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हम अपने स्थान पहुंचे, छगन रास्ते में ही उतर गया था किसी के पास जाने के लिए,
"क्या हुआ था?" शर्मा जी ने पूछा,
"जो कुछ हुआ, मुझे अभी तक विश्वास नहीं" मैंने कहा,
"मतलब?" उन्होंने उत्सुकता से पूछा,
"पद्मा जोगन ने जलसमाधि ली थी" मैंने कहा,
"कहाँ?'' उन्होंने पूछा,
"अंजन ताल में" मैंने कहा,
"वहाँ क्यों?" उन्होंने पूछा,
"पता नहीं" मैंने बताया,
"लेकिन समाधि क्यों?" उन्होंने पूछा,
"ये भी नहीं पता" मैंने कहा,
"ओह" वो बोले,
मैं चुप रहा,
"ये अंजन ताल कहाँ है?" उन्होंने पूछा,
"वहीँ, एक सामान्य सा ताल है" मैंने कहा,
"अच्छा" वे बोले,
"इसका मतलब कोई अनहोनी नहीं हुई उसके साथ?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
अब कुछ पल दोनों चुप,
"अब?" वे बोले,
"अब इन सवालों के उत्तर जानने हैं" मैंने कहा,
"कौन देगा उत्तर?" उन्होंने पूछा,
"स्व्यं पद्मा जोगन" मैंने कहा,
"ओह! उठाओगे उसे?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
"कब?'' उन्होंने पूछा,
"आज रात" मैंने कहा,
"अच्छा" वे बोले,
"लेकिन पद्मा जोगन की कोई वस्तु आवश्यक नहीं?" पूछा उन्होंने,
"हाई, हम चलते हैं अभी" मैंने कहा,
"ठीक है" वे बोले,
और फिर हम निकल ही लिए पद्मा जोगन के स्थान के लिए, अब इस रहस्य से पर्दा उठना ज़रूरी था, मेरे अंदर उत्सुकता छलांग मारे जा रही थी!
करीब एक घंटे में हम पद्मा जोगन के स्थान पर पहुँच गए, संचालक से मिले, उसने हमारी मदद करने का ना केवल आश्वासन ही दिया बल्कि मदद भी की, उसने हमको पद्मा जोगन के कक्ष की चाबी दे दी, कक्ष अभी तक बंद था, हमने कक्ष खोला और मैं पिछली मुलाक़ात में पहुँच गया, सुन्दर औरत थी वो, सीधी-सादी, व्यवहार-कुशल, अपने में ही सिमटे रहने वाली थी वो जोगन! मुझे वो अच्छी लगती थी अपनी सादगी से, अपने मित्रवत व्यवहार से, भोज-कला से, खाना बहुत लज़ीज़ बनाती थी! बहुत अच्छी तरह से परोस कर खिलाती थी, मेरे ह्रदय में उसके प्रति सम्मान था, जैसे कि एक बड़ी बहन के प्रति होता है!
अंदर उसके वस्त्र टंगे थे, सफ़ेद और पीले वस्त्र! कुछ बैग से और कुछ कुर्सियां और मूढ़े! मैंने एक जगह से एक अंगोछा ले लिया, ये उसका ही था, अक्सर अपने पास रखती थी, गुलाबी रंग का अंगोछा, संचालक को कोई आपत्ति नहीं हुई! हमने धन्यवाद किया और वहाँ से वापिस हुए!
अपने स्थान पहुंचे,
"क्या हुआ था?" शर्मा जी ने पूछा,
"जो कुछ हुआ, मुझे अभी तक विश्वास नहीं" मैंने कहा,
"मतलब?" उन्होंने उत्सुकता से पूछा,
"पद्मा जोगन ने जलसमाधि ली थी" मैंने कहा,
"कहाँ?'' उन्होंने पूछा,
"अंजन ताल में" मैंने कहा,
"वहाँ क्यों?" उन्होंने पूछा,
"पता नहीं" मैंने बताया,
"लेकिन समाधि क्यों?" उन्होंने पूछा,
"ये भी नहीं पता" मैंने कहा,
"ओह" वो बोले,
मैं चुप रहा,
"ये अंजन ताल कहाँ है?" उन्होंने पूछा,
"वहीँ, एक सामान्य सा ताल है" मैंने कहा,
"अच्छा" वे बोले,
"इसका मतलब कोई अनहोनी नहीं हुई उसके साथ?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
अब कुछ पल दोनों चुप,
"अब?" वे बोले,
"अब इन सवालों के उत्तर जानने हैं" मैंने कहा,
"कौन देगा उत्तर?" उन्होंने पूछा,
"स्व्यं पद्मा जोगन" मैंने कहा,
"ओह! उठाओगे उसे?" उन्होंने पूछा,
"हाँ" मैंने कहा,
"कब?'' उन्होंने पूछा,
"आज रात" मैंने कहा,
"अच्छा" वे बोले,
"लेकिन पद्मा जोगन की कोई वस्तु आवश्यक नहीं?" पूछा उन्होंने,
"हाई, हम चलते हैं अभी" मैंने कहा,
"ठीक है" वे बोले,
और फिर हम निकल ही लिए पद्मा जोगन के स्थान के लिए, अब इस रहस्य से पर्दा उठना ज़रूरी था, मेरे अंदर उत्सुकता छलांग मारे जा रही थी!
करीब एक घंटे में हम पद्मा जोगन के स्थान पर पहुँच गए, संचालक से मिले, उसने हमारी मदद करने का ना केवल आश्वासन ही दिया बल्कि मदद भी की, उसने हमको पद्मा जोगन के कक्ष की चाबी दे दी, कक्ष अभी तक बंद था, हमने कक्ष खोला और मैं पिछली मुलाक़ात में पहुँच गया, सुन्दर औरत थी वो, सीधी-सादी, व्यवहार-कुशल, अपने में ही सिमटे रहने वाली थी वो जोगन! मुझे वो अच्छी लगती थी अपनी सादगी से, अपने मित्रवत व्यवहार से, भोज-कला से, खाना बहुत लज़ीज़ बनाती थी! बहुत अच्छी तरह से परोस कर खिलाती थी, मेरे ह्रदय में उसके प्रति सम्मान था, जैसे कि एक बड़ी बहन के प्रति होता है!
अंदर उसके वस्त्र टंगे थे, सफ़ेद और पीले वस्त्र! कुछ बैग से और कुछ कुर्सियां और मूढ़े! मैंने एक जगह से एक अंगोछा ले लिया, ये उसका ही था, अक्सर अपने पास रखती थी, गुलाबी रंग का अंगोछा, संचालक को कोई आपत्ति नहीं हुई! हमने धन्यवाद किया और वहाँ से वापिस हुए!
अपने स्थान पहुंचे,