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रंगीन रातों की कहानियाँ

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भैया लंड दिखाओ ना प्लीज़

हेल्लो दोस्तो एक और झन्नाटेदार कहानी पेश कर रहा हू जिसे पढ़ कर आप अपना लंड हिलाने पर मजबूर हो जाएँगे .. मेरा नाम अंशुमन है और में इस साईट का बहुत चाहने वाला हूँ.. क्योंकि मुझे ब्लू फिल्म देखने से ज़्यादा मज़ा इस साईट की स्टोरी पढ़ने में आता है और शायद आप सभी को भी आता होगा में अधिकतर लेस्बियन कहानियाँ ही पढ़ता हूँ और कभी कभी देसी भी. मेरी उम्र अभी 20 साल है और मेरे साथ 11 अगस्त को बहुत मस्त घटना हुई जो में आज आप सभी से शेयर करना चाहूँगा और वो मेरे दिमाग़ से हट ही नहीं रही.. बाकी सब स्टोरी का पता नहीं.. लेकिन यह स्टोरी बिल्कुल एकदम असली है और अब में उस दिन को पुरानी यादोँ की तरह आप सभी के सामने रखता हूँ. मेरी छोटी बहन 19 साल की है और उसका नाम प्रेरणा है और पता नहीं मुझे एकदम से क्या हो गया है कि में आजकल उसी को देखकर तड़पता रहता हूँ बेहन को छोड़ा और उसको पता भी नहीं चलने देता कि में उसके साथ सेक्स करना चाहता हूँ.. लेकिन क्या बताऊँ कि अगर वो मुझे मिल जाए तो फिर और कोई नहीं चाहिए. यह अहसास आप सभी समझते होंगे और मेरे ख्याल से सारे भाई अपनी बहन के साथ सेक्स करने की इच्छा अपने मन में दबाए रखते है. फिर मैंने इस दिशा में कभी कोई कदम नहीं उठाया और मेरी कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं बनी और कभी किसी को मैंने ट्राइ ही नहीं किया और सच बोलूं तो में लड़कियों के मामले में थोड़ा शर्मीला स्वभाव का हूँ.

इसलिए तो मैंने एक दिन डिसाईड किया कि धीरे धीरे कुछ ट्राई किया जाए और कुछ ऐसा किया जिससे प्रेरणा खुद ही मुझसे सेक्स करना चाहे और में जब भी कोई मौका हाथ लगता उसको देखना नहीं छोड़ता था.. उसकी नाभि, उसके बूब्स, उसकी छाती, उसके पैर, उसकी गांड, और कभी उसकी कमर.. सब की एक तस्वीर बनाकर रोज़ उसके नाम की मुठ मार ही लेता था. फिर वो भी इस उम्र में हर रोज़ धीरे धीरे सेक्सी होती जा रही थी और धीरे धीरे में उससे सभी बातें शेयर ज्यादा करने लगा.. उसका भी कोई बॉयफ्रेंड नहीं था और फिर में उसको सेक्सी कहानियाँ मेल करने लगा एक फेक आई.डी से जिसमे लेस्बियन या देसी सेक्स वाली अच्छी स्टोरी होती थी.. लेकिन मुझे पता नहीं था कि वो पढ़ती थी या नहीं और सिर्फ़ मुझे एक बार पता लग जाए कि वो उन स्टोरी को पढ़ती है.. तो मुझे पता चल जाए कि वो क्या और कैसा सोचती है एक भाई से सेक्स करने के बारे में?



फिर सभी स्टोरी की तरह में उसको नहाते हुए नहीं देख पाता था और ना ही बाकी स्टोरी की तरह में रात को उसके साथ सोता था जिससे उसको छू सकूँ.. में ज़मीन पर गद्दा बिछाकर सोता था और वो ऊपर बेड पर सोती थी. में ट्राई करता था कि उसको देखता रहूँ क्योंकि उसकी उम्र हो गयी थी चूत में ऊँगली करने की.. कभी वो सोचे कि में सो रहा हूँ और वो चूत में ऊँगली करे तो में उसको ऐसा करते हुए देखना चाहता था. में उसकी पेंटी, ब्रा तो सूंघने लगा था और मुठ मारने लगा था. फिर कभी वो बाथरूम में पेंटी, ब्रा को छोड़कर आती थी तो में उनको सूंघकर ही में बहुत खुश हो जाता था और में आजकल उससे बहुत खुलकर बातें करता था जिससे उसकी पसंद ना पसंद का पता लग जाए और जब भी मौका मिलता था उसको हग करता था. उसके बूब्स को महसूस करने के लिए में उसको अपने साथ बाईक पर घुमाने लगा.. क्योंकि वो पीछे से थोड़े बूब्स मेरी कमर पर छू देती थी.

एक दिन में जब बाईक पर उसके साथ था तो उसने मुझे किसी जनरल स्टोर के बाहर रोका और कहा कि 15 मिनट रुको में अभी आती हूँ. तो मैंने ज्यादा नहीं सोचा.. लेकिन में उसके पीछे नहीं गया और थोड़ी देर बाद मैंने सोचा.. कि में अंदर जाता हूँ और मुझे पता लगा कि उसको ब्रा, पेंटी लेने थे. फिर 2-3 दिन के बाद बाथरूम में उसकी नयी वाली पेंटी, ब्रा पड़ी हुई थी में बहुत गरम हो गया और मैने फिर से मुठ मार ली और मैंने ध्यान दिया कि वो भी आजकल मेरी तरफ आकर्षित होने लगी थी और एक दिन उसका मेरी फेक आई.डी पर जवाब आया कि वो भी ऐसी कहानियों को बहुत पसंद करती है और मुझे बहुत अच्छा लगा.. क्योंकि मुझे अब भरोसा था कि उसको फंसाने में बहुत मज़ा है.. लेकिन अब उसको अपनी तरफ आकर्षित कैसे करूं यही सोचना था. दोस्तों आपको बता दूँ कि मेरी फेक आई.डी से उसको लगता था कि कोई लड़की उसको स्टोरी भेजती है.

फिर एक दिन वो स्कूल में थी और जब मैंने देखा कि वो ऑनलाईन है.. तो मैंने फेक आई.डी से उससे चेट करना शुरू किया.. फिर उसने मुझे बताया कि वो भी भाई के साथ सेक्स करना चाहती है. तो मेरा लंड एकदम खड़ा हो गया.. लेकिन दोस्तों में उसको कैसे पूछूँ और कैसे किस तरह उसको चोद सकूँ समझ में नहीं आ रहा था और वो पता नहीं कैसा व्यहवार करेगी और में बहुत डरता भी था और शरम भी बहुत थी. फिर मैंने एक प्लान बनाया और थोड़ा दिमाग़ लगाया.. उस समय मेरे एग्जाम थे.. मैंने उसको बोला कि मुझे सुबह जल्दी 6 बजे उठा देना. क्योंकि वो रोज़ जल्दी उठकर मम्मी की किचन के कामों में मदद करवाती थी और एक्ससाईज़ भी करती थी. फिर मैंने भी थोड़ा पहले का अलार्म लगा लिया और सुबह सुबह उठकर उसके बारे में सोचने लगा.. तो मेरा लंड खड़ा हो गया और इंतजार करने लगा. कि वो मुझे उठाए और उसको पता लग जाए कि मेरा लंड खड़ा हुआ है.

फिर थोड़ी देर बाद वो मुझे उठाने आई.. और थोड़ी देर मैंने नींद में होने का नाटक किया.. में नीचे जमीन पर बिस्तर डालकर सोता हूँ इसलिए वो मुझे झुककर उठा रही थी और उसकी सुंदर छाती को देखकर मेरा लंड ज्यादा खड़ा हो गया और उसको भी पता लग गया कि मेरा खड़ा है. मैंने ग़लती से उसके बूब्स के ऊपर से हाथ लगा दिया और नींद में होने की बात सोचकर उसने कोई विरोध नहीं किया और उसका हाथ भी स्टाईल से मैंने अपने लंड पर छू दिया.. लेकिन उसने कोई भी विरोध नहीं किया और धीरे धीरे मुझे महसूस होने लगा कि एक दिन तो में उसके साथ सेक्स कर ही लूँगा और काश में उससे सीधा पूछ पाता.. लेकिन में बहुत शर्मिला स्वभाव का था और एग्जाम टाईम था इसलिए रोज़ यह सब होने लगा. वो कुछ हलचल नहीं करती थी और रोज़ में ग़लती से उसके बूब्स छू लेता था. उसको भी पता था कि में बहुत शर्मीले स्वभाव का हूँ और उसका भी सेक्स करने का मन होने लगा. फिर मेरे एग्जाम खत्म हो गये और एक दिन उसने मुझे बोला कि आज कल आप लेट उठने लगे हो भैया.. रोज़ सुबह जल्दी उठना चाहिए. तो में समझ गया कि उसको भी लंड चाहिए? तो मैंने पूछा कि क्यों अब क्या करूं जल्दी उठकर?

प्रेरणा : जल्दी उठकर एक्ससाईज़ किया करो.. में भी करती हूँ.. या मॉर्निंग वॉक पर जाया करो.

में : नहीं में फिट हूँ मुझे नहीं करनी एक्ससाईज़.

प्रेरणा : यार आप आज कल मोटे हो रहे हो.

में : ठीक है कल से करेंगे.. लेकिन तेरे साथ ही करूँगा.

प्रेरणा : ठीक है भाई और क्या करेगा मेरे साथ?

में : क्या मतलब?

प्रेरणा : कुछ नहीं मेरा मतलब है कि मॉर्निंग वॉक पर भी चलेंगे ना.

में : हाँ क्यों नहीं?

अब में हर रोज़ एक्ससाईज़ के वक्त में उसको बहुत छूने लगा था.. रोज़ वो मुझे जल्दी उठाती थी और हर रोज़ वही होने लगा. मुझे आखिरकार एक दिन उसको चोदना था और एक दिन मम्मी को मौसी के यहाँ पर जाना पड़ा. पापा ऑफिस में थे और वो दूसरा शनिवार था.. हमारी छुट्टी थी तो मैंने कुछ नहीं बोला और फिर ..

प्रेरणा : उठो भैया.

में : नहीं.. आज आलस आ रहे है और तुम भी सो जाओ.

प्रेरणा : क्या में यहीं सो जाऊँ आपके पास?

में : हाँ क्यों नहीं.

प्रेरणा : ठीक है भैया आज घर में कोई नहीं है मम्मी मौसी के घर गयी है.

में : तो अब खाना कौन बनाएगा.. तू?

प्रेरणा : क्या यार.. आपको भी उठने से पहले भूख लग जाती है.

बेहन को छोड़ा

में : ज़ोर ज़ोर से हंसने लगा.

प्रेरणा : और बताओ भाई क्या चल रहा है?

में : कुछ नहीं यार.

प्रेरणा : भाई में जब भी आपको उठाने आती हूँ तब आप सोए हुए रहते है.. लेकिन आपका सुबह सुबह ऐसे क्यों खड़ा हुआ रहता है?

में बहुत चकित और खुश और नर्वस और गरम.. सारा मिक्स सा अहसास आ रहा था और उसे क्या जवाब दूँ? समझ में नहीं आ रहा था और फिर मैंने कहा.. कि मुझे पेशाब आ रहा है और में उठकर बाथरूम में चला गया.

प्रेरणा : क्या हुआ? वापस आओ ना मेरे साथ थोड़ी देर लेटो.. कुछ बात करनी है.

में : हाँ आ रहा हूँ.

प्रेरणा : आपको में कैसी लगती हूँ?

में : तू बहुत अच्छी है.. लेकिन तू ऐसा क्यों पूछ रही है?

प्रेरणा : यार आप बहुत शर्मीले हो और आपकी कोई गर्लफ्रेंड भी नहीं है और मेरा भी कोई बॉयफ्रेंड नहीं है.

में : हाँ मेरी तो अभी तक कोई गर्लफ्रेंड नहीं है.. लेकिन तेरा कोई बॉयफ्रेंड क्यों नहीं है? और तू तो दिखने में भी बहुत अच्छी लगती है.

प्रेरणा : क्या भैया आजकल अच्छे लड़के है ही नहीं.. सब गंदे है और मुझे वो पसंद नहीं.. कोई वैसे भी आप की तरह अच्छा दिखने वाला हो और आप क्यों नहीं पटाते कोई? आप बहुत शर्मीले हो.

में : हाँ यार और अब मेरा लंड फिर से बहुत टाईट हो रहा था.

उसको फिर मेरा खड़ा हुआ लंड महसूस हुआ. इस बार मैंने उसके गाल पर छोटा सा किस कर दिया और उसने भी मेरे सर पर किस कर दिया.

प्रेरणा : में आपसे बहुत प्यार करती हूँ भैया और आप बहुत अच्छे हो मेरा बहुत ध्यान रखते हो.

फिर वो मेरे ऊपर लेट गयी और में पीछे से उसकी ब्रा महससू कर रहा था और उसकी गांड भी. तभी वो बोली कि भैया अब शरमाओ मत और एक किस करने में आपका खड़ा हुआ है प्लीज़ मुझे फिर से किस करो ना. फिर मैंने कुछ नहीं सोचा और उसके गुलाब जैसे होंठो को ऐसा किस किया कि क्या बताऊँ? बहुत चूसा उसके होंठो को और उसने भी और एक दूसरे को गीले वाले किस किए और हम बहुत देर तक किस करते रहे.. करीब 12 मिनट तक वो मेरे ऊपर लेटी हुई किस करती रही और में किस करते हुए उसकी गांड को मसल रहा था. तभी अचानक से वो उठकर चली गयी और रोने लगी.

में : क्या हुआ.. रो क्यों रही है.

प्रेरणा : भाई यह क्या हुआ? और यह क्या कर दिया हमने? क्यों यह बहुत ग़लत है ना? सब मेरी ग़लती है मैंने ही आपको उकसाया.. आप तो कुछ नहीं करने वाले थे.

में : रो मत और अब चुप हो जा कुछ नहीं करना तो कोई बात नहीं और मुझे माफ़ कर दे में ही तुझे वो सेक्सी कहानियाँ भेजता था.

प्रेरणा : क्या? तुम पागल हो.

में : मुझे माफ़ करो वैसे किस कैसा था?

तो वो कूदकर मेरी गोद में आ गयी और फिर से किस करना स्टार्ट कर दिया और इस बार भी अच्छा किस था और उसने मेरी टी-शर्ट को उतार दिया और मैंने भी उसका टॉप उतार दिया.. वो ब्रा में बहुत अच्छी लग रही थी. क्या बताऊँ एकदम ग़ज़ब? और फिर से किस करना स्टार्ट कर दिया. तो वो बोली कि क्यों भैया आपको सब आता है ना?

में : हाँ मैंने बहुत ब्लू फिल्म देखी है.

प्रेरणा : कंडोम है?

में : छोड़ उसको उसका अभी क्या काम?

फिर मैंने उसकी ब्रा उतार दी और किस करते हुए उसकी कमर को मसलने लगा.. वो बहुत अच्छे से किस कर रही थी. मैंने उसको रोककर उसके बूब्स दबाए और उसके बूब्स चूसने लगा.. लेकिन उसके बूब्स बड़े बड़े एकदम गोरे बहुत अच्छे आकार में थे और बहुत अच्छे निप्पल भी थे. में बहुत देर तक दोनों बूब्स को एक एक करके चूसता रहा और हम फिर से किस करने लगे.

प्रेरणा : भैया आपका लंड दिखाओ ना प्लीज़.

में : पहले तू तेरी चूत दिखा ना.

प्रेरणा : आप भी पूरी लाईफ शर्मीले ही रहोगे.. आप खुद ही देख लो.

फिर मैंने उसकी पेंट को उतार दिया और उसके पैर को चूमने चाटने लगा और फिर उसकी जांघ को चाटा और उसकी गुलाबी पेंटी के पास उसकी चूत को किस करने लगा. फिर उसकी चूत के पास चाटने लगा.. वो तो इतने में ही एक बार झड़ गयी और उसकी पेंटी गीली हो गई. तो उसने कहा कि भैया प्लीज़ पेंटी खोलो मेरा रस तो बाहर आ गया. तो मैंने उसकी पेंटी को जोश ही जोश में फाड़ दिया.. उसकी क्या चूत थी? बस थोड़े थोड़े बाल थे और बिल्कुल गुलाबी सी चूत थी और उसे देखकर मेरे मुहं में पानी आ गया और फिर मैंने कहा कि अब तो चूत को चूसकर बहुत मस्त मज़ा आएगा. तो वो बोली कि कोई बात नहीं.. लेकिन आपको बुरा ना लगे तो क्या अब आप मेरी चूत को चाटोगे?

फिर मैंने कहा कि हाँ तुम देखती रहो और में चूत को बहुत तेज़ी से चूसने लगा और थोड़ी देर चूसने के बाद वो मेरे बाल पकड़ कर खींचने लगी और मुझे पता था कि उसका दूसरी बार झड़ने का नंबर आने वाला है. उसकी चूत के रस का बहुत अच्छा स्वाद था और उसने मेरे सर को अपनी जांघ में दबा लिया था. फिर वो बोली कि वाह भैया आप मेरी चूत का सारा पी गये.. चलो अब आपका लोवर उतारो.. तो मैंने कहा कि तुम खुद ही उतार लो. फिर उसने हंसकर मेरा लोवर और अंडरवियर एक साथ उतार लिया मेरा लंड भी थोड़ा सा गीला था और अब वीर्य निकल रहा था. तो उसने पहले हाथ से सहलाया, मसला तो मेरा लंड झड़ गया और पूरा वीर्य उसके बूब्स पर गिर गया और थोड़ा सा उसने चाट लिया और वो बोली कि कोई बात नहीं भैया यह दोबारा खड़ा कब होगा? तो मैंने कहा कि इसको अपने मुहं में लेकर ज़ोर ज़ोर से चूसो.. अभी खड़ा हो जाएगा.

तो उसने लंड को ऐसा चूसा कि लंड एकदम से दो मिनट में ही खड़ा हो गया उसने बहुत मस्त चूसा था. उसकी इस मस्त स्टाईल से मुझे पहली बार बहुत मज़ा आया और अब दोबारा से मेरा खड़ा हुआ था और उसने बहुत देर तक चूसा.. लेकिन इस बार झड़ा नहीं. तो मैंने उससे कहा कि तेरे बूब्स के बीच में दबाकर प्लीज़ मेरे लंड की मालिश कर दे. तो उसने वैसा ही किया और मैंने बहुत धक्के मारे और उसको भी बहुत मज़ा आ रहा था.. वो बोली कि भैया अब मुझसे कंट्रोल नहीं हो रहा.. प्लीज़ इसको मेरी प्यासी चूत में डालो ना. तो मैंने कहा कि मुझसे भी कंट्रोल कहाँ हो रहा है? फिर मैंने बोला कि क्या तू वर्जिन है? और खून तो नहीं निकलेगा ना? तो वो बोली कि भैया मेरी सील तो पहले ही टूट गयी थी.. मेरा एक बार साईकल पर एक्सिडेंट हो गया था और बहुत खून निकल गया.. लेकिन आज नहीं निकलेगा. मैंने फिर से उसकी गीली चूत को चूसा और उसको बोला कि तू ऊपर आकर इसको अपनी चूत में डाल ले. वो मान गयी और जल्दी से मेरे ऊपर आ गयी.. लेकिन पहली बार उसकी टाईट चूत में लंड को डालने में मुझे थोड़ी प्रोब्लम हुई और उसको दर्द भी हुआ.

फिर मैंने नीचे से एक ज़ोर का धक्का लगाकर लंड को डाल दिया और उसके मुहं में उंगली डाल दी ताकि वो चीखे चिल्लाए नहीं.. उसकी चूत अंदर से बहुत गरम थी. एक बार लंड के पूरा अंदर घुसने के बाद वो मेरी छाती पर लेट गयी और मेरी छाती के बालों पर किस करने लगी और धीरे धीरे हम धक्के मारने लगे और वो भी बहुत तेज़ तेज़ धक्के देने लगी और अब उसको दर्द नहीं हो रहा था.. लेकिन बहुत मज़ा आ रहा था और में उसके बूब्स दबा रहा था.. कभी धक्के रोककर उसके बूब्स चूस भी रहा था, कभी उसकी पीठ पर हाथ से मालिश कर रहा था. उस पल को में बहुत अच्छे से पूरा इन्जॉय कर रहा था और वो भी कर रही थी. फिर उसने बोला कि भैया अब पोज़िशन चेंज करते है आप ऊपर से आओ.. तो मैंने उसकी बात मान ली और उसके ऊपर आकर धक्के मारने लगा और हम दोनों बहुत मज़े कर रहे थे.. लेकिन पसीने से गीले हो गए थे और उसके पसीने की स्मेल भी अच्छी लग रही थी.

तभी थोड़ी देर में मेरी चुदाई की स्पीड बढ़ गयी और हम दोनों एक साथ में झड़ गए.. उसने मेरी पीठ पर अपने नाख़ून से निशान बना दिए.. मुझे दर्द तो हुआ.. लेकिन बहुत अच्छा भी लगा और फिर मैंने भी बहुत ज़ोर से उसके बूब्स पर काट लिया. उसकी चीख निकल गयी.. लेकिन उसको भी मज़ा आया. मैंने फिर से लंड को चुसवाकर खड़ा किया और उसको डॉगी स्टाईल में चोदा और फिर 69 पोज़िशन में बहुत देर तक उसने मेरा लंड और मैंने उसकी चूत चाटी.. बहुत मज़ा आया. अब तक हम दोनों बहुत थक गये थे.. लेकिन सेक्स की इच्छा हो रही थी और फिर भी सेक्स किए जा रहे थे और झड़े जा रहे थे.. क्योंकि आज के बाद पता नहीं कब ऐसा मौका मिले और आज ही सारी पोज़िशन ट्राई करनी थी.. उसकी गांड भी बहुत अच्छी थी.

फिर मैंने कहा कि क्यों अब गांड में डाले? तो वो मान गयी और बहुत ट्राई किया.. लेकिन में लंड को उसकी गांड में नहीं डाल सका.. वो बहुत टाईट थी. फिर मैंने तेल से बहुत मालिश की उंगलियां डालकर उसका छेद को ढीला किया और फिर उसने मेरे लंड पर तेल से मालिश की और फिर ट्राई किया तो में उसकी गांड में लंड को घुसा पाया और गांड में लंड को घुसाने का अलग ही मज़ा है. हमे सेक्स करते हुए लगातार 4 घंटे हो गये थे.. लेकिन मेरा लंड अभी भी फिर से खड़ा था और उसके जिस्म की आग भी कम नहीं हुई थी.

फिर हम साथ में नहाने गये और नहाते हुए भी मस्त सेक्स किया. उसकी गांड में साबुन लगाकर भी गांड मारी.. उसने मेरा लंड मस्ती से बहुत चूसा, कुर्सी पर, बेड पर, सोफे पर, बाथरूम में, जमीन पर, किचन में हर जगह सेक्स किया.. 11 अगस्त तो सेक्स दिन घोषित कर देना चाहिए और पता नहीं अगला मौका कब मिलता? और हमने घर पर कोई नहीं होने का बहुत फायदा उठाया. में कभी कभी तो लंड उसकी चूत में घुसाकर ही सो जाता हूँ और एकदम नंगे सोते है और रात को ही हमे मौका मिलता है और बहुत जोरदार सेक्स करते है
 
जालिम लंड पापा का

दोस्तो एक मस्त चकाचक कहानी पेशेखिदमत है आपके

‘हां विनोद, मैंने निशा से बात कर ली है, और वो तैयार है. तुम पहाड़ी के पीछे जंगल पहुँचो और मैं निशा को लेकर आता हूँ…….अरे रितु की चिंता मत करो, वो सो रही है.’ मेरे पापा विनोद अंकल से बात कर रहे थे. मैने गलती से उनकी बाते सुन ली थी, पर मुझे ये समज नहीं आ रहा था की पापा निशा को लेकर जंगल में क्यूँ जा रहे हे. मैंने उनके पीछे जाने का तय किया.

दोस्तों मैंने अपने बारे में बताया नहीं, मेरा नाम रितु है, मैं २२ साल की लड़की हूँ और अभी अभी ही दो महीने पहले मेरी शादी हुई है. दो महीनो के बाद मैं अपने गाँव अपने पापा से मिलने आई थी. निशा मेरे घर में काम करनेवाली 19 साल की लड़की थी, दिखने में ठीक थी. मेरे पापा घर में अकेले रहते है. मेरी मम्मी का स्वर्गवास 4 साल पहले हो चूका था. मेरा छोटा भाई है पर वो पढने के लिए दिल्ली गया है.

मेरे पापा अपने गाँव में सब से अमीर है और उनकी बात कोई टालता नहीं है. उनका नाम राजेश्वर सिंह चौधरी है, और वो सच में अपने गाँव के चौधरी ही है. मैंने बचपन से ही पापा को कड़क और मजबूत शख्स की तरह देखा है. उनकी चाल, बोलने का तरीका सब मर्दाना लगता है. हां तो कहानी पर वापस आते है. निशा को लेकर मैंने पापा को बुलेट पर जाते हुए देखा.

मुझे कुछ गलत लगा, वैसे मैंने कभी अपने पापा के बारे में गलत नहीं सोचा की वो गलत काम कर सकते है, हाँ मैं जैसे जैसे जवान होती गयी वैसे वैसे मुझे अपने पापा के कडकपन, उनके गुस्से, उनकी मर्दाना बातो पर और मर्दाना ताकत की ओर खिंचाव होने लगा. पर कभी जिक्र नहीं किया, पापा से नजदीक होने की हिम्मत भी नहीं हुई. पापा जैसा ही मैं अपना पति चाहती थी, पर वो मिला तो भी सॉफ्टवेर इंजिनियर, काफी मासूम और सीधासाधा. मेरा पति भी अच्छा है पर सख्त नहीं है.

हाँ तो पापा ने निशा को बुलेट के पीछे बिठाया और जंगल के रस्ते की ओर चले गए, मैं भी उनके पीछे पीछे चल पडी. वो बुलेट पर थे तो आसानी से पहुँच गए पर मैं चलते जा रही थी, मैं पीछा तो नहीं कर सकती थी पर मुझे रास्ता पता था. करीब आधे घंटे बाद मैं वहां पर पहुँची, मैंने उन्हें ढूंढना शुरू किया, पर वो मिले नहीं.

फिर थोड़ी देर बाद मुझे पहाड़ी से अजीब आवाज़ सुनाई दी, मैं जंगल के रास्ते से ऊपर की ओर चढ़ने लगी वैसे वैसे आवाज़ तेज़ होती गयी. मुझे आसानी से पता चल गया की ये आवाज़ चुदवाने की है और धीरे धीरे मैंने निशा की आवाज़ को पहचान लिया. एक मिनट के लिए मैं रूक गयी, की कहीं मैं गलत तो नहीं कर रही. अगर पापा को पता चल गया तो क्या होगा.

पर फिर सोचा की शायद विनोद अंकल निशा को चोद रहे हो और पापा सिर्फ उसे छोड़ने आये हो तो..ये सोचकर मैं फिर से आगे चली. आगे चलते ही मैंने पापा की बुलेट को देखा, और पीछे हट गयी फिर मैंने इधर उधर देखा कि कैसे देखूं कि पापा को पता ना चले.

फिर मैंने एक पत्थर देखा और पत्थर के ऊपर चढ़ कर देखने लगी, अब मैं उनसे थोडा सा ऊपर थी, तो उन्हें पता चलने की गुंजाइश कम थी. फिर मैंने ऊपर हो कर देखा तो निशा कुत्ते की स्टाइल में थी और पापा निशा को जमकर चोद रहे थे..पापा और निशा पूरे नंगे थे. मैंने कभी पापा को ऐसे नहीं देखा था.

पापा को और पापा के लंड को देखकर मैं हैरान हो गयी..पापा जबरदस्त दम लगाकर निशा को चोद रहे थे, निशा की जांघे लाल लाल हो गयी थी मतलब पापा उसे आधे घंटे से चोद रहे थे. पापा ने उसके बालों को पकड़ के रक्खा था उसका सर भी पीछे खींचकर रक्खा था और वो कुतिया की तरह चुदवा रही थी. मैं एक दम सुन्न हो गयी थी.

‘विनोद..तुम भाई अगली बार से मत आना, तुम कुछ करते नहीं हो और बस बैठ के देखते रहते हो..क्यूँ निशा.’ पापा ने निशा को धक्के मारते हुए कहा.

‘ह ह…ह ह्ह्ह्ह…हां बापजी.’ मेरे पापा को गाँव में सब बापजी कह कर बुलाते थे.निशा की जबान लडखडा रही थी, वो काफी थक गयी थी. पापा रूकने का नाम नहीं ले रहे थे. पापा के पाँव के थपेड़ो की आवाज़, ऊपर से निशा की जबरदस्त चुदाई की आवाज़ सुनकर मेरी चूत भी गीली हो गयी. पता ही नहीं चला कब मेरा हाथ मेरी चूत पर चला गया.

मैं उन दोनों को देखकर साड़ी के ऊपर से ही अपनी चूत मसलने लगी. निशा कुतिया की तरह झुकी हुई थी और उसने अपने दोनों हाथ बुलेट पर लगा कर रक्खे थे. पापा के लंड के धक्के इतने जोरदार थे कि उसकी छाती बुलेट की सीट से टकरा रही थी. मैंने देखा की निशा बुलेट की सीट को मुट्ठी में लेने की कोशिश कर रही थी, मेरा अंदाज़ा सही था वो अब झाड़ने वाली थी.

और मेरे मन में आया ही था की एकदम से वो ढीली हो गयी और उसकी चूत का पानी निकल गया और वो नीचे गिर गयी. पापा का लंड बहार आ गया. मैंने देखा सच में पापा का लंड किसी जानवर से कम नहीं था. मैं तो उसे देखते ही पागल हो गयी. और उसे ही देखती रही. फिर पापा ने निशा को उठाया और आराम से बिठाया.

निशा भी समझ गयी और अपने घुटनों पर बैठ कर पापा के लंड को हिलाने लगी. पापा ने झट से लंड उसके मूंह में डाल दिया और उसके मूंह को चोदने लगे..बेचारी निशा..मैं उसकी हालत समझ रही थी वो काफी थक गयी थी. उधर विनोद अंकल बस देखे जा रहे थे. फिर पापा ने अपने लंड को बहार निकला और अपने हाथो से लंड को हिलाने लगे और हट गए..अब मैं उनके लंड को देख नहीं पा रही थी.

‘ओह्ह्ह..आआअह्ह्ह….बस इतनी सी आवाज़ निकली और पापा के लंड से वीर्य छुट गया..’ मैं पापा के लंड को देखने के चक्कर में भूल गयी की मैं पत्थर पर खडी थी और मेरे हिलते ही पत्थर हिल गया और मैं नीचे गिर गयी. मैं सीधा उन तीनो के सामने आ गयी. तीनो मुझे देखकर चौंक गए और पापा ने एकदम से अपनी धोती उठा ली. मैं भी शरमा गयी, मुझे और कुछ नहीं सुझा तो मैं वहां से चल दी. अब मैं पापा का सामना नहीं कर सकती थी. पापा क्या कहेंगे..एक टाइम पर तो मुझे अपने पति के घर चले जाने का भी ख्याल आया.

मैं पापा के डर से जल्दी से चले जा रही थी और इतने में मैंने बुलेट के आने की आवाज़ सूनी और मुड़कर देखा. पापा ही आ रहे थे, उन्होंने मेरी ओर देखा और मैंने शर्म से आँखे नीचे कर ली, मुझे शर्म और डर दोनों लग रहा था. मैं डर के मारे अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों से खेलने लगी.

‘बैठो..घर अभी दूर है..’ पापा मेरे पास आकर रुके और कहा. मैं तो एक ही सेकंड में बैठ गयी. पापा चलने लगे. रस्ते में मुझे समझ आया कि मैंने कौनसा गुनाह किया है तो मैं डर रही हूँ, पापा को देखो गलत काम उन्होंने किया फिर भी बिना किसी शर्म और डर के कैसे चौधरी की तरह कहा कि बैठो… मैं फिर से पापा के मर्दाना होने पर फ़िदा हो गयी.

अब मैं डर नहीं रही थी, मुझे पता नहीं पापा पर प्यार आ रहा था, उन्होंने जो किया वो गलत था, हमारी इज्जत के लिए गाँव की इज्जत के लिए. पर पता नहीं मैं पापा की ओर खिंच रही थी. मैंने बिना डर के पापा के कंधे पर अपना हाथ रख दिया. जैसे बीवी अपने पति के कंधे पर हाथ रखती है ऐसे. बस अब मेरे मन में चल रहा था कि किसी तरह पापा के लंड को छूना है. क्या जालीम लंड है पापा का.

मैं सोच ही सोच में घर भी पहुँच गयी, हम घर पहुंचे तो वहां पर कुछ लोग पापा से मिलने आये थे. वो लोग कुछ नेता जैसे भी मालूम पड़ रहे थे. मैं पापा के सामने नहीं आना चाहती थी तो मैं बाइक से उतर कर सीधी घर में चली गयी और पापा सब से गाँव के बारे में बात करने लगे. उनको बातों में शाम हो गयी और मैंने खाना फटाफट बना दिया और पापा को कैसे पटाऊ वो सोचने लगी.

मेहमान शायद कुछ ख़ास थे तो वो सब भी पापा के साथ खाना खा कर ही गए और अब रात भी हो गयी थी. सब चले गए और मैं खाना खा रही थी की इतने में लाइट चली गयी. मैं एकदम से डर गयी और मैंने पापा को आवाज़ दी

‘पापा..’

‘हाँ..क्या हुआ, लाइट ही गयी है. कुछ नहीं हुआ. अभी लालटेन लेकर आता हूँ.’ और पापा मेरे पास लालटेन लेकर आये और मेरे पास रखकर चले गए. मैंने खाना निपटाकर और बरतन धोकर वापस आई तो पापा अपने रूम में बिछाना बिछा रहे थे. मैं समझ गयी की पापा जल्दी सो कर मुझसे दूर रहना चाहते हे. पर अब मैंने शर्म तोड़कर कहा

‘पापा..इतनी जल्दी सो ना है..’

‘हाँ..बेटा, लाइट है नहीं तो क्या करेंगे..तू भी सो जा.’ और वो अपना कुर्ता उतारने लगे, मैं पापा की चौड़ी छाती को देख रही थी. पापा ने अन्दर बनियान नहीं पहनी थी. मुझे ऐसे उनके बदन को देखते हुए पापा ने देख लिया.

‘क्या देख रही है रितु..जा सो जा’ पापा ने मुझे होश में लाने के लिए कहा

‘पापा..वो क्या है कि लाइट के बगैर डर सा लगता है..’

‘इसमें कैसा डर, तू बचपन से इसी गाँव में बड़ी हुई है, यहाँ अक्सर लाइट जाती है..’ पापा ने मुझे समझाते हुए कहा और जमीन पर अपने बिछाने पर बैठ गए. मैं भी पापा के जवाब के लिए तैयार थी.

‘हाँ पापा पर आज डर लग रहा है..’ और इससे पहले कि पापा मुझे मना करे मैं पापा के पास उनके बिछाने पर जा कर बैठ गयी और बड़े सेक्सी आवाज़ में कहा.

‘पापा प्लीज..जब तक लाइट आ ना जाये तब तक सोने दो, फिर मैं चली जाउंगी.’

पापा ने एक नजर मेरी ओर देखा, अब उनके पास कोई चारा नहीं था. कितना भी कठोर बाप हो पर बेटी ऐसे कहे तो मान ही जाता है. और पापा भी मान गए. उन्होंने कहा ठीक है सो जाओ. और वो भी लेट गए. उन्होंने एक हाथ अपने सर के नीचे रक्खा और दूसरा अपनी छाती पर और आँखे बंद कर के लेट गए.

मैंने भी फिर हिम्मत करते हुए पापा के छाती पर रक्खे हुए हाथ को पकड़ा और उसे साइड में रख कर उस पर अपना सर रख कर लेट गयी, मतलब मैं पापा के हाथ को तकिया बना कर सो गयी. पापा ने एकदम से फिर से मेरी ओर देखा और इस बार मैंने उन्हें एक कातिल मुस्कराहट दी. और पापा से चिपक कर सो गयी. मैंने अपना हाथ पापा की छाती पर रख दिया और पापा की छाती को सहलाने लगी.

पापा सिर्फ धोती में थे और अब पता नहीं उनके मन में क्या चल रहा था. मैंने तभी आईडिया निकाला

‘पापा..आपकी छाती पर कितने सारे बाल है..’

‘क्यूँ तुम्हे कोई तकलीफ है..’

‘नहीं पापा..मुझे क्यों तकलीफ होगी..आप भी ना. हमेशा गुस्से से बात करते हो, मैं तो ये कह रही थी कि कितने अच्छे लगते है आपके सीने पर ये बाल. इन्हें सहलाने में भी मजा आता है.’ और मैंने पापा से भोले अंदाज़ में कहा और उनहे हाथ से हटकर मैं पापा के सीने पर आ गयी. अब मैं पापा से एकदम चिपक गयी थी. मैंने हिम्मत कर के अपने पाँव भी पापा के पाँव पर रख दिए थे और धीरे धीरे उनके पाँव को भी सहला रही थी.

बेचारे पापा मेरे मासूम डायलाग से चुप हो गए और कुछ नहीं बोल पाए. मैंने अब उनके बालों को चूमना शुरू कर दिया..बाल तो बहाना थे मैं तो अपने पापा को चूम रही थी. पर अब तक पापा की ओर से कोई हरकत नहीं हो रही थी. मैं चूमते चूमते पापा की छाती पर निप्पल को पकड़ लिया और अपने होठो में दबा लिया..और उसे चूसने लगी..जैसे मैंने ऐसा किया पापा के बदन में एक अंगड़ाई सी आ गयी और छटपटा उठे.

‘रितु ये तुम क्या कर रही हो..’ पापा ने अब बिलकुल नोर्मल तरीके से बात की, अब उनकी आवाज़ में कठोरता नहीं थी. अब वो पिघल रहे थे.

‘कुछ नहीं पापा..मुझे आपके बाल पसंद आ गए है..कितने घने है..और मुलायम भी. आप सो जाइये.’ और इतना कहकर मैंने उनके होठो पर अपनी ऊंगली रख दी उन्हें चुप करने के लिए.

फिर मैं उन्हें चूमते चूमते उनकी गरदन चूमने लगी..पर अब पापा की हिम्मत नहीं हो रही थी मुझे डांटने की. पर वो समझ रहे थे कि मैं उन्हें किस करने का सोच रही हूँ तो वो अपने गरदन मैं जिस और चूमती उस और से दूसरी और हटा रहे थे.

‘पापा..आपकी मूछ को एक बार चूम लू.’ मैं पापा के होठो के ठीक ऊपर थी.

‘नहीं बेटा…उधर नहीं.’ पापा के मूंह से अब बेटा भी निकलने लगा था.

‘पापा प्लीज..मुझे आपकी मूछे पसंद है..’ और मैंने इतना कहते ही पापा के होठो पर अपने होठ रख दिया और उन्हें चूमने लगी. जाहिर सी बात है पापा अब भी कोई हरकत नहीं कर रहे थे. पर मैं फिर अब ठीक उनके ऊपर ही आ कर लेट गयी और पापा को बेशर्मी से चूम रही थी.

फिर मैंने अपने हाथ को पापा के हाथ पर रक्खा और जोर से पापा की उँगलियों में अपनी उंगलिया मिला ली. जिससे उन्हें सिग्नल मिले और वो भी कुछ करे. और वो भी अब कमजोर पड़ने लगे और उन्होंने भी मेरे होठो को चूमना शुरू किया. मैं अपनी प्लानिंग में कामयाब होती दिख रही थी मैं और भी जोश में आ गयी और पापा को जंगली की तरह से चूमने लगी.

अब पापा भी सबर खो रहे थे वो भी मुझे किस कर रहे थे और अब उनके हाथ मेरे बदन पर घूम रहे थे. मैंने फिर पापा के मूंह में अपनी जीभ दे दी और पापा ने मेरी और देखा और बिना कुछ बोले फिर से मेरी जीभ को चूसने लगे. अब सही मौका था मैं पापा के लंड के ठीक ऊपर आ गयी और अपनी गांड को पापा के लंड पर घिसने लगी.

पापा के लंड को छूते ही मुझे एहसास हो गया था कि वो कड़क हो चूका है..अब मैंने अपने हाथ को नीचे किया और पापा की धोती में उसे डाल ही रही थी कि पापा ने मेरे हाथ को पकड़ लिया और अपने मूंह से मेरी जीभ को भी निकाल दिया और बोले

‘हे भगवान..रितु तुम ये क्या कर रही हो..मैंने भी ये क्या कर दिया..’ पापा ने अपने मूंह पर हाथ रखते हुए कहा. पापा अब उठकर बैठ गए थे और मेरी ओर देख रहे थे. मैं भी पापा के साथ ही बैठ गयी और पापा के सामने सर झुका कर बैठी रही और सर नीचे करके ही मैंने हलकी सी आवाज़ में कहा

‘पापा आई एम् सॉरी..पर आपको शाम को देखने के बाद मुझे निशा से जलन होने लगी है. रोनक (मेरे पति ) से तो 5 मिनट भी कर पाना मुश्किल है और आप को देखकर मुझे पता नहीं क्या हो रहा है.’ मैं इतना कहकर पापा बैठ गए थे तो उनकी गोद में सर रख दिया और बेटी की तरह लेट गयी. पापा ने अपनी गोद में सोने से मना नहीं किया.

‘नहीं बेटा..तुम्हारी मुश्किल ठीक है, पर तुम जो कर रही हो वो गलत है.’ पहली बार मेरे पापा ने मेरे सर पर प्यार से हाथ घुमाकर बात की थी. मैं पापा की बात सुन रही थी पर मुझे तो सेक्स का भूत सवार था. पापा बात कर रहे थे तभी मैंने पापा की धोती पर से ही पापा के लंड को पकड़ लिया..और उसे अपनी मुट्ठी में मसलने लगी.

‘नहीं रितु ऐसा मत करो..तुम समझदार लड़की हो.’ पापा अभी भी मना कर रहे थे. पर मैं रूक नहीं रही थी. मैंने पापा की धोती की गाँठ खोल दी और पापा के लंड को हाथ में पकड़ लिया. पापा भी मेरा हाथ छूते ही जैसे करंट लगा हो ऐसे हिल गए.

‘देखो रितु, मुझे गुस्सा मत दिलाओ. मुझे मजबूर मत करो..’ पापा अब मुझे डराना चाहते थे. मैंने अब तक पापा के लंड को आज़ाद कर दिया था और वो बाहर आ गया था. मैंने पहलीबार इतना बड़ा लंड देखा था. पापा के लंड को देखते ही मैं गॉद में से उठकर बैठ गयी और पापा के लंड को देखने लगी. पापा ने पास में पड़ी चादर से उसे ढक लिया.

तो मैंने पापा की ओर देखा और पापा को झट से धक्का दे कर लिटा दिया, इससे पहले की पापा कुछ समझे मैं पापा पर चढ़ गयी और 69 की पोजीशन में आ गयी और चादर हटाकर पापा के लंड को अपने मूंह में ले लिया.

लंड इतना मोटा था की मेरे मूंह में भी नहीं समां रहा था. मेरी गांड पापा की ओर थी, पापा ने अपनी ताकत से मुझे एक ओर हटा दिया पर मैंने पापा के लंड को नहीं छोड़ा. मैं चुस्ती गयी अब पापा को पता नहीं गुस्सा आ गया और उन्होंने मुझे जोर से पकड़ कर धक्का दे दिया.

पापा की ताकत इतनी थी कि मैं सामने की दीवार से टकरा गयी. मैं अब हार चुकी थी, मुझे लगा था कि जबतक मैं पापा के पास रहूंगी तब तक उन्हें मना सकती हूँ पर अब वो गुस्सा हो गए थे और उन्होंने मुझे अलग कर दिया था, अब वो नहीं मानेंगे. मैं उनकी और पीठ कर के दीवार से चिपक कर खडी थी, और दीवार को मारने लगी.

पर इतने में पता नहीं पापा को क्या हुआ कि वो मेरे पास आये और जोर से मुझसे टकरा गए, मुझे और भी दिवार से चिपका दिया. उन्होंने मुझे कस कर दीवार से सटा दिया था. फिर उन्होंने मेरे दोनों हाथो को पकड़ा और मेरे दोनों हाथो को अपने हाथो से दोनों और फैला दिए और मेरे कान में बोले..

‘किसी को पता तो नहीं चलेगा..’ मैं मन ही मन खुश हो गयी पर मैंने पापा की बात का जवाब नहीं दिया. उन्होंने मुझे पकड़ कर पलटा दिया और अपनी ओर घुमा लिया. मैं नीचे देख रही थी तो उन्होंने मेरे चेहरे को ऊपर किया..और मेरे होठ पर होठ रख कर मुझे किस करने लगे. मैंने उन्हें अपने से हटा दिया और कहा

‘ऐसे ही प्यार करना था तो वो तो रोनक भी करता है..मुझे निशा की तरह जंगली प्यार चाहिए.’ मैंने बेशरम बनते हुए पापा से कहा. पापा भी मेरी बात सुनते ही मुझसे चिपके हुए थे तो थोड़े से दूर हुए और मेरी ओर देखा मैं भी बड़ी अदब से उनकी ओर देख रही थी की वो अब क्या करते हे. इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाती वो मेरे पास आये अपने दोनों हाथ मेरे ब्लाउज पर रक्खे और एक ही झटके में मेरे ब्लाउज को फाड़ दिया.

मैं तो पापा को देखती ही रह गयी, इससे पहले कि मैं और कुछ समझू उन्होंने मेरे बूब्स को अपने दोनों हाथो में दबोच लिया, उनके हाथो में कितना जोर होगा आप समझ ही सकते हो, उनके हाथो ने जैसे मेरे बूब्स को दबाया कि मैं सहन नहीं कर सकी और 3 इंच ऊपर हो गयी. फिर पापा ने मुझे फिर से पकड़ा और बिछाने की ओर धक्का दिया.

मैं बिछाने पर गिरी और मैंने उनकी ओर देखा, अब उनमे चौधरी वाला मर्द जाग गया था, वो सच में मेरी ओर ऐसे बढ़ रहे थे की मानो मेरा रेप करनेवाले हो. मैं अब सच में खुश हो गयी और मैंने अपने आप ही अपनी साड़ी को जिस्म से निकाल दिया. अब मैं सिर्फ पेन्टी में थी. मुझे ऐसे देखकर वो मेरे ऊपर झपटे और मुझे बालों से पकड़ा और मुझे घुटनों के बल पर बैठा दिया और अपना लंड मेरे मूंह में डाल दिया.

उनका लंड मेरे मूंह में आधे से ज्यादा नहीं जा रहा था पर उन्होंने मेरे सर को पीछे से पकड़ा और मेरे सर को हिला हिला कर अपने लंड को मेरे मूंह में घुसाने लगे. जब पूरा लंड मेरे मूंह में चला गया तो उन्होंने कुछ भी नहीं किया बस मेरे सर को पकड़ के रक्खा, अब मेरे से सांस भी नहीं ली जा रही थी, मैं अपने हाथ को उनके घुटनों पर मारने लगी.

फिर भी उन्होंने नहीं छोड़ा, थोड़ी देर मुझे तड़पाया और फिर मुझे छोड़ा. और अपने लंड को बाहर निकाला, और मैं अपनी छाती पर हाथ रख कर सांस ले रही थी, पर उन्होंने फिर से मेरे मूंह को पकड़ और लंड को अन्दर डाल दिया और इस बार लंड को अन्दर बाहर करने लगे. इतनी जोर से कर रहे थे कि फिर से मुझे सांस लेने नहीं दे रहे थे.

फिर उन्हें लगा कि अब मेरे से सहा नहीं जा रहा है तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया और नीचे गिरा दिया. अब मैं कुछ भी करने के हालत में नहीं थी, मैंने ही पापा के अन्दर शैतान को मजबूर किया था. मैं बस अपने दोनों हाथो को ऊपर कर के लेटी रही और पापा को देखने लगी.

वो अपने लंड को आगे पीछे कर रहे थे, फिर उन्होंने मेरे दोनों पाँव को पकड़ा और पाँव पकड़ कर मुझे अपनी ओर खिंचा, मैं ऊपर हो गयी और अब मैं सिर्फ सर के बल थी, मेरे दोनों पाव पापा के कंधे को छू रहे थे. उन्होंने फिर मेरी पेन्टी को पकड़ा और निकाल दिया.

फिर उन्होंने मेरी चूत को देखा, मेरी चूत पर हलके हलके से बाल थे, उन्होंने बाल को अलग किया और अपनी ऊंगली से मेरी चूत को मसलने लगे, मैं तो तड़प उठी. पापा के मसलने भी ताकत थी. उन्होंने मेरी चूत को दो उंगलियों से अलग किया और अपना अंगूठा उसके अन्दर डाल दिया. और शैतानी हरकत करने लगे कि अपने अंगूठे के नाखून से मुझे चूत के अन्दर दर्द पहुचाने लगे. और मुझे सही में दर्द होने लगा था. मैं छटपटा रही थी.

फिर उन्होंने मुझे पलटा दिया और ऊपर उनके मूंह के पास कर दिया. मुझे ऊपर कर के मेरी चूत को चाटने लगे. पापा का लंड मेरे सामने था. मैं भी उनके लंड को चूसने लगी. वो खड़े खड़े ही मुझे 69 पोजीशन में लेकर मजे उठा रहे थे.

फिर उन्होंने मुझे नीचे छोड़ दिया और मैं पेट के बल नीचे गिर गयी, वो भी नीचे घुटनों के बल बैठ गए और मुझे निशा की तरह कुतिया स्टाइल में बैठा दिया और मेरी चूत में अपना लंड घूसा दिया. आम इंसान की तरह नहीं शैतान की तरह पूरा लंड अन्दर डालने जा रहे थे पर गया नहीं,

आधा ही गया और इतने में भी मुझे लगा कि चूत की चमड़ी छिल गयी, मेरे से रहा नहीं गया उअर मैं कुतिया स्टाइल से नीचे गिर गयी, उन्होने बड़ी बेरहमी से मुझे उठाया और फिर से लंड अंदर डाल दिया, इस बार उन्होंने अपने दोनों हाथो से बने उतने जोर से मेरी चूत को फैला दिया और लंड पूरा का पूरा अन्दर डाल दिया और चोदने लगे.

पापा की चुदाई देखने में जितना मजा आ रहा था उससे कई अच्छा मुझे अब लग रहा था, दर्द तो बेहिसाब हो रहा था पर मेरी मन की इच्छा पूरी हो रही थी. पापा एकदम तेज़ी से मेरी कमर को पकड़ कर चोद रहे थे और ऊह्ह..ओह्ह..ऊह्ह्ह्ह…की आवाज़ लगा रहे थे, उनका हर धक्का मुझे लग रहा था.

अब उन्हें लगने लगा का था की मैं एंजाय करने लगी हूँ तो उन्होंने स्पीड और बढ़ा दी और मुझे चोदने लगे. फिर उन्होंने मुझे अलग कर दिया और मुझे पकड़ के अपनी गॉद में बिठा लिया और मुझे चोदने लगे. मैं पापा की गोद में बैठकर उन्हें किस करने लगी और उनके बालों को सहलाने लगी. वो बिना रुके मुझे चोदे जा रहे थे.

करीब करीब 15-20 मिनट से मुझे चोद रहे थे. मुझे अपने पति से कभी इतना मज़ा नहीं आया था. दो महीनो से मेरा पति मुझे इतनी बार चोद चुके थे पर कभी मैं झड़ी नहीं थी. अब इतनी चुदाई के बाद मुझे लग रहा था की मैं अब झाड़ने वाली हूँ. पापा मुझे बिना थके चोद रहे थे, मैं पापा को और जोर से और जोर से कह रही थी.

फिर पापा ने मुझे अपने दोनों कंधो से पकड़ा और नीचे कर दिया, मतलब अब मैं जमीन से ऊपर थी पर उनके दोनों हाथो के सहारे थी, और वो मुझे चोद रहे थे. मुझे पापा की ताकत का तब एहसास हुआ की वो ऐसे मुझे हवा में पकड़ कर चोद रहे थे. पर उनकी इस हरकत से मेरी चूत के अन्दर और दबाव बढ़ने लगा और मैं मचलने लगी. मुझे अब लगा की मैं झाड़ने वाली हूँ.

पापा को भी शायद पता चल गया था, पर वो जोर जोर से मुझे लंड से धक्के लगा रहे थे, मैं कन्ट्रोल कर रही थी की मेरा चूत का पानी ना निकले पर मैं हार गयी और मेरे बदन में एक झटका सा लगा और मैंने एक जोर से करवट ली और पापा समझ गए और उन्होंने मुझे छोड़ दिया और मैं नीचे गिर गयी और उन्होंने लंड बहार निकाल दिया और एक ही सेकंड में मैं झाड गयी.

मुझे इतनी हसीन चुदाई कभी नसीब नहीं हुई थी, मैं खुश हो रही थी. पापा ने मेरी चूत की ओर देखा और मेरी चूत के बहते पानी को देखा..मैं अब चैन की सांस ली, और पलट कर सीधी हो गयी और पापा को मेरी चूत की ओर देखते देखा और उनके लिए मैंने अपने दोनों पाँव फैला लिये और उन्हें जी भर कर अपनी चूत दिखाने लगी.

मेरी चूत से पहलीबार पानी निकला था और मैंने अब जाना की असली चुदाई का सुख क्या होता है. पर अभी पापा का पानी निकलना बाकी था और उन्होंने पास में पडी अपनी धोती को उठाया और मेरी चूत के पानी को पोछा और मेर जी-स्पॉट को मसलने लगे

और जो पानी रूक गया था वो फिर से झटके ले कर बाहर आने लगा..मैं भी फिर से एक दो बार करवट ले उठी. पर पापा ने मुझे पकड़ा और मेर दोनों पाँव को पकड़ कर फैला लिया और मेरे दोनों हाथो की और ले लिया,इतना मेरे पाव को फैला दिया. फिर मेरे हाथो से ही मेरे पांवो को पकड़ा दिया और मेरी चूत चाटने लगे.

अब मेरी चूत सूख चुकी थी पर वो चाटने लगे थे, उन्होंने अपनी जीभ से मेरी चूत को बहोत देर तक चाटा और फिर मेरे दोनों बूब्स के निप्पल को पकड़ा और उसे जोर से दबा दिया और फिर से मेर चूत गीली सी होने लगी. उन्होंने फिर मेरी चूत में अपनी दो उंगलिया डाल दी और उसे अन्दर बाहर करने लगे. मैं फिर से बेकरार होने लगी थी.

पापा ने फिर मेरी चूत से उंगलिया बाहर निकाली और मेर चूत पर मूंह रक्खा और अपने दोनों हाथो से मेरे गांड के छेद को चौड़ा कर दिया. मैं समझ गयी की अब क्या होने वाला है, उन्होंने धीरे से अपनी एक उंगली मेरे गांड में डाल दी.

‘पापा मैंने कभी इस तरफ नहीं किया है..प्लीज’ मेरा प्लीज कहने का ये मतलब नहीं था कि पापा मुझे मत चोदो पर मैं ये कहना चाहती थी की गांड जरा आराम से मारना. पापा भी समझ गए

‘मुझे देखते ही पता चल गया था, वरना अब तक तो अन्दर डाल कर खून निकाल दिया होता.’ और उन्होंने जोर लगा कर दूसरी उंगली भी डाल दी. मैं दर्द से कराह उठी…..मेरी गांड में जबरदस्त दर्द हो रहा था. अब तक तो उन्होंने उंगलियों से चोदना भी नहीं शुरू किया था,वो थोड़ी देर रुके और फिर उंगलिया अन्दर बाहर करने लगे. मैं फिर दर्द से कराहने लगी.

फिर उन्होंने ना आव देखा ना ताव और मेरे गांड पर अपना लंड रक्खा और उसे पास में पड़े तेल में नहलाया और थोडा तेल मेरी गांड में भी डाला और लंड धीरे धीरे कर के मेरी गांड में डाल दिया. इतना तेल डालने के बाद भी मेरे से दर्द नहीं सहा जा रहा था.

‘पापा मत करो..प्लीज..मुझसे से नहीं सहा जा रहा.’

‘मैंने कहा था मुझे मजबूर मत करो..’ और मुझे इतना कहकर वो मुस्कुराये और मैं भी उनकी बात पर हंस पडी और उन्होंने मुझे मुस्कुराते देखा और मेरी ओर झुके और मेरे होठो को चूसने लगे, उनका लंड मेरी गांड में था. और वो बिना कुछ किये ही मेरी गांड को जला रहा था. पर पापा ने मेरे होठो को चूसते चूसते लंड को बाहर निकाला और फिर जोर से अन्दर डाल दिया..मैं पापा के होठो में होठ डालने के बावजूद भी दर्द के मारे ऊपर हो उठी, पर पापा नहीं हटे..अब मेरी समझ में आया की मेरे मूंह से जोर से चीख ना निकले इसीलिए वो मुझे किस कर रहे थे.

फिर वो धीरे धीरे कर के बड़ी बेरहमी से चोदने लगे और जब तक मैं शांत नहीं हुई तब तक वो मुझे किस भी करते रहे. मुझे लगने लगा था कि मेरी गांड सच में फट गयी है पर मैं कुछ नहीं कर सकती थी, पापा मुझे फिर से उसी तेज़ी से चोद रहे थे, गांड थोड़ी छोटी होने से उनके मूंह से भी दर्द की आवाज़ आ रही थी. पर वो बिना रुके चोद ही रहे थे.

बिना झाडे वो तक़रीबन अब एक घंटा होने आया था और वो मुझे चोद रहे थे.

फिर उन्होंने मुझे फिर से कुतिया स्टाइल में बिठा दिया और मेरी गांड मारने लगे. मैं अब जोर जोर से दर्द के मारे चिल्ला रही थी. कुतिया स्टाइल में पता नहीं पापा का लंड तो कुछ और ही पावर में आ जाता था और चूत में तो सह भी लेती पर गांड में नहीं सहा जा रहा था,

मैं तकिये पर अपनी मुट्ठिया मारने लगी..फिर से उन्होंने मुझे 10 मिनट तक चोदा और मैं फिर से अपने आप को रोक नहीं पाई और मैं फिर से झाड गयी.

इस बार मेरी हालत ऐसी नहीं थी की मैं बैठ सकू पर मैं फिर भी बैठी और एकदम से मैंने पापा के लंड को पकड़ा और जोर जोर से अपने मुट्ठी में हिलाने लगी ता की उनका वीर्य निकल जाये और वो शांत हो जाये..

फिर मैंने तुरंत उसे अपने मूंह में ले लिया और जम कर चूसने लगी और आखिर कर उनके लंड से जोरदार पिचकारी मेरे मूंह में निकली और मैं फिर भी लंड को हिलाती रही जब तक एक एक बूँद खाली ना हो जाये. फिर मैंने पापा को देखा उनकी आँखों में अब थकावट भी थी और चमक भी.

फिर वो अपने घुटनों के बल पर बैठे और सीधे नीचे गिर और लेट गए. मैं भी इतना थक गयी की लेट गयी, तब मुझे ना गांड फटने का दर्द था, ना ही चूत का. हम दोनों बस सोना चाहते थे, दुसरे दिन सब दर्द हुआ तो पता चला की कैसे गांड फटती है..

समाप्त
 
बहन के साथ मम्मी और बुआ भी

दोस्तो यह बात तब की है.. जब मैं लगभग अठारह साल का रहा होऊँगा.. अपने कुछ दोस्तों के साथ-साथ मैं भी गर्मियों की छुट्टियों में नया नया जिम जाने लगा था और कुछ दिनों की मेहनत का असर अब मेरे सीने और गर्दन पर पड़ने लगा था यानि मेरी बॉडी कुछ अलग दिखने लगी थी। इसका नतीजा यह हुआ कि जो भी मुझे कुछ दिनों के बाद मिलता.. वह मुझसे आकर्षित हुए बिना नहीं रहता। ऊपर से मेरी अच्छी हाइट और सूरत में कुदरती भोलापन इस आकर्षण में चार चाँद लगा देते थे।

यह सभी मिलकर मुझे शायद गुडलुकिंग बनाते थे।

वैसे मैं शुरू से ही थोड़ा रिज़र्व किस्म का था.. जिस कारण मैं अधिकतर पर घर में ही रहना ज़्यादा पसंद करता था। घर में वैसे तो किसी चीज़ की कमी नहीं थी। पापा का अपना व्यापार है.. जिसकी तरक्की के लिए वह खूब मेहनत कर रहे हैं। इसलिए वो घर पर कम ही रहते हैं। लेकिन जब भी आते तो हम दोनों भाई बहनों के लिए कुछ ना कुछ महँगी गिफ्ट ज़रूर लाते।

मैं बहुत ही हरामी किस्म का लड़का रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि मैं शुरू से ही इतना बदमाश लड़का था.. लेकिन क्या है ना.. कि मेरे अन्दर भी एक शैतान छुपा हुआ है.. इस कारण से मैं भी कई बार अपनी वासना पर रोक ना लगाकर भावनाओं में बह जाता हूँ और शायद यही कुछ ऐसे लम्हे होते हैं.. जब इंसान के अच्छे-बुरे की पहचान होती है।

खैर.. मैं क्यों आप सभी को बोर कर रहा हूँ। चलिए आज मैं आप सभी को अपने जीवन में बीते कुछ हसीन पलों को एक कहानी में पिरो कर बताता हूँ। यह सभी घटनाएं मेरे साथ मेरी जवानी की शुरूआत के समय की हैं और मैं सोचता हूँ कि यदि इन परिस्थितियों में जिनमें से होकर मैं गुज़रा हूँ.. यदि आप भी होते.. तो यही सब करते।

मम्मी के अलावा एक बड़ी बहन है जोकि मुझसे दो साल बड़ी है।

हमारी मम्मी एक गृहणी हैं जो ज़्यादा मॉडर्न नहीं हैं.. वे घर में ही रहना ज़्यादा पसंद करती हैं। मतलब मम्मी का फिगर बहुत अच्छा है.. कोई यह नहीं कह सकता कि यह लेडी इतने बड़े बच्चों की माँ है। मम्मी की उम्र लगभग 38 साल होगी.. लेकिन अभी वह मुश्किल 30 की लगती होंगी। मम्मी और बहन दोनों का ही भरा हुआ बदन है और दोनों के ही सीने पर उभार की अधिकता है। दोनों माँ-बेटी कम बल्कि बहनें ज़्यादा लगती हैं। बाहरी लोग मेरी मम्मी और बहन के सीने पर ही ज़्यादा देखते रहते हैं।

मम्मी को थोड़ा ब्लड-प्रेशर की दिक्कत है.. इस कारण उन्हें ज़्यादा मेहनत या गर्मी सहन नहीं होती। शायद इसी कारण मम्मी घर में थोड़ा कपड़ों के मामले में लापरवाह रहती हैं। मम्मी छोटे और गहरे गले के ब्लाउज पहनना पसंद करती हैं.. जिसमें से मम्मी के मोटे मोटे स्तन देख कर तो बुड्डा भी पागल हो जाए।

मेरी बहन भी टाइट कपड़े ही पहनती है। मैं भी उसकी टाइट टीशर्ट में से झांकते उसके उरोजों को देखता रहता हूँ।

घर में वह मम्मी की तरह ही खुले गले के कपड़े पहनती है। मम्मी तो घर में ब्लाउज और पेटीकोट ही ज़्यादा पहनती हैं.. पुराने हो चुके कॉटन रूबिया के ब्लाउज में से मम्मी के मोटे-मोटे दूध से सफेद मांसल स्तन देख-देख कर मैं पागल होता रहता हूँ।

ऐसे ही मेरी बहन भी घर में स्कर्ट ज़्यादा पहनती है और बड़ी ही लापरवाही से उठती बैठती है। जिस कारण वह भी अपनी जवानी का प्रदर्शन करती रहती है।

मैं इसी जुगाड़ में रहता हूँ कि कैसे भी इनके बदन का मज़ा लूटा जा सके। लेकिन बस दिन-रात देख कर ही मन मसोस कर रह जाता था।

एक दिन हमारे ही शहर में एक शादी थी और सभी लोग वहाँ गए थे। जो भी वहाँ मुझे देखता मेरी बॉडी की तारीफ किए बिना नहीं रहता।

वहाँ पर मेरी सबसे छोटी बुआ भी आई थी.. जिसने अपनी जवानी में बड़ी रंगरेलिया मनाई थीं और अब शादी के बाद भी एक बार मायके में अपने ब्वॉय-फ्रेण्ड के साथ पकड़ी गई थीं.. लेकिन वो मामला दबा दिया गया था।

खैर.. आज वह अपने छः माह के बच्चे के साथ कार्यक्रम में आई थी। वहाँ तेज गर्मी के कारण उनका छोटा बच्चा बहुत रो रहा था.. इसलिए मम्मी के कहने पर मैं बुआ को अपने साथ घर ले आया।

बुआ भी बड़ी बिंदास है.. ज़रा भी शर्म संकोच नहीं करती। वहाँ इतनी पब्लिक में गर्मी लगने पर अपने पेटीकोट को उँचा उठाकर पंखे के सामने बैठ गई थी। जब सब उसका मज़ाक उड़ाने लगे.. तो बोली- मेरा पति एक माह से ट्रैनिंग पर गया है और मेरे अन्दर की गर्मी बहुत परेशान कर रही है..

उसकी इस बात पर सब हँस पड़े थे।

मेरे साथ घर आते वक्त भी रास्ते भर वह मुझे जल्दी चलने को कहती रही क्योंकि उसे ज़ोर की पेशाब लगी थी।

खैर.. घर आते ही बुआ ने सबसे पहले तो कूलर चला कर अपने बच्चे को सुलाया और फिर जब तक मैं ठंडा पानी लाया.. उसने अपनी साड़ी खोल कर एक तरफ फेंक दी और बाथरूम में घुस गई शायद उसे लगा होगा कि मैं कमरे से बाहर हूँ.. इस कारण वह खुले दरवाजे में ही पेशाब करने लगी। मैं पीछे से चुपचाप उसके मोटे-मोटे चूतड़ों के दीदार करता रहा। मूतने से इतनी तेज़ सीटी की आवाज़ आ रही थी और इतनी देर तक कि मानो हफ्ते भर का आज ही मूत रही हो।

जब बुआ पेशाब करके उठी तो पीछे से उसकी चूत का नज़ारा भी हो गया.. जो कि मेरे लिए पहला अनुभव था।

सफेद पैन्टी को अपने चूतड़ पर चढ़ाती हुई वह बाहर आई.. तो मुझे देख कर बड़ी बेशर्मी से बोली- यदि एक पल और रुक जाती तो मेरी चूत ही फट जाती..

उसके मुँह से ‘चूत’ शब्द सुन कर मैं चौंक पड़ा.. लेकिन बुआ अपनी चूत को रगड़ते हुए हँसती रही।

फिर मुझसे बोली- रात भर सफ़र में नींद ही नहीं आई.. चल यहीं कूलर के सामने सो जाते हैं।

डबलबेड पर बीचों-बीच वह पसर गई… और मुझसे बातें करने लगीं..

लेकिन मेरा सारा ध्यान बुआ के ब्लाउज पर ही था.. जिसके ऊपर के दो बटन खुले हुए थे और उसके दूध से भरे दोनों स्तन ब्लाउज फाड़ बाहर आने को बेताब से हो रहे थे।

उसके निपल्स में से दूध अपने आप बाहर आ रहा था.. जिस कारण उसकी ब्रा भी गीली हो गई थी।

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था.. लेकिन वह ताड़ गई और अपने ब्लाउज में हाथ डालकर दोनों मम्मों को खुजलाते हुए बोली- मुझे दूध ज़्यादा आता है.. और मेरा बच्चा इसे पी नहीं पाता.. इस कारण मेरे बोबों में से दूध बह रहा है.. मेरी चूचियाँ दुखने सी लगती हैं।

ऐसा कहते हुए उसने अपने बच्चे को अपने पास खींच लिया और मेरे सामने ही अपने ब्लाउज को एक तरफ से उँचा उठा कर अपने दूध से भरे चूचुकों को बच्चे के मुँह में दे दिया।

उसके मम्मों का आकार देख कर मैं चक्कर में पड़ गया.. उसके मम्मे ऐसे लग रहे थे मानो अभी फट पड़ेंगे।

बुआ के पैर कूलर की हवा के रुख़ की तरफ थे.. जिस कारण हवा के प्रेशर से उसका पेटीकोट घुटनों के ऊपर तक चढ़ा हुआ था और वह बार-बार अपनी चूत को खुज़ाए जा रही थी।

बच्चे के मुँह में अपना दूसरा स्तन देते हुए वह बोली- शायद रात भर बस में बैठे रहने के कारण चूत मे खुजली हो गई है.. साली बड़ी मीठी-मीठी खुजलन सी हो रही है।

उसके मम्मों की चौंचें दूध पिलाने से बड़ी लंबी हो गई थीं.. जिन्हें वह अन्दर भी नहीं कर रही थी। बच्चा बड़े ज़ोर-ज़ोर से दूध चूसते हुए आवाज़ कर रहा था।

तो बोली- यह साला भी अपने बाप पर गया है.. पूरा रस निचोड़ लेता है और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।

यूँ ही इधर-उधर की बातें करने के दौरान बोली- तूने किसी गर्लफ्रेंड से चक्कर चलाया कि नहीं.. या यूँ ही हाथ ठेला चला रखा है?

मैं समझ तो गया था पर जानबूझकर सीधा बन रहा था।

बुआ बोली- हमारे समय में तो साले सब लौंडे गंडमरे थे.. कोई साला हिम्मत ही नहीं करता था और आज जब इतनी आज़ादी है तो तुम साले सीधे बनते हो।

कूलर की ठंडी हवा के बीच हल्की-फुल्की बातें करते हुए हम कब सो गए.. पता ही नहीं चला।

शाम को लगभग चार बजे जब मेरी नींद पेशाब के लिए खुली तो मैं बुआ के दोनों मम्मों को देखता ही रह गया।

वे पूरी तरह से वापस दूध से भर गए थे। चूचुकों में से दूध की बूँदें टपक रही थीं और तनाव के कारण उनमें लाल खून की नसें साफ़ दिखाई पड़ने लगी थीं।

दूसरी तरफ बुआ का पेटीकोट भी जाँघों तक चढ़ गया था.. जिसमें मैं बार-बार झुक कर उसकी सफ़ेद पैन्टी को देख रहा था। बुआ की चूत की फाँकों में पैन्टी का आगे का हिस्सा दब सा गया था और साइड से रेशमी सुनहरे बाल दिखाई पड़ रहे थे।

जब मैं पेशाब करके वापस आया.. तब तक शायद आहट से बुआ जाग गई थी.. और झुक कर अपने बैग में से कुछ ढूँढ रही थी, तब उसके बड़े-बड़े बोबे लटकते हुए बड़े सेक्सी लग रहे थे।

मैंने अपना लण्ड सहलाते हुए पूछा तो बोली- मैं चूचियों का पंप ढूँढ रही हूँ.. जिससे कि मेरे बोबों का दूध निकालना पड़ता है। मेरे दोनों बोबे बहुत दुख रहे हैं। इनका दूध नहीं निकाला तो इनमें से खून छलकने लगेगा।

यह सुन कर मैं घबरा सा गया.. लेकिन चूचियों का पंप नहीं मिला.. शायद किसी और बैग में रख दिया होगा।

दोस्तो, शायद मेरे नसीब में मेरे परिवार के छेदों का ही सुख लिखा था।

तब मैंने पूछा- अब क्या होगा?

तो वह बोली- हाथों से निकालने की कोशिश करती हूँ..

वो हाथ में एक काँच का खाली गिलास ले कर अपने दूध से भरे मम्मों को दबाने निचोड़ने लगी.. तब उनमें से थोड़े से दूध की फुहार सी निकली।

लेकिन जब उसे आराम नहीं मिला तो बोली- काश.. अभी यहाँ तेरे फूफाजी होते तो मुझे इतना परेशानी ही नहीं होती।

तो मैं बोला- बुआ यदि मैं कुछ कर सकता हूँ.. तो मुझे ज़रूर बतलाना.. कोई दबा या नया पंप खरीद लाऊँ?

तो बोली- तू चाहे तो मुझे अभी इस दर्द से आराम दिलवा सकता है।

‘कैसे..?’

उसने मुझे अपने पास बुलाया और बोली- तू मेरा थोड़ा सा दूध पी ले..

मैं उठ कर खड़ा हो गया और शर्मा कर बोला- धत्त.. मुझे शरम आती है।

तो वो बोली- इसमें शरमाने की क्या बात है? क्या तूने अपनी माँ का दूध नहीं पिया.. या कभी तू अपनी औरत के मम्मे नहीं चूसेगा?

यह कह उसने मेरा हाथ खींच कर पलंग पर गिरा लिया और अपने मम्मों को हाथों से पकड़ कर मेरे मुँह में दे दिया।

एक बार तो मैंने बचने की कोशिश की.. लेकिन इतने मुलायम मम्मों को अहसास पा कर मैं पड़ा रहा।

पहले के एक-दो घूँट दूध तो बड़े बेस्वाद लगे.. लेकिन जैसे ही मैंने अपनी जीभ से बुआ के निपल्स को सहलाया तो मेरा लण्ड तन कर पजामे में से बाहर आने को होने लगा।

अब तो मैं भी अपने दोनों हाथों से दबा-दबा कर उनके सफेद पपीतों का आखरी बूँद तक दूध पीना चाहता था लेकिन बुआ ने मेरा मुँह दूसरे स्तन में लगाते हुए कहा- चल अब थोड़ा सा छोटू के लिए भी छोड़ दे।

बुआ भी मेरी बराबर में ही लेटी हुई थी.. और उसका पेटीकोट वापस घुटनों के ऊपर तक आ चुका था।

बुआ ने बड़ी सफाई से मेरे कड़क हो चुके लण्ड को टटोलते हुए मुझसे पूछा- क्या इससे पहले कभी किसी माल के बोबों को चूसा है?

तो मैंने कहा- हाँ.. बहुत बार..

तो वो हैरत से बोली- कौन है वो?

मैं हँस कर बोला- बुआ मेरी माँ के और किस के?

तो वो बोली- साले बदमाश.. इसके अलावा और कौन?

मैं बोला- पिया तो नहीं.. लेकिन पीने की इच्छा ज़रूर रखता हूँ।

‘किसके?’

उसके बहुत पूछने पर भी मैंने नाम नहीं बताया तो वह बोली- समझ गई जरूर तेरी बहन होगी।

मैं बोला- आप कैसे समझ गई?

तो वह बोली- तू घर के अलावा और कहीं मुँह नहीं मार सकता.. क्योंकि यदि तुझमें हिम्मत होती.. तो तू मुझे देख कर यूँ ही नहीं सो जाता.. बल्कि अब तक तो मुझे ‘निपटा’ चुका होता।

यह सुन कर मैं बोला- तो अभी कौन सी देर हुई है..

ऐसा कह कर मैं बड़ी आहिस्ता से अपना एक हाथ बुआ के पेटीकोट में डाल कर उसके चूतड़ों को सहलाने लगा।

तब बुआ ने आँखें बंद कर लीं और गहरी साँसें लेने लगी।

मैं अपनी उंगलियों को धीरे-धीरे बुआ की जाँघों के जोड़ों में घुसाते ही जा रहा था और फिर मैंने अपनी दो उंगलियों को बुआ की मांसल चूत.. जो कि रेशमी सुनहरी बालों से ढकी हुई थी.. उसमें घुसा दी।

तो बुआ अपने होंठों को दाँतों से भींचते हुए बोली- आह्ह.. अब देर मत कर.. डाल दे अपना.. मेरी चूत का भोसड़ा बना दे..

बुआ ने तेज़ी से अपनी पैन्टी उतार फेंकी और पेटीकोट उँचा करके दोनों टाँगों को चौड़ी करके अपनी चूत को फैला कर लण्ड घुसड़ने का कहने लगी।

यह देख मैंने भी तुरंत अपना मोटा और लंबा लण्ड बुआ की चूत में पेल दिया।

वैसे तो यह मेरे लिए पहला अनुभव था.. लेकिन बुआ ने बड़ी होशियारी से मुझे उत्साहित करके मेरा जोश कम नहीं होने दिया और हम दोनों ने एक लंबी अवधि तक चुदाई का खूब मज़ा लिया।

बुआ ने मेरी बहन को भी फंसाने के कई तरीके समझाए.. ताकि बाद में भी मैं चूतों के मज़े ले सकूँ।

इस तरह बुआ ही मेरी पहली सेक्स गुरू बनी..

उसके बाद बुआ हमारे घर दो दिन और रुकी लेकिन इस बीच मैं बुआ को बस चूम-चाट ही सका.. इसके अलावा हमें मज़े मारने का कोई मौका नहीं मिला।

लेकिन बुआ ने रात मे मेरी बहन को ना जाने क्या पट्टी पढ़ाई कि उस दिन के बाद से मेरी बहन का मेरी तरफ रुख़ ही बदल गया।

अब वह मेरे सामने और ज़्यादा खुले गले के कपड़े पहनने लगी, जिसमें से उसकी बड़ी-बड़ी छातियाँ देख कर मैं पागल होता रहता।

कई बार वह टाइट स्कर्ट और टी-शर्ट पहनती.. जिससे उसके बदन का पूरा भूगोल दिखता.. लेकिन ऐसा कोई मौका ही नहीं मिल रहा था कि मैं अपना कोई दांव चला सकूँ।

तभी मेरे दिमाग़ में एक आइडिया आया और मैंने पापा का नोकिया-6230 मोबाइल दराज से निकाल लिया। पापा ऐसे भी उसे इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। इस फोन के अन्दर दो जीबी का मैमोरी कार्ड लगा था और इसकी वीडियो शूटिंग क्वालिटी वाकयी बड़ी ग़ज़ब की है।

जब मेरी बहन बाथरूम में नहाने के लिए जाने लगी.. तो मैंने बड़ी सफाई से इस फोन को वीडियो मोड पर आन करके बाथरूम की छत पर लगे बिजली के सॉकेट के बॉक्स में छुपा कर लगा दिया। फोन में कोई सिम नहीं होने से उसकी घंटी बजने का भी कोई डर नहीं था।

जब मेरी बहन नहा कर वापस बाहर आ गई.. तो मैं फोन ले आया और उसे चैक किया।

उसमें मेरी बहन की नग्न फिल्म उतर चुकी थी, किस तरह वह अपने कपड़े खोल कर अपने मोटे-मोटे मम्मों को रगड़-रगड़ कर नहा रही थी।

इसे देखने के बाद तो मैं और ज़्यादा बेचैन रहने लगा.. क्योंकि एक बार बुआ की चूत का जो स्वाद लग गया था।

वहीं अब हस्तमैथुन से मन नहीं भरता था।

इससे प्रेरित होकर मैंने अपनी मम्मी और बहन के कई नंगे वीडियो शूट किए और उनको अपने सिस्टम में हिडन फाइल्स बना कर सेव कर दिया। कुछ दिनों बाद एक दिन जब मम्मी-पापा दोनों किसी कार्यक्रम में गए थे और दो-तीन दिनों बाद लौटने वाले थे।

घर पर मैं और मेरी बहन ही बचे थे। मैं भी कुछ प्लान करके मजा लेने की जुगाड़ में था कि किसी तरह से अपनी बहन की चूत के मज़े मार सकूँ।

उन दिनों गर्मी बहुत तेज थी और आस-पास पानी गिरने के कारण उमस बहुत बढ़ गई थी। इस कारण मेरी बहन और मैं पसीने में नहा चुके थे। हवाओं की तेज़ गति के कारण लाइट भी बंद थी.. जिस कारण हमारी हालत खराब हो रही थी।

मेरी बहन पीठ पर हुई घमोरियों के कारण परेशान थी… जिस कारण वह बार-बार पीठ खुजला रही थी। उस समय मैंने उससे कहा- तू नहा ले और कोई कॉटन का ढीला सा कपड़ा पहन ले।

तो वह बोली- मैं दो बार नहा चुकी हूँ और कॉटन की टी-शर्ट ही पहने हूँ.. लेकिन तू कहता है तो चल तू अपना कोई पुराना कॉटन का शर्ट दे दे।

मैंने उसे अपना एक पुराना महीन कॉटन का शर्ट दे दिया.. जिसमें से उसकी ब्लैक कलर की ब्रा साफ़ दिखाई पड़ रही थी और उसके मोटे-मोटे मम्मों के कारण भी शर्ट टाइट फिट हुआ था। जिसके कारण शर्ट के बटन खिंच से रहे थे.. और उस गैप में से उसका सफेद सीना और काली ब्रा साफ़ दिखाई पड़ रही थी। इसके बाद भी जब उसे आराम नहीं मिला.. तो मैंने उससे कहा- पीठ पर पाउडर लगा ले।

लेकिन वह आलस के कारण उठना नहीं चाहती थी.. थोड़ी देर बाद मुझसे बोली- भैया ऐसा कर.. तू ही मेरी पीठ पर पाउडर लगा दे।

तब मैं जानबूझ कर एक बार तो मना कर गया.. लेकिन उसके फिर से रिक्वेस्ट करने पर राज़ी हो गया।

उस समय उसने मेरी शर्ट और घुटनों तक का स्कर्ट पहन रखा था.. जिसमें से उसकी सफेद चिकनी टाँगें दिखाई पड़ रही थीं।

इस समय वह ज़मीन पर उल्टी पेट के बल लेटी हुई थी और मैं ठीक उसके पास के सोफे पर लेटा हुआ था। मैं पाउडर का डब्बा हाथ में लेकर बोला- ऐसे कैसे लगाऊँ.?

तो उसने अपनी शर्ट को आधी पीठ तक ऊँचा उठा दिया और बोली- ले.. जल्दी से लगा दे..

मैंने अपनी हथेलियों में ढेर सा पाउडर लिया और उसकी मांसल पीठ पर बड़े ही कामुक अंदाज़ मे हाथ फिराने लगा। लेकिन उसकी ब्रा की स्ट्रिप के कारण पाउडर लगाने में दिक्कत हो रही थी।

तो उसने खुद ही हाथ पीछे कर उसे खोलने की कोशिश की.. लेकिन शर्ट टाइट होने के कारण उसे सफलता नहीं मिली।

तभी मैं बोला- तुम शर्ट और उँचा करो मैं इसका हुक अभी खोल देता हूँ।

तो उसने भी बिना किसी संकोच के ब्रा का हुक खुलवा लिया।

अब मैं बड़ी मस्ती के साथ अपने हाथों से उसकी मांसल पीठ पर हाथ फेर रहा था।

अब थोड़ा और ऊपर हाथ बढ़ने पर शर्ट के सीने पर टाइट होने के कारण हाथ नहीं बढ़ पा रहा था।

तभी मेरी बहन बोली- रूको भैया..

उसने अपनी शर्ट के ऊपर से तीन बटन खोल दिए.. यह सब देख मैं दंग सा रह गया। इसी के साथ अब मैं और जोश से भर चुका था.. इसलिए अब मैंने अपनी हथेलियों को पीठ के साथ.. बाँहों के जोड़ों तक घुमाया.. जिससे मुझे उसके मोटे-मोटे मम्मों की नर्माहट का अहसास हुआ और मेरा लण्ड तन कर खड़ा हो गया।

उधर शायद मेरी बहन भी मूड में आ गई थी.. इसी कारण उसने पैरों में हरकत की.. जिस कारण उसका स्कर्ट उसकी सफेद केले के तने के समान चिकनी जाँघों तक चढ़ गया।

मेरे हाथों की हरकत जैसे-जैसे बढ़ रही थीं.. उसकी कसमसाहट भी बढ़ती जा रही थी।

अचानक वह उठी और अपने कपड़ों को ठीक करके काम में बिज़ी हो गई। पहले तो मुझे लगा कि शायद वह नाराज़ हो गई है.. लेकिन मैंने ऐसी कोई हरकत भी नहीं की थी कि उसे कोई आपत्ति हुई हो।

शाम होते ही जोरों की बारिश होने लगी.. तो वह भी मेरे साथ ही बाल्कनी में खड़े हो कर पहली बारिश का आनन्द उठाने लगी।

तभी मैंने कहा- तुम बारिश के पहले पानी में नहा लो.. बदन की सभी घमोरियाँ मिट जाएंगी..

तो वह बोली- हाँ भैया.. यह ठीक रहेगा..

उसने मेरा हाथ पकड़कर छत पर दौड़ लगा दी। मेरी बहन ने अभी भी मेरा दिया हुआ सफ़ेद सूती पतला शर्ट पहन रखा था और अब तो उसने उसके अन्दर उसने ब्रा भी नहीं पहनी थी। भीगने से उसके मोटे-मोटे पपीते के समान स्तन सफ़ेद शर्ट में से क़यामत ढा रहे थे। उसकी काले निपल्स भी साफ दिखाई दे रहे थे।

हमारे घर के आसपास कोई बड़ी बिल्डिंग भी नहीं है.. केवल हमारा मकान ही दो मंज़िल उँचा है.. इस कारण छत पर हमें कोई देखने वाला भी नहीं था।

मैंने बहन से कहा- पहली बारिश में अपनी पीठ पर सीधे पानी लगने दो.. जल्दी आराम मिलेगा।

तो वह एक पल रुकी और मेरी और देखकर बोली- मैं ज़मीन पर लेट जाती हूँ.. तू मेरी पीठ को रगड़ दे।

ऐसा कह उसने अपनी शर्ट के बटनों को खोला और ज़मीन पर कोहनियों के बल उल्टी लेट गई।

मैंने तत्काल उसकी शर्ट को उँचा किया और उसकी पीठ को रगड़ना शुरू कर दिया। आगे से शर्ट के बटन खुले होने के कारण मुझे कोई परेशानी नहीं थी और जब मैंने शर्ट को पूरा सिर के बालों तक उँचा उठा दिया.. तो मुझे मेरी बहन के लटकते हुए मोटे ताजे स्तन साफ़ दिखाई पड़ रहे थे।

अभी मैं उन्हें छूने की हिम्मत जुटाता.. उसके पहले ही मेरी बहन ने करवट बदल दी। मतलब अचानक वह मेरी और मुँह करके ज़मीन पर चित्त लेट गई। अब मेरी ओर उसका खुला सीना था.. जहाँ दो बड़े-बड़े स्तन नोकदार चूचुकों के साथ तने खड़े थे।

उन्हें देख मेरी आँखें फटी की फटी ही रह गईं.. तो मेरी बहन ने मेरा हाथ पकड़ कर अपने दोनों मम्मों के ऊपर रख दिया।

मैंने भी अब हिम्मत कर उन्हें ज़ोर-ज़ोर से दबाना शुरू कर दिया। तभी मेरी बहन ने अपनी गर्दन ऊपर उठाई और मेरे होंठों को अपने मुँह में भर कर चूसना शुरू कर दिया। उसके पैर भी हरकत में थे.. जिस कारण उसका स्कर्ट उसकी जाँघों तक चढ़ गया था।

मैंने जैसे ही अपना एक हाथ उसकी स्कर्ट में डाला और उसकी जाँघों के जोड़ों पर रखा.. मेरी उंगलियां सीधी उसकी मोटी फूली हुए रेशमी बालों से दबी हुए चूत में जा घुसीं। स्कर्ट के अन्दर उसने पैन्टी भी नहीं पहनी थी। उसने अपना एक हाथ बढ़ा कर मेरा लंड टटोला और उसकी मोटाई का अंदाज़ लगा कर डरते हुए बोली- भैया जल्दी से इसे मेरी चूत में पेल दो।

मैंने बनने की कोशिश की.. मानो मैं कुछ समझा ही नहीं.. तो वो बोली- बनो मत.. मुझे सब मालूम है.. कि कैसे तुमने बुआ के साथ मज़े मारे हैं.. जल्दी से मेरी भी आग शांत कर दो।

बस फिर क्या था.. मैंने उसे वहीं बरसते पानी में दो बार ठंडा किया।

इसके बाद तो मेरी बहन बस मानो मौका ही देखती रहती थी। जब भी हमें एकांत मिलता.. मेरी बहन दिल खोल कर मुझसे चिपक जाती.. चाहे घर के अन्य सदस्य घर में ही हों। अब तो वह मेरे सामने ही कपड़े बदलती और कई बार टाँगें ऐसी फैला कर बैठती.. कि उसकी चूत की फांकें साफ़ दिखाई पड़तीं।

कुछ ही महीनों में उसका सिलेक्शन एमबीए की पढ़ाई के लिए कॉलेज में हो गया और वह आगे की पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई।

अब तो मेरी हालत और खराब रहने लगी। बिना चूत के मेरा मन किसी काम में नहीं लगता था। घर में अब मैं और मम्मी ही रहते थे.. क्योंकि पापा भी अपने जॉब के कारण टूर पर ज़्यादा ही रहते थे। पिछले एक महीने में वो बस दो या तीन दिन ही घर पर रुके होंगे। मेरी निगाहें लगातार मम्मी का पीछा करती रहती थीं कि कब मैं मम्मी को बिना कपड़ों के देख सकूँ।

वैसे तो मम्मी कई बार मेरे सामने ही पीठ करके कपड़े बदल लेती थीं.. या घर के कामों के दौरान उनके ब्लाउज के गले में से उनके उभारों का दीदार हो जाता था। पर यह सब नाकाफ़ी था.. बल्कि उल्टा इससे तो मेरी आग और भड़क उठती थी। घर के सभी कामों के साथ-साथ मुझे मम्मी के साथ बाज़ार भी जाना पड़ता था।

ऐसे ही एक दिन जब मैं और मम्मी बाज़ार में खरीददारी कर रहे थे.. तो मम्मी की एक सहेली मिल गई और हम तीनों उस बड़े से मॉल में साथ-साथ घूमने लगे।

तभी मम्मी की सहेली एक लेडीज काउन्टर पर रुकी.. और वहाँ बड़े ही खुले तौर से अंडरगार्मेंट्स देखने लगी।

वह मम्मी को भी बोली- तू भी यह इंपोर्टेड ब्रांड यूज किया कर, बड़ा मजा मिलता है।

तब मम्मी बड़ी ही मायूसी से धीरे से बोली- पहन तो लूँ.. लेकिन देखने वाला कौन है.. इसके पापा तो महीने में एक दो बार घर आ जाएं.. वही बहुत है।

तो आंटी एक आँख मार कर बोली- पगली है क्या.. जो इतनी भरी जवानी में इतने हुस्न वाले बदन की होकर फालतू बात करती है.. अरे क्या तेरा पति घर से बाहर साधु का जीवन जी रहा होगा.. अरे वह तो हर रात रंगीन कर रहा होगा और एक तू है कि यहाँ अपनी जवानी को जंग लगा रही है।

आंटी मेरी और इशारा करते हुए बोली- अरे मेरा ऐसा गबरू जवान बेटा हो.. तो मुझे यू बाहर मुँह ही नहीं मारना पड़े..

तब मम्मी ने उसे डांटकर चुप करवाया और मेरी ओर देखने लगीं।

लेकिन मैंने तेज़ी से अपनी गर्दन घुमा ली.. मानो मैंने कुछ सुना ही ना हो.. उसके बाद तो आंटी ने दो-तीन ब्रा को ट्रायल रूम में जाकर ट्राइ किया और मम्मी को अन्दर बुला कर दिखाती रही।

दरवाज़ा खुलने के दौरान एक बार तो मैंने भी आंटी के हुस्न का नज़ारा कर लिया। आंटी ने ज़िद की तो मम्मी ने भी खुद के लिए दो-तीन पेयर अंडरगार्मेंट्स बिना ट्रायल के पसंद कर लिए।

तब आंटी मेरी भी पसंद पूछने लगीं.. तो मम्मी ने उनका हाथ दबा दिया।

मुझे भी वहाँ पर एक पेयर पसंद आया.. लेकिन मम्मी ने उसे साइज़ में बराबर होने पर भी बड़े कट का होने के कारण नहीं खरीदा।

लेकिन बाद मैं मैंने उसे मम्मी की नज़रों से बच कर खरीद लिया और बाकी के सामान में छुपा दिया।

वहीं पास के जेंट्सस काउन्टर को देख कर मम्मी बोलीं- तुझे भी कुछ चाहिए.. तो खरीद ले..।

फिर मेरे द्वारा लॉन्ग अंडरवियर पसंद करने पर आंटी ने उसे हाथ में लेकर पटक दिया और बड़ी ही सेक्सी मुस्कान दे कर बोलीं- तेरे को यह कट साइज़ वी-शेप जॉकी सूट करेगा।

मैंने पहली बार इस तरह का अंडरवियर देखा था.. लेकिन आंटी के दबाव डालने पर मम्मी ने भी लेने की हामी भर दी।

खैर.. घर आते समय मम्मी के दोनों मांसल बोबे.. बार-बार मेरी पीठ को छू रहे थे। इस कारण मैं जानबूझ कर ज़ोर-ज़ोर से बाइक के ब्रेक मार रहा था।

घर आने पर आंटी का फोन आया- मम्मी को कह देना कि जल्दी से अंडरगार्मेंट्स ट्रायल कर लें.. क्योंकि यदि साइज़ का लोचा रहा.. तो एक दिन के बाद रिप्लेस नहीं होंगे।

तब मैंने मम्मी को वैसा ही बोल दिया.. तो मम्मी बोलीं- ठीक है.. पहन कर देख लूँगी।

रात मे सोने के पहले मम्मी नहाने गई थीं और मैं हाँल में बैठा टीवी देख रहा था। तभी मम्मी ने बेडरूम से गर्दन निकाल कर आवाज दी- यह तो चेंज करना पड़ेगी.. बहुत ही टाइट है।

तो मैं वहीं से बोला- इस्तेमाल करने पर कुछ तो लूज हो ही जाएगी..

तब मम्मी ने भी मेरी बात पर हामी भर दी.. कुछ मिनटों के बाद मम्मी फिर बोलीं- अरे बेटा ज़रा तू मदद कर दे.. तो शायद यह हुक लग जाए।

जब मैं उठकर अन्दर बेडरूम में गया तो मम्मी को केवल कमर तक तौलिया में लिपटा पाया। जो कि एक छोटे साइज़ का तौलिया था और वह केवल मम्मी की जाँघों तक ही आ रहा था। उस तौलिया का केवल एक राऊँड ही मम्मी की कमर पर लिपटा था।

मम्मी मेरी ओर पीठ करके ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी थीं.. जिसके काँच में मुझे मम्मी का फ्रंट साइड दिखाई पड़ रहा था.. लेकिन मम्मी ने अपना एक हाथ दोनों मम्मों के ऊपर रखा हुआ था जिस कारण मुझे कुछ खास दिखाई नहीं पड़ रहा था।

मम्मी की सफेद मांसल पीठ को देख मेरा लण्ड फिर से तन्ना गया और मैं अपने उत्तेजित लौड़े को दबाने लगा।

तब मम्मी ने एक हाथ से अपनी नई ब्रा को अपनी बाँहों में पहना और मुझे बोलीं- तू पीछे से हुक लगा दे।

मैंने ब्रा के दोनों हुक पकड़े और उन्हें खींच कर लगाने की कोशिश की.. लेकिन वह नहीं लगे।

तब मम्मी बोली- देख.. नहीं लगे.. लगता ही लौटानी ही पड़ेगी।

तब मैंने सामने काँच में देखा कि मम्मी के दोनों उरोज तो बाहर ही लटक रहे हैं.. बिना उन्हें अन्दर करे.. ब्रा बॉडी में फिट नहीं बैठ सकती थी।

तो मैंने मम्मी को बोला- आप ही सही से नहीं पहन रही हो।

तो मम्मी ने फिर से कोशिश की.. लेकिन फिर भी अपने बाहर लटकते हुए उरोजों को ब्रा के कप में नहीं डाला। मेरे अंदाज़ से मम्मी शायद जानबूझ कर ऐसा कर रही थीं.. क्योंकि जो औरत बरसों से ब्रा पहन रही हो.. वो यह ग़लती कर ही नहीं सकती।

तब मम्मी बोलीं- अच्छा तू ही सही तरीके से पहना दे..

मैं तुरंत मम्मी के आगे आया और मैंने उनके दोनों मक्खन के समान बड़े-बड़े उरोजों को हाथों में पकड़ कर काली नुकीली निपल्स को दबाते हुए ब्रा के कप में डाल दिया और फिर आगे से ही पीछे हाथ करके मम्मी की ब्रा के हुक लगा दिए।

इस कारण मम्मी मेरे सीने से चिपक सी गई थीं। मम्मी के बड़े-बड़े बोबे मेरे बदन से छू गए.. जिससे मेरा लण्ड तो पहले से ही तना हुआ था.. उनके बदन से छूने से शायद मम्मी मेरे लौड़े का तनाव जान गईं और मेरी कमर के नीचे चोर निगाहों से देखने लगीं।

मैंने कहा- अब बताओ.. सही फिटिंग तो है..

तो मम्मी बोलीं- हाँ.. बिल्कुल सही है.. इन ब्रांडेड आइटम की तो बात ही कुछ और है..

फिर मैंने कहा- आप पैन्टी भी ट्राई कर लीजिए..

तो मम्मी बोलीं- हाँ.. यह ठीक रहेगा..

फिर मम्मी ने मेरे सामने ही बैग में से नई पैन्टी निकाली और झुक कर पैरों में डाल ली और उसे जाँघों पर चढ़ाने लगीं.. और जब वह मम्मी के मोटे चूतड़ों तक पहुँच गई.. तो मम्मी ने तौलिया उतार फेंका..। अभी पैन्टी पूरी तरह नहीं पहन पाने के कारण मम्मी के मांसल चूतड़ों की दरार भी साफ दिखाई पड़ रही थी। तब मम्मी ने पैन्टी में उंगली डाल कर सही तरीके से पहन ली और मेरी ओर मुँह करके बोलीं- बता.. मैं कैसी दिख रही हूँ?

तो मैं बोला- बहुत बढ़िया..

इसी तरह मम्मी ने बाकी की दोनों ब्रा पैन्टी भी मेरे सामने ही ट्रायल कीं.. जिस कारण मैं मम्मी को काफ़ी देर तक अपने सामने अधनंगी देख चुका था और मम्मी के बदन को छू भी चुका था।

लेकिन मेरे बदन की आग बढ़ती ही जा रही थी.. तभी मम्मी बोलीं- तू भी अपना अंडरवियर ट्राई कर ले..

मैं तो इसी का इन्तज़ार कर रहा था.. मैंने तुरंत ही अपने कपड़े खोले और कमर पर वहीं मम्मी वाला तौलिया बांध कर अंडरवियर पहन लिया। तौलिया हटते ही मैं भी अपने लण्ड के उठाव को देख कर चौंक गया.. क्योंकि इस कट साइज़ जॉकी में मेरे लंड का तनाव साफ़ दिखाई पड़ रहा था।

मम्मी की निगाहें भी मेरे लंड पर से हट ही नहीं रही थीं.. जिस कारण मुझे शर्म सी महसूस होने लगी।

तभी अचानक मम्मी को बैग में से वह दूसरा ब्रा पैन्टी का सैट दिखाई पड़ गया और मम्मी ने उसे बाहर निकालते हुए हँसकर पूछा- यह किस के लिए लाया है रे शैतान?

तो मैंने धीरे से कहा- तुम्हारे लिए.. और कौन है जिसके लिए यह मैं लाता.. मुझे यह रंग बहुत पसंद आया था।

तब मम्मी भी बोलीं- हाँ.. रंग तो मुझे भी बहुत पसंद था.. लेकिन इसके कट बहुत ज़्यादा हैं।

तो मैंने कहा- चलो इसका भी ट्रायल करते हैं।

मेरे बोलते ही मम्मी ने अपनी पहनी हुई ब्रा उतार फेंकी और अपने बड़े-बड़े मांसल कबूतरों को उस नई ब्रा में कैद करने की कोशिश करने लगीं। इस ब्रा का कप तो नाम मात्र का था। मम्मी के मोटे-मोटे स्तन उसमें समा ही नहीं रहे थे और मम्मी की नुकीली काली चूचियाँ बार-बार बाहर को आ रही थीं।

मैंने कहा- इन्हें बाहर ही रहने दो.. अब पैन्टी ट्राई करो।

इतो मम्मी पर्दे की आड़ लेकर के नई पैन्टी को पहन कर मेरे सामने आ गईं।

इस पैन्टी को देख कर मैं पागल हो गया.. क्योंकि इसमें से मम्मी के मांसल चूतड़ पूरी तरह से बाहर आ रहे थे और पैन्टी के पीछे का हिस्सा मम्मी की मोटी गाण्ड में धंस चुका था।

जब मम्मी आगे को पलटीं.. तो मेरे ऊपर तो मानो क़यामत ही बरस पड़ी। पैन्टी का सामने का हिस्सा भी मम्मी की मोटी फैली हुई चूत की फांकों में फंस चुका था और मम्मी की चूत के दोनों होंठ बाहर आ रहे थे। साइड से भूरे रंग के बालों के बीच अपनी जन्मस्थली देख कर मैं भी चौंक पड़ा.. लेकिन मम्मी ने बड़ी बेशर्मी से अपने चूतड़ों को बिस्तर पर टिका कर अपनी दोनों जाँघें चौड़ी कर दीं और मुझे पास बुलाकर बड़े ही कामुक अंदाज में बोलीं- अब बता.. यह कैसी है?

मैंने कहा- मम्मी यह चटख रंग आप पर बहुत खुल रहा है.. और मैं तो कहूँगा कि आप घर में ऐसे ही रंग के इसी प्रकार के कपड़े पहना करो। आपको ब्लड प्रेशर की बीमारी के कारण कैसी भी गर्मी सहन नहीं करना चाहिए। इन कपड़ों में तो आराम रहता ही होगा।

तब मम्मी बोलीं- हाँ.. मैं भी यही चाहती हूँ कि मैं कुछ खुले कपड़े पहनूँ.. और यदि तुझे कोई परेशानी ना हो तो मैं आज से ही ऐसे ही रहूँगी।

‘अँधा क्या चाहता.. दो आँखें..’

लेकिन मैं कुछ नहीं बोला.. तभी मम्मी बोलीं- यह पैन्टी कुछ अन्दर की ओर घुस सी रही है.. तू ज़रा देख तो क्या परेशानी है?

मैंने तुरंत ही अपनी उंगलियों से मम्मी की चूत की फांकों में से पैन्टी को बाहर किया और मम्मी की चूत के बालों को पैन्टी के अन्दर डालने की कोशिश की।

तभी मम्मी अपनी चूत को फैलाए ही बिस्तर पर पसर गईं और अपने मम्मों को हाथों से सहलाने लगीं।

मैं तुरंत ही मम्मी के सीने से सट कर लेट गया और मम्मी के निप्पलों को पकड़ कर सहलाने लगा।

तभी मम्मी ने मेरे लंड को टटोला और उसे दबाने लगीं.. मैंने भी बिना देर किए.. मम्मी के उरोजों को मुँह में लेकर चूसना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में मम्मी ज़ोर-ज़ोर से सिसयाने लगीं- चोद दे मुझे.. अपनी माँ की चूत चोद दे.. मादरचोद बन जा.. फाड़ डाल मेरी चूत.. इसका भोसड़ा बना दे..

यह सब सुन कर मैं और जोश में आ गया और मैंने अपना लपलपाता हुआ लंड मम्मी की चूत में पेल दिया।

इसके बाद तो जो यह सिलसिला चला.. उसने कभी रुकने का नाम भी नहीं लिया।

बाद में जब हमारे सभी राज एक-दूसरे को मालूम चल गए तो मम्मी के साथ मेरी बहन और बुआ भी इस हसीन खेल में शामिल होने लगीं और मैं इन सभी की कामाग्नि बारी-बारी से शांत करने लगा।
 
माँ ने दीदी को चुदवाया

हैलो दोस्तो.. घर पर मेरी माँ, मेरी दीदी और मैं सब साथ रहते थे। मेरी उम्र करीब 18-19 के आस-पास थी.. मेरी दीदी की उम्र 22 साल की थी.. उसकी स्पोर्ट्स में रूचि थी और वो स्टेडियम जाती थी।

मेरी माँ टीचर है.. उसकी उम्र 37-38 की होगी.. मगर देखने में किसी भी हालत में 31-32 से ज्यादा की नहीं लगती थी, माँ और दीदी एकदम गोरी हैं, माँ मोटी तो नहीं.. लेकिन भरे हुए शरीर वाली थीं और उनके चूतड़ चलने पर हिलते थे।

उनकी शादी बहुत जल्दी हो गई थी। मेरी माँ बहुत ही सुंदर और हँसमुख है.. वो जिंदगी का हर मज़ा लेने में विश्वास रखती हैं।

हालाँकि वो सबसे नहीं खुलती हैं.. पर मैंने उसे कभी किसी बात पर गुस्साते हुए नहीं देखा है।

जब मैं पढ़ता था और हर चीज को जानने के बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी.. ख़ासतौर से सेक्स के बारे में.. मेरे दोस्त अक्सर लड़की पटा कर मस्त रहते थे, उन्हीं में से दो-तीन दोस्तों ने अपने परिवार के साथ सेक्स की बातें भी बताईं.. तो मुझे बड़ा अज़ीब लगा।

मैंने माँ को कभी उस नज़र से नहीं देखा था.. पर इन सब बातों को सुन-सुन कर मेरे मन में भी जिज्ञासा बढ़ने लगी और मैं अपनी माँ को ध्यान से देखने लगा।

चूँकि गर्मियों की छुट्टियाँ चल रही थीं और मैं हमेशा घर पर ही रहता था।

घर में मैं माँ के साथ ही सोता था और दीदी अपने कमरे में सोती थीं। माँ मुझे बहुत प्यार करती थीं। माँ, दीदी और मैं आपस में थोड़ा खुले हुए थे.. हालाँकि सेक्स एंजाय करने की कोई बात तो नहीं होती थी.. पर माँ कभी किसी चीज का बुरा नहीं मानती थीं और बड़े प्यार से मुझे और दीदी को कोई भी बात समझाती थीं।

कई बार अक्सर उत्तेजना की वजह से जब मेरा लंड खड़ा हो जाता था और माँ की नज़र उस पर पड़ जाती.. तो मुझे देख कर धीरे से मुस्कुरा देतीं और मेरे लंड की तरफ इशारा करके पूछतीं- कोई परेशानी तो नहीं है?

मैं कहता- नहीं..

तो वो कहतीं- पक्का.. कोई बात नहीं?

मैं भी मुस्कुरा देता.. वो खुद कभी-कभी हम दोनों के सामने बिना शरमाए एक पैर पलंग पर रख कर साड़ी थोड़ा उठा देतीं और अन्दर हाथ डाल कर अपनी बुर खुजलाने लगतीं।

नहाते समय या हमारे सामने कपड़े बदलते वक़्त.. अगर उसका नंगा बदन दिखाई दे रहा हो.. तो भी कभी भी शरीर को ढकने या छुपाने की ज़्यादा कोशिश नहीं की।

ऐसा नहीं था कि वो जानबूझ कर दिखाने की कोशिश करती हों.. क्योंकि इन सब बातों के बाद भी मैंने उसकी या दीदी की नंगी बुर नहीं देखी थी। बस वो हमेशा हमें नॉर्मल रहने को कहतीं और खुद भी वैसे ही रहती थीं।

धीरे-धीरे मैं माँ के और करीब आने की कोशिश करने लगा और हिम्मत करके माँ से उस वक़्त सटने की कोशिश करता.. जब मेरे लंड खड़ा होता।

मेरा खड़ा लंड कई बार माँ के बदन से टच होता.. पर माँ कुछ नहीं बोलती थीं।

इसी तरह एक बार माँ रसोई में काम कर रही थीं और माँ के हिलते हुए चूतड़ देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया। मैंने ने अपनी किस्मत आज़माने की सोची और भूख लगने का बहाना करते हुए रसोई में पहुँच गया।

मैं माँ से बोला- माँ भूख लगी है.. कुछ खाने को दो।

यह कहते हुए माँ से पीछे से चिपक गया.. मेरा लंड उस समय पूरा खड़ा था और मैंने अपनी कमर पूरी तरह माँ के चूतड़ों से सटा रखी थी.. जिसके कारण मेरा लंड माँ के चूतड़ों के बीच थोड़ा सा घुस गया था।

माँ हँसते हुए बोलीं- क्या बात है आज तो मेरे बेटे को बहुत भूख लगी है।

‘हाँ माँ.. बहुत ज्यादा.. जल्दी से मुझे कुछ दो…’

मैंने माँ को और ज़ोर से पीछे से पकड़ लिया और उनके पेट पर अपने हाथों को कस कर दबा दिया। कस कर दबाने की वज़ह से माँ ने अपने चूतड़ थोड़ी पीछे की तरफ किए.. जिससे मेरा लंड थोड़ा और माँ के चूतड़ों के बीच में घुस गया। उत्तेजना की वज़ह से मेरा लंड झटके लेने लगा.. पर मैं वैसे ही चिपका रहा और माँ ने हँसते हुए मेरी तरफ देखा.. पर बोलीं कुछ नहीं…

फिर माँ ने जल्दी से मेरा खाना लगाया और थाली हाथ में लेकर बरामदे में आ गईं।

मैं भी उसके पीछे-पीछे आ गया.. खाना खाते हुए मैंने देखा.. माँ मुझे और मेरे लंड को देख कर धीरे-धीरे हँस रही थीं।

जब मैंने खाना खा लिया तो माँ बोलीं- अब तू जाकर आराम कर.. मैं काम कर के आती हूँ।

पर मुझे आराम कहाँ था.. मैं तो कमरे में आ कर आगे का प्लान बनाने लगा कि कैसे माँ को चोदा जाए.. क्योंकि आज की घटना के बाद मुझे पूरा विश्वास था कि अगर मैं कुछ करता भी हूँ.. तो माँ अगर मेरा साथ नहीं देगीं.. तो भी कम से कम नाराज़ नहीं होंगी।

फिर यही हरकत मैंने 5-6 बार की और माँ कुछ नहीं बोलीं.. तो मेरी हिम्मत बढ़ गई।

एक रात खाना खाने के बाद मैं कमरे में आकर लाइट ऑफ करके सोने का नाटक करने लगा.. थोड़ी देर बाद माँ आईं और मुझे सोता हुआ देख कर थोड़ी देर कमरे में कपड़े और सामान ठीक किया और फिर मेरे बगल में आकर सो गईं।

करीब एक घंटे के बाद जब मुझे विश्वास हो गया कि माँ अब सो गई होगीं.. तो मैं धीरे से माँ की ओर सरक गया और धीमे-धीमे अपना हाथ माँ के चूतड़ों पर रख कर माँ को देखने लगा।

जब माँ ने कोई हरकत नहीं की.. तो मैं उनके चूतड़ों को सहलाने लगा और उनकी साड़ी के ऊपर से ही दोनों चूतड़ों और गाण्ड को हाथ से धीमे-धीमे दबाने लगा। जब उसके बाद भी माँ ने कोई हरकत नहीं की तो मेरी हिम्मत थोड़ा और बढ़ी और मैंने माँ की साड़ी को हल्के हल्के ऊपर खींचना शुरू किया।

साड़ी ऊपर करते-करते जब साड़ी चूतड़ों तक पहुँच गई.. तो मैंने अपना हाथ माँ के चूतड़ों और गाण्ड के ऊपर रख कर.. थोड़ी देर माँ को देखने लगा.. पर माँ ने कोई हरकत नहीं की। फिर मैं अपना हाथ उनकी गाण्ड के छेद से धीरे-धीरे आगे की ओर करने लगा, पर माँ की दोनों जाँघें आपस में सटी हुई थीं.. जिससे मैं उन्हें खोल नहीं पा रहा था।

फिर मैंने अपनी दो ऊँगलियाँ आगे की ओर बढ़ाईं तो मेरी साँस ही रुक गई।

मेरी ऊँगलियाँ माँ की बुर के ऊपर पहुँच गई थीं। फिर मैं धीरे-धीरे अपनी ऊँगलियों से माँ की बुर सहलाने लगा.. माँ की बुर पर बाल महसूस हो रहे थे।

चूँकि मेरे लंड पर भी झांटें थीं तो मैं समझ गया कि ये माँ की झांटें हैं। इतनी हरकत के बाद भी माँ कुछ नहीं कर रही थीं.. तो मैंने धीरे से अपनी पूरी हथेली माँ की बुर पर रख दी और बुर के दोनों होंठों को एक-एक कर के छूने लगा.. तभी मुझे महसूस हुआ कि माँ की बुर से कुछ मुलायम सा चमड़े का टुकड़ा लटक रहा है।

जब मैंने उसे हल्के से खींचा तो पता चला कि वो माँ की बुर की पूरी लम्बाई के बराबर यानि ऊपर से नीचे तक की लंबाई में बाहर की तरफ निकला हुआ था और जबरदस्त मुलायम था।

उस समय मेरा लंड इतना टाइट हो गया था कि लगा जैसे फट जाएगा.. मैं धीरे से उठ कर बैठ गया और अपनी पैन्ट उतार कर लंड को माँ के चूतड़ से सटाने की कोशिश करने लगा… पर कर नहीं पाया। तो मैं एक हाथ से माँ की बुर में ऊँगली डाल कर बाहर निकले चमड़े को सहलाता रहा और दूसरे हाथ से मुठ मारने लगा.. 2-3 मिनट में ही मैं झड़ गया।

पर जब तक मैं अपना गाढ़ा जूस रोक पाता.. वो माँ के चूतड़ों पर पूरा गिर चुका था। ये देख कर मैं बहुत डर गया और चुपचाप पैन्ट पहन कर.. माँ को वैसा ही छोड़ कर सो गया।

सुबह जब मैं उठा तो देखा.. कि माँ रोज की तरह अपना काम कर रही थीं और दीदी हॉकी की प्रैक्टिस.. जो सुबह 6 बजे ही शुरू हो जाती थी.. के लिए जा चुकी थीं।

मैं डरते-डरते बाथरूम की तरफ जाने लगा तो माँ ने कहा- आज चाय नहीं माँगी तूने?

तो मैंने बात पलटते हुए कहा- हाँ.. पी रहा हूँ.. पेशाब करके आता हूँ।

जब मैं बाथरूम से वापस आया तो माँ को देखा, माँ बरामदे में बैठी सब्जी काट रही थीं और वहीं पर मेरी चाय रखी हुई थी।

मैं चुपचाप बैठ कर चाय पीने लगा तो माँ मेरी तरफ देख कर हँसते हुए बोलीं- आज बड़ी देर तक सोता रहा।

‘हाँ माँ नींद नहीं खुली..’

तो माँ बोलीं- एक काम किया कर.. आज से रात को और जल्दी सो जाया कर..’

यह कह कर वो हँसते हुए रसोई में चली गईं।

जब मैंने देखा कि माँ कल रात के बारे में कुछ भी नहीं बोलीं.. तो मैं खुश हो गया।

उस दिन पूरे दिन मैंने कुछ भी नहीं किया.. मैंने सोच रखा था कि अब मैं रात को ही सब कुछ करूँगा.. जब तक या तो माँ मुझसे चुदाई के लिए तैयार ना हो या मुझे डांट नहीं देती।

रात को मैं खाना खाकर जल्दी से कमरे में आकर सोने का नाटक करने लगा।

थोड़ी देर में माँ भी दीदी के साथ आ गईं, उस दिन माँ बहुत जल्दी काम ख़त्म करके आ गई थीं।

खैर.. मैं माँ के सोने का इंतजार करने लगा।

थोड़ी ही देर में दीदी के जाने के बाद माँ धीरे से पलंग पर आकर लेट गईं। करीब एक घंटे तक लेटे रहने के बाद मैंने धीरे से आँखें खोलीं और माँ की तरफ सरक गया।

थोड़ी देर में जब मैंने बरामदे की हल्की रोशनी में माँ को देखा तो चौंक पड़ा.. माँ ने आज साड़ी की जगह नाईटी पहन रखी थी और उन्होंने अपना एक पैर थोड़ा आगे की तरफ कर रखा था।

फिर मैंने सोचा कि अगर यह किस्मत से हुआ तो अच्छा है और अगर माँ जानबूझ कर यह कर रही हैं तो माँ जल्दी ही चुद जाएगी।

उस रात मेरी हिम्मत थोड़ी बढ़ी हुई थी.. थोड़ी देर नाईटी के ऊपर से माँ का चूतड़ सहलाने के बाद मैंने धीरे से माँ की नाईटी का सामने का बटन खोल दिया और उसे कमर तक पूरा हटा दिया और धीरे से माँ के चूतड़ों को सहलाने लगा।

मैं जाँघों को भी सहला रहा था.. माँ के चूतड़ और जाँघें इतनी मुलायम थे कि मैं विश्वास नहीं कर पा रहा था।

फिर मैंने अपना हाथ उनकी जाँघों के बीच डाला तो मैं हैरान रह गया।

आज माँ की बुर एकदम चिकनी थी.. उनके बुर पर बाल का नामोनिशान नहीं था.. उनकी बुर बहुत फूली हुई थी और बुर के दोनों होंठ फैले हुए थे। शायद एक जाँघ आगे करने के कारण, उनकी बुर से निकला हुआ चमड़ा लटक रहा था।

मेरे कई दोस्तों ने गपशप के दौरान इसके बारे में बताया था कि उनके घर की औरतों की बुर से भी ये निकलता है और उन्हें इस पर बड़ा नाज़ होता है। मैं तो उत्तेजना की वज़ह से पागल हो रहा था.. मैंने लेटे-लेटे ही अपना शॉर्ट्स निकाल दिया और माँ की तरफ थोड़ा और सरक गया.. जिससे मेरा लंड माँ के चूतड़ों से टच करने लगा।

थोड़ी देर तक चुप रहने के बाद जब मैंने देखा कि माँ कोई हरकत नहीं कर रही हैं.. तो मेरी हिम्मत और बढ़ी।

अब मैं लेटे-लेटे ही माँ की बुर को सहलाने का पूरा मज़ा लेने लगा। थोड़ी ही देर मे मुझे लगा कि माँ की बुर से कुछ चिकना-चिकना पानी निकल रहा है।

ओह्ह.. क्या खुश्बू थी उसकी…

मेरा लंड फूल कर फटने की स्थिति में हो गया.. मैं अपना लंड माँ की गाण्ड के छेद.. उनकी जाँघों पर धीमे-धीमे रगड़ने लगा।

तभी मुझे एक आइडिया आया कि क्यों ना आज थोड़ा और बढ़ कर माँ की बुर से अपना लंड टच कराऊँ।

जब मैंने अपनी कमर को आगे खिसका कर माँ की जाँघों से सटाया तो लगा जैसे करेंट फैल गया हो.. मुझे झड़ने का जबरदस्त मन कर रहा था, पर मैंने सोचा कि एक बार माँ की बुर में लंड डाल कर उनकी बुर के पानी से चिकना कर लूँगा और फिर बाहर निकाल मुठ मार लूँगा।

यह सोच कर मैंने अपनी कमर थोड़ा ऊपर उठाया और अपना लंड माँ की बुर से लटके चमड़े को ऊँगलियों से फैलाते हुए उनके छेद पर रखा.. तो माँ की बुर से निकलता हुआ चिकना पानी मेरे सुपारे पर लिपट गया और थोड़ा कोशिश करने पर मेरा सुपारा माँ की बुर के छेद में घुस गया।

जैसे ही सुपारा अन्दर गया.. उफ़फ्फ़ माँ की बुर की गर्मी मुझे महसूस हुई और जब तक मैं अपना लंड बाहर निकालता मेरे लंड से वीर्य का फुहारा माँ की बुर में पिचकारी की तरह निकलने लगा।

मैं घबरा तो गया.. पर ज्यादा हिलने से डर भी रहा था कि कहीं माँ जाग ना जाएँ।

जब तक मैं धीरे से अपना लंड माँ की बुर से निकालता.. तब तक मेरे लंड का पानी माँ की बुर में पूरा खाली हो चुका था और लंड निकालते वक़्त वीर्य की गाढ़ी धार माँ के गाण्ड के छेद पर बहने लगी।

मुझे लगा अब तो मैं माँ से पक्का पिटूंगा। मैं डर के मारे जल्दी से शॉर्ट्स पहन कर सो गया.. मुझे नींद नहीं आ रही थी.. पर मैं कब सो गया, पता ही नहीं चला।

अगले दिन उठा तो देखा कि हमेशा की तरह माँ सफाई कर रही थीं.. पर दीदी स्टेडियम नहीं गई थी।

मुझे देखते ही माँ ने दीदी से कहा- वीना.. जा चाय गरम करके भाई को दे दे और मुझे प्यार से वहीं बैठने के लिए कहा।

मैंने चोरी से माँ की ओर देखा तो माँ मुझे देख कर पूछने लगीं- आज नींद कैसी आई?

मैंने कहा- अच्छी..

तो माँ हँसने लगीं और मेरी पैंट की ओर देख कर बोलीं- अब तू रात में सोते समय थोड़े ढीले कपड़े पहना कर। हाफ-पैन्ट पहन कर नहीं सोते हैं।

अब तू बड़ा हो रहा है.. देख मैं और वीनू भी ढीले कपड़े पहन कर सोते हैं। मैं यह सुन कर बड़ा खुश हुआ कि माँ ने मुझे डांटा नहीं।

उस दिन मुझे पूरा विश्वास हो गया था कि अब माँ मुझे रात में पूरे मज़े लेने से मना नहीं करेगीं.. भले ही दिन में चुदाई के बारे में खुल कर कोई बात ना करें।

अब तो मैं बस रात का ही इंतजार करता था।

खैर.. उस रात फिर जब मैं सोने के लिए कमरे में गया तो मुझे माँ की ढीले कपड़े पहनने वाली बाद याद आई.. पर मेरे पास कोई बड़ी शॉर्ट्स नहीं थी।

मैंने अल्मारी में से एक पुरानी लुँगी निकाली और अंडरवियर उतार कर पहन लिया और सोने का नाटक करने लगा।

तभी मेरे मन में माँ की सुबह वाली बात चैक करने का विचार आया और मैंने अपनी लुँगी का सामने वाला हिस्सा थोड़ा खोल दिया.. जिससे मेरा लंड खड़ा होकर बाहर निकल गया और अपने हाथों को अपनी आँखों पर इस तरह रखा कि मुझे माँ दिखाई दे।

थोड़ी ही देर में माँ कमरे में आईं और नाईटी पहन कर पलंग पर आने लगीं और लाइट ऑफ करने के लिए जैसे ही मुड़ीं.. एकदम से वे मेरे लंड को देखते ही रुक गईं.. थोड़ी देर वैसे ही मेरे लंड को जो की पूरे 6′ लम्बा और 1.5′ व्यास बराबर मोटा था.. को देखती रहीं।

फिर पता नहीं क्यों उन्होंने लाइट बंद करके नाईट-बल्ब जला दिया और पलंग पर लेट गईं।

वो मेरे लंड को बड़े प्यार से देख रही थीं.. पर मेरे लंड को उन्होंने छुआ नहीं.. फिर दूसरी तरफ करवट बदल कर एक पैर को कल की तरह आगे फैला कर लेट गईं।

मुझे पक्का विश्वास था कि आज माँ ने जानबूझ कर नाईट-बल्ब ऑन किया है ताकि मैं कुछ और हरकत करूँ।

आधे-एक घन्टे के बाद जब मैं माँ की ओर सरका.. तो लुँगी की गाँठ रगड़ से अपने आप ही खुल गई और मैं नंगे ही अपने खड़े लंड को लेकर माँ की तरफ सरक गया और नाईटी खोल कर कमर तक हटा दिया।

उस रात मैंने पहली बार माँ के चूतड़.. गाण्ड और बुर को देख रहा था.. मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था।

मैं झुक कर माँ की जाँघों और चूतड़ के पास अपना चेहरा ले जाकर बुर को देखने की कोशिश करने लगा। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि कोई चीज इतनी मुलायम, चिकनी और सुन्दर हो सकती है। माँ की बुर से बहुत अच्छी से भीनी-भीनी खुश्बू आ रही थी.. मैं एकदम मदहोश होता जा रहा था।

पता नहीं कैसे.. मैं अपने आप ही माँ की बुर को नाक से सटा कर सूंघने लगा.. उफ…बुर से निकले हुए चमड़े के दोनों पत्ते.. किसी गुलाब की पंखुड़ी से लग रहे थे।

माँ की बुर का छेद थोड़ा लाल था और गाण्ड का छेद काफ़ी टाइट दिख रहा था.. पर सब मिला कर उनके पूरे चूतड़ और जाँघें बहुत मुलायम थे।

मैंने उसी तरह कुछ देर सूंघने के बाद माँ की बुर के दोनों पत्तों को मुँह में भर लिया और चूसने लगा। उनकी बुर से बेहद चिकना लेकिन नमकीन पानी निकलने लगा.. मैं भी आज चुदाई के मज़े लेना चाहता था।

फिर मैंने माँ की बुर से निकलते हुए पानी को अपने कड़े सुपारे पर लपेटा और धीरे से माँ की बुर में डालने की कोशिश करने लगा… पर पता नहीं कैसे आज मेरा लंड बड़ी आसानी से माँ की बुर के छेद में घुस गया।

मैं वैसे ही थोड़ी देर रुका रहा.. फिर मैंने लंड को अन्दर डालना शुरू किया, दो-तीन प्रयासों में मेरा लंड माँ की बुर में घुस गया।

ओह.. क्या मज़ा रहा था.. माँ की बुर काफ़ी गरम थी और मेरे लंड को चारों ओर से जकड़े हुए थी।

थोड़ी देर उसी तरह रहने के बाद मैंने लंड को अन्दर-बाहर करना शुरू किया। ओह.. जन्नत का मज़ा मिल रहा था..

4-5 मिनट अन्दर-बाहर करते ही मुझे लगा कि मैं झड़ने वाला हूँ.. तो मैंने अपनी रफ़्तार और तेज़ कर दी और अपना गाढ़ा गाढ़ा वीर्य माँ की बुर में उड़ेल दिया और थोड़ी देर तक उसी तरह माँ से चिपका हुआ लेटा रहा कि अभी आराम से सो जाऊँगा।

पर पता नहीं कैसे आँख लग गई और मैं वैसे ही सो गया।

सुबह जब उठा तो देखा.. मेरी लुँगी की गाँठ लगी हुई है और एक पतली चादर मेरी कमर तक उढ़ाई गई है.. मैं समझ गया कि यह काम माँ ने किया है.. पर कब और कैसे..?

खैर.. जब मैं बाहर निकला तो दीदी स्टेडियम जा चुकी थीं और माँ रसोई में थीं।

मुझे देखते ही वो मेरी और अपनी चाय लेकर मेरे पास आईं और देते हुए बोलीं- आजकल तू बड़ी गहरी नींद में सोता है और अपने कपड़ों का ध्यान भी नहीं रखता है.. सुबह तेरी लुँगी जाने कैसे खुल गई थी और तू वैसे ही मुझ से चिपक कर सो रहा था..

और वे हँसने लगीं।

तो मैंने कहा- तो ठीक है ना माँ.. इसी बहाने तुम मेरा ध्यान रख लेती हो..

पर इसके आगे की कोई बात माँ ने नहीं की.. तो मैंने भी कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा जब रात में सब कुछ ठीक हो रहा है.. तो मज़े लो.. बाकी बाद में देखेंगे और मैं उठ कर फ्रेश होने चला गया।

माँ भी काम करने चली गईं।

इसी तरह 8-10 दिन बीत गए और मैं माँ की चुदाई के मज़े लेता रहा और माँ भी कुछ खुलने लगी थीं।

मैं भी रात को माँ की नाईटी ऊपर से नीचे तक पूरा खोल कर उसे पूरा नंगा कर देता.. फिर थोड़ी देर उसकी गाण्ड और चूत चाटने के बाद उसकी चूचियों को और पेट के नीचे वाले हिस्से को पकड़ कर पूरा ज़ोर लगा कर लंड अन्दर डाल कर चुदाई करता और झड़ने के बाद माँ की बुर से लंड बिना बाहर निकाले हुए उसकी चूचियों को पकड़ कर सो जाता था।

माँ भी सुबह कमरे से बाहर जाते समय मुझे नंगा ही छोड़ देतीं और दरवाज़ा चिपका देतीं.. ताकि दीदी अन्दर ना आ जाए।

अब वे दीदी के जाने के बाद नहाते वक़्त बाथरूम का दरवाजा नहीं बंद करतीं और हमेशा दिन में भी नाईटी पहने रहतीं.. जिसमें से उनका पूरा जिस्म लगभग दिखाई पड़ता था.. पर मैं कुछ ज्यादा ही करना चाहता था।

लगभग 10-12 दिन बाद रात को जब मैं पलंग पर गया तो मेरे दिमाग में यही सब बातें घूम रही थीं कि कैसे माँ को दिन में चुदाई के लिए तैयार किया जाए।

खैर.. मैं अपना लंड लुँगी से बाहर निकाल कर लेट गया.. थोड़ी देर में माँ कमरे में आईं और थोड़ा सामान ठीक करने के बाद नाइट-बल्ब ऑन करके लेट गईं.. लेटने से पहले उन्होंने मेरे माथे पर चुम्बन किया और मुस्कुरा कर सो गईं।

अब तक मैं ये जान चुका था कि माँ को सब पता है और वो जागी रहती हैं पर चूँकि वो कुछ नहीं कहतीं और चुपचाप मज़े लेती थीं.. तो मैं भी मस्त हो कर मज़े लेता।

अब तो मैं माँ के लेटने के 4-5 मिनट बाद ही शुरू हो जाता और नाईटी खोल कर हटा देता था।

आज भी केवल 5 मिनट के बाद मैंने फिर अपनी लुँगी हटा कर माँ की नाईटी को पूरा उतार दिया, थोड़ी देर तक माँ की गाण्ड और बुर को चाटने और खेलने के बाद जब मैंने लंड को माँ के चूतड़ों से रगड़ना शुरू किया चूँकि माँ आज थोड़ा सा पेट के बल लेटी हुई थीं.. तो मेरे मन में एक आइडिया आया कि क्यों ना आज माँ की गाण्ड में लंड डाला जाए।

ये सोचते ही मैं उत्तेजना से और भर गया और मैं माँ के चूतड़ों को हाथों से थोड़ा खोलते हुए उनकी गाण्ड के छेद को चाटने लगा।

मुझे महसूस हुआ कि माँ की बुर और गाण्ड का छेद खुल और बंद हो रहा था और बुर से पानी निकल रहा था। थोड़ी देर चाटने के बाद मैं ऊँगली से गाण्ड के छेद को खोलने लगा.. फिर सुपारे पर माँ की बुर का पानी लगाया फिर थोड़ा सा पानी उनकी गाण्ड के छेद पर भी लगाया और छेद पर सुपारा रख कर उसकी कमर को पकड़ कर अन्दर डालने की कोशिश करने लगा.. पर उनकी गाण्ड का छेद बुर के छेद से काफ़ी तंग था।

थोड़ी कोशिश करने पर सुपारा तो अन्दर घुस गया पर मैं लंड पूरा अन्दर नहीं डाल पा रहा था.. तो मैंने थोड़ा रुक कर उसके चूतड़ों को हाथों से फैलाते हुए फिर से लंड अन्दर डालना शुरू किया।

पर पता नहीं क्यों मेरे लंड में जलन सी होने लगी.. मैंने लंड बाहर निकाल लिया और नाइट-बल्ब की रोशनी में देखा तो मेरे सुपारे के पास से जो चमड़ा सटा था.. वो एक तरफ से फट गया था और वहीं से जलन हो रही थी।

मेरे दोस्तों ने बताया तो था कि चुदाई के बाद लंड का टांका टूट जाता है और सुपारा पूरा बाहर निकल जाता है।

अब जलन के मारे मैं चुदाई नहीं कर पा रहा था और मारे उत्तेजना के मैं बिना झड़े रह भी नहीं सकता था।

मैं उत्तेजना के मारे लंड को हाथ में पकड़ कर माँ के जिस्म पर रगड़ने लगा।

मेरे दिमाग़ में कुछ भी नहीं सूझ रहा था। मैं तो बस झड़ना चाहता था.. तभी मेरे मन में माँ के मुँह में लंड डालने का विचार आया और मैं अपना लंड माँ के चेहरे से रगड़ने के लिए पलंग से नीचे उतर कर.. माँ के चेहरे के पास खड़ा हो गया।

अपना लंड हाथ में पकड़ कर सुपारा माँ के गालों और होंठों से धीमे-धीमे रगड़ने लगा.. मैं बस उत्तेजना की वज़ह से पागल हो रहा था।

अगर उस वक़्त माँ उठ भी जाती तो भी मैं नहीं रुक पाता।

फिर मैं माँ के होंठों से सुपारे को सटाते हुए मुठ मारने लगा.. पर उनके मुँह पर झड़ने की हिम्मत नहीं हुई और मैं वहाँ से हट कर उनकी गाण्ड और बुर के छेद पर लंड रख कर मुठ मारने लगा।

मैं तेज़ी से मुठ मार रहा था और थोड़ी देर में माँ की गाण्ड के और बुर के छेद पर ऊपर से ही पूरा वीर्य पिचकारी की तरह छोड़ने लगा। माँ की पूरी बुर.. चूतड़ और गाण्ड मेरे वीर्य से भर गई थी और पूरा गाढ़ा पानी उनकी जाँघों पर भी बहने लगा।

जब मेरी उत्तेजना शांत हुई तो मैंने लंड में एक तेज़ जलन महसूस की.. मैंने देखा कि मेरा लंड पूरा छिल गया था और चमड़े पर सूजन आ गई थी।

मैं ये देख कर परेशान हो गया और माँ को उसी तरह छोड़ कर चुपचाप सो गया।

जब सुबह उठा तो मैंने देखा कि मेरे लंड का चमड़ा काफ़ी सूज गया था और छिला हुआ था।

मैं बाहर निकला तो माँ रसोई से निकल रही थीं और मुझे देखते ही वापस चाय लेकर चली आईं.. पर मेरा मुँह उतरा हुआ था।

माँ मुझे देख कर मुस्कुराईं.. पर मैं कुछ नहीं बोला।

माँ थोड़ी देर बैठने के बाद काम करने चली गईं और मैं नहाने चला गया। नहाते वक़्त मैं सोच रहा था की अब तो बस चुदाई बंद ही करनी पड़ेगी। लंड को देख कर मुझे रोना आ रहा था।

तभी मुझे एक आइडिया आया कि क्यों ना माँ को ही लंड दिखा कर उनसे इलाज़ पूछा जाए और हो सकता है इसी बहाने माँ मुझे दिन में भी खुल जाएं।

मैं तौलिया लपेटे बाहर निकला और कमरे में जा कर माँ को आवाज़ दी.. तो माँ कमरे में आईं और पूछा- क्या हुआ बेटा?

मैंने कहा- माँ मेरे पेशाब वाली जगह में दर्द हो रहा है.. सूज भी गया है।

तो माँ ने मुझे ऐसे देखा जैसे कह रही हों.. ये तो एक दिन होना ही था और बोलीं- बेटा तौलिया खोलो.. मैं देखूँ?

और वे बाहर बरामदे में दिन की रोशनी में आ गईं।

मैं भी बाहर आ गया और उनके पास खड़ा होकर तौलिया खोल दिया.. मेरा लंड वाकयी में सूज कर मोटा हो गया था।

जब माँ ने लंड को देखा तो धीमे से मुस्कुराते हुए मुझसे पूछा- इसके साथ क्या कर रहा था?

मैंने बड़े भोलेपन से कहा- कुछ नहीं, इसमें से खून भी निकल रहा है..

तो माँ मेरे लंड को हाथ में लेकर चमड़ा पीछे करने लगीं.. तो मुझे दर्द होने लगा।

तो माँ ने कहा- ओह ये तो छिल गया है.. लग रहा है रगड़ लगी है..

और वे चमड़ा पीछे कर के सुपारा देखने लगीं, फिर बोलीं- अच्छा मैं इस पर बोरोलीन लगा देती हूँ.. पर तू इसे खुला ही रहने दे और अभी कुछ पहनने की ज़रूरत नहीं है.. बस मैं ही तो हूँ.. तू ऐसे ही रह ले।

यह कह कर माँ कमरे से बोरोलीन लेने चली गईं।

मैं उनके चूतड़ों को हिलते हुए देख रहा था.. तभी वो बोरोलीन लेकर आ गईं और मेरे लंड को हाथ में लेकर सुपारे पर लगाने लगीं। जिसकी वज़ह से मेरा लंड खड़ा होने लगा और करीब 6 लम्बा हो गया.. सूजन की वज़ह से वो और मोटा लग रहा था.. यह देख कर माँ

मेरे चूतड़ पर थप्पड़ मारते हुए बोलीं- यह क्या कर रहा है?

मैं बोला- माँ, यह अपने आप हो गया है.. मैंने नहीं किया है।

तो माँ बोलीं- अच्छा ये भी अपने आप हो गया है और रगड़ भी अपने आप ही लग गई है.. सच बता ये रगड़ कैसे लगी?

मैं हँसने लगा तो माँ खुद ही बोलीं- बेटा ये एक बहुत नाज़ुक अंग होता है.. इसकी देखभाल बड़ी संभाल कर करनी पड़ती है.. जब तू शादी के लायक बड़ा हो जाएगा.. तब तुझे इसकी अहमियत पता चलेगी।

माँ बोलती जा रही थीं और सुपारे और लंड पर बोरोलीन लगाती जा रही थीं।

मेरा हाथ माँ के कंधे पर था और खड़े होने की वजह से मुझे नाईटी के खुले भाग से माँ की बड़ी-बड़ी चूचियाँ आधे से ज़्यादा दिखाई पड़ रही थीं।

मैं अपने हाथों को माँ की चूचियाँ की तरफ बढ़ाते हुए बोला- क्यों माँ शादी के बाद ऐसा क्या होता है कि इसकी इतनी ज़रूरत पड़ती है?

ये सुन कर माँ ने मुस्कुराते हुए मुझे देखा और बोलीं- ये तो शादी के बाद ही पता चलेगा..

तो मैं थोड़ा और मज़े लेते हुए माँ से पूछा- माँ क्या तुम औरतों की भी ये इंपॉर्टेंट होती है?

‘ये क्या?’ माँ ने पूछा।

तो मैं हँसते हुए बोला- अरे यही जो तुमने मेरा हाथ में पकड़ा हुआ है।

माँ मुझे देख कर मुस्कुराते हुए बोलीं- मेरा ऐसा नहीं है..

तो मैंने धीरे से उनकी नाईटी का ऊपर वाला बटन खोल दिया.. जिससे उनकी चूचियाँ बाहर दिखने लगी और धीमे से लंड को उससे सटाते हुए पूछा- तो फिर कैसा है?

पर माँ कुछ नहीं बोलीं.. मेरा लंड उत्तेजना में और टाइट हुआ जा रहा था और खिंचाव के कारण सुपारे के टांके वाली जगह पर दर्द होने लगा।

मैं बोला- उह.. माँ ये तो बहुत दर्द कर रहा है।

तो माँ बोलीं- बेटा रगड़ की वजह से तेरे सुपारे का टांका खुल गया है और ऊपर से तूने ही तो इसे फुला रखा है.. चल मैंने क्रीम लगा दी है.. 7-8 दिन में ठीक हो जाएगा और ये कह कर माँ सुपारे को सहलाने लगीं।

मैंने ध्यान से देखा तो माँ का भी चेहरा उत्तेजना की वजह से लाल हो गया था और उसकी चूचियाँ और निप्पल एकदम खड़े हो गए थे।

मैंने सोचा कि यह मौका अच्छा है माँ को और गरम कर देता हूँ.. तो माँ शायद खुल जाएँ।

यह सोच कर मैं बोला- माँ यह टांका क्या होता है और मेरा कैसे खुल गया?

माँ भी थोड़ा खुलने लगीं और बोलीं- बेटा ये जो चमड़ा है ना.. ये सुपारे के पीछे वाले हिस्से से चिपका रहता है.. तूने ज़रूर इसे तेज़ रगड़ दिया होगा। तो मैं माँ के निप्पल छूते हुए बोला- पहले ये बताओ कि इसे नीचे कैसे करूँ.. बहुत दर्द हो रहा है।

तो माँ मेरे चूतड़ों पर चिकोटी काटते हुए पूछने लगीं- पहले कैसे करता था?

तो मैं हँसने लगा और माँ की चूचियों पर हाथ से दबाव बढ़ाते हुए कहा- वो तो बस ऐसे ही।

;इसलिए आजकल कुछ ज़्यादा ही रगड़ रहा है.. तेरी वज़ह से मुझे भी परेशानी होने लगी है।’

माँ ने चूचियों पर बिना ध्यान देते हुए कहा।

‘तो तुम बताओ ना कि क्या करूँ..?” मैंने कहा और अपनी कमर थोड़ा और आगे बढ़ा दी.. जिससे मेरा लंड माँ की दोनों चूचियों के बीच में घुस गया और अपनी ऊँगलियों के बीच में निप्पल को फँसा लिया।’

तो माँ बोलीं- ये क्या कर रहा है?

मैं शरारात से हँसते हुए बोला- माँ तुम्हारी चूचियाँ बड़ी मुलायम हैं।

पर माँ हँसते हुए उठने लगीं.. जिससे मेरा लंड उनकी चूचियों में दब गया और मेरे सुपारे पर लगा क्रीम उनकी चूचियों पर भी लग गया।

तो माँ अपनी चूचियों को हाथों से फैलाते हुए मुझे दिखा कर बोलीं- ये देख तेरी क्रीम मेरी चूचियों में लग रही है.. चल अभी खाना बनाना है.. देर हो रही है.. बाद में बताऊँगी।

माँ रसोई में से सामान ला कर वहीं बरामदे में चौकी पर बैठ कर काम करने लगीं।

उसकी चूचियाँ वैसे ही खुली हुई थीं। पर मेरे दिमाग में तो माँ को दीदी के आने से पहले नंगा करने का प्लान चल रहा था।

यह सोच कर मैं भी माँ के बगल में ही उसकी तरफ मुँह करके चौकी पर बैठ गया।

मैंने अपना एक पैर मोड़ कर माँ की जाँघों पर रख दिया.. मेरा लंड उस समय एकदम टाइट था।

माँ ने मुस्कुराते हुए मुझे देखा और सब्जी काटने लगीं।

मैं माँ के सामने ही अपने लंड को हाथ में लेकर सहलाने लगा.. जिससे सुपारा और फूल गया था।

माँ बोलीं- ये क्या कर रहा है?

तो मैंने कहा- माँ बहुत खुजली हो रही है।

फिर माँ कुछ नहीं बोलीं और अपना काम करने लगीं।

मैं जानबूझ कर लंड माँ के सामने करके सहला रहा था। मैंने देखा माँ का ध्यान भी मेरे सुपारे पर ही था और वो बार-बार अपनी जाँघों को फैला रही थीं.. चूँकि नाईटी का आगे का भाग खुला हुआ था.. जिससे मुझे कई बार उसकी बुर दिखाई दी.. मैं समझ गया कि माँ एकदम गरम हो गई है.. मैं उसे और उत्तेजित करने के लिए हिम्मत बढ़ाते हुए एकदम खुल कर बात करने लगा।

मैं बोला- माँ तुम कह रही हो कि मेरा लंड ठीक होने में 7-8 दिन लगेंगे और तब तक मुझे ऐसे ही लंड खुला रखना पड़ेगा।

तो माँ बोलीं- हाँ.. खुला रखेगा तो घाव जल्दी सूखेगा और आराम भी मिलेगा।

‘लेकिन माँ खुला होने की वजह से मेरा लंड पूरा तना जा रहा है.. जिससे चमड़ा खिंचने के कारण दर्द हो रहा है और खुजली भी बहुत हो रही है।’

मैंने लंड माँ को दिखाते हुए बोला.. तो माँ ने कहा- बेटा लंड खड़ा रहेगा तो खुजली होगी ही..

तो मैं बोला- माँ क्या तुम्हारे उधर भी खुजली होती है?

‘हाँ.. होती है..’ माँ बोलीं।

‘क्यों.. क्या तुम्हारे भी टांका टूटता है?’

मैंने पूछा.. तो माँ हँसने लगीं और बोलीं- नहीं हमारे में टांका-वांका नहीं होता है.. बस छेद होता है।

माँ अब काफ़ी खुल कर बातें करने लगी थीं, तो मैंने जानबूझ कर अंजान बनते हुए माँ की जांघों के ऊपर से नाईटी का बटन खोल कर हटा दिया जिससे उनके कमर के नीचे का हिस्सा नंगा हो गया और उनकी बुर को हाथों से छूते हुए कहा- अरे हाँ.. तुम्हारे तो लंड है ही नहीं.. लेकिन छेद कहाँ है.. यहाँ तो बस फूला-फूला सा दिखाई दे रहा है और इसमें से कुछ बाहर निकल कर लटका भी है।

तो माँ ने तुरंत मेरा हाथ अपनी बुर से हटा कर उसे ढकते हुए बोलीं- छेद उसके अन्दर होता है।

‘तो तुम खुजलाती कैसे हो?’ मैंने कहा।

तो वो बोलीं- उसे रगड़ कर और कैसे।

मैं बोला- लेकिन मैंने तो तुम्हें कभी अपनी नंगी बुर खोल कर सहलाते हुए नहीं देखा है।

माँ खूब तेज हँसते हुए बोलीं- बुर.. बुर.. ये तूने कहाँ से सुना।

‘मेरे दोस्त कहते हैं उनमें से कई तो अपने घर में नंगे ही रहते हैं और सब औरतों की बुर देख चुके हैं।’

यह सुन कर माँ बोलीं- अच्छा तो ये बात है.. तभी मैं कहूँ कि तू आज कल क्यूँ ये हरकतें कर रहा है?

मैंने हँसते हुए कहा- कौन सी हरकत? तो माँ मेरे लंड को हाथों से पकड़ कर हल्के से हिलाते हुए बोलीं- रात वाली और कौन सी.. जिसके कारण यह हुआ है.. खुद तो जैसे-तैसे करके सो जाता है और मुझे हर तरफ से गीला कर देता है।

तो मैं हँसने लगा और कहा- तुम भी तो मज़े ले रही थीं।

तब तक शायद माँ की बुर काफ़ी गीली हो चुकी थी और खुजलाने भी लगी थी.. क्योंकि वो अपने एक हाथ से नाईटी का थोड़ा सा हिस्सा जो केवल उसकी बुर ही ढके हुए था।

क्योंकि बाकी का हिस्सा तो मैं पहले ही नंगा कर चुका था। उन्होंने नाईटी को हल्का सा हटा कर बुर से निकले हुए चमड़े के पत्ते को मसलने लगीं।

माँ धीमे-धीमे हँस रही थीं.. पर कुछ बोली नहीं।

‘माँ कितना अच्छा लगता है ना.. रात वाली हरकत दिन में भी करें.. देखो ना मेरा लंड कितना फूल गया है और तुम्हारी बुर भी खुज़ला रही है.. प्लीज़ मुझे दिन में अपनी बुर देखने दो ना और वैसे भी मैं अभी तो लंड तुम्हारे छेद में डाल नहीं पाऊँगा।’

मैंने एक हाथ से अपने लंड को सहलाते हुए कहा और दूसरे हाथ से उसकी नंगी जाँघ को सहलाते हुए उसकी बुर के होठों को ऊँगलियों से खोलने लगा।
 
माँ ने दीदी को चुदवाया-2

माँ भी शायद बहुत गर्म हो गई थीं और चुदना चाहती थीं.. क्योंकि उसने मेरा हाथ इस बार नहीं हटाया, पर शायद शर्मा रही थीं और अचानक बात को पलटते हुए बोलीं- अरे कितनी देर हो गई.. खाना बनाना है।

और वैसे ही नाईटी बिना बंद किए हुए उठ कर रसोई में चली गईं।

मैं भी तुरंत माँ के पीछे-पीछे रसोई में चला गया और मैंने देखा कि उन्होंने नाईटी के सिर्फ़ एक-दो बटन ही बंद किए थे.. बाकी सारा खुला हुआ था जिसके कारण उनकी चूचियाँ बाहर निकली हुई थीं और नाभि से नीचे का पूरा हिस्सा पैरों तक एकदम नंगा दिख रहा था।

मैं उनसे पीछे से पकड़ कर चिपक गया जिससे मेरा लंड माँ के चूतड़ों के बीच में घुस गया और बोला- माँ तुम बहुत अच्छी हो.. मेरे दोनों हाथ माँ के नंगे पेट पर थे।

माँ बोलीं- अच्छा मुझे मस्का लगा रहा है।

तो मैं हँसने लगा और धीरे-धीरे अपना हाथ माँ के पेट सहलाते हुए निचले हिस्से की ओर ले जाने लगा।

माँ की साँसें तेज़ चल रही थीं पर वे कुछ बोली नहीं.. तो मेरी हिम्मत और बढ़ी और मैंने अपना हाथ माँ की बुर के ऊपर हल्के से रख दिया और ऊँगलियों से उनकी बुर हल्के-हल्के दबाने लगा।

पर माँ फिर भी कुछ नहीं बोलीं।

मेरा लंड उत्तेजना की वज़ह से पूरा तना हुआ था और माँ की गाण्ड में घुसने की कोशिश कर रहा था। माँ की बुर की चिकनाई मुझे महसूस हो रही थी और चिकना पानी उसकी बुर से निकल कर जांघों पर बह रहा था।

मैं ऊँगलियों को और नीचे की तरफ करता जा रहा था.. तभी मेरी ऊँगलियां माँ की बुर की पुत्तियों को टच करने लगीं।

माँ बोलीं- तू बहुत बदमाशी कर रहा है।

पर मैं बिना कुछ बोले लगा रहा और फिर एक हाथ से धीरे-धीरे उसकी बुर के लटकते हुए चमड़े को सहलाने और फैलाने लगा।

जब मैंने देखा कि माँ मना नहीं कर रही हैं तो मैं धीरे से दूसरे हाथ से माँ की नाईटी को माँ की कमर के पीछे कर दिया दिया.. जिससे माँ पेट के नीचे से एकदम नंगी हो गईं।

मैं उत्तेजना के मारे पागल हो रहा था। मेरे लंड का सुपारा माँ की नंगे चूतड़ों की फांकों में धँस गया.. फिर मैं उनकी बुर से निकले लंबे चमड़े को फैला कर बुर के छेद में ऊँगली डालने की कोशिश करने लगा।

माँ ने काम करना बंद कर दिया..

उनकी बुर से चिकने पानी की बूंदें टपकने लगी थीं।

माँ भी अब मेरा साथ दे रही थीं और नाईटी के बाकी बटनों को खोल दिया.. जिससे नाईटी नीचे गिर गई।

अब माँ और मैं पूरी तरह नंगे हो गए थे।

मैं पीछे से हट कर माँ के सामने आ गया और मूढ़े पर बैठ कर माँ की बुर को फैलाते हुए उनकी बुर से बाहर लटकते हुए चमड़े को मुँह में भर लिया और चूसने लगा।

माँ ने मेरा सर पकड़ कर अपनी बुर से और सटा दिया.. उनके मुँह से ‘ओह्ह.. आह’ की आवाजें निकल रही थीं।

मैंने अपनी जीभ माँ की बुर में डाल दी और उन्हें तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा। उनकी बुर का सारा नमकीन पानी मेरे मुँह में भर गया.. माँ ने भी मस्त हो कर अपनी जांघों को और फैला दिया और कमर हिला-हिला कर बुर चटवाने लगीं।

कुछ ही देर में माँ मेरे मुँह को जाँघों से दबाते हुए झड़ गईं.. पर मेरा लंड और ज्यादा तन गया था।

तभी माँ मुझे खड़ा करते हुए खुद मूढ़े पर बैठ गईं और नीचे गिरी हुई नाईटी से मेरे सुपारे को पौंछ कर मेरा सुपारा अपने मुँह में भर लिया और मेरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों से दबाते हुए चूसने लग गईं और एक ऊँगली मेरी गाण्ड के छेद में डालने लगीं।

मैं तो जैसे सपनों की दुनिया में पहुँच गया था।

माँ ज़ोर-ज़ोर से मेरा लंड चूस रही थीं और मैं भी लंड को उसके मुँह में अन्दर-बाहर कर रहा था।

तभी मैंने अपना कंट्रोल खो दिया और तेज ‘आह..’ करते हुए माँ के मुँह में ही झड़ने लगा।

माँ मेरे सुपारे को तब तक अपने मुँह में लिए रहीं.. जब तक मेरा वीर्य निकलना बंद नहीं हो गया।

हम दोनों कुछ देर तक वैसे ही बैठे रहे, फिर माँ मुझ से प्यार करते हुए बोलीं- तूने आख़िर अपनी मनमानी कर ही ली..

तो मैं बोला- तुम्हें अच्छा लगा ना?

तो माँ हँसने लगीं और चाय बनाने लगीं।

चाय पीकर मैं रसोई से बाहर आ गया और माँ नंगी ही खाना बनाने लगीं। फिर उसके बाद कुछ नहीं हुआ..

दोपहर में खाना खाते समय माँ मेरे लंड को देखते हुए बोलीं- अभी वीनू के आने का टाइम हो गया है.. अब तू लुँगी लपेट ले.. वरना वीनू को अटपटा लगेगा.. रात में सोते वक़्त पलंग पर फिर से लुँगी उतार कर नंगे सो जाना..

हम दोनों उस समय तक नंगे ही बैठे थे।

मैंने माँ से कहा- माँ कपड़े पहनने का मन नहीं कर रहा है.. अब तो घर में नंगा ही रहूँगा.. अब तो दीदी को भी नंगे ही रहने के लिए कहो..

‘लेकिन कैसे?’ माँ बोलीं।

तो मैं बोला- मुझे नहीं पता.. पर अब मैं नंगा ही रहूँगा और तुम भी नंगी रहो।

माँ बोलीं- ठीक है.. पर अभी तो कुछ पहन लो।

फिर मैं लुँगी लपेट कर टीवी देखने लगा और माँ भी नाईटी पहन कर काम करने लगीं।

जब दोपहर में वीनू आई तो मुझे लुँगी में बैठे देख कर माँ से धीमी आवाज़ में बातें करने लगी और मैं मन ही मन उन दोनों को एक ही बिस्तर पर चोदने का प्लान बना रहा था।

रात को मैं पूरा प्लान बना कर लुँगी उतार कर मा का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद माँ कमरे में आईं और दरवाजा बंद कर दिया।

फिर काम खत्म करने के बाद बिना लाइट ऑफ किए ही नंगी हो कर पलंग पर लेट गईं और मेरी तरफ करवट करके मुझसे पूछा- अब कैसा है?

‘क्या?’

‘वही…’

मैं तो पहले से ही तैयार था.. तुरंत बात को पकड़ते हुए पूछा- क्या वही?

माँ बोलीं- हाँ..

मैंने कहा- वही.. क्या इसका कोई नाम नहीं है.. क्या?

‘अच्छा.. बड़ा चतुर हो गया है.. तुझे नहीं पता क्या?’ और हँसने लगीं।

मैं बोला- मुझे तो दोस्तों ने बताया है.. पर तुम सही नाम बताओ ना?

‘अच्छा पहले सुनूं तो.. तेरे दोस्तों ने क्या बताया है?’

मैंने कहा- लंड..

यह सुनते ही माँ की जोर से हँसी छूट गई।

मैं माँ की जाँघों को फैलाते हुए उनकी बुर की पुत्तियों को सहलाने लगा और पूछा- अच्छा ये बताओ.. यह जो तुम्हारी बुर से बाहर चमड़ा निकला है.. इसका क्या कहते हैं?

तो माँ बोलीं- तेरे दोस्त क्या कहते हैं?

मैंने कहा- छोड़ो ना दोस्तों को.. तुम बताओ इसे क्या कहते हैं।

तो माँ ने कहा- कुछ भी कह ले.. पत्ती.. पंखुड़ी.. तुझे जो भी अच्छा लगता हो।

मैंने कहा- हाँ.. अच्छा ये बताओ जब मैं तुम्हारी गाण्ड मे लंड डाल रहा था.. तो दर्द होते ही तुमने मुझे मना क्यों नहीं किया?

तो माँ ने कहा- मुझे भी गाण्ड मरवाने का मन कर रहा था।

मैंने आश्चर्य से पूछा- क्या?

तो माँ ने कहा- हाँ.. मेरे गाँव में मेरे पड़ोस की चाची और उनकी लड़की जो एक दूर की रिश्तेदारी में मेरी चाची और चचेरी बहन लगती थीं..

उसने बताया कि शादी के बाद उन्हें चुदाई के बारे में ज़्यादा नहीं मालूम था और उसका पति उसकी गाण्ड में ही अपना लंड पेलता था..

बाद में मेरी चाची यानि उसकी माँ जो खुद भी बहुत चुदक्कड़ थी… उसने अपनी बेटी और दामाद को चुदाई के बारे में बताया।

अब अक्सर वो सब साथ में चूत चुदाई और गाण्ड मरवाने का मज़ा लेते हैं।

उसी ने मुझे गाण्ड में लंड लेने का तरीका और मज़े के बारे में बताया था।

उसकी दो लड़कियाँ हैं जब तू बड़ा होगा.. तो मैं तेरी शादी उसी की बड़ी वाली लड़की से कराऊँगी.. फिर हम सब भी साथ में मज़े लेंगे..

अच्छा अब ये बता कि वीनू को कैसे पटाया जाए? अब तो मैं भी एक भी दिन बिना तेरे लंड के नहीं रह सकती हूँ। अब तो जब तक मेरी गाण्ड में तेरा लंड ना जाए.. मज़ा नहीं आएगा.. एक बार वीनू भी पट जाए तो फिर तो मैं दिन भर गाण्ड मरवाती और चुदवाती रहूँगी.. उसके बाद तू चाहे तो वीनू को भी चोद ले.. फिर उसे भी अपनी बुर हाथ से नहीं रगड़नी पड़ेगी।

मैं बोला- मैं जैसा कहता हूँ.. वैसा ही करती रहना.. वो अपने आप खुल जाएगी.. वैसे भी वो तुमसे खुल कर बात करती ही है ना.. चुदने भी लग जाएगी..

तो माँ ने कहा- हाँ.. हम ओपन तो हैं.. पर कभी चुदाई की बातें नहीं की हैं।

मैंने कहा- अच्छा कितना ओपन हो?

माँ मेरे लंड को सहलाते हुए बोलीं- पहले तो सिर्फ़ एमसी के समय पैड लगाने तक.. पर अब तो हम दोनों एक-दूसरे के सामने नंगे ही कपड़े बदल लेते हैं..

कभी-कभी मैं उससे बाल साफ़ करने वाली मशीन भी माँग लेती हूँ.. झांटों को साफ़ करने के लिए मैं बाथरूम में बुर पर मशीन नहीं लगा पाती हूँ और कमरे में लगाती हूँ.. तो वो मुझे ऐसा करते हुए कई बार देख चुकी है..

हम दोनों का एक-दूसरे की बुर देखना नॉर्मल है.. कई बार जब वो खेल कर आती है और थकी होती है.. तो मैं उसकी मालिश कर देती हूँ.. वो भी उसे नंगी करके..

उसकी जाँघों और चूतड़ों पर भी उस समय मेरे हाथ उसकी बुर और गाण्ड के छेद को भी छूते और मसलते हैं और वो भी कभी-कभी मुझे नंगी करके मेरी मालिश करती है..

हाँ.. कभी-कभी जब मालिश के समय मेरी बुर खुजलाती है तो उसी के सामने मैं बुर में ऊँगली करती थी.. तो उस समय उसने मुझे देखा है और मुझे ये भी पता है कि वो भी अपनी बुर में ऊँगली डाल कर झड़ती है..

पर इतना होने पर भी ना तो उसने कभी मुझे झाड़ा है और ना ही मैंने उसको.. बस हम दोनों को ये जानते हैं कि हम दोनों बुर में ऊँगली करते हैं पर चाची और बहन की तरह बुर या गाण्ड चटवाना या चुदाई की बातें नहीं की हैं।

तो मैंने कहा- इतना काफ़ी है।

और मैंने अपना सारा प्लान माँ को बता दिया।

अगले दिन सुबह प्लान के मुताबिक मैं लुँगी पहन कर बाहर गया तो देखा माँ और दीदी बातें कर रही थीं।

मुझे देख कर माँ ने दीदी से कहा- जा भाई के लिए चाय ले आ।

तो दीदी रसोई में चली गईं.. मैं माँ के सामने अपनी लुँगी थोड़ा फैला कर ऐसे बैठा कि दीदी को पता चल जाए कि मैं माँ को अपना लंड दिखा रहा हूँ.. पर दीदी को मेरा लंड ना दिखाई दे।

जैसे ही दीदी आईं तो मैंने माँ को इशारा करते हुए अपनी जाँघों को बंद कर लिया।

दीदी कभी मुझे और कभी माँ को देखतीं.. पर वो समझ गई थी कि माँ मेरा लंड देख रही थीं।

चाय पीने के बाद मैंने जानबूझ कर अपना लंड हाथ से पकड़ कर.. जिससे दीदी की जिज्ञासा बढ़ जाए.. माँ से कहा- मैं फ्रेश होने जा रहा हूँ..।

तो माँ दीदी की तरफ देख कर बोलीं- हाँ.. चल मुझे भी पेशाब लगी है और बाथरूम में आकर मैं देख भी लूँगी..

फिर उसके बाद कुछ नहीं हुआ.. इस तरह 2-3 दिन बीत गए और हम लोग इसी तरह दीदी को उत्तेजित करते रहे।

एक दिन दोपहर में खाना खाने के बाद प्लान के मुताबिक मैं कमरे में आकर लुँगी से अपना लंड बाहर निकाल कर सोने का नाटक करने लगा।

थोड़ी देर में माँ भी आ गईं और अलमारी खोल कर वहीं ज़मीन पर बैठ गईं और कपड़े सही करने लगीं। थोड़ी देर में दीदी कमरे में आईं और माँ के पास ही बैठ गईं और बातें करने लगीं।

तभी दीदी की नज़र मेरे खड़े लंड पर पड़ी तो वो चौंक कर माँ से बोली- माँ देखो.. भाई कैसे सो रहा है और उसके सूसू पे क्या हुआ है?

तो माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा- हाँ.. उसकी सूसू में रगड़ लगने की वजह से छिल गया है.. मैंने ही क्रीम लगा कर खुला रखने को कहा है।

दीदी बोली- वहाँ पर कैसे रगड़ लग गई.. जो इतना छिल गया?

तो माँ हँसते हुए बोलीं- मुझे क्या पता?

दीदी भी हँसते हुए बोली- अच्छा तो.. इसने ज़रूर वो ही किया होगा।

माँ बोलीं- अच्छा.. तुझे कैसे पता.. तू भी वही करती है क्या?

तभी प्लान के मुताबिक माँ ने अपनी नाईटी हल्का सा खींच कर अपनी बुर खुजलाने लगीं और ऐसे बैठ गईं कि दीदी को उनकी बुर दिखाई दे।

माँ की बुर पर नज़र पड़ते ही दीदी बोलीं- माँ तुमने मेरी बाल साफ़ करने वाली क्रीम लगाई है क्या?

तो माँ बोलीं- तुझे कैसे पता?

दीदी ने कहा- तुम्हारी चिकनी बुर दिखाई दे रही है।

तो माँ झुक कर अपनी बुर देखने का बहाना करते हुए बोलीं- हाँ.. लगाई है.. उसमें ज़रा सी तो बची थी।

दीदी माँ की बुर की ओर इशारा करके हँसते हुए बोली- वो ज़रा सी थी? मेरी पूरी क्रीम एक बार में खत्म कर दी.. अपनी बुर का साइज़ तो देखो.. इतनी बड़ी बुर है कि पूरी की पूरी एक बार में ही खत्म हो जाए और ऊपर से शीशे में देख कर फैला-फैला कर लगाती हो।

तो माँ भी हँसते हुए बोलीं- अच्छा तो सिर्फ़ मेरी ही बड़ी है.. तेरी तो इसी उम्र में इतनी फैल गई है.. जितनी मेरी तेरे पैदा होने के बाद फैली थी और तू तो रोज लगाती है.. तो खत्म नहीं होगी।

दीदी की चड्डी की ओर जो स्कर्ट से दिखाई पर रही थी.. इशारा करते हुए बोलीं।

तो दीदी ने कहा- नहीं.. मैंने नहीं लगाई है.. मैं ढूँढ रही थी.. पर मिली नहीं।

माँ ने कहा- मैं मान ही नहीं सकती।

अब दीदी भी मस्ती में भर कर अपनी चड्डी को साइड से हल्का सा खींच कर अपनी बुर माँ को दिखाते हुए बोली- नहीं लगाई.. ये देखो अभी मेरी बुर तुम्हारे जितनी चिकनी नहीं है.. 10-12 दिन हो गए है.. बाल साफ़ किए हुए।

ये सारी बातें सुन कर मेरा लंड पूरा 6-7 इंच का होकर तन गया और झटके लेने लगा।

तभी मुझे दीदी की आवाज़ सुनाई पड़ी- वो देखो भाई का लंड कैसा हो गया है.. लग रहा है कि सपने में कुछ कर रहा है।

तो माँ हँसने लगीं और कपड़े लेकर पलंग पर बैठ गईं तो दीदी भी साथ में पलंग पर आ गईं।

मैंने हाथ को अपने चेहरे पर इस तरह रखा था कि वो दोनों मुझे दिखाई दे रहे थे.. पर उन्हें मैं सोता हुआ लग रहा था।

मैंने देखा कि दीदी की निगाहें मेरे लंड पर टिकी हुई थीं.. तो मैं अपने लंड को और झटके देने की कोशिश करने लगा।

तभी माँ दीदी से बोलीं- ज़रा तौलिया देना.. और कहते हुए अपनी नाईटी को कमर तक उठाते हुए अपनी बुर खोल दी।

माँ दीदी को पूरी तरह गरम करना चाहती थीं और यही हमारा प्लान था।

माँ खुद भी गरम हो गई थीं और उनकी बुर से पानी निकलने लगा था।

शायद यही हाल दीदी का भी था.. तौलिया लेते ही माँ दीदी को दिखाते हुए अपनी बुर की पुत्तियों को हाथों से फैला कर पौंछने लगीं.. उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

तभी दीदी ने माँ से कहा- माँ मुझे भी देना..

तो माँ ने पूछा- क्यों तेरी बुर भी पानी छोड़ रही है क्या?

दीदी ने कहा- हाँ.. मेरी भी चड्डी गीली हो गई है।

माँ अपनी बुर पौंछने के बाद दीदी को तौलिया देते हुए बोलीं- तूने तो फालतू में ही चड्डी पहन रखी है.. उतार क्यों नहीं देती.. देख पूरी गीली हो गई है.. कोई बाहरी थोड़े ही है यहाँ पर.. और फिर तू तो मेरे सामने कई बार नंगी हो चुकी है।

तो दीदी मेरी ओर इशारा करने लगी।

माँ बोलीं- ये बेचारा तो वैसे ही परेशान है और ये भी तो नंगा ही है और तुझसे छोटा ही है.. इससे कैसी शरम.. चल उतार दे.. गीली चड्डी नहीं पहनते।

यह कह कर माँ अपनी नाईटी उतारने लगीं।

यह देख कर दीदी भी जो अब तक मेरी वजह से शर्मा रही थी.. माँ का इशारा पाकर तुरंत अपनी टी-शर्ट.. स्कर्ट और चड्डी उतार कर नंगी हो गई।

दीदी की चूचियाँ माँ जितनी बड़ी तो नहीं थीं.. पर काफ़ी सुडौल थीं। उसकी बुर पर छोटे-छोटे बाल थे और बुर भी फूली हुई थी.. पर उसकी पुत्तियाँ माँ जितनी बड़ी नहीं थीं.. वहाँ पर हम तीनों ही नंगे थे।

पूरे पलंग पर बुर के पानी की खुश्बू फैल गई थी। तभी माँ ने मेरे लंड को हाथों में लेते हुए कहा- ज़रा देखूं तो अभी रगड़ सूखी या नहीं..

वो मेरे सुपारे को घुमा कर चारों तरफ से देखने लगीं।

दीदी भी मेरी तरफ खिसक आई थी और उसकी भी साँसें माँ की तरह तेज़ चल रही थीं।

माँ ने जानबूझ कर दीदी की तरफ अपनी कमर करके जाँघों को पूरा खोल दिया.. जिससे उनकी बुर पूरी तरह खुल गई और उसकी पुत्तियाँ बाहर निकल कर लटक गईं।

माँ धीरे-धीरे मेरे सुपारे को सहला रही थीं..

दीदी मेरे सुपारे को बड़े ध्यान से देख रही थी और गरम हो गई थी, अब वो माँ के सामने ही अपनी बुर रगड़ने लगी।

यह देख कर माँ दीदी को चुदाई के लिए तैयार करने के लिए हँसते हुए बोलीं- क्या हुआ.. लग रहा है लंड देख कर तेरी बुर ज्यादा पानी छोड़ रही है.. अभी तेरी बुर का छेद छोटा है.. इतना मोटा सुपारा उसमे फँस जाएगा और तेरी बुर फट जाएगी.. कोई बात नहीं.. तू ऊँगली करके पानी निकाल दे।

यह सुन कर दीदी और गर्म हो गई और एकदम खुल कर माँ से बोली- अच्छा.. तो क्या सिर्फ़ तुम्हारी बुर का छेद ही इसके साइज़ का है.. लंड दिख गया.. तो तुम्हारी बुर फड़कने लगी नहीं.. तो हमेशा ऊँगली करती रहती थीं और मेरी चूत का छेद इतना भी छोटा नहीं है.. ये देखो..

और ये कह कर अपनी बुर को हाथों से फैला कर माँ को अपना लाल-लाल छेद दिखाने लगी और वो दोनों हँसने लगे।

हम सब इतने उत्तेजित थे कि किसी को कुछ भी होश नहीं था।

सिर्फ़ लंड और बुर दिखाई दे रहा था। तभी मैंने सही समय सोच कर उठने का नाटक करते हुए अपनी आँखें खोल दीं और उठने का नाटक करते हुए बैठ गया।

मेरे उठते ही माँ ने पूछा- अरे उठ गया बेटा.. अब दर्द तो नहीं हो रहा है।

मैंने कहा- नहीं.. पर मुझे पेशाब लगी है।

और यह कह कर बिना दीदी की तरफ देखे.. बाथरूम जाने लगा।

तो माँ बोलीं- मुझे भी पेशाब लगी है.. रुक मैं भी चलती हूँ।

वो मेरे साथ आ गईं.. बाथरूम पहुँच कर हम दोनों साथ-साथ मूतने लगे।

माँ की बुर से तेज़ सीटियों जैसी आवाज़ निकल रही थी।

हम अभी शुरू ही हुए थे कि दीदी भी आ गईं।

उसे देख कर माँ ने पूछा- क्या हुआ?

तो दीदी ने कहा- मुझे भी पेशाब लगी है।

तो माँ ने हँसते हुए कहा- अच्छा बैठ जा.. लगता है तेरी बुर लंड के लिए ज्यादा खुजली मचा रही है।

वो हम दोनों के सामने ही बैठ गई.. बैठने पर उसकी जाँघें फैल गईं.. जिससे उसकी बुर की फाँकें पूरा फैल गईं और बुर के लाल-लाल छेद से निकलते हुए पेशाब की धार को देख कर मेरा लंड और तन गया।

दीदी भी मेरे लंड से पेशाब की धार निकलते हुए बड़े ध्यान से देख रही थी।

तो माँ ने मौका देख कर मुझसे पूछा- अब सुपारे पर पेशाब लगने से कल की तरह जलन तो नहीं हो रही है?

तो मैंने कहा- नहीं..

तब तक माँ पेशाब कर चुकी थीं और मैं भी और दीदी के मूतने का इन्तजार करने लगे।

जब दीदी मूत कर खड़ी हुईं तो हम सब कमरे में आ गए।

मेरा लंड अभी भी एकदम खड़ा था।

माँ पलंग पर टेक लगा कर बैठ गईं और मुझे अपने पास बैठा लिया।

दीदी भी हम दोनों के सामने बैठ गई।

फिर माँ मेरे सुपारे को हाथ में लेकर बोलीं- ठीक है.. अब कुछ दिन तक रगड़ना-वगड़ना नहीं.. लंड खड़ा होता है तो कोई बात नहीं… थोड़ी देर लंड को सहलाएगा तो ठीक हो जाएगा..

‘लेकिन माँ ज्यादा तनने के कारण मेरे लंड में अब बहुत खुजली हो रही है।’ मैंने लंड माँ की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

तो माँ बोलीं- ठीक है.. मैं इसका पानी झाड़ देती हूँ.. फिर ये थोड़ा नरम हो जाएगा.. नहीं तो चमड़ा खिंचने से और दर्द होगा।

मैंने कहा- क्या.. अभी तो माँ मेरे चूतड़ पर हाथ रख कर अपनी तरफ करते हुए लंड को दूसरे हाथ में लेकर बोलीं- तो क्या हुआ.. मेरे सामने कैसी शरम और अब तो दीदी के सामने भी शरमाने की कोई ज़रूरत नहीं है।

यह बात माँ ने उत्तेजित होकर मुझे दीदी की बुर दिखाते हुए कहा- यह देख वीनू की बुर का छेद तो लंड लेने के लिए खुद ही खुला हुआ है..

फिर मैं पलंग पर लेट गया.. माँ मेरे कमर के पास बैठी थीं और मेरा सर दीदी की जांघों के पास था.. जिससे दीदी की बुर की फैली हुई फांकें अब मुझे एकदम नज़दीक से दिखाई दे रही थीं।

माँ दीदी से बोलीं- ज़रा गरी का तेल देना।

दीदी ने तेल दिया।

माँ ने तेल हाथ में लगा कर मेरे सुपारे पर लगाया और मेरे लवड़े की मुठ मारने लगीं और मैं अपने एक हाथ से माँ की बुर के छेद में धीरे-धीरे ऊँगली करने लगा।

माँ और दीदी बहुत ज़्यादा उत्तेजित थीं जिससे उनकी बुर और गाण्ड का छेद खुल और बंद हो रहा था।

तभी दीदी अपनी बुर में अपनी ऊँगलियाँ डालते हुए माँ से बोली- माँ हाथ से ऐसे पकड़ कर करोगी तो लंड में फिर घाव हो जाएगा।

माँ भी सर हिलाते हुए बोलीं- हाँ.. तू सही कह रही है.. पर क्या करूँ इसको झाड़ना तो पड़ेगा ना..

तो दीदी जो एकदम गरम हो गई थी.. अपनी बुर दिखाते हुए माँ को इशारा करके बोली- ऐसे करो ना..

तो माँ अपनी बुर को फैलाते हुए बोलीं- हाँ.. तू सही कह रही.. मैं इसके लंड पर बैठ कर इसका लंड अपनी बुर में डाल लेती हूँ और ऊपर-नीचे करती हूँ.. मेरी बुर में लंड जाते ही झड़ जाएगा.. पर चुदाई में मेरी इन बड़ी-बड़ी पुत्तियों से रगड़ कर कहीं फिर से छिल ना जाए? एक काम करती हूँ.. इसका सुपारा मुँह में लेकर हल्के-हल्के से चूस कर झाड़ देती हूँ।

यह कह कर तुरंत अपने चूतड़ दीदी की तरफ उठाते हुए मेरे लंड पर झुक गईं और लंड चूसने लगीं।

लेकिन मैंने अपनी ऊँगली माँ की बुर से नहीं निकाली और दूसरे हाथ से बुर की पुत्तियों को फैलाते हुए और तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा।

तभी ये देख कर दीदी ने भी अपना कंट्रोल शायद खो दिया और झुक कर माँ के चूतड़ों को अपने हाथों से फैला कर माँ की चूतड़.. गाण्ड और बुर का छेद चाटने लगी।

जैसे ही दीदी ने माँ की 4 इंच लंबी और 2 इंच चौड़ी पुत्तियों को अपने मुँह ले लिया, माँ ने भी अपनी जाँघों को और फैला दिया और उसके मुँह पर अपनी बुर को दबाते हुए मेरे लौड़े को चूसने लगीं।

मैं भी इसी इंतजार में था और अपनी ऊँगलियाँ माँ की बुर से निकाल कर दीदी के चूतड़ जो मेरी तरफ थे, अपने हाथ से फैला कर उसकी गाण्ड और बुर में ऊँगली डाल कर चोदने लगा।

दीदी भी अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर अपनी बुर में ऊँगली डलवा रही थी कि मेरे दिमाग़ में एक आइडिया आया और मैंने माँ से कहा- माँ एक काम करो.. तुम थोड़ा सा आगे बढ़ जाओ.. जिससे दीदी मेरे और तुम्हारे बीच में आ जाएगी.. फिर तुम मेरे लंड को चूसना.. दीदी तुम्हारी बुर चाटेगी और मैं दीदी की बुर चाटूंगा।

तो माँ और दीदी तुरंत उसी तरह लेट गईं और फिर हम तीनों एक-दूसरे की बुर और गाण्ड चाटने लगे।

मैंने अपनी एक ऊँगली दीदी की गाण्ड में थूक लगा कर डाल दीं और उसकी बुर को मुँह में भर लिया।

कुछ ही देर में मैं अपना लंड माँ के मुँह में और अन्दर घुसाते हुए दीदी की बुर को पूरा मुँह भर कर चाटते हुए झड़ गया।

माँ दीदी को दिखाते हुए मेरे पूरे वीर्य को जीभ से चाट कर पीने लगीं।

जब उसने मेरा लंड पूरा सुखा दिया.. तो सीधी होकर आराम से लेट गईं और दीदी से अपनी बुर चटवाने लगीं और फिर झड़ कर शांत हो गईं।

इधर मैंने भी दीदी की बुर चाट कर उसे झाड़ दिया था।

थोड़ी देर लेटे रहने के बाद हम तीनों उठ कर बैठ गए।

मेरा लंड उस समय सिकुड़ा हुआ था तो दीदी माँ को मेरा लंड दिखाते हुए बोली- अरे वाहह.. माँ तुम्हारा ये चूसने वाला तरीका तो ज्यादा बढ़िया था.. भाई को झाड़ भी दिया और लंड पर भी कुछ नहीं हुआ।

माँ बोलीं- हाँ.. पर तूने तो आज कमाल कर दिया.. ओह क्या बुर चाटी है..

तो दीदी बोली- हाँ.. माँ मुझे भी अच्छा लगा।

माँ बोलीं- चल अच्छा है.. अब जब इसका लंड थोड़ा ठीक हो जाए.. तो तुझे भी इसे अपनी बुर में लेने में मज़ा आएगा.. तब तक अपना छेद फैला ले।

ये कह कर माँ ने मुझे आँख मारी.. तो हम तीनों हँसने लगे और हम लोग इसी तरह थोड़ी देर तक आपस में हँसी-मज़ाक करते रहे और चाय पी.. पर दीदी की बुर देख-देख कर मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया और झटके लेने लगा.. तो मैं अपना लंड हाथ में लेकर दीदी और माँ को दिखाते हुए धीमे-धीमे मुठ मारने लगा।

यह देख कर दीदी माँ से बोली- माँ देखो भाई का लंड फिर से फूल गया है.. लगता है इसका फिर से झड़ने का मान कर रहा है।

तो माँ बोलीं- मैं तो अब थक गई.. हाँ.. तुम दोनों को जो करना है.. करो मैं सिर्फ़ लेट कर देखूँगी।

यह कह कर माँ लेट गईं.. उसकी कमर मेरी तरफ थी और जाँघें फैली हुई थीं जिससे उसकी मेरी दोनों हथेलियों जितनी बड़ी और चिकनी बुर एकदम खुल गई थी और उसकी लंबी और चौड़ी पुत्तियाँ बाहर निकल कर लटकी हुई थीं।

ये देख कर मैं अपने एक हाथ से उन्हें मसलने लगा… ये देख कर दीदी जो बड़ी ललचाई नज़रों से मेरे लंड को देख रही थीं.. झुक कर मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया।

ओह क्या मस्त लग रहा था.. दीदी गपागप मेरे लंड को मुँह में लेकर चूसे जा रही थी.. और मैं भी अपनी ऊँगलियां माँ की बुर में तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा।

माँ भी धीरे-धीरे अपनी कमर ऊपर उछाल कर चुदवा रही थीं और खूब ज़ोर से हिलते हुए झड़ गईं।

तभी मैं अपना लंड दीदी के मुँह में अन्दर तक घुसड़ेते हुए झड़ गया।

दीदी भी मेरे लंड का पानी पूरा चाट गई.. फिर हम सब थक कर सो गए।

अब ये हमारे घर का नियम बन गया था और हम तीनों जन हर काम साथ-साथ करते.. बाथरूम साथ जाते.. कोई लेट्रीन करता.. कोई मंजन करता.. कोई नहाता.. कभी-कभी हम सब एक-दूसरे को अपने हाथों से ये काम करवाते। मंजन करते और नहलाते और जब मौका मिलता अपनी बुर और लंड एक-दूसरे में घुसाए रहते।
 
माँ ने दीदी को चुदवाया-3

माँ भी शायद बहुत गर्म हो गई थीं और चुदना चाहती थीं.. क्योंकि उसने मेरा हाथ इस बार नहीं हटाया, पर शायद शर्मा रही थीं और अचानक बात को पलटते हुए बोलीं- अरे कितनी देर हो गई.. खाना बनाना है।

और वैसे ही नाईटी बिना बंद किए हुए उठ कर रसोई में चली गईं।

मैं भी तुरंत माँ के पीछे-पीछे रसोई में चला गया और मैंने देखा कि उन्होंने नाईटी के सिर्फ़ एक-दो बटन ही बंद किए थे.. बाकी सारा खुला हुआ था जिसके कारण उनकी चूचियाँ बाहर निकली हुई थीं और नाभि से नीचे का पूरा हिस्सा पैरों तक एकदम नंगा दिख रहा था।

मैं उनसे पीछे से पकड़ कर चिपक गया जिससे मेरा लंड माँ के चूतड़ों के बीच में घुस गया और बोला- माँ तुम बहुत अच्छी हो.. मेरे दोनों हाथ माँ के नंगे पेट पर थे।

माँ बोलीं- अच्छा मुझे मस्का लगा रहा है।

तो मैं हँसने लगा और धीरे-धीरे अपना हाथ माँ के पेट सहलाते हुए निचले हिस्से की ओर ले जाने लगा।

माँ की साँसें तेज़ चल रही थीं पर वे कुछ बोली नहीं.. तो मेरी हिम्मत और बढ़ी और मैंने अपना हाथ माँ की बुर के ऊपर हल्के से रख दिया और ऊँगलियों से उनकी बुर हल्के-हल्के दबाने लगा।

पर माँ फिर भी कुछ नहीं बोलीं।

मेरा लंड उत्तेजना की वज़ह से पूरा तना हुआ था और माँ की गाण्ड में घुसने की कोशिश कर रहा था। माँ की बुर की चिकनाई मुझे महसूस हो रही थी और चिकना पानी उसकी बुर से निकल कर जांघों पर बह रहा था।

मैं ऊँगलियों को और नीचे की तरफ करता जा रहा था.. तभी मेरी ऊँगलियां माँ की बुर की पुत्तियों को टच करने लगीं।

माँ बोलीं- तू बहुत बदमाशी कर रहा है।

पर मैं बिना कुछ बोले लगा रहा और फिर एक हाथ से धीरे-धीरे उसकी बुर के लटकते हुए चमड़े को सहलाने और फैलाने लगा।

जब मैंने देखा कि माँ मना नहीं कर रही हैं तो मैं धीरे से दूसरे हाथ से माँ की नाईटी को माँ की कमर के पीछे कर दिया दिया.. जिससे माँ पेट के नीचे से एकदम नंगी हो गईं।

मैं उत्तेजना के मारे पागल हो रहा था। मेरे लंड का सुपारा माँ की नंगे चूतड़ों की फांकों में धँस गया.. फिर मैं उनकी बुर से निकले लंबे चमड़े को फैला कर बुर के छेद में ऊँगली डालने की कोशिश करने लगा।

माँ ने काम करना बंद कर दिया..

उनकी बुर से चिकने पानी की बूंदें टपकने लगी थीं।

माँ भी अब मेरा साथ दे रही थीं और नाईटी के बाकी बटनों को खोल दिया.. जिससे नाईटी नीचे गिर गई।

अब माँ और मैं पूरी तरह नंगे हो गए थे।

मैं पीछे से हट कर माँ के सामने आ गया और मूढ़े पर बैठ कर माँ की बुर को फैलाते हुए उनकी बुर से बाहर लटकते हुए चमड़े को मुँह में भर लिया और चूसने लगा।

माँ ने मेरा सर पकड़ कर अपनी बुर से और सटा दिया.. उनके मुँह से ‘ओह्ह.. आह’ की आवाजें निकल रही थीं।

मैंने अपनी जीभ माँ की बुर में डाल दी और उन्हें तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा। उनकी बुर का सारा नमकीन पानी मेरे मुँह में भर गया.. माँ ने भी मस्त हो कर अपनी जांघों को और फैला दिया और कमर हिला-हिला कर बुर चटवाने लगीं।

कुछ ही देर में माँ मेरे मुँह को जाँघों से दबाते हुए झड़ गईं.. पर मेरा लंड और ज्यादा तन गया था।

तभी माँ मुझे खड़ा करते हुए खुद मूढ़े पर बैठ गईं और नीचे गिरी हुई नाईटी से मेरे सुपारे को पौंछ कर मेरा सुपारा अपने मुँह में भर लिया और मेरे चूतड़ों को अपने दोनों हाथों से दबाते हुए चूसने लग गईं और एक ऊँगली मेरी गाण्ड के छेद में डालने लगीं।

मैं तो जैसे सपनों की दुनिया में पहुँच गया था।

माँ ज़ोर-ज़ोर से मेरा लंड चूस रही थीं और मैं भी लंड को उसके मुँह में अन्दर-बाहर कर रहा था।

तभी मैंने अपना कंट्रोल खो दिया और तेज ‘आह..’ करते हुए माँ के मुँह में ही झड़ने लगा।

माँ मेरे सुपारे को तब तक अपने मुँह में लिए रहीं.. जब तक मेरा वीर्य निकलना बंद नहीं हो गया।

हम दोनों कुछ देर तक वैसे ही बैठे रहे, फिर माँ मुझ से प्यार करते हुए बोलीं- तूने आख़िर अपनी मनमानी कर ही ली..

तो मैं बोला- तुम्हें अच्छा लगा ना?

तो माँ हँसने लगीं और चाय बनाने लगीं।

चाय पीकर मैं रसोई से बाहर आ गया और माँ नंगी ही खाना बनाने लगीं। फिर उसके बाद कुछ नहीं हुआ..

दोपहर में खाना खाते समय माँ मेरे लंड को देखते हुए बोलीं- अभी वीनू के आने का टाइम हो गया है.. अब तू लुँगी लपेट ले.. वरना वीनू को अटपटा लगेगा.. रात में सोते वक़्त पलंग पर फिर से लुँगी उतार कर नंगे सो जाना..

हम दोनों उस समय तक नंगे ही बैठे थे।

मैंने माँ से कहा- माँ कपड़े पहनने का मन नहीं कर रहा है.. अब तो घर में नंगा ही रहूँगा.. अब तो दीदी को भी नंगे ही रहने के लिए कहो..

‘लेकिन कैसे?’ माँ बोलीं।

तो मैं बोला- मुझे नहीं पता.. पर अब मैं नंगा ही रहूँगा और तुम भी नंगी रहो।

माँ बोलीं- ठीक है.. पर अभी तो कुछ पहन लो।

फिर मैं लुँगी लपेट कर टीवी देखने लगा और माँ भी नाईटी पहन कर काम करने लगीं।

जब दोपहर में वीनू आई तो मुझे लुँगी में बैठे देख कर माँ से धीमी आवाज़ में बातें करने लगी और मैं मन ही मन उन दोनों को एक ही बिस्तर पर चोदने का प्लान बना रहा था।

रात को मैं पूरा प्लान बना कर लुँगी उतार कर मा का इंतजार करने लगा। कुछ देर बाद माँ कमरे में आईं और दरवाजा बंद कर दिया।

फिर काम खत्म करने के बाद बिना लाइट ऑफ किए ही नंगी हो कर पलंग पर लेट गईं और मेरी तरफ करवट करके मुझसे पूछा- अब कैसा है?

‘क्या?’

‘वही…’

मैं तो पहले से ही तैयार था.. तुरंत बात को पकड़ते हुए पूछा- क्या वही?

माँ बोलीं- हाँ..

मैंने कहा- वही.. क्या इसका कोई नाम नहीं है.. क्या?

‘अच्छा.. बड़ा चतुर हो गया है.. तुझे नहीं पता क्या?’ और हँसने लगीं।

मैं बोला- मुझे तो दोस्तों ने बताया है.. पर तुम सही नाम बताओ ना?

‘अच्छा पहले सुनूं तो.. तेरे दोस्तों ने क्या बताया है?’

मैंने कहा- लंड..

यह सुनते ही माँ की जोर से हँसी छूट गई।

मैं माँ की जाँघों को फैलाते हुए उनकी बुर की पुत्तियों को सहलाने लगा और पूछा- अच्छा ये बताओ.. यह जो तुम्हारी बुर से बाहर चमड़ा निकला है.. इसका क्या कहते हैं?

तो माँ बोलीं- तेरे दोस्त क्या कहते हैं?

मैंने कहा- छोड़ो ना दोस्तों को.. तुम बताओ इसे क्या कहते हैं।

तो माँ ने कहा- कुछ भी कह ले.. पत्ती.. पंखुड़ी.. तुझे जो भी अच्छा लगता हो।

मैंने कहा- हाँ.. अच्छा ये बताओ जब मैं तुम्हारी गाण्ड मे लंड डाल रहा था.. तो दर्द होते ही तुमने मुझे मना क्यों नहीं किया?

तो माँ ने कहा- मुझे भी गाण्ड मरवाने का मन कर रहा था।

मैंने आश्चर्य से पूछा- क्या?

तो माँ ने कहा- हाँ.. मेरे गाँव में मेरे पड़ोस की चाची और उनकी लड़की जो एक दूर की रिश्तेदारी में मेरी चाची और चचेरी बहन लगती थीं..

उसने बताया कि शादी के बाद उन्हें चुदाई के बारे में ज़्यादा नहीं मालूम था और उसका पति उसकी गाण्ड में ही अपना लंड पेलता था..

बाद में मेरी चाची यानि उसकी माँ जो खुद भी बहुत चुदक्कड़ थी… उसने अपनी बेटी और दामाद को चुदाई के बारे में बताया।

अब अक्सर वो सब साथ में चूत चुदाई और गाण्ड मरवाने का मज़ा लेते हैं।

उसी ने मुझे गाण्ड में लंड लेने का तरीका और मज़े के बारे में बताया था।

उसकी दो लड़कियाँ हैं जब तू बड़ा होगा.. तो मैं तेरी शादी उसी की बड़ी वाली लड़की से कराऊँगी.. फिर हम सब भी साथ में मज़े लेंगे..

अच्छा अब ये बता कि वीनू को कैसे पटाया जाए? अब तो मैं भी एक भी दिन बिना तेरे लंड के नहीं रह सकती हूँ। अब तो जब तक मेरी गाण्ड में तेरा लंड ना जाए.. मज़ा नहीं आएगा.. एक बार वीनू भी पट जाए तो फिर तो मैं दिन भर गाण्ड मरवाती और चुदवाती रहूँगी.. उसके बाद तू चाहे तो वीनू को भी चोद ले.. फिर उसे भी अपनी बुर हाथ से नहीं रगड़नी पड़ेगी।

मैं बोला- मैं जैसा कहता हूँ.. वैसा ही करती रहना.. वो अपने आप खुल जाएगी.. वैसे भी वो तुमसे खुल कर बात करती ही है ना.. चुदने भी लग जाएगी..

तो माँ ने कहा- हाँ.. हम ओपन तो हैं.. पर कभी चुदाई की बातें नहीं की हैं।

मैंने कहा- अच्छा कितना ओपन हो?

माँ मेरे लंड को सहलाते हुए बोलीं- पहले तो सिर्फ़ एमसी के समय पैड लगाने तक.. पर अब तो हम दोनों एक-दूसरे के सामने नंगे ही कपड़े बदल लेते हैं..

कभी-कभी मैं उससे बाल साफ़ करने वाली मशीन भी माँग लेती हूँ.. झांटों को साफ़ करने के लिए मैं बाथरूम में बुर पर मशीन नहीं लगा पाती हूँ और कमरे में लगाती हूँ.. तो वो मुझे ऐसा करते हुए कई बार देख चुकी है..

हम दोनों का एक-दूसरे की बुर देखना नॉर्मल है.. कई बार जब वो खेल कर आती है और थकी होती है.. तो मैं उसकी मालिश कर देती हूँ.. वो भी उसे नंगी करके..

उसकी जाँघों और चूतड़ों पर भी उस समय मेरे हाथ उसकी बुर और गाण्ड के छेद को भी छूते और मसलते हैं और वो भी कभी-कभी मुझे नंगी करके मेरी मालिश करती है..

हाँ.. कभी-कभी जब मालिश के समय मेरी बुर खुजलाती है तो उसी के सामने मैं बुर में ऊँगली करती थी.. तो उस समय उसने मुझे देखा है और मुझे ये भी पता है कि वो भी अपनी बुर में ऊँगली डाल कर झड़ती है..

पर इतना होने पर भी ना तो उसने कभी मुझे झाड़ा है और ना ही मैंने उसको.. बस हम दोनों को ये जानते हैं कि हम दोनों बुर में ऊँगली करते हैं पर चाची और बहन की तरह बुर या गाण्ड चटवाना या चुदाई की बातें नहीं की हैं।

तो मैंने कहा- इतना काफ़ी है।

और मैंने अपना सारा प्लान माँ को बता दिया।

अगले दिन सुबह प्लान के मुताबिक मैं लुँगी पहन कर बाहर गया तो देखा माँ और दीदी बातें कर रही थीं।

मुझे देख कर माँ ने दीदी से कहा- जा भाई के लिए चाय ले आ।

तो दीदी रसोई में चली गईं.. मैं माँ के सामने अपनी लुँगी थोड़ा फैला कर ऐसे बैठा कि दीदी को पता चल जाए कि मैं माँ को अपना लंड दिखा रहा हूँ.. पर दीदी को मेरा लंड ना दिखाई दे।

जैसे ही दीदी आईं तो मैंने माँ को इशारा करते हुए अपनी जाँघों को बंद कर लिया।

दीदी कभी मुझे और कभी माँ को देखतीं.. पर वो समझ गई थी कि माँ मेरा लंड देख रही थीं।

चाय पीने के बाद मैंने जानबूझ कर अपना लंड हाथ से पकड़ कर.. जिससे दीदी की जिज्ञासा बढ़ जाए.. माँ से कहा- मैं फ्रेश होने जा रहा हूँ..।

तो माँ दीदी की तरफ देख कर बोलीं- हाँ.. चल मुझे भी पेशाब लगी है और बाथरूम में आकर मैं देख भी लूँगी..

फिर उसके बाद कुछ नहीं हुआ.. इस तरह 2-3 दिन बीत गए और हम लोग इसी तरह दीदी को उत्तेजित करते रहे।

एक दिन दोपहर में खाना खाने के बाद प्लान के मुताबिक मैं कमरे में आकर लुँगी से अपना लंड बाहर निकाल कर सोने का नाटक करने लगा।

थोड़ी देर में माँ भी आ गईं और अलमारी खोल कर वहीं ज़मीन पर बैठ गईं और कपड़े सही करने लगीं। थोड़ी देर में दीदी कमरे में आईं और माँ के पास ही बैठ गईं और बातें करने लगीं।

तभी दीदी की नज़र मेरे खड़े लंड पर पड़ी तो वो चौंक कर माँ से बोली- माँ देखो.. भाई कैसे सो रहा है और उसके सूसू पे क्या हुआ है?

तो माँ ने मेरी तरफ देखते हुए कहा- हाँ.. उसकी सूसू में रगड़ लगने की वजह से छिल गया है.. मैंने ही क्रीम लगा कर खुला रखने को कहा है।

दीदी बोली- वहाँ पर कैसे रगड़ लग गई.. जो इतना छिल गया?

तो माँ हँसते हुए बोलीं- मुझे क्या पता?

दीदी भी हँसते हुए बोली- अच्छा तो.. इसने ज़रूर वो ही किया होगा।

माँ बोलीं- अच्छा.. तुझे कैसे पता.. तू भी वही करती है क्या?

तभी प्लान के मुताबिक माँ ने अपनी नाईटी हल्का सा खींच कर अपनी बुर खुजलाने लगीं और ऐसे बैठ गईं कि दीदी को उनकी बुर दिखाई दे।

माँ की बुर पर नज़र पड़ते ही दीदी बोलीं- माँ तुमने मेरी बाल साफ़ करने वाली क्रीम लगाई है क्या?

तो माँ बोलीं- तुझे कैसे पता?

दीदी ने कहा- तुम्हारी चिकनी बुर दिखाई दे रही है।

तो माँ झुक कर अपनी बुर देखने का बहाना करते हुए बोलीं- हाँ.. लगाई है.. उसमें ज़रा सी तो बची थी।

दीदी माँ की बुर की ओर इशारा करके हँसते हुए बोली- वो ज़रा सी थी? मेरी पूरी क्रीम एक बार में खत्म कर दी.. अपनी बुर का साइज़ तो देखो.. इतनी बड़ी बुर है कि पूरी की पूरी एक बार में ही खत्म हो जाए और ऊपर से शीशे में देख कर फैला-फैला कर लगाती हो।

तो माँ भी हँसते हुए बोलीं- अच्छा तो सिर्फ़ मेरी ही बड़ी है.. तेरी तो इसी उम्र में इतनी फैल गई है.. जितनी मेरी तेरे पैदा होने के बाद फैली थी और तू तो रोज लगाती है.. तो खत्म नहीं होगी।

दीदी की चड्डी की ओर जो स्कर्ट से दिखाई पर रही थी.. इशारा करते हुए बोलीं।

तो दीदी ने कहा- नहीं.. मैंने नहीं लगाई है.. मैं ढूँढ रही थी.. पर मिली नहीं।

माँ ने कहा- मैं मान ही नहीं सकती।

अब दीदी भी मस्ती में भर कर अपनी चड्डी को साइड से हल्का सा खींच कर अपनी बुर माँ को दिखाते हुए बोली- नहीं लगाई.. ये देखो अभी मेरी बुर तुम्हारे जितनी चिकनी नहीं है.. 10-12 दिन हो गए है.. बाल साफ़ किए हुए।

ये सारी बातें सुन कर मेरा लंड पूरा 6-7 इंच का होकर तन गया और झटके लेने लगा।

तभी मुझे दीदी की आवाज़ सुनाई पड़ी- वो देखो भाई का लंड कैसा हो गया है.. लग रहा है कि सपने में कुछ कर रहा है।

तो माँ हँसने लगीं और कपड़े लेकर पलंग पर बैठ गईं तो दीदी भी साथ में पलंग पर आ गईं।

मैंने हाथ को अपने चेहरे पर इस तरह रखा था कि वो दोनों मुझे दिखाई दे रहे थे.. पर उन्हें मैं सोता हुआ लग रहा था।

मैंने देखा कि दीदी की निगाहें मेरे लंड पर टिकी हुई थीं.. तो मैं अपने लंड को और झटके देने की कोशिश करने लगा।

तभी माँ दीदी से बोलीं- ज़रा तौलिया देना.. और कहते हुए अपनी नाईटी को कमर तक उठाते हुए अपनी बुर खोल दी।

माँ दीदी को पूरी तरह गरम करना चाहती थीं और यही हमारा प्लान था।

माँ खुद भी गरम हो गई थीं और उनकी बुर से पानी निकलने लगा था।

शायद यही हाल दीदी का भी था.. तौलिया लेते ही माँ दीदी को दिखाते हुए अपनी बुर की पुत्तियों को हाथों से फैला कर पौंछने लगीं.. उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

तभी दीदी ने माँ से कहा- माँ मुझे भी देना..

तो माँ ने पूछा- क्यों तेरी बुर भी पानी छोड़ रही है क्या?

दीदी ने कहा- हाँ.. मेरी भी चड्डी गीली हो गई है।

माँ अपनी बुर पौंछने के बाद दीदी को तौलिया देते हुए बोलीं- तूने तो फालतू में ही चड्डी पहन रखी है.. उतार क्यों नहीं देती.. देख पूरी गीली हो गई है.. कोई बाहरी थोड़े ही है यहाँ पर.. और फिर तू तो मेरे सामने कई बार नंगी हो चुकी है।

तो दीदी मेरी ओर इशारा करने लगी।

माँ बोलीं- ये बेचारा तो वैसे ही परेशान है और ये भी तो नंगा ही है और तुझसे छोटा ही है.. इससे कैसी शरम.. चल उतार दे.. गीली चड्डी नहीं पहनते।

यह कह कर माँ अपनी नाईटी उतारने लगीं।

यह देख कर दीदी भी जो अब तक मेरी वजह से शर्मा रही थी.. माँ का इशारा पाकर तुरंत अपनी टी-शर्ट.. स्कर्ट और चड्डी उतार कर नंगी हो गई।

दीदी की चूचियाँ माँ जितनी बड़ी तो नहीं थीं.. पर काफ़ी सुडौल थीं। उसकी बुर पर छोटे-छोटे बाल थे और बुर भी फूली हुई थी.. पर उसकी पुत्तियाँ माँ जितनी बड़ी नहीं थीं.. वहाँ पर हम तीनों ही नंगे थे।

पूरे पलंग पर बुर के पानी की खुश्बू फैल गई थी। तभी माँ ने मेरे लंड को हाथों में लेते हुए कहा- ज़रा देखूं तो अभी रगड़ सूखी या नहीं..

वो मेरे सुपारे को घुमा कर चारों तरफ से देखने लगीं।

दीदी भी मेरी तरफ खिसक आई थी और उसकी भी साँसें माँ की तरह तेज़ चल रही थीं।

माँ ने जानबूझ कर दीदी की तरफ अपनी कमर करके जाँघों को पूरा खोल दिया.. जिससे उनकी बुर पूरी तरह खुल गई और उसकी पुत्तियाँ बाहर निकल कर लटक गईं।

माँ धीरे-धीरे मेरे सुपारे को सहला रही थीं..

दीदी मेरे सुपारे को बड़े ध्यान से देख रही थी और गरम हो गई थी, अब वो माँ के सामने ही अपनी बुर रगड़ने लगी।

यह देख कर माँ दीदी को चुदाई के लिए तैयार करने के लिए हँसते हुए बोलीं- क्या हुआ.. लग रहा है लंड देख कर तेरी बुर ज्यादा पानी छोड़ रही है.. अभी तेरी बुर का छेद छोटा है.. इतना मोटा सुपारा उसमे फँस जाएगा और तेरी बुर फट जाएगी.. कोई बात नहीं.. तू ऊँगली करके पानी निकाल दे।

यह सुन कर दीदी और गर्म हो गई और एकदम खुल कर माँ से बोली- अच्छा.. तो क्या सिर्फ़ तुम्हारी बुर का छेद ही इसके साइज़ का है.. लंड दिख गया.. तो तुम्हारी बुर फड़कने लगी नहीं.. तो हमेशा ऊँगली करती रहती थीं और मेरी चूत का छेद इतना भी छोटा नहीं है.. ये देखो..

और ये कह कर अपनी बुर को हाथों से फैला कर माँ को अपना लाल-लाल छेद दिखाने लगी और वो दोनों हँसने लगे।

हम सब इतने उत्तेजित थे कि किसी को कुछ भी होश नहीं था।

सिर्फ़ लंड और बुर दिखाई दे रहा था। तभी मैंने सही समय सोच कर उठने का नाटक करते हुए अपनी आँखें खोल दीं और उठने का नाटक करते हुए बैठ गया।

मेरे उठते ही माँ ने पूछा- अरे उठ गया बेटा.. अब दर्द तो नहीं हो रहा है।

मैंने कहा- नहीं.. पर मुझे पेशाब लगी है।

और यह कह कर बिना दीदी की तरफ देखे.. बाथरूम जाने लगा।

तो माँ बोलीं- मुझे भी पेशाब लगी है.. रुक मैं भी चलती हूँ।

वो मेरे साथ आ गईं.. बाथरूम पहुँच कर हम दोनों साथ-साथ मूतने लगे।

माँ की बुर से तेज़ सीटियों जैसी आवाज़ निकल रही थी।

हम अभी शुरू ही हुए थे कि दीदी भी आ गईं।

उसे देख कर माँ ने पूछा- क्या हुआ?

तो दीदी ने कहा- मुझे भी पेशाब लगी है।

तो माँ ने हँसते हुए कहा- अच्छा बैठ जा.. लगता है तेरी बुर लंड के लिए ज्यादा खुजली मचा रही है।

वो हम दोनों के सामने ही बैठ गई.. बैठने पर उसकी जाँघें फैल गईं.. जिससे उसकी बुर की फाँकें पूरा फैल गईं और बुर के लाल-लाल छेद से निकलते हुए पेशाब की धार को देख कर मेरा लंड और तन गया।

दीदी भी मेरे लंड से पेशाब की धार निकलते हुए बड़े ध्यान से देख रही थी।

तो माँ ने मौका देख कर मुझसे पूछा- अब सुपारे पर पेशाब लगने से कल की तरह जलन तो नहीं हो रही है?

तो मैंने कहा- नहीं..

तब तक माँ पेशाब कर चुकी थीं और मैं भी और दीदी के मूतने का इन्तजार करने लगे।

जब दीदी मूत कर खड़ी हुईं तो हम सब कमरे में आ गए।

मेरा लंड अभी भी एकदम खड़ा था।

माँ पलंग पर टेक लगा कर बैठ गईं और मुझे अपने पास बैठा लिया।

दीदी भी हम दोनों के सामने बैठ गई।

फिर माँ मेरे सुपारे को हाथ में लेकर बोलीं- ठीक है.. अब कुछ दिन तक रगड़ना-वगड़ना नहीं.. लंड खड़ा होता है तो कोई बात नहीं… थोड़ी देर लंड को सहलाएगा तो ठीक हो जाएगा..

‘लेकिन माँ ज्यादा तनने के कारण मेरे लंड में अब बहुत खुजली हो रही है।’ मैंने लंड माँ की तरफ बढ़ाते हुए कहा।

तो माँ बोलीं- ठीक है.. मैं इसका पानी झाड़ देती हूँ.. फिर ये थोड़ा नरम हो जाएगा.. नहीं तो चमड़ा खिंचने से और दर्द होगा।

मैंने कहा- क्या.. अभी तो माँ मेरे चूतड़ पर हाथ रख कर अपनी तरफ करते हुए लंड को दूसरे हाथ में लेकर बोलीं- तो क्या हुआ.. मेरे सामने कैसी शरम और अब तो दीदी के सामने भी शरमाने की कोई ज़रूरत नहीं है।

यह बात माँ ने उत्तेजित होकर मुझे दीदी की बुर दिखाते हुए कहा- यह देख वीनू की बुर का छेद तो लंड लेने के लिए खुद ही खुला हुआ है..

फिर मैं पलंग पर लेट गया.. माँ मेरे कमर के पास बैठी थीं और मेरा सर दीदी की जांघों के पास था.. जिससे दीदी की बुर की फैली हुई फांकें अब मुझे एकदम नज़दीक से दिखाई दे रही थीं।

माँ दीदी से बोलीं- ज़रा गरी का तेल देना।

दीदी ने तेल दिया।

माँ ने तेल हाथ में लगा कर मेरे सुपारे पर लगाया और मेरे लवड़े की मुठ मारने लगीं और मैं अपने एक हाथ से माँ की बुर के छेद में धीरे-धीरे ऊँगली करने लगा।

माँ और दीदी बहुत ज़्यादा उत्तेजित थीं जिससे उनकी बुर और गाण्ड का छेद खुल और बंद हो रहा था।

तभी दीदी अपनी बुर में अपनी ऊँगलियाँ डालते हुए माँ से बोली- माँ हाथ से ऐसे पकड़ कर करोगी तो लंड में फिर घाव हो जाएगा।

माँ भी सर हिलाते हुए बोलीं- हाँ.. तू सही कह रही है.. पर क्या करूँ इसको झाड़ना तो पड़ेगा ना..

तो दीदी जो एकदम गरम हो गई थी.. अपनी बुर दिखाते हुए माँ को इशारा करके बोली- ऐसे करो ना..

तो माँ अपनी बुर को फैलाते हुए बोलीं- हाँ.. तू सही कह रही.. मैं इसके लंड पर बैठ कर इसका लंड अपनी बुर में डाल लेती हूँ और ऊपर-नीचे करती हूँ.. मेरी बुर में लंड जाते ही झड़ जाएगा.. पर चुदाई में मेरी इन बड़ी-बड़ी पुत्तियों से रगड़ कर कहीं फिर से छिल ना जाए? एक काम करती हूँ.. इसका सुपारा मुँह में लेकर हल्के-हल्के से चूस कर झाड़ देती हूँ।

यह कह कर तुरंत अपने चूतड़ दीदी की तरफ उठाते हुए मेरे लंड पर झुक गईं और लंड चूसने लगीं।

लेकिन मैंने अपनी ऊँगली माँ की बुर से नहीं निकाली और दूसरे हाथ से बुर की पुत्तियों को फैलाते हुए और तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा।

तभी ये देख कर दीदी ने भी अपना कंट्रोल शायद खो दिया और झुक कर माँ के चूतड़ों को अपने हाथों से फैला कर माँ की चूतड़.. गाण्ड और बुर का छेद चाटने लगी।

जैसे ही दीदी ने माँ की 4 इंच लंबी और 2 इंच चौड़ी पुत्तियों को अपने मुँह ले लिया, माँ ने भी अपनी जाँघों को और फैला दिया और उसके मुँह पर अपनी बुर को दबाते हुए मेरे लौड़े को चूसने लगीं।

मैं भी इसी इंतजार में था और अपनी ऊँगलियाँ माँ की बुर से निकाल कर दीदी के चूतड़ जो मेरी तरफ थे, अपने हाथ से फैला कर उसकी गाण्ड और बुर में ऊँगली डाल कर चोदने लगा।

दीदी भी अपने चूतड़ उछाल-उछाल कर अपनी बुर में ऊँगली डलवा रही थी कि मेरे दिमाग़ में एक आइडिया आया और मैंने माँ से कहा- माँ एक काम करो.. तुम थोड़ा सा आगे बढ़ जाओ.. जिससे दीदी मेरे और तुम्हारे बीच में आ जाएगी.. फिर तुम मेरे लंड को चूसना.. दीदी तुम्हारी बुर चाटेगी और मैं दीदी की बुर चाटूंगा।

तो माँ और दीदी तुरंत उसी तरह लेट गईं और फिर हम तीनों एक-दूसरे की बुर और गाण्ड चाटने लगे।

मैंने अपनी एक ऊँगली दीदी की गाण्ड में थूक लगा कर डाल दीं और उसकी बुर को मुँह में भर लिया।

कुछ ही देर में मैं अपना लंड माँ के मुँह में और अन्दर घुसाते हुए दीदी की बुर को पूरा मुँह भर कर चाटते हुए झड़ गया।

माँ दीदी को दिखाते हुए मेरे पूरे वीर्य को जीभ से चाट कर पीने लगीं।

जब उसने मेरा लंड पूरा सुखा दिया.. तो सीधी होकर आराम से लेट गईं और दीदी से अपनी बुर चटवाने लगीं और फिर झड़ कर शांत हो गईं।

इधर मैंने भी दीदी की बुर चाट कर उसे झाड़ दिया था।

थोड़ी देर लेटे रहने के बाद हम तीनों उठ कर बैठ गए।

मेरा लंड उस समय सिकुड़ा हुआ था तो दीदी माँ को मेरा लंड दिखाते हुए बोली- अरे वाहह.. माँ तुम्हारा ये चूसने वाला तरीका तो ज्यादा बढ़िया था.. भाई को झाड़ भी दिया और लंड पर भी कुछ नहीं हुआ।

माँ बोलीं- हाँ.. पर तूने तो आज कमाल कर दिया.. ओह क्या बुर चाटी है..

तो दीदी बोली- हाँ.. माँ मुझे भी अच्छा लगा।

माँ बोलीं- चल अच्छा है.. अब जब इसका लंड थोड़ा ठीक हो जाए.. तो तुझे भी इसे अपनी बुर में लेने में मज़ा आएगा.. तब तक अपना छेद फैला ले।

ये कह कर माँ ने मुझे आँख मारी.. तो हम तीनों हँसने लगे और हम लोग इसी तरह थोड़ी देर तक आपस में हँसी-मज़ाक करते रहे और चाय पी.. पर दीदी की बुर देख-देख कर मेरा लंड फिर से खड़ा हो गया और झटके लेने लगा.. तो मैं अपना लंड हाथ में लेकर दीदी और माँ को दिखाते हुए धीमे-धीमे मुठ मारने लगा।

यह देख कर दीदी माँ से बोली- माँ देखो भाई का लंड फिर से फूल गया है.. लगता है इसका फिर से झड़ने का मान कर रहा है।

तो माँ बोलीं- मैं तो अब थक गई.. हाँ.. तुम दोनों को जो करना है.. करो मैं सिर्फ़ लेट कर देखूँगी।

यह कह कर माँ लेट गईं.. उसकी कमर मेरी तरफ थी और जाँघें फैली हुई थीं जिससे उसकी मेरी दोनों हथेलियों जितनी बड़ी और चिकनी बुर एकदम खुल गई थी और उसकी लंबी और चौड़ी पुत्तियाँ बाहर निकल कर लटकी हुई थीं।

ये देख कर मैं अपने एक हाथ से उन्हें मसलने लगा… ये देख कर दीदी जो बड़ी ललचाई नज़रों से मेरे लंड को देख रही थीं.. झुक कर मेरे लंड को अपने मुँह में भर लिया।

ओह क्या मस्त लग रहा था.. दीदी गपागप मेरे लंड को मुँह में लेकर चूसे जा रही थी.. और मैं भी अपनी ऊँगलियां माँ की बुर में तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगा।

माँ भी धीरे-धीरे अपनी कमर ऊपर उछाल कर चुदवा रही थीं और खूब ज़ोर से हिलते हुए झड़ गईं।

तभी मैं अपना लंड दीदी के मुँह में अन्दर तक घुसड़ेते हुए झड़ गया।

दीदी भी मेरे लंड का पानी पूरा चाट गई.. फिर हम सब थक कर सो गए।

अब ये हमारे घर का नियम बन गया था और हम तीनों जन हर काम साथ-साथ करते.. बाथरूम साथ जाते.. कोई लेट्रीन करता.. कोई मंजन करता.. कोई नहाता.. कभी-कभी हम सब एक-दूसरे को अपने हाथों से ये काम करवाते। मंजन करते और नहलाते और जब मौका मिलता अपनी बुर और लंड एक-दूसरे में घुसाए रहते।
 
ससुर बहू की पेलमपेली

मैं आपको एक बहुत ही रोचक घटना बताने जा रहा हूँ। मैंने कैसे अपनी नई नवेली बहू की चुदाई कर डाली। मेरा नाम मस्ताना सिंह है और मेरी उम्र 48 साल है। मेरी पत्नी का देहांत करीब 5 साल पहले हो गया था। फिटनेस फ्रीक होने की वजह से मैं अभी तक बहुत फिट रहता हूँ। पत्नी के जाने के बाद मेरे कई औरतों और कम उम्र की लड़कियों से शारीरिक सम्बन्ध रहे हैं।

मेरा एक ही बेटा है और कोई औलाद नहीं। घर में हम दो लोग ही थे। पर अभी दो महीने पहले मैंने मेरे बेटे रमेश की शादी करवा दी। मेरी बहू रीटा बहुत सुन्दर, आकर्षक और अच्छे स्वाभाव की लड़की है। अब चूंकि रमेश अपने काम में इतना व्यस्त है कि रीटा पूरे दिन में कई घंटे मेरे साथ ही बिताती है।

रीटा-रमेश की शादी को दो महीने ही हुए थे, एक दिन रीटा ने मुझसे पूछा भी कि क्या वह मेरे साथ मेरे जिम में, टेनिस, तैराकी में साथ आ सकती है?

तो मुझे उसे अपने साथ रखने में कुछ ज्यादा ही खुशी का अनुभव हुआ। हम अक्सर साथ-साथ शापिंग के लिए भी जाते। तो एक बार क्या हुआ कि हमलोग, मतलब रीटा और मैं एक माल में स्विम-सूट देख रहे थे।

थोड़ा मुश्कुराते हुए, थोड़ा शरमाते हुए रीटा ने मुझे एक छोटी सी टू-पीस बिकिनी दिखाई और पूछा- “यह कैसी है पापा?” और जिस तरह से यह पूछते हुए उसने मेरी ओर देखा।

तो दोस्तों, मेरे जीवन में शायद इससे उत्तेजक अदा किसी लड़की या औरत ने नहीं दिखाई थी। उसके चेहरे पर मुश्कान थी, आँखों में शरारत भरा प्रश्न था, उसकी यह कामुक अदा मुझे मेरे अन्दर तक हिला गई। मैंने बिना एक भी पल गंवाए उसकी कमर पर अपने दोनों हाथ रखे और दबाते हुए कहा- “हाँ, इसमें तुम लाजवाब लगोगी, तुम्हारी फिगर है ही इसे पहनने के लिए एकदम उपयुक्त…”

वो खिलखिलाई- “मैं तो बस मजाक कर रही थी पापा। मैं इसे आम स्विमिंगपूल में कैसे पहन सकती हूँ?”

“लेकिन जान, मैं मजाक नहीं कर रहा…” फिर मैंने अपना एक हाथ उसकी कमर के पीछे लेजाकर, दूसरा हाथ उसके कूल्हे पर रखकर उसे अपनी तरफ दबाते हुए कहा- “हमारा क्लब एक विशिष्ट क्लब है और यहाँ पर काफी लड़कियां और महिलाएं ऐसे कपड़े पहनती हैं। और सप्ताहांत को छोड़कर अंधेरा होने के बाद तो शायद ही कोई क्लब में होता हो। तुम इसे उस वक्त तो पहन ही सकती हो…” अब तक मेरा ऊपर वाला हाथ भी नीचे फिसलकर उसके चूतड़ों पर आ टिका था। फिर मैंने सेलगर्ल की ओर घूमते हुए वो बिकिनी भी पैक करने को कह दिया।

अगली सुबह रीटा मेरे साथ जिम में थी, उसकी छरहरी-सुडौल काया से मेरी नजर तो हट ही नहीं रही थी। उसने भी शायद मेरी घूरती नजरों को पहचान लिया था, तभी तो उसके गुलाबी गाल और लाल-लाल से हो गए थे, और ज्यादा प्यारे हो गए थे।

वो मेरे पास आकर मेरे गले में एक बाजू डालते हुए बोली- “जब आप मेरी तरफ इस तरह से देखते हैं ना पापा, तो मुझे बहुत शर्म आती है पर अच्छा भी बहुत लगता है…” कहकर उसने अपना चेहरा मेरी छाती में छिपा लिया।

मैं उसकी पीठ थपथपाते हुए उससे जिम में रखी मशीनों के बारे में बात करने लगा कि उन्हें कैसे इश्तेमाल करना है? और उनसे क्या नहीं करना है?

उसे मेरी बातें तुरन्त समझ आ जाती थी और अपनी बात भी मुझसे कह देती थी।

हमने जिम में थोड़ी वर्जिश करने के बाद आराम किया, फिर नाश्ता करके टेनिस के लिये क्लब आ गये। उसे टेनिस बिल्कुल नहीं आता था तो मैंने उसे रैकेट पकड़ना आदि बताकर शुरू में अलीशार पर कुछ शाट मारकर कुछ सीखने को कहा। गयारह बजे तक हम वापिस घर आ गए और आते ही वो तो बगीचे में ही कुर्सी पर ढेर हो गई।

मैं उसके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया और पूछा- क्या मैंने तुझे ज्यादा ही थका दिया?

उसने कहा- “नहीं पापा, ऐसी कोई बात नहीं…” पर उसके चेहरे के हाव-भाव से साफ नजर आ रहा था कि वो थक चुकी है।

मैं उसकी कुर्सी के पीछे खड़ा हुआ और उसके कंधे और ऊपरी बाजुओं को सहलाते हुए बोला- “टेनिस की प्रैक्टिस कुछ ज्यादा हो गई…”

वो बोली- पापा, कई महीनों से मैंने कसरत आदि नहीं की थी ना, शायद इसलिए।

मैंने कुछ देर उसकी बाजू, कन्धे और पीठ सहलाई तो वो कुर्सी छोड़कर खड़े होते हुए बोली- “पापा, आप कितने अच्छे हैं…” और यह कहते हुए उसने मुझे अपनी बाहों में भींच लिया।

मैंने भी उसके बदन को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया और कहा- “मेरी रीटा भी तो कितनी प्यारी है…” कहते हुए मैंने उसके माथे का चुम्बन लिया और जानबूझकर अपनी जीभ से मुख का थोड़ा गीलापन उसके माथे पर छोड़ दिया।

“पापा, मैं कितनी खुशनसीब हूँ जो मैं आपकी बहू बनकर इस घर में आई… आप यहीं बैठकर आराम कीजिए, मैं चाय बनाकर लाती हूँ…” कहते हुए रीटा मुड़ी।

मैं कुर्सी पर बैठकर सोचने लगा कि मैं भी कितना खुश हूँ रीटा जैसी बहू पाकर। आज कितना अच्छा लगा रीटा के साथ। तभी मन में यह विचार भी आया कि उसके वक्ष कैसे मेरी छाती में गड़े जा रहे थे जब वो मेरी बाहों में थी। ओह्ह… जब रीटा चाय बनाने के लिए जाने लगी तो मेरी नजर उसके चूतड़ों पर पड़ी, उसका टाप थोड़ा ऊपर सरक गया था और शायद टेनिस खेलने से उसकी सफेद निक्कर थोड़ी नीचे होकर मुझे उसके चूतड़ों की घाटी का दीदार करा रही थी। अब या तो उसने पैंटी पहनी ही नहीं था या फिर पैन्टी निक्कर के साथ नीचे खिसक गई थी। अब तो यह देखते ही छलांगें मारने लगी।

मैं भूल गया कि यह मेरी पुत्र वधू है। मैं उठकर उसके पीछे रसोई में गया, उसके पीछे खड़े होकर उसे चाय बनाते देखने लगा। मेरी निक्कर का उभार उसके कूल्हों के मध्य में छू रहा था।

उसने पीछे मुड़कर अपने कन्धे के ऊपर से मेरी आँखों में झांका और बोली- “पापा, मैं तो चाय लेकर बाहर ही आने वाली थी…” और उसने मेरे लिंग के पड़ रहे दबाव से मुक्त होने के लिए अपने चूतड़ थोड़े अन्दर दबा लिए।

और मैं उसकी टाप और निक्कर के बीच चमक रही नंगी कमर पर अपनी दोनों हथेलियां रखकर बोला- मैं कुछ मदद करूँ?

मेरे इस स्पर्श से उसे एक झटका सा लगा और वो मेरी ओर देखने के लिए मुड़ी कि उसके चूतड़ मेरे लिंग पर दब गए। मेरा उत्थित लिंग उसके पृष्ठ उभारों के बिल्कुल बीच में जैसे घुस सा गया। उसे मेरी उत्तेजना का आभास हो चुका था पर कोई प्रतिक्रिया दिखाए बिना वो बोली- “चलिए पापा, चाय तैयार है…” कहकर वो मेरे आगे-आगे चलने लगी।

मैं भी उसके पीछे-पीछे उसकी नंगी कमर और ऊपर-नीचे होते कूल्हों पर नजर गड़ाए चलने लगा। बाहर पहुँचते-पहुँचते मैं अपने को रोक नहीं पाया और जैसे ही रीटा चाय स्टूल पर रखने के लिए झुकी, मैं अपनी दोनों हथेलियां उसके कूल्हों पर टिकाते हुए बोला- “नाइस बम्स…” और इसी के साथ मैंने अपनी दोनों कन्नी उंगलियां कूल्हों की दरार में दबा दी।

रीटा- “ओह पापा, आप भी ना… अभी चाय छलक जाती…” चाय रखने के बाद वो मेरी तरफ घूमते हुए बोली।

और मेरे हाथ फिर से उसकी कमर पर आ गये- “तुम्हारे कूल्हे बहुत लाजवाब हैं रीटा। मुझे बहुत पसंद हैं…” पता नहीं मैं कैसे बोल गया और इसी के साथ मेरी आठों उंगलियां उसकी निक्कर की इलास्टिक को खींचते हुए उसके चूतड़ों के नंगे मांस में गड़ गईं।

रीटा के बदन में जैसी बिजली सी दौड़ गई और थोड़ी लज्जा मिश्रित मुश्कान के साथ बोली- सच में पापा?

मैं- “हाँ रीटा, तुम्हारे चूतड़ एकदम परफेक्ट हैं। इससे बढ़िया चूतड़ मैंने शायद किसी के नहीं देखे…” कहले हुए मैंने अपनी हथेलियां कुछ इस तरह नीचे फिसलाई कि सफेद निक्कर उसकी जांघों में लटक गई।

रीटा अपनी जगह से हिली नहीं और अब मैं उसके नंगे चूतड़ों को अपने हाथों में मसल रहा था। मैंने फुसफुसाते हुए उससे कहा- “रीटा, मैंने बहुत सारे चूतड़ इस तरह नंगे देखे हैं, सहलाए हैं, चाटे भी हैं पर…” कहते-कहते मैंने अपनी उंगलियों के पोर उन दोनों कूल्हों के बीच की दरार में घुसा दिए।

रीटा- “हाँ पापा, मैंने सुना है कि आपने खूब…” कहते हुए वो कामुक मुश्कान के साथ शरमा गई।

मैं- “तुम्हें किसने बताया?”

उसने कनखियों से मेरी तरफ देखा और अर्थपूर्ण मुश्कुराहट के साथ बोली- “काम्या ने। वो मेरे साथ कालेज में पढ़ती थी, वो मेरी सहेली थी और चटखारे ले-लेकर आपकी रसीली कहानियां मुझे सुनाया करती थी…” इसी के साथ वो खिलखिलाकर हँस पड़ी।

अब यह मेरे लिए परेशानी वाली बात थी, मैंने पूछा- “काम्या ने तुम्हें क्या-क्या बताया?” अब मेरे हाथ खुल्लमखुल्ला रीटा के चूतड़ों से खेल रहे थे।

वो फिर खिलखिलाई- “ये लड़कियों की आपस की बातें हैं, मैं आपको नहीं बताऊँगी…”

मैं- “लेकिन ना कभी काम्या ने, ना कभी तुमने बताया कि तुम सहेलियां थी?”

रीटा- “रमेश से मेरी शादी करवाने में काम्या का ही तो हाथ है। दो साल पहले जब एक बार आप लन्दन गये हुए थे तो काम्या मुझे यहाँ इस घर में लेकर आई थी। उस समय सुमन मौसी भी यहीं थी। तो काम्या ने ही मौसी को बीच में डालकर रमेश की शादी मुझसे करवाई…”

मैं- “ओह्ह… तो सुमन भी तुम्हारे साथ मिली हुई है?”

रीटा- “तो क्या पापा? सुमन मौसी तो आपके साथ भी… है ना?

मैं- “ह्म्म…”

रीटा- “सुमन मौसी ने ही तो बताया था कि…”

मैं- “क्या बताया था उसने? बोलो…”

रीटा- “उन्होंने बताया था कि आप किसी भी लड़की को अपने चुम्बन से पागल कर सकते हो…”

मैं- “सुमन से भी ना… चुप नहीं रहा जाता… तो अब तुम भी पागल… उंह्ह…” मैंने उसके टाप के अन्दर उसकी पीठ पर एक हाथ फिराते हुए कहा।

रीटा- “हाँ पापा, मुझे भी अपने होंठों का जादू दिखाईए ना…” रीटा ने अपना चेहरा ऊपर उठाकर अपने होंठों को गोल करते हुए कहा।

मैं अपना हाथ उसकी पीठ से सरका कर गर्दन तक ले आया और उसके सिर को पीछे से जकड़ते हुए अपने होंठ उसके रसीले होंठों पर रख दिये। मेरे हाथ के उसके सिर पर जाने से हुआ यह कि उसका टाप भी मेरे हाथ के साथ रीटा के कन्धों में आकर रुका। मेरा दूसरा हाथ जो अभी तक उसके चूतड़ों पर था, वो फिसल कर उसकी जांघों तक चला गया और उसकी जांघ को उठाकर मैंने अपनी बाजू पर ले लिया।

रीटा ने अपने को मुझसे छुड़ाते हुए कहा- “पापा, अन्दर चलते हैं…”

मैंने उसे छोड़ते हुए कहा- “चलो, ड्राइंग रूम में चलो…”

जैसे ही वो सीधी खड़ी हुई, उसकी निक्कर उसके पैरों में ढेर हो गई।

मैंने निक्कर को पकड़कर उसके पैरों से निकालकर कहा- “चलो, मैं इसे सम्भालता हूँ…”

अब वो आगे आगे, और मैं पीछे-पीछे उसकी निक्कर को हाथ में लेकर सूंघते हुए चल रहा था, उसकी जांघों और योनि की गन्ध उस निक्कर में रमी हुई थी। कपड़ों के नाम पर रीटा के गले में उसका टाप एक घेरा सा बनाए पड़ा था। निक्कर मेरे हाथ में थी, ब्रा-पैन्टी पहनना शायद उसे भाता नहीं था। अन्दर ड्राइंग रूम में जाकर रीटा ने ए॰सी॰ और सारी बत्तियां जला दी, तो पूरा कमरा रोशनी से नहा गया। और जैसे ही रीटा बत्तियां जलाकर मेरी तरफ घूमी, उसने अपने गले से वो टाप निकालकर मेरे मुँह पर फ़ेंक दिया।

लेकिन मेरी नजर तो उसकी नाभि पर थी, उसमें उसने एक बाली पहनी हुई थी। उसके बाद मेरी निगाहें सरक कर नीचे गई तो देखा योनि ने घने सुनहरे-भूरे बालों का घूंघट ओऔढ़ा हुआ था।

रीटा ने मेरी तरफ अपनी बाहें फैलाते हुए कहा- “आओ ना पापा। मुझे अपने होंठों से पागल करो ना…” कहकर रीटा अपने होंठों पर जीभ फिरा रही थी, और उसके गीले होंठ मुझे निमंत्रण दे रहे थे।

मैंने उसके गालों को अपनी हथेलियों में पकड़कर उसकी गहरी आँखों में झांका और अपने होंठ उसके होंठों पर हल्के से रगड़ दिये।

उसके मुख से सिसकारी फूटी- “पापा, और करो प्लीज…”

मैं- “जानू… अब तुम्हारी बारी है…” मैं उसके नंगे चूतड़ों को अपने हाथों में सहेजते हुए फुसफुसाया।

रीटा- “पापा… प्लीज आप करो ना… प्लीज पापा करो…” वो एक छोटे बच्चे की तरह मचलते हुए बोली- “जन्नत का मजा तो आप ही मुझे देंगे ना पापा?”

मैं- “ओह्ह… ठीक है। मेरे सिर को अपने हाथों में थाम लो रीटा…

बिना एक भी शब्द बोले उसने मेरा सिर पकड़कर अपने चेहरे पर झुका लिया। हमारे होंठों ने एक दूसरे को छुआ और मैं उसे अपने होंठों से सताने लगा।

रीटा का पूरा बदन कांप रहा था और उसके मुख से कामुक सीत्कारें निकल रही थीं, और तभी अचानक एकदम से उसने मेरे होंठों को चाकलेट की तरह चूसना-खाना शुरू कर दिया।

रीटा की इस हरकत ने मुझे भी पागल सा कर दिया, मैंने उसके चूतड़ों के नीचे अपने दोनों हाथ लेजाकर उसे ऊपर को उठाया तो उसने अपनी टांगें मेरे कूल्हों के पीछे जकड़ लीं। इससे उसके चूतड़ों के बीच की दरार चौड़ी हो गई और मेरी मध्यमा उंगली उसकी गाण्ड के छेद को कुरेदने लगी। लड़की मेरे बदन पर सांप की तरह लहरा कर रह गई और मेरी उंगली उसके कसे छेद को भेदते हुए लगभग एक इंच तक अन्दर घुस गई।

रीटा हांफ रही थी- “ऊह्ह… पापा… उह्ह पा… आह्ह… ना…”

मुझे याद नहीं हम कितनी देर तक इस हालत में रहे होंगे कि तभी उसका मोबाइल घनघना उठा। और इस आवाज से हमारे प्यार के रंग में भंग हो गया। उसने एक हल्के से झटके के साथ अपनी टांगें मेरी कमर से नीचे उतारी और बोली- “पापा, जरा उंगली निकालो, मैं फोन देख लूँ…”

जैसे ही मैंने अपनी उंगली उसकी गाण्ड से निकाली उसने मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपनी नाक तक लेजाकर मेरी उंगली सूंघने लगी। उसने पीछे हटकर फोन उठाकर देखा तो उसके पति यानि मेरे बेटे रमेश का फोन

था।

मैंने रीटा की आँखों में देखा तो वो शर्म के मारे मुझसे नजरें चुराने लगी। मैं उसके पास गया और रीटा से सटकर फोन पर अपना कान लगा दिया।

रमेश उससे पूछ रहा था- सुबह क्या-क्या किया?

रीटा ने भी अभी आखिर की कुछ घटनाओं को छोड़कर उसे सब बता दिया।

रमेश ने पूछा कि वो हांफ क्यों रही है?

तो रीटा ने बताया कि वो नीचे थी और फोन ऊपर, फोन की घंटी सुनकर वो भागकर ऊपर आई तो उसकी सांस फूल गई।

सच में मेरी पुत्र-वधू काफी चतुर है। मैंने मन ही मन भगवान को इसके लिये धन्यवाद किया। मैं अपने बीते अनुभवों से जानता था कि गर्म लोहे पर चोट करने का कितना फायदा होता है। मेरे बेटे का फोन बहुत गलत समय पर आया था, बिल्कुल उस समय जब मैं अपनी बहू की योनि तक पहुँच ही रहा था और वो भी मेरी हरकतों का माकूल जवाब दे रही थी। अगर रमेश का फोन बीस मिनट भी बाद में आया होता तो मेरी बहू अपने ससुर के अनुभवी लौड़े का पूरा मजा ले रही होती। लेकिन शायद भाग्य को यह मंजूर नहीं था। मैं फोन पर कान लगाए सुन रहा था।

मेरे बेट-बहू लगातार फोन पर ‘लव यू’ कह रहे थे और चुम्बनों का आदान प्रदान कर रहे थे।

और मुझे महसूस हो रहा था कि जितनी देर फोन पर मेरे बेटे बहू की यह रासलीला चलती रहेगी, मेरे लण्ड और मेरी बहू रीटा की चूत के बीच की दूरी बढ़ती जाएगी। और शायद रमेश को बातचीत खत्म करने की कोई जल्दी भी नहीं थी। मुझे आज मिले इस अनमोल अवसर को मैं व्यर्थ ही नहीं गंवा देना चाहता था, तो मैंने अपनी बहू को उसके पीछे आकर अपनी बाहों में जकड़ लिया।

रीटा मेरे बेटे के साथ प्यार भरी बातों में मस्त थी और उसने मेरी हरकत पर ज्यादा गौर नहीं किया, वो अपने पति से बिना रुके बातें करती रही, लेकिन उसकी आवाज में एक कंपकंपाहट आ गई थी

“क्या हुआ? तुम ठीक तो हो ना?” मेरे बेटे रमेश ने थोड़ी चिन्ता जताते हुए पूछा।

थोड़ा रुकते हुए रीटा ने जवाब दिया- “उंह्ह… हाँ ठीक हूँ… जरा हिचकी आ गई थी…”

मैंने रीटा के जवाब की प्रशंसा में उसके एक उरोज को अपनी मुट्ठी में भींचते हुए दूसरा हाथ उसके गाल पर फिरा दिया।

रमेश अपनी पत्नी और मेरी बहू रीटा से कुछ इधर-उधर की बातें करने लगा। लेकिन उसे लगा कि रीटा की आवाज में वो जोश नहीं है जो कुछ पल पहले था क्योंकी रीटा ‘हाँ हूँ’ में जवाब दे रही थी और अपने बदन को थिरकाकर, लचकाकर मेरी तरफ देख-देखकर मेरी हरकतों का यथोचित उत्तर दे रही थी।

इससे मुझे यकीन हो गया था कि वो वास्तव में अपने पति के साथ मेरे सामने प्रेम-प्यार की बातें करने में आनन्द अनुभव कर रही थी। जरा सोचकर देखिए जिस लड़की की शादी को अभी दो महीने ही हुए हों वो अपने पति से प्यार भरी बातें करते हुए अपने ससुर के सामने पूर्ण नग्न हो और उसका ससुर उसकी चूचियों से खेल रहा हो।

अब मैं समझ चुका था कि मेरी बहू मुझसे इसके अलावा भी बहुत कुछ पाना चाह रही है, तो मैंने भी और आगे बढ़ने का फैसला कर लिया। मैंने फोन के माउथपीस पर हाथ रखा और फुसफुसाया- “बात चालू रखना, फोन बंद मत होने देना। ठीक है?”

उसने मेरी तरफ वासनामयी नजरों से देखा और ‘हाँ’ में सर हिलाया। रीटा भी अब खुलकर इस खेल में घुस गई थी।

अब मैं उसके सामने आया और नीचे अपने घुटनों पर बैठकर अपने हाथ उसके चूतड़ों पर रखकर उसे अपने पास खींचा और अपने होंठ उसकी योनि लबों पर टिका दिए।

“ओअ अयाह ऊउह…” रीटा के होंठों से प्यास भरी सिसकारी निकली।

मैं सुन नहीं पाया कि उसके पति ने क्या कहा।

लेकिन वो उत्तर में बोली- “ना… नहीं, मैं ठीक हूँ। बस मुझे ऐसा लगा कि मेरी जांघ पर कुछ रेंग रहा था…”

एक बार रमेश ने शायद कुछ कहा जिसके जवाब में रीटा ने कहा- “शायद मेरी पैंटी में कुछ घुस गया है… चींटी या और कुछ? मैं टेनिस लान में घास पर बैठ गई थी तो…”

मेरे बेटा जरूर कुछ गन्दी बात बोला होगा, तभी तो रीटा ने कहा- “धत्त… गंदे कहीं के। अच्छा ठीक है, मैं पैंटी उतारकर अंदर देखती हूँ… तो मैं पांच मिनट बाद फोन करूँ?”

उसने हाँ कहा होगा तभी तो उसके बाद रीटा ने मेरे बेटे को फोन पर एक चुम्मी देकर फोन बन्द कर दिया और फोन को सोफे पर उछालते हुए मुझसे बोली- “पापा…”

मैं खड़ा हो गया और रीटा को अपनी बाहों में ले लिया।

रीटा भी मेरी छाती पर अपना चेहरा टिकाकर मुझे बाहों के घेरे में लेते हुए धीमी आवाज में बोली- “आप बहुत गन्दे हैं पापा…” कहकर उसने अपने कूल्हे आगे की तरफ धकेलकर मेरी पैन्ट के उभार पर अपनी योनि टिका ली थी।

मैंने अपने हाथों से उसका चेहरा ऊपर उठाया और उसके होंठों को चूमते हुए बोला- “हाँ। सही कह रही हो रीटा, मैं असल में बहुत गन्दा हूँ जान। अगर मैं गन्दा ना होता तो अपनी प्यारी बहू रीटा को मजा कैसे दे पाता?”

रीटा मेरी आँखों में झांकते हुए बोली- अगर रमेश को पता लगा तो क्या होगा?

मैंने उसके चूतड़ों को थपथपाते हुए कहा- “तुम बहुत समझदार हो जानम। तुम उसे हमेशा खुश और संतुष्ट रखोगी…” कहकर मैंने उसके होंठों को फिर चूमा, और बोला- “और मैं तुम्हें हमेशा खुश और संतुष्ट रखूँगा…”

रीटा- “मुझे पता है पापा…” कहकर उसने मुझे कसकर अपनी बाहों में जकड़ लिया, और कहा- “मैं रमेश से फोन पर बात कर रही थी और आप मुझे वहाँ चूम रहे थे। कितने उत्तेजना भरे थे ना वो पल? मैं तो बस ओर्गैस्म तक पहुँचने ही वाली थी…”

मैंने रीटा को सुझाव दिया- “अपना फोन उठाओ और बेडरूम में चलो। वहाँ जाकर आराम से रमेश से फोन पर बातें करना…”

रीटा खिलखिलाते हुए बोली- “मैं भी कुछ ऐसा ही सोच रही थी पापा…” फिर उसने मेरी आँखों में झान्कते हुए कहा- “पापा, मुझे सुमन मौसी ने बताया था कि आप किसी भी लड़की के मन की बात जान सकते हैं। अब मुझे पता लगा कि मौसी सही कह रही थी…”

हम दोनों खूब हंसे और हँसते-हँसते रीटा ने मेरी पैन्ट के उभार को अपनी मुट्ठी में पकड़ते हुए कहा- क्या मैं इस शरारती को देख सकती हूँ?

मैं- “हाँ बिल्कुल, यह तुम्हारा ही तो है…” कहकर मैंने फटाफट अपनी पैंट उतारी।

रीटा ने लपक कर नीचे बैठकर मेरा अन्डरवीयर नीचे खींच दिया। एक झटके से अन्डवीयर उरतने से मेरा सात इन्च लम्बा तने हुये लिंग ने जोर से उठकर सलामी दी, तो वो सामने बैठी रीटा के नाक से जा टकराया। रीटा जैसे घबरा कर पीछे हटी, फिर तुरन्त आगे बढ़कर उसने एक हाथ से मेरे लटकते अण्डकोषों को सम्भाला और बहुत हल्के से अपने होंठ लिंग की नोक पर छुआ दिए।

काफी समय से खड़े लण्ड को गीला तो होना ही था, उसके होंठ छुआने से मेरे लण्ड का लेस उसके होंठों पर लग गया और एक तार सी उसके होंठों और मेरे लण्ड की नोक के बीच बन गई।

रीटा ने दूसरे हाथ से मेरे लण्ड की लम्बाई को पकड़ा और अपने होंठों पर जीभ फिराती हुए बोली- “अम्मांह… बहुत प्यारा है…”

मैं- “जानू, तुम्हें पसन्द आया?” मैं थोड़ा आगे होकर फिर से अपने लण्ड को उसके होंठों पर रखते हुए बोला।

रीटा- “हाँ पापा…” कहते हुए उसने अपनी जीभ मेरे लिंग के अगले मोटे भाग पर फिराई। फिर एक लम्बी सांस भरकर उसे सूँघते हुए बोली- “और इसमें से कितनी अच्छी खुशबू आ रही है…”

मैंने उसे कन्धों से पकड़कर उठाया और कहा- चलो बिस्तर पर चलते हैं।

रीटा- “एक मिनट…” रीटा ने मेरी शर्ट ऊपर उठाकर उतार दी, फिर मेरे लण्ड को पकड़कर मुझे बिस्तर की तरफ खींचते हुए बोली- “अब चलो…”

अब हम दोनों बिल्कुल प्राकृतिक अवस्था में थे, मैंने उसके कूल्हे पर एक हाथ रखकर उसे बिस्तर की तरफ धकेलते हुए कहा- चलो।

हम दोनों बिस्तर पर आ गए, रीटा के हाथ में फोन था, वो बिस्तर पर अपनी टाँगें थोड़ी फैलाकर पीठ के बल लेट गई और अपनी जांघों के बीच में उंगली से इशारा करते हुए मुझसे बोली- “पापा, थोड़ा चाटो ना प्लीज…”

मैंने अपना चेहरा उसकी चिकनी जाँघों के बीच में टिका लिया और अपने होंठों में उसकी झाँटे दबाकर खींचने लगा।

रीटा- “ओह्ह… पापा, आप बाद में खेल लेना, मेरी… गीली हो रही है, एक बार मेरे अन्दर से चाट लीजिए…”

मैं थोड़ा सीधा हुआ और अपनी उंगलियों से बालों के जंगल में उसकी योनि के लबों को खोजने लगा, कहा- “तुम इन्हें साफ क्यों नहीं करती रीटा?”

रीटा- “रमेश को ऐसे ही पसंद है ना…”

मैंने रीटा को जांघों से पकड़कर ऊँचा उठाया तो उसकी योनि मेरे होंठों के पास थी और वो खुद अपने कन्धों के ऊपर टिकी हुई थी, उसका सिर और कन्धे बिस्तर पर शेष बदन मेरी बाहों में मेरे ऊपर था। मैंने अपने दोनों अंगूठों और दो साथ वाली उंगगियों से उसकी योनि के लबों को अलग-अलग किया तो अन्दर गुलाबी भूरी पंखुड़ियां कामरस से भीग कर आपस में चिपक गई थी। मैंने अपनी जीभ से उनपर लगे रस को चाटा और उनकी चिपकन हटाकर जीभ अन्दर घुसा दी। मेरी जीभ एक इन्च से ज्यादा अन्दर चली गई थी।

रीटा के मुख से निकला- “पापा… ओ पापा… आपका जवाब नहीं अम्मंअह…”

मेरी बहू रीटा के बदन और योनि की मिली-जुली गंध मेरी उत्तेजना को और बढ़ा रही थी।

तभी रीटा ने रमेश का नम्बर मिला दिया। रमेश ने एकदम से फोन उठाया, जैसे वो रीटा के फोन का ही इन्तजार कर रहा था, वो भी अपनी पत्नी से काम-वार्ता को उत्सुक लग रहा था। मेरी चतुर बहू ने फोन का लाउडस्पीकर आन कर दिया ताकि मैं भी उन दोनों की पूरी बात सुन सकूँ।

रमेश ने पूछा- बताओ कि क्या हुआ था?

रीटा हँसते हुए बोली- वही हुआ था जानू। मेरी पैंटी में चींटी घुस गई थी, वो तो शुक्र है कि काली वाली थी, अगर कहीं लाल चीटी होती तो पता नहीं मेरा क्या हाल होता?

रमेश- “तुम्हारा या तुम्हारी चूत का?” मेरे बेटे ने पूछा।

रीटा- “हाँ हाँ… चूत का। पता है कि मैंने चीटी को कहाँ से निकाला?”

रमेश- “कहाँ से?”

रीटा- “बिल्कुल क्लिट के ऊपर से…”

रमेश- “ओह्ह… साली चीटी, मेरी घरवाली की चूत का मजा ले रही थी? रीटा… तुमने अच्छी तरह देख तो लिया था ना कि वो चीटी ही थी? कहीं चीटा हुआ तो? और उसने तुम्हें… हाँ… हाँ…”

रीटा- “सुनो रमेश, इस समय मैं बिल्कुल नंगी बिस्तर में लेटी हुई हूँ और उस जगह को रगड़ रही हूँ जहाँ उस चीटी… ना… ना… उस चीटे ने मुझे काटा था…”

रमेश- “ओअह्ह… तो तुम अपने हाथ से अपनी क्लिट मसल रही हो? अपनी फुद्दी में उंगली कर रही हो?”

रीटा- “हाँ मेरे यार… अगर तुम होते तो उंगली की जगह तुम्हारा लौड़ा होता, और तुम्हारा लण्ड मेरी चूत की खुजली मिटा रहा होता…” मेरी चालू बहू ने कहा- “लेकिन अभी तो मुझे सिर्फ़ उंगली से ही गुजारा करना पड़ेगा…”

रमेश- “और वो डिल्डो कब काम आएगा जो हमने पेरिस में खरीदा था? तुम उसे इश्तेमाल करो ना…” मेरे बेटे ने सुझाव दिया।

रीटा- “अरे हाँ… वो तो मैं भूल ही गई थी। अभी निकालती हूँ उसे…” रीटा ने मुश्कुराते हुए मेरी तरफ देखा और फिर फोन के माइक को हाथ से ढकते हुए मुझसे फुसफुसाई- “आप ही मेरे डिल्डो हो आज। घुसा दो अपना डिल्डो मेरे अन्दर। मैं आपके बेटे से कहूँगी कि मैंने डिल्डो ले लिया अपने अन्दर…” कहकर मेरी समझदार बहू ने कनखियों से मुझे देखा और फिर कुछ देर बाद फोन में बोली- “हाँ जानू, ले आई मैं। डाल लूँ अन्दर?”

रमेश- “हाँ… हाँ… घुसा ले ना। पूरा बाड़ना…”

रीटा ने मुझे इशारा किया कि अब घुसाना शुरू करो।

रीटा- “लेकिन रमेश, यह तो बहुत बड़ा है। मेरी चूत जरा सी है, यह कैसे पूरा जाएगा अन्दर?” उसने सिसियाते हुए कहा।

रमेश- “अरे चला जाएगा रानी… पूरा जाएगा… तू कोशिश तो कर। बड़ा है तभी तो तुझे असली मजा आएगा ना… घुसाकर देख। सुमन मौसी के पास तो इससे भी बड़ा डिल्डो है। तुमने तो देखा है कि वो कैसे चला जाता है मौसी की चूत में…”

रीटा- “अरे, सुमन मौसी की चूत को तो तुम्हारे पापा ने चोद-चोदकर फुद्दा बना रखा है। मौसी बता रही थी ना कि तुम्हारे पापा का तुमसे भी बड़ा है। चलो… फिर भी कोशिश करके देखती हूँ…”

मैं तो रमेश और रीटा का वार्तालाप सुनकर हतप्रभ रह गया। मैं तो खुद को ही चुदाई का महान खिलाड़ी समझ रहा था, पर यहाँ तो सभी एक से बढ़कर एक निकल रहे हैं। लेकिन परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि मैं कुछ ना कह पाया और चुपचाप मैंने बिल्कुल शान्ति से बिना कोई आवाज किए रीटा की जाँघों को फैलाया और अपने लिंगमुण्ड को योनि के मुख पर टिका।

तो रीटा ने लिंगदण्ड को अपने हाथ में पकड़ा और उसे अपने अन्दर सरकाने का यत्न करने लगी। रीटा की चूत खूब गीली होकर चिकनी हो रही थी, उसने मेरे लिंग के सुपाड़े को अपनी योनि-लबों के बीच में रगड़कर उन्हें फैलाया और मेरे हल्के से दबाव से मेरा सुपाड़ा अन्दर फिसल गया।

रीटा- “अओह… हाँ… आ… अई…” रीटा ने जोर से एक चीख मारी।

उधर से आवाज आई रमेश की- “वाह रीटा… बहुत अच्छे, कितना अन्दर गया?

रीटा- “ऊओह… रमेश, अभी तो बास आगे का मोटा सा नाब ही अन्दर घुसा है… उफ़्फ़् कितना मोटा है यह? तुम्हारे लण्ड से तो डेढ़ गुना मोटा और शायद डेढ़ गुना ही ज्यादा लम्बा है यह…” रीटा मेरी आँखों में झांकते हुए बोली।

और फिर एक बार माइक को हाथ से ढकते हुए फुसफुसाई- “मैं सही कह रही हूँ पापा। आपका सच में रमेश के से ड्योढ़ा तो है ही…”

इस बात से बिल्कुल बेखबर कि उसकी पत्नी उसके पिता के लण्ड की बात कर रही है, रमेश ने उसे और अंदर तक घुसाने के लिये उकसाया- “और अन्दर तक ले ना रीटा। पूरा अन्दर घुसा ले…”

रीटा- “हाँ मेरे राजा हाँ…” रीटा हांफते हुए से बोली और मुझे अपना लण्ड उसकी चूत में और अन्दर घुसाने के लिए इशारा किया।

मैंने अपनी जांघों को एक झटका दिया और मेरा आधे से ज्यादा लौड़ा मेरी बहू रीटा की चूत के अन्दर था।

रीटा- “ओह्ह माँ… मर गई मैं… पापा जी आह्ह… मम्मा…” रीटा जोर से सीत्कारते हुए असली दर्द से चिल्लाई तो उसके मुँह से पापा निकल गया। और शायद अपनी इस भूल को छिपाने के लिये बाद में मम्मा बोली थी।

उधर मेरे बेटा खिलखिलाकर हँसते हुए बोला- “अपने मम्मी-पापा को क्यों बुला रही हो? बुलाना है तो मेरे पापा को बुला ले ना… तेरी फाड़कर रख देंगे वो…”

रीटा- “हट बेशरम… गन्दे कहीं के। तुम्हारे पापा क्या फाड़ेंगे मेरी चूत। अब तो बुड्ढे हो गये वो…” मेरी तरफ तिरछी नजर से देखकर आँख मारते हुए रीटा बोली।

रमेश- “अरे, इस गलतफहमी में मत रहना। मेरे पापा का लौड़ा इस डिल्डो का भी बाप है…”

रीटा- “तो सुनो रमेश। अब मैं यह कल्पना कर रही हूँ कि मेरी चूत में यह डिल्डो नहीं, तुम्हारे पापा का लौड़ा है…”

रमेश खिलखिलाया- “ठीक है। तुम यही सोचकर डिल्डो से चुदो कि तुम मेरे पापा से चुद रही हो। मैं भी सुनूँ कि मेरी रानी कैसे चुदती है अपने ससुर से?” रमेश इस मजाक पर मजा लेकर खूब जोर से हँसा।

रीटा ने एक वासना भरी सिसकारी लेते हुए कहा- “अब मैं अपनी आँखें बन्द करके तुम्हारे पापा को अपने अन्दर महसूस कर रही हूँ। वो अब मेरे नंगे बदन के ऊपर लेटे हुए हैं, उनका लण्ड मैं अपनी चूत में महसूस कर रही हूँ, पापा के हाथ मेरी चूचियों पर हैं…”

अब रीटा ने मेरी तरफ अधीरता से देखा- “हाँ पापा, और पेलिये ना… रुक क्यों गये? घुसाइए, पूरा बाड़ दीजिए… अपने मोटे लौड़े से अपने बेटे की पत्नी की चूत की धज्जियां उड़ा दीजिए…”

मुझे फोन पर अपने बेटे की वासना भरी सिसकारती आवाज सुनाई दी- “ओह्ह… मेरी रानी, तुमने मेरा लण्ड पूरा सख्त कर दिया। क्या कल्पना की है तुमने?”

रीटा ने बोलना जारी रखा- “नील… तुम सही कह रहे थे… तुम्हारे पापा का लण्ड सच में लाजवाब है। इसने मेरी बुर फैलाकर रख दी है, और यह अभी भी थोड़ा मेरी फुद्दी से बाहर दिख रहा है…”

तब रीटा ने मुझे देखते हुए कहा- “पेलिये ना अपना पूरा लौड़ा मेरी चूत के अन्दर पापा। यह बाकी क्या मेरी ननदों के लिए बचा कर रखा हुआ है? पापा आप बड़े हरामी हैं। आपने अपनी दोनों सालियों की चूत फाड़ी और

अब अपनी बहू की फुद्दी को भी नहीं छोड़ा। आपको शर्म आनी चाहिए पापा। आप बहूचोद बन गए…”

उधर रमेश सुन-सुनकर पागल हुए जा रहा था। फोन पर उसकी आह्ह… ऊह्ह… साफ-साफ सुनाई दे रही थी।

रीटा- “जब आपने अपने बेटे की दुल्हन पर हाथ साफ कर ही दिया तो अब अपना पूरा लौड़ा दे दीजिए ना उसे…”

रमेश उधर से बोला- “अरे रीटा, दरवाजे खिड़कियां तो अच्छी तरह बन्द कर लिए थे ना? पापा घर में ही होंगे। कहीं उन्होंने यह सब सुन लिया तो वे सच में ही ना…”

रीटा- “घबराओ मत डार्लिंग…” मेरी शातिर बहू ने उत्तर दिया- “कोई भी गैर मर्द हमारी बातें नहीं सुन सकता…”

रमेश- “रानी… तुम्हारी कल्पना शक्ति नायाब है। मेरा लौड़ा तो तुम्हारी बातें सुनकर ऐसे टनटना गया कि क्या बताऊँ…”

रीटा- “अरे रमेश राजा… यह तो अभी शुरूआत है। आगे-आगे देखो कि तुम्हारा चुदक्कड़ बाप अपनी बहू को कैसे-कैसे चोदता है…”

रमेश- “ठीक है रीटा… अपनी कल्पना चालू रखो, और चुदो मेरे पापा से। उनसे कहो कि तुम्हारी पूरी तसल्ली कर दें…”

अब रीटा ने अपनी चूचियों की तरफ इशारा करते हुए कहा- “पापा मेरी चूचियां अपने मुँह से चूसो ना…”

मैंने रीटा की चूचियों को आपस में इस तरह दबाया कि उनके निप्पल पास पास हो जाएं और फिर मैंने दोनों चुचूकों को एक साथ अपने मुँह में ले लिया।

रीटा चहकी- “अबे ओ रमेश, देख तेरा बाप कैसे मेरे दोनों निप्पल एक साथ चूस रहा है। देख कैसे सालीचोद अपनी बहू की चूचियां चूस-चूसकर उसे चोद रहा है अपने मोटे लौड़े से…”

रमेश से अब बर्दाश्त नहीं हो रहा था, बोला- “आज तुम मुझे मार ही दोगी रीटा। मैं यहाँ अपने आफिस में बैठकर मुट्ठ मार रहा हूँ। पर रुकना मत। तुम बहुत बढ़िया ड्रामा कर रही हो…”

रीटा- “आई पापा, काटो मत… दुखता है…” जैसे ही मैंने रीटा के एक निप्पल को अपने दाँतों से काटा तो वो चिल्लाई- “पापा… ये अक्षरा या सुमन मौसी के नहीं मेरे चुचूक हैं। इन्हें प्यार से चूसो, और मेरे होंठों को भी तो चूसो पापा। अपनी जीभ मेरे मुंह में डालकर मेरे मुँह की चुदाई करो…”

फिर रीटा ने रमेश से कहा- “सुनो रमेश, तुम्हारे पापा अब मेरी चुम्मी ले रहे हैं…” और सच में रीटा ने ऐसी आवाजें निकाली जैसी चूमा-चाटी में आती हैं। और मैं यह सोच रहा था कि कितनी शैतान दिमाग की है मेरी बहू। अपने ससुर से सच में चुद रही है और अपने पति को फोन पर अपनी चुदाई का आँखों देखा हाल सुना रही है। कैसे बाप बेटे दोनों को एक साथ सेक्स का मजा दे रही है। अब वो खुलकर सिसकारियां भर रही थी, आनन्द से चीख रही थी, खुलकर मुझसे चुद रही थी बिना किसी डर के।

मुझे लग रहा था कि वो अब उस शिखर पर पहुँच रही है जिसे प्राप्त करने के लिये उसने इतने पापड़ बेले थे। अपनी बहू के चरमोत्कर्ष का भान होते ही मेरे अन्दर भी जैसे एक ज्वालामुखी फटने को हुआ और मेरा लण्ड और गर्म हो गया और फूलने लगा।

मेरे लण्ड की यह हलचल मेरी बहू रीटा ने भांप ली और वो फोन पर बोली- “रमेश, तेरे पापा मेरी चूत में झड़ना चाहते हैं, क्या करूँ? झड़ने दूँ अन्दर या बाहर निकालने को कहूँ?”

मेरे बेटे ने आनन्द से कहा- “रीटा, झड़ने दे पापा को अपनी चूत में ही…”

रीटा- “मगर मेरे को बच्चा ठहर गया तो?” फिर आगे बोली- “फिर तो मेरी चूत से तुम्हारा भाई पैदा हो जाएगा। सोच लो?”

रमेश खुलकर हंसा, फिर बोला- कोई बात नहीं। तू अपनी चूत से मेरा भाई पैदा कर या मेरा बेटा। जोरू तो तू मेरी ही रहेगी ना…”

रीटा- “तो ठीक है…”

फिर रीटा मुझे देखते हुए और अपने पति को सुनाते हुए बोली- “पापा, आपके बेटे ने मुझे इजाजत दे दी कि मैं अपनी फुद्दी में से उसका भाई पैदा करूँ। आप मेरे गर्भ में अपना बीज बो दीजिए। मेरी चूत अपने वीर्य के सराबोर कर दीजिए। मुझे गर्भवती कर दीजिए, मुझे मेरे पति के भाई की माँ बना दीजिए…” ऐसा कहते हुए रीटा ने अपने पैर बिस्तर पर टिकाकर अपने कूल्हे ऊपर झटकाए ताकि मेरा पूरा लण्ड उसकी चूत की पूरी गहराई में जाकर अपना बीज छोड़ सके।

फिर जानबूझ कर जोर से चीखते हुए भद्दी आवाज में बोली- “आह्ह… पापा, आपने मुझे चोद दिया आज। चुदाई का इतना मजा मुझे कभी नहीं मिला। मुझे आपसे प्यार हो गया है पापा। मुझे आपके लौड़े से प्यार हो गया है पापा। अब से रमेश के सामने मैं आपकी बहू हूँ और रमेश के पीछे आपकी रखैल…” यह बोलते-बोलते रीटा एक बार फिर झड़ गई।

और साथ ही मेरे लण्ड ने अपना झरना उसकी योनि के सबसे गहरे स्थान में बहा दिया।

उसने मुझे अपनी बाहों में जोर से जकड़ लिया और चिल्लाई- “रमेश… देखो… तुम्हारे पापा ने अपना वीर्य मेरी चूत में छोड़ दिया। तेरे बाप ने मुझे चोद दिया…”

मैं फोन की दूसरी तरफ से अपने बेटे की वासना भरी सिसकारियां सुन पा रहा था, जाहिर था कि वो मुट्ठ मार रहा था। मैं बड़े आराम से यह अनुमान लगा सकता था कि आज का दिन मेरे लिए, मेरे बेटे के लिये और सबसे ज्यादा मेरी बहू रीटा के लिए पूरे जीवन में कभी ना भूलने वाला दिन होगा।

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***** THE END समाप्त *****
 
बात अक्टूबर, 2012 की है जब मैं अपनी बुआ की लड़की की शादी मैं गाज़ियाबाद गया हुआ था. मुझे शादी का माहौल बहुत पसन्द है, जी भर के मौज-मस्ती, खाना-पीना, नए लोगों से मिलना और सबसे खास चीज़…’कट्टो’.

मेरे मम्मी-पापा भी साथ में थे. हम रेलगाड़ी से गाज़ियाबाद पहुँचे, फिर हमने घर जाने के लिये ऑटो लिया और घर की तरफ़ रवाना हुए. जब हम गली के सामने पहुँचे तो हमने देख़ा कि बुआ का लड़का संजू हमारे स्वागत के लिये गली के मोड़ पर ख़ड़ा है. उसने ऑटो को रुकवा लिया और कहने लगा- अभी आप घर नहीं जा सकते.

तभी बुआ और फ़ूफ़ा भी वहाँ पहुँच गये, उनके साथ एक आंटी भी आई थी. उस आंटी को मैंने पहले कभी नहीं देख़ा था, क्या मस्त माल थी यार, एकदम गोरी-चिट्टी, भरा-पूरा बदन और एकदम कातिल मुस्कराहट और साड़ी में एकदम कयामत लग रही थी.

पर यह हमारी कहानी की कट्टो नहीं है, उसके लिये ज़रा इन्तजार कीजिये. फिर मैं अपने सोच के सागर से बाहर आया…

मैंने बुआ-फ़ूफ़ा के पैर छूकर नमस्ते की और आंटी को भी नमस्ते की.

बुआ ने कहा- अभी आप सब घर नहीं जा सकते, पहले भात की रस्म होगी उसके बाद ही घर जा सकते हो.

मैंने कहा- बुआ जी, फिर क्या तब तक हमें सड़क पर ही खड़ा रख़ोगी?

बुआ- नहीं बेटा, रस्म तो शाम को होगी. तब तक आप सब इनके घर पर रुकोगे, बुआ ने आंटी की तरफ़ इशारा किया.

फिर हम सब बुआ के साथ आंटी के घर की तरफ़ चल पड़े. आंटी का घर बुआ के घर से थोड़ा पहले उसी गली में था. हम आंटी के घर पहुँचे, आंटी ने हमे गैस्ट रूम में बिठाया. कमरे में एक सोफ़ा सैट, एक पलंग, एक डाईनिंग टेबल और कुछ कुर्सियाँ रखी हुई थी. हम सभी उसी कमरे में बैठ गये और आपस में बातें करने लगे.

आंटी अन्दर चली गई और थोड़ी देर बाद नाश्ता लेकर आईं, जब वो आई तो मेरी आँख़ें फ़टी की फ़टी रह गई. अब आप सोच रहे होंगे कि मैंने ऐसा क्या देख़ा…

आंटी के साथ एक लड़की थी जो कि चाय की ट्रे लिये हुए हमारी तरफ़ आ रही थी. मम्मी के पूछने पर आंटी ने बताया कि वो उनकी बेटी है…पूजा!

हमारी कहानी की कट्टो!

पूजा 18 साल की कमसिन जवान लड़की थी, वो ‘बी सी ए’ प्रथम वर्ष में थी. उसकी आँख़ें बड़ी शरारती थी, बालों को बांध कर जूड़ा बनाया हुआ था जिससे वो बहुत कामुक लग रही थी, उभरे हुए स्तन, गुलाबी होंठ, आँख़ों में सुरमा. उसने गुलाबी रंग का सूट पहना हुआ था और उस पर जालीदार दुपट्टा, एकदम परी लग रही थी.

मैं काफ़ी देर तक उसे देख़ता रहा, मेरा ध्यान तब टूटा जब उसने मुझे चाय लेने को कहा, तब जाकर मुझे होश आया कि वहाँ सभी बैठे हुए थे.

मैंने एक मुस्कान के साथ चाय का कप पकड़ा और उसने भी एक कातिल मुस्कराहट दी. फिर पूजा वहाँ से चली गई. नाश्ते के बाद पापा, फ़ूफ़ा जी के साथ बाहर चले गये, बुआ-मम्मी-आंटी आपस में बातें करने लगीं. मैं वहाँ बैठा-बैठा बोर हो रहा था, मेरे दिमाग में तो पूजा नाम की परी घूम रही थी.

तभी आंटी ने मुझे देखकर एक कातिल मुस्कान के साथ कहा- क्या हुआ बेटा? तुम्हारा मन नहीं लग रहा क्या, मैंने भी एक मुस्कान दी पर कुछ नहीं बोला.

तभी आंटी ने आवाज़ लगाई- मोनू… मोनू…!

एक करीब 13-14 साल का लड़का कमरे में आया.

आंटी- यह मेरा बेटा है…मोनू!

मम्मी- आपके कितने बच्चे हैं?

आंटी- दो… एक लड़का और एक लड़की मोनू और पूजा.

फिर आंटी ने मोनू से कहा- जाओ भईया, को अपने कमरे में ले जाओ!

मोनू ने मुझसे कहा- आईए भईया!

मैं उसके पीछे-पीछे चल दिया. हम सीढ़ियों से होते हुए ऊपर वाली मंजिल पर पहुँच गये. वहाँ आमने-सामने दो कमरे बने हुए थे, बीच में थोड़ी जगह खाली थी, और एक तरफ़ तीसरा कमरा था. उससे उपर वाली मन्जिल पर सिर्फ़ एक ही कमरा था. यह सब मैं आप सब को इसलिए बता रहा हूँ ताकि आप लोग अपनी कल्पना को अच्छी तरह उभार कर कहानी का पूरी तरह मजा ले सको.

तो बीच वाली मन्जिल पर जो आमने-सामने के कमरे थे, उनमे से एक मोनू का था और उसके सामने वाला उसकी बहन पूजा का. मोनू मुझे अपने कमरे में ले गया और मुझे बैठने को कहा, उसने टीवी ऑन किया और म्यूज़िक चैनल पर लगा दिया. मैंने देखा कि टीवी के पास में प्ले-स्टेशन (विडियो गेम) रखा हुआ था, तो मैंने उससे पूछ लिया- मोनू तुम्हें गेम्स पसंद हैं क्या?

मोनू- हाँ… मुझे विडियो गेम्स खेलना बहुत अच्छा लगता है, क्या आप खेलेंगे मेरे साथ?

मैं- नहीं मोनू, मैं तो बस यूँ ही पूछ रहा था.

फिर मोनू बच्चों की तरह ज़िद करने लगा- प्लीज भईया एक-एक मैच, मैं फ़ाइटिंग की डी-वी-डी लेकर आता हूँ, इतन कहकर वो नीचे चला गया. तभी मैंने सामने पूजा के कमरे की ओर देखा जिसका दरवाज़ा बंद था. मैंने सोचा कि पूजा के कमरे में जाकर उससे मिलना चाहिए, अब वो अकेली भी है, फिर मुझे लगा कि कहीं उसे इस तरह बुरा ना लगे.

तभी मुझे मोनू के ऊपर आने की आवाज़ आई, मैं टी-वी की तरफ मुँह करके बैठ गया. तभी मोनू कमरे में आया और मुझे डी-वी-डी दिखाने लगा, फिर उसने प्ले-स्टेशन ऑन किया और डी-वी-डी लगा दी. वो ड्ब्लू-ड्ब्लू-ई की डी-वी-डी थी, हमने अपने-अपने प्लेयर चुने और शुरु हो गये.

उसने प्ले-स्टेशन के साथ कम्प्यूटर के स्पीकर जोड़ दिये थे, जिससे बहुत तेज़ आवाज आ रही थी. हम दोनों बड़े उत्साह के साथ खेल रहे थे, और मोनू जोर-जोर से चिल्ला रहा था. पूजा का कमरा पास होने के कारण उस तक बहुत शोर जा रहा था.

थोड़ी देर के बाद पूजा ने कमरे का दरवाज़ा खोला और कमरे में घुसते ही मोनू पर चिल्लाई- इतना शोर क्यो कर रहे हो, तुम्हारे इस शोर की वजह से मैं पढ़ नहीं पा रही हूँ.

मोनू ने पूजा और मेरा परिचय करवाया…

मोनू- आप भी हमारे साथ खेलो ना दीदी, बहुत मजा आ रहा है.

मैं पूजा से- जी बिल्कुल, अगर आप भी हमारे साथ खेलेंगी तो और भी मजा आएगा.

…इससे पूजा का गुस्सा कुछ कम हुआ.

पूजा मुस्कराती हुई- जी नहीं… मुझे पढ़ाई करनी है.

मोनू- प्लीज़ दीदी, थोड़ी देर के लिये खेलो ना.

पूजा- ठीक है बाबा लेकिन सिर्फ़ थोड़ी देर के लिये ही खेलूँगी.

मोनू- तो दीदी तैयार रहिये, अगली बारी आपकी है.

मोनू हम दोनों के बीच में बैठा हुआ था, मोनू और मैं खेल रहे थे लेकिन मेरा ध्यान गेम की तरफ़ कम और पूजा की तरफ़ ज्यादा था. मेरा प्लेयर बुरी तरह पिट रहा था, पूजा खिलखिला कर हंस रही थी.

फिर उसने मेरी तरफ़ देखकर कहा- समीर जी, आपको तो खेलना ही नहीं आता.

मैंने कहा- मोनू बहुत अच्छा खेल रहा है, इसलिए मैं हार रहा हूँ, उसे क्या पता था कि मैं उसी की वजह से हार रहा हूँ.

तभी किसी ने कमरे का दरवाज़ा खटखटाया, पूजा ने जाकर देखा.

पूजा- मोनू, तुम्हारा दोस्त आया है.

मोनू- मैं अभी आता हूँ.

मोनू ने अपने दोस्त से कुछ बातें की, फिर कहा- मैं अपने दोस्त के साथ जा रहा हूँ, आप दोनों खेलो. इतना कह कर वो दरवाज़ा बंद करके चला गया.

इतनी जल्दी हुई इस गतिविधि से मेरी तो बांछें खिल गईं थी, मुझे कहाँ पता था कि मुझे इतनी जल्दी मौका मिल जाएगा पूजा से अकेले में मिलने का. मैंने पूजा की तरफ़ देखा तो उसने शरमा कर मुँह नीचे कर लिया और मुस्कराने लगी.

उसकी ये अदायें देखकर मैंने धीरे से अपने आप से कहा- बेटा समीर…अब तो लौंडिया फ़ंसी समझो.

पूजा- कुछ कहा आपने…

मैं झिझकते हुए- नहीं… नहीं तो, कुछ भी तो नहीं.

मैं फ़िर से- बड़े तेज़ कान हैं साली के.

पूजा- आपने फिर कुछ कहा…

मैं- मैं… वो मैं कह रहा था कि खेल शुरु करते हैं.

पूजा- प्लीज़ रहने दीजिये ना मेरा मन नहीं है, चलिये ना कोई मूवी देखते हैं.

मैं- ठीक है, जैसी आपकी मर्ज़ी…

पूजा ने टी-वी ओन किया और चैनल बदल-बदल कर देखने लगी, कुछ देर बाद उसने टीवी बंद कर दिया.

मैं- क्या हुआ…?

पूजा- कोई भी ढंग की फ़िल्म ही नहीं आ रही, चलो, मैं आपको अपने लैपटोप पर फ़िल्म दिखाती हूँ.

मैं- ठीक है, आप यहीं पर ले आओ.

पूजा- आइये ना मेरे कमरे में ही चलते हैं.

मैं फ़िर खुद से- लगता है साली चुदने के लिए बड़ी उतावली हो रही है..!!

पूजा- आपने फिर कुछ कहा…

मैं- कुछ नहीं चलिए…

फ़िर हम दोनों पूजा के कमरे में गये, कमरे में बहुत अच्छी खुशबू फ़ैली हुई थी. गद्देदार बैड… मानो हम दोनों को सम्भोग के लिए बुला रहा हो. कमरे में एक ओर पढ़ाई की मेज और दो कुर्सी रखी हुई थीं, एक कोने में किताबों का रैक रखा हुआ था, एक कपड़ों की अलमारी और बैड के साथ में एक सोफ़ा चेयर रखा हुआ था. पूजा ने मेज पर रखी किताबों को रैक में रख दिया और अलमारी का लॉक खोल कर उसमें से लैपटोप निकाला.

मैं- आप लैपटोप को अलमारी में क्यों रखती हो?

पूजा- मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है कि कोई मेरी चीज़ों को हाथ लगाये, खास कर के मेरे लैपटोप को, मैं इसे कभी भी किसी के साथ साँझा नहीं करती इसीलिए मैं इसे अलमारी में रखती हूँ.

मैं- फ़िर आप मुझे क्यों दिखा रहीं हैं?

पूजा- आप तो…हमारे खास मेहमान हैं!

इतना कहकर वो कातिल मुस्कान बिखेरने लगी.
 
मैं भी मुस्कराकर- फ़िर… चलो ना अब दिखा भी दो.

पूजा चौंकते हुए- क्या…

मैं- वही… जिसके लिये आप मुझे अपने कमरे में लाई हो.

पूजा- मैं तो आपको फ़िल्म दिखाने लाई हूँ.

मैं- तो… मैं भी तो फ़िल्म दिखाने के लिए ही तो कह रहा हूँ.

पूजा- आपकी हंसी तो कुछ और ही बयान कर रही है.

मैं- हंस तो आप भी रही हो मैडम, आपकी हंसी का क्या राज़ है?

पूजा- मैं तो… बस यूं ही.

तभी नीचे से आंटी की आवाज़ आई- पूजा…!!

पूजा कमरे से बाहर निकलकर- हाँ मम्मी…?

आंटी- नीचे आ… थोड़ा काम है.

पूजा- मैं अभी थोड़ी देर में आती हूँ.

इतना कहकर वो नीचे चली गई.

पूजा के जाने के बाद मैंने सोचा क्यों न जब तक पूजा आती है तब तक लैपटोप की जांच-पड़ताल कर ली जाए. दूसरों के कम्प्यूटर की खोजबीन करने में मुझे बड़ा मजा आता है. मैंने लैपटोप ऑन किया लेकिन पूजा ने लैपटोप पर पासवर्ड लगा रखा था. मैंने पासवर्ड खोलने की कोशिश की, सबसे पहले मैंने पूजा का नाम डाला फिर पूजा रानी और तरह-तरह के शब्दों का प्रयोग किया लेकिन मेरा डाला गया कोई भी पासवर्ड सही नहीं निकला.

फिर मेरे दिमाग में एक शब्द आया- ‘शोना’

लड़कियों को यह शब्द बहुत पसंद है तो मैंने पासवर्ड में शोना डाला और लैपटोप का पासवर्ड खुल गया. मैंने अपने आप को शाबाशी दी और लगा लैपटोप का मुआयना करने. मैंने सोचा कि पूजा एक कामुक लड़की है, अभी-अभी उसने जवानी में कदम रखा है, अपना लैपटोप सबसे छुपा कर रखती है तो पक्का उसके लैपटोप में रेलगाड़ी होगी. अब आप लोग सोच रहे होगें कि लैपटोप में कौन-सी रेलगाड़ी होती है, दोस्तों मैं सैक्सी फ़िल्म की बात कर रहा हूँ. मैं और मेरे दोस्त इसे रेलगाड़ी कहते हैं. हम लोगों ने शाहिद कपूर की फ़िल्म ‘इश्क विश्क’ देखी थी, उसमे सैक्सी फ़िल्म को रेलगाड़ी की संज्ञा दी गई थी, बस तभी से हम लोग भी इसे रेलगाड़ी कहने लगे.

मैं लैपटोप में पड़ी फ़ाइलों के विशाल संग्रह में रेलगाड़ी ढूँढने लगा लेकिन काफ़ी कोशिशों के बाद भी मुझे सफ़लता नहीं मिली. फिर मेरे दिमाग की बत्ती जली और मैंने पहले खोली गई फ़ाईलों का संग्रह निकाला, पहले खोली गई फ़ाईलों की सूची मेरे सामने थी. तभी मैंने एक फ़ाईल को खोला तो मेरे होश उड़ गये, मेरे सामने रेलगाड़ी चलने लगी.

फ़िल्म चलते ही उसमें से कामुक आवाज़ें आने लगी तो मैंने घबरा कर उसे बंद कर दिया कहीं कोई सुन न ले. मैं बहुत खुश था और साथ में आश्चर्य चकित भी. पूजा ने उन फ़ाइलों को बड़ी ही चालाकी से छुपा रखा था, उसने उन फ़ाइलों को विंडोज वाली जगह पर डाल रखा था और उनके नाम की जगह गिनती (1,2,3,4…) डाल रखी थीं. पर उसने एक बहुत बड़ी गलती की थी कि पिछली फ़ाइलों को ना देख पाने का विकल्प नहीं चुना जिसके कारण उसका राज़ खुल गया और मुझे रेलगाड़ी ढूँढने में सफ़लता हासिल हुई.

और आप लोगों को भी यह जानकर हैरानी होगी कि उस लैपटोप में फ़िल्मों का संग्रह 35 जी-बी का था, मैंने इतना बड़ा संग्रह पहले कभी नहीं देखा था.

इतना बड़ा संग्रह देखकर मेरे अंदर रेलगाड़ी देखने की तीव्र इच्छा होने लगी. पहले मैंने कुछ सावधानी बरतने की सोची, मैं कमरे से बाहर निकला और सीढ़ियों से नीचे की ओर देखा के कोई आ तो नहीं रहा, फिर मैंने सोचा के नीचे चल कर देखता हूँ कि पूजा क्या कर रही है और उसे कितना वक्त लगेगा आने में. मैं पानी पीने के बहाने से नीचे गया, सीढ़ियों से उतर कर मैं अंदर की तरफ गया.

मैंने आंटी को आवाज़ दी तो सामने वाले कमरे में से आंटी की आवाज़ आई- आओ समीर अंदर आ जाओ.

मैं कमरे के अंदर गया तो मैंने देखा कि आंटी बैड की चादर बदल रही थीं, उन्होंने चुन्नी नहीं डाली थी और झुकने से उनकी चूचियाँ साफ-साफ दिख रही थीं, एक दम गोरी-गोरी, मोटी-मोटी और रसीली.

मैं कुछ देर तक उनकी चूचियों को ही निहारता रहा. यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं.

आंटी एक शरारती मुस्कान के साथ बोली- बोलो समीर कुछ चाहिए क्या?

शायद उन्होंने मेरी हरकत को देख लिया था.

मैं (मन में)- चाहिए तो बहुत कुछ, आप क्या-क्या दे सकती हैं.

आंटी- क्या…

मैं- वो… आंटी जी मुझे पानी चाहिए.

आंटी- तो इतनी सी बात के लिए झिझक क्यों रहे हो बेटा, इसे अपना ही घर समझो, जाओ रसोई में फ़्रिज रखा है वहाँ से पी लो.

मैं (मन में)- आंटी जी, मैंने जिस चीज़ के नजारे लिए हैं उसे देखकर तो कोई भी झिझकने लगेगा.

मैं- ठीक है आंटी जी…

मैं रसोई की तरफ़ जाते हुए (अपने आप से)- अबे कमीने…या तो माँ को पटा ले या बेटी को, किसी एक की तरफ ध्यान दे. भाई समीर हमें तो चूत चाहिए, जो खुश होकर दे देगी उसी की ले लेंगे चाहे फिर माँ हो या बेटी हमे क्या फर्क पड़ता है. अबे यार… तू बड़ा कमीना इन्सान है.

रसोई में जाकर देखा तो पूजा बर्तन धो रही थी.

पूजा- अरे समीर आप, कुछ चाहिए क्या.

मैं- हाँ वो… मैं पानी पीने के लिए आया हूँ.

पूजा- फ़्रिज से निकाल कर पी लो.

मैं फ़्रिज से पानी की बोतल निकाल कर पानी पीने लगा, फिर उसे वापस फ़्रिज में रख दिया.

पूजा- सॉरी समीर, मैं तुम्हें अकेला छोड़ कर आ गई, मम्मी ने रसोई का काम दे दिया, तुम बोर हो गए होगे ना.

मैं- नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है.

पूजा- मुझे अभी शायद आधा घण्टा और लगेगा, तुम लैपटोप चला लो, उसका पासवर्ड शोना है.

मैं- थैंक्स…

उस बेचारी को क्या पता था कि समीर द ग्रेट ने उसके लैपटोप का पासवर्ड पहले ही खोल दिया है और उसके सारे राज़ मेरे सामने आ चुके हैं. फिर मैं ऊपर कमरे में आ गया और दरवाज़ा बंद कर लिया लेकिन कुंडी नहीं लगाई क्योंकि अगर पूजा को इस तरह दरवाज़ा बंद मिलता तो उसे शक हो सकता था कि कुछ गड़बड़ है.

मैंने लैपटोप को मेज पर रखा और कुर्सी पर बैठ गया. मैं उन फ़िल्मों को खोल-खोलकर देखने लगा कि उनमें से कौन सी सबसे अच्छी है. फिर मैंने उनमें से एक क्सक्सक्स फ़िल्म चुनी देखने के लिए.

यह फ़िल्म एक लड़की और उसके ट्यूशन मास्टर की थी, लड़की की उम्र करीब 18 साल और मास्टर की उम्र करीब 35 साल की थी. लड़की सोफे पर बैठी हुई थी और उसके बगल में उसका मास्टर. मास्टर एक किताब में से उसे कुछ पढ़ा रहा था पर लड़की का ध्यान किताब में नहीं था वो अपने मास्टर की तरफ़ कामुक नज़रों से देख रही थी.

कुछ देर बाद लड़की उठी और मास्टर की तरफ़ पीठ करके खड़ी हो गई और अपनी छोटी सी स्कर्ट को ऊपर उठा कर मास्टर को अपनी गांड दिख़ाने लगी. मास्टर किताब को एक तरफ फेंक कर उसकी गांड पर हाथ फ़ेरने लगा. क्या मस्त गांड थी दोस्तों उस लड़की की, मेरा लंड जो कि काफ़ी देर से झटके मार रहा था अपने पूरे रंग में आ गया.

जीन्स में लंड काफ़ी तंग लग रहा था मानो मेरा लंड मुझसे कह रहा हो, यार समीर अंदर मेरा दम घुट रहा है प्लीज मुझे बाहर निकाल. मुझसे भी रहा नहीं गया और मैंने अपनी जीन्स की चैन खोल कर अपना लंड बाहर निकाला तब जाकर मेरे लंड ने चैन की सांस ली अब वो आज़ादी के साथ झटके लगा रहा था.

उधर मास्टर ने लड़की को पेट के बल सोफे पर लिटा दिया और उसकी गांड को जोर-जोर से मसलने लगा और कभी उसकी गांड के गोल-गोल उभारों को चाटता तो कभी मुँह में लेने की कोशिश करता जैसे कि उन्हें खा ही जाएगा. और मास्टर ही क्या अगर किसी को भी इतनी सुन्दर गांड मिलती तो वो भी कोई कसर नहीं छोड़ता. फिर मास्टर सोफे पर बैठ गया और लड़की घुटनों के बल बैठ कर उसकी पैंट की चैन खोलने लगी, मास्टर ने उसकी मदद की और अपने लंड को बाहर निकाल लिया.

लड़की लंड को देखकर बहुत खुश हुई और लंड को पकड़ कर हिलाने और मसलने लगी. तभी मास्टर ने अपने लंड की खाल को पीछे करके लंड की टोपी को बाहर निकाला और लड़की को चूसने के लिए इशारा किया.

पहले तो लड़की ने लंड की टोपी पर अपनी जीभ फिराई और फिर लंड को पूरा मुँह में लेकर चूसने लगी, और मास्टर असीम आनन्द का मजा ले रहा था.

मेरा एक हाथ मेरे लंड महाराज का मन बहला रहा था तो दूसरा लैपटोप के माउस पैड पर था. फिर मास्टर ने लड़की के सारे कपड़े उतार कर उसे पूरी तरह नंगी कर दिया और फिर सोफ़े पे लिटा कर उसके होठों का रस पीने लगा. फिर उसकी चूची चूसने लगा, वो चूचियों को जोर-जोर से मसल-मसलकर उसके चूचकों को चूस रहा था.

लड़की की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. मैं बस फ़िल्म का अधूरा मजा ले पा रहा था क्योंकि मैं फ़िल्म कि आवाज़ नहीं सुन पा रहा था. वहाँ हैडफ़ोन भी नहीं था और मैं कोई जोखिम नहीं उठाना चाहता था.

फिर मास्टर ने अपनी जीभ लड़की की चूत पर लगा दी और उसकी चूत चाटने लगा. कभी वो अपनी जीभ को चूत के अन्दर-बाहर करके लड़की की चूत को चोदता, तो कभी चूत के दाने को अपने होठों से पकड़ कर खींचता. फिर वो दोनों 69 की अवस्था में आ गये और जोर-जोर से एक दूसरे को चूसने लगे. मास्टर अपनी जीभ से लड़की की चूत चोद रहा था और लड़की मास्टर के लंड की जोरदार चुसाई कर रही थी जैसे उसे निगल ही जाएगी.

कुछ देर बाद दोनों अलग हुए.

मास्टर सोफे पर अपनी टांगें नीचे लटका कर बैठ गया और लड़की सोफ़े पर अपने घुटने मोड़कर उसके लंड पर बैठ गई. लड़की का मुँह मास्टर की तरफ था और उसने मास्टर का लंड पकड़ कर अपनी चूत से लगाया और लंड पर बैठकर उसे अपनी चूत में ले लिया.

लड़की लंड पर उछल-उछलकर अपनी चूत मरवा रही थी और मास्टर नीचे से झटके लगा रहा था. मेरे सामने उस लड़की की जबरदस्त चुदाई हो रही थी जिससे मेरे सर पर सेक्स का भूत चढ़ता जा रहा था. मैं अपने लंड को जोर-जोर से सहला रहा था, मेरा मुठ मारने का मन कर रहा था पर मैं डर रहा था कि कहीं मेरी पिचकारी से लैपटोप, मेजपोश या कुछ भी गन्दा हो गया तो मैं फस जाऊँगा. मेरी टांगें अकड़ने लगी थीं.

फिर मैं कुर्सी से उठा और लैपटोप लेकर बैड पर रख दिया. फिर एक तकिये को लंड के नीचे लगा कर लेट गया. फिर मैंने एक दूसरी फ़िल्म चलाई. उसमे शुरु में ही एक लड़का एक मस्त गांड को चोद रहा था, लड़की घुटनों के बल झुकी हुई थी और लड़का उसकी चिकनी गांड को ठोक रहा था. मैंने भी एक हल्का सा धक्का लगाया तो मेरे लंड के नीचे मुलायम तकिया होने के कारण मुझे कुछ मजा आया, तो मैं उस तकिये को लड़की मानकर धीरे-धीरे उसे चोदने लगा.

फ़िल्म में जोरदार चुदाई चल रही थी… मैं पूजा के बारे में सोचते-सोचते तकिये को रगड़ रहा था कि अभी पूजा आ जाये तो मैं उसकी जोरदार चुदाई कर दूँगा. मैं यह सोच कर निश्चिंत था कि अगर पूजा आएगी तो उसके आने की आवाज़ सुनकर मैं अपनी स्थिति ठीक कर लूँगा, तभी किसी ने एकदम से दरवाज़ा खोल दिया.

मैं अपने आप को संभाल नहीं सका और जैसा था वैसा ही लेटा रहा, मैंने फ़िल्म को बंद कर दिया और तकिये को लंड के नीचे से खिसका कर अपनी छाती के नीचे लगा लिया. मैंने देखा कि वो पूजा थी और मेरी हरकतों से मुझे शक भरी निगाहों से देख रही थी.

फिर वो मेरे पास आकर बैठ गई और अपनी भौंहे हिलाकर कहने लगी- क्या कर रहे हो समीर जी?

मैं बुरी तरह घबरा गया था, पूजा को क्या पता था कि मैं किस हालत में लेटा हुआ था. आप लोगों को तो पता ही होगा कि छुप कर सेक्स करने से घबराहट के कारण गला कुछ सूख सा जाता है और आवाज़ दबी-दबी सी निकलती है.

मैं- कुछ नहीं यार, आपके लैपटोप में कोई खास फ़िल्म ही नहीं है.

पूजा- क्या हुआ समीर, आपकी आवाज़ कुछ…

मैं- ऊँ…ऊँह, वो… मेरा गला कुछ सूख गया है इसलिए… एक गिलास पानी मिलेगा?

पूजा- मैं अभी लाती हूँ.

पूजा कमरे से बाहर निकली और उसके दरवाज़ा बंद करते ही मैं जल्दी से उठा और अपने खड़े लंड को मुश्किल से अंदर डाला, तभी पूजा ने झटके से दरवाज़ा खोलकर कहा कि पानी मटके का पियोगे या फ़्रिज का. उसने मुझे पैंट की चैन बंद करते देख लिया था, फिर वो मेरे जवाब का इंतजार किए बिना मुस्कराकर नीचे भाग गई.

मैं काफ़ी घबरा गया था… फिर मैं सोचने लगा कि जब उसे पता था कि मैं फ़्रिज का पानी पीता हूँ, मैंने उसके सामने फ़्रिज से ही पानी निकालकर पीया था तो उसने फिर क्यों पूछा था मुझसे…

शायद वो सब जानती थी कि मैं अकेले में क्या कर रहा था उसके कमरे में, तभी तो वो मुस्करा रही थी, लगता है मुर्गी फ़ंस चुकी है. तभी पूजा पानी लेकर आ गई और मुझे पानी दिया. मैंने पानी पीया तो वो फ़्रिज का था, वो सब जानती थी कि मुझे कैसा पानी चाहिए, उसने तो मेरी हरकतें देखने के लिए पानी के बारे में पूछा था.

मैंने अपने लंड की तरफ ध्यान किया तो वो अभी भी अपने रंग में था, फिर मैंने सोचा कि पेशाब कर आता हूँ जिससे यह शांत हो जायेगा.

मैं पूजा को बोलकर चला गया कि मुझे बाथरूम जाना है. उसी मंजिल वाले बाथरूम में चला गया और पेशाब करने लगा. पर यह इतना आसान नहीं था, ये मेरे पुरुष मित्र भली भांती समझ सकते हैं कि खड़े लंड से पेशाब करना कितना मुश्किल होता है.

जैसे-तैसे मैंने पेशाब किया जिससे मेरा लंड कुछ शांत हुआ. फिर मैं बाथरूम से निकलकर पूजा के कमरे की ओर बढ़ा.

मैं सोचने लगा कि पूजा मेरे बारे में क्या सोच रही होगी और इस वक्त क्या कर रही होगी, मैंने छुप कर पूजा को देखने की सोची. मैं दरवाज़े के पास गया और धीरे से थोड़ा-सा दरवाज़ा खोल कर अंदर झांकने लगा तो मैं दंग रह गया. जो तकिया मैंने अपने लंड के नीचे लगाया था, पूजा उसे बड़ी मदहोश होकर सूंघ रही थी और अपने एक हाथ से कभी अपनी चूची तो कभी अपनी चूत को मसल रही थी. मैं समझ गया कि माल एकदम तैयार है. मैंने भी झटके से दरवाज़ा खोला तो पूजा उसी तरह घबरा गई जैसे मैं घबरा गया था. उसने तकिया एक तरफ फ़ेंका और खड़ी हो गई.
 
पूजा- अरे…समीर तुम आ गए.

मैं- जी हाँ, मगर तुम इतनी घबराई हुई क्यों लग रही हो, क्या तुम्हारा भी गला सूख गया है क्या…?

पूजा ने शरमाकर अपना मुँह नीचे कर लिया.

पूजा- नहीं ऐसा कुछ नहीं है.

मैं- तुम मुझे फ़िल्म दिखाने वाली थी.

पूजा- इतना कुछ तो तुमने देख लिया अब क्या बाकी रह गया.

दोनों का सच एक-दूसरे के सामने आ चुका था, पूजा अब खुल कर बात करने लगी थी. तो मैंने भी थोड़ी हिम्मत की और जाकर दरवाज़े की कुंडी लगा दी.

पूजा- यह क्या कर रहे हो समीर, अगर कोई आ गया तो…?

मैं- कोई नहीं आएगा यार, डरो मत.

हम दोनों कुर्सी पर बैठ गए, और लैपटोप को मेज पर रख दिया. फिर मैंने सेक्सी फ़िल्मों की लिस्ट निकाली तो पूजा कुर्सी से उठने लगी, मैंने पूजा का हाथ पकड़ कर उसे दोबारा बिठा दिया.

मैं- क्या हुआ पूजा, कहाँ जा रही हो?

पूजा- नहीं समीर, हम ये फ़िल्में साथ में नहीं देख सकते.

मैं- मगर क्यों यार?

पूजा- यह बहुत गंदी फ़िल्म हैं, मैं इन्हें अकेले में देखती हूँ, तुम्हारे साथ नहीं देख सकती, मुझे शर्म आती है.

मैं- और जब तुम उस तकिये को इतनी मदहोशी से सूंघ रही थी तब तुम्हारी शर्म कहाँ थी.

पूजा शर्म से लाल हुई जा रही थी…

मैंने पूजा का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर कहा- देखो पूजा, तुम मुझे बहुत पसंद हो, मैं तो तुम्हें पहली बार देखते ही तुम पर फ़िदा हो गया था. यह कहकर मैंने अपने होंठ पूजा के रसीले होठों से लगा दिए और उनका रस पीने लगा. पूजा ने मुझे बीच में ही अपने से अलग किया, उसके चेहरे पर उसके अंदर की खुशी साफ झलक रही थी.

मैं- कैसा लगा…?

पूजा- समीर… बहुत अच्छा-अच्छा महसूस हो रहा है, यह मेरी ज़िंदगी का पहला चुम्बन है.

मैं- तो बीच में ही क्यों रोक दिया मेरी जान, आज मुझे अच्छी तरह अपने होठों का रस पीने दो.

पूजा- यह मेरा पहली बार है इसलिए मुझे लंबा चुम्बन लेने का अनुभव नहीं है.

मैं- तो अनुभव ले लो ना… इतना कहकर मैंने फिर से उसके होंठ अपने होठों से पकड़ लिये.

हम दोनों एक दूसरे के होठों को चूसने लगे, कभी मैं उसकी जीभ को पकड़ कर चूसता तो कभी वो मेरी जीभ को. उसके गालों पर रखे मेरे हाथ अब धीरे-धीरे नीचे खिसकने लगे और उसके कंधों से होते हुए उसकी कामुक, मोटी-मोटी और रसदार चूचियों पर आ गये, तो वो एकदम से सिहर उठी. मैं उसके चूचों को धीरे-धीरे सहलाने व दबाने लगा, वो कसमसाती हुई मुझे चूम रही थी. हम काफ़ी देर तक एक दूसरे को चूमते रहे, हमारी सांसें तेज होती जा रही थी, पूजा की गर्म-गर्म सांसें मेरे चेहरे से टकरा रही थी, हम एक-दूसरे से लिपट कर जाने कहाँ खो गये थे.

तभी किसी ने दरवाज़े पर दस्तक दी तो हमारा सारा नशा उड़ गया और हम दोनों बुरी तरह घबरा गए. पूजा ने फ़ुर्ती से उठ कर अपना दुपट्टा ठीक किया और दरवाज़े की ओर बढ़ी. मैंने लैपटोप को संभाला और उसमें जल्दी से एक विडियो गाना चला दिया. पूजा ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि बाहर मोनू खड़ा है.

पूजा- अरे मोनू तुम…

मोनू- समीर भईया, को नीचे बुलाया है.

और इतना कहकर वो नीचे चला गया.

हमारी तो जान में जान आई कि मोनू ने हमसे कोई सवाल नहीं किया, अगर कोई बड़ा होता तो हम बुरी तरह फ़ंस जाते क्योंकि दरवाज़ा अंदर से बंद था और जवान छोरा-छोरी अकेले…

पूजा हंसते हुए बोली- बच गए यार… मेरी तो सांस ही अटक गई थी.

मैंने भी हंसते हुए कहा- तो फिर दोबारा से शुरु करें.

पूजा- जी नहीं, तुम्हें नीचे बुलाया गया है.

मैं- तो मैडम, फिर यह अधूरा काम कब पूरा होगा?

पूजा- इतनी भी क्या जल्दी है, अभी तो हम मिले हैं, सही वक्त आने पर इस अधूरे काम को पूरा करेंगे, अभी तुम जाओ, नहीं तो फिर से कोई आ जायेगा.

मैं- ठीक है… अभी तो मैं जा रहा हूँ लेकिन मौका मिलते ही इस अधूरे काम को पूरा करुँगा.

इतना कहकर मैंने उसे कस कर अपनी बाहों में जकड़ लिया और एक लंबा व गहरा चुम्बन लिया और नीचे चला गया.

नीचे पहुँच कर मैंने देखा कि भात की रस्म की तैयारी चल रही थी, काफ़ी सारी औरतें इकटठी हैं, मेरी गाँव वाली बुआ भी आई हुई थीं. कुछ देर बाद हम बुआ के घर पहुँचे और भात की रस्म पूरी की. घर पहुँच कर मैं अपने सारे रिश्तेदारों से मिला और फिर मैं औरतों वाले कमरे में गया अपनी प्यारी-प्यारी भाभियों से मिलने.

अंदर जाकर देखा तो मेरी सभी भाभियाँ वहाँ इकट्ठी थीं और उनके बीच एक ऐसा चेहरा था जिसे देख कर मैं हैरान रह गया और साथ ही साथ मेरी खुशी का कोई ठिकाना न रहा. मेरी खुशी की वजह सुलेखा भाभी थीं, वो मेरी गांव वाली बुआ के साथ शादी में आई थीं. मैंने सभी भाभीयों को नमस्ते की, मुझे देख कर मेरी सारी भाभियाँ बहुत खुश हुईं और एक ने मुझे हाथ पकड़ कर अपनी बगल में बिठा लिया और हम सभी आपस में हंसी-मजाक करने लगे.

मेरी बगल वाली भाभी बोली- देवर जी, अब आप आ गये हो तो शादी में और भी मजा आएगा.

तो मैंने उन्हें खोआ मारते हुए कहा- क्यों नहीं भाभी जी, आपको तो पूरा-पूरा मजा दूंगा!

और इस पर सभी भाभियाँ जोर से हंस पड़ीं.

सुलेखा भाभी भी मेरे एक तरफ बैठी हुई थीं, फिर मैंने सुलेखा भाभी को छेड़ने के लिए अपनी एक भाभी से पूछा- भाभी, ये कौन हैं?

तो उन्होंने बताया कि ये बुआ के गांव से आई हैं, बुआ की पड़ोसन हैं और उनके साथ आई है, ये भी तुम्हारी भाभी लगती हैं.

मैंने कहा- अच्छा… तो ये बुआ के साथ आई हैं, तभी तो कहूँ इन्हें पहले कभी नहीं देखा.

सुलेखा भाभी ने मेरी बाजू पर चुटकी काटी और मेरी तरफ आँख निकालते हुए बोली- अच्छा जी, इतनी जल्दी भूल गये… ये मुझे 2 साल पहले से जानते हैं, जब गांव आए थे तब इनसे मुलाकात हुई थी और अब देखो कैसे बातें बना रहे हैं.

थोड़ी देर बाद सब भाभियाँ कमरे से बाहर चली गईं, अब कमरे में सिर्फ़ मैं और सुलेखा भाभी थी.

अब हम दोनों अकेले थे तो मैंने कहा- हमारा बेटा कहाँ है?

तो उन्होंने बताया कि वो बाहर बाकी बच्चों के साथ खेल रहा है. मैंने मोका देखकर सुलेखा भाभी के गाल पर एक चुम्बन ले लिया.

भाभी- यह क्या कर रहे हो समीर? कोई देख लेगा तो, दरवाज़ा भी खुला हुआ है.

मैं- तो लो दरवाज़ा बंद किए देता हूँ…

यह कहकर मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया.

भाभी- अरे नहीं, कोई आ गया तो उसे शक हो जाएगा कि दरवाज़ा बंद क्यों है.

मैं- किसी को शक नहीं होगा मेरी जान, मैंने कुंडी नहीं लगाई है बाकी मैं सब संभाल लूँगा.

भाभी- तुम भी ना! एकदम बेशर्म हो, तुम्हें पकड़े जाने का भी कोई डर नहीं है…

मैं- अब तुम्हारे सामने भी कैसी शर्म…

इतना कहकर मैं सुलेखा भाभी के रस भरे होठों को रगड़ने लगा और उनका रस चूसने लगा. मैं यह देखकर बहुत खुश हुआ कि भाभी मुझसे भी ज्यादा उतावली थी मेरे होठों को चूसने के लिए, वो मेरे होठों को जोर-जोर से अपने होठों में पकड़ कर चूस रही थी और अपने दांतों से भी काट रही थी. जिससे मेरे होठों में दर्द होने लगा.

मैं भाभी से अलग हुआ- क्या कर रही हो यार? खा जाओगी क्या मेरे होंठों को!

तो भाभी मेरी तरफ देखकर हंसने लगीं.

मैंने पूछा- अब क्या हुआ? हंस क्यों रही हो तुम?

भाभी ने मुझे उठाया और शीशे के सामने ले गईं, शीशे में देखकर मेरा माथा ठनका. मेरे होंठ, गाल, माथा लगभग पूरा चेहरा भाभी के होंठों की लाली से गुलाबी हो गया था.

मैंने कहा- अब क्या होगा भाभी? मेरे चेहरे का तो तुमने पोस्टर बना दिया है, यह तो आसानी से साफ भी नहीं होगा, किसी ने देख लिया तो?

भाभी ने कहा- पहले किसी कपड़े से पौंछ लो फिर साबुन से धो लेना, आसानी से साफ हो जायेगा.

भाभी ने एक रुमाल लेकर बड़े प्यार से मेरे चेहरे को पौंछा, जिससे मेरा चेहरा कुछ साफ हुआ. फिर मैं कमरे से बाहर निकला और बड़ी मुश्किल से सभी से अपना मुँह छुपा कर बाथरुम में घुस गया. मैंने अपने चेहरे पर साबुन लगाया और फिर पानी से अच्छी तरह धोया, जिससे चेहरा एकदम साफ हो गया. मैंने तौलिए से अपना मुँह पौंछा और फिर वापस कमरे में चला गया.

भाभी हंसते हुए- आ गए देवर जी, अब मुझसे कभी पंगा मत लेना, नहीं तो इससे भी बुरा हाल करुंगी.

मैं- वो तो यहाँ इतनी भीड़भाड़ है वरना अकेले में मैंने तुम्हारा क्या हाल किया था भूल गईं क्या.

इस पर भाभी मुझे कातिल मुस्कान देने लगी.

भाभी- और सुनाओ समीर, कोई मिली या नहीं?

मैंने भाभी को अपने पेशे के बारे में कुछ भी नहीं बताया कि मैं एक जिगोलो बन गया हूँ, उनकी नज़रों में मैं अब भी एक सीधा-सादा इंजीनियरिंग का छात्र था.

मैं- नहीं भाभी… मेरी तो कहीं दाल ही नहीं गलती.

भाभी- दाल यूं ही नहीं गलती देवर जी, थोड़ी मेहनत करनी पड़ती है, कभी कोशिश भी की है?

मैं- बहुत कोशिशें की मगर कोई मछ्ली नहीं फ़ंसी कांटे में… पर…

भाभी- पर क्या…?

मैंने भाभी को पूजा के बारे में सब कुछ बता दिया.

भाभी- ओ… तो मामला एकदम फिट है तो फिर दिक्कत किस बात की है.

मैं- पूजा तो एकदम तैयार है पर भाभी मौका ही नहीं मिल रहा है और शायद कल मैं यहाँ से चला जाऊँगा, पता नहीं हमारा मिलन हो पाएगा या नहीं. कुछ तो करो भाभी प्लीज…

भाभी ने थोड़ी देर सोचने के बाद कहा- मैंने सोच लिया देवर जी कि आपका पूजा के साथ मिलन करवा के रहूँगी वो भी आज रात ही.

मैं- भाभी मैं तुम्हारा बहुत आभारी रहूँगा, पर यह सब होगा कैसे? दोनों ही घरों में काफ़ी लोग जमा हैं.

भाभी- अभी तो भीड़ है पर रात को सब शादी में शरीक होने के लिए बैंक्वेट हाल जायेंगे, तब यहाँ तो कोई ना कोई रुकेगा क्योंकि शादी वाला घर है पर उस वक्त पूजा के घर कोई नहीं होगा.

वो समय ही तुम दोनों के मिलन के लिए एकदम सही रहेगा. यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं.

भाभी की यह योजना सुन कर मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा और मैंने उनके गाल को चूम कर उनका धन्यवाद किया. धीरे-धीरे समय बीत गया और शाम को 8 बजे के करीब सभी लोग बैंक्वेट हाल चले गये. मैं भी संजू (बुआ का लड़का) के बैंक्वेट होल की तरफ रवाना हुआ, घर से 5 मिनट की दूरी पर ही था.

जैसा कि भाभी ने कहा था हमारे घर पर एक-दो बंदे रुके थे घर की देखभाल के लिए, पर पूजा के घर के बाहर मैंने ताला लगा हुआ देखा तो सोचा कि सब भाभी की योजना के मुताबिक चल रहा है.

बैंक्वेट होल पहुँच कर मैं सभी मेहमानों से मिला.

वहाँ मैंने पूजा को देखा तो मेरा चेहरा खिल उठा और हम खाना खाते-खाते एक दूसरे को दूर से ही प्यासी निगाहों से देख रहे थे और मुस्करा रहे थे.

तभी किसी ने पीछे से मेरी पीठ थपथपाई, मैंने पीछे मुड़कर देखा तो वो सुलेखा भाभी थीं.

भाभी ने बताया कि उन्होंने पूजा को सब कुछ समझा दिया है कि क्या करना है और मुझे भी आगे की योजना बताई.
 
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