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रहस्य-रोमांच
बेलगाम औरत की हसरतें
अपनी बेलगाम हसरतों के कारण सायरा ने लोक-लाज को दरकिनार कर अमर्यादित हो गई और कई पुरुषों के साथ रंगरेलियां मनाने लगी। उसके पति को उसकी यह बेवपफाई पसंद नहीं आई और उसने उसकी हत्या कर दी, किंतु मृत्यु के बाद भी सायरा की आत्मा अपनी हवस शांत करने के लिए भटकती रही...
नारंग मंडी मेरा जन्म स्थान था। हम बच्चे थे, जब हम रामदयाल हवेली के बारे में सुना करते थे कि उसमें भूतों का बसेरा है। कमसिनी के बावजूद मुझे भूतों के एहसास ने कभी खौपफजदा नहीं किया और पिफर एक वक्त ऐसा भी आया, जब मैंने उस हवेली को खरीद लिया।
मैं महानगर की घनी आबादी, शोर, गर्मी और प्रदूषण से तंग आ चुका था। उस वक्त मेरा एक स्टेज शो भी चल रहा था, जिसके एक हफ्रते में नौ शो भी हो जाते थे। उस शो ने इतनी शोहरत हासिल की कि भविष्य में भी उसके जारी रहने की संभावना थी। मेरी अनुपस्थिति में मेरा सहकर्मी उसे निर्देशित करता थी। मैं गर्मी, प्रदूषण और काम की अध्किता के कारण तंग आकर तमाम काम अपने सहकर्मी के हवाले करके स्वयं नारंग मंडी पहुंच गया था।
मुझे यहां के प्रसि( प्रोपर्टी डीलर से नारनूल रोड पर स्थित एक पुरानी हवेली के बारे में इलम हो चुका था। जब मुझे उसकी बिक्री की खबर मिली तो मैंने नारंग मंडी के एक प्रोपर्टी डीलर से संपर्क साध।
हम दरख्तों की लम्बी लाइन के अंदर से गुजरती सड़क पर सपफर कर रहे थे। अचानक कार दाएं तरपफ जाने वाली एक पतली सड़क की तरपफ मुड़ गई। दोनों तरपफ लहलहाते खेत थे, पिफर हम एक छोटी-सी नहर की पुलिया से गुजरे।
पुलिया पार करते ही कार रुकी और प्रोपर्टी डीलर ने हवेली की जानिब इशारा किया। लंबे और वीरान रास्ते के आखिर में बना एक मकान मेरे सामने था। चारों तरपफ खाली जमीन थी, जिसमें हर तरपफ लंबी-लंबी घास उगी हुई थी। अनगिनत पेड़ भी थे। इसे एक सम्पूर्ण पफार्म हाउस भी कहा जा सकता था।
तमाम हालत ऐसी थी, जैसे बरसों से यहां कोई आया ना हो और यह बात ठीक भी थी। राम लाल हवेली यकीनन किसी हिंदू की सम्पत्ति रही होगी। एक जमींदार टाइप के खानदान ने उसे अलॉट करा लिया था। वह कुछ मुद्दत से इसमें रहे और पिफर इसके भुतहा होने या अपनी निजी मजबूरी के कारण कहीं और शिफ्रट हो गए। पिफर यह हवेली सादिक चौध्री ने खरीद ली।
प्रोपर्टी डीलर ने हवेली की तरपफ इशारा किया। मैंने उसे देखते ही एक नजर में उसे खरीदने का पफैसला कर लिया।
प्रोपर्टी डीलर ने अपने सिर से कैप उतारा और गंजे सिर पर हाथ पफेरते हुए बोला, ‘‘अब इसे आंदर से चलकर देखते हैं।’’
‘‘इसकी जरूरत नहीं। बाहरी हालत से इसकी अंदरुनी हालत का बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है।’’
‘‘ठीक है। मैं जल्दी ही इसके कागजात तैयार कराउंफगा। मेरी पसंद और अंदाज का उसे अनुमान हो गया था और वह बेहद खुश था क्योंकि उसे एक भारी कमीशन मिलने की उमीद हो गई थी।’’
दस रोज बाद राम लाल हवेली और उसके साथ की जमीन मेरी सम्पत्ति थी। मैंने दर्जन भर मजदूर और कारीगर उस जगह काम करने के लिए नियुक्त कर दिए थे। हवेली के कमरों में हर तरपफ जाले लगे हुए थे। पफर्श और दीवारें मिट्टी से अटी हुई थीं। अगले दो हफ्रते उसकी सपफाई में खर्च हो गए।
हवेली की अंदरुनी सजावट के लिए शहरयार सिद्दकी को खास तौर पर मैंने महानगर से बुलाया था। नौजवान कलाकार ने जब पुरानी हवेली, उसके अंदर बनी सागवान की सीढ़ियों और प्राचीन टायलों का पफर्श देखा तो प्रभावित हुए बगैर ना रह सका। वह प्राचीन और दुलर्भ वस्तुओं का कद्रदान था।
पफौरन ही वह कमरों की नाप लेने और अपने ड्राइंग बोर्ड पर नक्शे वगैरा बनाने में व्यस्त हो गया। मेहनत और लगन से काम करना शहरयार की पिफतरत थी। इसी कारण दूर-दूर तक वह मशहूर था। शौकीन लोग उसे दूर-दूर से बुलाया करते थे। अगले हफ्रते उसे शहर में विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी में गुजरे।
इस दौरान मैंने अपनी जायदाद पर अपने पहले वाले मेहमान देखे। मैं आसपास के इलाके का जायजा ले रहा था कि मैंने लकड़ी के पुल के नीचे दो लड़कों को बंसियों से मछलियां पकड़ते हुए देखा। जब मैंने झाड़ी में से निकल कर उन्हें आवाज दी तो वह बंसियां वहीं पफेंक कर भाग गए। वह मेरे बुलाने पर भी वापस नहीं आए। हालांकि मैं उनसे दोस्ती का इरादा रखता था और उन्हें इजाजत देना चाहता था कि वह जब चाहें यहां आकर मछलियां पकड़ सकते हैं।
एक रोज पत्राकार नसीर अहमद आ गया। वह शहर में स्थानीय अखबार का सम्पादक था। वह भी नारंग मंडी का रहने वाला था। मैं उसे बचपन से जानता था। उसे घटिया शराब पीने की आदत थी। वह अक्सर शराब पीता रहता और उसे बुरा-भला कहता रहता और अल्लाह से मापिफयां मांगता रहता। कई बार तो वह उसे इतना बुरा-भला कहता कि गालियों पर उतर आता। मैं उसकी इन पुरानी आदतों से अच्छी तरह वाकिपफ था।
हम दोनों बरामदे में पड़ी बेंत की कुर्सियों पर बैठ गए। उसने इलाके के बारे में बातें शुरू कर दीं। ऐस-ऐसे लोगों का जिक्र किया, जिन्हें मैं लगभग भूल चुका था।
मैं बहुत हैरान हुआ, जब उसने बताया कि सुहैल अख्तर कारगिल की लड़ाई में शहीद हो चुका है। वह कारगिल की पहाड़ियों पर बू पफोर्स तोपों के साथ जांबाजी से मुकाबला करता रहा था।
उसने बताया, ‘‘और वह मुश्ताक, जिसके साथ तुम स्कूल जाते थे, उसने एक दौलतमंद विध्वा से शादी कर ली थी। पिफर वह दोनों ब्रिटेन चले गए और वापस नहीं लौटे। सुना है, वहां वह दोनों एक होटल चलाते हैं।’’
‘‘मेरा ख्याल है, अगर तुम बोतल खाली कर दो तो बाकी भूले-बिसरे लोग भी तुम्हें याद आ जाएं।’’ नसीर अहमद मेरे जुमले में छुपे व्यंग्य को भांप गया।
मैं उसे रूखसत करने के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक उसने हवेली के आसपास की जमीन पर लाभदायक पौधें के उत्पादन के बारे में बातें करना शुरू कर दीं। पिफर उसने बातों का रुख मोड़ते हुए पूछा, ‘‘तुमने उसे देखा है?’’ उसने अपनी ऐनक के उफपर से मुझे घूरा।
‘‘किसकी बात कर रहे हो?’’ मेरी जिज्ञासा बढ़ी।
‘‘मैं सायरा चौध्री की बात कर रहा हूं। तुम्हें पता है, उसकी रूह हवेली में आती है।’’
‘‘मुझे नहीं मालूम’’
‘‘तुम दिमाग पर जोर दो तो सब कुछ याद आ जाएगा।’’ नसीर ने पूरे यकीन के साथ कहा, ‘‘सायरा ने सादिक चौध्री से शादी कर ली थी। वह शौहर को बहुत चाहती थी, लेकिन उसके साथ उसके अनगिनत कजन भी थे, जिन्हें वह उन्हें नाराज नहीं करती थी। उसके कजन समझते थे कि सायरा के शौहर को कुछ भी पता नहीं है। पिफर अचानक कारगिल की जंग छिड़ गई और सादिक को पफौज में बुला लिया गया।’’
जंग के दौरान सादिक चौध्री जख्मी हुआ। यु( विराम के बाद वह कई माह तक अस्पताल में भर्ती रहा। अस्पताल में उसे सायरा के बारे में मालूमात मिलती रहती थी कि उसके कई नौजवानों के साथ जिस्मानी ताल्लुकात हैं और वह रात-दिन उनके साथ गुलछर्रे उड़ा रही है।
नसीर अहमद ने एक लंबा घूंट भरा और कमीज की आस्तीन से मुंह सापफ करने के बाद बोला, ‘‘तो वह शौहर के बिस्तर पर बेलिबास लेटी थी और उस पर एक हट्टा-कट्टा नौजवान सवार था। यह सीन देखक उसका खून खौल उठा। उसकी दिल दहला देने वाली आवाज सुनकर वह नौजवान जिस्म पर चादर डालकर पफरार हो गया, जबकि सायरा भाग नहीं सकी। उसने सीढ़ियों के नीचे इस जगह ;उसने जगह की जानिब इशारा कियाद्ध सायरा पर का हमला किया, जिससे वह हलाक हो गई और अगले रोज ही उसे नापाक ही दपफन कर दिया गया। उसकी मौत को खुदकुशी जाहिर किया गया। चौधरी ने इलाके की पुलिस से सांठ-गांठ करके मामला रपफा-दपफा करा लिया।’’
वह एक लम्हे के लिए रुका। खाली बोतल की तरपफ हसरत भरी नजरों से देखा और बाहर घास पर उछाल दिया। पिफर बोला, ‘‘सादिल चौध्री ने इंतकाल का कोई शोक नहीं मनाया। वह यहां से हमेशा के लिए कहीं और चला गया।’’
‘‘कापफी अर्से तक हवेली खाली रही। पिफर सादिक चौधरी ने उसे बेचने की कोशिश की, लेकिन बिक नहीं सकी और कापफी अर्से तक इसी तरह बंद पड़ी रही।’’
कुछ देर खामोशी छाई रहीं। मैंने इस काहानी को पहली बार सुना था। मैंने उसकी बातों को महत्व नहीं दिया। एक अखबार का मामूली संपादक इस तरह की बातें करता और खबरें बनाता था।
‘‘हां, आगे कहो।’’ मैंने उसकी बातों पर यकीन ना करते हुए कहा।
उसने उंगलियों पर गिनती शुरू की, ‘‘नंबर एक, इसके बाद सायरा कई बार देखी गई इस हवेली में, हालांकि वह जिंदा नहीं थी। तुम पांचवें आदमी हो, जिसने पिछले बीस साल बाद इस हवेली को आबाद किया है। तुमसे पहले आबाद करने वालों ने कहा था कि यह हवेली भूतहा है, सिवाए एक के, जिसने कोई टिपण्णी नहीं की और खुदकुशी कर ली थी।’’
नसीर अहमद के चले जाने के बाद मैंने घास में पड़ी जॉनी वॉकर की खाली बोतल देखा तो मुझे अंदाजा हो गया कि यह पत्राकार भूतों पर इतना विश्वास क्यों करता है।
महीने के आखिर में हवेली के आसपास कृषी उद्योग के लिए काम शुरू हो गया। शहरयार महानगर से वापस आ गया। वह पर्दों और कालीन के कुछ नमूने साथ लाया था। इसके अलावा भुगतान के कुछ चेक भी साइन करवाने थे। मैंने उस रात काम करने वाले कारीगरों और शहरयार को खाना खिलाने के लिए बाहर से खाना मंगवाया।
बाद में कॉपफी के दौर के बाद सायरा का किस्सा शुरू हो गया। मैंने नसीर अहमद से सुनी कहानी सबको सुनाई। सबने दिलचस्पी ली और मुझे यकीन था कि अगले हफ्रते यह शहर भर में पफैल जाएगी, क्योंकि वह इस सिलसिले में कुछ ना कुछ जरूर छापेगा।
हवेली की सजावट का काम एक सप्ताह और होना था। पिफर भी वह अब कापफी हद तक रिहाईश के काबिल हो गई थी। मैंने अपनी पहली रात हवेली में गुजारने का इरादा कर लिया। मैं पुराने आतिशदान के करीब बैठा था और अपने असिस्टेंट की तरपफ से भेजे गए एक ड्रामे की स्क्रीप्ट का अध्ययन कर रहा था। मैं उस रोज कापफी संतुष्ट था।
बाहर दरख्तों में हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी। आतिशदान मंे लकड़ियां चटख रही थीं। माहौल बहुत रहस्यमयी होता जा रहा था। तब मुझे एहसास हुआ कि लोगों ने तन्हा घरों के बारे में इतनी कहानियां क्यों लिखी हैं। तभी चकाचौंध् रोशनी तमाम कमरे में पफैल गई।
मैं हैरत से उछल पड़ा। उस अद्भुत रोशनी ने मुझे चौकन्ना कर दिया। पिफर मैंने एक इंतहाई खौपफजदा मंजर देखा।
सपफेद लिबास में एक मनमोहक हसीना उस रोशनी में तो प्रकट हुई। उसके दिलकश होंठों पर दबी-दबी मुस्कराहट थी। बाल खुले थे और कंधें पर बिखरे हुए थे। उसकी सब्ज आंखें थी, जो बेहद चमकदार थीं।
गठीला गुलाबी जिस्म बेहद हसीन था। पारदर्शी लिबास में सीने पर सजे खूबसूरत उभार बहुत प्यारे दिख रहे थे। अगले ही पल या शायद मेरी पलक झपकाते ही वह मेरे रूबरू आकर खड़ी हो गई। मैं एक लम्हे के लिए पलकें तक झपकाना भूल गया और सम्मोहित होकर उसे देखने लगा।
वह कुछ और आगे आई और मैं बिस्तर से उठकर बैठ गया और मूर्खों की तरह उसे देखते हुए पूछा, ‘‘तुम कौन हो और यहां इस वक्त क्या कर रही हो?’’
इसके साथ ही मेरा गला खुष्क हो गया। आवाज छलक में पफंस गई और मैं आगे एक लफ्रज नहीं बोल सका। उसके दिलनशीं होंठ ध्ीरे से खुले और उनसे मध्ुर लहजे में एक जुमला बरामद हुआ, ‘‘तुम हसन कमाल हो ना’ डायरेक्टर हसन कमाल।’’
उसे मेरे नाम का कैसे इल्म हुआ, मैं समझ नहीं सका। मुझे यह भी ख्याल आया कि शायद मेरे स्टेज ड्रामे के प्रतिद्वंदियों ने मेरे खिलापफ कोई नया गेम खेला हो या पिफर शायद वह ड्रामों में काम करने की शौकीन हो।
‘‘डियर, तुमको यहां किसने भेजा है?’’ मैंने पूछा।
हसीना के चेहरे का रंग बदल गया। उसने गर्दन को जरा तिरछा करके अपनी लंबी-लंबी पलकें झपकाई, ‘‘आखिर आपका मतलब क्या है, मुझे कौन भेज सकता है? मैं खुद यहां आई हूं।’’
उसका लहजा मध्ुर और सुरीला था। मेरे दिमाग में घंटी-सी बजने लगीं। मैंने अपने पूरे कैरियर में किसी अभिनेत्राी की आवाज और लहजा इस कदर लुभाने वाला नहीं सुना था। मैंने हसीना से प्रभावित हुए बगैर ना रह सका, लेकिन हैरत की बात थी कि मैंने इससे पहले उसे कभी नहीं देखा था और न ही कोई स्थानीय लड़की ऐसी थी, जो मेरे नाम और पेशे से परिचित हो।
मैंने कहा, ‘‘तुमने ठीक कहा है। मेरा नाम हसन कमाल है और मैं डायरेक्टर भी हूं, लेकिन मैंने पहले कभी तुम्हें नहीं देखा। क्या नाम है तुम्हारा मिस?’’
‘‘नूरीन... नूरीन... यही मेरा नाम है। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूं। तुम्हें कुछ महसूस कराना चाहती हूं । तुम्हें उस लज्जत से वाकिपफ कराना चाहती हूं, जिससे अभी तक तुम मेहरूम रहे हो।’’
वह ध्ीरे से आगे बढ़ी और अपने गुलाबी रसीले होंठ मेरे होंठों से मिला दिए। मैं उसकी इस बेबाकी पर ठगा-सा रह गया, पिफर कुछ ही लम्हे बाद उसकी आवारा हरकतों से वेताब होकर मैं उसे बेलिबास करने लगा। अगले ही पल मेरे सामने दहकता वजूद महक रहा था।
मैं उसे पलंग पर ले आया और उस पर झपट पड़ा। यह वह मदहोश लम्हे थे, जो आज से पहले मेरी जिंदगी में पहले कभी नहीं आए थे। दुनिया से बेखबर मस्तियों में डूबे बदन एक-दूसरे में इतने खोए रहे कि रात सरकने का पता ही नहीं चला। जब होश आया तो सुबह की अंजान हो रही थी।
अगली सुबह जब मैं जागा तो नूरीन मौजूद नहीं थी। मुझे पिछली रात के लम्हे याद नहीं थे। मुझे यूं महसूस हुआ था कि सारी रात किसी पिंजरे में बंद रहा हूं, जिसके चारों तरपफ नोकदार और तेजधर कीलें लगी हुई थीं।
सारा दिन खौपफ और हैरत के मिले-जुले एहसास मुझ पर छाए रहे।
दूसरी रात वह मुझे नजर नहीं आई। मैं उसके ना आने से मायूस हो गया और उसे अपना वहम, अपना ख्वाब समझने लगा। कुछ रातों अनिंद्रा की अवस्था मंे गुजरीं। तमाम रातें उसके बारे में सोचते-सोचते गुजार दीं। मैं उसे तलाश करे उससे कुछ सवाल पूछना चाहता था।
मैंने उसका जिक्र हवेली में काम करने वाले लोगों से किया, मगर वह लोग उस वजूद से अंजान थे। उस लड़की के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं था। नूरीन का पता लगाने के लिए मुझे कोई मदद नहीं मिल सकी।
नूरीन पांचवीं रात को पिफर आई। उसने ध्ीरे से दरवाजा खोला। मुझे स्टडी करते देखकर वह दिलकश अंदाज में मुस्कराई और बोली, ‘‘आप मेरा इंतजार कर रहे थे क्या?’’
मैं उसके लहजे और उसकी आवाज की अपनायत और कोमलता में डूब गया।
मैंने हां में सिर हिलाया। नूरीन ने अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर जमाए। सिर को हल्की-सी जुम्बिश देकर आगे की तरपफ झुकाया, ‘‘तो जनाब, आप मेरा इंतजार क्यों कर रहे थे?’’
‘‘हां...,’’ मैंने उसे अपने अंदरूनी जज्बात से आगाह किया। वह हंसी और पिफर उसने अपना सपफेद गाउफन उतार पफेंका और हवा में तैरती हुई मेरे पास आ गई। मैं उठा और उसे अपनी बांहों में भरकर समेट लिया।
पिफर मैं उसे बिस्तर पर ले आया। कुछ लम्हे मैं उसे यूं ही देखता रहा। पिफर कई दिन से भूखे की तरह उस पर टूट पड़ा। यह वह मदहोश लम्हे थे, जब उसने मुझे भरपूर सहयोग दिया था, पिफर सुबह की पहली अंजान के साथ वह गायब हो गई।
मेरे नई हवेली की अजनबी खूबसूरत मेहमान कई रोज तक आती रही। मुझे एक-एक लम्हा कीमती लगने लगा। मैं उसके बारे में कुछ नहीं जान सका था। उससे पहली मुलाकात पर मैंने उससे पूछा था और उसके बाद मैंने कई बार भी पूछताछ की थी, लेकिन वह हर बात टाल गई थी।
पिफर कुछ रोज बाद वह अचानक गायब हो गई। मुझे उसकी शिद्दत से जरूरत महसूस हो रही थी। इसके कई कारण रहे होंगे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शरीरिक संबंध् थे। उसकी अनुपस्थिति में मेरे लिए वक्त गुजारना मुश्किल हो रहा था। वह इंतहाई शिद्दत से मुझे अंदर से काट रही थी।
और पिफर यह तन्हाई आखिर उस वक्त दूर हुई, जब शहरयार और उसके कारिंदे कई वैगनें सामान से भरकर लाए। पफर्निचर, पेंटिंग्स, कालीन और घर की सजावट और जरूरत की हर चीज। नौजवान अंदरूनी सजावट का काम खुश होकर कर रहा था। उसकी रफ्रतार बहुत तेज थी। वह अपने कारीगरों के साथ हवेली में मसरूपफ हो गया और उन्हें निर्देश देकर अपनी मर्जी के मुताबिक काम करवाने लगा।
जुमेरात तक घर का काम पूरा हो गया। शहरयार ने तमाम कारीगरों का बाकी भुगतान करके उन्हें रुखसत कर दिया।
एक रात वह पिफर आई हांपफती हुई। उसकी आंखें अंदरुनी खुशी के कारण चमक रही थी और एक हफ्रते की अनुपस्थिति के कारण उसमें बहुत जोश पाया जाता था।
‘‘तुम्हारा वह प्यारा दोस्त कहां गया?’’ आते ही नूरीन ने पूछा।
‘‘तुम किसकी बात कर रही हो?’’
‘‘वह नौजवान, भूरी आंखों वाला।’’ अपने होंठों पर जुबान पफेरते हुए उसने कहा।
‘‘उसे जाने दो बेबी. अब मैं जो तुम्हारा हो गया हूं।’’ मैंने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘ठीक है।’’ उसकी आंखें सुकड़ी, ‘‘लेकिन वह ध्ीमे मिजाज का है।’’ और तुम हिंसा पसंद हो। तुम्हें सताने में बहुत मजा आता है।’’
‘‘मैं हिंसावादी हूं?’’ मैंने हैरत से पूछा, ‘‘ओह माई गॉड... ऐ लड़की, क्या तुम समझती हो कि अपनी कमर पर नाखूनों के निशान मैंने खुद बनाए हैं?’’
नूरीन कुछ देर खड़ी मुझे घूरती रही, पिफर मेरे करीब आई और मेरी कमीज पीछे से उठाकर अपनी मुहब्बत के निशान तलाशने लगी।
‘‘ओह, वैरी सॉरी...’’ और पिफर उन निशानों को चूम लिया। पिफर उसने जवानी का वह खेल खेला कि मुझे पिछली रातों का मजा आज की लज्जत की तुलना में पफीका मालूम देने लगा।
उस रात जाने से पहले मैंने उसे अपने साथ शहर ले चलने को कहा ताकि वह मेरे नए शो के प्रीमियर में शिरकत कर सके।
अपने सुनहरे घने बालों को एक झटके से पीछे करते हुए उसने कहा, ‘‘ओह सॉरी, यह मुमकिन नहीं है।’’
‘‘आखिर क्यों?’’ मैंने जोर देकर पूछा।
‘‘यह कतई नामुमकिन है।’’ वह जोर से चीखी, ‘‘प्लीज मत जाओ, मैं तन्हा रह जाउफंगी।’’
पिफर वह मेरी बिस्तर पर बैठ गई। मेरी आंखों में झांकते हुए मुझसे पूछा, ‘‘सच-सच बताओ, क्या तुम मुझसे मुहब्बत करते हो। कह दो मुझसे हमेशा मुहब्बत करते रहोगे। प्लीज हसन बताओ।’’
खिड़की के शीशे में से चांदनी अंदर आ रही थी, जिसकी सपफेद रोशनी में उसके गालों पर ढलके आंसू सापफ नजर आ रहे थे। वह बहुत खूबसूरत थी। मैंने अपनी जिंदगी में उससे खूबसूरत लड़की नहीं देखी थी। अचानक मैंने उसके गालों पर ढलके आंसुओं को चूम लिया।
‘‘हकीकत में मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं और करता रहूंगा।’’
अचानक वह बिस्तर से उठ खड़ी हुई, ‘‘मैंने तुमसे पहले किसी से इतनी मुहब्बत नहीं की थी हसन। मुझे तुम्हारी मुहब्बत की जरूरत है। तुम्हें मेरा यकीन करना होगा।’’
उसके जाने के बाद दरवाजा खुद बंद हो गया।
‘‘आई लव यू।’’ मैंने आहिस्ता से कहा।
और इस वक्त सबसे महत्वपूर्ण बात यही थी कि मैंने दृढ़ विश्वास के साथ उसकी मुहब्बत स्वीकार और इकरार किया था।
बेलगाम औरत की हसरतें
अपनी बेलगाम हसरतों के कारण सायरा ने लोक-लाज को दरकिनार कर अमर्यादित हो गई और कई पुरुषों के साथ रंगरेलियां मनाने लगी। उसके पति को उसकी यह बेवपफाई पसंद नहीं आई और उसने उसकी हत्या कर दी, किंतु मृत्यु के बाद भी सायरा की आत्मा अपनी हवस शांत करने के लिए भटकती रही...
नारंग मंडी मेरा जन्म स्थान था। हम बच्चे थे, जब हम रामदयाल हवेली के बारे में सुना करते थे कि उसमें भूतों का बसेरा है। कमसिनी के बावजूद मुझे भूतों के एहसास ने कभी खौपफजदा नहीं किया और पिफर एक वक्त ऐसा भी आया, जब मैंने उस हवेली को खरीद लिया।
मैं महानगर की घनी आबादी, शोर, गर्मी और प्रदूषण से तंग आ चुका था। उस वक्त मेरा एक स्टेज शो भी चल रहा था, जिसके एक हफ्रते में नौ शो भी हो जाते थे। उस शो ने इतनी शोहरत हासिल की कि भविष्य में भी उसके जारी रहने की संभावना थी। मेरी अनुपस्थिति में मेरा सहकर्मी उसे निर्देशित करता थी। मैं गर्मी, प्रदूषण और काम की अध्किता के कारण तंग आकर तमाम काम अपने सहकर्मी के हवाले करके स्वयं नारंग मंडी पहुंच गया था।
मुझे यहां के प्रसि( प्रोपर्टी डीलर से नारनूल रोड पर स्थित एक पुरानी हवेली के बारे में इलम हो चुका था। जब मुझे उसकी बिक्री की खबर मिली तो मैंने नारंग मंडी के एक प्रोपर्टी डीलर से संपर्क साध।
हम दरख्तों की लम्बी लाइन के अंदर से गुजरती सड़क पर सपफर कर रहे थे। अचानक कार दाएं तरपफ जाने वाली एक पतली सड़क की तरपफ मुड़ गई। दोनों तरपफ लहलहाते खेत थे, पिफर हम एक छोटी-सी नहर की पुलिया से गुजरे।
पुलिया पार करते ही कार रुकी और प्रोपर्टी डीलर ने हवेली की जानिब इशारा किया। लंबे और वीरान रास्ते के आखिर में बना एक मकान मेरे सामने था। चारों तरपफ खाली जमीन थी, जिसमें हर तरपफ लंबी-लंबी घास उगी हुई थी। अनगिनत पेड़ भी थे। इसे एक सम्पूर्ण पफार्म हाउस भी कहा जा सकता था।
तमाम हालत ऐसी थी, जैसे बरसों से यहां कोई आया ना हो और यह बात ठीक भी थी। राम लाल हवेली यकीनन किसी हिंदू की सम्पत्ति रही होगी। एक जमींदार टाइप के खानदान ने उसे अलॉट करा लिया था। वह कुछ मुद्दत से इसमें रहे और पिफर इसके भुतहा होने या अपनी निजी मजबूरी के कारण कहीं और शिफ्रट हो गए। पिफर यह हवेली सादिक चौध्री ने खरीद ली।
प्रोपर्टी डीलर ने हवेली की तरपफ इशारा किया। मैंने उसे देखते ही एक नजर में उसे खरीदने का पफैसला कर लिया।
प्रोपर्टी डीलर ने अपने सिर से कैप उतारा और गंजे सिर पर हाथ पफेरते हुए बोला, ‘‘अब इसे आंदर से चलकर देखते हैं।’’
‘‘इसकी जरूरत नहीं। बाहरी हालत से इसकी अंदरुनी हालत का बखूबी अंदाजा लगाया जा सकता है।’’
‘‘ठीक है। मैं जल्दी ही इसके कागजात तैयार कराउंफगा। मेरी पसंद और अंदाज का उसे अनुमान हो गया था और वह बेहद खुश था क्योंकि उसे एक भारी कमीशन मिलने की उमीद हो गई थी।’’
दस रोज बाद राम लाल हवेली और उसके साथ की जमीन मेरी सम्पत्ति थी। मैंने दर्जन भर मजदूर और कारीगर उस जगह काम करने के लिए नियुक्त कर दिए थे। हवेली के कमरों में हर तरपफ जाले लगे हुए थे। पफर्श और दीवारें मिट्टी से अटी हुई थीं। अगले दो हफ्रते उसकी सपफाई में खर्च हो गए।
हवेली की अंदरुनी सजावट के लिए शहरयार सिद्दकी को खास तौर पर मैंने महानगर से बुलाया था। नौजवान कलाकार ने जब पुरानी हवेली, उसके अंदर बनी सागवान की सीढ़ियों और प्राचीन टायलों का पफर्श देखा तो प्रभावित हुए बगैर ना रह सका। वह प्राचीन और दुलर्भ वस्तुओं का कद्रदान था।
पफौरन ही वह कमरों की नाप लेने और अपने ड्राइंग बोर्ड पर नक्शे वगैरा बनाने में व्यस्त हो गया। मेहनत और लगन से काम करना शहरयार की पिफतरत थी। इसी कारण दूर-दूर तक वह मशहूर था। शौकीन लोग उसे दूर-दूर से बुलाया करते थे। अगले हफ्रते उसे शहर में विभिन्न वस्तुओं की खरीदारी में गुजरे।
इस दौरान मैंने अपनी जायदाद पर अपने पहले वाले मेहमान देखे। मैं आसपास के इलाके का जायजा ले रहा था कि मैंने लकड़ी के पुल के नीचे दो लड़कों को बंसियों से मछलियां पकड़ते हुए देखा। जब मैंने झाड़ी में से निकल कर उन्हें आवाज दी तो वह बंसियां वहीं पफेंक कर भाग गए। वह मेरे बुलाने पर भी वापस नहीं आए। हालांकि मैं उनसे दोस्ती का इरादा रखता था और उन्हें इजाजत देना चाहता था कि वह जब चाहें यहां आकर मछलियां पकड़ सकते हैं।
एक रोज पत्राकार नसीर अहमद आ गया। वह शहर में स्थानीय अखबार का सम्पादक था। वह भी नारंग मंडी का रहने वाला था। मैं उसे बचपन से जानता था। उसे घटिया शराब पीने की आदत थी। वह अक्सर शराब पीता रहता और उसे बुरा-भला कहता रहता और अल्लाह से मापिफयां मांगता रहता। कई बार तो वह उसे इतना बुरा-भला कहता कि गालियों पर उतर आता। मैं उसकी इन पुरानी आदतों से अच्छी तरह वाकिपफ था।
हम दोनों बरामदे में पड़ी बेंत की कुर्सियों पर बैठ गए। उसने इलाके के बारे में बातें शुरू कर दीं। ऐस-ऐसे लोगों का जिक्र किया, जिन्हें मैं लगभग भूल चुका था।
मैं बहुत हैरान हुआ, जब उसने बताया कि सुहैल अख्तर कारगिल की लड़ाई में शहीद हो चुका है। वह कारगिल की पहाड़ियों पर बू पफोर्स तोपों के साथ जांबाजी से मुकाबला करता रहा था।
उसने बताया, ‘‘और वह मुश्ताक, जिसके साथ तुम स्कूल जाते थे, उसने एक दौलतमंद विध्वा से शादी कर ली थी। पिफर वह दोनों ब्रिटेन चले गए और वापस नहीं लौटे। सुना है, वहां वह दोनों एक होटल चलाते हैं।’’
‘‘मेरा ख्याल है, अगर तुम बोतल खाली कर दो तो बाकी भूले-बिसरे लोग भी तुम्हें याद आ जाएं।’’ नसीर अहमद मेरे जुमले में छुपे व्यंग्य को भांप गया।
मैं उसे रूखसत करने के बारे में सोच ही रहा था कि अचानक उसने हवेली के आसपास की जमीन पर लाभदायक पौधें के उत्पादन के बारे में बातें करना शुरू कर दीं। पिफर उसने बातों का रुख मोड़ते हुए पूछा, ‘‘तुमने उसे देखा है?’’ उसने अपनी ऐनक के उफपर से मुझे घूरा।
‘‘किसकी बात कर रहे हो?’’ मेरी जिज्ञासा बढ़ी।
‘‘मैं सायरा चौध्री की बात कर रहा हूं। तुम्हें पता है, उसकी रूह हवेली में आती है।’’
‘‘मुझे नहीं मालूम’’
‘‘तुम दिमाग पर जोर दो तो सब कुछ याद आ जाएगा।’’ नसीर ने पूरे यकीन के साथ कहा, ‘‘सायरा ने सादिक चौध्री से शादी कर ली थी। वह शौहर को बहुत चाहती थी, लेकिन उसके साथ उसके अनगिनत कजन भी थे, जिन्हें वह उन्हें नाराज नहीं करती थी। उसके कजन समझते थे कि सायरा के शौहर को कुछ भी पता नहीं है। पिफर अचानक कारगिल की जंग छिड़ गई और सादिक को पफौज में बुला लिया गया।’’
जंग के दौरान सादिक चौध्री जख्मी हुआ। यु( विराम के बाद वह कई माह तक अस्पताल में भर्ती रहा। अस्पताल में उसे सायरा के बारे में मालूमात मिलती रहती थी कि उसके कई नौजवानों के साथ जिस्मानी ताल्लुकात हैं और वह रात-दिन उनके साथ गुलछर्रे उड़ा रही है।
नसीर अहमद ने एक लंबा घूंट भरा और कमीज की आस्तीन से मुंह सापफ करने के बाद बोला, ‘‘तो वह शौहर के बिस्तर पर बेलिबास लेटी थी और उस पर एक हट्टा-कट्टा नौजवान सवार था। यह सीन देखक उसका खून खौल उठा। उसकी दिल दहला देने वाली आवाज सुनकर वह नौजवान जिस्म पर चादर डालकर पफरार हो गया, जबकि सायरा भाग नहीं सकी। उसने सीढ़ियों के नीचे इस जगह ;उसने जगह की जानिब इशारा कियाद्ध सायरा पर का हमला किया, जिससे वह हलाक हो गई और अगले रोज ही उसे नापाक ही दपफन कर दिया गया। उसकी मौत को खुदकुशी जाहिर किया गया। चौधरी ने इलाके की पुलिस से सांठ-गांठ करके मामला रपफा-दपफा करा लिया।’’
वह एक लम्हे के लिए रुका। खाली बोतल की तरपफ हसरत भरी नजरों से देखा और बाहर घास पर उछाल दिया। पिफर बोला, ‘‘सादिल चौध्री ने इंतकाल का कोई शोक नहीं मनाया। वह यहां से हमेशा के लिए कहीं और चला गया।’’
‘‘कापफी अर्से तक हवेली खाली रही। पिफर सादिक चौधरी ने उसे बेचने की कोशिश की, लेकिन बिक नहीं सकी और कापफी अर्से तक इसी तरह बंद पड़ी रही।’’
कुछ देर खामोशी छाई रहीं। मैंने इस काहानी को पहली बार सुना था। मैंने उसकी बातों को महत्व नहीं दिया। एक अखबार का मामूली संपादक इस तरह की बातें करता और खबरें बनाता था।
‘‘हां, आगे कहो।’’ मैंने उसकी बातों पर यकीन ना करते हुए कहा।
उसने उंगलियों पर गिनती शुरू की, ‘‘नंबर एक, इसके बाद सायरा कई बार देखी गई इस हवेली में, हालांकि वह जिंदा नहीं थी। तुम पांचवें आदमी हो, जिसने पिछले बीस साल बाद इस हवेली को आबाद किया है। तुमसे पहले आबाद करने वालों ने कहा था कि यह हवेली भूतहा है, सिवाए एक के, जिसने कोई टिपण्णी नहीं की और खुदकुशी कर ली थी।’’
नसीर अहमद के चले जाने के बाद मैंने घास में पड़ी जॉनी वॉकर की खाली बोतल देखा तो मुझे अंदाजा हो गया कि यह पत्राकार भूतों पर इतना विश्वास क्यों करता है।
महीने के आखिर में हवेली के आसपास कृषी उद्योग के लिए काम शुरू हो गया। शहरयार महानगर से वापस आ गया। वह पर्दों और कालीन के कुछ नमूने साथ लाया था। इसके अलावा भुगतान के कुछ चेक भी साइन करवाने थे। मैंने उस रात काम करने वाले कारीगरों और शहरयार को खाना खिलाने के लिए बाहर से खाना मंगवाया।
बाद में कॉपफी के दौर के बाद सायरा का किस्सा शुरू हो गया। मैंने नसीर अहमद से सुनी कहानी सबको सुनाई। सबने दिलचस्पी ली और मुझे यकीन था कि अगले हफ्रते यह शहर भर में पफैल जाएगी, क्योंकि वह इस सिलसिले में कुछ ना कुछ जरूर छापेगा।
हवेली की सजावट का काम एक सप्ताह और होना था। पिफर भी वह अब कापफी हद तक रिहाईश के काबिल हो गई थी। मैंने अपनी पहली रात हवेली में गुजारने का इरादा कर लिया। मैं पुराने आतिशदान के करीब बैठा था और अपने असिस्टेंट की तरपफ से भेजे गए एक ड्रामे की स्क्रीप्ट का अध्ययन कर रहा था। मैं उस रोज कापफी संतुष्ट था।
बाहर दरख्तों में हवा की सरसराहट सुनाई दे रही थी। आतिशदान मंे लकड़ियां चटख रही थीं। माहौल बहुत रहस्यमयी होता जा रहा था। तब मुझे एहसास हुआ कि लोगों ने तन्हा घरों के बारे में इतनी कहानियां क्यों लिखी हैं। तभी चकाचौंध् रोशनी तमाम कमरे में पफैल गई।
मैं हैरत से उछल पड़ा। उस अद्भुत रोशनी ने मुझे चौकन्ना कर दिया। पिफर मैंने एक इंतहाई खौपफजदा मंजर देखा।
सपफेद लिबास में एक मनमोहक हसीना उस रोशनी में तो प्रकट हुई। उसके दिलकश होंठों पर दबी-दबी मुस्कराहट थी। बाल खुले थे और कंधें पर बिखरे हुए थे। उसकी सब्ज आंखें थी, जो बेहद चमकदार थीं।
गठीला गुलाबी जिस्म बेहद हसीन था। पारदर्शी लिबास में सीने पर सजे खूबसूरत उभार बहुत प्यारे दिख रहे थे। अगले ही पल या शायद मेरी पलक झपकाते ही वह मेरे रूबरू आकर खड़ी हो गई। मैं एक लम्हे के लिए पलकें तक झपकाना भूल गया और सम्मोहित होकर उसे देखने लगा।
वह कुछ और आगे आई और मैं बिस्तर से उठकर बैठ गया और मूर्खों की तरह उसे देखते हुए पूछा, ‘‘तुम कौन हो और यहां इस वक्त क्या कर रही हो?’’
इसके साथ ही मेरा गला खुष्क हो गया। आवाज छलक में पफंस गई और मैं आगे एक लफ्रज नहीं बोल सका। उसके दिलनशीं होंठ ध्ीरे से खुले और उनसे मध्ुर लहजे में एक जुमला बरामद हुआ, ‘‘तुम हसन कमाल हो ना’ डायरेक्टर हसन कमाल।’’
उसे मेरे नाम का कैसे इल्म हुआ, मैं समझ नहीं सका। मुझे यह भी ख्याल आया कि शायद मेरे स्टेज ड्रामे के प्रतिद्वंदियों ने मेरे खिलापफ कोई नया गेम खेला हो या पिफर शायद वह ड्रामों में काम करने की शौकीन हो।
‘‘डियर, तुमको यहां किसने भेजा है?’’ मैंने पूछा।
हसीना के चेहरे का रंग बदल गया। उसने गर्दन को जरा तिरछा करके अपनी लंबी-लंबी पलकें झपकाई, ‘‘आखिर आपका मतलब क्या है, मुझे कौन भेज सकता है? मैं खुद यहां आई हूं।’’
उसका लहजा मध्ुर और सुरीला था। मेरे दिमाग में घंटी-सी बजने लगीं। मैंने अपने पूरे कैरियर में किसी अभिनेत्राी की आवाज और लहजा इस कदर लुभाने वाला नहीं सुना था। मैंने हसीना से प्रभावित हुए बगैर ना रह सका, लेकिन हैरत की बात थी कि मैंने इससे पहले उसे कभी नहीं देखा था और न ही कोई स्थानीय लड़की ऐसी थी, जो मेरे नाम और पेशे से परिचित हो।
मैंने कहा, ‘‘तुमने ठीक कहा है। मेरा नाम हसन कमाल है और मैं डायरेक्टर भी हूं, लेकिन मैंने पहले कभी तुम्हें नहीं देखा। क्या नाम है तुम्हारा मिस?’’
‘‘नूरीन... नूरीन... यही मेरा नाम है। मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहती हूं। तुम्हें कुछ महसूस कराना चाहती हूं । तुम्हें उस लज्जत से वाकिपफ कराना चाहती हूं, जिससे अभी तक तुम मेहरूम रहे हो।’’
वह ध्ीरे से आगे बढ़ी और अपने गुलाबी रसीले होंठ मेरे होंठों से मिला दिए। मैं उसकी इस बेबाकी पर ठगा-सा रह गया, पिफर कुछ ही लम्हे बाद उसकी आवारा हरकतों से वेताब होकर मैं उसे बेलिबास करने लगा। अगले ही पल मेरे सामने दहकता वजूद महक रहा था।
मैं उसे पलंग पर ले आया और उस पर झपट पड़ा। यह वह मदहोश लम्हे थे, जो आज से पहले मेरी जिंदगी में पहले कभी नहीं आए थे। दुनिया से बेखबर मस्तियों में डूबे बदन एक-दूसरे में इतने खोए रहे कि रात सरकने का पता ही नहीं चला। जब होश आया तो सुबह की अंजान हो रही थी।
अगली सुबह जब मैं जागा तो नूरीन मौजूद नहीं थी। मुझे पिछली रात के लम्हे याद नहीं थे। मुझे यूं महसूस हुआ था कि सारी रात किसी पिंजरे में बंद रहा हूं, जिसके चारों तरपफ नोकदार और तेजधर कीलें लगी हुई थीं।
सारा दिन खौपफ और हैरत के मिले-जुले एहसास मुझ पर छाए रहे।
दूसरी रात वह मुझे नजर नहीं आई। मैं उसके ना आने से मायूस हो गया और उसे अपना वहम, अपना ख्वाब समझने लगा। कुछ रातों अनिंद्रा की अवस्था मंे गुजरीं। तमाम रातें उसके बारे में सोचते-सोचते गुजार दीं। मैं उसे तलाश करे उससे कुछ सवाल पूछना चाहता था।
मैंने उसका जिक्र हवेली में काम करने वाले लोगों से किया, मगर वह लोग उस वजूद से अंजान थे। उस लड़की के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं था। नूरीन का पता लगाने के लिए मुझे कोई मदद नहीं मिल सकी।
नूरीन पांचवीं रात को पिफर आई। उसने ध्ीरे से दरवाजा खोला। मुझे स्टडी करते देखकर वह दिलकश अंदाज में मुस्कराई और बोली, ‘‘आप मेरा इंतजार कर रहे थे क्या?’’
मैं उसके लहजे और उसकी आवाज की अपनायत और कोमलता में डूब गया।
मैंने हां में सिर हिलाया। नूरीन ने अपने दोनों हाथ अपनी कमर पर जमाए। सिर को हल्की-सी जुम्बिश देकर आगे की तरपफ झुकाया, ‘‘तो जनाब, आप मेरा इंतजार क्यों कर रहे थे?’’
‘‘हां...,’’ मैंने उसे अपने अंदरूनी जज्बात से आगाह किया। वह हंसी और पिफर उसने अपना सपफेद गाउफन उतार पफेंका और हवा में तैरती हुई मेरे पास आ गई। मैं उठा और उसे अपनी बांहों में भरकर समेट लिया।
पिफर मैं उसे बिस्तर पर ले आया। कुछ लम्हे मैं उसे यूं ही देखता रहा। पिफर कई दिन से भूखे की तरह उस पर टूट पड़ा। यह वह मदहोश लम्हे थे, जब उसने मुझे भरपूर सहयोग दिया था, पिफर सुबह की पहली अंजान के साथ वह गायब हो गई।
मेरे नई हवेली की अजनबी खूबसूरत मेहमान कई रोज तक आती रही। मुझे एक-एक लम्हा कीमती लगने लगा। मैं उसके बारे में कुछ नहीं जान सका था। उससे पहली मुलाकात पर मैंने उससे पूछा था और उसके बाद मैंने कई बार भी पूछताछ की थी, लेकिन वह हर बात टाल गई थी।
पिफर कुछ रोज बाद वह अचानक गायब हो गई। मुझे उसकी शिद्दत से जरूरत महसूस हो रही थी। इसके कई कारण रहे होंगे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण शरीरिक संबंध् थे। उसकी अनुपस्थिति में मेरे लिए वक्त गुजारना मुश्किल हो रहा था। वह इंतहाई शिद्दत से मुझे अंदर से काट रही थी।
और पिफर यह तन्हाई आखिर उस वक्त दूर हुई, जब शहरयार और उसके कारिंदे कई वैगनें सामान से भरकर लाए। पफर्निचर, पेंटिंग्स, कालीन और घर की सजावट और जरूरत की हर चीज। नौजवान अंदरूनी सजावट का काम खुश होकर कर रहा था। उसकी रफ्रतार बहुत तेज थी। वह अपने कारीगरों के साथ हवेली में मसरूपफ हो गया और उन्हें निर्देश देकर अपनी मर्जी के मुताबिक काम करवाने लगा।
जुमेरात तक घर का काम पूरा हो गया। शहरयार ने तमाम कारीगरों का बाकी भुगतान करके उन्हें रुखसत कर दिया।
एक रात वह पिफर आई हांपफती हुई। उसकी आंखें अंदरुनी खुशी के कारण चमक रही थी और एक हफ्रते की अनुपस्थिति के कारण उसमें बहुत जोश पाया जाता था।
‘‘तुम्हारा वह प्यारा दोस्त कहां गया?’’ आते ही नूरीन ने पूछा।
‘‘तुम किसकी बात कर रही हो?’’
‘‘वह नौजवान, भूरी आंखों वाला।’’ अपने होंठों पर जुबान पफेरते हुए उसने कहा।
‘‘उसे जाने दो बेबी. अब मैं जो तुम्हारा हो गया हूं।’’ मैंने मुस्कराते हुए कहा।
‘‘ठीक है।’’ उसकी आंखें सुकड़ी, ‘‘लेकिन वह ध्ीमे मिजाज का है।’’ और तुम हिंसा पसंद हो। तुम्हें सताने में बहुत मजा आता है।’’
‘‘मैं हिंसावादी हूं?’’ मैंने हैरत से पूछा, ‘‘ओह माई गॉड... ऐ लड़की, क्या तुम समझती हो कि अपनी कमर पर नाखूनों के निशान मैंने खुद बनाए हैं?’’
नूरीन कुछ देर खड़ी मुझे घूरती रही, पिफर मेरे करीब आई और मेरी कमीज पीछे से उठाकर अपनी मुहब्बत के निशान तलाशने लगी।
‘‘ओह, वैरी सॉरी...’’ और पिफर उन निशानों को चूम लिया। पिफर उसने जवानी का वह खेल खेला कि मुझे पिछली रातों का मजा आज की लज्जत की तुलना में पफीका मालूम देने लगा।
उस रात जाने से पहले मैंने उसे अपने साथ शहर ले चलने को कहा ताकि वह मेरे नए शो के प्रीमियर में शिरकत कर सके।
अपने सुनहरे घने बालों को एक झटके से पीछे करते हुए उसने कहा, ‘‘ओह सॉरी, यह मुमकिन नहीं है।’’
‘‘आखिर क्यों?’’ मैंने जोर देकर पूछा।
‘‘यह कतई नामुमकिन है।’’ वह जोर से चीखी, ‘‘प्लीज मत जाओ, मैं तन्हा रह जाउफंगी।’’
पिफर वह मेरी बिस्तर पर बैठ गई। मेरी आंखों में झांकते हुए मुझसे पूछा, ‘‘सच-सच बताओ, क्या तुम मुझसे मुहब्बत करते हो। कह दो मुझसे हमेशा मुहब्बत करते रहोगे। प्लीज हसन बताओ।’’
खिड़की के शीशे में से चांदनी अंदर आ रही थी, जिसकी सपफेद रोशनी में उसके गालों पर ढलके आंसू सापफ नजर आ रहे थे। वह बहुत खूबसूरत थी। मैंने अपनी जिंदगी में उससे खूबसूरत लड़की नहीं देखी थी। अचानक मैंने उसके गालों पर ढलके आंसुओं को चूम लिया।
‘‘हकीकत में मैं तुमसे मोहब्बत करता हूं और करता रहूंगा।’’
अचानक वह बिस्तर से उठ खड़ी हुई, ‘‘मैंने तुमसे पहले किसी से इतनी मुहब्बत नहीं की थी हसन। मुझे तुम्हारी मुहब्बत की जरूरत है। तुम्हें मेरा यकीन करना होगा।’’
उसके जाने के बाद दरवाजा खुद बंद हो गया।
‘‘आई लव यू।’’ मैंने आहिस्ता से कहा।
और इस वक्त सबसे महत्वपूर्ण बात यही थी कि मैंने दृढ़ विश्वास के साथ उसकी मुहब्बत स्वीकार और इकरार किया था।