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मेरी आप बीती

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सुबह करीब ग्यारह बजे मेरी नींद खुली वैसे भी छुट्टियाँ चल रही थीं इसलिये मैं रोजाना ही देर तक सोती रहती थी, यह सोचकर किसी ने मुझे जगाया भी नहीं। जब मैं उठी तो मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था और मेरे होंठ भी कुछ भारी-भारी से लग रहे थे। जब बाथरुम जाने के लिए बिस्तर से उठी तो मेरे पैर लड़खड़ाने लगे।

मेरी योनि तो इतना दर्द कर रही थी कि मैं ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। मैं अपनी जाँघें चौड़ी करके चल रही थी। बाहर भैया-भाभी खड़े हुए थे।

भैया ने पूछा- बड़ी देर तक सोती हो !

मैंने झूठी मुस्कान चेहरे पर लाकर कहा- वो मेरी छुट्टियाँ चल रही हैं ना इसलिए !

और जल्दी से बाथरुम में घुस गई। शुक्र था कि मैं साड़ी में थी, अगर मैं सलवार-सूट में होती तो भैया-भाभी को पता चल जाता कि मैं जाँघें चौड़ी करके चल रही हूँ और क्यों चल रही हूँ?

जब मैं शौच करने लगी तो मेरे योनि द्वार में इतनी जलन हुई कि मेरी आँखो से आँसू निकल आए क्योंकि रात को महेश जी के लिंग से मेरी योनि जख्मी हो गई थी और जब उसमें मेरा नमकीन पेशाब लग रहा था तो वो जलन करने लगा। मुझे ऐसा लग रहा था, जैसे मेरे योनि द्वार से पेशाब नहीं बल्कि तेजाब निकल रहा है, जो मेरी योनि को जला रहा है।

मैंने ठण्डे पानी से अपनी योनि को साफ किया तो कुछ राहत मिली। मैं बिना नहाए ही बाथरुम से बाहर आ गई। भैया-भाभी अब भी बाहर खड़े बातें कर रहे थे।

इस बार भाभी ने पूछा- क्या बात है आज नहाई क्यों नहीं?

मैंने बताया, “आज थोड़ी तबियत खराब है !”

भाभी ने मुझे हाथ लगाकर देखा और कहा- अरे ! तुम्हें तो तेज बुखार है, चलो कुछ खा लो फिर डॉक्टर के पास चलते हैं।

मैंने मना कर दिया, और घर पर ही बुखार की दवा खाकर भैया-भाभी के कमरे में ही सो गई। मुझे अपने आप पर गुस्सा आ रहा था कि मैंने यह क्या कर दिया। रात को मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में सोई।

दो दिन तक मुझे बुखार रहा, मगर मैं भैया-भाभी और मम्मी-पापा के बार-बार कहने पर भी डॉक्टर के पास नहीं गई। मैं डर रही थी कहीं डॉक्टर को पता ना चल जाए कि मेरी तबियत कैसे खराब हुई है।

अब मैं नीचे मम्मी-पापा के कमरे में ही रहने लगी। जब महेश जी घर पर नहीं रहते, तब ही ऊपर भैया-भाभी के कमरे में जाती और जब वो घर पर रहते तो मम्मी-पापा के कमरे से बिल्कुल भी बाहर नहीं निकलती थी। क्योंकि जब भी उन्हें मौका मिलता था, वो मेरे साथ कोई ना कोई छेड़खानी कर देते थे।

कभी मेरे उरोज दबा देते तो कभी मेरी योनि को मसल देते और कहते, “फिर कब मौका दे रही हो?

मेरा दिल करता कि उनका नाखूनों से मुँह नोच लूँ मगर खून का घूँट भर कर रह जाती, क्योंकि ऐसा करने से सबको पता चल जाता कि हमारे बीच क्या चल रहा है।

तीन हफ्ते इसी तरह निकल गए और एक दिन उनको मौका मिल ही गया। उस दिन भाभी भैया के साथ अपने मम्मी-पापा से मिलने मायके गई हुई थीं। पापा बैंक में कैशियर हैं इसलिए वो बैंक में थे, और महेश जी अपनी कम्पनी में थे। घर पर बस मैं और मम्मी ही थे।

मम्मी ने टीवी पर देवी-देवताओं की फिल्म लगा रखी थी, जो मुझे पसंद नहीं थी। इसलिए मैं ऊपर भैया-भाभी के कमरे जाकर टीवी देखने लगी। वैसे भी ऊपर कोई नहीं था, मगर पता नहीं इस बात की भनक महेश जी को कैसे लग गई। शायद भाभी ने बताया होगा कि वो मायके जा रही हैं।

मुझे जरा सा भी अंदाजा नहीं था कि महेश जी इस समय भी घर आ सकते है। करीब डेढ़ बजे महेश जी घर आए और घर आते ही वो सीधे मेरे पास आ गए।

उन्हें देखते ही मैं घबरा गई और भागने लगी, मगर उन्होंने मुझे पकड़ लिया और मुस्कुराते हुए कहने लगे,”तुम मुझसे इतना डरती क्यों हो?”

मैंने कहा- देखो मुझे जाने दो नहीं तो मैं शोर मचा दूँगी।

महेश जी ने अपने चेहरे पर कुटिल मुस्कान लाकर कहा- मचाओ, मेरा क्या है मुझे तो बस ये घर छोड़ कर ही जाना पड़ेगा, मगर तुम्हारी तो पूरे मोहल्ले में बदनामी हो जाएगी।

और जबरदस्ती मेरे गालों व गर्दन पर चूमने लगे। मैं डर गई, कहीं सच में ऐसा ना हो जाए इसलिए मैंने शोर तो नहीं मचाया। मगर अपने हाथों से उन्हें हटाने की कोशिश करने लगी।

अपने आप को छोड़ देने की विनती करने लगी। मगर महेश जी पर कोई असर नहीं हुआ और उन्होंने सूट के ऊपर से ही मेरे एक उरोज को बेदर्दी से मसल दिया।
 
मैं दर्द से कराह उठी और उनकी छाती में अपनी सारी ताकत से धक्का मार दिया, जिससे वो गिरते-गिरते रह गए और मैं दरवाजे की तरफ भागी, मगर महेश जी ने मुझे दरवाजे के पास ही पकड़ लिया और दरवाजा बँद करके कुण्डी लगा दी।

मुझे दीवार से सटा कर फिर से मेरी गर्दन व गालों पर चूमने लगे, वो मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लेते और कभी मेरे उरोजों को दबा देते।

मैं अपने घुटनों पर बैठ गई और उनसे बार-बार छोड़ने और जाने की विनती करने लगी। मैं उन्हें हटाने के लिए उनके सर के बाल खींचने लगी।

मगर तभी उन्होंने मेरी सलवार का नाड़ा खींच दिया और नाड़ा खुलते ही सलवार मेरे पैरों में गिर गई। मैंने नीचे पैन्टी भी नहीं पहन रखी थी। इसलिए जल्दी से महेश जी के सर के बालों को छोड़ कर मैंने दोनों हाथों से अपनी योनि को छुपा लिया और उनसे विनती करने लगी, “प्लीज मुझे छोड़ दो…प्लीज मुझे जाने दो..”

अब महेश जी बिल्कुल आजाद थे, क्योंकि मेरे दोनों हाथ अपनी योनि को छुपाने में व्यस्त थे।

उन्होंने मुझे खींच कर बेड पर गिरा दिया।

मैं बेड पर गिरी तो मेरे पैर बेड से नीचे लटकते रह गए, जिनमें मेरी सलवार फंसी हुई थी। महेश जी ने मेरी सलवार को एक पैर से दबा लिया और झुक कर मेरी जाँघों को चूमने लगे। यह कहानी आप अन्तर्वासना डॉट कॉम पर पढ़ रहे हैं।

मेरी सलवार मेरे पैरों में फंसी हुई थी, इसलिए मैं अपने पैरों को हिला भी नहीं पा रही थी और मैंने दोनों हाथों से अपनी योनि को छुपा कर जाँघों को पूरी ताकत से भींच रखा था। इसलिए मैं अपने हाथ भी नहीं हिला सकती थी।

महेश जी धीरे-धीरे मेरी जाँघों को चूमते हुए ऊपर की तरफ बढने लगे। उन्होंने मरी जाँघों को चौड़ी करके मेरे हाथों को योनि पर से हटाने की कोशिश तो की, मगर मैंने ना तो अपनी जाँघें चौड़ी कीं और ना ही अपने हाथ योनि पर से हटाए।

इसलिए वो मेरा सूट ऊपर खिसका कर एक हाथ से मेरे उरोजों को सहलाने लगे। धीरे-धीरे मेरी जाँघों व पेट को चूमते हुए महेश जी मेरे ऊपर लेट गए। जिससे वो मेरे उरोजों तक पहुँच गए और मेरे एक उरोज को अपने मुँह में भरकर चूसने लगे।

अब तो मुझे भी कुछ-कुछ होने लगा था। मेरी साँसें फूलने लगी, मुँह से धीरे-धीरे सिसकारियाँ निकलने लगीं और मेरी योनि से निकलने वाली नमी को मैं हाथों पर महसूस करने लगी थी।

मगर फिर भी मैं उनका विरोध कर रही थी। मैंने हाथों को अपनी जाँघों के बीच से निकाल कर महेश जी को अपने ऊपर से हटाने लगी, जिससे उनके मुँह से मेरा उरोज निकल गया।

मगर तभी उन्होंने मेरे हाथों की कलाइयों को पकड़ लिया और अपने दोनों पैर मेरे दोनों घुटने के बीच फँसा दिए, जिससे मेरी जाँघें थोड़ा खुल गई।

अब महेश जी पीछे खिसक कर मेरी योनि के पास आ गए और अपना मुँह मेरी योनि पर सटा दिया। ना चाहते हुए भी मेरे मुँह से, “इईशशश..श…श…अआ..आ…ह…” की आवाज निकल गई।

धीरे-धीरे महेश जी की जीभ मेरी योनि पर हरकत करने करने लगी। वो कभी जीभ से मेरे दाने को सहलाते तो कभी योनि द्वार के चारों तरफ जीभ घुमा देते।

मेरी योनि से पानी आने लगा और मुझे मेरी योनि में चिंगारियाँ सी सुलगती महसूस होने लगीं। ऐसा लग रहा था जैसे महेश जी अपनी जीभ से कोई करेंट मेरी योनि में छोड़ रहे हैं, जो उनकी जीभ से निकल कर मेरी योनि से होता हुआ, मेरे पूरे शरीर में दौड़ रहा हो।

मेरा विरोध कम हो गया और वैसे भी मैं विरोध करते-करते थक गई थी। इसलिए मैंने विरोध करना बंद कर दिया और शरीर को ढीला छोड़ दिया।

मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और समर्पण कर दिया। बस मेरे मुँह से सिसकारियों के साथ ‘ईशश… ऊहह… पलईज… ईशश… मउझए… छओड़… दओह… ईशश…श…बस… कअ रओनआ…’ की आवाजें निकल रही थीं।

जैसे ही मैंने अपने शरीर को ढीला छोड़ा, महेश जी ने मेरे हाथों को छोड़ दिया और दोनों हाथों को मेरी जाँघों के बीच डाल कर उन्हें थोड़ा और अधिक फैला दिया। जिसका मैंने कोई विरोध नहीं किया।

उनका पूरा सर मेरी जाँघों के बीच समा गया और उनकी जीभ अब आसानी से मेरे योनि व गुदा द्वार पर भी पहुँच पा रही थी।

उत्तेजना से मेरी बुरी हालत होने लगी और मेरी योनि से तो पानी की जैसे बाढ़ ही आ गई। मेरी योनि से निकला पानी चादर को भी गीला करने लगा था।

और अचानक महेश जी ने अपनी जीभ को मेरे योनि छिद्र में घुसा दिया। मेरे मुँह से बहुत जोर से ‘अ…आ…ह…अ…उ…च…” की आवाज निकल गई और मैंने अपनी जाँघों से उनके सर को भींच लिया।

महेश जी ने मेरी बगल में रखे रिमोट को उठाकर टीवी की आवाज को तेज कर दिया और मेरी जाँघों को फैला कर फिर से अपनी अपनी जीभ को मेरे योनि द्वार में घुमाने लगे।

शायद महेश जी को भी डर था कि मेरी आवाज नीचे मेरी मम्मी तक ना पहुँच जाए। मगर मेरी मम्मी ने तो शायद कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि ऊपर महेश जी मेरे साथ ये सब भी कर रहे होंगे।
 
महेश जी ने जीभ की हरकत को बढ़ा दिया। अब वो जीभ को मेरे योनि द्वार के अंदर-बाहर करने लगे और मेरी सिसकारियाँ तेज हो गईं।

उत्तेजना के कारण मैं भी अपने कूल्हे ऊपर-नीचे उचकाने लगी और पता नहीं कब मेरे हाथ उनके सर पर पहुँच गए, मैं उनके सर को अपनी योनि पर दबाने लगी और जोर-जोर से सीत्कार करने लगी।

मैं बस चरम पर पहुँचने ही वाली थी कि महेश जी ने अपना मुँह मेरी योनि पर से हटा लिया। मैं उन्हें पकड़ने की कोशिश करने लगी। क्योंकि उत्तेजना के कारण मैं जल रही थी, और मेरा बदन तो भट्टी की तरह तपता हुआ महसूस हो रहा था। इसलिए मैं जल्दी से जल्दी अपनी मंजिल पर पहुँच कर अपनी योनि में लगी आग को शाँत करना चाहती थी।

मगर महेश जी खड़े हो गए। कुछ देर तक कोई भी हरकत ना होने पर मैं झुँझलाहट से आँखें खोलकर महेश जी को देखने लगी। महेश जी बिल्कुल नँगे मेरे सामने खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनके शरीर पर कपड़े का एक तार भी नहीं था और उनका करीब छः इन्च लम्बा काला लिंग उनकी नाभि को छू रहा था।

मुझे शर्म आने लगी, इसलिए फिर से मैंने अपनी आँखे बँद कर लीं। महेश जी ने मेरे पैरों में फँसी सलवार को निकाल कर अलग कर दिया और मेरी कमर के नीचे हाथ डालकर मुझे बेड के बीच में ले आए।

इसके बाद मेरे साथ क्या होने वाला है और उसमें होने वाले पीड़ा का भी मुझे अहसास था, इसलिए मुझे डर भी लग रहा था। मगर फिर भी पता नहीं क्यों मैं ऐसे ही पड़ी रही जबकि अब तो मैं बिल्कुल आजाद भी थी।

महेश जी मेरी जाँघों को चौड़ा करके उनके बीच घुटनों के बल बैठ गए और एक हाथ से अपना लिंग पकड़ कर मेरी योनि पर रगड़ने लगे।

पानी निकलने से मेरी योनि इतनी गीली हो गई थी कि आसानी से उनका लिंग मेरी योनि पर फिसल रहा था।

मैं पहले ही काफी उत्तेजित और डरी हुई भी थी। मगर अब तो महेश जी के गर्म लिंग का स्पर्श अपनी योनि पर पाकर मेरे हाथ पैर काँपने लगे और अब भी मेरे मुँह से उत्तेजना के कारण, ‘इईश…श… प..अ…ल…ई…ज… म..उ…झ..ऐ… छ..ओ…ड़…द..ओ…ह…’ निकल रहा था।

और अचानक महेश जी ने अपने लिंग को मेरे योनि द्वार पर रखा और एक जोर का झटका मारते हुए मेरे ऊपर लेट गए।

इससे उनका आधे से ज्यादा लिंग मेरी योनि मे समा गया।

मैं दर्द के कारण चीख पड़ी ‘अ.आ..आ…आ…आ…ह… आ…उ…च…’ और छटपटाने लगी।

अगर दरवाजा बंद ना होता और टीवी की आवाज इतनी तेज ना होती तो शायद मेरे चीखने की आवाज मम्मी तक पहुँच जाती।

तभी जल्दी से महेश जी ने एक हाथ से मेरा मुँह दबा लिया और मेरे गालों पर चुम्बन करते हुए अपना लिंग थोड़ा सा बाहर खींच कर एक जोर का धक्का और मारा। इस बार उनका पूरा लिंग मेरी योनि में समा गया।

यह सब महेश जी ने अचानक और इतनी जल्दी से किया कि मैं कुछ समझ ही नहीं पाई। मैंने अपने दोनों हाथों से महेश जी की कमर को पकड़ लिया और मुँह से ‘उउउई उऊऊऊ.ऊँ..ऊँ…ऊँ… गुँ..गुँ… गुँ…’ की आवाज करने लगी।

महेश जी ने अपने हाथ से मेरा मुँह दबा रखा था इसलिए मैं कुछ बोल तो नहीं पा रही थी। मगर दर्द के कारण मेरी आँखों में आँसू भर आए। कुछ देर तक महेश जी बिना कोई हरकत किए ऐसे ही मेरे ऊपर पड़े रहे।

जब मैं कुछ शाँत हुई तो उन्होंने मेरे मुँह पर से अपना हाथ हटा लिया और अपने दोनों हाथों से मेरे आँसू पौंछ कर गालों पर चूमने लगे।

महेश जी का हाथ मेरे मुँह से हटते ही मैं रोते हुए उनसे अपने आप को छोड़ देने की विनती करने लगी, “आह… बहुत दर्द हो रहा है… प्लीज मुझे छोड़ दो… अब बस करो… मैं मर जाऊँगी… प्लीज मुझे जाने दो…”

मगर महेश जी ने मेरे हाथों को पकड़ कर बेड से सटा दिया और मेरी गर्दन पर चुम्बन करते हुए कहा- बस जान, अब तो हो गया, बस अब और दर्द नहीं होगा।

मगर मुझे अब भी दर्द हो रहा था। ऐसा लग रहा था जैसे कोई गर्म मोटा लोहे का डण्डा मेरी योनि में घुसा रखा हो।

इसके बाद महेश जी धीरे-धीरे धक्के लगाने लगे और मैं अब भी कराहते हुए उनसे ‘आ..आ…ह…ह… बस करो… आ..आ…ह… प्लीज मुझे छोड़ दो…’ कह रही थी।

मगर महेश जी लगातार धक्के लगाते रहे। धीरे-धीरे मेरा दर्द कम होने लगा, और कुछ देर बाद तो मेरा दर्द बिल्कुल गायब ही हो गया और मुझे भी मजा आने लगा, इसलिए मैंने अपने घुटने मोड़ लिए और जाँघों को पूरी तरह से फैला दिया।

मेरे कराहने की आवाज सिसकारियों में बदल गई और मैं भी मजे से धीरे-धीरे अपने कूल्हों को उचकाने लगी।

इसके बाद महेश जी ने भी मेरे हाथों को छोड़ दिया और अपने एक हाथ से मेरे उरोजों को सहलाने लगे। मेरे हाथ आजाद होते ही अपने आप महेश जी की पीठ पर चले गए और मैं उनकी पीठ को सहलाने लगी।

धीरे-धीरे महेश जी ने गति पकड़ ली और वो तेजी से धक्का लगाने लगे। मेरी भी सिसकारियाँ तेज हो गईं और मैं भी उत्तेजना के कारण तेजी से अपने कूल्हे उचका-उचका कर महेश जी का साथ देने लगी।

 
जब महेश जी धक्का लगाते तो उनकी जाँघें मेरी जाँघों से टकरा जाती जिससे ‘पट-पट’ की आवाज निकल रही थीं, और अब तो मैं भी नीचे से धक्के लगा रही थी।

इसलिए पूरा कमरा मेरी सिसकारियों और ‘पट-पट’ की आवाजों से गूंजने लगा। ऐसा लग रहा था, जैसे हम दोनों में एक-दूसरे को हराकर पहले चरम पर पहुँचने की होड़ लगी हो।

क्योंकि जितनी तेजी और जल्दी से महेश जी धक्का लगाते उतनी ही तेजी और जल्दी से मैं भी अपने कूल्हों को ऊपर नीचे कर रही थी। उत्तेजना से मैं पागल सी हो गई।

महेश जी ने मेरे ऊपर के होंठ को अपने मुँह में भर लिया और चूसने लगे। उत्तेजना के कारण पता नहीं कब, उनका नीचे का होंठ मेरे मुँह में आ गया जिसे मैं भी चूसने लगी।

हम दोनों के शरीर पसीने से भीग गए और साँसें उखड़ने लगी। मेरे मुँह पर महेश जी का मुँह था फिर भी मैं उत्तेजना में, जोर-जोर से सिसकारियाँ भर रही थी।

कुछ देर बाद ही अपने आप मेरे हाथ महेश जी की पीठ से और पैर उनकी कमर से लिपटते चले गए, मेरे मुँह में महेश जी का होंठ था जिसको मैंने उत्तेजना के कारण इतनी जोर से चूस लिया कि मेरे दाँत उनके होंठ में चुभ गए और उसमें से खून निकल आए।

पूरे शरीर में आनन्द की एक लहर दौड़ गई और मैं महेश जी के शरीर से किसी बेल की तरह लिपट गई। एकदम से सीत्कार करते हुए शाँत हो गई और मेरी योनि ने ढेर सारा पानी छोड़ दिया।

इसके बाद महेश जी ने भी मेरे शरीर को कस कर भींच लिया और उनके लिंग से रह-रह कर निकलने वाले गर्म वीर्य को अपनी योनि में महसूस करने लगी। जो मेरी योनि से निकल कर मेरी जाँघों पर भी बहने लगा। और वो निढाल होकर मेरे ऊपर गिर गए।

कुछ देर तक वो ऐसे ही मेरे ऊपर पड़े रहे और फिर उठ कर अपने कपड़े पहनने लगे। मगर मैं ऐसे ही शाँत भाव से पड़ी रही और महेश जी को कपड़े पहनते देखती रही। कपड़े पहन कर महेश जी कमरे से बाहर निकल गए।

महेश जी के जाने के बाद टीवी को बन्द करने के लिए मैं रिमोट देखने लगी, तो मुझे अपने कूल्हों के नीचे कुछ गीला-गीला व चिपचिपा सा महसूस हुआ।

मैंने देखा तो चादर पर मेरी योनि से निकला पानी और महेश जी का वीर्य पड़ा हुआ था। कहीं कोइ देख ना ले ये सोचकर मैं घबरा गई इसलिए मैंने जल्दी से चादर को बदल दिया और टीवी को भी बंद कर दिया। धुलाई के लिए मैंने उस चादर को उठा लिया, मगर नीचे से मैं नंगी थी इसलिए मैंने उस चादर को ही अपने शरीर से लपेट लिया और अपनी सलवार उठा कर जल्दी से बाथरूम में घुस गई।

जब मैंने बाथरूम के दरवाजे को बंद करके कुण्डी लगा ली, तब जाकर चैन की साँस ली और मेरा डर कम हुआ। मैंने चादर को खोल कर नीचे डाल दिया व आदत के अनुसार अपने सारे कपड़े उतार कर बाथरुम में लगे शीशे के सामने जाकर नंगी खड़ी हो गई और खुद के शरीर को देखने लगी।

मेरे शरीर पर काफी जगह महेश जी के पकड़ने से उनकी उँगलियों के निशान बने हुए थे और पेट के नीचे का योनि क्षेत्र व मेरी जाँघें तो बिल्कुल लाल हो गई थीं।

मेरी योनि से अब भी महेश जी का वीर्य एक लम्बी लार की तरह रिस कर मेरी जाँघों पर बह रहा था, जिसमें थोड़ा सा मेरी योनि का खून भी मिला हुआ था।

इसके बाद मैंने उस चादर की धुलाई की और नहाकर अपने कपड़े पहन कर बाहर आ गई। बाथरुम से बाहर निकलते ही मैं सीधे नीचे मम्मी के पास चली गई।

मम्मी अब भी टीवी पर वो ही फिल्म देख रही थीं। मुझे उन पर गुस्सा आ रहा था, क्योंकि ऊपर मेरे साथ इतना कुछ हो गया और गया। उनको इस फिल्म से ही फुर्सत नहीं है।

इसके बाद तो मैंने ऊपर जाना बिल्कुल ही बंद कर दिया चाहे ऊपर कोई हो या ना हो। मैं कभी भी ऊपर नहीं जाती थी।

इसी तरह एक सप्ताह बीत गया, भैया की छुट्टियाँ खत्म हो गईं और भैया चले गए। भैया के जाने के बाद भाभी और मम्मी-पापा के दबाव के कारण मैं ऊपर भाभी के कमरे में सोने लगी और इसका फायदा महेश जी को मिला।

एक दिन मैं किचन में खाना बना रही थी महेश जी उस दिन जल्दी आये थे मुझे ढूंढते हुये वह किचन में आगये और पीछे से मुझे पकड़कर मेरे स्तन जोर जोर से दबाने लगे मैं बहोत डर गई और उन्हें मना करने लगी पर वह सुन ही नही रहे थे तब किचन के दरवाजे पर पैरो की आहट हुई मैने झटके में अपने आप को छुड़ा लिया और घूम कर हात में पकड़ा हुआ बेलन पूरी ताकत से उनके सर पर दे मारा उनके सर से खून की धारा बहने लगी वह सर पकड़ कर अविस्वास से मुझे देख रहे थे मैंने उनके मुँह पर थुक दीया और कहा हरामजादे मैं तुझसे सिर्फ नफरत करती हूं अब ज्यादा आगे बढ़ा तो तुझ पर बलात्कार का केस डालकर अंदर कर दूंगी चाहे मेरा कुछ भी हों कमीने फिर मुझे अपना मनहूस मुँह मत दिखाना भाग यहा से वर्ना सब के सामने तेरी करतूतों की पोल खोल दूँगी मेरे हाथ से मार और गालिया खाकर पूरी तरह अपमानित होकर वह किचन से बाहर गया किचन के बाहर मेरी माँ ने सब सुन लिया था पर वह सामने नही आई क्यों कि जो मेरे साथ हुआ था इनमें उनकी भी गलती थी उसी दिन कोई बहाना बनाकर महेश जी चले गए फिर कभी मेरे सामने नही आये दोस्तो सेक्स प्यार से ही तो मजा देता है बलात्कार में किसीको मजा नही आता

 


भैया से भी चुद गई


महेश जी के जाने के बाद मैं घर में आजादी सी महसूस करने लगी।

कुछ दिनों के बाद भैया का तबादला ग्वालियर में हो गया, वहाँ पर उनको सरकारी क्वार्टर भी मिल गया.. इसलिए वो भाभी को साथ लेकर जाना चाहते थे और तब तक मेरा रिजल्ट भी आ गया था.. इसलिए पापा के कहने पर भैया ने मेरा एडमीशन भी ग्वालियर में ही बीएससी में करवा दिया।

भैया को जो सरकारी र्क्वाटर मिला.. उसमें एक छोटा सा डाइनिंग हॉल, किचन, लैट.. बाथ और दो ही कमरे थे.. जिनमें से एक कमरा भैया भाभी ने ले लिया और दूसरे में मैं रहने लगी।

कुछ दिनों तक तो नया शहर था इसलिए मेरा दिल नहीं लगा.. मगर धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया।

मैं खाना खाकर सुबह दस साढ़े बजे कॉलेज चली जाती और शाम को चार बजे तक घर लौटती थी.. उसके बाद कुछ देर टीवी देखती और फिर फ्रेश होकर रात का खाना बनाने में भाभी का हाथ बंटाती थी।

उसके बाद खाना खाकर रात कुछ देर पढ़ाई करती और फिर सो जाती।

धीरे-धीरे कॉलेज में कुछ लड़कियों से दोस्ती भी हो गई.. मगर कभी लड़कों से दोस्ती करने की मेरी हिम्मत नहीं हुई।

एक रात मैं पढ़ाई कर रही थी.. तो मुझे ‘इईशश.. श… श.. अआआह.. ह…ह.. इईशश.. श…श.. अआआह.. ह…ह..’ की आवाज सुनाई दी।

मुझे समझते देर नहीं लगी कि यह आवाज किसकी है और कहाँ से आ रही है।

अपने आप ही मेरे कदम भैया-भाभी के कमरे की तरफ उठने लगे।

उनके कमरे का दरवाजा अन्दर से बन्द था और लाईट जल रही थी। मैं जल्दी से कोई ऐसी जगह देखने लगी.. जहाँ से अन्दर का नजारा देख सकूँ.. मगर काफी देर तक तलाश करने के बाद भी मुझे कोई भी ऐसी जगह नहीं मिली.. इसलिए मैं दरवाजे से ही अपना कान सटाकर अन्दर की आवाजें सुनने लगी।

अब भाभी की सिसकियों की आवाज तेज हो गई थी.. जिन्हें सुनकर मुझे भी अपनी जाँघों के बीच गीलापन महसूस होने लगा था। कुछ देर बाद भाभी की सिसकियाँ ‘आहों और कराहों’ में बदल गईं.. और वे शान्त हो गईं।

मैं समझ गई कि उनका काम हो गया है और कभी भी दरवाजा खुल सकता है.. इसलिए मैं जल्दी से अपने कमरे में आकर सो गई.. मगर अब नींद कहाँ आने वाली थी।

उत्तेजना से मेरा बदन जल रहा था और मेरी योनि तो जैसे सुलग ही रही थी।

अपने आप मेरा हाथ योनि पर चला गया वैसे मुझे उंगली से अपना काम किए बहुत दिन हो गए थे।

जब से महेश जी मुझसे यौन सम्बन्ध बनाने लगे थे.. मैंने उंगली से मैथुन करना छोड़ दिया था.. क्योंकि उस समय मैं इतनी डरी रहती थी कि इन सब बातों के बारे में सोचने का ध्यान ही नहीं रहता था और वैसे भी मेरी वासना शान्त हो जाती थी।

मगर आज भैया-भाभी की उत्तेजक आवाजें सुनने के बाद मैं इतनी उत्तेजित हो गई थी कि मैं उंगली से अपनी उत्तेजना को शान्त किए बिना नहीं रह सकी।

इसी तरह मैंने बहुत सी बार भैया-भाभी के कमरे में इस तरह की आवाजों को सुना और जब दिल करता तो उंगली से अपनी वासना को शान्त कर लेती थी।

इसी तरह से दो साल बीत गए और मैं बीएससी फाईनल में पहुँच गई।

मगर इन दो सालों में मेरे शरीर और रंग रूप में काफी परिर्वतन आ गया, मेरा रंग पहले से भी अधिक निखर गया और शरीर भर गया, मेरी बगलों में बाल उग आए और मेरी योनि तो अब गहरे काले बालों से भर गई थी.. जिन्हें मौका लगने पर कभी-कभी मैं हेयर रिमूवर से साफ कर लिया करती थी।

मेरे उरोज इतने बड़े हो गए थे कि उन्हें सम्भालने के लिए अब मुझे ब्रा पहननी पड़ती थी और अब तो मुझे भाभी के कपड़े भी बिल्कुल फिट आने लगे थे।

अपनी आदत के अनुसार जब मैं सारे कपड़े उतार कर शीशे में अपने नंगे शरीर को देखती तो सम्मोहित सी हो जाती, बिल्कुल दूध जैसा सफेद रंग.. गोल चेहरा.. सुर्ख गुलाबी होंठ, बड़ी-बड़ी काली आँखें.. पतली और लम्बी सुराहीदार गर्दन.. काले घने लम्बे बाल.. जो कि अब मेरे कूल्हों तक पहुँचते थे।

बड़े-बड़े सख्त उरोज और उन पर गुलाबी निप्पल सामने वाले को चुनौती देते से लगते थे।

मेरी पतली कमर.. गहरी नाभि..पुष्ट और भरे हुए बड़े-बड़े नितम्ब.. केले के तने सी चिकनी व मुलायम जाँघें.. दोनों जाँघों के बीच गुलाबी रंगत लिए फूली हुई योनि।

मेरा शरीर कद काठी में तो भाभी के समान ही था.. मगर रंग-रूप और सुन्दरता में अब मैं भाभी पर भारी पड़ने लगी थी।

जब मैं बन-सँवर कर कॉलेज जाती.. तो लड़के ‘आहें..’ भरने लगते और मैं अपने आप पर इतराने लगती थी।

एक दिन घर से पापा का फोन आया। पापा ने बताया कि मम्मी सीढ़ियों पर फिसल कर गिर गई हैं.. जिससे उनके हाथ की हड्डी टूट गई और सर पर भी चोट आई है।

भैया ने उसी दिन एक हफ्ते की छुट्टी ले ली और हम सब घर चले गए।
 
घर जाकर देखा तो मम्मी के हाथ पर प्लास्टर लगा हुआ था और सर पर भी पट्टी बँधी हुई थी। भैया के पूछने पर मम्मी ने बताया- बारिश के कारण सीढ़ियाँ गीली हो गई थीं.. और जब वो किसी काम से ऊपर जाने लगीं.. तो पैर फिसल जाने से गिर गईं।

अब मम्मी तो कोई काम कर नहीं सकती थीं.. इसलिए घर के सारे काम मुझे और भाभी को ही करने पड़ते थे। एक हफ्ता बीत गया और भैया की छुट्टियाँ समाप्त हो गईं।

भैया अकेले ही ग्वालियर जाने के लिए तैयार हो गए.. मगर पापा ने कहा- तुम्हारी मम्मी को तो ठीक होने में दो महीने लग जाएंगे। तुम अकेले कैसे रहोगे तुम्हें घर के काम की और खाने की परेशानी होगी। तुम पायल को यहीं पर छोड़ दो और बहू को अपने साथ ले जाओ।

मगर भाभी ने मना कर दिया और कहा- मैं यहाँ रह जाती हूँ.. और पायल को जाने दो.. नहीं तो दो महीने कॉलेज ना जाने पर उसकी पढ़ाई खराब हो जाएगी।

इस पर पापा ने भी सहमति दे दी।

मेरा अकेले जाने का दिल तो नहीं कर रहा था.. मगर अपनी पढ़ाई के कारण मुझे भैया के साथ ग्वालियर आना पड़ा।

शुरूआत में तो अकेले का मेरा दिल नहीं लगता था.. क्योंकि घर के इतने सारे काम अकेले करना और कॉलेज भी जाना मेरे लिए कठिन हो रहा था.. मगर धीरे-धीरे आदत सी बन गई।

मैं सुबह जल्दी उठ जाती और घर के सारे काम खत्म करके भैया के लिए दोपहर तक का खाना सुबह ही बनाकर रख देती थी।

उसके बाद मैं कॉलेज चली जाती और शाम चार साढ़े चार बजे तक कॉलेज से लौटती थी।

घर आकर मैं कुछ देर टीवी देखती और फिर नहाकर रात का खाना बनाने लग जाती।

भैया भी शाम साढ़े छः सात बजे तक घर आ जाते थे।

रात का खाना मैं और भैया साथ ही खाते और उसके बाद मैं कुछ देर अपने कमरे में पढ़ाई करती और सो जाती थी।

इस तरह कुछ दिन बीत गए।

बारिश का मौसम था.. इसलिए हफ्ते भर से लगातार बारिश हो रही थी.. जिस कारण एक भी कपड़ा सूख नहीं रहा था और दो दिन से बिजली (लाईट) भी खराब थी। रात को मोमबत्ती की रोशनी से ही काम चलता था।

मेरे कपड़े ना सूखने के कारण मैं ब्रा और पैन्टी तो पहले से ही भाभी के पहन रही थी.. मगर एक दिन तो शाम को जब मैं नहाने लगी तो मेरे पास नहाकर पहनने के लिए एक भी कपड़ा नहीं था।

मैंने जो कपड़े पहन रखे थे बस वो ही सूखे थे.. इसलिए मैंने उनको अगले दिन कॉलेज में पहन कर जाने के लिए निकाल कर रख दिए और नहाकर अन्दर बिना कुछ पहने ही भाभी की नाईटी पहन ली।

वैसे भी एक तो बिजली नहीं थी.. ऊपर से रात में कौन देख रहा था। इसके बाद मैं खाना बनाने लग गई.. मगर तभी भैया ने फोन करके बताया- मैं एक पार्टी में हूँ.. मुझे आने में देर हो जाएगी.. और मैं खाना भी खाकर ही आऊँगा।

अब तो मुझे बस मेरे लिए ही खाना बनाना था.. इसलिए मैंने थोड़ा सा खाना बनाकर खा लिया।

बिजली खराब थी और मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ाई कर नहीं सकती थी.. इसलिए मैं अपने कमरे में आकर ऐसे ही लेट गई।

बाहर बारिश तो नहीं हो रही थी.. मगर बिजली चमक रही थी और ठण्डी हवा चल रही थी.. इसलिए पता नहीं कब मेरी आँख लग गई।

कुछ देर बाद अचानक दरवाजे के खटखटाने की आवाज से मेरी नींद खुल गई।

मैं समझ गई कि भैया आ गए है। मैंने जो मोमबत्ती जला रखी थी.. वो खत्म होकर बुझ चुकी थी.. मगर खिड़की से इतनी रोशनी आ रही थी कि मैं थोड़ा बहुत देख सकती थी।

मैं जल्दी से दरवाजा खोलने चली गई और मैंने जैसे ही दरवाजा खोला तो भैया सीधे मेरे ऊपर गिर पड़े.. शायद वो दरवाजे का सहारा लेकर ही खड़े थे.. अगर मैंने उन्हें पकड़ा नहीं होता तो वो सीधे मुँह के बल फर्श पर गिर जाते।

भैया के मुँह से शराब की तेज बदबू आ रही थी। उन्होंने इतनी शराब पी रखी थी कि वो ठीक से खड़े भी नहीं हो पा रहे थे।

मैंने भैया को पकड़ कर उनके कमरे में ले जाने लगी.. तो उन्होंने भाभी का नाम ले कर मुझे कस कर पकड़ लिया और कुछ बड़बड़ाने लगे।

घर में अँधेरा होने के कारण भैया ठीक से मेरी सूरत तो देख नहीं पा रहे थे.. मगर मैंने भाभी की नाईटी पहन रखी थी और मैं कद-काठी में भी भाभी के समान ही थी.. इसलिए भैया शायद मुझे भाभी समझ रहे थे।

भैया के कमरे में भी बिल्कुल अँधेरा था।

मैंने उन्हें बिस्तर पर सुला दिया और अपने कमरे में जाने के लिए मुड़ी तो भैया ने मेरा हाथ पकड़ कर झटके से खींच लिया और फिर से भाभी का नाम लेकर कहा- कहाँ जा रही हो रानी..

मैं स्तब्ध थी..
 
भैया के खींचने से मैं उनके ऊपर गिर गई। मुझे भैया पर हँसी आ गई और मैंने भैया के ऊपर से उठते हुए कहा- भैया मैं भाभी नहीं हूँ.. पायल हूँ..

मगर भैया ने मेरी बात को अनसुना कर दिया.. वो मेरे सर को पकड़ कर मेरे गालों पर चुम्बन करने लगे और फिर से मुझे अपने ऊपर खींच लिया। मैं कुछ और बोल पाती इससे पहले भैया ने मेरे दोनों होंठों को अपने मुँह में ले लिया और चूसने लगे.. जिससे मेरे बदन में भी सिहरन सी होने लगी।

मुझे भैया पर हँसी भी आ रही थी और गुस्सा भी.. इसलिए मैं अपने होंठों को छुड़वा कर जोर से चीख कर कहा- भैया.. मैं भाभी नहीं हूँ.. पायल हूँ.. पायल.. आपकी बहन..!

मैं यह कहते हुए फिर से खड़ी होने की कोशिश करने लगी।

मगर भैया को तो जैसे मेरी कोई बात सुनाई ही नहीं दे रही थी।

मैं अपने आपको भैया से छुड़वा ही रही थी कि अचानक भैया ने करवट बदल कर मुझे नीचे गिरा लिया और वो मेरे ऊपर आ गए।

मुझे भैया से ये उम्मीद बिल्कुल भी नहीं थी कि वो इतनी जल्दी ये सब कर देंगे।

भैया फिर से मेरे होंठों को चूसने लगे और एक हाथ से नाईटी के ऊपर से मेरे उरोजों को भी दबाने लग गए।

भैया का उत्तेजित लिंग मेरी जाँघ पर चुभता हुआ सा महसूस हो रहा था मेरे पूरे बदन में चींटियां सी काटती महसूस होने लगीं.. और ऊपर से मौसम भी इतना सुहावना हो रहा था, अब तो मुझे भी कुछ होने लगा था।

मैंने भी भैया को अपनी बाँहों में भर लिया.. मगर तभी मुझे ख्याल आया कि यह मैं क्या कर रही हूँ.. भैया नशे में हैं.. मैं नहीं.. मुझे समाज का और भाई-बहन के रिश्ते का ख्याल था।

मेरा भी दिल तो मचलने लगा था.. मगर मैं भाई-बहन के रिश्ते को कलंकित नहीं करना चाहती थी.. इसलिए मैंने भैया को अपने ऊपर से धकेल कर अपने आपको छुड़वा लिया और फिर से कहा- भैया.. आप ये क्या कर रहे हैं.. होश में आओ.. मैं आपकी बहन हूँ।

कमरे में अँधेरा था जिस कारण भैया मेरी सूरत नहीं पहचान पा रहे थे.. मगर भैया पर मेरे चीखने का भी कोई असर नहीं हो रहा था।

उन्होंने भाभी का नाम बड़बड़ाते हुए फिर से मुझे दबोच लिया और अचानक मेरी नाईटी को उलट दिया। नीचे मैंने पैन्टी भी नहीं पहन रखी थी.. इसलिए मैंने अपने घुटने मोड़ लिए और अपनी नाईटी को पकड़ने लगी।

मैं अपनी नाईटी को ठीक कर पाती.. इससे पहले भैया ने एक हाथ से मेरी दोनों जाँघों को दबाकर मेरे घुटनों को सीधा कर दिया और मेरी नंगी योनि पर अपना मुँह टिका दिया।

यह सब भैया ने इतनी जल्दी और अचानक किया कि मैं कुछ समझ ही नहीं पाई।

मैंने अपनी दोनों जाँघें एक-दूसरे चिपका कर बन्द कर रखी थीं.. जिससे भैया की जीभ मेरे योनि द्वार तक तो नहीं पहुँच पा रही थी.. मगर भैया मेरी योनि की फाँकों को चूसने लग गए।

अब तो मेरे लिए अपने आप पर काबू करना कठिन हो गया था.. क्योंकि अब भैया मेरे सबसे संवेदनशील अंग पर अपनी जीभ से हरकत कर रहे थे.. जिससे मेरे रोम-रोम में चिंगारियां सी सुलगने लगीं।

अब तो मैं भी बहकने लगी थी और मेरी जुबान भी कपकँपाने लगी। मैंने फिर से काँपती आवाज में भैया को कहा- भ..अ..ऐ..य..आ.. अ..आ..प..अ… ये..ऐ.. क..अ..य..आ.. क..अ..र..अ…र.. अ..ह..ऐ… ह..अ..ओ…!

मैं भैया को हटा कर उठने की कोशिश करने लगी.. मगर तभी भैया ने मेरे कूल्हों के नीचे अपने दोनों हाथों को डालकर मेरी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठा लिया और मेरी योनि की फाँकों को अपने मुँह में भर कर इतनी जोर से चूस लिया कि मुझे अपनी योनि का अंदरूनी भाग खिंचकर भैया के मुँह में जाता सा महसूस हुआ और मेरे मुँह से ‘इईईई.ई..ई…ई.. शशशश..श.. भैया.. आहह..’ की आवाज निकल गई।

भैया मेरी योनि में अपनी जीभ से लगातार हरकत करने लगे.. जिससे मेरे पूरे शरीर में उत्तेजना की लहर दौड़ने लगी और पता नहीं कब मेरी जाँघें खुल गईं।

अब मेरी पूरी योनि पर भैया का अधिकार हो गया था। भैया कभी मेरे दाने पर.. तो कभी योनि द्वार पर.. अपनी जीभ को घुमाने लगे।

मेरे मुँह से, ‘इईश.. श..श..अआहह…अह..’ की हल्की-हल्की सिसकियाँ फूटने लगीं।

मुझे भी पता नहीं क्या हो गया था.. मैं भैया का बिना कोई विरोध किए शान्त होकर पड़ी रही। मेरा दिमाग तो कह रहा था कि ये सब गलत हो रहा है.. मगर दिल साथ नहीं दे रहा था।

भैया ने अपनी जीभ से मेरे तन-बदन में आग लगा दी थी और आखिर में दिल के आगे दिमाग ने घुटने टेक दिए और मैंने अपनी जाँघें पूरी तरह फैलाकर भैया को अपने आपको समर्पित कर दिया।

कुछ देर बाद भैया ने मेरी योनि को छोड़ दिया।

कमरे में अँधेरा था मगर फिर भी मैं भैया को अपने कपड़े उतारते हुए देख पा रही थी।

भैया अपने सारे कपड़े उतार कर मेरे ऊपर लेट गए, मैं भी आँखें बन्द करके पड़ी रही और भैया के लिंग के प्रवेश कराने का इंतजार करने लगी।

 
भैया ने एक हाथ से अपने लिंग को मेरी योनि के प्रवेश द्वार पर रख कर जोर का धक्का मारा.. एक ही झटके में भैया का पूरा लिंग मेरी योनि में समा गया.. जिससे मुझे हल्का सा दर्द हुआ और दर्द व उत्तेजना के कारण मेरे मुँह से ‘अआआह..ह…ह..’ की आवाज निकल गई।

मेरे दिमाग में एक बार फिर से खयाल आया कि मैं यह क्या कर रही हूँ? मगर उत्तेजना के कारण मेरा ख्याल दिमाग में ही दब कर रह गया..

क्योंकि अब भैया धीरे-धीरे अपनी कमर को हिलाने लग गए थे.. जिससे मुझे मजा आ रहा था और वैसे भी अब तो सारी सीमाएँ और मर्यादाएँ टूट चुकी थीं इसलिए मैं भी अपने पैर भैया के पैरों में फंसा कर अपने कूल्हों को उचका-उचका कर भैया का साथ देने लगी और मेरे मुँह से ‘इईई.ई..ई…ई.. शशशश..श.. अआआह.. उहहह..’ की आवाजें निकलने लगीं।

भैया लगातार धक्के लगाते रहे और मैं ऐसे ही सिसकियाँ भरती रही। धीरे-धीरे भैया की गति बढ़ने लगी और फिर से वो मेरे होंठों को अपने मुँह में भर कर चूसने लगे।

इस बार मैं भी उनके एक होंठ को चूसने लगी।

भैया तो बिल्कुल नंगे थे मगर मेरी नाईटी बस मेरे पेट तक ही उल्टी हुई थी.. जिससे मेरा शरीर भैया के नंगे शरीर को स्पर्श नहीं कर रहा था और भैया भी नाईटी के ऊपर से ही मेरे उरोजों को दबा रहे थे.. इसलिए मैंने खुद ही अपनी नाईटी को खिसका कर अपने उरोजों के ऊपर तक उलट लिया और भैया की पीठ को अपनी बाँहों में भर कर दबाने लगी।

भैया जितनी तेजी से धक्के लगा रहे थे.. मैं भी उतनी ही तेजी से अपने कूल्हे उचका रही थी।

मेरे होंठ भैया के मुँह में थे.. फिर भी उत्तेजना के कारण मेरे मुँह से मादक आवाजें निकल रही थीं।

खिड़की से ठण्डी हवा आ रही थी और बाहर मौसम भी ठण्डा था.. मगर फिर भी मैं और भैया पसीने से लथपथ हो गए थे।

आज करीब दो अढ़ाई साल के बाद मैंने किसी के साथ यौन सम्बन्ध बनाया था.. इसलिए मैं जल्द ही चरम पर पहुँच गई।

मैं भैया के शरीर से किसी जौंक की तरह चिपक गई और शान्त हो गई।

कुछ देर बाद भैया भी अपनी मंजिल पर पहुँच गए और उनका लिंग मेरी योनि में गर्म वीर्य उगलने लगा, भैया ढेर होकर मेरे ऊपर गिर गए।

कुछ देर तक हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे.. मगर काफी देर होने के बाद भी जब भैया मेरे ऊपर से नहीं उठे तो मैं उन्हें उठाने लगी.. मगर मैंने देखा कि भैया तो मेरे ऊपर ही सो चुके थे।

मैंने भैया को अपने ऊपर से धकेल कर बिस्तर पर गिरा दिया और उठ कर अपने कमरे में आ गई।

मेरे खड़े होने से भैया का वीर्य मेरी योनि से रिस कर मेरी जाँघों पर आ गया.. जिससे मेरी जाँघें चिपक रही थीं.. इसलिए मैंने बाथरूम में जाकर अपनी योनि और जाँघों को साफ करके अपने कमरे में आकर बिस्तर पर लेट गई।

अब मुझे पछतावा हो रहा था कि मैंने ये क्या कर दिया? मुझे भैया को कैसे भी करके रोकना चाहिए था।

यही सब सोचते-सोचते ही मुझे नींद आ गई।

सुबह जब मैं उठी तो मेरा पूरा बदन दर्द कर रहा था।

मित्रो, मेरी आप बीती बस इतनी ही पर आगे मेरी शादी एक आर्मीमैन से हुई जो साल में दो महीनों के लिए घर आते और बाकी दिन मैं प्यासी रहती पर वहा मेरे देवर के साथ संबंध बन गये उसकी कहानी मेरे देवर सलील कीजबानी बहुत जल्द हिंदी फोरम में पोस्ट होगी जो आपको जरूर पसंद आएगी

मेरी आप बीती 2



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