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Guest
“नहीं रह सकते। क्योंकि उसके पास ताकतें हैं, वो...” “अब हम सब अलग-अलग हो चुके हैं, जो कि अच्छी बात है।”
जथूरा की याद है तुम्हें?
” नहीं।” ।
पोतेबाबा की भी याद नहीं?
” नहीं ।” तभी जगमोहन की आंखें सिकुड़ीं।
सिगरेट के धुएं में उसे हाथ की उंगलियां पल भर के लिए दिखाई दी थीं।
उधर धुआं फेंको ।” जगमोहन के होंठों से निकला।
क्या?” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।
उधर धुआं फेंको। उधर, वहां शायद पोतेबाबा है। वो आ चुका है।” जगमोहन व्याकुल स्वर में बोला।
देवराज चौहान ने ऐसा ही किया।
अगले ही पल धुएं में पोतेबाबा की आकृति चमकती चली गई। देवराज चौहान के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे, उस आकृति को देखकर।
य...ये पोतेबाबा है।”
पोतेबाबा का दाढ़ी वाला चेहरा मुस्करा पड़ा।
मैं धूप लाता हूं। उसके धुएं में इसकी आकृति आधी-अधूरी नजर आती रहेगी।” कहकर जगमोहन चला गया।
“कैसा है तू देवा?” पोतेबाबा की आवाज सुनाई दी। आकृति सोफे की तरफ बढ़ गई। | अगले ही पल आकृति धुएं से बाहर थी। नजर आनी बंद हो गई। | देवराज चौहान ने पुनः कश लेकर सोफा चेयर पर धुआं फेंका तो वहां बैठा पोतेबाबा दिखा।
देवा को पोतेबाबा का सलाम।” देवराज चौहान उसे देखता रहा।
पहचाना मुझे?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिले ।।
“नहीं।"
तीसरा जन्म है तुम्हारा। जन्मों की यादों के पीछे खो चुकी हैं तुम्हारी यादें । लेकिन तुम्हें कभी भी सब कुछ याद आ सकता है
क्यों याद आ सकता है?”
क्योंकि अब पूर्वजन्म से तुम्हारे तार जुड़ते जा रहे हैं, तभी तो तुम मेरे से बात कर रहे हो ।”
तुम हकीकत में कौन हो?"
जथूरा का सबसे खास सेवक ।”
मैं जथूरा को भी नहीं जानता।”
मैं अपने मुंह से तेरे को जथूरा की याद नहीं दिलाऊंगा। अपने बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि मैं गुलचंद का यार हुआ करता था।”
सोहनलाल का?” ।
“हां, उसके बाद जथूरा की सेवा में चला गया और आज जथूरा का खास हूं।”
देवराज चौहान पोतेबाबा की आधी-अधूरी नजर आ रही आकृति को देखे जा रहा था।
तभी जगमोहन मोटी-सी धूप जलाकर वहां ले आया था। उसमें उठता धुआं वहां फैलने लगा। धूप को उसने पास टेबल पर रख दिया। अब धुएं में पोतेबाबा की आकृति बहुत हद तक स्पष्ट नजर आने लगी थीं।
“क्या बात हुई?” जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
*अभी तो कुछ खास बात नहीं हुई।”
देवराज चौहान ने कहा फिर पोतेबाबा से बोला “तुम चाहते क्या हो?”
जथूरा की याद है तुम्हें?
” नहीं।” ।
पोतेबाबा की भी याद नहीं?
” नहीं ।” तभी जगमोहन की आंखें सिकुड़ीं।
सिगरेट के धुएं में उसे हाथ की उंगलियां पल भर के लिए दिखाई दी थीं।
उधर धुआं फेंको ।” जगमोहन के होंठों से निकला।
क्या?” देवराज चौहान ने जगमोहन को देखा।
उधर धुआं फेंको। उधर, वहां शायद पोतेबाबा है। वो आ चुका है।” जगमोहन व्याकुल स्वर में बोला।
देवराज चौहान ने ऐसा ही किया।
अगले ही पल धुएं में पोतेबाबा की आकृति चमकती चली गई। देवराज चौहान के चेहरे पर अजीब से भाव उभरे, उस आकृति को देखकर।
य...ये पोतेबाबा है।”
पोतेबाबा का दाढ़ी वाला चेहरा मुस्करा पड़ा।
मैं धूप लाता हूं। उसके धुएं में इसकी आकृति आधी-अधूरी नजर आती रहेगी।” कहकर जगमोहन चला गया।
“कैसा है तू देवा?” पोतेबाबा की आवाज सुनाई दी। आकृति सोफे की तरफ बढ़ गई। | अगले ही पल आकृति धुएं से बाहर थी। नजर आनी बंद हो गई। | देवराज चौहान ने पुनः कश लेकर सोफा चेयर पर धुआं फेंका तो वहां बैठा पोतेबाबा दिखा।
देवा को पोतेबाबा का सलाम।” देवराज चौहान उसे देखता रहा।
पहचाना मुझे?” पोतेबाबा की आकृति के होंठ हिले ।।
“नहीं।"
तीसरा जन्म है तुम्हारा। जन्मों की यादों के पीछे खो चुकी हैं तुम्हारी यादें । लेकिन तुम्हें कभी भी सब कुछ याद आ सकता है
क्यों याद आ सकता है?”
क्योंकि अब पूर्वजन्म से तुम्हारे तार जुड़ते जा रहे हैं, तभी तो तुम मेरे से बात कर रहे हो ।”
तुम हकीकत में कौन हो?"
जथूरा का सबसे खास सेवक ।”
मैं जथूरा को भी नहीं जानता।”
मैं अपने मुंह से तेरे को जथूरा की याद नहीं दिलाऊंगा। अपने बारे में मैं इतना ही कहूंगा कि मैं गुलचंद का यार हुआ करता था।”
सोहनलाल का?” ।
“हां, उसके बाद जथूरा की सेवा में चला गया और आज जथूरा का खास हूं।”
देवराज चौहान पोतेबाबा की आधी-अधूरी नजर आ रही आकृति को देखे जा रहा था।
तभी जगमोहन मोटी-सी धूप जलाकर वहां ले आया था। उसमें उठता धुआं वहां फैलने लगा। धूप को उसने पास टेबल पर रख दिया। अब धुएं में पोतेबाबा की आकृति बहुत हद तक स्पष्ट नजर आने लगी थीं।
“क्या बात हुई?” जगमोहन ने देवराज चौहान को देखा।
*अभी तो कुछ खास बात नहीं हुई।”
देवराज चौहान ने कहा फिर पोतेबाबा से बोला “तुम चाहते क्या हो?”