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रहस्य के बीच complete

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Guest
रहस्य के बीच

हर ओर जैसें खून की बरसात हो रही थी । रहस्यों का गहराता जाल हर पल कसता जा रहा था और दुनिया कै सभी महान जासूस इस जाल मे फंसे तड़प रहे थे । बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं था ।

कही बिकास अकेला ही उन रहस्यों को भेदने का प्रयास कर रहा था तो कही विजय लेकिन मौत का यह सन्नाटा हर बीतते पल के साथ और भी गहरा होता जा रहा था ।

वेदप्रकाश शर्मा की जादुई कलम से निकला......

हारॅर स्टोरी

विजय विकास सीरिज

रहस्य के बीच
 
सन् 1955 की 5 जनवरी।

पांच जनवरी की कडकड़ाती हुई सर्द स्याह रात ।

गर्जना करते हुए बादल, प्रकोप दिखाते हुए मेघ, चमचमाती हुई बिजली और तीव्र हवा के झक्कड़ इस स्याह रात को मौत-सी भयंकर बना रहे थे ।

बात है श्मशानगढ़ की ।

श्मशानगढ़ ।

एक ऐसी स्टेट जो पूर्णतया अपने नाम के समान गुण वाली थी, अर्थात् श्मशान से भी अधिक भयानक । वहां रात का आगमन होते ही मानो साक्षात मौत सड़क पर नृत्य करती थी ।

बिजली चमकी l

पलभर के लिए प्रकाश से वातावरण जगमगाया ।

इस एक ही पल के प्रकाश में पेडों के झुरमुट मेँ बनी वह दैत्याकार हवेली ऐसे चमकी मानो कोई खतरनाक डायन अपने शत्रु क्रो डसना चाहती है ।

प्रत्येक चमक के साथ दैत्याकार हवेली चमकती और वातावरण के डरावनेपन मेँ चार चांद लगा देती ।

उस दैत्याकार हवेली के एक कमरे मे एक बिस्तर पर दो प्राणी गहरी नींद के आगोश में थे ।

पहली एक युवती जो चेहरे से पैतीस वर्ष के लगभग लगती थी और दूसरा था उसका बच्चा जो आठ बर्ष का लगता था ।

गर्म रुई की रजाई में उनके चेहरों के अतिरिक्त सम्पूर्ण जिस्म लिपटा था लेकिन फिर भी बच्चे को शायद सर्दी लग रही थी क्योंकि बच्चा वार-बार कुलबुलाता तथा अपनी मां के वक्षस्थल में समाकर उसकी गर्मी प्राप्त करने की चेष्टा करता ।

मां ने उसे बांहों मेँ भरकर अपने आंचल मेँ छुपा लिया था ताकि उसे और अधिक सर्दी न लग सके ।

सहसा एक धीमी…सी आहट हुई दरवाजा खुला ।

तभी जोरदार गड़गड़ाहट के साथ बिजली र्कोंधी ।

दरवाजे पर एक डरावनी शक्ल-सूरत का व्यक्ति नजर आया । चेहरे पर भयानक भाव थे । दहकती सुर्ख आंखों से झांकती राक्षसी हवस । उसकी आंखें मानो इंसानी लहू की प्यासी थीं । होंठों पर क्रूरतम मुस्कान तथा नथुने फड़क रहे थे । जबड़े कुछ सख्ती के साथ मिंचे हुए थे । जिससे चेहरे की एक…एक हड्डी स्पष्ट चमक रही थी ।

क्षण मात्र के प्रकाश मेँ वह दरवाजे के बीचों बीच खड़ा किसी दानव से किसी भी प्रकार कम नहीं लग रहा था । अब भी रह…रहकर जब बिजली कौंधती तो वह किसी दैत्य के समान डरावना लगता था ।

उसकी दैत्याकार आकृति दरवाजे से हिली । वह कमरे के अंदर दाखिल हुआ तथा पलंग की ओर बढा ।

नाइट बल्ब के मद्धिम प्रकाश मेँ वह कोई खूनी भेडिया लग रहा था । उसकी लाल आंखें इस प्रकाश से और भी लाल हो गई थी । आंखों में एक हवस थी, इंसानी लहू की प्यास, खूंखार तरीके से वह पलंग की और बढ रहा था ।

उसके सीधे हाथ मे तलवार थी, एक चमचमाती तलवार ।।

वह आगे बढ़ रहा था, निरंतर पलंग की ओर ।

बादल गरजे तथा फिर-बादलों की गरजना के साथ वह युवती तथा तथा उसका पुत्र हड़बड़ाकर उठ गए और तभी उनकी नजर कमरे मेँ उपस्थित भयानक व्यक्ति पर पडी ।

उनके कंठ से चीख निकल गई ।

बच्चा अपनी मां के सीने से लग गया ।

लेकिन उस भयानक व्यक्ति पर इस बात का लेशमात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा । उसके चेहरे पर उसी प्रकार खूंखार भाव, वही क्रूरता, वही हवस झलक रही थी ।

तलवार सम्भाले वह निरंतर उन्हीं की ओर बढता रहा l सहसा वह युवती जैसे उसे पहचान गई थी, वह बोली-“आप यहां?"

लेकिन वह कुछ नही बोला, उसी प्रकार भयंकर तरीके से उनकी ओर बढता रहा ।

"हाँ, मैं यहाँ?" वह बोला…" कमीनी, कुतिया, मैं तुम दोनों के लहू का प्यासा हू । मैं तुम्हारे खून से अपनी आत्मा को तृप्त करूंगा । तुम्हारे मीठे लहू का आनंद लूंगा । हा. . .हा . . हा . . . l" कहने के बाद उसने अट्टहास लगाया ।

अट्टहास ने सर्द तूफानी रात के वातावरण को झिझोड़ दिया । ऐसा लगा मानो अनेक आत्माएं मिलकर खिलखिला रही हों I

मां और पुत्र कांप गए । उन्हें लगा उनके सामने खड़ा कोई जीवित व्यक्ति नहीं है बल्कि कोई प्रेतात्मा है । मौत और भय को परछाइयां उनकी आंखो में तैरने लगीं ।

उसने अपने बच्चे को और भी अपने आगोश में छुपा लिया और फिर साहस बटोरकर गिड़गिडाई----" नहीँ...नही...हमेँ क्षमा कर दीजिए. . .अ. . .अ. . . I” अभी वह कह भी नही पाई थी वह फिर भयानक तरीके से हंसा । उसकी हंसी इतनी भयानक थी कि स्वयं भयानकता भी कांप जाए ।

"बडा पागल है वो जो तुम्हारे मीठे लहू का आनंद न ले I” वह उसी प्रकार आगे बढता हुआ भयानक स्वर में बोला ।

“इस.. .बालक का ल. . हू . . .अ…अ I”

फिर वह आगे कुछ न कह सकी ।

बिजली कौंधी ।

उसके हाथ की तलवार लहराई ।

खच ।

एक जोरदार चीख से वातावरण झनझनाया ।

क्षण मात्र में सिर धड़ से अलग हो गया ।

गर्म लहू की बौछार, तृप्त खून का फव्वारा तथा उबलते रक्त की धारा एकदम निकली और वह हवस का पुजारी झपटा गर्म लहू की प्यास बुझाने के लिए और तीव्रता से धारा के रूप में बहते लहू को वह ओक से पीने लगा ।

वह लहू पर ऐसा झपटा था मानो वर्षों का प्यासा हो ।

तभी दूर कहीं ।

कोई कुत्ता रोया ।

उल्लू बोला ।

चमगार्दड़ चिल्लाए । लेकिन वह भयंकर राक्षस लहू पीकर अपनी प्यास बुझा रहा था ।

उसका सारा चेहरा और हाथ लहू से सन गए थै I

इस समय वह राक्षस लग रहा था । भयानक व्यक्ति, खूंखार लहू का प्यासा, लहू से सना उसका चेहरा भयंकरता की चरम सीमा को स्पर्श कर गया था ।

उसने अधिक खून नहीं पिया । शीघ्र ही हट गया तथा भयानक तरीके से बालक की ओर देखा ।

“नही.. .नही. . . I” वह बालक भय से पीला पड़ गया था ।

"तेरा खून इस कुतिया से ज्यादा गर्म होगा बदजात I” वह भयानक तरीके से बालक की तरफ़ बढ़ता हुआ बोला ।

बालक सिसका, बिलबिलाया, रोया, बिलखा लेकिन उस राक्षस पर किसी बात का कोई प्रभाव नहीं पड़ा बल्कि उसी प्रकार की भयानक हंसी के साथ वह बालक की तरफ़ बढा ।

 
झन्न . . .न . . .न

तलवार फिर लहराई ।

फिर खच की एक आवाज ।

एक मासूम की करुण चीख ।

तथा पलभर में सिर से धढ़ अलग हो गया ।

उसने एक किलकारी मारी, जो मासूम बालक के गर्म खून को देखकर उसकी प्रसन्नता की परिचायक थी । वह किलकारी के साथ झपटा तथा उसने खून से ओक लगा दी ।

अगले ही क्षण वह उस गर्म खून को बड़े चाव के साथ पी रहा था ।

जब वह सम्पूर्ण खून पी गया तो भी मानो उसको प्यास न बुझी थी । वह पागलों की भांति झपटा तथा अपनी जीभ से फ़र्श पर पड़े लहू को कुत्ते की भांति चाटने लगा ।

यह मानव था या राक्षस अथवा कोई प्रेतात्मा?

@@@@@@@@@@@@@@@@@@

ज्यों ही युवती को तलवार लगी कई काम एक साथ हुए I

पहला-क्षण मात्र में घड और सिर का नाता टूट गया ।

दूसरा-वह निर्जीव हो गई ।

लेकिन क्यों?

वह निर्जीव क्यों हो गई?

सिर और धड़ के अलग होते ही, उसके दिल की धड़कने बंद हो गई । सीने मेँ फंसी रूह एक तीव्र झटके के साथ बाहर आई I इस रूह के शरीर से पृथक होते ही वह निर्जीव हो गई l सिर कटना उसके निर्जीव होने का वास्तविक कारण नहीँ था बल्कि वास्तविक कारण था इस रूह का शरीर त्याग देना । रूह उस शरीर मेँ नहीं रह सकती जो अस्वस्थता की सीमा से निकल गया हो और यही कारण उस युवती की मृत्यु का था । जैसे ही धड़ सिर से अलग हुआ, शरीर आत्मा के निवास के योग्य नहीं रहा । और आत्मा ने उसके शरीर क्रो त्याग दिया । इधर आत्मा ने शरीर'को त्यागा ।

आत्मा एक गोले के रूप में बाहर आईं, वह तेर्जी के साथ घूम रही थी ।

मानव आत्मा एक छोटे-से गोले के रूप में थी । वह अत्यंत तीव्रता के साथ वायुमंडल में घूम रही थी ।

उस समय हवस का वह पुजारी युवती का खून पी रहा था । आत्मा के अंदर प्रतिशोध की भावना थी । भयानक प्रतिशोध की ज्वाला उसके सीने में धधक रही थी ।

बदले के शोले उफन रहे थे । यह आत्मा अपने शरीर की मौत का बदला लेना चाहती थी इस भयानक इंसान से, लेकिन?

लेकिन यह असहाय थी, मजबूर थी । बिना किसी शरीर के वह आत्मा अपना प्रतिशोध पूरा नहीं कर सकती थी । बिना शरीर की वह आत्मा इस भयानक व्यक्ति की तो बात ही क्या एक बालक को भी हानि पहुंचाने में असमर्थ थी ।

कुछ देर तक आत्मा कमरे मेँ ही घूमती रही ।

कुछ काल तक आत्मा भटकती रही लेकिन जब रास्ता न मिला तो एक खिडकी का शीशा हल्का-सा चटक गया और आत्मा वायु के रूप में बाहर के तूफानी वातावरण में आ गई ।

तीव्र हवा के झक्कडों के साथ आत्मा इधर-उधर लहराई । तीव्रता के साथ घूमी और फिर वायु के वेग के साथ बहती चली गई । इस आत्मा में उस युवती के समस्त विचार, भावनाएं तथा इच्छाएं आदि अभी तक सुरक्षित थे तथा वह उडी चली जा रही थी । आत्मा की अपनी कोई शक्ति नहीं थी । वह तो पूर्णतया वायु के वेग पर निर्भर थी ।

वह उडती जा रही थी, उड़ती गई और उड़ती ही चली गई ।

अंत में । लगभग साठ मिनट पश्चात ।

वायु के साथ भटकती हुई वह एक विशाल बूढे पीपल के वृक्ष के विशाल तने से टकराई-तने में चिपकी आत्मा रेगी ।

फिर सबसे अंत मे ।

वह आत्मा उस पेड़ के विशाल तने में बने एक बड़े गोलाकार छिद्र में समा गई l पीपल का वृक्ष भीतर से खोखला था तथा आत्मा वृक्ष के भीतरी खोखले भाग मेँ भटक रही थी ।

युवती की वह आत्मा उस वृक्ष मेँ कैद होकर रह गई ।

ठीक इसी प्रकार l बालक की आत्मा ने भी शरीर त्यागा ।

उस बालक की प्रतिशोध की ज्वाला अपनी मां की आत्मा से अधिक तीव्र थी । क्योंकि अभी इस आत्मा को बालक का यह शरीर बहुत प्रिय था और आत्मा उसे त्यागने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नही थी ।

बदले की आग चाहे कितनी भी तीव्र क्यों न थी लेकिन बिना किसी शरीर के तो आत्मा किसी का कुछ बिगाड ही नहीं सकती थी ।

अत: मजबूर वह आत्मा भी पहले से ही 'क्रैक' हुए शीशे के रास्ते से तूफानी रात मेँ वायुमंडल में आ गई ।

वह भी हवा के झक्कडों के साथ इधर-उधर लहराई, घूमी तथा घूमती हुई वेग के साथ तीव्रता से आगे की तरफ उडी चली गई ।

काफी समय तक वायुमंडल मेँ इसी प्रकार भटकने के पश्चात ।

अंत मेँ l

इस बालक की भटघन्ती हुई आत्मा एक झोंपडी कै बंद दरवाजे की दरार में से झोंपडी में प्रविष्ट हो गई I

झोपडी में एक तेल का लेम्प टिमटिमा रहा था ।

लैम्प का जर्जर पीला प्रकाश झोंपडी में फैला हुआ था तथा झोंपडी में किंहीं दो व्यक्तियों की सांसें तीव्रता से चलने की ध्वनि गूंज रही थी ।

झोंपडी में सिसकारियों का साम्राज्य था ।

एक टूटी-फूटी-सी खाट चरमरा रही थी l

यह कोई नवविवाहित जोड़ा था जो संसार के सर्वोत्तम सुख में डूबे इस सर्द रात्रि की सर्दी से बचने का उपाय कर रहे थे ।

वे एक…दूसरे में डूबे जा रहे थे ।

एक…दूसरे में समाना चाहते थे ।

बालक की आत्मा इसी झोंपडी के वायुमंडल में चक्कर लगाने लगी ।

और फिर ।

सबसे अंत मेँ ।

बालक की वह आत्मा वायु के साथ सांस के माध्यम से संभोग करती उस युवती के शरीर में चली गई तथा वहीँ कैद होकर रह गई ।

रात की भयंकरता में किसी प्रकार कभी न आई थी ।

फिनिश

 


रहमान ।।

बंगला सीकेट कोर का एक जांबाज जासूस ।

यूं तो यह केवल बीस वर्ष का नवयुवक था । लेकिन बीस बर्ष का यह नवयुवक विजय की उम्मीदों से कही अधिक खतरनाक साबित हुआ था । 'पाकिस्तान का बदला' वाले केस मे बंगला सीक्रेट कोर की ओर से बिजय की सहायता के लिए उसे भेजा गया था और जब वह बिजय से मिला तो खूनी ब्लैक दिसम्बर के एजेंटों की रायफलॉं में साए में था I

लेकिन जब बिजय ने रहमान को चमत्कारी ढंग से स्वयं को बचाता देखा तो विजय दांतों तले उंगली दबाकर रह गया ।

विजय तभी जान गया था कि रहमान बहुत कुछ कर सकता है ।

रहमान विजय को गुरु मानता था और उसका बहुत आदर करता था । रहमान एक ऐसा नौजवान था जो पाक-बंगता के बर्बरतापूर्ण युद्ध मेँ सिर से कफ़न बांधकर कूद गया था। रहमान की प्यारी बहन की इज्जत पाकिस्तानी भेडियों ने सरे…बाजार नीलाम की थी । मां के स्तनों से अपनी संगीने रंगी थीं, बूढे बाप के जर्जर जिस्म को गोलियों से छलनी कर दिया था तथा एक मासूम छोटे माई को संगीनों की नोक पर रखकर जीवित धधकती हुई आग मेँ धकेल दिया और फिर उसकी आंखों में खून उतर आया था । बीस वर्ष का वह युवक इतना खतरनाक हो उठा कि उसने पाक सेना की टुकड्रियां की टुकडियां मौत के मुंह में झोंक दी थीं । लेकिन फिर भी पाकिस्तानियों के विरुद्ध उसके सीने में जलती प्रतिशोध की ज्वाला कम न हुईं और शायद जीवन-भर कभी कम भी नहीं होगी ।

वह यूं ही सिर पर कफ़न बांधे युद्ध में लड़ता रहा था और अपने बंगला देश को एक आजाद देश बनाया था ।

बंगला से बंगला देश बनते ही बंगला को एक जासूसी संस्था बनानी आवश्यक हो गई तथा बंगला के अधिकारियों ने "बंगला सीक्रेट कोर" का चयन किया और रहमान बंगला देश की इसी जासूसी संस्था का सर्वश्रेष्ठ जासूस था ।

युद्ध के पश्चात पाकिस्तान की एक संस्था "पाकिस्तान का बदला" के पतन हेतु उसे 'बंगला सीक्रेट कोर' की ओर से भारत विजय के पास भेजा गया था ।

पाकिस्तान का बदला वाले केस में रहमान ने बिजय के कंधे-से-कंधे लड़ाकर कार्य किया तथा बिजय जान गया कि रहमान एक श्रेष्ठ जासूस बन सकता है और यही कारण था कि उसने रहमान को फिलहाल बंगला देश नहीं भेजा । उस समय से वह रहमान को जासूसी के एक-से-एक दिग्गज दांव-पेच सिखाता रहा ।

वैसे रहमान तो काफी दिलचस्प भी था । विजय उसके साथ बोर नहीं होता था । और उसे अपनी बकबास करने का पूर्ण मसाला मिल जाता था और वही क्रम अब भी चल रहा था ।

विजय कह रहा था-"तो चेले मियां, अगर आज के बाद तुमने हमारी शान में गुस्ताखी की तो. . ॰ I"

"गुरू मेरा मतलब कुछ और ही था ।" गम्भीर स्वर में वह बोला ।

“क्या मतलब था?"

"मैं झकझकी सुनना चाहता था ।"

"बदतमीज?” विजय एकदम किसी क्रोधी साधु की भांति चीखा ।

"अब क्या हुआ गुरुदेव? "

"तुम झकझकी का अपमान करते हो I"

“ऐसी तो कोई बात नहीं हे गुरु जी I”

“अबे झकझकी सुनने की इच्छा क्रो इस प्रकार व्यक्त करना सरासर झकझकी का अपमान करना है । अगर झकझकी सुनना चाहते हो तो कहना चाहिए झकझकी बोर वस्तु है l”

"आपकी आज्ञा, सिर…आंखों पर गुरुदेव ।" रहमान सिर हिलाकर किसी आज्ञाकारी शिष्य की भांति बोला ।

"फलो-फूलो मेरे बच्चे?"

"तो गुस्वेव, झकझक्री से बोर चीज इस संसार में नही है I»

"अबे ओ बुद्धिमान गुरु के मूर्ख चेले, जुबान सम्भाल के बात कर जानते नहीं हो तुम झकझकिर्यो के सम्राट मुनि श्री 100008 यानी बिजय दी ग्रेट के सामने बेठे हो I तुम हमारे सामने हमारी साहित्यिक क्षेत्र में की गई एक नई खोज 'झकझक्री' को बोर कहते हो I”

"मेरा मतलब.. . I"

"बको मत, मेरी बात अभी समाप्त नहीं हुई है ।" विजय बीच मेँ ही चीखा…“तुमने हमारी झकझक्री का अपमान किया है । अत: हम तुम्हारे सामने अब एक निहायत ही स्वच्छ साहित्यिक झकझक्री पेश करते हैं I"

और रहमान नादान चेले की भांति गर्दन उठाए विजय क्रो देखता रहा तभी विजय ने जो झकझक्री सुनाई वह कुछ इस प्रकार थ्री…

"मेरे घर पर आए मियां रहमान कहने लगे-मान न मान मैं तेरा मेहमान । गरीबी मेँ आटा गीला, मेरी निकल गई जान l उसकी सुनते-सुनते मेरे पक गए कान । "

“मजा नहीं आया गुरु I” रहमान अजीब-सा मुंह बनाकर बोला ।

"अबे तो फिर दूसरी सुन I"

"ठहरो गुरू ।”

"बको चेले!"

"एक झकझक्री मेरी भी ।"

"अबे ओ मिस्टर मेहमान ।"

"मेहमान नहीं गुरु, रहमान I"

“हां . .हां. . .मैं कोई कह रिया था…बात ये है क्रि झकझक्री तो जरूर सुनाओ, लेकिन अपने गुरु की इज्जत बचा के I"

“हां तो गुरूदेव, पेशेखिदमत है ।" रहमान ने कहा तथा’ निम्न झकझकी सुनाई ।।

"आरती करो गुरन्देव की । सफाई करो उनकी जेब की । भेट चढाओ एक सेब की । भैंस है ये बलदेव की I”

"शाबाशा चेले मियां I" विजय उसकी पीठ ठोकता हुआ बोला-"वाह बेटा रहमान । आज हम जान गए कि हमारे बाद भी हमारा नाम रोशन करने वाले कोई हैं?"

और रहमान सीना फुलाकर कुछ इस प्रकार अकड़ गया कि मानो उसे संसार के सबसे अधिक बुद्धिमान की उपाधि दे दी गई हो ।

 


बिजय अभी कुछ कहना ही चाहता था, कि पूर्णसिंह ने कमरे में प्रवेश किया तथा उसे देखकर विजय फिर बोला…“कहो बेटा पूरे शेर यानी सड़े हुए बेर, क्या हाल हैं?"

"साहब, ये चिट्रिठयां अभी-अभी डाकिया दे गया हैं ।” पूर्णसिंह ने अपने हाथ में पकड़े दो लिफाफों को आगे बढाते हुए कहा ।

"मेज पर रख दो ।" विजय ने सतर्कता के साथ कहा ।

पूर्णसिंह चला गया ।

सम्पूर्ण सतर्कत्ताओं को ध्यान मे रखते हुए उसने वे लिफाफे खोले यह उसके दुश्मनों का कोई फ्रेंड नही था बल्कि लिफाफे थे ।

“चेले मियां ।"

“यस गुरुदेव! "

"इन्हें बांचो!"

"बांचो? "

" यानि पढो !"

“ओं l"

"जोर-जोर से I"

"जैसी आज्ञा गुरूदेव I” रहमान ने कहा तथा पहला पत्र पढने लगा ।

लिखा था…

"प्रिय दोस्त विजय?

आज तुम एक अजनबी का वह का पढ़कर आश्चर्यचकित होगे । लैकिन दोस्त सबसे पहलें मैं तुम्हें अपना परिचय दै दु तो अच्छा हैं शायद तुम मुझे न पहचानते ही लेकिन मैं तुम्हें ध्यान दिलाने का प्रयत्न करता हूँ । मैं इंटर में तुम्हारे साथ पढा था और मेरा नाम राजीव है ।

अब तो शायद मुझे पहचान गए होगे ।

प्रिय दोस्त; हमारी स्टेट श्मशानगढ में आजकल ऐसी-ऐसी भयानक वारदातें हो रही है कि श्मशानंढ़ पह्रलै तो रात में ही श्मशान नजर आता था लोकेन अब दिन में भी यही

हाल है । मुझे तो विश्वास नही हो रहा है कि जो अफवाहें यहां फैली हुई हैं क्या उनमें एक प्रतिश्त भी सच हो सकती है ।।

कहतें हैं कि श्मशानगढ़ आत्माओ भूतो-प्रेतों और राक्षसों की स्टेट है I यहाँ मानव नहीं रह सकता । रात होते ही यहां प्रेतात्माओं की अजीबोगरीब लीलाएँ प्रारम्भ ही जाती हैं । एक सुंदर लड़की हर रात को श्मशानगढ़ की सडकों पर नजर आती है, लोग उससै भयभीत हैं I कहते हैं वह रूह है…भटकती हुई रूह यानी प्रेताआत्मा I

विजय, शायद तुम मुझे पागल समझो क्योकि में अब एक ऐसी बात लिखने जा रहा हू…जिस पर हम जैसै आथुनिक़ व्यक्ति कभी विश्वास कर ही नहीं सकता ।

बडी ही अजीबोगरीब उलझनपूर्ण वारदातें यहां तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही हैं I

तुम्हें पत्र लिखने की आवश्यकता इसलिए पडी क्योंकि यहां हर रोज आत्माओं द्वारा यह धमकी दी जा रही हैं कि स्टेट कै राजा कै खानदान कै एक एक व्यक्ति को तडपा तडपा कर मौत दी जाएगी I

आज से अट्रठारड वर्ष पूर्व 5 जनवरी, 1955 को यहाँ स्टेट की एक रानी तथा उनके बच्चे की इतनी निर्मम हत्या की गई कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता I हत्यारे ने उनका खुन तक पी लिया था I उसी 5 जनबरी सै आज़ तक प्रेतात्माओं की ये लीलाए जोर पकड़ती जा रही हैं I ये समझ लो कि श्मशानगढ़ पुरी तरह प्रेतग्रस्त हैं I

मैं यहां होने वाली प्रेतालीलाआँ का वर्णन विस्तार से करने का साहस नहीं रखता I जब भी इन प्रेत लीलाओं कै विषय में सोचता हू तो भय लगने लगता है । ऐसा लगता है जैसै कोई प्रेताआत्मा मैरे दिलो दिमाग पर काबु करती जा रही है

मुझे कोई प्रेत हाथों से उठाकर पटक दैगा...नहाँ...नहीं,,,, मै उन भयानक वारदातों का वर्णन नहीं कर सकता देखो, अब मेरा हाथ कांपने लगा है । मुझे लग रहा है जैसे कोई प्रेत आत्मा घूरु रही है । मेरै शरीर की शक्ति छिनती जा रही है , जिस्म रज रहित होता जा है ।

दोस्त, बस यह समझ लो कि वास्तव मे शमशानगढ प्रेत आत्माओं की स्टेट है लोकिन मै क्योंकि प्रेत-आत्माओ पर विश्वास नहीं करता, इसलिए सोचता हू कि शायद ये सब एक षड्रयत्र के अंतर्गत हो । हो सकता कि स्टेट कै कुछ पुरानै शत्रू स्टेट का बिनाष चाहते हों. . बैसे सच पूछो तो मेरा विश्वास आधुनिक बिज्ञान के बिचार ( प्रेत आत्माएं नहीं होती ) से हटता जा रहा है और विश्वास होता जा रहा है कि प्रेत आत्माएं भी इसी संसार मे रहती हैं I विजय, अब अंत मे तुमसे यही प्रार्थना करूंगा कि दोस्त अगर तुम्हें दोस्ती का जरा भी खयाल है तो हमारी मदद कै लिए तुरंत श्मशानगढ़ के रवाना हो जाओ । अखबारों मे तुम्हारे कास्नामै पढकर जाने मैरे दिल को क्यों यह विश्वास हो गया कि केवल तुम ही हमारी स्टेट को इन परेशानियों से मुक्त करा सकते हो ।

आशा है दोस्ती की खातिर तुम खतरा मोल लोगे । बैसे तुम्हें यहां पूरा पारिश्रमिक दिया जाएगा

तुम्हारी प्रतीक्षा मे

तुम्हारा ही दोस्त

“लो चेले मियां, कर लो अंग्रेजी में बात ।" रहमान के चुप होते ही विजय ने कहा ।

"केस तो दिलचस्प हो सकता है, गुरु I”

"तो क्या श्मशानगढ़ जाने का इरादा है चेले मियां?"

"अगर गुरूदेव का है. . .तो . . ।"

"अबे बेटा, गुरुदेव की खोपडी का तो दीवाला ही निकल गया ।”

" क्यों? "

“अबे ये साला मूत-प्रेतों का चक्कर अपनी समझ से बाहर होता है । हम तो प्यारे जासूस महोदय हैं, अत: भूत-प्रेतों पर विश्वास करने जैसी महान मूर्खता हम नहीँ कर सकते ।"

“गुरू ।"

"बको I”

"भूत-प्रेतों पर तुम्हें विश्वास करना ही होगा I"

"वो किस खुशी में साले चेले मियां?”

"गुरुदेव, आप तो जानते ही हैं कि मैं बंगाली हूं और आप यह भी जानते होंगे कि बंगाल का काला जादू प्रसिद्ध हे । अब हम बंगाली लोग जादू पर विश्वास करते हैं तो 'भूत-प्रेतों के विषय में भी काफी जानकारियां रखते हैं । यहां तक कि मैं स्वयं किसी तांत्रिक से कम नहीं हूं । खतरनाक-से-खतरनाक आत्मा को वशीभूत कर सकता हूं और जो चाहूं करवा सकता हू । आपके दोस्त राजीव के पत्र में जो लिखा हे यह मुझे किसी हद तक सत्य लग रहा है l"

रहमान शायद अभी आगे भी कोई भाषण देता लेकिन बिजय बीच में ही हाथ उठाकर बोला…

"मिस्टर मेहमान ।"

"यस गुरू ।”

"चुप होने का क्या लोगे?”

"कुछ भी नहीं!"

“तो बोलती पर ढक्कन लगा लो ।"

"लगा लिया ।"

"बात ये है मियां मेहमान, कि साले तुम बंगाली हो, कहीं काले जादू का चमत्कार दिखाकर हमारी खोपडी का दिवाला न निकाल दो । तुम बंगालियों की खीपडियॉ का दिवाला तो निश्चित रूप से पहले ही निकल चुका है जो इस बीसवीं सदी में भूतों पर विश्वास करते हो । अबे मियां, ये हमारे उन बोगस दिमागों की उपज है जिन्हें कहानियां लिखने का शौक था और जिनका दिमाग सठिया गया था । जब उन महापुरुषों क्रो वास्तविक जीवन में कोई 'प्लांट' नजर नहीं आया तो सोचने लगे कि मरने के बाद इंसानों का क्या होता होगा और बस फिर कपोल कल्पित कहानियां गढने में उन्हें देर न लगी तथा आज तक तुम जैसे नौजवानों क्रो मूर्ख बना रहे हैं ।"

"नहीं गुरु, मैंने स्वयं काले जादू द्धारा आत्माओं से बात की है I”

"सब बकवास I”

"गुरु मैँ तुम्हारी भी बात करवा सकता हू I”

"हा तुम साले ठहरे बंगाल के काले जादूगर, हमारा उल्लू खींचने में अधिक समय कहां लगाओगे?"

"ये बात नहीं है गुरु ।" अच्छा एक बात बताओ?"

"पूछो I"

"श्मशानगढ जाओगे?"

"अगर आप जाएंगे ।"

"हमेँ तो प्यारे जाना ही पडेगा, देखते हैं क्या राग-माला है? "

"बस तो गुरु, मैं भी ।"

"देखो मियां, चेले दी ग्रेट ।। अगर तुमने फिर काले…वाले जादू की बात की तो उठाकर बंगाल में फेंक दूगा I”

“कुछ भी हो, मैं अपने ढंग से चलूंगा!”

 


"चेले मियां, अगर जासूस होकर भूतों तथा जादू पर बिश्वास करोगे तो बन लिए जासूस I”

“मेरा बिश्वास जादू के प्रति अटूट है ।"

"एक बात का जवाब दोगे?”

“पूछो ?"

"जब पाकिस्तानियों ने तुम लोगों पर इतनी बर्बरताएं कीं, अत्याचार किए, उस समय तुम्हारा काला जादू कहां चला गया था-अपने काले जादू से ही पाक की सेना को उड़ा क्यों नहीं दिया था?"

"वह बात और थी, गुरू ।"

"तुम काले जादू का नाम लेकर अपनी कमजोरी क्रो दबाना चाहते हो I”

“बात यह नहीं, गुरु ।”

"अब तुम अपनी बोलती पर ढक्कन लगा लो ।" विजय ने कहा तथा यह कहकर कि वह कुछ देर में वापस आ रहा है, कमरे से बाहर निकल गया । रहमान अपने ढंग से इस कैस

के पहलुओं पर विचार कर रहा था ।

गैराज से कार निकालकर विजय सीधा गुप्त भवन तथा ब्लेक-ब्वाॅय के सामने कुर्सी पर बैठता हुआ बोला ।।

"सुनाओ प्यारे काले लडके ।"

"'सर, अभी रहमान क्रो भेजा तो नहीं?"

“नहीं-क्यों? ”

“सर, "बंगला सीकेट कौर' से संदेश भेजा गया है कि रहमान को भेज दिया जाए I”

"कह देना…अभी कुछ दिन और रहमान तुम्हारा मेहमान रहेगा ।"

“क्यों सर?”

"इसलिए कि हम श्मशानगढ़ जा रहे हैं I”

"श्मशानगढ़ ! "

"यस प्यारे!"

"लेकिन क्यो, सर?”

"सुना है आजकल वहां प्रेतात्माओं का बड़ा आतंक है I"

"उससे हमें क्या मतलब, सर?”

"कोई खास नहीं ।"

"तो फिर आप वहां क्यों जाना चाहते हैं?”

"सैर-सपाटा करने ।"

"लेकिन सर, क्या सैर-सपाटे को आपको श्मशानगढ ही नजर आया?”

"अपनी…अपनी पसंद है प्यारे काले लड़के I"

"नहीँ सर, मैं नहीं मान सकता, अवश्य वहां आप किसी विशेष काम से जा रहे हैं?"

"मियां चीफ़ दी ग्रेट !!"

"यस सर! ”

"आजकल तुम्हारी अकल के घोड़े हमारी बगल से होकर सरपट दोड़ रहे हैं ।”

"मैं मतलब नहीँ समझा, सर ।"

"मेरा मतलब हे, आजकल काफी होशियार होते जा रहे हो I"

"सर, आप ही की संगत का प्रभाव है सर ।"

"खैर 'प्रभाव' की साले की क्या मजाल जो न हो. . .वेसे असली माजरा यह है कि वहां से हमारे एक भूतपूर्व परम मित्र का पत्र आया है तथा उन मित्र महोदय ने हमसे प्रार्थना की है कि हम शीघातिशीघ्र श्मशानगढ़ में अपना मनहूस थोबड़ा ले जाएं तथा उन साली प्रेत आत्माओं का तीया-पांचा कर दे I"

"सर, क्या आप वास्तव में श्मशानगढ़ जाएंगे?"

"विचार तो कुछ ऐसा ही है चीफ़ मियां ।" विजय ने कहा तथा फिर सम्पूर्ण घटना विवरण सहित बता दी ।

सारी बातें सुनकर ब्लैक-ब्वाॅय बोला-“सर हो सकता है वहां वास्तव में प्रेत आत्माओं का चक्कर हो?"

"मियां चीफ़ दी बोगस, क्या तुम्हारा दिमाग मिट्टी के तेल में घुल गया है. . .अच्छे-खासे पढे-लिखे होकर प्रेत आत्माओं पर बिश्वास रखते हुए क्या तुम्हें जरा भी गैरत नहीं आई?"

“सर, आपको तो मालूम ही है कि आजकल के आधुनिक वैज्ञानिक भी प्रेत आत्माओं में कुछ सत्यता महसूस करने लगे हैं । वे अपने नए परीक्षणों में इस बात पर जोर दे रहे है कि मरने के बाद आखिर आत्मा का होता क्या है?. वह कहां जाती है. . . ये बात तो ठीक है कि अभी तक वैज्ञानिकों ने स्पष्ट रूप से यह स्वीकार नहीं किया है कि भूत-प्रेत कुछ होते भी हैं…लेकिन साथ ही यह बात भी है कि वे स्वीकार करते हैं कि वे आत्माएं जो अपने जीवन से तृप्त और संतुष्ट नहीं हो पाती वे अपने कार्य क्रो पूरा करने के लिए ब्रहांड मे भटकती रहती हैं ।"

"भाषण तो तुम किसी हद तक ठीक ही दे रहे हो प्यारे काले लडके ।"

"इसलिए सर, हो सकता है वहां कोई ऐसा ही चक्कर हो I”

“खैर प्यारे ये साली प्रेत आत्मा वाली बात हलक से नीचे उतरती तो है नहीं, लेकिन अगर ऐसा हुआ भी तो कोई चिंता नहीं है…हमारे साथ बंगाल के काले जादूगर "मेनड्रेक्र' रहमान की सूरत में जा रहे हैं-आत्माओँ का तीया-पांचा वह अपने तांत्रिक करिश्मे से कर देगा I”

"सर एक राय देना चाहता हूं I”

"दे डालो ।"

"क्यों ना आप अशरफ क्रो भी अपने साथ ले जाएं?"

“उनकी आवश्यकता नहीं है . . . । वहां कोई मैं बारात लेकर जाऊंगा? ”

"सर, मैं सिर्फ सुरक्षा के नाते कह रहा था ।”

"हमारा चेला और हम तो साली अपनी प्रेत आत्माओं का मी तीया-पांचा कर देगे ।"

"फिर भी सर, रहमान अभी कच्चा खिलाडी है I”

“मियां चीफ़ दी ग्रेट, वह साला बीस बरस का छोकरा किसी भी बात में कम नही हे । मानता हूं वह इस क्षेत्र का नया खिलाडी है लेकिन शायद तुम यह नहीं जानते कि चेला किसका है?. .जैसे ग्रेट जासूस का वह चेला हे वैसा ही ग्रेट वह स्वयं भी है । आज़ वह जासूसी के क्षेत्र में कच्चा अवश्य है लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि अगर वह मेरे साथ काम करता रहा तो एक दिन वह बड़े-बड़े जासूसों के नाक-कान अपनी जेब में रखकर घूमा करेगा ।"

"सर, अब आप अपने शागिर्द की जरूरत से ज्यादा तारीफ़ कर रहे हैं ।” ब्लैक…ब्बाय विजय पर व्यंग कसने वाले स्वर मेँ बोला I

"प्यारे काले लडके, हमारा चेला वक्त पर अपना परिचय स्वयं दे देगा ।"

"खैर सर, छोडो इन बातों को, मतलब यह कि आप सिर्फ रहमान के साथ श्मशानगढ़ जा रहे हैं?”

"निःसंदेह I”

“जैसी आपकी इच्छा I"

"और देखो मैं यह कहने आया था कि अगर बीच मेँ किसी कारणवश मुझसे सम्बंध स्थापित करने की आवश्यकता पड़े तो फ्लाई टू करना I"

"ओके सर ।" ब्लैक-ब्वाॅय ने कहा ।

"अच्छा प्यारे, चलते हैँ. . .प्रेत आत्माओं के बीच बैठकर हम कुछ झकझकियों का निर्माण करेगे और वापस आकर उन्हें तुम्हारी सेवा मे हाजिर करेंगे I" विजय ने कहा तथा हाथ मिलाकर गुप्त भवन से बाहर आ गया ।

ब्लैक व्बाॅय के होंठो पर एक अजीबोगरीब मुस्कान I

इधर विजय गुप्त भवन से बाहर आया तथा अपनी कार की ओर बढा । अभी वह कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा ही था कि वह चौक पडा। उसकी निगाह स्टेयरिंग में फसे एक कागज पर स्थिर हो गई थी । पहले तो वह कुछ सोचता रहा…फिर हाथ बढाकर कागज निकाल लिया तथा कार में बैठे-बैठे उसने वहीँ खोल लिया तथा पढा । लिखा था… "प्यारे विजय मैं जानता हू कि तुम श्मशानगढ़ कै लिए रवाना हो रहे हो, लेकिन साबधान याद रखना यहां भयंकर 'प्रेत्त आत्माए' पनप रही हैं ! ध्यान रखना इस बारु तुम किती मानव अपराधी सै नहीं बल्कि भूतों से टकराने जा रहे हो । उन भूतों-प्रेतों सै जो सदियों से भटक रहे हैं । मैं श्मशागढ़ के विषय में काफी जानता हू । बैसे मैं यह थी जानता हू कि तुम मैरे इस पत्र से रुकने वाले नहीं ही लैकिन एक बार फिर सतर्क कर रहा हू कि वहां तुम्हें आत्माओं सै भी टकराना होगा । न जाने क्यों मैरा दिल कह रहा हैं कि श्मशानगढ़ कै राजा कै खानदान कै एक-एक व्यक्ति का कत्ल कर दिया जाएगा । याद रखना; जंगल में बनी एक दैत्याकार हवेली बहुत ही मनहूस है और वह तुम्हारी कब्र भी साबित हो सकती है ।

खैर मैं अब अधिक क्या लिखु तुम स्वय ही उन रहस्यों

में उलझने जा रहे हो जो सदियाँ से रहस्य बनै हुए हैं । बस यह ध्यान रखना कि इस कैस में तुम मौत की गहरी नींद भी सो सकते हो ।

तुम्हारा शुभचिंतक I”

 
सम्पूर्ण कागज पढकर विजय ने कुछ बिचित्र ढंग से मुंह बनाया था फिर गोल होंठ करके सीटी बजाने लगा और इस कागज के विषय मे सोचने लगा ।

उसने कार स्टार्ट करके आगे बढा दी तथा फिर विचारों के सागर मेँ गोते लगाने लगा ।

इस पत्र ने विजय क्रो वास्तव में उलझा दिया था । विजय को अब जंचने लगा था कि श्मशानगढ़ में कोई भयंकर साजिश रची जा रही है ।

वैसे वह यह भी समझ गया था कि केस वास्तव में खतरनाक भी हो सकता है ।

यह तो अनुमान वह लगा न सका कि यह पत्र किसका है लेकिन यह अवश्य वह जान गया कि उसका श्मशानगढ़ के प्रस्थान की बात गुप्त नहीं है ।

वह निश्चय कर चुका था कि इस केस को पूरी गम्भीरता के साथ हैंडल करेगा । यह केस साधारण आत्माओं का केस नजर नहीं आ रहा था ।

उसकी श्मशानगढ़ की यात्रा के विचार में परिवर्तन का तो खैर कोई प्रश्न ही नहीं था, लेकिन इस पत्र ने केस को उलझा अवश्य दिया था ।

वह जान गया कि श्मशानगढ़ में रहस्य की परते उसकी प्रतीक्षा कर रही हैं ।

@@@@@@@@@@@@@@@@

पटरियों पर रेंगती हुई ट्रेन स्थिर हो गई ।

यह श्मशानगढ़ का स्टेशन था ।

यहां गाडी सिर्फ दो मिनट के लिए रुकती थी ।

विजय और रहमान गाडी रुकते ही तुरंत प्लेटफार्म पर उतर आए ।

रहमान के हाथ में एक सूटकेस था ।

इस समय रात का एक बज रहा था ।

स्टेशन पर गजब की निस्तब्धता छाई हुई थी I

अभी वे दोनों अपने स्थान पर खड़े थे कि वे चौंके, सहसा गाडी ने एक तीव्र सीटी दी तथा फिर घीरे-धीरे रेंगती चली गई ।

उनके अतिरिक्त वहां कोई न उतरा था ।

"प्यारे मेहमान I” सहसा बिजय बोला ।

"हूं।" रहमान जान गया था कि बिजय उसे 'मेहमान' कहने से बाज नहीँ आएगा ।

""यार, क्या माजरा है?"

"क्यों गुरु?”

"बात ये है कि अब यहां से जाएं कैसे? न कुछ पता. ..न सवारी? "

"बात तो सोचने वाली है गुरु l”

“तो फिर जल्दी से हो जाओ शुरू I"

"बोलो क्या करूं ?"

"प्लेटफार्म से बाहर का नजार देखते हैं I”

" चलो !"

रहमान ने कहा तथा फिर वे दोनों बाहर की तरफ बढ गए I बाहर भी उसी प्रकार का सन्नाटा छाया हुआ था I

सड़क दूर दूर तक वीरान पड्री हुई थी I

यह रात चांदनी थी अत: सड़क पर भी चांदनी फैली हुई थी । कुछ देर तक वे सन्नाटे में डूबी सड़क्र क्रो देखते रहे I

"चलो प्यारे I” विजय ने कहा तथा सडक की निस्तब्धता को भंग करते हुए वे आगे बढ़ गए । सड़क पर उनके जूतों की टक-टक की आवाज गूंजने लगी ।

"प्यारे चेले!"

"यस गुरु ।" बातें चलते-चलते ही हो रही थी ।

"झकझक्री सुनाने का मौसम बड़ा प्यारा है I"

"गुरू मैं बोर नहीं होना चाहता I"

"बस तो फिर एक झकझकी सुनो, सारी बोरियत दूर हो जाएगी ।"

"गुरु आप. . . I" और रहमान कुछ कहता-कहता स्क गया । विजय भी ध्यान से कुछ सुनने का प्रयास कर रहा था ।
 
"चेले मियां, कुछ सुन रहे हो?”

"गुरु, लगता है कोई आत्मा खिलखिला रही है ।"

"अबे साले रहमान । "

"यस गुरु ।"

"तुम्हें हर आवाज आत्मा की ही नजर आती है ।"

"गुरु ध्यान से सुनो ।" रहमान ने कहा था फिर स्वय भी ध्यान से सुनने लगा ।

वास्तव में घीरे-घीरे रात की यह नीरवता-यह

सन्नाटा-यह निस्तब्धता भंग होती जा रही थी ।

ऐसा लगता था जैसे कोई खिलखिला रहा है, जोर'-जोर से खिलखिला रहा है । वास्तव में वह खिलखिलाहट बडी ही भयानक थ्री । लगता था कोई मुर्दा झुंझला रहा हैं । यह खिलखिलाहट सीधी दिल में उतरती चली जाती थी ।

उन दोनों के रोंगटे खडे हो गए ।

खिलखिलाहट क्षण प्रतिक्षण तीव्र होती जा रही थी ।

दोनों ने एक-दूसरे की तरफ़ देखा ।

तभी बिजय फुर्ती के साथ एक तरफ को दौड पड़ा तथा साथ ही बोला-"मेरे पीछे आओ चेले मियां I"

खिलखिलाहट क्षण-प्रतिक्षण बढती जा रही थी । इस खिलखिलाहट के बीच मानो मनहूस कुत्ता रोने लगा । तभी जैसे कोई रो रहा हो, सिसक…सिसककर रो रहा हो। भयानक-भयानक आवाजें आने लगीं ।

भागते-भागते वे एक मैदान में पहुच गए I

मैदान मेँ भी चांदनी थी ।

और जो कुछ उन्होंने इस चांदनी मेँ देखा उसे देखकर आश्चर्यचकित रह गए! दूर चांद की चांदनी के बीच एक लड़की नजर आईं । उसके गदराए जिस्म पर दूध जैसी सफेद साडी थी जिसका आंचल हवा मेँ लहरा रहा था ।

वह सीधी चली जा रही थी, उसकी पीठ उन्ही लोगों की ओर थी ।

वातावरण में वही खिलखिलाहट गूंज रही थी ।

"प्यारे चेले ।" विजय धीरे-से फुसफुसाया ।

"यस गुरु I”

"वह कोन है I”

"शायद कोई आत्मा ।"

"बकवास मत करो ।" विजय बात-बात पर रहमान की इस 'आत्मा' वाली रट पर झुंझला गया था ।

“नहीं करता, गुरू ।।"

"ध्यान रहे, उसे मालूम न हो पाए कि हम उसके पीछे हैं ।"

"लेकिन यह खिलखिलाहट तथा भयानक आवाजें?”

"इनके विषय में बाद में सोचेगे, पहले अपनी अम्मा का पीछा करो ।"

"ओके गुरु ।" अभी रहमान ने इतना ही कहा था कि वे फिर चौंक पड़े ।

एकाएक उसके कानों में ऐसी आवाजें टकराने लगीं जैसे दो आदमी आपस में भिड़ गए हों । आवाजे मैदान के एक तरफ पड़े एक विशाल पत्थर के पीछे से आ रही थीं ।

घटनाएं कुछ इस तेजी के साथ घटित हो रही थी कि कुछ सोचने-समझने का अवसर नहीं मिल रहा था । वातावरण में चारों तरफ़ अजीबोगरीब आवाजें गूंज रही थी ।

"तुम अपनी अम्मा का पीछा करो बेटे रहमान-मैं उधर देखता हू ।"

विजय के शरीर में इस समय बिजली दौड गई थी । वह तेजी के साथ रहमान को आदेश देकर अपनी सम्पूर्ण रफ्तार के साथ उस पत्थर की तरफ दोड़ा ।

आंधी-तूफान की भांति वह दौडता हुआ पत्थर पर चढ गया ।
 
जब उसने पत्थर के पीछे का दृश्य देखा तो हैरत में पड गया ।

चांद की चांदनी में दो इंसानी साए खूनी भेडिए की भाँति भिड़े हुए थे ।

उनमें से एक के जिस्म पर स्याह लिबास था तया दूसरे कै जिस्म पर दूध जैसा सफेद घुटनों तक चोगा था । सफेद चोगे वाला यह व्यक्ति आवश्यकता से कुछ अधिक ही लम्बा था तथा खडा हुआ सिर्फ हड्रिडयों का ढांचा प्रतीत होता था ।।

विजय खडा होकर उनकी हरकत नोट करने की चेष्टा कर रहा था ।

दोनों में से कोई भी कुछ नही बोल रहा था लेकिन एक-दूसरे पर खूनी भेडिए की भांति टूट रहे थे ।

बिचित्र-बिचित्र-सी किलकारियां उनके मुख से निकल रही थीं ।

स्याह लिबास वाला व्यक्ति आवश्यकता से कुछ अधिक फुर्तीला जान पडता था । वह चोगे वाले व्यक्ति पर भारी पड़ रहा था ।

पहले वह अच्छी तरह स्थिति का अध्यन करना चाहता था तभी नाटक में पाठ ले सकता था । अभी तो वह स्वयं यह समझने में असमर्थ था कि यह सब क्या हो रहा है? आखिर वह लडकी क्या बला है? ये यहां क्यों लड रहे हैं? अन्य अनेकों प्रश्न उसके दिमाग में कुलबुला रहे थे । अत: वह शांति के साथ उन दोनों को देखता रहा ।

कुछ समय की खतरनाक भिडंत के पश्चात-स्याह लिबास वाले ने सफेद चोगे वाले को सिर से ऊपर उठाकर पटक दिया ।

चोगे वाले के मुख से डरावनी-सी चीख निकली ।

स्याह व्यक्ति ने फुर्ती दिखाई ।

उसने उसे ऊपर उठाकर पांच…छ: बार पटका । इन पटकियों के अंतर्गत सफेद चोगे वाला लहूलुहान हो गया तथा मृत अथवा बेहोश स्थिति में निश्चल पड़ गया ।

स्याह चोगे वाला तेजी फे साथ झपटा तथा अगले ही पल वह फुर्ती के साथ सफेद चोगे वाले की जेबें टटोल रहा था l

दूसरे ही पल स्याह चोगे वाले ने कोई वस्तु सफेद चोगे वाले की जेब से निकालकर अपनी जेब के हवाले की तथा उसके बाद वह एक पल भी वहां नहीं ठहरा, तेजी के साथ एक तरफ़ को भागा ।

बिजय की समझ में कुछ नहीं आया, अभी तक तो वह केवल पहेलियों मेँ ही उलझा हुआ था । वह यह भी न देख सका कि वह क्या वस्तु थी जो स्याह लिबास वाले व्यक्ति ने सफेद चोगे वाले की जेब से निकालकर अपनी जेब के हवाले की थी?

फिर भी फुर्ती के साथ इसी स्याह व्यक्ति के पीछे झपटा ।

स्याह लिबास वाले व्यक्ति की रफ्तार काफी तीव्र थी और उसी रफ्तार से बिजय भी उसका पीछा कर रहा था । वातावरण में शोर ज्यों-का-त्यों था ।

अभी विजय की समझ में कोई विशेष बात तो आई नहीं थी लेकिन इतना वह समझ गया था कि स्याह व्यक्ति ने जो वस्तु सफेद चोगे वाले की जेब से निकाली हे, वह निश्चित ही कोई महत्त्वपूर्ण वस्तु रही होगी ।

लेकिन फिर भी विजय बिना कुछ सोचे-समझे भिड़ने की मूर्खता करना नहीँ चाहता था । अत: शांति और सतर्कता के साथ उसका पीछा करता जा रहा था ।

चांदनी रात में यह पीछा बडा ही रहस्यमय प्रतीत हो रहा था ।

लगभग दस मिनट के पश्चात ।

काला साया एक पथरीली-सी गुफा में प्रविष्ट हो गया ।

गुफा के द्वार पर बिजय एक क्षण के लिए ठिठका ।

गहन अंधकार का साम्राज्य था ।

लेकिन अंधकार में काले साए के चलने की आवाज़ गूंज रही थी जो निरंत्तर दूर होती जा रही थी ।

विजय एक क्षण के लिए घूम गया, किसी का शक्तिशाली घूंसा उसकी नाक पर पडा था ।

लाल-पीले तारे उसकी आंखों के सामने नाच गए और वह लड़खड़ाकर पथरीले फर्श पर गिरा ।

"सही बात तो ये है कि तुम पर पीछा करने का तरीका तक नहीं आता ।” सहसा बिजय के कानों से खतरनाक लहजा टकराया ।

विजय सम्भलकर खड़ा हो गया ।

वे इस समय गुफा के द्वार पर ही थे अत: चांद की चांदनी में वे एक-दूसरे को साए के रूप में देख सकत्ते थे ।

विजय ने सामने देखा I

वही काले लिबास वाला व्यक्ति अपने दोनों कूल्हो पर हाथ रखे उसे घूर रहा था । मद्धिम प्रकाश के कारण विजय उसके होंठों पर नृत्य करने वाली कुटिल मुस्कान न देख सका ।
 
दोनों प्रतिद्वंद्वी आमने-सामने खड़े एक…दूसरे को घूर रहे थे ।

"कहो बेटे कालिए, क्या इरादे हैं?" विजय सम्भला कर सतर्क होकर बोला ।

"मुझें लगता है तुम्हारा ये अभियान 'मौत' का अभियान होगा I"

"ये तो बाद की बात है प्यारे । पहले अपने इरादे तो बताओ I”

“मेरे इरादे काफी नेक हैं I"

"नेक से मतलब?"

"मतलब ये कि तुम्हें इस संसार से विदाई परमिट दिलाने का अभी मेरा कोई इरादा नही है I"

"लेकिन प्यारे मैँ सोचता हू, फिलहाल उस परमिट को तुम ही ले लौ ।" बिजय ने कहा तथा फुर्ती के साथ उस पर झपटा l

लेकिन स्याह साया पूर्णतया सतर्क जान पड़ता था । उसने भी गजब की फुर्ती का परिचय दिया और अपने स्थान से हट गया ।

झोंक में विजय पथरीले फ़र्श पर गिरां ।

लेकिन तुरंत ही सम्भल भी गया ।

अगले ही क्षण वे दोनों फिर आमने-सामने खड़े थे ।

सहसा स्याह व्यक्ति ने गजब की फुर्ती दिखाई I

एक बार तो स्वयं विजय कांप गया ।

वह जान गया कि स्याह व्यक्ति कोई खतरनाक लडाका ।

अगर विजय एक पल को भी चूक जाता तो निश्चित रूप से उसकी एक-आघ हड्डी टूट जाती ।

गजब की फुर्ती के साथ इस व्यक्ति ने 'जूडो' मारा था ।

"जूडो'…फ्री-स्टाइल का एक ऐसा खतरनाक दांव जिसकी चपेट में आया व्यक्ति किसी भी तरह सुरक्षित नहीं रह सकता ।

लेकिन स्याह व्यक्ति का भयंकर इरादा वह पहले ही भांप गया, और उससे अधिक फुर्ती का प्रदर्शन करता हुआ वह अपने मुख्य स्थान से हट गया ।

झोंक में स्याह व्यक्ति लड़खड़ाया I

लढ़खड़ाते व्यक्ति के पीछे से विजय ने एक किक जमा दी, वह मुंह के बल फर्श पर गिरा ।

तभी विजय झपटा और उस पर चढ़ बैठा तथा बोला…“हम भी खलीफा हैं, बेटे कालिए l”

लेकिन विजय ठीक से अपना वाक्य पूरा न कर पाया था कि स्याह व्यक्ति ने उसे जांघों पर रखकर उछाल दिया । वह हवा मेँ लहराया तथा धड़ाम से फर्श पर गिरा ।

वह फिर फुर्ती के साथ खडा हो गया ।

उसने स्याह व्यक्ति की ओर देखा l

सहसा स्याह व्यक्ति ने फुर्ती के साथ गुफा के गहन अंधकार मे जम्प लगा दी और तभी गुफा के अंधेरे के बीच से आवाज आई-"अभी मैं जरा जल्दी में हूं बेटे, फिर मुलाकात होगी ।"

"अबे ओं...कालू...भाई..अबे...यार...सूनो...तो !" बिजय ने भी उसके पीछे झपटने की कोशिश की लेकिन बिजय अंधेरी गुफा के पथरीले फ़र्श पर गिरा ।

सहसा गुफा मेँ निस्तब्धता छा गई ।

न कहीं कोई ध्वनि, न कोई आहट थी ।

कुछ देर तक विजय भी आराम से फर्श पर पड़ा रहा तथा फिर बड़बड़ाया-“डरकर भाग गया साला ठाकुर के पूत से ।”

फिर वह वहां से उठा तथा टार्च के सहारे उसने स्याह व्यक्ति को खोजने की चेष्टा भी की लेकिन असफलता का भंडार लेकर रह गया ।

यह सिर्फ एक साधारण गुफा थी ।

तभी उसे रहमान का ध्यान आया । वह उस सफेदपोश लडकी के पीछे गया हुआ था ।

यह विचार दिमाग मेँ आते ही वह वापस चल दिया ।

उसकी चाल पहले से तीव्र थी ।

और तब…
 
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