• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

सुलग उठा सिन्दूर complete

  • Thread starter Thread starter StoryPublisher
  • Start date Start date


दीपा का दिल हलक से फंसा हुआ था-बोली-"मुझें बहुत डर लग रहा है देव---मैं अब भी कहती हूं अब भी मान जाओ----अगर अब भी हम खुद को कानून के हवाले कर दें तो?"

"मैं तुम्हारी यह बकवास सुनता-सुनता पागल हो गया हूं ।"

"समझने की कोशिश करो देव---फिलहाल हम कानून के शिकंजे से जरूर बच गए हैं, मगर भगवान ही जाने कि जब्बार हमसे इसकी क्या कीमत वसूल करेगा?"

देव ने तुरन्त कोई ज़वाब नहीं दिया।

शायद इसलिये क्योकि वह दीपा की बात से सहमत था-जो जब्बार ने किया था-निश्चय ही निकट भविष्य में वह उसकी कीमत बसूल करने बाला था ।

कैसी कीमत -- किस रुप में ?

इन सवालो के जवाब में देव के दिमाग में एक ही बात उभरती थी-------यह कि जब्बार स्वयं लूट की इस दौलत में तो कोई हिस्सा हासिल करना चाहेगा ।

शायद आधा ।

देव को दस लाख की रकम घटकर पांच लाख होती नजर आई तो अपना दिल उसे बैठता-सा लगा…तभी दीपा ने टोक दिया----" क्या सोच रहे हो देव?"

"जो होगा देखा जाएगा ।" अपने ही विचारों में गुम वह बड़बड़ाया ।

दीपा ने लगभग चीखकर पूछा…"क्या होगा और क्या देखा जाएगा?"

"ज्यादा-से-ज्यादा वह इस दौलत का आधा हिस्सा मांगेगा ।" कार ड्राइव करते हुए उसने कहा----" मगर मैं इतनी आसानी से उसकी मांग मानने वाला नहीँ हूं।"

"क्या करोगे तुम?"

"दस-बीस हजार या -ज्यादा-से-ज्यादा एक लाख में मानता है तो ठीक, वर्ना।"

" दीपा का दिल पुरी तरह धडक उठा-" वर्ना ?"

" छोड़ो वक्त आने पर देखा जाएगा ।"

रात का एक बजा था ।

हर तरफ अंधकार और नीरवता।

अधिकांश शहर दिन की नीद सो रहा या । परन्तु देव और दीपा की आंखों में नीद कहां----दोनों के जिस्म और कपेड़े पसीनायुक्त मिटटी से लथपथ थे…उस वक्त दीपा डरी-सी नजरों से अपने पति को देख रही थी, जव देव ने कहा----"बस--हमारा आज रात का काम खत्म हो गया है--- अब नहाने के बाद चैन की नीद सोंएगें ।"

दीपा कुछ बोली नहीँ-सिर्फ उसे देखती रही।

"पहले मैं नहा लेता हूं…उसके वाद तुम ।" कहने के बाद बिना दीपा के जवाब की प्रतीक्षा किए यह बाथरूम में चला गया-बीस मिनटं बाद दीपा बाथरूम में थी और देव जिस्म पर नाईट शूट डाले सोफे पर पड़ा सिगरेट फूंक रहा था ।

इस वक्त उसके दिमाग में सिर्फ जब्बार चकरा रहा था ।

सारा काम कितने आराम से निपट गया था---अगर यह दौलतं जब्बार ने न देखी होती तो इस वक्त वह कितने सुकून में होता…क्रम्बख्त जब्बार ।

मौका मिलते ही वह जरूर कमीनगी दिखाने वाला था ।

सोफे पर पड़ा देव जब्बार से पीछा छूड़ाने की कल्पनाएं करता रहा-स्नान के बाद दीपा भी कमरे में आ गई----उसके जिस्म पर हल्के गुलाबी रंग की झीनी नाइटी थी ।

संगमरमर-सा गोरा---केले के तने जैसा चिकना और गदराया हुआ दीपा का जिस्म भी देव के मस्तिष्क से जब्बार को नही निका्ल सका-किसी ठोस पहाड़ के समान जो चोटियां किसी को भी दीवाना बना सकते थी, उनका देव पर तनिक भी तो असर न हुआ।

अगर हालात सामान्य होते तो रात के इस वक्त-दीपा को इस रूप में देखने के बाद देव जानवर वन गया होता, परन्तु इस वक्त उसके जेहन में उमंग की एक हल्की सी लहर तक न उठो।

उसकी तरफ सहमी-सी देख रही दीपा शायद अभी कुछ कहना ही चाहती थी कि अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई ।

देव सोफे से उछलकर खड़ा होगया।

 


दीपा की सांस रुक गई---चेहरा उसी तरह पीला पड़ गया, जैसा जब्बार के अटैची खोलते वत्त था…देव का समूचा जिस्म एकबार पुन: पसीने से भरभरा उठा ।

चेहरे पर हवाइयां-आंखो में आतंक लिए उन्होंने एक…दुसरे की तरफ देखा ही था कि दरवाजे पर पुन: रहस्यमय अवाज मे दस्तक हुई ।

"र-रात के इस वक्त कौन हो सकता है?" दीपा का लहजा बुरी तरह कांप रहा था।

देव के मुंह से निकला-"श…शायद जब्बार ।"

नाम सुनते ही दीपा की सिटटी-पिटटी गुम हो गई ।

देव स्वयं ही बड़वड़ाया----"मुझे उस कमीने के यहाँ पहुचने की उम्मीद तो थी, मगर इतनी जल्दी नहीं-----त-तुम डरो नहीं दीपा---मैं उसे भुगत लूगा।"

दीपा मूर्ति में बदल चुकी थी ।।

दस्तक पुन: हुई ।

देव लपककर दरवाजे के नजदीक पहुचा-डरे हुए स्वर में फुसफुसाया-कौन है?"

सिर्फ दस्तक ।

कोई आवाज नहीं ।।

देव ने पुन: अपना छोटा-सा सवाल दोहराया, किन्तु जवाब नदारद और अन्त में जिज्ञासा इस कदर बढ़ गई कि उसने एक झटके से दरवाजा खोल दिया और दरवाजा खोलते ही उसके मस्तिष्क को इतना तेज झटका लगा कि जैसे दिमाग की नस फट पड़ेगी ।

दरवाजे पर जब्बार नहीं था ।

देव की कल्पनाएं गुडमुड़ होकर रह गई और हक्का-बक्का - सा वह दरवाजे पर मौजूद उस नितान्त अपरिचित युवक को देखता रह गया, जिसके समूचे जिस्म पर काला लिबास था-चेहरे पर घनी दाढ़ी- मूंछ और आंखों पर काले ग्लास का चश्मा । "

" कौन हो तुम ?"' देव के मुंह से निकला।

उसके मुंह से गुर्राहट निकली----" जगबीर कहते हैं ।"

"कौन जगबीर?"

"ट्रेजरी लूटने वाले तीन लुटेरों में से एक ।"

देव के -दिमाग पर विजली गिर पडी़-वहीं खड़ा-खड़ा जैसे वह राख के ढेर में बदल गया और अभी स्वयं को नियंत्रित भी न कर पाया था कि जगबीर ने जेब से रिवॉल्वर निकालकर उसकी छाती पर रख दिया ।

दीपा के हलक से चीख निकल पड़ी ।

"खामोश ।" वह जहरीले सर्प के समान गुर्राया---"अगर मुंह से जरा भी आवाज निकालने की कोशिश तो मैं तुम्हारे सुहाग के परखच्चे उड़ाकर रख दूगा ।"

दीपा की चीख का अंतिम सिरा घुटकर रह गया ।

बदहवास अवस्था में देव जगबीर को घूर रहा था, जबकि जगबीर ने उसे रिवॉल्वर से अन्दर धकेलते हुए कहा-"रास्ते से हटो ।"

बेचारा देव ।

वह कर ही क्या सकता था ?

दीपा की तरह वह भी आंतकित नजरों से सिर्फ देखता भर रहा, जबकि अन्दर जाने के बाद जगबीर ने चटकनी चढ़ा दी…सारी दुनिया का साहस जुटाने के बाद देव एक सवाल कर पाया-----" तुम हमसे क्या चाहते हो?"

"पनाह ।"

"प-पनाह से मतलब?"

"पुलिस सारे शहर में भूसे में छूपी सुई की तरह तलाश कर रही है, वह मेरा नाम हुलिया ही नहीं जानती वल्कि फोटो भी बरामद कर चुकी है और मैं पुरजोर कोशिश के बावजूद शहर के बाहर नहीं निकल सकता, जव तक पुलिस की सरगर्मी ठंडी न पड़ जाए, तव तक के लिए तुमसे इस धर में पनाह मांगने आया हूं ।"

 


" मगर हम तुम्हे पनाह क्यों देने लगे?"

" ट्रैजरी से लूटी गई दोलत इस वक्त इस धर में है, तुम्हारे पास और तुम ही मुझे पनाह नहीं दोगे तो कौन देगा ?"

"क-क्या बकवास कर रहे हो, लूट की दौलत से भला हमारा क्या मतलब?"

" "होशियार बनने की कोशिश मत करो मिस्टर देव, शहर में लाखों मकान हैं-पनाह के लिए मैंने इसी मकान को चुना----"इसी से तुम्हें समझ जाना चाहिए कि मुझे सब मालूम है, यह भी कि तुम लोग ही कुछ ही देर पहले उस दौलत को मकान के लॉन में गाड़ चुके हो ।"

देव के मुह से वोल न फूटा ।।।

"दौलत को जंगल से यहाँ तक लाने में तुमने काफी मेहनत की है, एक लंगूर की हत्या तक करनी पडी़-धटनास्थल से अपनी उपस्थिति के चिन्ह मिटाने और फिर चेकपोस्ट पर चल रही चैकिंग से दौलत को गुजारकर यहां लाना वाकई जिगर का काम है ।"

"त--तुम इतना सव कैसे जानते हो?"

"तुम्हें यह सब नहीं सोचना चाहिए मिस्टर देव, क्योंकि अगर मैं इस सवाल का जवाब दे भी दूं तो तुम्हे कोई फायदा होने वाला नहीं है--हर व्यक्ति को सिर्फ अपने फायदे की बात से मतलब रखना चाहिए और मेरा अॉफर तुम्हारे फायदे का है ।"

"केसा अॉफर?"

"मैं लूट की दौलत में से तुमसे कोई हिस्सा नहीं मांगूगा, बदले में सिर्फ पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ने तक तुम्हें मुझे यहां रहने देना होगा…मौका मिलते ही इस शहर से फरार हो जाऊंगा, हां-उस वक्त थोड़े पैसे की जरूरत पड़ सकती है मगर वह पैसा लूट की दौलत का सौवां हिस्सा होगा ।"

देव निश्चय न कर सका ।

" ठीक विपरीत यदि मैं किसी भी तरह पुलिस की गिरफ्त में फंसता हूं तो मजबूरन अपनी सारी जानकारी मुझे पुलिस को देनी होगी ।"

" त--तुम ऐसा नहीं कर सकते ।"

" क्यों ?"

"अगर तुम पुलिस के हाथ लग गए तो भले ही चाहे जो वयान दो, किन्तु कानून तुम्हे फांसी से कम सजा नहीं देगा ।"

"इसीलिए ऐसी अॉफर दे रहा हू जो तुम्हारे भी फायदे का है, मेरे भी---- तुम्हें दौलत मिल जाएगी मुझे फांसी की सजा से निजात ।" कहने के साथ ही जसबीर ने रिवॉल्वर वापस अपनी जेब में लिया !

उस क्षण देव का जी चाहा कि वह झपटकर जगबीर की गर्दन दबोच ले, मगर वह ऐसा नहीं कर सका । ऐसा करने के हालात ही न थे ।

बोला---"क्या तुम सच बोल रहे हो?"

"किस बोरे में?"

" यह कि तुम्हें सिर्फ पनाह चाहिए, दौलत में से कोई हिस्सा नहीं ?"

"जुर्म की काली दुनिया में सफेद झूठ नहीं बोले जाते---अगर तुमने मुझे शांति से यहां रहने-दिया तो मैं पूरी तरह अपना वादा निभाऊंगा ।"

देव को उसकी बात पर यकीन न हुआ, पर इस वत्त उसके पास कोई चारा न था ।

अत: बोला-ठीक है, पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ने तक यहाँ रह-सकते हो ।"

"मै जानता था कि यहाँ पनाह मिल जाएगी ।" कहने के साथ ही जगबीर ने अपनी आंखों से चश्मा उतारकर बड़े ही अश्लील अंदाज में नाइटी से झलक रहे दीपा के जिस्म को निहारा-दे…मदद पाने की-सी नजरों से दीपा ने अपने सिन्दूर की तरफ देखा ।

सिन्दूर किसी दूसरी ही उधेड़ बुन में व्यस्त था ।।

बिना किसी किस्म की औपचारिकता का प्रदर्शन किए जगबीर ने आगे बढकर सेन्टर टेवल पर पड़े सिगरेट के पैकेट से एक सिगरेट निकालकर सुलगा ली और लापरवाही के साथ सोफे पर बैठकर धुएं के छल्ले वनाने लगा ।

 


दीपा और देव ,बुत के समान खड़े अपने घर में जबरदस्ती मेहमान बनकर घुस आए उस व्यक्ति को देख रहे थे-दीपा रह…रहकर देव की तरफ़ इस उम्मीद से देख रही थी कि शायद वह जगबीर से पीछा छुडाने के लिए कुछ करे ।

चाहता देव भी यही था, किन्तु हालात ऐसे थे कि दिमाग में कोई तरकीब आ ही न रहीं थी, काफी देर से छाई खामोशी को जगबीर ने ही तोड़ा----"आप लोग खड़े क्यों हैं,आराम से बैठ जाइए ।"

यंत्र-चालित-सा देव उसके सामने बाले सोफे पर बैठ गया ।

दीपा ने पुन: महसूस किया कि वह कामुक नजरों से उसके जिस्म को निहार रहा ।

अत: सकपकाकर वह बेडरूम की तरफ भाग गई ।

दोनों कमरों के बीच का दरवाजा उसने धड़ाम से बंद कर लिया।

जगबीर हंसा ।

गन्दे दांत चमके-बे बता रहे थे कि अपनी याददाश्त में उसने कभी किसी मंजन का इस्तेमाल नहीं किया है, बेहयाई से हंसते हुए उसने कहा----"'कमाल है, शरमा गई ।"

. देव के मुंह से कोई बोल न फूटा ।

कुछ देर तक जगबीर उसे देखता रहा, फिर बोला-"यदि तुम मेरे यहाँ रहने पर इस तरह तनाव बनाए रखोगे मिस्टर देव तो काम नहीं चलेगा ।"

"क्या मतलब?" देव कै मुंह से स्वयं निकला ।

"ट्रेजरी मे पड़े डाके के संबंध में पुलिस की सरगर्मी बहुत जल्दी ठंडी पड़ने बाली नहीं है , क्योंकि न दौलत उनके हाथ आनी है, न ही मैं----अतः मुझें महीने दो महीने यहां रहना पड़ सकता है और मैं तुम्हें यह समझाना चाहता हूं कि इतना समय तनाव के साथ नहीं कट सकता ।"

"कैसा तनाव?"

" मुझे पराया समझने का तनाव ।" वह देव की आंखो में झांकता हुआ बोला ---- मैं ये चाहता है कि यहाँ घर के सदस्य की तरह रहूं ।"

" "ऐ-ऐसा ही होगा, ऐसा ही होगा ।"

"गुड ।" कहने के बाद सिगरेट में एक कश लगया, फिर बोला----"तुम लोगों ने आज सुबह से कुछ नहीं खाया है, क्या मूख नहीं लगी?"

"भ-भूख----हां---इस तरफ तो हमारा ध्यान ही नहीं गया ।"

जगबीर फिर बेहयाई से हंसा, बोला…"तुम ठीक कहते हो, जब फ्री का इतना माल हाथ लग जाए तो भूख-प्यास का ध्यान किसे रहता है और वैसे भी तुम लोग सिर्फ सुबह से भुखे हो और मैं ।"

" तुम?"

"कल से भूखा ट्रेज़री के बाद से चने या एक दाना भी मुंह में नहीं गया, भाभी से कि फ़टाफ़ट खाना तेयार करें ।"

देव का दिमाग फटने को तैयार हो गया ।

जी चाहा कि झपटकर उसकी गर्दन दबोच ले, मगर ऐसा कुछ भी करना इस वक्त उसके वश में न था, मजबूर देव ने दीपा को आवाज लगा दी ।

दोनो कमरों के बीच का दरवाजा खोलकर जो दीपा वहाँ आई , उसके तन पर इस वक्त सूती धोती थी----------उसका प्रयत्न अपने जिस्म के उठानों को उसमें छुपा लेने का था और उसकी मंशा भांपकर जगबीर के होठों पर भद्दी मुस्कराहट नाच गई ।

 


देव ने दीपा को खाना बनाने का हुक्म दिया ।

जगबीर की जिद पर हालांकि तीनों ने साथ बैठकर खाना खाया ।।

देव और दीया को एक-एक टुकडा सटकने में बडी मेहनत पड़ रही थी ।

खाने से फारिग होते-होते साढ़े तीन बज गएं ।

सिगरेट सुलगाने के वाद जगबीर ने सेण्टर टेबल पर टांगे पसारते हुए कहा----" मेरे सोने का इन्तजाम करो, कहां सोना हैं मुझे ?"

" तुम बेडरूम में सो सकते हो?"

" और तुम लोग?"

"हम फोल्डिंग पलंग डालकर इस कमरे में सो जाएंगे ।"

"गुड-जल्दी इन्तजाम करो, अव मुझें नीद आ रही है ।"

जगबीर नामक मेहमान का आदेश भला टाल कौन सकता था । शीघ्र ही सोने की व्यवस्था हो गई और वह उठकर बेडरूम की तरफ जाता हुआ बोला----" बीच का दरवाजा मैं अपनी तरफ बन्द कर लूंगा, तुम्हें इस तरफ़ से बन्द करने की जरूरत नहीँ है ।"

"य-ये नहीं हो सकता ।" एकाएक दीपा गुर्रा उठी ।

दीपा को घूरते -हुए जगबीर ने _पूछा-"क्यों नहीं हो सकता?"

"इधर हम पति-पत्नी सोये है, अगर हम इधर से दरवाजा बद नहीं करेगे तो तुम चाहे जिस क्षण दरवाजा खोलकर इस कमरे में आ सकते हो?"

" तो ?"

"'त-तो से क्या मतलब?" दीपा बोखला गई ।

.""बात को समझने की कोशिश करों जगबीर भाई । जगबीर के कुछ कहने से पहले ही देव मध्यस्थता करता हुआ बोला-----" इस तरह हमारी प्राइंवेसी भंग होगी ।"

"कोई प्राईवेसी भंग नहीं होगी ।" उसने 'सपाट स्वर में कहा…"जव मुझे इस कमरे में आनाा होगा, उससे पहले दस्तक दूगां और तुम्हारी तरफ़ से इजाजत मिलने पर ही यहाँ आऊगां ।"

"यह ठीक रहेगा ।" वह दीपा से पहले बोल पड़ा । अपनी गन्दी नज़रें वह दीपा पर गड़ाये गुर्राया----"ओर सुबह तक अपनी बीबी को यह बात अच्छी तरह समझा देना कि जगबीर को इंकार सुनने की आदत नहीं है।"

" म-मैं समझा दूंगा ।"

"हालांकि मैं जानता हूं कि तुम किसी किस्म की गड़बडी करने की स्थिति में नहीं हो, मगर फिर भी, याद रखना कि मेरे पास रिवॉल्वर है और मैं किसी भी क्षण तुममें से किसी को भी-गोली मार सकता ।" इन शब्दों के बाद उसने दरवाजा बन्द कर लिया ।

जगबीर के अंतिम शब्द-देव के जिस्म में झुरझुरी पैदा कर गए ।

दोनो पति-पत्नी काफी देर तक बन्द दरवाजे को घूरते रहे । "

पहले देव को ही होश आया, बोला---" बिस्तर बिछाओ दीपा ।"

दीपा कुछ कहना चाहती थी कि देव तेजी से झुककर उसके कान में फूसफुसया-फिलहाल उसके वारे में कोई बात न करना ।"

दीपा सन्नाटे में आ गई ।

विस्तर बिछ गए ।

दोनों में से किसी की भी आंखों में दूर-दूर तक नींद का नामोनिशान नहीं-करीब पैंतालीस मिनट तक यूं ही पड़ा रहने के वाद देव आहिस्ता से उठा ।

दवे पांव बेडरूम के दरवाजे के निकट-पहुचा । उसकी कार्यवाहियां देखकर दीपा का दिल बहुत जोर-जोर ने धड़क रहा था ।

अपने विस्तर पर वह इस तरह चिपकी पडी थी---जैसे किसी ने बांध रखा हो।

 


उधर बेडरूम में चूकि नाइट बल्व अॉन धा, अत: डवल वेड पर पैर पसारे पड़ा जगबीर उसे 'की-होलं' से साफ नजर आया-देव यह जानना चाहता था कि यह सो चुका है या नहीं, किन्तु काफी देर तक देखते रहने के बाद भी ठीक से निश्चय नहीं कर सका ।

अंत में वह दबे पांव दीपा के पास आया। उसके कान में फुसफुसाया---"तुम मेरे पीछे आओ, कुछ वात करनी है ।"

सस्पेंस और आतंक के कारण दीपा का बुरा हाल था।

"आहिस्ता से उठना, वह जगा हुआ भी हो सकता है?"

फुसफसाने के बाद वह बिल्ली -की तरह बरांडे में खुलने वाले की तरफ बढ़ गया ।

पन्द्रह मिनट बाद बरांडे के अंधेरे में खडी दीपा फुसफुसा रही थी-----" हम बुरी तरह फंस गए है देव, यह अच्छा आदमी नहीं है ।"

"पता नहीं कम्बख्त को कहाँ से सुराग मिल गया कि दौलत हमारे पास है, जो सीधा यहीं चला आया ।"

"वह मुझे अच्छी नजरों से नहीं देख रहा था देव-उसका कोई इलाज करो-मैं उसके साथ नहीं रह सकती, वहुत डर लग रहा है मुझें ।"

" क्या तुम्हें उसकी इस बात पर यकीन है कि पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ने पर यहाँ से बिना दौलत लिये चला जाएगा?"

"हरगिज नहीं ।"

"मुझे भी उसकी बकवास पर बिल्कुल यकीन नहीं है--अपने द्वारा लूटी गई दौलत को इस तरह छोड़कर भला वह क्यों जाने लगा?"

"इसीलिए तो कहती हूं कि इस झमेले से निकल जाओ, वर्ना अंत में -हमारे हाथो में दौलत नहीं हथकड़ियां होंगी ।"

"तुमने फिर अपनी वही पुरानी बकवास शुरू कर दी , जिसे मैं सुनना नहीं चाहता, मेरे दिमाग में इस मुसीबत से छुटकारा पाने की एक तरकीब है ।"

"'क्या?"

जवाब में देव ने जो कुछ कहा, उसे सुनकर दीपा के तिरपनं कांप गए । हलक से चीख निकल पड़ी-"खून-खून. .तुम खून कराओगे?"

देव ने झपटकर उसका मुंह भींच लिया, बोला---"अगर उसने एक लफ्ज भी सुन लिया तो गजब हो जाएगा ।"

सुबह आठ बजे ।।

जब्बार ने अपनी मोटरसाइकिल ठीक देव के मकान के सामने रोकी । इस वक्त वह वर्दी में न था ।

मोटर साइकिल को स्टैण्ड पर खड्री करने के वाद उसने मकान का लोहे वाला दरवाजा स्वयं खोला और छोटा-सा फ्रंट लॉन पार करके बरांडे में पहुंच गया ।

मुश्किल से दो बार की दस्तक के बाद दरबाजा खुल गया ।

दरवाजा खोलने वाली दीपा थी अौर आतंक की ज्यादती के कारण उसका चेहरा इस कदर पीला पड़ा हुआ था जैसे सालों से बीमार हो ---

जब्बार ने महसूस किया कि उसे देखते ही दीपा कुछ और ज्यादा पीली पड़ गई ।

"हैलो दीपा ।" जब्बार मुस्कराया ।

शब्द दीपा के मुंह से नहीं किसी गहरे अंथकूप में फंसे कैदी के मुंह से निकले-----" हैलो । "

"क्या मुझे अंदर आने के लिए रास्ता नहीं दोगी ?"

"व-वे घर पर नहीं है।"

"यह अनुमान मैं लगा चुका हूं डार्लिग ।" वह पूरी बदतमीजी के साथ बोला…"क्योंकि लॉन में कहीं भी गाडी़ नहीं है वह शायद अपने दोस्त की कार लौटाने गया होगा ।"

"हाँ ।"

"बडी अच्छी बात है, मुझे अकेले में तुमसे चन्द बाते करनी है ।"

" म- मैं इस वक्त अकेली हूं जब्बार, प्लीज----एक घंटे वाद आ जाना, तब तक वे लोट आएंगे, जो वाते तुम्हें करनी है वे उन्हीं से करों तो बेहतर है ।"

जब्बार का काला चेहरा एकाएक कठोर हो गया । वह लगभग खा जाने वाली नजरों से दीपा को घूरता हुआ गुर्राया-"शायद तुमने सुना नहीं कि मुझे तुमसे बांते करनी हैं ।"

"म-मगर ।"

"क्या तुम यह चाहती हो कि एक सब-इंस्पेक्टर होने के नाते मैं तुम्हें इसी वक्त गिरफ्तार कर लूं?"

दीपा की सांस रुक गई ।

 


वह कहता चला गया-"देव जब सुनेगा की मुझे तुम्हारी बेवकूफी की वजह से गुस्सा आया था तो शायद वह तुम्हें माफ नहीं करेगा ।"

देव के वाक्य, दौलत के लिए उसकी दीवानगी आदि दीपा को आंखो के सामने चकरा उठी, अन्दर वाले कमरे में जगबीर मौजूद था और वह नहीं चाहती थ्री कि जब्बार जो कहेगा उसे वह सुने, किन्तु फिलहाल जब्बार को टालने का उसके पास कोई बहाना न

था । अत: मजबूर दीपा को रास्ते से हटना पड़ा ।

कमरे में प्रविष्ट होने के बाद जब्बार जब दरवाजा बन्द करके चिटकनी चढा़ रहा था तो दीपा लगभग चीख पडी-"य-ये क्या कर रहे हो?"

चटकनी चढाने , के बाद वह घूमा और उसकी डरी हुई आखों में झांकता हुआ धूर्त मुस्कराहट के साथ .बोला--"हमारी बातें अगर किसी तीसरे के कानों तक पहुच गई तो शायद देव इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।"

"म--मगर वे आने ही वाले होंगे, हम दोनो को इस तरह बंद मकान में देखकर जाने वे क्या सोचने लगे?"

"वह कुछ नहीं सोचेगा, दरअसल इस सम्वन्ध में कुछ सोचने की मानसिक स्थिति में ही नहीं है वह-फिलहाल उसे सिर्फ दस लाख की चिन्ता है।" '

दीपा के मुंह से बोल ना फूटा ।

उसे लग रहा था कि कुछ ही देरे बाद अब यहाँ कोई जबरदस्त कांड होने -वाला है । वह ठीक से कल्पना नहीं कर पा रही थी कि जगबीर पर जब्बार के किन शब्दों का क्या प्रभाव होगा, जबकि जब्बार कहता चला गया…"कम-से-कम आज मैं वह जवार नहीं हूं दीपा, जो अपने प्यार की सच्चाई का यकीन दिलाने के लिए तुम्हारे आगे-पीछे चक्कर काटा करता था ।"

"क्या मतलब?"

"सबसे पहले मैं ये जानना चाहता हूं कि ट्रेजरी से लूटी गई दौलत तुम्हारे हाथ कैसे लगी?"

"इस सवाल का जवाब तुम्हें वे ही देगें ।"

जब्बार ने सख्त स्वर में कहा-" मैं तुमसे पूछ रहा हूं ।"

दीपा की आंखें भर आईं, बोली----"प्लीज जब्बार ।"

"मैं सिर्फ अपने सवाल का जवाब चाहता हूं कोई आंसू-कोई 'रिववेस्ट' नहीं ।"

मजबूर दीपा को उसे सब बताना पड़ा-सबकुछ ।

सुनने के बाद जब्बार ने कहा-"चेकपोस्ट पर सबकुछ समझने और अपनी आंखो से देख लेने के बावजूद मैंने तुम्हे बचा लिया-इस बारे में देव और तुम क्या सोचते हो----"मैंने क्यों किया था?"

"द-देव का अनुमान है कि उस दौलत में से शायद तुम भी हिस्सा चाहते हो ।"

बडी गहरी मुस्कराहट के साथ पूछा जब्बार ने---"ओर तुम्हारा अनुमान क्या है?"

" म - मेरा---?" दीपा बौखला गई---"म-मैं तो यह सोचती हुं कि वह सब तुमने दोस्ती की खातिर किया था----तुम्हारा एहसान जिन्दगी-भर नहीं भूलूगी ।"

जब्बार के पतले होठों पर ऐसी मुस्कान उभर आई जैसे वह दीपा पर तरस खा रहा हो-------" तुम्हारे पति का अनुमान कुछ परसेंट ठीक है, मगर मुझे दुख है कि तुम्हारा अनुमान सिरे से गलत है ।"

"क्या मतलब?"

"देव की तरह लखपति बनने की तमन्ना मेरे दिल में भी है, मगर मेरी इससे भी वहूत पुरानी और पुरजोर तमन्ना तुम्हारा पति बनने की थी…अब यकीन हो गया है कि मेरी तम्न्नाएं पूरी होंगी----खुदा मुझ पर मेहरबान हो गया है ।"

"ज-जब्बार ।" वह चीख पड़ी ।

" बहुत जल्दी तुम यही नाम अपनी इसी जूबान से प्यार के साथ भी पुकारोगी ।" वह कहता चला-गया----" अमीर बनने का शौक बड़ा बुरा होता है दीपा डार्लिग-इसकी कीमत तो तुम्हें चुकानी ही होगी ।"

"ऐसा कभी नहीं होगा ।" दीपा दहाड़ उठी…"'तुम अपने नापाक इरादे में कभी कामयाब नहीं हो सकोगे जब्बार-मैँ मर जाऊंगी, मगर ऐसा हरगिज नहीं होने दूंगी ।"

"ऐसा होगा ।" वह कुटिलतापूर्वक बोला----" और मजे की बात ये है कि ऐसा मैं जबरदस्ती नहीं करूंगा-----जो भी होगा देव की सहमति से होगा--- मैं तुम्हारे उस पति से सौदा करूंगा----" जिसे तुमने एक साल पहले मुझे ठुकराकर अपनाया था---------तुम्हारी कम-से-कम एक रात वह अपनी खुशी से मुझे देगा ।"

" तुम कोरी कल्पनाएं कर रहे हो------कोई पति ऐसा नहीं कर सकता ।"

" भूल है तुम्हारी-दौलत के लालच में फंसा पति कुछ भी कर सकता है।"

दीपा तिलमिलाकर रह गई…एकाएक उसे देव की दीवानगी स्मरण हो आई थी----जुबान को जैसे लकवा मार गया-चेहरा तमतमा रहा था , किन्तु मुंह से आवाज़ न निकल सकी ।

 


जबकि जब्बार कहता चला गया------"कितना तड़पा हूं मैं तुम्हारे लिए-ये मैं ही जानता हूं दीपा कि तुम्हरि लिए मैंने कितनी राते रो-रोकर गुजारी हैं--वेवकूफ था मैं-वह हर प्रेमी बेवकूफ होता है जो किसी के लिए अपने दिल को जख्मी करता रहे--- मैं उस एक-एक पल-एक-एक आंसू की कीमत तुमसे वसूल करूगां दीपा, "मगर इस तरह नही-तुम्हारे पति की इजाजत के साथ---- तुम्हें यह अहसास कराने के बाद कि जब्बार को ठुकराकर देव से शादी करना तुम्हारी जिन्दगी की सबसे बड्री भूल थी ।"

दीपा को लगा कि उसका सारा शरीर सुलाने लगा है ।

जब्बार मोटर साइकिल तक पहुचा ही था कि जाने कहां से प्रकट होकर देव उसकी तरफ़ लपका और उसे इस तरह अपनी तरफ बढ़ता देखकर जवार के होंठो पर जहरीली मुस्कान नाच उठी--बोला-"हेलो देव प्यारे ।"

"' मुझें तुमसे कुछ बाते करनी हैं-यहाँ से चलो ।"

"मैं भी बातें करने ही आया था-आओ-तुम्हारे घर में बैठकर ही ।"

"न-नहीं ।" देव ने जल्दी से कहा-वहां बाते करना मुनासिब नहीं है ।"

" क्यों ?"

"बाद में बताऊंगा----फिलहाल सिर्फ इतना समझ लो कि अगर हम यहीं ज्यादा देर खड़े रहे तो स्थिति इस हद तक बिगढ़ सकती है कि न ही वह हो सकेगा, जो मैं चाहता हूं और न ही वह जो तुम चाहते हो।"

"क्या मतलब?"

"सब समझा दूंगा-यहां से तो चलो ।"

जब्बार बोला ---'"लेकिन मुझे तुमसे जो सौदा करना है वह दीपा के सामने ही हो तो मजा आएगा---वह देखे तो सही कि जिसे उसने चुना है वह क्या है ?"

"अपने सौदे की तुम जो भी बातें करना चाहो बेशक उसके सामने कर लेना मगर, फिलहाल यहाँ से चलो-वक्त की नजाकत को समझने की कोशिश करों जब्बार-अगर तुमने मेरी वात नहीं मानी तो वह जड़ ही हमारे हाथ से निकल जाएगी जिसके आधार पर हमारे बीच कोई सौदा हो सकता है ।"

"कहाँ चले?"

"किसी भी ऐसी जगह जहाँ हमारी बातें किसी तीसरे के कान तक न पहुच सकें-किसी पार्क या किसी होटल के केबिन में ।"

"ओं की ।" कहने के साथ ही जब्बार ने मोटर साइकिल में जोरदार किक मारी-देव लपककर उसके पीछे बैठ गया और बीस मिनट बाद में वे एक होटल के केबिन में आमने-सामने बैठे थे-चाय मंगाने के बाद वेटर को डिस्टर्ब न करने की हिदायत दे दी गई थी ।

देव ने एक सिगरेट सुलगाने के बाद सवाल किया---" तुम क्या बात करके आए हो?"

"वह सौदा दीपा के सामने होगा ।" जब्बार ने सपाट स्वर में कहा---" मैं यहां तुम्हारे सवालो का जवाब देने नहीं, वल्कि जानने आया हूं कि तुम मुझे यहाँ क्यों लाए हो?"

देव समझ रहा था कि जब्बार भी लगभग वही सपने संजोये बैठा है, जो उसके दिल में है । त: पहले उसकी अकड़ डीली करने का फैसला करके बोला-"क्योकिं घर में दीपा के अलाबा----एक और शख्स भी है, जिसे शायद मेरा तुम्हारा मिलन पसन्द नहीं आएगा ।"

"क्या बक्यास कर रहे हो…अन्दर वह बिल्कुल अकेली थी ।"

"तुम अंधेरे में हो और तुम्हारे जवाब से मैं समझ सकता हूं कि तुमने दीपा से जो भी बातें की, वे ड्राइंगरूम में की होंगी--- उस वक्त वह बेडरूम में छुपा रहा होगा।"

"कौन ?"

देव ने धमाका करने की गरज से कहा-"जगबीर ।"

"कौन जगबीर-वया बकवास कर रहे हो तुम?"

देव की आंखें सिकुड गईं---वह ध्यान से जब्बार को घूरता हुआ बोला -----" क्या वास्तव में तुमने यह नामक नहीं सुना?"

"नहीं ।"

"मगर वह तो कहता है कि शंहर के हर पुलिसिये को उसका नाम और हुलिया ही मालुम नहीं है, बल्कि पुलिस उसका फोटो" तक बरामद कर चुकी है ।"

"कौन-किसका फोटो-क्या बकवास कर रहे हो तुम?" जब्बार झुंझला उठा था-"पहेलियां मत बुझाओ-अगर मुझे कोई पट्टी पढ़ाने की कोशिश करोगे तो अच्छा नहीं होगा देव---साफ-साफ बताओ कि जगबीर कौन है ?"

देव जब्बार को जिस मानसिक स्थिति में पंहुचाना चाहता था, वह उसी में पहुंच गया और देव अपनी इस कामयाबी पर खुश था । अत: अब पूरा विस्फोट करने की गरज से बोला----" ट्रेजरी लूटने बाले तीन लुटेरों में से एक का नाम है ।"

"क-क्या ?"' जब्बार उछल पड़ा ।

 
देव मन-ही-मन खुश था-ज़ब्बार पर उसके वाक्य की बहीं प्रतिक्रिया हुई थी, जो वह चाहता था-ज़ब्बार का चेहरा बुरी तरह तमतमा रहा था, जबकि गम्भीर वने रहे देव ने कहा----" जो बातें दीपा से करके आए हो वे मैं इसीलिए पूछ रहा था, क्योकि सारी बाते जगबीर ने भी सुनी होंगी ।"

जब्बार के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह देव के कथन पर विश्वास न कर पा रहा हो-लह देव को संदिग्ध और कठोर दृष्टि से धूरता हुआ बोला-------"कहीं यह सब कुछ तुम्हारी कोरी बकवास तो नहीं है-------मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए तुम कहीं कोई काल्पनिक जगबीर तो पैदा नहीं कर रहे हो?"

.'"_अगर जगबीर मात्र मेरे दिमाग की कल्पना है तो मैं किसी को तुम्हारे सामने पेश नहीं कर पाऊँगा, यानी मेरी यह वात चल नहीं पाएगी, जबकि निकट भविष्य में मैं उसे तुम्हारे सामने पेश करने वाला हूं !"

" मं-मगर ट्रैजरी का फरार लुटेरा तुम तक कैसे पहुंच गया ?"

"यह मैं नहीं जानता, लेकिन यह हकीकत है कि वह इस वक्त भी मेरे घर में है ।" कहने के बाद देव ने जगबीर के आगमन और उसके द्वारा की गई बाते विस्तारपूर्वक बता दी-सुनने के बाद जब्बार का चेहरा अजीब अंदाज भभकने लगा था ।

बोला---" वह बिल्कुल झूठ बोल रहा है-हालांकि यह सच है कि पुलिस सरगर्मी से उसकी तलाश में है----शहर से बाहर जाने के हर माध्यम पर कड़ी चौकसी है परन्तु फोटो की तो बात ही दूर -- पुलिस के पास उसका नाम तक नहीं है ।"

"यह बात मैं तभी समझ गया था, जब तुम उसका नाम सुनकर चौके नहीं और जाहिर है कि बात को बढा-चढाकर कहने पीछे उसक्री मंशा पनाह की जरूरत को दृढ़त्तापूर्वक सावित करना रही है ।"

"यह बात भी मेरे कण्ठ से नीचे नहीं उतरती कि पुलिस की सरगर्मी ठंडी पड़ जाने पर वह दस लाख को छोड़कर इतनी आसानी से चला जाएगा ।"

"मैं भी ऐसा नहीं समझता।" देव ने कहा----" जिस रकम के लिए लुटेरों ने इतना रिस्क लिया…उसने अपने दो साथी गंवा दिए----उसे वह भेंट स्वरुप हमें देकर जाएगा, इस बात पर वही यकीन कर सकता है, जिसके भेजे में दिमाग नाम की कोई चीज ही न हो ।"

"फिर ?-"

देव को खुशी थी कि जब्बार उसी लाइन पर आता जा रहा है, जहां वह उसे लाना चाहता था----बोला-"उसकी स्कीम जाहिर है---हमें धोखे में रखकर जगबीर पुलिस की सरगर्मी को गुजार देने और उसके बाद माल सहित शहर से निकल जाने के ख्वाब संजोये बैठा है---जाने से पहले उसने हमारा भी कोई-न-कोई इन्तजाम करने की स्कीम वना रखी होगी ।"

" जाहिर है ।"

"और जो इन्तजाम उसने हम पति-पत्नी का सोच रखा होगा-उसी में अब तुम्हें भी शामिल कर लिया होगा।"

"क्या मतलब?"

"हालांकि मैं नहीं जानता कि दीपा से क्या बाते की है?" देव उसे वहुत ही सन्तुलित शब्दों का इस्तेमाल करके फंसा रहा था…"लेकिन इतना दावे के साथ कह सकता है कि बेडरूम में छुपा जगबीर तुम्हारी बाते सुनकर निश्चय ही जान गया होगा कि दौलत का राज न सिर्फ तुम्हे भी मालूम है, बल्कि तुम भी हमारी तरह उस पर आंख गड़ाये बैठे हो…वह यह भी जान गया होगा कि चेकपोस्ट पर दौलत को लेने के बावजूद तुमने इंस्पेक्टर से झूठ बोला और हम पति-पत्नी को वहां से निकल जाने दिया ।"

जब्बार के कान से वह एक-एक लफ्ज गूंज उठा, जो उसने दीपा से कहा था और इसमें शक नहीं कि उसका चेहरा फक्क पड़ता चला गया।

जबकि देव ने गर्म लोहे पर चोट की-----" सीधी वात है कि माल के साथ शहर छोड़ने से पहले वह हर उस शख्स का इन्तजाम कर देगा जो दौलत के राज से वाकिफ है और उसे पाना चाहता है ।"

"तो उसका क्या करें ?"

"यही सवाल मेरे दिमाग में है और इसका जवाब तलाश करने के लिए ही मैं न सिर्फ तुम्हें यहां लाया हूं बल्कि तुम्हारी तरफ दोस्ती का हाथ भी बढाना चहाता हूं ।"

" मैं समझा नहीं ।" जब्बार का दिमाग ठस्स होकर रह गया था ।

देव ने उसे समझाने वाले अन्दाज में कहना शुरू किया---" देखो जब्बार-जगबीर के सामने जो स्थिति मेरी और दीपा की है-वही तुम्हारी भी है-वह जितनी बड़ी बाधा हमारे रास्ते की है, उतनी ही तुम्हारे रास्ते की-संक्षेप में अगर यह कहा जाए तो गलत न होगा कि अब हम तीनो एक ही किश्ती में सवार हे-डूबेगे तो साथ और पार लगेंगे तो साथ-विना जगबीर का कोई इलाज सोचे हमारे बीच कोई भी समझौता बेकार है, यानी सबसे पहले हमे साथ बैठकर दोस्ती के वातावरण में जगबीर से छुटकारा पाने को कोई योजना सोचनी चाहिए ।"

"ऐसी क्या योजना हो सकती है ?"

"तुम ही अपने दिमाग से सोचकर बताओ ।"

काफी देर तक सोचने के बाद जब्बार बोला----"पुलिस मैन होने के नाते मैं उसे गिरफ्तार कर सकता हूं , किन्तु वह हमारा मेद खोल देगा ।"

"वह हमारे हर राज से वाकिफ हो चुका है-जिस तरह हमारी जिन्दगी उसके लिए मौत है, उसी तरह उसकी जिन्दगी हमारे लिए मौत---वह कहीं भी रहे…कभी भी हमारा भेद खोल सकता है और वह क्षण हम लोगों की आजाद जिन्दगी का आखिरी क्षण होगा---जब ऐसी शखिसयत जिन्दगी में आ जाए तो इलाज एक ही होता है ।"

"क-क-क्या?" ' थूक निगलते हुए जब्बार ने धड़कते दिल से पूछा।

"खतरनाक शखित्तयत का खात्मा।"

"ह-हत्या?" जब्बार के तिरपन कांप गए----" न-नहीं------ऐसा करना वहुत खतरनाक होगा-हम ऐसे जंजाल में फंस जाएंगे, जिसमें से मौत ही हमें निकाल सकेगी ।"

जब्बार के जाने के बाद जिस वक्त दरवाजा बन्द करके दीपा चटकनी चढा़ रही थी, उस वक्त उसकी टांगे बुरी तरह कांप रही थी । बुरी तरह डरी हुई थी वह । जब्बार का एक-एक लफ्ज़ लावे की तरह अभी भी उसके कानों में उत्तर रहा था ।

 


वह जानती थी कि कालेज लाइफ से ही जब्बार उसे गन्दी नजरों से देखता है और अब जबकि देव की बेवकुफी की वजह से उसे यह मौका मिला है तो वह निश्चय ही देव से वह कीमत मांगेगा , जो कह रहा था ।

क्या देव तेयार हो जाएगा?

उसकी आत्मा से आवाज निक्ली---"हरगिज नहीं…देव मुझसे बहुत प्यार करता है---मेरे लिए उसने अपने मां-बाप को ठुकरा दिया----जब्बार का सौदा वह कभी मंजूर नहीं करेगा, बल्कि.. .यदि जब्बार ने उसके सामने ऐसा कोई लफ्ज जुबान से भी निकाला तो देव उसकी-जुबान खींच लेगा-आखिर वह मुझसे वेइन्ताह प्यार करने वाला खुद्दार पति है ।'

तभी-दीपा की आगे के सामने दस लाख के लिए देव की दीवानगी चकरा गई ।"

उसका जब्बार के लिए मुस्कराने को कहना-जगबीर की अश्लील नजरों को देखकर भी अनदेखा करना-----उसे स्मरण हो आया कि उसके विरोध-के वावजूद देव ने जगबीर की इधर से चदृकनी न चढाने की शर्त मान ली थी।

सारा प्यार----- समुचा विश्वास डगमगाने लगा है ।।

अभी चटकनी उसने पूरी तरह बन्द की ही थी कि पीछे से दोनो कमरों के बीच का दरवाजा खुलने की आवाज सुनकर सहम गई ।

वह तेजी से पलटी-जगबीर पर नजर पडते उसके जिस्म में मोत की झुरझुरी दौड़ गई , क्योंकि दरवाजे के बीचों बीच खड़ा जगबीर खूंखार नजरों से धूर रहा था ।

दीपा की हालत शेर की माँद में फंसी हिरनी की-सी हो गई ।।

मुंह में भर गए थूक को अभी वह ठीक से निगल भी न पाई थी कि जगबीर के हलक से किसी जंगली भेड्रिये की-सी गुर्राहट निकली---" कौन था वह?"

दीपा के मुंह से बोल न फूटा ।

"जवाब दो वर्ना मारते-मारते-खाल में भुस भर दूंगा ।"

बेचारी दीपा।

उसने बहुत चाहा, पर आतंक की ज्यादती के कारण मुंह से आवाज न निकल सकी, जबकि उसकी चुप्पी ने जगबीर के चेहरे पर फैले गुस्से को पराकाष्ठा तक पहुंचा दिया---दांत चबाता हुआ वह दीपा की तरफ बढा तो उसका चेहरा विकृत होता चला गया ।

बड्री मुश्किल से चीखी वह…"द-दूर रहना-छूना मत मुझे ।"

" तो जवाब दो-बह कौन था ? " . . "ज-जब्बार ।"

" कौन जब्बार?"

"व-वह पुलिस में है-स-सब-इंस्पेक्टर ।"

"प-पुलिस में ?"' गोरिल्ले की तरह झपटकर उसने दीपा के रेशमी बाल पकंड़ लिए और पूरी बेरहमी के साथ उन्हें झटका देता हुआ बोला---" बह तो तुझसे बदमाशों की तरह सौदा कर रहा था---लगता है कि वह तुम्हे मिली दौलत के राज से वाकिफ है और बातों से ऐसा भी लगता था ,क्रि वह तेरा पुराना यार है…बोल-तुम लोगों से क्या सम्बन्ध है उसका?"

दर्द से विलविलाती हुई दीपा गिडगिड़ाई-" आह-म-मेरे बाल तो छोडो़…बताती हूं…मैं तुम्हें सव बता दूंगी ।"

"बोल ।" बाल छोड़ते वक्त उसने इतना झटका दिया कि एक चीख के साथ लड़खड़ाती दीपा सेन्टर टेबल से उलझकर फ़र्श पर गिरी…दांत गुलाब की पंखुडी़ में गड़ गए थे-वहाँ से खून बहने लगा, किन्तु जगबीर के चेहरे पर रहम का कोई लक्षण नहीं उभरा--गुर्राया-" अगर झूठ बोला तो हडडी-पसली बराबर कर दूंगा-जल्दी बक ।"

कराहती दीपा खड़ी हो गई ।

मारे डर वह जगबीर को सबकुछ बताने ही वाली थी कि एकाएक मस्तिष्क में यह विचार आया कि क्या देव उसे सब कुछ बताया जाना पसन्द करेगा?

शायद नहीं ।।

और इस एक मात्र विचार ने उसके चेहरे पर दृढता पैदा कर दी--बोली-वे अपने दोस्त की कार देने गए हैं----"आते ही होंगे…तुम्हरे सवालों का जवाब वही देगे ।"

"मैं तुझसे जवाब मांग रहा ।"

"स-सॉरी ।" दुढ़ता पूर्वक कहती हुई दीपा की आत्मा तक कांप रही थी-"मैं इस बारे कुछ नहीं बता सकती ।"

"त-तू ?" वह दहाड़ उठा-""तू मुझे कुछ नहीं वताएगी--तेरी ये मजाल-वक हरामजादी , वर्ना तेरे जिस्म के जरें-जरें इस कमरे ने बिखर जाएंगे ।"

 
Back
Top