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“सोहनलाल।” नानिया कह उठी—“ये मुझे देखकर मुस्कराता है।"
"तेरा भाई है। बहन पर प्यार तो आएगा ही।"
“भाई।" सपन चड्ढा ने लक्ष्मण दास को देखा।
"ठीक ही तो कह रहा है सोहनलाल ।” लक्ष्मण दास ने जल्दी से कहा—“तेरी बहन तो है ये।" ___
“फिर तो तेरी भी होगी।” सपन चड्ढा ने चिढ़कर कहा। ___
“मेरा क्या है। मैं तो संसार को त्यागने की सोच रहा हूं। रिश्तों में मेरा कोई विश्वास नहीं।” ।
___ "त...त... " सपन चड्ढा ने कहना चाहा।
“चुप कर।" लक्ष्मण दास ने कहा फिर जगमोहन-सोहनलाल से बोला—“तुम लोग यहां कैसे?" ___
“हम...हम महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर आ गए थे।" जगमोहन ने सोच-भरे स्वर में कहा— “उस वक्त हम जथूरा के पास जाने के लिए नदी पार कर रहे थे। मगरमच्छों ने हमें अपने जबड़ों में कस लिया। इसके साथ ही हम बेहोश हो गए। उसके बाद
अब होश में आया तो तुम लोगों को सामने पाया।"
“ये जगह कहां पर है?" सोहनलाल ने पूछा।
"हम तो इतना जानते हैं कि ये कालचक्र है। सब जगह एक जैसी है।" सपन चड्ढा ने कहा।
“तुम लोग यहां कैसे आ गए?"
“ये मोमो जिन्न ही हमें चक्कर घिन्नी की की तरह घुमाए जा रहा है। जिधर चाहता है हमारा स्टेयरिंग उधर ही मोड़ देता है। लगता है जब तक हमारी जान नहीं निकलेगी, ये हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा।" लक्ष्मण दास बोला। ___
"लेकिन तुम लोग महाकाली की मायावी पहाड़ी में आए क्यों?"
“बताया तो मोमो जिन्न खींचे जा रहा है हमें। कहता है देवा-मिन्नो को हमारी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।” सपन चड्ढा ने लम्बी सांस लेकर कहा—“भला जिन्न से कोई पूछे कि हम देवराज चौहान की सहायता करने के लायक ही कहां हैं।"
"देवराज चौहान कहां है?"
"वो भी इसी तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर है। सब ही भीतर हैं। हम जरा उनके पीछे रह गए। वरना उनके साथ ही होते।"
“मुझे बताओ, क्या हुआ था। देवराज चौहान से अलग हुए मुझे बहुत देर हो गई है।"
"जानता हूं। तुम्हें कालचक्र ने अपने में फंसा लिया था और तुम्हारी जगह मखानी, जगमोहन बन के आ गया।” (ये जानने के लिए पढ़ें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास 'पोतेबाबा' ।)
“ओह ।” जगमोहन के होंठ भिंच गए। ___
“सब बातें बताओ।” सोहनलाल बोला—“हम इन बातों से अंजान हैं।”
लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने सब कुछ बताया। जगमोहन, सोहनलाल जो नहीं जानते, वो अब जान चके थे।
"तो ये हआ देवराज चौहान-मोना चौधरी और बाकी सब के साथ।” जगमोहन सोच-भरे स्वर में कह उठा।
“तुम जानते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" सपन चड्ढा ने पूछा।
"नहीं। हमें इतना ही पता है कि वो पूर्व दिशा में कहीं पर है।"
“वो पक्का नहीं, बूंदी ने बताया था।” सोहनलाल बोला।
"बूंदी?" जगमोहन की नजरें घूमीं—“वो कहां है?" सोहनलाल और नानिया ने भी हर तरफ देखा। परंतु बूंदी कहीं न दिखा।
"तेरा भाई है। बहन पर प्यार तो आएगा ही।"
“भाई।" सपन चड्ढा ने लक्ष्मण दास को देखा।
"ठीक ही तो कह रहा है सोहनलाल ।” लक्ष्मण दास ने जल्दी से कहा—“तेरी बहन तो है ये।" ___
“फिर तो तेरी भी होगी।” सपन चड्ढा ने चिढ़कर कहा। ___
“मेरा क्या है। मैं तो संसार को त्यागने की सोच रहा हूं। रिश्तों में मेरा कोई विश्वास नहीं।” ।
___ "त...त... " सपन चड्ढा ने कहना चाहा।
“चुप कर।" लक्ष्मण दास ने कहा फिर जगमोहन-सोहनलाल से बोला—“तुम लोग यहां कैसे?" ___
“हम...हम महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर आ गए थे।" जगमोहन ने सोच-भरे स्वर में कहा— “उस वक्त हम जथूरा के पास जाने के लिए नदी पार कर रहे थे। मगरमच्छों ने हमें अपने जबड़ों में कस लिया। इसके साथ ही हम बेहोश हो गए। उसके बाद
अब होश में आया तो तुम लोगों को सामने पाया।"
“ये जगह कहां पर है?" सोहनलाल ने पूछा।
"हम तो इतना जानते हैं कि ये कालचक्र है। सब जगह एक जैसी है।" सपन चड्ढा ने कहा।
“तुम लोग यहां कैसे आ गए?"
“ये मोमो जिन्न ही हमें चक्कर घिन्नी की की तरह घुमाए जा रहा है। जिधर चाहता है हमारा स्टेयरिंग उधर ही मोड़ देता है। लगता है जब तक हमारी जान नहीं निकलेगी, ये हमारा पीछा नहीं छोड़ेगा।" लक्ष्मण दास बोला। ___
"लेकिन तुम लोग महाकाली की मायावी पहाड़ी में आए क्यों?"
“बताया तो मोमो जिन्न खींचे जा रहा है हमें। कहता है देवा-मिन्नो को हमारी सहायता की जरूरत पड़ सकती है।” सपन चड्ढा ने लम्बी सांस लेकर कहा—“भला जिन्न से कोई पूछे कि हम देवराज चौहान की सहायता करने के लायक ही कहां हैं।"
"देवराज चौहान कहां है?"
"वो भी इसी तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर है। सब ही भीतर हैं। हम जरा उनके पीछे रह गए। वरना उनके साथ ही होते।"
“मुझे बताओ, क्या हुआ था। देवराज चौहान से अलग हुए मुझे बहुत देर हो गई है।"
"जानता हूं। तुम्हें कालचक्र ने अपने में फंसा लिया था और तुम्हारी जगह मखानी, जगमोहन बन के आ गया।” (ये जानने के लिए पढ़ें राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित अनिल मोहन का उपन्यास 'पोतेबाबा' ।)
“ओह ।” जगमोहन के होंठ भिंच गए। ___
“सब बातें बताओ।” सोहनलाल बोला—“हम इन बातों से अंजान हैं।”
लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने सब कुछ बताया। जगमोहन, सोहनलाल जो नहीं जानते, वो अब जान चके थे।
"तो ये हआ देवराज चौहान-मोना चौधरी और बाकी सब के साथ।” जगमोहन सोच-भरे स्वर में कह उठा।
“तुम जानते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" सपन चड्ढा ने पूछा।
"नहीं। हमें इतना ही पता है कि वो पूर्व दिशा में कहीं पर है।"
“वो पक्का नहीं, बूंदी ने बताया था।” सोहनलाल बोला।
"बूंदी?" जगमोहन की नजरें घूमीं—“वो कहां है?" सोहनलाल और नानिया ने भी हर तरफ देखा। परंतु बूंदी कहीं न दिखा।