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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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“शौहरी।” मखानी धीमें स्वर में बोला।

बोल।”

“जब से हमने सफर शुरू किया पनडुब्बी का, तब से तुमने हमें चुप रहने को क्यों कहा?" *

“मुझे गड़बड़ का अंदेशा हो रहा है।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।

“कैसी गड़बड़?”

“मोमो जिन्न की तरफ से मुझे परेशानी आ रही है। उसकी तरफ से संकेत ठीक नहीं मिल रहें। जो भी जथूरा के हक में काम करता है, एक ही काम पर होने की वजह से, हमें संकेत मिलते रहते हैं कि काम ठीक चल रहा है। परंतु मोमो जिन्न की तरफ से मिलने वाले संकेत बीच-बीच में टूटते जा रहे हैं।”

“क्या वो जथुरा के खिलाफ चल रहा है?”

लगता तो ऐसा ही है। तभी लक्ष्मण और सपन ने तुम दोनों पर हमला किया। जान ले ली तुम दोनों की। तुम्हें नए शरीर में आना पड़ा।” ।

ये बात तो है। तू कहे तो मैं मोमो जिन्न से बात करूं।”

“मोमो जिन्न् तेरे हाथ के नीचे नहीं आने वाला। वो ताकतवर है। परंतु लगता है जैसे कि नई गड़बड़ हो गई हैं।”

नई गड़बड़? वो कैसे?”

“अब मुझे मोमो जिन्न की तरफ से कोई संकेत नहीं मिल रहे।”

इसका क्या मतलब हुआ?”

“वो यहां से काफी दूर चला गया लगता है।”

वो तो उन दोनों के साथ पेड़ों की तरफ गया है। मखानी ने उस तरफ देखा।

“मेरे खयाल में मोमो जिन्न उन दोनों के साथ वहां से भी दूर चला गया है।” शौहरी की फुसफुसाहट कानों में पड़ी।

“ये तो बुरा हुआ। मैं लक्ष्मण और सपन को सबक सिखाना चाहता था।” मखानी बोला।

शौहरी की तरफ से कोई आवाज नहीं आई।

“तुम चुप क्यों हो गए?”

संकेतों को चैक कर रहा था। परंतु कोई फायदा नहीं। मोमो जिन्न की तरफ से कोई संकेत नहीं है।”

तो अब हम क्या करें?”

कुछ देर बाद बताऊंगा।” मखानी ने कमला रानी को देखा, वो उसे ही देख रही थी।

क्या बात हुई शौहरी से।” मखानी ने सब बता दिया।

“मुझे तो लगता है कि हम नई मुसीबत में पहुंच गए हैं।” कमला रानी गहरी सांस लेकर कह उठी।

वो कैसे?” ।

हम् पूर्वजन्म में आ पहुंचे हैं। इन सब लोगों का पूर्वजन्म। भौरी ने बताया कि हम अपनी दुनिया से दूर निकल आए हैं।”

ये जगह कहां पर है?”

मुझे क्या मालूम?” कमला रानी ने आस-पास नजरें दौड़ाईं।

भौरी से पूछा।”

“जब भी भौरी से बात करती हूँ तो व्यस्त होने को कह देती है। जबसे हम जथूरा की जमीन पर पहुंचे हैं, वो बहुत व्यस्त हो गई

। “छोड़ इन बातों को।” मखानी मुस्कराया—“वैसे ये जगह अच्छी

लगती है।”

“अभी देखी कहां है ये जगह। समुद्र और वो दूर पेड़ ही देखे

तू साथ है तो मुझे हर जगह अच्छी लगेगी।” मखानी मुस्करा पड़ा।

मुस्करा मत ।” कमला रानी ने मुंह बनाया।

क्यों?

जब भी तू मुस्कराकर मेरे से बात करता है तो उसके बाद चुम्मी मांगता है।”

“तेरे को पहले ही पता चल गया।”

क्या?"

“मैं तो चुम्मी मांगने वाला था।” कमला रानी ने मखानी को घूरा।

मखानी दाँत फाड़कर कह उठा।

सिर्फ एक ।”

नहीं।” कमला रानी ने इनकार में सिर हिलाया।

एक बार ।”

एक बार भी नहीं मैं...।” तभी मखानी ने झपट्टा मारा और कमला रानी की चुम्मी ले

ली ।।

 


कमला रानी ने धक्का दिया तो मखानी दो कदम दूर जा लुढ़का।

चुम्मी तो ले ही ली। तेरे में यही बुराई है कि जब तेरी जरूरत पड़ती है तू मना कर देती है।” मखानी बोला।

गलती तेरी है।

मेरी?”

तू मांगता क्यों है। सीधे-सीधे ले लिया कर। औरत मांगने पर नहीं देती। शर्म आती है। चुपचाप पास आ और ले लिया कर।”

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मोमो जिन्न, लक्ष्मण और सपन को गए जब देर होने लगी तो नगीना बोली।

“उन्हें अब तक आ जाना चाहिए था।” ।

“मैं देखकर आता हूं।” कहने के साथ ही देवराज चौहान पेड़ों की तरफ बढ़ गया।

“अंम भी थारे साथ चल्लो हो। गड़बड़ो हौवे तो थारे को म्हारी जरूरत पड़ जावो ।”

बांकेलाल राठौर भी देवराज चौहान के साथ चल पड़ा।

मेरे ख़याल में वो तीनों वहां नहीं मिलेंगे।” मोना चौधरी कह उठी–“वहां होते तो अब तक उन्हें आ जाना चाहिए था।”

“क्या कहना चाहती हो?" पारसनाथ बोला।

अब तक वो खिसक चुके होंगे।”

मुझे नहीं लगता।” महाजन ने कहा—“आखिर वो ऐसा क्यों करेंगे।”

ये तो वो ही जाने ।” मोंना चौधरी कह उठी।।

नगीना और बांके पास में खामोश खड़े रहे।

कमला रानी और मखानी कई कदम दूर इस तरह बैठे थे कि जैसे उन्हें किसी बात से कोई मतलब ही न हो।

“मखानी ।” कमला रानी बोली-“हम बेकार हो गए। कुछ भी नहीं कर पा रहे।”

हम जिनके शरीरों में घुसे हुए हैं, वे कमजोर हैं। हमारे लिए जग्गू-मिन्नो के बहरूप बढ़िया थे।”

“मैंने तो सोचा था कि पूर्वजन्म में आकर मजा रहेगा। लेकिन यहां तो दिल लगाने को कुछ भी नहीं है।”

मैं हूं तो।”

तू सिर्फ चुम्मी ही लेता है।”

“मैं तो आगे भी बढ़ना चाहता हूं, परंतु तू ही लाल बत्ती दिखा देती है।”

“तेरे को कभी भी अक्ल नहीं आएगी।” कमला रानी ने मुंह बनाया।

“क्यों?”

“औरत जब लाल बत्ती दिखाए तो उसे हरी समझा कर। औरत कभी भी हरी बत्ती नहीं दिखाएगी मर्द को ।”

“ऐसा क्यों?” ।

यही तो औरत की फितरत है। औरत की न में हां छिपी होती है, वरना वो न शब्द का भी इस्तेमाल न करे।”

ये तो तूने नई बात बताई। आऊ क्या?”

फिर पूछने लगा। तू कभी भी...।”

“कमला रानी।” तभी कमला रानी के कानों में भौरी की आवाज गूंजी।

“भौरी तू।” कमला रानी के होंठ हिले–“तूने तो मेरे से बात करना ही बंद कर दिया।”

“जथूरा की जमीन पर पहुंचते ही मैं अचानक व्यस्त हो गई थी।”

“अब फुर्सत मिल गई?”

“थोड़ी-बहुत। अब तेरे और मखानी के काम का वक्त आ गया

| “हमें कमजोर शरीर मिले हुए हैं। झगड़े वाला काम नहीं कर सकते हम।”

झगड़ा नहीं करना है।”

तो बोल।”

देवा और भंवर सिंह, मोमो जिन्न, लक्ष्मण, सपन को देखने उधर गए हैं कि वो देर क्यों लगा रहे हैं।”

हमें उससे क्या?”

सच बात तो ये है कि वो तीनों सोबरा की जमीन पर जाने के लिए निकल पड़े हैं।”

सोबरा की जमीन पर...

मोमो जिन्न जाएगा।

लेकिन क्यों?”

तू इस चक्कर में न पड़। अपने काम की बात सुन।”

बोल भौरी।”

“तूने इन सबको जथूरा की नगरी में लाना है।”

 


“जथूरा की नगरी, मैं तो जानती नहीं कि वो किधर है।” कमला रानी के होंठों से निकला।

मखानी कमला रानी को देख रहा था।

मैं हूँ न, तेरे को रास्ता बताने वाली।”

‘ समझ गई।” ।

इनमें से कोई नहीं जानता कि किधर जाना है। तेरे को इन्हें जथूरा की नगरी तक ले जाना है। रास्ते के बारे में तू निश्चिंत रह, वो तेरे को मैं बताती रहूंगी ।” भौरी का शांत स्वर कानों में पड़ा।

“ये काम तो हो जाएगा।” कमला रानी बोली–“ये बता कि हमारा ठिकाना कहां है। यहां तो हमें कोई नजर नहीं आता।” ।

“तू मेरे साथ रहेगी, परंतु अभी नहीं। अभी कई काम पड़े हैं। करने को।”

“मुझे और मखानी को एक साथ रहने का वक्त कब मिलेगा?”

जल्दी मिलेगा। तुम दोनों इन सबको लेकर जथूरा की नगरी पहुंचो।” ।

“वो कितनी दूर है?”

“पास ही है। कुछ ही देर में तुम लोग वहां पहुंच सकते हो।” इसके बाद भौरी की आवाज नहीं आई। कमला रानी ने मखानी को सब कुछ बताया।

तो मोमो जिन्न गड़बड़ कर गया। वो पहले से ही गलत चल रहा था। उसके कहने पर ही लक्ष्मण और सपन ने हमारी जानें लीं ।” ।

“वो तो है।” कमला रानी कह उठी–“अभी तो वो तीनों जथूरा की जमीन पर ही होंगे। जथूरा उन्हें पकड़ क्यों नहीं लेता।”

क्या पता जथूरा उन्हें पकड़ने के फेर में हो ।”

ये हो सकता है।”

अब हमें इन सब पर ध्यान देना चाहिए। हमें काम मिल गया है। सबको जथूरा की नगरी में ले जाना है।”

मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चडूढा उन्हें नहीं मिले।

वे सब हैरान-परेशान थे कि आखिर वे इस तरह गायब क्यों हो गए। तब कमला रानी और मखानी अपनी दाल गलाने पास आ पहुंचे।

मैं जानता था, वे तीनों भाग जाएंगे।” मखानी कह उठा।

क्यों?" नगीना ने उन्हें देखा।

क्योंकि मोमो जिन्न ने जथूरा से विद्रोह कर दिया है। जथूरा के खिलाफ चल रहा है वो। हम दोनों को लक्ष्मण और सपन ने उसी के कहने पर मारा था। इस बात का उसे जथूरा को जवाब तो देना ही पड़ेगा।” मखानी ने भोलेपन से कहा।

तंम पैले ही सब कुछ जानो हो ।”

“हां।”

“तो म्हारे को कोणो न बतायो हो?”

“तुमने पूछा ही नहीं।”

“तंम टेढ़ा चल्ने हो। अंम भूलो नेई कि तंमने म्हारे को, मारना चाहते हो। अंम पैले तंम दोनों को वडो हो।” कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर आगे बढ़ा तो देवराज चौहान बोल पड़ा।

“रुक जाओं बांके ।” ।

 
“तंम टेढ़ा चल्ने हो। अंम भूलो नेई कि तंमने म्हारे को, मारना चाहते हो। अंम पैले तंम दोनों को वडो हो।” कहने के साथ ही बांकेलाल राठौर आगे बढ़ा तो देवराज चौहान बोल पड़ा।

“रुक जाओं बांके ।” ।

“यो दोनों हरामों हौवे–म्हारे को मारणों को पूरों तैयारी कर लयों हो ।”

इस वक्त ये हमारे काम आ सकते हैं।”

“का काम आवे यो फुसड़े दोनों ।”

देवराज चौहान ने दोनों से कहा।

तुममें से कोई यहां के रास्ते जानता है?”

“नहीं।” मखानी ने इनकार में सिर हिलाया।

मैं जानती हूं।” कमला रानी बोली। मखानी ने कमला रानी को देखा और सिर हिलाकर कह उठा। ये जानतीं है। मैं बताना भूल गया था।”

“जथूरा कहां मिलेगा?” देवराज चौहान ने पूछा।

“अपनी नगरी में। मैं तुम सबको वहां ले जा सकती हूं।” कमला रानी ने कहा।

“तुम्हें कैसे पता कि हम वहां जाना चाहते हैं।”

“तो और कहां जाओगे। जथूरा की इस जमीन पर यूं ही तो घूमते नहीं रहोगे। नगरी में जाओगे ही।”

“तुम इतनी आसानी से हमें नगरी तक ले जाने के लिए कैसे तैयार हो गईं?” मोना चौधरी बोली।

“मत जाओ।”

“तुम मेरे सवाल का जवाब नहीं दे रहीं, ये कहकर बात को टाल रही हो।”

“मैंने ठीक ही तो कहा है कि यहाँ तक पहुंच गए हो तो तुम्हें जथूरा की नगरी तक जाना ही होगा। और तो कोई जगह ही नहीं है कि तुम लोग जा सको।” कमला रानी ने सरल स्वर में कहा “सोबरा की तरफ जाना चाहते हो तो जुदा बात है।”

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हम जथूरा के पास ही जाना चाहते हैं।” देवराज चौहान ने कहा।

सोबरा के पास जाने में क्या बुराई है।” मोना चौधरी ने देवराज चौहान को देखा।

“तुम जा सकती हो।”

तुम क्यों जथूरा के पास ही जाना चाहते हो?”

मुझे लगता है कि जथूरा ने हमसे चालाकी खेली है।” देवराज चौहान ने सोच-भरे स्वर में कहा “वो ये ही दर्शाता रहा कि हमें पूर्वजन्म में आने से रोकना चाहता है, जबकि वो हमें यहां बुलाना चाहता था।”

नेई बाप ।” रुस्तम राव के होंठों से निकला। पारसनाथ और महाजन की नजरें मिलीं।

 
“ये बात तो शायद मैं भी स्वीकार करती हूं।” मोना चौधरी ने गम्भीर स्वर में कहा।

“मुझे जथूरा से जानना है कि वो चाहता क्या है। क्यों उसने हमें चक्कर में डालकर, यहां तक लाने की कोशिश की।”

“ऐसा कुछ था तो जथूरा सीधे-सीधे कहकर भी हमें बुला सकता था।” नगीना बोलीं।।

वो ऐसा नहीं कह सकता था नगीना।”

क्यों?” ।

“क्या हम उसके बुलावे पर पूर्वजन्म में जाना पसंद करते? शायद कभी नहीं करते।” ।

“तो इसलिए उसने हमें चक्कर में डालकर यहां तक पहुंचा दिया?" नगीना ने सिर हिलाया।

“शायद, यह बात हो सकती है, परंतु पक्का कुछ नहीं है। असल बात तो जथूरा ही बताएगा।”

तो अब हम जथूरा के पास चलें?”

जरूर ।” देवराज चौहान ने कमला रानी और मखानी को देखा–“क्या हम चलें?” ।

“क्यों नहीं। आओ।” कहकर कमला रानी आगे-आगे एक दिशा

की तरफ चल पड़ी।।

सब उसके पीछे चल पड़े। मखानी रुस्तम राव के पास पहुंचा और कह उठा।

मैं लक्ष्मण दास और सपन को नहीं छोडूंगा।”

“काये को?”

उन्होंने हमें मार दिया था उस रात ।” ।

तुम दोनों भी तो उस रात हम सबको मारने जा रहे थे।” पीछे आता महाजन् कह उठा।

तुमसे किसने बात की।” मखानी ने माथे पर बल डालकर कहा।

“बात कर ली तो तेरा क्या घिस गया ।” महाजन मुस्कराया।

मैं बात नहीं करता।” कहकर मखानी आगे जाती कमला रानी के पास पहुंच गया।

“मखानी।” कमला रानी धीमे स्वर में बोली-“ये सब तो आसानी से हमारे साथ चल पड़े। ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी।”

फंसे पड़े हैं कि इस अंजान-वीरान जगह पर, कहां जाए। अपनी जरूरत को हमारे साथ चले हैं।” ।

“जथूरा की नगरी देखने की मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि वो कैसी होगी।” ।

“मैं तो कुछ और ही सोच रहा हूं।”

क्या मखानी।” ।

यहीं कि हम दोनों को एकांत कब मिलेगा। कब हम प्यार करेंगे।” मखानी ने गहरी सांस लेकर कहा।

“मेरे खयाल में हमें जथूरा की नगरी में अवश्य एक कमरा मिल जाएगा।”

कमरा न भी मिले। किसे परवाह है, पेड़ की छाया और तने की ओट मिल जाए, हम अपना काम चला लेंगे।”

“शरारतें तूने छोड़ी नहीं मखानी।”

 
एक चुम्मी दे दे।” मखानी दांत फाड़कर कह उठा।

“यही तो तेरे में बुराई है, जरा-सी हंसकर बात की नहीं कि चुम्मी मांगने लगता है।”

मखानी ने झपट्टा मारा और कमला रानी की चुम्मी ले ली।

ये ठीक किया ।” कमला रानी बोली “तेरे को पहले भी समझाया है कि औरत से मांगते कुछ नहीं, आगे बढ़कर चुपचाप ले लेते हैं।”

“वाह री औरत।” मखानी ने गहरी सांस ली–“एक नम्बर की हरामी जात है।”

ये तेरे को अब पता चला।”

“पता तो पहले से ही था, पर सही तस्वीर तो तेरी देखी है। तूने तो औरतों की जात पर डंडा घुमा दिया।”

सब थोड़े न, मेरे जैसी दिलदार होती हैं।” तू तो...।" । तभी पीछे कुछ आहटें उभरीं। दोनों ने चलते-चलते गर्दन घुमाकर देखा पीछे। “ओह, देवा को क्या हुआ?” कमला रानी के होंठों से निकला।

एकाएक देवराज चौहान के मस्तिष्क में पीड़ा की तीव्र लहर उठी। देवराज चौहान के होंठों से हल्की-सी कराह निकली। दोनों हाथों से उसने सिर थाम लिया। आंखें बंद होती चली गईं। वो जोरों से लड़खड़ाया और घुटने मुड़ते चले गए। ये सब कुछ मात्र दो पलों में हो गया था। वो नीचे गिरने लगा तो पीछे आते पारसनाथ ने उसकी बिगड़ी हालत को पहचाना और उसके गिरने से पहले ही उसे थामकर संभाल लिया, फिर धीरे से नीचे बैठा दिया।

सब ठिठके।।

“क्या हो गया आपको?” नगीना के होंठों से चीख निकली और आगे बढ़कर उसने देवराज चौहान को संभाला।

देवराज चौहान के दोनों हाथ अभी भी सिर पर थे। आंखें बंद थीं। होंठ भिंचे हुए थे। उसे किसी का कोई स्वर सुनाई नहीं दे रहा था। उसके मस्तिष्क में तूफान उठा हुआ था।

बंद आंखों के पीछे आंधी उठती महसूस हो रही थी। आग की लपटों का भंडार था वो, जो कि हवा के रुख के साथ बहने की चेष्टा कर रहा था। वहां पहाड़ियां थीं। कठोर चट्टानों की पहाड़ियां मधे यम-सी ऊंची चोटी पर दो गुफाएं नजर आ रही थीं। इतनी बड़ी गुफाएं कि एक साथ दस आदमी भीतर प्रवेश कर सकें। दोनों गुफाओं के बीच दस फुट का फासला था। तभी उसे वो दोनों गुफाएं हिलती-सी महसूस हुईं। थोड़ा-सा हिल, फिर वो थम गईं। साथ ही हल्की सी कराह स्पष्ट तौर पर उसके कानों में पड़ी।

| देवराज चौहान की निगाह उन गुफाओं पर टिकी रही।

 
तभी देवराज चौहान की निगाह गुफाओं से साठ फीट नीचे पड़ी। वहां कुछ हिलता सा दिखा उसे।

अगले ही पल भरभराती हुई मध्यम-सी आवाज उसने सुनी।

आजाद करो मुझे। अब तो बहुत वक्त हो गया है।” एकाएक देवराज चौहान के मस्तिष्क में उठता तूफान थमने लगा। धीरे-धीरे सब कुछ शांत हो गया। देवराज चौहान गहरी-गहरी सांसें लेने लगा। सिर से दोनों हाथ खुद-ब-खुद हटते चले गए। आंखें खुल गईं। भिंचे होंठ ढीले पड़ते चले गए। चेहरे पर और शरीर पर पसीना ही पसीना बह रहा था।

क्या हो गया आपको?” नगीना परेशान-सी कह उठी।

वो...वो गुफाएं नहीं थीं, नाक के दो छेद थे।” देवराज चौहान गहरी सांसें लेता कह उठा।

नाक के छेद?” पारसनाथ बोला।

छोरे, लागो हो, देवराज चौहान भयंकरो माजरो देखो हो।”

हां, नाक के छेद थे बो।” देवराज चौहान की हालत अभी भी ठीक नहीं हुई थी—“पहाड़ पर लेटा हुआ था वो। वो उसका चेहरा था। पहले...पहले मैंने समझा वो...वो नाक के छेद गुफाएं हैं।” ।

“लेकिन वो था कौन?” मोना चौधरी बोली।

“मैं नहीं जानता।” देवराज चौहान सोचों में डूबा कह उठा–“मैं उसे पहचान नहीं पाया। शायद उसका चेहरा ठीक से देख ही नहीं सका मैं। उसकी नाक के छेद गुफा जैसे लग रहे थे। इसी से उसका आकार-प्रकार महसूस किया जा सकता है। परंतु वो पत्थर का था। लेकिन उसके होंठ हिल रहे थे, वो बोल रहा था।”

बोल्लो हो वो। पत्थरो का बुत बोल्नो हो? सुन लयो छोरो।”

सुनेला बाप ।”

“क्या बोल रहा था वो?” नगीना ने पूछा।

वो अपनी आजादी के लिए कह रहा था। कह रहा था कि बहुत वक्त हो गया है। मुझे आजाद कर दो।” देवराज चौहान ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा-“लेकिन मैं उसकी बात को जरा भी नहीं समझ पाया कि वो कैसी आजादी की बात कर रहा

“जथूरा की जमीन पर पहुंचते ही तुम्हारे मस्तिष्क ने ये सब देखा।” मोना चौधरी बोली-“ये सब पूर्वजन्म का असर है।”

“तो बेबी तुम्हें भी तो कुछ याद आना चाहिए।” महाजन ने कहा।

मुझे ऐसा कुछ याद नहीं हुआ।” देवराज चौहान उठ खड़ा हुआ।

अब आप ठीक महसूस कर रहे हैं?” नगीना व्याकुल थी। देवराज चौहान ने सहमति में सिर हिला दिया।

“तुम इन बातों से क्या अंदाजा लगाते हो?” पारसनाथ ने पूछा।

मेरे खयाल में वो मुझे बुला रहा था।” देवराज चौहान बोला-“मुझे आजादी के लिए कह रहा था।” \

और तुम्हें याद नहीं आया कि वो कौन है?” ।

“नहीं। मेरे मस्तिष्क ने जो देखा, उसके अलावा मुझे कुछ याद नहीं। मैं नहीं जानता वो कौन था।”

पत्थर का बुत था वो?”

नहीं जानता वो क्या था उसका नाक और होंठ देखे, वो मुझे पत्थर के लगे।”

शायद तुम्हें इसके अलावा और कुछ भी याद आ जाए।” मोना चौधरी ने कहा।

देवराज चौहान ने कुछ नहीं कहा। उसके चेहरे पर उलझन की छाया थी। फिर कह उठा।।

“उसके होंठ ऐसे थे कि जैसे कोई बड़ी दरार हो। जब भी वो होंठ खोलता तो बीच का खाली हिस्सा दरार जैसा लगता। वो किसी दैत्य जैसा था। मैं नहीं समझ पाया कि वो क्या था, कैसा था?”

“हमें चलते रहना चाहिए।” महाजन बोला–“इससे हमारा वक्त बचेगा।”

वो सब पुनः चल पड़े। “तुम खुद को ठीक महसूस कर रहे हो?” महाजन ने पूछा।

हां।” देवराज चौहान के होंठ हिले। ये सब क्या हो रहा है?* नगीना कुह उठी। “जो मुझे याद आया वो मेरे पूर्वजन्म का ही हिस्सा था। पूर्वजन्म की जमीन पर पांब रखते ही, पहला जन्म ताजा होने लगा परंतु आपको तो ठीक से कुछ भी याद नहीं।”

हां, ठीक से याद नहीं। लेकिन शायद बाद में कुछ याद आ जाए।”

सब चलते जा रहे थे। सबसे आगे कमला रानी और मखानी थे।

छोरे।” बांकेलाल राठौर मूंछों पर हाथ फेरकर रुस्तम राव के पास पहुंचा–“यो तो बोतो ही गम्भीरो बात हौवे ।”

क्या बाप?”

“उसके नाको के छेदो गुफाओं जैसो। होंठ खुलते हैं तो दरार जैसो दिखे।” ।

तुम्हें क्या परेशानी होईला बाप?”

*अंम उसो की गर्दनो का अंदाजा लगायो कि वो कित्ती मोटी हौवे ।”

“काये को?” ।

“गर्दन तो उसो की मन्ने ही ‘वडनी' हौवे । इत्ती मोटी गर्दनो अंम कैसों वडो हो। ख़ासो हथियारों की जरूरत पड़ो हो ।”

आपुन तेरे साथ होईला बाप। उसकी गर्दन पर मोटा आरा चलाईला।”

म्हारे को सोचनो दयो उसो की गर्दनो के बारो में ।”

जब वे चले तो कमला रानी ने धीमे स्वर में मखानी से कहा।

तूने देवा की बात सुनी मखानी?”

हां।” ।

तेरे को उसकी बात सुनकर क्या लगता है कि वो किसकी बात कर्...।” ।

वो झूठा है।”

क्यों?”

कोई भी इतना बड़ा हो ही नहीं सकता कि उसकी नाक के छेद गुफाओं जैसे हों।” *

“तेरा मतलब कि देवा झूठ कहकर सबको भटकाने की चेष्टा में ये ही बात है। वो जरूर कोई चाल चल रहा है, तभी तो।”

“तू वहम का मारा है।”

“तू हमेशा मुझे ऐसा ही कहती है।”

तो गलत क्या कहती है। तू तो हर बात में शक ले आता है। तेरे को कोई बात भी सीधी नहीं लगती।”

“एक बात तो सीधी है।” मखानी मुस्कराया।

क्या?" ।

चुम्मी ।”

फिर तू...।।

अब तो दे दे।” ।

तेरे को कहा है न कि औरत से चुम्मी नहीं मांगते ।”

तो क्या मांगते हैं?” ।

कुछ भी नहीं मांगते ।” मखानी ने बाज की तरह झपट्टा मारा और कमला रानी की चुम्मी ले ली।

“अब तू समझदार होता जा रहा है।” कमला रानी मुस्करा पड़ी।

“हमें किसी पेड़ की छाया मिल जाए। तने की ओट मिल जाए तों...।”

“ये बातें औरत के साथ नहीं करते।”
 
तो क्या करते हैं?”

छाया और पेड़ पहले से ही ढूंढकर रखते हैं और औरत को उठाकर तने की ओट में ले जाते हैं।” कमला रानी मुस्कराकर बोली।

मखानी ने पीछे आते सब पर निगाह मारी और कह उठा।

इस समय ये सम्भव नहीं। कहीं वो सब भी मेरे पीछे, तने की ओट में न आ जाएं।”

मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा तेजी से आगे बढ़े जा रहे थे। सपन चड्ढा और लक्ष्मण दास की सांसें फूलने लगी थीं। जबकि मोमो जिन्न मस्ती से आगे बढ़ा जा रहा था। ये पेड़ों से घिरा इलाका था, परंतु जंगल जैसा नहीं था। काफी देर हो गई थी उन्हें इस तरह चलते हुए।

रुक भी जा।” सपन चड्ढा आखिर कह उठा–“मैं थक गया हूँ।” कहकर सपन चड्ढा ठिठका।।

“मैं भी।” लक्ष्मण दास भी रुक गया। दोनों नीचे जा बैठे। मोमो जिन्न ठिठककर पलटा और बोला।

तुम दोनों इंसान बहुत कमजोर हो।”

तू हमें उठा क्यों नहीं लेता?”

“ऐसे ही ठीक है। तुम दोनों आराम कर लो।” मोमो जिन्न कह उठा–“वो सब हमें ढूंढ़ रहे होंगे, कि हम कहां चले गए।”

“नाम मत लों उनका।” सपन चड्ढा कह उठा_“मुझे तों कमला रानी और मख़ानी से डर लगता रहा कि कहीं वो बदला न ले लें हमसे। हमें मार न दें। हर वक्त हमें घूरते रहते थे।”

“मेरे होते हुए वो तुम दोनों का कुछ नहीं बिगाड़ सकते।” मोमो जिन्न ने कहा।

“तुमने तो हमारे लिए मुसीबतें खड़ी कर दी हैं। दिल्ली में हम कितने सुखी थे।” लक्ष्मण दास बोला–“वो दिन कितना अच्छा था कि हम दोनों मौज-मस्ती के लिए दिल्ली से बाहर निकले थे, परंतु तुम पत्थर के रूप में हमारी कार में आ घुसे और हम दोनों को अपने इशारे पर चलने को मजबूर कर दिया।

“ऐसा इसलिए हुआ कि तुम देवा को जानते थे।” मोमो जिन्न मुस्कराया।

मैं तो नहीं जानता था ।” सपन चड्ढा ने तीखे स्वर में कहा। तुम, इसके दोस्त हो। तुम्हारा भी अच्छा इस्तेमाल किया मैंने।”

“हमें दिल्ली पहुंचा दो, बहुत मेहरबानी होगी तुम्हारी ।”

सोबरा से कहकर पहुंचा दूंगा। जब तक हम सोबरा के पास नहीं पहुंचते, तब तक खतरे में रहेंगे।”

कैसा खतरा?”

“जासूसी यंत्र सोबरा को बता सकता है कि हम कहां हैं।”

जासूसी यंत्र-ये क्या होता है?” ।

सैटलाइट जैसा होता है। जथूरा ने आकाश में कई जासूसी मंत्र छोड़ रखे हैं। उनसे अपनी जरूरत के काम लेता है, किसी को खोजना हो तो जासूसी यंत्र उसे खोज लेता है। आदेश देने भर की देर है।”

सैट लाईट?” सपन चड्ढा ने अजीब-से स्वर में कहा। जथूरा महान है।”

कमाल है। जथूरा सैटलाइट का इस्तेमाल भी करता है और जिन्नों का भी।”

वो सच में महान है।”

हम उसके सैटलाइट से कैसे बच सकते हैं?” लक्ष्मण दास ने पूछा।

जल्दी से जथूरा की जमीन से बाहर निकलकर।” मोमो जिन्न ने कहा।

कोई और रास्ता नहीं?”

“नहीं।” ।

जब उन्हें पता चलेगा कि तुम उन सबके साथ नहीं हो तो वो तुम्हें जरूर ढूंढेंगे।”

इस बात की पूरी आशंका है।” मोमो जिन्न गम्भीर हुआ।

इसका मतलब तुम्हारे साथ रहने में हम दोनों भी मुसीबत में फंस सकते हैं।”

मोमो जिन्न ने दोनों को घूरा।।

“तुम दोनों के विचार बहुत घटिया हैं। मैं तुम्हें अपना यार कहता हूं और तुम मुझे मुसीबत कह रहे हो।”

मैंने ऐसा कब कहा।”

“तुम्हारा मतलब तो ऐसा ही था।”

नहीं, तुम गलत समझे हो, मैं तो...।”

“याद रखो, जब तक मैं तुम लोगों के साथ हूं, तब तक ही तुम लोग सुरक्षित हो।” मोमो जिन्न बोला।

नहीं तो क्या होगा?

मैं नहीं जानता क्या होगा। जथूरा की इस जमीन पर तरह-तरह के खतरे भरे पड़े हैं। तुम दोनों किसी भी खतरे में फंसकर अपनी जान गवां सकते हो। मैं तुम दोनों को उन खतरों से बचाकर, आगे बढ़ रहा हूं। यही वजह है कि तुम्हें खतरों का एहसास नहीं हो रहा। वरना तुम लोग तो अब तक मर चुके होते ।”

जथूरा और लक्ष्मण दास की नजरें मिलीं।

कहता तो ये ठीक है।” लक्ष्मण दास बोला।

“हमें इसकी पूरी इज्जत करनी चाहिए।” सपन चड्ढा कह उठा।

कर तो रहे हैं। अब इसे हम मुसीबत नहीं कहेंगे। मोमो जिन्न तो हमारा यार है।”

सच्चा यार ।”

पक्का यार ।” लक्ष्मण दास ने मुस्कराकर मोमो जिन्न को देखा–“अब तो खुश हो जा।”

“मैं नाराज ही कहां हुआ था। वो तो मैं यूं ही बोला था जानता हूँ कि तुम दोनों दिन के अच्छे हो, परंतु कभी-कभी लाइन से फिसल जाते हो। इस वक्त तुम दोनों को हिम्मत रखनी चाहिए।” मोमो जिन्न प्यार से बोला-“मैं तुम दोनों का भला चाहता हूं। अगर जथूरा के हाथ पड़ गए तो वो तुम दोनों से सेवकों के काम लेने लगेगा।”

“तुम्हारा मतलब कि इतना बड़ा बिजनेसमैन नौकर बन जाएगा।” लक्ष्मण दास बोला।

मैं भी?” सपन चड्ढा सकपकाया।

“तभी तो कहता हूं कि आराम मत करो। चलते रहो। सोबरा के पास पहुंचकर आराम ही आराम है।”

दोन फुर्ती से उठ खड़े हुए। “चलो।” । वो तीनों फिर चल पड़े।

“मुझे बस यही चिंता है कि जथूरा के जासूसी यंत्र हमें न खोज लें ।” मोमो जिन्न कह उठा।

जथूरा की नगरी 100 मील के घेरे में थी। चारदीवारी हुई पड़ी थी, पूरे घेरे पर। नगरी में शानदार और खूबसूरत शहर बसा था। सड़कें थीं, दुकानें थीं, फैक्ट्रियां थीं। जरूरत की हर चीज वहां थी। इसके अलावा यहां-वहां बड़े-बड़े महल बने नजर आ रहे थे। लाल पत्थरों के महल। कोई छोटा था तो कोई बड़ा, जैसे कि जरूरत के हिसाब से बनाया गया था उन्हें। परंतु किसी भी महल के पास कोई पहरेदार नजर नहीं आ रहा था, खड़ा नहीं था। यदा-कदा लाल वर्दी में सिपाही अवश्य आते-जाते दिखाई दे जाते थे। उनकी कमर पर कटार जैसा हथियार बंधा दिखता था।

इस तरह की जथूरा की कई नगरियां थीं, परंतु ये नगरी अहम इसलिए थी कि यहां पर जथूरा के विशेष काम होते थे। इन महलों जैसी जगह के भीतर आम नागरिक का जाना मना था। सिर्फ जथूरा के सेवकों का ही आना-जाना लगा रहता था।

इस वक्त दोपहर का एक बजा था। | जिस महल को बड़ा महल कहा जाता है, हम उसी के भीतर चलते हैं।

बड़े महल के एक खास कमरे में।

कमरे का दरवाजा बंद था। भीतर कोई नहीं था। छोटी-सी गोल टेबल के गिर्द तीन खाली कुर्सियां पड़ीं नजर आ रही थीं। दूसरी तरफ एक चार फुट ऊंचे से स्टैंड की दो हथेली जैसी शाखाएं निकल रही थीं। उनमें एक पर चांदी का कलश रखा था और दूसरे पर सोने का। उन कलशों में चांदी में चांदी के रंग की और सोने में, सोने के रंग वाली गोलियां पड़ी थीं। सोने के कलश में तीन गोलियां, चांदी के कलश में मात्र दो गोलियां।
 
तभी दरवाजा खुला।। परंतु कोई दिखा नहीं । फिर दरवाजा बंद हो गया।

जथूरा महान है।” वहां पर पोतेबाबा की मध्यम-सी आवाज गूंजी।

स्पष्ट था कि पोतेबाबा ने भीतर प्रवेश करके, दरवाजा बंद कर दिया था।

इसके साथ ही मध्यम-सी कदमों की आहट, कलशों की तरफ बढ़ने लगी।

कलशों के पास पहुंचकर आहट थमी फिर चांदी के कलश से एक गोली उठकर हवा में तैरती महसूस हुई। अगले ही पल वो गोली हवा में लुप्त हो गई, जो कि पोतेबाबा के मुंह में चली गई थीं। | उसके बाद मध्यम-सी आहट गूंजी जो कि कुर्सियों की तरफ बढ़ रही थी। फिर एक कुर्सी पीछे को खींची गई और कुर्सी पर पड़े दबाव से लगा जैसे कोई उस पर बैठा हो।

वक्त बीतने लगा। दौड़ते पल मिनटों में बदलने लगे।

मात्र पांच मिनट ही बीतें होंगे कि पोतेबाबा की मध्यम-सी कराह वहां गूंजी।।

“आह। कितना तकलीफदेह है अदृश्य होना और फिर अपने असली रूप में लौटना। कितना दर्द होता है।”

एकाएक कुर्सी पर हल्का-सा खाका उभरने लगा। खाका उभरता और गायब हो जाता।। साथ ही पातेबाबा की कराहें सुनाई दे रही थीं।

कभी पोतेबाबा का दाढ़ी से भरे चेहरे का खाका उभरता तो कभी सिर का, कभी पेट, बांह या टांग का।

खाका उभरता और लुप्त हो जाता। पोतेबाबा की मध्यम-सी कराह रह-रहकर उठ रही थी।

‘जथूरा महान है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं।' कराहों के बीच, बड़बड़ाहट यूँजी पोतेबाबा की।

तभी पोतेबाबा की बांई टांग एकाएक स्पष्ट हो उठी।

टांग पर न तो कोई कपड़ा था और न ही पांवों में कुछ पहना था।

फिर दूसरी टांग स्पष्ट नजर आने लगी।

उसी पल पोतेबाबा के होंठों से तीव्र कराह पूंजी और चेहरा स्पष्ट दिखाई देने लगा। सिर भी। आंखें बंद थीं। सिर के बाल चांदी की तरह सफेद और काले, मिक्स थे। जो कि पीछे की तरफ थे। गर्दन तक पहुंच रहे थे। माथे पर चंदन का तिलक लगा था। चेहरे पर सफेद दाढ़ी थी। थोड़ी लम्बी दाढ़ीं, जो छातीं तक आ रहीं थी।

पोतेबाबा के होंठ खुले और तीखी चीख निकली। लगा जैसे कुछ छटपटाया हो। | फिर उसका गला, छाती और कमर का हिस्सा स्पष्ट हो उठा। बांहें भी नजर आने लगीं।

पोतेबाबा अब सशरीर सामने मौजूद था।

आंखें बंद थीं उसकी। वो गहरी-गहरी सांसें ले रहा था। गले में मालाएं पड़ी दिखाई दे रही थीं। वो कमर में धोती पहने था। कई पलों तक पोतेबाबा बंद आंखों की मुद्रा में ही रहा। |

‘कितना कष्ट से भरा है अदृश्य होना और फिर वापस शरीर के साथ दिखाई देना।' वो बड़बड़ाया।

अगले ही पल जथूरा ने आंखें खोलीं। उसकी आं में किसी महात्मा जैसी चमक थी। चंद पल वो सामने देखता रहा फिर उसने अपने हाथों-पैरों पर निगाह मारी और कुर्सी से उठकर, दोनों हाथ छत की तरफ करके मुस्कराया और मधुर स्वर में कह उठा। \

“जथूरा महान है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं।” फिर उसने बांहें नीचे कीं और दरवाजे की तरफ बढ़ गया। दरवाजा खोला। बाहर निकला। आगे राहदारी में बढ़ गया। होंठों पर बराबर मुस्कान ठहरी हुई थी।

तभी सामने से लाल वर्दी में महल का कर्मचारी आता दिखाई दिया।

“ओह, पोतेबाबा।” पोतेबाबा को देखकर वो ठिठका–“आप कब आए?

पोतेबाबा रुका नहीं । पास से निकलता कह उठा।

“जथूरा महान हैं।”

“ओह।” कर्मचारी एकाएक इस तरह संभला जैसे भूली बात याद आ गई हो। वो फौरन कह उठा–“जथूरा महान है।

” | पोतेबाबा आगे बढ़ता हुआ राहदारी मैं मुड़ा तो सामने से आते

दो कर्मचारी उसे देखकर ठिठके।

जथूरा महान है।” वो दोनों एकाएक कह उठे।

उस जैसा, दूसरा कोई नहीं ।” बिना रुके कहता पोतेबाबा आगे बढ़ता चला गया।

इसी तरह कुछ रास्तों को पार करके पोतेबाबा स्नानघर में पहुंचा।

जो कि बंद दीवारों के बीच खुले में था। तालाब जैसी बहुत बड़ी जगह बनी हुई थी। जिसके भीतर तीन-चार फुट पानी था, जिसमें वे केवड़े की महक उठाकर, वहां के वातावरण को मदहोश बनाए हुए थी।

। कमर में कपड़ा बांधे वहां एक सेवक टहल रहा था जो कि पोतेबाबा के देखते ही संभला।

“जथुरा महान है।” वो कह उठा।

उस जैसा दूसरा कोई नहीं।” पोतेबाबा ने मुस्कान भरे स्वर में कहा।

आप कब आए?” उसने आदर भरे स्वर में पूछा।

सीधा यहीं आ रहा हूं गुलाम अली। मुझे स्नान की जरूरत है।” पोतेबाबा ने कहा-“मेरी पीठ को अच्छी तरह रगड़ना।”

जो हुक्म।”

पोतेबाबा ने गले में पहन रखी मालाएं उतारकर एक तरफ रखीं, फिर धोती उतारी और केवड़े के खुशबूदार जल में प्रवेश करता चला गया।

पानी में पहुंचकर डुबकी लगाई। फिर गुलाम अली से कहा। “भीतर आ जाओ। मेरी पीठ रगड़ो।”

जी।” गुलाम अली पीठ रगड़ने वाले सामान के साथ फौरन पानी में उतर आया और पीठ रगड़ने लगा।

“यहां कैसा चल रहा है गुलाम अली?”

सब ठीक है। पहले की तरह।”

स्नान के लिए तो यहां अक्सर सारे आते होंगे?” पौतेबाबा ने पूछा।

। “सब नहीं। बाकी दूसरे स्नानघर में जाते हैं। यहां आने की सबको इजाजत नहीं है।”

तो नई खबर क्या है। तुम्हारी तो यहां आने वालों से बातें होती होंगी।”

“नई खबर कुछ भी नहीं है। सब ठीक चल रहा है।” पीठ रगड़ते गुलाम अली ने कहा-“हर कोई इसी बात के कयास लगा रहा है कि आप देवा-मिन्नो को यहां ला पाने में सफल हो पाते हैं। या नहीं।”

पोतेबाबा के होंठों पर मुस्कान थी।

गलती माफ हो तो पूछे कुछ?”

देवा-मिन्नों के बारे में?” सही अंदाजा लगाया आपने ।”

जथूरा महान है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं ।” पोतेबाबा श्रद्धा भरे स्वर में कह उठा–“जथूरा का हाथ मेरी पीठ पर है। मैं अपने काम में सफल होकर लौटा हूं।”

“ओह, तो आप देवा-मिन्नो को ले आए?” गुलाम अली खुश हो उठा।

“हो ।”

ये तो बहुत खुशी की बात है, अब...।”

सब ठीक हो जाएगा।” पोतेबाबा कह उठा।

अवश्य ठीक होगा। जथूरा के आप जैसे सेवक हैं तो उसकी महानता में और भी बढ़ोत्तरी होगी।”
 
“अवश्य। जथूरा की महानता को बढ़ने से, कोई भी रोक नहीं सकता।” पोतेबाबा ने मुस्कराते हुए मधुर स्वर में कहा “मैं गरुड़ के बारे में कुछ सुनना चाहता हूं गुलाम अली। उसके बारे में बताने का कुछ है तो कहो।”

“आपके जाने के बाद सब कुछ उसने ही संभाल रखा है। मेरे खयाल में गरुड़ अच्छा काम कर रहा है। वो जथूरा का सच्चा सेवक है। आपने उसे चुनकर कोई गलती नहीं की।” गुलाम अली ने सोच-भरे स्वर में कहा“परंतु उसके हाव-भाव में कुछ घमंड के भाव अवश्य आ गए हैं।”

पोतेबाबा ने सिर हिलाया।

क्या कहना चाहते हों?”

गरुड़, जथूरा की बेटी से मिलने के प्रयत्न में रहता है। वो हमेशा उससे बात करने की चेष्टा में रहता है।”

पोतेबाबा ने अपना मुस्कराता चेहरा थोड़ा-सा घुमाकर गुलाम अली को देखा। “ऐसा?”

“हां पोतेबाबा। ये बात मेरी पत्नी ने बताई जो कि जनाना स्नानघर संभालती है।” गुलाम अली बोला।

“ये तो गलत बात है। तवेरा से मिलने का प्रयत्न करना हर कर्मचारी के लिए मना है। तवेरा किसी से मिलना चाहे तो वो जुदा बात है। गरुड़ को ऐसा नहीं करना चाहिए।” कहते हुए पोतेबाबा ने सिर हिलाया।

“गरुड़ कल यहां आया तो मैंने ये बात उससे कही थी कि सुनने में आया है कि आप जथूरा की बेटी से सम्बंध बढ़ाने की चेष्टा में हैं तो गरुड़ ने मेरे को डांट दिया कि ये बात कहने की मेरी हिम्मत कैसे हुई।”

ऐसा कहा उसने ।”

हां।” ।

“उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए। किसी भी कर्मचारी को ऐसा कहने का उसे अधिकार नहीं है। ठीक है अब तुम मेरी नई धोती ले आओ। तब तक मैं नहा लेता हूं। बहुत काम करने हैं मुझे।”

“जी ।” गुलाम अली पानी से बाहर निकलता कह उठा-“देवा-मिन्नो कहां पर हैं?” ।

“यहीं जथूरा की जमीन पर ।”

क्या वो यहां आएंगे?” ।

“अवश्य। वो यहां पहुंचेंगे। यूं समझो कि उन्हें यहां लाया जा रहा है।”

गुलाम अली चला गया।

पोतेबाबा नहाकर पानी से बाहर निकला तो गुलाम अली कपड़े ले आया।

पोतेबाबा ने धोती बांधी फिर बालों में कंघी की। इस दौरान पोतेबाबा बेहद शांत था और मुस्कान ओढ़े हुए था। जब पोतेबाबा वहां से चलने को हुआ तो गुलाम अली बोला। जथूरा महान है।”

उस जैसा कोई दूसरा नहीं।” पोतेबाबा ने कहा और बाहर निकलता चला गया।

महल की कई राहदारियां पार करके वो एक कमरे में प्रविष्ट हुआ।

वहां करीब 60 की उम्र जैसी एक औरत मौजूद थी।

आप आ गए।” वो पोतेबाबा को देखते ही कह उठी। *अभी पहुंचा हूं।”

ये पहली बार है कि आप सीधा मेरे ही पास आए हैं।” वो मुस्कराई।

कुछ काम था लक्ष्मी। पता चला है कि गरुड़ का झुकाव, तवेरा की तरफ है।” ।

“ओह।”

“मालूम करो कि ये बात सच है या झूठ? बेहतर होगा कि तवेरा से ही बात करो।” ।

“मैं अभी तवेरा के पास जाती हूं।” । मैं तुम्हारे पास फिर आऊंगा लक्ष्मीं ।”

बैठेंगे नहीं । खाना तो खा लीजिए।”

अभी फुर्सत नहीं है। कई काम करने हैं।” कहकर पोतेबाबा बाहर निकल गया।

वो बहुत बड़ा कमरा था।

वहां पर 25-30 लोग लाल वर्दी में व्यस्त नजर आ रहे थे। दीवारों पर छोटी-छोटी स्क्रीनें लगी हुई थीं, जो कि रोशन थीं और हर स्क्रीन में कुछ-न-कुछ नजर आ रहा था। | पोतेबाबा के वहां प्रवेश करते ही जथूरा महान है, जथूरा महान है, के स्वर गूंज उठे।

पोतेबाबा ने ये कहकर जवाब दिया कि “उस जैसा कोई दूसरा नहीं'।

पोतेबाबा ने वहां का नजारा लिया।

फिर वो आगे बढ़ा और एक बंद पड़ी स्क्रीन के सामने खाली कुर्सी पर जा बैठा। सामने कुछ बटन लगे थे। उसकी उंगलियां उस पर चलने लगीं। अगले ही पल स्क्रीन रोशन हो उठी। वहां चमचमाते बिंदु दिखने लगे।

तभी एक व्यक्ति पास आ पहुंचा।

इस स्क्रीन पर सैटलाइट के द्वारा समस्या आ रही है।” उस व्यक्ति ने कहा।

कैसी समस्या?”

स्क्रीन सिग्नल नहीं पकड़ रही।”

“सॉफ्टवेयर कौन-सा हैं?” पोतेबाबा ने पूछा।

*2+1 का है।” 47+1 का सॉफ्टवेयर डालो।” वो व्यक्ति तुरंत काम में जुट गया। मिनट-भर में ही उसने अपना काम पूरा किया। तभी स्क्रीन रोशन हो उठी।। पोतेबाबा कई बटनों को दबाता उस व्यक्ति से कह उठा।

सैटलाइट पुराना हो गया है। इस वजह से वो कभी-कभी समस्या दे देता है।”

“नया सैटलाइट तो कब का तैयार हो चुका है। उसे ऊपर छोड़ा जाना बाकी है। थोड़ा अन्य काम बचा था, जो कि अब तक पूरा हो गया होगा।” पोतेबाबा के हाथ की उंगलियां बटनों पर खेल रही थीं और नजरें स्क्रीन पर थीं।

अब स्क्रीन पर जमीनी दृश्य नजर आने लगे थे। *आप क्या ढूढ़ रहे हैं?” उस व्यक्ति ने पूछा।

देवा और मिन्नों को सर्च कर रहा हूं। स्क्रीन पर ।”

वों आ गए?”

“हां पहुंच गए।”

उन्हें लाने में बहुत समस्या आई होगी आफ्को ।”

“ज्यादा नहीं।” पोतेबाबा का स्वर शांत था।

“क्या देवा-मिन्नो यहां आएंगे?”

“आना तो उन्हें यहीं चाहिए।” एकाएक स्क्रीन पर उन्हें हिलते हुए कुछ बिंदु दिखे।

पोतेबाबा ने उन हिलते बिंदुओं को ‘जूम' में लिया तो एकाएक स्क्रीन पर वो सब नजर आए।

ये तो बहुत सारे हैं।” वो व्यक्ति कह उठा। ।

“हां। देवा-मिन्नो के साथी भी हैं। इन सबके ग्रहों की चाल ऐसी है कि एक पूर्वजन्म में आए तो सबको ही पूर्वजन्म में आना पड़ता है।” पोतेबाबा ने शांत स्वर में कहा।।

कौन-कौन हैं साथ में?" ।

बेला, नगीना के रूप में है। भंवर सिंह है, त्रिवेणी है, परसू-नीलसिंह है। कमला रानी और मखानी है।”

कमला रानी और मखानी के बारे में नहीं सुना?”

ये दोनों कालचक्र का हिस्सा हैं।” पोतेबाबा के हाथ बटनों पर चल रहे थे।

“ये कम लोग हैं। पनडुब्बी में तो ज्यादा लोग थे।”

वो बोला। हां। मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा भी थे।” वों कहां गए?”

मालूम नहीं।” पोतेबाबा मुस्कराया—“ये बात मैं उनसे पूछंगा, जो इन पर नजर रखे हुए हैं।”

क्या मैं उनसे पता करके आऊँ?”

“नहीं। मैं जाऊंगा उनके पास ।”

“आप इस वक्त क्या देखने की चेष्टा में हैं।”

मैं किसी तरह का धोखा नहीं खाना चाहता। इसलिए इन सब का परिचय मैं सॉफ्टवेयर द्वारा चैक करना चाहता हूं।” ।

“ओह, क्या धोखा खाने की गुंजाइश है कि ये लोग ये न होकर कोई और हो सकते हैं?" ।

गुंजाइश नहीं है, परंतु मैं अपनी तसल्ली करना चाहता हूं।” तभी स्क्रीन पर देवराज चौहान दिखा।

ये तो देवा है।”

कैसे पहचाना?” पोतेबाबा ने पूछा।

इसे मैंने पनडुब्बी में बैठे देखा था। तब पता चला था कि ये देवा है।”

तभी पोतेबाबा ने सामने लगा एक स्विच दबा दिया।

उसी पल स्क्रीन पर एक तरफ कुछ लिखा हुआ दिखाई देने लगा।

जो कि इस प्रकार था। नाम–देवराज चौहान।। जन्म स्थान–जयपुर।। कद–पांच फुट ग्यारह इंच। पूर्वजन्म का नाम देवा।।

“यै ठीक है।” पोतेबाबा कह उठा फिर उसने दूसरा बटन दबाया तो स्क्रीन पर मिन्नों दिखने लगी।
 
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