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महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

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वो बहुत लम्बी और फैली हुई पहाड़ी थी।

जगमोहन, सोहनलाल और नानिया ने दूर से ही उस पहाड़ी को देख लिया था।

पहाड़ी पर पेड़ और पौधे खड़े नजर आ रहे थे। दूर से वो बाग जैसे लग रहे थे। ___

“वो है पहाड़ी?" जगमोहन ने पूछा।

“हां।" खोतड़ा ने बग्गी दौड़ाते हुए कहा—“कुछ ही देर में हम वहां पर होंगे।" ___

“पहले तो इस दिशा में कोई पहाड़ी नहीं होती थी।” नानिया ने कहा।

"ये मायावी पहाड़ी है। महाकाली ने अपनी ताकतों से पहाड़ी को बनाया है। फिर इसमें तिलिस्मी भरा जादुई चक्र चालू किया। बहुत मेहनत की महाकाली ने इसे तैयार करने में। उसके बाद यहां जथूरा को कैद में रखा।” खोतड़ा बोला। ___

"मुझे हैरानी है कि इतनी ज्यादा मेहनत महाकाली ने सिर्फ जथूरा को कैद करने के लिए की।” नानिया बोली।

खोतड़ा ने कुछ नहीं कहा। बग्गी दौड़ती रही।

"ये सब करने में अवश्य महाकाली का कोई अपना ही मतलब रहा होगा।" नानिया कह उठी।

“मुझे ऐसा नहीं लगता।" खोतड़ा बोला।

काफी देर बाद बग्गी पहाड़ी के पास जा पहुंची। मीलों लम्बी-चौड़ी थी पहाडी। खोतड़ा पहाड़ी के साथ-साथ बग्गी दौड़ाता रहा। “तुम कहां जा रहे हो। पहाड़ी के साथ-साथ क्यों बग्गी दौड़ा रहे हो?" सोहनलाल ने पूछा।।

“पीछे के प्रवेश द्वार पर तुम तीनों को छोड़ना है।” खोतड़ा ने कहा।

तीनों खामोशी से बग्गी में बैठे, इधर-उधर नजरें दौड़ाते रहे। फिर वो वक्त भी आया, जब बग्गी का दौड़ना थम गया।

सामने ही पहाड़ी थी। खोतड़ा बोला। “तुम लोग यहां उतर जाओ।”

"रास्ता कहां है?"

“पहाड़ी पर सामने ही रास्ता बनेगा तो भीतर चले जाना। नीचे उतरो।”

तीनों नीचे उतरे। खोतड़ा ने पुनः कहा। “अब मुझे वापस जाना होगा।

"रास्ता कैसे खुलेगा?" जगमोहन ने पूछा।

“महाकाली को सब खबर है कि तुम लोग पहुंच गए हो यहां। वो जब भी ठीक समझेगी, रास्ता खोल देगी।” इसके साथ ही खोतड़ा ने लगामों को झटका दिया तो घोड़े दौड़ पड़े। बग्गी दूर जाने लगी।

_ तीनों बग्गी को देखते रहे, जो कि कुछ ही देर में नजरों से ओझल हो गई।

ये सुनसान जगह थी। पक्षी-परिंदा, जानवर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। मध्यम हवा के संग हिलते पेड़-पौधे ही दिखाई दे रहे

थे।

पहाड़ी ज्यादा ऊंची नहीं थी, पचास-सत्तर मीटर ऊंची रही होगी वो।

“क्या पता पहाड़ी का रास्ता कब खुलता है।" नानिया ने कहा।

“खुल जाएगा।” सोहनलाल की नजरें आसपास घूम रही थीं। जगमोहन एक पत्थर पर जा बैठा था। नानिया ने प्यारी-सी नजरों से सोहनलाल को देखा।

“सोहनलाल।”

“हां।” सोहनलाल ने भी नानिया को देखा। होंठों पर मुस्कान आ गई।

“जब हम वापस तुम्हारी दुनिया में जाएंगे तो वहां पहाड़ी पर घर बनाएंगे।"

“पहाड़ी पर?"

"तुम्हें पहाड़ी पर रहना अच्छा नहीं लगता क्या?"

“बहत अच्छा लगता है।" सोहनलाल ने नानिया का हाथ पकड़ा-“परंतु मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां पहाड़ नहीं हैं।"

"नहीं हैं?"

"जरा भी नहीं।” सोहनलाल ने मुस्कराकर कहा।

"ओह, कोई बात नहीं, हम बिना पहाड़ वाली जगह पर रह लेंगे।"

"देखते हैं कि हम वापस पहुंच पाते हैं भी या नहीं?"

"क्यों नहीं वापस जा पाएंगे?"

“इस तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर जाने किन हादसों का सामना करना पड़ेगा।"

"हम दोनों भीतर साथ ही रहेंगे।"

"हां। हम साथ रहेगे।" जगमोहन ने गहरी सांस ली और मुंह फेर लिया।

"ये तुम्हारा दोस्त सांसें क्यों भरता रहता है?" नानिया ने जगमोहन को देखा।

“तुम इसकी किसी हरकत की परवाह मत किया करो।"

“क्यों, दिमाग का कुछ ढीला है क्या?"

“दिमाग तो कसा हुआ है, परंतु मन उदास रहता है, क्योंकि इसे किसी से प्यार नहीं हुआ।"

"प्यार करने में क्या है, किसी से भी कर लें।”

"मैंने तो बहुत समझाया परंतु ये समझता नहीं।” जगमोहन ने खा जाने वाली निगाहों से सोहनलाल को देखा। सोहनलाल उसे देखकर दांत फाड़ने लगा।
 
“ये देखो सोहनलाल—ये क्या।” उसी पल नानिया ने कहा। दोनों की नजरें घूमी।

जमीन के साथ जहां से पहाड़ी शुरू हो रही थी, वहां पहाड़ी का दस फुट लम्बा हिस्सा जैसे फटकर दाएं-बाएं हो उठा था और भीतर जाने का रास्ता नजर आने लगा था।

जगमोहन फौरन उठकर खड़ा हो गया। तीनों की निगाहें रास्ते पर थीं।

“ये रास्ता हमारे लिए ही खुला है।” सोहनलाल ने कहा।

"हमें भीतर जाना चाहिए।" नानिया कह उठी।

जगमोहन ने होंठ सिकोड़कर पहले आसमान की तरफ फिर हर तरफ देखा।

"क्या हुआ तुम्हें?” सोहनलाल ने उसे देखा।

“बाहर के माहौल को देख रहा हूं और सोच रहा हूं फिर शायद खुला मौसम देखने को न मिले।" जगमोहन ने कहा।

“ये तो निराशावादी है।” नानिया ने कहा।

"ये आशावादी है, इसे गलत मत समझो।” सोहनलाल मुस्कराया। तभी उस पहाड़ी के पैदा हुए रास्ते में एक व्यक्ति दिखा।

वो तीस बरस का, ठिगना-सा था। धोती बांध रखी थी। शेव बढ़ी हुई थी। वो पहाड़ी की सीमा से बाहर नहीं आया और वहीं से उन्हें आवाज लगाता कह उठा। ___

“भीतर आ जाओ जल्दी से । महाकाली ने रास्ता तुम लोगों के लिए ही खोला है। ये कभी भी बंद हो सकता है।"

जगमोहन फौरन आगे बढ़ गया। पहाड़ी के भीतर भरपूर प्रकाश हो रहा था। सोहनलाल और नानिया हाथ पकड़े जगमोहन के पीछे चल पड़े। बीच रास्ते में खड़ा वो आदमी फौरन पीछे हट गया। तीनों भीतर प्रवेश कर गए।

उस आदमी ने दोनों हाथ हवा में उठाए और होंठों में कुछ बड़बड़ाया।

अगले ही पल वो रास्ता धीरे-धीरे बंद होने लगा।

रास्ता बंद हो गया। यहां पर्याप्त रोशनी थी। सब कुछ स्पष्ट नजर आ रहा था।

ये खुला कमरा था। फर्श साफ था। परंतु दीवार और छतें पहाड़ी की थीं। सामने ही एक साथ बने तीन रास्ते नजर आ रहे थे। दरवाजों की तरह रास्ते। इसके अलावा कमरे में कुछ नहीं था।

सोहनलाल और नानिया एक-दूसरे का हाथ थामे यहां के माहौल को देख-समझ रहे थे।

जगमोहन ने उस व्यक्ति को देखा। वो व्यक्ति हसरत भरी निगाहों से नानिया को देखे जा रहा था। “तुम कौन हो?" जगमोहन ने पूछा।

"मेरा नाम बूंदी है।” कहते हुए उसने नानिया से निगाह न हटाई।

सोहनलाल और नानिया ने भी उसे देखा।

"इस तरह आंखें फाडकर क्या देख रहे हो?" जगमोहन बोला।

"औरत। औरत को देख रहा हूं। कब से नहीं देखा। कितने बरसों हो गए।” बूंदी ने सूखे होंठों पर जीभ फेरते हुए कहा—“ये आदमी कितना किस्मत वाला है कि इसने औरत का हाथ थाम रखा है। मेरी बात सुनो भैया।” वो सोहनलाल से बोला।

“क्या?"

"क्या तुम मुझे मौका दोगे कि कुछ देर में इस औरत का हाथ पकड़ सकू?" बूंदी ने कहा।

“मैं तुम्हें ऐसा नहीं करने दूंगा। ये मेरी औरत है।”

"कितनी बुरी किस्मत है मेरी।" उसने गहरी सांस ली। वो उदास हो गया।

"अब मेरी बात का जवाब दो। तुम अपने बारे में बताओ।" जगमोहन बोला।

"मैं बूंदी हूं। महाकाली का सेवक हूं।" उसने जगमोहन को देखा— "मैं यहां पर बहुत दुखी हूं।" ।

"क्यों?"

“महाकाली ने तिलिस्मी पहाड़ी के पीछे के रास्ते का पहरेदार बना रखा है मुझे। उधर आगे के रास्ते पर मेरा भाई बांदा, पहरेदार है। हम दोनों भाई कभी मिल भी नहीं सकते। मुझे उसकी बहुत याद आती है। क्या तुम लोग मेरा भला करोगे?"

"कैसे?"

"मुझे महकाली की कैद से आजाद करा दो।"

"हमें तुम्हारी जिंदगी से कोई मतलब नहीं।"

"मैं जानता हूं कि मैंने बुरी किस्मत पाई है। कोई मेरी सहायता नहीं करेगा।" उसने उदास स्वर में कहा और नीचे बैठ गया।

“बेचारा, कितना दुखी है।” नानिया कह उठी।

“चुप कर।” सोहनलाल ने मुंह बनाया—“ऐसे दुखी तेरे को मेरी दुनिया में हर कदम पर मिलेंगे।"
 
“वहां भी ऐसा होता है?"

"इससे ज्यादा होता है।" तभी जगमोहन बोला।

"ये सामने तीन रास्ते क्यों बने हुए हैं?"

“आने वाले को धोखा देने के लिए।” बूंदी ने कहा।

"आने वाले को? कहां से अपने वाले को?"

"उधर से जो इस तरफ आ पहुंचेगा। उसे तीन दरवाजे नजर आएंगे।” बूंदी ने बैठे-बैठे कहा—“वो इस वाले रास्ते से इधर आना चाहेगा तो, ये रास्ता उसे तिलिस्मी नदी में फेंक देगा। इस वाले रास्ते से भीतर आएगा तो उसी पल पहाडी के ऊपर पहंच जाएगा, जहां से चला था और अगर इस तीसरे रास्ते से आएगा तो, इस कमरे में आ जाएगा और बाहर जाने के लिए वैसा ही रास्ता खुल जाएगा। जहां से तुम लोग भीतर आए हो।”

“बहुत खतरनाक रास्ते हैं ये।” सोहनलाल ने कहा। __

"तिलिस्मी पहाड़ी है, इस पहाड़ी का निर्माण महाकाली ने अपने दुश्मनों को भटकाने के लिए किया है।" बंदी बोला—“परंत एक बात मैं तुम लोगों से स्पष्ट कर देता हूं कि मेरी किसी बात का भरोसा मत करना।"

"क्या मतलब?”

"मैं जो कहूंगा उसमें सच भी छिपा होगा और झूठ भी। जैसे कि मैंने तुम लोगों को इन तीनों रास्तों के बारे में बताया। मैंने जो कहा वो सच है, परंतु ये झूठ बताया कि कौन-से रास्ते से प्रवेश करने से क्या होगा।

“मतलब कि रास्तों की जानकारी तुमने गलत कही।"

“हां। क्या पता जिस रास्ते से होकर आने से, आने वाला तिलिस्मी नदी की अपेक्षा, सीधा इस कमरे में आ जाए और बाहर जाने का रास्ता खुल जाए।" बूंदी ने कहा।

“तुमने आधा सच, आधा झूठ क्यों बोला हमसे?"

"इस तिलिस्म में झूठ तभी बोला जा सकता है, जबकि सच भी साथ में जुड़ा हो।” बूंदी बोला। ___

“हमारे आने पर तुमने दो बातें कहीं।” जगमोहन बोला—"खुद के दुखी होने की और इस औरत का हाथ पकड़ने की। इन दोनों बातों में कौन-सी सच बात थी और कौन-सी झूठ?" ___

“मैं यहां पर दुखी हूं ये झूठ है और इस औरत का मैंने हाथ पकड़ना चाहा, ये सच है।" ।

“तिलिस्म में हमें जो भी मिलेगा, वो सच और झूठ एक साथ बोलेगा?”

“हां और उसी में तुम लोगों की बात का सच्चा जवाब भी होगा। ये तुम लोगों की बुद्धि पर है कि सही जवाब ढूंढ पाते हो या नहीं?"

जगमोहन के होंठ सिकुड़ गए। “ये तो बहुत चक्कर वाला मामला है।” सोहनलाल बोला।

"तु घबरा मत।" नानिया बोली—“सच झूठ को मैं पहचान लूंगी।"

तभी बूंदी कह उठा। "लेकिन तुम लोगो को इस बात से घबराने की जरूरत नहीं है।"

"क्यों?"

“तुम लोगों ने तो पीछे की तरफ से आगे जाना है। जो रास्ता मिले, चलते जाना। कहीं-न-कहीं तो देवा-मिन्नो मिल ही जाएंगे तो उन्हें समझाकर, उन्हें वहीं से वापस ले जाना। शर्त ये है कि तब तक वो जिंदा रहे तो।” ____

“तुम मुझे बताओ कि किस रास्ते से हम प्रवेश करें तो

देवा-मिन्नो के पास जल्दी पहुंचेंगे।"

"ये मैं नहीं बता सकता।

"क्यों?"

"इस बात का जवाब मेरे अधिकार सीमा से बाहर है।"

"अगर हम किसी गलत रास्ते में प्रवेश कर गए तो?" नानिया बोली।

"तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जाओगे तो पहाड़ी के सामने वाले रास्ते की तरफ ही, जहां से देवा-मिन्नो ने आना है। अगर तुम लोगों की किस्मत खराब हुई तो, देवा-मिन्नो से मुलाकात ही नहीं होगी।" बूंदी ने कहा।

- "क्या मतलब?" ___

“इतनी फैली हुई पहाड़ी है। भीतर जाने कितने रास्ते सामने वाले रास्ते की तरफ जाते हैं। देवा-मिन्नो क्या पता किस रास्ते की तरफ से आते हैं और तुम लोग जाने किस रास्ते पर आगे जाते हो।"

जगमोहन और सोहनलाल की नजरें मिलीं।
 
"फिर तो तुम्हें बताना चाहिए कि हम किस रास्ते से जाएं तो देवराज चौहान मिलेगा।"

"मैं नहीं बताऊंगा।"

"क्यों?"

"मैं अगर कह दूं कि पहले रास्ते से जाओ और दूसरा रास्ता ठीक हुआ तो। क्या पता तीसरे रास्ते से भीतर जाते ही तुम तीनों फौरन देवा-मिन्नो को अपने सामने पाओ।” बूंदी ने कहा।

“इसने तीन बातें कहीं हैं।” सोहनलाल बोला—“उसमें से एक सच है।"

"कोई फायदा नहीं।” जगमोहन ने गहरी सांस ली—“तीन में से एक सच्ची बात का ढूंढना कठिन है। दो में से एक को ढूंढना होता तो हम शायद कोई फैसला ले लेते।"

बूंदी मुस्कराकर बोला। "पते की बात कही जग्गू ने। अब एक बात और भी सुन ले।" “क्या?"

"जितना मर्जी आगे बढ़ जाओ, परंतु वापस मत पलटना। वापस आने पर तिलिस्मी रुकावटों का सामना करना पड़ेगा, जैसे कि देवा-मिन्नो को करना पड़ेगा।" बूंदी बोला।

"इतना कुछ बता रहे हो तो एक बात का जवाब और दे दो।" जगमोहन मुस्कराया।

"पूछो पूछो।”

“इस पहाड़ी में जथुरा कहां है?"

"बे-ईमानी नहीं करूंगा महाकाली से, बेशक मैं यहां दुखी ही क्यों न होऊ।” बूंदी मुस्करा पड़ा—“सारा खेल ही जथूरा का है। वैसे मैंने बता भी दिया तो तुम उस तक नहीं पहुंच सकोगे।"

“क्यों?"

“जथूरा तक पहुंचने के रास्ते पर देवा-मिन्नो के नाम का तिलिस्म बंधा है। जब तक देवा-मिन्नो तिलिस्म नहीं तोड़ देते तब तक कोई भी जथूरा तक नहीं पहुंच सकता।" बूंदी ने कहा। __

“फिर तो तुम्हें बताने में कोई परेशानी नहीं होनी...।"

"तुम लोग वहां तक नहीं पहुंच सकते तो पूछते ही क्यों हो। जाओ अब, मेरा आराम करने का वक्त हो रहा है।"

"नमूने भरे हुए हैं यहां तो।” सोहनलाल कह उठा।

"मैं नमूना नहीं, बूंदी हूं।” बूंदी ने शांत स्वर में कहा।

जगमोहन की निगाह उन तीनों रास्तों पर जा टिकी। चेहरे पर सोच के भाव थे।

"हमें इनमें से एक रास्ता चुनना है।"

"कौन-सा चुनें?” तभी नानिया ने कहा।

"हम तीनों एक-एक रास्ते में प्रवेश कर सकते हैं।"

“उससे हम अलग हो जाएंगे। बेहतर होगा कि हम एक साथ ही रहें।” जगमोहन ने कहा।

"तो हम किस रास्ते पर आगे बढ़ें। तीन रास्तों में से एक को चुनना आसान भी तो नहीं।" ।

जगमोहन ने बूंदी को देखा। उन्हें देखता बूंदी फौरन हाथ हिलाकर कह उठा।

“मुझसे मत पूछना। मेरे से सच नहीं जान पाओगे।"

"एक इशारा ही तो करना है।” सोहनलाल मुस्कराया।

"ये मुझसे नहीं होगा।

"ठीक है।” नानिया कह उठी—“अगर मैं तुम्हें हाथ पकड़ने का मौका दूं तो तब बताओगे।"

बूंदी का चेहरा खिल उठा।

“नानिया—तुम... ।” सोहनलाल ने कहना चाहा।

"मुझे बात करने दो सोहनलाल । बीच में मत बोलो।"

“तम कितनी अच्छी हो।” बंदी नानिया से कह उठा।

“जवाब दो मेरी बात का।”

“ये मेरा सौभाग्य होगा कि तुम्हारा हाथ थामा तो, क्या तुम बिना किसी शर्त के अपना हाथ मेरे हाथ में नहीं दे सकती।"

“अगर तुम सही रास्ता बताओगे तो तभी हाथ थामने दूंगी।"
 
“क्या फायदा कि मैं झूठ कह दूं कि पहले वाले रास्ते में चले जाओ, जबकि सही रास्ता तीसरे में हो।” बूंदी ने मुंह बनाकर कहा।

“मतलब कि तुम हमें कुछ नहीं बताओगे?" नानिया ने कहा।

“नहीं। क्या अब मैं तुम्हारा हाथ पकड़ सकता हूं?" उसी पल जगमोहन ने कहा।

"तुमने पहले और तीसरे रास्ते का जिक्र किया, परंतु दूसरे रास्ते के बारे में कुछ नहीं कहा।”

"मेरी मर्जी, मैं नहीं लेता दूसरे का नाम।” बूंदी मुस्करा पड़ा।

जगमोहन ने सोहनलाल को देखा।

"हमें पहले और तीसरे में से एक रास्ते का चुनाव करना चाहिए।” सोहनलाल बोला।

“तुम तय करो।"

“जो नानिया कहेगी, उस पर जाएंगे।” सोहनलाल ने कहा। दोनों की निगाह नानिया पर जा टिकी।

नानिया गम्भीर दिखी। तीनों रास्तों पर उसने निगाह मारी। बोली।

“पहले रास्ते से भीतर जाएंगे।"

“ठीक है।" जगमोहन ने सिर हिलाया। सोहनलाल ने बूंदी को देखा।

बूंदी टुकर-टुकर सा तीनों को देख रहा था।

“अब ये तो बता सकते हो कि हमने सही रास्ते का चुनाव किया है या नहीं?"

“पहला रास्ता गलत भी हो सकता है और ठीक भी।”

"ये तो हम भी जानते हैं।"

"कहीं बीच वाला रास्ता तुम लोगों के काम का न हो।” बूंदी लापरवाही से बोला।

जगमोहन सोहनलाल की नजरें मिलीं।

"ये हमें भटका रहा है।” जगमोहन बोला।

"हम पहले रास्ते से ही भीतर जाएंगे।” सोहनलाल ने कहा।

"औरत का कहना मत मानो। दूसरे रास्ते से भीतर प्रवेश कर जाओ।" बूंदी मुस्करा पड़ा।

“ये हमें भटका रहा है।" जगमोहन ने पुनः कहा।

“सही रास्ता बता रहा हूं तो मेरा एहसान मानने की अपेक्षा इल्जाम लगा रहे हो।" बूंदी नाराजगी से बोला।

"तुम किसी भी कीमत पर हमें सही दिशा नहीं बता सकते।" सोहनलाल ने कहा।

“क्यों?"

“तुम खुद कबूल कर चुके हो कि तुम हमें सही जवाब नहीं दोगे।" ___

“सही दे रहा हूं तो तुम लोग मान नहीं रहे। शक कर रहे हो।”

जगमोहन सोहनलाल और नानिया को देखता कह उठा।

“अपनी बातों से ये हमारा दिमाग खराब कर देगा। हमें पहले रास्ते से ही चलना चाहिए।"

“चलो।” नानिया पहले वाले रास्ते की तरफ बढ़ी। जगमोहन-सोहनलाल उसके पीछे हो गए।

“ये क्या कर रहे हो।" बूंदी कह उठा—“मारे जाओगे। पहले दरवाजे से भीतर प्रवेश करते ही आग के दरिया से सामना हो जाएगा।"

उसकी बात पर तीनों ठिठक गए। पलटकर बूंदी को देखा।

"मेरी मानो तो तीसरे दरवाजे से भीतर प्रवेश कर जाओ। उसके बाद आनंद ही आनंद मिलेगा।” बूंदी हंसकर बोला। _

“हमें रुकना नहीं।" बूंदी को घूरते जगमोहन बोला—“पहले रास्ते से ही भीतर प्रवेश करो।"

“वहां...वहां अगर आग का दरिया हुआ तो?" नानिया के होंठों से निकला।

“तो तुम अकेली नहीं, हम दोनों भी मरेंगे।”

“शुभ-शुभ बोल सोहनलाल।" फिर एक-एक करके तीनों पहले वाले रास्ते से भीतर प्रवेश कर गए। ___

बूंदी फर्श पर बैठा, शांत निगाहों से पहले रास्ते की तरफ देखे जा रहा था।

__ मन आशंकाओं से घिरे थे। भय भी लग रहा था। परंतु तीनों में से एक रास्ता तो चुनना ही था और बूंदी विश्वास के काबिल नहीं था कि उसकी बात मानी जाए। ____

मन में ये बात बैठाए कि देखते हैं क्या होता है, पहले रास्ते से

वे भीतर प्रवेश कर गए थे।

भीतर प्रवेश करते ही तीनों ने खुद को एक बाजार में पाया। चहल-पहल थी बाजार में।

लोग आ-जा रहे थे। शोर उठ रहा था। छोटी-बड़ी पुरानी दुकानें नजर आ रही थीं। सिर पर खुला आसमान था। सामने से घोडागाड़ी आते पाकर तीनों एक तरफ हो गए।
 
"ये कैसी जगह है?" सोहनलाल के होंठों से निकला।

“महाकाली की मायावी दुनिया है।” नानिया ने कहा।

"लेकिन ये आसमान कैसे नजर आ रहा है, हमने तो पहाड़ी के भीतर प्रवेश किया था।"

“आंखों का धोखा है ये सोहनलाल ।”

“धोखा?"

“हां। ये सब मायावी जाल है। देखने में असली, कुछ भी नकली नहीं। परंतु सब कुछ जादुई है। महाकाली ने अपनी ताकतों से ये सब बसा रखा है। इस दुनिया में ये सब होना मामूली है।"

"हैरानी है।” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा। जगमोहन हर तरफ ध्यानपूर्वक देख रहा था।

“क्या कहते हो?” सोहनलाल ने पूछा।

"कुछ भी समझ नहीं आ रहा कि हम कहां आ पहुंचे हैं।" जगमोहन ने कहा।

“यहां के लोगों से बात करें?"

“उससे क्या होगा?"

"शायद कोई काम की बात सुनने को मिले।"

“महाकाली की जगह है ये। यहां हमें कोई काम की बात क्यों बताएगा।" जगमोहन ने आसपास देखते हुए कहा। ___

“फिर भी पूछने में क्या हर्ज है।” कहने के साथ ही सोहनलाल ने पास जाते आदमी को टोका-"सुनना भाई साहब।"

वो आदमी ठिठका। सोहनलाल को देखने लगा।

"ये कौन-सी जगह है?"

“तुम नहीं जानते?"

“नहीं।"

"नए आए हो?"

"हां" सोहनलाल ने सिर हिलाकर स्वीकार किया।

"ये महाकाली की तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर बसाई मायावी दुनिया है।"

“मायावी दुनिया। तो क्या तुम असली आदमी नहीं हो?"

"असली हूँ। जैसे तुम असली हो।"

“तुम इस मायावी दुनिया में कैसे आ गए?"

“महाकाली हम सब लोगों को यहां ले आई अपनी ताकतों से। हम यहीं के हो के रह गए।"

"तुम यहां से निकलना चाहते होंगे?"

“नहीं। मैं खुश हूं यहां। मजे से जिंदगी बीत रही है।"

“एक बात बताओ। हमने पहाड़ी के पीछे से भीतर प्रवेश किया है और सामने वाले रास्ते पर जाना चाहते हैं। कैसे जाएं?" ___

“मैं न तो पीछे का रास्ता जानता हूं न आगे का। मुझे कुछ नहीं पता।” कहकर वो आगे बढ़ गया।

सोहनलाल उसे जाते देखता रहा। सब कुछ सामान्य नजर आ रहा था, परंतु ये सब मायावी था।

“क्या करें अब?” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा।

"हमें रास्ता पूछते रहना होगा।" जगमोहन ने कहा—“किसी से तो पता चले..."

तभी नानिया का स्वर दोनों ने सुना।

"लो, ये फिर आ गया।"

दोनों की नजरें घूमी। सामने से बंदी आ रहा था। वो पास आ पहुंचा।

"मैं तुम लोगों को ही ढूंढ़ रहा था।” बूंदी बोला—“तुम्हारे बिना मन नहीं लगा मेरा।" ____

“तुम्हें आना ही था तो हमारे साथ आ जाते।” सोहनलाल ने उसे घूरा।

"तब मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था।” बूंदी ने नानिया को देखा—“मैं इसका हाथ पकड़ना चाहता हूं।"

"कभी नहीं।" नानिया ने तेज स्वर में कहा।

“गुस्सा मत करो।” बूंदी बोला—“मैं तुम्हें गुस्से में नहीं देख सकता।"

“तुम चाहते क्या हो?" जगमोहन ने पूछा।

"कुछ नहीं। मैं तो सेवक हूं। सेवा करना मेरा काम है। अगर तुम लोग दूसरे वाले दरवाजे से भीतर आते तो अब तक सामने वाले दरवाजे के पास पहुंच गए होते। परंतु तुम लोग तो यहां आ गए। एकदम उल्टी तरफ।" ___

"तु सच में घटिया इंसान है।” जगमोहन मुस्कराया।

“मैं ज्योतिष का काम भी जानता हूं और बता सकता हूं कि तुम तीनों बहुत जल्द मरने वाले हो, परंतु तुम तीनों की ही उम्र बहुत लम्बी है। जीते-जीते तंग आ जाओगे।" बंदी ने कहा। ____

“आशीर्वाद दे रहा है या फांसी की सजा सुना रहा है।"

सोहनलाल ने कड़वे स्वर में कहा।

"इन दोनों बातों में कौन-सी बात सच है?" जगमोहन ने बूंदी की आंखों में झांका। ___

"दोनों ही सच हैं। वैसे ये पता लगाना तुम लोगों का काम है कि कौन-सी बात सच है।" ___ “ये इसी तरह की बातें करके हमारा दिमाग खराब करता रहेगा।" नानिया बोली।

"मैं तुम्हारा हाथ...।"

“चुप रहो।” नानिया उखड़ी।

“फिर नाराज हो गई। जबकि मैं तुम्हें खुश देखना चाहता हूं।" बूंदी ने गहरी सांस लेकर कहा।

* “तुम हमें काम की बात बताओगे या यूं ही उल्टी बात करते रहोगे?"

“पूछो-पूछो। काम की बात पूछो।"

“सामने वाला रास्ता किधर है, जहां से देवराज चौहान ने आना है।"

“पूर्व या पश्चिम । इन दोनों तरफ से एक रास्ता चुन लो।” बूंदी मुस्कराया—“इससे या तो तुम्हारी उम्र लम्बी हो जाएगी या छोटी। या तो देवा से मिल लोगे या नहीं।"

"ये इसी तरह की बातें करेगा।"

“जथूरा कहां है?"

“वो जहां भी है आराम से है, परंतु दुखी बहुत है।” बूंदी ने मुंह लटकाकर कहा—“सोबरा का कालचक्र पकड़ते ही उस पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। लेकिन जो भी हुआ, उससे वो खुश है।"

“तुम पागल तो नहीं हो।” नानिया ने तेज स्वर में कहा।

“बिल्कुल नहीं। मैं तो सेवक हूं।" जगमोहन के होंठ सिकुड़े।

"हम देवराज चौहान से नहीं मिलना चाहते।"

"ये तो अच्छी बात है।" बूंदी बोला।

"तो अब कहां जाएं?"

“उत्तर चले जाओ। दक्षिण चले जाओ। वहां देवा से मुलाकात नहीं होगी।”

__ "हम जथूरा से भी नहीं मिलना चाहते।"

"फिर तो तुम लोगों को पूर्व या उत्तर दिशा में जाना होगा।" बूंदी कह उठा।

* “ये हमारे किसी काम का नहीं।” सोहनलाल ने जगमोहन को देखा। __

“इसे पकड़कर पीटना शुरू कर दो। ठीक हो जाएगा।” नानिया ने गुस्से से कहा।

"तुम अपना हाथ थामने का मुझे मौका दो। फिर मैं तुम्हें कोई कष्ट नहीं होने दूंगा।"

"बूंदी।” जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“कहो—कहो।" बूंदी ने सिर हिलाकर जगमोहन को देखा।

"हमें महाकाली ने तिलिस्मी पहाड़ी में इसलिए प्रवेश दिया है कि हम देवराज चौहान को समझाकर वापस ले जाएं ।”

“मालूम है।”

“तो ये काम हम तभी कर सकते हैं, जब देवराज चौहान से हमारी मुलाकात हो जाए।"

“ठीक कहते हो।”

“तो तुम हमें बताओ कि हम किधर जाएं, जहां देवराज चौहान हमें मिले।" ___

“बताया तो है, पूर्व चले जाओ, पश्चिम चले जाओ। उम्र लम्बी या छोटी हो जाएगी। देवा मिलेगा या...।"

इसी पल जगमोहन ने बाज की तरह बूंदी पर झपट्टा मारा।

और तीनों को हक्के-बक्के रह जाना पड़ा। तब उन्हें मालूम हुआ कि बूंदी मानव नहीं, मानव की छाया भर

जगमोहन बूंदी के हवारूपी इंसानी शरीर को पार करता हुआ नीचे जा गिरा।

ऐसा होते ही बूंदी का छायारूपी शरीर पल-भर के लिए छिन्न-भिन्न हुआ और अगले ही पल वो सामान्य दिखने लगा। उसके होंठ मुस्कराहट के रूप में फैलते चले गए।

जगमोहन गिरते ही संभला और फुर्ती से उठकर, बूंदी को देखा। बूंदी बराबर मुस्करा रहा था। नानिया ने सोहनलाल का हाथ पकड़ लिया। दोनों हैरान थे।

“तुम लोग मुझे पकड़ नहीं सकते। मुझ पर वार नहीं कर सकते।"

“तुम कैसे इंसान हो?" जगमोहन ने पूछ।

"मैं भी तुम जैसा ही हूं, परंतु महाकाली का सेवक हूं। तुम लोगों के सामने तो मैं छाया भर हूं। मेरा असली शरीर तो एक कमरे में है। जहां मैं रहता हूं।" बूंदी ने मुस्कराते हुए कहा।

"तुम धोखा हो।"

"तुमने कैसे सोच लिया कि महाकाली के सेवक पर हाथ डाल लेंगे।"

“तुम तो मेरा हाथ पकड़ने को कह रहे थे।” नानिया बोली।

“हां पकडूं क्या?"

"तुम तो छाया भर हो। मेरा हाथ नहीं पकड़ सकते।” नानिया ने सिर हिलाकर कहा।

बूंदी मुस्कराता रहा।

"तुम हमें भटकाने के लिए यहां मौजूद हो या राह दिखाने के लिए?" जगमोहन ने पूछा।

"दोनों ही बातें हैं।”

"वो कैसे?"

“जैसा कि मैं पहले भी बता चुका हूं कि हर बात के दो जवाब दूंगा। एक झूठा, एक सच्चा। सच को पहचान सको तो समझ लेना कि मैंने राह दिखाई। सच को नहीं समझे तो समझ लो, मैंने भटका दिया।" ___

"बेहतर होगा कि अब से इसकी बात को गम्भीरता से न लिया जाए।” जगमोहन ने सोहनलाल से कहा। .

“तुम जाओ।” सोहनलाल बोला—“हमें तुम्हारी जरूरत नहीं

"मेहमानों का मार्गदर्शक बनना ही मेरा काम है।"

“हम तुम्हें अपने पास नहीं चाहते।"

“मैं तो नहीं जाऊंगा।"

"तुम मेरा हाथ क्यों नहीं पकड़ लेते?"

"मेरी ऐसी किस्मत कहां कि कालचक्र की रानी साहिबा का हाथ थाम सकूँ।" बूंदी ने गहरी सांस लेकर कहा।

"तुम तो मेरे बारे में सब जानते हो।” नानिया बोली।

“मैं सबके बारे में सब जानता हूं।" तभी जगमोहन ने राह चलती औरत से पूछा।

“यहां सूर्य किधर से निकलता है?"

"उधर से।" औरत ने एक दिशा की तरफ इशारा किया—“कहां जाना है तुम्हें?"

“पहाड़ी के सामने वाले रास्ते की तरफ।"

"कौन-सी पहाडी—यहां तो कई पहाडियां हैं।"

“मैं उस पहाड़ी की बात कर रहा हूं, जिसके भीतर ये सब चीजें मौजूद हैं।" जगमोहन ने कहा। ____

"मुझे तुम्हारी बातें समझ नहीं आ रहीं।" कहकर वो आगे बढ़ गई।

जगमोहन ने बूंदी को देखा।
 
बूंदी मुस्करा रहा था। जगमोहन ने नानिया से कहा। “जथूरा की नगरी और सोबरा की नगरी, दोनों किस दिशा में हैं?"

“जथूरा की पूर्व की तरफ और सोबरा की पश्चिम की तरफ।"

"तो हम पूर्व की तरफ बढ़ेगे।" जगमोहन ने कहा।

“ऐसी गलती मत करना।" कह उठा बंदी_“पूर्व की तरफ जाओगे तो उम्र घट जाएगी। पश्चिम की तरफ जाओगे तो उम्र बढ़ेगी।"

"हमें तुम्हारी बातों की परवाह नहीं।”

"मैं तुम लोगों का भला चाहता हूं।"

“हम पश्चिम की तरफ से, सोबरा की नगरी में आए हैं।" सोहनलाल बोला—"तो हमें पूर्व की तरफ ही जाना चाहिए।"

“हां । इसकी बातों की परवाह मत करो।" तीनों पूर्व दिशा की तरफ चल पड़े। नानिया ने सोहनलाल का हाथ पकड़ लिया। बूंदी भी उनके साथ चल पड़ा।

“तुम जाते क्यों नहीं?" जगमोहन बूंदी से कह उठा।

“तुम तीनों की मौत देखने से पहले मैं कैसे जा सकता हूं।"

“इससे बात ही मत करो।” नानिया बोली। उसके बाद तीनों ने बूंदी से बात नहीं की। जबकि बूंदी कुछ-न-कुछ कहता ही रहा।

चलते-चलते तीनों उस बाजार से तो क्या, बस्ती से भी बाहर, दूर आ गए थे। पत्थरों से भरा रास्ता था ये जिसे तय करते हुए उन्हें काफी वक्त बीत चुका था। परंतु रास्ता खत्म होने का नाम नहीं ले रहा था।

बंदी अब खामोश-सा उनके साथ चल रहा था।

“सोहनलाल ।” नानिया बोली-“अब थकान होने लगी है।”

"मैं भूख भी महसूस कर रहा हूं।” सोहनलाल ने आसपास देखते हुए कहा—“हमें आराम कर लेना चाहिए। यहां खाने को तो कुछ मिलेगा नहीं। हमें उस बस्ती से ही खाने का सामान लेकर चलना चाहिए था।”

"बूंदी के होते हुए आप लोग चिंता क्यों करते हैं।” बूंदी कह उठा— "मैं खाना अभी हाजिर कर देता हूं।"

"तुम खाना दोगे?" नानिया ने उसे देखा।

“पलों में हाजिर कर दूंगा। आप लोग एक बार हुक्म तो करें, मैं तो सेवक हूं।"

तभी जगमोहन कह उठा। "नदी बहने की, पानी की आवाज आ रही है।"

“नहीं?" सोहनलाल ने नानिया को देखा—“तुम्हें कोई आवाज सुनाई दे रही है?"

"नहीं तो।”

“आगे बढ़ो।" जगमोहन ने कहा—“पास में पानी है।" वे आगे बढ़ते रहे। जगमोहन का कहना सच था। कुछ ही देर में नदी पर पहुंच गए। परंतु नदी का रूप देखकर वो सिहर उठे।

पानी की जगह लावा बह रहा था। सुनहरी-लाल रंग का। नदी में से अंगारे उछल-उछलकर किनारे पर या नदी के बीच ही गिर रहे थे। बहती नदी में बड़े-बड़े अंगारे लावे के साथ बह रहे थे। ___

“ये तो लावे की नदी लगती है। कहीं पर ज्वालामुखी फटा है।"

सोहनलाल ने कहा।

जगमोहन ने बूंदी को देखा और बोला।

"ये कैसी नदी है?" ___

“ये ठंडी भी बहुत है और गर्म भी बहुत है। पूर्व दिशा में जाना है तो इसे पार करना पड़ेगा।"

-

"बेवकूफ।” सोहनलाल बोला—“आग उगलती नदी को पार किया जा सकता है क्या?"

"किया भी जा सकता है और नहीं भी किया जा सकता।"

"तुम हमारे लिए खाने का इंतजाम करो।" ।

“अभी करता हूं।” बूंदी ने शांत स्वर में कहा।

जगमोहन, सोहनलाल और नानिया की परेशानी-भरी निगाह नदी पर थी।

नदी में लावा उफान पर था। दिल दहल-सा रहा था, नदी को देखते हुए।

वे तीनों नदी के किनारे से पंद्रह-बीस फुट की दूरी पर खड़े थे।
 
"बूंदी कहता है कि पूर्व दिशा की तरफ बढ़ना है तो नदी पार करनी होगी, जो कि सम्भव ही नहीं है।” सोहनलाल बोला।

“क्या पता ये झठ कह रहा हो।" नानिया ने कहा।

“ये झूठ नहीं कह रहा। क्योंकि इसने एक ही बात कही है इस बारे में। दो बातें नहीं कहीं।"

"खाना हाजिर है।” बूंदी की आवाज सुनकर तीनों पलटे।

अपने पीछे टेबलों पर खाना लगा देखा। पानी का घड़ा भी वहां था।

“ये तुमने कैसे कर लिया?" सोहनलाल ने बूंदी को देखा।

"मैं कुछ भी नहीं। ये तो महाकाली की छोटी-सी माया है।” बूंदी ने कहा।

नानिया आगे बढ़कर खाने को चैक करने लगी।

“एकदम असली और ताजा है।" बूंदी कह उठा—“मेहमानों को हम पूरी इज्जत देते हैं।"

“वो तो नजर आ ही रहा है।” नानिया कड़वे स्वर में बोली। नानिया पलटकर जगमोहन और सोहनलाल से बोली। “खाना ठीक है, खा लो।"

वे पास आ गए। घड़े के पानी से हाथ मुंह धोया। टेबल पर खाना था परंतु कुर्सियां नहीं थीं।

“कुर्सियां होती तो आराम से खाना खाते।” सोहनलाल ने कहा।

"मेहमानों का हम इतना भी ध्यान नहीं रखते कि वे आलसी हो जाएं।” बूंदी कह उठा।

“बहुत चिंता रहती है मेहमानों की तुम्हें ।”

"क्यों न होगी। सेवक का पहला काम ही मेहमाननवाजी है।" बूंदी ने मुस्कराकर कहा।

टेबल के पास खड़े होकर ही तीनों ने खाना शुरू किया।

खाना सच में बढ़िया था। मजे से, पेट भर के खाया।

"मुझे समझ नहीं आता कि हम लावे की नदी को कैसे पार करेंगे?" सोहनलाल बोला।

“नहीं कर सकते।” नानिया ने कहा-“नदी को देखकर तो मेरा दिल कांप रहा है।"

पानी पीने के बाद जगमोहन फुर्सत में आया और बूंदी से बोला। "बाकी का खाना तुम खा लो।

“मेहरबानी, जो आप को मेरा खयाल रहा।” बूंदी ने शराफत से कहा।

अगले ही पल वो टेबल बचे खाने सहित गायब हो गया।

"हम नदी कैसे पार करेंगे?" जगमोहन ने पूछा।

"तैरकर भी पार कर सकते हैं। परंतु ऐसा करने पर या तो आप जिंदा रहेंगे या मर जाएंगे।” बूंदी ने कहा।

जगमोहन मुस्कराया। नजरें बूंदी पर थीं। फिर बोला। "एक बात मैंने अभी-अभी महसूस की है।"

"क्या?"

“लावे की नदी है ये। नदी में अंगारे नाच रहे हैं, परंतु गर्मी हमें महसूस नहीं हो रही।

"ये ही तो महाकाली की माया है।"

"इसका राज क्या है?"

"मैं नहीं बता सकता।"

"ठंडे लावे की नदी होती तो लावा जम चुका होता। जमा लावा नदी के रूप में नहीं बह सकता। परंतु ये बह रहा है, यानी कि लावा गर्म है। गर्म है तो नदी के किनारे पर हम दो पल भी खड़े नहीं रह सकते थे।" जगमोहन ने गम्भीर स्वर में कहा।

“ओह।” सोहनलाल के होंठों से निकला— "इस तरफ तो मैंने ध्यान ही नहीं दिया था। तुमने ठीक बात कही।"

जगमोहन की निगाह बूंदी पर थी। बूंदी शांत खड़ा उन्हें देख रहा था। “तुम इस बारे में कुछ कहो बूंदी।"

“नदी का रहस्य तो तुम लोगों को ही समझना होगा जग्गू।" बूंदी ने कहा।

जगमोहन की निगाह लावे की नदी पर जा टिकी। फिर वो नदी की तरफ बढ़ा।

“तुम कहां जा रहे हो?” सोहनलाल ने उसकी बांह पकड़ी।

“फिक्र मत करो। नदी में कूदने का मेरा इरादा नहीं है।" जगमोहन मुस्कराया।

सोहनलाल जगमोहन के साथ ही रहा। दोनों किनारे पर आकर ठिठके।

जगमोहन आंखें सिकोड़े, बहते लावे को देखे जा रहा था। सोहनलाल बेचैन दिखा।

"चार-पांच फुट लम्बी पेड़-पौधे की टहनी लाओ सोहनलाल।"

सोहनलाल वहां से हटकर पेड़ और झाड़ियों की तरफ बढ़ गया।

एक तरफ खड़ी नानिया ने बूंदी से कहा।

“अगर तुम नदी का रहस्य बता दो तो मैं तुम्हें पकड़ने के लिए, अपना हाथ दे सकती हूं।"

“मेरा ऐसा सौभाग्य कहां कि तुम्हारा हाथ पकड़ सकूँ।” बूंदी ने गहरी सांस लेकर कहा।

"मेरा हाथ पकड़ोगे तो सुख मिलेगा।"

"जानता हूं।"

"कैसे जानते हो?"

“हर औरत का हाथ पकड़ने में सुख मिलता है। मैं बहुत सुख ले चुका हूं। अब और नहीं लेना चाहता।”

"तुम तो मेरा हाथ पकड़ने को बहुत बेसब्र थे।" ___
 
“वो तो मैं अब भी हूं। परंतु मैं अपनी छाया से, अपनी इच्छा पूरी नहीं करा सकता।”

- "तुम शरीर के साथ सामने आकर, मेरा हाथ पकड़ लो। परंतु नदी का रहस्य बताना होगा।"

बूंदी मुस्कराया। फिर कह उठा।

“जग्गू नदी का रहस्य खोजने में जुटा है। शायद वो रहस्य पा ले।" ___

“तुम किसी काम के नहीं हो।” नानिया ने कहा और मुंह

बनाकर जगमोहन की तरफ बढ़ गई।

तब तक सोहनलाल पांच फुट लम्बी डंडी लिए जगमोहन के पास आ गया था।

"लो।"

जगमोहन ने डंडी थामी और एक सिरे से पकड़कर दूसरा सिरा बहते लावे में डाला।

नानिया ने सोहनलाल का हाथ पकड़ लिया। "लगता है हम फंस गए।"

“चुप रहो।” सोहनलाल ने कुछ दूर खड़े बूंदी को देखा—“सब ठीक हो जाएगा।"

जगमोहन ने डंडी बाहर निकाली तो वो गीली जैसी दिखी।

"ये क्या।” सोहनलाल के होंठों से निकला—"लावे ने इस डंडी को पूरी तरह जला देना था, लेकिन ये तो गीली है।"

जगमोहन ने गीला सिरा पुनः ध्यान से देखा और उसके बाद फिर उसे बहते लावे में डाल दिया।

“क्या कर रहे हो?" सोहनलाल ने पूछा।

"देखते रहो।” कुछ पलों बाद जगमोहन ने डंडी को पुनः बाहर निकाला। वो पहले की ही तरह गीली थी। जगमोहन ने गीले सिरे पर उंगली रखी। सब ठीक रहा।

गर्मी का एहसास नहीं हुआ। डंडी का गीला सिरा ठंडा महसूस हुआ।

जगमोहन ने डंडी का गीला सिरा मुट्ठी में जकड़ लिया। सोहनलाल के होंठ भिंच गए।

"हाथ जल जाएगा।" नानिया चीखी।

परंतु सब ठीक रहा। जगमोहन के हाथ को ठंडक का एहसास हुआ। “सब ठीक है। ये ठंडी नदी है।"

"ये...ये क्या कह रहे हो?” सोहनलाल के होंठों से निकला।

"बहता लावा और उस पर लुढ़कते अंगारे मात्र आंखों का धोखा है। मायावी खेल है महाकाली का।" फिर अगले ही पल नीचे झुकते हुए जगमोहन ने अपना हाथ लावे की बहती नदी में डाल दिया।

"रुको।” सोहनलाल चीखा। नानिया का मुंह खुला का खुला रह गया। फिर जैसे आंखों को धोखा हुआ हो।

लावे की नदी एकाएक शीतल जल में बदलती चली गई। इस तरह जैसे किसी ने जादू के जोर से सब कुछ बदल दिया हो। लावे की नदी में बहते अंगारे भी गायब हो गए।

अब तो स्पष्ट साफ पानी की बहती नदी नजर आने लगी थी। पानी में छोटे-बड़े पत्थर, बहाव के साथ धीमे-धीमे से लुढ़क रहे थे, जैसे पहले लावे की नदी में अंगारे लुढ़क रहे थे।

दृश्य बदल चुका था।

जगमोहन ने नदी से हाथ बाहर निकाला तो हाथ में लगी पानी की बूंदें नीचे गिरी।
 
सोहनलाल ने गहरी सांस ली। नानिया की हालत अभी तक सुधरी नहीं थी। जगमोहन पलटा और सोहनलाल को देखकर मुस्कराया।

"तुम्हारा दोस्त पागल तो नहीं है।" नानिया के होंठों से निकला।

"क्यों?” सोहनलाल ने नानिया को देखा।

“लावे की नदी में हाथ डाल दिया।"

"उसे विश्वास रहा होगा कि सब ठीक है, तभी उसने ऐसा किया।” सोहनलाल ने कहा।

__ “अगर उसका विश्वास गलत होता तो लावा में जलकर उसका हाथ ही गायब हो जाना था।"

तभी जगमोहन बोला।

“अब हम आगे बढ़ सकते हैं। ये मायावी नदी थी। मेरे हाथ का स्पर्श पाते ही सामान्य ढंग में बदल गई।"

“अगर ये सच में लावे की नदी होती तो?" नानिया बोली।

“मुझे विश्वास था कि ये लावे की नदी नहीं है। क्योंकि लावे में इतनी गर्मी होती है कि इंसान उसके पास तो क्या दूर भी खड़ा नहीं हो सकता। लावा कभी भी ठंडा नहीं होता।" ___

“तुम अगर किसी से प्यार करते तो, तब ऐसी हरकत हरगिज न करते। क्यों सोहनलाल?"

"ह....हां।

“तू तो इसकी गोद में बैठ जा सोहनलाल ।” जगमोहन ने व्यंग्य-भरे स्वर में कहा।

"ये तो बैठेगा। तुम क्यों जलते हो।” नानिया तुनककर बोली। जगमोहन ने बूंदी की तरफ देखा। बूंदी मुस्कराता हुआ उसे ही देख रहा था। वो पास आ गया।

"तुमने तो जंग जीत ली जग्गू।” बूंदी बोला। जगमोहन कुछ नहीं बोला।

"ये मायावी, लावे की नदी ने तब ही सामान्य होना था, जब इसके पानी को कोई छू लेता। जबकि बहते लावे को देखकर कोई इसके भीतर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर सकता था। परंतु तुमने कर दिया जग्गू। सच में हिम्मत वाले हो।"

जगमोहन की निगाह बहते पानी पर जा टिकी।

"तेज बहाव है। परंतु तैरा जा सकता है।" बूंदी बोला।

सोहनलाल और नानिया जगमोहन के करीब आ गए।

“तुम तैरना जानती हो?" जगमोहन ने नानिया से पूछा।

"हां-हां-मैं गांव के तालाब पर तैरा करता थी।” नानिया ने फौरन कहा। __

“ये गांव का तालाब नहीं है।” सोहनलाल बोला—“बहती नदी है।

__"मैं तैरकर पार कर लूंगी इसे।” नानिया ने विश्वास-भरे स्वर में कहा।

सोहनलाल ने बूंदी को देखा और कह उठा। "तुम खड़े-खड़े मुंह क्या देख रहे हो?"

“मैं आप तीनों की सेवा के लिए मौजूद हूं।" बूंदी ने मुस्कराकर कहा।

“तुम हमारी कोई सेवा नहीं कर सकते।” सोहनलाल ने तीखे स्वर में कहा। __
 
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