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सुबह करीब ग्यारह बजे मेरी नींद खुली वैसे भी छुट्टियाँ चल रही थीं इसलिये मैं रोजाना ही देर तक सोती रहती थी, यह सोचकर किसी ने मुझे जगाया भी नहीं। जब मैं उठी तो मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था और मेरे होंठ भी कुछ भारी-भारी से लग रहे थे। जब बाथरुम जाने के लिए बिस्तर से उठी तो मेरे पैर लड़खड़ाने लगे।
मेरी योनि तो इतना दर्द कर रही थी कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मैं अपनी जाँघें चौड़ी करके चल रही थी। बाहर भैया-भाभी खड़े हुए थे।
भैया ने पूछा- बड़ी देर तक सोती हो !
मैंने झूठी मुस्कान चेहरे पर लाकर कहा- वो मेरी छुट्टियाँ चल रही हैं ना इसलिए !
और जल्दी से बाथरुम में घुस गई। शुक्र था कि मैं साड़ी में थी, अगर मैं सलवार-सूट में होती तो भैया-भाभी को पता चल जाता कि मैं जाँघें चौड़ी करके चल रही हूँ और क्यों चल रही हूँ?
जब मैं शौच करने लगी तो मेरे योनि द्वार में इतनी जलन हुई कि मेरी आँखो से आँसू निकल आए क्योंकि रात को महेश जी के लिंग से मेरी योनि जख्मी हो गई थी और जब उसमें मेरा नमकीन पेशाब लग रहा था तो वो जलन करने लगा। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे योनि द्वार से पेशाब नहीं बल्कि तेजाब निकल रहा है, जो मेरी योनि को जला रहा है।
मैंने ठण्डे पानी से अपनी योनि को साफ किया तो कुछ राहत मिली। मैं बिना नहाए ही बाथरुम से बाहर आ गई। भैया-भाभी अब भी बाहर खड़े बातें कर रहे थे।
इस बार भाभी ने पूछा- क्या बात है आज नहाई क्यों नहीं?
मैंने बताया, “आज थोड़ी तबियत खराब है !”
भाभी ने मुझे हाथ लगाकर देखा और कहा- अरे ! तुम्हें तो तेज बुखार है, चलो कुछ खा लो फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।
मैंने मना कर दिया, और घर पर ही बुखार की दवा खाकर भैया-भाभी के कमरे में ही सो गई। मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि मैंने यह क्या कर दिया। रात को मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में सोई।
दो दिन तक मुझे बुखार रहा, मगर मैं भैया-भाभी और मम्मी-पापा के बार-बार कहने पर भी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं डर रही थी कहीं डॉक्टर को पता ना चल जाए कि मेरी तबियत कैसे खराब हुई है।
अब मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में ही रहने लगी। जब महेश जी घर पर नहीं रहते, तब ही ऊपर भैया-भाभी के कमरे में जाती और जब वो घर पर रहते तो मम्मी-पापा के कमरे से बिल्कुल भी बाहर नहीं निकलती थी। क्योंकि जब भी उन्हें मौका मिलता था, वो मेरे साथ कोई ना कोई छेड़खानी कर देते थे।
कभी मेरे उरोज दबा देते तो कभी मेरी योनि को मसल देते और कहते, “फिर कब मौका दे रही हो?
मेरा दिल करता कि उनका नाखूनों से मुँह नोच लूँ मगर खून का घूँट भर कर रह जाती, क्योंकि ऐसा करने से सबको पता चल जाता कि हमारे बीच क्या चल रहा है।
तीन हफ्ते इसी तरह निकल गए और एक दिन उनको मौका मिल ही गया। उस दिन भाभी भैया के साथ अपने मम्मी-पापा से मिलने मायके गई हुई थीं। पापा बैंक में कैशियर हैं इसलिए वो बैंक में थे, और महेश जी अपनी कम्पनी में थे। घर पर बस मैं और मम्मी ही थे।
मम्मी ने टीवी पर देवी-देवताओं की फिल्म लगा रखी थी, जो मुझे पसंद नहीं थी। इसलिए मैं ऊपर भैया-भाभी के कमरे जाकर टीवी देखने लगी। वैसे भी ऊपर कोई नहीं था, मगर पता नहीं इस बात की भनक महेश जी को कैसे लग गई। शायद भाभी ने बताया होगा कि वो मायके जा रही हैं।
मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि महेश जी इस समय भी घर आ सकते है। करीब डेढ़ बजे महेश जी घर आए और घर आते ही वो सीधे मेरे पास आ गए।
उन्हें देखते ही मैं घबरा गई और भागने लगी, मगर उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए कहने लगे,”तुम मुझसे इतना डरती क्यों हो?”
मैंने कहा- देखो मुझे जाने दो नहीं तो मैं शोर मचा दूँगी।
महेश जी ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाकर कहा- मचाओ, मेरा क्या है मुझे तो बस ये घर छोड़ कर ही जाना पड़ेगा, मगर तुम्हारी तो पूरे मोहल्ले में बदनामी हो जाएगी।
और जबरदस्ती मेरे गालों व गर्दन पर चूमने लगे। मैं डर गई, कहीं सच में ऐसा ना हो जाए इसलिए मैंने शोर तो नहीं मचाया। मगर अपने हाथों से उन्हें हटाने की कोशिश करने लगी।
अपने आप को छोड़ देने की विनती करने लगी। मगर महेश जी पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने सूट के ऊपर से ही मेरे एक उरोज को बेदर्दी से मसल दिया।
मेरी योनि तो इतना दर्द कर रही थी कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मैं अपनी जाँघें चौड़ी करके चल रही थी। बाहर भैया-भाभी खड़े हुए थे।
भैया ने पूछा- बड़ी देर तक सोती हो !
मैंने झूठी मुस्कान चेहरे पर लाकर कहा- वो मेरी छुट्टियाँ चल रही हैं ना इसलिए !
और जल्दी से बाथरुम में घुस गई। शुक्र था कि मैं साड़ी में थी, अगर मैं सलवार-सूट में होती तो भैया-भाभी को पता चल जाता कि मैं जाँघें चौड़ी करके चल रही हूँ और क्यों चल रही हूँ?
जब मैं शौच करने लगी तो मेरे योनि द्वार में इतनी जलन हुई कि मेरी आँखो से आँसू निकल आए क्योंकि रात को महेश जी के लिंग से मेरी योनि जख्मी हो गई थी और जब उसमें मेरा नमकीन पेशाब लग रहा था तो वो जलन करने लगा। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे योनि द्वार से पेशाब नहीं बल्कि तेजाब निकल रहा है, जो मेरी योनि को जला रहा है।
मैंने ठण्डे पानी से अपनी योनि को साफ किया तो कुछ राहत मिली। मैं बिना नहाए ही बाथरुम से बाहर आ गई। भैया-भाभी अब भी बाहर खड़े बातें कर रहे थे।
इस बार भाभी ने पूछा- क्या बात है आज नहाई क्यों नहीं?
मैंने बताया, “आज थोड़ी तबियत खराब है !”
भाभी ने मुझे हाथ लगाकर देखा और कहा- अरे ! तुम्हें तो तेज बुखार है, चलो कुछ खा लो फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।
मैंने मना कर दिया, और घर पर ही बुखार की दवा खाकर भैया-भाभी के कमरे में ही सो गई। मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि मैंने यह क्या कर दिया। रात को मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में सोई।
दो दिन तक मुझे बुखार रहा, मगर मैं भैया-भाभी और मम्मी-पापा के बार-बार कहने पर भी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं डर रही थी कहीं डॉक्टर को पता ना चल जाए कि मेरी तबियत कैसे खराब हुई है।
अब मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में ही रहने लगी। जब महेश जी घर पर नहीं रहते, तब ही ऊपर भैया-भाभी के कमरे में जाती और जब वो घर पर रहते तो मम्मी-पापा के कमरे से बिल्कुल भी बाहर नहीं निकलती थी। क्योंकि जब भी उन्हें मौका मिलता था, वो मेरे साथ कोई ना कोई छेड़खानी कर देते थे।
कभी मेरे उरोज दबा देते तो कभी मेरी योनि को मसल देते और कहते, “फिर कब मौका दे रही हो?
मेरा दिल करता कि उनका नाखूनों से मुँह नोच लूँ मगर खून का घूँट भर कर रह जाती, क्योंकि ऐसा करने से सबको पता चल जाता कि हमारे बीच क्या चल रहा है।
तीन हफ्ते इसी तरह निकल गए और एक दिन उनको मौका मिल ही गया। उस दिन भाभी भैया के साथ अपने मम्मी-पापा से मिलने मायके गई हुई थीं। पापा बैंक में कैशियर हैं इसलिए वो बैंक में थे, और महेश जी अपनी कम्पनी में थे। घर पर बस मैं और मम्मी ही थे।
मम्मी ने टीवी पर देवी-देवताओं की फिल्म लगा रखी थी, जो मुझे पसंद नहीं थी। इसलिए मैं ऊपर भैया-भाभी के कमरे जाकर टीवी देखने लगी। वैसे भी ऊपर कोई नहीं था, मगर पता नहीं इस बात की भनक महेश जी को कैसे लग गई। शायद भाभी ने बताया होगा कि वो मायके जा रही हैं।
मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि महेश जी इस समय भी घर आ सकते है। करीब डेढ़ बजे महेश जी घर आए और घर आते ही वो सीधे मेरे पास आ गए।
उन्हें देखते ही मैं घबरा गई और भागने लगी, मगर उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए कहने लगे,”तुम मुझसे इतना डरती क्यों हो?”
मैंने कहा- देखो मुझे जाने दो नहीं तो मैं शोर मचा दूँगी।
महेश जी ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाकर कहा- मचाओ, मेरा क्या है मुझे तो बस ये घर छोड़ कर ही जाना पड़ेगा, मगर तुम्हारी तो पूरे मोहल्ले में बदनामी हो जाएगी।
और जबरदस्ती मेरे गालों व गर्दन पर चूमने लगे। मैं डर गई, कहीं सच में ऐसा ना हो जाए इसलिए मैंने शोर तो नहीं मचाया। मगर अपने हाथों से उन्हें हटाने की कोशिश करने लगी।
अपने आप को छोड़ देने की विनती करने लगी। मगर महेश जी पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने सूट के ऊपर से ही मेरे एक उरोज को बेदर्दी से मसल दिया।