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मेरी आप बीती

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मेरा पहला हस्तमैथून

**************

लेखिका:-पायल शर्मा

नमस्कार दोस्तो, मेरा नाम पायल शर्मा है, यह मेरी पहली कहानी है और यह सच्ची घटना है। आप इस कहानी को पढ़ कर कमेन्ट ज़रूर करना कि यह आपको कैसी लगी।

चलो मैं अब कहानी पर आती हूँ, यह बात उस समय की है जब मैं बारहवीं में पढ़ती थी, हमारे परिवार में मम्मी-पापा, भैया-भाभी और मैं, हम पाँच लोग हैं। पापा बैंक में खजांची हैं और भईया आर्मी में सर्विस करते हैं, उनकी ड्यूटी जम्मू कश्मीर में है।

हमारा घर दो मंजिल का है, नीचे एक कमरा, ड्राइंग रूम, रसोई और लैटरीन बाथरूम है, ऊपर दो कमरे और उनके बीच में सांझा लैटरीन-बाथरूम है। नीचे के कमरे में मम्मी-पापा रहते हैं और ऊपर का एक कमरा भैया-भाभी का है और दूसरा मेरा है।

मगर मैं भाभी के कमरे में ही रहती हूँ क्योंकि भैया आर्मी में हैं इसलिए उनको साल में तीन महीने की ही छुटी मिलती है। ज़ब भैया घर पर रहते हैं तब ही मैं अपने कमरे में रहती हूँ नहीं तो भाभी के कमरे में ही रहती हूँ।

मैंने भाभी के कमरे में ही पढ़ने के लिये एक मेज-कुर्सी लगा रखी है और पढ़ाई के बाद मैं भाभी के साथ ही बेड पर सो जाती हूँ।

भाभी दस-साढ़े दस बजे तक घर का काम खत्म करके कमरे में आती तब तक मैं पढ़ाई करती थी, उसके बाद हम दोनों कुछ देर टीवी देखते और सो जाते!

मैं और भाभी सहेली की तरह रहते थे।

सब कुछ सामान्य ही चल रहा था, मगर एक रात सब कुछ बदल गया, उस रात मैं और भाभी सो रहे थे और करीब दो बजे भैया घर आ गये। वैसे तो जब भी भैया घर आते तो दिन में ही आते थे मगर उस रात पता नहीं कैसे आ गये, भैया भाभी की आवाज सुनकर मैं जग तो गई थी मगर मुझे बहुत नींद आ रही थी इसलिए मैं यह सोचकर कि ‘भैया से सुबह मिल लेंगे’ फिर से सो गई।

मगर कुछ देर बाद अजीब तरह की आवाज सुनकर मेरी नींद फिर से खुल गई। मैंने चेहरे से थोड़ा सा कम्बल उठाकर भाभी की तरफ देखा तो मेरी सांस अटक कर रह गई और मैंने दोबारा अपने चेहरे पर कम्बल डाल लिया क्योंकि सामने के नजारे के बारे में मैंने थोड़ा बहुत सिर्फ अपनी सहेलियों से ही सुना था मगर आज पहली बार देख रही थी, वो भी अपने भैया भाभी को!

भाभी की नाईटी उनके कंधों तक उल्टी हुई थी और नीचे भी उन्होंने कुछ नहीं पहना हुआ था, भैया भी बिल्कुल नंगे होकर भाभी के ऊपर लेटे हुए थे और अपनी कमर को ऊपर नीचे हिला रहे थे। भाभी के पैर भैया की कमर से लिपटे हुए थे और उनके मुँह से धीरे धीरे ओह्आह्ह ओह्ह्ह्ह की मादक आवाज आ रही थी जिसे मैं आसानी से सुन सकती थी।

सर्दी का मौसम था, इसलिए मैंने कम्बल औढ़ रखा था मगर भैया भाभी को ऐसी हालात में देख कर मेरा पूरा बदन पसीने से भीग गया और मेरे दिल की धड़कन रेल के इंजन की तरह चलने लगी। मैंने फिर से कम्बल को चेहरे से बस इतना सा हटाया कि मैं भैया भाभी को देख सकती थी और वो मेरे चेहरे को नहीं देख सकते थे।

वैसे भी उनका ध्यान मुझ पर बिल्कुल नहीं था, वो समझ रहे थे की मैं गहरी नीन्द सो रही हूँ और उसी तरह लगे रहे।

कुछ देर बाद भैया ने गति पकड़ ली वो कमर को जोर जोर से हिलने लगे और साथ ही भाभी के उरोज भी दबा रहे थे और भाभी भी कमर उठा-उठा कर भैया का साथ दे रही थी।

यह सब देख कर मेरी हालत खराब हो रही थी।

कुछ देर बाद भाभी की ऊह्ह, आह्ह्ह, आह्ह की आवाज सिसकारियों में बदल गई और भाभी ने अपने हाथों और पैरों से भैया की कमर को कस कर पकड़ लिया और वो शान्त हो गई कुछ देर बाद भैया भी निढाल हो गए और भाभी की बगल में लेट गए। कुछ देर दोनों ऐसे ही पड़े रहे, फिर भाभी उठी और अपनी ब्रा और पैंटी पहनने लगी।

मैंने भाभी को ब्रा और पैंटी में कई बार देखा था मगर भाभी के बड़े बड़े उरोज और योनि को आज पहली बार देख रही थी। इसके बाद भैया भी उठकर अपने कपड़े पहनने लगे तभी मेरी नजर भैया के लिंग पर गई जो कि अब शान्त हो गया था। मगर अब भी उसका आकार काफी बड़ा था। मैंने पहली बार किसी का लिंग देखा था जो मेरे लिये एक आश्चर्य के जैसा था।

इसके बाद भैया-भाभी सो गए मगर यह सब देखने के बाद मेरी नींद कोसों दूर भाग गई थी, मेरा पूरा बदन भट्टी की तरह तपने लगा, ऐेसा लग रहा था जैसे मुझे बहुत तेज बुखार हो गया हो और मेरी योनि तो अंगारों की तरह सुलगती महसूस हो रही थी।

अपने आप ही मेरा एक हाथ सलवार के ऊपर से ही योनि पर चला गया मुझे पैंटी में कुछ गीला गीला सा महसूस हुआ तो मैंने एक हाथ सलवार के अंदर डाल दिया, योनि से चिपचिपा पानी सा निकल रहा था, मैंने उसे सूंघा तो उसमें से अजीब सी खुशबू आ रही थी।

 
कम्बल को एक बार फिर चेहरे से हटाकर मैंने भैया भाभी को देखा वो सो चुके थे, मैंने फिर से अपना हाथ सलवार में डाल दिया और योनि की दरार में ऊँगली घुमाने लगी, ऊँगली घुमाने से मुझे बड़ा अच्छा लग रहा था और पूरे बदन में एक करेंट सा दौड़ने लगा।

योनि से पानी निकलने के करण वो पूरी तरह से गीली हो गई थी इसलिए अपने आप ही मेरी एक ऊँगली योनि के अन्दर चली गई जिसे मैं अंदर-बाहर करने लगी तो मुझे बड़ा आनन्द आने लगा और एक अजीब सा नशा छाने लगा। इसलिए मैंने ऊँगली की हरकत को तेज कर दिया, मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा सारा खून मेरी जांघों के बीच इकट्ठा हो गया है और सारे शरीर में आग भड़क रही है।

मैंने ऊँगली की हरकत को और तेज कर दिया…

मेरा मुँह सूख गया और साँसें उखड़ने लगी और कुछ देर बाद ही मेरी दोनों जाँघें एक दूसरे से चिपक गई, व मेरा पूरा शरीर अकड़ सा गया और मेरी योनि ढेर सारा पानी उगलने लगी जिससे मेरी जाँघें और पूरा हाथ तक गीला हो गया, आँखें अपने आप मस्ती में बंद हो गई और पूरे बदन में आनन्द की लहर सी दौड़ गई।

अब मैं काफी हल्का महसूस कर रही थी और मेर दिल को एक अजीब सुकून सा मिल गया था। मैंने उँगली से आज पहली बार ये सब किया था, अभी तक मैं इस सुख से अनजान थी।

इसके बाद मैं अपनी पेंटी से ही हाथ को साफ करके, पेंटी व सलवार को ठीक से पहन लिया और फिर पता नहीं कब मेरी आँख लग गई। सुबह मैं देर सोती रही और कॉलेज भी नहीं गई।

जब भाभी ने मुझे जगाया तो जागते ही मैंने उनसे भैया के बारे में पूछा!

भाभी ने बताया कि वो छुट्टी नहीं आये थे, वो तो आगरा किसी काम से आये हुए थे इसलिए एक रात के लिये घर पर भी आ गये और सुबह 4 बजे ही चले गये।

मैंने पूछा- फिर कब आयेंगे?

तो भाभी ने कहा- तेरे एग्जाम खत्म होने के बाद।

इसके बाद भाभी अपना काम करने लगी और मैं बाथरूम चली गई। जब नहाने लिये मैंने अपने कपड़े उतारे तो मेरा ध्यान अपनी पेंटी पर चला गया जिस पर सफ़ेद दाग लगा हुआ था और वो सूख कर सख्त भी हो गया था।

तभी मुझे रात की घटना याद आ गई और शर्म से मेरे गाल लाल हो गये। मैं बाथरूम में लगे शीशे के सामने जाकर नँगी ही खड़ी हो गई और खुद को देखने लगी।

लम्बा कद, दूधिया गोरा रंग, काले घने लम्बे बाल, बड़ी बड़ी काली आँखें, पतले और सुर्ख गुलाबी होंठ, उभरे हुए स्तन जो कि नीम्बू के आकार से बस थोड़े ही बड़े थे और उन पर गुलाबी निप्पल ऐसे लग रहे थे जैसे सफेद आईसक्रीम पर लाल चेरी रखी हुई हो, पतली कमर, केले के तने सी चिकनी और मखमल सी मुलायभ गोरी जांघें और जाँघों के बीच फ़ूली हुई गुलाबी रंगत लिए मेरी छोटी सी योनि जिस पर हल्के हल्के रोयें ही आए थे और योनि के बीच हल्का सा दिखाई देता गुलाबी दाना (क्लिटोरियस) ऐसा लगता था मानो पाव (डबल रोटी) को चाकू से बीच में से काटकर उसमें अनार दाना छुपा रखा हो, मांसल भरे हुए नितम्ब।

मैंने पहले भी कई बार खुद को शीशे में नंगा देखा है मगर आज़ पता नहीं क्यो खुद को देख कर रोमाँचित हो रही थी और बदन में एक अजीब गुदगुदी सी होने लगी। मैं भाभी से अपने शरीर की तुलना कर रही थी मगर भाभी के मुकाबले में मेरा शरीर कुछ भी नहीं था क्योंकि भाभी तो पूरी तरह खिला हुआ फ़ूल थी और मैं अभी ताजा ताजा खिली हुई कली के समान थी जिसको फ़ूल बनने में अभी काफी समय लगना था।

थोड़ा गौर से देखने पर मुझे योनि पर भी सफेद दाग दिखाई दिया मैंने हाथ में पानी लिया और योनि को साफ करने लगी, जैसे ही ठण्डे पानी का स्पर्श योनि से हुआ तो मेरे पूरे बदन में सिहरन सी दौड़ गई और मैं उत्तेजना से भर उठी, एक बार फिर मैंने अपनी ऊँगली से हस्तमैथुन किया, इस बार मुझे रात से भी ज्यादा मज़ा आया।

इसके जब भी मुझे मौका लगता, मैं ऊँगली से अपना काम कर लेती थी और मुझमें काफी परिर्वतन भी आ गया था। अब मैं बनने-सँवरने पर काफी ध्यान देने लगी, घन्टों तक बाथरुम में नँगी होकर खुद के शरीर को देखती रहती और भाभी से अपनी तुलना करती।

जब भी लड़कों की नजर मुझे घूरती तो मैं सहम सी जाती क्योंकि अब मुझे मालूम हो गया था कि लड़कों की नजरें मुझमें क्या ढूंढती हैं।

और यह सारा बदलाव मुझमें उस रात की घटना के बाद आया।

कहानी जारी रहेगी

 


मेरा पहला मुखमैथून

आपने मेरी कहानी का पहलाभाग मेरा पहला हस्तमैथुन पढ़ा और बहुत पसन्द किया इसके लिये धन्यवाद।

अब मैं इसके आगे की कहानी लिख रही हूँ। उम्मीद करती हूँ कि ये भी आपको पसन्द आयेगी।

आपने मेरी पहली कहानी में मेरे बारे में तो पढ़ लिया होगा। अब मुझमें काफ़ी परिवर्तन आ गया था, मेरे सोचने समझने का तरीका ही बदल गया था।

कुछ दिन बाद मेरी परीक्षा आ गई और एक दिन जब मैं अपना आखिरी पेपर देकर लौटी तो देखा घर पर महेश जी आए हुये थे। महेश जी मेरी भाभी के भाई थे जिनकी उम्र 30-32 साल होगी, वो शादीशुदा व एक दो साल के बच्चे के पिता भी थे।

मैंने उन्हें नमस्ते की और ऊपर भाभी के कमरे में चली गई।

बाद में भाभी ने मुझे बताया कि महेश की नौकरी इसी शहर में एक लिमिटेड कम्पनी में लग गई है और जब तक उन्हें कम्पनी की तरफ से घर नहीं मिल जाता वो हमारे ही घर में रहेंगे।

महेश जी को मेरा कमरा दे दिया गया, वैसे भी मेरा कमरा खाली ही रहता था क्योंकि मैं तो पहले से ही भाभी के कमरे में रहती थी।

महेश जी सुबह नौ बजे काम पर चले जाते और शाम को पाँच बजे तक आते थे।

पहले जब महेश जी हमारे घर आते थे तो ऐसा नहीं लगता था मगर इस बार पता नहीं क्यों उनकी नजर मुझे घूरती सी महसूस होती थी।

मैं जब भी उनके सामने जाती वो मुझे ऐसे देखते जैसे आँखों से मेरा एक्सरे कर रहे हों और किसी ना किसी बहाने से मुझे छूने की कोशिश करते, कभी कभी तो मौका मिलने पर मेरे नाजुक अंगों को भी सहला देते और ऐसा दिखाते कि जैसे कुछ हुआ ही नहीं।

उनकी इन हरकतों पर मुझे बड़ा गुस्सा आता और मुझे उनसे डर भी लगने लगा।

पहले तो मैं उनसे बातचीत और कभी कभी हंसी मजाक भी कर लिया करती थी मगर अब तो मुझे उनके सामने जाने में भी डर लगता था। ऐसा पता नहीं वो जानबूझ कर करते थे या मुझे ही लगता था।

कभी कभी तो मैं सोचती कि महेशजी की शिकायत मम्मी-पापा और भाभी से कर दूँ पर यह सोचकर रह जाती कि हो सकता है वो जानबूझकर ना कर रहे हों और यह मेरा ही वहम हो, और मैं डरती भी थी की कही मम्मी पापा और भाभी मुझे गलत ना समझ लें।

एक रात हमें किसी पार्टी में जाना था, पार्टी में महेश जी नहीं जा रहे थे इसलिये भाभी ने उनके लिये खाना बना कर रख दिया था।

पार्टी में जाने के लिये भाभी के कहने पर मैंने उनके साड़ी व ब्लाउज पहन लिये मगर भाभी का ब्लाउज मुझे फिट नहीं हो रहा था क्योंकि भाभी की तुलना में मेरे उरोज बहुत छोटे हैं इसलिये भाभी ने मुझे ब्लाउज के नीचे अपनी एक फोम वाली पैडिड ब्रा पहना दी।

वैसे मैंने पहले कभी भी ना तो ब्रा पहनी थी और ना ही कभी साड़ी पहनी थी मगर उस ब्रा को पहनने के बाद मुझे उनका ब्लाउज बिल्कुल फिट आ गया और मेरे उरोज भी बड़े दिखने लगे।

हम पार्टी के लिये निकल ही रहे थे कि महेश जी आ गये, मुझे साड़ी में देख कर महेश जी ने मेरी तारीफ की मगर मैंने ध्यान नहीं दिया पर इस बात का अहसास मुझे पार्टी में जाने के बाद हुआ।

मैंने देखा कि पार्टी में सब लड़कों की नजरें मुझ पर ही थी और मैं भी अपने आप पर गर्व कर रही थी।

पार्टी के बाद हम करीब ग्यारह बजे घर पहुँचे, घर पहुँचते ही मैं बिना कपड़े बदले ऐसे ही सोने लगी तो भाभी ने कपड़े बदल लेने के लिये कहा मगर मैंने मना कर दिया क्योंकि वो साड़ी मुझे बहुत अच्छी लग रही थी और दूसरे मैं पार्टी में बहुत थक गई थी, मैं और भाभी बात कर ही रहे थे कि तभी नीचे से मम्मी ने आवाज लगा कर बताया कि भैया आये है उनके लिये खाना बनाना है।

भैया के आने की बात सुनते ही भाभी का चेहरा खिल सा गया और वो भैया के लिये खाना बनाने नीचे चली गई।

खुशी तो मुझे भी हुई पर मैं यह सोचकर ज्यादा खुश थी कि आज फिर से मुझे उस रात की तरह कुछ देखने को मिलेगा!

कुछ देर बाद भैया ऊपर कमरे में आ गये, मैंने उन्हें नमस्ते किया और हम दोनों बातें करने लगे। इसके कुछ देर बाद भाभी भी भैया का खाना ऊपर कमरे में ही ले आई। जब तक भैया ने खाना खाया मैं उनसे बातें करती रही।

भैया के खाना खत्म करते ही भाभी ने कहा- चलो अब सो जाओ, बाकी बातें सुबह कर लेना, समय देखो, रात का एक बज रहा है।

मैंने घड़ी की तरफ देखा तो सच में एक बज रहा था मगर मैं यह सोचकर बैठी रही कि मुझे तो यहीं पर सोना है, पर कुछ देर बाद भाभी ने फिर से कहा- चलो पायल, अपने कमरे में चलो और सो जाओ! तुम्हारे भैया इस बार एक रात के लिये नहीं बल्कि महीने भर के लिये आये हैं।

मैंने कहा- मगर भाभी, मेरे कमरे में तो महेश जी सो रहे हैं!

भाभी ने कहा- अरे हाँ! और अब तो मम्मी पापा भी सो गये होंगे? उन्हें जगाना भी ठीक नहीं होगा!
 
मैं दिल ही दिल में यह सोच कर खुश हो गई कि चलो अब तो यहीं पर सोना है मगर कुछ देर सोच कर भाभी ने कहा- कोई बात नहीं पायल, तुम आज रात भर के लिये महेश भैया के साथ अपने कमरे में ही सो जाओ, मैं कल तुम्हारा बिस्तर नीचे मम्मी पापा के कमरे में लगा दूँगी! चलो मैं महेश भैया को बता देती हूँ।

मुझे भाभी पर गुस्सा तो बहुत आया पर क्या कर सकती थी, बिना कुछ बोले भाभी के पीछे पीछे चल पड़ी और दिल ही दिल में भाभी को गालियाँ दे रही थी। भाभी मुझे महेश जी के कमरे में छोड़ कर चली गई।

उस कमरे में कम पावर का बल्ब जल रहा था जिसकी रोशनी में मुझे महेश जी बेड पर लेटे हुए दिखाई दे रहे थे।

महेश जी से मुझे पहले ही डर लगता था ऊपर से उनके कमरे में सोने के लिये तो मेरी रुह तक काँपने लगी इसलिये मैं चादर लेकर नीचे सोने लगी मगर महेश जी कहने लगे- फर्श बहुत ठण्डा है और बाहर से ठण्डी हवा भी आ रही है। दरवाजा बँद कर दो और तुम बेड पर ही एक तरफ सो जाओ।

मुझे डर लग रहा था मगर शर्म के कारण मैं यह कह भी नहीं सकती थी, इसलिये मैंने दरवाजे को बँद तो नहीं किया मगर उसे हल्का सा सटा दिया और महेश जी के पैरों की तरफ सर करके बेड के एक किनारे चुपचाप सो गई और कुछ देर बाद मुझे नींद भी आ गई।

पर अचानक मेरी नीन्द खुल गई क्योंकि मुझे अपने सीने पर कुछ भारी भारी सा महसूस हुआ। हाथ लगाकर देखा तो महेश जी का पैर मेरे सीने पर था।

मैंने उसे हटाया और करवट बदल कर फ़िर से सो गई।

करवट बदलने से मेरी पीठ महेश जी की तरफ और मेर चेहरा बेड के किनारे की तरफ हो गया मगर कुछ देर बाद मुझे अपने पैरों पर कुछ रेंगता सा महसूस हुआ।

मैंने गरदन घुमा कर देखा तो महेश जी मुझसे बिल्कुल सटे हुए थे, उनका सर मेरे पैरों में था और वो एक हाथ से मेरे पैरों को सहला रहे थे।

जब मैं सोई थी तो दरवाजे को थोड़ा सा खुला छोड़ दिया था और मेरे व महेश जी में करीब दो फ़ीट का फासला था मगर अब दरवाजा बिल्कुल बन्द था और महेश जी भी मुझसे चिपके हुए थे।

यह सोचकर शर्म और डर से मेरा गला सूख गया, दिल की धड़कन तेज हो गई, मैं कुछ बोलना चाह रही थी मगर मेरे मुँह से आवाज भी नहीं निकल पा रही थी और महेश जी को हटाना चाह रही थी पर मेरे हाथ पैर काम नहीं कर रहे थे, मैं बुत बन कर रह गई।

कुछ देर मेरे पैरों को सहलाने के बाद महेश जी मेरी पिण्डलियों को जीभ से चाटने लगे और एक हाथ से धीरे धीरे मेरी साड़ी व पेटिकोट को ऊपर की तरफ़ खिसकाने लगे, इसके बाद उनकी जीभ भी धीरे धीरे ऊपर की तरफ बढ़ने लगी।

जब उनकी जीभ मेरे घुटनों से ऊपर बढ़ने लगी तो एक बार मेरे दिल में आया कि मैं जोर से चिल्ला कर सभी घर वालों को जगा दूँ मगर यह सोचकर रह गई कि मम्मी पापा और भैया भाभी मेरे बारे में क्या सोचेंगे और इसमे मेरी ही बदनामी होगी, इसलिये मैं खुद ही हिम्मत जुटा कर उन्हें हटाने लगी।

मैंने अपने घुटने मोड़ कर एक हाथ से अपनी साड़ी व पेटीकोट को पकड़ लिया और दूसरे हाथ से महेश जी को हटाने लगी मगर वो नहीं माने उन्होंने मेरी साड़ी व पेटीकोट को मेरे पेट तक उलट दिया व एक हाथ मेरे कूल्हों के नीचे से डाल कर मुझे कस कर पकड़ लिया और अपना मुँह मेरे कूल्हों से सटा दिया।

नीचे मैंने पैंटी पहन रखी थी इसलिये वो पैंटी के ऊपर से ही मेरे कूल्हे पर अपनी जीभ घुमाने लगे। कभी कभी वो पैंटी के किनारों से जीभ अँदर घुसाने की कोशिश करते तो मेरी साँस अटक कर रह जाती और पूरे बदन में एक सिहरन सी दौड़ जाती।

कुछ देर बाद महेश जी ने अपना हाथ मेरे कूल्हों के नीचे से निकाल लिया और मेरी जाँघों के बीच डालने लगे मगर कामयाब नहीं हो पाए क्योंकि मैंने अपनी जाँघें पूरी ताकत से भींच रखी थी उनके बीच हवा तक गुजरने के लिये जगह नहीं थी पर अचानक महेश जी ने मेरे चूतड़ों पर दाँत से काट लिया जिससे मैं अआ.आ..ह… ह.. आ.उ ..ऊँ…च… की आवाज करके उछल पड़ी और मेरी जाँघें खुल गई।

तभी उन्होंने मेरी एक जाँघ को ऊपर उठा कर अपना सर मेरी जाँघों के बीच फ़ंसा लिया और अपने मुँह को मेरी जाँघों के जोड़ से सटा दिया।

मैं उन्हें हटाने लगी तो उन्होंने मेरी जाँघों को पकड़ लिया और फिर से जीभ को पैंटी के ऊपर से ही मेरी जाँघों के जोड़ पर घुमाने लगे।

उनकी जीभ से मुझे कुछ हो रहा था।

जब उनकी जीभ मेरी योनि पर जाती तो मैं सिकुड़ जाती, उनकी जीभ की गर्मी मुझे पैंटी के ऊपर से ही महसूस हो रही थी।

मुझे डर भी लग रहा था मगर पता नहीं क्यों मजा भी आ रहा था।

एक बार फिर से मैं उन्हें हटाने लगी इस बार मैंने उनके सर के बाल पकड़ कर खींच लिये, बाल खींचने से उन्हें दर्द हुआ जिससे वो हट तो गये मगर उन्होंने फिर से मुझे पकड़ लिया।

इस बार उन्होंने मेरे कँधे को दबाकर मुझे सीधा कर लिया और अपने दोनों पैरों से मेरे दोनों हाथों को दबाकर मेरे ऊपर आ गये।

अब मेरे पैरों की तरफ उनका सर व उनके पैरों की तरफ मेरा सर था 69 की पोजिशन में! और उन्होंने एक झटके में मेरी पैंटी को खींच कर निकाल दिया।

 
यह सब महेश जी ने इतनी जल्दी से किया कि मैं कुछ भी नहीं कर पाई और बिल्कुल बेबस सी हो गई क्योंकि मेरे दोनों हाथों को महेश जी ने अपने पैरों से दबा रखा था।

अब नीचे से मैं बिल्कुल नँगी हो गई थी क्योंकि मेरी साड़ी व पटीकोट तो पहले से ही मेरे पेट तक उल्टे हुए थे।

इसके बाद महेश जी ने मेरी जाँघों को पकड़ कर फैला दिया व अपने होंठ फिर से मेरी जाँघों के जोड़ से सटा दिये और धीरे धीरे मेरी नँगी जाँघों को और छोटी सी योनि को चूमने चाटने लगे।

उनकी इस हरकत से मेरी योनि में एक चिन्गारी सी सुलग उठी और वो चिन्गारी मेरे पूरे बदन को जलाने लगी, मुझ पर एक बेचैनी और खुमारी सी छा गई। धीरे धीरे महेश जी अपनी जीभ को मेरी योनि की दरार में घुमाने लगे।

अब तो मुझे भी मज़ा आ रहा था मगर मैं नहीं चाहती थी कि महेश जी को पता चले कि मुझे मज़ा आ रहा है पर मेरी योनि पानी उगल उगल कर मेरी चुगली करने लगी।

मैंने अपने मुँह को जबरदस्ती बन्द कर रखा था मगर फ़िर भी जब उनकी गर्म जीभ मेरी योनि के छोटे से गुलाबी दाने (क्लिटोरियस) को छूती तो मेरी जाँघें काँप सी जाती व पूरे शरीर में करेंट की एक लहर सी दौड़ जाती और ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से सिसकारी निकल जाती।

इस बात का अहसास महेश जी को भी हो गया कि मुझे मज़ा आ रहा है इसलिये महेश जी ने मेरी जाँघों को छोड़ दिया और अपने दोनों हाथों को मेरे कूल्हो के नीचे ले जाकर मुझे थोड़ा सा ऊपर उठा लिया और जीभ निकाल कर मेरी योनि में कभी दाने पर तो कभी योनिद्वार पर घुमाने लगे।

मेरे मुँह से ना चाहते हुए भी जोर जोर से सिसकारियाँ फ़ूटने लगी।

कभी कभी वो जानबूझ कर मेरे दाने को दाँतों से हल्का सा दबा देते तो मैं उछल पड़ती और मेरे मुँह से कराह निकल जाती।

उत्तेजना से मेरी हालत खराब हो रही थी और मेरी योनि तो जैसे उबल ही रही थी जिसमें से पानी उबल उबल कर बाहर आने लगा था जो कि मेरी जाँघों को भी गीला करने लगा। मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी जाँघों के बीच मेरी योनि में लाखो चींटियाँ काट रही हैं।

धीरे धीरे महेश जी अपनी जीभ को मेरी योनि में गहराई तक पहुँचाने लगे अब तो मैं अपने आप पर काबू नहीं कर पा रही थी, अपने आप ही मेरे मुँह से जोर जोर से ईइ इशशश्श्श्श शश… अआआह्ह्ह… ईइशशश्श्श्श शश… अआआहहह… की आवाजें निकलने लगी।

इससे महेश जी को पूरा यकीन हो गया कि मुझे मज़ा आ रहा है इसलिये महेश जी ने मेरे हाथों को भी आजाद कर दिया और जल्दी जल्दी अपनी जीभ को मेरी योनि में अन्दर बाहर करने लगे।

मेरे हाथ आजाद होते ही अपने आप महेश जी के सर पर चले गये और मैं उनके सर को जोर जोर से अपनी योनि पर दबाने लगी।

उत्तेजना से मेरा बुरा हाल हो रहा था और मेरी योनि में तो मानो पानी की बाढ़ सी आ गई थी, ऊपर से महेश जी के मुहँ से निकलने वाली लार के मिलने से मेरी पूरी जाँघें भीगने लगी।

उत्तेजना से मैं पागल हो रही थी और मेरी योनि में तो जैसे अन्गारे से सुलगते महसूस हो रहे थे इसलिये मैंने अपनी जाँघों को अधिक से अधिक फ़ैला लिया और शर्म लिहाज को भुला कर मैं भी अपनी कमर को ऊपर नीचे हिलाने लगी ताकी उनकी जीभ अधिक से अधिक मेरी योनि में समा जाये।

मैं चाह रही थी कि मेरी योनि में जो आग लगी हुई है, महेश जी उस आग को जल्दी से जल्दी अपनी जीभ से शान्त कर दें। महेश जी ने भी अपनी जीभ की हरकत को तेज कर दिया और नीचे से मेरे कूल्हों को धीरे धीरे दबाने लगे।

उनकी इस हरकत ने आग में घी का काम किया और मैं उत्तेजना के कारण पागलों की तरह जोर जोर से अपनी कमर को हिलाकर ईइइशश… अआहह्ह्ह… ईइइशश… अआआहहह्ह्ह… की आवाज करने लगी।

और अचानक जैसे सब कुछ जैसे थम सा गया, मेरा शरीर अकड़ गया मैंने महेश जी के सर को दोनों हाथों से अपनी योनि पर दबा लिया और अपनी जाँघों से कस कर पकड़ लिया, मेरी सिसकारियाँ हिचकियों में बदल गई और मेरी योनि ढेर सारा पानी उगलने लगी, आनन्द की एक लहर सी पूरे बदन में दौड़ गई।

यह मेरा पहला मुखमैथुन था जो अत्यधिक आनन्द से भरा हुआ था।

अब सब कुछ शान्त हो गया।

कुछ देर तक मैं आँखें बन्द करके ऐसे ही पड़ी रही और महेश जी के सर को भी अपनी जाँघों के बीच दबाए रखा मगर जब महेश जी अपने आप को छुड़वाने के लिये हिले तो मेरी तन्द्रा टूटी, मैंने महेश जी के सर को छोड़ दिया और धीरे से आँखें खोलकर उनकी तरफ़ देखा!

वो मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुरा रहे थे उनका मुँह मेरी योनि से निकले पानी से गीला हो रहा था जिसे वो अपनी जीभ होंठों पर फ़िरा कर चाट रहे थे।

मैंने फ़िर से अपनी आँखें बन्द कर ली।

कुछ देर बाद…

इसके आगे की कहानी अगले भाग में लिखूँगी।
 


पहला सहवास

पहला मुखमैथुन को पढ़ा और बहुत पसन्द किया इसके लिये धन्यवाद।

अब मैं इसके आगे की कहानी लिख रही हूँ। उम्मीद करती हूँ कि यह भी आपको पसन्द आयेगी।

आपने मेरी पहले की कहानी में यह तो पढ़ लिया होगा कि किस तरह से मुझे मजबूरी में महेश जी के कमरे में सोना पड़ा और महेश जी ने जबरदस्ती अपने मुँह से मेरी योनि का मैथुन किया।

मुखमैथुन में सच में मुझे इतना मज़ा अया कि मैं इस आनन्द को शब्दों में बयान नहीं कर सकती।

अब सब कुछ शान्त हो गया था। कुछ देर तक मैं आँखें बन्द करके ऐसे ही पड़ी रही और महेश जी के सर को भी अपनी जाँघों के बीच दबाए रखा मगर जब महेश जी अपने आप को छुड़वाने के लिये हिले तो मेरी तन्द्रा टूटी, मैंने महेश जी के सर को छोड़ दिया और धीरे से आँखें खोलकर उनकी तरफ़ देखा !

वो मेरी तरफ़ देख कर मुस्कुरा रहे थे, उनका मुँह मेरी योनि से निकले पानी से गीला हो रहा था जिसे वो अपनी जीभ होंठों पर फ़िरा कर चाट रहे थे, मैंने शर्म के करण अपनी आँखें बन्द कर ली।

कुछ देर बाद फ़िर से मैंने आँखें खोल कर उनकी तरफ़ देखा, वो अब भी मुस्करा रहे थे मगर इस बार वो मेरी नंगी योनि और जाँघों की तरफ़ देख रहे थे, तभी मुझे अपने कपड़ों का ख्याल आया जो कि अस्त-व्यस्त हो चुके थे।

मैं जल्दी से अपनी साड़ी और पेटिकोट को ठीक करने लगी मगर जल्दी में मेरी पेन्टी नहीं मिल पाई शायद महेश जी ने बिस्तर से नीचे गिरा दी थी इसलिये मैं पेन्टी पहने बिना ही कम्बल लेकर सोने लगी मगर महेश जी ने कम्बल को पकड लिया और कहने लगे- अकेले ही मजा लेकर सोने का इरादा है क्या?

मैंने फ़िर से अपनी आँखें बन्द कर ली और बिना कुछ बोले ही करवट बदल कर सो गई क्योंकि अभी जो कुछ हमारे बीच हुआ, उससे मुझे बहुत शर्म आ रही थी और अपने आप पर गुस्सा भी आ रहा था।

महेश जी भी मेरे पास मेरी बगल में लेट गये और फ़िर से कहने लगे- कुछ हमारे बारे में भी तो सोचो !

उन्होंने कम्बल को खींच कर मुझ से अलग कर दिया और मेरी गर्दन व गालों पर चुम्बन करने लगे, उनके मुँह से मेरी योनि से निकले पानी की खुशबू आ रही थी। मैं अपने आपको छुड़वाने की कोशिश करने लगीं मगर महेश जी के आगे मेरा कहाँ जोर चलने वाला था, उन्होंने मेरे दोनों हाथों को मोड़ कर बिस्तर से सटा कर पकड़ लिया और मुझे सीधा करके जबरदस्ती मेरे गालों को चूमते चाटते रहे।

कुछ देर बाद महेश जी ने मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया और बुरी तरह से चूसने लगे जैसे कि मेरे होंठों में से कोई रस आ रहा हो।

मुझे फ़िर से कुछ होने लगा था जैसे मुझे कोई नशा चढ़ने लगा हो, मैं अपनी सुध बुध खोने लगी यहाँ तक कि मैं महेश जी का विरोध करना भी भूल गई, कभी कभी जब वो मेरे होंठों में अपने दाँत गड़ा देते तो मैं कराह उठती और छ्टपटाने लगती।

इसी बीच महेश जी ने अपना पायजामा और अण्डरवियर निकाल लिया और पता नहीं कब उन्होंने अपने लिंग पर मेरा हाथ रखवा दिया।

जैसे ही मुझे इस बात का अहसास हुआ कि मेरा हाथ कहाँ पर रखा है तो मेरा दिल धक से रह गया, साँसें तेज हो गई और मैंने जल्दी से अपना हाथ खींच कर वहाँ से हटा लिया क्योंकि आज से पहले सिर्फ़ एक बार मैंने अपने भैया का लिंग देखा था, आज पहली बार किसी के लिंग को स्पर्श करके मैं घबरा गई।

मेरी आँखें बन्द थी फ़िर भी मुझे महेश जी के लिंग के विशाल आकार का अहसास हो गया।

एक बार फ़िर से महेश जी ने मेरा हाथ पकड़ कर अपने लिंग पर रखवा दिया मगर शर्म के करण मैंने फ़िर से अपना हाथ खींच लिया पता नहीं क्यों उनके लिंग को छूने के बाद मेरे शरीर में एक अजीब सी सरसराहट होने लगी और मन में गुदगुदी सी होने लगी।

इसके बाद महेश जी ने मेरे ब्लाउज के बटन खोल दिये और मेरी ब्रा को ऊपर खिसका कर मेरे छोटे छोटे उरोजों को मसलने लगे, इससे मुझे दर्द भी हो रहा था और मज़ा भी आ रहा था। पता नहीं क्यों मैं उनका कोई विरोध नहीं कर रही थी।

कुछ देर बाद महेश जी मेरे एक निप्पल को अपने मुँह में भरने लगे, मगर एक बड़े नींबू से बस कुछ ही बडे आकार के मेरे उरोज थे इसलिये पूरा का पूरा उरोज ही उनके मुँह में समा गया और वो किसी छोटे बच्चे की तरह से उसे चूसने लगे।

उनकी इस हरकत ने मेरे तन-बदन में आग लगा दी और मैं फ़िर से उत्तेजित हो गई।

इसके साथ साथ महेश जी एक हाथ से मेरे दूसरे उरोज को मसलने लगे और एक हाथ से कपड़ों के ऊपर से ही मेरी योनि को सहलाने लगे, मेरे मुँह से फ़िर से सिसकारियाँ फ़ूटने लगी। उत्तेजना का मुझ पर एक नशा सा हो गया और पता नहीं कब महेश जी ने मेरी साड़ी और पेटीकोट को उतार दिया।

अब मैं नीचे से बिल्कुल नँगी हो गई थी क्योंकि पेंटी तो मैंने ना मिलने के कारण पहनी ही नहीं थी इसलिये शर्म के कारण मैं अपने दोनों हाथों से अपनी योनि को छुपा लिया।

इसके बाद महेश जी ने मेरे उरोजों को छोड़ दिया और मेरे बदन को चूमते हुए धीरे धीरे मेरे पेट की तरफ़ बढने लगे।

 
मैं शर्म और उत्तेजना से दोहरी हो रही थी।

जब महेश जी मेरी नाभि से नीचे की तरफ़ बढ़ने लगे तो पूरे शरीर में एक सिहरन सी दौड़ने लगी इसलिये मैंने अपने घुटने मोड़ लिये।

महेश जी ने उन्हें सीधा करना चाहा मगर मैंने नहीं किये इसलिये वो उठ कर मेरे घुटनों के पास आ गये और मेरी जाँघों को चूमते हुए मेरी योनि की तरफ़ बढ़ने लगे।

मगर मैंने अपनी जाँघों को भींच रखा था इसलिये महेश जी ने अपने हाथों से दबाकर फ़िर से मेरे घुटनों को सीधा कर दिया और मेरी योनि को चूमने लगे। मेरे पूरे बदन में एक आग सी भड़क उठी और मेरी योनि तो भट्टी की तरह से तपती महसूस हो रही थी।

इसके बाद महेश जी अपनी जीभ को निकाल कर मेरी योनि के ऊपर के हिस्से को जीभ से सहलाने लगे।

मैंने अपनी जाँघों को भींच रखा था इसलिये उनकी जीभ ठीक से मेरी योनि तक नहीं पहुँच रही थी मगर फ़िर भी जब महेश जी अपनी जीभ को नीचे मेरी योनि तक पहुँचाने की कोशिश करते तो मेरी जाँघों में कंपकंपी सी होने लगी और उत्तेजना के कारण अपने आप ही मेरी जाँघें खुल गई।

अब महेश जी की जीभ मेरी पूरी योनि पर घूमने लगी।

मेरी योनि फ़िर से पानी से लबालब हो गई जिसे महेश जी अपनी जीभ से चाट चाट कर साफ़ करने की नाकामयाब कोशिश कर रहे थे और कभी कभी तो वो मेरी छोटी सी योनि को साबुत ही अपने मुँह में भर कर इतनी जोर से चूस लेते कि मैं छटपटाने लगती और मेरे मुँह से ईइइइशशश… अआआहहहह… की जोर से आवाज निकल जाती।

महेश जी अपनी जीभ को मेरे दाने पर और योनि द्वार के चारो तरफ़ घुमा रहे थे जिससे मेरे रोम रोम सुलग उठा और मेरी योनि से पानी रिस रिस कर बाहर आने लगा।

उत्तेजना से मेरी हालत खराब हो रही थी इसलिये मैं जोर जोर से सिसकारियाँ भरने लगी। मैं चाह रही थी कि उनकी जीभ मेरी योनि में प्रवेश कर जाये और पहले की तरह ही वो अपनी जीभ से मेरी इस आग को शांत कर दें मगर महेश जी ऐसा नहीं चाहते थे वो तो जानबूझ कर मुझे तरसा रहे थे।

जब कभी महेश जी मेरी योनि के प्रवेश द्वार में हल्का सा डालते तो मेरे मुँह से इईशश..श… श… अआआ..ह…ह.. की आवाज निकल जाती और अपने आप मेरे कूल्हे ऊपर उठ जाते ताकि उनकी जीभ मेरी योनि में गहराई तक समा जाये मगर महेश जी तुरंत अपना मुँह मेरी योनि पर से हटा लेते और मुस्कुराने लगते।

कुछ देर ऐसे ही तड़फाने के बाद महेश जी ने मेरी योनि को छोड़ दिया और अपनी टी-शर्ट उतार कर मेरे ऊपर लेट गये।

कहानी जारी रहेगी।
 
महेश जी अपनी जीभ को मेरे दाने पर और योनि द्वार के चारो तरफ़ घुमा रहे थे जिससे मेरे रोम रोम सुलग उठा और मेरी योनि से पानी रिस रिस कर बाहर आने लगा।

उत्तेजना से मेरी हालत खराब हो रही थी इसलिये मैं जोर जोर से सिसकारियाँ भरने लगी।

मैं चाह रही थी कि उनकी जीभ मेरी योनि में प्रवेश कर जाये और पहले की तरह ही वो अपनी जीभ से मेरी इस आग को शांत कर दें

मगर महेश जी ऐसा नहीं चाहते थे वो तो जानबूझ कर मुझे तरसा रहे थे। जब कभी महेश जी मेरी योनि के प्रवेश द्वार में हल्का सा डालते तो मेरे मुँह से इईशश.. श… श… अआआ.. ह…ह.. की आवाज निकल जाती और अपने आप मेरे कूल्हे ऊपर उठ जाते ताकि उनकी जीभ मेरी योनि में गहराई तक समा जाये मगर महेश जी तुरंत अपना मुँह मेरी योनि पर से हटा लेते और मुस्कुराने लगते।

कुछ देर ऐसे ही तड़फाने के बाद महेश जी ने मेरी योनि को छोड़ दिया और अपनी टी-शर्ट उतार कर मेरे ऊपर लेट गये।

अब महेश जी बिल्कुल नंगे थे उनके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं था। महेश जी का भार 70-75 किलोग्राम से ज्यादा ही होगा और मेरा मुश्किल से 40 किलोग्राम था, उनके विशाल शरीर के नीचे मेरा नाजुक कली सा पूरा बदन ढक गया था पता नहीं कैसे मैं उनका भार सहन कर पा रही थी।

मेरा यह पहला अवसर था जब मेरा नंगा बदन किसी पुरुष के नंगे बदन का स्पर्श पा रहा था जो कि बड़ा ही सुखद था।

महेश जी की बालो से भरी नंगी छाती से मेरे छोटे छोटे उरोज दब रहे थे और उनके लिंग की गरमाहट को मैं अपनी योनि पर महसूस कर रही थी।

इसके बाद महेश जी मेरी गर्दन व गालों पर चुम्बन करने लगे और साथ ही अपने शरीर को भी आगे पीछे हिलाने लगे जिससे मुझे बहुत मजा आ रहा था क्योंकि उनकी नंगी छाती से मेरे उरोज मसले जा रहे थे और उनका गर्म लिंग मेरी योनि पर रगड़ खा रहा था।

मैं बस आँखें बँद करके सिसकारियाँ भर रही थी।

जब महेश जी क़ो लगा कि मैं पूरी तरह से मस्त हो गई हूँ तो महेश जी ने एक हाथ से मेरी गर्दन को थोड़ा सा ऊपर उठा कर मेरे होंठों को अपने मुँह में ले लिया और अपने घुटनों से मेरी जाँघें फैला कर दूसरे हाथ से अपने लिंग को मेरी योनि के प्रवेश द्वार पर लगा के एक जोर का झटका मारा जिससे उनके मोटे लिंग का एक चौथाई भाग मेरी छोटी सी योनि को चीरता हुआ अन्दर चला गया।

यह सब इतना अचानक हुआ कि मैं कुछ समझ ही नहीं पाई। मेरे मुँह से बस घुटी हुई उऊऊँऊँ ..ऊँ…ऊँ… हहुहु हुँहुँ.. हुँ…हुँ… उउउउ.. उ…उ…ह… की आवाज निकली व दर्द से मेरी आँखें बाहर उबल पड़ी, उनमें आँसू भर आये और मेरी योनि से खून का फव्वारा निकल पड़ा।

मुझे ऐसा लगा जैसे मेरी योनि में जबरदस्ती कोई मोटी लोहे की जलती हुई छड़ घुसा दी हो।

मेरे होंठ महेश जी के मुँह में थे इसलिये मेरा मुँह बँद था नहीं तो मेरे मुँह से इतनी जोर से चीख निकलती की सारे घरवाले जाग जाते। मैं बस उँहह..ह… उँघुँघुँ..घुँ… करके रह गई।

मेरी सारी उत्तेजना गायब हो गई और मैं दर्द से तड़पने लगी, मैंने महेश जी की कमर को दोनों हाथों से पकड़ लिया और उन्हें पीछे धकेलने लगी ताकि उनका लिंग मेरी योनि से बाहर निकल जाये मगर महेश जी ने अपनी कमर को छुड़वा लिया और मेरे दोनों हाथों की कलाइयों को मेरी गर्दन के पास अपने दोनों हाथों से इस तरह दबा लिया कि अब मैं ना तो अपने हाथ हिला सकती थी और ना ही अपनी गर्दन को हिला पा रही थी।

इसके बाद महेश जी ने अपने लिंग को थोड़ा सा बाहर खींच लिया जिससे मुझे कुछ राहत मिली मगर फिर से उन्होंने जोरदार झटका मारा।

अब की बार उनका आधे से ज्यादा लिंग मेरी योनि में चला गया, मैं दर्द से बिलबिलाने लगी और अपने आप को छुड़ाने का प्रयास करने लगी मगर सफल नहीं हो पा रही थी।

कुछ देर रुक कर फिर से उन्होंने लिंग को बाहर खींचा और एक बार फिर से जोरदार झटका मारा इस बार उनका पूरा लिंग मेरी योनि में समा गया।

मेरी आँखों के आगे अँधेरा सा छा गया और मैं दर्द से बुरी तरह तड़पने लगी।

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे महेश जी का लिंग मेरी योनि को चीरकर मेरे पेट तक पहुँच गया है और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी क्योंकि मेरे दोनों हाथों को महेश जी ने अपने हाथों से दबा रखा था जिनको मैं हिला भी नहीं पा रही थी और मेरे होंठ भी उनके मुँह में थे जिससे मैं चिल्ला भी नहीं सकती और अगर गर्दन को थोड़ा सा भी हिलाती तो महेश जी मेरे होंठों को दाँत से काट लेते जिससे भी मुझे बहुत दर्द हो रहा था।
 
मैं बिल्कुल विवश और लाचार हो गई, बस मेरे पैर ही आजाद थे जिनको मैं जोर जोर से बेड पर पटकने लगी।

इसके बाद महेश जी अपनी कमर को धीरे धीरे आगे पीछे हिलाने लगे जिससे उनका लिंग मेरी योनि में अन्दर बाहर होने लगा, जब उनका लिंग बाहर जाता तो मुझे कुछ राहत मिलती मगर जब वो अन्दर जाता तो मुझे ऐसा लगता कि जैसे उनका लिंग मेरी योनि व पेट को फाड़ कर पीछे मेरी कमर से बाहर निकल जायेगा।

दर्द के कारण मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैं कुछ बोल तो नहीं पा रही थी मगर अपनी गीली आँखों से महेश जी से अपने आप को छोड़ देने की भीख माँग रही थी और जोर जोर से अपने पैर बेड पर पटक रही थी!

मगर महेश जी पर ना तो मेरी आँसुओं से भरी आँखों का और ना ही मेरे पैर पटकने का कोई असर हो रहा था, वो तो बस मेरी योनि पर वार पर वार किये जा रहे थे, उनका एक एक वार मेरी योनि को तहस नहस कर रहा था और मैं दर्द से तड़प रही थी।

कुछ देर बाद असहनीय दर्द के कारण मेरा शरीर जैसे संज्ञा-शून्य सा हो गया क्योंकि मेरे पेट के नीचे के भाग पर मुझे कुछ भी महसूस नहीं हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे मेरी नाभि के नीचे कुछ है ही नहीं। मगर महेश जी लगातार धीरे धीरे धक्के लगाते रहे।

थोड़ी देर तक मैं ऐसे ही जड़ सी होकर पड़ी रही और अपने आप धीरे धीरे फिर से मेरे शरीर में चेतना आने लगी मगर अब मुझे इतना अधिक दर्द नहीं हो रहा था।

कुछ देर बाद तो मेरा दर्द गायब ही हो गया और धीरे धीरे दर्द की जगह आनन्द ने ले ली, मैं फिर से उत्तेजित हो गई, अब महेश जी के झटकों से मुझे दर्द नहीं हो रहा था बल्कि सुख मिल रहा था इसलिये मैंने अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और बिल्कुल शाँत सी हो गई।

महेश जी धक्के लगाते हुए मेरे होंठों को बुरी तरह चूस रहे थे। मेरे होंठों को महेश जी ने अपने मुँह में लेकर बँद कर रखा था मगर फिर भी उत्तेजना के कारण मेरे मुँह से उँहु…हुँ…हुँ.. उँह…हुँ…हुँ… उँह…हुँ…हुँ… की आवाज निकलने लगी।

कुछ देर बाद जब महेश जी को लगा कि मैं शांत हो गई हूँ तो उन्होंने मेरे हाथों को छोड़ दिया और एक हाथ से मेरे उरोजों को सहलाने लगे और मेरी गर्दन व गालों पर चुम्बन करने लगे।

अब मेरे होंठ और हाथ दोनों आजाद हो गये थे इसलिये मैंने अपने दोनों हाथों से महेश जी के कँधों को पकड़ लिया और अपने आप ही उत्तेजना के कारण मेरे मुँह से इईशश..श…श… अआआहहा.. हाँ…हाँ… इईशश..श…श… अआहहा.. हम्म…हाँ… की मादक सिसकारियाँ निकलने लगी जिससे महेश जी का जोश दोगुना हो गया और वो तेजी से धक्का लगाने लगे।

मेरी भी साँसें तेज हो गई और सिसकारियों की आवाज बढ़ गई।

सर्दी का मौसम था फिर भी हम दोनों के शरीर पसीने से पूरे गीले हो गये और साँसें उखड़ने लगी। पूरा कमरा मेरी सिसकारियों और हम दोनों की साँसों की आवाजों से गूंजने लगा।

धीरे धीरे मेरा मजा बढ़ता गया और कुछ देर बाद मेरे पूरे शरीर में आनन्द की एक लहर दौड़ गई, मेरे हाथ-पैर महेश जी की कमर से लिपट गये और मेरे कूल्हे अपने आप ऊपर उठ गये, मेरे मुँह से इईशश..श…श… अआहह..ह…ह… की जोर से आवाज निकली और मैं अपनी योनि से ढेर सारा पानी छोड़ते हुए शाँत हो गई।

कुछ देर बाद महेश जी भी चरम पर पहुँच गये उन्होंने मेरे शरीर को कश कर पकड़ लिया और अआह.प..आ… य…अ…ल.. इईशशश.. श…श… मेरी ज.आ..न… कहा और उनका लिंग ढेर सारा गर्म वीर्य मेरी योनि में उगलने लगा।

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरी योनि में कोई गर्म लावा फ़ूट पड़ा हो जो मेरी योनि से रिस कर मेरी गुदा छिद्र पर भी बहने लगा और वो शाँत हो गये।

अब पूरे कमरे में सन्नाटा सा छा गया था, बस हम दोनों की उखड़ी हुई साँसों की ही आवाज आ रही थी, ऐसा लग रहा था जैसे कमरे में कोई तूफान आ गया था और अब वो गुजर गया है।

कुछ देर महेश जी मेरे ऊपर ऐसे ही पड़े रहे और जब वो उठने लगे तो मेरा ध्यान उनके लिंग व जाँघों पर चला गया जिन पर खून लगा हुआ था।

कमरे में इतनी अधिक रोशनी तो नहीं थी मगर महेश जी की जाँघों और लिंग पर लगे खून को देखने के लिये पर्याप्त थी।

मैं तुरन्त अपनी योनि को देखने के लिये उठी तो मुझे योनि में बहुत पीड़ा महसूस हुई मगर मैं फिर भी उठ कर बैठ गई और अपनी योनि को देखने लगी।

मेरी योनि से अब भी खून और वीर्य रिस रिस कर बाहर आ रहा था और मेरी जाँघें व योनि खून से लथपथ थी, चादर पर भी काफ़ी खून गिरा हुआ था, इतना खून देखकर मैं घबरा गई।
 
मैं खड़ी होकर लाईट जलाने लगी तो असहनीय दर्द के कारण मेरी आँखों में फिर से आँसू भर आए और मैं बेड से नीचे गिर पड़ी।

महेश जी ने मुझे उठाया और गोद में उठा कर बाथरुम में ले गये, मेरी योनि व जाँघो को साफ किया और मुझे दर्द की एक दवा भी खिला दी।

इसके बाद महेश जी ने बिस्तर की चादर को बदली करके मुझे कम्बल औढ़ाकर सुला दिया और कुछ देर बाद मुझे नींद आ गई।

यह मेरा पहला सहवास था जो कि बहुत ही दर्द भरा मगर आन्नदायक भी था।

सुबह करीब ग्यारह बजे मेरी नींद खुली। वैसे भी छुट्टियाँ चल रही थी इसलिये मैं रोजाना ही देर तक सोती रहती थी, यह सोचकर किसी ने मुझे जगाया भी नहीं।

जब मैं उठी तो मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था और मेरे होंठ भी कुछ भारी भारी से लग रहे थे। जब बाथरुम जाने लगी तो मेरे पैर लड़खड़ाने लगे मेरी योनि तो इतना दर्द कर रही थी कि मैं ठीक से चल भी नहीं सकती थी।

बाहर भैया भाभी खड़े हुए थे, भैया ने पूछा- बड़ी देर तक सोती हो?

मैंने चेहरे पर झूठी मुस्कान लाकर कहा- वो भैया मेरी छुट्टियाँ चल रही है ना इसलिये!

और जल्दी से बाथरुम में घुस गई।

जब मैं शौच करने लगी तो मेरे योनि द्वार में इतनी जलन हुई कि मेरी आँखों से आँसू निकल आये क्योंकि रात को महेश जी के लिंग से मेरी योनि जख्मी हो गई थी और जब उसमें मेरा नमकीन पेशाब लग रहा था तो वो जलन करने लगा।

मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरे मूत्र द्वार से पेशाब नहीं बल्कि तेजाब निकल रहा है जो मेरी योनि को जला रहा है।

मैंने ठण्डे पानी से अपनी योनि को साफ किया तो कुछ राहत मिली। मैं बिना नहाये ही बाथरुम से बाहर आ गइ। भैया भाभी अब भी बाहर खड़े बाते कर रहे थे।

इस बार भाभी ने पूछा- क्या बात है? आज नहाई क्यों नहीं?

मैंने बताया- आज थोड़ी तबियत सी खराब है!

भाभी ने मुझे हाथ लगाकर देखा और कहा- अरे! तुम्हें तो तेज बुखार है! चलो, कुछ खा लो फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।

मैंने मना कर दिया और घर पर ही बुखार की दवा खाकर भैया भाभी के कमरे में ही सो गई। मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि मैंने यह क्या कर दिया। रात को मैं क्यों…!?!

इसके आगे की कहानी भी जल्दी लिखूँगी।
 
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