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“ऐसी बात तुम्हें नहीं सोचनी चाहिए, वैसे तो हत्यारा कोई भी हो सकता है, लेकिन ऐसा भी हो सकता है कि हत्यारे ने अपने कपड़े कमरे मेँ छिपा दिए हों?” बिजय गोल…मोल शब्दों में कहता गया ।
“आप तलाशी ले सकते हैं l” सूभ्रांत ने गम्भीरता से कहा l
"वैसे क्या तुमने कभी कोई लडकी सफेद लिबास में लिपटी देखी है?"
“वह तो अक्सर रात को श्मशानगढ़ की सड़कौं पर देखी जाती है । कहते हैं कि वह कोई भटकती हुई आत्मा है I"
“ क्या तुमने कभी उसे दिन के प्रकाश में नहीं देखा? "
"उसे आज़ तक जिसने भी देखा है पीछे से ही देखा है । रातको भी उसकी सूरत देखने में कोई सफ़ल न हो सका है क्योंकि कोई कोशिश ही नहीं करता ।"
"इसका मतलब तुम उसे नहीं पहचानते? "
"नहीं I"
“हो सकता है कि वह इसी इमारत में रहती हो ।"
"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । जब मैं कह चुका हू कि वह आत्मा है ।"
"तुम भी जा सकते हो ।"
वह चला गया ।
उसके बाद रहमान ने अमीता को मेजा l
अमीता की आंखों में अभी तक आंसू थे । शायद अपनी मां और भाई की मौत के दुख के आंसू। वह चुपचाप बिजय के सामने आकर बैठ गई ।
"रोइए मत अमीता जी, साहस रखिए! मैं आपके माई के हत्यारे को पकडकर आपके सामने लाने की पूर्ण चेष्टा करूंगा ।" विजय ध्यान से उसका चेहरा देखता हुआ बोला।
"मिस्टर विजय, मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा है कि आखिर यह सब क्या हो रहा है? पहले आत्माओं द्वारा हमेँ धमकियां दी गई कि इस स्टेट के राजा के खानदान के एक…एक व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया जाएगा । फिर राजीव भैया को किसी गोल्डन नकाबपोश ने कत्ल कर दिया l आप कहते हैं कि वह इसी इमारत में मौजूद होना चाहिए और सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि भैया की लाश खडी हो गई और अपनी ही मां को अपना हत्यारा कहकर उनका गला दबाकर हत्या कर दी । यह सब क्या है विजय बाबू? क्या यह सच है कि एक लाश खड्री होकर इस प्रकार कह सकती है? क्या मां राजीव भैया का खून करवा सकती हैं?" बोलती-बोलती अमीता फफक पडी ।
"गुत्थियां तो बहुत हैं अमीता जी, लेकिन क्या आपको किसी पर शक है?"
"अब शक की गुंजाइश कहां रह गई है मिस्टर बिजय, क्या कभी किसी को संदेह हो सकता था कि मां अपने बेटे का खून कर सकती है? मेरा ख्याल है भैया के अन्य खूनी भी वे ही होंगे जिन पर संदेह किया जा सकता । मैं आपसे प्रार्थना करती हू कि आप भैया के हत्यारे को खोज निकालें । हम आपको मुंह-मांगी फीस देगे. . .सच कहती हू अगर आप भैया के खूनी को मेरे सामने खडा कर देगे तो भैया की लाश से पहले मैं उस कमीने का खून पी जाऊंगी. . .चाहे वह खूनी मैं स्वयं ही क्यों न होऊं ।”
अमीता की भावनाओं से परिचित होकर विजय मुस्कराया तथा बोला…"निर्मला कैसी लड़की है?"
“क्या मतलब? "
"मेरा मतलब क्या वह राजीव का खून नहीं कर सकती ?”
"वह चुडैल कुछ भी कर सकती है ।"
विजय ने महसूस किया कि अमीता भी निर्मला से काफी इंष्यों करती है…वह आगे बोला'…"
"क्यों?"
"वह चुड़ेल मेरे भैया से नहीं, बल्कि हमारी दौलत से प्यार करती थी । वह गंदी झोंपडी में रहने वाली लडकी क्या जाने कि मुहब्बत क्या होती है I वह चुडैल तो भैया के ज़रिए हवेली की दौलत हड़पना चाहती होगी ।"
“मिस अनीता?" विजय मुस्कराता हुआ बोला…“किसी से इतनी ईर्ष्या करना ठीक नही होता । आप बिना किसी विशेष प्रमाण के निर्मला को जबर्दस्ती कातिल सिद्ध करने की चेष्टा कर रही हैं । इससे कोई जासूस यह अनुमान लगा सकता है कि आप भी इस केस में कहीं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही--है ।
और स्वयं को बचाने के लिए किसी दूसरे पर बिना किसी प्रमाण के आरोप थोप रहे हैं l”
अमीता एकदम घबरा-सी गई तथा बोली…“आप तो मेरी बातों का गलत अर्थ लगा रहे हैं । क्या यही प्रमाण कम है कि वह मेरे भैया से प्यार करती थी ।"
"मिस अनीता, प्यार भी दो प्रकार का होता है । एक तो होता है किसी से सच्चा प्यार, दिली प्रेम और दूसरा होता है झूठा प्यार यानी किसी के पैसे इत्यादि से प्यार ।।”
“वह भैया की दौलत से प्यार करती थी I"
"तुम्हें कैसे मालूम?"
"वह हर समय दौलत की बात करती रहती थी ।"
“मैं समझता हू कि अगर निर्मला खून कर सकती है तो वह न राजीव की दौलत से प्यार करती होगी और न ही राजीव से, क्योंकि अगर वह राजीव से वास्तव में सच्चा प्यार करती थी तो यह दावे से कहा जा सकता हूं कि कोई भी सच्ची प्रेमिका अपने प्रेमी का खून नही कर सकती और अगर वह राजीव की दौलत से प्यार करती थी तो किसी भी कीमत पर राजीव का खून नहीं कर सकती क्योंकि इस स्थिति मेँ तो उसके धन प्राप्ति फे स्वप्न अधूरे ही रह जाएंगे ।"
"यह आपके सोचने का तरीका हे ।" अमीता की बुद्धि में बिजय की बात कुछ बैठ गई थी ।
"वैसे अमीता जो, एक बात बताइए?"
"पूछिए I"
"निर्मला के परिवार से तुम्हारे परिवार की कोई पुरानी शत्रुता तो नहीं है?"
"वे हमारे कदमों में रहते है, हमसे दुश्मनी करने का साहस उनमें कहां?”
“फिर तो निर्मला का खूनी होना अत्यधिक कठिन है I"
"जासूस आप हैं, आप ही पता लगाएं ।"
“खैर, अब तुम जा सकती हो ।"
वह चली गई तो फिर एक…एक करके सभी नौकरों को भेजा गया-उन सभी के बयान लगभग एक जैसे ही थे । वे अपने मालिक राजीव को चाहते थे । किसके मन में मैल था…विजय उनके चेहरे से भांपने में असफ़ल रहा था ।
सब के बाद में शांति के बयान हुए ।
यूं तो शांति बर्तन माँजने वाली थी लेकिन थी गजब की सुंदर । उसकी बातों से विजय ने भी भांपा कि कहारिन होते हुए भी वह राजीव को 'मुहब्बत' की नजरों से देखती थी l
लेकिन फिर भी इन सबके बयानों के पश्चात भी विजय किसी ठोस निर्णय पर न पहुच सका था ।
अभी वह उठना ही चाहता था कि वह चौंक पडा । बाहर से कुछ ऐसी आवाजें आ रही थी कि जैसे कोई जबर्दस्ती इमारत मेँ घुसना चाह रहा हो तथा उसे बाहर निकालने की चेष्टा की जा रही हो ।
वह शीघ्रता से बाहर आया तो उसने देखा कि एक चालीस वर्ष की आयु का व्यक्ति और एक सुंदर-सी लडकी आना चाहते थे ।
लडकी को वह पहचान चुका था क्योंकि उसका फोटो वह राजीव के कमरे से प्राप्त कर चुका था ।
वह निर्मला थी I निर्मला की आंखों में आंसू थे, वह सिसकारियां ले-लेकर रो रही थी और नौकर उन्हें धक्के दे रहे थे ।
"ठहरो!" विजय बोला I
सबने उसकी ओर देखा तभी निर्मला चीख पडी…“तुम्ही ने मेरे राजीव का खून किया है कमीनी, मैं जासूस को बता दूंगी. . तुम्ही ने मेरे राजीव को मुझसे छीन लिया है ।"
और वह और भी कुछ चीखना चाहती थी कि विजय बोल पडा…"क्या आप निर्मला देवी हैं?”
उसने 'हां' मेँ गर्दन हिला दी ।
"रहमान, इन्हें अंदर भेज दो I”
“नही, मिस्टर विजय, इन मनहूसों के कदम अंदर नहीं पड़ेगे I" चंद्रभान आगे बढ़ते हुए बोले ।
"कातिल को गिरफ्तारी के लिए इनके बयान भी आवश्यक हैं । इन्हें आने दो I”
और चंद्रभान जी न जाने क्या सोचकर चुप रह गए ।
कुछ समय पश्चात बिजय निर्मला से पूछ रहा था…"कहो, तुम्हें क्या कहना है?"
"क्या आप जासूस हैं?” वह बोली ।
""हां…लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि हवेली मेँ कोई जासूस आया हुआ है?”
"यह खबर तो सारे श्मशानगढ़ में फैली हुई है ।"
“अच्छा.... .खैर अब तुम बताओ क्या कहना चाहती हो?"
"जासूस जी, मेरे राजीव को इन्होंने ही मारा है. . .ये सब मेरे राजीव से मेरे कारण जलते थे । जब मेरा राजीव जीवित था तो मुझे यहां आने से रोकने का साहस किसी मेँ भी न था । मै सारी इमारत में अपने राजीव के साथ घूमा करती थी लेकिन आज. . . I" और फिर वह फफ्क-फ़फ्ककर रो पडी I
“लेकिन तुम्हें राजीव की मौत का इतना दुख क्यों है?" बिजय ने बडा ही अजीब-सा प्रश्न किया ।
"जासूस जी, शायद तुम्हें कोई लडकी प्यार नहीं करती I"
विजय उसकी इस मासूमियत पर मुस्कराया तथा बोला…"मेरां मतलब है तुम किसी और से भी प्यार कर सकती हो-जैसे सुभ्रात से I” विजय इस प्रकार के शब्द कहकर निर्मला के प्यार को परखना चाहता था ।
"गुंडे, लुच्चे I” निर्मला यकायक बिजय पर चढ गई…“तू मेरे देवता राजीव की बराबरी उस हरामी सुभ्रांत से करता है । मुझे वेश्या समझता है जो एक रात के बाद एक. . . ।"
निर्मला के पिता ने उसे रोक लिया वरना निर्मला अपने प्रेम पर उछलती कीचड़ देखकर तो उसे प्रसाद के रूप मेँ एक थप्पड ही रसीद करने जा रही थी ।
उसके बाद निर्मला के पिता निर्मला को ले गए ।
विजय सबके बयानों के साथ रहस्य की परतों में घुसने की वेष्टा कर रहा था ।
”प्यारे मेहमान दी ग्रेट, ये साला केस तो बडा उलझनपूर्ण निकला ।” विजय एक अकेले कमरे में बैठा कह रहा था I
" गुरू , रहस्य की परते उलझती जा रही हैं ।”
"एक बात तो बताओ…मियां पकोंडी मल?"
" पूछो, गुरु I"
“यह साली अपने राजीव की लाश कैसे उठ खडी हुई?"
"ऐसा हो जाता है गुरु ।”
"चुप बे गुरु के वेले, तुम साले फिर किसी आत्मा की बात करोगे ।” विजय ने डांटा ।
"जब बात ही ऐसी है, गुरु l”
"खैर प्यारे हम इस पर शुरू से एक सरसरी नज़र मारते हैं और फिर रहस्यों से उलझने की कोशिश करते हैं । जहां कुछ रह जाए वहां तुम याद दिलाना ।"
"ऐसा ही कीजिए, गुरु I"
“आप तलाशी ले सकते हैं l” सूभ्रांत ने गम्भीरता से कहा l
"वैसे क्या तुमने कभी कोई लडकी सफेद लिबास में लिपटी देखी है?"
“वह तो अक्सर रात को श्मशानगढ़ की सड़कौं पर देखी जाती है । कहते हैं कि वह कोई भटकती हुई आत्मा है I"
“ क्या तुमने कभी उसे दिन के प्रकाश में नहीं देखा? "
"उसे आज़ तक जिसने भी देखा है पीछे से ही देखा है । रातको भी उसकी सूरत देखने में कोई सफ़ल न हो सका है क्योंकि कोई कोशिश ही नहीं करता ।"
"इसका मतलब तुम उसे नहीं पहचानते? "
"नहीं I"
“हो सकता है कि वह इसी इमारत में रहती हो ।"
"तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है । जब मैं कह चुका हू कि वह आत्मा है ।"
"तुम भी जा सकते हो ।"
वह चला गया ।
उसके बाद रहमान ने अमीता को मेजा l
अमीता की आंखों में अभी तक आंसू थे । शायद अपनी मां और भाई की मौत के दुख के आंसू। वह चुपचाप बिजय के सामने आकर बैठ गई ।
"रोइए मत अमीता जी, साहस रखिए! मैं आपके माई के हत्यारे को पकडकर आपके सामने लाने की पूर्ण चेष्टा करूंगा ।" विजय ध्यान से उसका चेहरा देखता हुआ बोला।
"मिस्टर विजय, मेरी तो कुछ समझ में नही आ रहा है कि आखिर यह सब क्या हो रहा है? पहले आत्माओं द्वारा हमेँ धमकियां दी गई कि इस स्टेट के राजा के खानदान के एक…एक व्यक्ति को मौत के घाट उतार दिया जाएगा । फिर राजीव भैया को किसी गोल्डन नकाबपोश ने कत्ल कर दिया l आप कहते हैं कि वह इसी इमारत में मौजूद होना चाहिए और सबसे आश्चर्य की बात तो ये है कि भैया की लाश खडी हो गई और अपनी ही मां को अपना हत्यारा कहकर उनका गला दबाकर हत्या कर दी । यह सब क्या है विजय बाबू? क्या यह सच है कि एक लाश खड्री होकर इस प्रकार कह सकती है? क्या मां राजीव भैया का खून करवा सकती हैं?" बोलती-बोलती अमीता फफक पडी ।
"गुत्थियां तो बहुत हैं अमीता जी, लेकिन क्या आपको किसी पर शक है?"
"अब शक की गुंजाइश कहां रह गई है मिस्टर बिजय, क्या कभी किसी को संदेह हो सकता था कि मां अपने बेटे का खून कर सकती है? मेरा ख्याल है भैया के अन्य खूनी भी वे ही होंगे जिन पर संदेह किया जा सकता । मैं आपसे प्रार्थना करती हू कि आप भैया के हत्यारे को खोज निकालें । हम आपको मुंह-मांगी फीस देगे. . .सच कहती हू अगर आप भैया के खूनी को मेरे सामने खडा कर देगे तो भैया की लाश से पहले मैं उस कमीने का खून पी जाऊंगी. . .चाहे वह खूनी मैं स्वयं ही क्यों न होऊं ।”
अमीता की भावनाओं से परिचित होकर विजय मुस्कराया तथा बोला…"निर्मला कैसी लड़की है?"
“क्या मतलब? "
"मेरा मतलब क्या वह राजीव का खून नहीं कर सकती ?”
"वह चुडैल कुछ भी कर सकती है ।"
विजय ने महसूस किया कि अमीता भी निर्मला से काफी इंष्यों करती है…वह आगे बोला'…"
"क्यों?"
"वह चुड़ेल मेरे भैया से नहीं, बल्कि हमारी दौलत से प्यार करती थी । वह गंदी झोंपडी में रहने वाली लडकी क्या जाने कि मुहब्बत क्या होती है I वह चुडैल तो भैया के ज़रिए हवेली की दौलत हड़पना चाहती होगी ।"
“मिस अनीता?" विजय मुस्कराता हुआ बोला…“किसी से इतनी ईर्ष्या करना ठीक नही होता । आप बिना किसी विशेष प्रमाण के निर्मला को जबर्दस्ती कातिल सिद्ध करने की चेष्टा कर रही हैं । इससे कोई जासूस यह अनुमान लगा सकता है कि आप भी इस केस में कहीं महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही--है ।
और स्वयं को बचाने के लिए किसी दूसरे पर बिना किसी प्रमाण के आरोप थोप रहे हैं l”
अमीता एकदम घबरा-सी गई तथा बोली…“आप तो मेरी बातों का गलत अर्थ लगा रहे हैं । क्या यही प्रमाण कम है कि वह मेरे भैया से प्यार करती थी ।"
"मिस अनीता, प्यार भी दो प्रकार का होता है । एक तो होता है किसी से सच्चा प्यार, दिली प्रेम और दूसरा होता है झूठा प्यार यानी किसी के पैसे इत्यादि से प्यार ।।”
“वह भैया की दौलत से प्यार करती थी I"
"तुम्हें कैसे मालूम?"
"वह हर समय दौलत की बात करती रहती थी ।"
“मैं समझता हू कि अगर निर्मला खून कर सकती है तो वह न राजीव की दौलत से प्यार करती होगी और न ही राजीव से, क्योंकि अगर वह राजीव से वास्तव में सच्चा प्यार करती थी तो यह दावे से कहा जा सकता हूं कि कोई भी सच्ची प्रेमिका अपने प्रेमी का खून नही कर सकती और अगर वह राजीव की दौलत से प्यार करती थी तो किसी भी कीमत पर राजीव का खून नहीं कर सकती क्योंकि इस स्थिति मेँ तो उसके धन प्राप्ति फे स्वप्न अधूरे ही रह जाएंगे ।"
"यह आपके सोचने का तरीका हे ।" अमीता की बुद्धि में बिजय की बात कुछ बैठ गई थी ।
"वैसे अमीता जो, एक बात बताइए?"
"पूछिए I"
"निर्मला के परिवार से तुम्हारे परिवार की कोई पुरानी शत्रुता तो नहीं है?"
"वे हमारे कदमों में रहते है, हमसे दुश्मनी करने का साहस उनमें कहां?”
“फिर तो निर्मला का खूनी होना अत्यधिक कठिन है I"
"जासूस आप हैं, आप ही पता लगाएं ।"
“खैर, अब तुम जा सकती हो ।"
वह चली गई तो फिर एक…एक करके सभी नौकरों को भेजा गया-उन सभी के बयान लगभग एक जैसे ही थे । वे अपने मालिक राजीव को चाहते थे । किसके मन में मैल था…विजय उनके चेहरे से भांपने में असफ़ल रहा था ।
सब के बाद में शांति के बयान हुए ।
यूं तो शांति बर्तन माँजने वाली थी लेकिन थी गजब की सुंदर । उसकी बातों से विजय ने भी भांपा कि कहारिन होते हुए भी वह राजीव को 'मुहब्बत' की नजरों से देखती थी l
लेकिन फिर भी इन सबके बयानों के पश्चात भी विजय किसी ठोस निर्णय पर न पहुच सका था ।
अभी वह उठना ही चाहता था कि वह चौंक पडा । बाहर से कुछ ऐसी आवाजें आ रही थी कि जैसे कोई जबर्दस्ती इमारत मेँ घुसना चाह रहा हो तथा उसे बाहर निकालने की चेष्टा की जा रही हो ।
वह शीघ्रता से बाहर आया तो उसने देखा कि एक चालीस वर्ष की आयु का व्यक्ति और एक सुंदर-सी लडकी आना चाहते थे ।
लडकी को वह पहचान चुका था क्योंकि उसका फोटो वह राजीव के कमरे से प्राप्त कर चुका था ।
वह निर्मला थी I निर्मला की आंखों में आंसू थे, वह सिसकारियां ले-लेकर रो रही थी और नौकर उन्हें धक्के दे रहे थे ।
"ठहरो!" विजय बोला I
सबने उसकी ओर देखा तभी निर्मला चीख पडी…“तुम्ही ने मेरे राजीव का खून किया है कमीनी, मैं जासूस को बता दूंगी. . तुम्ही ने मेरे राजीव को मुझसे छीन लिया है ।"
और वह और भी कुछ चीखना चाहती थी कि विजय बोल पडा…"क्या आप निर्मला देवी हैं?”
उसने 'हां' मेँ गर्दन हिला दी ।
"रहमान, इन्हें अंदर भेज दो I”
“नही, मिस्टर विजय, इन मनहूसों के कदम अंदर नहीं पड़ेगे I" चंद्रभान आगे बढ़ते हुए बोले ।
"कातिल को गिरफ्तारी के लिए इनके बयान भी आवश्यक हैं । इन्हें आने दो I”
और चंद्रभान जी न जाने क्या सोचकर चुप रह गए ।
कुछ समय पश्चात बिजय निर्मला से पूछ रहा था…"कहो, तुम्हें क्या कहना है?"
"क्या आप जासूस हैं?” वह बोली ।
""हां…लेकिन तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि हवेली मेँ कोई जासूस आया हुआ है?”
"यह खबर तो सारे श्मशानगढ़ में फैली हुई है ।"
“अच्छा.... .खैर अब तुम बताओ क्या कहना चाहती हो?"
"जासूस जी, मेरे राजीव को इन्होंने ही मारा है. . .ये सब मेरे राजीव से मेरे कारण जलते थे । जब मेरा राजीव जीवित था तो मुझे यहां आने से रोकने का साहस किसी मेँ भी न था । मै सारी इमारत में अपने राजीव के साथ घूमा करती थी लेकिन आज. . . I" और फिर वह फफ्क-फ़फ्ककर रो पडी I
“लेकिन तुम्हें राजीव की मौत का इतना दुख क्यों है?" बिजय ने बडा ही अजीब-सा प्रश्न किया ।
"जासूस जी, शायद तुम्हें कोई लडकी प्यार नहीं करती I"
विजय उसकी इस मासूमियत पर मुस्कराया तथा बोला…"मेरां मतलब है तुम किसी और से भी प्यार कर सकती हो-जैसे सुभ्रात से I” विजय इस प्रकार के शब्द कहकर निर्मला के प्यार को परखना चाहता था ।
"गुंडे, लुच्चे I” निर्मला यकायक बिजय पर चढ गई…“तू मेरे देवता राजीव की बराबरी उस हरामी सुभ्रांत से करता है । मुझे वेश्या समझता है जो एक रात के बाद एक. . . ।"
निर्मला के पिता ने उसे रोक लिया वरना निर्मला अपने प्रेम पर उछलती कीचड़ देखकर तो उसे प्रसाद के रूप मेँ एक थप्पड ही रसीद करने जा रही थी ।
उसके बाद निर्मला के पिता निर्मला को ले गए ।
विजय सबके बयानों के साथ रहस्य की परतों में घुसने की वेष्टा कर रहा था ।
”प्यारे मेहमान दी ग्रेट, ये साला केस तो बडा उलझनपूर्ण निकला ।” विजय एक अकेले कमरे में बैठा कह रहा था I
" गुरू , रहस्य की परते उलझती जा रही हैं ।”
"एक बात तो बताओ…मियां पकोंडी मल?"
" पूछो, गुरु I"
“यह साली अपने राजीव की लाश कैसे उठ खडी हुई?"
"ऐसा हो जाता है गुरु ।”
"चुप बे गुरु के वेले, तुम साले फिर किसी आत्मा की बात करोगे ।” विजय ने डांटा ।
"जब बात ही ऐसी है, गुरु l”
"खैर प्यारे हम इस पर शुरू से एक सरसरी नज़र मारते हैं और फिर रहस्यों से उलझने की कोशिश करते हैं । जहां कुछ रह जाए वहां तुम याद दिलाना ।"
"ऐसा ही कीजिए, गुरु I"