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सियालदाह की एक घटना -वर्ष 2012

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हम अपने स्थान पहुंचे, छगन रास्ते में ही उतर गया था किसी के पास जाने के लिए,

"क्या हुआ था?" शर्मा जी ने पूछा,

"जो कुछ हुआ, मुझे अभी तक विश्वास नहीं" मैंने कहा,

"मतलब?" उन्होंने उत्सुकता से पूछा,

"पद्मा जोगन ने जलसमाधि ली थी" मैंने कहा,

"कहाँ?'' उन्होंने पूछा,

"अंजन ताल में" मैंने कहा,

"वहाँ क्यों?" उन्होंने पूछा,

"पता नहीं" मैंने बताया,

"लेकिन समाधि क्यों?" उन्होंने पूछा,

"ये भी नहीं पता" मैंने कहा,

"ओह" वो बोले,

मैं चुप रहा,

"ये अंजन ताल कहाँ है?" उन्होंने पूछा,

"वहीँ, एक सामान्य सा ताल है" मैंने कहा,

"अच्छा" वे बोले,

"इसका मतलब कोई अनहोनी नहीं हुई उसके साथ?" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

अब कुछ पल दोनों चुप,

"अब?" वे बोले,

"अब इन सवालों के उत्तर जानने हैं" मैंने कहा,

"कौन देगा उत्तर?" उन्होंने पूछा,

"स्व्यं पद्मा जोगन" मैंने कहा,

"ओह! उठाओगे उसे?" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"कब?'' उन्होंने पूछा,

"आज रात" मैंने कहा,

"अच्छा" वे बोले,

"लेकिन पद्मा जोगन की कोई वस्तु आवश्यक नहीं?" पूछा उन्होंने,

"हाई, हम चलते हैं अभी" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले,

और फिर हम निकल ही लिए पद्मा जोगन के स्थान के लिए, अब इस रहस्य से पर्दा उठना ज़रूरी था, मेरे अंदर उत्सुकता छलांग मारे जा रही थी!

करीब एक घंटे में हम पद्मा जोगन के स्थान पर पहुँच गए, संचालक से मिले, उसने हमारी मदद करने का ना केवल आश्वासन ही दिया बल्कि मदद भी की, उसने हमको पद्मा जोगन के कक्ष की चाबी दे दी, कक्ष अभी तक बंद था, हमने कक्ष खोला और मैं पिछली मुलाक़ात में पहुँच गया, सुन्दर औरत थी वो, सीधी-सादी, व्यवहार-कुशल, अपने में ही सिमटे रहने वाली थी वो जोगन! मुझे वो अच्छी लगती थी अपनी सादगी से, अपने मित्रवत व्यवहार से, भोज-कला से, खाना बहुत लज़ीज़ बनाती थी! बहुत अच्छी तरह से परोस कर खिलाती थी, मेरे ह्रदय में उसके प्रति सम्मान था, जैसे कि एक बड़ी बहन के प्रति होता है!

अंदर उसके वस्त्र टंगे थे, सफ़ेद और पीले वस्त्र! कुछ बैग से और कुछ कुर्सियां और मूढ़े! मैंने एक जगह से एक अंगोछा ले लिया, ये उसका ही था, अक्सर अपने पास रखती थी, गुलाबी रंग का अंगोछा, संचालक को कोई आपत्ति नहीं हुई! हमने धन्यवाद किया और वहाँ से वापिस हुए!

अपने स्थान पहुंचे,
 
अपने स्थान पहुँच कर मैंने रणनीति बनानी आरम्भ की, क्या किया जाए और कैसे किया जाए, किस प्रकार जांच को आगे बढ़ाया जाए आदि आदि, दरअसल मुझे पद्मा जोगन की रूह को खोजना था, वही बता सकती थी असल कहानी, एक एक कारण का खुलासा हो सकता था उस से, और मेरी उत्सुकता भी शांत हो सकती थी! मैंने उसी शाम अपने एक जानकार हनुमान सिंह से संपर्क किया और शमशान में एक स्थान माँगा, उसने घंटे भर के बाद बात करने को कहा, उम्मीद थी कि स्थान मिल जाएगा, तभी शर्मा जी ने कुछ सवाल पूछे,

"आज पता कर लेंगे आप?" उन्होंने पूछा,

"हाँ, शत प्रतिशत" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले,

"मुझे कारण जानना है" मैंने कहा,

"हाँ, सही कहा आपने" वे बोले,

घंटा बीता, हनुमान सिंह से बात हुई, उस रात्रि कोई स्थान नहीं उपलब्ध था, स्थान अगली रात को ही उपलब्ध हो सकता था, अब अन्य कोई चारा भी नहीं था, इंतज़ार करना ही पड़ता, तो हनुमान सिंह को अगली रात का प्रबंध करने के लिए कह दिया,

मन में कई चिंताएं उमड़-घुमड़ रही थीं, जैसे कोई अकेली मछली सागर का ओरछोर देखने की अभिलाषा में दिन रात, अनवरत तैरे जा रही हो, भूखी प्यासी!

"शर्मा जी, आज प्रबंध कीजिये मदिरा का, आप संचालक से कह के ले आइये, साथ में खाने के लिए भी कह दीजिये, मैं कक्ष में जा रहा हूँ" मैंने कहा,

"जी, अभी कहता हूँ" वे बोले,

अब वो अपनी राह और मैं कक्ष की राह,

मन में बौछार बिखर रही थीं चिंताओं की, धुन्गार फैली थी पूरे मस्तिष्क में! काऱण क्या और कारण क्या, बस इस ने जैसे मेरी जान लेने की ठान राखी थी!

शर्मा जी ले आये सभी सामान, मैंने मदद की उनकी, सामान काफी था और ताज़ा बना हुआ था, मछली की ख़ुश्बू ज़बरदस्त थी! मैंने एक बड़ा सा टुकड़ा उठाया और खा लिया, वाक़ई लाजवाब थी!

"कुछ और लाऊं गुरु जी?" उन्होंने पूछा,

"क्या?" मैंने पूछा,

"फलादि?" उन्होंने पूछा,

"नहीं, रहने दो" मैंने कहा,

"जी" वे बोले.

"गुरु जी एक प्रश्न है दिमाग में" उन्होंने पहला पैग बनाते हुए कहा,

"कहिये" मैंने कहा,

"शाह साहब भिश्ती वाले नहीं बताएँगे ये?" उन्होंने पूछा,

"शाह साहब हाज़िर तो कर सकते हैं पद्मा को, लेकिन बुलवा नहीं सकते उसकी गैर-राजी के" मैंने कहा,

"ओह! मैं समझ गया!" वे चौंक गए!

गैर-राजी, यही बोला था मैंने!

"मैं स्व्यं उसको पकड़वाउंगा और पूछूंगा" मैंने कहा,

"ये ठीक है" वे बोले,

अब हमने मदिरा का सम्मान करते हुए, माथे से लगाते हुए, षोडशोपचार करते हुए अपने अपने गले में नीचे उतार लिया!

"अलख-निरंजन! दुःख हो भंजन" दोनों ने एक साथ कहा!

फिर दूसरा पैग!

"अलख-निरंजन! खप्परवाली महा-खंजन!" दोनों ने एक साथ कहा!

फिर तीसरा पैग!

"अलख निरंजन! नयन लगा मदिरा का अंजन!"दोनों ने एक साथ कहा,

तीन भोग सम्पूर्ण हुए!

"कल आप सफल हो जाओ, फिर देखते हैं क्या करना है" वे बोले,

"हाँ" मैंने गर्दन हिला कर कहा,

"पता चल जाए तो सुकून हो" वे बोले,

"बिलकुल" मैंने कहा,

फिर पैग बनाया गया, मैंने मछली साफ़ कर दी थी, वे उठे और बाहर गए, और ले आये!

हमने फिर से दौर आरम्भ किया!

"पद्मा जोगन के बारे में कोई और जानकारी?" उन्होंने पूछा,

"पद्मा जोगन की एक बहन थी, अब जीवित नहीं है, वो दुर्गापुर में बसी थी, पद्मा सारा सभी कुछ उसको भेज देती थी, मुझे उसका पता नहीं है कि कहाँ है" मैंने कहा,

"ओह! तो आपको कैसे पता कि वो जीवित नहीं?" उन्होंने पूछा,

"स्वयं पद्मा ने ही बताया था, वो बड़ी बहन थी उसकी" मैंने कहा,

"बड़े दुर्भाग्य की बात है"

"हाँ, भाई आदि और कोई नहीं" मैंने बताया
 
उस रात हम काफी देर तक बातचीत करते रहे, या यूँ कहें कि पेंच निकालते और डालते रहे, कई जगह रुके और फिर आगे चले, फिर वापिस मुडे और फिर आगे चले! यही करते रहे, जब मदिरा का मद हावी हुआ तो जस के तस पसर गए बिस्तर पर, हाँ मैं कुछ बड़बड़ाता रहा रात भर, शायद पद्मा जोगन से की हुई कुछ बातें थीं!

और जब सुबह मेरी नींद खुली तो सर भन्ना रहा था! घड़ी देखी तो सुबह के छह बजे थे, सर पकड़ कर मैं चला स्नानालय और स्नान किया, थोड़ी राहत मिली, स्नान से फारिग हुआ तो कमरे में आया, शर्मा जी भी उठ गए थे, नमस्कार हुई, मौन नमस्कार, और वे फिर स्नान करने के लिए स्नानघर चले गए, वे भी स्नान कर आये और अब हम दोनों बैठ गए, तभी सहायक आ गया, चाय लेकर आया था, साथ में फैन थे , करारे फैन, दो शर्मा जी ने खाये और तीन मैंने, चाय का मजा आ गया!

"सर में दर्द है, आपके भी है क्या?" मैंने पूछा,

"हाँ, दर्द तो है" वे बोले,

"अभी चलते हैं बाहर, यहाँ बाहर अर्जुन के पेड़ हैं उसकी छाल चबाते हैं, दर्द ठीक हो जाएगा,

"ठीक है" वे बोले,

अब हम बाहर चले और एक छोटे अर्जुन की पेड़ की छाल निकाली और फिर चबा ली, अब आधे घंटे में दर्द ख़तम हो जाना था!

"आज हनुमान सिंह खुद बात करेगा या उसको फ़ोन करना पड़ेगा?" उन्होंने पूछा,

"स्व्यं बात करेगा वो" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले,

तभी मैंने सामने देखा, एक बिल्ली अपने बच्चों को दूध पिला रही थी, उसकी निगाहें हम पर ही थीं, मैंने हाथ से शर्मा जी को रोका, कार्य-सिद्ध होने का ये शकुन था! अर्थात आज हमारी नैय्या पार लग जाने वाली थी! मांसाहारी पशु यदि दुग्धपान कर रहे हों तो कार्य सिद्ध होता है और यदि शाकाहारी पशु हों तो कार्य सिद्ध नहीं होता! ऐसा यहाँ लिखने से मेरा अभिप्रायः ये नहीं कि अंधविश्वास को मैं बढ़ावा दूँ, परन्तु मैं शकुन-शास्त्र से ही चलता हूँ और ये मेरे अनुभूत हैं, तभी मैंने यहाँ ऐसा लिखा है!

"चलिए वापिस" मैंने कहा,

"जी" वे बोले,

और तभी हनुमान सिंह का फ़ोन आ गया, आज भूमि मिल जानी थी, अतः मैं आज सामग्री इत्यादि खरीद सकता था! ये भी अच्छा समाचार था!

"आज शाम को सामान खरीद लेते हैं" मैंने कहा,

"जी" वे बोले,

अब वापिस आ गए कक्ष में!

मैं आते ही लेट गया, वे भी लेट गए, सहायक आया और अपने साथ किसी को ले आया, ये स्वरूपानंद थे, यहाँ के एक पुजारी, मैं खड़ा हुआ, नमस्कार की, वे बुज़ुर्ग थे,

"जी?" मैंने कहा,

"दिल्ली से आये हैं आप?" उन्होंने पूछा,

"जी" मैंने कहा,

"पद्मा जोगन के लिए आये हैं?" उन्होंने पूछा,

बात हैरान कर देने वाली थी!

"हाँ जी" मैंने कहा,

"मुझे छगन ने बताया" वे बोले,

"अच्छा" मैंने कहा,

"मैं उसका ताऊ हूँ" उसने कहा,

मेरे होश उड़े!

"पद्मा ने कभी नहीं बताया?" मैंने पूछा,

"वो मुझसे बात नहीं करती थी" वे बोले,

"किसलिए?" मैंने पूछा,

"उसके बाप की, यानि मेरे छोटे भाई की भूमि के लेन देन के कारण" वे बोले,

"अच्छा" मैंने कहा,

"बस, यहीं से फटाव हो गया, मेरे लड़के आवारा निकले, सब बेच दिया" वे बोले,

"ओह" मैंने कहा,

"आपको पता चला कुछ??" उन्होंने पूछा,

"कोई सटीक नहीं" मैंने कहा,

"आप पता कीजिये" वे बोले,

"कर रहा हूँ" मैंने कहा,

"एक एहसान करेंगे?" उन्होंने पूछा,

मैं विस्मित!

"कैसा एहसान?" मैंने पूछा,

"मुझे बता दीजियेगा जब आप जान जाएँ" वे बोले,

"ज़रूर" मैंने कहा,

सहायक इस बीच चाय ले आया और हम चाय पीने लगे!
 
चाय समाप्त की और स्वरूपानंद को विदा किया और अब कुछ देर लेटे हम! आराम करने के लिए, सर का दर्द समाप्त हो चुका था, जैसे था ही नहीं!

"गुरु जी?" शर्मा जी बोले,

"हाँ?" मैंने पूछा,

"खबर करेंगे क्या इनको?" उन्होंने पूछा,

"कर देंगे" मैंने आँखें बंद करते हुए कहा,

"केवल उत्सुकता है इनको" वे बोले,

"हाँ, लेकिन खून, खून के लिए भागता है" मैंने कहा,

"ये तो है" वे बोले,

कुछ और इधर-उधर की बातें और फिर झपकी!

आँख खुली तो एक बजा था!

"उठिए" मैंने सोते हुए शर्मा जी को उठाया

"क्या बजा?" उन्होंने अचकचाते हुए पूछा,

"एक बज गया" मैंने कहा,

"बड़ी जल्दी?" वे उठे हुए बोले,

"हाँ!" मैंने हँसते हुए कहा,

वे उठ गए! आँखें मलते हुए!

"चलिए, भोजन किया जाए" मैंने कहा,

"अभी कहता हूँ" वे उठे और बाहर चले गए, फिर थोड़ी देर में आ गए,

"कह दिया?" मैंने पूछा,

"हाँ" वे बोले,

और तभी सहायक आ गया, आलू की सब्जी और गरम गरम पूरियां! साथ में सलाद और दही! मजा आ गया! पेट में भूख बेलगाम हो गयी!

खूब मजे से खाया, और भी मंगवाया! और हुए फारिग! लम्बी लम्बी डकारों ने' स्थान रिक्त नहीं' की मुनादी कर दी!

"आइये" मैंने कहा,

"कहाँ" उन्होंने पूछा,

"स्वरूपानंद के पास" मैंने कहा,

"किसलिए?" उन्होंने उठते हुए पूछा,

"देख तो लें?" मैंने कहा,

"चलिए" वे बोले,

हम बाहर आये, स्वरूपानंद का कक्ष पूछा और चल दिए वहाँ, वो नहीं मिले वहाँ, ढूँढा भी लेकिन नहीं थे, पता चला कहीं गए हैं!

फिर समय गुजरा, दिन ने कर्त्तव्य पूर्ण किया और संध्या ने स्थान लिया, अब हम बाहर चले, सामग्री लेने, बाज़ार पहुंचे, मदिर, सामग्री आदि ले और सवारो गाड़ी पकड़ कर चल दिए हनुमान सिंह के पास!

वहाँ पहुंचे, हनुमान सिंह से बात हुई, गले लग के मिला हमसे, अक्सर दिल्ली आता रहता है, सो मेरे पास ही आता है!

"हो गया प्रबंध?" मैंने पूछा,

"हाँ जी" वो बोला,

"धन्यवाद!" मैंने कहा,

"क्या ज़रुरत!: उसने हंस के कहा,

हम बाहर चल पड़े, अच्छा ख़ासा बड़ा शमशान था, कई चिताएं जल रही थीं वहाँ! दहक रही थी!

"ठीक है" मैंने कहा,

"सामान है?" उसने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"ठीक" उसने कहा और सामान लिया, मैं एक बोतल उसके लिए भी ले आया था!

"ठीक है, आप स्नान कीजिये" उसने कहा,

"ठीक है" मैंने कहा,

"आप, शर्मा जी, वहाँ कक्ष में रहना" मैंने कक्ष दिखाया,

"जी" वे बोले,

अब मैं स्नान करने चला गया!

वापिस आया तो सारा सामान उठाया, हनुमान सिंह ने मुझे एक चिता दिखायी, ये एक जवान चिता थी, जवाब देह की चिता!

"ठीक है" मैंने कहा,

अब मैंने अपना बैग खोला और आवश्यक सामान निकाला, और भस्म आदि सामने रख ली!

अब!

अब मैंने भस्म स्नान किया!

तंत्राभूषण धारण किये!

लंगोट खोल दी!

आसान बिछाया!

और तत्पर हुआ!

क्रिया हेतु!

भस्म-स्नान किया सबसे पहले!
 
केश बांधे!

रक्त से टीका लगाया माथे पर!

माथे पर अंगूठे से, काजल ले, टीका लगाया!

अपना त्रिशूल निकाला और बाएं गाड़ा आसान के!

चिमटा लिया और दायें रखा!

गुरु-वंदना की!

अघोर-पुरुष से सफलता व उद्देश्य पॄति केतु कामना की!

शक्ति को नमन किया!

दिक्पालों की वंदना की!

प्रथम आसान भूमि को चूमा!

पिता रुपी आकाश को नमन किया!

आठों कोणों को बाँधा!

और!

फिर, उस चिता के पाँव पर जाकर नमन किया!

उसके सर पर शीश नवाया!

तीन परिक्रमा की!

और, अपने आसान पर विराजमान हो गया! चिमटा खड़का कर समस्त भूत-प्रेतों को अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी! फिर दो थाल निकाले, उनमे मांस सजाया, कुछ फूल आदि भी, काली छिद्रित कौड़ियां सजायीं! कपाल निकाला, उसकी खोपड़ी पर एक दिया जलाया! और कपाल-कटोरा निकाला! उसमे मदिरा परोसी और अघोर-पुरुष को समर्पित कर कंठ से नीचे उतार लिया!

महानाद किया!

सर्वदिशा अटटहास किया!

और फिर मैंने पद्मा का आह्वान किया! उसके आत्मा का आह्वान! मंत्र पढ़े, मंत्र तीक्ष्ण हुए, और तीक्ष्ण, महातीक्ष्ण, रज शक्ति के अमोघ मंत्र!

परन्तु?

एक पत्ता भी न खड़का!

ऐसा क्यों?

क्यों ऐसा?"

उफ्फ्फ्फ़! नहीं! ये नहीं हो सकता! कदापि नहीं हो सकता! नहीं औघड़! ये तू क्या सोच रहा है? अनाप शनाप? नहीं ऐसा हरगिज़ नहीं सोचना! नहीं तो तेरा त्रिशूल तेरे हलक से होत्ता हुआ गुद्दी से बाहर!

लेकिन!

सोचूं कैसे ना ओ औंधी खोपड़ी???

कहाँ है पद्मा??

पद्मा की आत्मा??

है तो ला?

ला मेरे सामने?

खींच के क्यों नहीं लाता?"

मुक्त तो नहीं हुई होगी!

हा! हा! हा! हा!

मुक्त कैसे??' भला कैसे ओ औंधी खोपड़ी??

कैसे??

जवाब दे??

तू?? तू जवाब तो दे ना!

कहाँ है?? कहाँ है????

मुझे बताने चला था!

हाँ!

मदिरा! मदिरा! प्यास! प्यास!

कंठ जल रहा है!

मदिरा!

मदिरा!

फिर से कपाल-कटोरा भरा और कंठ से नीचे!

हाँ!

अब ठंडा हुआ कंठ!

सुन ओ औंधी खोपड़ी?

कहाँ है पद्मा की रूह??

ला उसको सामने??

हा! हा! हा! हा! हा! हा!

मैंने सही था! ये औघड़ सही था!

वो हो गयी क़ैद!

किसी ने कर लिया उसको क़ैद!

सुन बे औंधी खोपड़ी!

क़ैद हो गयी वो!

जाने कहाँ!

जाने किसने?

है ना??

लेकिन!

पता चल जाएगा!

चल जाएगा पता!

अभी! अभी!

मैंने त्रिशूल लिया और लहराया!

ये भाषा है शमशान की मित्रगण! मसान से वार्तालाप!
 
वो क़ैद थी! लेकिन कहाँ? किसके पास? अब सिपाही रवाना करना था, एक बात तो तय थी, जिसने क़ैद किया था वो भी खिलाड़ी थी, अब यहाँ दो वजह थीं, या तो किसी ने केवल रूह को पकड़ा था, या कुछ कुबुलवाने के लिए, जैसे कि वो सिक्का कहाँ है! इन्ही प्रश्नों का उत्तर खंगालना था! और यही देखते हुए मुझे ये तय करना था कि किसे तलाश में भेजा जाए, जो उसका पता भी निकाल ले और खुद को क़ैद का भय भी न हो! ये काम कोई महाप्रेत या चुडैल नहीं कर सकती थी, इसके लिए मुझे अपना खबीस, तातार खबीस भेजना था, अतः मैंने ये निसहाय किया कि अब तातार ही वहाँ जाएगा, और मैंने तभी तातार का शाही-रुक्का पढ़ा!

हवा पर बैठा हुआ तातार हाज़िर हुआ! उस समय मई चिता से दूर पहुँच गया था, शमशान में कीलित भूमि पर खबीस हाज़िर नहीं होते!

मैंने तातार को उसका उद्देश्य बताया, उसको उसका अंगोछा दिया, उसने गंध ली और अपने कड़े टकराता हुआ मेरा सिपाही हवा में सीढ़ियां चढ़ रवाना हो गया! मई वहीँ बैठ गया!

कुछ समय बीता,

थोड़ा और,

और फिर!

हाज़िर हुआ! जैसे हवा की रानी ने हाथ से रखा हो उसको मेरे सामने!

अब उसने बोलना शुरू किया! मैंने सुना और मेरी त्यौरियां चढ़ती चली गयीं! उसके अनुसार एक औघड़ रिपुष नाथ के पास उसकी आत्मा थी, काले रंग के घड़े में बंद! और वो औघड़ वहाँ से बहुत दूर असम के कोकराझार में था उस समय! और हाँ, रिपुष के पास कोई भी सिक्का नहीं था!

मई खुश हुआ, तातार को मैंने भोग दिया और मैंने उसके हाथ पर हाथ रखते हुए उसको शुक्रिया कहा, तातार मुस्कुराया और झम्म से लोप हुआ!

अब मैं उठा वहाँ से, चिता-नमन किया, गुरु-नमन एवं अघोर-नमन किया और वापिस आ गया! स्नान किया और सामान्य हुआ, सामान आदि बाँध लिया, रख लिया, शत्रु और उसकी क़ैदगाह मुझे पता थी अब!

मैं कक्ष में आया, नशे में झूमता हुआ! और वहीँ लेट गया! शर्मा जी और हनुमान सिंह समझ गए कि क्रिया पूर्ण हो गयी, वे दोनों उठे और कक्ष से बाहर चले गए! वे भी सो गए और मैं भी!

सुबह हुई!

शर्मा जी मेरे पास आये!

"नमस्कार" वे बोले,

"नमस्कार" मैंने उत्तर दिया,

"सफल हुए?" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"पद्मा मिली?" उन्होंने उत्सुकता से पूछा,

"नहीं" मैंने कहा,

वो चौंके!

"नहीं?" उन्होंने पूछा,

"नहीं" मैंने कहा,

"फिर सफल कैसे?" उन्होंने पूछा,

"वो क़ैद है" मैंने अब आँखों में आँखें डाल कर देखा और कहा,

"क़ैद?" अब जैसे फटे वो!

"हाँ!'' मैंने कहा,

"ओह!" उनके मुंह से निकल,

"अब?" वो बोले,

"हमको जाना होगा,

"कब?", उन्होंने पूछा,

"कल ही?" मैंने कहा,

"कहाँ?",उन्होंने पूछा

"असम",मैंने कहा,

अब कुछ पल चुप्पी!

"ठीक है",उन्होंने पूछा

"अब चलते हैं यहाँ से",मैंने कहा,

"जी",उन्होंने पूछा

इतने में हनुमान सिंह भी आ गया, चाय लेकर! हमने चाय पी!

"सही निबटा सब?" उसने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"चलो" उसने कहा,

"अब हम चलते हैं" मैंने कहा,

"जी" वो बोला,

और हम वहाँ से निकल पड़े!

अब मंजिल दूर थी, हाँ एक बात और, रंगा पहलवान, बिलसा और वो दीनानाथ अब सब संदेह के दायरे से मुक्त थे!
 
अगला दिन,

हमे वहाँ से अब गाड़ी पकड़ी असम के लिए, आरक्षण श्रद्धा जी से करवा लिया था, सौभाग्य से हो भी गया, और हम गाड़ी में बैठ गए, हमको करीब ग्यारह घंटे लगने थे,

आराम से पसर गए अपने अपने बर्थ पर!

और साहब!

जब पहुंचे वहा तो शरीर का कोई अंग ऐसा नहीं था जो गालियां न दे रहा हो, कुछ तो मौसम, कुछ लोग ऐसे और कुछ भोजन! हालत खराब!

खैर,

मैं अपने जान-पहचान के एक डेरे पर गया, डबरा बाबा का डेरा! डबरा बाबा को मेरे दादा श्री का शिष्यत्व प्राप्त है! हम वहीं ठहरे! ये डेरा अपनी काम-सुंदरियों के लिए विख्यात है तंत्र-जगत में! स्व्यं डबरा बाबा के पास नौ सर्प अथवा नाग-कन्याएं हैं!

"पहुँच गए आखिर" मैंने कहा,

"हाँ जी" वे बोले,

कक्ष काफी बड़ा था, दो बिस्तर बिछे थे भूमि पर, मैं तो जा पसरा! मुझे पसरे देखा शर्मा जी भी पसर गए!

"आज आराम करते हैं, कल निकलते हैं वहाँ रिपुष के पास" मैंने कहा

"हां" वे बोले,

हम नहाये धोये, भोजन किया और सो गए, शेष कुछ नहीं था करने के लिए!

अगले दिन प्रातः!

मैं बाबा डबरा के पास गया, वे पूजन से उठे ही थे,

"कैसे हैं?" मैंने पूछा,

"ठीक" वे बोले और हमको बिठा लिया उन्होंने, उनकी आयु आज इक्यानवें साल है,

"बाबा, आप किसी रिपुष को जानते हैं?" मैंने पूछा,

"रिपुष?" उन्होंने सर उठा के पूछा,

"हाँ जी" मैंने कहा,

"हाँ" वे बोले,

मुझे अत्यंत हर्ष हुआ!

"कहाँ रहता है?" मैंने पूछा,

"बाबा दम्मो के ठिकाने पर" उन्होंने कहा,

"दम्मो? वही जिसे नौ-लाहिता प्राप्त हैं?" मुझे अचम्भा हुआ सो मैंने पूछा,

"हाँ" वे बोले,

अब काम और हुआ मुश्किल!

"उसका ही शिष्य है ये?" मैंने पूछा,

"हाँ! सबे जवान" वे बोले,

"अर्थात?" मैंने पूछा,

"बाइस वर्ष आयु है उसकी केवल" वे बोले,

"बाइस वर्ष? केवल?" मैंने हैरान हो कर पूछा,

"हाँ" वे बोले,

अब मैं चुप!

"क्या काम है उस से?'' बाबा ने पूछा,

"कुछ खरीद का काम है" मैंने कूटभाषा का प्रयोग किया,

"अच्छा" वे बोले,

"स्वभाव कैसा है?" मैंने पूछा,

"बदतमीज़ है" उन्होंने बता दिया,

"ओह" मेरे मुंह से निकला,

कुछ पल शान्ति!

"संभल के रहना" वे बोले,

"किस से?" मैंने पूछा,

वो चुप!

"किस से बाबा?" मैंने ज़ोर देकर पूछा,

"दम्मो से" वे बोले,

उन्होंने छोटे से अलफ़ाज़ से सबकुछ समझा दिया था!

"ज़रूर" मैंने कहा,

शान्ति, कुछ पल!

"और रिपुष?" मैंने फिर पूछा,

"उसके ऊपर दम्मो का हाथ है" वे बोले,

"समझ गया!" वे बोले,

मैं भी खोया और बाबा भी!

"चले जाओ" वे बोले,

कुछ सोच कर!

"नहीं बाबा" मैंने कहा.

"समझ लो" वे बोले,

"समझ गया!" मैंने कहा,
 
अब हम उठे वहाँ से, बाबा डबरा ने बहुत कुछ बता दिया था, अब मुझे एक घाड़ की आवश्यकता थी, कुछ अत्यंत तीक्ष्ण मंत्र जागृत करने थे! अंशुल-भोग देना था! ये बात मैंने अपने एक जानकार बुल्ला फ़कीर से कही उसने उसी रात को मुझे अपने डेरे पर बुला लिया, मैं जिस समय वहाँ पहुंचा तब रात के सवा नौ बजे थे! बुल्ले फफकीर के पास एक घाड़ था कोई उन्नीस-बीस बरस का, और बारह और औघड़ थे वहाँ, किसी को शीर्षपूजन करना था, किसी को वक्ष और किसी को लिंग पूजन, मुझे उदर पूजन करना था, शक्ति का स्तम्भन करना था, प्राण-रक्षण करना था!

पूजन का समय सवा बार बजे का था, अतः मैं स्नान करने गया, और उसके बाद तांत्रिक-श्रृंगार किया, भस्म-स्नान किया! लिंग-स्थानोपत्ति पूजन किया फिर हगाड़ पूजन आरम्भ हुआ!

मेरा क्रमांक वहाँ ग्यारहवां था अतः मैंने बेसब्री से इंतज़ार किया, षष्ट-मुद्रा में घाड़ जागृत हो गया, और उठकर बैठ गया था!

नशे में चूर!

झूमते हुए, गर्दन हिलाते हुए, आँखें चढ़ी गईं!

और फिर आया मेरा वार!

मैंने घाड़ के उदर का पूजन किया! उसने अपने हाथों से अपने अंडकोष पकडे थे, मैं समझ सकता था कि क्यों!

अब मैंने प्रश्न किये उस से!

"रिपुष का दमन होगा?"

"हाँ" वो बोला,

ओह!

"दम्मो आएगा?" मैंने पूछा,

"हाँ" वो बोला,

ओह!

"क्षति होगी?" मैंने पूछा,

"डबरा वाला जीतेगा" वो बोला!

ओह!

"कुशाल कौन चढ़ेगा?" मैंने पूछा,

"दम्मो" वो बोला,

"मरेगा?" मैंने पूछा,

"नहीं" वो बोला,

"नव-लौहिताएँ?" मैंने पूछा,

"आएँगी" वो बोला,

और फिर धाड़ से उसने अपने गले में रुंधती हुई आवाज़ बाहर निकाली, जैसे कोई कपडा फाड़ा हो!

"भोग लेगा?" मैंने पूछा,

"हाँ" उसने कहा,

मैंने शराब की बोतल दी उसको!

एक बार में ही बोतल ख़तम!

मैंने अपना चाक़ू निकाला और अपना हाथ काट कर उसको चटा दिया! उसने कूटे की तरह से रक्त पी लिया और तीन बार छींका!

मेरा वार समाप्त!

जानकारी पूर्ण हुई!

मैं अब श्रृंगार मुक्त होने चला गया!

मुक्त हुआ!

स्नान किया!

और वापिस शर्मा जी के पास!

"हो गया पूजन?" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"अब चलें" उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

अब हम उठे और एक कक्ष में आ गए!

"कल चलना है दम्मो के पास?'' उन्होंने पूछा,

"हाँ" मैंने कहा,

"ठीक है" वे बोले और लेट गए!

मैं भी लेट गया!

दारु के भभके आ रहे थे!

सर घूम रहा था! अन नींद का समय था!

हम सो गए!

सुबह उठे!

आठ बजे का वक़्त था!

"उठो?" मैंने शर्मा जी की चादर खींच कर कहा,

अलसाते हुए वे भी उठ गए!
 
और फिर अगला दिन!

उस दिन सुबह सुबह चाय-नाश्ता करने के बाद हम बाबा डबरा के पास गए, बताने को कि हम दम्मो बाबा के पास जा रहे हैं सुलह करने, हो सकता है मान ही जाए, तकरार या झगड़ा न हो तो ही बढ़िया!

"अच्छा बाबा, हम चलते हैं" मैंने कहा,

"ठीक है, सावधान रहना" वे बोले,

आशीर्वाद दिया और हम चेल अब बाबा दम्मो और उस जवान औघड़ रिपुष के पास!

करीं दो घंटे में पहुंचे हम बाबा दम्मो के स्थान पर, पहाड़ी पर था, काले ध्वज लगे हुए थे, बीच में किनाठे पर एक मंदिर बना था, शक्ति मंदिर! सफ़ेद, शफ्फाफ़ मंदिर! हमने द्वारपाल से बाबा के बारे में पूछा, उसने एक दिशा के बारे में बता दिया, हम वही चल पड़े, बड़ा था ये डेरा, करीब पांच सौ स्त्री-पुरुष तो रहे होंगे! हम आगे बढे, ये रिहाइश का क्षेत्र था, हमने एक सहायक से पूछा, उसने एक कक्ष की तरफ इशारा कर दिया, हम वहीँ चल पड़े,

कक्ष के कपाट खुले थे, अंदर एक मस्त-मलंग सा औघड़ बैठा था, लुंगी और बनियान पहने, लम्बी जटाएँ और लम्बी दाढ़ी मूंछें! आयु कोई सत्तर बरस रही होगी! हम अंदर गए, वहाँ तीन लोग और थे, हाँ, रिपुष नहीं था वहाँ!

"नमस्कार" मैंने कहा,

"हूँ" उसने कहा,

हमको बिठाया उसने, वे तीन अब चुप!

"कहिए?" उसने पूछा,

"आप ही दम्मो बाबा हैं?" मैंने पूछा,

"हाँ, कहिये?" वो बोला,

"आपसे कुछ बात करनी है" मैंने कहा,

वो समझ गया, उसने उन तीनों को हटा दिया वहाँ से!

"बोलिये, कहाँ से आये हो?" उसने पूछा,

"दिल्ली से" मैंने कहा,

"ओह, हाँ, कहिये?" उसने कहा,

"रिपुष आपका ही शिष्य है?" मैंने पूछा,

"हाँ, तो?" उसने त्यौरियां चढ़ा के पूछा,

"रिपुष के पास एक रहन है हमारी" मैंने कहा,

"कैसी रहन?" उसने पूछा,

"पद्मा जोगन" मैंने कहा,

अब वो चौंका!

"हाँ, तो?" उसने पलटा मारा!

"वही चाहिए" मैंने कहा,

"क्यों?" उसने पूछा,

"है कुछ बात" मैंने कहा,

"क्या?" उसने पूछा,

"उसको मुक्त करना है" मैंने कहा,

"किसलिए?" उसने पूछा,

"मेरी बड़ी बहन समान है वो" मैंने कहा,

"तो?" उसने कहा,

"छोड़ दीजिये उसको" मैंने कहा,

"नहीं तो?" सीधे ही काम की बात पर आया,

"आप बुज़ुर्ग हैं सब समझते हैं" मैंने कहा,

और तभी रिपुष आ गया! बाइस वर्ष में क्या खूब शरीर निकाला था उसने हृष्ट-पुष्ट, काली दाढ़ी मूंछें! और अमाल-झमाल के तंत्राभूषण धारण किये हुए!

उसको बिठाया अपने पास दम्मो ने!

"अपनी रहन मांग रहे हैं ये साहब" उसने उपहास सा उड़ाते हुए कही ये बात!

"कौन सी रहन?" उसने पूछा,

"पद्मा" दम्मो ने कहा,

"क्यों?" उसने मुझ से पूछा,

"मेरी बड़ी बहन समान है वो" मैंने कहा,

वो हंसा!

जी तो किया कि हरामज़ादे के हलक में हाथ डाल के आंतें बाहर खींच दूँ!

"अब काहे की बहा?" उसने मजाक उड़ाया,

'आप छोड़ेंगे या नहीं?" मैंने स्पष्ट सा प्रश्न किया,

"नहीं" उसने हंसी में कहा ऐसा!

"क्यों?" मैंने पूछा,

"सिक्का! सिक्का नहीं मालूम तुझे?" उसने अब अपमान करते हुए कहा,

"सिक्के की एक औघड़ को क्या ज़रुरत?" मैंने कहा,

"हूँ!" उसने थूकते हुए कहा वहीँ!

अब विवाद गर्माया!
 
"इतना अभिमान अच्छा नहीं" मैंने चेताया,

"कैसा भी मान? मैंने पकड़ा है तो मेरा हुआ" उसने कहा,

दम्मो ने उसकी पीठ पर हाथ मारते हुए समर्थन किया!

"तो आप नहीं छोड़ेंगे" मैंने पूछा,

"नहीं" वो बोला,

"सोच लो" मैंने कहा,

"अबे ओ! मेरे स्थान पर मुझे धमकाता है?" उसने गुस्से से कहा,

"मैंने कब धमकाया, मैंने तो समझाया" मैंने कहा,

"नहीं समझना, कहीं तुझे समझाऊं" उसने दम्भ से कहा,

मैं कुछ पल शांत रहा!

"मैं धन्ना शांडिल्य का पोता हूँ" मैंने कहा,

अब कांपा थोडा सा दम्मो! रिपुष तो बालक था, उसे ज्ञात नहीं!

"कौन धन्ना?" रिपुष ने पूछा,

"मै बताता हूँ" बोला दम्मो!

"अलाहबाद का औघड़! कहते हैं, सुना है उसने शक्ति को साक्षात प्रकट किया था और उसने अपने हाथों से खाना बना कर परोसा था, धन्ना की रसोई में!" बोल पड़ा दम्मो!

"ओहो!" रिपुष बोला,

"हाँ" मैंने कहा,

"मैं उसी धन्ना का पोता हूँ" मैंने कहा,

अब सांप सूंघा उनको!

"देखो, मैं आपकी इस रहन को एक वर्ष के बाद छोड़ दूंगा" रिपुष ने कहा,

"नहीं, आज ही" मैंने कहा,

'सम्भव नहीं" उसने कहा,

"सब सम्भव है" मैंने कहा,

"हरगिज़ नहीं" उसने कहा,

"हाँ" मैंने कहा,

अब चुप्पी!

"अब जा यहाँ से" चुटकी मारते हुए बोला रिपुष! मैंने दम्मो को देखा, चेहरे पर संतोष के भाव और होठों पर हंसी!

"जाता हूँ, लेकिन आगाह करना मेरा फ़र्ज़ है" मैंने कहा,

"आगाह?" खड़ा हुआ वो, हम भी खड़े हुए!

"हाँ!" मैंने कहा,

"क्या?" उसने पूछा,

"आज हुई अष्टमी, इस तेरस को द्वन्द होगा! तेरा और मेरा!" मैंने कहा,

"अवश्य!" वो नाच के बोला!

"खुश मत हो!" मैंने कहा,

"अरे तेरे जैसे बहुत देखे मैंने, धुल चटा चुका हूँ मैं" उसने कहा,

"देखे होंगे अवश्य ही, लेकिन मैं अब आया हूँ" मैंने कहा,

"अबे जा धन्ना के पोते!" बोला रिपुष!

क्रोध के मारे लाल हो गया मैं!

"तमीज सीख ले, यदि दम्मो के पास शेष हो तो" मैंने गुस्से से कहा,

"अबे भाग, निकला यहाँ से स्साला!" उसने कहा,

मुझे हंसी आयी!

"तू बेकार हो गया रिपुष! सच कहता हूँ" उसने कहा,

'अबे भग यहाँ से अब?" उसने मेरी छाती पर हाथ मार कर कहा,

"जा रहा हूँ, अब दिन गिन ले, मारूंगा नहीं, लेकिन वो हाल करूँगा कि मौत को भी तरस आ जाएगा तुझ पर" मैंने कहा,

"निकल?" चिल्लाया वो!

"जा भाई जा" दम्मो उठते हुए बोला,

"जाता हूँ" मैंने कहा,

"तेरस" मैंने कहा,

"हाँ! मान ली" वो बोला,

"मेरी बात मान लेता तो चुदास भी आँखों से ही देखता!" मैंने कहा,

"चल ओये?" उसने कहा,

अब हम निकले वहाँ से!

"बड़ा ही बद्तमीज़ लड़का है कुत्ता" शर्मा जी बोले,

"कोई बात नहीं, हाड़ पक गए इसके अब!" मैंने कहा,

"दो साले को सबक" गुस्से से बोले वो,

"ज़रूर" मैंने कहा,

मैंने पीछे देखा, वे देख रहे थे हमको जाते हुए!

बारूद तैयार था! चिंगारी लगाना शेष था!

"चलिए" मैंने कहा,

हम टमटम में बैठे और चले अपने डेरे!
 
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