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रहस्यमई आँखें complete

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इससे पहले की रोहित कुछ बोल पाता, मैंने अपना चश्मा उतारा और उसकी आँखों में देखने लगी.

आधे मिनट बाद वापस मैंने अपना चश्मा पहन लिया. रोहित एकदम सामान्य लग रहा था.

तुम दोनों यहाँ...क्या हुआ, कोई काम हैं क्या? उसने पूछा.

नहीं...वो बस उस दिन के लिए सोरी बोलने आई थी. मैंने कहा और पुजा को लेकर वापस आ गयी.

तूने क्या किया था उसके साथ? मैंने उसे थप्पड़ मारा फिर भी वो कुछ नही बोला. पूजा ने पूछा.

मैंने उसकी पिछली पांच मिनट की यादाश्त मिटा दी थी.

क्या...मगर कैसे?

वो सब छोड़...अब मैं याग्निक के साथ भी यही करने वाली हूँ. वो भूल जाएगा कि कभी तू हॉस्पिटल भी गई थी.

तुझे पता भी हैं ताश्री तू क्या बोल रही हैं? ये एक महीने पहले की बात हैं.

इसीलिए मुझे ढेर सारा वक्त और एकांत चाहिए.

....और वो तुझे कहाँ मिलेगा?

किसी होटल के कमरे में...मैंने उसे आँख मरते हुए कहा.

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नंदिनी और विजय हॉस्पिटल के लिए निकल गए. नंदिनी विजय की और देख ही नही रही थी. विजय ड्राइव कर रहा था मगर चुपके से नंदिनी की और देख भी रहा था. नंदिनी गुमसुम सी एक ओर देख रही थी. उसने अपनी आँखों पर चश्मा लगा रखा था.

मेम मैं माफ़ी चाहती हूँ, मैं...वो अचानक केबिन में आ गया था.

नही....कोई बात नही...मगर अपने सीनियर के केबिन में पूछ कर ही जाना चाहिए.

आप परेशान लग रही थी...चतुर्वेदी सर ने कुछ कहा था क्या?

नंदिनी समझ गई थी कि विजय उसके आंसुओ के बारे में पूछ रहा था.

नही...ऐसा कुछ नही हैं. वो बस कुछ पुरानी बात याद आ गयी थी.

विजय भी बातों के जरिये नंदिनी का मन बहलाना चाहता था.

मैंने सुना हैं कि आपके भी माता-पिता...?

हाँ...वो इस दुनिया में नही हैं. मैं अनाथ आश्रंम में ही पली बढ़ी हूँ. नंदिनी ने एक सेकंड रुक कर कहा. आपके भी मतलब...तुम्हारे भी माता-पिता नही हैं क्या?

नही..मेम...मैंने कभी उनकी सूरत नही देखी थी.

तुमने देखी होगी...बस तुम्हे यादं नही होगा. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.

विजय भी मुस्कुराया.

वैसे मेम आप बहुत मेहनती हैं...अनाथाश्रम में पलने के बावजूद भी आप यहाँ तक पहुँच गयी.

इंस्पेक्टर तो तुम भी बन ही गए.

हाँ...पर मुझे गोद ले लिया गया था.

अब तक वो हॉस्पिटल पहुँच गये थे. नंदिनी एक पल तो ठिठकी मगर फिर अन्दर चली गयी. उसने रिसेप्शन पर देखा, मगर वहां कोई नही था. याग्निक यहीं तो काम करता था इसी रिसेप्शन काउंटर पर.

नंदिनी आगे बढ़ी और आईसीयू में पहुंची. हवलदार से मिलकर उसका हालचाल पूछा. उसके साथ वाले हवलदार को आवश्यक निर्देश दिए और वापस नीचे आ गयी.

उसने रिसेप्शन पर कड़ी लड़की से पूछा. पहले यहाँ एक लड़का काम करता था?

कब? दो साल से तो मैं ही यहाँ काम कर रही हूँ.

हम्म...और उससे पहले.

हाँ उससे पहले एक लड़का था.

उसने कहीं और ज्वाइन कर लिया?

नहीं...कहते हैं उसकी यादाश्त चली गयी.

क्या? नंदिनी ने आश्चर्य से पूछा.

नंदिनी बाहर जाने के लिए मुड़ी. विजय उसके पीछे ही खड़ा था.

आप उस ताश्री वाले केस की वापस तहकीकात कर रही हैं? उसने जीप में बैठते हुए कहा.

क्यों?

आप जिस लड़के के बारे में पूछ रही थी वो तो उसी केस से ही जुड़ा हुआ हैं न?

तुम याग्निक से मिले थे? नंदिनी ने पूछा.

हाँ...चतुर्वेदी सर ने मुझे पूछताछ करने के लिए भेजा था उसके घर...मगर कोई फायदा नही हुआ.

नंदिनी ने विजय की और प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा जैसे पूछ रही हो क्यों? विजय आगे बोलता रहा.

उसे कुछ भी याद नही था. वो दस साल के किसी मासूम बच्चे की तरह था.

मासूम! नंदिनी ने धीरे से कहा.

मेम सुबह से भूख लग रही हैं कुछ नाश्ता कर ले क्या? विजय ने नंदिनी की तन्द्रा तोड़ते हुए पूछा.

आज तुम लंच नही लाये?

आअज टिफ़िन वाले की छुट्टी हैं.

हम्म...ठीक हैं आगे कहीं रोक लो.

विजय ने एक ज्यूस वाले के यहाँ जीप रोक दी. उसने ज्यूस वाले को दो गिलास ज्यूस के लिए कहा. वो दोनों गाडी में ही बैठे थे. कुछ ही देर में ज्यूसवाला ज्यूस ले आया.

यहीं मकान हैं उसका... विजय ने ज्यूस पीते हुए कहा.

क्या...किसका मकान?

वो उस लड़के याग्निक का...ये सामने वाला मकान ही हैं...और इस गली के अन्दर ही ताश्री की उस दोस्त का मकान हैं.

नंदिनी के ज्यूस हलक में ही रह गया.

फिर नंदिनी सामान्य हुई और अपना ज्यूस ख़त्म किया.

चलो चलते हैं.

कहाँ?

पूछताछ करके आते हैं....

हम दोनों तय समय पर होटल के नीचे पहुँच गये. मैंने पूजा को वहीँ रुकने को कहा.

तुम्हे कितना समय लगेगा. पूजा ने पूछा.

यहीं कोई लगभग आधा घंटा.

ताश्री! मुझे तो डर लग रहा हैं. अगर तुम यह नहीं करना चाहती तो रहने दे. मैं नहीं चाहती हूँ की मेरी वजह से तू किसी मुसीबत में पड़ जाए.

मेरी तू एक ही तो दोस्त हैं. अगर मैं तेरे ही काम नही आ सकती तो फिर मेरी इस शक्ति का मतलब ही क्या हैं? ये याग्निक आज के बाद कभी तुझे परेशां नही कर पायेगा ये मेरा तुझसे वादा हैं. तू मुझपर भरोसा रख कोई दिक्कत नही होगी. मैंने चेक किया वो पेन अब भी मेरी जेब में ही था.

अगर तू आधे घंटे के अन्दर नही आई तो मैं ऊपर आ जाउंगी.

ठीक हैं.

मैं होटल में चली गई. याग्निक के कमरे के बाहर जाकर मैंने डोरबेल बजाई. मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था, धड़कन दुगुनी रफ़्तार से चल रही थी. रोहित का मामला अलग था, वहां अगर मैं यादाश्त न भी मिटा पाती तब भी में उसे नियंत्रित कर ही सकती थी मगर यहाँ मामला दूसरा था.

कुछ देर बाद उसने दरवाजा खोला.

ताश्री...तुम! तुम यहाँ क्या कर रही हो? उसने चौंकते हुए पूछा.

अन्दर नही बुलाओगे मुझे? मैंने एक झूठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा.

हाँ...हां...आओ न? वो सकपका गया था.

तुम आखिर पूजा से चाहते क्या हो? मैंने बेड पर बैठते हुए कहा.

वो...वो..उसने तुम्हे क्या बताया?

यहीं की वो आज नही आएगी.

मगर क्यों?

उसे कोई जरुरी काम आ गया था.

ऐसा कैसे हो सकता हैं? वो जानती हैं न आज उसका मुझसे मिलना कितना जरुरी हैं.

हां...बेशक...तभी तो उसने मुझे भेजा हैं. ज़रा मुझे देखकर बताओ...क्या मैं उससे कम खुबसूरत हूँ.

न...नही....तुम भी खुबसूरत हो...

तो ज़रा मेरी आँखों में झांककर बताओ क्या ये किसी झील से कम गहरी हैं. मैंने अपना चश्मा उतार दिया.

हम्म...बिलकुल नही....

मैं जिस दिन से तुमसे मिली हूँ तबसे तुमसे कुछ कहाँ चाहती हूँ याग्निक! मैंने उसके पास आते हुए कहा.

क्या?

भाड़ में जाओ!!

मेरी आँखों के सामने एक रौशनी चमकी और में उसके दिमाग में थी. नीचे हरा-भरा घांस का भरा एक मैदान... ऊपर बिजलियों से चमकता हुआ एक आसमान जिसमें बादल गरज रहे थे. पास ही एक नदी थी जिसमे उसकी यादो के प्रतिबिम्ब दिख रहे थे. यह नदी पास ही एक पहाड़ से आ रही थी.

मैंने एक सीटी बजाई और कुछ ही देर में एक नीला घोडा मेरे सामने हाज़िर था. यह याग्निक का अंतर्मन था. मुझे देखकर एक बार तो वो जोर से हिनहिनाया. जैसे किसी अजनबी की घुसपैठ से परेशान हो. मैं उसके पास गयी और उसकी गर्दन पर हाथ फिराया.

शांत रहो...मैं तुम्हारी दोस्त हूँ. मुझे वहां ऊपर जाना हैं. मैंने पहाड़ की तरफ इशारा करते हुए कहा.

उसने एक बार मुझे देखा और फिर वो नीचे बैठ गया. अब मैं उसके ऊपर सवार थी और वो आसमान में उड़ रहा था. कुछ ही देर में हम उस पहाड़ पर थे. वहां चारो और टीवी स्क्रीन लगी हुई थी जिसपर उसकी यादे परिलक्षित हो रही थी. मैंने अपनी जेब से वो पेन निकाला और उसे घुर कर देखा, वो एक तलवार जितना बड़ा हो गया. अब मैं उन स्क्रीन्स के पास गयी और उन्हें एक-एक करके तोड़ने लगी.

यह देखकर वो घोडा जोर से हिनहिनाया.

चुपचाप वही खड़े रहो. मैंने उसे डपटते हुए कहा और वापस वो स्क्रीन्स तोड़ने लगी. यह उन यादो को मिटाने का एक तरीका था, इससे भले ही यादें पूरी तरह से न मिटे पर वो किसी काम की भी नही रहती थी. मैं पूरी मग्न होकर यह काम करने लगी तभी मुझे कुछ आवाज आई... मैंने पीछे मुड़ कर देखा, वो घोडा गायब हो चूका था और उसकी जगह एक जंगली कुत्ता खड़ा था.

अरे नही! अब यह एक दिक्कत थी. यह कुता वास्तव में अन्तर्मन का रक्षक था. मैं वहाँ से भागी. कुछ देर भागने के बाद में रुक गयी. मैं वापस उसी जगह आ गई थी. मैं पीछे मुड़ी और मैंने एक पत्थर उठा लिया. वो कुता रुक गया और वापस भाग गया जैसे वो डर गया हो. मैंने चैन की सांस ली और सामने मुड़ी. अब डरने की बारी मेरी थी. सामने वही तांत्रिक था. काला चोगा पहले, गले में रुद्राक्ष की माला और हाथ में एक त्रिशूल लिए हुए.

मेरे लिए यह वास्तव में डरने की बात थी. क्योंकि सपने में उस तांत्रिक का आना दूसरी बात थी और यहाँ अंतर्मन में आना एक दूसरी बात...मुझे अब समझ में आया था कि मैं जैसे-जैसे याग्निक के अंतर्मन की गहराइयों में उतरी थी, खुद के भी अंतर्मन की गहराई में उतरती गई थी और शायद इसी वजह से मेरा इस तांत्रिक से सामना हुआ हैं.

मैं भागने के लिए वापस पीछे मुड़ी मगर पीछे भी वो ही खड़ा था.

 


तुम ग्यारहवां सूत्र हो- तुम ग्यारहवां सूत्र हो. वो बार-बार यहीं बोल रहा था. मेरे चारो तरफ वो ही तांत्रिक था जैसे उसने एक घेरा बना लिया हो... और वो मेरे पास आने लगा.

मेरे पास मत आओ. मैंने उसे धमकाते हुए कहा मगर मेरी धमकी बेअसर थी. वो धीरे-धीरे मेरी और बढ़ रहा था.

तुम ग्यारहवां सूत्र हो. वो किसी मंत्र की तरह इस लाइन का जाप कर रहा था.

मैं ताश्री हूँ...ताश्री. मैं जोर से चिल्लाई. मैंने आसमान की तरफ देखा. बिजलियाँ और जोर से कडकने लगी और नीचे जमीं पर गिरने लगी. वहां हर तरफ बिजलियाँ गिर रही थी...वो सारी स्क्रीन्स उन बिजलियों से एक एक कर जलने लगी और तभी एक बिजली मेरे ऊपर आकर गिरी.

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मेरी आँख खुली तो मैं एक होटल के कमरे में थी. मेरा सर बहुत ही जोर से दर्द कर रहा था जैसे किसी ने इस पर तेजाब डाल दिया हो. मैंने ध्यान से देखा यह कमरा याग्निक का तो नही लग रहा था.

थैंक गॉड! तुम्हे होश आ गया. पूजा ने कहा. वो मेरे पास ही बैठी थी. उसके पास ही अंतस भी खड़ा था. अरे हाँ! यह तो अंतस का कमरा था. मैं थोड़ी सी उठी और अपने सर पर हाथ लगाया. उस पर कुछ लगा हुआ था किसी लेप के जैसा.

मैं यहाँ कैसे आ गयी?

हम दोनों लेकर आये हैं. तुम बेहोश हो गयी थी. अंतस ने कहा.

बेहोश!...मगर में बेहोश कैसे हो गयी?

वो तो तुम ही बता सकती हो. मैं कमरे पहुंची तब तक तो तुम और याग्निक दोनों बेहोश पड़े थे. पूजा ने कहा.

और तुम वहां कैसे पहुंचे? मैंने अंतस से पूछा.

मेरे कमरे में पहुँचने तक तुम दोनों बेहोश थे और तुम्हारे फोन पर अंतस का फोन आ रहा था मैंने फोन उठाया और इसे वहीँ बुला लिया. पूजा ने ही जवाब दिया.

और माँ....!

मैंने उन्हें फोन करके बोल दिया हैं आज तुम मेरे घर पर ही रुकोगी तुम्हे अपना बाकि का होमवोर्क करना हैं.

मगर हम तुम्हारे घर पर तो नही हैं.

इसके घर ले जाने और तुम्हारे घर ले जाने में ज्यादा फर्क नही हैं. दोनों जगह तुम्हे बहुत सारे जवाब देने पड़ते जो शायद् तुम देना नही चाहती.

मैं कुछ देर चुपचाप बैठी रही और स्थिति का आकलन करने लगी. मगर मुझे सरदर्द के आगे कुछ समझ ही नही आ रहा था.

ये मेरे सर पर क्या लगा रखा हैं.

चन्दन हैं....यह तुम्हारी कुण्डलिनी उर्जा को नियंत्रित करने में मदद करेगा. अंतस ने कहा.

मतलब?

मतलब यह कि तुम्हे जो हुआ था वो दरअसल कुण्डलिनी उर्जा का आधिक्य प्रवाह था जो तुमने अपने बाकि चक्रों से आग्नेय में खींच ली थी...इससे तुम्हारी उर्जा का संतुलन बिगड़ गया और तुम बेहोश हो गयी.

मगर मैं तो उसके दिमाग में थी?

यही तो समस्या थी...इसीलिए तुम अपनी उर्जा को नियंत्रित नही कर पायी. तुम उसके दिमाग को नियंत्रित जरुर कर रही ही मगर वास्तव में तुम दोनों के दिमाग आपस में जुड़े हुए थे.

मुझे अंतस की जानकारी पर आश्चर्य हो रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे उसने इस विषय पर पी.एच.डी. कर रखी हो. पूजा तो बस हम दोनों को आँखे फाड़ कर देख ही रही थी जैसे हम दोनों किसी दूसरी दुनिया की भाषा में बात कर रहे हो.

मुझे तो उस लड़के याग्निक की फिकर हो रही हैं. अगर तुम्हे छह घंटे लगे हैं होश आने में तो उसका क्या हाल हुआ होगा. अंतस ने कहा.

क्या मैं...छह घंटे से बेहोश थी

नंदिनी और विजय याग्निक के घर के बाहर पहुंचे. नंदिनी का दिल जोरो से धड़क रहा था मगर वो निश्चिन्त थी, आखिर इस दिन के लिए ही तो उसने सालों से इंतज़ार किया था. विजय ने दरवाजा खटखटाया. एक औरत ने दरवाजा खोला. नंदिनी पहचान गई, यह याग्निक की पत्नी वैदिक थी पर शायद वो नंदिनी को नही पहचान पाई थी.

इंस्पेक्टर विजय आप! सब ठीक तो हैं न? याग्निक की बीवी ने उन्हें देखकर कहा.

विजय- ये एसीपी साहिबा हैं. ताश्री के केस में कुछ पूछताछ करना चाहती हैं.

वैदिका- उसके खुनी के बारे में कुछ पता चला क्या?

नंदिनी- नहीं लेकिन जल्द ही चल जाएगा. आप ताश्री के बारें में क्या जानती हैं?

वैदिक- ताश्री के मर्डर के पहले मैने कभी ताश्री का नाम भी नही सुना था. मैं पूजा को जरुर जानती थी, वो मेरे पड़ोस में रहती थी.

नंदिनी- पूजा का आपके घर आना-जाना होता था?

वेदिका- नही...एक दो बार मिली जरुर थी लेकिन घर पर कभी नही आई थी.

नंदिनी- आपके पति कहाँ हैं?

वेदिका- वो अन्दर कमरें में ही हैं... आप मिल लीजिये तब तक में चाय बना लाती हूँ.

मैं इससे अकेले में बात करना चाहती हूँ. नंदिनी ने विजय से कहा. विजय ने हां में गर्दन हिला दी.

अन्दर एक कमरें में याग्निक फर्श पर बैठा हुआ था. ढीले-ढाले कपडे, अस्त-व्यस्त बाल, खुद से बाते करते हुए किसी बच्चे की तरह खेल रहा था.

याग्निक! नंदिनी ने याग्निक को धीरे से पुकारा. एक अनजाने खौफ ने अब भी नंदिनी की आवाज को दबा रखा था. याग्निक ने एक बार नंदिनी की और देखा.

वैदिका बाहर हैं, उसने कहा और वापस खेलने लग गया.

याग्निक! मैं नंदिनी हूँ. नंदिनी ने उसके पास बैठते हुए कहा.

वैदिका! नंदिनी आई हैं. याग्निक ने वेदिका को जोर से आवाज लगाई. उसने नंदिनी की तरफ देखा तक नही,

नंदिनी को अब गुस्सा आने लगा था, तुम मुझे ऐसे नही भूल सकते याग्निक. तुमने मेरी ज़िन्दगी बर्बाद कर दी और अब तुम मुझे पहचान तक नही रहे हो.

याग्निक- चलो हम घर-घर खेलते हैं. ये मेरी वेदिका, ये मैं और ये तूम...लेकिन तुम हमारे घर में नही रहोगी. तुम बाहर खेलोगी. तुम गन्दी हो, वैदिका अच्छी हैं.

नंदिनी- बकवास बंद करो, तुमने न जाने कितनी लडकियों की ज़िन्दगीयां उजाड़ी हैं, मैं तुम्हे कभी माफ़ नही करुँगी...

याग्निक ने कुछ नंदिनी की ओर देखा वो चुप हो गयी. वो कुछ देर नंदिनी की ओर देखता रहा और फिर बोला ‘धप्प!’ और वो हंसने लगा, उल्लू बनाया...नंदिनी को उल्लू बनाया.

नंदिनी गुस्से में थी. वो और भी कुछ कहना चाहती थी मगर उसने कुछ नही कहा. वो समझ चुकी थी कि अब इसका कोई फायदा नही हैं, याग्निक सच में अपनी सोचने समझने की शक्ति खो चूका था.

नंदिनी बाहर आ गई. उसने लाख कोशिश की लेकिन अपने आंसुओ को पलकों तक पहुँचने से न रोक पाई. विजय ने उसे आँखे पौंछते हुए देख ही लिया. तब तक वैदिका भी चाय लेकर आ गई.

वैदिका- तुम नंदिनी हो. मैं सोच ही रही थी, मैंने तुम्हे कहाँ देखा हैं? उस दिन के बाद हमारी मुलाकात ही नही हुई.

नंदिनी- हां..मैं वो ट्रेनिंग के लिए शहर से बाहर चली गयी थी.

वैदिका- लेकिन तुम तो याग्निक के साथ हॉस्पिटल में काम करती थी न?

नंदिनी- वैदिका, आपके पति की यह हालत कैसे हुई?

वेदिका- पता नही..एक दिन होटल के कमरे में बेहोश मिले थे. डॉक्टर ने बताया कि कोई बड़ा सदमा लगने की वजह से इनकी यादाश्त चली गई.

नंदिनी- ...और आपने कभी सोचा नहीं वो वहां होटल में क्या कर रहे थे?

वैदिका चौंक गयी- वो होटल में...?

नंदिनी- विजय तुमने इन्हें कभी नही बताया की हम ताश्री के मामले में याग्निक से क्यों पूछताछ कर रहे हैं?

विजय- मैडम वो...हमने इन्हें बताया था ताश्री की डायरी में याग्निक का भी था.

नंदिनी- ...और किस तरह का जिक्र हैं यह?

विजय- यही की वो ताश्री का दोस्त था. विजय ने नंदिनी की आँखों में आँखे डालकर कहा, जैसे वो नंदिनी से अब रुक जाने के लिए कह रहा हो.

नंदिनी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई. मुझे आपके पति के लिए अफ़सोस हैं, मैं दुआ करुंगी की वो जल्द से जल्द ठीक हो जाए.

विजय और नंदिनी दोनों बाहर आ गए.

विजय- आप याग्निक को जानती थी?

नंदिनी- हां, वो मेरा पुराना दोस्त हैं.

विजय- और ताश्री को?

नंदिनी- नही. मैंने पहले कभी उसके बारे में नहीं सुना. तुमने पूजा का घर कौनसा वाला बताया था?

विजय- वो इस गली में आखिरी वाला..मगर अब वो यहाँ नही रहती हैं.

नंदिनी- तो?

विजय- उसकी शादी हो गयी हैं, वो अब अपने ससुराल हैं.

-ताश्री! मुझे अब चलना चाहिए. पूजा ने कहा.

-चलना चाहिए का क्या मतलब! तुम यहाँ नही रुकोगी?

-नहीं, मैंने तुम्हारे घर पर झूठ बोला था, अपने घर पर नही. मुझे जाना होगा.

-...और मैं यहाँ इसके साथ अकेली रहूंगी?

-मुझे लगा यह तुम्हारा बॉयफ्रेंड हैं. उसने बेतल्खी से कहा. मैंने गुस्से से पूजा को घुरा.

तभी अन्तस बोला- वैसे तुम्हे मेरे साथ रहने की जरुरत नही हैं. मैंने इसी होटल में दूसरा कमरा ले लिया हैं. तुम यहाँ आराम से रह सकती हो.

पूजा उसके बाद अपने घर चली गई. मुझे अजीब लग रहा था, मैंने जिसके लिए यह आफत मौल ली थी वो ही मुझे इस मुसीबत में अकेला छोड़ कर चली गयी थी.

-लगता हैं तुम्हारी दोस्त हमारे बारे में नही जानती हैं. पूजा के जाने के बाद अंतस ने कहा.

-मैं खुद कौनसा जानती हूँ जो वो जानेगी.

-वो मुस्कुरा दिया. मेरे हर सवाल पर वो मुस्कुरा देता था, जैसे उसकी मुस्कराहट उसके सारे रहस्यों लगी ताला हो, जिसे में चाह कर भी नही खोल सकती थी.

-मुझे भूख लगी हैं. मैंने कहा.

-मैंने खाना आर्डर कर दिया हैं. आता ही होगा.

-..और यह सरदर्द कब तक रहेगा?

-कुछ घंटे, कुछ दिन, कुछ महीने या फिर कुछ साल!

-साल का क्या मतलब? मुझे ज़िन्दगी भर ऐसा सरदर्द रहेगा?

-उड़ने से पहले गिरने के बारें में पता कर लेना चाहिए. अगर पेड़ की जड़ो के साथ खिलवाड़ करोगी तो पूरा पेड़ ही हिल जाएगा. वैसे अगर तुम चाहो तो मैं तुम्हारी मदद कर सकता हूँ.

-वो कैसे?

-जिस तरह से पानी ऊपर चढ़ता हैं वह नीचे भी उतर सकता हैं, नियमित ध्यान से यह उर्जा वापस अपने स्त्रोत तक पहुँच जाएगी, मैं तुम्हारी इसमें मदद कर सकता हूँ.

तभी खाना आ गया. खाना खाकर वो अपने कमरे में सोने चला गया.

मैंने सोने की कोशिश की लेकिन मुझे नींद नही आ रही थी. दिन को छह घंटे सोने के बाद भला नींद आती भी तो कैसे? मैंने कुछ देर टीवी देखी लेकिन टीवी पर भी होमशॉप 18 और हनुमान कवच के अलावा कुछ आ नही रहा था. पुरे दिन बकवास सीरियल दिखाने वाले चैनल रात को धर्म की दुकाने बन जाते हैं. वैसे भी मुझे सिरदर्द की वजह से कुछ देखने की इच्छा ही नही हो रही थी.

अचानक मैंने सोचा की क्यों न अंतस के रूम की तलाशी ली जाए आखिर पता तो चले की ये हैं क्या?

 
मैं कमरे में इधर-उधर ढूंढने लगी. उसके कमरे में बहुत सी अजीब चीजे थी, जैसे अलग अलग तरह की आयुर्वेदिक दवाइयाँ, बहुत सारी किताबे जो आध्यात्म, ध्यान और मनोविज्ञान से जुडी हुई थी. कुछ ऐसी चीजे जिनका कोई तुक ही नही था जैसे कि मोर पंख, सफेद पत्थर कुछ् जानवरो के दांत...पता नही क्या क्या सामान था इसके पास? मैंने पहली बार किसी के पास ऐसा सामान देखा था.

तभी मुझे एक ड्रावर में गले में पहनने की माला मिली, बड़े-बड़े मोतियों की उस माला के में सोने का एक त्रिशूल था, जो की हूबहू वैसा ही था जैसा की मझे स्टोर रूम में मिले उस बक्से के ऊपर था. उस माला के नीचे एक लिफाफा पड़ा था. मैंने उस लिफाफे को उठा कर खोला तो उसके अंदर एक फ़ोटो थी, एक छोटी बच्ची की, यह तो मेरी ही तस्वीर थी.

भला* मेरी बचपन की फोटो इसके पास क्या कर रही हैं और यह त्रिशूल का निशान, यह अंतस के पास कैसे आया? क्या अंतस मेरी माँ को जानता हैं, क्या उसने सच कहा था की वो मुझे तबसे जानता हैं जबसे मैं पैदा हुई हूँ. लेकिन अगर वो मुझे जानता हैं तो मैं उसे क्यों नही जानती?

नींद तो मुझे वैसे भी नही आ रही थी और जो आने वाली थी वो भी उड़ गयी. मैं अब इस आदमी पर और भरोसा नही कर सकती, मुझे इसकी हकीकत जाननी ही होगी. मैं सुबह चार बजे सोई और जब उठी तब तक नो बज चुकी थी. अंतस ने दरवाजा खटखटाया. मैं उठ कर बैठ गई मेरा दिल तेजी से धड़क रहा था. मैंने अपना चश्मा पहन और दरवाजा खोला.

शुक्र हैं तुम उठ गई, वरना मुझे तो लगा था आज भी तुम्हारा पुरे दिन सोने का इरादा हैं. वो कहते-कहते अंदर आ गया. मैं खामोश खड़ी थी.

तुम्हारा सरदर्द अब कैसा हैं?

ठीक हैं।* मैंने धीरे से कहा.

चलो जल्दी से तैयार हो जाओ, मैं तुम्हे घर छोड़ आता हूँ. उसने कुछ अस्तव्यस्त पड़े सामान को व्यवस्थित करते हुए कहा.

अंतस! मैंने वही खड़े हुए कहा. उसने मेरी ओर प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा.

तुम कौन हो? मैं बेड के पास आ गयी, जहाँ वो खड़ा था.

मतलब?

मैंने बेड के ड्रावर से वो माला और वो तस्वीर निकाल कर उसके सामने रख दी.

जिज्ञासा एक बहुत ही बुरी चीज हैं अगर इसे नियंत्रण में न रखा जाये . उसने वो माला उठा कर हाथ में ले ली.

मगर अज्ञानता से तो बेहतर ही हैं. मैं एक हाथ अपनें चश्में की तरफ ले गयी.* मुझे सब बताओ अंतस! वरना फिर मुझे दूसरा तरीका अपनाना होगा.

वो हंसा. अगर तुम यह करना चाहती तो तुम पहले ही कर चुकी होती.*

वो सच कह रहा था. हर चीज के* कुछ फायदे होते हैं तो कुछ नुकसान भी होते हैं. सबकुछ जानना एक श्राप हैं, क्योंकि किसी के बारें में सबकुछ जानने के बाद हम उससे प्यार नही कर सकते. यहीं वजह थी कि सच* जानने की इतनी तड़प होने के बावजूद* मैं आजतक अंतस की आँखों में नही देख पाई थी.**

मगर अब तुम मुझे मजबूर कर रहे हो. मैंने कहा.

वह चुपचाप खड़ा रहा जैसे कोई निर्णय ले रहा हो.

मैं उसके जवाब के इंतज़ार में थी.

मैं एक तांत्रिक हूँ.* उसने माला लेकर गले में पहनते हुए कहा.

तुम मज़ाक कर रहे हो. मैंने आस्चर्य से उसकी और देखा.

क्यों तुम्हे क्या लगा कि सिर्फ बड़ी दाढ़ी वाले और काला चोगा पहनने वाले ही तांत्रिक हो सकते हैं?

मेरा दिमाग घूमने लगा. कुछ कुछ अब साफ़ होने लगा था. वो सपनो का आना, फिर अंतस का मुझसे मिलना...शायद वो सपने चेतावनी थे कि मुझे अंतस से दूर रहना चाहिए...और मैं पागल उस पर ही विश्वास करने लगी थी.

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क्या मैं अंदर आ सकता हूँ मैडम? राणा ने पूछा. कुछ फाइलो को देखती नंदिनी अचानक चोंक गयी.

नंदिनी- अरे राणा साहब आप? आइये बैठिये. आज इधर का रास्ता कैसे भटक गए.?

राणा- बस इधर से गुज़र रहा था तो सोचा कि बस मिलता चलूँ आपसे.

नंदिनी- चलिए अच्छा किया. वैसे भी मैं आपसे बात करने ही वाली थी.

राणा- किस सिलसिले में?*

नंदिनी- आपको अपने पर्लटॉप होटल पर भी ध्यान देना चहिये.

राणा- क्यों? वहां क्या ख़ास हैं?

नंदिनी- आपके लिकर का लाइसेंस ख़त्म हो चूका हैं...

राणा ने नंदिनी को सवालिया नज़र से देखा.

नंदिनी- पिछली बार भी आपने लेट रिन्यू करवाया था. डिपार्टमेंट ताक में बैठा हैं. आगे फिर आपकी जिम्मेदारी होगी.

राणा- हा हा हा...शुक्रिया. अच्छा हुआ आपने बता दिया वरना ज्यादातर पुलिस वाले तो छापा मारने के बाद ही बताते हैं.

नंदिनी- मेरा मानना हैं कि जब तक जरूरत न हो ताकत का प्रयोग नही करना चाहिए...

नंदिनी बात करते करते अचानक रुक गयी. उसकी नज़र राणा के गले में पड़ी एक माला पर पड़ी जिसमें एक त्रिशूल लटका था.

राणा ने नंदिनी की नज़रो को भांप लिया.

राणा- क्या हुआ?

नंदिनी- यह माला?

राणा- आपको पसंद आई? मैं आपके लिए भी एक भिजवा दूंगा.

नंदिनी- नही..उसकी जरूरत नही हैं. यह अपने कहीं से खरीदी थी?

राणा- नही मेरे पिता ने दी थी मेरे को? क्यों कोई ख़ास बात हैं?

नंदिनी- आप ताश्री को जानते थे?

कौन ताश्री? राणा ने सीधे होते हुए कहा.

वही लड़की जिसका दो साल पहले मर्डर हो गया था.

राणा- अरे हां..याद आया. विजय उस वक्त मेरे पास पूछताछ करने के लिए आया था. कह रहा था उस लड़की की डायरी में मेरा नाम भी हैं. अब भला इतने बड़े आदमी के बारे में अख़बार वाले कुछ का कुछ छाप देते हैं. कोई लड़की अपनी डायरी में कुछ लिख दे तो मैं क्या कर सकता हूँ?

नंदिनी- उस लड़की के कातिल के पास भी ऐसी ही माला थी जैसी की आपके गले मैं हैं.

राणा- मिस नंदिनी! यह बस एक त्रिशूल हैं. दुनिया में लाखो* शिवभक्त हैं* और उनमें से कई ऐसी रुद्राक्ष की माला पहनते हैं. कल को अगर मैं ऐसी ही माला आपको भेंट कर दूँ तो क्या आप भी इस केस में शामिल हो जाएगी?

नंदिनी- मगर ताश्री ने मेरे बारें में अपनी डायरी में नही लिखा हैं.

राणा- पता नही आप भी कौनसे गढ़े मुर्दे उखाड़ने बैठ गई हैं? आपके पास आज के केस कम हैं जो आप यह दो साल पुराना केस लेकर बैठी हैं. वैसे आपके हवलदार की तबियत कैसी हैं?

नंदिनी- आपको इस बारें में कैसे पता?

राणा- अगर आप मेरी मदद कर सकती हैं तो आपकी मदद करना मेरा भी फ़र्ज़ बनता हैं.

नंदिनी- मदद... कैसी मदद?

राणा- आपके हवलदार पर फायरिंग करने वाले ड्राईवर अभी एमजी रोड पर शाह ढाबे पर खाना खा रहे हैं.

क्या? नंदिनी चोंक गयी.

राणा जाने के लिए उठ खड़ा हुआ. अब आज्ञा चाहूँगा मैडम!

राणा के जाते ही नंदिनी ने विजय को आवाज लगाई.*

विजय- जी मैडम.

नंदिनी-* रामनायक पर हमला करने वालो के बारें में पता चल गया हैं. वो अभी एमजी रोड पर एक ढाबे पर हैं.

विजय- आपको राणा ने बताया?

नंदिनी- हाँ...क्यों?

विजय- कुछ नहीं...मैं जीप निकालता हूँ.*

नंदिनी और विजय कुछ देर बाद ढाबे पर थी.

विजय जीप से उतरे हुए एक ट्रक की तरफ देखता हैं. 4091...मैडम यही ट्रक हैं.

नंदिनी- मतलब की खबर पक्की हैं.

दोनों ढाबे के काउंटर पर पहुँचते हैं.

नंदिनी(ट्रक की तरफ इशारा करते हुए)- उस ट्रक का ड्राईवर कहाँ हैं?

उस आदमी ने खाट पर बैठ कर शराब पी रहे दो आदमियों की तरफ इशारा किया. वो दोनों नंदिनी और विजय को देखते ही भागे. नंदिनी और विजय भी उन दोनों के पीछे भागे.

कुछ दूर जाकर एक को तो विजय ने पकड़ लिया, दूसरे के पीछे नंदिनी थी. थोडा सा आगे जाकर उस आदमी ने पिस्तौल निकली और नंदिनी पर गोली चला दी. गोली नंदिनी के कंधे को छुकर निकल गयी. इतने में पीछे से विजय ने भी गोली चला दी, गोली उस आदमी के पैर में लगी थी. वो वहीँ नीचे गिर गया. विजय पास में आ गया.

विजय- आप ठीक तो हैं मैडम?

नंदिनी ने दूसरे हाथ से अपने ज़ख्म को दबा लिया. हां ठीक हूँ. निशाना चूक गया.

विजय उस ड्राईवर के पास गया और खींच कर दो थपड लगाये. हरामखोर पुलिस वाले गोली चलाता हैं. विजय ने तीन-चार लात-घूंसे और लगा दिया.

नंदिनी- बस विजय....इन्हें जीप में बिठाओ.

विजय उन दोनों को हथकड़ी डाली और जीप में पीछे बिठा दिया.

विजय- हिम्मत तो देखो कमीनो की. पुलिस वालो पर हमला करते हैं. बेटा तू तो लंबा अंदर जाएगा. विजय ने जीप में बैठते हुए कहा. मैडम में आगे हॉस्पिटल पर रोक देता हूँ.

नंदिनी- नही उसकी जरुरत नही हैं. ज़ख्म ज्यादा नही हैं. पहले इनको थाने पहँचते हैं फिर मैं हॉस्पिटल दिखा दूंगी.

थाने जाने के बाद वो दोनों हॉस्पिटल पहुंचे. पट्टी करवाकर दोनों बाहर आये.

विजय- मैडम मैं आपको घर छोड़ देता हूँ.

नंदिनी- कोई बात नही...मैं चली जाउंगी.

विजय- ऐसे में ड्राइव करना मुश्किल होगा. मैं छोड़ दूंगा.

ओके. नंदिनी ने कुछ सोचकर कहा. रास्ते में काफी देर दोनों खामोश रहे.

आज आप खाने का क्या करेगी. ऐसे में खाना बनाना तो पॉसिबल नही होगा. विजय ने चुप्पी तोड़ते हुए कहा.

नंदिनी- हां मैं देखती हूँ कुछ...बाहर से मंगवा लुंगी.

विजय- अगर आप चाहे तो शाम को हम दोनों बाहर डिनर पर चल सकते हैं. विजय ने नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा.

नंदिनी- नही...नही..कोई बात नही...मैं मैनेज कर लुंगी.

विजय- जी...मैडम...विजय वापस सामने देखने लगा. शायद उसे इतने सख्त जवाब की उम्मीद न थी. कुछ देर के लिए दोनों वापस खामोश हो गए.

एनीवे थैंक्स विजय. कुछ देर बाद नंदिनी बोली.

विजय- किसलिए मैडम?

नंदिनी- मेरी जान बचाने के लिए...तुम अगर ठीक समय पर फायर न करते तो दूसरी गोली मेरे भेजे में होती. शायद बिना टीम के जाना मेरी गलती थी.

विजय- नही मैडम...अगर हम इंतज़ार करते तो हो सकता था की वो हमारे हाथ से निकल जाते.

इतने में नंदिनी का घर आ गया. नंदिनी जीप से उतर कर आगे गयी और वापस मुड़ी. विजय उसे ही देख रहा था. नंदिनी को मुड़ते देख उसने नज़रे झुका ली.

आठ बजे. नंदिनी ने पास आकर कहा.

विजय- जी मैडम?

नंदिनी- डिनर...हम आठ बजे चलेंगे.*

विजय- जी मैडम बिलकुल.

नंदिनी- ...और तुम मुझे नंदिनी बुला सकते हो....यह मैडम बिलकुल अजीब लगता हैं.

विजय- जी मैडम...आई मीन नंदिनी.

नंदिनी मुस्कुरा दी. विजय के चेहरे पर भी मुस्कान आ गयी.**

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मैं वही बैड पर ही बैठ गयी. मुझे समझ में नही आ रहा था कि यह हो क्या रहा हैं.

-मुझे घर जाना हैं. मैंने कहा.

-हां...मैं तुम्हे छोड़ देता हूँ.

-नहीं मैं चली जाउंगी. मैंने अपना बैग उठाया और घर आ गयी. घर पहुंची तब तक माँ एनजीओ जाने की तैयारी कर रही थी.

-आ गयी तू! इतनी थकी-थकी क्यों लग रही हैं? माँ ने मुझे घूरते हुए कहा.

-वो रात को काफी लेट तक पढ़ाई कर रही थी.

-तो आज कॉलेज नहीं जाएगी?

-आज वैसे भी छुट्टी हैं.

-हम्म...मैंने खाना बना के रख दिया हैं तुम खा लेना.

उसके बाद माँ निकल गयी. मुझे अब भी काफी जोर से सिरदर्द हो रहा था. मैं नहाने चली गयी. नहाकर निकली ही थी की दरवाजे की घंटी बजी. मैंने फटाफट चेंज किया और दरवाजा खोला. यह पूजा थी.

-अब तबियत कैसी हैं तुम्हारी? पूजा ने पूछा.

-अब ठीक हैं मगर यह सरदर्द ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रहा हैं.

-कब आई थी वहां से? पूजा ने सोफे पर बैठते हुए कहा.

-अभी आधे घंटे पहले. मैं भी सामने ही बैठ गयी.

-कुछ हुआ था क्या? उसने धीरे से पूछा.

-क्या बकवास कर रही हैं. मैं उस लड़के को जानती तक नही हूँ.

-जानना क्या हैं? हैंडसम हैं, स्मार्ट हैं और पैसे वाला भी लगता हैं.

मैं अब गुस्से में आ गई थी.* -तेरे को इतना ही पसन्द हैं तो तू ही करले तेरा तो वैसे भी....मैं कहते कहते रुक गई. पूजा रुआंसी हो गयी थी. -सॉरी....मैंने कहा.

-कोई बात नही...बट थैंक्स यार... तूने मेरे लिए जो किया हैं उसका एहसान मैं ज़िन्दगी भर नही चूका सकती.

-ऐसी कोई बात नही हैं. तु मेरी दोस्त हैं. अगर तू पहले ही बता देती तो अच्छा होता.

-मैं डर गयी थी यार. मुझे लगा जाने तू मेरे बारे में क्या सोचेगी?

-तु मेरी सबसे अच्छी दोस्त हैं और रहेगी. भले ही तु प्रेग्नेंट ही क्यों न हो जाए. मैंने हँसते हुए कहा. वो भी हंसने लगी. वैसे उस लड़के का क्या हुआ? मैंने पूछा.

-कल शाम को ही उसे घर लाए थे. लोग कह रहे थे उसकी यादाश्त चली गयी हैं. शायद पागल ही हो गया हैं.

- क्या? यह मैंने क्या कर दिया?

- कोई बात नही ताश्री. अच्छा ही हुआ. ऐसे लोगो के साथ तो ऐसा ही होना चाहिए. पता नही उसने और कितनी लड़कियो की ज़िन्दगी बर्बाद की होगी.

मैं सोचने लगी. मुझे अफसोस ही हो रहा था.

-चल ठीक हैं..मैं चलती हूँ मुझे मार्किट भी जाना हैं. पूजा ने उठते हुए कहा.

पूजा के जाने के बाद मैंने खाना खाया और सो गयी. कुछ देर बाद मुझे झटका सा लगा. जैसे किसी ने मुझे बिजली का शोक दिया हो. मेरी नींद खुल गयी. यह माँ थी मेरे पास में बैठ कर मेरा सर दबा रही थी.

-तबीयत तो ठीक हैं तेरी? माँ ने पूछा.

-हाँ...बस थोडा सा सरदर्द हैं. मैंने उठते हुए धीरे से कहा.

चल उठ जा. मैं चाय बना रही हूँ पी लेना.

माँ के जाने के बाद मैंने अपना मोबाइल चेक किया तो देखा की 10-12 मिस्ड कॉल थी. सारे के सारे किसी अननोन नंबर से थे. शायद मेरा फोन साइलेंट मोड पर था.* ये अंतस भी जाने कब मेरा पीछा छोड़ेगा.* मैंने मन ही मन सोचा. तभी वापस फोन बजा. मैंने फोन उठाया.

-क्यों बार-बार फोन कर रहे हो? मुझे तुमसे बात नही करनी हैं...मैंने गुस्से से कहा.

-ताश्री! मैं रोहित बोल रहा हूँ.* वो पूजा....

- क्या हुआ पूजा को? मैंने घबराते हुए कहा.

-वो पूजा का एक्सीडेंट हो गया हैं. जल्दी से सिटी हॉस्पिटल पहुँचो.*

आसमान में काले घने बादल छाए हुए थे. कहीं बरस चुकी बरसात की ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी जिससे मौसम सुहाना हो चूका था. एक ओपन रेस्तरां में खुले गार्डन में एक टेबल पर नंदिनी और विजय बैठे थे.

नंदिनी- तुम अपनी फेमिली को यहाँ क्यों नहीं ले आते?

विजय- मेरा कोई नही हैं.

नंदिनी- मगर तुमने तो कहा था कि तुम्हे गोद लिया गया हैं?

विजय- हाँ, मगर कुछ समय पहले ही मेरे पिता गुजर गये थे.

नंदिनी- ओह, आई एम् सोरी! तुम्हे यहाँ अकेलापन महसूस नही होता.

विजय- अकेली तो आप भी हैं.

नंदिनी- मेरी बात अलग हैं...मुझे आदत हैं.

विजय- आपने अब तक शादी नही की?

नंदिनी एक सेकंड के लिए चुप हो गयी.

नन्दिनी- मुझे शादी नही करनी हैं.

विजय- मतलब?

नंदिनी- मुझे रिश्तो से नफरत हैं?

विजय- और इस नफरत का कारण क्या हैं...डर या अनुभव?

नंदिनी- तुम्हे मुझे देख कर लगता हैं कि मुझे डरने की जरूरत हैं?

विजय- लोग अक्सर वो नही होते हैं जो वो दीखते हैं या दिखना चाहते हैं?

नंदिनी- मेरी छोड़ो. तुम अपनी सुनाओ, तुम्हे कोई नही मिला.

विजय- मैंने ऐसा कब कहा?

नंदिनी- मतलब की तुम्हारी ज़िन्दगी में कोई हैं?

विजय- हैं नही थी.

नंदिनी- छोड़ कर चली गयी?

विजय- हां...हमेशा के लिए.

नंदिनी- ओह...आई एम् सोरी.

अब तक दोनों खाना खा चुके थे. वेटर बिल लेकर आ चूका था. विजय ने बिल पे किया.

नंदिनी- एक सेकंड...मैं वाशरूम जाकर आती हूँ.

नंदिनी उठकर वाशरूम के लिए निकल गयी. अंदर कांउटर पर एक लड़की बैठी थी. नंदिनी ने उससे पूछा, एस्क्युज़ मी, यह वाशरूम किधर हैं?

जी आप आगे से लेफ्ट ले लीजियेगा. ठीक सामने ही हैं. लड़की ने ऊपर देखकर मुस्कुराते हुए कहा. जब उस लड़की ने ऊपर देखा तो नंदिनी को वो कुछ जानी पहचानी सी लगी.

तुम...तुम पूजा हो न? नंदीनी ने पूछा.

पूजा- जी...मगर आप कौन?

नंदिनी- मैं एसीपी नंदिनी हूँ. तुम यहाँ काम करती हो?

पूजा- नहीं यह मेरे हस्बैंड का रेस्टोरेंट हैं.

नंदिनी- तुम्हारे हस्बैंड?

पूजा- जी...रोहित सिंघानियाँ...

पूजा ने एक बैसाखी पकड़कर उठते हुए कहा.

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रेस्टोरेंट के एक कमरे में नंदिनी, विजय और पूजा तीनो बैठे थे.

पूजा- ...तो आप ताश्री के केस की फिर से जांच कर रही हैं?

नंदिनी- ऑफिशियली नही...बस अपने लेवल पर.

पूजा- किसलिए?

नंदिनी- मैं ताश्री के कातिल को सालाखो के पीछे पहुँचाना चाहती हूँ.

पूजा- ...और आप भी अंतस को ही कातिल मान रही हैं.

नंदिनी- क्यों, तुम्हे ऐसा नही लगता?

पूजा- अंतस ताश्री से बहुत प्यार करता था, ताश्री को छोटी सी खरोंच भी आये तब भी वो बर्दाश्त नही कर पाता था, मैंने देखा था उस दिन जब ताश्री बेहोश हो गयी थी, अंतस ने ताश्री को किसी बच्ची की तरह संभाला था...और आपको लगता हैं कि ताश्री को अंतस ने मारा हैं.

विजय- किसी के दिल में क्या हैं यह कौन जान सकता हैं, तुम अंतस को जानती ही कितना हो?

पूजा- इंस्पेक्टर विजय! मैं अंतस को तो ज्यादा नही जानती थी मगर ताश्री को अच्छी तरह से जानती थी और अंतस के साथ ताश्री खुद को सबसे ज्यादा सुरक्षित महसूस करती थी.

नंदिनी- तब भी ताश्री के असली हत्यारे को सजा मिलना जरुरी हैं. इसलिये जो कुछ भी तुम जानती हो बता दो.

पूजा- मुझे जो कुछ भी मालुम था वो तो मैं पहले ही इंस्पेक्टर विजय को बता चुकी हूँ.

नंदिनी- हां, मगर कुछ ऐसा जो तुम उस वक्त न बता पायी हो, या फिर तुम्हे बाद में पता चला हो, आखिर तुम ताश्री की सबसे अच्छी दोस्त थी.

पूजा कुछ देर शुन्य में देखने लगी. हां बिलकुल. ताश्री मेरी सबसे अच्छी दोस्त थी. लेकिन मैं सबकुछ पहले ही बता चुकी हूँ. मेरे पास अब नया कुछ नही हैं. अब अगर आप इज़ाज़त दे तो मैं जाना चाहूंगी, अभी वीकेंड हैं तो बहुत रश चल रही हैं रेस्टोरेंट में...

नंदिनी- हां क्यों नही..

पूजा का यह बर्ताव नंदिनी की उम्मीदों के बिलकुल विपरीत था. उसे लगा था की ताश्री के केस की वापस जांच के बारे में सुनकर वो खुश होगी.

नंदिनी- यह इतना रुखा बर्ताव क्यों कर रही थी?

विजय- इतना सब सहने के बाद किसी से उम्मीद भी क्या की जा सकती है?

नंदिनी- मतलब?

विजय- जब ताश्री का मर्डर हुआ था, इसकी शादी होने वाली थी, एक तो सबसे अच्छी दोस्त को खोने का गम, एक्सीडेंट का सदमा और उपर से पुलिस की रोज रोज की पूछताछ से ये परेशान हो गयी थी. तब इसके परिवार वालो ने एसीपी सर से स्पेशल रिक्वेस्ट की थी, उससे इस केस में और पूछताछ न की जाए.

नंदिनी- हम्म...मतलब याग्निक की तरह यह भी एक डेड एंड ही हैं.

विजय- ऐसा ही समझ लीजिये.

तभी नंदिनी को किसी का फोन आया. बात करने के बाद विजय ने पूछा. कल कहीं जाना हैं?

नंदिनी- हां, वो आश्रम में रेनोवेशन करवाया हैं और संसथापक की एक मूर्ति भी लगवाई हैं, वो चाहते हैं की मैं उसका आनावरण करूँ.

विजय- यह तो काफी अच्छी बात हैं.

नंदिनी- हां मगर दिन का प्रोग्राम हैं.

विजय- तो तुम कल थाने से छुट्टी ले लो...आई मीन आप..

तुम चलेगा. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.

 


मैं जल्दी से सीटी हॉस्पिटल पहुंची. पूजा के मम्मी पापा भी वहीँ थी. उन दोनों का रो-रो कर बुरा हाल हो रहा था. उनके कोई रिश्तेदार थे साथ में जो उन्हें ढाढस बंधा रहे थे. मैं उनके पास गयी लेकिन ज्यादा बात नही कर पायी. कुछ देर में मुझे सामने से रोहित दवाइयां लेकर आता दिखा. वो दवाइयां देकर मेरे पास आया.

-ये कैसे हुआ?

-रोड क्रोस करते हुए, कोई कार वाला टक्कर मारकर चला गया.

-मगर तुम्हे कैसे पता चला?

-पूजा मुझसे ही मिलने आई थी.

-अब कैसी हैं वो?

-डॉक्टर ऑपरेट कर रहे हैं, अभी कुछ बताया नही हैं.

मुझे रोना आ गया. मैं वही पास ही बेंच पर ही बैठ गयी. रोहित भी काफी दुखी लग रहा था. कुछ देर बाद में सामान्य हुई.

-पूजा तुमसे क्यों मिलने आई थी.

-मैंने उसे फोन करके बुलाया था.

-किसलिए?

-वो...दरअसल... वो आगे कुछ बोल नही पाया.

-तुम पूजा से प्यार करते हो न? मैंने उसकी तरफ देखते हुए कहा.

-हां..मगर तुम्हे कैसे पता?

-उस दिन वो चिट्टी तुमने पूजा के लिए लिखी थी, लेकिन पूजा कुछ समझ नही पाई और उसने वो मुझे लाकर दे दी.

-तुम्हे पता था तो उस दिन क्लास में...

-मुझे बाद में पता चला था.

वास्तव में परसों जब पूजा ने रोहित को थप्पड़ मारा था और उसको नियंत्रित करने के लिए मैं उसके दिमाग में घुसी थी. मुझे तभी इस सब के बारें में पता चला था.

- मैंने पूजा को अपने दिल की बात कहने के लिए ही बुलाया था. रोहित ने कहा.

- और उनसे क्या कहा?

- सोच कर बताउंगी. वो जाने के लिए मुड़ी ही थी कि पता नही कहाँ से वो कार आ गयी.

तभी डॉक्टर ओटी से बाहर निकले. सब उनके पास घेरा बनाकर खड़े हो गए.

-सीरियस स्पाइनल इंजरी हैं, हमें स्पेशलिस्ट को बुलाकर ऑपरेशन करवाना होगा. 15 से 20 लाख का खर्चा होगा. वरना लड़की पूरी ज़िन्दगी खड़ी नही हो पाएगी. डॉक्टर ने बताया.

हम सब सुनकर स्तब्ध रह गए. मैं पूजा के परिवार की हालत जानती हूँ इतनी बड़ी रकम लाना उनके लिए बहुत मुश्किल था. रोहित और मैं वापस आकर अपनी जगह बैठ गये. तभी सामने से मुझे अंतस आता दिखा.

तभी सामने से मुझे अंतस आता दिखा. मैं उठ कर उसके पास गयी.

-पूजा कैसी हैं? उसने पूछा.

-तुम यहाँ क्या कर रहे हो?

-मैं अपनी दोस्त से मिलने आया हूँ.

-पूजा तुम्हारी दोस्त कबसे हो गई?

-उस दिन जब तुम छह घंटे के लिए बेहोश थी.

इससे बहस करना बेकार था.

-वो काफी सीरियस हैं, डॉक्टर ने ऑपरेट करने के लिए बोल रहे हैं. काफी ज्यादा खर्चा आएगा.

-ओह..वो ठीक तो हो जाएगी न?

-कुछ कह नही सकते हैं.

हम दोनों रोहित के पास जाकर बैठ गये. पूजा के पापा और रिश्तेदार फोन पर फोन कर रहे थे. मैं उठकर पूजा के मम्मी के पास गई. वो भी काफी परेशान लग रही थी.

-क्या हुआ आंटी?

-डॉक्टर आज रात को ही ओपरेशन करने के कह रहे हैं...अब इतनी जल्दी इतने पैसो का इंतजाम कहाँ से करेंगे? कुछ भी करें तब भी ज्यादा से ज्यादा 5-7 लाख ही हो पाएंगे.

-आप धीरज रखिये, कोई न कोई रास्ता जरुर निकल आएगा.

मैं वापस रोहित के पास आ गई. मैं पूजा के लिए बहुत परेशान थी. मैं उसे एक मुसीबत से निकल चुकी थी पर अब इस मुसीबत से कैसी निकालू कुछ समझ में नही आ रहा था. तभी मेरी नज़र रोहित पर पड़ी.

-रोहित मुझे तुमसे कुछ बात करनी हैं. मैंने कुछ सोचकर कहा. रोहित और मैं कुछ दूर चले गये.

रोहित तुम्हे पता ही हैं, पूजा के ऑपरेशन के लिए 20 लाख रुपयों की जरुरत हैं, उसके पापा ज्यादा से ज्यादा 5-7 लाख ही कर पायेंगे और ऑपरेशन आज रात को ही करना हैं. अगर तुम अपने पापा से ले सकते तो पूजा के पापा 5-10 दिन में वापस कर देंगे.

-हां...मगर...रोहित ने कुछ सोचते हुए कहा .

-मैं जानती हूँ रोहित यह तुम्हारे लिए भी आसान नही हैं. लेकिन अभी इसके अलावा और कोई रास्ता भी नही हैं. तुमने उस दिन कहा था न कि कोई मुझसे प्यार नही कर सकता हैं...मैं इसके लायक ही नहीं हूँ. मेरी नज़रे अंतस की और चली गई. शायद तुम सही थे. मगर क्या तुम किसी से प्यार कर सकते हैं और अगर करते हो तो क्या तुम उसे साबित कर सकते हो?

रोहित कुछ देर खामोश खड़ा रहा और फिर बाहर की और जाने लगा.

-कहाँ जा रहे हो? मैंने पूछा.

-अपने प्यार को साबित करने. मैं उसे जाते हुए देखती रही फिर कुछ देर बाद अंतस के पास आ गई. वो कुछ देर खामोश बैठा रहा और फिर बोला.

-मुझे पूजा के लिए अफ़सोस हैं. चिंता मत करो वो जल्दी ही ठीक हो जाएगी.

-तुम्हे किसी बात का अफ़सोस हैं. मैंने उसे हिकारत भरी नजरो से देखकर कहा. पांच घंटे के दोस्त के लिए भला कौन अफसोस करता हैं.

-रिश्ते वक्त से नही ज़ज्बातो से बनते हैं. किसी से रिश्ता बनाने के लिए पांच घंटे ही बहुत होते हैं तो किसी के लिए सारी उम्र भी कम पड़ जाती हैं.

- तुम रिश्तो के बारे में क्या समझोगे, तुम तो रिश्तो की नीव ही साजिशों की रखते हो.

-सच कई बार उलझा हुआ होता हैं, उसकी गांठे वक्त के साथ खोलना ही बेहतर होता हैं. सच न कहना हमेशा झूठ ही नहीं होता, यह कई बार रिश्तो को बचाने के लिए ज़रूरी भी होता हैं.

मैं चाहे यह मानु या न मानु मगर अंतस की बाते मुझे मंत्रमुग्ध सी कर देती थी. किसी नशे की तरह जिसके बहाव में मैं बहती चली जाती थी.

-तुम यहाँ पूजा के लिए नही मेरे लिए आये हो न?

- तुम्हारे पास यह मानने की वजह हैं मगर यह सच नही हैं. मैं अपना सामान पहले ही पैक कर चूका हूँ.

-तुम शहर छोड़ कर जा रहे हो. तुम्हारा काम ख़तम हो गया?

-काम...मेरा कोई काम नहीं हैं...मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आया था.

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अगले दिन अनाथाश्रम से लौटते वक्त नंदिनी पूजा के रेस्टोरेंट पर ही रुक गयी. अंदर काउंटर पर एक आदमी बैठा था. नंदिनी ने अंदाजा लगा लिया यह रोहित ही था.

-पूजा कहाँ मिलेगी? नंदिनी ने पूछा.

-जी आप कौन?

-मैं उसकी दोस्त हूँ.

-आप दो मिनट बैठिये मैं बुला कर लाता हूँ.

कुछ ही देर में पूजा सामने थी.

-जी आप? मगर रोहित ने तो मुझसे कहा था कि मेरी कोई दोस्त आई हैं.

- हां, मैंने उससे यही कहा था. मैं उसे बेवजह परेशान नही करना चाहती थी.

- हम्म थैंक्स. मगर मैने पहले ही कहा था कि मैं सबकुछ बता चुकी हूँ.

-मुझे मालुम हैं. देखो पूजा...मैं जानती हूँ कि इस केस में पहले ही तुम्हे काफी परेशान किया जा चूका हैं. मगर मैं यह जांच अलग तरीके से कर रही हूँ. अगर कुछ भी ऐसा हैं जो किसी कारण से तुमने पहले नही बताया हो, तुम मुझे बता सकती हो.

-मगर आप दुसरो से अलग कैसे हैं?

-याग्निक... नंदिनी कुछ देर के लिए रुक गयी.

-हां...एसीपी चतुर्वेदी ने मुझे बताया था कि ताश्री ने हमारे बारें में अपनी डायरी में लिखा था तो?

-मैं उसे पहले से जानती थी.

पूजा आश्चर्य से नंदिनी को देखने लगी.

मैं कभी उससे प्यार करती थी. आज से लगभग पांच साल पहले की बात हैं..

-मगर याग्निक की तो शादी हो चुकी थी.

-हां मुझे बाद में पता चला था. तुम्हारी तरह में भी उसके जाल में फंस गयी थी. तुम खुशकिस्मत थी कि तुम बच गई. तुम्हारे साथ ताश्री थी.

-कमीना कहीं का...पूजा की आँखे गुस्से से लाल हो गयी.

-पूजा ताश्री ने सिर्फ तुम्हारे नही मेरे भी गुनाहगार को सजा दिलाई थी. ताश्री के हम दोनों पर अहसान हैं. यहीं वो कारण हैं जिसके लिए मैं ताश्री के कातिल को सजा दिलवाना चाहती हूँ. अगर तुम कुछ भी जानती हो जो की इस केस में मेरी मदद कर सकता हैं तो प्लीज मुझे बता दो.

पूजा कुछ देर के लिए खामोश हो गई.

-उस दिन जब ताश्री अंतस के कमरे में बेहोश थी, अंतस को किसी का फोन आया था, कोई ऋषि नाम का आदमी था. अंतस उसे बड़े भाई कह कर बुला रहा था. वो बार बार किसी संगठन का नाम ले रहा था. वो कहा रहा था की यहाँ का काम बहुत जल्द ही ख़त्म होने वाला हैं, फिर वो वापस लौट जायेगा.

-यहाँ का काम... मगर अंतस तो यहाँ सिर्फ एक ही काम से आया था. नंदिनी ने मन ही मन में कहा.

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महोब्बत मौत है मितवा,

बार बार नही होती,

हसरते खिलती हैं मगर,

गुलज़ार नही होती,

आँखे करती हैं हरगिज़ ज़फ़ा,

भर आती हैं मगर जार-जार नही रोती,

एक बार ओढ़ी थी वफ़ा की चादर,

बिखरती हैं मगर तार-तार नही होती..

जो उल्फत की थी तो हो गई महोब्बत भी,

अब फिर से इकरार नही होता, तकरार नही होती...

नंदिनी एक रेस्टोरेंट में अकेली बैठी थी. रेस्टोरेंट के चारो और ग्लास लगे हुए थे. यह देर शाम का समय था. रेस्टोरेंट के अन्दर मंद-मंद संगीत चल रहा था, जो माहोल को रोमांटिक बना रहा था मगर नंदिनी तो एक अजीब ही दुविधा में फंसी हुई थी. वो सोच रही थी कि आखिर वो कहाँ से कहाँ तक आ गयी हैं. उसने कभी सोचा भी नही था कि वो यहाँ तक आ पायेगी. लेकिन अजीब बात हैं, जब उसने शुरुआत की तब उसके साथ कितने लोग थे मगर आज वो बिलकुल अकेली थी. रास्ते में कुछ मुसाफिर मिले भी तो वो भी केवल दर्द ही देकर गए. शायद उसे भी अब अकेली रहने की आदत पढ़ चुकी थी या फिर किसी के साथ से ही डर लगने लगा था. मगर शायद वो अब अकेली नही थी, वो विजय के बारें में सोचने लगी थी. वो उसे शुरू से अच्छा लगता था, विजय में एक स्थिरता थी, उसकी आँखों में एक सम्मान था, उसके साथ में अपनापन था. वह सुलझा हुआ समझदार इंसान था मगर नंदिनी ने कभी उसे उस नज़रिये से नही देखा था. मगर इन दिनों उन दोनों के बीच नजदीकियां ज्यादा ही बढ़ रही थी. वो चाहती तो विजय को रोक सकती थी मगर उसे इसमें कुछ गलत भी नही लग रहा था...

नंदिनी रेस्टोरेंट के शीशे से बाहर देखते हुए यह सब सोच रही थी तभी नंदिनी की नज़र सामने एक दूकान पर पड़ी. यह एक पर्स की दूकान थी. अभी-अभी इस दूकान में कोई गया था. नंदिनी को वो शक्ल जानी पहचानी लगी. उसने फटाफट काउंटर पर बिल दिया और बाहर आ कर इंतज़ार करने लगी.

कुछ देर बाद उस दूकान से वो लड़की बाहर निकली. नंदिनी ने उसे ध्यान से देखा. उसकी आंख्ने फटी की फटी रह गयी. उसे अपनी आँखों पर विश्वास नही हो रहा था. यह तो ताश्री हैं!!

नीली टीशर्ट, काली जींस, गले में एक मफलर, चेहरे पर एक बच्चे जैसी मासूमियत...ऐसा लग रहा था एक बच्ची बस उम्र में बड़ी हो गयी हो. उसकी आँखों पर चश्मा नही था पर चेहरे पर एक मुस्कान थी. हाथ में बैग लिए, मन ही मन कुछ सोचते हुए मुस्कुराते हुए जा रही थी. जैसे अपने किसी करतब पर खुश हो रही हो. नंदिनी कुछ पल तक एक टक उसे निहारती रही जैसे किसी माँ को अपना खोया हुआ बच्चा मिल गया हो.

नंदिनी उसका पीछा करने लगी. कुछ देर चलने के बाद आगे बाइक पर एक लड़का हाथ में एक बेग लिए खड़ा था. शायद यह अंतस था. उसके बैग में ख़रीदे हुए कपडे थे.

अंतस- इतना वक्त लगता हैं तुम्हे एक बैग खरीदने में...मैंने सारे कपडे खरीद लिए और आधे घंटे से यहाँ खड़ा हूँ.

ताश्री- वो दूकान वाला सरासर पागल बना रहा था, ६०० का पर्स १५०० में बेच रहा था. मैंने भी कह दिया मैं उसके दिल्ली वाले सप्लायर वर्मा की बेटी हूँ. बेचारा फ्री में देने के लिए तैयार हो गया था. ताश्री ने चहकते हुए कहा.

अतंस- तुम कब इन भोले भाले दुकानदारो को ठगना छोडोगी ताश्री!

ताश्री- जब ये मुझे ठगना छोड़ देंगे. ताश्री ने मुस्कुराते हुए कहा.

नंदिनी का शक अब पक्का हो गया था, यह ताश्री ही थी. ताश्री बाइक पर बैठी ही थी कि नंदिनी दौड़ कर उनके पास पहुँच गई. उसने उनपर अपनी बन्दुक तान दी, रुक जाओ ताश्री...नंदिनी ने चिल्लाकर कहा.

ताश्री ने एक बार नंदिनी को घुरा.

तुम बहुत दूर आ चुकी हो नंदिनी. ताश्री ने नंदिनी को घूरते हुए ही कहा.

मतलब?

यह रास्ता सही नही हैं. ताश्री ने उधर देखा. वहां से एक ट्रक आ रही थी. ट्रक नंदिनी को चपेट में लेती हुई निकल गयी.

अचानक नंदिनी की नींद खुल गयी. बड़ा अजीब सपना था. वो पुरी पसीने तरबतर हो गयी थी. उसका सर भी काफी भारी हो रहा था. उसने घडी की और देखा तो सुबह के दस बज रहे थे. वो फताफट तैयार हुई और थाने के लिए निकली.

----------------------------------

-तुम शहर छोड़ कर जा रहे हो. तुम्हारा काम ख़तम हो गया?

-काम...मेरा कोई काम नहीं हैं...मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आया था.

तभी मेरा फोन बजा. यह माँ का फोन था.

-तू कौन से वार्ड में हैं?

-C-3 में क्यों?

-मैं यहाँ हॉस्पिटल में हूँ.

-आप यहाँ हॉस्पिटल में क्या कर रही हैं?

-तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ और पूजा के मम्मी पापा से भी मिल लुंगी.

-आप निचे ही रुको मैं आती हूँ. मैंने फोन रखा.

कौन था. मेरे फोन रखते ही अंतस ने पूछा.

मेरी माँ हैं.

तुम्हारी माँ...यहाँ हॉस्पिटल में हैं?

हां...क्यों?

नही..कुछ नही. अंतस खड़ा हो गया.

तभी सामने से माँ आती दिखाई दी. माँ ने पहले मेरी और देखा और फिर अंतस की ओर...उनकी नज़रे अंतस पर ही टीक गयी. वो उसे घूरते हुए ही मेरे पास आई.

- अब पूजा कैसी हैं? उन्होंने मेरी और देखते हुए कहा.

- अभी कुछ पता नही चल रहा हैं, ऑपरेशन के लिए कह रहे हैं.

- तू रात यही रुकेगी?

- हां..मैंने धीरे से कहा.

- हम्म...मैं इसीलिए तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ. परेशान मत होना सब ठीक हो जाएगा.

अंतस वापस बेंच पर बैठ गया था. माँ ने दो तीन बार नज़रे चुराकर अंतस की ओर देखा. फिर वो पूजा के माँ-बाप से मिलने चली गयी.

मैं अब चलता हूँ. माँ के जाते ही अंतस ने कहा.

हम्म...मैंने कोई जवाब नही दिया. जैसे मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता हो.

उसके जाने के बाद मैं वही बैठ गयी. कुछ देर बाद माँ वापस आ गई.

- काफी महंगा ऑपरेशन हैं? माँ ने मेरा पास आकर कहा.

- हां...पूजा के परिवार वाले पता नही इतने पैसे कहा से लायेंगे.

-हम्म...वो जल्दी ही ठीक हो जाएगी. तू चिंता मत कर.

वो लड़का कौन था. माँ ने कुछ देर रुककर कहा.

-कौन...अंतस?

-हां..वही जो अभी यहाँ खड़ा था.

-वो पूजा का दोस्त हैं.

-हम्म...ठीक हैं मैं जा रही हूँ तुम अपना ख्याल रखना.

शाम को कोई 9.00 बजे का वक़्त था. पूजा की माँ और मैं दोनों बैठे हुए थे. कुछ दूर पूजा के पापा उनके रिश्तेदार के साथ कुछ बात कर रहे थे. शायद पैसो की व्यवस्था कर रहे हो. तभी एक अंकल आये.

जी वो पूजा के पेरेंट्स? उन्होंने हमारे पास आकर पूछा.

मैं उसकी माँ हूँ. पूजा की माँ ने कहा. अब तक पूजा के पापा और रिश्तेदार भी हमारे पास आ गए थे.

- मैं रोहित का पिता हूँ. उस व्यक्ति ने पूजा के पापा से कहा.

- रोहित? पूजा के पापा ने सवालिया अंदाज में कहा.

- वो लड़का जो पूजा को यहाँ लेकर आया था. मैंने उन्हें समझाते हुए कहा.

- मैंने ऑपरेशन का खर्चा काउंटर पर पे कर दिया हैं. डॉक्टर्स बहुत जल्दी ही ऑपरेशन शुरू कर देंगे. डॉक्टर माथुर मेरे फ्रेंड ही हैं. आपको चिंता करने की जरुरत नही हैं.

- जी..मगर...आपने...पूजा के पापा कुछ बोल ही नही पाए. शायद उन्हें कुछ समझ में नही आ रहा था.

-थैंक्स अंकल...पूजा के पापा हो सकेगा जितना जल्दी आपको वापस लौटा देंगे. मैंने कहा.

- नही बेटा उसकी जरुरत नही हैं. उन्होंने कहा. मैं और पूजा के पापा दोनों उन्हें आँखें फाड़ कर देखने लगे.

- शायद आपको मालुम नही हैं...मेरा बीटा आपकी बेटी से प्यार करता हैं. आज जब वो पूजा के ऑपरेशन के लिए मुझसे पैसे मांगने आया तो मैंने मना कर दिया. मगर फिर उसने सुसाइड करने की कोशिश की.

- सुसाइड!! हम सब चौंक गये.

- वो अब कैसा हैं? पूजा के पापा ने घबराते हुए पूछा.

- वो अब ठीक हैं...अच्छा हुआ की हम ऐन मौके पर पहुँच गए वरना कुछ भी अनर्थ हो सकता था.

- भगवान् का शुक्र हैं. हमने राहत की सांस ली.

- हम कई बार अपने बच्चो को समझने में कितनी बड़ी गलती कर देते हैं. हम जिसे उनकी नादानियाँ समझते हैं वो बड़ी जिम्मेदारी होती हैं. अगर आपको कोई ऐतराज़ न हो तो पूजा के ठीक होते ही मैं उसकी शादी रोहित के साथ करवाना चाहता हूँ.

पूजा के मम्मी-पापा की आँखे आसुओं से भर गयी थी. वे कुछ भी नही बोल पाए.

-तुम शहर छोड़ कर जा रहे हो. तुम्हारा काम ख़तम हो गया?

-काम...मेरा कोई काम नहीं हैं...मैं यहाँ सिर्फ तुम्हारे लिए आया था.

तभी मेरा फोन बजा. यह माँ का फोन था.

-तू कौन से वार्ड में हैं?

-C-3 में क्यों?

-मैं यहाँ हॉस्पिटल में हूँ.

-आप यहाँ हॉस्पिटल में क्या कर रही हैं?

-तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ और पूजा के मम्मी पापा से भी मिल लुंगी.

-आप निचे ही रुको मैं आती हूँ. मैंने फोन रखा.

कौन था. मेरे फोन रखते ही अंतस ने पूछा.

मेरी माँ हैं.

तुम्हारी माँ...यहाँ हॉस्पिटल में हैं?

हां...क्यों?

नही..कुछ नही. अंतस खड़ा हो गया.

तभी सामने से माँ आती दिखाई दी. माँ ने पहले मेरी और देखा और फिर अंतस की ओर...उनकी नज़रे अंतस पर ही टीक गयी. वो उसे घूरते हुए ही मेरे पास आई.

- अब पूजा कैसी हैं? उन्होंने मेरी और देखते हुए कहा.

- अभी कुछ पता नही चल रहा हैं, ऑपरेशन के लिए कह रहे हैं.

- तू रात यही रुकेगी?

- हां..मैंने धीरे से कहा.

- हम्म...मैं इसीलिए तेरे लिए खाना लेकर आई हूँ. परेशान मत होना सब ठीक हो जाएगा.

अंतस वापस बेंच पर बैठ गया था. माँ ने दो तीन बार नज़रे चुराकर अंतस की ओर देखा. फिर वो पूजा के माँ-बाप से मिलने चली गयी.

मैं अब चलता हूँ. माँ के जाते ही अंतस ने कहा.

हम्म...मैंने कोई जवाब नही दिया. जैसे मुझे इससे कोई फर्क नही पड़ता हो.

उसके जाने के बाद मैं वही बैठ गयी. कुछ देर बाद माँ वापस आ गई.

- काफी महंगा ऑपरेशन हैं? माँ ने मेरा पास आकर कहा.

- हां...पूजा के परिवार वाले पता नही इतने पैसे कहा से लायेंगे.

-हम्म...वो जल्दी ही ठीक हो जाएगी. तू चिंता मत कर.

वो लड़का कौन था. माँ ने कुछ देर रुककर कहा.

-कौन...अंतस?

-हां..वही जो अभी यहाँ खड़ा था.

-वो पूजा का दोस्त हैं.

-हम्म...ठीक हैं मैं जा रही हूँ तुम अपना ख्याल रखना.

शाम को कोई 9.00 बजे का वक़्त था. पूजा की माँ और मैं दोनों बैठे हुए थे. कुछ दूर पूजा के पापा उनके रिश्तेदार के साथ कुछ बात कर रहे थे. शायद पैसो की व्यवस्था कर रहे हो. तभी एक अंकल आये.

जी वो पूजा के पेरेंट्स? उन्होंने हमारे पास आकर पूछा.

मैं उसकी माँ हूँ. पूजा की माँ ने कहा. अब तक पूजा के पापा और रिश्तेदार भी हमारे पास आ गए थे.

- मैं रोहित का पिता हूँ. उस व्यक्ति ने पूजा के पापा से कहा.

- रोहित? पूजा के पापा ने सवालिया अंदाज में कहा.

- वो लड़का जो पूजा को यहाँ लेकर आया था. मैंने उन्हें समझाते हुए कहा.

- मैंने ऑपरेशन का खर्चा काउंटर पर पे कर दिया हैं. डॉक्टर्स बहुत जल्दी ही ऑपरेशन शुरू कर देंगे. डॉक्टर माथुर मेरे फ्रेंड ही हैं. आपको चिंता करने की जरुरत नही हैं.

- जी..मगर...आपने...पूजा के पापा कुछ बोल ही नही पाए. शायद उन्हें कुछ समझ में नही आ रहा था.

-थैंक्स अंकल...पूजा के पापा हो सकेगा जितना जल्दी आपको वापस लौटा देंगे. मैंने कहा.

- नही बेटा उसकी जरुरत नही हैं. उन्होंने कहा. मैं और पूजा के पापा दोनों उन्हें आँखें फाड़ कर देखने लगे.

- शायद आपको मालुम नही हैं...मेरा बीटा आपकी बेटी से प्यार करता हैं. आज जब वो पूजा के ऑपरेशन के लिए मुझसे पैसे मांगने आया तो मैंने मना कर दिया. मगर फिर उसने सुसाइड करने की कोशिश की.

- सुसाइड!! हम सब चौंक गये.

- वो अब कैसा हैं? पूजा के पापा ने घबराते हुए पूछा.

- वो अब ठीक हैं...अच्छा हुआ की हम ऐन मौके पर पहुँच गए वरना कुछ भी अनर्थ हो सकता था.

- भगवान् का शुक्र हैं. हमने राहत की सांस ली.

- हम कई बार अपने बच्चो को समझने में कितनी बड़ी गलती कर देते हैं. हम जिसे उनकी नादानियाँ समझते हैं वो बड़ी जिम्मेदारी होती हैं. अगर आपको कोई ऐतराज़ न हो तो पूजा के ठीक होते ही मैं उसकी शादी रोहित के साथ करवाना चाहता हूँ.

पूजा के मम्मी-पापा की आँखे आसुओं से भर गयी थी. वे कुछ भी नही बोल पाए.

……………

 


वो फटाफट तैयार हुई और थाने के लिए निकली. थाने पहुंची तो नंदिनी ने देखा की थाने में कोई नही था. उसने पहरेदार से पूछा कि सब कहाँ गए. पहरेदार ने बताया कि कोई केस आया हुआ हैं, विजय सर जाब्ता लेकर गए हुए हैं. नंदिनी ने विजय को फोन करके पूछा तो उसने बताया कि किसी पेट्रोल पम्प पर गाँव वालो का झगडा हो गया था. स्थित अब नियंत्रण में थी. वो कुछ ही देर में लौटने वाले हैं.

नंदिनी अपने केबिन में आ गई और कुछ फाइल्स देखने लगी. तभी उसे किसी फाइल की जरुरत महसूस हुई तो उसने पहरेदार को आवाज लगाईं. हो सकता हैं चाय पीने गया हो. नंदिनी ने मन ही मन में सोचा और खुद ही उठकर फाइल लेने चली गयी.

स्टोर रूम में ढेर सारी फाइलें थी. फाइलों का अम्बार लगा हुआ था. कुछ ही देर में नंदिनी को समझ में आ गया कि फाइलें इंडेक्स से नही जमी हुई हैं और उसे मेहनत करनी होगी. वो फाइल ढूढने के लिए इधर-उधर देखने लगी. कुछ रेक देखने के बाद उसकी नज़र एक अलमारी पर पड़ी, उसने उसमें ढूंढा मगर उसमें भी कुछ नही था. तभी उसकी नज़र कबडड के पीछे बनी अलमारी में गयी. कब्बड उसके आगे पड़ा था मगर एक छोटी सी दरार थी उसमें से एक पीला पैकेट दिख रहा था. नंदिनी ने हाथ उस दरार में हाथ डाल कर वो पैकेट बाहर निकाला. उस पैकेट के नीचे ही एक फोल्डर पड़ा था. नंदिनी ने वो फोल्डर भी उठा लिया. वो इन दोनों को लेकर वापस ऑफिस में आ गयी.

नादिनी ने वो फोल्डर खोला तो उसके अन्दर एक पोस्टमार्टम रिपोर्ट पड़ी थी, दिव्या नाम की किसी लड़की की. रिपोर्ट देखने के बाद नंदिनी ने वो पैकेट खोला. उसमें एक डायरी थी. उसने डायरी खोलकर देखा. यह ताश्री की डायरी थी.

कुछ ही देर में विजय और बाकि सब लोग भी आ गए. थोड़ी देर बाद विजय नंदिनी के केबिन में आया.

तुम आ गयी. मुझे लगा आज छुट्टी पर हो. विजय ने बैठते हुए पूछा.

हम्म...नंदिनी जैसे उसे नज़रअंदाज किया. यह दिव्या कौन हैं? नंदिनी ने पूछा.

-दिव्या...कौन दिव्या मैडम? विजय ने थोड़े आश्चर्य से पूछा. मैडम सुनते ही नंदिनी ने विजय की ओर देखा.

आई मीन नंदिनी. विजय ने अपनी भूल सुधारते हुए कहा.

मुझे यह पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली थी. नादिनी ने रिपोर्ट विजय को दिखाते हुए कहा.

क्या नंदिनी? पहले वो ताश्री फिर यह दिव्या! तुम भी क्या गड़े मुर्दे उखाड़ने पर तुली हो? विजय ने नंदिनी के हाथ से वो रिपोर्ट लेकर देखते हुए कहा.

यह रिपोर्ट बिना किसी केस फाइल के पड़ी हुई थी. नंदिनी ने स्पष्ट करते हुए कहा.

अरे हां... याद आया. एक बार हॉस्पिटल वालो ने हमें गलत पेशेंट की पोस्टमार्टम रिपोर्ट भेज दी थी. शायद यह वहीँ हैं. मैंने कहा था इसे रद्दी में दे देना.

अच्छा हुआ नही दी, वरना ताश्री की डायरी भी रद्दी में चली जाती. नंदिनी ने टेबल पर पड़ी डायरी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

-अरे वाह..यह तुम्हे कहाँ मिल गयी. मैं ढूंढ-ढूंढ कर थक गया था.

-इसी रिपोर्ट के साथ ही पड़ी थी, कबडड के पीछे.

-तभी मुझे नहीं मिली. चलो अच्छा हुआ झंझट छुटा.

-...और वो रामनायक के शुटर्स से कुछ पता चला? नंदिनी ने डायरी अपनी रैक में रखते हुए कहा.

-हां मैडम...मूर्तियों की स्मगल्लिंग कर रहे थे.

-मगर एक ही तरह की इतनी सारी मूर्तियाँ कहा लेकर जा रहे थे.

-वो तो कुछ बता नही रहे हैं...कह रहे हैं किसी स्टेचू डीलर के पास ले जा रहे थे, मगर नाम नही बता रहे हैं.

-चलो मैं पूछती हूँ. मैं पूछ चूका हूँ मैडम...आपके हाथ का दर्द.

-अब ठीक हैं...चलो थोड़ी कसरत भी हो जाएगी.

-मैडम मुझे कहीं बाहर जाना हैं, मैं जाकर आता हूँ.

-हम्म...ओके...जल्दी ही जाना..हमें मदनलाल के केस पर भी काम करना हैं.

-जी मैडम...विजय ने कहा और फाइल लेकर बाहर चला गया.

----------------------

नंदिनी सेल में गयी और ड्राईवर से पूछताछ करने लगी मगर आधे घंटे तक पूछताछ करने के बाद भी कुछ ख़ास पता नही चला पाया.

बहुत ढीठ हैं साले. उगलना तो तुमको पड़ेगा. नंदिनी ने जेल का गेट बंद करते हुए कहा.

मैडम मुझे एक फोन करना हैं. तभी उनमें से एक ड्राईवर ने कहा.

किसे? नंदिनी ने पूछा.

जी मेरी घरवाली को...चार दिन से कुछ खोज-खबर नहीं हुई है तो परेशान हो रही होगी.

हम्म...ठीक हैं हवालदार इसे फोन करवा दो. नंदिनी ने हवालदार से कहा और अपने केबिन में आ गयी. फोन नंदिनी के केबिन के पीछे की तरफ ही था. जिसके ऊपर एक रोशनदान बना हुआ था. नंदिनी को बाहर की आवाज सुनाई दे रही थी.

जय महाकाल...मैं नीलकंठ...उस ड्राईवर ने फोन पर कहा.

....ट्रक को पुलिस ने पकड़ लिया हैं, अभी हम जेल में हैं...

जी हां...संगठन का कार्य हैं...मेरी उपस्थिति अनिवार्य हैं...आपको कोई न कोई उपाय अवश्य निकालना होगा. ...

...सभा का सञ्चालन मुझे ही देखना हैं....

धन्यवाद...आभार आपका..

ड्राईवर फोन रखकर वापस अपने सेल में चला गया. नंदिनी भी कुछ फाइल्स देखने लगी, तभी उसका फोन बजा. फोन कमिश्नर का था.

जी कमिश्नर साहब. नंदिनी ने सतर्क होते हुए कहा.

मिस नंदिनी आपने एमजी रोड के ढाबे से दो लोगो को गिरफ्तार किया हैं.

जी कमिश्नर साहब उन्होंने हमारें हवालदार पर फायरिंग की थी और वे मूर्तियों की स्मगलिंग कर रहे थे.

मिस नंदिनी...आपसे एक भूल हुई हैं, उनमें से एक व्यक्ति ट्रक का ड्राईवर हैं मगर दूसरा नीलकंठ, वो बेगुनाह हैं. वो तो बस उसके साथ वहां बैठकर खाना खा रहा था. आप उसे अभी रिहा कीजिये.

लेकिन सर उसने...

लेकिन वेकिन कुछ नही मिस नंदिनी. आप वैसे भी एक निर्दोष व्यक्ति को दो दिन जेल में रख चुकी हैं. उसका वकील अभी जमानत के कागजात लेकर आ रहा हैं. आप उसे अभी रिहा कीजिये.

इतना कह कर कमीशनर ने फोन रख दिया.

नंदिनी सीधा उठ कर उस ड्राईवर के सेल में गयी और खीच कर उसके कान के नीचे दो झापड़ लगाये.

किसे फोन गया था बे तूने? नंदिनी ने गुस्से में पूछा.

जी मैडम...वो..घरवाली को किया था...

और फोन करने के 5 मिनट में तेरे बाप का फोन आ गया. साले हैं कौन तू जो तुझे छुडाने के लिए खुद कमिश्नर फोन कर रहा हैं और यह संगठन क्या हैं?

संगठन...जी वो हमारा जयपुर ट्रांसपोर्ट आर्गेनाईजेशन हैं.

और तुझे कौनसी मीटिंग में जाना हैं?

हमारे आर्गेनाईजेशन की ही मीटिंग हैं?

कब?

कल ही हैं..

तभी हवलदार ने टोका. मैडम वो इसका वकील आया हैं.

अरे वाह! बड़ा जल्दी आ गया. नंदिनी ने सेल से बाहर निकलते हुए कहा.

एक काम करो, तुम चेक करो कल जयपुर ट्रांसपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की कोई मीटिंग हैं क्या? नंदिनी ने हवालदार से कहा और अपने केबिन में आ गयी.

उसने बाहर आकर चेक किया सारे डॉक्यूमेंट सही थे, उसे छोड़ने के अलावा और कोई चारा नही था.

नंदिनी ने उसे रिहा कर दिया. उसके जाने के बाद उसने एक हवालदार को बुलाया.

एक काम करो, इस पर नज़र रखो. जहाँ इसका वकील इससे अलग हो वहां से इसे उठा कर वापस ले आओ.

कुछ ही देर में हवालदार उस ड्राईवर को पकड़कर वापस ले आया.

एक काम करो, इसे पीछे वाले लॉकअप में डाल दो. नंदिनी ने उस हवालदार से कहा.

कुछ देर बाद विजय भी वापस आ गया. नंदिनी ने पूरा माजरा विजय को बताया.

तुम्हे उस तरह जमानत पर रिहा किये हुए व्यक्ति को वापस नही लाना चाहिए था. विजय ने समझाया.

तो क्या करती जिसने मुझ पर गोली चलायी उसे ऐसे ही छोड़ देती.

मगर फिर भी अगर कमिश्नर ने खुद फोन किया था तो जरुर कुछ ख़ास रहा होगा.

कुछ भी हो जब तक मैं इन मूर्तियों और इस संगठन के बारें में पता नही कर लेती कोई रिहा नही होगा. नंदिनी गुस्से में थी.

कुछ देर बाद वो शांत हुई. मैं लंच लेकर आती हूँ. नंदिनी ने निकलते हुए कहा.

जी मैडम.

कुछ देर बाद नंदिनी वापस आई. वो विजय के साथ बैठकर कुछ फाइल्स डिस्कस करने लगी.

तभी एक हवालदार दोड़ते हुए आया.

वो...मैडम...

वो पसीने में भीगा हुआ था. उसकी सांस फुल गयी थी.

क्या हुआ? नंदिनी ने खड़े होते हुए पूछा.

मैडम...वो ड्राईवर ने आत्महत्या कर ली हैं.

उसने सांस लेते हुए कहा.

05/02/2013

3-4 दिन से हॉस्पिटल घर और घर से हॉस्पिटल यहीं रूटीन था. पूजा को होश आ गया हैं, उसकी तबियत अब ठीक हैं मगर एक पैर में फ्रैक्चर हैं. डॉक्टर ने कहा हैं कुछ दिन चलने में दिक्कत होगी मगर बाद में ठीक हो जाएगी. होश में आने पर वो थोड़े सदमे में थी. उसे कुछ समझ में नही आ रहा था कि अचानक यह सब कसी हो गया, उसे तो एक्सीडेंट कैसे हुआ यह भी कुछ याद नही था.

रोहित अगले दिन हॉस्पिटल आया था. मैंने उसे पैसो के लिए थैंक्स कहा मगर उसकी बेवकूफी के लिए उसे डांटा भी...उसने बताया कि उस दिन जब उसने घर जाकर अपने पापा से पैसे मांगे तो उन्होंने मना कर दिया. काफी मीन्नते करने के बाद भी जब वो नही माने तो उसका दिल बैठ गया और उसे इसके अलावा और कोई रास्ता ही नही सुझा.

हम कई बार लोगो को समझने में बड़ी गलती कर देते हैं. हम किसी को पहली बार देखते ही उसके बारें में कोई राय बना लेते हैं, उसे पसंद या नापसंद कर लेते हैं, उसे अच्छी तरह समझे बिना और फिर बाद में पछताते हैं. शायद कोई व्यक्ति अच्छा या बुरा नहीं होता यह तो बस व्यक्ति के किरदार होते हैं, हमारा जिस किरदार से सामना होता हम उसे वहीँ मान लेते हैं. रोहित को जब मैंने पहली बार देखा तो उसे अमीर बाप की बिगड़ी हुई औलाद समझा था. मगर मैं गलत थी.

अंतस उस दिन के बाद मुझे नज़र नही आया. शायद वो चला गया था. मगर मैं उससे मिलने के लिए बैचेन हो रही थी. पता नही मुझे क्या हो रहा हैं? जब वो सामने होता हैं तो उसपर गुस्सा आता हैं उससे झगड़ा करती हूँ. मगर जब वो सामने नही होता हैं तब मैं बैचेन हो जाती हूँ. उस दिन उसने कहा था कि उसने अपना सामान पैक कर लिया हैं तो शायद वो शहर छोड़ कर चला गया हो.

मगर मैं गलत थी...

शाम को मैं हॉस्पिटल के बाहर गार्डेन में बैठी थी. सूरज डूब चूका था, मौसम ठंडा हो गया था. ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी. गार्डन में कुछ पेशेंट्स के परिजन भी बैठे हुए थे. मैं उन्हें ही देख रही थी. तभी किसी ने मुझे आवाज दी. जैसे किसी सुखी धरती पर बारिश की पहली बुँदे गिरी हो. मैं बिना पीछे देखे ही इस आवाज को पहचान गई थी. यह अंतस ही था. वो मेरे पास आ गया.

तुम अब तक गए नही. मैंने अपनी मुस्कराहट को थामते हुए कहा. मुझे लगा तुम चले गए होंगे.

मैंने सोचा एक बार नींव को दुबारा भर कर देखा जाए. अब तक तो केवल दीवारे ही बनी हैं, मकान तो अब तक बना ही नही. उसने एक पहेली सी कही.

मतलब? मैंने उठते हुए कहा.

तुमने उस दिन कहा था न कि मैं रिश्तो की नींव ही साजिशो से भरता हूँ तो इस बार सच से भरने की कोशिश करता हूँ. एक नए रिश्ते की शुरुआत करते हैं. हम दोनों साथ-साथ चलने लगे थे.

और अगर मैं कहूँ की अब मुझे कोई रिश्ता बनाना ही नहीं हैं तो? मैंने मुस्कुराते हुए कहा. मैं उसका चेहरा पढ़ रही थी ऐसा लग रहा था जैसे वो कुछ सोच रहा था.

रिश्ता तो बन चूका हैं, बात तो उसे निभाने की हैं. उसने कहा. हम दोनों चलते चलते एक गली में आ गए थे. रोडलेम्प की लाल रौशनी छाई हुई थी. सामने से कोई दो आदमी आ रहे थे.

हां...मगर रिश्ते को निभाने के लिए सच बोलने की जरुरत होती हैं और शायद तुम्हे उसकी आदत नही हैं. मैंने साफ़-साफ़ कहा.

हां...तुम ऐसा मान सकती हो मगर मैं बस सही वक्त का इंतज़ार कर रहा था.

और अब वो सही वक्त आ गया हैं. मैंने उसे घूरते हुए पूछा.

हां...शायद...

तभी सामने से आते वो आदमी हमारे सामने आकर खड़े हो गए. ये दो हट्टे कट्टे लोग थे.

अरे भाई सामने से हटो..क्यों रास्ता रोक कर खड़े हो? अंतस ने उनसे कहा.

शायद तुम ही गलत रास्ते पर चल रहे हो. उनमें से एक ने कहा. हमने ध्यान नही दिया था हमारे पीछे दो लोग और आ रहे थे. वो चारो हमें घेर कर खड़े हो गए.

बेहतर होता संगठन इससे दूर ही रहता. उसने अंतस को घूरते हुए मेरी और इशारा करते हुए कहा.

कितने आदमी हो. अंतस ने मुस्कुराकर कहा. मुझे आश्चर्य हुआ. मेरी डर के मारे हालत खराब हो रही थी. यह मुस्कुरा रहा था.

जितने भी हैं तुम्हारे लिए तो काफी हैं. उसने अंतस से कहा.

चलो देखते हैं. अंतस ने मेरी और देख कर कहा. ताश्री! अच्छा होगा तुम दूर चली जाओ.

हां...मेम..आप यहाँ से चली जाए. उनमें से एक ने कहा.

मैं चुपचाप वहां से दूर चली गयी. यह क्या हो रहा था मुझे कुछ समझ ही नही आ रहा था. मैं कुछ दूर आकर खड़ी हो गयी. मैं डर से थर-थर काँप रही थी.

उसमें से एक ने अंतस को पीछे से पकड़ने की कोशिश की...अंतस ने अपने कोहनी उसके पेट में मारी और फिर जैसे ही वो झुका उसके सर पर दे मारा...वो वहीँ नीचे बैठ गया...तभी अंतस ने उसके चेहरे पर एक लात मारी और वो जमीन पर पड़ा था.

यह किसी फिल्म के फाइट सीन जैसा था. पांच सेकंड के अन्दर ही वो शख्स जमीन पर पड़ा था.

फिर वो तीनो एक साथ अंतस पर झपट्टे. अंतस ने पीछे हटते हुए उन तीनो पर लात घुसे बरसाना शुरू कर दिए. कुछ ही देर में एक एक कर वो तीनो भी ढेर हो गए.

अगली बार उससे कहना की ढंग के आदमी भेजे. अंतस ने एक आदमी के पास जाकर कहा. वो चारो बुरी तरह से ज़ख़्मी हो गए थे. वो धीरे उठे और भाग खड़े हुए. यह तुमने अच्छा नही किया लड़के, तुम्हे इसका अंजाम भुगतना होगा. जाते-जाते एक आदमी अंतस को धमकी देकर देकर गया.

अंतस फिर मेरी तरह आया. चलो ताश्री! उसने कहा. अंतस को भी कुछ छोटे आई थी.

चलो हॉस्पिटल चलते हैं. मैंने उसे सहारा देते हुए कहा.

नही उसकी जरुरत नही हैं...मैं ठीक हूँ. उसने कराहते हुए कहा.

ये लोग कौन थे? मैंने पूछा.

राणा के आदमी थे. उसने बिना मेरी और देखते हुए कहा. मेरा सर चकरा गया. राणा के आदमी!

मगर राणा ने क्यों तुम्हारे ऊपर....

मगर-वगर कुछ नही..तुम कल सुबह ग्यारह बजे मेरे रूम पर आ जाना. मेरे पास अब ज्यादा वक्त नही हैं.

उसने ऑटो रुकवाया और उसमें बैठ कर चला गया.

मैं वापस हॉस्पिटल में आ गयी. आखिर राणा ने क्यों अंतस पर हमला करवाया. और यह संगठन क्या हैं? मुझे कुछ भी समझ में नही आ रहा था.

तभी एक हवालदार दोड़ते हुए आया.

वो...मैडम...

वो पसीने में भीगा हुआ था. उसकी सांस फुल गयी थी.

क्या हुआ? नंदिनी ने खड़े होते हुए पूछा.

मैडम...वो ड्राईवर ने आत्महत्या कर ली हैं.

उसने सांस लेते हुए कहा.

क्या? नंदिनी और विजय दोनों चौंकते हुए उठ खड़े हुए. दोनों तेजी से लॉकअप की तरफ भागे. ड्राईवर एक रस्सी के सहारे पंखे पर लटका हुआ था. पास ही दो हवालदार खड़े थे.

इसे निचे उतारो. नंदिनी ने चिल्लाते हुए कहा.

हवालदार तेजी से दौड़कर उसके पास गए और उसे नीचे उतारा. वो अब तक मर चूका था. एक हवालदार सफ़ेद कपडा लाया और उस पर ओढा दिया.

यह फंदे पर लटक गया तब तक तुम लोग कहाँ थे? नंदिनी पहरेदार की तरफ देखकर चिल्लाई.

पहरेदार भी डर से थर-थर काँप रहे थे.

वो मैडम....यह सेल थोडा अन्दर की तरफ हैं तो हम इधर कम ही आते हैं. एक हवालदार ने डरते-डरते कहा.

...और यह रस्सी यहाँ तक कैसे पहुंची? विजय ने पंखे के ऊपर लटकी रस्सी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

वो...रस्सी...हवलदार आगे कुछ नही कह पाया. कुछ देर बाद नंदिनी और विजय दोनों केबिन में आ गए.

यह पता नही कैसे हो गया. नंदिनी ने बैठते हुए चिंता में कहा.

नंदिनी फंसे तो हम बेहद खतरनाक हैं. एसपी के खुद फोन करने पर तुमने उस ड्राईवर को रिहा किया. रिलीज़ डाक्यूमेंट्स पर तुम्हारे साइन हैं. फिर तुम उसे उठा कर वापस जेल में डाल देती हो और वो आत्महत्या कर लेता हैं. अगर बाहर किसी को भनक भी लग गयी तो हंगामा हो जाएगा कोई यकीन नही करेगा की यह आत्महत्या हैं मर्डर नही...हम सबका सस्पेंशन पक्का हैं. विजय ने स्थिति की गंभीरता समझाते हुए कहा.

स्टाफ में से कोई मिला हुआ हैं...या फिर यह भी हो सकता हैं कि उसने कपडे सुखाने की रस्सी उठा ली हो.

तब तो इस खबर के बाहर जाने की सम्भावना और भी जयादा हैं. अब हमें क्या करना चाहिए. नंदिनी खुद पसीने से तरबतर थी.

हमें एक झूठ को छुपाने के लिए दूसरा झूठ बोलना होगा. मगर हो सकता हैं यह तरिका तुम्हे ज्यादा पसंद नही आये. विजय ने नंदिनी की तरफ देखते हुए कहा.

तुम्हे जो करना हैं वो करो, मुझे तो कुछ सूझ ही नही रहा हैं.

विजय बाहर आ गया और एक हवालदार को बुला कर कुछ कहा. कुछ ही देर में तीन चार लोग एक गाडी लेकर आए और ड्राईवर की लाश को उठाकर ले गए.

यह उस ड्राईवर की लाश को कहाँ ले गए हैं? नंदिनी ने विजय से पूछा.

आज क्या हुआ था? विजय ने नंदिनी से प्रतिप्रश्न किया.

मतलब?

कमिश्नर का फोन आने पर तुमने उस ड्राईवर को रिहा कर दिया फिर?

...फिर हवालदार उसे वापस लेकर आया.

नही लाया.

नंदिनी ने विजय को सवालिया नज़र से देखा.

उस ड्राईवर ने यहाँ से छुटने के बाद आगे की सजा के डर से आत्महत्या कर ली. अभी कुछ ही देर में किसी गांववाले का थाने में फोन आएगा कि किसी पेड़ पर किसी लाश लटकी हुई हैं, हम जायेंगे और केस बनायेंगे.

..और अगर स्टाफ में से किसी ने बाहर खबर कर दी तो? नंदिनी ने परेशान होते हुए पूछा.

लोगो को एक आसान झूठ एक मुश्किल सच से कई गुना बेहतर लगता हैं. ये कहानी तुम्हारी वाली हकीकत से कई आसान हैं और ज्यादा भरोसेमंद भी...

तभी एक हवलदार आया. सर फोन आ गया हैं. उस हवालदार ने कहा.

तुम काफी थक चुकी हो. अब घर जाकर आराम करो. आगे मैं संभाल लूंगा. विजय ने कहा.

मगर....

मगर–वगर कुछ नही. तुम्हे मुझ पर विश्वास हैं न.

हां..बिलकुल. नंदिनी ने मुस्कुराकर कहा.

तो तुम सब मुझ पर छोड़ दो और निश्चिंत होकर घर जाओ.

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05/02/2013

अब किस पर विश्वास करना हैं और किस पर नही कुछ समझ में नहीं आ रहा था. कल जो हुआ सब अप्रत्याशित था. आखिर राणा ने अंतस पर क्यों हमला किया था? और उस आदमी ने कहा था कि संगठन मुझसे दूर रहे. आखिर यह संगठन क्या हैं और वो लोग क्यों मुझे उससे दूर रखना चाहते हैं? कहीं अंतस का इस सगठन से कुछ लेना देना तो नही हैं? कहीं अंतस से मिलना मेरे लिए खतरनाक तो नही हैं. और अंतस कह रहा था कि उसके पास ज्यादा वक्त नही हैं, आखिर वो किस बात से डर रहा था?

इन सारे सवालो से ही कल से मेरा दिमाग घूम रहा था. मुझे अंतस से मिलने से डर लग रहा था, मगर मेरे लिए इन सवालो का जवाब जानना भी जरुरी था. आखिरकार अब ये मेरे वजूद का सवाल था.

मैंने अंतस को फोन लगाया.

तुम आज आ रही हो न? उसने सामने से पूछा.

हां...मगर तुम्हारे रूम पर नही..हम गार्डन में मिलेंगे.

हा...हा...हा...वो हंसने लगा. तुम्हारा डर मैं समझ सकता हूँ, मगर तुम भी तो मेरा डर समझो. अगर इस बार वो लोग आये तो मैं उनसे नही लड़ सकूँगा.

तो इस बात की क्या गारंटी हैं कि वो तुम्हारे रूम पर नही आयेंगे? मैंने भी अपना दिमाग चलाते हुए कहा.

हां, मुझे पता हैं इसीलिए मैंने कल शाम को ही होटल चेंज कर लिया हैं. आज तुम्हे होटल लीला में आना हैं.

होटल लीला! मैंने चौंकते हुए कहा. वो मेरे घर से कोई सौ किमी दूर हैं.

बिलकुल...तुम बस अपनी गली से बाहर आ जाना..वहां एक कार तुम्हे लेने आ जाएगी.

कार! मगर मैं उसे पहचानूंगी कैसे?

तुम पहचान जाओगी.

हम्म...ठीक हैं. मैंने फोन रखते हुए कहा.

मुझे वास्तव में घबराहट हो रही थी. फिर भी मुझे सच तो जानना ही था. सो मैंने फैसला कर लिया की मैं उससे मिल कर ही रहूंगी.

मैं 10.30 बजे तक तैयार होकर घर से निकल गयी. मैं गली के बाहर जाकर खड़ी हुई ही थी कि एक कार आकर रुकी. मैं उसकी और देखने लगी तभी कार का

दरवाजा खुला और एक आदमी बाहर निकला.

अरे! मैं चौंक गयी. यह तो वहीँ ऑटो वाले काका हैं, जिससे मैं अक्सर कोलेज जाती हूँ. उन्होंने सफ़ेद रंग के ड्राईवर वाले कपडे पहन रखे थे. बिलकुल वासी ही जैसे अमीर लोगो के ड्राईवर पहनते हैं.

काका! आप कार भी चलाते हैं. मैंने उन्हें देखते ही पूछा.

बैठो बिटियाँ. उन्होंने पीछे का दरवाजा खोलते हुए कहा.

बैठो मतलब? आप मुझे लेने के लिए आये हैं? आप अंतस को जानते है?

हां...आप जल्दी से कार में बैठिये...हमें देर हो रही हैं.

मैं कार मैं बैठ गयी और वो ड्राइव करने लगे.

काका..आप अंतस को कैसे जानते हैं?

बेटा...आप अभी बहुत-सी बाते नही जानते हो लेकिन अब सब जान जाओगे.

..मगर उस दिन जब हम अंतस को हॉस्पिटल लेकर गये थे उसदिन आप ऐसे बर्ताव कर रहे थे जैसे आप उसे जानते ही नही हो...और उस दिन जब उन लडको ने मुझे छेड़ा था....

मैं कहते कहते रुक गयी. अब मुझे समझ में आ रहा था कि यह सब कुछ मेरी समझ से बड़ा था. मैने कभी गौर ही नही किया था कि हर बार जब भी मैं किसी मुसीबत में होती थी हर बार इन काका का ऑटो ही मुझे लेने आता था.

बच्चे...अभी तुम्हे बहुत कुछ जानना हैं मगर अभी के लिए बस इतना समझ लो कि हम जो कुछ भी कर रहे हैं तुम्हारी भलाई के लिए ही कर रहे हैं.

मैं पीछे हज़ारो सवालो से गिरी हुई चुपचाप बैठी रही

………………………..

दो दिन मौसम शांत रहने के बाद आज फिर से आसमान में काली घटायें छा गयी थी। लगातार बिजलियाँ चमक रही थी। विजय थाने से नहाया था। दिन भर हुई कार्यवाही से वो काफी थक गया था। वो अभी कपडे पहन ही रहा था कि डोरबेल बजी। इतना लेट कौन हो सकता हैं? उसने मन ही मन सोचा। कहीं थाणे से तो कोई नही हैं? हो सकता हैं कोई इमरजेंसी हो। उसने फटाफट कपडे पहने और दरवाजा खोला, हाथ में बैग लिए नंदिनी खड़ी थी।

नंदिनी तुम यहाँ? इस वक्त....विजय ने कुछ चिंतित होते हुए कहा।

हाँ, वो मुझे घर पर अकेले काफी घबराहट हो रही थी तो मैं यहाँ आ गयी। उसने अंदर आते हुए कहा। सब ठीक से हो गया न, कोई प्रॉब्लम तो नही हुई। नंदिनी काफी परेशान लग रही थी और होना भी चाहिए, आखिर उसके करियर का सवाल था।

अंदर विजय के कपडे इधर उधर पड़े थे, घर भी पूरा अस्त व्यस्त था, विजय तेजी से अंदर गया और कपडे इकट्ठे कर अलमारी में रखने लगा।

नही कोई दिक्कत नही हुई। अब सब ठीक हैं। वैसे तुम फोन करके भी पूछ सकती थी। विजय ने कुछ पेपर ड्रावर में रखते हुए कहा।

क्यों, तुम्हे मेरा यहाँ आना अच्छा नही लगा? नंदिनी पलंग पर बैठी थी, उसने विजय को घूरते हुए कहा। विजय एक सेकंड के लिए रुक गया। उसने नंदिनी को देखा जैसे वो उसकी मनोस्थिति को समझना चाहता हो।

नही ऐसी तो कोई बात नही हैं...वो तो बस अँधेरा ही था सो...

तुमने खाना खा लिया? नंदिनी ने विजय को अनसुना सा करते हुए कहा।

नही मैं तो बस अभी आया हूँ..क्यों?

मैं तुम्हारे लिए खाना लेकर आई हूँ। नंदिनी ने बैग से टिफ़िन निकालते हुए कहा।

ओह थैंक्स, मगर तुमने इतनी तकलीफ क्यों की? विजय ने पास पड़ी कुर्सी पर बैठते हुए औपचारिकतावश पूछा.

विजय नंदिनी के इस अजीब बर्ताव से अचम्भे में था. उसे समझ में नही आ रहा था की नंदिनी उसके प्रति इतना लगाव क्यों दिखा रही हैं? कहीं वो दिन में उसके द्वारा की गयी मदद को अहसान मान कर उसका बदला चुकाने की कोशिश तो नही कर रही हैं.

नही ऐसा कुछ नही हैं, वो तो मैं बस थाने से थोडा जल्दी आ गयी थी तो मैंने सोचा की मेरे साथ-साथ तुम्हारे लिए भी खाना बना दूँ. वैसे भी तुम बाहर का खाना खा-खाकर पक गए होंगे तो मैंने सोचा की तुम्हे अपने हाथ का बकवास खाना भी टेस्ट करवा दूँ. नंदिनी ने हँसते हुए कहा. विजय भी हंसने लगा इसके बाद दोनों बैठ कर खाना खाने लगे.

वो लोग कौन थे? खाना खाते हुए नंदिनी ने पूछा.

कौन?

वही जो उस लाश को लेने के लिए आये थे.

नंदिनी तुम तो जानती ही हो पुलिस की नौकरी में अच्छे से ज्यादा बुरे लोगो से काम पड़ता हैं. उनका काम ही यहीं हैं...ठिकाने लगाना.

नंदिनी ने एक सेकंड के लिए विजय को घुरा.

खैर जो भी हो..आज तो बाल-बाल बच गए. नंदिनी ने राहत की सांस लेते हुए कहा. वे अब तक खाना खा चुके थे.

हां सो तो हैं..मगर फिर भी हमें सावधान रहना होगा. यह बात किसी भी तरह बाहर नही पहुंचनी चाहिए. वरना कुछ भी हो सकता हैं...

तभी बरसात शुरू हो गई. आसमान में गर्जन के साथ बिजलियाँ चमकने लगी. तेज हवाओ से खिड़कियाँ टकराने लगी. विजय उठा और उसने खिड़कियाँ बंद कर दी. कुछ देर बाद लाइट भी चली गयी. विजय ने ढूंढ कर एक मोमबती जला ली.

कुछ देर तक दोनों खामोश बैठे रहे. उन दोनों के बिच ख़ामोशी शोर मचा रही थी.

यह बरसात भी न...विजय ने कुछ बात छेड़ने की कोशिश की. आजकल बिन मौसम भी बरसात आ जाती हैं. उसने शब्द ढूढ़ते हुए कहा.

मगर यह तो बरसात का मौसम ही हैं. नंदिनी ने मुस्कुराते हुए कहा.

हां मगर फिर भी तुम अब घर कैसे जाओगी?

अब यह चिंता का विषय था. नंदिनी अब तक इस बारें में सोचा ही नही था कि अगर बरसात बंद नही हुई तो वह घर कैसे जाएगी? ऊपर से रात भी काफी हो गयी थी. 10.30 बजे का वक्त हो गया था.

वैसे अगर तुम चाहो तो यहाँ रुक सकती हो. विजय ने एक विकल्प सुझाया जिसके चुने जाने के आसार वो जानता था कि नगण्य हैं.

हां मैं भी यहीं सोच रही थी काफी लेट हो गया हैं तो अभी जाना सही नही रहेगा.

विजय यह जवाब सुनकर चौंक गया. उसे इसकी बिलकुल भी उम्मीद नही थी. बल्कि उसके पास तो इसकी कोई तैयारी भी नहीं थी. उसके पास एक ही बेड था, और बिस्तर भी गिने चुने ही थे. ऊपर से छत भी टपक रही थी. उसे लगा था कि नंदिनी जाने की बात करेगी तो वो छोड़ आएगा. मगर यहाँ तो कुछ उल्टा ही हो गया था.

रात की 12.00 बज चुकी थी. बाहर मद्धम- मद्धम बारिश हो रही थी. अन्दर नंदिनी और विजय दोनों अब भी बैठे थे और अपनी ज़िन्दगी की कुछ बाते कर रहे थे.

वाह क्या बात हैं, आपने सारे एग्जाम फर्स्ट एटेम्पट में ही पास कर लिए, मुझे तो एंट्रेंस भी दो बार देना पड़ा था.

सारे नही...फाइनल में एक अटेम्प्ट लगा था. नंदिनी ने कुछ याद करते हुए कहा. उसकी आवाज एक दम धीमी हो गयी थी.

क्या हुआ तुम कुछ अपसेट हो गयी. विजय ने नंदिनी का चेहरा पढ़ते हुए कहा.

नहीं कुछ नही. नंदिनी ने ना में सर हिला दिया.

उस दिन जब हम याग्निक से मिलने गए थे तब भी तुम अपसेट थी, तुम याग्निक को कैसे जानती हो?

ऐसे ही वो मेरा पुराना दोस्त था. नंदिनी ने और भी धीरे से कहा.

तुम उससे प्यार करती थी?

नंदिनी ने चौंक कर विजय की तरफ देखा. तुम्हे कैसे पता?

उस दिन मैंने तुम्हारी आँखों में एक दर्द देखा था. ऐसा दर्द किसी को न पाने के कारण होता हैं या फिर किसी को खोने पर होता हैं.

खोया तो तुमने भी किसी को हैं. कौन थी वो?

मेरा पहला और आखिरी प्यार...अफ़सोस मैं उससे कभी इज़हार नही कर पाया.

इज़हार नही कर पाए मतलब, वो नही जानती थी की तुम उससे प्यार करते हो.

शायद जानती थी.... विजय ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी जैसे आगे कुछ बताना नही चाहता था.

क्या हुआ था?

नंदिनी कुछ लोग हमारी ज़िन्दगी में आते ही दूर जाने के लिए हैं. वो हमारे लिए यादें छोड़ जाते हैं और कई बार एक मकसद भी, जिसे पूरा करने के लिए हम अपनी ज़िन्दगी भी लगा सकते हैं.

सही कहा तुमने विजय. अगर जो मेरे साथ हुआ था अगर न हुआ होता तो आज मैं शायद यहाँ तक न पहुँच पाती.

विजय ने अपना एक हाथ नंदिनी के हाथ पर रख दिया. दोनों के बीच फिर एक खामोशी छा गयी. मोमबती भी अब पूरी ख़त्म हो गयी थी, उसकी लौ अब बुझने से पहले फडकने लगी थी. नंदिनी ने विजय के कंधे पर सिर रख दिया था. विजय ने नंदिनी की पीठ पर हाथ रखा और उसे अपने में समा लिया. मोमबती बुझ चुकी थी, चारो और अँधेरा हो गया.

सुबह जब नंदिनी उठी तो यह उसकी ज़िन्दगी की एक नयी शुरुआत थी. एक ही रात में विजय के साथ उसका रिश्ता पुरी तरह से बदल चूका था. मगर नंदिनी इससे खुश थी. शायद विजय ही वो इंसान था जिसके साथ वो अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारना चाहती थी.

सुबह उठकर नंदिनी अपने घर गयी और वहां से तैयार होकर वापस थाने पहुंची. कुछ देर बाद नंदिनी ने हवालदार को आवाज लगाईं.

जी मैडम. हवालदार ने अन्दर आते हुए कहा.

मैंने तुम्हे ट्रांसपोर्ट ऑर्गनाइजेशन की मीटिंग के बारे में पता करने के लिए कहा था. कुछ पता चला?

हां..मैडम आज तो क्या इस पुरे महीने ट्रांसपोर्ट ऑर्गेनाइजेशन की कोई मीटिंग नही हैं.

लगा ही था...और वो उस ड्राईवर का सामान कहाँ हैं?

लाकर में हैं मैडम.

लेकर आओ. इतने में विजय भी अन्दर आ गया था.

कुछ देर बाद हवालदार एक पैकेट लेकर आया. जिसमें ड्राईवर का पर्स, मोबाइल वगैरह थे.

नंदिनी ने जैसे ही पैकेट टेबल पर खाली किया एक चीज पर उसकी नज़र रुक गयी. यह गले में पहनने की चांदी की माला थी, जिसमें हु-ब-हु वहीँ त्रिशूल था जो उसने राणा के गले में देखा था.

हम्म...तो ये बात हैं. नंदिनी ने वापस हवालदार को बुलाया.

एक काम करो, मुझे भारत सेवा संस्थान के बारें में पूरी डिटेल निकालकर दो.

जी मैडम.

कोई आधे घंटे बाद गाडी होटल लीला के सामने जाकर रुकी.

फर्स्ट फ्लोर पर कमरा नंबर ११८. मैं जब कार से उतरी तो काका ने कहा. मैं अन्दर गयी और लिफ्ट से ऊपर पहुंची. मुझे अब भी डर लग रहा था. मैं अकेली अंतस से मिलने इतना दूर एक होटल के कमरे में जा रही थी, यह जानते हुए भी अंतस एक तांत्रिक हैं और ऊपर से राणा ठाकुर भी चाहता हैं कि मैं अंतस से दूर रहूँ. कही ऐसा तो नहीं की अंतस मुझे किसी साजिश में फंसा रहा हैं. मगर फिर भी अब मैं काफी दूर आ चुकी थी, अब मेरे लिए सच जानना काफी ज़रूरी था.

मैंने अंतस के कमरे के सामने जाकर दरवाजा खटखटाया. कुछ ही देर में अंतस ने दरवाजा खोला. ऐसा लग रहा था वो तैयार ही बैठा था.

-आओ अन्दर आ जाओ. कोई तकलीफ तो नही हुई न.

-नही...तुम काका को कैसे जानती हो? मैंने अन्दर आकर बैठते हुए पहला सवाल दागा.

-वो तुम्हारे पापा के पुराने दोस्त हैं. उसने सीधा जवाब दिया जो मेरी उम्मीद के विपरीत था, वरना तो वो एक सवाल के बदल दूसरा सवाल ही पूछता था. मगर फिर भी आज मैं इस सब में नही उलझना चाहती थी.

-ठीक हैं...अब तुम मुझे सब शुरू से बताओ. तुम कौन हो, मुझसे क्या चाहते हो और उस तस्वीर में मेरी माँ के साथ कौन हैं? आज मैंने भी सोच लिया था, आज तो मैं सच जान कर रहूंगी.

- ध्यान से सुनो. अंतस ने कुछ देर रुक कर कहा. मैं जो तुम्हे बताने जा रहा हूँ वो जानने के बाद तुम्हारी पूरी ज़िन्दगी बदलने वाली हैं. क्योंकि अब तक तुम अपने और दुसरो के बारें में उतना ही जानती हो जितना तुम्हे बताया गया था. उसने एक घूंट पानी का पिया. तुमने भारत सेवा संस्थान के बारें में सुना हैं?

-बीएसएस? मैंने आसान भाषा में कहा.

-हां वही..

-बीएसएस के बारें में कौन नही जानता हैं, देश-विदेश में योग सिखाती हैं. बीएसएस देश की सबसे बड़ी धार्मिक संस्था हैं. पुरे देश में धर्म की रक्षा का झंडा इन्होने ने ही तो उठा रखा हैं.

-बिल्कुल सही, मगर वो सब सिर्फ लोगो को दिखाने के लिए हैं, बिएसएस वास्तव में एक तांत्रिको का संगठन हैं. जिसे हम संगठन के नाम से जानते हैं.

-क्या बकवास कर रहे हो. बीएसएस और तांत्रिक...

-यही सच हैं ताश्री! सालो से या यूँ कहो सदियों से हमारे देश में तांत्रिको का यह संगठन राजनीति और धर्म को प्रभावीत करते आया हैं. देश की आज़ादी की लड़ाई से हो या फिर प्रधानमंत्री का चुनाव हो, इस संगठन का हमेशा हस्तक्षेप रहा हैं. वर्षो तक समाज में नकारात्मक छवि में रहने के बाद देश के तांत्रिको को समझ में आ गया कि अगर उन्हें अपने वजूद बचाना हैं तो उन्हें संगठित होना होगा. और कुछ सालो पहले उन्होंने एक संगठन बनाया और बिएसएस के छद्म आवरण के जरिये सारे तांत्रिको को एकजुट किया. आज पुरे समाज में तांत्रिक फैले हुए हैं. हम आम इंसानों की तरह ही रहते हैं, किसी रिक्शे के ड्राईवर से लेकर किसी राज्य के मुख्यमंत्री तक कोई भी व्यक्ति इस संगठन का सदस्य हो सकता हैं. हम लोग कोई काला चोगा नही पहनते हैं, कोई सार्वजनिक साधना नही करते हैं.

- मगर फिर भी तांत्रिको का इतना बड़ा संगठन छुपा हुआ कैसे रह सकता है? मुझे अब भी उसकी बातो पर विश्वास नही हो रहा था.

-क्योंकि संगठन के सदस्य संगठन के लिए जान दे भी सकते हैं और जान ले भी सकते हैं. संगठन के हर सदस्य को एक बात अच्छी तरह से सिखाई जाती हैं और वो हैं छल करना. कोई तब तक हमारे बारें में सच नही जान सकता जबतक हम खुद ऐसा न चाहे और अगर कोई जान भी जाए तब भी वो किसी दुसरे को बताने के लिए जिन्दा नही रहता हैं.

- फिर भी इस सब का मुझसे क्या लेना देना हैं?

- उस फोटो में तुम्हारी माँ के साथ जो आदमी हैं, वो श्री मृत्युंजय महाराज हैं. हमारे संगठन के प्रमुख.

- क्या? मैं चौंक कर उठ खड़ी हुई. तुम यह कहना चाहते हो की मेरी माँ इस सबके बारें में जानती हैं.

- तुम्हारी माँ खुद संगठन की प्रमुख रह चुकी हैं. पूरा संगठन उन्हें गुरु माँ के नाम से जानता हैं.

- क्या बकवास कर रहे हो.

मुझे सब कुछ पता चलने बाद भी कुछ समझ में नही आ रहा था. आखिर मेरी माँ देश के सबसे बड़े तांत्रिको के संगठन की प्रमुख कैसे हो सकती हैं? वो तो इतनी आम दिखती हैं, बिलकुल किसी आम गृहणी की तरह, मैंने जब से होश संभाला हैं उन्हें मेरी परवरिश करते हुए ही देखा हैं. वो तो किसी से ज्यादा बात तक नही करती हैं. मुझे अब लगने लगा था कि अंतस जरुर कोई न कोई बड़ा झूठ बोल रहा था.

- मैं नहीं मानती. मैंने कभी मेरी माँ को किसी संगठन के बारे में बात करते हुए नही सुना.

- हां क्योंकि तुम्हारी माँ ने संगठन ने छोड़ दिया था. वो दूसरी इंसान थी जिन्होंने संगठन से बगावत की थी और आज तक जिंदा हैं. उसने ऐसे कहा जैसे यह कोई गर्व की बात हो.

- और वो पहला इंसान कौन हैं? मुझे कुछ समझ ही नही आ रहा था अंतस क्या कह रहा हैं.

- राणा ठाकुर.

- मगर मेरी माँ ने संगठन क्यों छोड़ा?

तभी दरवाजे पर खट-खट हुई. हम दोनों काँप गए. कही यह राणा के आदमी तो नही थे. अंतस उठा और एक ड्रावर खोला उसमें पिस्तौल के पिस्तौल पड़ी थी, उसने वो उठाई और एक हाथ से पीछे छिपा ली. उसने मेरी और देखा. मैंने से सवालिए नजरिये से देखा. उसने इशारे इशारे में निश्चिंत रहने के लिए कहा.

वो धीरे से दरवाजे के पास गया और पिस्तौल को पीछे छिपा कर ही उसने दरवाजा खोला. दरवाजा खुलते ही वो पीछे हट गया. जसी सम्मान में किसी को आने के लिए रास्ता दे रहा हो.

गुरु माँ आप? उसके मुंह से निकला.

यह मेरी माँ थी. पूरी गुस्से से भरी हुई. उन्होंने अन्दर आते ही अंतस को खींच कर एक तमाचा मारा.

 


नंदिनी ने जैसे ही पैकेट टेबल पर खाली किया एक चीज पर उसकी नज़र रुक गयी. यह गले में पहनने की चांदी की माला थी, जिसमें हु-ब-हु वहीँ त्रिशूल था जो उसने राणा के गले में देखा था.

हम्म...तो ये बात हैं. नंदिनी ने वापस हवालदार को बुलाया.

एक काम करो, मुझे भारत सेवा संस्थान के बारें में पूरी डिटेल निकालकर दो.

जी मैडम.

हवालदार के जाने के बाद नंदिनी ने फोन निकाला और किसी को फोन किया. विजय चुपचाप यह सब देख रहा था.

- नमस्ते राणा साहब! नंदिनी ने एक बनावटी मुस्कान लाते हुए कहा.

- नमस्ते एसीपी साहिबा. आज हमारी याद कैसे आ गयी? उधर से राणा ने भी उसी अंदाज़ में कहा.

- जी आपको शुक्रिया कहना था.

- शुक्रिया..मगर किस बात का?

- आपने हवलदार के हमलावरों को पकडवाने में हमारी मदद की इसलिए.

- इसमें शुक्रियां वाली कौनसी बात हैं? आप मेरी मदद करते रहिये, मैं आपकी मदद करता रहूँगा.

- हम्म...मगर राणा साहब आपने मेरा एक काम नही किया.

- कैसा काम मिस नंदिनी?

- वो त्रिशूल वाला लॉकेट आपने अब तक नही भिजवाया. नंदिनी ने अपनी आवाज में एक कुटिलता लाते हुए कहा.

- मुझे लगा था आपने उसके लिए मना कर दिया था.

- हां..मना तो कर दिया था. खैर मुझे अब एक मिल चूका हैं.

- मिल चूका हैं...कहाँ से मिला हैं आपको?

- उस ड्राईवर की लाश से जिसे आपने पकड़वाया था. शायद वो भी शिवभक्त था.

- ड्राईवर...लाश...वो ड्राईवर मर चूका हैं? राणा ने अचरज में पूछा.

- जी हाँ...उस ड्राईवर ने आत्महत्या कर ली थी. शायद किसी को बचाना चाहता था.

- आप कहना क्या चाहती हैं नंदिनी?

- क्या यह भी एक संयोग ही हैं कि उस ड्राईवर के गले में भी वैसा का वैसा त्रिशूल था, जैसा आपके गले में हैं. जिस ड्राईवर को पूरा पुलिस डिपार्टमेंट नही ढूंढ पाया उसके बारें में भला आपको कैसे पता?

- तो आपको लगता हैं कि वो मेरा आदमी था! भला मैं अपने ही आदमी को क्यों पकडवाऊंगा?

- यह तो मैं नहीं जानती कि उस आदमी को पकड़वाकर आपको क्या मिला मगर जिस दिन में जान गयी यह आपके लिए अच्छा नही होगा.

- मैं आपकी मदद करना चाह रहा हूँ और आप उल्टा मुझ ही पर शक कर रही हैं? अगर कोई दोस्ती का हाथ बढाए तो उसके हाथ में खंजर घौपना अच्छी बात नही मैडम.

- मेरा भला-बुरा मैं अच्छी तरह से समझती हूँ, बेहतर हैं आप अपनी फिकर करे.

-शुक्रिया मुझे बताने के लिए, मैं आगे से ध्यान रखूँगा.

इसके बाद राणा ने फोन रख दिया. विजय इतनी देर नंदिनी की सारी बातों को सुन रहा था.

- ये तुमने क्या किया नंदिनी? राणा से दुश्मनी ठीक नही हैं.

- हम यहाँ पुलिस की नौकरी करने आये हैं विजय, दोस्त बनाने नही.

- वो तो ठीक हैं, फिर भी राणा ने तो ड्राईवर के बारें बता कर तुम्हारी मदद ही की थी.

- विजय, राणा के गले में भी मैंने ऐसा ही लॉकेट देखा था. नंदिनी ने ड्राईवर के लॉकेट की तरफ इशारा करते हुए कहा.

- ऐसा भी तो हो सकता हैं, कि यह मात्र एक संयोग हो.

- और अंतस के पास भी ऐसा ही लॉकेट था. उस ड्राईवर ने किसी संगठन का जिक्र किया था, ऐसे ही एक संगठन का जिक्र ताश्री की डायरी में भी था, उसने लिखा था कि राणा उस संगठन से जुड़ा हुआ हैं.

- नंदिनी वो एक डायरी हैं और यह हकीकत हैं, तुम दोनों को एक कैसे कर सकती हो?

- ...और अगर वो डायरी भी एक हकीकत ही हुई तो?

- मतलब?

- मतलब यह की अब तक इस केस की तहकीकात यह मान कर हुई हैं कि ताश्री का खून अंतस ने किया हैं, पर अगर उसका खून अंतस ने न किया हो और राणा ने किया हो तो?

- यह सिर्फ एक थ्योरी हैं, और हमारे लिए किसी थ्योरी का तबतक कोई मतलब नही हैं जब तक हमारे पास पर्याप्त सबुत न हो.

- वही तो...अब हमें केवल सबुत ढूंढने हैं...खैर छोड़ो..आज तुम खाना मेरे घर पर ही खाओगे. नंदिनी ने उठते हुए कहा. और उस टिफ़िन वाले को भी मना कर देना.

- क्यों कोई ख़ास वजह हैं? विजय ने मुस्कुराते हुए कहा.

- हां अब मैं तुम्हे और बाहर खाना नही खाने दूंगी. वैसे भी तुम अपनी हेल्थ काफी बिगड़ चुके हो.

- जो आज्ञा मैडम. विजय ने हँसते हुए कहा.

विजय और नंदिनी दोनों केबिन से बाहर आ गये.

- तुमने बिएसएस के बारें में डिटेल्स निकाली? नंदिनी ने हवलदार से कहा.

- जी मैडम. इसकी स्थापना सन १९२७ में हुई देश में धर्म की स्थापना, प्रचार और रक्षा के लिए हुए थी...

- बकवास मत करो, इसके प्रमुखों के बारे में बताओ.

- पहले इसके प्रमुख नित्यानंद महाराज थे कुछ साल पहले उनकी मौत हो गयी थी, फिर उनके बेटे मृत्युंजय महाराज बने थे, अभी वो जेल में हो और...

- जेल में? मगर किस आरोप में?

- मोरल ट्रेफिकिंग मैडम...

- मोरल ट्रेफिकिंग! भला इतने बड़े संगठन के प्रमुख को लड़कियों की तस्करी करने की कहाँ जरुरत पड़ गई?

- जी मैडम. दो साल पहले पुलिस ने इन्हें रंगे हाथो इनके हरिद्वार की शाखा से कुछ लडकियों के साथ पकड़ा था. अभी यह हरिद्वार की जेल में हैं.

- हम्म... नंदिनी ने कुछ सोचते हुए कहा. और अभी संगठन का प्रमुख कौन हैं?

- अभी...मैडम अभी तो कोई वेद सागर नाम का व्यक्ति हैं.

- क्या...वेद! इस वेद के बारें में और डिटेल्स निकालो.

- और डिटेल्स! और तो कोई डिटेल्स नही हैं मैडम.

- इतने बड़े संगठन के प्रमुख के बारें में कोई जानकारी नही हैं?

- वो दरअसल मैडम इनके तीन साल का दीक्षा काल होता हैं, बोले तो प्रोबेशन पीरियड, इस समय के दौरान इनके बारें में कोई भी जानकारी सार्वजनिक नहीं की जाती हैं.

- वाह क्या बात हैं? फिर भी इसके बारें में हो सके जितना पता करो.

- इस वेदसागर महराज में तुम्हे इतनी दिलचस्पी क्यों हैं नंदिनी? विजय ने पूछा।

- पूजा ने बताया था कि अंतस किसी वेद नाम के आदमी से फोन पर बात कर रहा था। हो न हो यह वहीं वेद हैं।

- जहाँ तक मुझे याद हैं पुजा ने हमें ऐसा कुछ नही बताया था।

- हां, वो मेरी पूजा से एक और मुलाकात हुई थी, उसने तभी बताया था।

इसके बाद नंदिनी वापस अपने केबिन में चली गयी.

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शाम को थाने से घर जाने का समय था. नंदिनी अपने केबिन में घर जाने की तयारी कर रही थी. विजय केबिन में आता हैं.

-तुम भुलना मत आज तुम्हे खाना खाने मेरे घर पर आना है । नंदिनी ने विजय को देखकर कहा।

-बिलकुल मुझे याद हैं। तुम्हे कुछ चाहिए तो नही, मैं आते हुए लेता आऊंगा।

-नहीं, बस तुम आ जाना। नंदीनी ने मुस्कुराते हुए कहा।

- तुम कहो तो तुम्हारे साथ ही आ जाऊं। विजय ने चुटकी ली।

- रहने दो। इतना भी जरूरी नहीं हैं। नंदिनी उसके बाद थाने से निकल गयी।

रास्ते में वो विजय के बारें में ही सोचते हुए जा रही थी। यह उसके लिये एक नई ज़िन्दगी की शुरूआत थी। ऐसा लग रहा था जैसे उसे कोई नया जन्म मिला हो। सबकुछ जैसे नया नया लग रहा था। नंदिनी का इस दुनिया को देखने का नज़रिया ही बदल गया था।

तभी नंदिनी को लगा की कोई उसका पीछा कर रहा हैं। काफी समय से एक वैन उसके पीछे लगी हुई थी। नंदिनी ने अपनी जीप रोकी तो वो वैन भी रुक गयी। अचानक उस वैन से एक गोली चली । नंदिनी नीचे झुकी, उसने अपनी जीप के ड्रावर से पिस्तौल निकाली, और वापस उस वैन पर गोली चलाई। मगर ये क्या! नंदिनी की पिस्तौल तो खाली थी। नन्दीनी ने देखा कि उस वैन से चार नकाबपोश लोग उतरे हैं। नंदिनी भी अपनी जीप से उतर गयी। वो लोग चलकर जीप के पास आ गए। वैन भी धीरे धीरे पास आ गयी थी।

-नमस्कार, एसीपी साहिबा! एक नकाबपोश ने कहा और दो नकाबपाशो ने नंदिनी को जबरदस्ती पकड़ कर वैन में डाल दिया।

………

 
विजय थाने से घर आया था और वापस नंदिनी के घर जाने की तैयारी कर ही रहा था तभी उसको एक फोन आया. उसने फोन उठाया, यह थाने से एक कांस्टेबल का फोन था.

“सर वो एसीपी साहिबा....” सामने से कांस्टेबल ने कहा.

“क्या हुआ नंदिनी को?” विजय ने चौंकते हुए पूछा.

“एसीपी साहिबा का अपहरण हो गया हैं स .”

“क्या अपहरण...मगर कब? कैसे?”

“घर जाते वक्त अजमेर रोड पर कुछ गुंडों ने उनका अपहरण कर लिया हैं. किसी ने गुंडों को जबरदस्ती उन्हें वैन में डालते देखा था तो थाने फोन किया.”

तुम उस जगह पर पहुँचो, मैं भी आ ही रहा हूँ...और सुनो यह बात किसी भी हाल में थाने से बाहर नही पहुंचनी चाहिए, समझे?”

“जी सर.”

कुछ वक्त बाद विजय घटनास्थल पर पहुंचा. वहां सिर्फ नंदिनी की जीप पड़ी थी. पास ही उसे खाली पिस्तौल भी मिली. लेकिन उन्हें यह पता नही चला था कि पिस्तौलें पहले से खाली थी. उन्होंने यहीं माना था कि शायद बचाव में नंदिनी ने भी फायर किया होगा जिससे पिस्तौल खाली हो गयी होगी. नंदिनी के जीप के ऊपर फायरिंग के दो निशान भी मिले थे. वहां कुछ देर तफ्तीश करने के बाद विजय ने अलग अलग टीमे बनायीं और जगह-जगह ढूँढने भेजा. पुरे शहर में नाकाबंदी करवा दी गयी. पूरी रात विजय और उसकी टीम जगह जगह ढूंढती रही मगर उन्हें कुछ भी हासिल नही हुआ. सुबह वो वापस थाने आ गये. विजय एक कुर्सी पर निराश सा बैठा था. पास ही एक हवलदार भी खड़ा था.

“सर यह किसका काम हो सकता हैं? मैडम को तो यहाँ आये ही कुछ दिन हुए थे, आखिर उनकी किससे दुश्मनी हो सकती हैं?” हवालदार ने विजय से कहा.

“एक इंसान था जिसके साथ उसकी दुश्मनी हुई थी...चलो मेरे साथ...” विजय ने उठते हुए कहा.

“कहाँ सर?”

“राणा साहब के यहाँ... उनसे मुलाकात करने का वक्त आ गया हैं.”

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गुंडों ने नंदिनी को वैन में डालने के बाद क्लोरोफोम सुंघा कर बेहोश कर दिया. वो पूरी रात उस वैन में पीछे बेहोश पड़ी थी. गुंडों ने उसका मुंह और हाथ बाँध दिए थे. सुबह जब उसको होश आया तो वो अब भी उस वैन के पीछे ही थी, होश आने पर भी नंदिनी ने आँखे बंद ही रखी जिससे कि उन गुंडों को पता न चले की उसे होश आ गया हैं.

“...मुझे तो लगा था इसे उठाने में काफी दिक्कत होगी, मगर ये काम काफी आसानी से हो गया.” उनमें से एक गुंडे ने कहा.

“वो तो अच्छा हुआ इसकी गन खाली थी, वरना इसको पकड़ने मे फट कर हाथ में आ जाती.” दुसरे गुंडे ने कहा.

“हां भाई काम तो काफी मुश्किल था, एक एसीपी को किडनैप करना कोई मजाक काम थोड़ी हैं, मगर आखिर संगठन का सवाल था, खुद मृत्युंजय महाराज का आदेश था तो करना ही था.” तीसरे ने कहा.

“लेकिन आखिर इसे उठाने की जरुरत ही क्यों पड़ी?” पहले वाले ने पूछा.

“शायद यह सगठन के बारें में बहुत कुछ जान रही थी और खुद संगठन के लिए एक खतरा बन सकती थी.”

“तो अब?”

“अभी तक तो बस इसे उठाने के लिए कहा गया हैं बाकि अगले आदेश का इंतज़ार करना हैं...फिलहाल तो बहुत जोर से भूख लग रही हैं, पूरी रात से गाडी चला रहा हूँ.” ड्राईवर ने कहा.

“मगर आदेश हैं कि हमें बीच में कहीं नही रुकना हैं.” पास ही बैठे व्यक्ति ने कहा.

“भाई आदेश तो ठीक हैं मगर मेरे पेट में समस्या हो रही हैं उसका क्या? वो तो आदेश नही समझता हैं न? तीसरे न कहा.

“हम्म...ठीक हैं किन्तु सिर्फ आधा घंटा...और सुनो तुम यही रुको.” ड्राईवर के पास वाले आदमी ने एक आदमी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

“जी महोदय...”

उसके बाद वैन एक ढाबे पर रुकी और सारें गुण्डे उतरकर ढाबे पर चले गए. कुछ देर बाद वो व्यक्ति भी वैन से उतारकर बाहर आ गया. उसके उतरने के बाद नंदिनी थोड़ी सी हिली मगर उसके हाथ पीछे बंधे हुए थे और पैर भी बंधे हुए थे. उसे ट्रेनिंग के दौरान ऐसी परिस्थिति से निपटना सिखाया गया था. वो सीधी लेटी और अपने हाथो को ऊँचा कर धीरे-धीरे आगे लाने लगी. यह काफी दर्दनाक प्रक्रिया थी यही एक मात्र रास्ता हैं, कुछ देर बाद उसके हाथ उसके सर से होते हुए उसके मुंह के सामने आ गए, उसने अपने मुंह से हाथो की रस्सी खोली और फिर पैरो की रस्सी भी खोली, उसने वैन में इधर उधर देखा, वहां एक लोहे का जैक पड़ा था, उसने उसे उठाया और धीरे से वैन के आगे आ गयी.वो आदमी कुछ देर खड़ा होकर फोन पर किसी से बात कर रहा था. नंदिनी धीरे से वैन से बाहर निकली और उस आदमी के सर पर जैक से वार किया. वो वही ढेर हो गया. नंदिनी तेजी से वहां से भागी.

उसका मोबाइल शायद उसकी जीप में ही रह गया था, थोडा थोडा उजाला हो गया था, जिससे उसने अनुमान लगाया कि शायद सुबह की छह-सात बज रही हैं. आगे जाकर एक गाँव आया, कोई औरत मटका लेकर पानी लेने जा रही थी.

“यह कौनसी जगह हैं?” नंदिनी ने उस औरत से पूछा.

“फालना गाँव...” उस औरत ने नंदिनी को घूरते हुए कहा.

“जिला कौनसा हैं?”

“हरिद्वार!” उस औरत ने कहा.

राणा ठाकुर उठने के बाद सुबह-सुबह जॉगिंग के लिए गए थे, वहां से वापस आकर नहाने के बाद नाश्ता कर रहे थे.

“काका...” उन्होंने अपने नौकर को आवाज लगाई.

“जी होकम.” एक नौकर दौड़ता हुआ आया.

“प्रताप अभी तक उठा नही?”

“होकम वो रात को देर से ही आये थे.”

“हम्म..यह इसका रोज का हो गया हैं, कल होटल से भी जल्दी ही निकल गया था... जाइए उसको उठाइये और यहाँ नीचे भेजिए.”

“होकम वो...” नौकर नज़रे नीची किये वहीँ खड़ा रहा. राणा समझ गये कि प्रताप को नींद से उठाने की जुर्रत नौकर नही कर सकते हैं.

“ठीक हैं...आप जाइए मैं खुद उठा लूँगा उसे” राणा वापस पेपर पढने लगे. तभी एक पहरेदार अन्दर आया.

“होकम वो इंस्पेक्टर विजय आपसे मिलने आये हैं.” पहरेदार ने कहा.

“इंस्पेक्टर विजय! वो इतनी सुबह यहाँ क्या करने आया हैं...ठीक हैं उसे अन्दर भेजिए.”

थोड़ी देर बाद विजय दो हवलदार के साथ अन्दर आया.

“विजय साहब..क्या बात हैं आज सुबह सुबह कैसे दर्शन दे दिए?” राणा ने उन्हें बिठाते हुए कहा. “काका...मेहमानों के लिए नाश्ता लाना.”

“नही राणा साहब उसकी कोई जरुरत नही हैं, हम यहाँ नंदिनी...आई मीन एसीपी साहिबा के बारें में पूछने के लिए आये हैं.”

“नंदिनी के बारे में! मैं कुछ समझा नही विजय.”

“एसीपी साहिबा का कल शाम को अपहरण हो गया हैं.”

“क्या! मिस नंदिनी का अपहरण हो गया हैं?” राणा ने चौंक कर कहा. “कमाल की बात हैं विजय हमारें शहर में खुद एसीपी सुरक्षित नही हैं तो बाकी जनता का क्या होगा? ...और आप इस बारें में मुझसे क्या पूछताछ करना चाहते हैं? कहीं आपका शक मुझ पर तो नही हैं?”

“राणा साहब...एसीपी साहिबा इस शहर में नयी आई थी और उनकी किसी और से दुश्मनी नही थी. अभी हाल ही में हमारे थाने में एक ड्राईवर ने आत्महत्या की थी और नंदिनी को लगता हैं कि इसके पीछे आपका हाथ था. कल आपकी नंदिनी से कुछ बहस हुई थी न?”

“हां वो उन्हें कुछ गलत फहमी हुई थी मगर इसका यह मतलब तो नही हैं कि मैं उनका अपहरण कर लूँगा.”

“हमें अभी तो सिर्फ आपके ऊपर ही शक हैं...आपको थाने चलना होगा.” विजय ने दृढ़ता से कहा.

“आप मुझे गिरफ्तार करने आये हैं?” राणा ने आखे तरेरते हुए कहा.

“गिरफ्तार नही बस पूछताछ के लिए.”

“आप किसी इज्जतदार व्यक्ति को ऐसे थाने नही ले जा सकते हैं.”

“मेरे पास इसका वारंट हैं...राणा साहब मैं आपकी बात समझता हूँ, मगर मामला काफी गंभीर हैं...”

“प्रताप उठ जाए तो उससे कहना हम किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं.” राणा ने अपने नौकर से कहा.
 
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