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मस्ती एक्सप्रेस_Masti Express COMPLETE

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Friends,

Following Stories are posted in PDF format.

1. अंजू मौसी (मौसी का गुलाम);


2. अज़ब प्रेम की ग़ज़ब कहानी;

3. कच्ची कली;

4. तरक्की का सफ़र;

5. तीन देवियाँ;

6. तीन घोड़िया एक घुड़सवार

You may download the above.

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शिशिर ने रजनी को प्यार से चूम लिया- “रजनी भाभी भी तो अपनी हैं…” फिर सुनीता को और भींचते हुये बोला- “भाभी शुरूआत तो मैं आप से ही करूंगा लेकिन तुम दोनों इतनी अच्छी लग रही हो कि मैं कुछ भी नहीं उतारना चाहता…”

लेकिन रजनी उसका पैंट उतार चुकी थी। अंडरवेर खींचकर रजनी ने उसके लण्ड को मुट्ठी में बांधा तो जैसे लोहे की गरम राड पर हाथ रख दिया हो। शिशिर का बड़ा मोटा और लंबा लण्ड सांप की तरह ऊपर मुँह बाये खड़ा था। पत्थर की तरह सख्त। उसको देखते ही रजनी के मुँह से निकल गया- “ओ माई गुडनेश… अब समझी कि सुनीता इतनी दिवानी क्यों हो रही थी…” फिर रजनी शिशिर की बांहों से खिसक कर नीचे घुटनों के बल बैठ गई। मुट्ठी में बाँधकर उसका लण्ड सीधा अपने सामने कर लिया और मुँह खोलकर अपने नरम होंठ उसके ऊपर रख दिये।

होंठ लगते ही शिशिर की वासना एकदम जाग उठी। हाथ बढ़ाकर शिशिर ने रजनी को उठा लिया और सुनीता की कमर में हाथ डालकर उन्हें खींचता हुआ बेड तक ले गया। रजनी को बेड के पैताने कारपेट पर बैठा दिया और सुनीता को बेड पर चित्त गिरा दिया। शिशिर ने सुनीता की साड़ी ऊपर तक उलट दी। बाहर के ही नहीं अंदर के कपड़े भी उसने कीमती पहन रखे थे। लेस लगी डिजाइनर पैंटी पर चूत के पानी से एक बड़ा धब्बा बन गया था। शिशिर ने पैंटी अलग की तो सामने दो चिकनी सपाट जांघें थीं, संतरे की रसभरी फांक की तरह सूजी-सूजी चूत की पंखुड़ियां थीं जिनके भीतर से गुलाबीपन झांक रहा था, अर्ध-गोल सुडौल नितम्ब थे जिनके बीच में गहरी दरार थी।

उसके मुँह से निकल गया- “भाभी तुम बाकई बहुत खूबसूरत हो…”

दोनों हाथों से उसने सुनीता को खींच लिया और उसकी जांघें अपने कंधों पर धर लीं। सुनीता का धड़ पलंग पर था, नितम्ब पलंग से ऊपर उठे हुये थे और मुँह खोले चूत शिशिर के मुँह से सटी हुई। सुनीता की चूत से मदमस्त सुगंध निकल रही थी। शिशिर ने अपने होंठ सुनीता की चूत की पंखुड़ियों से सटा दिये और चूतड़ आगे करके अपना लण्ड पलंग से टिकी बैठी रजनी के होंठों से लगा दिया।

रजनी ने सिर ऊंचा करके उसका लण्ड अपने होठों में ले लिया।

जैसे ही शिशिर ने चूत के अंदर के उभार को होंठों में दबोचा, सुनीता के मुँह से एक सीत्कार निकल गई और वह तनकर के धनुष की तरह हो गई। वह चूत की उठान को होंठों से इस तरह चूसने लगा जैसे संतरे की फांक चूस रहा हो।

नीचे बैठी रजनी शिशिर के लण्ड को जड़ से दायें हाथ की मुट्ठी में बांधे लालीपोप की तरह चटखारे लेकर चूस रही थी।

शिशिर दोहरे मज़े ले रहा था।

रजनी ने मुट्ठी को लण्ड के सिरे तक फिसलाकर उसके ऊपर की खाल को हटा दिया तो लण्ड का सुपाड़ा निकल आया। जैसे लालीपोप खा रही हो, उसने सुपाड़ा अपने मुँह में लेकर हलके से दांत लगा दिये।

शिशिर उत्तेजना से कराह उठा और उसने सुनीता की चूत की उठान पर हलके से दांत लगा दिये।

सुनीता के मुँह से चीख निकल गई, बोली- “ओ देवरजी तुम तो काटते हो…”

शिशिर क्लिट पर जीभ फेरने लगा। सुनीता की सिहरन बढ़ गई। उसने शिशिर के सिर पर हाथ रखकर और कस के उसका मुँह चूत पर दबा लिया। शिशिर ने साथ ही चूतड़ आगे करके और जोर से लण्ड चूत के मुँह में पेला। रजनी ने चूत के होंठों की पकड़ और बढ़ा दी।

जब रजनी जोर बढ़ा देती थी तो शिशिर सुनीता की चूत पर कसर निकालता था और जब सुनीता रगड़ बढ़ा देती की तो शिशिर रजनी पर कसर मिटाता था। शिशिर सुनीता और रजनी के बीच माध्यम बन हुआ था।

सुनीता जोरों से- “उईईई… आआआह्ह…” करे जा रही थी।

रजनी के मुँह से निकल रहा था- “उहूँहूँहूँ हूँहूँहूँ हूँ…” जैसे बड़ी स्वादिष्ट चीज़ चाट रही हो।

शिशिर की जीभ चूत की गहराइयों तक घुस जाती थी और सुनीता तड़प-तड़प जाती थी। शिशिर दोनों हाथों से सुनीता की दोनों चूचियों को मसल रहा था। उसके दोनों चूचुक ब्लाउज़ के ऊपर ही एक-एक इंचा उभर आये थे।

रजनी उंगली और अंगूठे की रिंग बना के शिशिर के लण्ड को उसमें ले रही थौ साथ ही मुँह से चूसती जाती थी।

काफी देर तक वे मज़े लेटते रहे। सुनीता की गुलाबी तितली तनकर सख्त हो गयी थी। शिशिर ने उसके ऊपर अंगूठा रखा।


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सुनीता एकदम कांप गई- “ओओ माँ अंअंअं अंआंआं आआआ आआआ मैं तो गईईईई… … …” उसने कसके चूत शिशिर के मुँह से चिपका दी और जोरों से दोनों हाथों से उसका सिर टांगों में दबा लिया।

शिशिर बड़ा उत्तेजित हो उठा। उसने लण्ड पेलने की गति बढ़ाई और उसके लण्ड ने वीर्य उगलना चालू कर दिया। रजनी ने मुँह से लण्ड निकाल लिया। लण्ड से गाढ़ा रस निकलता ही जा रहा था। रजनी ने सुनीता की पैंटी उठा ली और ढेर सारा वीर्य उस पर ले लिया।

रजनी उठी और खड़े होकर शिशिर से चिपक गई। शिशिर के वीर्य से भरे अपने होंठ, सुनीता के रस से गीले शिशिर के होठों से सटा दिये। रजनी ने उठकर सुनीता की ओर देखा तो वह निढाल पड़ी हुई थी। साड़ी उलटी हुई थी। बड़ी ही चिकनी और सुडौल टांगों के बीच चूत की फांकें तराशी हुई डबलरोटी की तरह फूली हुईं थी। उनके ऊपर बड़े सलीके से कतरे हुये सुनहरे बालों का तिकोन सा बना था। दोनों फांकें फैल गईं थीं। अंदर का गुलाबीपन दिखाई दे रहा था जिसके अंदर से नमी झांक रही थी। बुरी तरह चूसने से चूत लाल हो गई थी। पेट और टांगों पर जरा सा भी ज्यादा मांस नहीं था। सब कुछ एकदम अनुपात में। ब्लाउज़ बुरी तरह से मसला हुआ था जिसमें से सुडौल गोलाइयां उभरी हुई थीं। सफेद साड़ी में चूत खोले कोई अप्सरा पड़ी थी। रजनी पहली बार अपनी अंतरंग सहेली के अंदर के भागों को देख रही थी।

इस बीच शिशिर बाथरूम चला गया था। रजनी की चूत में आग लगी हुई थी। रजनी ने एक झटके से अपनी सलवार का नाड़ा खोल लिया और चूत के रस से गीली हो गई पैंटी को खींचकर निकाल फेंका। अपना कुर्ता भी निकाल फेंका और बिल्ली की तरह चलती हुई सुनीता के ऊपर आ गई। वह सुनीता के ब्लाउज़ के बटन खोलने लगी। रजनी पहली बार ऐसा कर रही थी।

सुनीता भौचक्की रह गई, बोली “रजनी… ये क्या करती हो?”

रजनी तब तक उसका ब्लाउज़ और ब्रेजियर अलग कर चुकी थी। बड़े-बड़े गोले स्प्रिंग से उछलकर बाहर आ गये थे। रजनी ने देखा तो बोल पड़ी- “सुनीता, तू बाकई बहुत खूबसूरत है…”

रजनी ने सुनीता का बायां उभार चूचुक सहित मुँह में भर लिया और अपनी चूत सुनीता की चूत के ऊपर बैठा दी। जब रजनी की चूत की पंखुड़ियों ने सुनीता की चूत के अंदर रगड़ा तो सुनीता को बहुत अच्छा लगा। उसने रजनी की पतली कमर अपनी दोंनों टांगों के बीच भर ली और अपनी टांगें उसकी कमर पर कसकर उसकी चूत को और कसकर अपनी चूत में घुसा लिया।

रजनी ने अपनी दाईं चूची उसके मुँह में दे दी।

शिशिर जब बाथरूम से आया तो उसने देखा कि सुनीता चित्त लेटी है, रजनी उसके ऊपर लेटी है। रजनी सुनीता की एक चूची चूस रही है और सुनीता रजनी की चूची पर पिली पड़ी है। सुनीता की नारंगी की तरह रस से भरी हुई सुनहरे तराशे बालों वाली चूत रजनी की लंबी फांक वाली रसीली सफाचट चूत में लाक है। सुनीता की चूत का एक होंठ रजनी की चूत में घुसा है और रजनी की चूत का एक होंठ सुनीता की चूत के भीतर। दोनों एक दूसरे की चूत के अंदर के दाने को रगड़ रही हैं। चूत को ज्यादा से ज्यादा खुला रखने के लिये सुनीता ने अपनी टांगें रजनी की कमर पर कस रखी हैं और रजनी ने टांगें फैला रखी हैं। दोनों कस-कस के आवाजें निकाल रही हैं।

यह देखकर शिशिर का लण्ड तनकर उत्तेजना से हिलने लगा। वह आगे बढ़ा और पलंग के पैताने जाकर उसने उन दोनों को वैसे ही गुथी हालत में पलंग के किनारे तक खींच लिया। पैताने खड़े-खड़े ही उसने अपना लण्ड हाथ से पकड़ा, सुनीता की चूत के मुंह पर रखा और एक झटके में ही पूरा अंदर कर दिया।

सुनीता के मुँह से निकला- “उईई माँ…”

उसने दो तीन बार उसको अंदर बाहर पेला। फिर अपना लण्ड बाहर खींच लिया। फिर से मुट्ठी में पकड़ा और अबकी बार रजनी के सुराख से मिलाया और जोर लगा के घुसाता ही गया।

रजनी कराह उठी- “ओ माई गोड…”

दो तीन बार उसने उसकी चूत में ही अंदर बाहर किया फिर खींच लिया। फिर उसने सुनीता की बुर पर लगाया और बोला- “लो भाभी अब तुम लो…” और सारा का सारा अंदर कर दिया।

सुनीता बनावटी शिकायत से- “देवरजी, तुम तो अंदर तक हिला देते हो…”

बाहर खींचकर शिशिर ने रजनी की बुर में एक झटके में पूरा भीतर ओर कहा- “लो रजनी भाभी तुम लो…”

रजनी- “हाँ… लगाओ तुम्हारे लण्ड में जोर है तो मेरी चूत भी कम नहीं…”

शिशिर एक बार सुनीता को चोदता था और एक बार रजनी को। दोनों के अंदर उसका लण्ड एक की चूत से निकलता तो दूसरी की चूत में घुस जाता।


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उसको दुहरा स्वाद मिल रहा था। एक बार सुनीता की मांसल, स्पंजी, लण्ड को जकड़ने वाली बुर का और दूसरी बार पतली, लंबी, गरम सुरंग का जिसमें लण्ड गहराई तक घुस जाता था। जब वह रजनी पर चोट करता तो रजनी झेलते हुये अपनी चूत सुनीता की चूत पर रगड़ देती। जब वह सुनीता पर जोर लगाता तो सुनीता टांगों की जकड़ और बढ़ा देती कि उसकी चूत रजनी की बुर पर रगड़ मार देती। शिशिर की रफ्तार बहुत बढ़ गई थी। धखाधक-धकाधक वह लगाये जा रहा था- सुनीता में, रजनी में, फिर सुनीता में। सुनीता रजनी एक दूसरे की चूचियों को कस के जकड़े हुये थीं। उनका सिसकना बढ़ गया था।

जैसे ही चोट लगती सुनीता बुदबुदाती- “ओओह्ह शिशिर मैं क्या करूं हुहूँ…”

सुनीता जब ज्यादा आनंद में आ जाती थी तो शिशिर का नाम लेकर पुकारने लगती थी।

रजनी का चुनौती वाला रुख अब भी बना हुआ था, हालांकि उसमें रहम जैसा भाव आ गया था। उसके अंदर धक्क से जाता तो रजनी कराह उठती- “ओ मेरे राम्म्म… हाँ हाँ काट डालो इसको आज… इसे छोड़ना नहीं…”

शिशिर ने सुनीता की जांघें को दोनों हाथों से थाम रखा था जो रजनी की कमर पर कसी हुईं थीं। खड़े-खड़े वह एक के बाद एक दोनों को पेले जा रहा था जैसे पिस्टन शंट कर रहा हो।

सुनीता मैं घुसता तो सुनीता तड़पती- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…”

रजनी झेलती तो दांतों के ऊपर दांत जकड़े हुये अंदर लंबी सांस खींचती- “ऊऊऊऊऊऊ…” जब चोट पड़ चुकती तो जोर से सांस बाहर करती- “ओफ्फ्फ्फ…”

सुनीता की बुर बुरी तरह से रिस रही थी। जांघों तक पानी फैल गया था। रजनी की बुर भी पूरी गीली हो रही थी। दोनों की चूत गुत्थम-गुत्था थीं और एक दूसरे के पानी से लथफथ हो रही थीं।

शिशिर का लण्ड उनकी चूत से फच्च-फच्च की आवाज निकाल रहा था।

सुनीता और रजनी की कराह बढ़ती जा रही थी- “ओओ… ओओओ… आआआ… ओ मेरी मम्मीई… ओ माईई गोड… उईईई म्माँ मैं मरीई…” “ऊऊऊऊऊऊ… ओफ्फ्फ्फ”

शिशिर ने और गति बढ़ाई तो रजनी ने सुनीता की चूची को छोड़कर अपने होंठ उसके होंठों पर गड़ा दिये। शिशिर ने हाथ बढ़ाकर सुनीता की दोनों चूचियां हथेलियों में थाम लीं और शंटिंग चालू रखी। दोनों होंठ चूसती जातीं थीं और “ऊंऊं” की आवाज करती जाती थीं। जैसे ही शिशिर ने चूचियों की घुंडियों को ऊँगलियों में मसला तो सुनीता चिल्ला उठी- “ओ शिशिर मैं तो गईईई… मत निकालो बाहर…”

इसके साथ ही अपनी कमर उठाकर उसने रजनी की चूत से इतने कस के सटा ली कि रजनी हिल न सकी। उसकी रगड़ से रजनी का पानी भी छूट गया- “आआआ… मैं क्या करूं? माँ मेरी मैं झड़ीईई…”

शिशिर ने जल्दी से पूछा- “रजनी भाभी, आपने बर्थ कंट्रोल की गोली ली है?”

रजनी के हाँ कहते ही शिशिर ने रजनी की बुर में अपना पूरा लण्ड अंदर किये हुये ही सारा वीर्य उगलना चालू कर दिया। करीब-करीब एक साथ तीनों लोग सिहरते रहे। जब शिशिर ने लण्ड बाहर किया तो रजनी की मसली चूत के अंदर से गाढ़ा-गाढ़ा सफेद द्रव बाहर निकलकर सुनीता की चूत पर गिर रहा था।

रजनी ने उठकर अपनी चूत को पोंछा।

सुनीता ने हाथ से खींचकर शिशिर को अपनी बगल में लिटा लिया।

शिशिर ने हाथ बढ़ा के रजनी को अपनी दूसरी तरफ लिटा लिया। दोनों ने शिशिर के एक-एक कंधे पर सिर रख लिया।

रजनी बोली- “थैंक यू शिशिर, मैं पूरी तरह संतुष्ट हो गई हूँ, खासतौर पर तुमने मेरी सहेली से मेरी जान पहचान करवा दी…”

सुनीता लाजाती हुई बोली- “धत्त… ऐसा भी कोई करता है?”

शिशिर बोला- “रजनी भाभी, अभी कहां? अभी आपसे अकेले की मुलाकात तो करनी है…”

रजनी- “न बाबा… और मैं न ले सकूंगी…”

सुनीता- “शिशिर इसको मत छोड़ना। इतनी इठलाती थी, हैकड़ी तो बंद हो इसकी…”

शिशिर ने सुनीता को भिंचकर चूम लिया फिर रजनी को भींचकर उसको चूम लिया।


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मिसेज़ संगीता अग्रवाल राकेश और रूपेश

जब सुनीता और रजनी शिशिर से मुलाकात का बेसबरी से इंतेजार कर रही थीं, ठीक उसी समय राकेश और रूपेश मिसेज़ अग्रवाल के घर पर दस्तक दे रहे थे। मिसेज़ अग्रवाल ने दरवाजा खोला। एकदम सजी-धजी, पूरा श्रिंगार किये। कमनीय तो थीं ही और मादक हो उठी थीं। पूरे उठे हुये जोबन, उभरे गोल-गोल चूतड़, दमकता रंग, आँखों में शुरूर, मोटी नहीं थी पर शरीर अच्छा भरा हुआ।

उन्होंने राकेश का हाथ पकड़ते हुये कहा- “आइये देवर जी…”

फिर रूपेश की ओर देखते हुये- “आइये रूपेश जी…”

कोई हिचकिचाहट नहीं थी, न शर्मा रही थीं। अंदर आकर राकेश ने कीमती परफ्यूम भेंट की तो वह उससे सटकर खड़ी हो गईं, बोली- “लीजिये लगा दीजिये…”

राकेश उनके उभार की नजदीकी महसूस करने लगा था। उसके शरीर में झनझनाहट सी लगने लगी थी।

वह बोलीं “बैठिये…”

लिविंग रूम में शानदार सोफे पड़े हुये थे। खुशहाली और शुरूचि चारों ओर नजर आ रही थी। राकेश और रूपेश बड़े से सोफे पर बैठ गये।

मिसेज़ अग्रवाल ने पूछा- “आप लोग कुछ हार्ड ड्रिंक लेना चाहेंगे? मैं तो लेती नहीं…”

राकेश- “अगर आप साकी बनेंगी तो जरूर लेंगे…”

मिसेज़ अग्रवाल- “आप बनाइये तो सही मैं सब कुछ बनूंगी। आज की रात आपके नाम है, अगर कुछ कमी रह गई तो सुनीता और रजनी शिकायत करेंगी…”


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राकेश और रूपेश दोनों ड्रिंक बना लाये और मिसेज़ अग्रवाल के लिये कोक। मिसेज़ अग्रवाल बड़ी बेतकल्लुफी से उनके सामने लवो सीट पर बैठ गईं। दोनों टांगें चौड़ाई हुई थीं। अगर साड़ी से न ढकी होती तो सामने चूत का पूरा मुँह खुला दिखता। उन दोनों को नमकीन देने को ठीक उनके मुँह के सामने इस तरह झुकती थी कि उनकी छातियां चूचुक तक दिखाई देती थीं।

रूपेश से न रहा गया तो उनको पकड़ा तो उसके ऊपर इस तरह गिरीं कि हाथ उसके लण्ड पर रख दिया फिर उठती हुई बोलीं- “तसल्ली रखो लाला जी…”

अबकी बार सामने और बेतकल्लुफी से बैठीं। टांगें चौड़ाये दोनों पैर सोफे पर रख लिये। टांगों के ऊपर की साड़ी ऊपर हो गई की नीचे की नीचे गिर गई थी। सामने चूत को केवल सिलिकन अंडरवेर ढके हुये थी जिसके ऊपर एक धब्बा उभर आया था। दो एकदम फक्क गोरी सुडौल रानें उनके बीच फँसी हुई पतली खाली पट्टी… वह दोनों उत्तेजित होने लगे थे। लण्ड उठने लगे थे जिनको वह बड़े ध्यान से देख रही थीं।

राकेश कहने लगा- “भाभी, तुम गजब हो, ऐसी चीज़ को अग्रवाल कैसे छोड़कर चले जाते हैं?”

मिसेज़ अग्रवाल- “जाने के पहले अपनी पूरी कसर निकाल लेते हैं, बाकी आने पर पूरी कर लेते हैं। हाथ लगाने से दुख रही है। पहले से तुम लोगों से वायदा न किया होता तो आज मैं आराम कर रही होती…”

रूपेश ने कहा- “भाभी ऐसा भी क्या तड़पाना? ना ही छुपाते हो ना ही मुँह दिखाते हो…”

मिसेज़ अग्रवाल ने आँख नचाई- “मुँह दिखाई की रश्म होती है…”

राकेश उठते हुये- “लो मैं रश्म पूरी किये देता हूँ…”



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*****To Be contd... ... ....

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अबकी बार सामने और बेतकल्लुफी से बैठीं। टांगें चौड़ाये दोनों पैर सोफे पर रख लिये। टांगों के ऊपर की साड़ी ऊपर हो गई की नीचे की नीचे गिर गई थी। सामने चूत को केवल सिलिकन अंडरवेर ढके हुये थी जिसके ऊपर एक धब्बा उभर आया था। दो एकदम फक्क गोरी सुडौल रानें उनके बीच फँसी हुई पतली खाली पट्टी… वह दोनों उत्तेजित होने लगे थे। लण्ड उठने लगे थे जिनको वह बड़े ध्यान से देख रही थीं।

राकेश कहने लगा- “भाभी, तुम गजब हो, ऐसी चीज़ को अग्रवाल कैसे छोड़कर चले जाते हैं?”

मिसेज़ अग्रवाल- “जाने के पहले अपनी पूरी कसर निकाल लेते हैं, बाकी आने पर पूरी कर लेते हैं। हाथ लगाने से दुख रही है। पहले से तुम लोगों से वायदा न किया होता तो आज मैं आराम कर रही होती…”

रूपेश ने कहा- “भाभी ऐसा भी क्या तड़पाना? ना ही छुपाते हो ना ही मुँह दिखाते हो…”
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मिसेज़ अग्रवाल ने आँख नचाई- “मुँह दिखाई की रश्म होती है…”

राकेश उठते हुये- “लो मैं रश्म पूरी किये देता हूँ…”

मिसेज़ अग्रवाल जल्दी से उठते हुये- “ना ना पहले दूल्हे मियां को तो देखने दो…” वह रूपेश और राकेश के बीच मैं सटकर बैठ जातीं है। दोनों तरफ हथेलियों से दोनों लण्ड थाम लेती हैं।

राकेश कमर में हाथ डालकर अपनी तरफ खींच लेता है।

वो सामने से छातियां पूरी गड़ा के कस के चिपक जाती हैं, उसके होंठों को अपने होठों से दबा लेती हैं और नीचे हाथ डालकर उसका लण्ड बाहर निकाल के फुसफुसाती हैं- “ये तो बहुत ज्यादा दबंग है…”

राकेश पीठ पर ब्लाउज़ के बटन और ब्रेजियर के हुक खोल देता है। रूपेश उठकर के उनकी साड़ी खींच लेता है और आगे हाथ डालकर नाड़ा खोल के पेटीकोट खींच लेता है। वह उतारने के लिये पैंटी पकड़ता है कि मिसेज़ अग्रवाल उठकर के खड़ी हो जाती हैं- “इसको अभी रहने दो…”

उनका पूरा बदन दमकता है। उम्र के बावजूद उनकी भरी-भरी छातियां गोल-गोल और सख्ती से खड़ी हुई हैं। खाली घुंडियां तन करके आधा इंचा ऊँची हो गईं। बदन पर कोई थुलथुल मांस नहीं। वो बोलीं- “पहले आप लोगों की बारी है…”

इसके साथ ही वह राकेश का पैंट उतारने को बढ़ती हैं लेकिन इसकी जरूरत नहीं पड़ती। वह दोनों अपने-अपने कपड़े उतार फेंकते हैं। दोनों का तन्नाया लण्ड खड़ा होता है।

मिसेज़ अग्रवाल के मुँह से निकल जाता है- “हे मां, आप दोनों तो एक दूसरे से होड़ ले रहे हैं मैं कैसे लूगी ये?”

उत्तेजना में राकेश उनको बांहों में बाँध लेता है। वह राकेश को लिये हुये सोफे पर गिर जाती हैं फिर फिसला कर नीचे कालीन पर घुटने के बल बैठ जाती हैं। राकेश के लण्ड की सुपाड़ी खोलकर अपने होठों मैं दबाकर उसको चूसने लगती हैं। राकेश का शरीर एकदम तन जाता है।

रूपेश पीछे से उनकी चूचियां जकड़ लेता है तो दूसरा हाथ बढ़ाकर वह उसका लण्ड पकड़ लेती हैं और लण्ड पकड़े हुये राकेश के बगल में बैठा लेती हैं। राकेश को अब पूरा का पूरा निगलती जाती हैं और रूपेश के लण्ड की मुट्ठी मारती जाती हैं। मिसेज़ अग्रवाल ने दोनों गोलाइयां राकेश के पैरों पर दबा ली हैं। राकेश हाथ डालकर उनकी चूचियों को मुँह और हथेलियों में ले लेता है और अपने होंठ उनकी चिकनी सुडौल पीठ पर चिपका देता है।

मिसेज़ अग्रवाल की घुटी-घुटी चीख निकल जाती है। वह बुदबुदाती जाती है जिसमें आनंद मिला हुआ है। वो पीछे से पैंटी के अंदर हाथ ले जाके बीच की उंगली उनकी चूत के अंदर कर देता है जो तर हो रही है। मिसेज़ अग्रवाल एकदम उछल जाती हैं, राकेश के लण्ड पर दांत गड़ा देती हैं, रूपेश का लण्ड बहुत कस के मुट्ठी में जकड़ लेती हैं। वह दोनों चीख उठते हैं। मिसेज़ अग्रवाल की रफ्तार बहुत तेज हो जाती है साथ ही वह अपनी चूत भी रूपेश की उगली पर ऊपर नीचे करती जाती हैं, क्योंकी रूपेश उंगली ज्यादा अंदर नहीं कर सकता है। तीनों लोग जोर-जोर से आवाजें निकाल रहे हैं।

सबसे पहले मिसेज़ अग्रवाल चिल्लाती हैं- “ओ मांँ… मैं तो गइई…” वह बड़ी जोर से राकेश के लण्ड को चूसती हैं। रूपेश के लण्ड पर कस के मुट्ठी मारती है। वह बड़ी देर तक झड़ती रहती हैं साथ ही जोरों से सीईई… की आवाज करती रहती हैं।

राकेश अपना गाढ़ा रस उनके मुँह में उगल देता है।

रूपेश की धार हवा में फौवारे की तरह छूट जाती है।

मिसेज़ अग्रवाल अपना मुँह हटा लेती हैं। रिस-रिस करके सफेदी नीचे गिरती जाती है। मिसेज़ अग्रवाल ने सोफे पर दोनों के बीच बैठकर उनके सिर को अपनी छातियों से चिपका लिया। तीनों देर तक निढाल से पड़े रहे। फिर दोनों को चूमकर उन्होंने बेडरूम में चलने को कहा।

बेडरूम में शानदार किंग साइज़ का बेड पड़ा था और एक दीवाल पर सोफे लगे हुये थे। मिसेज़ अग्रवाल बाथरूम से आकर बोलीं- “अब मैं अपनी दिखाने को तैयार हूँ… लेकिन दूंगी तब जब आप अपनी मस्त चुदाई की कहानी सुनायेंगे…”

राकेश और रूपेश वैसे ही नंग-धड़ंग सोफे पर बैठ गये थे। उनके सामने पलंग पर बैठकर मिसेज़ अग्रवाल ने एक झटके से अपनी कच्छी खींचकर उतार दी। वह उनके जूस से तर हो रही थी। फिर उन्होंने उंगली में घुमाकर उन लोगों की ओर फेंका।

वह रूपेश के मुँह पर पड़ी। उसने बड़े प्यार से मस्ती से उसे चूमा और लंबी सांसों से सूँघा।

मिसेज़ अग्रवाल ने टांगें चौड़ी कर दीं। माई गोड… डबलरोटी की तरह फूली उनकी फुद्दी थी एकदम सफाचट… पैर फैलाने से संतरे की फांक से होंठ खुल गये थे, बीच में तितली सी क्लिटोरिस उठी हुई थी और उसके नीचे चूत का छेद खुला हुआ था, एकदम गुलाबी, गहराई तक गीला और चमकता हुआ। एकदम पकी हुई प्रौढ़।

रूपेश के मुँह से निकल गया- “ओ माई गोड ऐसी चूत तो मैंने आज तक नहीं देखी…”

दोनों के लण्ड जो उठे हुये थे तन्नाकर सीधे ऊपर हो गये। उठकर वे पलंग की तरफ बढ़े।

मिसेज़ अग्रवाल ने टोका- “पहले सुनीता और रजनी की चुदाई की बातें…”


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“अभी बताते हैं…” उन्होंने कहा।

पर राकेश ने उनको पलंग पर खींच लिया और टांगें दोनों ओर कर अपना मुँह उनकी चूत के ऊपर रख दिया। होठों के बीच क्लिट लेकर चूसने लगा।

मिसेज़ अग्रवाल के मुँह से किलकारी निकल गई। रूपेश ने सिरहाने पहुँचकर उनकी एकं चूची मुँह में ले ली और दूसरी हथेली में कस के दबा ली। उसका बड़ा सा लण्ड मिसेज़ अग्रवाल के मुँह के सामने लाटक रहा था जो उन्होंने आगे बढ़कर मुँह में ले लिया। राकेश उनकी चूत को बहुत बुरी तरह से चूस रहा था। उनकी रानों को दोनों हाथों के जोर से पूरा फैला लिया था और अपना मुँह जितना घुसा सकता था घुसा लिया था। बीच-बीच में जीभ उनकी चूत में करता था।

मिसेज़ अग्रवाल अपनी चूत उठा-उठा दे रही थी। रूपेश का लण्ड काफी बड़ा था जो वह पूरा नहीं ले पा रही थीं। लेकिन जब राकेश चूत को चाटता था तो वो सिर ऊंचा करके रूपेश का लण्ड पूरा गपक लेती थीं। गाय की बछिया की तरह चटखारे लेकर चूस रही थीं। चूतड़ बेचेनी से रगड़ रही थीं।

जब राकेश ने फिर से जीभ चलाई तो उन्होंने रूपेश के लण्ड से मुँह खींच लिया- “हुहु ऊऊऊऊ ओ माँ तुमने तो आग लगा दी है। लण्ड डाल दो अपना…”

राकेश- “पर वो चुदाई की कहानी तो…”

“कहानी फिर कभी… पहले मेरीई चुदाई…” और उन्होंने खुद उसका लण्ड पकड़कर चूत पर लगाया और चूतड़ उठाकर के गप्प से अंदर ले लिया। फिर बोलीं- “लगाओ धक्के कस-कस के…”

राकेश ने तीन चार बार उनको कस-कस के पेला। हर झटके पर वह और जोर से लगाने को उकसाती थीं। राकेश ने लण्ड बाहर निकाल लिया और उनसे कहा- “आप घुटनों के बल उकड़ू हो जाइये, मैं पीछे से लगाऊँगा। आगे से आप रूपेश का लण्ड ले लीजिये…”

मिसेज़ अग्रवाल पलट के घुटनों और बांहों के बल उकड़ू हो गईं। पीछे से राकेश ने लण्ड लगाया। जैसे ही पेला वह सड़ाक से उनकी चूत में घुस गया। उसने हाथ डालकर उनकी दोनों चूचियां पकड़ लीं। रूपेश उनके ठीक मुँह के सामने लण्ड तन्नाके खड़ा था।

मिसेज़ अग्रवाल ने एक मुट्ठी में लण्ड पकड़ के मुँह में ले लिया। राकेश चूचुकों को ऊँगालियों में रगड़-रगड़ के लण्ड अंदर-बाहर शंट कर रहा था। हर चोट पर मिसेज़ अग्रवाल का धड़ आगे हो जाता था और रूपेश का लण्ड उनके तालू तक घुस जाता था। जितनी चूत पर चोट पड़ती थी उतनी ही तेजी से वह रूपेश के लण्ड को मुँह में ले रही थीं। रूपेश अपने दोनों हाथों से उनके दोनों गोल-गोल चूतड़ मजबूती से जकड़े था और अपना लण्ड ऐसे पेल रहा था जैसे चूत में धकापेल कर रहा हो। उसकी जकड़ से मिसेज़ अग्रवाल की पीछे की दरार फैल गयी थी। आगे पीछे गति से सटासाट हो रहा था।

मिसेज़ अग्रवाल पूरी तरह आनंद में थीं- “ओ मेरी मां… दो-दो लण्ड मेरे अंदर हो रहे हैं। इतना मजा ता मैंने कभी नहीं लिया…”

राकेश और रूपेश के ऊपर वासना का भूत सवार था। राकेश पूरा लण्ड घच्च से घुसेड़ता और आवाज निकालता- “ले, पूरा ले ले…”

रूपेश आगे बढ़ के मुँह में घुसेड़ देता- “ले, मेरा ले अब…”

मिसेज़ अग्रवाल अलग से चिल्ला रही थीं- “हाँ हाँ लगाओ, छोड़ना नहीं आज इसको फाड़ के रख दो पूरा…”

राकेश ने गति बढ़ा दी। एकाएक चिल्लाया- “मैं झड़ा… लो लो लो और लो…”

मिसेज़ अग्रवाल- “नहीं नहीं, अभी मत झड़ना। इस को फाड़ के रख दो… मेरे को बीच में मत छोड़ो…”

लेकिन राकेश ने सफेदी उगलना चालू कर दी थी।

मिसेज़ अग्रवाल ने जल्दी से अपनी चूत बाहर खींच ली।

राकेश को किसका कर रूपेश तेजी से उस ओर आया। कमर में हाथ डालकर उसने मिसेज़ अग्रवाल को चित्त कर दिया और अपना लण्ड धपाक से पेल दिया। राकेश ने जबर्दस्त चुदाई की थी। वह बुरी तरह पशीने से लथफथ था। वो बाथरूम में घुस गया।

मिसेज़ अग्रवाल ने रूपेश को कखींचकर कसके भींच लिया। दोनों बाहें उसकी पीठ पर बाँध लीं और टांगें उसकी कमर के इर्द-गिर्द जकड़ लीं, और बोलीं- “ओ मेरे लाला, अब मेरी इसकी पूरी मरम्मत कर दो…”

रूपेश ने बाहर करके अचानक धक्के से अंदर करते हुये कहा- “लो भौजी, तुम भी क्या याद रखोगी किस लौड़े से पाला पड़ा था…”

बिसात बिछी हुई थी, खेल चालू था। दोनों एक दूसरे से चिपके हुये चुदाई किये जा रहे थे और बतिया रहे थे।

मिसेज़ अग्रवाल- “हाँ, लौड़ा तो तुम्हारा जबर्दस्त है। अंदर तक धुनाई कर देता है। आज तो मजा आ गया, पहले वनीला अब चाकलेट आइसक्रीम…”

रूपेश- “और अग्रवाल साहब क्या हैं?”

मिसेज़ अग्रवाल- “इटैलियन बार क्रंची और मजेदार…”

रूपेश- “और कितने स्वाद चखे हैं?”

मिसेज़ अग्रवाल- “बहुत पहले चखा था देसी बरफ, पत्थर की तरह। बड़ी तकलीफ हुई थी…”

रूपेश- “कम आन भौजी, इतनी चटोरी चीज़ और स्वाद न ले…”


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मिसेज़ अग्रवाल के चेहरे पर झेंप फैल गई- “जाओ भी तुम बहुत तेज हो। चख लेतीं हूँ दूसरा स्वाद कभी-कभी। लेकिन दो स्वाद एक साथ कभी नहीं चखे। पर खाती मज़े से हूँ और खूब खाती हूँ…”

रूपेश- “हाँ… मैं तो चीज़ देख के ही जान गया हूँ बेमिशाल। मैंने तो ऐसी कभी नहीं चखी…”

मिसेज़ अग्रवाल- “ऐसे कितनी चखी हैं?”

रूपेश “चख लेता हूँ कभी-कभी…”

मिसेज़ अग्रवाल- “बहुत शातिर हो…” और उसको कस के चूम लेती हैं फिर कहतीं हैं- “लेकिन ये चाकलेट क्यों पिघल रही है?”

रूपेश- “ना भौजी, इसमें बड़ा दमखम है…” उसने उकड़ू बैठ के दूर तक लण्ड बाहर करके गप्प से घुसेड़ दिया। हर वार पर उसका पेड़ू धप्प से खुली चूत पर पड़ने लगा। उसने दोनों हथेलियों में दोनों उभारों को भर लिया और बुरी तरह गूंधने लगा।

मिसेज़ अग्रवाल की उत्तेजना आने में देर नहीं लगी। उन्होंने सिसकना शुरू कर दिया।

रूपेश का लण्ड और तेजी से चूत में होने लगा।

मिसेज़ अग्रवाल हिस्टिरिक हो चुकी थीं। उन्होंने जोरों से रूपेश के सीने में सिर छुपा लिया। अपने दांत रूपेश के उभरे चूचुक पर गड़ा दिये। वह जोर-जोर से आवाज निकाल रही थीं- “हाँ हाँ लगाओ… और मारो… फाड़ डालो मेरी बुर को… देखें कितना जोर है लौड़े में…”

रूपेश भी जावाब दे रहा था- “ले और ले आज तक तुमने इटालियान बरफ ही खाई है आज जंबो चाकलेट का मजा चख…”

दोनों का बहसीपन बढ़ता ही गया। रूपेश लगाता गया मिसेज़ अग्रवाल लेती गई। रूपेश ने अंगूठा ले जाके जैसे ही क्लिटोरिस पर रखा, मिसेज़ अग्रवाल झड़ गईं। वो चिल्लाईं- “ये लाला, ये क्या किया? ऊऊऊऊ… मैं तो… हे राम मैं क्या करूं?” और उनकी चूत हवा में उठ गई।

रूपेश ने उनकी कमर पकड़ के बड़ी तेजी से लण्ड चूत में आगे पीछे किया। फिर वह भी चिल्लाया- “लो भौजी, मैं भी ख़लास्स हुआ…”

मिसेज़ अग्रवाल ने हाथ से पकड़ के उसका लण्ड बाहर खींच दिया। वह उनकी चूत के ऊपर बड़ी देर तक रस उगलता रहा।

राकेश बाथरूम के दरवाजे से यह नजारा देख रहा था उत्तेजित भी थोड़ा हो रहा था।

मिसेज़ अग्रवाल निढाल पड़ी थीं। बोली- “तुम लोग तो गजब के चोदू हो। लगता है सुनीता और रजनी भी बड़ी चुदैल हैं…” फिर अपनी चूत पर हाथ रखते हुये वह बोलीं- “ओ माँ ये तो भुस बन गई है हाथ लगाने से दुखती है। मैं तो अब पूरी तरह संतुष्ट हो गई हूँ। कुछ दिन इसको छेड़ूंगी भी नहीं। तुम लोग फ्रेस हो लो। चलो मैं तुम लोगों के लिये गरमा-गरम काफी बनाती हूँ। फिर तुम्हारी कहानी सुनेंगे…”


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***** to be Contd... ....

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