऐ बहुत गरमी लग रही थी न तुझको ओओ…”

फिर चोट पर मैं सिसकी- “ओओ मइया… मैं तो मर जाऊँगीईई…”

और प्रदीप कस के धपाक- “ले इसको ले… तेरी रिस रही चूत की गरमीइ निकल जायेगी…”

मेरी चूत ने न जाने कितनी चोटें खाईं। अचानक एक चोट ऐसी पड़ी कि चूत हवा में उठ गई। मैंने कस के उसको जकड़ लिया- “ओओह्ह… मैं क्या करूं… मैं तो गईई…”

प्रदीप- “लेऐऐ मैं भी आया…” उसने आखिरी धक्का दिया और अपना गाढ़ा-गाढ़ा रस छोड़ दिया।

इसके बाद मैं नहाने चली गई। प्रदीप भी साथ ही नहाया। नहाते समय फिर हम लोग चुदाई किये। उस रात कई बार मैं चुदी यहां तक की पीछे वाले छेद में भी उसने डाला।

सुबह उठे तो मैंने प्रदीप को चिढ़ाया- “हाय राम… तुमने मुझे खराब कर दिया…”

दूसरे दिन बगैर रिजर्बेशन के बड़ी मुश्किल से हम लोगों को ट्रेन में घुसने भर की जगह मिली लेकिन मुझे कोई शिकायत नहीं थी।

जब मौका मिलता मैं उससे कहती- “हाय राम… तुमने मुझे खराब कर दिया…”

आने के पहले मैं एक बार और उसके सुपर-डुपर लण्ड का आनंद लेना चाहती थी। उसको भी कोई ऐतराज नहीं था। अपनी नवेली से तो वह सुहागरात मना ही चुका था और प्रदीप के ही शब्दों में उसकी बीवी के मुकाबाले मैं सुपर थी। लेकिन शादी की भीड़ में कोई सुनसान जगह नहीं मिल पा रही थी।

एक दिन उसने बताया कि साथ वाले उसके घर में भूसा भरा रहता है। अगर मैं चाहूँ तो वहां हो सकता है। भूसा क्या मैं तो उससे लगवाने के लिये कहीं भी तैयार थी। आने के एक दिन पहले भूसे पर लिटाकर उसने मेरी मस्त चुदाई की।


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***** ***** to be contd...

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सुनीता और शिशिर की कहानी

होली के दूसरे दिन शिशिर जब लंच से लौटा तो सुनीता भाभी का फोन पर मेसेज था- “जितनी जल्दी हो सके घर आ जाओ…” शिशिर सब सुभ हो की कामना करते हुये सुनीता के घर जल्दी से जा पहुँचा। सुनीता भाभी ने दरवाजा खोला तो वह खूबसूरत साड़ी में सजी धजी खड़ी थीं।

शिशिर ने पूछा- “क्या बात है भाभी?”

तो बड़ी अदा से मैं बोली- “देवरजी तुम कह रहे थे कि भाभी होली नहीं मनाओगी तो मैंने सोचा चलो तुम होली मना लो। तुम्हारी शर्त पूरी करने के लिये बड़ी मुश्किल से कल अपने को तुम्हारे भइया से बचा के रक्खा है। आज तो वह छोड़ेंगे नहीं इसलिये अभी मना लो…” और एक प्लेट में से मुट्ठी में गुलाल लेकर मैं आगे बढ़ी।

शिशिर बोला- “भाभी इतनी मंहगी साड़ी खराब करोगी?”

लेकिन इसके पहले ही मैंने शिशिर के चेहरे पर गुलाल मला दिया। शिशिर ने मुझको पकड़ लिया और अपना गुलाल लगा गाल मेरे गुलाबी गालों पर रगड़ने लगा। फिर उसने मुझे बाहों में लेकर मेरे रसीले होंठों पर चूमा और अपने होंठ गड़ा दिये। फिर मुझे प्यार से चूसने लगा। सुनीता भाभी उससे चिमत गईं और चुंबन का जवाब पूरे जोर से देने लगीं। कुछ देर वह ऐसे ही चिपके रहे फिर भाभी ने उसकी पीठ के ऊपर हाथ ले जाकर शिशिर का सिर पकड़कर उसे नीचे को खींचा।

शिशिर का मुँह उनके कंधों को चूमता हुआ सीने पर जा पहुँचा। वह अपने गालों का गुलाल सुनीता भाभी के उभारों के ऊपर रगड़कर ब्लाउज़ पर लगाने लगा। सुनीता को करेंट सा लगा, वह उत्तेजित हो उठी, चूचुक सख्त हो गये। शिशिर को एकदम पता लग गया। उसने दायां हाथ सुनीता की कमर में डालकर सामने से चिपका लिया और बांयें हाथ से उनके ब्लाउज़ के बटन खोल दिये। सुनीता ने पीछे हाथ करके ब्रा की हुक खोलकर के उसको अलग कर दिया। उसके सुडौल गदराये उरोज सामने थे जिनके ऊपर गहरे गुलाबी रंग के फूले हुये चूचुक तने खड़े हुये थे। शिशिर उनको देखता ही रह गया।

सुनीता भाभी ने टोका- “क्या देख रहे हो?”

शिशिर सच बोला- “भाभी इतनी खूबसूरत गोलाइयां नहीं देखी…”

सुनीता ने चोट की- “कितनों की देखी है?”

शिशिर का खड़ा हुआ लण्ड सुनीता की चूत को चुभ रहा था। उसने हाथ बढ़ाकर उसको पकड़ लिया। प्रतिक्रिया के रूप में शिशिर ने सुनीता भाभी की दाईं चूची मुँह में ले ली। सुनीता के मुँह से सीत्कार निकल गई। उन्होंने सारा भार शिशिर के ऊपर डाल दिया।

शिशिर ने उन्हें बाहों में संभाल न लिया होता तो गिर जातीं। सहारे से बेडरूम में ले जाकर शिशिर ने पलंग पर लिटा दिया। सुनीता ने गले में बाहें डालकर अपने ऊपर खींचा।

शिशिर ने कहा- “पहले अपने नीचे का खजाना तो दिखाओ…”

शोख अदा से सुनीता बोलीं- “पहले हम खजाने की चाभी देखेंगे…” इसके साथ ही सुनीता ने पैंट के बटन और जिपर खोल डाले और अंडरवेर समेत पैंट पैरों के नीचे गिरा दिया।

कमीज उतार कर वह एकदम नंगा हो गया। उसका लण्ड फनफनाकर कर खड़ा था।

“उईईई माँ… इतना बड़ा और मोटा है? कैसे समायेगा?” उत्तेजना में सुनीता भाभी की जबान लड़खड़ा रही थी।

शिशिर ने साड़ी की ओर हाथ बढ़ाया और एक झटके में साड़ी खींच दी और सिलिकन पेटीकोट का नाड़ा खोल लिया। सुनीता ने कुछ कहे बगैर अपने चूतड़ उठा दिये और आसानी से खींच करके पेटीकोट नीचे गिर दिया। उसने कीमती पैंटी पहन रखी थी। एक बड़ा सा धब्बा चूत के पानी से फैल गया था।

शिशिर पैंटी उतारने लगा तो सुनीता बोली- “इसे पहने रहने दो…” लेकिन उतरवाने में विरोध नहीं किया।

क्या नजारा था। संगमरमरी बदन सामने था। भाभी की पतली कमर, मांसल चूतड़, फूली हुई चूत, बड़ी-बड़ी गोल-गोल ऊंचाइयां और मदहोश मुश्कान आमंत्रित कर रही थीं। शिशिर मतवाला सा सुनीता भाभी की ओर बढ़ा और उन्होंने हाथ फैलाकर उसको समेट लिया। उसने उनकीे दांयें चूचुक को मुँह में ले लिया और बायीं चूची को हाथ से मसलने लगा।

भाभी “सी सी” कर उठीं। उन्होंने मुट्ठी में लण्ड थाम लिया और चूत के ऊपर फेरने लगीं। शिशिर ने पोजीशन बदल दी और बांयें चूचुक को मुँह में ले लिया तो भाभी ने एक लंबी आवाज की- “आआआह” और कानों में फुसफुसाईं- “देवरजी अब क्यों तड़पा रहे हो?”

साथ ही दोनों हाथों से उसका सिर पकड़कर नीचे को खींचने लगी। शिशिर नीचे खिसकता गया। भाभी ने लण्ड की उत्सुकता में अपनी टांगें चौड़ी कर ली। लेकिन शिशिर खिसकता ही गया। वह जांघों तक खिसक आया। भाभी की टांगें दोनों कंधों पर आ गईं। उसने भाभी की चूत पर मुँह रख दिया।


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सुनीता भाभी अचकचा उठीं- “देवरजी ये क्या करते हो?” और उन्होंने अपनी हथेली चूत के ऊपर रख ली। उनके लिये यह नई बात थी।

शिशिर ने एक हाथ से बल के साथ उनका पकड़ा और हटा दिया। दूसरे हाथ से उनकी चूत की फांकें खोली और अपना मुंह गड़ा दिया। भाभी ऐतराज में अपनी दोनों टांगें उसकी पीठ पर मारने लगीं और हाथ से शिशिर का सिर उठाने लगीं। लेकिन शिशिर का मुँह उनकी चूत से चिपक गया था तो हटा ही नहीं। वह चटखारे लेकर उनकी चूत के रस को पी रहा था। जैसे ही उसने अपनी जीभ भाभी की क्लिटोरिस के ऊपर रक्खी उनका पैर मारना एकदम रुक गया।

वो आवाज करने लगीं- “ओओफ्फ्फ… ओ माईई…” और उठाने की जगह उन्होंने उसके सिर को कस के चूत में दबा लिया।

शिशिर ने भाभी की क्लिटोरिस को दोनों होंठों के बीच ले लिया।

सुनीता- “ओह्ह… मैं अब और नहीं रुक सकती… मुझे कसके दबा लो लो… लो मैं तो गई…” सुनीता भाभी ने चूत उठाकर के जोर से उसके होंठों से चिपका दी और काफी देर तर उनकी चूत में कंपकंपि बनी रही। शिशिर भाभी की बगल में एक करवट लेट गया और हाथ बढ़ा के उनको खींच लिया। भाभी उससे चिपक गईं और उसके सीने में सिर छुपा लिया।

शिशिर ने उनके सिर पर हाथ रखकर और कसके चिपका लिया। थोड़ी देर वह इसी तरह पड़े रहे एक दूसरे में मगन।

भाभी फुसफुसाईं- “देवरजी, तुम्हारे प्यार करने का तरीका भी निराला है…”

“हाँ, इसमें लातें पीठ पर खानी पड़ती हैं…”

भाभी ने सिर उसकी छाती पर रगड़ा- “चलो हटो, कहीं ऐसा भी कोई करता है…”

“आपको मजा आया?”

भाभी ने हाँमी में सिर हिला दिया। बोलीं- “देवरजी, ये बाताओ कि कुमुद इतनी अच्छी, लंबी और सुंदर है फिर तुम मेरे पीछे क्यों पड़े रहते थे?”

शिशिर तुरंत बोला- “भाभी, आपने अपने को पूरे आईने में देखा है आप में ना रुक पाने वाली कशिश है। मैं काबू में ही न रह पाता था। फिर कुमुद सेक्स में चुलबुली नहीं है…” वह फिर बोला- “भाभी आपकी कशिश में कितने लोग खिंचे रहते होंगे…”

सुनीता भाभी बोलीं- “जानती हूँ लेकिन मैं राकेश को पूर्ण समर्पित हूँ, तुम्हारे अलावा…”

शिशिर ने आनंद से उन्हें भींच लिया। धीरे से एक चूचुक मुँह में लेना चाहा तो उन्होंने मना कर दिया- “अब नहीं…” और वह शांत हो गई थीं।

शिशिर बोला- “बस भाभी, सीने पर मुह रख के लेटने दो…”

वह चित्त हो गई और बड़े प्यार से उसका गाल अपने बायें उभार पर दबा लिया।

शिशिर गाल को और दबाता गया फिर धीरे-धीरे रगड़ने लगा। थोड़ी देर बाद उसने बगैर दबाव के अपनी दाईं हथेली उनके बायें सीने पर रख दी। भाभी ने मना नहीं किया। उन्हें अच्छा लग रहा था। वह अब अपनी तरफ से उसके सिर पर दबाव बढ़ाती जा रही थीं। शिशिर ने धीरे से अपने होंठ खोलकर दांयें चूचुक को अंदर कर लिया। भाभी ने झुक कर उसके माथे को चूम लिया। सुनीता भाभी अब गर्माने लगीं थीं। मैंने होंठों में चूचुक कसके दबोच लिया और चूसने लगा।

वह कराही- “उईईईई… माँ… तुम तो काटते हो…” लेकिन सिर को कस के चूची पर दबा लिया।

अब मैं दांयीं चूची को मज़े से चूस रहा था और बांयीं को कसके मसल रहा था। वह अब चूतड़ हिलाने लगी थीं। शिशिर ने दांयां हाथ चूची से हटाकर उनकी चूत पर रख दिया। उन्होंने दोनों जांघों से कस के दबा लिया। उसका सिर दूसरी चूची की तरफ करतीं हुई बोलीं- “इसको चूसो न…”

शिशिर ने दूसरी चूची मुँह में ले ली और दो ऊँगालियों से चूत की दरार को खोलते हुये तीसरी उंगली छेद में डाल दी। चूत गीली हो रही थी।

भाभी ने चट से अपनी जांघें खोल दी, बोलीं- “पूरी अंदर डाल दो…”

भाभी ने अपने दांयें हाथ से उसका फड़फड़ाया हुआ लण्ड मुट्ठी बंद कर लिया और कहा- “ओ माई गोड ये तो मेरे हाथ में भी नहीं आ रहा है…”

शिशिर उंगली अंदर बाहर करने लगा। उनकी चूत बुरी तरह रिसने लगी थी। बाहर पानी निकल रहा था।

“हाय अंदर तक घुसेड़ दो न जल्दी से…” वह पूरी तरह उत्तेजित थीं। वह कसकस के उसके लण्ड पर मुट्ठी चलाने लगीं थीं।

शिशिर बोला- “भाभी इसकी जगह कोई और भी होती है?”

भाभी- “तो डालो न उस जगह…” फिर शिशिर के कुछ कहने के पहले उन्होंने पलट के अपनी चूत उसके लण्ड के ऊपर कर ली और हाथ से लण्ड पकड़कर सुपाड़ा चूत में घुसेड़ लिया।

अब शिशिर के पास और कोई चारा नहीं था। उसने सुनीता भाभी को पलटा। उनकी टांगों के बीच में घुटनों के बल बैठ गया। उन्होंने उतावली में टांगें पूरी चौड़ा दी और चूत ऊपर उठा दी। चूत की पंखुड़ियां अलग-अलग थीं, गुलाबी छेद खुला हुआ था, अंदर पानी चमक रहा था। शिशिर ने लण्ड का सुपाडा चूत के मुँह पर रखा और धीरे-धीरे घुसाने लगा।

सुनीता भाभी की सहमी सी आवाज निकली- “देवरजी धीरे से डालियेगा, आपका बहुत बड़ा और मोटा है…” लेकिन उनकी चूत लण्ड को पूरा का पूरा लील गई। भाभी के मुँह से निकला- “हाय…”

उसने लण्ड बाहर किया और घच्च से अंदर… वह और जोर से “हाय…” कर उठीं। उसने फिर बाहर किया फिर और जोर से घच्च… उनकी सीत्कार और ऊँची हो गई। शिशिर का सीधा खड़ा लण्ड सुनीता भाभी की चूत में सड़ाक से पूरा घुस जाता था।

जैसे-जैसे घच्च-घच्च की गति बढ़ती गई भाभी की- “हायय… उईईई… माँ मरी…” की सीत्कार भी।

कुछ देर तक झटके लगाने के बाद शिशिर पलंग के नीचे खड़ा हो गया। सुनीता भाभी को दोनों टांगों से खींचकर पलंग के किनारे कर लिया। उनकी टांगें चौड़ी करके उनके बीच में खड़ा हो गया। अब खड़े-खड़े उसका लण्ड भाभी की चूत के सामने था। उसने लण्ड चूत के मुँह पर लगाया और कहा- “अपनी दोनों टांगें मेरी कमर पर बाँध लो…”

भाभी की दोनों चूचियों को दोनों हाथों से मसलाते हुये शिशिर ने एक चोट में सड़ाक से लण्ड अंदर कर दिया तो भाभी हिल गईं और मुँह से चीख निकल गई। शिशिर ने चूत के सामने काफी बाहर तक लण्ड निकालकर एकदम से चोट मारी।

भाभी और जोर से चीखीं- “ओ माँ… मैं मर जाऊँगी…” उन्होंने कस के शिशिर के कंधे दोनों हाथों से जकड़ लिये और अपना मुँह उसकी छाती में गड़ा लिया।

शिशिर ने जब चोट मारी तो वह बुदबुदाईं- “शिशिर ये तुम्हारी है, जैसे चाहे लो इसको…” पहली बार उन्होंने उसे शिशिर कह के बुलाया था।

शिशिर धकाधक चोद रहा था। उसका लण्ड चूत की गहराइयों तक जा रहा था। हर चोट में लण्ड की जड़ चूत के ऊपर धप्प से पड़ती थी।

भाभी आपे मैं नहीं थीं- “आआह्ह… आआह्ह… ऊंऊंह्ह… हाय ऊईईईइ… ओ शिशिर ये तुम्हारी है फाड़ डालो इसको उफ्फ्फ… ओ शिशिर…”

हर झटके में उसी वेग से सुनीता भाभी बढ़-बढ़ के लण्ड को झेल रही थीं। जोरों से चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकल रही थी। अचानक भाभी ने उसकी कमर में टांगें एकदम जकड़ लीं- “ओह्ह… मैं और नहीं ले सकती… मैं तो गईईई मेरे शिशिर…” और भाभी ने अपना ज्वालामुखी उगल दिया।

उनकी चूत इतनी जोर की कांपी कि शिशिर भी न ठहर पाया- “भाभीईई… मैं भी आया… ये लोओ…” उसने गहराई तक ले जाके पानी छोड़ दिया और देर तक छोड़ता रहा। जब उसने अपना लण्ड बाहर निकाला तो भाभी की चूत से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद फेन सा फैलता रहा।

भाभी ने पैंटी से उसे पोंछा भी नहीं जैसी उनकी आदत थी, बस निढाल पड़ी रही।

शिशिर ने उनका हाथ पकड़ा।

तो भाभी शिकायत के लहजे में बोलीं- “देखो तुमने इसकी क्या हालत कर दी है? हथौड़ा सा चलाते हो, अब मैं अब राकेश को रात मैं कैसे दूंगी। इसे देखकर उन्हें शक हो गया तो?”

शिशिर ने कोमलता से उनका हाथ थाम लिया। सुनीता भाभी ने उसे दोनों बाहों में लाड़ से भर लिया और अपने सीने में छुपा लिया।


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सुनीता की कहानी

होली के आनंद के बाद जब भी शिशिर की मुझे भोगने की तबीयत होती तो कह देता- “भाभी, परांठे सेंकने हैं 24 घंटे का उपवासा रखना…”

जब मेरी तबीयत मचलती तो मैं शिशिर से कहती- “हथौड़ा लूगीं…” मैं पूरी तरह संतुष्ट थी। राकेश भरपूर चोदता था। स्पेशल चुदाई शिशिर से कराती रहती थी। ग्रुप की महफिल के बाद खासतौर पर मुझे हथौड़े की जरूरत पड़ती थी। शिशिर का व्यवहार मेरी तरफ कोमल बना हुआ था केवल चोदते समय वह कोई लिहाज़ नहीं करता था। मैं बहुत खुश रहती थी।

गर्मियां शुरू हो गईं थीं। गर्मियों में 10 या 15 दिन के लिये या तो हम लोग रजनी के यहां जाते थे या रजनी और रूपेश हमारे यहां आ जाते थे। इस बार वह लोग हमारे यहां आये। रजनी और मैं कालेज़ के जमाने की सहेलियां थीं, पक्की दोस्त। एक दूसरे के बारे में सब कुछ जानती थीं। हम दोनों ही खूबसूरत समझी जाती थीं। रजनी मेरे से ज्यादा लंबी थी और दुबली भी। मेरा शरीर शुरू से ही सांचे में ढला हुआ था। रजनी तबीयत की मस्त थी। खुलकर सेक्स की बातें करती और आगे बढ़ने के लिये भी तैयार। मैं इस बारे मैं बिल्कुल पक्के खयालों की।

अब रजनी के सीने और कूल्हों पर मांस चढ़ गया था लेकिन बदन उसका इकहरा ही था, आकर्षक। मेरी शादी रजनी से दो साल पहले हो गई थी। रजनी की शादी हुई तो उसके पति रूपेश मेरे ऊपर दीवाने हो गये। हमें चोदने के लिये बेचैन रहने लगे। रजनी को भी उन्होंने तैयार कर लिया। शादी के थोड़े दिनों बाद ही रजनी ने मेरे से कहा- “रूप तेरी चूत की सैर करना चाहता है बदले में राकेश को मैं अपनी नई नवेली का रस चखा दूंगी…”

मैंने दो टूक जवाब दिया- “मैं राकेश को पूरी तरह समर्पित हूँ ऐसा कुछ भी नहीं करूंगी…” जानबूझ कर मैंने पता नहीं किया कि राकेश को रजनी ने रसपान कराया या नहीं। रजनी के आने पर राकेश की खुशी देखकर लगता था कि वह स्वाद चख चुके थे। इस बात पर इसके बाद पर्दा पड़ गया था।

जैसे ही रजनी मुझसे मिली तो कह उठी- “लगता है तुम्हें यह जगह रास आ गई है, बड़ी खुश दिखती हो…”

जल्दी ही रजनी और रूपेश सबसे घुलमिल गये। शिशिर से रूपेश की भी पटने लगी। ग्रुप की महफिलों में भी दोनों ने खूब बढ़-बढ़ के भाग लिया। रजनी ने तो ऐसे किस्से सुनाये कि उस रात जरूर लोगों ने बीवियों से जम कर कसर निकाली होगी। ज्यादा दिन तो सैर सपाटों में ही निकल गये। जब तब शिशिर और कुमुद या अकेला शिशिर भी सामिल हो जाते थे।

जो बात कोई न जान पाया था रजनी इतनी जल्दी भांप गई, बोली- “अब तुम्हारी खुशी का राज समझ में आया। शिशिर से इश्क लड़ाया जा रहा है…”

मैं लाल हो गई, बोली- “तुम भी रजनी गजब हो… शिशिर मेरा देवर है…”

रजनी बोली- “सब जानती हूँ…”

उसके बाद मैं कुछ चोकन्नी रहने लगी।

लेकिन इस बीच ही शिशिर परांठे सेंकने की फरमाइश कर बैठा। मैंने समझाया कि अभी रजनी रूपेश हैं। लेकिन वो नहीं माना। दिन में ही समय निकालकर उसने मुझे बहुत ही जबरदस्ती से चोदा। मैं त्राहि-त्राहि कर उठी। चूत पर इतनी चोटें पड़ी थीं कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। अपनी दोनों टांगें फैला- फैलाकर चल रही थी। शाम को रजनी ने देखा तो मेरी चूत पर चिउंटी काटी।

मेरे मुँह से जोर से ‘ओह्ह’ निकल गई।

रजनी बोली- “इसकी कसके रगड़ाई हुई है क्या?” लेकिन राकेश तो ऐसा नहीं करता। क्या बात है शिशिर से लगवा के आई हो…”

उसने मेरी चोरी पकड़ ली थी। मैं बोली- “क्या करूं रजनी, वह माना ही नहीं…”

रजनी ने उलाहना देते हुये कहा- “जब रूप ने मांगी थी तो साफ मना कर दिया था कि मैं तो बस राकेश को ही देती हूँ…”

मैं- “हाँ… मैं केवल राकेश की हूँ। शिशिर स्पेशल है हमारा ही…”

रजनी- “अरे जाओ, ऐसे लोग जिस किसी पर भी फिसलाते रहते हैं…”

मैं- “न रजनी, यह केवल मेरा और शिशिर का संबंध है, भाभी और देवर का…”

रजनी- “अगर मैंने शिशिर को फँसा के दिखा दिया तो?”

मैं- “तो जो चाहोगी दूंगी। लेकिन क्या सबूत दोगी?”

रजनी- “शिशिर का अंडरवेर दूंगी मेरी चूत के रस से पोंछा हुआ चाहो तो सूँघ के देख लेना…” रजनी को अब एक मिशन मिल गया था, शिशिर को बहकाने का।


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रजनी की कहानी

सुनीता को उकसाना तो एक बहाना था। सुनीता को देखकर मेरी चूत भी शिशिर से चुदवाने के लिये बेकरार हो रही थी। शर्त के बाद मुझे खुला मौका मिल गया। डोरे डालने के लिये मैंने स्त्री सुलभ हथियारों का इश्तेमाल किया जिसमें शरीर की भाषा, नैनों की भाषा और प्रेम की भाषा शामिल थी। मैं बड़ी सेक्स भरी आवाज में उससे बातें करने लगी। आँखों में रस भर के कहती- “मैं भी तो तुम्हारी भाभी हूँ। सुनीता जैसा मेरा भी तो अधिकार है…”

कभी बदन को ऐंठकर कुटिलता से कहती- “रात को तो मेरी हालत खराब हो गई…” आफिस फोन कर देती कहीं ले जाने या लंच पर ही ले जाने के लिये। रेस्टोरेंट में बड़े टाइट कपड़े पहनकर जाती जिनसे मेरे चूचुक के आकार साफ दिखाई देते, चूतड़ के उभार साफ नजर आते। बात-बात पर उस पर गिर पड़ती, कंधे पर सिर रख देती, साथ मैं सेक्स भरी बातें भी करती जाती। इन सबका असर यह हुआ कि शिशिर मेरे से बहुत खुल गया। दो मतलब लिये हुये सेक्स भरा मजाक भी करने लगा। जल्दी ही एक दिन शिशिर के आफिस में ही मैंने हाव-भाव से साफ जाहिर कर दिया कि अब क्यों देर करते हो लगाओ न मुझमें और उससे सटकर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया। ले

किन शिशिर पीछे हट गया। उसने एकदम हाथ नहीं झटका न ही मुझे। धकेला बल्की बाहर चलते हुये बोला- “चलो घर चलें, कुमुद इंतजार कर रही होगी…”

मैं समझ गई कि लोहा पूरी तरह गरम करने के लिये शारीरिक तरीके से बढ़ने की जरूरत है। मैं शरीर का मजा देने के लिये मौके की तलाश में थी और वह मौका मुझे मिल गया। शहर में नुमायश लगी थी। सुनीता, राकेश, शिशिर, कुमुद, मैं, रूप सब लोग गये।

मैं टाइट सलवार-सूट में थी। एक जगह स्टेज पर गाने बजाने हो रहे थे। लोग घेरा बना के जमा थे। अंथेरा हो रहा था और वह जगह ज्यादा ही अंधेरी थी। हम सब लोग भी गाने सुनने के लिये खड़े हो गये। मैं शिशिर के सामने खड़ी हो गई। अनजानी सी पीछे हुई और अपने पीछे का हिस्सा उसके सामने से चिपका दिया। मेरी चूतड़ों की गोलाइयां उसकी जांघों में पूरी तरह फिट हो गईं थीं।

मैं चूतड़ों की दरार में उसके सख्त होते हुये लण्ड को महसूस करने लगी थी कि तभी वह वहां से हट गया और सुनीता के पीछे जाकर खड़ा हो गया। सुनीता के चेहरे पर एक मुश्कान उभरी जो मुझे चिढ़ाने के लिये भी थी और शिशिर की उसको लण्ड लगाने की मक्कारी पर भी।

मैंने सीधी खुराक देने की ठान ली क्योंकी मेरे वहां रहने में कुल छह दिन और रह गये थे जिनमें मुझे अपनी मनमानी करनी थी। अगले ही दिन पिकनिक थी। मैंने उस दिन साड़ी पहनी लेकिन अंदर पैंटी नहीं पहनी। पिकनिक में चादर पर मैं शिशिर के सामने बैठी थी, घुटनों को ऊपर करके। जब देखा कि लोग नहीं देख रहे हैं तो मैंने अपनी टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे अंदर का नजारा दिख सके। मैंने नोट किया कि शिशिर के ऊपर असर पड़ा है।

शिशिर दबी आँखों से मेरी साड़ी के अंदर झांक रहा था। ऐसा मैं कभी-कभी ही कर पा रही की क्योंकी इतने लोगों के बीच में बैठी थी, लेकिन उनको शक भी नहीं हो सकता था कि मैंने पैंटी नहीं पहनी है। अबकी बार मौका मिला तो मैंने टांगें पूरी खोल दी, इतनी कि मेरी चूत का मुँह भी खुल गया होगा। अब नजारा उसके सामने था और वह भी जैसे सब कुछ भूलकर आश्चर्य से घूरे जा रहा था। मैं भी उसकी तरफ देखकर मक्कारी से मुश्कुरा रही थी।

शिशिर सोच रहा था- “ओ माइ गोड कैसी फूली-फूली रसभरी चूत है… सुनीता भाभी से कम नहीं…”

सुनीता की नजरों से यह खेल छुपा न था। जब सुनीता ने शिशिर को रजनी की चूत को घूरते हुये देखा तो हैरानी भी हुई और शिशिर पर गुस्सा भी आया। उसने आवाज देकर शिशिर को कार से खेल का सामान लाने को भेज दिया।

जब अकेले में शिशिर भाभी-भाभी करता हुआ सुनीता के पास आया तो सुनीता बोली- “देवरजी बड़ी लार टपक रही थी। ये समझ लेना कि कहीं और मुँह मारा तो अपनी भाभी से परांठे कभी भी नहीं खा पाओगो…”

मैंने सुनीता की चालाकी जान ली थी, जब उन्होंने शिशिर को हटा दिया। उसके बाद उन लोगों को कुछ घुसपुस करते हुये भी देखा। समझ गई कि मान मनौवल चल रही होगी, क्योंकी सुनीता को अपना कंट्रोल खतम होते हुये दिख रहा है। मुझे अपनी चूत की ताक़त पर भरोसा था। जानती थी कि ऐसी चूत देखने के बाद कोई भी अपने को काबू में नहीं रख सकता। उस रात मैंने उथेड़बुन करके कैसे भी शिशिर से अकेले में मिलने का समय निकाला।

मैं शिशिर से झूठी नाराजी दिखाती हुई बोली- “क्या देखे जा रहे थे। आज मैं पैंटी पहनना भूल गई तो तुमको शर्म नहीं आती, अंदर ताक-झाँक करते हो…”

शिशिर- “जब देखने लायक चीज़ होगी तो आँखें अटकेंगी ही…”

मैं- “तो फिर चाहिये है उसको?”

शिशिर- “उसके दावेदार तो और भी हैं। आप मेरी भाभी की सहेली हैं हमें आपकी इज्जत करनी है…”

मैं कुछ बौखला सी गई, बोली- “सुनीता और हम एक हैं। तुममें और सुनीता में क्या है मुझे सुनीता ने सब बता दिया है फिर हमको लेने में क्यों परहेज करते हो?”

शिशिर मेरा हाथ पकड़कर अनुनया भरे स्वर में बोला- “जब आप सब जानती ही हैं तो इन संबंधों को हम लोगों के बीच में ही रहने दीजिये न। सेक्स छोड़ दीजिये बाकी सब बातें मैं आपकी सुनीता भाभी की ही तरह मानूंगा। आप को कोई शिकायत नहीं होगी…”

उसकी तरफ देखकर कहने को कुछ और नहीं रह गया था। मैं सोच भी नहीं सकती की कि मेरी जैसी औरत देने को तैयार हो और कोई आदमी लेने से मना कर दे।

सुनीता भी शायाद नहीं सोच सकती थी क्योंकि जब मैंने बताया तो अचानक खुशी से वह उछल पड़ी और मेरे गले लग गई।

सब कुछ बता देने के बाद मैंने सुनीता से कहा- “अच्छा भाई, मैं भाभी भक्त देवर को मान गई लेकिन जाने के पहले उसका मजा तो चखा दो जिसने मेरी सहेली की यह हालत कर दी है…”

सुनीता पहले तो मुकर गई। जब बहुत मिन्नतें की तो बोली- “अच्छा देखेंगे…”


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सुनीता और शिशिर

उसी दिन शाम को शिशिर और कुमुद सुनीता के यहां डिनर पर आये। शिशिर का बर्ताव मेरी तरफ बड़ा नरम था जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैंने सुनीता को उकसाया तो अकेला पाकर उसने शिशिर से बात की।

सुनीता- “तुम बाकई भाभी के हकदार हो। तुमको अपने को सौंपकर मैंने कोई भूल नहीं की। रजनी वापिस जा रही है। वह मेरी बड़ी अंतरंग है। उसकी तमन्ना पूरी कर दो। समझो मेरी तरफ से यह तोहफा है…”

शिशिर आश्चर्य से- “भाभी क्या बात करती हो? मैं तुम्हारे और कुमुद के अलावा किसी को नहीं छुऊंगा फिर तुम्ही तो उस दिन मुझ पर लांछन लगा रही थी और मेरे से अलग हो जाना चाहती थीं…”

सुनीता- “वह तो तुमको समझने के लिये कहा था। अब उसकी अच्छी तरह से मरम्मत कर दो कि शर्त लगाने की हेकड़ी भूल जाये…”

शिशिर- “भाभी मैं तो तुम्हारे बगैर किसी को नहीं करूंगा…”

सुनीता हँस के- “तो फिर कुमुद को क्यों लगाते हो?”

शिशिर- “कहो तो करना छोड़ दूं…”

सुनीता- “नहीं नहीं… तुम कहां बात ले जाते हो। मैं कह रही हूँ कि तुम रजनी को करो बस…”

शिशिर- “तो आपको भी मौजूद रहना पड़ेगा…”

सुनीता- “यह कैसे हो सकता है? रजनी मेरे सामने कैसे करायेगी?”

शिशिर- “क्यों नहीं करायेगी? जब आपकी अंतरंग है और आपसे फरमाइश कर सकती है…”

सुनीता- “अच्छा देवरजी, अब समझी तुम्हारी चालाकी दोनों को एक साथ लगाना चाहते हो…”

शिशिर- “जाओ मैं नहीं करूंगा…”

सुनीता- “अच्छा भाई, हम दोनों हाजिर हो जायेंगी…”


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रजनी

मुझे यह जानकर बड़ी खुशी हुई कि सुनीता ने शिशिर को तैयार कर लिया है। सुनीता का साथ रहना भी मुझे भा रहा था। सुनीता ने जब प्रश्न उठाया कि- लेकिन राकेश और रूप से बचाकर मिलोगी कैसे?

तो मैंने उसको चैलेंज जैसा लेते हुये कहा- “तुम इसकी फिक्र न करो, मेरे ऊपर छोड़ दो…” लेकिन यह बड़ी समस्या थी। हम लोग छुट्टियों में थे और सब लोग साथ ही निकलते थे। उनसे अलग रहकर एक रात निकल पाना टेढ़ी खीर था। मैंने एक प्लान बनाया। सुनीता को नहीं बताया नहीं तो वह मना कर देती। मैंने सोचा कि रूप और राकेश को किसी और के संग लगा दें। ठीक भी था जब हम लोग मज़े ले रहे थे तो उनको भी मज़े ले लेने दें। सबके ऊपर नजर दौड़ाई तो मिसेज़ अग्रवाल ठीक लगीं। अच्छा भरा बदन था। खूब उभार लिये सीने थे, भारी सेक्सी चूतड़ थे, और उनके जल्दी राजी हो जाने की उम्मीद भी थी। मैंने प्लान पर काम करना चालू कर दिया।

सबसे पहले मिसेज़ अग्रवाल का तैयार करना था। मैं उनसे अकेले में मिली तो सेक्स की बातों के साथ उनके सेक्सी शरीर की बड़ी तारीफ कर दी और कहा- “बुरा न मानो तो एक बात कहूँ… रूप तो तुम्हारे ऊपर मर मिटा है। जब भी मुझे करता है तो तुम्हारा नाम ले-लेकर ही लगाता है…”

मिसेज़ अग्रवाल शर्माती हुई बोलीं- “ओ माँ… बड़े बुरे हैं वो…”

मैंने उनके हाथ को दबाते हुये कहा- “बुरे नहीं, जब तुम्हारे नाम का लगाते हैं तो मुझे तारे नजर आ जाते हैं। तुम लगवाके देख लो न…”

मिसेज़ अग्रवाल- “तुम उन्हें परमिशन दे दोगी?”

मैं- “वो जिस शुख को लेना चाहते हैं, मैं क्यों रोकूं। तुम अपनी बाताओ तुम्हें मंजूर है?”

उन्होंने आँखों से हामी भर दी।

उसी रात मैंने रूप से चुदाई कराई। उसकी मन की बात करके तबीयत खुश कर दी। जब वह धक्के लगा रहा था तो मैंने बात छेड़ी- “रूप, मिसेज़ अग्रवाल का दिल है तुम्हारे ऊपर… तुमसे मजा लेना चाहती हैं…”

रूप ने पूछा- “तुमको कैसे मालूम हुआ?”

मैंने कहा- “खुद उन्होंने मुझसे इशारों में कह दिया। तुमसे कहने की हिम्मत नहीं हुई कि तुम मना न कर दो…”

यह बातें करते हुये रूप के धक्के की रफ्तार बढ़ गई।

मैंने बात जारी रखी- “लेकिन रूप एक बात है, उनका ज्यादा माल खाने का मन है। तुम्हारा और तुम्हारे दोस्त राकेश दोनों का साथ-साथ खाना चाहती हैं…”

रूप का मन थोड़ा बुझ गया- “पता नहीं राकेश का? वह उसकी बीवी पता नहीं…”

मैंने चूत कस कर लण्ड पर जमाते हुये उसको उकसाया- “तुम्हारा दोस्त है तैयार करो उसको। तर माल खाने को मिल रहा है…”

रूप ने जवाब में पूरा पेलते हुये कहा- “करता हूँ उसको तैयार…”

मैंने चूत उसकी झांटों से रगड़ते हुये कहा- “डार्लिंग जल्दी करना, वह मुझसे पूछेगी…”

उसके बाद रूप के चोदने में बहुत उत्साह आ गया।

दूसरे दिन ही जवाब मिल गया। राकेश बाखुशी तैयार हो गया। मुझे अब फिर से संगीता अग्रवाल से बात करनी थी। मैं पुराने जमाने की कुटनी का रोल कर रही थी। पत्नियां चुदवाना चाहती थीं, पति चोदने को बेकरार थे, लेकिन कितनी अजीब बात थी की दोनों ही किसी और के लिये दीवाने हो रहे थे। किसी और को चूत देने के नशे मैं मैंने कैसी-कैसी चालें चलीं थीं।

मिसेज़ अग्रवाल से मिली तो अलग ले जाकर चिउंटी काटती हुई मैं फुसफुसा के बोली- “तेरे मज़े हैं, रूप और राकेश दोनों ही लगाना चाहते हैं…”

संगीता अग्रवाल समझी नहीं बोली- “अभी तो एक बार मिलना बहुत है…”

मैंने कान में कहा- “एक साथ ही दोनों हाँ…” और मैंने उसका हाथ दबा दिया।

संगीता के चेहरे पर घबड़ाहट थी बोली- “न बाबा न… ऐसा कैसे हो सकता है?”

मैं झूठ बोली- “बड़ा मजा आता है, मैं तो कई बार करा चुकी हूँ। सोचे दो लण्डों का अलग-अलग स्वाद मिलेगा…”

संगीता के चेहरे पर वासना नाचा उठी- “सच… क्या मैं करा पाऊँगी?”

मैंने हाथ दबाकर उसके तसल्ली दे दी। वह भी लगवाने के लिये उत्तेजित हो गई। भाग्य से मिस्टर अग्रवाल को दो दिन बाद बाहर जाना था। उस दिन की रात मिसेज़ अग्रवाल के यहां रूप और राकेश के लिये बुक हो गई। मिसेज़ अग्रवाल खाना बड़ा जायकेदार बनाती थीं और खुद भी जायकेदार थीं। रूप और राकेश की बड़ी दावत पक्की थी। हम लोगों के लिये मैदान साफ हो गया।

मैंने सुनीता को सुझाया कि वह घर में इंतेजाम न करे। किसी भी कारण से रूप और राकेश वापिस आ पहुँचे तो हम लोग रंगे हाथों पकड़े जायेंगे। सुनीता ने शिशिर को खबर कर दी।

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सुनीता, रजनी और शिशिर

शिशिर ने एक आलीशान होटल मैं रूम रिज़र्व कर दिया। सुनीता और रजनी आठ बजे रात को होटल पहुँची शिशिर को साढ़े आठ बजे आना था। कमरे को देखकर दोनों दंग रह गईं। शिशिर ने पांच-सितारा होटल का एक पूरा सूट बुक कर दिया था। खाने के लिये डाइनिंग टेबल, बैठने के लिये सोफा, चमचमाता बाथरूम, क्वीन साइज़ बेड और उसके सामने ढेर सारी खुली जगह। शिशिर साढ़े आठ बजे के पहले ही पहुँच गया। बेल दबाने पर दरवाजा खुला तो सुनीता और रजनी सामने खड़ी थीं, एकदम सजी धजी।

सुनीता ने दूध सी सफेद साड़ी पहन रखी थी। उसका गोरा रंग उससे मिल गया था। गले में मोतियों का हार, कानों में हीरे के बड़े-बड़े थाप, सुर्ख लिपिस्टिक, रचे होंठ और कमान सी आँखें।

रजनी ने धानी कुर्ता, सफेद चूड़ीदार, हाथों में ढेर सारी हरी-हरी चूड़ियां, मैचिंग कीमती हार, इयरिग और सुघड़ मेकप।

शिशिर उनको ताकता ही रह गया।

सुनीता शर्मा के बोली- “अब आओगो भी या ऐसे ही खड़े रहोगे?”

शिशिर जैसे सोते से जाग गया हो। उसने हाथ के बैग से एक सफेद मोगरे की माला निकाली और सुनीता से बोला- “भाभी ये आपके लिये…”

सुनीता उसकी ओर पीठ करके खड़ी हो गईं, उसने माला उसके जूड़े में बाँध दी। मोगरा महक उठा। पलट कर सुनीता ने उसके गले में बाहें डाल दी। शिशिर ने उन्हें खींचकर अपने से चिपका लिया। दोनों ऐसे ही जुड़े थोड़ी देर खड़े रहे। सुनीता ने एक चुंबन उसके होठों पर लेकर अपने को अलग किया।

फिर शिशिर रजनी की तरफ बढ़ा और बैग से सुर्ख गुलाब का बुके उनकी ओर करके बोला- “रजनी जी ये आपके लिये…”

रजनी बोली- “रजनी नहीं, भाभी…”

शिशिर ने अपने को सुधारते हुये कहा- “रजनी भाभी, यह आपके लिये…”

रजनी ने बढ़ के दोनों बाहें उसके गाले में डाल दी और अपने होंठ कसके उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर उनको चूमता रहा।

इस बीच सुनीता डाइनिंगा टेबल पर जार में रखी सुगंधित मोमबत्ती जला दी थी और उसकी भीनी-भीनी खुशबू कमरें में भरने लगी थी। साफ्ट म्यूजिक लगा दिया था। सुनीता ने लाइट बंद कर दी। शिशिर ने सुनीता की ओर देखा। मोमबत्ती की मंद-मंद रोशनी में वह परी सी लग रही थी। रजनी की कमर में हाथ डाले हुये शिशिर सुनीता की ओर बढ़ा और उसको अपने से चिपका लिया।

रजनी उसके बायें कंधे से चिपकी थी और सुनीता दांयें से। इसी हालत में वह लोग थिरकते रहे। शिशिर कभी सुनीता को चूमता था कभी रजनी को। शिशिर का लण्ड गरमाने लगा था। रजनी उस पर हाथ फेरने लगी थी। उसने झुक कर सुनीता के दांयें उभार को ब्लाउज़ के ऊपर से ही मुँह में ले लिया।

सुनीता सी सी कर उठी। सुनीता ने फुसफुसा के कहा- “देवरजी, पहले रजनी को शुख दीजिये, मैं तो आपके पास ही हूँ आज की रात उसकी है…”

शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…”

लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये।


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***** To be contd... ...

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