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सुलग उठा सिन्दूर complete

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जब्बार के प्राण सूखे जा रहे थे, उसके दिमाग पर झुंझलाहट सवार ’थी कि कल के डिसकस में उसने और देव ने ये सव वातें सोच क्यों नहीं ली थीं?

उन लोगों को पटरी पर लाने की जब्बार को कोई राह सुझाई न दे रही थी कि शुक्ला ने कहा----" सब बातों के वावजूद हम फोन को नजरअन्दाज नहीं कर सकते!"

"केरेक्ट ।" यह शब्द जब्बार के मुंह से स्वत: निकला!

"आजकल शहर में ट्रेजरी की लूट से सम्बन्धित चर्चाएं जोरो पर हैं, हमने इनाम भी रखा है-क्या ऐसा नहीं हो सकता" कि वह कोई और बदमाश हो, जो इस पति-पत्नी को कवर करके पनाह लिए हुए है, फोन करने बाले ने इनाम लेने के अति उत्साह में उसे का ट्रैजरी का लुटेरा समझा और फोन कर दिया ।"

"यह हो सकता !" नागर ने माना!

जब्बार जल्दी से बोला-----" उस अवस्था में हमे फसे हुए पति पत्नी की मदद तो करनी ही चाहिए!"

"बेशक ।" उप-अधीक्षक बोले----"पता लगना भी जरूरी है कि उन्हें आतंकित करके यहीं रहने वाला बदमाश कौन है?"

जब्बार ने राहत की सांस ली, मन-ही-मन कहा-"तू वहीं चल तो सही नागर के बच्चे, अगर तुझे वहां ट्रेजरी के लुटेरे की लाश न दिखाई तो मेरा नाम भी जब्बार नहीं?"

योजना घड़ लेना अलग बात होंतो है है उस पर अमल करना अलग बात ।

कमरे में बैठकर योजना बनाना जितना आसान है उसे क्रियान्वित करना उतना ही कठिन, यह सच्चाई देव की समझ में अब आ रही थी-हालाकि वह और दीपा स्वयं को सामान्य दंर्शाते हुए जगबीर से बातों में मशगूल होने का पूरा ड्रामा कर रहे थे, किन्तु बीच-बीच में चोर नजरों से एक-दूसरे को देख लेते!

उन्हे पुलिस दल के यहां पहुंचने की इन्तजार थी!

समय धीरे--धीरे सरक रहा था!

बेचैनी बढ़ती जा रही थी!

उनके अनुमानुसार अब तक पुलिस दल को यहाँ पहुच जाना चाहिए था मगर पहुंचा नहीं था । इसी वजह से दिमागों में तरह-तरह की शंकाएं चकराने लगी! "

बे जगबीर से बाते जरूर कर रहे थे, मगर चेहरों से बेचैनी साफ़ झलक रही थी अौर एक समय ऐसा आया कि जगबीर ने टोक ही दिया--"'क्या बात है!"

"आं--क-कुछ भी नहीं!" देव बौखला गया!

"तुम दोनो अपसेट-से नजर आ रहे हो!"

दीपा के पसीने छूट गए!

"न-नहीं तो !" देव अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दरवाजे पर दस्तक हुई ।

तीनों उछल पड़े ।

'"क…कोई है?" योजना के मुताबिक देव ने फुसफुसाकर जल्दी से कहा------" दरबाजा खोलो । दीपा, मगर जरा ठहरकर, हम दोनो छुप जाते हैं !"

"त-तुम क्यों!" जगबीर ने पूछा ।

" आओ ,बातें करने के लिए समय नहीं है!" वह उसका हाथ पकड़ तेजी से बेडरूम की तरफ बढा, घबराहट के कारण दीपा का सारा जिस्म कांप रहा था । "

समूची पुलिस टीम सादे लिबास में थी!

लॉन में पहुचते ही जब्बार ने फुसफुसाकर उप-पुलिस अधीक्षक को सलाह दी-"हमें मकान को चारो तरफ से घेर लेना चाहिए सर, मैं पीछे की तरफ़ जा रहा हूं ।"

"ओं के!" उप अधीक्षक ने कहा----हमें, शुक्ला और नागर को छोड़कर सभी मकान के चारों तरफ लॉन में फैल जाए! "

यह सारी कार्यवाही गुपचुप हुई!"

अपने होलस्टर में झूल रही रिवॉल्वर को थपथपाते हुए जब्बार इमारत के पीछे पहुंचा, इस तरफ खुलने बाली खिडकी इस वक्त बंद थी, वह उसी के नजदीक दीवार से सटकर खड़ा हो गया!

रिवॉल्वर हाथ में ।

अव उसे सिर्फ इस खिड़की के खुलने का इन्तजार था ।

उधर-पूरी तरह आश्वस्त होने के बाद उप-अधीक्षक ने शुक्ला को इशारा किया और आगे बढ़कर शुक्ला ने मकान के बंद दरवाजे पर दस्तक दी!

काफी अंतराल के बाद पूछा बनाया---" कौन है?"

"हम सरकारी आदमी है ।" नागर ने थोडी ऊंची आवाज में कहा-"जनगणना बिभाग से आए हैं -दरवाजा खोलिए!"

दरवाजा एक झटके से खुल गया ।

सामने खड़ी दीपा को देखते ही वे भांप गए कि वह किसी टेशन में है--पसीने से तर-बतर उसका सफेद चेहरा उसकी मानसिक स्थिति की चुगली खा रहा था ।

"क…कहिए !" उसने कांपती आवाज में पूछा !

"हम जनगणना विभाग से आए हैं!" एक खुला हुआ रजिस्टर और पैन हाथ में लिए नागर ने कहा--"जानना चाहते हैं कि यहाँ कौन-कौन रहता है?" '

" म - मै और मेरे पति ।"

" बस ।"

" ज ---- जी हां ।"

" आप यहां केवल दो ही व्यक्ति हैं ?"

" जी ।"

" नाम ?"

दीपा के कुछ कहने से पहले ही शुक्ला ने कहा ---" क्या हम अन्दर बैठकर कॉलम भर सकते है ?"

" श--श्योर ।" कहती हुई वह एक तरफ हट गई ।

तीनों अन्दर प्रविष्ट हुए --- पुलिसिया नजरो से क्षण भर में कमरे का निरिक्षण कर डाला --- दोंनों कमरों के बीच का दरबाजा उनमें से एक की नजरों से भी छुप ना पाया था --- सोफे पर बैठते हुए उप अधिक्षक ने पुछा ---" क्या इस वक्त आप घर में अकेली हैं ?"

" जी हां ।"

" आपके पति कहां है ?"

" ड् -- डयूटी पर ।"

उधर ये बातचीत चल रही थी और इधर बेडरूम से 'की-हाल' के जरिए देख रहे देव ने अपने चेहरे पर सारी दुनिया की, बौखलाहट के भाव उत्पन्न किए और वहां से आंख हटाकर जगबीर को घसीटता हुआ कमरे के बीचों बीच ले जाकर, फुसफुसाया----" ग-गजब हो गया?"

"क-क्या बात है-तुम इतने घबराए हुए क्यों हो?"

 


"लगता है कि पुलिस को यहाँ तुम्हारी या दौलत में से किसी की मौजूदगी की भनक लग गई है ।"

"क्या बक रहे हो?"

"मैँ ठीक कह रहा हूं ।" इसमें शक नहीं कि देव एक सफल अभिनेता था---" वे जनगणना से सम्बन्धित लोग नहीं हैं- उस नीली कमीज वाले को मैं खुब पहचानता हूं--- चैकपोस्ट पर भी मैंने उसे देखा था-वह पुलिस वाला है---भेष बदलकर शायद वे यहां से कोई टोह लेने आए हैं!"

जगबीर का सारा चेहरा भभक उठा---"दांत भींचकर गुर्राया-"यहाँ पुलिस भला कैसे पहुंच सकती है-------मेरा या दौलत का सुराग उन्हें

कैसे लग सकता है ?"

" म--मुझे क्या मालुम-- मै तो सिर्फ यह जानता हूं कि वे पुलिस वाले हैं!"

उसे घूरते हुए जगबीर ने बड़े ही खूंखार स्वर में कहा-"कही तुम ही कोईगड़बड़ नहीं कर रहे हो?"

"म--मैं -"' देव सचमुच गड़बड़ा गया…"म-मैं भला गडबड क्यों करने लगा और फिर अपने घर में मैं खुद ही पुलिल क्यों वुलाऊंगा?"

"मुझे किसी चक्कर मे फंसाने के लिए ।"

"क-क्या बात कर रहे हो-तुम पुलिस के चक्कर से फंसते ही हमारा भांडा भी फोड़ सकते हो, मगर ये समय इस किस्म की वातें करने का नहीं है जगबीर----" वे किसी भी क्षण इस कमरे में पहुच सकते हैं!"

""तो?" उसे घूरते हुए जगबीर ने पूछा!

"अगर तुम्हें यहां पुलिस ने देख लिया तो गजब हो जाएगा-फिलहाल तुम यहाँ से निकल जाओ---इस आफ़त के टलने के वाद फिर आ जाना ।"

"कहां निकल जाऊ?"

"व-वो खिड़क्री है!" देव बन्द खिडकी की तरफ़ इशारा करके बोला…-""तुम उसके जरिए पीछे निकल जाओं-क्विक-जल्दी करो-आओ! "

"नहीं!" जगबीर ने सख्ती से कहा ।

खिडकी की तरफ़ बढ़ रहे देव के कदम जाम हो गए-दिल धक्क से रह गया और मुह से एक ही शब्द निकल-----" क्यों ?"

"मैं यहाँ से निकलकर कहीं नहीं जाऊंगा !" जगबीर के ये शब्द गड़गड़ाती हुई विजली बनकर देव के दिलो-दिमाग पर गिरे----"' अगर पकडा जाता हूं तो यहीं से पकड़ा जाऊंगा-इसी मकान-इसी कमरे से!"

"क-यया बात कर रहे हो?" देव, के हाथ-पैर फूल गए-"पकड़े जाएं तुम्हारे दुश्मन----" इधर से निकल जाओ जगबीर वरना अब तक के सारे किए धरे पर पानी फिर जाएगा"

"अगर वे पुलिस वाले हैं और उन्हें किसी तरह का संदेह हो गया तो निश्चय ही उन्होंने इस इमारत को चारों तरफ से घेर लिया होगा-मेरे निकलकर भागते ही उनका संदेह विश्वास में बदल जाएगा--नहीं-मैं यहाँ से भागने की बेवकूफी हरगिज नहीं करूँगा! "

देव मानो राख के ढेर में बदलकर रह गया । अपने सारे शरीर पर उसे असंख्य चीटियां रेंगती महसूस हुई…जगबीर की जिद के कारण स्कीम नाकाम हुई जा रही थी-----इस नाकामी ने देव को सिर्फ बौखला ही दिया, वल्कि पागल-सा कर दिया-जी चाहा कि खिड़की खोले…जगबीर की गर्दन पकड़कर ज़बरदस्ती उसे बाहर धक्का दे दे, परन्तु ऐसा मुमकिन न था…हां-दांत' भीचकर गुस्से में वह गुर्राया ज़रूर-"क्यों सारी, मेहनत पर पानी फेरने पर आमादा हो जगबीर-----मैं कहता हूं भाग जाओ!"

"मैं एक बार!"

जगवीर का वाक्य पूरा न हो सका । .

बन्द दरवाजे पर दस्तक हुई ओंर इस दस्तक ने उनकी वैसी हालत करदी जैसी एक पेड़ से बंधी बकरी की शेर को देखकर हो जाती है-देव फुसफसाया---"वे यहां पहुंच गए हैं----अव भी वक्त है जगबीर -- मैं कहता हूं निकल जाओं यहां से ।

मगर जगबीर ने उसकी एक न सुनी ।

उसने कमरे में पड़े डाबलवेड की प्लाई,गद्दे और चादर सहित उठाई-वह बिस्तर रखने वाले स्थान में प्रविष्ट होता हुआ फुसफुसाया-"गद्दा और -चादर दरुस्त कर लेना!"

बेड में अटैचड बॉक्स में वह लेट गया-ऊपर से ढक्कन की तरह इस्तेमाल होने वाली प्लाई उसने आहिस्ता से गिराई ही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई!

बेचारा` देव!

काटो तो खून नहीं!

स्कीम तो अब पूरी तरह धराशायी हो ही चुकी थी, बल्कि अब तो उसे उन हालातों से जूझना था, जो इस स्कीम की नाकामी के कारण उसके सामने मुंह बाए खडे़ थे । उसने जल्दी से बिस्तर ठीक किया ।

पुनः दस्तक!

"कौन है?" उसने नींद में डूबे अलसाए स्वर में पूछा ।।

"दरवाजा खोलिए मिस्टर देव-हम जनगणना विभाग से आए हैं और उसी के सम्बन्थ में आपसे कुछ जानकारी चाहते हैं!"

"म-मेरी बात तो सुनिए-वे घर पर नहीं हैं!" बेवकूफ़ दीपा अब भी यही कहे जा रही थी ।।

"आप चुप रहिए! किसी ने उसे डांटा और इस बीच देव एक बार पलंग पर लेटकर विस्तर को इस स्थिति में पहुचा चुका था कि जेसे वहाँ कोई ’सोया हुआ था…दरवाजे की तरफ बढते हुए उसने अपने बाल बिखेर लिए…आंखों में आलस्य भरा!

दरवाजा खेलते ही तीन जिन्न उसके सामने थे!

उनमें से एक देव को तेजी से धकेलकर अन्दर दाखिल हो गया-जाने कब उसने जेब से रिवॉल्वर निकलकर हाथ में ले लिया था-जिस वक्त वह कड़ी और खोजी दुष्टि से सारे कमरे फा निरीक्षण कर रहा था, उस वक्त देव की नज़र दीपा के चेहरे पऱ पडी ।

उफ-सदियों की बीमार नजर आ रही थी ।।

वह पीला जर्द चेहरा, काटो तो खून नहीं!

टाँगे कांप रही थी ।

"यहाँ तो कोई नजर नहीं आता सर !" सारे कमरे का निरीक्षण करने के वाद रिवॉल्वर हाथ में लिए शुकला उप-अधीक्षक की तरफ पलटकर बोला ।

एकाएक नागर ने सीधा सवाल देव से किया…"कहां है वह?”

"क-कौन ?"

"वही बदमाश जो तुम्हें कवर किए हुए था!"

"म-मुझे कवर किए हुए?" देव बोला-"म-मुझे भला कौन बदमाश क्योॉ कवर करेगा?"

 


नागर ने कोई सवाल नहीं किया, बल्कि सिर्फ खा जाने वाली नजरों से उसे देखता रहा, जबकि ये नजरे मौत की तरंगे बनंकर उसके समूचे जिस्म में फैेल गई थीं…उप पुलिस अधीक्षक ने पूछा…"'क्या तुम यह कहना चाहते हो कि तुम्हे किसी बदमाश ने कवर नहीं कर रखा था?"

" कमाल की बात कर रहे हैं आप!" "डरो मत ।" उसका वाक्य पुरा होने से पहले ही शुक्ला बोला-"हमारे घेरे में तुम सुरक्षित हो-वह तुम्हें कोई नुक्सान नहीं पहुचा सकेगा-बेखौफ बताओ कि वह कहाँ है ?"

"क-कौन-कहां है-किसकी बात कर रहे हैं आप-और आप लोग कौन हैं---, रिवॉल्वर, ये सब क्या चक्कर है?"

' "हम पुलिस वाले हैं-ये हमारे डीएसपी साहब है?"

"प-पुलिस?" कुछ भी सही ----देव एक शानदार एक्टर जरूर था…"मगर पुलिस का यहां क्या काम…क्या किया है मैंने ?"

हर्में खबर मिली थी कि एक बदमाश आप लोगों को रिवॉल्वर से डरा-धमकाकर पुलिस से बचने के लिए यहाँ पनाह लिए हुए है ।"

"क्या बात कर रहे है आप-यह तो किसी ने वे पैर की उड़ा दी-खबर बिल्कुल झूठी थी…जाकर उसे गिरफ्तार कीजिए, जिसने खबर दी!"

"खबर हमें एक अज्ञात व्यक्ति ने फोन पर दी थी!"

"हद है…इसका मतलब तो ये हुआ कि!"

"क्या तुम बिकुल सच बोल रहे हो?".उसकी वात काटकर नागर खूंखार स्वर में बोला-"इस स्थान में तुम दोनों के अलावा और कोई अभी नहीं था?"

" अन्दर-ही-अन्दर रुह कांप गई देव की, जबकि प्रत्यक्ष में बोला--'"कितनी वार कहना पड़ेगा कि यहाँ हम दोनों ही हैं-अपको मिली इंफोरमेशन गलत है!"

"तो कमरा बद करके तुम यहां क्या कर रहे थे?"

"सो रहा था ।"

"'दिन में?"

" क्यो-क्या दिल में सोना कानून-की किसी धारा के मुताबिक अपराध है?"

" मगर तुम तो कह रही थी कि तुम्हारे पति घर में हैं ही नहीं?"

एकाएक दीपा की तरफ़ पलटकर नागर ने ऐसे सख्त स्वर में सवाल किया कि दीपा की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई…जवाब की तो बात ही दूर-उसके मुंह से चूं-चां तक नहीं निकली--हां----बात को सम्भालने के लिए देव ने जल्दी से जवाब दिया…""इसे मैंने यही निर्देश थे…सोने से पहले मैंने इससे कहा था कि यदि मुझें पूछने कोई भी आए तो इंकार कर दे!"

"क्यों? "

"स-सॉरी ---यह मेरा पर्सनल मामला है ।"

उप-अधीक्षक महोदय ने पूछा-मगर ये इतनी डरी हुई क्यों हैँ-देखिएं-इस वक्त भी बेहद आतंकित हैं ये----शुरू से हम इन्हें इसी हालत में देखं रहे है…फवक और निस्तेज -देखकर कोई भी कह 'सकता है कि ये द्गहशतग्रस्त हेै…इनक्री यह अवस्था देखकर हमे पक्का विश्वास हो गया था कि फोन पर मिली सूचना सही है ।"

दीपा को तो मानो लकवा मार गया था!

डर की ज्यादती के कारण उसका सर चकराने लगा-अपनी आखों के सामने का सारा हिस्सा उसे किसी फिरकनी की तरह तेजी से घूमता नजर आ रहा था, जबकि देव ने कहा----"यह पर्सनल मामला शायद मुझें आप लोगों के सामने स्पष्ट करना ही पड़ेगा ।"

" कौन-सा पर्सनल मामला?"

"ब-बात दरअसल ये है डी.एस.पी. साहब कि आज से आठ महीने पहले मेने दो महीने के वादे पर एक सेठ से पांच हजार रुपए लिए थे-जान-पहचान होने की वजह से उसने बिना कुछ गिरवी रखे और विना व्याज के पैसे दे दिए, मगर मैं अपनी माली हालत अच्छी न होने की वजह से अभी तक उसका पेमेंट नहीं कर पाया -वादे पर वादे करता रहा-कल बात इतनी बढ़ गई कि उसने धमकी दी…'अब मेरी समझ में आ का है कि घी सीधी उगली से नहीं निकलेगा--मुझे पैसे देने आते, तो वसूल करने भी आते हैं-जाओ-मैं वसूल कर लूगा!' इस धमकी से मुझे लगा कि अब शायद वह गुण्डों से मेरी पिटाई कराएगा-यह संभावना मैंने अपनी बीबी के सामने व्यक्त करते हुए निदेश दिया कि चाहे जो जाए उससे कह दे कि मैं घर में नहीं -ये बेचारी गुण्डों वाली बात सुनकर कुछ ज्यादा ही डर गई आपको देखकर तो लगता है कि इसके प्राण ही सूख गए हैं!"

. "वह कौन सेठ है जिसके आप पर पांच हजार रुपये चाहिएं?"

"रघुबरपुरे में रहता है. .मगर आप उसका नाम पता क्यों पूछ रहे हे-नहीँ-मैं आपसे उसकी कोई शिकायत नहीं कर रहा -गलती तो मेरी ही है, जो वार-वार वादे करने के बाद भी पैसा नहीं दे सका…उस बेचारे ने तो ऐसा कुछ किया नहीं-व-वह तो आपने दीपा के आतंकित होने यह कारण पुछा तो मैंने बात पर बात कही-----आप लोगों को यह उसके द्वारा भेजे हुए गुण्डे ही समझी होगी-तभी तो इतनी डर गई-क्यों दीपा --- तुमने इन्हें पैसा वसूल करने वाले गुण्डे ही समझा था न?"

सबकी दृष्टि दीपा की तरफ घूम गई ।।

और दीपा बेचारी की आंखों सामने अंधेरा फैलता चला गया----" देव की वात में हां…मे-हां निकाले के लिए उसने मुंह खोला ज़रूर, किन्तु उससे कोई आवाज न निकाल सकी ।

सबके देखते-ही-देखते वह चकराकर धड़ाम से फर्श पर गिरी ।

देव के साथ सभी उसकी तरफ लपके --- वह बेहोश हो चुकी थी ।।।

खिडकी के समीप रिवॉल्वर हाथ में लिए दीवार से चिपके खड़े जब्बार की मानसिक स्थिति पागलों जैसी हो गई-----" हर पल खिडकी के खुलने और उसमें से जगबीर के निकलकर भागने की इन्तजार थी, किन्तु इन्तजार की पराकाष्ठा के बावजूद वेसा नहीं हुआ!

कमरे के अन्दर से उसे विभिन्न किस्म की आवाजें ज़रूर आती रहीं--- आवाजें अस्पष्ट थीं-शुरू में तो उसने सोचा कि देव जगबीर को खिड़की के माध्यम से निकल जाने की सलाह दे रहा होगा, मगर शीघ्र ही उसने नागर और शुक्ला की आवाजे 'पहचान ली!

यह बात तुरन्त उसकी समझ में आ गई कि पुलिस टीम बेडरूम में पहुच चुकी और यह समंझ में आते ही दिमाग में सवाल कौंधा…"तो फिर जगबीर कहां है…बाहर तो वह निकला नहीं!"

"क्या वह पकड़ा गया?" इस एक मात्र सवाल ने जब्बार के छवके छुड्रा दिए-हाथ-पाव सुन और ठंडे पड़ गएं-दिमाग का चक्का जाम-जगबीर के बयान उसके कानों में गूंजने लगे और उस वक्त उसे अपने हर तरफ अंधेरा-हीं-अंधेरा नजर आ रहा था, जब कानों से भारी पदचाप टकराई ।

कोई इथर आ रहा था।

उसने जल्दी से रिवॉल्वर होलस्टर में ठूंसा और अभी पूरी तरह खुद को सम्भाल भी नहीं पाया था कि सार्जेंट बलजीत मोड़ पार करके सामने आ गया-----वहीं से चीखकर बोला----. आइए सर…नागर साहब ने कहा हैकि अव इस इमारत को घेरे रहने की कोई जरूरत नहीं है!"

"क-क्या वह पकड़ा गया?" समंभालते--सम्भालते भी लहजा बुरी तरह कांप रहा था।

"नो सर…यहां कोई था ही नहीँ-इफॉरमेशन गलत थी!" इस जवाब ने जहां उसे -राहत पहुंचाई वहीं सैकडों सवाल भी पैदा कर दिए । "

केई था ही नहीं?

ऐसा भला कैसे हो सकता है-जगबीर कहां गया?

अचानक उसके दिमाग में विचार कौधा…"कहीं देव ने झूठ तो नहीं बोला था…कहीँ 'जगबीर' उसे आतंक्ति करने के लिए देव के दिमाग की कल्पना ही तो न थी-मगर-यद्रि यह सिर्फ कल्पना होती तो वह इतना सब…ये लम्बा-चौड़ा ड्रामा क्यों रचता --- क्यों बेवजह अपने घर में पुलिस को आमंत्रित करता----" यह नाटक था तो देव को आखिर इससे क्या लाम होने वाला है?"

उसे उक्त सवालों में से किसी का भी जवाब न सूझा--बात ठीक से उसके पल्ले न पड्री थीकि इस बीच नजदीक पहुच गए बलजीत ने पुछा-"क्या बात है सर…आप इतने अपसेट क्यों है-उफ-आपक चेहरा------चेहरा तो पसीने-पसीने हो रहा है!"

 


"क-कहाँ-न----नहीं तो!" जवार ने बौखलाकर कहते हुए जेब से रूमाल निकाला और पसीना पोंछने के बहाने अपना चेहरा ढांपते हुए बोला---" चलो ।"

इमारत के अग्र भाग और फिर ड्राइंगरूम को पार करके बेडरूम में कदम रखने तक वह स्वयं पर पूरी तरह नियन्त्रण पा चुका था-बेहोश दीपा को पलंग पर लिटाया जा चुका था!

पंखा पूरी गति से चल रहा था ।

हाथ में पानी से भरा गिलास लिए देव उसके संमीप बैठा था और उप-अघीक्षक, नागर, शुक्ला आदि उसके चारों तरफ़ खडे़ थे-जब्बार के कमरे में कदम रखते ही देव से उसकी नजरे मिलों!

आंखों में देर सारे सवालिया निशान थे मगर ऐसा कोई निशान नहीं जो उन्हें पहले ही से एक…दूसरे का पंरिचित 'शो‘ करे…जब्बाऱ भी पुलिस वालों के बीच चुपचाप खड़ा होकर दीपा को देखने लगा । तभी उप-अथीक्षक महोदय ने कहा-"औरतो का दिल बड़ा कमजोर होता है मिस्टर देव-उनसे गुण्डो-वुण्डो का जिक्र नहीं करना चाहीए ।"

"मैंने कल्पना नहीं की थी कि वह इतनी डर जाएगी!"

""खैर. . कोई खास बात नहीं है…आतंक की ज्यादती के कारण इन्हें चक्कर आ गया और बेहोश हो गई…कुछ देर बाद खुद होश में आ जाएंगी फिर भी-किसी डाँक्टर को बुला लेना उचित होगा!"

"जी!” देव ने सिर्फ इतना ही कहा ।

इस वक्त वह थोड़ा निश्चित था, क्योंकि सबका ध्यान बेहोश दीपा पर था और वह उस बेड पर लेटी थी जिसके अन्दर जगबीर था--बेड बक्सेदार है और उसके अन्दर कोई हो सकता है ----

वर्तंमान हालातों में किसी के दिमाग में यह बात आने की सम्भावना न थी-फिर भी वह पुलिस को जल्दी-से-जल्दी यहाँ से निकाल देना चाहता था…अतः गिलास एक तरफ रखा-उठकर खडा होता हुआ बोला…"क्या अपको मुझसे और भी कोई सवाल _ करना है?"

""नों...हमारी वजह से तुम लोगों को जो टैंशन पहुंची उसके लिए हमे अफसोस है!" उप-अधीक्षक ने उसका कंधा थपथपाते हुए कहा…"मगंर हम भी मजबूर थे और दरअसल आप दोनों की मदद के लिए ही जनगणना अधिकारी बनकर यहां आए थे…फोन पऱ हमें किसी ने सूचना दी थी कि एक मुजरिम ने आप लोगों को आप ही के घर में कैद कर रखा है!"

"मैने पहले ही सम्भावना व्यक्त की थी सर कि फोन किसी की शरारत हो सकती है!" प्रशंसा पाने के लिए सीना तानकर नागर ने उन्हें याद दिलाया----"ट्रेजरी के दो लुटेरे फरार हैं--एक नहीं और फिर लूट. की रकम के साथ उनके शहर में घुसने की कोई तुक ही नहीं है!"

" तुम्हारा अनुमान ठीक निकला-खेर----- जो लोग इमारतों के चारों तरफ लॉन में छुपे हुए थे, उन्होंने कहीं कोई ऐसी चीज, तो नहीं देखी ,जिससे यहां कहीं आस-पास किसी बदमाश की मौजूदगी का आभास होता हो?" उप-अधीक्षक ने औपचारिकता के नाते सभी से पूछा!

सभी चुप रहे!

चलने लिए उप-अधीक्षक अभी देव से इजाजत लेना ही चाहते थे कि सार्जेंट बलजीत ने कहा-" मैंने ऐसी तो कोई चीज नहीं देखी सर जैसी आप पूछ रहे हैं, लेकिन. . . !"

"लेकिन क्या?"

"जिधर मैं खड़ा हुआ था, उधर लॉन के एक हिस्से को देखकर मुझे ऐसा लगा जैसे एक-दो दिन पहले ही वहीं किसी ने गहरा गड्डा करके पुन: उसे भर दिया हो ।"

देव की धमनियों से बहता खून अचानक फ्रीज हो गया!

जबकि शुक्ला ने साजेंन्ट पर घुड़क्रत्ते हुए क्रहा---"सर ने तुमसे बेवकूफी भरी बाते करने के लिए नहीं कहा धा-ये क्या वात हुई खुदे हुए लॉन का ही जिक्र करने लगे------

------क्या तुम यह कहना चाहते हो कि हमारे यहाँ आते ही बदमाश गड्डा खोदकर जमीन में घुस गया और फिर अन्दर से उसने उसे भर भी लिया ।"

सभी "हंस पडे! "

वेचारा सार्जेन्ट ।

सकपका ही नहीं बल्कि बुरी तरह घबरा गया वह -रोते से स्बर मे बोला----"म-मेरे कहने का मतलब तो ये था सर कि शायद वहां गड्डा खोदकर किसी ने कोई चीज छुपा रखी हो?"

“क्या बकवास कर रहे हो?" अचानक देव आपे से बाहर होकर चीख पड़ा-"यहां भला कोई क्यो लान में गड्डा खोदकर किसी चीज को दबाएगा-वह गड्डा मैंने गुलाब का पौधा लगाने है लिए खोदा था ।"

"ओह...आप तो बुरा मान गए मिस्टर देव-जितनी अक्ल उतनी ही उसने बात की?" उप-अधीक्षक ने कहा----""इसकी तरफ से हम आपसे माफी मांगते हैं ।"

देव का चेहरा अभी तक बुरी तरह भभक रहा था…दरअसल उसे लगा था कि ये लोग लॉन में गड़ी दौलत तक पहुंचने वाले हैं और इसी शंका ने उसके होश उड़ाकर रख दिए थे…अभी तक लम्बी--लम्बी सांसे ले रहा था वह जबकि उप-अधीक्षक ने कहा…" चलो ।"

"ठहरिए सर ।" निरन्तर देव के चेहरे का निरीक्षण कर रहे नागर ने एकाएक कहा तो कमरे से निकलने के लिए मुड़ते-मुड़ते सभी ठिठक गए!

"क्या बात है नागर?"

"हमे उस खुदे हुए स्थान पर जांच करनी चाहिए सर ।"

" क्या बात कर रहे हों-क्या तुम भी इस सार्जेंट की बातों में !"

"नो सर. . .मैं बलजीत के कथन से कतई सहमत नहीं हुं , परन्तु उस गड्ढे का जिक्र होते ही मिस्टर देव मुझे जरूरत से कुछ ज्यादा ही पेरेशान----उतेजित और चिन्तित नजर आने लगे हैं और मैं इनकी इस अवस्था का राज जानना चाहता हूं ।"

देव को काटो तो खून नहीं!

'" सबकी नजरे उसके चेहरे पर जम गई और ऐसा होने पर लाख प्रयासों के बावजूद उसके चेहरे की सफेदी झलकती चली गई----बोला----"अ----आप गलत सोच रहे हैं इंस्पेक्टर---दरअसल मुझे इस सार्जेंट की ऊटपटांग बात पर गुस्सा आ गया था ।"

"अगर हम उस खुदे हुए स्थान को करें तो क्या तुम्हें कोई आपत्ति है ?"

" ब-बिल्कुल नहीं-मुझे भला क्या आपत्ति हो सकती है, मगर...!"

" मगर ?"

. "व-व्यर्थ ही आप अपना समय क्यों बरबाद करते हैं-वहाँ भला क्या हो सकता है?"

"हमारा जो भी समय है वह इन्हीं बातों के लिए होता----खेर---हम आपको किसी तरह का कष्ट नहीं देगे-आप यहाँ आराम से बैठकर अपनी वाइंफ़ की देखभाल कीजिए-कहे तो किसी कांस्टेबल द्वारा डॉक्टर को बुलवाएं-गड्डे को हम खुद चेक कर लेंगें ।"

बात , बिगड़ती देखकर देव के छक्के छूटे जा रहे थे---बोला…"अ…अजीब बात कर रहे हैं आप--वहाँ भला क्या रखा हे-डी-एस.पी. साहब-आप ही इन्हें कुछ समझाइए न?"

"जब वहाँ कुछ है ही नहीं तो आपके पेट में इतना दर्द क्यों हो रहा है?" इस बार शुक्ला ने कहा ।

 


देव का दिल चाहा कि अपने बाल नोच ले----सर इस कमरे की-दीवारों पर दे-देकर मारे…उसको अपनी ही मूर्खता से सारा खेल बिगड़ा जा रहा था ।

अब तो 'उप-अधीक्षक' महोदय भी संदिग्ध हो उठे!

देव के कन्धे पर हाथ रखकर बोले-"फिक्र मत करो यंग-मैन अगर वहां कुछ नहीं होगा तो तुम्हारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा!"

देव का दिल चाहा कि वह उनके पेरों में गिर पड़े ।

रोए-गिड़गिड़ाए!

हाथ जोड़कर उस खुदे स्थान को न छेडने की रिवचेस्ट करे , परन्तु लगा कि उसकी सुनी नहीं जाएगी---उल्टा उनका इरादा दुढ़ हो जाएगा----भेद खुल जाने के डर से पागल-सा होकर है वह चीख पड़ा---"हां. . .खोदो उसे-देख लो-मैं लुटेरा हूं----चोर हूं-डाकू हूं-ट्रेजरी को मैंने ही लूटा था और वह दोलत मैंने वहां दबा रखी हे…खोदकर निकल लो!"

"क्या बात है यंगमेन-इतने नर्वस क्यों हो गए तुम?"

अब देव ने दूसरा रुख इख्तियार किया-----" जब आप एक शरीफ़ शहरी पर डाकू-चोर होने का इलजाम लगाएंगे तो वह नर्वस नहीं होगा तो क्या होगा ?"

"मगर हमारे ख्याल से तुम्हें किसी ने चोर-डाकू -नहीं कहा!"

"सीधे न कहकर आप इशारे में कह रहे है---चोर-डाकू कहना नहीं तो और क्या है कि आप किसी शरीफ शहरी के द्वारा पोथा लगाने के उद्देश्य से अपने लॉन में खोदे गए गड्डे की जांच पड़ताल करते फिरेॉ--आपको इस तरह किसी का अपमान करने का कोई हक नहीं है!"'

" अभी तक किसी ने आप पर कोई इलजाम नहीं लगाया फिर आपका अपमान कैसे हो गया?"

"जव मुझ पर कोई इलजाम ही नहीं तो फिर आप क्यो मेरे लॉन में गड्डे को चेक करना चाहते हैं-----ऐसा करने का आपको क्या हक है?"

आगे बढता हुआ नागर दांत भीचकर बोला----"डी.एस. पी. साहब की नर्मी का नाजायज फायदा उठा रहे हैं मिस्टर देव-वार-बार पुलिस के हक की बात मत कीजिए, हमें हर उस शाम, हर उस स्थान को चैक करने का हक है जिस पर हमें हल्का-सा भी शक हो!"

"म-मुझ पर क्या शक है आपको?"

"कोई शक नहीं था, मगर व्यवहार से अब शक हो रहा है कि लॉन में तुमने ऐसी चीज गाड़ रखी है, जिसे पुलिस की नजरों में नहीं आने देना चाहते और अब हम उस चीज को देखे विना इस मकान से बाहर नहीं जाएंगे!"

"आपको बेवजह शक हो रहा है, 'वहां कुछ भी नहीं है!"

"जांच के बाद स्वयं पता लग जाएगा ।"

"फिर वही बात, आप समझते क्यों नहीं-----मैं सिर्फ इसलिए इतना चीख-चिला रहा हूं आपके इस तरह खोदने और जांच-पड़ताल -से बेवजह मेरी बेइज्जती होगी, लोग न जाने किस-किस तरह की शंकाएं मुझ पर करेगे?"

"अदालत के दरवाजे सब के लिए खुले हैं, अगर वहां से कुछ न मिले तो आप पुलिस पंर मान-हानि का दावा कर सकते हैं ।" नागर के इस वाक्य ने उसके मुंह पर कुकर का ढक्कन फिक्स कर दिया-अव उसके पास विरोध करने लिए तर्क-संगत शब्द ही ना रहे ।।।

जब्बार सहित समूची पुर्लिस टीम कमरे से ही नहीं बल्कि इमारत से बाहर जा चुकी थी । लॉन से उनके बात करने की अस्पष्ट आवाजें आ रही थी ।

कमरे में देव अकेला खड़ा था , दीबारें उसे मुंह चिढ़ाती सी महसूस हो रही थी ।

आखों के आगे रंग बिरंगे तारे नाच रहे थे ।

खेल खत्म होने में अब उसे कहीं कोई गुंजाइश नजर नहीं आ रही थी --- वह जानता था कि अगर उन्होंने गड्ढा खोदा तो अटैची उनके हाथ लग जाएगी और खेल खत्म !!

देव का जी चाहा कि यहां से भाग जाए!

परन्तु ।।

भागकर जाए कहां?

पुलिस पाताल से भी मुझे खोज निकालेगी!

अभी वह अपने मन में उठ रही 'हजारों डरावनी शंकाओं से आतंकित हो ही रहा था कि बेड की प्लाई धीरे से थोड़ी ऊपर उठकर वापस गिऱी, देव उछल पड़ा!

घूमा!

जगबीर प्लाई को उठाकर पलंग के बॉक्स से निकलने-कि चेष्टा कर रहा था परन्तु ऊपर दीपा का बेहोश जिस्म पड़ा होने की वज़ह से -कामयाब न हो पा रहा था, दीपा के जिस्म को एक तरफ़ हटाने के लिए देव अभी पलंग की तरफ़ बढना ही चाहता था कि ड्राइंगरूम में पदचाप गुंजी !

"कोई आ रहा हैं' तेजी से फुसफुसाता हुआ वह दरवाजे की तरफ मुड़ा और जब्बार को अपनी तरफ आता देखते ही उसे बिजली का शॉक लगा!

"ज-जब्बार तुम?" उसकी तरफ़ लपकता हुआ देव अभी कुछ कहना ही चाहता था कि!

"श-श-शी-शी!" जवार ने अपने 'होंठों पर उंगली रखकर जल्दी से उसे चुप रहने के लिए कहा और फुसफुसाकर बोल.----" ये सब क्या चक्कर है, स्कीम फेल केसै ।"

आह ।

यह सोचकर देव तिलमिला उठा कि इन बातों को जगबीर सुन रहा है और अगर वह समझ गया तो पुलिस द्वारा दौलत बरामद करने से पहले ही उसके जिस्म के टुकड़े करके इस कमरे में बिखेर देगा-जब्बार का एक ही शब्द उसके लिए मौत का वारंट वन सकता था, अत: उसका हाथ पकडकर तेजी से ड्राइंगरूम में घसीट लाया-दोनों कमरों के बीच का दरवाजा बंद किया और

फूसफूसाकर बोला, "ध-धीरे बोलो, तुम्हारा एक भी शब्द अगर जगबीर ने सुन लिया तो हम दोनों में से किसी की खेर नहीं ।"

जब्बार दांत भींचकर फुफकारा…"अब मैं तुम्हारे दिमाग के इस काल्पनिक जगबीर क फेरे में पड़ने वाला नहीं हूं, नाटक बंद करो !"

"क-क्या कमाल कर रहे हो, मैं तुमसे नाटक नहीं कर रहा हूं---उफ-------------भगवान केलिए समझने की केशिश करो जब्बार---------जगबीर मेरे दिमाग की कल्पना नहीं है!"

 


"ये सब समझ चुका हुं ।" वह खूंखार स्वर में गुर्राया, धीरे इसलिए बोल रहा हूं क्योंकि बाहर पुलिस है, अगर वे न होते तो समझा तो मैं तुम्हें अभी देता मगर खेैर, बाद में सही…जब्बार के साथ चाल चलने की सजा मैं तुम्हें देकर रहूंगा-फिलहाल ये बताओ कि फावड़ा कहां है?"

"फ-फावड़ा?"

"हाँ, जिससे तुमने वह गड्डा खोदा था…डी.एस.पी. साहब ने मंगाया है!"

"क-वया गजब कर रहे हो जब्बार, अगर यह गड्डा खुद गया तो मैं, तुम दीपा और जगबीर सब फंस जाएंगे----वहाँ ट्रेजरी से लूटी गई दोलत दफन है!"

"क-क्या?" जब्बार के तिरपन कांप गए।

"हां-इसीलिए तो मैं इतना घबराया हुआ हुं !" देव ने जल्दी से कहा----" तुम्हीं कुछ करों जब्बार, , किसी तरह उन्हें वह गड्डा खोदने से रोको-हम सब तबाह हो जाएंगे, इतना मौका ही नहीं मिलेगा कि बाद में कोई किसी से किसी तरह का बदला ले सके!"

जब्बार बेचारे ने तो उसके मुंह से निकलने वाला मानो कोई वाक्य सुना ही न था-उसके पहले वाक्य को सुनकर मानो वह किसी देवऋपि के श्राप से किसी पत्थर की मुर्ती में तबदील हो गया था ।

कहीं कोई हरकत नहीं!

पलकें तक न झपक रही थी!

उसकी यह हालत देखकर देव के देवता कूच कर गए । द्रोनों हाथों से जब्बार के कंधे पकड़कर देव ने उसे बुरी तरह झंझोड़ा और जब्बार मानो गहरी नींद से जागा । पागलों की तरह बड़वड़ा उठा वह-"न…नहीँ---ये नहीं हो सकता!"

"क्या नहीं हो सकता?"

"दौलत वहां नहीं हो सकती, इतनी बडी बेवकूफी तुम कभी नहीं कर सकते!"

"बेवकूफी हो गई है जब्बार, दौलत वहीं है!" इस वार सचमुच रो पड़ा देव, बुरी तरह गिड़गिड़ाता हुआ बोला-----"'कुछ करो, कुछ ऐसा कि उसे खोदकर देखने की बात ही उनके दिमाग से निकल जाए-इसी में हम सबकी भलाई है!"

"नागर साहब वहुत कांईयां और जिद्दी किस्म के पुलिसिये हैं, अब उन्हें उस स्थान की जाचं करने से दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती!"

"ए-ऐसा मत कहो जब्बार, कुछ करो दोस्त!"

"उन्होंने मुझे फावड़ा लेने भेजा है बताओ कहां है, वरना देर होने कि स्थिति में वे किसी और पुलिस वांले को यहां भेज सकते हैं और सुनो, माल बरामद होने पर तुम चेकपोस्ट वाली घटना या इस मामले में मेरे इन्वॉल्व होने का जिक्र किसी से नहीं करोगे !"

"क-क्यों नहीं करूंगा, जव मैं फंसुगा तो!"

वाक्य होने से पहले ही जब्बार झपटकर दोनों हाथो से उसका गिरेबान पकड़ लिया । उसे रवर के वने खिलौने की तरह अपने नजदीक घसीटा और चेहरा उसके चेहरे के अत्यन्त नजदीक ले जाकर बड़े ही खूंखार अंदाज-में गुर्राया---"मेरे होल्सटर ,मे हमेशा रिवॉल्वर रहता है, जिस क्षण तुम मेरा नाम लोगे उसी क्षण वह मेरे हाथ में आ जाएगा और पुलिस की गिरफ्त में फंसने से पहले ही मैं तुम्हारा और दीपा का कत्ल कर चुका होऊंगा-----मुझे वही सजा होगी जो नाम ले देने से होने की सम्भावना है और सुनो, अगर मेरा-नाम नहीं लिया-इस मामले से दूर रखा ये मेरा वादा है, पुलिस में होने के नाते मैं तुम्हें कानून से बचाने के लिए जायज-नाजायज मदद करूँगा!"

देव की जवान को लकवा मार चुका था! जब्बार उसी अंदाज में कहता चला गया…"अदालत सिर्फ वह सुनती है जो हम कहते है और केस को अदालत में ले जाने से पूर्व हमारे पास उसे कमजोर या पुख्ता बनाने के लिए सैकडों हथकंडे होते हैं, सारे सबूत गायब कर देते है हम…खून तक के मुजरिम बाइज्जत वरी हो जाते हैं-ये केस तो है ही क्या, किसी के लान में कोई भी कुछ भी गाड़ सकता है!"

"क-क्या मतलब?"

"इन गुत्थीदार बातों को ज्यादा डिटेल में समझाने का वक्त मेरे पास नहीं है!" जब्बार ने कहा-"बस इतना याद रखो कि अगर मैं बाहर रहा तो यह केस जिस किसी भी अफ़सर के चार्ज में होगा-उससे बात करके, रिश्वत दे के, यानी किसी भी तरह, अदालत तक पहुचते-पहुंचते इतना कमजोर कर दूगा कि तुम गुनहगार साबित न हो सकोगे---साबित-यह होगा कि जाने किसने तुम्हारे लॉन में दौलत गाड़ दी और तुम दोनों बाइज्जत बरी हो जाओगे!

वह जवार के भभकते चेहरे को देखता रह गया ।

"इसके विपरीत अगर तुमने मेरा नाम लिया तो कानुन से पहले तुम्हें मेरा रिवॉल्वर सौत सजा देगा और अब गड्डा खुदने तक तुम सोच लेना कि इस मामले में मुझे इनवॉल्व करने में तुम्हारा फायदा है या न करने मे-काकी देर हो चुकी है, जल्दी से फावड़ा दो!" कहने के साथ ही -जब्बार ने उसे इतना तेज अटका दिया कि देव खुद को दीदार से टकराने से बडी़ मुश्किल से रोक सका ।।

सोच तो मिस्टर नागर ।" डी.एस.पी. महोदय कह थे---" अगर यहां कोई गैरकानूनी चीज न निकली तो लड़का पुलिस के लिए बबाल खड़ा कर सकता है!"

"कैसा बबाल सर?"

"अगर उसने किसी अखबार तक अप्रोच कर ली और कीसी रिपोर्टर को ये सारी कहानी सुना दी तो अखबार इस घटना को नमक-मिर्च लगाकर छापेगे----उन्हे चौबीस घंटे पुलिस पर कीचड उछालने के बहानों की तलाश रहती है, वे इस वात को उछालेगे कि ट्रेजरी के लुटेरे तो पुलिस पर पकडे नहीं जाते उल्टे शरीफ शहरियों को परेशान और बदनाम करने की कोशिश की जाती है!"

"ल-लेकिन सर, उसके चेहरे के भाव…बोखलाडट और चीख-पुकार से क्या आपको नहीं लगता कि यहाँ उसने कोई गैेर--कानूनी चीज गाड़ रखी है?"

"बेशक लगता है, मगर क्या सिर्फ शक की विना पर इतना रिस्क लिया जाए---मुमकिन है कि यह सिर्फ अपनी इज्जत की खातिर इतना चीख-रहा हो?"

"अगर उसे अपनी इज्जत की इतनी ही परवाह होती सर तो बकौल उसी के वह एक कर्जदार के डर से यूं घर में छुपा न बेैठा होता, किसी भी तरह उसका कर्ज निपटाता ।"

"क्या बात है?" बीच में शुक्ला बोल उठा'-----"'काफी देर होगई मगर इंस्पैक्टर फावड़ा लेकर नहीं लौटा ?"

" तुम खुद जाओ शुक्ला , देखो --- क्या बात है?"

" सर ।" मुस्तैदी से-कहने के बाद शुक्ला मुड़ा और तेजी से इमारत के द्वार की तरफ़ बढ गया, उधर नागर बोता-----" कुछ भी कहिए सर, मुझे पक्का यकीन है कि यहां कोई गैर कानूनी चीज गड्री है और मैं अंत तक इसे चेक करने की गुजारिश करता रहूंगा ।"

"तो जरूर करो हम तुम्हारे साथ हैं, और लो फावड़ा आ गया!" उप-पुलिस अधीक्षक के इन शब्दों के साथ सबकी नहीं उस तरफ उठ गईं-शुक्ला अभी इमारत के दरवाजे के इधर ही था कि जब्बार फाव्रड़े सहित बाहर निकला!

कुछ देर खाद फावड़ा उनके बीच था, जब्बार ने स्फाई दी-"फावड़ा अंधेरे स्टोर रुम में डाल रखा था, निकालने में टाइम लगा!"

किसी ने उसके शब्दों की तरफ ध्यान देने की क्रोशिश नहीं की ।

उस वक्त उसकी हालत देखने लायक थी, जब नागर ने उसे ही हुक्म दिया----"खुदाई शुरू करों जब्बार, ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं है, क्योकि खुदी हुई मिट्टी अभी ढंग से बैठी नहीं है । "

देव की हालत वड़ी अजीब थी।

 


जब्बार को फावड़ा ले जाते वह तब तक देखता रहा जव तक नजर आता रहा और आंखो से ओझल होने के बावजूद देव की वह मुद्रा न टूटी-कानों में अभी तक जब्बार के शब्द गूंज रहे थे, वह फैसला नहीं कर पा रहा था कि क्या करे, क्या नहीं?

दिमाग में मानो सोचने-समझने की क्षमता ही न रही!

तभी उसने अपने पीछे से आहट सुनी!

फिरक्नी की तरह घूम गया वह ।।।

दोनों कंमरो के बीच के दरवाजे को पुनः हल्ले से खटखटाया गया।

देव के मुंह 'से द्वारा हुआ स्वर निकला----"क-कौन है?"

"म-मैं हूं देव, दरवाजा खोलो !"

जिस्म के अन्दर से इस वार फूट पडने वाली पसीने की खेप ने देव कि हथेलियां और तलवे तक भीगो दिए, लपककर उसने दरवाजा खोल दिया-सामने खड़ा जगबीर उसे बेैसी ही नज़रों से देख रहा था जैसी नजरों से कसाई बकरे को देखता है!

देव की सिट्टी-पिट्टी गुम ।।।

दीपा का जिस्म बेड पर एक तरफ़ लुढ़का पड़ा था। देव की समझ में यह बात आ गई कि जगबीर जोर लगाकर प्लाई ऊपर उठाने के बाद बाहर निकल आया है!

एकाएक जगबीर ने कहा---"पुलिस के सामने तुम मेरा नाम भी नहीं लोगे!"

"ठ-ठीक है, मैं ही बलि का बकरा बनूगा!" आतंक की पराकाष्ठा के कारण देव फूट-फूटकर रो पड़ा-----यह बिचार उसकी जान लिए जा रहा था कि यदि यहाँ खडे़ होकर जगबीर ने उसकी और जवार, की सारी बातें सुनी हैं तो क्या होगा!

"नाटक मत करो, ये बताओ कि जब यहां खड़ा जवार कुछ कहने वाला था तब उसकी बात पूरी होने से पहले ही तुम उसे घसीटकर दूसरे कमरे में क्यों ले गये ?"

देव को थोड़ी राहत मिली!

जगबीर का यह वाक्य इस बात का गवाह था कि उसने उसके और जवार के बीच होने वाली प्रारम्भिक बाते नहीं सूनी हैं, मगर अब भी बोल उसके मुंह से न फूटा जबकि जगबीर ने पूछा…"कौन-सी स्कीम नाकामी की बात कर रहा था वह ?"

"सब सवालों को छोडो़ जगबीर, बाहर…बे उस स्थान को खोद रहे हैं जहां मैंने दोलत दवा रखी है----किसी तरह उन्हें रोको, मुझे कोई ऐसी तरकीब बताओ जिसके इस्तेमाल से उन्हें रोक सकूं -हमारे आपस के किसी सवाल-जवाब का अर्थ तभी तक है जब तक कि लूट की दौलत उनके हाथ नहीं लगती-अगर उन्हें रोका न गया तो कुछ देर बाद सब कुछ खत्म होने जा रहा है---सब कुछ । "

"मैं सुन चुका हूं अच्छी तरह समझ चुका हूं कि अब उन्हें रोका नहीं जा सकता!" जगबीर ने कहा --मगर यदि तुम होशियारी से-काम लो तो सब बच सकते हैं!"

"क-कैसे ?"

" दौलत उनके हाथ लग जाने के वाद तुम सारी जिम्मेदारी केवल अपने ऊपर लोगे- मुझे जब्बार और दीपा को भी इस झमेले से दुर रखोगे----पुलिस से कहोगे कि जंगल से दौलत तुम अकेले लाए थे, लालच में फंसकर तुमने उसे यहां छिपा दिया!"

देव उसका मुंह ताकता रह गया, बोला…"तुम तो कह रहे थे कि सब बच जाएंगे?"

"तीन बिल्कुल बच गए, तुम्हारी पत्नी भी और मामले को इस ढंग से सामने रखने पर तुम पर कोई संगीन जुर्म साबित नहीं होगा------फिर मैं…तुम्हारी पत्नी और जब्बार अदालत से तुम्हें साफ बचा लाएंगे!"

"क्या ऐसी कोई तरकीब नहीं है जिससे वह खुदाई ही रुक जाए?" देव ने ठीक किसी पागल की तरह पूछा, जसबीर ने कहा-"'ऐसी कोई तरकीब नजर नहीं आती!"

"तव मैं भी किसी को नहीं बख्शूंगा, पुलिस के सामने एक-एक का नाम लूँगा" देव पागलों की तरह वढ़बड़या----"मैं अकेला ही बलि का बकरा क्यों बनूं --- मेरे साथ जिसने जो कुछ किया है, यह एकएक बात पुलिस बता दुंगा ।"

अभी जगबीर शायद कहने ही वाला था कि वरांडे में भारी बूटों की पदचाप गूंजी और जगबीर खुद को तेजी से दरवाजे के पीछे छुपाता हुया फुसफुसाया----" शायद कोई आ रहा है, बाहर जाओ-किसो को इस कमरे में न आने देना!"

देव में कोई उत्साह नहीं जागा!

आत्मसमर्पण करने की मुद्रा में वह दरवाजा पार कर ड्राइंगरूम में पहुंचा, उधर सामने वाले दरवाजे से डी-एससी, नागर, शुक्ला और जब्बार आदि ने ड्राइंगरूम में कदम रखा ।

वे सब खामोश थे, गम्भीर!

 


देव के मुंह से कोई बोल न फूट सका-अपने लिए उसने केवल जब्बार की आंखों में सख्ती देखी थी । एकाएक नागर ने पूछा---" अब तुम्हारी वाइंफ़ कैेसी है मिस्टर देव?"

"व-वैसी ही!"

पुन: खामोशी छा गई!

यह खामोशी देव को खटक गई, दिमाग में एकमात्र सवाल उभरा कि ये लोग मुझे गिरफ्तार क्यों नहीं कर रहे हैं-खामोश क्यों है और इस सवाल के उभरने के तुरन्त बाद लगा कि उनमें से ज्यादातर के चेहरों पर पश्चाताप के भाव हैं!

"देख लिया आपने?" उसने धड़कते दिल से पूछा!

. ""जी!" नागर ने संयत स्वर में कहा-"मैं आपसे माफी चाहता हूं ।"

देव का दिमाग नाच उठा ।

बुरी तरह भिन्ना उठा वह, क्रिन्तु इस भिन्नाहट को किसी भी तरह अपने चेहरे पर नहीं उभरने दिया-----अभी ठीक से उसकी समझ में यह बात नहीं आई थी कि आखिर बात क्या हुई है, उसी की टोह लेने के लिए थोड़े व्यंग्यात्मक स्वर में वह बोला…"खुदाई तो आप लोगों ने पूरी कर ली होगी?"

"अ-आप हमें शर्मिन्दा कर रहे हैं!" शुक्ला ने कहा ।

"और वहां से आपको बहुत वड़ा सन्दूक मिला होगा जिसमें मैंने हीरे, पन्ने, जवाहरात और अशरफियां भर रखी रखी थी, है न?"

"हमें सचमुच अफसोस है यंगमैन ।" इस वार डी.एस.पी. महोदय ने कहा---"' तुम पड़े-लिखे हो, समझते हो कि खास तौर से हम पुलिस बालों अपनी शंका मिटानी पड़ती है, हमें शक हुआ…खुदाई की मगर कुछ न मिल-हमारा शक बेबुनियाद निकला और तुम एक सच्चे तथा शरीफ शहरी साबित हुए !"

इससे आगे डी.एस.पी. महोदय जाने क्या-क्या कहते चले गए?

मगर देव के कानों तक एक लफ्ज न पहुंच ऱहा था ।

उसने तो सिर्फ एक ही बात सुनी थी, यह कि खुदाई में पुलिस के हाथ कुछ नहीं लगा और इसे सुनते ही मानो वह बहरा हो गया ।

एक साथ उस पर कई प्रतिक्रिया हुई ।

पुलिस से बचने की खुशी में जिस तेजी से उसके जिस्म में उमंग की लहर दौड़ी थी, उसी तेजी से दिमाग में सवाल कौंध गया----" दस लाख से भरी अटैची कहां गई?"

मगर उक्त दोनों भावनाओं में से एक को भी देव ने अपने चेहरे पर न उभरने दिया-मन-ही-मन उसने तय किया कि रकम के बारे में बाद में सोचेगा--फिलहाल उसे बच जाने का जश्न मनाना चाहिए !

डी.एस.पी. के चुप होते ही वह अपने स्वर में नाराजगी भरता हुआ वोला-"मुझे जबरदस्त मानसिक तनाव से गुजरना पड़ा है, अगर आप लोगों की तसल्ली हो गई हो तो अव मैं कुछ देर आराम करना चाहता हूं ।"

"श्योर ।" डी.एस.पी. महोदय ने मुस्कराते हुए कहा-----"" हम लोग इजाजत चाहेंगे, इस उम्मीद के साथ कि इस घटना को तुम बहुत ज्यादा महसूस नहीं करोगे!"

देव कुछ बोला नहीं । नाराज़गी भरे अंदाज में केवल उन्हें घूरता रहा और जब वह ऐसा कर रहा था तब उसने महसूस किया कि जब्बार उसे खा जाने वाली नजरों से घूर रहा है----न समझ सका कि जब्बार के सीने में कौन-सी आग सुलग रही है-न ही उससे सवाल करने का कोई मौका था ।

पुलिस टीम उससे विदा लेकर चली गई ।

कमरा खाली हो जाने के बावजूद उसे यकीन नहीं आया कि वे लोग चले गए हैं और वह अभी भी पुलिस और कानून की पकड़ से वहुत दूर, अपने ड्राइंग रूम में बैठा है ।

आजाद ।।

जो हुआ, वह चमत्कार जैसा ही था ।।

परन्तु इस चमत्कार के पीछे कौन है, कितना बड़ा तूफान उठकर खडा होने वाला था-इस वात का कम-से-कम इस वक्त उस बेचारे को जरा भी इल्म न था।

जाने कितनी देर तक वह अपने विचारों में गुम रहा, चौंका उस वक्त जव सिगरेट की तलब लगी-सिगरेट सुलगाने के बाद अभी उसने पहला ही कश लगाया था कि हल्ले से चौंक पडा!

पुलिस टीम को गए काफी देर हो चुकी थी, मगर जगबीर इस कमरे में नहीं आया था और यह बात एकदम अस्वाभाविक थी-ऐसा चमत्कार होने पर तो उसे तुरन्त यहाँ आना चाहिए था ।

देव एक झटके से खड़ा हो गया ।।

पलटकर उसने बेडरूम की तरफ देखा-------दरवाजा खुला होने के कारण ठीक सामने बेड पर अस्त-व्यस्त पड्री बेहोश दीपा साफ नजर आ रही थी!

कहीं कोई हलचल नहीं!

देव का माथा ठनक गया!

तेजी से लपककर उसने मुख्य द्वार बंद किया और फिर लगभग भागता हुआ बेडरुम में पहुंचा, बेडरूम खाली था, जगबीर उसे कहीं नजर न आया-दिल धड़कने की गति बंद हो गई और फिर पिछले लॉन में खुलने वाली खिडकी पर नजर पड़ते ही उसका दिल 'धक्क' से रह गया ।

खिडकी खुली पडी़ थी ।

हक्का-बक्का रह गया वह ।

स्तब्ध!

 


खिडकी के पट मंद गति से बहने वाली हवा के साथ धीरे--धीरे कांप रहे थे-होश आने पर दोड़कर खिडकी के समीप पहुचा!

बाहर झांका!

अच्छी खासी शांति उसे सांय-सांय करता सन्नाटा सी महसूस हुई!

वह मुर्खों की तरह चिल्लाया-"जगबीर...ज़गबीरा” कहीं कोई आवाज नहीं! " देव की अवस्था पागलों जैसी हो गई, खिड़की से लोटकर उसने पलंग की प्लाई उठाई-पलंग के नीचे, सेफ के पीछे झांका-गर्ज यह थी कि उसने हर वह स्थान चैक किया जहाँ जगबीर छुप सकता था, साथ ही बार-बार उसका नाम लेकर पुकारता भी जा रहा था!

परिणाम, ढाक के तीन पात थक---हारकर वह पलंग पर ढेर हो गया, दिमाग में सिर्फ जगबीर से सम्बधिंत सवाल चकरा रहे थे…कहां गायब हो गया वह, क्यो चला गया क्या दौलत से भरी अटैची भी उसके कब्जे में है?

अभी वह इन्ही सवालों में उलझा हुआ था कि दीपा के हलक से कराह निकली!

दिमाग में इकट्ठे हुए सारे विचार उसी तरह बिखर गए जैसे 'स्ट्रारइगर' की चोट पड़ने पर "गोटियां' बिखर जाती हैं-----पहलू बदलकर वह दीपा के नजदीक पहुचा । पानी से भरा गिलास उठाकर चम्मच से उसके मुंह में पानी डाला, बीच-बीच में वह दीपा को उसका नाम लेकर पुकार रहा था ।

कुछ देर बाद दीपा पूरी तरह होश में आ गई!

प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए देव ने पूछा…"त-तुम ठीक तो हो न दीपा ??"'

"व-वे लोग गए?"

"हां, वे गए…हम पूरी तरह सुरक्षित हैं दीपा, तुम घबराओ मत-----वे लोग मुझ पर कोई जुर्म साबित नहीं कर सके…उल्टे अपने व्यवहार लिए माफी मांगकर गए हैं!"

"म-माफी?"

"त--तुम फिक्र मत करो, सबकुछ ठीक हो गया है----फिलहाल आराम करो दीपा, मैं किंचन से तुम्हारे लिए दूध लाता हू--जब ठीक हो जाओगी तो सबकुछ बताऊंगा? कहने के बाद दीपा के रोकते-रोकते भी वह उठा और किचन में चला गया! ३

कुछ देर बाद गिलास में दूध लेकर आया!

सैकडों सवाल करती रही, मगर देव ने एक न सुना । बोला-----"पहले यह गिलास खाली करो उसके बाद से तुम्हारे हर सबाल का जबाब दूगां ।।"

दूध पीती हुई दीपा के कानों में देव के सम्बन्ध में कहे गए जगबीर के शब्द गूंज रहे थे ।

"तुम्हारी मांग में भरा सिन्दूर सुलग रहा है दीपा और हैरत की बात है कि तुम्हे पता ही नहीं-वह इस कदर गिर चुका है कि दौलत के लिए तुम्हें मेरे या जवार के ही नहीं, बल्कि खून पीने वाले भेडियों तक के हवाले कर सकता है!"

"न-नहीं!" वह दीवानों की तरह चीख पडी!

देव पुरी तरह चौका-"क-क्या हुआ"'

"क--कुछ नहीं!" देव के चेहरे को निहारती हुई वह इस तरह हांफ रही थी जैसे वहुत दुर से दौड़कर यहाँ आई है मारे उत्तेजना के उसका चेहरा पुरी तरह भभक रहा था, बोली, "त-तुर ऐसे नहीं हो सकते-वह बकवास कर रहा था!"

"कैसा नहीं हो सकता मैं, कौन बकवास कर रहा था!" देव चीख पड़ा----"ये तुम, क्या कह रही हो दीपा, मुझे कुछ बताओ

"ज--जगबीर, अरे?" दीपा चौंक पडी…"कंहां गया वह, नजर नहीं आ रहा?"

"मेरे ख्याल से वह भाग गया है!"

"कहां ?"

"ये तो मैं नहीं जानता, मगर शायद दौलत से भरी अटैची भी ले गया है वह ।"

"अटैची?" दीपा उछल पडी़…"मगर कैसे, यह सब कैसे हो गया-----मुझें बताओ देव, जल्दी बताओ वर्नों मैं पागल हो जाऊंगी-अरे बेहोश होने के बाद यहाँ क्या हुआ था ?"

देव ने बताया ।

दीपा के सवालों का तांता कुछ ऐसा लगा कि देव, जो उसके चीखने का कारण पूछना चाहता था, उसका नम्बर ही न आया और सबकुछ सुनने के बाद| दीपा ने पूछा-"क्या जरूरी है कि दस लाख से भरी अटैची जगबीर ही यहां से ले गया हो?"

"और कहाँ जाएगी?"

"क्या मतलब ?"

मैं ही बेवकूफ था जो समझता रहा कि वह की सरगर्मी ठंडी पड़ने तक यहाँ से निकलने के बारे में नहीं सोचेगा !" अफ़सोस युक्त स्वर में देव ने कहना शुरू किया-"दरअसल यहाँ सिर्फ लूट का माल हासिल करने आया था-हमेँ धोखे में डालकर उसने किसी समय लॉन से अटैची निकाली, गड्डा पहले की तरह भरा और अब यह बात भी मेरी समझ में आ रही कि उस वक्त मेरी सलाह पर वह यहाँ से क्यों नहीं गया, जब ड्राइंग रूम में पुलिस टीम मोजूद थी ।"

"क्यों ?"

"लॉन से निकलने के बाद अटैची उसने इस कमरे में कहीं छुपा रखी होगी---" सामने अटैची लेकर फरार नहीं हो सकता था, अत: अड़ गया और यहीं छुपा रहा-उसके बाद जैसे ही मौका लगा अटैची लेकर फरार हो गया है!"

दीपा उसके तर्कों से सहमत हुए बिना न रह सकी, बल्कि अगर यह कहा जाए कि जो हुआ वह मन-ही-मन उससे खुश थी तो गलत न -होगा-बोली---" चलो-जगबीर की फरारी के साथ यह मामला ही खत्म हो गया देव-भगवान जो करता है अच्छा ही करता है! "

"क्या मतलब?"

"जरा मेटाडोर पर नजर पडने से पहले की मेरी और अपनी जिन्दगी को याद करों देव ।।" कहती-कहती दीपा भावुक हो उठी-"आपस में हम कितने प्यार…सुकून और आराम से रह रहे थे-अचानक हमारी जिन्दगी में ट्रेजरी से लुटी गई वह दौलत आ गई और हमारा सबकुछ छिन गया--एक-दूसरे के लिए कितने पराए से हो गए थे हम----

------हमारी हर सांस में आतंक और तनाव भर गया था-कभी पुलिस की गिरफ्त में फंस जाने का डर--कभी जब्बार की दहशत तो कभी -ज़गबीर का आतंक-हमारा चेन हमसे छिन गया था-------

---------वह दौलत एक मुसीबत जानकर हमारे गले में पड़ गई थी------मुजरिमों की तरह केसी-केसी खतरनाक योजनाएं बनाने लगे थे तुम, मगर वक्त ने खुद ही सब कुछ खत्म कर दिया-----जगबीर ने अपनी योजना मुताबिक लॉन से पहले ही अटैची न निकाल ली होती तो तुम्हारी सलाह पर वह भागने की कोशिश करता…तुम्हारी योजना के अनुसार जब्बार की गोली से मारा जाता, उधर अटैची पुलिस के हाथ लग जाती----हम फंस जाते---

--------शुक्र है कि ऐसा कुछ न हुआ-स्वयं ही सव कुछ ठीक हो गया-पुलिस यहां से संतुष्ट होकर चली गई लालच के भंवर में फंसाने वाली को उनमें से एक लुटेरा ले गया, जिन्होंने उसे लूटा था!"

उस दोलत के हाथ से निकल जाने का मुझे हमेशा अफसोस रहेगा दीपा-उसके लिए मैंने और मेंरे साथ-साथ तुमने भी क्या कुछ न सहा, मगर हाथ कुछ नहीं आया!"

"यकीन मानो देव-हम बहुत सस्ते छूट गये हैं!"

' "में समझा नहीँ!"

"जिन राहो पर हम भटक गए थे, उनका अन्त या तो जेल के कोठरी है या मोत…दोलत तब भी हमारे हाथ नहीं लगनी थी…हम आजाद हैं--अपने घर में हैं---, हमारी जीत है ।",

देव कुछ बोला नहीं…जाने क्या सोचता रहा?

" भूल जाओ देब!" दीपा ने प्यार से उसके चेहरे को अपनी हथेलियों में भरकर कहा----" जो हुआ उसे एक डरावना तूफानी ख्वाब समझकर भूल जाओ-मुझे याद रखो-अपनी छोटी-सी दुनिया को याद रखो --- कितनी खुशगवार है ये जिन्दगी?"

मुख्यद्वार पर होने वाली दस्तक ने देव को कुछ कहने से रोक दिया ।।

दरवाजा खोलते ही जब्बार हवा के एक झोंके की तरह कमरे में आ गया

-----देव ने महसूस किया कि इस वक्त वह वहुत ज्यादा भिन्नया हुआ था

-----उसे कच्चा चबा जाने के से अंदाज में घूरता हुआ बोला…"दरवाजा बन्द कर दो!"

" क्या वात हेै-तुम इतने गुस्से में क्यो हो ?" चटकनी लगाने के बाद देव ने पूछा!

उफनते हुए जब्बार ने कहा--"' अपने आपको बहुत ज्यादा चालाक समझते हो?"

"क्या मतलब?"

"वाकई तुम चालाक हो-अपनी योजना में फंसाकर तुमने सचमुच मुझे धोखे में डाल दिया था, लेकिन सामने वाले को बेवकूफ मत समझो-----इस भ्रम में न रहो कि मैं तुम्हारे जाल में फंसकर सारी जिन्दगी धोखे में रहूंगा ।"

"तुम कहना क्या चाहते हो?"

"सीधी तरह बताओ देव कि लूट की दौलत कहाँ है ? वर्ना मुझसे बूरा कोई न होगा"

"ओह !" वह मानो सव कुछ समझ गया----उसकै चेहरे पर उत्पन्न हो आया तनाव थोड़ा कम हुआ----बोला, " जगबीर हम दोनो से कहीं ज्यादा होशियार साबित हुआ…वह...!"

" श-शटअप ।"--जब्बार दहाड़ा-'"अब मैं ये बोगस नाम तुम्हारे मुंह से सुनना नहीं चाहता !"

"क्यों ?"

"क्योंकि यह नाम नितान्त काल्पनिक है----केवल तुम्हारे दिमाग़ की उपज, जिसे बडी खुसूरती से तुमने मेरे दिमाग मे ठूंस दिया और मैं तुम्हारे जाल फंसता चला गया"

" जाने अपने दिमाग में तुम क्या लिए बैठे हो?"

"बताता हूं बेटे…सब कुछ बताऊंगा-केवल इसलिए ताकि तुम जान सको कि मैं सबकुछ समझ गया हूं और तुम समझ सको कि मैं इतनी आसानी से तुम्हारा पीछा छोड़ने वाला नहीं हूं ?"

"जो तुम समझ गए हो उसे मैं सुनने के लिए तैयार हुं !" देव ने धैर्यपूर्वक कहा!

जब्बार ने एक गहरी सांस ली और बोला…"चैकपोस्ट पर तुम्हारी कोशिश थी कि दौलत को बिना किसी की नजरों से गुजारे यहाँ ले जाओ, किन्तु इसे तुम्हारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि मेरी नजर में आ गई-तुम उसे यहाँ ले तो जाए, मगर मेरे रूप में एक ऐसी मुसीबत तुम्हरे दिमाग में समा गई जिससे छुटकारा पाना तुम्हारे लिए जरूरी था--तुम जानते थे कि मैं बहुत जल्द ही तुम्हारे सामने जिन्न की तरह… प्रकट होकर अपना हिस्सा मांगने वाला हूं और हिस्सा तुम देना नहीं चाहते थे-अब-बोलो-मै ठीक कह रहा हूं न?"

" ठीक । " कहते हुए देव ने एक सिगरेट सुलगा ली ।

"मुझसे पीछा छुड़ाने के लिए तुम्हें एक षड्रयंत्र की ज़रूरत थी-सारी रात ऐसा कोई षड्रयंत्र रचने के बारे में सोचते रहे और यहाँ तुम्हरि दिमाग के आल्हापन को मानना पडेगा कि मुझे चक्कर में उलझाने के लिए तुमने एक षडृयंत्र सोच भी लिया!"

 


"केसा षडृयंत्र?"

"तुमने अपने दिमाग की कल्पना से जगबीर नामक एक ऐसा पात्र गढ़ा । जो वास्तविक कहानी में कहीं था ही नहीं!"

"य-ये झूठ है!"

"विरोध बाद में करना-पहले खामोशी से सुनते रहो!" कहने के साथ ही उसने होलस्टर से रिवॉल्वर निकालकर देव पर तान दिया-गुर्राया-"अगर बीच में कोई गड़बड़ करने की कोशिश की तो मैं तुम्हारे परखच्चे उड़ा दूगां

देव हतप्रभ ।

वह कहता चला गया…"होटल के केविन में ले जाकर काल्पनिक जगबीर की कहानी तुमने मुझे इस ढंग से सुनाई कि मैं जरा भी शक न कर सका यह समझ वैठा कि वास्तव में ट्रेजरी का एक लुटेरा तुम्हारे घर में छुपा हुआ है-इससे तुम्हें यह फायदा हुआ कि -जो जब्बार तुमसे हिस्सा मांगने आया था वह हिस्सा मांगना भूलकर इस चक्कर में उलझ गया और थोड़ा डर गया-तुम्हारा षडृयंत्र यहीं खत्म नहीं होगया-वल्कि यहा से

शुरू हुआ था-----" तुमने मुझ से मुकम्मल निजात पाने की योजना बनाई थी-----उसी योजना के अंतर्गत तुमने मेरे सामने काल्पनिक जगबीर की हत्या का प्रस्ताव रखा…'एनकाउंटर' के-से ढंग से जगबीर की हत्या का मैं प्रस्ताव----इतना मजबूर तुम मुझे पहले ही कर चुके थे कि यह प्रस्ताव मुझे मानना ही पडे़ ---- सब कुछ तुम्हारी इच्छा के अनुरूप हुआ, मगर यह सबकुछ जगबीर की हत्या के लिए नही हो रहा था, क्योंकि वास्तव में जगवीर तो कहीं कोई था ही नहीं-फिर हत्या किसकी होती?"

"तो फिर किसलिए हो रहा था?"

"मेरे दिमाग में यह बात ठूंसने के लिए कि दौलत तुम्हारे हाथ से निकल गई है!"

"ये बकवास है!"

"मत भूलो कि मेरे हाथ में रिवॉल्वर है और मैं जब चाहू तुम्हें मार सकता हूं?" जब्बार ने दांत भीचकर कहा…"ठीक तुम्हारी योजना के अनुसार यहाँ पुलिस दल आया…तुम्हारी योजना में फंसा में जगबीर को "एनकाउण्टर' करने इमारत के पीछे छुपा रहा, मगर खिड़की खोलकर बाहर तो कोई तब निकलता न जबकि 'जगबीर' नाम की कोई शखिसयत होती----मैं वहा छुपा रहा, जबकि , यहां दूसरा ही ड्रामा चल रहा था-पुलिस को ठीक उसके विपरीत बयान दिए गए जो तुमने मुझसे कहे थे-मैं चकरा गया----तब भी यह नहीं समझा था कि वास्तव में तुम क्या खेल, खेल रहे हो-उस वक्त मैं इसी भ्रम में था कि किसी बजह से स्कीम नाकाम हो गई है----उसके बाद एक सार्जेंट द्वारा यहाँ लॉन में खुदे एक गड्डे का जिक्र शुरू हुआ--फिर उसकी खुदाई शुरू हुई…बड़ी ही बेहतरीन एक्टिंग की तुमने-उस वक्त तक भी मैं यह समझता रहा कि अपनी बेवकूफी की वज़ह से तुम फंस गए हो----मगर नहीं-----मेरी मूल थी---तुम बेवकूफ नहीं, बल्कि सबसे वड़े चालाक थे-----

कुछ भी यहां हुआ वह शुरू से आखिर तक तुम्हारी योजना थी, यह बात सेरी समझ से उस क्षण आयी जब खुदाई में लूट के दस लाख तो क्या एक करेंसी नोट तक हाथ न लगा----तब समझा कि 'सार्जेंट' की जिस बात को सब लोग हंसी में उड़ा रहे पे, अनावश्यक गुस्से का प्रदर्शन करके तुमने उसे तूल क्यों दिया…जाहिर है कि तुम मेरी उपस्थिति पुलिस मेॉ वह गड्डा खुदवाना चाहते थे ताकि मुझ पर ये 'शो' कर सको कि तुम्हरि द्वारा वहीं गाड़ी गई दौलत पुलिस के खोदने से पहले ही जाने किसने निकल ली है- काल्पनिक जगबीर की हत्या के षडृयंत्र की आड़ में यह सारा नाटक वास्तव में मुझ पर यह साबित करने के लिए रचा गया कि दोलत तुम्हारे हाथ से निकल चुकी है, ताकि तुमसे कोई हिस्सा न मांग सकू-----बोलो-क्या यह सब झूठ है?"

"सरासर झूठ है!"

"बक्रो मता"

"तुम वहुत बडी गलतफहमी के शिकार हो रहे हो जब्बार!" देव ने कहा…"सबसे बड़ा धोखा तुम ये सोचकर खा रहे हो कि जगबीर मेरे दिमाग की कल्पना है-वह वास्तव में था-मेरे काफी कहने के वावजूद वह उस वक्त भागने के लिए तेैयार नहीं हुआ"

"कोई सबूत है तुम्हारे पास?"

"स-सवूत-हां-सबूत हेै…देखो, जरा दीपा के शरीर को गोर से देखो-बुरी तरह जख्मी है ये-----जब तुम दीपा से बात करके यहाँ से गए तब उसने इससे विस्तारपूर्वक तुम्हारा परिचय जानना चाहा था किन्तु इसने नहीं बताया और तब उसने इसे अपनी बेल्ट से पीटा था ।"

"गुड-काफी पुख्ता सबूत ईजाद किया है तुमने!"

"वया मतलब?"

"मगर मैं इस सबूत से संतुष्ट नहीं हूं----पांच लाख के लिए इसे मार सकते हो और अपनी पवित्रता बनाए रखने के लिए दीपा अपने जिस्म पर ये निशान बनवा सकती है------कोई और सबूत पेश को बेटे-कोई ऐसा सबूत, जिसे मैं मान सकूं !"

"ऐसा कोई सबूत हो ही नहीं सकता, क्योकि इस वत्त तुम जिस मानसिक स्थिति में हो उससे हमारे द्वारा पेश किया गया हर सबूत तुम्हें सिर्फ हमारी 'चाल' नजर जाएगा!"

"तभी तो कहता हूं कि शिकस्त मान लो…स्वीकार कर …लो… कि यह सब तुम्हारी चाल थीँ-दोलत तुम्हारे पास अभी भी है और मेरे साथ तुम उसका हिस्सा करने के लिए तेयार हो?"

"दौलत मेरे पास नहीं है-उसे जगबीर ले गया!" "जगवीर को तुमने पैदा ही इसलिए किया था, क्योकि एक दिन

तुम्हें मुझसे कहना था कि वह सारी दौलत के साथ फरार हो गया हैं, मगर जरा ये तो सोचते कि जगबीर को मैं कभी देखूंगा ही नहीं, उसकी भला फरारी पर कैसे यकीन कर लूंगा?"

… "इस बात से कोई नतीजा नहीं निकलेगा कि वार-वार तुम अपनी वात दोहराते रहो और मैं अपनी-वेहतर ये है कि हम कोई ऐसी बात सोचे जिससे किसी निष्कर्ष पर पहुच सके!-"

"मैं तुम्हारे इस छोटे से आशियाने की तलाशी लेनी चाहता हूं ।"

"शोक से!" देव ने कहा-पर तलाशी से तुम्हारी संतुष्टि होती है तो हमें कोई एतराज नहीं है!"

"लगता है जहां तुमने अटैची छुपाई है उस स्थान पर तुम्हें बड़ा नाज है!" जब्बार ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा…"मगर मैं भी पुलिस वाला हूं बेटे-अटैची को तलाश करके ही दम लूँगा"

"कोशिश कर लो" देव ने कन्धें उचका दिए ।

जाने क्या सोचकर जवार ने रिवॉल्वर जेब में रख लिया और तलाशी में जुट गया ड्राइंगरूम चौर किंचन की खाक छानने के बाद वह बेडरूम में पंहुचा-सेफ की चाबी मांगी-लॉकर तक खंगाल डाला उसने ।

बेड की प्लाई उठाकर बॉक्स का वह हिस्सा देखा जहाँ जगबीर छूप गया था…घूमकर दुसरी तरफ़ पहुचा और इस तरफ की प्लाई उठाते ही उसके मुंह से निकला'----"मार्वलस ।"

"क्या है?" देव के मुंह से निक्ला।.

"नजदीक आकर खुद लो, मगर जरा सम्भल कर रिवॉल्वर एक बार फिर मेरे हाथ में है!" कहते हुए जब्बार ने रिवॉल्वर निकल लिया ।

देव और दीपा के दिल धाड़-धाड़ करके बज रहे थे ।

अजीब सस्पेंस भरी नजरों से उन्होंने एक-दूसरे की तरफ़ देखा----डरता हुआ-सा देव आगे बढ़ा और दो कदम बाद ही जव उसकी नजर बॉक्स में रखी मिट्टी से सनी अटैची पर पड़ी तो वह यथास्थान जाम होकर रह गया ।

बुरी तरह उछलती हुई दिलरूपी गेद इस बार उछली तो कंठ में अटककर रह गई ।

चेहरा फ़क्क ।

"क्या तुम अब भी यही कहोगे कि दौलत तुम्हारे नहीं है-उसे जगबीर ले गया?"

"य-यकीन मानो मैं इसे यहां पहली वार देख रहा '!” देव ने कहा-"नहीँ जानता कि यह लॉन से यहां कब और कैसे आई ।"

"शायद उडकर आ गई हो?" जब्बार हंसा…"'हां, ये उड़कर ही आई है-देखो-इसमें पंख लगे हुए हे…तुम्हें नहीं दिख रहे?"

देव वड़वड़ाया---"इसे यहां जगबीर लाया होगा?"

"और जब गया तो इसे यहीं छोड गया-यहीँ न?" जब्बार ने जबरदस्त व्यंग्य किया-----"बड़ा ही धर्मात्मा किस्म का आदमी था बेचारा----तुम दोनों के लिए दस लाख छोड़कर देवताओं की तरह अन्तर्धान हो गया-दरअसल ट्रेजरी में उसने डकैती ही तुम लोगों की दरिद्रता दूर करने के लिए डाली थी-हे न?"

देव की बुद्धि चकराकर रह गई-अपना विचार खुद उसे ही न जंचा ।

 
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