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मेरी सेक्सी बहनें compleet

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करीब आधे घंटे में रिश्तेदारों से फ्री होके, नाश्ता किया और ललिता और मैं बाहर चले गया.. 11.15 को हमने गाड़ी स्टार्ट की और सीधा दौड़ा दी प्रसाद की ऑफीस की तरफ.. प्रसाद की ऑफीस के नीचे पहुँचे, और हमने 15थ फ्लोर की लिफ्ट ले ली... उसकी ऑफीस के बाहर पहुँचे

"ए के प्रसाद..... लीगल काउनसेलर" उसकी ऑफीस के दरवाज़े पे बड़ा बोर्ड लगा था, सुनहेरे अक्षरों में लिखा हुआ

"मिस्टर प्रसाद, कॅन वी कम इन प्लीज़" मैने उसकी ऑफीस को नॉक करके पूछा

"ओह.. यस प्लीज़ कम गाइस.... वॉट विल यू हॅव" प्रसाद ने हमारा स्वागत किया

"नतिंग सर , थॅंक यू वेरी मच.." ललिता ने कहा

"टेल मी चिल्ड्रेन , हाउ कॅन आइ हेल्प यू"

"सर, आफ्टर ऑल दा थिंग्स व्हिच वी हॅव टोल्ड यू, वी हॅव दा पेपर्स व्हिच यू वान्ट... वी वुड रिक्वेस्ट यू टू प्लीज़ कम इन अट दिस अड्रेस ऑन 19थ जुलाइ.. वी विल हॅंड ओवर दा पेपर्स टू यू आंड यू विल बी टेस्टिफाइड ऐज विटनेस इन फ्रंट ऑफ दा पोलीस.. होप यू डोंट हॅव एनी प्राब्लम विद दट" ललिता ने उसे मेरा कार्ड पकड़ाते हुए कहा

"मिस्टर वीरानी... दा सन ऑफ वीरानी मॅनीयूफेकचॅरिंग प्राइवेटलिमिटेड..." प्रसाद ने कार्ड देखा, और फिर मुझे देखा

"राइट सर..." मैने हंस के कहा

"ओह माइ लॉर्ड... हाउ डिड आइ नोट नो दिस... गोद ब्लेस्स यू माइ बॉय, आंड यू गर्ल.... युवर डूयिंग आ वेरी नोबल कॉस... गिव माइ रीगार्ड्स टू मिस्टर वीरानी, ही हॅज़ डन फ्यू केसस वित मी इन हिज़ बिज़्नेस.. आम शुवर ही रिमेंबर्ज़ माइ नेम"

"ओफ़कौर्स सर.. आइ विल डू तट.. जस्ट मेक शुवर यू रीच हियर बाइ 1 PM प्लीज़..."

"डोंट वरी गाइस... आइ विल बी देअर" प्रसाद ने हमे आश्वासन दिया

हम प्रसाद के वहाँ से निकले और तुरंत हमारे ट्रॅवेल एजेंट के पास गये...

"मिस्टर वीरानी.. आइए, हाउ वाज़ युवर इंडोनेषिया ट्रिप.." ट्रॅवेल एजेंट ने मुझे पूछा

"वंडरफुल... अभी ये पासपोर्ट्स हैं मेरे भाई और पेरेंट्स के... 20थ को ऑस्ट्रेलिया, एनितिंग पासिबल"

"ओफ़कौर्स, वीसा जल्दी लगवा दूँगा मैं.. आप फ़िक्र ना करें, वीरानी के नाम से तो भला कौन मना करेगा हमे" ट्रॅवेल एजेंट ने पासपोर्ट लेते हुए कहा

"ओके सर.. मेरे पास आपकी बॅंक डीटेल्स हैं, मैं उसमे 50,000 के स्लॉट्स में पैसे ट्रान्स्फर कर देता हूँ... अलग अलग बॅंक अकाउंट से आएँगे, सिन्स देअर् ईज़ आ लिमिट फॉर नेफ़्ट"

"नो प्राब्लम जी... आपके पापा घूम के आए आप पैसा बाद में दीजिए, उसकी फ़िक्र ही नहीं है"

"जी नहीं , उसकी नो नीड.. हमे चलना चाहिए" कहके मैं और ललिता बाहर आ गये

"ओह नो... वेट, मैं अभी आया.." मैने बाहर आके कहा

"नाउ व्हाट भाई.. वी आर ऑलरेडी लेट" ललिता पीछे चिल्ला रही थी

मैं दौड़ के वापस ट्रॅवेल एजेंट के पास आया

"सुनिए, ये एक और पासपोर्ट है, इसका भी ऑस्ट्रेलिया ट्रिप कीजिए प्लीज़" मैने ललिता का पासपोर्ट देते हुए कहा, और जल्दी से बाहर आ गया

"अब चलें..." ललिता ने गाड़ी में बैठे हुए मुझसे सवाल पूछा

हम जल्दी से गाड़ी में घर की तरफ निकले, 1 बजे के टाइम पे हम 1.20 को पहुँचे... शुक्र है मोम अब तक तैयार नहीं थी... हम 10 मिनट में निकले, पूरा दिन हमने शॉपिंग लंच, गेम्स भी खेले... इन शॉर्ट हमने बहुत एंजाय किया.. मोम डॅड के साथ विजय और शन्नो ने भी शॉपिंग की.. ललिता ने भी अपने लिए कुछ कॅषुयल कपड़े लिए.. कॅषुयल क्यूँ

"भाई.. सेम सवाल करोगे तो सेम जवाब मिलेगा ओके" कहके ललिता फिर अपने कपड़ों के सेलेक्षन में लग गयी..

दिन के अंत में हम थक हार के घर वापस आए.. आके जल्दी से सब लोग अपने कमरे में सो गये, और फिर मैं और ललिता मेरे रूम में ही बैठे थे..

"भाई, मज़ा आ गया ना आज तो बहुत" ललिता ने अपने कपड़े दिखाते हुए कहा

"भाई.. भाई.. व्हेअर आर यू लॉस्ट" ललिता ने मुझे कंधे से हिला के पूछा

"ललिता.... व्हाई डू यू हेट हिम... इट्स बिन आ एअर नाउ ऑलमोस्ट..." मैने फिर ललिता से पूछा

"भाई, वन मोर टाइम यू टेक हिज़ नेम, आंड ई विल बी आउट ऑफ हियर" ललिता ने अपने कपड़े फेंक के कहा

"ललिता.. चिल... मेरा सवाल सुनेगी अब प्लीज़..."

"बोलो"

"व्हाट इफ़ ही ईज़ बिहाइंड ऑल दिस... ईवन ही ईज़ आ फॅमिली........ राइट ?????"

 
दोस्तो एक और भेद खुलने वाला है यहाँ से कुछ देर कहानी फ्लेश बॅक मे जाएगी

फ्लश बॅक............................................

ललिता रोज़ की तरह सुबह को तैयार हो रही थी... वो सुबह को जल्दी नहा लेती और पूरा दिन फिर आराम से बैठती और मज़े लेती दोस्तों और फॅमिली के साथ... एक सुबह जब ललिता नहाने गयी, नहाते नहाते उसे लगा कि शायद कोई उसे देख रहा है.. उसे पिछले 10 दिनो से ऐसा लग रहा था, पर वहाँ है ऐसा सोच के उसने इग्नोर किया और किसी से शेअर् नहीं किया... आज भी उसने ऐसा ही किया... नहा के वो जैसे ही बाहर की तरफ बढ़ी, उसे किसी के कदमो की आहट सुनाई दी.. कदम पीछे जा रहे थे... बाहर आके उसने देखा तो उसे कोई नहीं दिखा.. उसने केर्फुली अपने रूम की खिड़की बंद की और कपड़े पहनने लगी.. कपड़े पहन के वो उछलती गाती हुई नीचे लिविंग रूम में आई और नाश्ते के लिए चिल्लाने लगी...

"हां हां बेटा, ले तेरा फॅवुरेट नाश्ता, स्क्रंबल्ड एग्स आंड स्पॅनिश ओम्लीट" मोम ने ललिता को नाश्ता देते हुए कहा

"लव्ली आंटी.. थॅंक्यू सो मच.... मोम कहाँ है" ललिता ने अपना ओम्लीट खाते हुए कहा

"बेटा वो आज तेरे पापा के साथ कहीं बाहर गयी है, डॉली भी उनके साथ गयी है, रात को देर होगी उन्हे आने में"

"डॉली भी गयी.. नो प्राब्लम, मैं आपके साथ टाइम पास कर लूँगी आज" ललिता ने ओम्लीट मोम को खिलाते हुए कहा

"ओह हो... बट दट विल टेक सम टाइम बेटे, मैं और तुम्हारे अंकल कहीं बाहर जा रहे हैं, वी विल टेक अन अवर टू कम बॅक, फिर आके मस्ती, ओके ना..." मोम ने ललिता को चूमते हुए कहा

ललिता की उमर भले 24 की थी, पर घर की जान थी वो... सब उससे बहुत प्यार करते थे.. इनफॅक्ट मोम डॅड मुझसे ज़्यादा ललिता और डॉली दोनो से प्यार करते थे... शायद मेरी कोई सग़ी बहेन नहीं थी तभी....

"व्हाट आंटी.. जल्दी आना आप, भाई भी नहीं है, बोर हो जाउन्गि मैं" ललिता ने फिर मोम को स्क्रंबल्ड एग्स खिलाते हुए कहा

"यूँ गये और यूँ आए बेटा" मोम ने फिर ललिता को गले लगा के कहा

"अरे अब चलो भी, देर हो रही है.. और ललिता बेटा, कम हियर माइ जान" डॅड ने ललिता को अपने पास बुलाया

"अंकल, जल्दी आना प्लीज़ हाँ" ललिता ने डॅड को हग करके कहा

"डोंट वरी बेटा.. टेक केअर ओके..." कहके डॅड और मोम बाहर चले गये...

घर पे सुबह के 10 ही बज रहे थे, डॉली शन्नो और विजय, बाहर थे, मैं ऑफीस में था, और मोम डॅड भी अभी कहीं काम से गये.. लेकिन ललिता अभी अकेली नहीं थी.. ललिता के साथ वहाँ कोई और भी था..... ललिता मज़े से अपना नाश्ता खा रही थी और टीवी देख रही थी.. नाश्ता फिनिश करके ललिता ने प्लेट्स किचन सींक में डाली और वापस टीवी देखने बैठी... टीवी देखते वक़्त भी कोई उसे छुप छुप के देख रहा था.. शायद ललिता को उस वक़्त ये एहसास नहीं हुआ, , क्यूँ कि टीवी पे उसकी फेव दीपिका पादुकों की मूवी आ रही थी.. वो जल्दी से बच्चो की तरह टीवी के सामने बैठ के मूवी को देखने लगी... कुछ देर में टीवी देखते देखते उसे पता ही नहीं चला कि कोई उसके पीछे आके खड़ा भी है.. धीरे धीरे उस शक़्स ने पीछे से ललिता के कंधों पे हाथ रखा, जिससे ललिता चौंक के पीछे मूडी

"ओह माइ गॉड... यू स्केर्ड दा हेल आउट ऑफ मी..." ललिता के माथे पे पसीना आ चुका था ऐसे करने से...

"ये क्या तरीका है, कोई ऐसे डराता है क्या..." ललिता ने सामने वाले शक़्स को प्यार से मुक्का मारते हुए कहा

"सॉरी डियर.... यू कंटिन्यू वाचिंग दा मूवी, आइ विल नोट डिस्टर्ब यू नाउ..."

कहके उस शक़्स ने ललिता को अपनी गोद में लेटा दिया और उसके बाल सहलाने लगा... कुछ ही देर में बाल सहलाते सहलाते उस शक़्स ने अपने हाथ को थोड़ा नीचे किया और ललिता के गालों को सहलाने लगा.. कुछ देर तो ललिता ने इग्नोर किया, पर काफ़ी देर के बाद ललिता बोली

"ओफफो.. प्लीज़ ऐसा मत करो, " कहके ललिता ने उस शक़स के हाथ वापस अपने बालों में रख दिया..

5 मिनट के बाद अब वो शक़्स गालों पे वापस आ गया और उन्हे सहलाने के बदले उन्हे ज़ोर ज़ोर से रगड़ने लगा....

"बोला ना, अच्छा नहीं लग रहा, हटो यहाँ से" कहके ललिता ने अपना सर उसकी गोद से उठाया ही था, तभी उस शॅक्स ने ललिता के सर को कस के पकड़ा और उसे अपनी गोद में वापस ले आया

"किस मी नाउ प्लीज़..." उस शक़्स ने अपनी सहमति हुई आवाज़ में कहा

"व्हाट.. यू आर क्रेज़ी, लेट मी गो नाउ.." कहके ललिता अपना ज़ोर आज़माने लगी, पर उस शक़्स ने काफ़ी ताक़त से उसे दबोचा हुआ था...

"यस... आइ आम क्रेज़ी, क्रेज़ी फॉर युवर बॉडी, युवर लव.....युवर स्मेल.... प्लीज़ लेट मी किस यू..... लेट मी फक यू... मेरे साथ बिस्तर पे आओ चलो...." कहके वो शक़्स ललिता को उठा के ललिता के रूम में ले जाने लगा..... मौका पाते ही ललिता ने उसके कलाई पे काटा और उससे दूर होके दौड़ने लगी.. दौड़ते दौड़ते ललिता पीछे की दीवार से जा टकराई.. उस शक़्स ने मौका पाके ललिता की तरफ छलाँग लगा ली...

ललिता वाज़ कॉर्नेरेड नाउ... उस शक़्स ने ललिता के हाथों को दबोच रखा था, और धीरे धीरे उसके गालों को चूमने लगा था...

"उम्म्म.. आइ लव युवर स्मेल.. अहाहा.... प्लीज़ लेट मी किस यू"

जैसे ही वो शक़्स ललिता के करीब पहुँच रहा था, तभी डॅड और मोम दरवाज़ा खोलके अंदर आए.. वो कुछ चीज़ ले जाना भूल गये थे..

"तुम हमेशा भूल जाती हो.. रूको मैं लाता हू" कहके डॅड जैसे ही लिविंग रूम में गये, उनकी नज़र उस दृश्य पर पड़ी

"ये क्या हो रहा है.. रूको, ये क्या है" कहके डॅड ललिता की तरफ दौड़े और मोम को आवाज़ दी... डॅड के चिल्लाने की आवाज़ सुनके मोम अंदर आई

"ओह गॉड... व्हाट हॅपंड..." मोम ने ललिता को बाहों में लेते हुए पूछा

उधर डॅड उस शक़स को तमाचे पे तमाचे मारे जा रहे थे

"बोल साले.. ये सब क्या है हाँ.. साले गंदी नाली के कीड़े... रुक अभी तेरी खबर लेता हूँ, कहके डॅड ने अपना बेल्ट निकाला और सतसट सतसट उस शक़्स को उससे मारने लगे.....

"सॉरी.. सॉरी... वो ऐसा हुआ" वो शक़्स बस येई बोल पा रहा था...
 


डॅड तो जैसे पागल से हो गये थे... उन्होने खुद अब वक़्त नहीं देखा... लगातार 15 मिनट तक उन्होने उस शक़्स को बेल्ट मारना चालू रखा

"उठ साले... ये सब करते शरम नहीं आती तुझे हाँ.. चल साले अंदर, भडवे कहीं के... येई सब सीखा है तूने, साले हरामी.. " कहके डॅड उस शक़्स को उसके हाथ से घसीट के रूम में ले गये और उसे बाहर से लॉक कर दिया

"ललिता बेटे... प्लीज़ कूल डाउन... कम डाउन ओके... डॉक्टर को बुलाओ जल्दी" डॅड ने ललिता को सोफे पे ले जाके मोम से कहा

ललिता रो रो के चिल्ला रही थी.. उसका रोना और बढ़ता जा रहा था....

"ललिता, डार्लिंग प्लीज़ काम डाउन.. हम हैं इधर ओके.. यू आर सेफ माइ जान.... डोंट वरी" कहके डॅड ने उसे गले लगा लिया

"पानी लाओ प्लीज़, और एलेक्ट्रल लाओ, विद आ पिंच ऑफ लाइम.. फास्ट" डॅड ,मोम को चिल्ला के बोले

कुछ ही सेकेंड्स में मोम एलेक्ट्रल लाई और उसमे नींबू निचोड़ के ललिता को पिलाया.. लिक्विड पीके ललिता को थोड़ी राहत मिली.. उसके आँसू बंद थे, पर उसका सुबकना अब तक बंद नहीं हुआ था... उसके माथे से अभी तक खून बह रहा था, हाला कि बहुत कम था.. पर डॅड ललिता को लेके बहुत ही प्रोटेक्टिव थे...

"बेटे.. काम डाउन, युवर अंकल ईज़ हियर ओके.. ना मेरी बेटी ना,, नहीं रोते ओके.. अरे मेरी बच्ची, प्लीज़ बेटा , नहीं रो" डॅड की आँखों में भी आँसू आने लगे थे

कुछ ही देर में डॉक्टर आए, उन्होने ललिता को थोड़ा टिंचर लगाया और पट्टी कर दी...

"डोंट वरी मिस्टर वीरानी.. नतिंग हॅज़ हॅपंड, जस्ट आ स्माल इंजुरी... बट उसका रोना देख के लग रहा है, कुछ ग़लत हुआ है.. अगर हुआ है तो उसका माहॉल चेंज कीजिए, नहीं तो ये डर उसके दिलो दिमाग़ में बैठ जाएगा" कहके डॉक्टर वहाँ से निकल गया

"तुम अभी ललिता को लेके कहीं चली जाओ.. आइ डोंट केअर व्हेअर, बट नाउ... उसका माहॉल बदलना है ओके.. ये लो पैसे, और टॅक्सी लेके एरपोर्ट जाओ.. एक काम करो, हमारे लोनवाला वाले फार्म हाउस में जाओ, गाड़ी के ड्राइवर को बोलो, ही विल टेक यू देअर ओके" डॅड ने मोम से ऑर्डर किया... मोम ने वक़्त की नज़ाकत को समझा और ललिता को अपने साथ गाड़ी में लेके वहाँ से रवाना हो गयी

मोम के जाते ही

"विजय.. घर पे आओ जल्दी" डॅड ने अंकल से फोन पे कहा

"भाईसाब, क्या हुआ, कुछ अर्जेंट है क्या" अंकल को पता नहीं था इन सब के बारे में

"विजय, डू ऐज आइ से" पापा ने फिर ज़ोर लगाया

"भाई साब, बताइए तो क्या हुआ प्लीज़" अंकल फिर रेज़िस्ट करने लगे

"घर आओ समझे... अभी के अभी... मुझे तुम्हारी मोजूदगी चाहिए यहाँ एक घंटे में... आइ डोंट केअर कैसे आओगे बट आओ" कहके पापा ने अपना फोन ज़मीन पे फेंक दिया

विजय से बात करके पापा लिविंग रूम में ही बैठ गये अपनी रॉकिंग चेअर् पे और उस कमरे में नज़रें गाढ दी जिसमे वो शक़्स बंद था.. हर एक मिनट पापा को एक एक घंटे की तरह लग रहा था... 50 मिनट हो चुकी थी,पापा ने ना तो पानी पिया था, ना ही उन्होने वहाँ से नज़रें हटाई थी... कुछ ही सेकेंड्स में उन्हे बाहर गाड़ी के ब्रेक की आवाज़ आई.. स्क्रीचैंग साउंड था टाइयर्स का, जैसे किसी ने फुल स्पीड में ब्रेक लगाए हो...

"भाई साब बोलिए, सब ख़ैरियत..." विजय ने अंदर आते हुए पूछा

"इधर आओ मेरे साथ.. इधर आके देखो" पापा विजय को पकड़ के उस रूम के पास ले गये.. शन्नो और डॉली डर चुके थे पापा का ऐसा बिहेवियर देख के

"ये देखो..." पापा ने वो रूम को अनलॉक किया और अंदर बैठे शक़्स की तरफ इशारा किया

"ये ऐसे क्यूँ बैठा है..." विजय ने बस इतना ही कहा कि पापा ने ज़ोर से कहा

"इसने ललिता के साथ ज़बरदस्ती की है आज... ये उसका रेप कर रहा था.. हम वक़्त पे ना आते तो अनर्थ हो जाता आज.." पापा फिर रोने लगे ये कहते कहते

"क्या..... ऐसा नहीं हो सकता..." विजय के नीचे से ज़मीन खिसकने लगी.... वहीं शन्नो और डॉली ने शरम के मारे अपने हाथ अपने मूह पे रख दिए थे

"नहीं भाई साब... ये ऐसा नही कर सकता.. मेरा बेटा ऐसा नहीं करेगा कभी.. कह दीजिए कि ये ग़लत है" विजय फुट फुट के रोने लगा था

"नहीं भाई साब ये नहीं हो सकता... संजय ऐसा कभी नहीं कर सकता..." विजय आगे बढ़ते हुए कोने में गया जहाँ जय अपना माथा नीचे करके रो रहा था..

विजय :- संजय बेटे, उपर देखो.. मेरी तरफ देखो... संजय बेटे देखो उपर, मैं कुछ नहीं करूँगा

संजय रोते हुए उपर देखने लगा... उसके होंठों से बहता हुआ खून, उसकी आँखों के नीचे पड़े हुए नखुनो के निशान, सॉफ बयान कर रहे थे कि उसे कितना मारा गया है....

"बोल बेटा, तूने किया ऐसा... बेटा बोल, मैं कुछ नहीं करूँगा....." विजय उसके सर पे हाथ फेरने लगा

"डॅड...उहह अहहहुहह ओह्ह्ह.... सॉरी डॅड.." संजय बस इतना ही कह पाया, कि विजय की आँखों में खून दौड़ने लगा...

"साले हरामी कुत्ते.... अपनी बहेन पे नज़र रखता है ऐसी" कहके विजय ने उसे और मारना चालू किया... इस बार विजय उसे बाहर लाया घसीट के और उसे झापड़, अपने बेल्ट से, और ना जाने क्या क्या गालियाँ देने लगा...

"साले, बेहेन्चोद बनेगा, सुअर साले..." विजय मारे जा रहा था उसे और शन्नो और डॉली से ये दृश्य देखा नहीं जा रहा था.. डॉली अपने बाप को नहीं रोक सकती थी, पर शन्नो माँ थी.... वो उसे रोकने बीच में गयी

"रुक जाइए मैं कहती हूँ.. उसकी हालत देखिए..." कहके शन्नो ने विजय का हाथ रोक लिया.. लेकिन विजय के अंदर मानो जैसे किसी शैतान ने घर कर लिया था... उसने शन्नो का हाथ पटका , और उसे भी 2 तमाचे मारके साइड में फेंक दिया

"हट जा भेन की लौडि.... बीच में आएगी तो काट डालूँगा आज तुझे भी...." विजय ने शन्नो को धक्का देके कहा...

 


अपनी माँ के पास जाके डॉली उसको अपने रूम में ले जाने लगी... दोनो माँ बेटी बहुत रो रही थी... माँ का दिल शायद बेटे के लिए रो रहा था, और डॉली का बहेन के लिए... विजय ने संजय को इतना मारा, इतना मारा, वो खुद थक के ज़मीन पे बैठ गया और बेहोश सा होने लगा.. पापा ने डॉक्टर को एक बार फिर बुलाया.. डॉक्टर के आते ही, शन्नो और डॉली नीचे आए, सबके लिए पानी लाए.... ठंडा पानी पीके शायद डॅड का गुस्सा कम हुआ, पर विजय का नहीं.. डॉक्टर की मौजूदगी मे विजय वहाँ से उठके कहीं दूसरे रूम में चला गया... जब तक डॉक्टर संजय को देखते, डॅड नीचे ही बैठे थे उसके पास...

"मैने ज़ख़्मों पे दवाई तो लगा दी है... पर मिस्टर वीरानी... आप लोगों को इतना नहीं मारना चाहिए था... आइ आम युवर फॅमिली डॉक्टर... अगर मेरी सलाह माने तो एक बात कहूँ" डॉक्टर घर के बाहर डॅड को ले गया और उनसे बातें करने लगा.. डॉक्टर के जाते ही, डॅड जल्दी से अंदर आए और शन्नो से कहा संजय को उसके रूम में ले जाने के लिए.. शन्नो के जाते ही डॅड ने विजय से बात की

"विजय.. मुझे बिल्कुल उमीद नहीं थी कि घर में ऐसा भी कुछ होगा.. घर का वातावरण ऐसा होगा, बच्चे क्या करते हैं उसमे ज़िम्मेदारी माँ बाप की भी होती है..." डॅड ने विजय से एक ही लाइन में सब कह डाला.. शायद विजय समझ गया हो पर उसने डॅड को जवाब नहीं दिया

"भाईसाब.. संजय ऐसा नहीं कर सकता, मैं नही मानती आपकी इस बात को.." शन्नो सीडीयों से नीचे आती बोली

"वो तुम लोगों की सोच को मैं बदल नहीं सकता... तुमने खुद संजय से बात की होगी, विजय के सामने भी उसने कबूला... इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं कर सकता.. आगे ऐसा कुछ ना हो मुझे उसकी चिंता है... ललिता और डॉली मेरी बेटियाँ हैं, मैं उनके साथ ऐसा कुछ होते नहीं देख सकता... बेहतर है उसे शहर से बाहर भेज दो पढ़ाई के लिए.. इधर रहेगा तो ना तो मेरी बेटियाँ सेफ हैं , ना तो तुम लोग.. ये मेरा आखरी फ़ैसला है, और अगर मंज़ूर नहीं है, तो संजय के लिए इस घर में कोई जगह नहीं है... आगे तुम्हारी मर्ज़ी..." कहके डॅड अपने कमरे में चले गये

डॅड के कमरे में जाते ही विजय और शन्नो में आर्ग्युमेंट चालू हो गयी... दोनो असमंजस में थे, विजय संजय से काफ़ी गुस्सा तो था, पर साथ ही उसे घर से बाहर भी नहीं निकालना था.. उसने दिल पे पत्थर रख के फ़ैसला किया कि वो डॅड की बात मानेगा, पर उससे पहले वो अपनी फॅमिली के साथ कुछ टाइम अकेले बिताना चाहेगा.. सुबह जब उसने अपना फ़ैसला डॅड को सुनाया,

"मुझे कोई प्राब्लम नहीं है.. मैं टॉप कॉलेज में इसकी अड्मिशन करवा देता हूँ, तुम लोग होके आओ जहाँ जाना है.. मुझे कोई दिक्कत नहीं है, पर एक बात.. बेटे डॉली, क्या तुम जाना चाहोगी संजय के साथ" डॅड ने विजय से बात कहके डॉली पे फ़ैसला छोड़ा

काफ़ी देर तक डॉली सोच में पड़ गयी... एक तरफ उसका भाई था, एक तरफ उसकी बहेन ललिता...

"अंकल.. मैं संजय और ललिता से समान प्यार करती हूँ.. पर वक़्त ऐसा है, ललिता को मेरी ज़्यादा ज़रूरत है.. इसलिए मैं उसके पास जाना चाहूँगी" डॉली ने अपना फ़ैसला सुनाया... विजय को इस फ़ैसले से कोई दिक्कत नहीं थी, पर शन्नो को उसका फ़ैसला बिल्कुल ग़लत लगा

"ठीक है भाई साब.. आप डॉली को भेजिए लोनवाला, और हम लोग कुछ दिन अंशु के घर चले जाते हैं.. शन्नो भी उनसे मिल लेगी, और शायद संजय को भी वहाँ अच्छा लगे.." विजय कहके वहाँ से अपने रूम में चला गया और जाने की तैयारी करने लगा.. कुछ ही देर में डॅड ने डॉली के लिए गाड़ी मँगवाई और उसे रवाना कर दिया, ये कहके के सेफ पहुँच के सबसे पहले वो उन्हे फोन करे.. डॉली के जाते ही विजय शन्नो और संजय भी नीचे आ गये

"चलिए भाई साब, हम निकलते हैं.. कुछ दिन में आ जाएँगे..." ये कहके विजय वहाँ से निकल गया.. जाते जाते संजय ने डॅड को एक बार देखा... उसके ज़ख़्म अभी भरे नहीं थे, वो शायद ठीक से चल भी नहीं पा रहा था.... विजय और शन्नो वहाँ से निकल गये और गाड़ी में जाके बैठ गये, पर संजय वहीं खड़े खड़े डॅड को घूर्ने लगा.... कुछ सेकेंड्स में डॅड भी वहाँ से वापस अपने कमरे चले गये, संजयअकेला रह गया

"ये तुझे बहुत भारी पड़ेगा.. बहुत भारी पड़ेगा वीरानी...." संजय घर में आखरी शब्द बोलके वहाँ से चला गया.. शन्नो को अपने घर देख के अंशु बहुत खुश हुई.. वहीं पूजा और उसका बाप संजय को देख के बहुत नाराज़ थे... पूजा संजय को अपने कमरे में ले गयी

संजय क्या हुआ... " पूजा संजय से बातें करने लगी

 


एक एक कर संजय ने पूजा को सब कुछ बताया.. पूजा संजय से बहुत प्यार करती थी, पर शायद ये भाई बहेन के प्यार से ज़्यादा था...

"संजय, तुम चिंता मत करो... उस वीरानी को तो हम मिलके देख लेंगे, रही बात ललिता की, उसके बदले मैं तुम्हारा ख़याल रखूँगी" कहके पूजा एक एक कर अपने कपड़े उतारने लगी, और नग्न अवस्था में संजय के पास लेट गयी....संजय और पूजा काफ़ी देर तक जब रूम में ही रहे, शन्नो और अंशु उपर गये उन्हे देखने , उन्हे इस हालत में देख दोनो का दिमाग़ तो खराब हुआ, पर कुछ नहीं कहके वहाँ से निकल गये...

"दीदी... ये ग़लत तो है, पर मुझे इसमे कोई दुख नहीं है.." कहके अंशु ने शन्नो के लिए दारू बनाई और उसे ज़बरदस्ती पिलाने लगी...

दोनो बहने, और उनके पति.. रात को काफ़ी देर तक दारू पीते रहे... चारो काफ़ी नशे में आ चुके थे, तभी पूजा और संजय निर्वस्त्र ही उनके सामने आ गये... पूजा को इस हाल में देख विजय से काबू नहीं हुआ और वो उसपे जन्गलियो की तरह टूट पड़ा... इस रात से चालू हुआ उनका ग्रूप सेक्स का मेला... जितने दिन वो लग वहाँ रहे, पार्ट्नर्स की अदला बदली करके चुदाई का संग्राम चलता रहा.. कभी बंद कमरे में, कभी खुले में... कभी थ्रीसम, कभी फोरसम, कभी लेज़्बीयन... पूजा के घर में हो रहे ऐसे कांड देख के उसके दादा दादी के अलावा घर के नौकरों को भी शरम आने लगी थी.... कुछ दिन बाद शन्नो और विजय घर वापस आए, और संजय वहीं से अपनी पढ़ाई करने देल्ही चला गया.. डॅड ने साउत कॅंपस में उसकी अड्मिशन करवा ली... डॅड को इतनी नफ़रत हो चुकी थी कि उन्होने संजय की डीटेल्स, पैसे सब अंशु के घर भिजवाया और उसे वहीं से चले जाने के लिए कहा.. ये एक और चोट थी संजय के लिए.. संजय अब ठान चुका था कि वो इस बात का बदला डॅड से लेके रहेगा...

संजय के जाते ही, कुछ दिनो में मोम, ललिता और डॉली को लेके लोनवाला से लौट आए... ललिता अब काफ़ी खुश लग रही थी.. शायद उसके दिमाग़ में डर ने घर नहीं किया... डॅड ये देख के बहुत खुश थे... ललिता को बार बार इस बात की याद ना आए इसलिए उन्होने ललिता और डॉली को एक ही रूम दे दिया, और संजय का रूम तुडवा दिया... घर का रेनवेशन हुआ, और जो चीज़ जैसी थी, वैसी नहीं रही... सब डाइरेक्षन्स चेंज, इंटीरियर चेंज... डॅड एक भी चीज़ ऐसी नहीं रखना चाहते थे घर पे जिसकी वजह से ललिता को उस इन्सिडेंट की याद आए... कुछ दिनो के बाद घर में हवन करवाया और ललिता को एक बार फिर खुश देख उनको तसल्ली हुई, के उन्होने सही किया जो भी किया...

जहाँ डॅड ललिता को देख खुश थे, वहीं शन्नो बहुत नाराज़ थी.. संजय का उससे दूर होना उसको पसंद नही आया.. वो संजय को बुला नहीं सकती थी, पर रोज़ संजय से फोन पे बात कर लेती.. उधर विजय अब अंशु की चूत का दीवाना बन बैठा था.. दिन रात बस उसे चुदाई ही चाहिए थी...

"अरे मेरी जान, चोदने दे ना, कितना टाइम हो गया तेरी चूत खाए" विजय एक रात शन्नो से बोलने लगा

"छोड़ो भी... अब कितनी बार चोदोगे, सुबह ही तो किया, और फिर दोपहर को खाना खाने के बहाने से आए उस वक़्त भी किया.. थोड़ा बिज़्नेस में ध्यान दो, पैसा रहेगा तो चूतें भी बहुत मिलेंगी आपको.." शन्नो की ये बात थी तो बिल्कुल सही, पर विजय का दिमाग़ अब बंद हो चुका था.. बिज़्नेस में उसका ध्यान पहले से ही कम था, अब उसको ऑफीस जाने का बिल्कुल मन नही करता था... फॅक्टरी टाइम में बीच में से ही निकल जाना, बार बार घर आके शन्नो को चोदना, फिर जिस रात शन्नो उसे चूत ना दे, वो अंशु और पूजा के पास चला जाता... अंशु और पूजा ने उसे अपनी चूत का गुलाम बना दिया था... धीरे धीरे शन्नो में उसकी रूचि ख़तम होती गयी, और वो अंशु और पूजा की चूत में पड़ा रहता...

एक सुबह की बात है, जब डॅड और विजय ऑफीस के लिए गाड़ी में निकल रहे थे..

"विजय, आज ऑफीस छोड़के कहीं मत जाना प्लीज़.. मैं एक मीटिंग के लिए जा रहा हूँ, पीछे हमारे पुराने क्लाइंट्स आने वाले हैं, उन्हे हॅंडल करना तुम प्लीज़... ओके" डॅड ने निर्देश देते हुए कहा

ऑफीस पहुँचते ही पापा ने विजय को ड्रॉप किया और खुद मीटिंग के लिए निकल गये... विजय ने सुबह सुबह अपना काम शुरू किया, लेकिन जैसे जैसे वक़्त बढ़ता गया उसकी वासना जागने लगी.. दोपहर को करीब 12 बजे वो अपनी कॅबिन में बैठा था, जब डॅड की असिस्टेंट विजय से कुछ डॉक्युमेंट्स पे साइन लेने आई.. जैसे ही डॉक्युमेंट्स साइन करवा कर वो पलटी, उसकी टाइट पॅंट में उसकी गान्ड देख के विजय से रुका नहीं गया और उसके बारे में सोचने लगा.. करीब 1 बजे, उसने असिस्टेंट को एक गॉडाउन में बुलाया जो बिल्कुल खाली था...

"सर आपने बुलाया मुझे" आसिटेंट अंदर जाती हुई बोली

"हां रीना... एक नोट बनाओ प्लीज़, डिकटेट करता हूँ मैं तुमको.."

 


डिक्टेशन देने के बहाने, विजय काजल के चारो और घूमने लगा और उसके शरीर को निहारने लगा.. आगे से पीछे से... डिकटेट करते करते विजय से काबू नहीं हुआ और उसने काजल पे पीछे से हमला किया.. पीछे से काजल को पकड़ के वो उसके कपड़े फाड़ने लगा... काजल उससे पीछा छुड़ा के भाग ही रही थी..

"कहाँ भाग रही है साली मदर्जात...गंद उछाल उछाल के हमारे लंड खड़े करती है और अब नाटक करती है हाँ" कहके विजय ने एक तमाच्चा मारा और काजल के उपर आ गया... ज़बरदस्ती में विजय ये भी भूल गया कि गॉडाउन खुला है...

उधर डॅड मीटिंग करके वापस आए ही थे, कि उन्हे काजल दिखी नहीं.... इंक्वाइरी करने पे पता चला कि किसी ने उसे गॉडाउन में आते हुए देखा है.. डॅड कन्फ्यूज़्ड थे कि काजल का गॉडाउन में क्या काम.. ये सोच के डॅड जैसे ही गॉडाउन में पहुँचे, उन्होने अपनी आँखों से देखा, शेफाली ज़मीन पे लेटी हुई थी, उसके आँसू थम नहीं रहे थे, और विजय अपने कपड़े पहन रहा था...

"चल चल उठ अब... रो मत इतना, तेरी पगार डबल कर दूँगा समझी, रोज़ मेरा बिस्तर गरम करने का बस.." कहके विजय जैसे ही पलटा, डॅड ने उसके गाल पे तमाचा मारा.... ये वो वक़्त था जब डॅड गवरमेंट कांट्रॅक्ट में लगे हुए थे... वो नहीं चाहते थे कि ये बात का इश्यू बने... इसलिए उन्होने एचआर से बात की और वर्कर्स और सभी स्टाफ मेंबर्ज़ को यकीन दिलाया कि जो हुआ वैसा कभी नहीं होगा.. फॅक्टरी के हर एक कोने में सीक्ट्व कॅमरा लगे... हर कोने में सेक्यूरिटी तैनात थी, विद ऑर्डर्स के आगे से ऐसा कुछ हो टू दे हॅव ऑल दा राइट्स टू डीटेन दा कॉन्विक्ट.. लेकिन डॅड विजय को इसकी सज़ा भी देना चाहते थे. वो ये नहीं चाहते थे कि विजय ये समझे कि डॅड ने उसे माफ़ किया...

"कुछ ऐसा कीजिए कमिशनर साब, कि मेरा सौतेला भाई ये ना समझे के वो बच गया.. लेकिन मैं नहीं चाहता कि ये रेप वाली बात बाहर निकले.." डॅड ने कमिशनर के साथ ड्रिंक लेते हुए कहा

"उससे पहले वीरानी जी, आप इन्हे सेट्ल कीजिए" कमिशनर ने काजल को अंदर बुलाते हुए कहा

"हमने इनकी एफआइआर नोट नहीं की है, क्यूँ कि आप इन्वॉल्व्ड हैं" कमिशनर ने काजल को बिठाते हुए कहा

"काजल... मैं बहुत शर्मिंदा हूँ जो भी हुआ उसके लिए.." उन्होने काजल के मोम डॅड को बिठाने के लिए कहा

"देखिए, मैं आपसे ये नहीं कहूँगा कि आप इस बात को भूल जाओ.. पर हां, मैं सिर्फ़ ये कहूँगा, के ये ज़िंदगी का अंत नहीं है.. मैं आपसे गुज़ारिश करूँगा कि आप एक नयी शुरुआत करें... मैं आपको एक बंगलो, और हमारी कंपनी में डबल प्रमोशन विद डबल सॅलरी दे रहा हूँ.. और आप ये ना समझें कि ये आपके मूह बंद रखने की कीमत है.. अगर आप इसके बाद भी कंप्लेंट करना चाहेंगी तो भी मुझे कोई प्राब्लम नहीं है.." डॅड ने कमिशनर को देखते हुआ कहा काजल से

"काजल जी... ये मिस्टर वीरानी हैं जो आपको ये ऑफर दे रहे हैं.. लेकिन अगर मैं आपसे सच कहूँ तो आपको कंप्लेंट करके कुछ हासिल नहीं होगा.. ये हमारे देश की ब्युरॉक्रसी है जिसकी वजह से केस कभी ख़तम नहीं होगा.. उल्टा बाहर 10 लोगों को बात पता चलेगी तो बदनामी और बढ़ेगी... मेरी आपसे ये सलाह है कि आप इनकी ऑफर स्वीकारें, और एक नयी शुरुआत कीजिए.." कमिशनर ने काजल के सर पे हाथ घूमाते हुए कहा

"पर साहब... हमारी बेटी पे तो दाग लग गया ना, उससे कौन करेगा शादी.. हम तो लूट गये ना" काजल के माँ बाप ने मिलके डॅड और कमिशनर से कहा

"आप उसकी फिकर ना करें... हमारी ऑफीस में एचआर मॅनेजर हैं, वो काजल से शादी करने के लिए तैयार हैं.. और मेरे कहने पे नहीं, वो तो इसको दो दिन में प्रपोज़ करने वाले थे" डॅड ने काजल को खुश करने के लिए कहा.. बात ये थी कि जिस दिन ये किस्सा हुआ, उस दिन डॅड को ये ख़याल आया ही था कि ऐसा सवाल ज़रूर उठेगा, इसलिए उन्होने एचआर मॅनेजर को बुला के निर्देश दिए कि काजल से शादी करने पर उसको भी प्रमोशन मिलेगा और एचआर वाला मान गया...

 


डॅड की ये बात सुनके, काजल के माँ बाप खुश हुए, पर काजल अभी भी सहमी बैठी हुई थी...

"काजल, तुम चलो घर, मैं सब डॉक्युमेंट्स लेके तुम्हारे घर पहुँचा देता हूँ... आंड बी स्ट्रॉंग.. ओके बेटे" डॅड ने काजल को वहाँ से जाने के लिए कहा..

4 दिन में काजल की शादी हुई और उसकी सब तैयारियाँ डॅड ने करवाई कंपनी एक्सपेन्सस से.. शादी के बाद उन्होने कपल को हनिमून पे भी भेजा सिंगपुर... सब खुश थे, डॅड खुश थे क्यूँ कि बात बाहर जाती तो उन्हे गवरमेंट कांट्रॅक्ट नहीं मिलता, कमिशनर खुश था क्यूँ कि डॅड ने उसे भी खुश किया था ताकि एफआइआर नोट ना हो और बात दब जाय... लेकिन सबसे ज़्यादा खुश विजय था क्यूँ कि उसे लगा वो बच गया... पर उसकी खुशी ज़्यादा देर नहीं टिकी..

"विजय, तुम फॅक्टरी पहुँचो मैं दूसरी गाड़ी में आता हूँ.." डॅड ने एक सुबह विजय को कहा

विजय गाड़ी लेके फॅक्टरी की ओर निकला, जहाँ रास्ते में उसे पोलीस ने रोका...

"सर दिक्क़ी खोलिए, रुटीन चेकिंग है" चेक पोस्ट पे पोलीस ने कहा

जैसे ही विजय ने डिकी खोली

"सर... सर... इधर आइए , ये बॅग देखिए , हवलदार चिल्लाया" ये आवाज़ सुनके विजय बाहर निकला और इनस्पेक्टर भी पहुँच गया

विजय को पोलीस ने गिरफ्तार किया, और पोलीस ने मीडीया में स्टेट्मेंट रिलीस किया.. दूसरे दिन की लोकल न्यूसपेपर की हेडलाइन्स थी..

"विजय वीरानी, जॉइंट चेर्मन ऑफ वीरानी मॅन्यूफॅक्चरिंग प्राइवेट लिमिटेड कॉट विद ड्रग्स वर्त 10 लॅक्स.. ही ईज़ टिप्ड टू बी असोसीयेटेड विद लोकल ड्रग माफिया"

 
विजय को कुछ दिन हवालात में गुज़ारने पड़े.. लेकिन अंशु के पति ने उसकी बैल करवाई.. डॅड मीडीया और गवरमेंट के प्रेशर में थे जो उन्होने खुद ही बनाया था.... इसलिए उन्होने विजय की बैल नही करवाई, और मीडीया में प्रेस रिलीस भेज दिया

"दिस ईज़ टू इनफॉर्म दा एंटाइयर मीडीया आंड ऑल दा एंप्लायीस ऑफ दा कंपनी, ड्यू टू सम अनफॉर्चुनेट इवेंट दट हॅज़ टेकन प्लेस रीसेंट्ली, आइ अफीशियली टर्मिनेट दा एंप्लाय्मेंट ऑफ मिस्टर विजय वीरानी ऐज जॉइंट चेर्मन फ्रॉम दिस कंपनी.. हाउएवर ड्यू टू हिज़ पर्सनल स्टेक इन दा होल्डिंग्स ऑफ दा कंपनी, ही कॅन स्टिल वर्क बट ओन्ली ऐज प्रोडक्षन हेड ऑफ दा कंपनी... वन्स दा केस अगेन्स्ट हिम ईज़ प्रूव्ड ऑर इफ़ ही ईज़ नोट गिल्टी, सूटेबल आक्षन विल बी टेकन इन फर्दर कोर्स ऑफ टाइम..."

 
बॅक टू प्रेज़ेंट



"भाई... भाई... व्हाट हॅपंड...." ललिता ने मुझे कंधे से झटकते हुए पूछा

"हुह... क्या कहा तुमने..." मैं अपने ख़यालों से बाहर आके पूछा

"कुछ नहीं... आप ही खो गये थे संजय के नाम से" ललिता ने अपना चेहरा बनके बोला

"आंड वैसे भी भाई, अगर मैं मान लूँ आपकी बात, तो संजय को फॅक्टरी के फाइनान्षियल्स के बारे में कैसे पता... ऐज ऑफ नाउ आइ आम अस्यूमिंग कि पूजा की शादी आपसे सिर्फ़ फॅक्टरी में स्टेक की वजह से हो रही है.. अंकल ने अपनी पर्सनल वेल्त पूजा और आपके नाम की है वो तो पूजा को कल पता चला... सो क्वेस्चन रिमेन्स, हाउ जय नोज अबाउट फाइनान्षियल्स ऑफ दा कंपनी हाँ" ललिता मेरे सामने चेर लेके बैठ गयी

"तेरे डॅड... उन्होने ही बताया होगा" मैने जवाब दिया ललिता को

"ओह कम ऑन भाई... डॅड कुछ पढ़े लिखे नहीं है, आप जानते हो, उनको फाइनान्षियल्स तो क्या उनको फाइनान्स का फ भी नहीं पता... और अगर उन्हे फाइनान्षियल्स पता होते तो वो अंकल के पर्सनल असेट्स भी जानते होते... उन्होने प्लाननिग सिर्फ़ ये समझ के की है कि पूजा को फॅक्टरी का ओनर बनाएँगे और अंकल के नाम जो प्रॉपर्टी है उनकी वॅल्यू 35 करोड़... अभी तो उनको कंपनी के होल्डिंग स्ट्रक्चर भी नहीं पता हैं विच अलोन ईज़ वॅल्यूड अट 20 करोड़ अट दा फेस वॅल्यू.. अभी तो हमारी कंपनी लिस्टेड भी नहीं है, जब वो होगी दिस वॅल्यू कॅन गो 10 टाइम्स हाइयर ऐज वेल... सो दट विल कम टू 200 करोड़ ओन्ली शेर्स वॅल्यू... मेरे डॅड को इतना नालेज होता तो ये पेसोनल वेल्त आज उनकी होती.... आंड बिसाइड्स, डॅड को अपनी होल्डिंग्स की वॅल्यू नहीं पता तो अंकल को कैसे मालूम होगी.. थ्ट्स इट" ललिता ने सॉफ सॉफ अपनी बात कही

"अगर आप कॅल्क्युलेट करोगे, अंकल का नेट वर्थ 265 करोड़ से 465 करोड़ होगा, इफ़ यू आड दा कंपनी होल्डिंग्स वॅल्यू.. कन्सिडरिंग के कंपनी लिस्ट होने वाली है इन कमिंग यियर्ज़ , से 2 ओर 3 यियर्ज़.. अगर उससे ज़्यादा होगा तो प्रॉफिट बढ़ेगा तो कंपनी की वॅल्यू भी अकॉर्डिंग्ली बढ़ेगी.." ललिता ने फाइनली अपनी बात ख़तम कि और मेरे लिए और खुद के लिए एक सिगर्रेट जला ली

"ललिता, इतना ध्यान से स्टेट्मेंट्स को तुमने और मैने पढ़ा है.. बट यू नो, हमारे अलावा एक और बंदा है जो हमारे स्टेट्मेंट्स देखता है... रोज़, सुबह शाम... " मैने ललिता को क्लू देते हुए कहा

"भाई, मैं समझ गयी आपका क्लू... वी नीड टू डील विद हिम इन लीगल वे ऑलराइट.. हां उससे बात निकलवानी है तो कल हम चलते हैं उसके पास.. फिलहाल सो जाते हैं, रात के 3 बज गये हैं.." कहके ललिता फिर मेरे बेड पे सो गयी..

"ये क्या है, रोज़ रोज़ इधर क्यूँ.." मैने मस्ती मे ललिता से पूछा

"क्यू , नहीं सो सकती, सिर्फ़ बीवी ही सोती है क्या.. भाई बहेन नहीं सो सकते... बड़े आए" ललिता कहके हँसने लगी

कुछ सेकेंड्स तक मैं खामोश रहा... मेरे दिमाग़ में एक सवाल था, जो मैं ललिता से उस वक़्त पूछना चाहता था, पर समझ नहीं आ रहा था कैसे पूछूँ...

"क्या हुआ.. कुछ बाकी है पूछना भाई." ललिता बेड से उठके मेरे पास बैठ गयी

"ललिता.... आइ आम सॉरी तुझे संजय की याद दिला दी, बट इन सब चीज़ों में मैं भूल गया था कि एक वक़्त ऐसा भी आया था जब मैने तुम्हारे साथ भी होटेल में...." इससे आगे मैं बोल नहीं पाया

"भाई... आप प्लीज़ ऐसा मत सोचो... संजय ने ज़बरदस्ती की थी, और हम मर्ज़ी से थे.. हां हमारे हालत ऐसे थे कि हम मजूर थे उस वक़्त, लेकिन संजय की कोई मजबूरी नहीं थी.. इसलिए आप प्लीज़ अपनी तुलना उसके साथ ना करें... यू आर माइ बेबी यार, कम ऑन नाउ, गिव मी हग " कहके ललिता ने अपनी बाहें खोली और मैं उसके गले लग गया

"अब सो जाइए, सुबह को काम है याद है ना... बस एक आखरी काम , फिर परदा उठाने का टाइम है" ललिता ने मेरे कान में कहा

ललिता और मैं यूही बातें करते करते सो गये.. रात को लेट सोए थे, तभी सुबह हम दोनो की आँख नहीं खुली.. दोपहर के 2 बजे करीब हमे मोम और शन्नो दोनो उठाने आए

"बेटे उठो, तुम दोनो यहाँ क्यूँ सोए हो" मम्मी ने ललिता को उठाते हुए कहा

', उठो भी, अब चलो तैयार हो जाओ, मेहमान आए हुए हैं घर पे.. 2 बज गये हैं दोपहर के" शन्नो ने मुझे उठाते हुए कहा

"व्हाट !!!! 2 बज गये... आपने हमे पहले क्यूँ नहीं उठाया मोम..." ललिता और मैं दोनो एक साथ बोल पड़े उठ के...

"तुम यहाँ क्यूँ सोई हो ललिता" शन्नो ने गुस्से में ललिता से पूछा

"मम्मी, मैं अपने कमरे में ही थी, पर रात को डर लग रहा था, इसलिए सुबह 4 बजे भाई के कमरे में आ गयी.. और देरी हो गयी" ललिता ने झूठ बोल दिया

 


ललिता और मैं जल्दी तैयार होने लगे.. तैयार होके हमने लंच किया और जल्दी से गाड़ी में बैठ के पास ही बनी बस्ती में चले गये...

"बेटा, शाम को जल्दी आना.." जाते जाते मैने मोम की चीख सुनी

जैसे ही हम बस्ती में पहुँचे, कुछ दूर जाके हमे एक आदमी दिखा

"गफ़ूर भाई..." ललिता ने उस आदमी से पूछा

"मैं हूँ बोलो..." गफ़ूर ने हमे देखते हुए अपनी कड़क आवाज़ में कहा

मैने जेब से 10,000 की गॅडी निकली और उसे काम समझा दिया..

"हहहा... आपका काम 2 घंटे में हो जाएगा... कहाँ मिलना है शाम को" गफ़ूर ने हमे पूछा

"यहीं, हम 2 घंटे में फिर आएँगे, तुम उसे ले आओ.. और अपने घर में खातिरदारी करो" मैने जाते हुए गफ़ूर को कहा

दोपहर के करीब 3.30 बज रहे थे.. भूख बहुत लगी, ललिता और मैं नज़दीकी एमसीडी में चले गये.. जाके हमने खाना ऑर्डर किया और बातें करने लगे

"आइ थिंक दिस ईज़ इट.. इसके बाद हमारा कोई काम पेंडिंग नहीं रहता भाई.." ललिता ने अपना बर्गर खाते हुए कहा

"हां.. बाकी तेरी सब फ्रेंड्स को इन्वाइट दे दिया तूने..." मैने अपने मोबाइल में देखते हुए पूछा

"हां भाई.. अब आप खाओ कुछ पहले" ललिता ने मेरे हाथ से मोबाइल लेके अपने बॅग में डाल दिया

"अरे मैं चेक कर रहा हूँ सब फ्रेंड्स को इन्वाइट दिया कि नही... मेरी कंपनी में भी सब को इन्वाइट चेक कर रहा हूँ" मैने अपना मॅक खाते हुए बोला

"चलो.... आज हुई 17.. कल रात को पत्ते खुलेंगे भाई. वैसे ज़य भी कल आएगा ना.. बीन लोंग टाइम उसको देखे हुए...कितने बजे फ्लाइट है उसकी" ललिता ने एक और बर्गर ऑर्डर कर दिया अपने लिए

"उसका मसेज नहीं आया अब तक, फोन दे तो पूछूँ" कहके मैं फिर अपने मोबाइल के लिए हाथ बढ़ाया और ज़य को कॉल किया

"हां छोटू.. कितने बजे की फ्लाइट है भाई तेरी कल की" मैने ज़य से पूछा

"भाई, दोपहर 12 बजे आ जाना आप. और मैं कितने बजे आ रहा हूँ बस आप ही जानते हो ओके, " ज़य ने जवाब दिया

"हां छोटू जानता हूँ, लास्ट टाइम पायल लेने आई थी तुझे अच्छा नहीं लगा... चिंता मत कर, इस बार मेरे साथ एक स्वीट सर्प्राइज़ है तेरे लिए" चल बाइ

"क्या भाई, मेरी तो बात करवाते कम से कम... चलो, कल मैं भी चलूंगी साथ आपके" ललिता फिर अपना बर्गर खाने में लग गयी

"हां रे, यूआर दा सर्प्राइज़ फॉर हिम..." मैने इतना ही कहा के एक अननोन नंबर से कॉल आया

"हेलो... हू ईज़ दिस..." मैने फोन पे पूछा

"गफ़ूर भाई है अपुन... आपका पार्सल आएला है, मेरे घर आ जाओ" कहके उसने फोन कट किया

ललिता और मैं बिल पे करके गफ़ूर की बस्ती में चल दिए.. शाम होने आई थी, इसलिए ट्रॅफिक बढ़ने लगा था... जैसे जैसे हम गफ़ूर के घर के नज़दीक पहुँचते, हमारे दिल की धड़कन तेज़ होती जाती.. अगर हमारा अंदाज़ा सही है तो कोई प्राब्लम नहीं है, लेकिंग अगर हमारा अंदाज़ा ग़लत हुआ तो डॅड से मार पड़ेगी और लीगल केस भी हो सकता था ललिता और मुझ पे...... ललिता और मैं तेज़ी से चलते चलते गफ़ूर के घर के बाहर पहुँचे..

"फ्यू !!!! होल्ड माइ हॅंड... आइ डोंट वान्ट टू स्किप माइ हार्टबीट नाउ..." कहके ललिता ने मेरा हाथ पकड़ा और ज़ोर ज़ोर से साँसे लेने लगी...

"चलो, " कहके ललिता ने दरवाज़ा खाटकाया और दरवाज़ा खुलते ही हम अंदर आ गये

 
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