S
StoryPublisher
Guest
दीपा का दिल हलक से फंसा हुआ था-बोली-"मुझें बहुत डर लग रहा है देव---मैं अब भी कहती हूं अब भी मान जाओ----अगर अब भी हम खुद को कानून के हवाले कर दें तो?"
"मैं तुम्हारी यह बकवास सुनता-सुनता पागल हो गया हूं ।"
"समझने की कोशिश करो देव---फिलहाल हम कानून के शिकंजे से जरूर बच गए हैं, मगर भगवान ही जाने कि जब्बार हमसे इसकी क्या कीमत वसूल करेगा?"
देव ने तुरन्त कोई ज़वाब नहीं दिया।
शायद इसलिये क्योकि वह दीपा की बात से सहमत था-जो जब्बार ने किया था-निश्चय ही निकट भविष्य में वह उसकी कीमत बसूल करने बाला था ।
कैसी कीमत -- किस रुप में ?
इन सवालो के जवाब में देव के दिमाग में एक ही बात उभरती थी-------यह कि जब्बार स्वयं लूट की इस दौलत में तो कोई हिस्सा हासिल करना चाहेगा ।
शायद आधा ।
देव को दस लाख की रकम घटकर पांच लाख होती नजर आई तो अपना दिल उसे बैठता-सा लगा…तभी दीपा ने टोक दिया----" क्या सोच रहे हो देव?"
"जो होगा देखा जाएगा ।" अपने ही विचारों में गुम वह बड़बड़ाया ।
दीपा ने लगभग चीखकर पूछा…"क्या होगा और क्या देखा जाएगा?"
"ज्यादा-से-ज्यादा वह इस दौलत का आधा हिस्सा मांगेगा ।" कार ड्राइव करते हुए उसने कहा----" मगर मैं इतनी आसानी से उसकी मांग मानने वाला नहीँ हूं।"
"क्या करोगे तुम?"
"दस-बीस हजार या -ज्यादा-से-ज्यादा एक लाख में मानता है तो ठीक, वर्ना।"
" दीपा का दिल पुरी तरह धडक उठा-" वर्ना ?"
" छोड़ो वक्त आने पर देखा जाएगा ।"
रात का एक बजा था ।
हर तरफ अंधकार और नीरवता।
अधिकांश शहर दिन की नीद सो रहा या । परन्तु देव और दीपा की आंखों में नीद कहां----दोनों के जिस्म और कपेड़े पसीनायुक्त मिटटी से लथपथ थे…उस वक्त दीपा डरी-सी नजरों से अपने पति को देख रही थी, जव देव ने कहा----"बस--हमारा आज रात का काम खत्म हो गया है--- अब नहाने के बाद चैन की नीद सोंएगें ।"
दीपा कुछ बोली नहीँ-सिर्फ उसे देखती रही।
"पहले मैं नहा लेता हूं…उसके वाद तुम ।" कहने के बाद बिना दीपा के जवाब की प्रतीक्षा किए यह बाथरूम में चला गया-बीस मिनटं बाद दीपा बाथरूम में थी और देव जिस्म पर नाईट शूट डाले सोफे पर पड़ा सिगरेट फूंक रहा था ।
इस वक्त उसके दिमाग में सिर्फ जब्बार चकरा रहा था ।
सारा काम कितने आराम से निपट गया था---अगर यह दौलतं जब्बार ने न देखी होती तो इस वक्त वह कितने सुकून में होता…क्रम्बख्त जब्बार ।
मौका मिलते ही वह जरूर कमीनगी दिखाने वाला था ।
सोफे पर पड़ा देव जब्बार से पीछा छूड़ाने की कल्पनाएं करता रहा-स्नान के बाद दीपा भी कमरे में आ गई----उसके जिस्म पर हल्के गुलाबी रंग की झीनी नाइटी थी ।
संगमरमर-सा गोरा---केले के तने जैसा चिकना और गदराया हुआ दीपा का जिस्म भी देव के मस्तिष्क से जब्बार को नही निका्ल सका-किसी ठोस पहाड़ के समान जो चोटियां किसी को भी दीवाना बना सकते थी, उनका देव पर तनिक भी तो असर न हुआ।
अगर हालात सामान्य होते तो रात के इस वक्त-दीपा को इस रूप में देखने के बाद देव जानवर वन गया होता, परन्तु इस वक्त उसके जेहन में उमंग की एक हल्की सी लहर तक न उठो।
उसकी तरफ सहमी-सी देख रही दीपा शायद अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई ।
देव सोफे से उछलकर खड़ा होगया।