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वो रात अलका दी के जीवन की काल-रात्रि ही तो बन गई थी।
दो दिन बाद से अलका दी आने लगी थीं। मीता अब उनसे और ज्यादा अपनापन महसूस करने लगी थीं।
‘आपके चले आने पर दिव्या को कौन देखता है, अलका दी?’ उस छोटी लड़की के प्रति मीता के मन में बहत प्यार-दुलार हिलोरें लेता था। बड़ी होने पर उसे जिन समस्याओं का सामना करना होगा, क्या वह झेल सकेगी?’
‘शीला उसे बहुत प्यार करती है। उसकी अपनी बेटी दिव्या की ही उम्र की थी, पति ने उसे घर से लिकाल, बेटी अपने पास रख ली। दिव्या को पाकर अपनी बेटी का गम भुलाती है।’
‘हर जगह वही कानी, औरत का शोषण, उसका अपमान क्यों होता है, अलका दी? चाहे वह अनपढ़ गंवार हो या उच्च वर्गीय शिक्षता... उसकी नियति वही क्यों है?’ ये अनवरत शोषण कब तक चलता रहेगा-कब तक?’
‘पता नहीं...।’
‘पता क्यों नहीं है, अगर आप जैसी स्त्री अपनी हार मान लेगी तो औरों से क्या उम्मीद रखंे? दूरदर्शन पर हम शोषण के विरू( नारी-संघर्ष के प्रभावषाली नाटक दिखाते हैं, परिचर्चाए आयोजित करते हैं और असलियत में खुद शोषण के शिकार बन जाते हैं, क्यों, अलका दी क्यों? क्यों नहीं हम आवाज उठा सकते?’
‘कहने और करने में बहुत फ़र्क है, मीता, तू नहीं समझेगी। जितना ही शोर करेगी उतनी ही ज्यादा बदनामी होगी।’
‘वाह ये भी कोई बात हुई? लंदन में यही भारतीय नारी अपने वहशी पति को जिंदा जलाकर खत्म करने के बाद भी सबकी सहानुभूति पा सकती है, यहां उससे न्याय भी नहीं मांग सकती?’
‘तुझमें इतनी आग भरी है, आज ही जान सकी, मीता। इस आग पर कभी पानी के छींटे मत पड़ने देना।’
अलका दी की बात पर मीता संकोच से भर उठी थी। अपने से उम्र में उतनी बड़ी अलका दी को वह लेक्चार देने चली थी। क्या सोचती होंगी अलका दी।
एक सप्ताह बाद अलका दी ने उसे अपनीे घर बुलाया था।
‘कल छुटटी है, सुबह आ जाना। कल का तेरा पूरा दिन मेरे नाम रहेगा, किसी और को अप्वाइंटमेंट मत दे देना, समझी’
‘ऐसी क्या बात है, अलका दी? क्या दिव्या का जन्म दिन है या...।’
वो सब जब आएगी तभी बताऊंगी।’
‘ये क्या, अलका दी, आप तो पहेलियां बुझाा रही हैं।’
‘सच किसी का जन्मदिन नहीं है, तुझसे कुछ जरूरी बातें करनी हैंµबस।’
दूसरे दिन नौ बजे ही मीता अलका के घर पहुंच गई थी। द्वार एक सौम्य पुरूष ने खोला था।
‘आइए, आप मीता हैं न? अलका जी किचेन में हैं, बुलाता हूँ।
मीता को असमंजस में छोड़, वह अन्दर चले गये। अन्दर से उज्ज्वल मुख के साथ अलका दी आ पहुंची।’
‘ठीक समय पर आ पहुंची, मीता, अभी राहुल जी ने चाय की फ़र्माइश की थी तू भी साथ देने आ गई। मीता, ये मि. राहुल चंद्र, मेरे ही शहर में वकील हैं, राहुल जी ये ही वो मीता है जिसकी वजह से आपको बुलाना पड़ा।’
‘तब तो आपका आभारी हूँ, मीता जी, आपकी वजह से अलका ने याद किया वर्ना-।’अपना वाक्य अधूरा छोड़ कर भी जैसे वह बहुत कुछ कह गये थे।
मीता को याद आया अलका दी ने उसे बताया था नवीन्द्र नाथ के साथ हुए हादसे के बाद किसी युवक वकील ने उनके प्रति सहानुभूति जतानी चाही थी, पर अलका दी उसकी सहानुभूति स्वीकार न कर सकी थीं।
‘आपके बारे में पहले सुन चुकी हूँ, आज परिचय का सौभाग्य मिला है।’
‘रियली, क्या बताया गया था मेरे बारे में? यही न कि मैं एक ख़ुदगर्ज मौका-परस्त इन्सान हूँ।’
‘छिः ऐसा मैंने कब कहा-मैंने तो-मीता तू ही बता इनकी बात क्या सच है?’
‘अगर इनकी बात सच होती तो क्या आज ये यहां आते, अलका दी?’
‘वाह, वकील तो मैं हूँ और ज़िरह आप कर रही हैं। अभी भी समय है कानून की पढ़ाई पूरी कर डालिए, बहुता यश पाएंगी।’ राहुल जोर से हंस पड़े थे।
‘अम्मा भी यही कहतीं थीं... बहस में मेरा कोई सानी नहीं।’
‘बात पूरी करती मीता ने जीभ दांतो तले दबा ली थी। आत्मप्रंशसा इसे ही तो कहते हैं।’
‘यह लड़की देखने में जिनी भीरू-सीधी दिखती है, वैसी बिल्कुल नहीं है। इसके अन्दर न जाने कितना बड़ा ज्वालामुखी सोया पड़ा है, राहुल।’
अपनी प्रशंसा सुन, मीता संकोच से भर उठी थीµ
‘अब मीता-पुराण छोड़, काम की बात कीजिए, अलका दी। बताइए न क्यों बुलाया है मुझे।’
‘उस दिन तेरी बातों ने मेरे मन में आग लगा दी थी, मीता। सोचकर लगा तू ठीक कहती है। दूसरों को उपदेश दे देना आसान बात है, पर अपने उउपर उसे चरितार्थ करना कितना कठिन है। राहुल जी को सारी बातें लिख भेजी और मेरा सौभाग्य, यह यहां आए हैं।’
‘सौभाग्य..., मेरा है अलका। आपके काम आ सकूंµइससे अच्छी और क्या बात होगी?’ राहुल जी का स्वर भावुक हो उठा था।
‘नवीन्द्र नाथ के खिलाफ में कोर्ट में जा रही हूँ, मीता। दिव्या को उन्हें अपनी बेटी स्वीकार करना ही होगा।’
‘यह हुई न बात। सच अलका दी, आप जरूर जीतेंगी।’
‘जीत या हार, परिणाम क्या होगा नहीं जानती, पर न्याय के लिए आवाज़ ज़रूर उठाउंगी।’
‘जिस काम के लिए आपके अन्तःकरण की स्वीकृति हो, उसे करने में परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए, अलका जी। मैं आपके साथ इसीलिए हूँ क्योंकि मेरा अन्तःकरण जानता है आपके साथ अन्याय हुआ है।’
राहुल चंद्र के तेजस्वी मुंह को मीता, विस्मय-विमुग्ध निहारती रह गई।
‘आप सचमुच महान हैं, राहुल दा।’
‘राहुल दा, पुकार मुझें इतना ऊंचा उठा दिया मीता, वर्ना मैं अकर्मण्य पुरूष भर हूँµपुरूषोचित दम्भ का प्रतीकµ
‘नहीं-नहीं, आप दूसरों से बहुत अलग हैं, राहुल दा। अब बताइए, हमें क्या करना है?’
‘नवीन्द्र नाथ के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर रहा हूँ। आज के युग में इतने परीक्षण संभव हैं कि न चाहते हुए भी दिव्या को उन्हें अपनी पुत्री स्वीकार करना ही पड़ेगा।’
‘अगर उसके बाद उन्होने अलका दी से दिव्या को छीनना चाहा तब?’
‘जिस व्यक्ति ने अपनी पुत्री का अस्तित्व ही नकार दिया, वह उसकी मांग किस आधार पर करेगा? उसके लिए तुम्हें चिन्तित नहीं होना है, अलका, वो मेरा दायित्व रहा।’
‘सच, जिस दिन वह दिव्या को अपनी बेटी स्वीकार लें उस दिन इस लड़की पर लगा कलंक कट जाए।’ अलका दी का स्वर रूआंसा हो आया था।’
‘समझ में नहीं आता स्त्रियंा किस दिशा में सोचती हैं। किसी नीच आदमी का नाम जबरन दिव्या पर थोप, उसका कलंक मिटाने की तो कल्पना भी हास्यास्पद है।’
‘बिना पिता के नाम के वह हमेशा नाजायज़ औलाद बनी रहेगी, राहुलदा।’
‘कोई और व्यक्ति भी तो उसे पिता का नाम दे सकता है...।’
‘ऐसे व्यक्ति तो बस कहानियों में मिलते हैं, राहुल दा।’
‘कहानियों में भी तो इसी जीवन के पात्र जीते हैं, मीता।’
‘आप खोज कर ला सकते हैं एक ऐसा व्यक्ति जो दिव्या को अपनी नाम दे सकें? मीता की बड़ी-बड़ी आंखे राहुल के मुख पर निब( थीं।’
‘इस बात का उत्तर अलका जी से लेना, मीता।’ राहुल गम्भीर हो उठे थे।
उन बातों को अब दोहराने से क्या फ़ायदा...।’ अलका असहज हो उठी थी।
‘अलका दी, आपने जीवन का इतना बड़ा सत्य मुझसे क्यों छिपाया? काश् उस समय आपने विश्वास किया होता...।’
‘ये तो आज भी मुझ पर विश्वास नहीं रखतीं, मीता, वर्ना मेरा प्रस्ताव यूं उपेक्षित न पड़ा रहता...।’
‘क्या मतलब, आपने अभी तक विवाह नहीं किया है, राहुल दा?’
‘विवाह किया था मीता, पर पत्नी मुझे झेल नहीं सकी। विवाह के पहले के अपने संबंध वह तोड़ न सकी। अन्ततः मुझे ही छोड़ना पड़ा।’
‘ये क्या कह रहे हैं, मैंने तो सुना था आपका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी है।’ अलका विस्मित थी।’
‘ठीक ही सुना था, शैली को पाकर मैं फूला न समाया था, पर उसने स्पष्ट कह दिया अपना तन-मन वह किसी और को दे चुकी थी...।’
‘बस इसी अपराध के लिए आपने उसका परित्याग कर दिया? कथनी और करनी में बहुत अन्तर होता है, राहुल जी, इसी बल पर आपने मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा था? मैं भी तो विवाह के पहले किसी की भोग्या थी... सब जानते थे?’ अलका का गोरा चेहरा उत्तेजना से लाल हो उठा।
‘हां सब जानते-समझते मैने तुम्हें अपनाना चाहा थाµपूरे मन से। मैं जानता हूँ अगर किसी को सच्चे मन से चाहा जाए तो उससे अलग होना कितना कठिन होता है।, इसीलिए मैंने स्वयं शैली का विवाह उसके पे्रमी राजेश से कराना, अपना दायित्व माना। दोनों बहुत सुखी हैं। मेरे मन ने स्वीकार किया, पिता की जिद का दंड शैली क्यों भोगे, बस स्वयं ही सारी व्यवस्था कर दी।’
‘क्या...? आपने अपनी पत्नी किसी और को सौंप दी, राहुल दा? आपके पुरूष के अहं को चोट नहीं लगी?’
‘नहीं, दोनों को अलग कर पाप का भागी बनने की अपेक्षा दोनों को मिलाकर ज्यादा सुखी हूँ।’
‘ओह राहुल, मुझे क्षमा करो, मैं न जाने क्या कुछ नहीं कह गई तुम इतने महान हो, मैं सोच भी नहीं सकती थी।’ अलका का स्वर भावविह्वल था।
‘राहुल दा, क्या आज भी आप अलका दी को स्वीकार करने का साहस रखते हैं?’
‘दिव्या के साथ अलका को स्वीकार करने को मैं आज भी प्रस्तुत हूँ। प्रस्ताव में मेरा ही स्वार्थ हैµबेटी के साथ एक सुन्दर पत्नी-मित्र भी लूंगा। शायद अलका नहीं जानती इनके कालेज के दिनों से मैं इनका दीवाना हुआ करता था।’
‘छिः इस उम्र में ऐसी बातें करना क्या शोभा देता है?’
‘उम्र की बात कर रही हो तो ज़राष्शीशे में अपना चेहरा देख लीजिए, लाल बहूटी बन गई हैं, आप।’
राहुल और मीता जोर से हंस पडे़ और अलका ने शर्माकर हथेलियों में मुंह छिपा लिया।
‘चलिए अलका दी, इसी बात पर आज स्पेशल लंच हो जाए। राहुल दा, से बाद में ढेर सी मिठाई भी खानी है।’
‘यानी अलका जी के कोर्ट में मेरी अर्जी मंजूर हो गई ?’
नाटकीय मुद्रा में रहुल ने बात कही थी।
‘जी हां, मैं मीता, आज के कोर्ट की जज, श्री राहुल चंद्र के पक्ष में अपना फैसला देती हूँ और जुर्माने के रूप में अलका जी को बिना देर किए आजीवन श्री राहुल चंद्र की कैद में रहने की सज़ा दी जाती है। दि कोर्ट इस एडजन्र्ड फ़ाॅर टुडे।’
‘वाह ये इकतफ़ा निर्णय लेने का अधिकार किसने दिया, मीता?’
‘अरे भई जज हूँ, न्याय-अन्याय का इकतरफा निर्णय और कौन देगा?’
‘काश अलका पहले ही तुम्हारे सामने अपना दिल खोल देती तो फैसले में इतनी देर तो न होती।’
दो दिन बाद से अलका दी आने लगी थीं। मीता अब उनसे और ज्यादा अपनापन महसूस करने लगी थीं।
‘आपके चले आने पर दिव्या को कौन देखता है, अलका दी?’ उस छोटी लड़की के प्रति मीता के मन में बहत प्यार-दुलार हिलोरें लेता था। बड़ी होने पर उसे जिन समस्याओं का सामना करना होगा, क्या वह झेल सकेगी?’
‘शीला उसे बहुत प्यार करती है। उसकी अपनी बेटी दिव्या की ही उम्र की थी, पति ने उसे घर से लिकाल, बेटी अपने पास रख ली। दिव्या को पाकर अपनी बेटी का गम भुलाती है।’
‘हर जगह वही कानी, औरत का शोषण, उसका अपमान क्यों होता है, अलका दी? चाहे वह अनपढ़ गंवार हो या उच्च वर्गीय शिक्षता... उसकी नियति वही क्यों है?’ ये अनवरत शोषण कब तक चलता रहेगा-कब तक?’
‘पता नहीं...।’
‘पता क्यों नहीं है, अगर आप जैसी स्त्री अपनी हार मान लेगी तो औरों से क्या उम्मीद रखंे? दूरदर्शन पर हम शोषण के विरू( नारी-संघर्ष के प्रभावषाली नाटक दिखाते हैं, परिचर्चाए आयोजित करते हैं और असलियत में खुद शोषण के शिकार बन जाते हैं, क्यों, अलका दी क्यों? क्यों नहीं हम आवाज उठा सकते?’
‘कहने और करने में बहुत फ़र्क है, मीता, तू नहीं समझेगी। जितना ही शोर करेगी उतनी ही ज्यादा बदनामी होगी।’
‘वाह ये भी कोई बात हुई? लंदन में यही भारतीय नारी अपने वहशी पति को जिंदा जलाकर खत्म करने के बाद भी सबकी सहानुभूति पा सकती है, यहां उससे न्याय भी नहीं मांग सकती?’
‘तुझमें इतनी आग भरी है, आज ही जान सकी, मीता। इस आग पर कभी पानी के छींटे मत पड़ने देना।’
अलका दी की बात पर मीता संकोच से भर उठी थी। अपने से उम्र में उतनी बड़ी अलका दी को वह लेक्चार देने चली थी। क्या सोचती होंगी अलका दी।
एक सप्ताह बाद अलका दी ने उसे अपनीे घर बुलाया था।
‘कल छुटटी है, सुबह आ जाना। कल का तेरा पूरा दिन मेरे नाम रहेगा, किसी और को अप्वाइंटमेंट मत दे देना, समझी’
‘ऐसी क्या बात है, अलका दी? क्या दिव्या का जन्म दिन है या...।’
वो सब जब आएगी तभी बताऊंगी।’
‘ये क्या, अलका दी, आप तो पहेलियां बुझाा रही हैं।’
‘सच किसी का जन्मदिन नहीं है, तुझसे कुछ जरूरी बातें करनी हैंµबस।’
दूसरे दिन नौ बजे ही मीता अलका के घर पहुंच गई थी। द्वार एक सौम्य पुरूष ने खोला था।
‘आइए, आप मीता हैं न? अलका जी किचेन में हैं, बुलाता हूँ।
मीता को असमंजस में छोड़, वह अन्दर चले गये। अन्दर से उज्ज्वल मुख के साथ अलका दी आ पहुंची।’
‘ठीक समय पर आ पहुंची, मीता, अभी राहुल जी ने चाय की फ़र्माइश की थी तू भी साथ देने आ गई। मीता, ये मि. राहुल चंद्र, मेरे ही शहर में वकील हैं, राहुल जी ये ही वो मीता है जिसकी वजह से आपको बुलाना पड़ा।’
‘तब तो आपका आभारी हूँ, मीता जी, आपकी वजह से अलका ने याद किया वर्ना-।’अपना वाक्य अधूरा छोड़ कर भी जैसे वह बहुत कुछ कह गये थे।
मीता को याद आया अलका दी ने उसे बताया था नवीन्द्र नाथ के साथ हुए हादसे के बाद किसी युवक वकील ने उनके प्रति सहानुभूति जतानी चाही थी, पर अलका दी उसकी सहानुभूति स्वीकार न कर सकी थीं।
‘आपके बारे में पहले सुन चुकी हूँ, आज परिचय का सौभाग्य मिला है।’
‘रियली, क्या बताया गया था मेरे बारे में? यही न कि मैं एक ख़ुदगर्ज मौका-परस्त इन्सान हूँ।’
‘छिः ऐसा मैंने कब कहा-मैंने तो-मीता तू ही बता इनकी बात क्या सच है?’
‘अगर इनकी बात सच होती तो क्या आज ये यहां आते, अलका दी?’
‘वाह, वकील तो मैं हूँ और ज़िरह आप कर रही हैं। अभी भी समय है कानून की पढ़ाई पूरी कर डालिए, बहुता यश पाएंगी।’ राहुल जोर से हंस पड़े थे।
‘अम्मा भी यही कहतीं थीं... बहस में मेरा कोई सानी नहीं।’
‘बात पूरी करती मीता ने जीभ दांतो तले दबा ली थी। आत्मप्रंशसा इसे ही तो कहते हैं।’
‘यह लड़की देखने में जिनी भीरू-सीधी दिखती है, वैसी बिल्कुल नहीं है। इसके अन्दर न जाने कितना बड़ा ज्वालामुखी सोया पड़ा है, राहुल।’
अपनी प्रशंसा सुन, मीता संकोच से भर उठी थीµ
‘अब मीता-पुराण छोड़, काम की बात कीजिए, अलका दी। बताइए न क्यों बुलाया है मुझे।’
‘उस दिन तेरी बातों ने मेरे मन में आग लगा दी थी, मीता। सोचकर लगा तू ठीक कहती है। दूसरों को उपदेश दे देना आसान बात है, पर अपने उउपर उसे चरितार्थ करना कितना कठिन है। राहुल जी को सारी बातें लिख भेजी और मेरा सौभाग्य, यह यहां आए हैं।’
‘सौभाग्य..., मेरा है अलका। आपके काम आ सकूंµइससे अच्छी और क्या बात होगी?’ राहुल जी का स्वर भावुक हो उठा था।
‘नवीन्द्र नाथ के खिलाफ में कोर्ट में जा रही हूँ, मीता। दिव्या को उन्हें अपनी बेटी स्वीकार करना ही होगा।’
‘यह हुई न बात। सच अलका दी, आप जरूर जीतेंगी।’
‘जीत या हार, परिणाम क्या होगा नहीं जानती, पर न्याय के लिए आवाज़ ज़रूर उठाउंगी।’
‘जिस काम के लिए आपके अन्तःकरण की स्वीकृति हो, उसे करने में परिणाम की चिंता नहीं करनी चाहिए, अलका जी। मैं आपके साथ इसीलिए हूँ क्योंकि मेरा अन्तःकरण जानता है आपके साथ अन्याय हुआ है।’
राहुल चंद्र के तेजस्वी मुंह को मीता, विस्मय-विमुग्ध निहारती रह गई।
‘आप सचमुच महान हैं, राहुल दा।’
‘राहुल दा, पुकार मुझें इतना ऊंचा उठा दिया मीता, वर्ना मैं अकर्मण्य पुरूष भर हूँµपुरूषोचित दम्भ का प्रतीकµ
‘नहीं-नहीं, आप दूसरों से बहुत अलग हैं, राहुल दा। अब बताइए, हमें क्या करना है?’
‘नवीन्द्र नाथ के खिलाफ़ मुकदमा दायर कर रहा हूँ। आज के युग में इतने परीक्षण संभव हैं कि न चाहते हुए भी दिव्या को उन्हें अपनी पुत्री स्वीकार करना ही पड़ेगा।’
‘अगर उसके बाद उन्होने अलका दी से दिव्या को छीनना चाहा तब?’
‘जिस व्यक्ति ने अपनी पुत्री का अस्तित्व ही नकार दिया, वह उसकी मांग किस आधार पर करेगा? उसके लिए तुम्हें चिन्तित नहीं होना है, अलका, वो मेरा दायित्व रहा।’
‘सच, जिस दिन वह दिव्या को अपनी बेटी स्वीकार लें उस दिन इस लड़की पर लगा कलंक कट जाए।’ अलका दी का स्वर रूआंसा हो आया था।’
‘समझ में नहीं आता स्त्रियंा किस दिशा में सोचती हैं। किसी नीच आदमी का नाम जबरन दिव्या पर थोप, उसका कलंक मिटाने की तो कल्पना भी हास्यास्पद है।’
‘बिना पिता के नाम के वह हमेशा नाजायज़ औलाद बनी रहेगी, राहुलदा।’
‘कोई और व्यक्ति भी तो उसे पिता का नाम दे सकता है...।’
‘ऐसे व्यक्ति तो बस कहानियों में मिलते हैं, राहुल दा।’
‘कहानियों में भी तो इसी जीवन के पात्र जीते हैं, मीता।’
‘आप खोज कर ला सकते हैं एक ऐसा व्यक्ति जो दिव्या को अपनी नाम दे सकें? मीता की बड़ी-बड़ी आंखे राहुल के मुख पर निब( थीं।’
‘इस बात का उत्तर अलका जी से लेना, मीता।’ राहुल गम्भीर हो उठे थे।
उन बातों को अब दोहराने से क्या फ़ायदा...।’ अलका असहज हो उठी थी।
‘अलका दी, आपने जीवन का इतना बड़ा सत्य मुझसे क्यों छिपाया? काश् उस समय आपने विश्वास किया होता...।’
‘ये तो आज भी मुझ पर विश्वास नहीं रखतीं, मीता, वर्ना मेरा प्रस्ताव यूं उपेक्षित न पड़ा रहता...।’
‘क्या मतलब, आपने अभी तक विवाह नहीं किया है, राहुल दा?’
‘विवाह किया था मीता, पर पत्नी मुझे झेल नहीं सकी। विवाह के पहले के अपने संबंध वह तोड़ न सकी। अन्ततः मुझे ही छोड़ना पड़ा।’
‘ये क्या कह रहे हैं, मैंने तो सुना था आपका वैवाहिक जीवन बहुत सुखी है।’ अलका विस्मित थी।’
‘ठीक ही सुना था, शैली को पाकर मैं फूला न समाया था, पर उसने स्पष्ट कह दिया अपना तन-मन वह किसी और को दे चुकी थी...।’
‘बस इसी अपराध के लिए आपने उसका परित्याग कर दिया? कथनी और करनी में बहुत अन्तर होता है, राहुल जी, इसी बल पर आपने मुझसे विवाह का प्रस्ताव रखा था? मैं भी तो विवाह के पहले किसी की भोग्या थी... सब जानते थे?’ अलका का गोरा चेहरा उत्तेजना से लाल हो उठा।
‘हां सब जानते-समझते मैने तुम्हें अपनाना चाहा थाµपूरे मन से। मैं जानता हूँ अगर किसी को सच्चे मन से चाहा जाए तो उससे अलग होना कितना कठिन होता है।, इसीलिए मैंने स्वयं शैली का विवाह उसके पे्रमी राजेश से कराना, अपना दायित्व माना। दोनों बहुत सुखी हैं। मेरे मन ने स्वीकार किया, पिता की जिद का दंड शैली क्यों भोगे, बस स्वयं ही सारी व्यवस्था कर दी।’
‘क्या...? आपने अपनी पत्नी किसी और को सौंप दी, राहुल दा? आपके पुरूष के अहं को चोट नहीं लगी?’
‘नहीं, दोनों को अलग कर पाप का भागी बनने की अपेक्षा दोनों को मिलाकर ज्यादा सुखी हूँ।’
‘ओह राहुल, मुझे क्षमा करो, मैं न जाने क्या कुछ नहीं कह गई तुम इतने महान हो, मैं सोच भी नहीं सकती थी।’ अलका का स्वर भावविह्वल था।
‘राहुल दा, क्या आज भी आप अलका दी को स्वीकार करने का साहस रखते हैं?’
‘दिव्या के साथ अलका को स्वीकार करने को मैं आज भी प्रस्तुत हूँ। प्रस्ताव में मेरा ही स्वार्थ हैµबेटी के साथ एक सुन्दर पत्नी-मित्र भी लूंगा। शायद अलका नहीं जानती इनके कालेज के दिनों से मैं इनका दीवाना हुआ करता था।’
‘छिः इस उम्र में ऐसी बातें करना क्या शोभा देता है?’
‘उम्र की बात कर रही हो तो ज़राष्शीशे में अपना चेहरा देख लीजिए, लाल बहूटी बन गई हैं, आप।’
राहुल और मीता जोर से हंस पडे़ और अलका ने शर्माकर हथेलियों में मुंह छिपा लिया।
‘चलिए अलका दी, इसी बात पर आज स्पेशल लंच हो जाए। राहुल दा, से बाद में ढेर सी मिठाई भी खानी है।’
‘यानी अलका जी के कोर्ट में मेरी अर्जी मंजूर हो गई ?’
नाटकीय मुद्रा में रहुल ने बात कही थी।
‘जी हां, मैं मीता, आज के कोर्ट की जज, श्री राहुल चंद्र के पक्ष में अपना फैसला देती हूँ और जुर्माने के रूप में अलका जी को बिना देर किए आजीवन श्री राहुल चंद्र की कैद में रहने की सज़ा दी जाती है। दि कोर्ट इस एडजन्र्ड फ़ाॅर टुडे।’
‘वाह ये इकतफ़ा निर्णय लेने का अधिकार किसने दिया, मीता?’
‘अरे भई जज हूँ, न्याय-अन्याय का इकतरफा निर्णय और कौन देगा?’
‘काश अलका पहले ही तुम्हारे सामने अपना दिल खोल देती तो फैसले में इतनी देर तो न होती।’