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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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तभी मखानी पास आ पहुंचा।

“क्या कर रही है इसके साथ?" मखानी की आवाज में नाराजगी के भाव थे।

“भैया से बात कर रही हूं। तुझे क्या?"

“भायो?" बांकेलाल राठौर सकपकाया।

“समझा कर, इसे बहला रही हूं।"

“बहला रही हो मुझे?" मखानी ने आंखें निकालीं।

"तम दोनों को बहला रही हैं।"

“यो तो बोत खतरनाको हौवे । यो तो.... "

तभी बांदा एक कमरे के बंद दरवाजे के सामने रुकता कह उठा।

“इस कमरे में दुल्हन है।" भीतर से ढोलकी की और खिलखिलाने की आवाजें आ रही थीं। “आप लोग एक-एक करके यहां से भीतर जाएंगे और दुल्हन हैं।"

आपको पसंद या ना पसंद करने के बाद दूसरे दरवाजे से बाहर निकाल देगी।" बांदा ने मुस्कराकर सबको देखते हुए कहा।

"तुम खेल क्या खेलना चाहते हो?"

"कोई खेल नहीं देवा। ये तो ब्याह की रस्म निभाई जा रही है।" बांदा ने कहा।

"इस रस्म की आड़ में तुम क्या करना चाहते हो?"

“मैं तो महाकाली का हुक्म बजा रहा हूं।”

"और महाकाली नहीं चाहती कि हम तिलिस्म तोड़कर, जथूरा को आजाद कराएं।"

“वो क्या चाहती है, मैं नहीं जानता। मैं तो उसके आदेशानुसार काम कर रहा हूं।" बांदा ने सबको देखते हए कहा-"कि इस काम में औरतों का कोई काम नहीं, इसलिए वो पहले एक-एक कमरे में जाएंगी, जिन्हें दूसरी तरफ से निकाल दिया जाएगा। उसके बाद मदों की बारी शुरू होगी।"

देवराज चौहान और मोना चौधरी की नजरें मिलीं।

"इसके बाद हम बांदा की कोई बात नहीं मानेंगे।" देवराज चौहान ने सिर हिला दिया। बांदा ने दरवाजा खटखटाया।

अगले ही पल दरवाजा खुला। दरवाजा खोलने वाली बीस बरस की हसीन और खूबसूरत लड़की थी, जिसने आसमानी रंग का सूट पहन रखा था। दुपट्टा ओढ़ रखा था। चुटिया कूल्हों तक लम्बी थी।

"हुक्म?" वो बांदा से बोली।

“युवतियों को एक-एक करके भीतर ले जाओ और दूसरे रास्ते से बाहर निकाल दो।"

“जी।” फिर वो आगे खड़ी नगीना से बोली—“आइए।" नगीना उसके साथ जाने लगी तो मोना चौधरी ने टोका। "पहले मैं जाऊंगी।"

"ठीक है। आप आ जाइए।" आगे बढ़कर मोना चौधरी ने भीतर प्रवेश किया। दरवाजा पुनः बंद हो गया।

भीतर से हंसने-खिलखिलाने की, युवतियों की आवाजें बराबर आ रही थीं।

दो मिनट बाद दरवाजा खुला। वो ही आसमानी सूट वाली युवती थी।

“अब आप आइए।" नगीना कमरे में प्रवेश कर गई।

दरवाजा पुनः बंद हो गया।

"दरवाजा बंद करने की क्या जरूरत है?" महाजन कह उठा।

"ब्याह वाला घर है।" बांदा ने कहा—“सब युवतियां शरारत से भरी पड़ी हैं। इस वक्त इन्हें कुछ भी कहना ठीक नहीं।”

"ये एक-एक को क्यों भीतर ले जा रही है। हमें इकठे भी तो भीतर ले जाया जा सकता है।” तवेरा ने कहा। __

“ये बात तो ये युवतियां ही जानें।” ।

तभी दरवाजा खुला और आसमानी सूट वाली युवती कमला रानी से बोली।

“तुम आओ।"

कमला रानी ने मखानी से कहा। "तुम ब्याह के लिए हां मत करना।”

मखानी ने कमला रानी के कान में कुछ कहा। जिसे सुनकर कमला रानी ने मुस्कराकर कहा। "उसकी तू फिक्र मत कर। तेरे को उसमें नहला दूंगी।"

"ठीक है।” मखानी खुशी से भर उठा—“मैं ब्याह नहीं करूंगा।"

कमला रानी कमरे में चली गई। दरवाजा फिर बंद हो गया।

“छोरे।" बांके रुस्तम राव के कान में बोला।

"बोल बाप।”

"म्हारे को तो दुल्हनो के बदले यो आसमानी कपड़ों वाली ही बोत पसंद आ गयो हो।"

"तेरे को तो सब पसंद आईला बाप।"

“यो उम्रो ही ऐसी हौवे । सबो ही भलो लगे हो।"

“कमला रानी तेरे से क्या बात करेला बाप?"

“दानों फैंको हो अंम पे। ईब वो देखो हो कि म्हारा ब्याह हो जाइयो तो सबो कुछ देने में तैयार होवे वो।"

“सब कुछ क्या बाप?"

"मत पूछो छोरे। म्हारो पूरा ध्यानो दुल्हनो पर हौवे। तन्ने म्हारे कम्पोटिशन में नेई आणो।"

“नेई बाप। इस मामले में आपुन नेई पड़ेला।"

“समझदारो हौवो तम।”

तभी दरवाजा खुला। तवेरा भीतर गई। दरवाजा बंद हो गया।

“यो तो बोतो ही देर लगो हो।"

"हौंसला रखेला बाप।"

"म्हारो दिल बजो हो जोरों से।"

“घबराने का नेई बाप।”

"तंम म्हारे साथो हौवो न?"

“पक्का बाप।”

“थारा ही सहारो हौवे ईब म्हारे को। म्हारे को पसीनो आयो हो।"

“दुल्हन देखने से पहले ही तू पसीने से भीगेला बाप ।”

"म्हारो यो ही आदतो हौवे।”

तभी दरवाजा खुला और उस युवती ने सब पर नजर मारी। बांदा कह उठा।

" सब से पहले कौन जाना चाहेगा?"

“मैं जाऊंगा।” देवराज चौहान बोला।

दरवाजे पर खड़ी आसमानी कपड़े वाली युवती मुस्कराकर बोली।

“आइए। दुल्हन आपका इंतजार कर रही है।" देवराज चौहान खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गया। युवती ने दरवाजा बंद कर लिया।

"देवराज चौहानो तो गयो। ईब पीछो वाले दरवाजे से ही बाहरो निकलो हो।”

__ “ये शादीशुदा होईला। तुरंत पीछे वाले दरवाजे से दुल्हन इसे निकाईला।



"म्हारे को डर लगो हो कि दुल्हनो देवराज चौहानो को पसंदो न कर लयो।"

"देवराज चौहान शादी को तैयार नेई होईला बाप।”

"म्हारा चांसो खूबो हो।"

“पक्का बाप।”

तभी दरवाजा खुला। वो आसमानी कपड़े वाली युवती दिखी।

बांदा आगे खड़े महाजन से बोला। “तुम जाओ।”

महाजन खुले दरवाजे से भीतर प्रवेश कर गया।

"देवराज चौहानो को पसंद तो न करो हो दुल्हनो?" बांके ने जल्दी पूछा।

युवती उसे देखकर मुस्कराई और दरवाजा बंद कर लिया।
 
"म्हारे को तिरछी नजरों से देखो हो। बोल्लो ना।” बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस ली।

बांदा मुस्कराता हुआ बारी-बारी सबको देखे जा रहा था। तभी दरवाजा खुला।

पारसनाथ भीतर प्रवेश कर गया। दरवाजा पुनः बंद हो गया। बांकेलाल राठौर बांदा के पास पहुंचा। "बांदो।"

"बोल भंवर सिंह।

"म्हारा दिल जोरों से बजो हो कि वो म्हारे को पसंद करो या न करो।"

"ये तो मैं भी नहीं बता सकता।"

“उधरो ब्याहो की तैयारियो, सबो पूरो हौवे न?"

"सब पूरी है।"

“पण्डतो ब्याह के फेरो वास्ते आ गयो?"

"हां, वो तो कब से तैयार बैठा है।"

"घोड़ी न दिखो हो?"

"वो भी तैयार खड़ी है।" बांदा ने कहा।

“दुल्हनो म्हारे को पसंद कर लयो तो कोई अड़चनो ना हौवे ब्याह को।"

"हां भंवर सिंह। तब तो तुरंत ब्याह हो जाएगा।"

बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस ली। तभी दरवाजा खुला। मखानी भीतर चला गया। दरवाजा फिर बंद हो गया।

"छोरे।” बांकेलाल राठौर रुस्तम राव के पास पहुंचा।

"बोल बाप।”

“यो मखानी गड़बड़ कर दयो हो। दुल्हनो मखानी को पसंद कर लयो तो मखानी ब्याह के लिए तैयार हो जाए।"

“ये खतरा तो होईला।"

"ऐसो हो गयो तो अंम कमलो रानी से काम चला लयो।"
 
"पैले ही सब सोचेला बाप।”

"म्हारे को ब्याहो की बोत जरूरतो हौवे । गुरदासपुरो वाली म्हारे को धोखो दे दयो।”

उसके बाद रातुला और फिर रुस्तम राव गया।

अब बांकेलाल राठौर ही अकेला बचा था दरवाजे के बाहर। __ “बांदो।" बांकेलाल राठौर कह उठा—"म्हारी बारो सबसे बादो में आयो हो।”

“अब क्या चिंता। अब तो तुम ही बचे हो।"

“वो पैले किसी दूसरो को पसंद कर लयो तो म्हारा नम्बरो तो कट गयो।

बांदा मुस्कराता हुआ उसे देखता रहा।

"तंम क्यों मुस्करावो?"

"तुम्हें बहुत जल्दी है ब्याह करने की।"

“खासो जल्दो न हौवे, पर हो जावे तो अंम भी ठिकाणो लग जायो।” बांकेलाल राठौर ने गहरी सांस ली।

“मैंने दुल्हन से कह रखा है कि मूंछों वाले को पसंद करे।" बांदा बोला। ___

“सच्चो?" बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर जा पहुंचा—“मन्ने मूंछों को बोत प्यार से पालो हो। उसो ही प्यार से दुल्हनों को भी पालो। ईक बार फेरे हो जाणे दयो। काम हो जाणे दयो।”

तभी दरवाजा खुला। आसमानी कपड़े वाली युवती दिखी। वो बांके से कह उठी।

"आइए—आइए। अब तो आप ही का इंतजार है।"

"..म्हारा?" बांकेलाल राठौर की आंखें चमकीं।

“जी हां। अब तो सिर्फ आप ही बचे हैं।"

"म्हारे को शिकायत हौवे। तंम म्हारे को बोत इंतजारो करायो।"

“सब शिकायत दूर ही जाएगी। दुल्हन आपका इंतजार कर रही

"म्हारा?" बांके ने बांदा को देखा।

बांदा ने मुस्कराकर सिर हिलाया।

बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर जा पहुंचा। आगे बढ़ा और युवती से बोला।

"चल्लो, अंम भी तैयार हौवो।"

युवती ने रास्ता दिया। बांके ने भीतर प्रवेश किया तो युवती ने दरवाजा बंद कर लिया।

बांकेलाल राठौर भीतर प्रवेश करते ही ठिठका।

दस-बारह युवतियां थीं वहां सजी-संवरी सी। हर एक के चेहरे से नूर चमक रहा था। खूबसूरती देखते ही बनती थी। एक युवती एक तरफ बैठी ढोलक बजा रही थी। दूसरी तबला बजा रही थी। बाकी दुल्हन को घेरे बैठी खिलखिलाकर हंस रही थीं। दुल्हन बूंघट ओढ़े शानदार बेड पर बैठी थी। ये सब देखते हुए बांके की आंखों में चमक थी।

आसमानी कपड़े वाली बांके की बांह पकड़ते कह उठी। “दुल्हन के पास तो चलिए। आप तो घबरा रहे हैं।"

बांके ने प्यार-भरी नजरों से उसे देखा। हाथ मूंछ पर पहुंच गया। "अंम आपो से कुछो कहो?"

"कहो-कहो।”

"म्हारे को तो आप ही बोत जंचो हो।"

आसमानी कपड़े वाली खिलखिलाकर हंसी फिर कह उठी।

"एक बार दुल्हन को देख लीजिए। उसके बाद आपको दूसरी पसंद नहीं आएगी।"

"म्हारे को आप ही ठीको लगो।”

"चलिए भी। दुल्हन को तो आपको देखना ही पड़ेगा।"

"बादो में तंम म्हारे को किधरो मिल्लो हो?"

“मैं तो दहेज में साथ चलूंगी।"

"सच्चो ।”

"बिल्कुल सच। कसम से।"

“फिरो ठीको। दुल्हनो भी म्हारी। सखी भी म्हारी । ईक बात बतायो।”

"क्या?"

“दुल्हनो को अम्भी तको कोई पसंदो न आयो?"

“नहीं। दुल्हन को तो मूंछे पसंद हैं।"

“वो म्हारी हौवे।"

"तभी तो वो तुम्हें पसंद करेगी। चलिए, एक बार दुल्हन से हाथ फिरवा लीजिए।"

"हाथ फिरवा लयो। किधरो?"

"चलो भी। वो बांके को खींचती कह उठी—"इतनी बातें तो किसी ने भी नहीं पूछीं।"

"म्हारी जिंदगो का सवाल हौवे, इसो वास्ते अंम पूछो हो।” बांके उसके साथ आगे बढ़ा।

दुल्हन की सहेलियां शरारत-भरे अंदाज से हंस रही थीं। ढोलकी और तबला बजाया जा रहा था।

ऐसे माहौल में अलग ही आनंद आ रहा था। आसमानी कपड़े वाली बांके को लेकर बेड के पास पहुंची और कह उठी।

“दुल्हन साहिबा। आपका मूंछों वाला दूल्हा आ गया।" बांके का हाथ मूंछ पर पहुंच गया। गर्दन थोड़ी अकड़ गई।

"कैसा लगता है मूंछों वाला कड़क गबरू?" बूंघट उठाए बिना दुल्हन ने पूछा। दुल्हन की मादकता से भरी आवाज सुनकर बांके जैसे निहाल हो गया।

"मैं क्या बताऊं।" आसमानी कपड़े वाली हंसकर बोली—“बिल्कुल वैसा ही लगता है, जैसा दूल्हा आपको चाहिए।"

बांकेलाल राठौर ने सहमति से सिर हिलाया फिर कह उठा। “अंम थारे को बोत सुखो रखो।"

“और।” दुल्हन ने धूंघट की ओट से पूछा।

"अंम थारे को लम्बी मोटर गाड़ी दयो।”

"और"

“थारे को दिल की रानी बनायो के पालो हो। थारी बोत सेवा करो। थारे पांवों जमीन पर न पड़ने दयो कि मैले हो जावे। अंम थारे को गोदी में खिलायो। बोत प्यारो से रखो।"

"और।"

"ओरो।" बांकेलाल राठौर के चेहरे पर सोच के भाव उभरे—“हर वक्तो थारे दिलो को बहलाऊं।"

"मेरी खूब सेवा करोगे?" दुल्हन ने पूछा।

“खूब ।"

“मुझे खाना बना के खिलाओगे?"

"बोत बढ़ियो खाणो बनाऊं थारे वास्तो।"

"प्यार में कोई कमी तो नहीं रखोगे?"

"बोत प्यार करूं थारे को। तभ्भी तो अंम ब्याह करणो चाहो हो। प्यारो के वास्ते।”

"मेरे को बहन बना के रखोंगे?"

"अंम थारे से राखो भी बंधवायो—अंम... " एकाएक बांकेलाल राठौर ठिठका और चूंघट को देखता कह उठा—“अंम थारे से ब्याहो करो हो। थारे को बहन बना के ना रखो, औरतो बना के रखो हो।”

"फिर तो आप मेरे को पसंद हैं।" बांकेलाल राठौर की आंखें चमक उठीं।

“पक्का अंम थारे को पसंद हौवे?"

"हां"

"तंम म्हारे से ब्याह करो हो?"

"हां।"

"चल्लो। बाहर पंडतो भी हौवे। सबो इंतजाम होवे। अंम जल्दो से ब्याह कर लयो।”

"कितना परेशान है ब्याह को।” आसमानी कपड़े वाली गहरी सांस लेकर कह उठी— “दुल्हन को देखने की भी चाह नहीं।"

“सारो जिंदगो दुल्हनो को ही तो देखना होवे।"

तभी दुल्हन ने बूंघट पलट दिया। दुल्हन पर नजर पड़ते ही बांकेलाल राठौर की आंखें फैल गईं। "तंम?"

साड़ी में प्रणाम सिंह मौजूद था। प्रणाम सिंह मुस्कराया।

“तंमने म्हारे को कुओं में फेकों हो ईब यां पे दुल्हनो बनके बैठ गयो। तंम बोत बड़ो हरामो हौवे—तंम... ।”

तभी सारी युवतियां बांकेलाल राठौर पर झपट पड़ीं।

“यो का करो हो।” बांकेलाल राठौर ने बचना चाहा। परंतु युवतियों ने उसे अच्छी तरह जकड़ लिया।

साड़ी में फंसा प्रणाम सिंह बेड से नीचे उतरा और थोड़ा-सा झुकते हुए बेड को धकेला तो बेड बे-आवाज-सा एक तरफ सरकता चला गया। उसके नीचे खाली जगह दिखाई दी।

उधर दो युवतियां तबला और ढोलक बजाए जा रही थीं। प्रणाम सिंह पीछे हटता, बांके को पकड़े युवतियों की तरफ इशारा किया। ___

“यो का करो। मन्ने एको से ही ब्याह करणो हौवे । सबो से नहीं।" बांकेलाल राठौर युवतियों की पकड़ में हड़बड़ाया-सा खड़ा था।

युवतियां बांके को धकेलकर, बेड के नीचे वाली खाली जगह पर लाईं। ____

“ईब समझो। यो थारा पीछो वालो दरवाजो हौवे। इधरो ही तमने सबो को फेंको हो, ईब म्हारे को फेंको इधरो।"

युवतियों ने उसे धक्का देना चाहा। परंतु बांके खुद को संभालता कह उठा।

"प्रणाम सिंहो, अंम थारे को 'वड' दयो। अंम थारी औलादो बांदो को भी... "

तभी युवतियों ने मिलकर उसे उठाया और बेड के नीचे की खाली जगह के भीतर फेंक दिया।

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मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास, सपन चड्ढा जब महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के नीचे पहुंचे तो आधी रात हो चुकी थी।

आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। ठंडी हवा चल रही थी। परंतु लक्ष्मण और सपन पूरी तरह पसीने से भीगे हुए थे। थककर चूर हो गए थे वे। उनकी बात नहीं मानी गई, वरना वो तो रास्ते में ही लेट जाते।

वहां पहुंचते ही दोनों जमीन पर जा बैठे। __

“तुम इंसान बहुत जल्दी थक जाते हो।" मोमो जिन्न ने बुरा-सा मुंह बनाया। -

“चुप कर।” सपन चड्ढा उखड़ा—“यहां जान निकली जा रही है और त...।" ___

“जिन्न से तमीज से बात करो।” मोमो जिन्न ने कठोर स्वर में कहा।

"भूखे पेट हमसे तमीज से बात नहीं होती।” लक्ष्मण दास ने कहा—“खाने का इंतजाम करो।" ।

“पानी भी।” सपन ने कहा- "ठंडा होना चाहिए।"

वहां गहरा अंधेरा था।

मोमो जिन्न ने उंगली आसमान की तरफ करके कुछ बुदबुदाया तो उसके दाएं हाथ की तर्जनी उंगली के ऊपर के हिस्से में टॉर्च की तरह तीव्र रोशनी हो उठी। आस-पास की सारी जगह स्पष्ट नजर आने लगी। __

“तुम्हारे पीछे खाना पड़ा है। खा लो।” मोमो जिन्न ने कहा।

दोनों ने फौरन पीछे की तरफ देखा तो वहां बर्तनों में खाना और पानी पड़ा देखा। दोनों ने राहत की सांस ली और खाने के पास पहुंचकर, खाने में व्यस्त हो गए।

"तुम भी खा लो।" लक्ष्मण कह उठा।

“खबरदार। जिन्न से खाने-पीने की बात मत करो। जिन्नों को भूख नहीं लगती।"

'साला।' सपन बड़बड़ाया—'नौ चूहे खाकर गंगा स्नान की बात करता है।

“नौ नहीं, नौ सौ।” लक्ष्मण दास कह उठा।

"ठीक है, ठीक है।" चिढ़ा-सा सपन बोला_"चहे तो खा लिए।"

“बाकी लोगों को यहां होना चाहिए। परंतु यहां तो कोई भी नजर नहीं आ रहा।”

“वो घोड़ों पर थे। जल्दी पहुंचे। पहाड़ी के भीतर चले गए होंगे।"

“घोडे भी तो नजर नहीं आ रहे।"

“फुर्सत मिलते ही खिसक गए होंगे। हमें खिसकने का मौका नहीं मिल रहा।”

“महाकाली की मायावी पहाड़ी में खतरे होंगे।”

"मेरा मन नहीं कर रहा पहाड़ी के भीतर जाने को।”

“मोमो जिन्न, हमें भीतर लिए बिना मानेगा नहीं।"

"हरामी। हमें पालतू कुत्तों की तरह साथ लिए घूमे जा रहा है।" बातों के साथ दोनों खाते भी जा रहे थे।

मोमो जिन्न की नजरें दूसरों की तलाश में हर तरफ घूम रही थीं।

“यहां तो कोई भी नजर नहीं आ रहा।" मोमो जिन्न बोला।

"तेरे इंतजार में रुके तो रहेंगे नहीं। पहाड़ी के भीतर चले गए होंगे।" लक्ष्मण दास ने कहा।

“पहाड़ी के भीतर नहीं—वापस चले गए होंगे।"

हैं।" “वापस?" लक्ष्मण ने सपन को देखा।

"हां" सपन कह उठा—“जथूरा को आजाद कराकर, वापस भी चले गए होंगे।” ___

“हां-हां।” लक्ष्मण दास जल्दी से बोला—“यही बात होगी। फिर तो हमें भी वापस चलना चाहिए।" ___

“चुप रहो।" मोमो जिन्न ने तीखे स्वर में कहा—“वो सब पहाड़ी के भीतर चले गए हैं। हमें उनके पीछे जाना होगा।"

"क्या ये जरूरी है?"

“बहुत जरूरी है।"

“हम यहीं रहकर उनकी वापसी का इंतजार कर सकते ___

“आलसी मत बनो। समझदार लोग काम करने में सबसे आगे रहते हैं।" ___

“हम थके हुए हैं। नींद भी आ रही है। ये रात तो हम यहीं पर बिताएंगे।"

__ “हमने वक्त नहीं खराब करना है।” मोमो जिन्न बोला—“हमें चलना होगा।”

"हमने कौन-से तीर मार लेने हैं वहां जाकर।” सपन चड्ढा तीखे स्वर में बोला—“यहीं पर उनकी वापसी का इंतजार... " ____

“नहीं, हमें...।" मोमो जिन्न कहते-कहते ठिठका। अगले ही पल उसकी गर्दन थोड़ी-सी टेड़ी हो गई। आंखें बंद कर ली। साथ ही फिर धीरे-धीरे सिर हिलाने लगा। जैसे किसी की बात सुन रहा हो। ___

“जथूरा के सेवकों से बात कर रहा है कमीना।” लक्ष्मण दास कह उठा। ___

मोमो जिन्न धीरे-धीरे सिर हिला रहा था। फिर मोमो जिन्न बोला।

"मैं अभी चल देता है।"

“यहां टांगों की जान निकली हुई है और ये चलने की बात कह रहा है।"

अगले ही पल मोमो जिन्न ने आंखें खोली और दोनों से बोला। "हमें यहां से चलना है।"

“हम नहीं जाएंगे। थके पड़े हैं।” सपन चड्ढा ने कहा—“हम जिन्न नहीं हैं। जो कि...” ।
 
__ “खबरदार जो जिन्न बनने की भी सोची। तुम साधारण लोग जिन्न बनने की कैसे सोच सकते हो। जिन्न बनने के लिए कई

बाधाएं पार करनी पड़ती हैं। तुम लोग तो जरा-सा चल नहीं सकते।" ___

“जरा सा। सारा दिन हो गया चलते-चलते और तुम कहते हो कि...।" __

“ये जरा-सा चलना ही है। मुझे तो समझ में नहीं आता कि इतने दिनों तक तुम लोगों के साथ कैसे रह लिया मैं ।" ___

“क्या?" लक्ष्मण दास हड़बड़ाया—“तुम-तुम कह रहे हो ये बात।"

"मैं क्यों नहीं कह सकता।"

“तुम तो हमें यार कहते थे। हमारे लिए जान देने की बात कहते थे।"

मोमो जिन्न नजरें चुराता कह उठा। "तब की बात और थी।"

"और क्यों थी?"

“वो...वो तब किसी ने शरारत करके मुझ में इंसानी इच्छाएं डाल दी थीं। तब मैं इंसानों जैसा बन गया था।"

“तब हमने ही तुम्हें बचाया कि, तुम्हारे बारे में किसी से कुछ नहीं कहा।" ___

“हमने तुम्हें जलेबियां-रबड़ी खिलाईं। तुम्हें सिल्क के कपड़े सिलवाकर दिए।" (ये सब विस्तार से जानने के लिए पढ़ें अनिल मोहन का पूर्व प्रकाशित उपन्यास 'जथूरा' ।) ____

“खबरदार जो जिन्न से खाने-पीने की बातें कीं।” मोमो जिन्न कठोर स्वर में बोला।

“गलत क्या कहा?"

"तुम दोनों शिष्टता भूल गए हो क्या?"

“जलेबी-रबड़ी खाते हुए तुम्हारी शिष्टता कहां थी।"

"ज्यादा बोले तो मैं तुम लोगों को नंगे कर दूंगा।"

"हां-हां कर दे।” लक्ष्मण दास गुस्से से बोला—“यहां हमें नंगा देखने के लिए है ही कौन।”

"ठीक कहा।" सपन ने सिर हिलाया—“कर दे नंगा।"

मोमो जिन्न ने दोनों को घूरा।

“देखता तो ऐसे है कि जैसे खा जाएगा हमें।” सपन चड्ढा ने मुंह बनाकर कहा।

"बड़े देखे ऐसे जिन्न।”

“मैं तुम दोनों की बुद्धि पलटा रहा हूं। तब तुम जथूरा महान है—जथूरा महान है, ही कहते रहोगे।"

"बुद्धि कैसे पलटाओगे?"

"अपनी ताकत से। तब तुम लोग सोचने-समझने के जरा भी काबिल नहीं रहोगे। मेरे पीछे पूंछ हिलाओगे।"

"पूंछ?"

“मतलब कि कुत्ते बन जाएंगे हम सपन।" लक्ष्मण दास ने कहा।

"ये ऐसा नहीं कर सकता। हमें सिर्फ धमका रहा है।"

"क्या पता कर दे, फिर हम क्या करेंगे?" लक्ष्मण और सपन की नजरें मिलीं।

"क्या करें?" लक्ष्मण दास बोला।

"इस वक्त इसकी बात मान लेते हैं।" सपन चड्ढा ने परेशान स्वर में कहा।

"ठीक है, बाद में साले से निबटेंगे।"

"लेकिन हम थके हुए हैं। चल नहीं सकते।"

उनकी बात सुनता मोमो जिन्न बोला। "मैं तुम दोनों को अपनी शक्ति से पहाड़ी के ऊपर पहुंचा दूंगा।"

"ये ठीक रहेगा।"

"चलो मेरी बांहें पकड़ो और आंखें बंद कर लो।” मोमो जिन्न ने अपनी बांहें फैलाकर कहा।

"ऐसी सैर तो हम पहले भी कर चुके हैं।” (विस्तार से जानने के लिए पढ़िए पूर्व उपन्यास 'जथूरा' ।)

दोनों खाना खा चुके थे।

वे उठे और दोनों ने मोमो जिन्न की फैली बांहों में से एक-एक बांह पकड़ ली।

उसी पल मोमो जिन्न बड़बड़ाया कुछ।

"लक्ष्मण कस के पकड़ना गिर मत जाना।” सपन चीखा।

"तू अपना खयाल रख।”

अगले ही पल मोमो जिन्न का शरीर, दोनों को बांहों में फंसाए, जमीन से ऊपर उठने लगा।

___ मोमो जिन्न के पांव जथूरा के चेहरे पर, नाक की गुफा के पास पड़े। फिर लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा के पांव भी नीचे टकराए। वे सकुशल पहाड़ी के ऊपर चंद मिनटों में पहुंच गए थे।

“यार तुम तो हनुमान जैसे उड़ते हो।” लक्ष्मण दास बोला।

“खबरदार। मैं जिन्न हूं। मुझे किसी के साथ न मिलाओ।"

“जिन्न क्या हो गया, तोप समझता है खुद को।” सपन चड्ढा व्यंग से बोला।

“मेरी बांहें छोड़ो।" दोनों ने बांहें छोड़ी। मोमो जिन्न की उंगली से निकली रोशनी में उन्हें सब कुछ नजर आ रहा था।

“लक्ष्मण। ये क्या, हम पहाड़ी के ऊपर पहुंच गए?"

"हां।"

“जिन्न बनना भी क्या मजेदार खेल है। जहां चाहे पलक झपकते ही पहुंचे जाओ।”

"तो इसने हमें दिन में इतना चलाया क्यों?"

“पागल है साला।"

"शिष्टता से बात करो।” मोमो जिन्न ने सख्त स्वर में कहा।

"शिष्टता से ही तो कर रहे हैं।"

“थोड़ी और शिष्टता का इस्तेमाल करो।"

“सुन लिया सपन।”

"बोलने दे इसे।"

“अगर मेरी बात नहीं मानोगे तो औरतों के बीच में तुम लोगों को नंगा कर दूंगा।"

“यहां औरतें हैं ही नहीं।"

"कहीं तो मिलेंगी। तब मैं... "

"ऐसा मत कह यार—मैं...।"

"मैं जिन्न हूँ यार नहीं।"

“ठीक है। जिन्न ही सही। तू कोई उल्टा काम मत करना। हम तेरी बात मानेंगे।"

"लेकिन अब जाना कहां है?" ___

“हमारे सामने दो गुफाएं नजर आ रही हैं। पहाड़ी के भीतर जाने का रास्ता इन गुफाओं से ही है।"

“ये तो दो हैं, कौन-सी से भीतर जाएं?"

“बाईं वाली गुफा से भीतर जाएंगे।”

पाठक बंधु याद रखें कि देवराज चौहान, मोना चौधरी, अन्य सब दाईं वाली गुफा से भीतर गए थे।

“दाईं से क्यों नहीं?" सपन चड्ढा ने पूछा।

“जथूरा के सेवकों ने मुझे बाईं तरफ वाले रास्ते से भीतर जाने को कहा है।"
 
“ठीक है, चलो।" तीनों आगे बढ़े और बाईं गुफा के भीतर प्रवेश कर गए।

उनके भीतर प्रवेश करते ही वो सारी जगह रोशनी से जगमगा उठी।

मोमो जिन्न ने अपनी उंगली से निकलती रोशनी बंद कर दी।

“ये रोशनी कहां से आ गई?” लक्ष्मण दास बोला। सामने ही रास्ता जा रहा था।

मोमो जिन्न आगे बढ़ता कह उठा। “मेरे पीछे आओ।"

दोनों उनके पीछे चल पड़े। "ये मायावी पहाड़ी है लक्ष्मण।” सपन चड्ढा उसके करीब आकर कह उठा।

"सना तो है।"

"तिलिस्म का भी कुछ है भीतर । मोमो जिन्न ने बताया था।"

"ये सब बातें तू मुझे क्यों याद दिला रहा है?"

"हम फंस गए तो मोमो जिन्न फौरन खिसक जाएगा। तब हमारा क्या होगा।"

“इस कमीने जिन्न का कोई भरोसा नहीं।" तभी आगे चलता मोमो जिन्न कह उठा।

"मुझ पर पूरा भरोसा रखो। मैं तुम दोनों को छोड़कर नहीं जाऊंगा।"

“तुम हमारी बातें सुन रहे हो।” ।

"भूल गए, मैंने बताया था कि तुम दोनों के कानों में सैंसर लगा रखे हैं। जो भी बात करोगे, मुझे सुनाई देगी।"

"क्या मुसीबत है।"

“यहां जिन्न भी है। सैंसर भी है, सैटलाइट भी है। कैसी दुनिया है ये।”

"हमारी दुनिया ज्यादा बेहतर है।” सपन चड्ढा ने कहा।

"ये दुनिया ज्यादा अच्छी है।"

"वो कैसे?"

“क्योंकि यहां जिन्नों को आराम से रहने दिया जाता है। तुम्हारी दुनिया में जिन्नों के लिए जगह नहीं है।"

“वहां इंसानों के रहने की जगह नहीं है तो जिन्नों को कहां जगह मिलेगी।"

___ "हम जिन्न जब भी तुम्हारी दुनिया में जाते हैं, रहने की जगह को लेकर हमारे सामने समस्या आ जाती है। कई बार तो चुपके से लोगों के घरों में घुसकर अपना ठिकाना बनाना पड़ता है। अच्छे जंगल भी नहीं दिखते वहां।"

“लोगों के घरों में घुसकर तुम जिन्न, वहां उत्पात भी मचाते हो।”

"कभी-कभी।"

"ऐसा क्यों करते हो?"

"उस घर के लोग जिन्न को असमय तंग करते हैं। आराम नहीं करने देते। हमारी कार्यशैली में बाधा डालते हैं। तब जिन्न को क्रोध आ जाता है तो गुस्से में वो घर की चीजों को आग लगा देता है। बर्तनों को इधर-उधर फेंकता है।" __

“जानते हैं। तुम लोगों के इन कामों से घर के लोग कितने डर जाते हैं।”

"तो वो हमें तंग न करें।”

"तुम उनके घर में घुसते ही क्यों हो।”

"हमें भी तो ठिकाना चाहिए।"

“किसी के घर में घुसकर बैठ जाने का तुम्हें कोई हक नहीं है। ये बदमाशी है।" ___

“जिन्न की हरकतें बदमाशों जैसी ही होती हैं। परंतु हम बदमाश नहीं जिन्न होते हैं।"

"छोड यार।" लक्ष्मण दास बोला—“किसके मुंह लग गया त।"

"बहुत बदतमीज होते जा रहे हो तुम दोनों।" कुछ देर बाद ही वो खुली जगह में जा निकले।

यहां धूप निकली हुई थी। सामने पेड़ों की कतारें नजर आ रही थीं। तेज हवा चल रही थी।

“यहां तो दिन निकला हुआ है।” सपन चड्ढा के होंठों से निकला।

“सूर्य भी निकला हुआ है। ये क्या हो रहा है सपन?"

"हम...हम तो अभी अंधेरे में थे। रात हो रही थी। परंतु...परंतु ये सब क्या?" __ मोमो जिन्न कह उठा।

“यहां से महाकाली की मायावी दुनिया शुरू होती है। ये उसी की दुनिया का सूरज है। ये सब चीजें उसने अपनी शक्तियों से बना रखी हैं। वो बहुत ताकतवर शक्ति है।"

"लेकिन हम यहां क्यों आए हैं?" ।

"देवा-मिन्नो की सहायता के लिए कि शायद उन्हें हमारी जरूरत पड़ जाए। देवा-मिन्नो को ढूंढ़ना होगा कि वो कहां है।" । ___

“देवा-मिन्नो की सहायता, हम भला क्या सहायता कर सकते

__ "खामोश रहो।” मोमो जिन्न की नजरें हर तरफ जा रही थीं।

"जरा-सा चलते हैं और हम थक जाते हैं। हम भला क्या किसी की सहायता..."

"लक्ष्मण।”

"कह।”

"ये महाकाली नाम की बहुत बड़ी जादूगरनी की जगह है।”

"तो?"
 
"हम बिना पूछे उसकी हद में घुस आए हैं। वो हमें मार देगी। ये साला मोमो जिन्न तो भाग जाएगा, जान बचा के।" ।

“वो देख, जथूरा के सेवकों से बात कर रहा है हरामी।"

मोमो जिन्न एक तरफ सिर झुकाए, आंखें बंद किए, कान पर हाथ रखे, हौले-हौले सिर हिला रहा था। ऐसा वक्त कुछ देर तक रहा फिर वो सामान्य होकर, इधर-उधर देखने लगा।

"हमें इस तरफ जाना है।"

“इधर क्या है?

“नदी है। वहां हमें सवारी मिलेगी, काले रंग की। उस पर सवार हो जाना है।"

"काले रंग की सवारी, नदी में?"

“पागल हो गया लगता है।"

"आओ।" लक्ष्मण और सपन, मोमो जिन्न के पीछे चल पड़े।

“ये हमें थका देगा।"

“जो किस्मत में लिखा है, वो ही होगा।” ।

“मैं टांगों की किस्मत की बात कर रहा हूं। मुझसे और नहीं चला जाता।”

दस मिनट के बाद ही उन्हें नदी दिखाई देने लगी।

दूर तक जाती, लम्बी नदी। उसका पानी मध्यम गति से बह रहा था। किनारे पर चौदह नावें एक ही कतार में खड़ी थीं। नाविक या चप्पू नावों में नहीं नजर आ रहा था।

वे किनारे पर पहुंचकर ठिठके। रंग-बिरंगी नार्वे थीं वे। लाल-पीली-नीली-काली-हरी-गुलाबी-भूरी यानी कि सबका रंग अलग-अलग था।

"हम काली नाव पर बैठेंगे।" मोमो जिन्न बोला।

"तुम भी?" लक्ष्मण दास ने उसे देखा।

"मैं क्यों नहीं बैठ सकता?" जिन्न ने लक्ष्मण दास को देखा।

“तुम जिन्न हो। तुम्हें अपनी शान बनाए रखनी चाहिए। जिन्न भी भला नाव में सफर करते हैं। तुम्हें तो शान से नाव के ऊपर-ही-ऊपर उड़ते हुए आना चाहिए हमारे साथ। क्यों सपन?" __

"ठीक ही तो कहा है तूने।" ।

“जब नाव में बैठकर सफर हो सकता है तो मैं अपनी शक्ति व्यर्थ में क्यों खर्च करूं।”

"कंजूस है। अपनी ताकत खर्च करने में डरता है।" ___

मोमो जिन्न आगे बढ़ा और काली नाव में जा बैठा। लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा भी नाव में पहुंच गए।

“ये चलेगी कैसे?" सपन चड्ढा ने कहा—“नाविक नहीं, चप्पू नहीं और... "

तभी नाव धीमे से आगे सरकने लगी।

"चल पड़ी, बैठ जा सपन।" लक्ष्मण दास चीखा। सपन चड्ढा हड़बड़ाकर फौरन नीचे बैठ गया।

“ये-ये चल कैसे रही है?" लक्ष्मण दास ने सपन चड्ढा से पूछा।

* “मुझे क्या पता, जादूगरनी की नगरी है, यहां जो हो जाए वो ही कम है।"

“लक्ष्मण दास ने मोमो जिन्न को देखा, जो आराम से बैठा था।

"देख तो कैसे मुफ्त की सवारी करने में मस्त है।" लक्ष्मण दास कह उठा।

नाव किनारे से नदी के बीचोबीच पहुंची और फिर धीरे-धीरे तेज होने लगी।

न तो इंजन की आवाज न चप्पू। बे-आवाज सी वो नदी के पानी पर दौड़े जा रही थी। हर पल जैसे नाव की रफ्तार बढ़ती जा रही थी।

“मोमो जिन्न।" लक्ष्मण दास परेशान-सा कह उठा—“ये चल कैसे रही है, इंजन नहीं, चप्पू नहीं, चलाने वाला नहीं।"

"चल तो रही है।" मोमो जिन्न बोला—"आराम से बैठे रहो।"

"लेकिन-लेकिन जाना कहां है?"

"मैं नहीं जानता। नाव हमें जहां पहुंचाएगी, वो ही हमारी मंजिल होगी।"

“मंजिल? वहां क्या होगा?”

“यहां पर मैं भी तुम्हारी तरह नया ही हूं। इस मायावी पहाड़ी के बारे में मैं कुछ नहीं जानता।"

“महाकाली को तो जानते होगे?"

"नहीं"

नाव की रफ्तार इतनी तेज थी कि उन्हें नाव को पकड़कर बैठना पड़ रहा था।

जबकि मोमो जिन्न मजे में बैठा था।

“सुना तुमने लक्ष्मण ।” सपन चड्ढा ऊंचे स्वर में कह उठा—“ये महाकाली को नहीं जानता। मायावी पहाड़ी के बारे में कुछ नहीं जानता। यहां के रास्तों का इसे पता नहीं और हमें अपने साथ यहां ले आया है।"

"मुसीबत आने पर ये तो भाग जाएगा। तब हमारा क्या... "

“मैं नहीं भागूंगा।” मोमो जिन्न बोला। "तेरा क्या भरोसा तू तो कहता है कि जिन्न झूठ नहीं बोलते और तूने कभी सच नहीं बोला। कभी तू हमारा पक्का यार बनता था और अब तू हमें नंगा घुमाने को कहता है। तू तो सबसे बड़ा कमीना है।"

मोमो जिन्न मुस्कराया।

"देख तो सपन। साला पहली बार अपनी तारीफ सुनकर मुस्कराया है।"

“तुम दोनों नादान बच्चे हो।”

"नादान बच्चे । हम तो उम्र में तुमसे बड़े हैं।” सपन चड्ढा कुढ़कर बोला।

"जिन्न की उम्र की बराबरी करने की चेष्टा मत करो। जिन्नों की उम्र हजारों साल लम्बी होती है। हमारे मालिक बदलते रहते हैं। परंतु हम वही रहते हैं। तुम इंसान तो 50-60 बरस की उम्र में ही मर जाते हो।" ___

"50-60?" लक्ष्मण दास तेजी से भागती नाव में चिल्लाया—“पचास के तो हम दोनों हैं।"

“उम्र हो गई तुम दोनों की। मरने वाले हो अब।"

"देखा सपन । ये हमें मार रहा है।"

"मौत के रास्ते पर ले जा रहा है। तभी तो कह रहा है कि हम मरने वाले हैं। साले को सब पता होगा।"

"इस साले से फुर्सत में निबटेंगे।"

“जब हम ही निबट गए तो फिर इससे क्या निबटना—निबटाना।"

“तुम दोनों चाहो तो मरने के बाद जिन्न बनने की लाइन में भरती हो सकते हो।"

“वो कैसे?"

“मरने के बाद श्मशान में लगे पीपल पर अपना घर बना लेना। वहां से तुम दोनों को आगे का रास्ता मिलेगा।"

“कैसा आगे का रास्ता?"
 
"कुछ टैस्ट होंगे, उसके बाद भूत-प्रेत की योनि में प्रवेश।"

"लेकिन तुम तो जिन्न बनने को कह रहे...।"

“सीधे कोई भी जिन्न नहीं बन जाता। एक-एक सीढ़ी चढ़कर ऊपर आना पड़ता है। पहले भूत-प्रेत बनकर क्लासें पढ़नी पड़ती हैं। भूत-प्रेती के काम में माहिर होकर टैस्ट पास करना पड़ता है। पास होने के बाद लम्बी ट्रेनिंग लेनी पड़ती है और बूढ़े जिन्न सब कुछ सिखाते हैं। परंतु कोई-कोई ही सीख पाता... "

“लक्ष्मण।" सपन चड्ढा चीखा—“इस हरामी की बातें मत सुन। ये तो हमें जीते-जी ही जिन्न बना देगा। अभी हमारे खेलने-खाने के दिन हैं और ये कहता है कि हमारी मौत आ...”

इसी पल नाव की रफ्तार एकाएक कम होने लगी। "ये...ये तो धीमी होने लगी।” लक्ष्मण दास के होंठों से निकला।

"हम कहां पहुंच रहे हैं लक्ष्मण?" लक्ष्मण दास ने हड़बड़ाकर मोमो जिन्न से कहा।

"तुम्हें डर नहीं लग रहा?"

“जिन्न को कभी डर नहीं लगता।” मोमो जिन्न बोला। लक्ष्मण और सपन की नजरें घूमी।

नदी के दोनों तरफ घना जंगल दिखाई दे रहा था। सुनसान जगह थी वो। कोई भी इंसान नहीं दिखा।

"हम कहां आ गए हैं मोमो जिन्न?” सपन चड्ढा ने पूछा।

"मैं नहीं जानता।"

"बुरा वक्त आने पर तू तो खिसक जाएगा। हमारी जान नहीं बचेगी।" सपन चढ्डा ने मोमो जिन्न से कहा।

"मैं नहीं भागूंगा।"

“पक्का ?"

"जिन्न पर शक मत करो। जिन्न का विश्वास करना सीखो।"

“सपन।”

"हां"

"इसका भरोसा कभी मत करना। इसका भरोसा कर-कर के तो हम यहां तक आ पहुंचे हैं। पहले हमें यार कहता न थकता था और अब हमें नंगा करके घुमाने को कह रहा है। ये कमीना है धोखेबाज

___ “मैं तेरी बात से सहमत हूं। लेकिन अब हमारा क्या होगा?"

“महाकाली की पहाड़ी है ये। मुझे लगता है कि अब हम किसी बड़ी मुसीबत में फंसने जा रहे हैं।”

“कहीं ये जिन्न हमारी बलि देने के लिए तो हमें नहीं ले जा रहा?"

दोनों की नजरें मिलीं। फिर मोमो जिन्न को देखा। मोमो जिन्न को अपनी तरफ देखते पाकर, मुस्कराते पाया। “सपन।"

“पहले ये मुस्कराया न करता था। जबसे महाकाली की पहाड़ी में आया है, ये मुस्कराने लगा है।"

"रहस्य वाली बात है कोई।"

“पक्का ये हमारी बलि देगा। महाकाली को बलि देकर खुश करना चाहता है।"

“ये महाकाली वो महाकाली नहीं है।"

"वो महाकाली कौन-सी है?"

“वो तो भगवानों की श्रेणी में आती है। मां महाकाली। जिसे हमारी दुनिया के लोग पूजते हैं। ये तो इस दुनिया की महाकाली

“तभी तो हमारी बलि दी जाएगी। इस दुनिया की महाकाली हमारी बलि मांगती होगी। तभी हमें लाया गया है।"

मोमो जिन्न मुस्कराता हुआ इन्हें देखे जा रहा था।

"तुम हमारी बातें सुन रहे हो। कुछ कहते क्यों नहीं?” लक्ष्मण दास कह उठा।

"मेरी मुस्कान का रहस्य जानना चाहते हो?"

"ह...हां।"

"तो सुनो, पहले तुम इस तरह की बेवकूफी वाली बातें नहीं करते थे, इसलिए मैं मुस्कराता नहीं था।" ।

“तुम...तुम कहना चाहते हो कि हम बेवकूफ हैं।

"अवश्य । तुम लोग बेवकूफ ही हो। वरना बलि जैसी घटिया बातें करके मेरे जैसे सर्वश्रेष्ठ जिन्न की तौहीन नहीं करते। तुम दोनों ने ये कैसे सोच लिया कि जिन्न बलि देने जैसा घटिया काम करेगा।"

“तो....तो हमें यहां क्यों लाए हो?"

“जथूरा के सेवकों ने मुझे आदेश दिया तो मैंने ऐसा किया।" कश्ती किनारे पर जाकर ठहर गई।

"चलो।” कहकर मोमो जिन्न उठा और नाव से निकलकर किनारे पर पहुंच गया।

“चलना तो पड़ेगा सपन।” वे दोनों भी नाव से बाहर नदी के किनारे पर आ गए।

उसी पल नाव में हरकत हुई और वो पानी में सरकती हुई वापस जाने लगी।

"मोमो जिन्न! नाव जा रही है।” सपन चड्ढा कह उठा।

“जाने दो।”

"हमें वापस जाना हुआ तो कैसे जाएंगे?"

"तब दूसरा रास्ता खुद ही बन जाएगा वापसी के लिए।" दोनों की नजरें हर तरफ घूमी।।

घना-गहरा, दिल धड़का देने वाला जंगल था। हवा से पत्तियों का शोर खड़-खड़ पैदा कर रहा था।

चप्पी और गहरा सन्नाटा था यहां।

"ये कैसी जगह है?"

“यहां पर हम क्या करेंगे?"

“मैं भी नहीं जानता कि...।"

मोमो जिन्न कहते-कहते ठिठका। उसकी गर्दन एक तरफ झुक गई। आंखें बंद हो गईं।

फिर हौले-हौले मोमो जिन्न सिर हिलाने लगा।

“आ गया वायरलैस ।” सपन कड़वे स्वर में बोला।

"हम तो पागल हो गए हैं यहां आकर ।"

“अभी तो और होना है। अब पता नहीं ये जिन्न क्या बम फोड़ेगा।"

"चेहरा तो देख इसका। लगता है आंखें बंद करके जैसे तपस्या करके, ज्ञान पाने में लीन हो।"

"हरामी बोत है साला।”

“हमारा पीछा नहीं छोड़ता। हमें अपना गुलाम कहता है।"

"आंखें खुल गईं कमीने की।” मोमो जिन्न ने दोनों को देखते कहा।

"हमें थोड़ा-सा पूर्व की तरफ जाना है।"

"वहां क्या है?

“वहां हमें, तुम जैसे ही इंसान मिलेंगे।"

"हम जैसे?" मोमो जिन्न ने सिर हिलाया।

सपन चड्ढा ने मोमो जिन्न को देखा फिर लक्ष्मण दास से कहा।

"हमारे जैसे इंसानों को यहां पर क्या काम?"

"मेरे से क्या पूछ रहा है। मुझे क्या पता।"

“तुम उन इंसानों को जानते होंगे।” मोमो जिन्न ने कहा।

“ये बात है तो चलो। तुम्हारे अलावा कोई दूसरी सूरत तो देखने को मिलेगी।" लक्ष्मण दास ने कहा।

वे तीनों पूर्व दिशा की तरफ चल पड़े।

"सपन। वहां कौन होंगे, जिन्हें हम जानते हैं।”

"देवराज चौहान या मोना चौधरी ही होंगे।"

"फिर तो ठीक है। पहला मौका मिलते ही जिन्न से पीछा छुड़ाना है हमने।"

"मुझे मौका मिला तो गर्दन काट दूंगा इसकी।"

"सैंसर लगे हैं, सुन रहा है ये कमीना, हमारी बातें।"

तभी चलते-चलते मोमो जिन्न ने कहा।

"इंसानों की जात घटिया होती है, ये तो मैं पहले ही जानता हूं। इंसानों का कितना भी कर लिया जाए, ये एक दिन उसी की गर्दन काट देते हैं, जो इनकी सेवा करता है। इससे ज्यादा मतलबी जात मैंने दूसरी नहीं देखी।"
 
__ "तुमने हमें तंग कर रखा है, तभी हम तुम्हारी गर्दन काटने की सोच रहे हैं।" ___

"मैं तो तुम दोनों का बहुत खयाल रख रहा हूं वरना हम जिन्न तो गले में रस्सा डालकर खींचते हुए चलते हैं।"

“गले में रस्सा?" सपन चड्ढा हड़बड़ाया।

"तुम दोनों के साथ मैं ऐसा नहीं कर रहा।"

“यही कसर रह गई है, ये भी कर लो।” सपन चड्ढा ने कड़वे स्वर में कहा।

"मैं एक बार कुत्ता बना था।” मोमो जिन्न बोला।

“क्या?" लक्ष्मण दास कह उठा—“कुत्ता?" ।

“हां। जिन्न बनते समय मेरे इम्तिहान का वक्त आया तो, मैंने कहा कि इंसान बुरे नहीं होते तो उन्होंने मुझे सबक सिखाने के लिए कुत्ते का जन्म दिलवा दिया। कुत्ते के जन्म में मैं अपने मालिक का वफादार बनकर रहने लगा कई बार मालिक को मुसीबतों से बचाया। दस साल बाद जब मैं बूढ़ा हुआ तो मुझे घर से निकाल दिया गया। परंतु उस घर से मेरा मोह था। मैं घर के पास ही घूमता रहता। उसी मकान के गेट के बाहर ही दिन रात बैठा रहता। मालिक ने मुझे अपने घर से दूर भगाने की बहुत चेष्टा की, परंतु मेरा प्यार मुझे दूर नहीं जाने देता। फिर एक रात मैं उसी मकान के गेट के बाहर सोया हुआ था कि मालिक ने चुपके से चाकू से मेरी गर्दन काट दी। मैं मर गया।"

“अच्छा—फिर?"

-

“फिर जब मैं कुत्ते के शरीर से निकलकर वापस पहुंचा तो पुनः मेरी परीक्षा हुई। परीक्षा में वो ही सवाल सामने आया कि इंसानों

की जात के बारे में आपकी क्या राय है?"

"तुमने क्या जवाब दिया?" सपन चड्ढा ने पूछा।

“मैंने क्या जवाब दिया।" मोमो जिन्न मुस्करा पड़ा-“मैंने कहा, इस धरती पर, चींटे से लेकर हाथी तक—पशु से लेकर पक्षी तक, ऐसी कोई चीज जिसमें जीवन है, उन सबसे बुरे इंसान होते

___ “तुमने ऐसा कहा।”

___ “हां और मैं परीक्षा में पहले नम्बर पर पास हुआ। मुझे सर्वश्रेष्ठ जिन्न माना गया। अब तो तुम्हें समझ आ गया होगा कि हम जिन्न इंसानों को कैसी नजरों से देखते हैं।” मोमो जिन्न ने शांत स्वर में कहा।

तीनों तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे।

"मैं तो पहले ही कहता था कि ये हरामी जिन्न है।” लक्ष्मण दास बोला— "इंसानों को बुरी निगाहों से देखता है। इसे ये नहीं मालूम कि इंसानों की जात, इस धरती पर सबसे सर्वश्रेष्ठ है।"

मोमो जिन्न मुस्कराया।
 
“कमीना फिर मुस्कराता है।"

“तुम लोग मेरे से शिष्ट भाषा में बात करो। मुझे गुस्सा आ गया तो गले में रस्सी डालकर घसीटूंगा।"

"ये जीते जी हमारी बलि देगा।"

"इसकी नीयत में खोट है।"

“ये खुद भी खोटा है।” “चुप हो जाओ—वरना... "

“चुप हो जा लक्ष्मण। इसे गुस्सा आने वाला है।" ।

"मुझे थकान हो रही है।”

तभी मोमो जिन्न ठिठका और गर्दन टेड़ी करके, सिर हिलाने लगा। उसके बाद पुनः आगे बढ़ता कह उठा। ___

"हमें उस तरफ जाना है। वो जगह ज्यादा दूर नहीं है। नदी के किनारे पर ही वे हमें मिलेंगे।"

"पर वे हैं कौन? उनके बारे में कुछ तो बता दो।”

“पता चल जाएगा। जरा तेज चलो। तुम दोनों तो सुस्तों की तरह चल रहे हो।”

"ये तो हमें चला-चला के हमारी जान लेगा।"

"तेरे को लगता है कि ये हमारे साथ सच बोलता है।"

“पता नहीं।” लक्ष्मण दास ने गहरी सांस ली—“लेकिन यहां पर तो इसी का सहारा है।"

जल्दी ही नदी किनारे उन्हें एक जगह पर ठिठक जाना पड़ा। वहां जगमोहन, सोहनलाल और नानिया बेहोश पड़े थे।

"ये तो जगमोहन, सोहनलाल हैं।" लक्ष्मण दास के होंठों से निकला। ___

“ओह । कोई तो अपने जैसा मिला, वरना इस जिन्न के साथ रहकर तो हम अपनी जात भी भूलने लगे थे।"

“अब तो मानते हो कि मैंने सच कहा था, जिन्न झूठ नहीं बोलते।" मोमो जिन्न ने कहा।

“तुम तो अब तक हमसे झूठ ही बोले हो।"

"इन्हें क्या हुआ पड़ा है?"

“बेहोश हैं, होश में लाओ इन्हें।"

"ये युवती कौन है?" सपन चड्ढा ने पूछा।

“नानिया है। कालचक्र की रानी साहिबा।"

"खूबसूरत है। क्यों सपन।" लक्ष्मण दास ने धीमे स्वर में कहा। सपन चड्ढा के कुछ कहने से पहले ही मोमो जिन्न कह उठा।

“तुम इंसानी मर्दो की ये बड़ी समस्या है कि औरत देखी नहीं कि उसके गिर्द मंडराने लगे।" ___

“ये समस्या तो हम मर्दो के साथ चिपकी हुई है।” लक्ष्मण दास ने गहरी सांस ली।

"जिन्नों में तो मर्द-औरत नहीं होते?".

"नहीं। हम जिन्नों में वो समस्या होती ही नहीं, जो मर्दो में होती

__

_"फिर तुम इंसानी मर्दो की समस्या को नहीं समझ सकते। हम भी कई बार परेशान हो जाते हैं, इस समस्या का समाधान ढूंढते-ढूंढ़ते।

मोमो जिन्न कमर पर हाथ बांधे वहीं पर टहलने लगा।

बहुत पक्की बेहोशी थी तीनों की।

एक घंटा लग गया, उन्हें होश में लाने में। सपन-लक्ष्मण को बहुत मेहनत करनी पड़ी।

उन पर निगाह पड़ते ही जगमोहन के होंठों से निकला।

"तुम...लक्ष्मण दास-सपन...।" थके अंदाज में दोनों ने सिर हिलाया।

“तुम दोनों यहां कैसे?” सोहनलाल ने पूछा।

लक्ष्मण ने मोमो जिन्न की तरफ इशारा करके कहा।

“ये हमें पालतू कुत्तों की तरह घुमाए जा रहा है। फंसे पड़े हैं बुरी तरह।" ___

“अब तुम लोगों के मिल जाने से राहत मिली है कि दुनिया में इंसान भी बसते हैं।"

सपन चड्ढा ने नानिया को देखा और मस्करा पड़ा।
 
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