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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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हों। जरूरी है। कोमा को मुझसे दूर ही रखना। कहीं वो पास आकर, मेरी नींद खराब न कर दें।”

सरदार ने सिर हिला दिया।

….

सोहनलाल और नानिया बस्ती में पहुंचे तो दोपहर का एक बज रहा था।

जगमोहन को उठाया गया।

सोहनलाल के चेहरे पर उभरी चमक को देखकर जगमोहन मुस्कराया।

तुझे क्या हो गया है?” जगमोहन ने पूछा।

मुझे? मुझे क्या होना है।” सोहनलाल भी मुस्करा पड़ा।

कल तक तो तेरा चेहरा बुझा-बुझा सा था, लेकिन आज तो तेरे चेहरे के नजारे ही कुछ और हैं।” कहते हुए जगमोहन ने नानिया को देखा–

“तुम भी कुछ अलग सी दिख रही हो आज।”

मुझे नानिया से प्यार हो गया है।” सोहनलाल ने बेहिचक कहा। जगमोहन के होंठ सिकुड़े।

सोहनलाल को प्यार?”

क्यों क्या सोहनलाल को प्यार नहीं हो सकता?”

अटपटा-सा लग रहा है सुनकर ।” जगमोहन ने गहरी सांस ली।।

हम शादी करेंगे, तुम्हारी दुनिया में जाकर।” नानिया ने कहा।

जगमोहन ने सोहनलाल को देखा तो सोहनलाल ने ‘हाँ' में सिर हिलाया।

“ये अच्छी बात है। जगमोहन ने कहा

“परंतु हमारी दुनिया में पहुंचोगे कैसे? कालचक्र से कैसे बाहर निकलोगे?”

“क्या तुम्हें रास्ता नहीं मिला।” नानिया बोली–“सरदार ने नहीं बताया?”

बताया भी, दिखाया भी। वो अजीब-सा रास्ता है।”

“वो किताब पढ़ी तुमने?” सोहनलाल ने पूछा।

“हो।” जगमोहन की निगाह नानिया के हाथ में फंसी मोटी-सी अंगूठी पर जा टिकी—“किताब पढ़ी। सारी पढ़ ली। रास्ता हमें मिल जाएगा, परंतु पहले जो बाहर निकलेगा, वो जान गंवा बैठेगा।”

“क्या मतलब?” ।

“मतलब भी समझ में आ जाएगा।” फिर जगमोहन ने नानिया से कहा-“वो अंगूठी मुझे दे दो।”

नानिया ने अपने हाथ में पड़ी अंगूठी को देखा फिर कह उठी।

ये अंगूठी मैं किसी को नहीं दूंगी। सोबरा ने कहा था कि ये अंगूठी मैं अपने से अलग न करूं।”

अब अंगूठी को अलग करने का वक्त आ गया है।” तुमसे किसने कहा?”

किताब में लिखा है।”

लेकिन तुम इसका करोगे क्या?”

साथ रहना और देख लेना।” । नानिया ने सोहनलाल को देखा।

सोहनलाल के सिर हिलाने पर नानिया ने अंगूठी निकालकर जगमोहन को थमा दी।

“तुमने।” सोहनलाल बोला—“किताब में क्या पढ़ा?”

जगमोहन ने सब कुछ बताया।

 
सरदार का दिखाया रास्ता भी बताया और गोटियों के बारे में भी बताया।

फिर बताया कि किताब में लिखे मुताबिक, उस जगह पर जो गोटी कम है, उसकी जगह नानिया की उंगली में फंसी अंगूठी रखी जाएगी तो वो दरवाजा खुल जाएगा। ।

“ओह, इतनी-सी बात” नानिया के होंठों से निकला “ये बात किताब में मुझे क्यों न समझ आई?”

“तुमने किताब पूरी पढ़ी?”

कभी नहीं। पढ़ने की चेष्टा की, लेकिन हमेशा कोई-न-कोई अड़चन आ जाती और मुझे पढ़ने से रुक जाना पड़ता।”

“सरदार से हमेशा तुम्हारी अनबन रही। तुम सरदार का बताया रास्ता भी कभी नहीं देख सकी।”

“लेकिन सवाल ये पैदा होता है कि रास्ता खुलने के बाद कौन सबसे पहले बाहर निकलकर अपनी जान गंवाएगा?” सोहनलाल ने गम्भीर स्वर में कहा—“इस बात पर विचार करना बहुत जरूरी है।”

“इसकी परवाह मत करो सोहनलाल ।” नानिया बोली।

क्यों?”

“मेरे पास हजारों सैनिक हैं। मैं किसी को भी पहले उस रास्ते से बाहर जाने को कह दूंगी।”

धोखे से।”

“हां, तो क्या फर्क पड़ता है।” नानिया मुस्करा पड़ी।

ये नहीं होगा।” जगमोहन बोला-“हम् धोखे से ये काम नहीं करवाएंगे। कोई खुशी से आगे आए तो, जुदा बात है।”

तुम्हें एतराज क्यों?”

“ये जान जाने का मामला है। सच में अंजान रखकर, धोखा देकर किसी को इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।”

“जगमोहन ठीक कहता है।” सोहनलाल ने सिर हिलाया।

तुम दोनों की ही ये मर्जी है तो मैं दोबारा कुछ नहीं कहूंगी।” नानिया ने कहा।

“मेरे खयाल में हमें पहले रास्ता खोलना चाहिए, कालचक्र से बाहर निकलने का ।” सोहनलाल ने कहा। ।

“हां, अभी चलते हैं। रास्ता खोलने के बाद सोचेंगे कि क्या करना है।” जगमोहन बोला और सामने से जाती एक औरत से कहा-“सरदार को यहां भेजों। उससे बात करनी है।”

वो औरत चली गई।

सोहनलाल सोचों में डूबा पास ही टहलने लगा।

“तुम।” नानिया पास आकर धीमे से जगमोहन से बोली-“बहुत ख़राब हो ।”

“क्यों?”

एक ही रात में कोमा की ऐसी हालत कर दी कि वो अभी तक उठ नहीं सकी।”

जगमोहन ने नानिया को घूरा।।

“तुम्हारा दिमाग खराब है।” जगमोहन ने भिन्नाकर कहा।

क्या मतलब?” नानिया अचकचाई।

“मैंने उसे छुआ भी नहीं ।”

ये कैसे हो सकता है।” नानिया के होंठों से निकला।

ये ही हुआ है। तुम्हारे दिमाग में इन बातों के अलावा कुछ और नहीं आता क्या?”

वो वो कुंआरी है, मैने उसे...।”

“चुप रहो।” नानिया अजीब सी निगाहों से जगमोहन को देखने लगी।

तुम सोहनलाल से शादी करने की सोचे बैठी हो?” जगमोहन ने पूछा।

“हो ।” ।

तो तब तुम मेरी भाभी बन जाओगी। रिश्ते का खयाल करों और मेरे से ऐसी बेकार की बातें मत करो।”

“ये बेकार की बातें हैं।” नानिया कह उठी।।

सवाल मत करो। जो मैं कह रहा हूं वह याद रखो। रिश्ते की कद्र करो।”

ठीक है। तुम्हारी ये इच्छा है तो मैं ये ही करूंगी।” नानिया ने सिर हिला दिया।

तभी सरदार और साथ में कोमा भी वहां आ पहुंची।

क्या बात है?” सरदार ने पूछा।

हमने गोटियों वाली जगह पर जाना है। जहां कल गए थे।” जगमोहन ने कहा।

तो रास्ता खोलना है, ठीक है चलो।”

“हम सब चलेंगे। साथ में पांच-सात लोगों को ले लेना। हमने सिर्फ रास्ता खोलना है। बाहर नहीं निकलना ।”

कभी तो बाहर निकलना ही पड़ेगा ।” सरदार बोला। जरूर निकलेंगे।”

“मैं अभी आया।” कहकर सरदार चला गया।

नानिया कोमा को एक तरफ ले गई और धीमे से बातें करने लगी।

जगमोहन मुंह फेर लिया। वो जानता था कि इनमें क्या बातें हो रही हैं और सोचने लगा कि औरतों की जिंदगी कुछ बातों के गिर्द ही घूमती रहती है। दूर तक शायद वो कभी सोच हीं नहीं पातीं। कोशिश ही नहीं करतीं।।

दिन के तीन बजे, जगमोहन, सोहनलाल, नानिया, सरदार और बस्ती के दो अन्य लोग उसी गोटियों वाले उबड़-खाबड़ कमरे में थे। एक आदमी ने मशाल थाम रखी थी, जिससे वहां रोशनी थी।

दीवार पर वो ही गेम बनी हुई थी और उस पर धागे में फंसी गोटियां लटक रही थीं।

कितनी अजीब जगह है ये।” सोहनलाल कह उठा। “ये जगह हमें कालचक्र से बाहर ले जाएगी।” कहकर जगमोहन आगे बढ़ा और उसी दीवार के सामने जा खड़ा हुआ, जहां गोटियां लटक रही थीं और गेम बनी हुई थी।

नानिया ने सोहनलाल का हाथ थामकर धीमे स्वर में पूछा।

ये क्या करेगा?

 
” देखती रहो।” जगमोहन गोटियों को गेम के छेदों में फंसाने लगा। तभी कोमा जगमोहन के पास आ पहुंची।

ये तुम क्या कर रहे हो जग्गू?” ।

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा।

कहीं कुछ बुरा न हो जाए।” कोमा पुनः कह उठी।

मैं वो ही कर रहा हूं, जो किताब में लिखा है।” जगमोहन बोला।

“किताब में लिखा गलत भी हो सकता है।” कोमा चिंता में थी।

पता नहीं। लेकिन मुझे लगता है कि किताब में सही लिखा है।” जगमोहन का स्वर गम्भीर था।

“मुझे तुम्हारी चिंता है।”

जगमोहन कुछ नहीं बोला।

सारी गोटियों को छेदों में फंसाने के बाद एक जगह खाली रह गई। । जगमोहन ने हाथ में पकड़ी, नानिया की उंगली वाली रिंग उस, एक खाली जगह में रख दी। कुछ भी नहीं हुआ।

सब सामान्य रहा। सदार पास में आ गया। तुमने किताब में ध्यान से पढ़ा था?” सरदार बोला।

हो ।”

तो फिर कुछ हुआ क्यों नहीं। कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता नहीं बन पाया अभी तक ।” । |

जगमोहन की निगाह पुनः दीवार में फंसी गोटियों की तरफ उठी।

तभी जगमोहन ने उस खाने में रखी रिंग में हल्का-सा कम्पन होते पाया। उसकी आंखें सिकुड़ीं। ।

“कुछ होने वाला है।” जगमोहन कह उठा–“वो रिंग उस खाने के भीतर चली गई है।”

तुम पीछे हट जाओ।” सोहनलाल कह उठा। जगमोहन पीछे हटा तो कोमा भी पीछे हट गई। सबकी निगाह दीवार पर बने उस खेल के बोर्ड पर थी। एकाएक फर्श में कम्पन-सा उभरा।

ये जगह बर्बाद होने वाली है।” सरदार हड़बड़ाकर ऊंचे स्वर में कह उठा।

“तुम बाहर चले जाओ।” जगमोहन कह उठा।

तुम सब?” हम यहीं रहेंगे।”

तो मैं बाहर क्यों जाऊं।” सरदार कह उठा। तभी एक तरफ की दीवार बे-आवाज-सी धीमे-धीमे एक तरफ सकने लगी।

“ओह।” कोमा के होंठों से निकला–“ये क्या हो रहा है।”

सबकी निगाह उस दीवार पर टिक चुकी थी। वो बेहद मध्यम गति से सरक रही थी। जितनी सरकी, उसके पीछे हरा-भरा बाग और आसमान नजर आने लगा था।

सबके चेहरे खुशी से खिलते जा रहे थे।

“ओह।” नानिंया खुशी से चिल्ला उठी–“सोहनलाल हमें कालचक्र से बाहर जाने का रास्ता मिल गया।"

सरदार की आंखों में भी तीव्र चमक लहरा रही थी।

कोमा ने जगमोहन का हाथ, आवेश और उत्साह में पकड़ लिया था।

वो दीवार अब तक आधी सरक चुकी थी। उसके पीछे का दृश्य अब पूरी तरह स्पष्ट हो गया था।

वहां हरा-भरा बाग था। फलों के पेड़ लगे नजर आ रहे थे। तेज हवा चलने की वजह से पेड़ झूमते हुए लग रहे थे। आसमान में काले-सफेद बादलों के टुकड़े तैर रहे थे। बाग के एक तरफ दूर तक जाता रास्ता दिखाई दे रहा था। । परंतु हैरत की बात थी कि वहां की हवा, इस तरफ भीतर नहीं आ रही थी।

वो दीवार पूरी सरककर ठहर चुकी थी। सब हैरानी और अविश्वास-भरी निगाहों से उस तरफ देख रहे थे।

जगमोहन के चेहरे पर राहत के भाव थे।

जग्गू। तुमने तो कमाल कर दिया।” कोमा खुशी से कह उठी।

“मैंने कुछ नहीं किया।”

झूठ बोलते हो। तुमने ही तो किया है, तभी तो...।”

ये सारा कमाल किताब ने किया है। उसमें लिखा था कि मैं ऐसा-ऐसा करू, वो ही कर दिया मैंने।”

सोहनलाल और नानिया एक-दूसरे का हाथ पकड़े जगमोहन के पास आ गए।

“हमने कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता पा लिया जगमोहन्।” सोहनलाल बोला। ।

“हां, परंतु अभी हम बाहर नहीं निकल सकते।” जगमोहन ने होंठ सिकोड़कर कहा-“किताब में ये बात स्पष्ट तौर पर लिखी है कि सबसे पहले जो बाहर निकलेगा, वो मौत को गले लगा लेगा।”

“तो क्या किया जाए?" जगमोहन बाहर की तरफ देखता रहा। तभी सोहनलाल ने नीचे से पत्थर उठाया और उस तरफ फेंका।

पत्थर बाहर को गया और उस जमीन पर जा गिरा। सब कुछ शांत रहा।

सब ठीक लगता है।” सोहनलाल बोला।

बच्चों जैसी बातें मत करो।” जगमोहन ने कहा-“किताब में गलत लिखा नहीं हो सकता।” ।

 
सोहनलाल ।” नानिया कह उठी–“जगमोहन की बात मानो। उसने किताब को पूरा पढ़ा है।”

मैं कहां उसकी बात को इंकार कर रहा हूं।”

“अब क्या किया जाए?” सरदार जगमोहन के पास आकर बोला।

जगमोहन ने सरदार को देखा फिर बोला।

“तुम एक पुतला तैयार करो ।”

“पुतला?”

“हीं। उसमें घास-फूस भरकर, उसे इंसान के जैसा बना दो।” जगमोहन ने कहा।

“उससे क्या होगा?”

“पता नहीं क्या होगा। मैं तो सिर्फ बेकार कोशिश करने की सोच रहा हूं।”

“मैरे खयाल में पुतले से कोई फायदा नहीं होगा।” सरदार बोला।

“क्यों?”

क्योंकि वो चलकर बाहर नहीं जा सकता। तुम क्या करोगे, क्या उसे बाहर को फेंकोगे?” ।

“यही सोच रहा था कि ऐसा करने पर जो मुसीबत आनी हो पुतले पर आए।” जगमोहन ने कहा।

“ये तो बचकानी बात है।”

कुछ न करने से तो कुछ करना बेहतर है।” जगमोहन मुस्कराया।

बेकार का काम करने से बेहतर है कि आराम कर लिया जाए। जल्दी मत करो। हमें आराम से सोचना चाहिए।” सरदार ने कहा।

“ठीक है। वापस बस्ती में चलते हैं। लेकिन तुम पुतला जरूर बनाना। जो मेरे दिमाग में आया है, वो कर लेने दो।”

“ठीक है, पुतला बन जाएगा।”

जगमोहन ने नानिया और सोहनलाल को देखा। तभी उसे ध्यान आया कि कोमा ने उसका हाथ थाम रखा है।

चलो, वापस बस्ती में चलते हैं।” जगमोहन ने कहा-“वहां कुछ सोचेंगे।” कोमा के हाथ में फंसा अपना हाथ छुड़ा लिया।

सब उस रास्ते को पार करके बाहर निकले और बस्ती की तरफ चल पड़े। सोहनलाल नानिया के पास से हटकर जगमोहन के पास आकर बोला।।

*आखिर कोई तो सुरक्षित रास्ता होगा ही।” ।

होना तो चाहिए।” जगमोहन ने सिर हिलाया-“परंतु उस रास्ते के बारे में किताब में कुछ नहीं लिखा।”

हमें ही सोचना पड़ेगा।” जगमोहन ने सिर हिला दिया।

जग्गू।” साथ चलती कोमा कह उठी–“मैं तुम्हें परेशान नहीं देख सकती।”

“क्यों?”

तुम मुझे अच्छे लगते हो। मैं तुम्हें खुश देखना चाहती हूं।”

जगमोहन ने कुछ नहीं कहा। नानिया भी पास आ पहुंची। वो बोली। “अब हम क्या करेंगे सोहनलाल?” देखेंगे कि...।” ।

“ओह।” एकाएक कोमा ठिठकी और कह उठी–“मेरे हाथ में कुछ था, वो तो मैं वहीं भूल आई।”

जगमोहन रुका। बाकी सब भी रुक गए।

कोई बात नहीं।” जगमोहन ने कहा-“दोबारा जब आएंगे तो तब ले लेना।”

“मैं अभी लाऊंगी। बहुत जल्दी आ जाऊंगी।” कहकर कोमा पलटकर भाग खड़ी हुई।

सब वहीं खड़े रह गए।

कोमा कहां गई है?” सरदार ने पूछा।

“अपनी कोई चीज उस कमरे में भूल गई है। वो लेने गई है।” सोहनलाल ने कहा।

“लेकिन उसके पास तो कुछ भी नहीं था।” सरदार कह उठा–“वो खाली हाथ थी।”

कुछ होगा। तुमने ध्यान नहीं दिया होगा।” ।

आ जाएगी।” नानिया बोली-“वो सामने तो वो जगह है।”

एकाएक जगमोहन बुरी तरह चौंका।।

“ओह।” उसने उस तरफ देखा, जहां कोमा गई थी। अब वो नजर नहीं आ रही थी।

क्या हुआ?” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा।

वो, वो पागल, हम सबके लिए, अपनी जान गंवाने गई है।” जगमोहन चीखा।

“तुम्हारा मतलब कि वो कालचक्र से बाहर निकलने गई है।” सोहनलाल के होंठों से निकला।

जगमोहन तेजी से उस तरफ दौड़ पड़ा, जिधर कोमा गई थी। बाकी सब भी जगमोहन के पीछे दौड़े।

कोमा वापस उस कमरे में पहुंच गई थी, जहां कालचक्र से बाहर निकलने का रास्ता था। चंद पल वो खड़ी उस रास्ते के पार हवा में हिलते पेड़ों को देखती रही फिर आगे बढ़ने लगी। उसके चेहरे पर गम्भीरता थी। दृढ़ता थी। वो फैसला ले चुकी थी कि जग्गू की इस परेशानी को दूर करना है उसने।

तभी उसके कानों में जगमोहन की आवाज़ पड़ी।

कोमा। रुक जाओ कोमा।”

आगे बढ़ती कोमा मुस्कराकर बुदबुदा उठी। ‘तो जग्गू समझ गया कि मेरे इरादे क्या हैं। तभी तो दौड़ा आया।।

कोमा उस जगह पर जा पहुंची, जहां से दीवार हटी थी। दो कदम का फासला था और उसने कालचक्र से बाहर होना था। तभी हांफता हुआ जगमोहन वहां पहुंचा।

रुक जाओ कोमा।” जगमोहन तेज स्वर में बोला “ऐसा मत करो। कोई और रास्ता निकल आएगा।” ।

कोमा ने एक बार भी पलटकर पीछे नहीं देखा और आगे बढ़ गई।

। “कोमा।” जगमोहन चीखा।

परंतु तब तक कोमा कालचक्र से बाहर निकलकर उस बाग के हिस्से में जा पहुंची थी।

जगमोहन ठगा-सा खड़ा उसे देखता रह गया।

वहां बहती तेज हवा में कोमा के बाल उड़ते स्पष्ट महसूस हो रहे थे। जगमोहन अवाकु-सा उसे देखता रहा।

उसी पल बाकी सब भी वहां आ पहुंचे और कोमा को कालचक्र से बाहर देखकर ठगे से रह गए।

ये...ये तो बाहर निकल गई।” सरदार के होंठों से निकला। कोमा को कुछ नहीं हुआ।” नानिया बोली-“सुरक्षित है वो।



तभी कोमा ने पलटकर उन सबको देखा। अगले ही पल उसके होंठ हिलते देखे।

वो कुछ कह रहीं थी। परंतु उसकी आवाज इथर किसी को सुनाई न दे रहीं थी। फिर अगला पल कयामत का था जैसे।

उस तरफ, ऊपर से कहीं, बड़ा-सा पत्थर गिरा कोमा पर। कोमा उस पत्थर के तले पिसती चली गई।

न-हींऽ...ऽ...ऽ...।” नानिया चीख उठी।

जगमोहन जड़ रह गया था। सोहनलाल ने आंखें बंद कर ली थीं। सरदार हक्का-बक्का खड़ा था।

“वो-वो मर गई।” सरदार के होंठों से निकला।

हमारा काम आसान कर गई।” जगमोहन ने फीके स्वर में कहा। कोमा की मौत का उसे बहुत दुख था।

अब वो सब आजाद थे। कालचक्र से बाहर आ चुके थे।

 
नानिया खुश थी। सरदार खुश था। बस्ती वाले खुश थे। जगमोहन भी खुश ही था, परंतु कोमा की मौत का ध्यान उसे बार-बार आ रहा था। नानिया को खुश पाकर, सोहनलाल खुश था। सरदार जगमोहन के पास पहुंचा और आभार भरे स्वर में कह उठा।

“तुम्हारी वजह से हम कालचक्र से मुक्ति पा सके।”

सबकी ही कोशिश थी।” जगमोहन ने कहा-“इसका सेहरा कोमा के सिर पर जाता है।”

“वो शायद तुम्हें सच्चा प्यार करती थी। तुम्हारी खातिर उसने अपनी जान दे दी।”

जगमोहन कुछ नहीं बोला।

अब हम अपनी बस्ती में जाएंगे, जहां कालचक्र में फंसने से पहले रहा करते थे।” सरदार बोला। “तुम इस जगह को जानते हो?”

क्यों नहीं जानूंगा। यहीं पर तो बचपन बिताया था।”

तो ये क्या जगह है?”

जथूरा की जमीन है ये।”

“ओह। तो पूर्वजन्म में प्रवेश कर लिया है मैंने।”

“क्या कहा?”

कुछ नहीं।” जगमोहन हर तरफ नजरें घुमाता कह उठा-“जथूरा का भाई सोबरा कहां रहता है?”

पूर्व की तरफ। जथूरा और सोबरा में जमती नहीं। झगड़ा है।”

क्यों?”

पुरानी बातें हैं। अब ठीक से याद नहीं। लेकिन इतना ध्यान है कि जथूरा के पिता गिरधारीलाल के पास खास ताकतें थीं। जिन्हें उन्होंने कैद करके अपने पास रखा था। परंतु गिरधारीलाल की मौत के पश्चात जथूरा ने ताकतों पर अपना कब्जा जमा लिया। जबकि सोबरा का कहना था कि पिता की चीजें दोनों भाइयों में बराबर-बराबर बंटनी चाहिए।”

सोबरा ठीक कहता है।”

लेकिन जथूरा ने उसकी एक न सुनी। सुनने में आता है कि उन्हीं ताकतों के दम पर जथूरा हादसों का देवता बन गया। उसने और ताकतें भी इकट्ठी कर लीं। सोबरा भी कम नहीं रहा। परंतु जथूरा उससे काफी आगे निकल गया।”

“दोनों में सच्चा कौन है?”

“शायद सोबरा।” सरदार ने कहा। पोतेबाबा के बारे में सुना है?”

“पोतेबाबा जथूरा का सबसे खास सेवक है। जथूरा अगर किसी पर भरोसा करता है तो वो पोतेबाबा ही है।” ।

जगमोहन के चेहरे पर सोच के भाव दौड़ने लगे थे। “तुम मेरे साथ मेरी बस्ती में चल सकते हो।” सरदार बोला।

नहीं। मुझे जथूरा या सोबरा में से किसी एक के पास जाना है। तुम कहो, किसके पास जाना चाहिए?”

“मैं इस बारे में अपनी राय नहीं दे सकता।” सरदार ने इनकार में सिर हिलाया।

क्यों?”

“मुझे दोनों ही पसंद नहीं। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?"

नहीं।” बाकी भी नहीं जाएंगे?”

उनसे तुम पूछ सकते हो।” सरदार सोहनलाल और नानिंया की तरफ बढ़ गया।

आखिरकार सरदार अपने लोगों के साथ वहां से चला गया। सोहनलाल और नानिया जगमोहन के पास पहुंचे।

जगमोहन, हम पूर्वजन्म में आ पहुंचे हैं।” सोहनलाल ने कहा।

तो यहां के खतरों का सामना करने के लिए हमें तैयार रहना चाहिए।” जगमोहन मुस्करा पड़ा।

सोहनलाल ने गहरी सांस ली। पूर्वजन्म की क्या बातें हैं?” नानिया ने पूछा।

कभी हम भी इन्हीं जगहों पर पैदा हुए थे।” सोहनलाल ने कहा।

“फिर?”

बताऊंगा सब कुछ।” सोहनलाल ने कहा-“ये वक्त इन बातों का नहीं हैं।” उसने जगमोहन को देखा_*अब क्या करना है?”

“मैं उलझन में हूं।” जगमोहन ने कहा-“उस तरफ का रास्ता जथूरा की तरफ जाता है और उधर का, सोबरा की तरफ। समझ में नहीं आता कि किस तरफ जाऊं। कहां की तरफ जाना हमारे हित में होगा।”

“जथुरा की तरफ तो बिल्कुल मत जाओ।” नानिया बोलीं।

“क्यों?”

वो अच्छा नहीं है।”

“और सोबरा अच्छा है?” नानिया के चेहरे पर हिचकिचाहट के भाव उभरे। वो कह उठी।

सोबरा भी ज्यादा अच्छा नहीं है। लेकिन जथूरा से तो अच्छा ही है।”

जगमोहन ने फौरन कुछ नहीं कहा।

सोहनलाल मैं कितनी खुश हूं कि कालचक्र से आजाद हो गई।” नानिया बहुत खुश थी—“तुम फल खाओगे?”

“हां।” ।

“मैं अभी लाती हूं।” कहने के साथ ही नानिया फल वाले वृक्ष की तरफ भागती चली गई।

सोहनलाल और जगमोहन की नजरें मिलीं।

“मैं देवराज चौहान के बारे में सोच रहा हूं।” जगमोहन बोला—“वो कहां होगा?”

“देवराज चौहान ही नहीं, वो सब ।” सोहनलाल बोला–“नगीना, बांके रुस्तम, मोना चौधरी, पारसनाथ, महाजन् । हम दोनों पूर्वजन्म में प्रवेश कर आए हैं तो वो लोग भी पूर्वजन्म से दूर नहीं होंगे।”

जगमोहन कुछ कहने लगा कि तभी उसके कानों में फुसफुसाहट पड़ी।

जग्गू।” ।

“तुम?” जगमोहन के होंठों से निकला। सोहनलाल की नजरें जगमोहन पर टिक गईं।

मैं वो ही हूं जो तुमसे कुएं में मिला था। तुमसे बात की थी।” आवाज पुनः कानों में पड़ी। (ये सब विस्तार से जानने के लिए पढ़े ‘जथूरा’।)

“पहचान चुका हूं तुम्हें ।” जगमोहन बोला-“अब हम कालचक्र में नहीं हैं। तम अपने बारे में बताओ।”

“अवश्य। बहुत जल्द मैं तुम्हारे सामने आऊंगा। परंतु इस वक्त मैं तुम्हारी समस्या का समाधान करना चाहता हूं।”

“कैसी समस्या?”

तभी नानिया दोनों हाथों में फल थामे पास आ पहुंची। “लो सोहनलाल, फल खाओं।”

सोहनलाल ने एक फल उठा लिया।

नानिया ने फल जगमोहन की तरफ बढ़ाए तो जगमोहन ने भी एक फल उठा लिया।

तुम उलझन में हो कि जथूरा की तरफ जाओं या सोबरा की तफ।”

हो ।”

तुम्हें सोबरा की तरफ जाना चाहिए। तभी संतुलन कायम रहेगा।”

“कैसा संतुलन?” ।

इस बात का जवाब तो तुम्हें वक्त आने पर पता चलेगा।”

“तुम मेरी किसी बात का स्पष्ट जवाब नहीं दे रहे।” जगमोहन बोला–“ये बताओ कि तुम किसकी तरफ हो?” ।

मैं सोबरा की तरफ से आया हूं।”

 


“तभी मुझे सोबरा की तरफ जाने को कह रहे हो।” नानिया सोहनलाल को देखकर अजीब स्वर में बोली। “ये किससे बात कर रहा है। कोई दिखता तो नहीं ।”

चुप रहो ।” सोहनलाल शांत स्वर में कह उठा।

मैं सिर्फ संतुलन कायम रखने की चेष्टा कर रहा हूं। देवा, मिन्नो और बाकी सब भी इस जमीन पर पहुंचने वाले हैं। मैं उनसे बात करने की स्थिति में नहीं हूं, परंतु तुमसे बात कर पा रहा हूं, इसलिए तुम्हें रास्ता सुझाकर संतुलन कायम रखने को कह रहा हूं।

आने वाले वक्त में जो होने वाला है, वो तुम नहीं देख पा रहे, परंतु मैं देख रहा हूं।”

कुछ मुझे भी बताओ।”

“अभी नहीं। परंतु बहुत जल्द मैं तुम्हारे सामने आऊंगा। तब सब बातें होंगी। ये जथूरा की जमीन है। ज्यादा नहीं रुक सकता मैं यहां। मुझे खतरा है। तुम सोबरा के पास पहुंचने का प्रयत्न करो।”

देवराज चौहान किस स्थिति में है?" जगमोहन ने पूछा।

“देवा-मिन्नो, पूरी तरह तो नहीं, परंतु कुछ हद तक जथूरा की पहुंच के भीतर हैं और तेजी से इसी तरफ आ रहे हैं। उनके इस धरती पर पांव रखते ही, जथूरा पूरी तरह हरकत में आ जाएगा। मैं उससे पहले ही तुम्हें इस धरती से निकाल देना चाहता हूं, ताकि संतुलन कायम रहे। तुम भी वक्त बर्बाद मत... ।”

“मैं समझ नहीं पा रहा कि तुम किस संतुलन की बात कर रहे...।” “ये बात हम बाद में करेंगे—जग्गू तुम...।”

देवराज चौहान इस धरती पर आ रहा है तो मैं यहीं रहना चाहूंगा, उससे मिलना...।”

“देवा से जल्दी मुलाकात होगी तुम्हारी। परंतु इस तरह नहीं। तुम्हें मुझ पर भरोसा है तो मेरी बात मानो और फौरन पूर्व दिशा की तरफ चल दो। जहां सोबरा की जमीन है। अब मैं जाता हूं। तुम यहीं वक्त बर्बाद मत करना।”

इसके बाद कोई आवाज नहीं आई।

सोहनलाल और नानिया की नजरें उस पर थीं।

क्या बात हुई?” सोहनलाल ने पूछा।

जगमोहन ने बता दिया।

तो अब हमें क्या करना चाहिए?”

मैं नहीं जानता वो कौन है जो हमें सोबरा के पास पहुंचने को कह रहा है, जबकि देवराज चौहान इसी जमीन पर पहुंचने वाला है। वो संतुलन कायम रखने को कह रहा है, परंतु बता नहीं रहा कि किस तरह का संतुलन चाहता है वो।”

“तुमने क्या फैसला किया कि हमें किस तरफ जाना चाहिए?” सोहनलाल गम्भीर था।

“हमारे लिए सोबरा हो या जथूरा दोनों ही अंजान हैं। परंतु जथूरा के बारे में काफी कुछ सुन रखा है। वो हादसों का देवता है और हमारी उस दुनिया में हादसे तैयार करके भेजता है। उन हादसों को मैं देख चुका हूं। वे बेहद खतरनाक होते हैं।” (विस्तार से जानने के लिए पढ़िए अनिल मोहन का राजा पॉकेट बुक्स से पूर्व प्रकाशित उपन्यास–“जथूरा' ।)

मेरे खयाल में हमें सोबरा को भी देखना चाहिए कि वो कैसा है।” ।

“सोबरा जथूरा का दुश्मन है। वो किसी मौके पर हमारे काम आ सकता है।” सोहनलाल ने कहा।

“परंतु देवराज चौहान इस धरती पर पहुंचने वाला है।” जगमोहन ने उलझन-भरे स्वर में कहा।

उसे अपना काम करने दो। उसके सामने अपने हालात होंगे, जिनका मुकाबला उसे करना ही पड़ेगा। वो बच्चा नहीं है। हमें अपने हालातों के बारे में सोच-विचार करना चाहिए। अपना रास्ता चुनना चाहिए हमें।”

“हम सोबरा की तरफ ही जाएंगे।” जगमोहून सोच-भरे स्वर में कह उठा।

तभी नानिया कह उठी।

देवराज चौहान कौन है? वों हम सबका बड़ा है।” सोहनलाल ने कहा।

“बड़ा है? क्यों वो पेड़ जितना बड़ा...।”

“वो बड़ा भाई है। उसे अच्छे-बुरे हालातों का ज्यादा अनुभव है।” सोहनलाल बोला।

“अब समझी।” नानिया ने सिर हिलाया-“वैसे सोबरा के पास जाने की सोचकर ठीक किया।”

तुम जानती हो कि सोबरा कहां रहता हैं?” जगमोहन ने पूछा। “क्यों नहीं, मैं यहां के बारे में सब जानती हूं, यहीं की तो हूँ

तो चलो, हमें सोबरा के पास पहुंचना है।” नानिया ने सोहनलाल का हाथ पकड़ा और कह उठी।

“आओ, सोबरा की तरफ चलते हैं।” वो तीनों चल पड़े।

कितना लम्बा रास्ता है?” जगमोहन ने पूछा।

रास्ता तो लम्बा है।” नानिया बोली-“वक्त तो काफी लगेगा पहुंचने में। सोहनलाल ।”

“हों।”

मैं तुम्हारी दुनिया में कब पहुंचेंगी?

” पता नहीं ।”

ये क्या बात हुई। मैं जल्द से जल्द वहां पहुंचकर तुमसे शादी कर लेना चाहती हूं।”

“जल्दी क्या है। हो जाएगी।”

मुझे जल्दी है।” सोहनलाल ने प्यार से नानिया को देखा और मुस्करा दिया। दो कदम पीछे आते जगमोहन ने मुंह बनाया और बड़बड़ा उठा।

उल्लू का पट्टा।'

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कांच की मछली जैसी पनडुब्बी समुद्र में गोली की रफ्तार से सक रही थी। कब का दिन निकल चुका था। समुद्र का नजारा बेहद मजेदार दिख रहा था उन्हें। छोटी-बड़ी मछलियां, व्हेल मछली के अलावा तरह-तरह के समुद्री जीवों के पास से पनडुब्बी निकल रही थी। समुद्र के नीचे का नजारा, इस तरह से उन्होंने पहली बार देखा था। दो बार पनडुब्बी व्हेल मछली से टकरा चुकी थी। परंतु पनडुब्बी का कुछ नहीं बिगड़ा था।

“ये कांच की पनडुब्बी नहीं है।” देवराज चौहान बोला—“कांच जैसी किसी पारदर्शी धातु की पनडुब्बी है।”

“मैं भी यही सोच रहा हूं।” पारसनाथ बोला-“देखने में कांच जैसी लगती है, परंतु पनडुब्बी के बाहरी हिस्से में लचक है। जब ये पहली बार व्हेल से टकराई तो मैंने देखा था, पनडुब्बी का बाहरी हिस्सा थोड़ा-सा दब गया था जो कि बाद में ठीक हो गया।”

“इसी से सोचा जा सकता है कि जथूरा के पास अजूबे की तरह कई चीजें हैं।” देवराज चौहान ने कहा।

*शायद।”

वो वैज्ञानिक भी है और तंत्र-मंत्र की ताकतें भी उसके पास हैं। पता नहीं वो कैसा है। वो कालचक्र जैसी शक्तियों भी रखता है और इस तरह की अजूबी पनडुब्बी भी रखता है। मेरे खयाल में उसके पास और भी बहुत कुछ होगा, हमें हैरान करने के लिए।”

“लेकिन हम उसके पास क्यों जा रहे हैं। आखिर हमारी मंजिल क्या है?” पारसनाथ ने पूछा।

“हमने जब-जब भी पूर्वजन्म का सफर किया है, हमें मालूम नहीं होता कि हम ऐसा क्यों कर रहे हैं। परंतु पूर्वजन्म की जमीन पर पहुंचकर हमें हमारी मंजिल नजर आने लगती है, जिसकी वजह से पूर्वजन्म में आ पहुंचते हैं।”

ओह।” । परंतु एक बात इस बार खतरे से भरी है।”

वो क्या?”

“जथूरा के पास जादुई ताकतें भी हैं और वैज्ञानिक शक्तियां भी। वो हादसों का देवता है। पेशीराम इस बात को स्पष्ट कह चुका है। कि जथूरा की ताकत का मुकाबला नहीं किया जा सकता। हम उसका मुकाबला नहीं कर सकते।” देवराज चौहान बोला।

दो कदम दूर बैठी मोना चौधरी कह उठी। पेशीराम ने ये बात मुझसे भी कही थी।”

तब हमें गम्भीरता से सोचना चाहिए कि हम जथूरा से कैसे टकरा सकेंगे?” महाजन कह उठा।

“पेशीराम ने जो कहा, वो अपनी जगह है। हम लोग ये क्यों सोचें कि उससे नहीं टकरा सकते। हम अपनी कोशिश जारी रखेंगे।” देवराज चौहान ने कहा-“कोशिश करने पर पहाड़ को भी सरकाया जा सकता है।”

“तुम चिंता मत करो। अंम जथूरा को ‘वड' दयो।”

पक्का बाप। आपुन टांगें पकड़ेगा उसकी और तुम उसकी गर्दन काटेला।”

“तंम भी चिंतो मत करो, उसो की टांगो भी अंम ही पकड़ लयों।” बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर जा पहुंचा।

“तुम बोत बहादुर होईला बाप ।”

अंम हौवे ।” *आपुन को तो पैले ई मालूम होईला।” रुस्तम राव ने गहरी सांस लेकर सिर हिलाया—“सब कुछ तुम ही करेला तो देवराज चौहान क्या करेला। कुछ उसके वास्ते भी छोड़ेला बाप ।”

छोरे। देवराज चौहानो को आराम करने दयो, बोत भाग दौड़ कर लयो उसो ने।” ।

“बहुत चिंता हो रही है तुम्हें बांके।” देवराज चौहान मुस्कराकर कह उठा।।

“क्यों न होवे। थारे दम परो ही तो अंम उछल-कूद करो हो। तंम म्हारी पॉवरो हौवे ।” ।

“जथूरो की, पूर्वजन्म की जमीन पर हमें भारी खतरे से सामना करना पड़ सकता है।” देवराज चौहान ने कहा।

अंम खतरों को ‘वड' दयो।”

शायद इतना आसान न हो।”

तंम सबो कुछो म्हारे पे छोड़ दयो।”

तुम तो तोप होईला बाप ।”

“ठीको बोल्लो, देवराज चौहानो की छायो में अंम तोप होईला ।”

सपन चड्ढा और लक्ष्मण दास की नजरें मिलीं।

सपन यार, ये कहां फंस गए।” लक्ष्मण दास मुंह लटकाकर बोला।

“मुझे भी कुछ समझ नहीं आ रहा।”

ये कौन-से पूर्वजन्म जा रहे हैं हम।”

“हमारा कोई पूर्वजन्म नहीं है। इन सबका है।”

तो हम इनके बीच क्यों आ फंसे?”

“ये साले कमीने मोमो जिन्न ने हमें फंसाया है।”

पता नहीं ये हरामी क्यों हमें साथ रखे हुए है। साला हमें मरवा के ही छोड़ेगा।”

पूर्वजन्म पड़ता कहां पर है। आखिर कोई तो जगह होगी।”

मुझे क्या पता जो तेरे को बता दूं। मोमो जिन्न को मैं नहीं छोडूंगा। मौका मिलने दे।” ।

तभी अपने पीछे सांसें लेने की आवाज सुनाई पड़ी। दोनों ने फौरन पीछे देखा।

पीछे मोमो जिन्न बैठा उनकी बातें सुन रहा था। वो दांत फाड़कर कह उठा।

मुझे मारने की योजना बना रहे हो। लेकिन याद रखो मुझे सिर्फ जथूरा या सोबरा मार सकता है।”

क्यों?"

जिन्न को बड़ी ताकतें ही मार सकती हैं। जिन्न इंसान तो होता नहीं ।”

लेकिन हम तुम्हें मारने की नहीं सोच रहे।” लक्ष्मण दास कह उठा–“हम तो आपस में बात कर रहे थे कि मोमो जिन्न कितना अच्छा है। हमें यार कहता है। हमारा कितना ध्यान रखता है, क्यों सपन।”

मुझे क्या पता।”

“यार हाँ कह दे।” लक्ष्मण दास ने सकपकाकर कहा।

“मैं तुम दोनों की बातें पीछे बैठा सुन रहा था। तुम लोगों के मधुर वचन मेरे कानों में पड़ रहे थे।” मोमो जिन्न ने कहा।

लक्ष्मण दास बैठे-बैठे पीछे घूम गया और बोला।।

“यार मोमो जिन्न आखिर तुम हमारा करना क्या चाहते हो। साफ-साफ क्यों नहीं बताते हमें ।”

जथूरा के सेवकों ने मेरी ड्यूटी तुम दोनों पर लगाई है।”

तो?"

मुझे तुम दोनों को साथ में रखना है। अगर उन्हें पता चल गया कि तुम दोनो का कोई काम नहीं रहा तो, वो मुझे वापस बुला लेंगे और वापस जाने पर जब मेरा निरीक्षण होगा तो उन्हें पता चल जाएगा, मेरी इच्छाएं वापस आ गई हैं तो वो मुझे मार देंगे।”

तो इसलिए तुम हमें पास में रखे हुए हो।”

हों।" ।

ये बात उन्हें पता नहीं चल सकती कि अब हम दोनों का कोई काम नहीं बचा।” सपन चड्ढा भी उसकी तरफ पलट गया।

चल सकती है। एक बार पता चल गई थी, परंतु मैंने कह दिया कि तुम दोनों से कभी भी कोई काम पड़ सकता है।”

“इस तरह तुम अपने को कब तक बचाते रहोगे?”

हम जथूरा की जमीन पर पहुंचने ही वाले हैं।” मोमो जिन्न ने कहा-“वहां पहुंचते ही मैं तुम दोनों के साथ सोबरा की जमीन पर जा पहुंचूंगा और सोबरा मुझे अपने पास पनाह दे देगा।”

तो हमारा क्या होगा?”

सोबरा तुम दोनों को वापस भेज देगा, तुम्हारी दुनिया में।”

पक्का ?"

तुम दोनों मेरे यार हो। मुझ पर शक मत करो। मेरी बात मानो। मैं सच कहता हूं। जिन्न झूठ नहीं बोलता।”

लक्ष्मण दास सपन चड्ढा को देखकर कह उठा। “ये कहता है, जिन्न झूठ नहीं बोलता।”

मुझे क्या पता।” सपन चड्ढा ने मुंह फुलाकर कहा।

“ये मुझसे ज्यादा नाराज रहता है।” मोमो जिन्न् कह उठा।

इसकी शक्ल ही ऐसी है। तुम इसकी परवाह मत किया करो। एक बात तो बताओ।”

“क्या?”

तुमने मुझे कहा था कि तुम्हें हुक्म मिला है, इन लोगों को, जथूरा के पास ले चलने का ।”

तो?”

जथूरा तो चाहता ही नहीं था कि ये लोग उसकी जमीन पर पहुंचे।”

“जथूरा महान है। उसकी सोच का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। कोई सोच भी नहीं सकता कि वो क्या खेल खेलने जा रहा है। उस जैसा दूसरा कोई नहीं।” मोमो जिन्न ने भक्ति वाले अंदाज में कहा, जैसे प्रवचन सुना रहा हो।

“ये क्या जवाब हुआ।” ।

तभी मोमो जिन्न ने गर्दन एक तरफ कर ली। आंखें बंद कर लीं, कुछ इस तरह कि उसे कुछ कहा जा रहा हो और वो सुन-समझ रहा हो। वो दोनों समझ गए कि जथूरा के सेवक उसे कुछ कह रहे हैं। कुछ पल मोमो जिन्न सिर हिलाता रहा।

फिर उसने सिर सीधा किया और आंखें खोलते हुए कह उठा। “बोलो, जथूरा महान है।”

“ये तुम्हें अचानक क्या हो गया?” ।

“जथूरा के सेवळू की तरफ से शिकायत आई है कि देर से उन्हें सिग्नल नहीं मिला कि मेरा काम ठीक चल रहा है। तुम दोनों ने भी याद नहीं दिलाया कि जथूरा की सेवा में हाजिरी लगानी है, बोलो, जथूरा महान है।”

जथूरा महान है।” दोनों कह उठे।

“सच में।” मोमो जिन्न मुस्कराकर बोला—“तुम दोनों मेरे सच्चे यार हो।”

मैं तुम्हें पसंद नहीं करता।” सपन चड्ढा कह उठा।

“मैं जानता है। इससे मुझे कोई फर्क भी नहीं पड़ता।” फिर मोमो जिन्न खड़ा होता ऊंचे स्वर में बोला “मैं मोमो जिन्न सबको इस बात की सूचना देता हूं कि हम जथूरा की जमीन पर आ पहुंचे हैं। जथूरा के सेवकों ने मुझे कहा कि ये बात सबको बता दें। इस बात को सब याद रखो कि यहां जथूरा की हुकूमत चलती है। जो जथूरा महान है' बोलेगा, वो खुश रहेगा।”

“कमीना।” सपन चड्ढा बड़बड़ा उठा–“जथूरा को महान कह रहा है और बाहर निकलते ही सोबरा की तरफ दौड़ लगा देगा।”

चुप कर ।” उसकी बड़बड़ाहट सुनकर लक्ष्मण दास धीमे स्वर में कह उठा।

क्या बातें हो रही हैं?" सामने खड़े मोमो जिन्न ने पूछा।

हम आपस में तय कर रहे थे कि जथूरा महान है, ये बात हम दिन में दस बार कहेंगे।” लक्ष्मण दास बोला।

तो खुश रहोगे।” मोमो जिन्न मुस्कराया।

तभी बांकेलाल राठौर कह उठा।

मोमो जिन्नो। म्हारे स्वागत की तैयारियां तो खूब होंगी?”

जथूरा की जमीन पर स्वागत नहीं होता। कोई अपना वक्त बर्बाद नहीं करता इन कामों के लिए। वहां सिर्फ काम होता है और सबको बराबर-बराबर समझा जाता है। तुम्हारी दुनिया की तरह नहीं कि बड़ा आए तो उसके स्वागत के लिए, बाकी अपना काम छोड़ दें।” ।

“थारो मतलब कि जथूरो की जमीनो पर, बड़ो की इज्जतो न हौवे ।” ।

“काम छोड़ के इज्जत करना मना है। किसी के पास वक्त ही नहीं है। सब अपने कामों में व्यस्त हैं। हजारों लोग हर वक्त जथूरा के हादसों को तैयार करने में व्यस्त रहते हैं। वो ऐसी गोलियां खाकर काम करते हैं जिससे कि उन्हें नींद न आए। ये तुम्हारी तरह की आलसी दुनिया नहीं है। जथूरा यूं ही महान नहीं है। उसकी महानता, उसके कामों में झलकती है।”

“देख तो साला कैसे भाषण दे रहा है।” लक्ष्मण दास धीमे से बोला।।

*और वहां पहुंचते ही सोंवरा की तरफ दौड़ पड़ेगा।”

“इसकी जुबान का कोई भरोसा नहीं। कहता है जिन्न् झूठ नहीं बोलते, परंतु ये तो महाझूठा है।”

थारो जथूरो को अंम समझायो कि स्वागत बोत जरूरो हौवे ।”

तभी पनडुब्बी को हल्के-हल्के झटके लगने लगे। सबकी निगाह बाहर की तरफ उठ गई।

पनडुब्बी गहरे पानी से ऊपर उठ आई थी। परंतु अभी भी वो पानी में थी। बराबर पनडुब्बी में कम्पन हो रहा था, फिर एकाएक ही पनडुब्बी आगे को झुकने लगी और पीछे से ऊपर को उठने लगी।

ये क्या होईला बाप?” रुस्तम राव कह उठा।

घबराने की जरूरत नहीं।” मोमो जिन्न कह उठा_“पनडुब्बी तट पर लग रही है कुछ ही देर में हम बाहर...।”

लेकिन ये टेड़ी क्यों हो रही है?” महाजन कह उठा।

पनडुब्बी में प्रवेश और बाहरी रास्ता पीछे से है।” मोमो जिन्न् ने कहा-“पिछला हिस्सा वैसे ही पानी से बाहर आ जाएगा, जैसा कि तुम लोगों के भीतर प्रवेश करते वक्त, बाहर था। वहां से हम बाहर निकलेंगे।”

पनडुब्यो की पूंछों में बोत कुछ हौवे ।”

सब अपने को संभाले रहे। अभी सब ठीक हो जाएगा।” मोमो जिन्न की आवाज सुनाई दी।

फिर शीघ्र ही सब ठीक हो गया।

आगे से झुकी और पीछे को उठी, पनडुब्बी एक जगह ठहर गई। उसकी पारदर्शी बॉडी से बाहर के तट का बहुत बड़ा हिस्सा स्पष्ट नजर आ रहा था।

सफर ठहर गया था।

“चलो बाहर निकलो।” मोमो जिन्न पनडुब्बी के पीछे वाले हिस्से की तरफ बढ़ता कह उठा।

 
समुद्र के किनारे रेत ही रेत नजर आ रही थीं। वीरान तट था। दूर नारियल के पेड़ खड़े हवा के संग गोते लगा रहे थे। वहां के जंगल जैसी जगह की शुरुआत का आभास हो रहा था।

सबसे पहले मोमो जिन्न कांच की मछली की खुली पूंछ (मुंह) से बाहर निकला और कूदकर रेत भरी जमीन पर आ पहुंचा। बरबस ही उसका हाथ पेट पर पहुंच गया।

“भूख लग रही है। जब मेरे में इंसानी इच्छाएं नहीं थीं तो मैं काम में कितना व्यस्त रहता था। खाने-पीने की जरूरत ही नहीं रहती थी ।” मोमो जिन्न आसपास देखता बड़बड़ा उठा।

उसके बाद एक-एक करके सब बाहर निकल आए।

उसके बाद पनडुब्बी का मुंह बंद हुआ और वो वापस पानी में प्रवेश करके गुम हो गई।

मोमो जिन्न लक्ष्मण और सपन के पास जाकर कह उठा। “कितना अच्छा मौसम है यहां।”

“होगा।” सपन चड्ढा ने कटू स्वर में कहा।

यहां पर खाने को जलेबी मिल जाती तो कितना अच्छा रहता।” मोमो जिन्न ने धीमे स्वर में कहा।

सपन चड्ढा ने चिढ़कर कहा।

तुम्हें हर वक्त खाने की पड़ीं रहती है।”

धीरे बोल यार। जथूरा के सेवक सुन लेंगे।” मोमो जिन्न घबराकर बोला।

अब क्या करना है?” लक्ष्मण दास ने पूछा।

हम सोबरा की जमीन की तरफ चलेंगे।” मोमो जिन्न ने कहा।

“चलेंगे?

और क्या?”

लेकिन तुम तो हमें पलों में कहीं भी पहुंचा देते हो, जहां हमें जाना होता है।” लक्ष्मण दास ने कहा।

ऐसा करना अब ठीक नहीं ।”

क्यों?”

हम जथूरा की जमीन पर आ पहुंचे हैं।” मोमो जिन्न ने गम्भीर स्वर में कहा—“यहां मैं अपनी ताकतें इस्तेमाल करूंगा तो उसी पल जथूरा के सेवकों को स्क्रीन पर, मेरी हरकतें नजर आने लगेंगी। वो चैक करेंगे कि मैं किधर जा रहा हूं तो उन्हें पता चल जाएगा कि मैं सोबरा की जमीन की तरफ जा रहा हूं तो बाधा डालकर मुझे रोक देंगे। उसके बाद मेरे मस्तिष्क को अपनी इच्छा के अनुसार चलाएंगे और मुझे अपने पास बुला लेंगे। तब मशीन द्वारा मेरा निरीक्षण करेंगे कि मेरे में गड़बड़ कहां है और फौरन ही मशीन से एक पर्चा बाहर आ जाएगा, जिस पर लिखा होगा कि मेरे में इंसानी इच्छाएं आ गई हैं।”

“तुम्हारा मतलब कि पैदल चलने के अलावा हमारे पास कोई और रास्ता नहीं?” ।

“हां। हमें खामोशी से पैदल ही चलना होगा। तब वो सोचेंगे कि मैं उनके पास आ रहा हूं। इस तरह रास्ता कट जाएगा।”

“ठीक है जैसा तुम ठीक समझो।” ।

और ये बाकी लोग?” सपन चड्ढा ने मोमो जिन्न से पूछा।

“हमें अपनी चिंता करनी चाहिए। मेरा काम इन लोगों को जथूरा की जमीन पर लाना था। वो ला दिया ।” मोमो जिन्न बोला।

जाने से पहले इन्हें तो कुछ कहेंगे ही।”

वो मैं संभाल लूंगा।” मोमो जिन्न ने कहा और पलटकर सबसे बोला—“तुम लोग यहीं रुको। मैं लक्ष्मण और सपन को उन पेड़ों के पीछे ले जाऊं। ये कहते हैं कि पेट में गड़बड़ हो रही है।”

“तुम साथ में क्यों जाईला बाप। पेट में गड़बड़ तो इनके होईला ।”

“ये अकेलें जाने से डर रहे हैं।” मोमो जिन्न ने कहा और उन्हें लेकर दूर नजर आ रहे पेड़ों की तरफ चल दिया।

“वहां सोबरा कहीं हमें डंडे मारकर भगा तो नहीं देगा?” सपन चड्ढा ने कहा।

मेरे साथ वो अच्छा सलूक करेगा। क्योंकि उसे मुफ्त में जिन्न मिल रहा है। अब तुम दोनों बोलो।”

“क्या?” “जथूरा महान है।”

जथूरा महान है।” दोनों कह उठे।

वो सच में महान है।” मोमो जिन्न कह उठा“उसकी महानता का कोई अंत नहीं।”

सपन चड्ढा और लक्ष्मण दास की नजरें मिलीं।

“पागल है साला। जथूरा के गाने गा रहा हैं और सोबरा के पास जाकर बचना चाहता है।” सपन चड्ढा बोला। ।

“चुप कर। इसके साथ लगा रहने में ही हमारा भला है। हम इस पूरी जगह से अंजान हैं।”

बांकेलाल राठौर रुस्तम राव के पास आकर कह उठा।

छोरे, यो मोमो जिन्न म्हारे को गड़बड़ों लागे हो।”

क्यों बाप?”

 


हर वक्तो इन दोनों के साथ ही चिपको हो। ईब देख, पेट में दर्दो उन दोनों के हौवो, और खुदो साथ चल दयो ।”

“आपुन को क्या पता होएला बाप कि भीतरी लफड़ा क्या होईला।”

“गड़बड़ी तो हौवे ही कुछो ।” बांकेलाल राठौर का हाथ मूंछ पर जा पहुंचा।

देवराज चौहान की नजरें हर तरफ घूम रही थीं। परंतु दूर-दूर तक सुनसानी थी। कोई भी नहीं दिख रहा था। तभी मोना चौधरी पास आकर बोलीं । “तुम्हें कुछ अजीब नहीं लग रहा देवराज चौहान?”

कैसा अजीब?” देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा।

यही कि हमें यहां लाकर पटक दिया और यहां कोई भी नहीं है। हमें ये भी नहीं पता कि हमें कहां जाना है।”

मोमो जिन्न हमारे साथ है।” मोना चौधरी की निगाह मोमो जिन्न की तरफ उठी जो लक्ष्मण-सपन के साथ पेड़ों की तरफ जा रहा था।

फिर भी जथूरा के लोगों को यहां अवश्य होना चाहिए था।” मोना चौधरी ने कहा।

“इतना ही बहुत है कि पूर्वजन्म तक पहुंचने का सफर आसानी से कट गया।” देवराज चौहान ने कहा।

हम अपनी इच्छा से पूर्वजन्म में नहीं आए, बल्कि हमें घेरकर पूर्वजन्म में पहुंचाया गया है।”

देवराज चौहान ने मोना चौधरी को देखा। नगीना भी पास आ पहुंची थी।

पहले हम सबको कालचक्र ने उस वीरान टापू पर पहुंचाया। फिर हमें वहां के अजीब हालातों में फंसाया गया। उसके बाद मजबूरन हमें पनडुब्बी में आना पड़ा और फिर हम यहां पहुंच गए।” मोना चौधरी ने कहा।

“ये ठीक कहती है।” नगीना कह उठी—“जथूरा हमें पूर्वजन्म में लाना चाहता था।” ।

“परंतु वो तो हमें पूर्वजन्म में आने से रोकना चाहता था।” देवराज चौहान बोला।

अवश्य ऐसा था।” नगीना बोली-“लेकिन मुझे लगता है कि बाद में उसने अपना इरादा बदल दिया था।”

देवराज चौहान के चेहरे पर सोच के भाव उभरे। तभी महाजन पास आता कह उठा।। “अब हम क्या करें—किंधर जाना है हमें?"

देवराज चौहान की निगाह कमला रानी और मखानी की तरफ उठी। वो सबसे हटकर रेत में अलग बैठे हुए थे। फिर उसने मोमो जिन्न को देखा। परंतु वो नजर नहीं आया। लक्ष्मण-सपन के साथ पेड़ों के पीछे पहुंचकर वो नजरों से गुम हो गया था। पारसनाथ भी करीब आ गया था। ।

“यहां पर किसी का न होना हमें परेशान कर रहा है।” पारसनाथ बोला।

“शायद वे लोग आ रहे हो।” देवराज चौहान ने हर तरफ नजरें घुमाईं।

“उन्हें आना होता तो वे अब तक आ चुके होते ।” मोना चौधरी ने गम्भीर स्वर में कहा।

मैं भी यहीं कहने वाली थी ।” नगीना कह उठी।

देखते हैं। मोमो जिन्न को वापस आ लेने दो।” देवराज चौहान ने सिर हिलाकर कहा।

बांकेलाल राठौर और रुस्तम राव कमला रानी और मखानी के पास पहुंचे।

का बात हौवे। जब से सफरो शुरु हौवो, तंम दोनों चुपो हौवे?” कमला रानी और मखानी ने उन्हें देखा, परंतु खामोश रहे।

कुछो तो बोल्लो हो ।” बांकेलाल राठौर ने पुनः कहा।

वे फिर भी चुप रहे।

सांप सुंघेला इन्हें बाप।”

म्हारे को अजगरो सुंघो लागे हो।”

दोनों उसके पास से हट गए।

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