• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

महाकाली--देवराज चौहान और मोना चौधरी सीरिज़

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date
“ओ के। ओ के। तंम म्हारी सेवो करो। इत्तो ही बोत हौवे।" वो सबसे कह उठा।

"मेरे खयाल में पहले तालाब में औरतों को नहाने दिया जाए तो बेहतर होगा। आप सब मर्द पीठ मोड़कर इधर बैठ जाइए।"

"तंम का करो हो?"

“मैं भी पीठ मोड़कर आप सब के साथ ही बैलूंगा।"

“फिरो ठोको हौवे।"

नहाने के बाद सबने राहत महसूस की। थकान कुछ कम हुई।

वो व्यक्ति उन सबको वापस झोपड़ों के पास ले आया। एक जलती मशाल के नीचे पेड़ों के बड़े-बड़े पत्ते बिछाकर बैठने के लिए बिछौना बना रखा था। उस व्यक्ति ने सबको वहीं बैठने को कहा

और वहां मौजूद अन्यों को खाना परोसने को कहा।

"सांभरा कहां है?" मोना चौधरी ने कहा।

"उन्हें अभी आपके आने की खबर भिजवाता हूं।"

“अभी तक खबर भी नहीं दी उसे।” नगीना ने कहा।

“सांभरा का आदेश था कि जब नहाकर आप सब खाने के लिए बैठे तो उन्हें खबर दी जाए।"

वो व्यक्ति एक झोंपड़े की तरफ चला गया।

"कैसा अजीब है सांभरा। इतनी बड़ी नगरी का मालिक होते हुए इस तरह पहाड़ पर रह रहा है।" महाजन ने कहा। ___

“ऐसा करने की कोई खास वजह होगी।” पारसनाथ ने कहा।

"जो वजहो भी हौवे, म्हारे को तो पहाड़ पर गर्मा-गर्म खाणो मिल्लो हो।"

"भूख लगेला है बाप।" सबको ही भूख लग रही थी।

“वापसो परो भी म्हारे को गर्म-गर्म खाणों मिल्लो हो । वो बांबो म्हारे वास्ते उधरो हलवाई बैठायो हो।"

__ “तेरे को खाने का चस्का लगेला बाप।"

"भूखो बोत लगो हो म्हारे पेटो में।"

मखानी और कमला रानी पास-पास बैठे थे। या यूं कहें कि जब कमला रानी बैठी, तब मखानी तुरंत उसकी बगल में आ बैठा था कि कोई दूसरा वहां न बैठ जाए। मौका पाकर मखानी प्यार से बोला।

"कमला रानी।"
 
"क्या है?"

“पहाड़ पर मौसम अच्छा है। ठंडी हवा चल रही है।” मखानी धीमे स्वर में कह उठा।

"तो?

"मेरा मतलब है कि मौसम भी है, अंधेरा भी है। खाना खा के अंधेरे में चलते हैं। प्यार करेंगे।" ।

कमला रानी मुस्कराकर मखानी को देखने लगी। मखानी उसकी मुस्कान पर जैसे नाच उठा। “गधा है तू।"

"क्या मतलब?"

"जब मौसम भी है, अंधेरा भी है, वक्त भी है तो कहने की क्या जरूरत है।"

"तो क्या करूं?"

“मेरी बांह पकड़कर, मुझे अंधेरे में खींच ले। ये भी तेरे को मैं ही बताऊंगी क्या।" __

_“आह । तूने तो मेरा दिल खुश कर दिया कमला रानी।” मखानी का चेहरा खुशी से चमक रहा था।

"अंडा कहां है?"

“संभाल के रखा है, तेरी ही कमी है।"

"चिंता मत कर। अब अंडे का आमलेट बना दूंगी। पहले जरा खाना खा लूं।"

"तू कितनी अच्छी है कमला रानी।"

“चुप हो जा। कहीं बातों-बातों में ही तेरा अंडा फूट गया तो, तब आमलेट नहीं बनेगा।"

तभी वो व्यक्ति आता दिखा।

साथ में एक बूढ़ा व्यक्ति था जो कि पतला और लम्बा था। उसके सिर के बाल सफेद और दाड़ी के बाल भी सफेद ही थे। उसकी कमर बिल्कुल सीधी थी। वो बहुत फुर्तीला था।

वो पास पहुंचकर उनके साथ ही खाने की पंक्ति में बैठता कह उठा।

“मैं सांभरा आप सबका यहां स्वागत करता हूं। मुझे खुशी है कि देवा और मिन्नो यहां आ गए हैं।"

खाना उनके सामने लगना शुरू हो गया था।

“तुम हमें जानते हो?” देवराज चौहान ने पूछा।

“बहुत अच्छी तरह से।"

"तुम्हारी बात से तो ऐसा लगता है कि जैसे तुम हमारे आने का इंतजार कर रहे थे।"

“तुमने ठीक कहा देवा ।”

"ये सब क्या हो रहा है, हमें खुलासा करके बताओ। हम यहां जथूरा को कैद से आजाद कराने आए हैं।"

सांभरा खामोश रहा।

“सुना है कि महाकाली ने जब जथूरा को कैद किया तो तुम इस बात से नाराज होकर, नगरी छोड़कर पहाड़ी पर आ गए।"

"ऐसा कुछ नहीं है।" सांभरा ने कहा।

"तुम्हारा सेवक बांबा तो यही कहता है।"

"वो, वो ही बात करेगा, जो उसे मालूम होगी।"

“बांबा ने हमें धमकी देकर भेजा है कि तुम्हें वापस नगरी में लाएं, वरना वो हमारी जान ले लेगा। वो नगरी से भी हमें निकलने नहीं देगा। मजबूरी में उसकी बात मानकर आना पड़ा।”

“बांबा अच्छा सेवक है। वो चाहता है कि मैं वापस नगरी में आ जाऊं।"

"तो तुम जाते क्यों नहीं?"

“आज रात ही मैं अपनी नगरी के लिए रवाना हो जाऊंगा।" सांभरा ने शांत स्वर में कहा।

“आज रात?"

“आज रात ही क्यों?”

"देवा और मिन्नो के यहां आ जाने से मेरा काम समाप्त हो गया, मेरे कष्ट के दिन खत्म हो गए।"

"हम समझे नहीं।"

“तुम कहना क्या चाहते हो?"

"हमें खाना खाना चाहिए और समझदार लोग खाने के बीच बातें नहीं करते।"

“तुम हमें उलझा रहे हो।" सांभरा ने खाना खाना शुरू कर दिया। उसे खामोश पाकर बाकी सब भी खाना खाने लगे।
 
खाना खाने के बाद वे सब फुर्सत में आए। उनकी बातें फिर शुरू हुईं तो सांभरा कह उठा।

"मैं तुम लोगों को बता दूं कि मैं किसी से नाराज होकर पहाड़ी पर नहीं आया। पचास बरसों से मैं यहां रह रहा हूं तो इसमें कोई रहस्य है। महाकाली ने जथूरा को कैद में किया तो महाकाली के सामने नए हालात पैदा हो गए, जब उसने देवा और मिन्नो के नाम का तिलिस्म बांधा, जथूरा की कैद पर। उसी वक्त ही मेरे को नए हालातों का अंदाजा हुआ तो मुझे पहाड़ी पर आना पड़ा।"

"क्यों?"

सांभरा ने अपनी धोती में छिपी चमकती दो गोलियों को निकाला। चंद्रमा की रोशनी जब-जब उन पर पड़ती तो वो गोलियां चमक उठती थीं। सांभरा हाथ में रखी गोलियों को देखता कह उठा।।

“इन्हें बचाना था।"

"ये क्या है?

“ये देवा और मिन्नो के ही रूप हैं। तुम नहीं समझोगे। ये रहस्य है, जिसे मैं नहीं बता सकता। परंतु वक्त आने पर सब कुछ तुम लोगों को खुद-ब-खुद ही पता चल जाएगा।" सांभरा ने नजरें उठाकर देवराज चौहान और मोना चौधरी को देखा—“मैं अगर नगरी में रहता। वहां के ऐशोआराम लेता रहता तो ये रहस्यमय गोलियां किसी ने चुरा लेनी थीं। इस बात का आभास मुझे मेरी शक्तियों ने करा दिया था। इसलिए मैं पहाड़ी पर आ गया और पहाड़ी पर अपनी ताकतों द्वारा लाइन खींच दी कि नगरी वाले मेरे पास न पहुंच सके। तभी मैं इन्हें सुरक्षित रख सकता था।"

"तुमने कहा कि ये गोलियां देवा-मिन्नो के रूप हैं।” नगीना बोली।

"हां बेला।"

"इस बात को स्पष्ट करो।"

“नहीं कर सकता। अभी कुछ भी बताना ठीक नहीं।”

"तो हमें कैसे मालूम होगा कि तुम क्या सच-झूठ कह रहे हो।"

"इसका जवाब तो आने वाला वक्त देगा। अब मेरी मुसीबतों के दिन खत्म हुए।”

"हमें तुम्हारी कोई बात नहीं समझ आ रही।” सांभरा ने एक गोली देवराज चौहान की तरफ उछाल दी। देवराज चौहान ने फौरन गोली को हवा में लपक लिया। सांभरा ने दूसरी गोली मोना चौधरी की तरफ उछाली। जिसे मोना चौधरी ने थाम लिया।

“अब मैं मुक्त हुआ।” सांभरा एकाएक मुस्कराकर कह उठा।

“ये...ये कैसी गोलियां हैं? हम इनका क्या करें?" मोना चौधरी ने पूछा। ___

“पूछने की जरूरत नहीं। आने वाला वक्त, तुम लोगों को हर बात का जवाब दे देगा। इन्हें खोने मत देना।”

“तुम तो हमारे लिए स्वयं ही रहस्य बन गए हो।"

"मैं रहस्य नहीं, मैं तो महाकाली का छोटा-सा सेवक हूं। साधारण-सा हूं।"

“तुम आज रात पहाड़ी से उतरकर नगरी में चले जाओगे?"

"हां। क्योंकि जो जिम्मेवारी मुझे दी गई थी, उससे मैं मुक्त हो गया।"

"किसने दी थी जिम्मेवारी?"

“मैं किसी बात का जवाब नहीं दे सकता। हर बात का जवाब तुम लोगों को भविष्य में से ही मिलेगा।" –

"हमने जथूरा को आजाद करवाना है। तुम हमें बता सकते हो कि जथूरा कहां पर कैद है?" देवराज चौहान ने कहा।

“नहीं बता सकता। इस बारे में कुछ भी कहना, मेरे हिस्से में नहीं आता।"

“सांभरो। तंम सीधो हो जायो। म्हारे को क्रोध मत दिलायो।"

"भंवर सिंह।” सांभरा मुस्कराया—“इस जीवन में तुम मजे कर रहे हो।"

“यो का बोल्लो हो छोरे?" बांके हड़बड़ा-सा उठा।

“तुम चुप रहोगे बाप। वो पौंची चीज होईला।”

"हम भी तुम्हारे साथ नगरी में जाएंगे।" पारसनाथ ने कहा।

"नहीं।" सांभरा ने सिर हिलाया—“तुम लोगों को उस तरफ नहीं जाना है। आगे की दिशा में पहाड़ी पर से उतर जाओ। आगे नगरी की बहुत ऊंची दीवार आएगी। मेरी दी गोलियों को दीवार से लगाना तो दीवार तुम लोगों को नगरी से बाहर निकलने का रास्ता दे देगी। याद रहे, ये पहाडी तब तक ही है, जब तक मैं पहाड़ी पर मौजूद हूं। मेरे पहाड़ी से जाते ही, ये पहाड़ी गायब हो जाएगी।

क्योंकि इस पहाड़ी का निर्माण मेरी मायावी ताकतों ने, मेरे रहने के लिए किया था। इसलिए रात-रात में ही तम लोगों ने पहाडी के दूसरी तरफ उतर जाना है। रुकना नहीं है।" ___

"हम तो थके हुए हैं।" कमला रानी कह उठी।

"हां-हां।” मखानी ने फौरन सिर हिलाया—“हम रात-भर नींद लेना चाहते हैं।"

सांभरा मुस्कराया और कह उठा। “मैं जानता हूं तुम दोनों आराम की आड़ में किस फेर में हो।" मखानी और कमला रानी ने हड़बड़ाकर एक-दूसरे को देखा।

रातुला ने दोनों को देखकर कहा।

"दोनों चुप रहो। किसी को कोई आराम नहीं मिलेगा।"

“तुम हमें पहाड़ी के उस तरफ कहां भेजना चाहते हो?"

“कहीं भी नहीं। मैं चाहता हूं कि तुम लोग मेरी नगरी से बाहर निकल जाओ।"

“जथूरा के बारे में कुछ तो बता दो कि वो कहां है?"

“वक्त बताएगा।” सांभरा उठता हुआ बोला—“अब जाओ यहां से।"

“तुम महाकाली के सेवक हो?" महाजन बोला।

"हां नीलसिंह।"

“तो तुम ये कभी नहीं चाहोगे कि हम जथूरा तक पहुंचे और उसे आजाद करा दें।”

सांभरा मुस्कराया।

“इसकी दी चमकीली गोलियां कोई चाल है हमें भटकाने को।”
 
महाजन बोला—“वो गोलियां फेंक दो।”

"ऐसा अनर्थ मत करना।” सांभरा फौरन बोला—“उन गोलियों की रक्षा करने के लिए तो मैं नगरी की सुविधाएं छोड़कर, पचास बरसों से इस पहाड़ी पर रह रहा हूं। ये मैंने देवा-मिन्नो के हवाले करनी थीं। वो कर दीं। एक बात याद रखना देवा-मिन्नो। इन गोलियों का इस्तेमाल तुम दोनों ही करोगे तो फायदा मिलेगा। नहीं तो फायदा नहीं मिलेगा।"

"कैसा फायदा?"

“ये तो आने वाला वक्त बताएगा।"

“तुम हर बात के जवाब को टाल रहे हो।"

“मुझे जितनी आज्ञा है। उतना ही काम मैं कर रहा हूं। शायद मेरे खामोश रहने में कोई भलाई होगी।"

“किसकी आज्ञा की बात कर रहे हो तुम?" क्षण-भर चुप रहकर सांभरा बोला।

"महाकाली की आज्ञा।"

“वो तो चाहती नहीं कि हम जथुरा को आजाद कराएं। तम कहीं चालाकी से हमें उलटे रास्ते पर तो नहीं डाल रहे।" ___

"मैंने तुम लोगों का स्वागत किया। तुम्हारे साथ बैठकर खाना खाया। क्या उसमें कोई चालाकी दिखाई दी?"

सब खामोश रहे।

"मैं सिर्फ इतना कहूंगा कि मैं कोई चालाकी नहीं कर रहा। जो किया वो सिर्फ सत्य है।” कहने के साथ ही सांभरा पलटा और झोंपड़े की तरफ बढ़ता चला गया।

उसके सेवक भी वहां से चले गए। सब खामोश से एक-दूसरे को देखने लगे।

"मालूम नहीं कि हमें इसकी बात माननी चाहिए कि नहीं।” तवेरा गम्भीर स्वर में कह उठी।

“मान लो।” पारसनाथ बोला—“हम सांभरा की बात नहीं मानेंगे तो क्या करेंगे?"

सब चुप।

"हमारे पास करने को कुछ नहीं है। कोई रास्ता नहीं है। कोई दिशा नहीं है।”

“सांभरा अगर हमसे कोई चाल चल रहा तो हम...।"

“वो हरामी बांदो।" बांके का स्वर सबने सुना—“यो हरामी म्हारे को ही पैले काये को दिखो हो।"

सबकी निगाह, उधर घूमी, जिधर बांकेलाल राठौर देख रहा था। बांदा नजर आया। वो कुछ अंधेरे में खुले में खड़ा था।

“इधरो आ जावो भूतनो के। म्हारे से शर्मावो मतो। थारे-म्हारे बीचो बूंघटो की क्या जरूरतो हौवे।"

बांदा कुछ कदम आगे आ गया और कह उठा। "आ गए तुम सांभरा की बातों में।"

“हो गयो शुरो।"

बांदा मुस्कराया। मशाल की रोशनी में पर्याप्त दिखाई दे रहा था।

“सांभरा तुम लोगों को भटका रहा है और तुमने उसकी बात को सच मान लिया।" बांदा ने कहा।

“मतलब कि तुम सच बोलते हो।” देवराज चौहान ने कहा।

"क्यों नहीं। मैंने कहा था कि सांभरा की नगरी में मत जाओ। वरना फंस जाओगे। फंसे कि नहीं?"

"हमें सांभरा की नगरी में कोई खास समस्या नहीं आई।"

"तंमने म्हारे को समस्याओ में डालो हो। अपणों बापो को दुल्हन बना के बिठा दयो, म्हारे से ब्याहो के वास्ते। अगर टांको भिड़ जातो तो युद्धो हो जातो तबो । म्हारे और थारे बापो में।"

"मेरा बाप शरारती है।”

"मूंछों वालों से शरारतो अच्छी न होवो।"

"सांभरा तुम सबको गलत रास्ते पर डाल रहा है।"

"सही रास्ता क्या है?" रातुला ने पूछा।

“वापस सांभरा की बस्ती में चले जाओ।"

“वहां क्या होगा?” पारसनाथ ने पूछा।

"तब बांबा बता देगा कि जथूरा को महाकाली ने कहां पर कैद कर रखा है।"

"ये बात तो तुम भी बता सकते हो।" ।

"नहीं बता सकता। मुझे जथूरा की कैद के बारे में कुछ पता ही नहीं कि वो कहां है।"

“तुम हमारे पास आते ही क्यों हो?"

"भटकों को रास्ता दिखाने के लिए।" ।

“जबकि तुम महाकाली के सेवक हो और महाकाली नहीं चाहती कि हम जथुरा को आजाद कराएं।" __

_“सांभरा भी तो महाकाली का सेवक है। उसकी बात क्यों मान रहे हो?"

"तुम्हारी बातें मानकर हम देख चुके हैं। तुम हमें गलत राह दिखा रहे हो। इस बार सांभरा की बात मानकर देख लें।" देवराज

चौहान बोला।

"मैं तुम्हारा भला चाहता हूं।"

“सांभरा भी हमारा भला चाहता है।"

"वो झूठा है।"

"हमारे खयाल से तुम झूठे हो।"

"तो सांभरा का रंग तुम तुम लोगों पर अच्छी तरह चढ़ गया।" बांदा एकाएक मुस्कराया।

“क्योंकि तुम्हारी बात कभी भी खरी नहीं निकली।” नगीना बोल पड़ी। ____

“शराफत का तो जमाना ही नहीं रहा।” बांदा ने गहरी सांस ली—“मैं तुम लोगों का भला कर... "

तभी झोपड़े से सांभरा अपने सेवकों के साथ निकला और उन्हें देखकर बोला। _. “तुम लोग अभी तक यहीं खड़े हो। वक्त कम है, फौरन यहां से..."
 
“यहां आओ।” देवराज चौहान ने कहा।

"क्यों?"

"इधरो खिसक आयो। थारे से प्राईवेटो बातों करनी हौवे।" सांभरा पास आ पहुंचा। तभी उसकी निगाह बांदा पर पड़ी। बांदा और सांभरा की नजरें मिली। बांदा हल्का-सा सिर झुकाकर, सांभरा को देखता मुस्कराया।

"तुम हो बांदा। अंधेरा होने की वजह से मैंने पहचाना नहीं।" सांभरा कह उठा।

“बांदा कहता है कि तुम हमें गलत रास्ते पर डाल रहे हो। इसका क्या मतलब हुआ?" देवराज चौहान ने कहा।

सांभरा सिर हिलाता कह उठा। "हम दोनों ही महाकाली के सेवक हैं।"

“परंतु तुम दोनों की बातों में भिन्नता है। ये कहता है कि हम वापस तुम्हारी बस्ती में जाएं। जबकि तुम कहते हो कि हम आगे

बढ़ते हुए पहाड़ी उतर जाएं। किसकी बात सच मानें?"

बांदा और सांभरा की नजरें मिलीं। दोनों मुस्कराए।

“बांदा अपना काम कर रहा है और मैं अपना।” सांभरा ने कहा।

“परंतु हम किसकी बात सच मानें।"

“जो तुम लोगों को ठीक लगे, वो करो।”

“ये क्या बात हुई।” महाजन कह उठा__

“तुम दोनों महाकाली के सेवक हो। दोनों एक-दूसरे को पहले से जानते हो। हमें तो वैसे भी तुम दोनों में से किसी पर भरोसा नहीं, क्योंकि महाकाली जथूरा की आजादी नहीं चाहती। ऊपर से तुम दोनों हमें अलग-अलग दिशाओं में जाने को कह रहे हो। तुम लोग हमें भटका रहे हो या रास्ता दिखा रहे हो?" __

_“मैं तो महाकाली का हुक्म बजा रहा हूं।" बांदा कह उठा। ___

“मैं भी। मैं वो ही कर रहा हूं जो महाकाली के हक में अच्छा है।" सांभरा ने गम्भीर स्वर में कहा।। ___

“महाकाली तो ये ही चाहती है कि जथूरा आजाद न हो।” मोना

चौधरी बोली।

"क्या महाकाली ने तुमसे ऐसा कहा?"

“नहीं। महाकाली की हमसे ऐसी कोई बात नहीं हुई। वो हमसे नहीं मिली।”

"मुझसे महाकाली की परछाई मिलती रही है। मेरी बात हुई महाकाली से।" तवेरा ने कहा।

“तुम तवेरा, जथूरा की बेटी।” सांभरा ने सिर हिलाया—“तुम्हारी बात का कोई महत्त्व नहीं।"

"क्यों?"

“महाकाली तुम्हारी इज्जत करती है। वो तुमसे यूं ही बातचीत करती रहती है।

“यूं ही।”

"हां"

"कितनी अजीब बात कह रहे हो सांभरा। वो मुझे अपने कामों में अपने साथ लेना चाहती... "

"जानता हूं वो ये बात करती है।" “फिर भी कह रहे हो कि... "

“क्या तुमने महाकाली के संग काम करने की हामी भरी?" सांभरा मुस्कराया।

"नहीं।"

“हामी भरती तो असलियत तुम्हारे सामने आ जाती।"

"कैसी असलियत?"

“यही कि महाकाली की तुममें कोई दिलचस्पी नहीं है।"

“तुझ झूठे हो।"

"क्यों?"

“महाकाली ने मुझे हमेशा कहा कि मैं उसके साथ काम करने की हामी भर दूं तो वो जथूरा को आजाद कर देगी।"

“एक बार हां कहती महाकाली को तो पर्दा उठता।" सांभरा मुस्करा रहा था।

"कैसा पर्दा?"

"रहने दे तवेरा। जो पर्दा महाकाली ने नहीं उठाया, वो मैं कैसे उठा दूं। लेकिन जल्दी ही सब कुछ तुम्हारे सामने होगा।"

इन बातों के दौरान बांदा शांत खड़ा था। "आखिर तुम कहना क्या चाहते हो सांभरा?"

“पीछे की मत सोचो। आगे देखो। वक्त आने पर सब सवालों के जवाब सामने होंगे।"

"तुम मुझे उलझा रहे हो।"

“नहीं। मैं स्पष्ट बात कह रहा हूं।"

“अब हम तुम्हारी नगरी में जाएं या तुम्हारे कहेनुसार आगे को जाएं?"

“सोचो। अपना दिमाग लगाओ। उसके बाद फैसला करो।" कहकर सांभरा अपने सेवकों के साथ आगे बढ़ता चला गया।

सबकी निगाह बांदा की तरफ उठी। बांदा मुस्कराकर उन्हें देख रहा था।

"वक्त कम है।" बांदा बोला— “तुम लोगों को जल्दी ही पहाड़ी से उतर जाना है। सुबह तक पहाड़ी अदृश्य हो जाएगी और पहले की तरह यहां गहरा पानी होगा। जो भी करना है जल्दी करो। आगे जाओ या पीछे जाओ।

_ “थारी मुंडी तो अंम 'वडो' हो।” बांकेलाल राठौर कड़वे स्वर में बोला।

तभी मोना चौधरी कह उठी। "हम सांभरा की बात मानेंगे।"

"फंसोगे।" बांदा बोला।

"मोना चौधरी ठीक कहेला बाप । बांदा की बात पर आपुन लोग नेई चलेगा।” रुस्तम राव ने कहा।

बांदा मुस्कराता हुआ उन्हें देखता रहा।

"आओ।” मोना चौधरी ने कहा और आगे चल पड़ी। सब मोना चौधरी के पीछे चल पड़े। पीछे से बांदा बोला।

"इस बार मैं सच कह रहा हूं, मेरी बात मान लो। नहीं तो बुरे फंसोगे।"

“थारी चोंचो को तोड़ो अंम।"

"मेरी बात तुम लोग मानते क्यों नहीं। मैं ठीक कह रहा हूं।" बांदा ने परेशान स्वर में कहा।

परंतु बांदा की बात की किसी ने परवाह नहीं की।

वे सब चंद्रमा की रोशनी में पहाड़ी उतरने लगे। ऐसे अंधेरे में पहाड़ से उतरना खतरनाक था।

परंतु उतरना भी जरूरी था।

क्योंकि आने वाले उजाले के साथ ही इस मायावी पहाड़ी ने गायब हो जाना था।
 
रातला ने तवेरा से बात की। "सांभरा की बातों में रहस्य था तवेरा।"

"बहुत।” तवेरा के चेहरे पर उलझन थी।

“महाकाली तेरे को कहती रही कि उसके साथ मिल जा, परंतु सांभरा कहता है ऐसा कहना, महाकाली का खेल था।" ।

“सांभरा की बातों से मैं कुछ भी नहीं समझी। सांभरा ने मेरे को उलझा दिया है।"

“ये उलझन पैदा हो गई कि महाकाली की मंशा क्या है?"

"सांभरा और बांदा दोनों महाकाली के सेवक है, परंतु अलग-अलग दिशाओं में जाने को कह रहे हैं। सांभरा ने कहा कि अगर मैं महाकाली को उसके साथ काम करने को हां कर देती तो पर्दा उठता। पता नहीं वो कैसे पर्दे की बात कर रहा था?"

"इन बातों में बड़ा रहस्य छिपा है।”

"मैं तो उलझन में फंस गई हूं।” तवेरा ने पहाड़ से उतरते हुए कहा।

तभी बांकेलाल राठौर की आवाज आई।

“देवराज चौहानो। म्हारे को पहाड़ों से उतरने में कितनो वक्त लागे हो?" __

“उतना ही, जितना चढ़ते हुए लगा था।” महाजन ने कहा।

“उतरना जल्दी हो जाता है। चढ़ने में जितना वक्त लगा, उतरने में उससे आधा वक्त लगेगा।” देवराज चौहान बोला। __

“लुढ़केला नेई बाप।"

“अम ना ही गिरो हो। म्हारे को अभी आसमानो कपड़ों वालो से ब्याह करणो हो।"

वे सब सावधानी से धीरे-धीरे पहाड़ से नीचे उतरते रहे। चंद्रमा सरकता जा रहा था। रात बीतती जा रही थी।

जगमोहन, सोहनलाल, नानिया, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा ने मिलकर उस कमरे की इस तरह सफाई कर दी कि धूल-मिट्टी का नामोनिशान नहीं रहा। हर चीज साफ चमकने लगी थी। ___

मंच जैसी जगह पर महाकाली का आदमबूत अब पूरी तरह से चमक रहा था। वो एक खूबसूरत स्त्री का बुत था जो कि रंग-बिरंगी घाघरा-चोली पहने हुए थी। कंधे पर चुनरी लटक रही थी। जिस कलाकार ने भी वो बुत बनाया, वो तारीफ के काबिल था। देखने में ऐसा लगता कि बुत में अभी जान पड़ेगी और वो चलने-बोलने लगेगा।

दीवारों से धूल हट चुकी थी। सोफेनुमा कुर्सियों पर से भी।

फानूस पर अवश्य अभी धूल थी। क्योंकि फानूस को साफ करने का कोई साधन नहीं था।

ये काम करके सब थक गए थे और सोफे जैसी कुर्सियों पर बैठ गए थे। ___

"बैठे क्यों?" मोमो जिन्न कह उठा—“वो जगह ढूंढ़ो जहां जथूरा कैद है।" ____

“आराम करने दे।” सपन चड्ढा ने तीखे स्वर में कहा—“जान निकाल दी हमारी सफाई करवाकर।" ____

“तुम इंसानों में ये ही समस्या है कि जरा-सा काम करते ही...”

"जरा सा।” लक्ष्मण दास बोला___

“हम क्या साफ-सफाई करने वाले हैं, जो हमें ये काम जरा-सा लगे। मुझे तो भूख लग रही है।" ___

“अब तो मुझे भी भूख लग रही है।" नानिया बोली-“क्यों सोहनलाल?"

सोहनलाल ने प्यार से मुस्कराकर नानिया को देखा। "लग रही है न?" नानिया ने उसका हाथ पकड़ा।

“तुझे लग रही है तो मुझे भूख क्यों नहीं लगेगी नानिया।" सोहनलाल बोला।

"लैला-मजनू की औलाद बस करो।” जगमोहन ने व्यंग से कहा।

“देखा, तुम्हारा दोस्त फिर चिढ़ने लगा हमारे प्यार से।"

“मैंने तुम्हें पहले भी समझाया था कि इसकी बात का बुरा मत माना करो।”

"धीरे-धीरे आदत पड़ेगी न।” नानिया ने गहरी सांस ली। सोहनलाल ने मोमो जिन्न से कहा। “तुम नानिया के लिए खाने का इंतजाम कर सकते हो?"
 
"सोहनलाल के लिए भी।” नानिया बोल पड़ी।

“हम क्या बुरे हैं। हमारा पेट नहीं है क्या?" सपन चड्ढा चिढ़कर बोला। ____

"दोनों में कितना प्यार है।” लक्ष्मण दास ने नानिया और सोहनलाल को देखकर कहा।

"तेरे पेट में मरोड़ क्यों उठ रही है।” सपन चड्ढा कह उठा।

"मैं तो दोनों का प्यार देख रहा.... ।”

“ज्यादा मत देख।” सोहनलाल ने तीखे स्वर में कहा—“मुंह मोड़ ले।"

“सोहनलाल। सब हमारे प्यार से चिढ़ते क्यों हैं?"

"वो ही चिढ़ता है, जिसके पास अपना प्यार नहीं होता। ये दोनों भी बिना औरत के लगते हैं।” ___

“सुन लिया लक्ष्मण।” सपन चड्ढा कह उठा— “हमारी इज्जत उतार रहे हैं ये।”

"मैं तो अब वापस जाकर शादी कर लूंगा।"

"क्यों?"

"अब उम्र नहीं रही तांक-झांक की। तू भी कर लेना।" सोहनलाल ने दांत फाड़कर जगमोहन से कहा।

"सुना।

ये समझदार हैं जो समझ गए कि बिना औरत के इज्जत नहीं मिलती। तू अपने बारे में सोच ।”

जगमोहन ने खा जाने वाली निगाहों से सोहनलाल को देखा।

तभी टेबल पर खाना पड़ा नजर आने लगा। खाने की महक उनकी सांसों में टकराई। भूख बढ़ गई।

वो सब खाने में व्यस्त होने लगे।

मोमो जिन्न कह उठा। “खाना खाने के बाद इस किले में जथूरा को तलाश करना है।"

"तू कुछ नहीं करेगा?" सपन चड्ढा बोला।

"ये काम मेरा नहीं है। मैं यहां की रखवाली करूंगा।" मोमो जिन्न ने कहा।

“हम खाना खा रहे हैं, तू जथूरा को ढूंढ़।” सपन चड्ढा बोला।

"शिष्टता से बात करो। जिन्न को सिर्फ उसका मालिक ही हुक्म दे सकता है।"

'भाड़ में जा। सपन चड्ढा बड़बड़ाया। “

क्या कहा तुमने?" मोमो जिन्न के माथे पर बल पड़े। “

जथूरा महान है।" लक्ष्मण दास जल्दी से कह उठा।

“तुम दोनों में जथूरा के सेवक बनने के भरपूर लक्षण हैं।” मोमो जिन्न ने कहा—"मैं तुम दोनों...।" ।

“यार तुम हमेशा हमारे पीछे क्यों... ।” सपन चड्ढा ने कहना चाहा।

“खबरदार जो जिन्न को यार कहा। वरना सारी जिन्न बिरादरी तुम दोनों के पीछे पड़ जाएगी।" - “एक संभाला नहीं जाता।" लक्ष्मण दास हड़बड़ाकर बोला—“सब पीछे पड़ गए तो हम पागल हो जाएंगे।"

"जिन्न से हमेशा तमीज से बात करो।"

"हम तो तुम्हें कितनी इज्जत देते हैं। क्यों सपन।"

“हां-हां। हम तो हर वक्त तुम्हारा ही गुणगान करते रहते हैं।" सपन चड्ढा ने कहा।

“मैं बहुत अच्छी तरह जानता हूं तुम दोनों के मन की बात।"

"क्या जानते हो?"

“चुपचाप उठो और किले में कहीं मौजूद जथूरा को ढूंढ़ो।" नानिया सोहनलाल से कह उठी।

"जिन्न ने तो इन दोनों का हाल बुरा कर रखा है।" मोमो जिन्न ने नानिया को घूरा। फिर बोला।

"हमारी बातों में तुम लोग दखल मत दो।"

“हम दखल नहीं दे रहे। आपस में बात कर रहे हैं। तुझे क्या।"

"हमारी बातें भी मत करो।” ।

"क्यों न करें। हम तेरे गुलाम नहीं हैं। तेरा हुक्म हम पर नहीं चल सकता।” नानिया ने मुंह बनाकर कहा।

मोमो जिन्न ने मुंह फेर लिया।

"कैसा जिन्न है ये।" सपन चड्ढा बोला—“औरत के आगे तो इसकी फूंक निकलती है।"

"चूप कर।" लक्ष्मण दास हड़बड़ाया। मोमो जिन्न ने गर्दन घुमाकर, सपन चड्ढा को देखा। सपन चड्ढा दांत फाड़कर कह उठा। “जथूरा महान है।”

“इन इंसानों की संगत में आकर तुम दोनों बदतमीज होते जा रहे हो।” मोमो जिन्न ने सख्त स्वर में कहा।

“चल सपन।” लक्ष्मण दास जल्दी से उठता हुआ बोला—“जथूरा को ढूंढ़े।"

"हां-हां चल।" सपन चड्ढा भी खड़ा हो गया। जगमोहन भी उठ खड़ा हुआ और सोहनलाल से बोला।

“हमें भी जथूरा को तलाश करना चाहिए।" सोहनलाल ने सिर हिलाया फिर नानिया से बोला। “तुम चाहो तो आराम कर लो नानिया—हम...।"

"मैं तो तेरे साथ ही रहूंगी सोहनलाल।” नानिया उठ खड़ी हुई। लक्ष्मण दास मोमो जिन्न से कह उठा। “तुम भी तो जथूरा को तलाश... ।”

“गुलामों के होते जिन्न काम नहीं करते। मैं तुम दोनों पर नजर रखंगा कि तुम दोनों ठीक से काम कर रहे हो या नहीं।"

“उल्लू का पट्ठा।” सपन चड्ढा बोला।

"क्या कहा?"

“उल्लू का पट्ठा। इंसान जिसकी खातिरदारी करते हैं, उसे उल्लू का पट्ठा...।" ___
 
“मत भूलो कि मैं भी कभी इंसान था। तब मैं भी दूसरों को उल्लू का पट्ठा कहा करता था।" मोमो जिन्न ने उसे घूरा।

सपन चड्ढा सकपका उठा। "तुम्हें शर्म आनी चाहिए जिन्न को गाली देते हुए।"

“गाली, म...मैंने तो प्यार से कहा था।"

तब तक जगमोहन, सोहनलाल और नानिया बाहर निकलने वाले दरवाजे की तरफ बढ़ गए थे।

तभी जगमोहन के सामने कुछ उछला।

जगमोहन फौरन ठिठका। उछलने वाली चीज की तरफ नजर गई।

सोहनलाल और नानिया भी रुक गए थे।

“क्या हुआ?" सोहनलाल ने पूछा।

परंतु जगमोहन की निगाह तो महाकाली की परछाई पर टिक चुकी थी। तीन इंच की, बेहद नन्ही-सी गुड़िया जैसी लग रही थी वो। परंतु कमर पर हाथ रखे, जगमोहन को देख रही थी।

“कौन हो तुम?" जगमोहन ने पूछा।

मोमो जिन्न, लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा का ध्यान इस तरफ हुआ।

"मैं महाकाली हूं।” महाकाली की आवाज वहां गूंज उठी।

“तुम महाकाली नहीं हो सकती।" _

“महाकाली की परछाई हूं। पूर्ण रूप में तुम्हारे सामने नहीं हूं मैं...।"

“वो तुम्हारी मूर्ति है?"

"हां।

“तुम्हारी प्रतिमा बहुत सुंदर है।"

“तुमने प्रतिमा को ध्यान से नहीं देखा। वरना तुम्हें पता चल जाता कि चेहरा खूबसूरत नहीं है।"

“क्या कहती हो?"

“पास जाकर एक बार फिर ध्यान से देखो।" जगमोहन होंठ सिकोड़े मंच पर बनी प्रतिमा की तरफ बढ़ गया।

“आ सोहनलाल । हम भी देखें।" नानिया और सोहनलाल भी प्रतिमा की तरफ बढ़ गए।

मोमो जिन्न फौरन करीब आया और महाकाली की परछाई के सामने थोड़ा-सा सिर झुकाया। ___

“तुम तो जथूरा के सेवक हो फिर मेरे आगे सिर क्यों झुकाते हो मोमो जिन्न?” महाकाली कह उठी।

"मैं तेरे आगे नहीं, तेरी कमाल की विद्या के सामने सिर झुका रहा हूं। तेरी विद्या महान है।"

“तू वास्तव में सच्चा जिन्न है। लेकिन यहां क्यों आया?"

"अपने मालिक जथुरा को आजाद कराने।" ।

“ये काम तेरे बस का नहीं है, तू चला जा यहां से।"

“जथूरा को लिए बिना मैं नहीं जाऊंगा।”

"जिद मत कर, जथूरा को मेरे कब्जे से निकाल ले जाना खेल नहीं है जो तू...।”

“जानता हूं कि तू विद्या की बहुत धनी है, परंतु मैं जथूरा को आजाद करवाने की पूरी चेष्टा कखेंगा।”

“लक्ष्मण दास और सपन चड्ढा के दम पर तू इतनी बड़ी बात कह रहा हैं।"

"नहीं-नहीं।” लक्ष्मण दास कह उठा—“ये हमें जबर्दस्ती यहां ले आया है। हम तो जथूरा को जानते भी नहीं।"

"सुना तुमने मोमो जिन्न।” महाकाली हंस पड़ी।

“जग्गू और गुलचंद भी हैं साथ में।"

“वो तेरे गुलाम नहीं हैं। वो अपनी मर्जी करेंगे। चला जा तू यहां से।”

"मैं अपनी मर्जी का मालिक हूं महाकाली।"

"मुझे क्रोध आ गया तो तेरे को बोतल में बंद कर दूंगी।" महाकाली ने गुस्से से कहा। ___
 
“हम यही चाहते हैं महाकाली कि तुम इसे बोतल में बंद कर दो।” सपन चड्ढा ने कहा—“इसने हमें बहुत परेशान कर रखा

मोमो जिन्न ने लक्ष्मण-सपन को घूरा।

"मैंने नहीं।" लक्ष्मण दास जल्दी से बोला—“ये बात सपन ने कही है।"

“तू भी तो मेरे साथ है।” सपन ने लक्ष्मण से कहा।

"इस बात में तेरे साथ नहीं हूं। देखता नहीं, मोमो जिन्न कैसे घूर रहा है तुझे। ये पक्का तेरे को भस्म कर देगा अभी।"

मोमो जिन्न महाकाली की परछाई को देखकर, गम्भीर स्वर में बोला।

“महाकाली, जथूरा कहां है?"

"मेरी कैद में आराम से है।" महाकाली ने हंसकर कहा।

"तू उसे आजाद कर दे। मैं हमेशा के लिए तेरा सेवक बन जाऊंगा।"

“मेरा सेवक। मैं अपने कामों में जिन्नों का इस्तेमाल नहीं करती। मेरी नजर में जिन्न बेकार के होते हैं।" ____

“ये कहकर तू जिन्नों का अपमान कर रही है महाकाली।” मोमो जिन्न तेज स्वर में कह उठा। ___

“आवाज नीची रख। तू जथूरा का मामूली-सा सेवक है। मेरे से ऊंचे स्वर में तने बात कैसे कर दी।" _

“क्षमा चाहता हूं।" मोमो जिन्न बोला—“लेकिन मैं जथूरा को लेकर ही जाऊंगा।"

तभी जगमोहन, सोहनलाल और नानिया पास आ पहुंचे।

“चेहरा देखा मेरे बुत का।” महाकाली ने पूछा- “कुछ नजर आया?"

“आंखों की पुतली में बीच का गोल घेरा नहीं है।"

“तो कुरूप लगा मेरा बुत?"

“कुछ-कुछ।”

“आंखों का गोल घेरा किसने निकाल लिया?” सोहनलाल ने पूछा।

“जाने दो। तुम लोग अपनी बात करो। यहां पर फिजूल में ही आए।” महाकाली की परछाई ने कहा। __

_“बेकार में क्यों?"

"तुम लोग तो जथूरा को आजाद नहीं करा सकते। मैंने तिलिस्म देवा और मिन्नो के नाम का बांधा है। तब तुम लोग कैसे जथूरा तक पहुंचोगे। तुम लोग तो ये भी नहीं जान सकते कि जथूरा कहां पर

“हम उसे ढूंढ़ लेंगे।” नानिया कह उठी।

“नहीं ढूंढ सकते। देवा-मिन्नो के अलावा जथूरा तक कोई नहीं पहुंच सकता।"

“तुम चाहोगी तो हमें जथूरा तक पहुंचा सकती हो।” । महाकाली हंस पड़ी। बोली।

“मैं क्यों चाहूंगी जग्गू। मैंने ही तो उसे कैद करके, उस पर तिलिस्म बांधा है।"

__ “अब तुम क्या चाहती हो हमसे?" सोहनलाल ने पूछा।

“यहां से चले जाओ। ये मेरा किला है। मैं अपने किले में किसी को नहीं देखना चाहती।” ___

“हमने तुम्हारे इस बुत वाले कमरे की सफाई की है।" नानिया बोली—“और अभी आराम भी नहीं किया। तुम कहती हो कि हम चले जाएं। बहुत नाशुक्री हो तुम। स्वागत क्या करना है हमारा तुमने, तुम तो धक्के मार रही हो।" ।

“मैं मेहमानों का स्वागत करती हूं, तुम लोग जबर्दस्ती मेरे किले में..." ___

"हम जबर्दस्ती नहीं आए। बूंदी का किया-धरा है, ये सब।" नानिया हाथ हिलाकर बोली-“उसने हमें मौसमों वाले रास्तों पर फंसा दिया था। आंधी-तूफान ने हमें तुम्हारे किले में ला पटका । बूंदी से पूछ तू। बुला उसे।"

महाकाली की परछाई हंस पड़ी।

"दांत क्यों फाड़ती है। चुहिया-सी है तू। हाथ में पकड़कर मसल दूंगी।” कहते हुए नानिया महाकाली की परछाई पर झपटी।

महाकाली की परछाई को उसने मुट्ठी में जकड़ना चाहा। परंतु देखते-ही-देखते महाकाली की परछाई गायब हो गई। “कहां भाग गई?" नानिया ने हड़बड़ाकर कहा।

"मैं यहां हूं।” महाकाली की आवाज उभरी।

महाकाली की परछाई सोफे जैसी कुर्सी की बांह पर खड़ी दिखाई दी।
 
"मुझे पकड़ना तो दूर, मेरी मर्जी के बिना कोई मुझे छू भी नहीं सकता नानिया।"

“देवराज चौहान इसी तिलिस्मी पहाड़ी में है क्या?" जगमोहन ने पूछा।

"हां" महाकाली ने कहा।

"बाकी सब?"

“वो सब साथ ही हैं।"

“कहां पर हैं वे?"

"ये मैं नहीं बता सकती।"

“वो यहां पहुंच जाएंगे?"

"इस बात का जवाब मैं नहीं दूंगी।"

"स्पष्ट है कि तुम मुझे किसी भी बात का जवाब नहीं दोगी।" जगमोहन बोला।

"हां" “फिर तो तुमने बात करने का कोई फायदा नहीं। हमें ही जथूरा को ढूंढ़ना होगा।" ___

“तुम लोग उसे आजाद नहीं करा सकते।" महाकाली ने व्यंग से कहा। __

“हो सकता है देवराज चौहान और मोना चौधरी यहां तक आ पहंचे। अगर तब तक हम जथुरा को ढूंढ़ लेते हैं तो उन्हें अपना काम करने में आसानी होगी।” जगमोहन बोला। ____

"लेकिन तम लोग इस काम में सफल नहीं हो सकोगे। जथरा मेरी कैद में है। उस तक देवा-मिन्नो ही पहुंच सकते हैं। वो भी तब, जब वो समझदारी से काम लें। जब तक उनके नाम का बना तिलिस्म नहीं टूटेगा तब तक जथूरा बहुत दूर है तुम लोगों से। अब चलती हूं। जथूरा अकेला है। बातों से उसका भी तो मन बहलाना

__अगले ही पल महाकाली की परछाई आंखों के सामने से गायब हो गई।

जगमोहन के चेहरे पर सोच दौड़ रही थी।

"दखा सोहनलाल । कैसे अकड़कर बात कर रही थी चुहिया सी। मेरे हाथ लग जाती तो...।" ।

“इज्जत से बात करो।” मोमो जिन्न बोला—“वो महाकाली है। बहुत ज्ञानी है।"

“तू मुझे तमीज मत सिखा।” नानिया ने मुंह बनाया।

"बड़ों की इज्जत करनी चाहिए।" ।

“तू तो जथूरा का सेवक है। फिर उसकी तरफदारी क्यों करता है?" __

“मैं उसकी नहीं। उसकी विद्या की कद्र करता हूं।” मोमो जिन्न ने कहा। ___

“तू कर । मैं तो परवाह नहीं करती। क्यों सोहनलाल?” __

“तू जो कहेगी, तेरी हर बात में सौ बार हां।” सोहनलाल ने कहा।

"देखा।” लक्ष्मण दास ने सपन चड्ढा से कहा—“कितना प्यार है दोनों में।”

"प्यार?" सपन चड्ढा खा जाने वाले स्वर में बोला—“चमचा है साला चमचा। औरत के अंदर घुसे जा रहा... ।”

“धीरे बोल वो सुन लेगा।" मोमो जिन्न ने घूरकर दोनों को देखा।

"जिन्न साहब हमें देख रहे हैं।” लक्ष्मण दास ने शराफत से कहा।

"लेकिन हम तो उनकी बात कर रहे हैं जिन्न की नहीं। अब ये हमें क्यों देखता है?" ____ “उसकी मर्जी।” लक्ष्मण दास ने दांत फाड़कर कहा और मोमो जिन्न

की तरफ देखा—“सैंसर कानों में लगा होने की वजह से सब सुन लेता है तू।कैसा अजीब जिन्न है, जो सैंसर का भी इस्तेमाल करता है।"
 
Back
Top