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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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"किधर होईला निशान?" रुस्तम राव बोला।

“इन्हीं रास्तों में देखो, शायद कुछ समझ सको।” बांदा बोला।

“तुम क्यों चाहोगे कि हम जथूरा के पास जा पहुंचे।” नगीना ने कहा।

"ठीक कहा बेला।” बांदा ने सिर हिलाया।

“इस नाते मैं ये भी कह सकती हूं कि ऐसा कोई निशान होगा ही नहीं, जिससे रास्ता समझा जा सके।"

"विश्वास करो, ऐसा निशान है।” बांदा ने कहा- ये बात मैं सच बोल रहा हूं।"

और वो बांदा की बात पर यकीन करके, रास्तों में देखते हुए इस बात का इशारा ढूंढ़ने लगे कि कौन-से रास्ते में जाना उनके लिए बेहतर होगा।

मखानी ने मुस्कराकर कमला रानी को देखा। कमला रानी ने फौरन मुंह फेर लिया। मखानी पास पहुंचा और धीरे-से उसे कोहनी मारी।

“क्या है?"

“धीरे बोल, क्यों सबको सुनाती है।"

"तंग मत कर मुझे।"

"जिस रास्ते से आए हैं, थोड़ा-सा उधर आ-जा।"

"क्यों?" कमला रानी ने उसे घूरा।

"मेरे से क्या पूछती है, तेरे को नहीं पता।” मखानी धीमे स्वर में बोला।

“मैं नहीं आऊंगी।"

"फिर नखरे।"

“नहीं आऊंगी।” कमला रानी ने इंकार में सिर हिलाया।

"दिल मत तोड़।”

"ये वक्त नहीं है इन बातों का।"

"इन बातों के लिए हर वक्त, वक्त होता है। नखरे मत झाड़। उधर चल।”

"नहीं।” कमला रानी ने कहा और वहीं नीचे बैठ गई।

'नहीं मानने वाली ये।' मखानी बड़बड़ा उठा। "भौरी।”

कमला रानी बड़बड़ाई। "क्या है?" भौरी की फसफसाहट कानों में पड़ी।

"तेरे को पता है कि कौन-से रास्ते से भीतर जाना ठीक होगा?" कमला रानी ने पूछा।

"मुझे कुछ नहीं पता। इस जगह में तो मैं पहली बार आई हूं। अब देलूंगी कि महाकाली ने यहां क्या-क्या इंतजाम कर रखा है।"

तभी मखानी पास ही बैठ गया। कमला रानी ने मखानी को देखा।

मखानी दांत फाड़कर मुस्कराया और आंख से उधर चलने का इशारा किया।

“तेरे को कोई और काम नहीं है।” कमला रानी ने झल्लाकर कहा।

“इसी काम से फुर्सत नहीं मिलती तो दूसरा क्या काम करूंगा।" मखानी ने मुस्कराकर कहा।

“चूल्हे में जा।” कमला रानी भुनभुनाकर दूसरी तरफ देखने लगी। ___

“अड़ गई मेरी कमला रानी।” मखानी गहरी सांस लेकर कह उठा।

वो सब काफी देर उन रास्तों में देखते, समझने की चेष्टा करते रहे। परंतु कुछ समझ में नहीं आया।

इस दौरान बांदा शांत बैठा रहा।

"मेरे खयाल में बांदा ने झूठ कहा है कि इन रास्तों से हमें कोई इशारा मिल सकता है।” मोना चौधरी कह उठी।

मन-ही-मन बाकी सब भी ये ही सोच रहे थे।

“ये ही तो मुसीबत है कि कोई मेरी बात का यकीन नहीं करता।” बांदा कह उठा।
 
"तंम दसों नम्बरों के हरामो हौवे।"

"इतना भी नहीं हूं।” बांदा ने मुंह लटकाकर कहा-“मैं तो चाहता था कि तुम ठीक रास्ते पर जाओ।"

“और सही रास्ता बता नहीं रहे।"

"मैं कहूंगा तो क्या तुम लोग मेरी बात मानोगे। मानोगे तो आग वाले रास्ते में चले जाओ।"

"तंम म्हारे को आगो वालो रास्तो में ही क्यों भेजो हो?" ___

“मैं कुछ नहीं कहूंगा। जो रास्ता ठीक लगे, उसमें चले जाओ।" बांदा ने नाराजगी से कहा।

सब रास्तों के पास खड़े एक-दूसरे को देख रहे थे।

"हमें किसी एक रास्ते का चुनाव करना होगा।" देवराज चौहान

बोला।

____ “तो आग वाला रास्ता ही क्यों न चुनें?" मोना चौधरी ने सोच-भरे स्वर में कहा। ___

“आग वाले रास्ते में ज्यादा मुसीबतें हो सकती हैं।” नगीना बोली— “बांदा बार-बार हमें वहीं जाने को कह रहा है।"

देवराज चौहान ने बांदा को देखा तो बांदा ने मुंह फेर लिया।

“यो तो म्हारे को पागलो कर दयो।”

"मेरे खयाल में आग वाले रास्ते पर ही जाना चाहिए।" पारसनाथ बोला—“क्या पता हम दूसरे रास्ते में जाएं तो वहां ज्यादा खतरे मिले। कोई एक रास्ता तो चुनना ही है हमें।"

रातुला ने तवेरा से कहा। “तुम कुछ कहोगी?"

“ये जो फैसला करेंगे—मुझे मंजूर होगा।" तभी देवराज चौहान कह उठा। “हम आग वाले रास्ते पर ही जाएंगे।"

“वाह ।” बांदा खुश हो गया— “तुम लोगों ने मेरी बात मान ली।"

“तुम इतने खुश क्या इसीलिए हो रहे हो?" महाजन ने उसे देखा।

“हां।" बांदा ने सिर हिलाया।

फिर सब एक-एक करके आग वाले रास्ते में प्रवेश करने लगे। मखानी ने बांदा से कहा। "तुम नहीं आओगे?"

"मैं तुम लोगों के साथ ही हूं। तुम सबकी सेवा करना ही मेरा काम है।” बांदा बोला—“तुम्हारे साथ जो औरत है, वो मुझे पसंद

आई।"

“तुम भी कमीने हो।” मखानी ने उसे घूरा।

“वो तेरी क्या लगती है?"

"तुझे क्या?” मखानी ने कहा और भीतर प्रवेश कर गया। देखते-देखते सब उस रास्ते में चले गए।

देवराज चौहान, नगीना, बांके, रुस्तम, मोना चौधरी, पारसनाथ, महाजन, मखानी, कमला रानी, रातुला और तवेरा ने उस दरवाजे से भीतर प्रवेश करते ही खुद को खुली जमीन पर पाया।

अगले ही पल सब हड़बड़ा से उठे।

आसमान से अंगारे बरस रहे थे। छोटे-छोटे अंगारे जो कि उनके आस-पास ही गिर रहे थे। परंतु उन्हें छू नहीं रहे थे। पहले तो उन्होंने खुद को अंगारों से बचाने की चेष्टा की, परंतु जब उन्हें लगा कि अंगारे उन्हें छू नहीं रहे तो वो कुछ शांत हुए।

"बांदो ने म्हारो को कां पे फंसा दयो।"

"ये कैसी जगह है?" महाजन कह उठा।

"अंगारो की बरसातो हौवे इधरो तो।"

मोना चौधरी, तवेरा के पास पहुंचकर बोली। "ये सब क्या हो रहा है?"

"मैं नहीं जानती।"

"कुछ करो। अंगारों को हमारे सिर से हटाओ।"

नगीना देवराज चौहान के पास थी।

"इन अंगारों का मतलब समझ में नहीं आ रहा।” नगीना बोली—“ये ऊपर से गिर तो रहे हैं, परंतु हमें छू नहीं रहे।"

“अवश्य इस बात में कोई रहस्य है।" देवराज चौहान सोच-भरे स्वर में बोला। ___

अंगारे जमीन पर गिरते और कुछ पल सुलगने के पश्चात बुझ जाते थे। ___

“इन अंगारों में गर्मी भी नहीं है।” नगीना बोली—“परंतु हम क्या करें?"

"कुछ देर इंतजार करो। सब ठीक हो जाएगा।"

"कैसे ठीक होगा?"

"मोना चौधरी भी अंगारों से घिरी है। नीलकंठ उसकी सहायता के लिए जरूर जाएगा।"

"ओह।"

तवेरा ने अपने कंधे से लटके झोले से चक्री जैसी कोई चीज निकाली और मन-ही-मन कुछ मंत्रों को बोलने के पश्चात उसे आसमान की तरफ उछाल दिया। चक्री तेजी से आसमान में घूमने लगी और गिरते अंगारों को तबाह करने लगी। चक्री की तेजी देखने लायक थी, परंतु इससे अंगारों को कोई फर्क न पड़ा। वो वैसे ही गिरे जा रहे थे।

"इससे तो कोई भी फायदा नहीं हुआ।" मोना चौधरी बोली।
 
तवेरा ने मंत्र पढ़कर चक्री को वापस बुलाया और उसे झोले में डालती कह उठी।

“इस वक्त मैं कुछ नहीं कर सकती।” तवेरा बोली।

"क्यों?"

"अंगारों को दूर करने का कोई रास्ता मुझे समझ नहीं आ रहा।"

मोना चौधरी ऊपर से गिरते अंगारों को देखती कह उठी।

“ये अंगारे हमारे सिरों पर ही हैं। हमें यहां से दूर चले जाना चाहिए।"

“ये ठीक रहेगा।” पास आते रातुला ने उसकी बात सुन ली थी।

“सबसे कहो, यहां से दूर हो जाए।" रातुला ने ऊंचे स्वर में कहा।

उसके बाद सब वहां से दूर होने के लिए दौड़ पड़े। लेकिन वो अंगारे उनके सिरों पर ही रहे।

आखिरकार वे ठिठक गए। तभी बांकेलाल राठौर कह उठा। “वो देखो, क्या बढ़ियो मकान हौवे।"

सबकी निगाह उस तरफ गई। काफी दूर मकान बना नजर आया।

"हमें वहां जाना चाहिए।" महाजन कह उठा।

"चल्लो।” बांकेलाल ने सिर हिलाया।

"इस तरह बिना सोचे समझे, मकान की तरफ नहीं जाना चाहिए।” तवेरा कह उठी-"हर कदम पर यहां धोखे ही हैं।"

अंगारे अभी भी बिना रुके गिरे जा रहे थे।

“छोरे। तंम खामोश क्यों हौवे?"

“आपून सोचेला बाप।” रुस्तम राव ने गम्भीर स्वर में कहा—"अंगारे हमें छू नेई रहेला। पर आपुन लोगों के सिर पर नाचेला। पास में गिरेला।"

"तो?"

"इसमें जरूर कोई रहस्य होएला बाप।"

एकाएक मोना चौधरी के चेहरे के भाव बदले, आंखें सुर्ख-सी हो उठीं। अगले ही पल मोना चौधरी ने हाथ आगे बढ़ाया और गिरते

अंगारे को हथेली में थाम लिया। __

“ये क्या कर रही हो मोना चौधरी।” पारसनाथ कह उठा।

परंतु तब तक मोना चौधरी अंगारा मुट्ठी में भींच चुकी थी। मोना चौधरी ने पारसनाथ को देखा।

मोना चौधरी के चेहरे के बदले भाव देखकर पारसनाथ की आंखें सिकुड़ीं।

“नीलकंठ ।” पारसनाथ के होंठों से निकला—

“तुम सब ऐसा ही करो।"

"अंगारे पकड़ें?" पारसनाथ के होंठों से निकला।

"हां।"

"हाथ जल जाएगा।"

मोना चौधरी ने मुट्ठी खोली तो उसकी हथेली पर राख पड़ी दिखी। उसने हाथ झाड़ा तो हथेली साफ हो गई। वहां पर अब कोई निशान तक नहीं था।

_ “कुछ नहीं होगा। तुम सब अंगारे पकड़ो।” मोना चौधरी के होंठों से नीलकंठ का स्वर निकला।

“इससे क्या होगा?" नगीना ने पूछा।

"अंगारों से बच जाओगे। ये दूर चले जाएंगे। जब तक ये तुम सबके सिरों पर रहेंगे, तब तक तुम सब परेशान रहोगे।” ।

और फिर सबने अंगारे पकड़ने शुरू कर दिए।

सबने अंगारे पकड़ लिए तो एकाएक आसमान में नाचते अंगारे गायब हो गए।

ये देखकर सबको राहत-सी मिली।

“अब तुम सब उस मकान में जाओ।” नीलकंठ की आवाज फिर सुनाई दी।

"नीलकंठ।" देवराज चौहान बोला—“तुम जानते हो कि हमें जथूरा कहां पर मिलेगा?"

"नहीं जानता।"

"तो तुम हमारी कोई सहायता नहीं कर सकते, जथूरा तक पहुंचने में?"

* “नहीं। क्योंकि महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के रहस्यों से मैं वाकिफ नहीं हूं।"

"उस मकान में क्या है?"

“वहीं से आगे जाने का रास्ता मिलेगा। वरना यहां पर भटकते रह जाओगे।"

वो सब उस मकान की तरफ बढ़ गए।
 
अंगारे जब तक उनके सिरों पर नाच रहे थे, तब तक वो ठीक से सोच न पा रहे थे। उन्हें हर तरफ समतल जमीन ही नजर आ रही थी, जिसका कहीं पर भी अंत नजर नहीं आ रहा था।

कुछ देर चलते रहने के बाद वे उस मकान के पास आ पहुंचे। धूप में वो मकान सुलगता-सा नजर आ रहा था। मकान का दरवाजा खुला था। वे सब भीतर प्रवेश करते चले गए।

पहला कमरा बैठक जैसा था और वहां पर बांदा आराम से बैठा था।

बांदा को वहां देखकर वे चौंके।

“तुम?" रातुला के होंठों से निकला।

“यो बोत बड़ो हरामी हौवे।"

"अंगारों से मुक्ति पाकर यहां तक आ गए।” बांदा बोला—“नीलकंठ ने सहायता कर दी। ___

“तूने क्यों नहीं बताया कि अंगारों से हम पीछा कैसे छुड़ाएंगे।"

नगीना बोली।

“मैं तो यहां पर आप लोगों का इंतजार कर रहा था।" बांदा बोला—“अगर आप लोग अंगारों से मुक्ति न पाते तो इस मकान में प्रवेश नहीं कर सकते थे। मैं उस काम में आपकी सहायता नहीं कर सकता था।"

"तुम चाहते क्या हो?" देवराज चौहान ने पूछा।।

"आप लोगों की सेवा के लिए मुझे लगाया गया है।” बांदा मुस्करा पड़ा। -

"तुम दिल से सेवा कर रहे होते तो, हमें अवश्य बता देते कि जथूरा कहां मिलेगा।" ___

“मेहनत करो। खतरों से बचो और जथूरा तक पहुंच जाओ।" बांदा ने कहा।

“यो कमीणों हौवे। कुछो न बतायो यो।"

“यहां पर हमारे लिए क्या है?" मोना चौधरी ने पूछा।

“आगे बढ़ने का रास्ता। उस दरवाजे से भीतर जाओगे तो रास्ता मिल जाएगा।"

सबकी निगाह दूसरी तरफ दरवाजे पर गई।

“वहां क्या है?" महाजन ने पूछा।

"खुद ही देख लो। जाओ भीतर प्रवेश करो।"

सब दरवाजे के पास पहुंचे। महाजन ने दरवाजे के पार देखा, परंतु उसे कुछ नजर नहीं आया।

“यहां तो कुछ भी नजर नहीं आ रहा।” महाजन बोला।

"भीतर प्रवेश कर जाओ।" बांदा की आवाज आई—“सब कुछ दिख जाएगा।"

महाजन भीतर प्रवेश कर गया। ऐसा करते ही महाजन सबकी निगाहों से ओझल हो गया।

"महाजन कहां गया?" पारसनाथ ने एकाएक बेचैनी से कहा और खुद भी दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गया।

एकाएक पारसनाथ भी सबकी निगाहों से ओझल हो गया।

"जो भी दरवाजे में प्रवेश करता है, वो दिखना बंद हो जाता है।" मोना चौधरी ने बांदा को देखा। ___

“तुम सबको इसी दरवाजे से भीतर जाना होगा, तभी आगे जाने का रास्ता मिलेगा।" बांदा ने शांत स्वर में कहा।

तवेरा कह उठी।

“नीलकंठ कह तो रहा था कि इस मकान के भीतर जाने से ही हमें आगे जाने का रास्ता मिलेगा। फिर सोचना क्या। नीलकंठ गलत नहीं कहेगा।” तवेरा आगे बढ़ी और उस दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गई।

तवेरा भी एकाएक निगाहों से ओझल हो गई। अब रुकने या सोचने का कोई फायदा नहीं था।

सब एक-एक करके उस दरवाजे से भीतर प्रवेश करते चले गए।
 
सबने पलक झपकते ही खुद को पेड़ की छांव में खुली जगह पर पाया। शाम हो रही थी। मध्यम-सी हवा चल रही थी। आसमान साफ था। नीला था। सूर्य की लाली आसमान में थी। - ठीक सामने खुले में एक आदमी कुएं की छोटी-सी दीवार पर बैठा उन्हें देख रहा था।

इन सबने भी उसे देखा।

"ये हम कहां आ गए?" नगीना बोली।

“बहना, यो ही बातों तो म्हारी समझ में न आयो हो।”

"वो सामने कुएं पर कौन बैठा है।" मोना चौधरी ने कहा।

“हमें ही देख रहा है।” रातुला बोला।

"आओ उससे बात करते हैं। वो यूं ही तो यहां पर मौजूद नहीं होगा।” कहकर मोना चौधरी आगे बढ़ गई।

नगीना ने देवराज चौहान को देखा। देवराज चौहान ने सहमति से सिर हिला दिया। सब मोना चौधरी के पीछे चल पड़े।

"जब से हमने पहाड़ी के भीतर प्रवेश किया है, हमें एक पल का भी चैन नहीं मिला।” नगीना ने कहा। __

"चिंता मत करेला दीदी।” रुस्तम राव ने कहा—“लम्बी तान के सोने को भी मिलेईला।" ।

"जैसे तेरे को सब कुछ पता है।” नगीना मुस्कराई। देवराज चौहान की निगाह हर तरफ जा रही थी। परंतु उसे कोई भी अन्य व्यक्ति न दिखाई दे रहा था।

उन्हें पास आते देखकर वो व्यक्ति कुएं की दीवार से उतरकर जमीन पर खड़ा हो गया।

सबसे पहले मोना चौधरी उसके पास पहुंची। “तुम कौन हो?” मोना चौधरी ने पूछा।

बाकी सब भी पास आ पहुंचे।

"मैं बांदा और बूंदी का बाप, प्रणाम सिंह हूं।"

“बांदो?" बांके कह उठा—"वो तो नम्बरो हरामो हौवे।"

“सच कहा।” प्रणाम सिंह ने दुख-भरे स्वर में कहा—“मैंने उसे बहुत समझाया, परंतु वो कभी भी मेरी बात नहीं समझा।”

"तन्ने ही उसो को पैदा करो हो।"

"पैदा तो उसकी मां ने किया है।” प्रणाम सिंह बोला—“मैंने तो प्यार किया था उसकी मां से तो वो पैदा हो गया।"

"ब्याह करो के प्यारो करो या यूं ही गोल-गोल बेल दयो उसो को।"

प्रणाम सिंह गहरी सांस लेकर रह गया।

“तुम यहां क्या कर रहे हो?" मोना चौधरी ने पूछा।

"मैं तो तुम लोगों की ही राह देख रहा था।"

"क्यों?

"मैं जानता हूं तुम लोग जथूरा को आजाद कराने आए हो। तुम मिन्नो हो और वो देवा है। तुम दोनों तिलिस्म तोड़ने आए

हो।"

"तुम जानते हो कि जथुरा कहां पर कैद है?

“हां। परंतु आसानी से नहीं बताऊंगा।"

"कैसे बताओगे?"

“मेरे से कुश्ती लड़कर मुझे हराना होगा।"

“कुश्ती?" मोना चौधरी के माथे पर बल पड़े।

“हां। मुझे हरा दिया तो, मैं तुम लोगों को बता दूंगा कि जथूरा कहां मिलेगा।"

“यो बापो तो म्हारे को बूंदो से ज्यादो हरामो लगो हो।"

“बांदा का बाप होएला तो हरामी क्यों न होईला।"

"ठीको बोल्लो हो तंम।" ।

“ये सब क्या हो रहा है?" नगीना ने देवराज चौहान से पूछा।

“मैं कुछ भी समझ नहीं पा रहा हूं। मोना चौधरी का आगे रहना ही ठीक है। उसे बात करने दो।"

"क्यों?"

“कोई मुसीबत आएगी तो नीलकंठ आकर सब संभाल लेगा। वो मोना चौधरी पर परेशानी नहीं आने देगा।"

मोना चौधरी प्रणाम सिंह से बोली।

“तुम बड़ी उम्र के हो। तुम्हें इस उम्र में किसी से कुश्ती नहीं लड़नी चाहिए।”

प्रणाम सिंह मुस्करा पड़ा। “तुम्हें शक है कि मैं पहली बार में ही हार जाऊंगा।" "वहम है तुम्हारा। देखो मैं तुम्हें अपनी ताकत दिखाता हूं।"

कहने के साथ ही उसने बेहद फुर्ती से मोना चौधरी को बांह और टांग से पकड़ा और अपने सिर से ऊपर हवा में उठा लिया।

"छोड़ो मुझे।" मोना चौधरी तेज स्वर में बोली। __

“अब तो मानती हो न कि मुझमें कुश्ती लड़ने के लिए ताकत

"ठीक है। माना—अब मुझे नीचे उतारो।"

अगले ही पल सब स्तब्ध रह गए। जैसे काटो तो खून नहीं। वो हाल हो गया सबका।

क्योंकि प्रणाम सिंह ने बेहद स्वाभाविक ढंग से मोना चौधरी को नीचे उतारने की अपेक्षा कुएं में फेंक दिया।

दो पल तो किसी को कुछ समझ ही न आया कि प्रणाम सिंह ने क्या कर डाला है।

अगले ही क्षण महाजन गला फाड़कर चीखा और प्रणाम सिंह पर झपटा।

"कमीने-कुत्ते, मैं तुझे जिंदा नहीं... ” ।

प्रणाम सिंह ने महाजन को बांह से थामा और उठाकर पलक झपकते ही उसे भी कुएं में फेंक दिया।
 
"ये भी कुएं में गईला बाप।"

“मन्ने तो पैले ही कहो हो कि बांदा का बाप बोत बड़ो हरामी हौवे। नतीजो सामणे हौवे।"

उस पल पारसनाथ सतर्कता से प्रणाम सिंह की तरफ बढ़ा। चेहरे पर कठोरता थी। पारसनाथ जैसे लम्बे-चौड़े इंसान को कुएं में फेंकना आसान काम नहीं था। पारसनाथ के चेहरे पर दरिंदगी नाच रही थी।

देवराज चौहान आगे बढ़ा और कुएं की मुंडेर से भीतर झांका।

कुआं बहुत गहरा था। भीतर अंधेरे के अलावा कुछ भी नहीं दिखा।

_ “आ परसू।” प्रणाम सिंह मुस्कराकर बोला—“तेरे से कुश्ती लड़ने में तो मुझे बहुत मजा आएगा।"

इसी पल पारसनाथ ने प्रणाम सिंह पर झपट्टा मारा।

अगले ही पल प्रणाम सिंह की फुर्ती देखकर सब ठगे से रह गए।

इससे पहले कि पारसनाथ उसे छू पाता, प्रणाम सिंह तेजी से नीचे बैठा और पारसनाथ को पिंडलियों से पकड़कर, कुएं की तरफ उछाल दिया। सबने पारसनाथ को जैसे हवा में उड़कर, कुएं के भीतर जाते देखा।

"अंम थारे को 'वड' दयो।” बांकेलाल राठौर गुर्राया और उसने प्रणाम सिंह पर छलांग लगा दी। __

प्रणाम सिंह ने बांके को दोनों हाथों से संभाला और कुएं में उछाल दिया।

देवराज चौहान होंठ भींचे प्रणाम सिंह के सामने आ पहुंचा। "तू कैसा है देवा?" प्रणाम सिंह मुस्कराया।

"क्या चाहते हो तुम?"

“मुझसे कुश्ती लड़ो। मुझे हरा दोगे तो मैं जथूरा का पता बता दूंगा।”

“तुम सबको कुएं में क्यों फेंक रहे हो?"

“हारे हुए को मौत ही मिलती है।"

“तुम्हारा मतलब कि जो कुएं में गए, वो मर गए हैं।" देवराज चौहान के माथे पर बल पड़े।

"मेरा तो यही ख्याल है।" प्रणाम सिंह ने मुस्कराकर कहा।

एकाएक देवराज चौहान ने फुर्ती से झपट्टा मारकर, प्रणाम सिंह की गर्दन दोनों हाथों से पकड़ ली।

उसी पल प्रणाम सिंह ने देवराज चौहान के पेट में घूसा मारा।

घुसा क्या लोहे का हथौड़ा था। देवराज चौहान पीड़ा से छटपटा उठा। गर्दन पर से हाथ हट गए। प्रणाम सिंह ने देवराज चौहान को थामा और कुएं में उछाल दिया।

“न-ही-5-5-5।” नगीना चीख उठी। वो तेजी से कुएं की तरफ दौड़ी। ___

"मैं जानता हं बेला कि त रुकने वाली नहीं।” प्रणाम सिंह बोला— “तू देवा के पीछे कुएं में कूद के ही रहेगी।"

हुआ भी यही।

नगीना कुएं की दीवार पर चढ़ी और इस तरह कुएं में कूद गई जैसे वो कूदते ही देवराज चौहान को बचा लेगी।

अब सिर्फ पांच बचे थे। मखानी, कमला रानी, रुस्तम राव, तवेरा और रातुला।

जो हुआ, उसके लिए सब हक्के-बक्के थे।

“बाप।” रुस्तम राव हाथ जोड़े प्रणाम सिंह के पास आ पहुंचा—“आपुन को कुएं में नेई फेंकने का।"

“डर गया त्रिवेणी।" प्रणाम सिंह मुस्कराया।

“हां बाप।”

"मुझे बेवकूफ बनाता है।" प्रणाम सिंह हंसा-"मैं जानता हूं, तू डरने वाला नहीं। तू तो...।"

“नेई बाप। आपुन सच में कांहेला। देख तेरे पांव पड़ता।” रुस्तम राव ने नीचे झुकते ही प्रणाम सिंह की टांगें पकड़ी और तीव्रता से ऊपर को उठाते हुए झटका दिया। रुस्तम राव उसे कुएं में फेंक देना चाहता था।

प्रणाम सिंह जोरों से लड़खड़ाया।

कुएं की दीवार थामकर उसने खुद को संभाला। इसी पल रातला भी प्रणाम सिंह पर झपट पड़ा।

प्रणाम सिंह ने रातुला को बांह से पकड़ा और कुएं में उछाल दिया।

इसके साथ ही उसने रुस्तम राव को नीचे से पकड़कर उठाया और कुएं में उछाल दिया।

अब सिर्फ तीन बचे थे। मखानी, कमला रानी और तवेरा। प्रणाम सिंह ने मुस्कराकर तवेरा को देखा। "तेरा जादू मुझ पर नहीं चलने वाला तवेरा।"

"मैं तुझे जानती हूं प्रणाम सिंह।” तवेरा गम्भीर स्वर में बोली-“तू तो महाकाली का खास आदमी है।"

प्रणाम सिंह मुस्कराया।

"क्यों फेंक रहा है तू सबको कुएं में?"

“जो हुक्म मिला, उसे पूरा कर रहा हूं।" प्रणाम सिंह ने शांत स्वर में कहा।

“क्या है कुएं में?" तवेरा ने पूछा।

“मैं क्या जानूं ।”

“महाकाली कहां है?"

"नहीं जानता। बरसों हो गए, उसे देखा नहीं। सिर्फ उसकी परछाई ही आती है सामने।"

“जथूरा कहां है?"

“नहीं जानता। परंतु जब से महाकाली ने जथूरा को कैद किया है, तब से वो स्वयं भी नजर नहीं आई।"

"क्यों, क्या रहस्य है इसमें?"

“मैं नहीं जानता। तुमने भी कुएं में जाना है। खुद जाओगी या मैं उठाकर फेंकू?" _

“मैं स्वयं जाऊंगी।” तवेरा ने कहा और आगे बढ़कर कुएं की मुंडेर पर चढ़ी और भीतर कूद गई।

प्रणाम सिंह ने अब बचे मखानी और कमला रानी को देखा। दोनों के चेहरों पर घबराहट थी।

"क्यों भोले बलम।” प्रणाम सिंह मखानी से बोला—“तेरा क्या इरादा है। कुश्ती हो जाए?"

- "मैं...मैं सिर्फ औरतों से कुश्ती लड़ता हूं, पूछ ले कमला रानी से। बता कमला रानी।"

“ये बात तो तेरे मुंह पर लिखी है, पूछना क्या?"

"क्या...क्या लिखा है?"

"ठरकी।”

"क्या?"

प्रणाम सिंह ने झपट्टा मारा और मखानी को इस तरह दबोच लिया जैसे बिल्ली चूहे को पकड़ लेती है।

"मुझे मत फेंक।” मखानी चीखा— “मुझे छोड़..."

प्रणाम सिंह ने मखानी को कुएं में फेंक दिया।

"आंय मर गई। ये तूने क्या किया।” कमला रानी चिल्ला पडी—“वो मेरे काम का आदमी था।"
 
तेरे को भी उसके पीछे भेज देता हूं।" प्रणाम सिंह कमला रानी की तरफ बढ़ा।

“नहीं.. नहीं।” कमला रानी पलटकर भागी—“मुझे नहीं जाना उसके पीछे।”

परंतु प्रणाम सिंह से बचकर कहां भाग पाती वो।

प्रणाम सिंह ने उसे पकड़कर कंधे पर लादा और कुएं की तरफ बढ़ गया।

"मुझे छोड़ दो। मैं तेरे को खुश कर दूंगी। लॉटरी निकलवा दूंगी तेरी। एक बार सेवा का मौका तो दे। मैं तेरे को...।"

प्रणाम सिंह ने कमला रानी को भी कुएं में फेंक दिया।

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शादी वाला घर था वो।

ढोलक बज रही थी। तबले की थाप सुनाई दे रही थी। चारों तरफ खिलखिलाहटें फैली थीं। हर कोई सजा-संवरा घूम रहा था। बच्चे नए-नए कपड़े पहने अपने ही खेल में लगे हुए थे। ब्याह के इस मौके पर जैसे औरतों को सजने-संवरने का मौका मिल गया था। हर हसीन औरत भाग-दौड़ में व्यस्त नजर आ रही थी।

पुरुषों ने ज्यादातर सफेद कमीज-पायजामा और गुलाबी पगड़ी बांध रखी थी।

मकान पर रंग-बिरंगी लाइटें लगी थीं।

आंगन में घी के दीपक जल रहे थे। कुछ बूढ़े व्यक्ति सफेद कमीज-पायजामा पहने एक तरफ चारपाइयों में बैठे हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। वहीं एक तरफ छोटे से मंच पर बैठा व्यक्ति देर से शहनाई बजा रहा था। बारात आने का वक्त हो रहा था और इसके साथ ही चहल-पहल बढ़ती जा रही थी। भीतर एक कमरे में दुल्हन सजी बैठी थी। पास में उसकी सहेलियां मौजूद थीं।

हर तरफ उल्लास और खुशी का माहौल था।

घर के बाहर पास में ही बहुत बड़ा तम्बू लगा था, जहां से खाने के सामानों की महक आ रही थी। वहां पर बारातियों को खाना-खिलाया जाना था। इस वक्त कोई भी फुर्सत में नहीं था।

एक-एक करके सबको होश आने लगा था।

उन्हें सिर्फ इतना याद था कि वे कुएं में गिरे। जाने कितनी गहराई थी कुएं की कि गिरते-गिरते होश गम हो गए थे। बेहोश होने से पहले उनके जेहन में प्रणाम सिंह का चेहरा ही नाच रहा था।

होश में आते ही उनके कानों में ढोल-तबले और शहनाई की आवाजें पड़ने लगी।

"म्हारे ब्याहो का बैंडो किधरो बजो हो?"

“बाप तेरी शादी होईला है क्या?"

"म्हारे को भी ये ई सपणों आयो हो।" बांकेलाल राठौर ने आंखें खोलते हुए कहा।

“ये सपना नेई, हकीकत होईला बाप।"

सबको होश आ गया था।

उन्होंने खुद को अंधेरे में घास पर पड़े पाया। सामने ही ब्याह वाला घर था। घर में लगी रोशनियां वहां तक आ रही थीं। शोर-शराबे की आवाजें भी सुनाई दे रही थीं।

"ये हम कहां आ गए?" मोना चौधरी कह उठी। "भूख तगड़ी लग रही है।"

“सामने ही शादी वाला घर है।” नगीना बोली-“भूख का तो इंतजाम हो ही जाएगा।”

“वो बांदों का बापो प्रणाम सिंहों बोत बड़ो हरामी निकलो हो।"

“पर हम हैं कहां?" नगीना बोली।

"महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर।” देवराज चौहान ने कहा— “हमें यहीं पहुंचाने के लिए कुएं में फेंका गया था।"

“यहां हमारा क्या काम?" रातुला कह उठा।

“अवश्य कुछ तो होगा ही, तभी हम यहां तक आ पहुंचे हैं।" देवराज चौहान ने कहा।

“तुम कुछ कहो तवेरा।” रातुला बोला।

“अभी मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा।" तवेरा गम्भीर स्वर में बोली—“लेकिन इतना जरूर है कि महाकाली ने हमें भटकाने के लिए तगड़ा जाल फैला रखा है। वो हमें हर कदम पर उलझाए जा रही है। पहले बांदा ने हमें बातों में लगाकर, आग वाले रास्तों पर जाने को तैयार कर लिया। फिर उस मकान में बांदा ने हमें उस रास्ते पर जाने को कहा। वहां से आगे हमें कुआं मिला और प्रणाम सिंह ने हमें कुएं में धकेल दिया और यहां आ पहुंचे।” ___

“इस हिसाब से तो हम एक कदम भी अपनी मर्जी से नहीं चले।” मोना चौधरी कह उठी।

“हां, हम इस वक्त भी महाकाली के इशारे पर ही नाच रहे हैं।" तवेरा सोचों में डूबी थी।

“आखिर महाकाली चाहती क्या है हमसे?"

"वो हमें जथूरा तक नहीं पहुंचने देगी। वो हमें भटका-भटकाकर, हमारी जान ले लेगी।"

"ये नहीं होगा।” मोना चौधरी ने दांत भींचकर कहा।

"ये ही होगा। महाकाली की ताकतों का हम मुकाबला नहीं कर सकते।"

“ये तुम कहती हो।”

"सच बात कहने में क्या बुराई है।"

“तुम तो हमारे साथ इसलिए हो कि, महाकाली द्वारा पैदा की गई मुसीबतों से बचाओगी।"

"इस बात से मैं अब भी पीछे नहीं हट रही। परंतु महाकाली की हर हरकत का मुकाबला नहीं कर सकती मैं। जैसे कि आसमान से गिरते अंगारों की असलियत मैं नहीं समझ पाई कि तब मुझे क्या करना चाहिए।"

"नीलकंठ तुमसे ज्यादा ज्ञानी है?"

“हां। वो मुझसे कहीं आगे है। परंतु मिन्नो में आकर, वो ज्यादा खुलकर काम नहीं कर सकता। ऐसे में वो शायद ही मेरे से ज्यादा काम कर सके। परंतु ये तो पक्का है कि मिन्नो को बचाने में वो पूरी ताकत लगा देगा।” तवेरा ने सोच-भरे स्वर में कहा।

मोना चौधरी मुस्करा पड़ी।

मखानी ने पास पड़ी कमला रानी को पैर मारा।

“क्या है?” कमला रानी झुंझलाई।।

"धीरे बोल। लोगों को क्यों सुनाती है।” मखानी ने तीखे स्वर में कहा।

“तूने मुझे पैर क्यों मारा?"

"प्यार से मारा था।"

"मैं सब समझती हूं।"

"यहां अंधेरा है। शादी-ब्याह का माहौल है। मजे लेने के एक नहीं. कई मौके मिलेंगे।” ।

"मजे?" कमला रानी ने उसे देखा।

“अंधेरे में। कोने में।"

"इसके अलावा तेरे को कोई दूसरा काम नहीं।”

“ये काम ही पूरा नहीं होता कि दूसरा कर सकूँ।” मखानी ने गहरी सांस ली—“जब मेरे को कुएं में फेंका तो तेरे को क्या लगा?"

"मैंने तो सोचा कि तू मर गया।"
 
"फिर?"

“मैं रोई, तड़पी कि मेरा मखानी मर गया।"

"सच।"

"तेरी कसम । मेरा तो दिल ही डूब गया था।"

"फिर तूने क्या किया?"

"मैंने तेरे पीछे कुएं में छलांग लगा दी।"

"लगता तो नहीं कि तू इतनी बहादुर है। तेरे को उसने ही नीचे फेंक दिया होगा।"

“वो तो मुझे बाहों में लेने को कह रहा था कि मुझे कुएं में नहीं फेंकेगा। परंतु मैं तो तेरी दीवानी हूं। लगा दी कुएं में छलांग।” ।

“छोड़ो, बीती बातों पर क्या बहस करना । चल जरा अंधेरे में खिसक जाते हैं। प्यार करेंगे।"

तभी ब्याह वाले घर की तरफ से एक आदमी को इस तरफ आते देखा। वो सफेद कमीज-पायजामे में था और सिर पर गुलाबी पगड़ी बांधी हुई थी। उसकी चाल में खुशी के भाव थे।

सबकी निगाह उस पर जा टिकी। वो पास आते ही कह उठा। "ओह, बाराती पहले से ही आ पहुंचे हैं। बारात भी आती होगी। आइए, भीतर चलिए। आप लोग यहां क्यों बैठे हैं।” __

“बाराती?" रुस्तम राव के होंठों से निकला।

"बारातो बोत बनो हो अंम । परो म्हारी बरातो कमो न निकलो हो।”

“तुम कौन हो?" देवराज चौहान ने पूछा।

“हम लड़की वाले हैं। चलिए, भीतर चलिए आप सब।"

“लेकिन... ।” रातुला ने कहना चाहा।

_

तभी तवेरा ने रातुला का हाथ दबाया। रातुला ने तवेरा को देखा।

“मत भूलो कि हम महाकाली की मायावी पहाड़ी के भीतर हैं। यहां हर बात का कोई मतलब अवश्य है।"

"ये हमें बाराती कह रहा..."

"तो हम बाराती बन जाएंगे।” तवेरा का स्वर धीमा था।

"भूख भी लगी है।" महाजन ने कहा। वो आदमी आदर-भरे ढंग से खड़ा रहा।

"चल्लो।" बांकेलाल राठौर उठता हुआ बोला—“ब्याहो बोतो देखो हो, यो ब्याह भी देख लयो।"

सब उठ खड़े हुए।

"आइए...आइए।" वो आदमी आगे बढ़ता कह उठा। ‘

सब उसके पीछे चलते मकान के गेट पर पहुंचे। वहां गुलाबी पगड़ी पहने तीन-चार आदमी मौजूद थे।

बांकेलाल राठौर मूंछ पर उंगली फेरता सबसे आगे था कि एकाएक उसकी आंखें सिकुड़ीं। ___

मकान के भीतर से बांदा आता दिखा। सफेद कमीज-पायजामें के ऊपर उसने गुलाबी पगड़ी बांध रखी थी। उसके चेहरे पर कोमल मुस्कान थी।

"तंम बांदो।"

"स्वागत है आप सबका।” बांदा पास में ठिठककर मधुर स्वर में बोला।

"तंम लड़की वाले हो?"

“हां भंवर सिंह।"

"लड़का ढूंढ़ने से पैले म्हारे को पूछो तो लयो हो।”

“वो क्यों?"

"अंम भी राजी हौवो ब्याह को। म्हारे को एको बोत बड़ी शिकायतो हौवे।"

"क्या?"

“थारा बापो तो तुमसे भी बड़ो हरामी हौवे। प्रणाम सिंहो नाम हौवे ना उसो का?"

"हां, वो ही मेरा पिता है।"

"म्हारे को कुओ में फैंको दयो।”

“पिताजी की इन्हीं आदतों से मैं परेशान हूं। बहुत समझाया, परंतु वो मानते नहीं।”

“का समझायो?"

“कि जिसको कुएं में फेंको, गर्दन काट के फेंको। ताकि वो किसी से शिकायत न कर सके।"

“तम सबो ही हरामी हौवो। एक बातो तो बतायो।”

"क्या?"

"म्हारे ब्याह का इधरो कोई चांस हौवे? कोई छोरी दुल्हो के वास्तो बैठी, म्हारा इंतजार करो हो । ___

“यहां सब ब्याहता हैं। एक ही कंवारी थी, उसका ब्याह आज हो रहा है।"

“ब्याहतो भी चल जायो।"

“सबके पति जिंदा हैं भंवर सिंह। तुम्हारा ब्याह नहीं हो सकता।"

"तंम तो हरामी हौवो। म्हारा केई पे जुगाड़ो भिड़ा दयो।"

तभी पीछे से महाजन पास आया। “तुम्हें यहां देखकर हैरानी हुई।"

“मैं तो आप लोगों का सेवक हूं। जहां आप जाएंगे। मुझे पाएंगे।" बांदा मुस्कराकर बोला।

"हमें भूख लगी है।"

"चलिए। उधर खाने का इंतजाम है। खाना भी तैयार है। सब मेरे पीछे-पीछे आ जाएं।” कहकर वो आगे बढ़ गया।

सब उसके पीछे चल पड़े।

"बांदा भी यहां है।" नगीना बोली—“कुछ तो गड़बड़ होगी ही।"

“तुम ठीक कहती हो।” देवराज चौहान ने गम्भीर स्वर में कहा।

“ये हमें हर बार किसी मुसीबत में डाल देता है।"

"इस बार देखते हैं कि ये क्या करता है।" देवराज चौहान मुस्करा पड़ा।

मोना चौधरी तवेरा के पास पहुंचकर बोली। "तुम बांदा पर काबू नहीं पा सकती?"

"नहीं। महाकाली ने इस वक्त बांदा को खास ताकतें दे रखी हैं। ये उन्हीं का फायदा उठा रहा है।" तवेरा ने कहा।

“तुम महाकाली से बहुत कमजोर हो।”

"मैंने कभी कहा ही नहीं कि मैं महाकाली का मुकाबला कर सकती हूं। परंतु तुम क्यों उस पर काबू पाने की सोच रही हो?"

“बांदा, महाकाली का भेदी है। ये सब कुछ जानता है और बार-बार हमें मिलकर किसी नए रास्ते में फंसा देता है। अगर बांदा पर काबू पा लिया जाए हम इससे अपने काम की कई बातें जान सकते हैं।"

“जथूरा के बारे में जान लेना चाहती हो तुम?"

“सब कुछ। खासतौर से महाकाली का ठिकाना।"

"महाकाली का ठिकाना कोई नहीं जानता। मैंने तो बरसों से नहीं सुना कि वो किसी के सामने आई हो। जहां भी जरूरत होती है अपनी परछाई को भेज देती है। उससे मिल पाने का खयाल अपने मन से निकाल दो।"

“मैंने तो सोचा था कि तुम इस बारे में कुछ कर पाओगी।"

"ये बात नीलकंठ से क्यों नहीं कहती कि...।"

“वो सब देख-सुन रहा है।" मोना चौधरी कह उठी—“यहां के हालातों से वाकिफ रहता है। जरूरत पड़ी तो वो जरूर कुछ करेगा।"

“नीलकंठ के लिए भी ये सब हालात आसान नहीं हैं।"

वो सब खाने वाली जगह पर पहुंचे। तम्बू लगा हुआ था। भरपूर रोशनियां थीं।

परंत अगले ही पल वो ठिठककर रह गए।

खाने की एक टेबल गर्म खानों से भरी पड़ी थी। पास में कुर्सियां रखी थीं। खाने की खुशब वहां फैली हई थी। हैरानी की बात तो ये ही थी कि उस टेबल के अलावा कहीं पर भी खाना और नहीं था। जबकि उन्हें लग रहा था कि सारा तम्बू बारात के लिए खाने के वास्ते भरा पड़ा होगा। परंतु ऐसा कुछ नहीं था।

ये सवाल सबके जेहन में कौंधा। उन्होंने ठिठककर बांदा को देखा तो बांदा कह उठा। “क्या हुआ?"

"बारात का खाना कहां है?"

"आपके सामने टेबल पर।” बांदा ने मुस्कराकर कहा।

"लेकिन बारात का खाना तो.... "

"बारात आ चुकी है।” बांदा बोला—“आप सब ही तो हैं बाराती। आप लोगों ने ही आना था।"

"अंम बराती हौवे?"

“हां, आप सब ही बाराती हैं।"

“दूल्हो कौणों हौवे?"

"आप सब में कोई एक दूल्हा बनेगा। लेकिन पहले खाना खा लीजिए।"

"अंम बनो दूल्हो।”

“मैं बनूंगा।” मखानी कह उठा।

“तू।” कमला रानी हड़बड़ाई-"तो मेरा क्या होगा।” ।

“जो भी हो। मुझे क्या। जब भी तेरे को कहता हूं तू नखरे दिखाती है।"

“खाना तो खा ले पहले।” कमला रानी मुस्कराई—“फिर मैं घोड़ी बनूंगी, तू दूल्हा बनना।"

“पक्का ।" कमला रानी ने हाथ बढ़ाकर उसके गाल को छुआ। मखानी खिल उठा और बांदा से बोला। "मुझे नहीं बनना दुल्हा। अपनी कमला रानी ही ठीक है।"

“मखानो।” बांकेलाल राठौर कह उठा—“तंम बच गयो। वरनो अंम थारो गलो अम्भी 'वड' दयो हो।” ।

“दूल्हा कौन बनेगा, इसका फैसला दुल्हन करेगी।” बांदा ने कहा।

बांदा को घूरता देवराज चौहान कह उठा। "आखिर तुम क्या खेल खेल रहे हो।"

"ये तो कोई खेल नहीं देवा।” मुस्कराया बांदा।

"खेल ही है। जहां हम जाते हैं, वहां तुम या तुम्हारे पिता प्रणाम सिंह आ जाते हैं और हमें मनचाही जगह धकेल देते हैं। आखिर तुम सब करना क्या चाहते हो?” देवराज चौहान ने शांत स्वर में कहा।

"मेरा काम आप लोगों को भटकाकर, गहरे खतरे में डालना है।"

“गहरा खतरा?"

"हां, आप लोग जल्दी वहां पहुंचने वाले हैं।"

“अगर हम तुम्हारी बातें न माने तो?"

"माननी पड़ेगी, वरना बड़ी मुसीबत में फंस जाओगे। अगर तुम महाकाली की इस मायावी पहाड़ी से बाहर निकलना चाहते हो तो बता दो।"

"मैं बाहर क्यों जाऊंगा?"

"होने वाली इन बातों से तंग आ जाओगे तो अवश्य यहां से बाहर जाना चाहोगे।"

"हम जथूरा को आजाद कराने आए हैं।"

"वो आपकी मर्जी, परंतु इस कोशिश में आप सफल नहीं हो सकते।" बांदा बोला।

“महाकाली से हम मिलना चाहते हैं।” पारसनाथ ने कहा।

"महाकाली किसी से नहीं मिलती। वो सिर्फ अपनी परछाई को ही भेजती है बातचीत के लिए।"

"उसकी परछाई से हमारी बात कराओ।" ।

"ये बात तो महाकाली की मर्जी पर निर्भर है कि वो बात करना चाहती है या नहीं। बात करना चाहती होती तो अब तक आपके पास अपनी परछाई को भेज चुकी होती।” बांदा ने नगीना, देवराज चौहान को देखते हुए कहा।
 
"इन बातों को छोड़ो। पहले खाना खा लें।” महाजन ने कहा।

उसके बाद वे बांदा की तरफ से ध्यान हटाकर सब खाना खाने लगे।

बांदा एक तरफ शराफत से खड़ा हो गया।

मखानी ने रोटी पर सब्जी लगाकर कमला रानी की तरफ बढ़ाया।

"ले मुंह खोल।”

“क्यों मेरे हाथ टूटे हैं क्या। मैं नहीं खा सकती।” कमला रानी ने मुंह बनाकर कहा।

“समझा कर।" मखानी प्यार से बोला—“इससे प्यार बढ़ता है।"

"प्यार ।” कमला रानी ने उसे घूरा—“अभी तो तू ब्याह करने को तैयार था।" ___

“वो...तो यूं ही।” मखानी ने दांत दिखाए—“तेरे को चिढ़ा रहा था।"

“मैं सब समझती हूं। तेरे को इधर-उधर मुंह मारने की बुरी आदत है।" __

“तू समझती नहीं कमला रानी।" मखानी ने समझाने वाले स्वर में कहा—"मैं ब्याह कर लेता तो, तब भी तेरा ही रहना था। तेरे को भूल थोड़े न पाता। तू तो मेरी जान है। तेरे बिना तो..."

"बस कर । तेरी बात सुनकर तो खाया-पिया बाहर आ जाएगा।"

"तो पक्का है न?" मखानी ने धीमे स्वर में पूछा।

"क्या?"

"खाने के बाद हम प्यार... ।” मखानी ने कहना चाहा।

“पहले खाना खा ले। कहीं मेरा जवाब सुनकर तेरी भूख ही गायब न हो जाए।"

जब तक खाना चलता रहा। बांदा कुछ भी नहीं बोला। खाने से जब सब फारिग हुए तो बांदा कह उठा। "चलिए। दुल्हन के पास जाना है।"

"क्यों?"

“दुल्हन ने अपना वर चुनना है।"

तबला-ढोलक और शहनाई की आवाज उनके कानों में पड़ रही थी।

"हम में से कई पहले से ही शादीशुदा हैं।” महाजन बोला।

“उससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” बांदा ने मुस्कराकर कहा।

.

"क्यों फर्क नहीं पड़ता।” नगीना कह उठी—“कंवारों में तो बांके, रुस्तम या मखानी ही हैं।”

"इसका फैसला दुल्हन करेगी।"

नगीना कुछ कहने लगी कि देवराज चौहान बोला। “चुप रहो और देखो आगे क्या होता है।"

"मेरे पीछे आइए।" बांदा आगे और बाकी सब पीछे चल पड़े। चलते-चलते देवराज चौहान और मोना चौधरी करीब आ गए।

"आखिर हम बांदा की बातें क्यों माने जा रहे हैं?" मोना चौधरी बोली।

"हालात हमारे सामने ऐसे होते हैं कि हम अपनी सोचों का इस्तेमाल नहीं कर पा रहे।"

“बांदा हमें जथूरा से दूर ले जाने की चेष्टा कर रहा है।”

“मालूम है।” देवराज चौहान गम्भीर था।

“अब से हम बांदा की कोई बात नहीं मानेंगे।"

"अभी से?"

"हां"

“मेरा खयाल है कि हमें देख लेना चाहिए कि इस बार बांदा क्या चाहता है। ये हमारी मर्जी है कि हम उसकी बात माने या नहीं।"

मोना चौधरी ने खामोशी से सिर हिला दिया। बांदा के पीछे वे ब्याह वाले घर में प्रवेश कर गए।

“छोरे।” बांकेलाल राठौर रुस्तम राव के पास पहुंचा।

"बोल बाप।”

"तंम कम्पोटीशनो से हट जाओ।"

"मैं समझेला नेई बाप।”

"तंम बोल्लो कि तंम ब्याहो न करो। मखानो को अंम सम्भालो। दुल्हनो म्हारे से ही ब्याह करो हो।"

"बाप, तेरे बस का कुछ नेई होईला।”

"टेड़ा मतो बोल्लो छोरे।"

"सच कहेला अंम।" रुस्तम राव ने बुरा-सा मुंह बनाया।

"ईब की बारो मौको न चूको अंम।" बांकेलाल राठौर का हाथ मुंछ पर पहुंच गया।

"कोई फायदा नेई होईला बाप।” __

तभी कमला रानी, चलते-चलते बांकेलाल राठौर के करीब आ गई।

बांकेलाल राठौर ने उसे देखा।

कमला रानी अदा के साथ मुस्कराई।

बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर जा पहुंचा। छाती कुछ फूल गई।

"तुम शादी करने जा रहे हो।” कमला रानी ने प्यार से पूछा।

"कम्पोटिशन हौवे। छोरा और मखानो भी लाइनो में लगो हो।"

“मखानी तो हट गया लाइन से।"

“थारे को बैंकयो।”

"तेरे को क्या जरूरत है शादी करने की?" कमला रानी कह उठी।

"बोत जरूरतो हौवे म्हारे को।"

“क्या?" बांके पल-भर के लिए हडबडाया फिर कह उठा। "बसो, जरूरतों हौवो। तंम ही बोल्लो का करो हो ब्याह करके?"

"बच्चे पैदा करते हैं।"

“अंम भी पैदो करो।"

“मैं तो सोच रही थी कि तेरे साथ जोड़ा बना लूंगी।"

“म्हारे संगो। मखानो ने मणों कर दयो का?"

“वो पुराना हो गया है। तू नया है। तेरी मूंछे मुझे बहुत पसंद –

“थारे को प्राब्लमो लगो हो म्हारे ब्याहो से। तम्भी तंम म्हारी राह में आयो हो।”

"मैं तेरे को बहुत...।"
 
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