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Guest
इससे पहले की रोहित कुछ बोल पाता, मैंने अपना चश्मा उतारा और उसकी आँखों में देखने लगी.
आधे मिनट बाद वापस मैंने अपना चश्मा पहन लिया. रोहित एकदम सामान्य लग रहा था.
तुम दोनों यहाँ...क्या हुआ, कोई काम हैं क्या? उसने पूछा.
नहीं...वो बस उस दिन के लिए सोरी बोलने आई थी. मैंने कहा और पुजा को लेकर वापस आ गयी.
तूने क्या किया था उसके साथ? मैंने उसे थप्पड़ मारा फिर भी वो कुछ नही बोला. पूजा ने पूछा.
मैंने उसकी पिछली पांच मिनट की यादाश्त मिटा दी थी.
क्या...मगर कैसे?
वो सब छोड़...अब मैं याग्निक के साथ भी यही करने वाली हूँ. वो भूल जाएगा कि कभी तू हॉस्पिटल भी गई थी.
तुझे पता भी हैं ताश्री तू क्या बोल रही हैं? ये एक महीने पहले की बात हैं.
इसीलिए मुझे ढेर सारा वक्त और एकांत चाहिए.
....और वो तुझे कहाँ मिलेगा?
किसी होटल के कमरे में...मैंने उसे आँख मरते हुए कहा.
---------------------------------------
नंदिनी और विजय हॉस्पिटल के लिए निकल गए. नंदिनी विजय की और देख ही नही रही थी. विजय ड्राइव कर रहा था मगर चुपके से नंदिनी की और देख भी रहा था. नंदिनी गुमसुम सी एक ओर देख रही थी. उसने अपनी आँखों पर चश्मा लगा रखा था.
मेम मैं माफ़ी चाहती हूँ, मैं...वो अचानक केबिन में आ गया था.
नही....कोई बात नही...मगर अपने सीनियर के केबिन में पूछ कर ही जाना चाहिए.
आप परेशान लग रही थी...चतुर्वेदी सर ने कुछ कहा था क्या?
नंदिनी समझ गई थी कि विजय उसके आंसुओ के बारे में पूछ रहा था.
नही...ऐसा कुछ नही हैं. वो बस कुछ पुरानी बात याद आ गयी थी.
विजय भी बातों के जरिये नंदिनी का मन बहलाना चाहता था.
मैंने सुना हैं कि आपके भी माता-पिता...?
हाँ...वो इस दुनिया में नही हैं. मैं अनाथ आश्रंम में ही पली बढ़ी हूँ. नंदिनी ने एक सेकंड रुक कर कहा. आपके भी मतलब...तुम्हारे भी माता-पिता नही हैं क्या?
नही..मेम...मैंने कभी उनकी सूरत नही देखी थी.
तुमने देखी होगी...बस तुम्हे यादं नही होगा. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.
विजय भी मुस्कुराया.
वैसे मेम आप बहुत मेहनती हैं...अनाथाश्रम में पलने के बावजूद भी आप यहाँ तक पहुँच गयी.
इंस्पेक्टर तो तुम भी बन ही गए.
हाँ...पर मुझे गोद ले लिया गया था.
अब तक वो हॉस्पिटल पहुँच गये थे. नंदिनी एक पल तो ठिठकी मगर फिर अन्दर चली गयी. उसने रिसेप्शन पर देखा, मगर वहां कोई नही था. याग्निक यहीं तो काम करता था इसी रिसेप्शन काउंटर पर.
नंदिनी आगे बढ़ी और आईसीयू में पहुंची. हवलदार से मिलकर उसका हालचाल पूछा. उसके साथ वाले हवलदार को आवश्यक निर्देश दिए और वापस नीचे आ गयी.
उसने रिसेप्शन पर कड़ी लड़की से पूछा. पहले यहाँ एक लड़का काम करता था?
कब? दो साल से तो मैं ही यहाँ काम कर रही हूँ.
हम्म...और उससे पहले.
हाँ उससे पहले एक लड़का था.
उसने कहीं और ज्वाइन कर लिया?
नहीं...कहते हैं उसकी यादाश्त चली गयी.
क्या? नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा.
नंदिनी बाहर जाने के लिए मुड़ी. विजय उसके पीछे ही खड़ा था.
आप उस ताश्री वाले केस की वापस तहकीकात कर रही हैं? उसने जीप में बैठते हुए कहा.
क्यों?
आप जिस लड़के के बारे में पूछ रही थी वो तो उसी केस से ही जुड़ा हुआ हैं न?
तुम याग्निक से मिले थे? नंदिनी ने पूछा.
हाँ...चतुर्वेदी सर ने मुझे पूछताछ करने के लिए भेजा था उसके घर...मगर कोई फायदा नही हुआ.
नंदिनी ने विजय की और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा जैसे पूछ रही हो क्यों? विजय आगे बोलता रहा.
उसे कुछ भी याद नही था. वो दस साल के किसी मासूम बच्चे की तरह था.
मासूम! नंदिनी ने धीरे से कहा.
मेम सुबह से भूख लग रही हैं कुछ नाश्ता कर ले क्या? विजय ने नंदिनी की तन्द्रा तोड़ते हुए पूछा.
आज तुम लंच नही लाये?
आअज टिफ़िन वाले की छुट्टी हैं.
हम्म...ठीक हैं आगे कहीं रोक लो.
विजय ने एक ज्यूस वाले के यहाँ जीप रोक दी. उसने ज्यूस वाले को दो गिलास ज्यूस के लिए कहा. वो दोनों गाडी में ही बैठे थे. कुछ ही देर में ज्यूसवाला ज्यूस ले आया.
यहीं मकान हैं उसका... विजय ने ज्यूस पीते हुए कहा.
क्या...किसका मकान?
वो उस लड़के याग्निक का...ये सामने वाला मकान ही हैं...और इस गली के अन्दर ही ताश्री की उस दोस्त का मकान हैं.
नंदिनी के ज्यूस हलक में ही रह गया.
फिर नंदिनी सामान्य हुई और अपना ज्यूस ख़त्म किया.
चलो चलते हैं.
कहाँ?
पूछताछ करके आते हैं....
हम दोनों तय समय पर होटल के नीचे पहुँच गये. मैंने पूजा को वहीँ रुकने को कहा.
तुम्हे कितना समय लगेगा. पूजा ने पूछा.
यहीं कोई लगभग आधा घंटा.
ताश्री! मुझे तो डर लग रहा हैं. अगर तुम यह नहीं करना चाहती तो रहने दे. मैं नहीं चाहती हूँ की मेरी वजह से तू किसी मुसीबत में पड़ जाए.
मेरी तू एक ही तो दोस्त हैं. अगर मैं तेरे ही काम नही आ सकती तो फिर मेरी इस शक्ति का मतलब ही क्या हैं? ये याग्निक आज के बाद कभी तुझे परेशां नही कर पायेगा ये मेरा तुझसे वादा हैं. तू मुझपर भरोसा रख कोई दिक्कत नही होगी. मैंने चेक किया वो पेन अब भी मेरी जेब में ही था.
अगर तू आधे घंटे के अन्दर नही आई तो मैं ऊपर आ जाउंगी.
ठीक हैं.
मैं होटल में चली गई. याग्निक के कमरे के बाहर जाकर मैंने डोरबेल बजाई. मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था, धड़कन दुगुनी रफ़्तार से चल रही थी. रोहित का मामला अलग था, वहां अगर मैं यादाश्त न भी मिटा पाती तब भी में उसे नियंत्रित कर ही सकती थी मगर यहाँ मामला दूसरा था.
कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला.
ताश्री...तुम! तुम यहाँ क्या कर रही हो? उसने चौंकते हुए पूछा.
अन्दर नही बुलाओगे मुझे? मैंने एक झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा.
हाँ...हां...आओ न? वो सकपका गया था.
तुम आखिर पूजा से चाहते क्या हो? मैंने बेड पर बैठते हुए कहा.
वो...वो..उसने तुम्हे क्या बताया?
यहीं की वो आज नही आएगी.
मगर क्यों?
उसे कोई जरुरी काम आ गया था.
ऐसा कैसे हो सकता हैं? वो जानती हैं न आज उसका मुझसे मिलना कितना जरुरी हैं.
हां...बेशक...तभी तो उसने मुझे भेजा हैं. ज़रा मुझे देखकर बताओ...क्या मैं उससे कम खुबसूरत हूँ.
न...नही....तुम भी खुबसूरत हो...
तो ज़रा मेरी आँखों में झांककर बताओ क्या ये किसी झील से कम गहरी हैं. मैंने अपना चश्मा उतार दिया.
हम्म...बिलकुल नही....
मैं जिस दिन से तुमसे मिली हूँ तबसे तुमसे कुछ कहाँ चाहती हूँ याग्निक! मैंने उसके पास आते हुए कहा.
क्या?
भाड़ में जाओ!!
मेरी आँखों के सामने एक रौशनी चमकी और में उसके दिमाग में थी. नीचे हरा-भरा घांस का भरा एक मैदान... ऊपर बिजलियों से चमकता हुआ एक आसमान जिसमें बादल गरज रहे थे. पास ही एक नदी थी जिसमे उसकी यादो के प्रतिबिम्ब दिख रहे थे. यह नदी पास ही एक पहाड़ से आ रही थी.
मैंने एक सीटी बजाई और कुछ ही देर में एक नीला घोडा मेरे सामने हाज़िर था. यह याग्निक का अंतर्मन था. मुझे देखकर एक बार तो वो जोर से हिनहिनाया. जैसे किसी अजनबी की घुसपैठ से परेशान हो. मैं उसके पास गयी और उसकी गर्दन पर हाथ फिराया.
शांत रहो...मैं तुम्हारी दोस्त हूँ. मुझे वहां ऊपर जाना हैं. मैंने पहाड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा.
उसने एक बार मुझे देखा और फिर वो नीचे बैठ गया. अब मैं उसके ऊपर सवार थी और वो आसमान में उड़ रहा था. कुछ ही देर में हम उस पहाड़ पर थे. वहां चारो और टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिसपर उसकी यादे परिलक्षित हो रही थी. मैंने अपनी जेब से वो पेन निकाला और उसे घुर कर देखा, वो एक तलवार जितना बड़ा हो गया. अब मैं उन स्क्रीन्स के पास गयी और उन्हें एक-एक करके तोड़ने लगी.
यह देखकर वो घोडा जोर से हिनहिनाया.
चुपचाप वही खड़े रहो. मैंने उसे डपटते हुए कहा और वापस वो स्क्रीन्स तोड़ने लगी. यह उन यादो को मिटाने का एक तरीका था, इससे भले ही यादें पूरी तरह से न मिटे पर वो किसी काम की भी नही रहती थी. मैं पूरी मग्न होकर यह काम करने लगी तभी मुझे कुछ आवाज आई... मैंने पीछे मुड़ कर देखा, वो घोडा गायब हो चूका था और उसकी जगह एक जंगली कुत्ता खड़ा था.
अरे नही! अब यह एक दिक्कत थी. यह कुता वास्तव में अन्तर्मन का रक्षक था. मैं वहाँ से भागी. कुछ देर भागने के बाद में रुक गयी. मैं वापस उसी जगह आ गई थी. मैं पीछे मुड़ी और मैंने एक पत्थर उठा लिया. वो कुता रुक गया और वापस भाग गया जैसे वो डर गया हो. मैंने चैन की सांस ली और सामने मुड़ी. अब डरने की बारी मेरी थी. सामने वही तांत्रिक था. काला चोगा पहले, गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ में एक त्रिशूल लिए हुए.
मेरे लिए यह वास्तव में डरने की बात थी. क्योंकि सपने में उस तांत्रिक का आना दूसरी बात थी और यहाँ अंतर्मन में आना एक दूसरी बात...मुझे अब समझ में आया था कि मैं जैसे-जैसे याग्निक के अंतर्मन की गहराइयों में उतरी थी, खुद के भी अंतर्मन की गहराई में उतरती गई थी और शायद इसी वजह से मेरा इस तांत्रिक से सामना हुआ हैं.
मैं भागने के लिए वापस पीछे मुड़ी मगर पीछे भी वो ही खड़ा था.
आधे मिनट बाद वापस मैंने अपना चश्मा पहन लिया. रोहित एकदम सामान्य लग रहा था.
तुम दोनों यहाँ...क्या हुआ, कोई काम हैं क्या? उसने पूछा.
नहीं...वो बस उस दिन के लिए सोरी बोलने आई थी. मैंने कहा और पुजा को लेकर वापस आ गयी.
तूने क्या किया था उसके साथ? मैंने उसे थप्पड़ मारा फिर भी वो कुछ नही बोला. पूजा ने पूछा.
मैंने उसकी पिछली पांच मिनट की यादाश्त मिटा दी थी.
क्या...मगर कैसे?
वो सब छोड़...अब मैं याग्निक के साथ भी यही करने वाली हूँ. वो भूल जाएगा कि कभी तू हॉस्पिटल भी गई थी.
तुझे पता भी हैं ताश्री तू क्या बोल रही हैं? ये एक महीने पहले की बात हैं.
इसीलिए मुझे ढेर सारा वक्त और एकांत चाहिए.
....और वो तुझे कहाँ मिलेगा?
किसी होटल के कमरे में...मैंने उसे आँख मरते हुए कहा.
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नंदिनी और विजय हॉस्पिटल के लिए निकल गए. नंदिनी विजय की और देख ही नही रही थी. विजय ड्राइव कर रहा था मगर चुपके से नंदिनी की और देख भी रहा था. नंदिनी गुमसुम सी एक ओर देख रही थी. उसने अपनी आँखों पर चश्मा लगा रखा था.
मेम मैं माफ़ी चाहती हूँ, मैं...वो अचानक केबिन में आ गया था.
नही....कोई बात नही...मगर अपने सीनियर के केबिन में पूछ कर ही जाना चाहिए.
आप परेशान लग रही थी...चतुर्वेदी सर ने कुछ कहा था क्या?
नंदिनी समझ गई थी कि विजय उसके आंसुओ के बारे में पूछ रहा था.
नही...ऐसा कुछ नही हैं. वो बस कुछ पुरानी बात याद आ गयी थी.
विजय भी बातों के जरिये नंदिनी का मन बहलाना चाहता था.
मैंने सुना हैं कि आपके भी माता-पिता...?
हाँ...वो इस दुनिया में नही हैं. मैं अनाथ आश्रंम में ही पली बढ़ी हूँ. नंदिनी ने एक सेकंड रुक कर कहा. आपके भी मतलब...तुम्हारे भी माता-पिता नही हैं क्या?
नही..मेम...मैंने कभी उनकी सूरत नही देखी थी.
तुमने देखी होगी...बस तुम्हे यादं नही होगा. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.
विजय भी मुस्कुराया.
वैसे मेम आप बहुत मेहनती हैं...अनाथाश्रम में पलने के बावजूद भी आप यहाँ तक पहुँच गयी.
इंस्पेक्टर तो तुम भी बन ही गए.
हाँ...पर मुझे गोद ले लिया गया था.
अब तक वो हॉस्पिटल पहुँच गये थे. नंदिनी एक पल तो ठिठकी मगर फिर अन्दर चली गयी. उसने रिसेप्शन पर देखा, मगर वहां कोई नही था. याग्निक यहीं तो काम करता था इसी रिसेप्शन काउंटर पर.
नंदिनी आगे बढ़ी और आईसीयू में पहुंची. हवलदार से मिलकर उसका हालचाल पूछा. उसके साथ वाले हवलदार को आवश्यक निर्देश दिए और वापस नीचे आ गयी.
उसने रिसेप्शन पर कड़ी लड़की से पूछा. पहले यहाँ एक लड़का काम करता था?
कब? दो साल से तो मैं ही यहाँ काम कर रही हूँ.
हम्म...और उससे पहले.
हाँ उससे पहले एक लड़का था.
उसने कहीं और ज्वाइन कर लिया?
नहीं...कहते हैं उसकी यादाश्त चली गयी.
क्या? नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा.
नंदिनी बाहर जाने के लिए मुड़ी. विजय उसके पीछे ही खड़ा था.
आप उस ताश्री वाले केस की वापस तहकीकात कर रही हैं? उसने जीप में बैठते हुए कहा.
क्यों?
आप जिस लड़के के बारे में पूछ रही थी वो तो उसी केस से ही जुड़ा हुआ हैं न?
तुम याग्निक से मिले थे? नंदिनी ने पूछा.
हाँ...चतुर्वेदी सर ने मुझे पूछताछ करने के लिए भेजा था उसके घर...मगर कोई फायदा नही हुआ.
नंदिनी ने विजय की और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा जैसे पूछ रही हो क्यों? विजय आगे बोलता रहा.
उसे कुछ भी याद नही था. वो दस साल के किसी मासूम बच्चे की तरह था.
मासूम! नंदिनी ने धीरे से कहा.
मेम सुबह से भूख लग रही हैं कुछ नाश्ता कर ले क्या? विजय ने नंदिनी की तन्द्रा तोड़ते हुए पूछा.
आज तुम लंच नही लाये?
आअज टिफ़िन वाले की छुट्टी हैं.
हम्म...ठीक हैं आगे कहीं रोक लो.
विजय ने एक ज्यूस वाले के यहाँ जीप रोक दी. उसने ज्यूस वाले को दो गिलास ज्यूस के लिए कहा. वो दोनों गाडी में ही बैठे थे. कुछ ही देर में ज्यूसवाला ज्यूस ले आया.
यहीं मकान हैं उसका... विजय ने ज्यूस पीते हुए कहा.
क्या...किसका मकान?
वो उस लड़के याग्निक का...ये सामने वाला मकान ही हैं...और इस गली के अन्दर ही ताश्री की उस दोस्त का मकान हैं.
नंदिनी के ज्यूस हलक में ही रह गया.
फिर नंदिनी सामान्य हुई और अपना ज्यूस ख़त्म किया.
चलो चलते हैं.
कहाँ?
पूछताछ करके आते हैं....
हम दोनों तय समय पर होटल के नीचे पहुँच गये. मैंने पूजा को वहीँ रुकने को कहा.
तुम्हे कितना समय लगेगा. पूजा ने पूछा.
यहीं कोई लगभग आधा घंटा.
ताश्री! मुझे तो डर लग रहा हैं. अगर तुम यह नहीं करना चाहती तो रहने दे. मैं नहीं चाहती हूँ की मेरी वजह से तू किसी मुसीबत में पड़ जाए.
मेरी तू एक ही तो दोस्त हैं. अगर मैं तेरे ही काम नही आ सकती तो फिर मेरी इस शक्ति का मतलब ही क्या हैं? ये याग्निक आज के बाद कभी तुझे परेशां नही कर पायेगा ये मेरा तुझसे वादा हैं. तू मुझपर भरोसा रख कोई दिक्कत नही होगी. मैंने चेक किया वो पेन अब भी मेरी जेब में ही था.
अगर तू आधे घंटे के अन्दर नही आई तो मैं ऊपर आ जाउंगी.
ठीक हैं.
मैं होटल में चली गई. याग्निक के कमरे के बाहर जाकर मैंने डोरबेल बजाई. मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था, धड़कन दुगुनी रफ़्तार से चल रही थी. रोहित का मामला अलग था, वहां अगर मैं यादाश्त न भी मिटा पाती तब भी में उसे नियंत्रित कर ही सकती थी मगर यहाँ मामला दूसरा था.
कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला.
ताश्री...तुम! तुम यहाँ क्या कर रही हो? उसने चौंकते हुए पूछा.
अन्दर नही बुलाओगे मुझे? मैंने एक झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा.
हाँ...हां...आओ न? वो सकपका गया था.
तुम आखिर पूजा से चाहते क्या हो? मैंने बेड पर बैठते हुए कहा.
वो...वो..उसने तुम्हे क्या बताया?
यहीं की वो आज नही आएगी.
मगर क्यों?
उसे कोई जरुरी काम आ गया था.
ऐसा कैसे हो सकता हैं? वो जानती हैं न आज उसका मुझसे मिलना कितना जरुरी हैं.
हां...बेशक...तभी तो उसने मुझे भेजा हैं. ज़रा मुझे देखकर बताओ...क्या मैं उससे कम खुबसूरत हूँ.
न...नही....तुम भी खुबसूरत हो...
तो ज़रा मेरी आँखों में झांककर बताओ क्या ये किसी झील से कम गहरी हैं. मैंने अपना चश्मा उतार दिया.
हम्म...बिलकुल नही....
मैं जिस दिन से तुमसे मिली हूँ तबसे तुमसे कुछ कहाँ चाहती हूँ याग्निक! मैंने उसके पास आते हुए कहा.
क्या?
भाड़ में जाओ!!
मेरी आँखों के सामने एक रौशनी चमकी और में उसके दिमाग में थी. नीचे हरा-भरा घांस का भरा एक मैदान... ऊपर बिजलियों से चमकता हुआ एक आसमान जिसमें बादल गरज रहे थे. पास ही एक नदी थी जिसमे उसकी यादो के प्रतिबिम्ब दिख रहे थे. यह नदी पास ही एक पहाड़ से आ रही थी.
मैंने एक सीटी बजाई और कुछ ही देर में एक नीला घोडा मेरे सामने हाज़िर था. यह याग्निक का अंतर्मन था. मुझे देखकर एक बार तो वो जोर से हिनहिनाया. जैसे किसी अजनबी की घुसपैठ से परेशान हो. मैं उसके पास गयी और उसकी गर्दन पर हाथ फिराया.
शांत रहो...मैं तुम्हारी दोस्त हूँ. मुझे वहां ऊपर जाना हैं. मैंने पहाड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा.
उसने एक बार मुझे देखा और फिर वो नीचे बैठ गया. अब मैं उसके ऊपर सवार थी और वो आसमान में उड़ रहा था. कुछ ही देर में हम उस पहाड़ पर थे. वहां चारो और टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिसपर उसकी यादे परिलक्षित हो रही थी. मैंने अपनी जेब से वो पेन निकाला और उसे घुर कर देखा, वो एक तलवार जितना बड़ा हो गया. अब मैं उन स्क्रीन्स के पास गयी और उन्हें एक-एक करके तोड़ने लगी.
यह देखकर वो घोडा जोर से हिनहिनाया.
चुपचाप वही खड़े रहो. मैंने उसे डपटते हुए कहा और वापस वो स्क्रीन्स तोड़ने लगी. यह उन यादो को मिटाने का एक तरीका था, इससे भले ही यादें पूरी तरह से न मिटे पर वो किसी काम की भी नही रहती थी. मैं पूरी मग्न होकर यह काम करने लगी तभी मुझे कुछ आवाज आई... मैंने पीछे मुड़ कर देखा, वो घोडा गायब हो चूका था और उसकी जगह एक जंगली कुत्ता खड़ा था.
अरे नही! अब यह एक दिक्कत थी. यह कुता वास्तव में अन्तर्मन का रक्षक था. मैं वहाँ से भागी. कुछ देर भागने के बाद में रुक गयी. मैं वापस उसी जगह आ गई थी. मैं पीछे मुड़ी और मैंने एक पत्थर उठा लिया. वो कुता रुक गया और वापस भाग गया जैसे वो डर गया हो. मैंने चैन की सांस ली और सामने मुड़ी. अब डरने की बारी मेरी थी. सामने वही तांत्रिक था. काला चोगा पहले, गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ में एक त्रिशूल लिए हुए.
मेरे लिए यह वास्तव में डरने की बात थी. क्योंकि सपने में उस तांत्रिक का आना दूसरी बात थी और यहाँ अंतर्मन में आना एक दूसरी बात...मुझे अब समझ में आया था कि मैं जैसे-जैसे याग्निक के अंतर्मन की गहराइयों में उतरी थी, खुद के भी अंतर्मन की गहराई में उतरती गई थी और शायद इसी वजह से मेरा इस तांत्रिक से सामना हुआ हैं.
मैं भागने के लिए वापस पीछे मुड़ी मगर पीछे भी वो ही खड़ा था.