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मस्ती एक्सप्रेस_Masti Express COMPLETE

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संगीता अग्रवाल की कहानी

राकेश और रूपेश को चिपकते हुये मिसेज़ अग्रवाल बोलीं:

मैं अपनी कहानी सुनाती हूँ। यह मेरी पहली खराबी की कहानी तो नहीं है लेकिन मेरी प्यार की पहली चुदाई की कहानी है जिससे शरीर और मन को बड़ी संतुष्टि मिली थी। बात उन दिनों की है जब हम लोगों को पैसे की काफी तंगी थी। इन्होंने अपना नया काम शुरू किया था। अमित बेटा करीब 6 साल का था। हम लोग दिल्ली में तीसरे मंजिल की एक बरसाती में रहते थे। कुल एक कमरा था और बस खुली हुई छत जिस पर किचेन और बाथ। सास-सासुर साथ में रहते थे। चुदाई का मौका ही नहीं मिल पाता था। कभी कभार ही चुदाई हो पाती थी वह भी जल्दी-जल्दी।

शरीर में सेक्स की भूख सी भरी रहती थी जिसको अग्रवाल साहब और उभार देते थे। वह सेक्स में माहिर थे और चुदाई में मज़ा करने की उन्होंने आदत डाल दी थी।

मकान मालिक एक बूढ़े दंपति थे जो नीचे की मंजिल पर रहते थे। दूसरी मंजिल काफी हवादार थी। तीन कमरे थे, छत थी। इस मंजिल में एक कम्पनी का बड़ा आफिसर रहता था। जवान मियां बीवी थे, बीवी दूसरे शहर में काम करती थी। छुट्टी में वह आ जाती थी या फिर मियां वहां चला जाता था। वह भी अग्रवाल ही थे, नाम थे शेखर और माया। शेखर सुदर्शन था, कद-काठी से अच्छा, देखने में खूबसूरत, लंबा। माया भी ठीक थी लेकिन ऐसी कोई खास बात नहीं। दोनों ही खुशमिजाज थे।

मकान मालिक और शेखर माया से हम लोगों की अच्छी मेल मुलाकात होती रहती थी। साथ-साथ ताश खेलते थे। एक दूसरे से खुलकर मजाक करते रहते थे।

शेखर मुझे संगीता भाभी और मेरे पति को भाई साहब कहकर बुलाता था। मेरे सास-ससुर का आदर करता था, उन्हें आये दिन घुमाने ले जाता था क्योंकी मेरे पति का काम नया होने से काफी व्यस्त रहते थे। अमित के लिये भी चाकलेट और गिफ्ट लाता था। अमित उससे काफी घुलमिल गया था। मेरे सास-ससुर उसको बड़ा पसंद करते थे। जब भी घर में कोई खास चीज़ बनती थी तो उसको भिजवाते थे। मैं देने जाती थी तो वह काफी हिचक दिखाता था। मैं खाना अच्छा बनाती थी और उसको मेरा खाना बेहद पसंद था।

लेकिन एक बात मैं देखती थी। जब मैं छत पर कपड़े डालने या किसी और काम के लिये होती थी तो शेखर मुझे घूरता रहता था। उसके कमरे की खिड़की से छत एकदम सामने पड़ती थी। उसकी आँखों में वासना साफ नजर आती थी। वह भी भूखा ही रहता था।

मैं जानबूझ कर लापरवाह रहने लगी जैसे मुझे मालूम ही न हो। अपना पल्लू गिरा देती और रस्सी पर कपड़े डालने के लिये पंजों के बल खड़ी होकर दोनों हाथ ऊपर तान देती जिससे मेरी चूचियां उसके सामने एकदम खड़ी हो जातीं। कभी मैं अकेले पेटीकोट में आ जाती और उसकी तरफ चूतड़ करके पैर फैलाकर झुक जाती जिससे मेरी दोनों गोलाइयां और बीच की दरार उसके सामने आ जाये।

इस तरह से खिझाने में तो मुझे हमेशा से मजा आता है। जितनी ही उसकी वासना भड़काती उतना ही ज्यादा मजा आता था। मेरी तबीयत खुश रहती थी। जब कभी इनसे चुदाई कराती थी तो उसमें भी ज्यादा मजा आता था। कई बार तबीयत होती कि नंगी ही छत पर आ जाऊँ या कम से कम ब्रा और पैंटी में चली जाऊँ लेकिन इतनी हिम्मत नहीं पड़ती थी। जब भी मिलते थे तो अब ज्यादा मजाक करने लगे थे। मजाक में सेक्स का पुट भी आने लगा था।

अग्रवाल साहब को भी यह सब कुछ बुरा नहीं लगता था। वह शेखर को पसंद करते थे। मैं भी ज्यादा खुल गई थी। जब तब सेक्स का तीर छोड़ देती थी। जैसे एक शाम मकान मालिक के यहां सब लोग ताश खेल रहे थे। पड़ोस के और भी मियां-बीवी आ जाते थे।


बाजी हारने पर मेरे मुँह से निकल गया- “मैं लूज हो गई…”

शेखर शरारत से बोला- “अरे भाई साहब ने इतनी जल्दी लूज कर दिया…”

मैं भी कहां चूकने वाली थी- “तुम्हारे बस का तो है नहीं किसी को लूज करना…”


और सब हँस दिये जिनमें मेरे पति भी शामिल थे।

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खेल में मैं और शेखर पार्टनर रहते थे। खूब घुलमिल गये थे, खुलकर हँसी मजाक करते थे। लेकिन मैं शरारत से बाज नहीं आती थी। जितना मैं शेखर को निसहाय पाती उतना ही मैं बोल्ड होती जा रही थी। खेल में उसके सामने बैठती। जब मौका पाती सबकी निगाह बाचाके अनजानी बनकर पल भर के लिये अपनी टांगें इस तरह खोल देती कि उसे मेरी कच्छी तक दिख जाये। कभी-कभी तो मैं कच्छी भी न डालती और फट्ट से टांगें चौड़ा देती कि उसे अंदर का नजारा दिख जाये, लेकिन सेंटर पीस न दिखे।

उसके चेहरे पर तनाव उभर आता, आँखें जलने लगती और वह ताव खाकर रह जाता। अजीब बात थी कि पति बगल में बैठा होता था और मैं चूत किसी और को दिखाती थी। लेकिन देर सबेर जब पति से चुदवाने को मिलता था तो ज्यादा आनंद आता था।

इन दिनों शेखर के लिये मुझे तरह-तरह का खाना बनाना बहुत अच्छा लगता था। कभी-कभी जो कम चीज़ हो तो खुद न खाती थी उसको दे देती थी। मैं खाना लेकर कम जाती थी क्योंकी जब मैं उसके सामने अकेली होती थि तो इतनी उत्तेजित हो उठती थी कि मेरी चूत गीली हो जाती थी। ज्यादातर मैं अमित से खाना भिजवा देती थी। चूत की जब प्यास मिटी होती थी तब ही जाती थी और जल्दी से वापिस आ जाती थी। उसका ख्याल रखने में मुझे कुछ-कुछ सेक्स का शुख मिलता था।

ताश के समय बड़ा ही हलका-फुलका माहौल रहता था। किसका बर्थ-डे है, किसकी हालगिरह है सब बातें होती रहती थीं, साथ में वधाइयां भी और पार्टी का इसरार भी। ऐसे ही एक बार मेरी बर्थ-डे पर सबने खूब वधाइयां दी, शेखर ने जिद की कि मैं तो पार्टी लेकर ही रहूँगा।

शेखर की बात रखने के लिये दूसरे दिन मैंने खीर पकवान बनाये। सबसे पहले उसके लिये ही लेकर गई। शेखर के सामने खाना रखते हुये मैं बोली- “लो बर्थ-डे की पार्टी…”

वह बोला- “भाभी तुम्हारे जैसा नहीं देखा… फाइव स्टार रोस्टोरेंट में पार्टी होना चाहिये…”

जैसे उसने मेरी दुखती नश पर हाथ रख दिया हो, मेरी आँखों में आंसु आ गये- “लाला तुम जानते हो कि तुम्हारी भाभी गरीब है इसलिये मजाक उड़ाते हो…”

शेखर ने अपने दोनों कान पकड़ लिये- “भाभी, ये क्या कहती हो? इतनी खूबसूरती की मालकिन इतने गु्णों वाली कैसे गरीब हो सकती है? तुम्हारे देवर में जब शामर्थ है तो तुम कैसे गरीब हो? मुझे अपना देवर मानती हो तो आगे से अपने को गरीब मत समझना…”

आगे बढ़ कर भावना में मैंने उसे अपने से चिपका लिया। वह कुर्सी पर बैठा था। उसका सिर मेरी दोनों टांगों के बीच में फँस गया… ठीक मेरी बुर के ऊपर। मुझे ध्यान आया तो मैं वहां से भाग आई।

इसके बाद हम लोगों का रवैया बदल गया। शेखर अमित के लिये ढेर सारी चीजें लाता। अमित उसके वहुत नजदीक हो गया। उसके घर में ही एक कमरे में पढ़ने का ठिकाना बना लिया। एक चाभी उसने हमें दे दी थी। मेरे लिये भी शेखर तरह-तरह की गिफ्टे लाता। मैं भी उसका ख्याल रखने लगी थी। घर साफ कर देती, चीजें जमा देती, बिस्तर बदल देती जिसकी तरफ से वह लापरवाह था और माया ही आने पर कुछ-कुछ कर पाती थी। अब मुझमें सकुचाहट आ गई थी और उसमें खुलापन।

एक बार उसने एक पैकेट मुझे दिया और कहा- “भाभी तुम्हारे लिये…”

अपने बाथरूम में जाकर खोला क्योंकी वही एक अकेली जगह होती थी। बड़ी मंहगी और खूबसूरत ब्रेजियर और पैंटी के 6-6 आइटम थे। मन तो बहुत खुश हुआ लेकिन नीचे आकर मैंने शेखर से कहा- “भाभी को ऐसी गिफ्ट दी जाती है कहीं…”

वह बोला- “भाभी आपके पास अच्छी ब्रा और पैंटी नहीं है इसलिये सोचा दे दूं…”


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बाकई मेरे पास बहुत ही सस्ती ब्रेजियर थीं। इसका मतलब है उसने सूखने डाले अंदर के कपड़े अच्छी तरह देख लिये थे। तब तो उसने यह भी देख लिया होगा कि मेरी पैंटियों का चूत के सामने वाला भाग कैसा काला हो गया है। सोचकर बड़ी शरम सी आई।

उसने पूछा- “आपको अच्छा नहीं लगा?”

मेरे मुँह से निकल गया- “बहुत अच्छी गिफ्ट है…”

वह शरारत से बोला- “क्या पता? अगर पहन कर दिखाओ तब पता लगे…”

मैंने आँखें ततेर कर कहा- “क्या?”

वह पीछे हट गया- “सारी भाभी…”

लेकिन मेरे बदन में सिहरन दौड़ गई चूत में फुरफुरी हो आई फिर भी बोल गई- “वो मैं अग्रवाल साहब के अलावा किसी को नहीं दिखाने वाली…”

एक दिन सोचा कि उसके गद्दे को झाड़ दूं। गद्दे को उठाया तो कई मैगजीन रखी थीं। कवर पर ही औरत की नंगी फोटो। एक को उठा के देखा तो आँखें खुली की खुली रह गईं। दूसरे पेज पर ही एक पूरी नंगी औरत दोनों ऊँगालियों से चूत खोले हुये लेटी थी और सामने एक नंगा आदमी खड़ा था जिसका बड़ा सा लण्ड तनकर खड़ा था। आगे वाले पेज में तो इससे भी बढ़कर था। औरत आदमी का आधा लण्ड लील चुकी थी। पूरी मैगजीन में एक से बढ़ कर एक दृश्य थे। ओ मां साथ में जो कहानियां थीं चुदाई का पूरा सचित्र वर्णन। सोचा मैगजीन को वहीं रख दूं। लेकिन छोड़ी ही नहीं गई। मैं वहीं शेखर के बेड पर लेट गई। पढ़ते-पढ़ते न जाने कब अपनी चूत सहलाने लगी। मैगजीन पूरी भी न कर पाई। जब एक कहानी का नायक बुरी तरह से नायिका को पेल रहा था और वह चिल्ला रही थी।

तो मैं अपनी चूत को बुरी तरह से रगड़ रही थी। शरीर ऐंठ गया था। चूचियां तन गई थीं। मैं अपनी बुर में लण्ड चाहती थी। उसी वक्त लण्ड लेने को छटपटा रही थी। उस रात मेरी चुदाई न होती तो मैं शायद अपने को न रोक पाती और रात मैं ही शेखर के पास आ जाती।

जब अग्रवाल साहब ने अपना लण्ड घुसेड़ा तो मैंने उन्हें कस के भींच लिया और खलास हो गई। ऐसा बहुत कम होता था। मुझे झड़ने में बड़ा समय लगता था। कई बार तो बगैर झड़े रह जाती थी। उनको भी बड़ा ताज्जुब हुआ।

यह शेखर के बारे में नई बात जानी थी। मुझे भी उन नंगी फोटो और चुदाई की कहानियां पढ़ने की लत लग गई। बहुत सोचती नहीं पढ़ूँगी लेकिन जब भी बेड ठीक करने जाती तो उसी के बिस्तर पर लेकर बैठ जाती। उसके बाद चूत में जो आग लगती उसे बुझाने के लिये अग्रवाल साहब का लौड़ा लेने के लिये जतन करने पड़ते। तबीयत होती शेखर के पास जाकर प्यास बुझा आऊँ।

जब कभी नई मैगजीन न पा पाती तो बड़ी बेचैन रहती। सेाचा शेखर के अंडरवेर बनियान भी क्यों न धोकर डाल दूं पूरे हफ्ते के जमा हो जाते हैं। जब अंडरवेर साफ कर रही की तो देखा कइयों पर झड़ा हुआ वीर्य सूख गया है। उस पर साबुन लगाते समय कंपकंपी आ गई।


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***** To be contd... ...

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यह शेखर के बारे में नई बात जानी थी। मुझे भी उन नंगी फोटो और चुदाई की कहानियां पढ़ने की लत लग गई। बहुत सोचती नहीं पढ़ूँगी लेकिन जब भी बेड ठीक करने जाती तो उसी के बिस्तर पर लेकर बैठ जाती। उसके बाद चूत में जो आग लगती उसे बुझाने के लिये अग्रवाल साहब का लौड़ा लेने के लिये जतन करने पड़ते। तबीयत होती शेखर के पास जाकर प्यास बुझा आऊँ।

जब कभी नई मैगजीन न पा पाती तो बड़ी बेचैन रहती। सेाचा शेखर के अंडरवेर बनियान भी क्यों न धोकर डाल दूं पूरे हफ्ते के जमा हो जाते हैं। जब अंडरवेर साफ कर रही की तो देखा कइयों पर झड़ा हुआ वीर्य सूख गया है। उस पर साबुन लगाते समय कंपकंपी आ गई।

शाम को जब उसने देखा कि मैंने अंडरवेर बनियान भी धोये हैं तो उसे बहुत खेद हुआ। उसने बड़ा जोर लगाया कि मैं ऐसा हर्गिज न करूं, लेकिन मैं भी जिद पर अड़ गई कि इसमें कोई बुराई नहीं। जब भी मैं अंडरवेर साफ करती किसी न किसी पर झड़ने के दाग होते। बेचारा वाकई औरत के लिये भूखा था। मैं उससे बाहर-बाहर के मजाक के लिये तो तैयार थी लेकिन चुदवाना केवल अग्रवाल साहब से चाहती थी। मैं उसके लिये कुछ नहीं कर सकती थी।

संबंध दोनों परिवारों में गहरे हो गये थे। माया और मेरे परिवार के सब लोग एक दूसरे को पसंद करते थे। लेकिन मैं शेखर की तरफ रोमांटिक तौर पर महसूस करती थी और शायद वह भी। एक बार उसके दफ्तर में पार्टी थी। उसने अग्रवाल साहब के सामने ही मुझसे पूछा- क्या मैं उसके साथ पार्टी में चल सकती हूँ?

अग्रवाल साहब ने ही कहा- इसमें पूछने की क्या बात है?

शेखर के साथ पहली बार अकेली जा रही थी पार्टी के लिये के लिये तो मैं अच्छी तरह से सजी-संवरी। नीचे आई तो शेखर टकटकी बाँधकर देखता ही रह गया। उसने मेरा हाथ थाम लिया। दबाते हुये धीरे से बोला- “भाभी तुम बाकई बहुत खूबसूरत हो…”

सुनकर बड़ा प्यारा लगा। मैं उससे और सट गई।

आलीशान पार्टी थी एकदम भव्य। मेरा हाथ पकड़कर खींचता प्रेसिडेंट, वाइस-प्रेसिडेंट के पास ले गया। बड़े अधिकार से बोला- “ये संगीता है…”

मैं मुँह देखती रह गई। कहां तो भाभी-भाभी कहते जबान नहीं थकती थी अब सीधा संगीता पर उतर आया लेकिन भाया बहुत। अपने साथियों से बड़ी बेतकल्लुफी से उसी तरह मिलवाया- “संगीता से मिलो…”

जल्दी ही समझ में आ गया कि पार्टी में पति-पत्नियों को बुलाया गया था और शेखर मुझे अपनी पत्नी की तरह मिलवा रहा है हालांकि मुँह से नहीं कह रहा है। अकेला होने पर मैंने उससे कहा- “मुझसे क्यों झूठ कर रहे हो?”

वह बोला- “मैं सबको दिखाना चाहता हूँ कि मेरी बीवी भी किसी से कम खूबसूरत नहीं है…”

मैं- “लेकिन मैं तो शायद उम्र में भी तुमसे बड़ी हूँ, एक बच्चे की मां हूँ…”

शेखर- “तुम्हें देखकर कौन कह सकता है। देखो वह औरतें तुमसे ज्यादा बड़ी दिख रही हैं। तुम बिल्कुल कमसिन हो…”

मेरे बदन में रोमांचा हो आया। तबीयत हुई कि उसको जकड़ के चूम लूं। बस हाथ पकड़कर उससे सथ गई। शेखर की पोजीशन अच्छी थी। उसके जूनियर की बीवियां मेरे आगे पीछे घूम रही थीं। मैं बड़ा गौरव महसूस कर रही थी।

पार्टी तो मेरी जान है। मुझे माहौल मिल गया था और मैं बहुत ईजी महसूस कर रही थी। डांस चालू हुआ तो उसमें खूब भाग लिया। लोग तारीफ कर रहे थे। पार्टनर के संग डांस में शेखर से एकदम चिपक गई, दूसरी बीवियों से भी ज्यादा। मेरी छातियां उसके सीने में घुसी जा रही थीं। मैंने अपनी दोनों रानें उसकी जाघों से चिपका दीं। टांगों के बीच के गड्ढे को उसकी टांगों के ऊपर के उभार से सटा दिया और डांस की थिरकन के साथ रगड़ने लगी।

शेखर के लण्ड मियां रंग लाने लगे थे और मेरी बुर के दरवाजे पर दस्तक देने लगे थे। लेकिन समय की नजाकत को देखते हुये सब्र करके मैंने अपने बीच थोड़ा फासला कर लिया। पार्टी खतम होने तक मेरी हिचकिचाहट जाती रही थी। घर लाने की जगह वह कहीं और ले जाकर पति का अपना असली हक वसूला करना चाहता तो मैं तैयार थी। लेकिन उसने जरूरत से ज्यादा सराफत दिखाई और मैं रात भर तड़पती रही। पर पार्टी से मैं खुश थी, मेरा सजना-सवंरना सार्थक हो गया था।

दूसरे दिन मैंने निश्चित कर लिया कि मैं शेखर से लगवाऊँगी, आखिर वह अपना है। दूसरे दिन खाना लेकर गई तो मेरा स्वागत करता हुआ वह बोला- “आइये भाभी…”

मैंने व्यंग से कहा- “अब भाभी कहते हो, कल तो संगीता-संगीता रटे जा रहे थे…”

शेखर- “वह तो ड्रामा था…”

मैंने चिढ़कर कहा- “हाँ तुम बड़े ड्रामेबाज हो… ढोंगी पति बनते हो पर रोल भी पूरा नहीं करते…”

शेखर- “हाँ तुम्हारे जैसी एक्टिंगा जो नहीं कर सकता…”

मैं बार बार उसे हिंट दे रही की और वह आगे ही नहीं बढ़ रहा था।

कभी पूरे जोबन सामने कर देती- “आज मैंने तुम्हारी चीज़ पहनी है…” कभी- “ओहो आज तो बेहद गरमी है, मैंने तो नीचे भी कुछ नहीं डाला है…” यहां तक की अपनी पहनी हुई पैंटी भी उसके बिस्तर पर छोड़ आई जिस पर रिसती चूत का पानी लगा था।

लेकिन शेखर ने तो जैसे कशम ले ली थी। जितना वह अंजान बन रहा था उतना ही मैं बेकाबू होती जा रही थी। मैंने सीधा वार करने का सोच लिया।

एक शाम जब वह आफिस से आया तो मैं उसी के बिस्तर पर अधलेटी होकर नंगी मैगजीन पढ़ रही थी। केवल ब्लाउज़ पहन रखा था जिसके नीचे ब्रेजियर नहीं थी और पेटीकोट डाला था जिसके नीचे पैंटी नहीं थी। टांगें मोड़ रखी थीं, जिससे अंदर का काफी कुछ दिखता था। दरवाजा खोलकर शेखर अंदर आया। कुछ देर तक मैं वैसे ही लेटी रही। फिर उठकर खड़ी हो गई। गुस्से से एक फोटो दिखाते हुये बोली- “छीः कैसी गंदी किताबें पढ़ते हो…”

थोड़ी देर के लिये वह सहम गया, धीरे से बोला- “भाभी, मेरी अपनी भी तो जरूरत है…”

मैंने पोज बनाते हुये कहा- “तुम्हारी भाभी क्या इनसे कम है?”

उसकी बोली मैं तलखी आ गई- “भाभी तुम हमेशा खिझाती हो। पहले फ्लर्ट करती हो, फिर पीछे हट जाती हो। पार्टी में भी तुमने यही किया। तुम्हारी वजह से ही मैं भड़का रहता हूँ। ऊपर से कहती हो कि भाई साहब के अलावा आप किसी को भी नहीं दिखा सकतीं…”

मैंने चकित होकर कहा- “जब तुम कह सकते हो कि जब तक देवर है मैं किसी चीज़ की कमी महसूस न करूं तो मैं क्यों नहीं कह सकती कि भाभी भी तुम्हारी हर जरूरत के लिये है…”

शेखर का चेहरा चमक उठा- “तो भाभी फोटो में जो है दिखाओ…”

“मेरी बला से…” और मैं बाथरूम की तरफ भागी।

वह बोला- “अब मैं नहीं छोड़ूंगा…” और दौड़कर बाथरूम में पहुँचने के पहले ही उसने मुझे दबोचा लिया। शेखर ने मुझे पीछे से पकड़ लिया था। उसने दोनों हथेलियों में मेरे दोनों उभार कस के दवा लिये थे और कसके चिपक गया था।


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मैं उसका लण्ड चूतड़ों की दरार पर महसूस कर रही थी। मैंने मुँह पीछे करके उसको चूम लिया। उसने घुमाकर मुझको सामने कर लिया। अपने होंठ मेरे होंठों पर जोर से गड़ा कर चूसने लगा और इतने जोर से जकड़ा कि मेरी पसलियां चरमरा उठीं। फिर एक हाथ सामने लाकर मेरा ब्लाउज़ खोलने लगा।

मैंने कहा- “इसको मत उतारो…”

लेकिन उसने बटन खोलकर उसे अलग कर दिया। अब उसने हाथ पेटीकोट के नाफै पर बढ़ाया।

मैंने मिन्नत की- “प्लीज़्ज़ इसको रहने दो…”

वह बोला- “तुमने मुझे इतना सताया कि अब कोई दया नहीं…” और नाड़ा खींचकर उसने मेरा पेटीकोट नीचे गिरा दिया।

अब मैं बिल्कुल नंगी की। शर्म से एक हाथ से अपने दोनों सीनों को ढक लिया और एक हाथ जहां टांगें मिलती है उसके ऊपर रख लिया। उसने सख्ती से मेरे दोनों हाथ अलग कर दिये। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। जब कुछ देर तक कुछ न हुआ तो मैंने अपनी आँखें खोलीं। वह एकटक मेरे को निहारे जा रहा था।

मैंने कहा- “क्या बात है पहले माया को नहीं देखा क्या?”

लेकिन शेखर तो भरपूर गोलाइयों में डूबा था। दोनों उभार छोटे सख्त खरबूज से जो आगे से मोड़ लेकर ऊपर हो गये थे, जिनके ऊपर चूचुक गहरे बादामी सहतूत से उठे हुये थे। नीचे तराशी जांघें केले के तने सी, उसके बीच में चूत का जबर्दस्त उभार डबलरोटी सा, बाल अच्छी तरह तराशे गये थे एकदम सेव नहीं किये गये थे। बीच से झांकती दो रसभरी नारंगी की फांकें। उसके सामने पूरी औरत खड़ी थी। बाहर से छरहरी अंदर से भरपूर। दमकते शरीर पर पूर्ण गोलाइयां अर्ध-गोल उठे हुये भरे-भरे मांसल नितम्ब जो गद्दे की तरह आदमी का बोझ संभाल सकते थे और सफाचट तने पेट के नीचे जांघों के बीच फूली-फूली खुलने को आतुर जगह।

शेखर सम्मोहित सा मुंह बाये देख रहा था।

संगीता ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखकर झझोड़ा तो उसे सुध हुई। मुँह से निकल गया- “अद्भुत… भाभी तुम बाहर से जितनी खूबसूरत हो अंदर से उससे भी ज्यादा खूबसूरत हो…” और फिर चुंबक सा चिपक गया और चिकनी मांशल कमर में हाथ डालकर ले जाकर बेड पर बिठा दिया। वो अभी भी पूरे कपड़े सूर्तटाई पहने हुये था।

चूमने को झुका तो संगीता ने टाई से पकड़कर खींचते हुये कहा- “मेरे को तो निर्लज्ज कर दिया और खुद बाबूजी बने हुये हैं…” संगीता तो उतारने की जरूरत ही नहीं पड़ी।

शेखर ने खुद सब कपड़े निकालकर एक तरफ फर्श पर फेंक दिये। अब वह संगीता के सामने एकदम नंगा था। संगीता ने उसकी ओर देखा। अच्छी सुदर्शन देह थी। अग्रवाल साहब की तो थोड़ी सी तोंद थी लेकिन शेखर का पेट सफाचट था। अग्रवाल का लण्ड अच्छा खासा था लेकिन शेखर का भी उनसे कम नहीं था, मोटाई में ज्यादा ही होगा। झांट के बाल जरूर बेतरतीब हो रहे थे, जैसे वहां ध्यान न दिया गया हो। शेखर ने बढ़ करके उसे बांहों में ले लिया और धकेलता हुआ उसको बेड पर अपने नीचे गिरा लिया। पहले मुँह पर सब जगह चूमा फिर संगीता के रसीले होंठ अपने होंठों में दबोच लिये।

संगीता ने अपनी बांहों में उसका सिर जकड़ लिया और टांगें थोड़ी चौड़ी कर दीं जिससे शेखर के नीचे के भाग को जगह मिल जाये। शेखर का लण्ड उसको गड़ रहा था।

शेखर नीचे को खिसक गया। संगीता की छोटी-छोटी उभरी चूचियां शेखर को बहुत अच्छी लग रही थीं। वह उनको पूरी मुट्ठी में सहलाने लगा फिर उनको भींचने लगा। संगीता के शरीर में बिजली सी दौड़ गई जो उसकी चूत तक चली गई। वह सिसकने लगी। उसके चूचुक एकदम सख्त हो गये थे। जब शेखर न घुंडियों को ऊँगलियों में मसला।

तो संगीता सीत्कार कर उठी- “उइइईई…” उसकी चूत से पानी निकलने लग गया था।

शेखर ने मुँह नीचे करके एक चूचुक को मुँह में लेकर चूसने लगा और दूसरे को ऊँगलियों से मसल रहा था। यह संगीता के लिये ज्यादा था। वह तो पूरी तरह गर्मा चुकी थी। उसने नीचे हाथ डालके उसका लण्ड पकड़ लिया और खींचकर अपनी चूत पर लगाने लगी।

लेकिन शेखर इतनी जल्दी उसको देना नहीं चाहता था, पहले उसकी चूत से खेलना चाहता था। वह अपने को पीछे कर लेता था। वह सिगीता को खिझा रहा था।

जब वह खींचकर अंदर डालने में कामयाब नहीं हुई तो संगीता ने पलटी खाई। शेखर नीचे आ गया और वह उसके ऊपर। उसने एक हाथ से उसका लण्ड पकड़करके अपनी चूत के छेद पर लगाया और धप्प से उसके ऊपर बैठ गई और पूरा का पूरा लण्ड लील लिया। जैसे चैन मिल गया हो सांस बाहर निकाली- “हुऊऊऊऊऊ…” फिर चूत को ऊपर किया फिर धप्प से पूरा लण्ड अंदर- “हिईईईईईईई…”


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शेखर आनंद ले रहा था। उसने दोनों हथेलियां बाँध के सिर के नीचे रखकर सिर ऊपर कर लिया था और पैर सीधे तान लिये थे, जिससे लण्ड और उठ गया था।

संगीता शेखर की जांघें पर बैठी थी। दायें हाथ का कप जैसा बनाकर उसने बेड का सहारा लिया था और बायें हाथ से चूत के ऊपर का हिस्सा दबा रखा था। वह कमान जैसी तन गई थी और ऊपर नीचे हो रही थी। छातियां ऊपर नीचे हो रही थीं। चूत लण्ड के बाहर कर लेती थी फिर एक झटके में पूरा अंदर कर लेती थी। अब उसकी गति काफी बढ़ गई थी। वह चूत पर लण्ड से चोटें लेने लगी थी। साथ ही तेज आवाजें निकालने लगी थी- “हिंहिमांहिं आंहिं आंहूँ आांहु हूँ आंहूँआंहूँहूँ…”

चूत लण्ड के बहुत ऊपर तक उठा लेती और सीधी लण्ड के ऊपर गिरती। लण्ड चूत में धक्क से चोट करता। बड़ी तेजी से सांस होठों से- “हुहुहु ऊऊहुहुहुऊऊऊहु रोरोऐै…” फिर एक बार जो चूत धप्प से गिरी तो कस के चिपक गई। उसने अपना सिर शेखर के सीने में गड़ा लिया। बांहों से उसे जकड़ लिया- “उईईई माँ मरीईईईई… मैं क्याआ करूंरू मैं मैं मैं…” वह बड़ी देर तक झड़ती रही।

उसने अपना सिर शेखर के सीने में गड़ाया तो फिर उठाया ही नहीं। शेखर उसको चूमना चाहता था।

लेकिन नहीं में सिर हिलाते हुये संगीता बोली- “पता नहीं आप मेरे बारे में क्या सोचते होंगे?”

शेखर बड़े प्यार से उसके बालों में उंगलियां फेरता हुआ बोला- “ऐसा कुछ नहीं। सोचता हूँ बहुत भूखी थी…” फिर उसने दोनों हथेलियों में सिर उठाते हुये पूछा- “है न?”

संगीता ने हाँमी में सिर हिला दिया।

शेखर ने शरारत से कहा- “लेकिन तुम्हारी एपेटाइत बहुत अच्छी है…”

संगीता का चेहरा लाल हो गया।

शेखर फिर बोला- “लेकिन यह तो अच्छे स्वास्थ्य की निशानी है…”

वह फिर से शेखर से चिपक गई। शेखर ने उसे बांहों में बाँध लिया। उसके होंठ संगीता के होंठों पर चिपक गये। शेखर का लण्ड उसकी चूत में ही था। वह उसे बहुत धीरे-धीरे अंदर बाहर कर रहा था। वह वैसे ही पड़ी रही। थोड़ी देर में उसकी गाण्ड हिलने लगौ। शेखर थोड़ी जल्दी-जल्दी लण्ड आगे पीछे करने लगा, साथ ही उसके होंठों को जोर से चूसने लगा।

संगीता को मजा आने लगा था और उसकी चूत ने भी साथ देना चालू कर दिया। जब शेखर अंदर करता तो वह अपनी चूत लण्ड पर दबा देती और जब बाहर करता तो उसको आगे बढ़ा देती। शेखर बाकायदा लय से चोदने लगा। संगीता भी अब गर्मा चुकी थी। वह उसी लय से जवाब दे रही थी।

अब शेखर ने संगीता को बांहों में लिये हुये ही पलटा खाया। संगीता चित्त नीचे आ गई और वह उसके ऊपर था। लण्ड अभी भी अंदर था। शेखर खिसक कर उकड़ू बैठ गया। हथेलियों में उफनते हुये जोबनों को भर कर दबाते हुये लण्ड को गहराइयों तक पेलने लगा।

संगीता सी सी कर उठी। उसने दोनों हाथों से शेखर की कमर को जकड़ लिया। वह बेकाबू थी। चूत पानी-पानी हो रही थी। जब लण्ड चूत की दीवारों को चीरता गहराई में घुसता तो वह भी चूत को अपनी तरफ से धकेलती। संगीता जोरों से सांसें निकाले जा रही थी- “ऊ हुहुहु… हुहुहु… ओह्ह ऊऊऊऊ… हुह… हुऊ… ऊऊऊ… रिरिरीईई…” साथ ही बुदबुदा रही थी- “लगा तो पूरे जोर से… कचूमर निकाल दो इसका… शेखर देखें तुम्हारा जोर… आज छोड़ना नहीं इसे…”

शेखर और जोर से शंटिंग करता था- “लो भाभी, ये लो तुम भी क्या याद रखोगी… लो भाभी ये लो पूरा अंदर तक…” और एक कस के धक्का और लण्ड की मुठ चूत पर बैठ गई।

संगीता बोल उठी- “भाभी नहीं, तुम्हारी संगीता उसी दिन जैसी…”

शेखर- “भाई साहब का वह हक मैं नहीं लूंगा। तुम तो मेरी प्यारी सी भाभी डार्लिंग हो, इतनी खूबसूरत। लेकिन भाभी तुमने चूत के दर्शन का तो मौका ही नहीं दिया…”

उसने लण्ड बाहर खींच लिया। संगीता ने टांगें जितनी खोल सकती थी खोल दी थीं। लण्ड ने चूत का छेद फैला दिया था। चूत का भाग फूला हुआ बड़ा मस्त लग रहा था। चूत के होंठ रसीली फांकों से मुँह फैलाये थे। चूत की तितली ने उत्तेजना में पंख फैला दिये थे। गहराई तक छेद खुला हुआ था, एकदम गुलाबी पर्त-दर-पर्त भरपूर स्पंज की तरह नरम, भरा हुआ। छेद से रस टपक रहा था, गहराई तक पानी चमक रहा था। शेखर तो पागल हो गया- “हुऊऊ माई गोड… भाभीई मैंने तो ऐसी चूत नहीं देखी… इसको तो चूसूंगा। देखें तुम्हारी झड़ी हुई चूत का क्या स्वाद है?”

संगीता जल्दी से बोल पड़ी- “शेखर, नहीं चूसना नहीं…” और उसने चूत पर अपना हाथ रख लिया।

शेखर ने जोर लगाकर उसका हाथ एक तरफ कर दिया और अपना मुँह खुली चूत पर रख दिया। संगीता हाथ पैर झटक कर अलग होने की कोशिश करने लगी। लेकिन शेखर ने उसकी जांघें को कस के जकड़ रखा था और मुँह चूत पर कसके जमा रखा था। उसके दोनों पैर अपने कंधों पर ले रखे थे। संगीता अपनी दोनों टांगें पटक-पटक कर उसकी पीठ पर मारने लगी- “नई नई चूसो मत न… हटो मुँह हटाओ…”

लेकिन शेखर ने उसकी क्लिटोरिस को होठों में दबाकर चूसना शुरू कर दिया।

संगीता के ऊपर एकाएक असर पड़ा। वह एकदम आनंद में भर गई। उसने टांगें पटकना बंद कर दीं। चिल्ला उठी- “ओ माई ईईई ऊऊऊ हुहुहु ये क्या करते हो ओओओह्ह…”


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शेखर ने मुँह अंदर बैठा लिया था। चूत की दोनों फांकें उसके गाल से सटी थीं। वह चटखारे लेकर संतरे की तरह चूस रहा था। चूत का रस उसके होठों, गाल, नाक पर फैल गया था। संगीता की चूत का अरोमा उसे पागल बना रहा था। संगीता ने टांगें उसके कंधे पर कसके बाँध ली थीं। दोनों हाथों से उसके सिर को जकड़ कर चूत की तरफ दबा रही थी। साथ ही तन करके चूत भी धकेल रही थी। जोरों-जोरों से आवाज निकाल रही थी। बीच-बीच में शेखर उसकी किरकिरी पर दांत लगा देता तो वह जोरों से चीख उठती। हथेलियों से वह उसकी दोनों चूचियां मसला रहा था उससे भी वह चीख उठती थी। इतनी उत्तेजना में थी कि सिर को इधर उधर पटक रही थी, छटपटा रही थी।

शेखर ने एक उंगली ले जाकर मुँह के नीचे की जगह से छेद में की तो उसने चूतड़ हवा में उठा दिये।

उसका सारा शरीर ऐंठ गया। चूत दिखने लगी। वो बोले जा रही थी, आवाज में कंपकंपी भरी थी- “ओ आआरे मैं मरीईईइ माँ आआंआं माऱ डाला तुमने ओओ मेरे शेखर मैं तो आआआ गईईई… कभीई भी तो नहीं चुसवाईई…” वह झड़ी तो झड़ती ही गई।

फिर शिथिल होकर हवा में उठा भाग नीचे आ गया। धीमे से उसने कहा- “ये क्या किया शेखर तुमने?”

शेखर के चेहरे पर संगीता का चूतरस लिपट गया था। चूत दो बार झड़ने के बाद भी मुँह बाये खिली हुई थी। गुलाबी नरमी अंदर से झांक रही थी। छेद से पानी रिस रहा था, संगमरमरी मस्त गोलाइयां गर्व से उठी हुई थीं। शेखर का लण्ड बहुत ही गरमाया हुआ था। उसने सुपाड़े का मुँह छेद पर लगाया और पूरा का पूरा पेल दिया। साथ ही संगीता के होंठों पर उसी की चूत के रस से सने होंठ जमा दिये।

लेकिन संगीता ने अपना मुँह घुमा लिया।

फिसलकर शेखर के होंठ उसके गाल पर आ गये जहां उनको रगड़कर वह रस उसके गाल पर मलता हुआ बोला- “भाभी अब चेहरे पर और रौनक आ जायेगी…”

उसका लौड़ा चूत को फाड़ने के लिये बेताब था। उसने तेजी से चुदाई चालू कर दी लेकिन संगीता की चूत ने उसी गरमी से जवाब नहीं दिया। शेखर ने सिर खिसका कर संगीता की दांईं चूची पर रख लिया। संगीता ने दांयें हाथ से सिर को जोरों से दबा लिया। शेखर ने होंठ खोलकर उसकी भरी और तनी घुंडियों को मुँह में ले लिया।

संगीता अचानक उछल गई- “उई री…”

शेखर अब दाईं चूची को चूसने लगा था और बांईं चूची के चूचुक को मसल रहा था।

संगीता के शरीर में गर्मी भर गई थी, उसकी चूत फड़कने लगी थी। उसने टांगें शेखर के कूल्हे पर बाँध ली थी। चूत को सिकोड़कर उसके लौड़े को अपनी पकड़ में ले लिया था।

शेखर का लण्ड संगीता की सुरंग में दीवालों को रगड़ता हुआ पूरा अंदर तक जाता और बाहर आता था। संगीता आनंद में भरपूर थी। जिसका इजहार वह आवाजें निकाल के कर रही थी। वह अपने नाखून शेखर की पीठ पर गड़ाने लगी थी। शेखर अपने घुटनों के बल उठ गया था और दोनों से कस के चूचियां पकड़ रखी थीं जिससे पूरे जोर से पेल सके।

लण्ड की चोट चूत पर पड़ती तो संगीता और जोश देती- “हाँ शेखर लगाओ न पूरो दम से…”

शेखर- “ले मेरा… पूरी बुर को चीर के रख देगा…”

संगीता- “हाँ हाँ लगाओ देखें कितना दम है…”

शेखर- “अच्छा तो अब लो…” चोट से संगीता के चूतड़ पीछे हट गये। बेड चरमरा उठा।

संगीता- “हाँ शेखर रख दो फाड़ के इसको। बना दो भुर्ता इसका…”

“उसको आज मजा चखाता ही हूँ…” कहकर शेखर उतरकर बेड के बगल में खड़ा हो गया। दोनों जांघें खींचकर उसकी चूत को एकदम किनारे पर कर लिया। और संगीता की टांगें चौड़ी करके खड़े-खड़े ही छेद पर लण्ड लगा के पूरा पेल दिया।

संगीता ने टांगें उसके कूल्हे के इर्द-गिर्द बाँध लीं।

अब शेखर बड़ी ताक़त से सटासट चोदने लगा।


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संगीता कुछ ही झटके झेल पाई। फिर कराह उठी लेकिन उसे बहुत ही मजा आ रहा था। जैसे-जैसे लौड़ा धकापेल कर रहा था उसकी कराह बढ़ रही थी। चूत पानी-पानी हो रही थी- “ओओ ओओओ आआआ ओ मेरी मम्मी ओ माईई गोड उईईई माँ मैं मरीईई… उउउउइइइइ रीईईइ…”

शेखर बाहर तक बाहर खींचता।

संगीता दांतों के ऊपर दांत जकड़े हुये अंदर खींचती लंबी सांस- “ओ मेरे शेखर ऊऊऊऊऊ हुहुहु…”

और शेखर सीधा खटाक से अंदर कर देता।

जब चोट पड़ चुकती तो जोर से संगीता की सांस बाहर होती- “उफ्फ्फ्फ…”

शेखर भी चरम आनंद में भर गया था- “ओ मेरी संगीता डार्लिंग… मेरा और ले ले… तुम्हारे जैसी चूत कोईईई नहींईइ…” उसने लण्ड को मुट्ठी मैं पकड़ा और लण्ड घुसेड़ा तो साथ में एक उंगली भी छेद में डालता ही गया।

संगीता और न ठहर सकी- “ओ मेरी माँ… मैं तो गईई… लगा दोओ कस के…” उसकी चूत फड़क उठी चूत के ज्वालामुखी ने लावा छोड़ दिया और छोड़ती गई।

शेखर बहुत कस-कस के झटके लगाते हुये बोला- “ओ मेरी संगीता मैं भी झड़ा… अब लो मेरे को…”

मैंने जल्दी से कहा- “शेखर, अंदर मत झड़ना…”

और शेखर ने लण्ड बाहर खींच लिया। उसका सफेद लावा उफन-उफन कर मेरी चूत पर फैलता रहा और वह मेरे ऊपर ढेर हो गया। काफी देर तक हम एक दूसरे की बांहों में लेटे रहे। मैंने उसे बड़े प्यार से हटाया।

तो बोली- “बहुत देर हो गई है गनीमत है कि वो देर से आते हैं…” फिर अपनी पैंटी से चूत के ऊपर से शेखर का रस साफ किया और कपड़े पहनकर जाने के पहले उसकी तरफ देखकर शरारत से बोली- “लाला जी आपका आज रात का खाना हमारे यहां है जिसकी दावत देने के लिये ही मैं यहां आई थी…”

मैं चुदी थी, चुदी थी और खूब चुदी थी। न चुदाई कराके भागने की जल्दी थी और न आवाज करने, चिल्लाने पर बंदिश जो मुझे वर्षों से नशीब नहीं हुआ था।

जब मैं ऊपर जा रही थी तो एकदम हल्की थी जैसे हवा में उड़ रही हूँ।

उस दिन के बाद शेखर से हमरो संबंध और गाढ़े हो गये। मैं उसकी भाभी और वह मेरा देवर था सिवाय उस समय के जब वह मुझे पकड़ के अपनी कसर निकालता था। उस समय वह मुझे संगीता कहता था। कम से कम महीने में एक दिन तो ऐसा आता ही था। इसमें कोई पछतावे की बात नहीं थी। वह सच्चे देवर की तरह वर्ताव और कर्तव्य करता था। मैं उसे चाहती थी।


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***** THE END समाप्त *****

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सभी दोस्तों को,

नया साल शुभ हो, मंगलमय हो और खुशियां लाये।


Wish you all a HAPPY AND PROSPEROUS NEW YEAR 2016

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