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वो बहुत लम्बी और फैली हुई पहाड़ी थी।
जगमोहन, सोहनलाल और नानिया ने दूर से ही उस पहाड़ी को देख लिया था।
पहाड़ी पर पेड़ और पौधे खड़े नजर आ रहे थे। दूर से वो बाग जैसे लग रहे थे। ___
“वो है पहाड़ी?" जगमोहन ने पूछा।
“हां।" खोतड़ा ने बग्गी दौड़ाते हुए कहा—“कुछ ही देर में हम वहां पर होंगे।" ___
“पहले तो इस दिशा में कोई पहाड़ी नहीं होती थी।” नानिया ने कहा।
"ये मायावी पहाड़ी है। महाकाली ने अपनी ताकतों से पहाड़ी को बनाया है। फिर इसमें तिलिस्मी भरा जादुई चक्र चालू किया। बहुत मेहनत की महाकाली ने इसे तैयार करने में। उसके बाद यहां जथूरा को कैद में रखा।” खोतड़ा बोला। ___
"मुझे हैरानी है कि इतनी ज्यादा मेहनत महाकाली ने सिर्फ जथूरा को कैद करने के लिए की।” नानिया बोली।
खोतड़ा ने कुछ नहीं कहा। बग्गी दौड़ती रही।
"ये सब करने में अवश्य महाकाली का कोई अपना ही मतलब रहा होगा।" नानिया कह उठी।
“मुझे ऐसा नहीं लगता।" खोतड़ा बोला।
काफी देर बाद बग्गी पहाड़ी के पास जा पहुंची। मीलों लम्बी-चौड़ी थी पहाडी। खोतड़ा पहाड़ी के साथ-साथ बग्गी दौड़ाता रहा। “तुम कहां जा रहे हो। पहाड़ी के साथ-साथ क्यों बग्गी दौड़ा रहे हो?" सोहनलाल ने पूछा।।
“पीछे के प्रवेश द्वार पर तुम तीनों को छोड़ना है।” खोतड़ा ने कहा।
तीनों खामोशी से बग्गी में बैठे, इधर-उधर नजरें दौड़ाते रहे। फिर वो वक्त भी आया, जब बग्गी का दौड़ना थम गया।
सामने ही पहाड़ी थी। खोतड़ा बोला। “तुम लोग यहां उतर जाओ।”
"रास्ता कहां है?"
“पहाड़ी पर सामने ही रास्ता बनेगा तो भीतर चले जाना। नीचे उतरो।”
तीनों नीचे उतरे। खोतड़ा ने पुनः कहा। “अब मुझे वापस जाना होगा।
"रास्ता कैसे खुलेगा?" जगमोहन ने पूछा।
“महाकाली को सब खबर है कि तुम लोग पहुंच गए हो यहां। वो जब भी ठीक समझेगी, रास्ता खोल देगी।” इसके साथ ही खोतड़ा ने लगामों को झटका दिया तो घोड़े दौड़ पड़े। बग्गी दूर जाने लगी।
_ तीनों बग्गी को देखते रहे, जो कि कुछ ही देर में नजरों से ओझल हो गई।
ये सुनसान जगह थी। पक्षी-परिंदा, जानवर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। मध्यम हवा के संग हिलते पेड़-पौधे ही दिखाई दे रहे
थे।
पहाड़ी ज्यादा ऊंची नहीं थी, पचास-सत्तर मीटर ऊंची रही होगी वो।
“क्या पता पहाड़ी का रास्ता कब खुलता है।" नानिया ने कहा।
“खुल जाएगा।” सोहनलाल की नजरें आसपास घूम रही थीं। जगमोहन एक पत्थर पर जा बैठा था। नानिया ने प्यारी-सी नजरों से सोहनलाल को देखा।
“सोहनलाल।”
“हां।” सोहनलाल ने भी नानिया को देखा। होंठों पर मुस्कान आ गई।
“जब हम वापस तुम्हारी दुनिया में जाएंगे तो वहां पहाड़ी पर घर बनाएंगे।"
“पहाड़ी पर?"
"तुम्हें पहाड़ी पर रहना अच्छा नहीं लगता क्या?"
“बहत अच्छा लगता है।" सोहनलाल ने नानिया का हाथ पकड़ा-“परंतु मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां पहाड़ नहीं हैं।"
"नहीं हैं?"
"जरा भी नहीं।” सोहनलाल ने मुस्कराकर कहा।
"ओह, कोई बात नहीं, हम बिना पहाड़ वाली जगह पर रह लेंगे।"
"देखते हैं कि हम वापस पहुंच पाते हैं भी या नहीं?"
"क्यों नहीं वापस जा पाएंगे?"
“इस तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर जाने किन हादसों का सामना करना पड़ेगा।"
"हम दोनों भीतर साथ ही रहेंगे।"
"हां। हम साथ रहेगे।" जगमोहन ने गहरी सांस ली और मुंह फेर लिया।
"ये तुम्हारा दोस्त सांसें क्यों भरता रहता है?" नानिया ने जगमोहन को देखा।
“तुम इसकी किसी हरकत की परवाह मत किया करो।"
“क्यों, दिमाग का कुछ ढीला है क्या?"
“दिमाग तो कसा हुआ है, परंतु मन उदास रहता है, क्योंकि इसे किसी से प्यार नहीं हुआ।"
"प्यार करने में क्या है, किसी से भी कर लें।”
"मैंने तो बहुत समझाया परंतु ये समझता नहीं।” जगमोहन ने खा जाने वाली निगाहों से सोहनलाल को देखा। सोहनलाल उसे देखकर दांत फाड़ने लगा।
जगमोहन, सोहनलाल और नानिया ने दूर से ही उस पहाड़ी को देख लिया था।
पहाड़ी पर पेड़ और पौधे खड़े नजर आ रहे थे। दूर से वो बाग जैसे लग रहे थे। ___
“वो है पहाड़ी?" जगमोहन ने पूछा।
“हां।" खोतड़ा ने बग्गी दौड़ाते हुए कहा—“कुछ ही देर में हम वहां पर होंगे।" ___
“पहले तो इस दिशा में कोई पहाड़ी नहीं होती थी।” नानिया ने कहा।
"ये मायावी पहाड़ी है। महाकाली ने अपनी ताकतों से पहाड़ी को बनाया है। फिर इसमें तिलिस्मी भरा जादुई चक्र चालू किया। बहुत मेहनत की महाकाली ने इसे तैयार करने में। उसके बाद यहां जथूरा को कैद में रखा।” खोतड़ा बोला। ___
"मुझे हैरानी है कि इतनी ज्यादा मेहनत महाकाली ने सिर्फ जथूरा को कैद करने के लिए की।” नानिया बोली।
खोतड़ा ने कुछ नहीं कहा। बग्गी दौड़ती रही।
"ये सब करने में अवश्य महाकाली का कोई अपना ही मतलब रहा होगा।" नानिया कह उठी।
“मुझे ऐसा नहीं लगता।" खोतड़ा बोला।
काफी देर बाद बग्गी पहाड़ी के पास जा पहुंची। मीलों लम्बी-चौड़ी थी पहाडी। खोतड़ा पहाड़ी के साथ-साथ बग्गी दौड़ाता रहा। “तुम कहां जा रहे हो। पहाड़ी के साथ-साथ क्यों बग्गी दौड़ा रहे हो?" सोहनलाल ने पूछा।।
“पीछे के प्रवेश द्वार पर तुम तीनों को छोड़ना है।” खोतड़ा ने कहा।
तीनों खामोशी से बग्गी में बैठे, इधर-उधर नजरें दौड़ाते रहे। फिर वो वक्त भी आया, जब बग्गी का दौड़ना थम गया।
सामने ही पहाड़ी थी। खोतड़ा बोला। “तुम लोग यहां उतर जाओ।”
"रास्ता कहां है?"
“पहाड़ी पर सामने ही रास्ता बनेगा तो भीतर चले जाना। नीचे उतरो।”
तीनों नीचे उतरे। खोतड़ा ने पुनः कहा। “अब मुझे वापस जाना होगा।
"रास्ता कैसे खुलेगा?" जगमोहन ने पूछा।
“महाकाली को सब खबर है कि तुम लोग पहुंच गए हो यहां। वो जब भी ठीक समझेगी, रास्ता खोल देगी।” इसके साथ ही खोतड़ा ने लगामों को झटका दिया तो घोड़े दौड़ पड़े। बग्गी दूर जाने लगी।
_ तीनों बग्गी को देखते रहे, जो कि कुछ ही देर में नजरों से ओझल हो गई।
ये सुनसान जगह थी। पक्षी-परिंदा, जानवर कुछ भी नजर नहीं आ रहा था। मध्यम हवा के संग हिलते पेड़-पौधे ही दिखाई दे रहे
थे।
पहाड़ी ज्यादा ऊंची नहीं थी, पचास-सत्तर मीटर ऊंची रही होगी वो।
“क्या पता पहाड़ी का रास्ता कब खुलता है।" नानिया ने कहा।
“खुल जाएगा।” सोहनलाल की नजरें आसपास घूम रही थीं। जगमोहन एक पत्थर पर जा बैठा था। नानिया ने प्यारी-सी नजरों से सोहनलाल को देखा।
“सोहनलाल।”
“हां।” सोहनलाल ने भी नानिया को देखा। होंठों पर मुस्कान आ गई।
“जब हम वापस तुम्हारी दुनिया में जाएंगे तो वहां पहाड़ी पर घर बनाएंगे।"
“पहाड़ी पर?"
"तुम्हें पहाड़ी पर रहना अच्छा नहीं लगता क्या?"
“बहत अच्छा लगता है।" सोहनलाल ने नानिया का हाथ पकड़ा-“परंतु मैं जिस शहर में रहता हूं, वहां पहाड़ नहीं हैं।"
"नहीं हैं?"
"जरा भी नहीं।” सोहनलाल ने मुस्कराकर कहा।
"ओह, कोई बात नहीं, हम बिना पहाड़ वाली जगह पर रह लेंगे।"
"देखते हैं कि हम वापस पहुंच पाते हैं भी या नहीं?"
"क्यों नहीं वापस जा पाएंगे?"
“इस तिलिस्मी पहाड़ी के भीतर जाने किन हादसों का सामना करना पड़ेगा।"
"हम दोनों भीतर साथ ही रहेंगे।"
"हां। हम साथ रहेगे।" जगमोहन ने गहरी सांस ली और मुंह फेर लिया।
"ये तुम्हारा दोस्त सांसें क्यों भरता रहता है?" नानिया ने जगमोहन को देखा।
“तुम इसकी किसी हरकत की परवाह मत किया करो।"
“क्यों, दिमाग का कुछ ढीला है क्या?"
“दिमाग तो कसा हुआ है, परंतु मन उदास रहता है, क्योंकि इसे किसी से प्यार नहीं हुआ।"
"प्यार करने में क्या है, किसी से भी कर लें।”
"मैंने तो बहुत समझाया परंतु ये समझता नहीं।” जगमोहन ने खा जाने वाली निगाहों से सोहनलाल को देखा। सोहनलाल उसे देखकर दांत फाड़ने लगा।