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सुलग उठा सिन्दूर complete

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यही सब सोचते उसने गैस अॉन करकेउस पर कढ़ाई रख दी -- स्पून से थोड़ी सूजी कढ़ाई में डाली और उसे भूनने लगी --- बंसी उसके ठीक सिर पर खड़ा था, दीपा ने कनखियों से थाली की तरफ़ देखा…थाली उससे केवल दो फुट दुर थी यानी हाथ बडाकर आराम से छू सकती थी, मगर मौका मिले तब न ?

अचानक उसके दिमाग में एक ख्याल अाया, कढ़ाई में घी डालती हुई बोली…"तुम किसी वर्तन में पानी लेकर उसमें दो चम्मच चीनी गोल लो बंसी?"

"वह किसलिए?"

"अच्छी तरह भूनने के बाद सूजी उसी में तो डाली जाएगी"

"बंसी हंसने लगा, बोला…"आपको सूजी का हलवा बनाना आता भी है बहूरानी?"

"क्या मतलब?"

"पानी में चीनी तब डलती है जब वह उबलने लगता है!"

"ये वहुत घिसी-पिटी तरकीब है और ऐसा करने पर कई बार चीनी के दाने 'दानों' की ही शक्ल में रह जाते हैं, जब वे मुंह में जाते हैं तो खाने वाले का सारा मजा किरकिरा हो जाता है!" दीपा कहती चली गई…"आज मैं तुम्हें बिल्कुल नए पैटर्न से हलवा बनाना सिखऊंगी---किसी बर्तन में थोड़ा-सा पानी लेकर दो चम्मच चीनी उसमें अच्छी तरह फेंट लो-ठीक उसी तरह जैसे आमलेट के लिए अंडों को फेंटा जाता है!"

कंधे उचकाकर बंसी ने एक डोंगा उठाया और 'वाशवैशन' की तरफ मुड़ा ही था कि दीपा ने बायां हाथ अपने वक्ष-स्थल में डालकर टेबलेट निकाल ली---उधर बंसी ने नल खोला----उस वक्त दीपा की तरफ उसकी पीठ थी, जब उसने पूरी फूर्ती के साथ टेबलेट उस कटोरी में डाल दी, जिसमें 'रेशेदार' सब्जी थी ।

टेबलेट डूब गई ।

"देखना बहूरानी, क्या इतना पानी वाकी रहेगा?"

दीपा ने पलटकर देखा जरूर मगर बिना सोचे-समझे कह दिया--- ठीक रहेगा?"

अब उसे इस बात की परवाह कहां थी कि हलवा स्वादिष्ट ही बनना चाहिए ?

दीपा ने जो कुछ बताया उसे सुनकर हालांकि देव के दिमाग पर थोडी घबराहट हावी हुई थी, शीघ्र ही खुद को संयत करके बोला---"खैर-विपरीत हालातों के बाद तुमने काम पूरा कर दिया, इसी बात की खुशी है-जव यह सारा ड्रामा देशवासीयों के सामने अाएगा,लोगों को पता चलेगा कि दुश्मनों के पडृयन्त्र को चकनाचूर करने के लिए हमने किन-किन हालातों में क्या-क्या किया तो लोग हमारी प्रशंसा करते न थकेंगे!"

"अब तो बस वर्तन लेकर बंसी के लौटने की इन्तजार है!" दीपा ने कहा----"हां तुम श्योर हो न देव कि मांजी अपने कमरे का ताला लगाकर गई हैं?"

"हां हंडरेड परसेट श्योर ।"

"इस तरह, साढे नौ तक वे फुसफुसाकर बाते करते रहे-ये बाते वे अपने कमरे में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्यान पर छुपे खड़े कर रहे थे, जहाँ से बंसी को कर्नल के कमरे से लोटता आराम से देख सकते थे।

एकाएक दीपा ने विषय बदला-"क्या बात है, बंसी अभी तक नहीं लोटा ?"

"लो!" गैलरी में नजर गडाए देव के मुंह से निकला---" शायद तुम्हारे कहने ही की देर थी, वह जा रहा है!"

इन वाक्यों के पांच मिनट बाद वे कर्नल भगतसिंह के कमरे की तरफ -जा रहे थे-प्राइवेट रुप के सामने से गुजरते वक्त सम्भालने की लाख चेष्टा के बावजूद वे कांप गए, चूंकि जानते

थे कि इस वक्त वे प्राइवेट रूम की निगरानी कर रहे जासूस की निगाह मे हैं ।

अंजली और भगतसि'ह के कमरों के नजदीक पहुचे ।

पलटकर एक वार पीछे देखा-----मोड़ तक गेलरी सुनसान पड़ी थी, देव का इशारा मिलते ही दीपा विजली से चलने वाली गुड़िया की तरह आहिस्ता से अंजली के कमरे का 'डंडाला' हटाकर अन्दर गुम हो गई ।

बाहर से देव ने डंडाला पुन: लगा दिया ।

गेैलरी अब तक सुनसान पड़ी थी, देव ने धड़कते दिल से भगतसिंह के कमरे के बंद दरवाजे पर दस्तक दी, पहली ही दस्तक पर अन्दर से पूछा गया-"कौन है?"

"मैं देव है बाबूजी, जरा दरवाजा खोलिए!"

"क्या बात है!"

"जरा काम है, आपसे कुछ जरूरी बाते करनी हैं?"

"अब मूड नहीं है, सुबह बात करेगे देव, तुम जाओ ।"

देव के रोंगटे खड़े हो गए, पहली बात तो ये कि अगर बाबूजी जिद पर अड़ गए तो किसी भी सूरत में दरवाजा न खोलेंगे । दूसरे अचानक ही उसके दिमाग पर यह आतंक हावी होने लगा था कि यदि ठीक इस वक्त कोई जासूस इधर निकल अाए तो उसे अकेला देखकर क्या चौंक नहीं पडेगा?"

हिम्मत करके देय ने कहा…"सुबह को सब होते हैं बाबूजी, जबकि मुझे आपसे अकेले में बाते करनी हैं, प्लीज…केवल पांच मिनट के लिए दरवाजा दीजिए ।"

"ओफ्फो...अच्छा ठहरो, खोलते हैं!" इस वाक्य ने जहां देव को शांति प्रदान की वहीं मस्तिष्क में एक नया सवाल यह उत्पन्न कर दिया कि बाबूजी टेबलेट के प्रभाव में हैं भी या नहीं?

क्या वास्तव में टेबलेट में मुश्ताक द्वारा बताए गए सब गुण है ?

कहीं ऐसा तो नहीं कि मुश्ताक ने उसे किसी झमेले में फंसा दिया हो, वह बाबूजी से बात शुरू करे और वावूजी बिना अाब-ताव देखे उसे शूट कर दें?

अभी वह यही सोच रहा था कि दरवाजा खुल गया ।

नाईट सूट पहने बाबूजी सामने थे और उनकी तरफ देखता दुखता हुआ देव यह पता लगाने की कोशिश करता रहा था कि वे करामाती गोली के प्रभाव में हैं या नहीं?

"अन्दर आओ!” कर्नल भगतसिंह ने कहा ।

देव ने एक नजर मोड़ तक सूनी पड़ी गेलरी पर डाली और कमरे में दाखिल हो गया-उस वक्त भगतसिंह बैड की तरफ़ लौट रहा था जव देव ने घूमकर चटक्नी चढ़ा दी।

भगतसिंह ने उसे बैड पर बैठाया, स्वयं लगभग लेटते हुए बोले----"कहो !"

एक बार फिर उनके हाव-भाव का निरीक्षण करके देव ने यह पता लगाने की नाकाम कोशिश की कि उन पर गोली का असर है या नहीं, बोला…"आपने हलवा खाया?"

भफ्तसिंह ठहाका लगाकर हंस पड़ा ।

देव की बुद्धि चकरा गई, जबकि भगतसिंह ने कहा, "क्या तुम ये बात करने यहां आएँ हो?"

"न-नहीं तो?"

"किर?"

"ऐसे ही पूछ लिया, दीपा ने आपके लिए कोई चीज पहली बार बनाई थी न?"

"नहीं खाया!"

थोड़ा चौंकते हुए देव ने पूछा---"क्यों?"

"बंसी मना करने लगा, कहने लगा कि दुश्मनों की जासूस हो सकती है-उसने अस्वाभाविक जिद करके हलवा बनाया है ---------

-मुमकिन है उसमें कुछ मिलाया हो----कल सुलह वह उसे लेब में भेजेगा टेस्ट के बाद पता लगेगा कि उसका सन्देह कितना गलत या सही है?"

देव उछल पड़ा ।

 


आश्चर्यजनक ढंग से भगतसिंह सच बोल रहा था, हैरत के सागर में डूबे देव ने पू्छा--"ये अाप क्या कह रहे हैं बाबूजी बंसी भला ऐसा क्यों कहेगा?"

"अरे भई, इस किस्म की चीजो पर नजर रखना ही तो उसका काम है…इसीलिए तो उसे और रामू को नौकरों के भेष में यहां रखा गया हैं?"

"नौकरों के भेष मे-वास्तव में वे कौन हैं?"

"मिलिट्री सीफेट सर्विस के जासूस ।"

" क्या ?"

"तुम चौंक रहे हो?" भगतसि'ह हंसता हुआ बोला…"हां तुम्हें चौकना ही चाहिए क्योकि आज़ से पहले यह बात तुम्हें मालूम नहीं थी-मगर तुम घबराओ नहीं, वे धर के किसी मेम्बर को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते-उनका काम संदेह होने पर उसकी . जांच-पड़ताल करना है, सो वे कर रहे हैं---हमें पूरा यकीन है, कि बहू दुश्मनों की जासूस नहीं हो सकती!"

" मगर इन जासूसों कोठी के अन्दर क्यों तैनात किया गया है बाबूजी ?"

" हकीकत तो बेचारे वे खुद भी नहीं जानते, सोचते है कि हमारे प्राइवेट रूम की सुरक्षा के लिए उन्हें इस वजह से यहाँ नियुक्त किया गया है । यहाँ मिलिट्री के सीक्रेटस रखे है ।"

देव ने धड़कते दिल से पूछा-"हकीकत क्या है?"

"वास्तव में वे एम. एक्स. ट्रिपल फाइव की सुरक्षा व्यवस्था के एक हिस्से हैं ।" भगतसिंह आराम से विना किसी तनाव के इस तरह बताए चला जा रहा था जैसे इस वक्त वह खुद को अपने जनरल के सामने महसुस कर रहा हो ।

"एसा एक्स ट्रिपल फाईव क्या है?" देव ने पूछा।

"दुसरी भाषा में तुम उसे हिन्दुस्तान के प्राण कह सकते हो!"

"" मैं समझा नहीं बाब्रूजी ।"

"वह एक ऐसी फाइल है-जिसमें यह दर्ज है कि हमारी कितनी-कितनी सेनाएं, टैंक और दूसरे हथियार कहाँ-कहाँ तैनात है, कौन-सा 'राडार' कहाँ लगा है-किस मोर्चे पर हम दुश्मन कें

छक्केे छुडा सकते हैं और वे मोर्चे कौन से हैं, जहाँ से दुश्मन यदि हमला करे तो हमारे परखच्चे उड़ा देगा---.. एक्स ट्रिपल फाइव में सबकुछ दर्ज है, यह भी कि हमारे मिजाइल्स और गुप्त हवाई अड्डे कहां हैं--पाकिस्तानी सेना में छुपे हमारे गुप्तचरों के नाम तक हैं उसमें । संक्षेप में यह समझ सकते हो कि अगर एम.एक्स ट्रिपल फाइव दुश्मन के हाथ लग जाए तो वह चौबीस घंटे के अन्दर देहली लाल किले पर अपना झंडा फ़हरा सकता है?"

रोमांचित होते देव ने पूछा…‘"एम.एक्स.ट्रिपल फाइव रखी कहाँ है ?"

कर्नल भगतसिंह बेहिचक सब बताता चला गया ।

की-हाँल से आंख सटाए झुकी खड़ी दीपा की कमर बुरी तरह दुखने लगी थी, किंतु एक पल के लिए भी वहां से आंख हटाकर उसे सीधी खड़ी होना गंवारा नहीं था-----वह दावे के साथ कह सकती थी कि अभी तक इस दरवाजे के सामने से, गैलरी से कोई नहीं गुजरा है और इसीलिए वह खुश भी थी----भगबान से दुआ कर रही थी कि इधर कोई आए ही नहीं।

वैसा कोई ड्रामा ही नहीं, जिसकी उन्होंने कल्पना की थी ।

किन्तु भगवान ने शायद उसकी दुआ नहीं सुनी, क्योंकि तभी गैलरी से उसे ऐसी आवाज आई जैसे वहां दवे पांव कोई चल रहा हो----दीपा का दिल बुरी तरह धड़कने लगा ।

गेैलरी में 'रामू' नजर आया ।

दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे पर दस्तक देने के लिए दीपा अभी वहां से हटने की सोच ही रही थी कि छवकै छूट गए--- रामू को उसने अागे निकल जाने की जगह इसी कमरे की तरफ बढ़ते देखा---अभी वह कुछ समझ भी न पाई थी कि धीरे से इसी दरवाजे का बाहर वाला "डंडाला'' सरकने की आवाज सुनी ।

दीपा के रोंगटे खड़े हो गए ।

पसीना छूट पड़ा, सिट्टी-पिट्टी गुम ।

जिन किबाडों के "की-हॉल'' से उसने आंख सटा रखी थी । उन्हीं' में हल्का-सा धक्का लगा और वह तेजी से सीधी खड़ी हो ग़ई कमर में दर्द की तेज लहर दौड़ी, मुंह से निकलना चाह रही सिसकारी को बडी मुश्किल से रोका!

इस बिचार ने उसके छक्के छुडा दिए कि रामू इसी कमरे में अा रहा है ।

यह तो वह न सोच सकी कि इस कमरे में आकर वह क्या करना चाहता है किन्तु आहिस्ता से खुल रहे किवाड़ के साथ-साथ पीछे जरूर हटती चली गई ।

अन्ततः दीवार से चिपक गई वह ।

रामू चोरों की तरह अन्दर दाखिल हुआ, दीपा ने अपनी सांस तक रोक ली, उफ-इस वक्त भले ही उसके जिस्म के चाहे जिस हिस्से को काटा जाए, एक बूंद खून हासिल न होगा!

चेहरा तीन दिन की सड़ी हुई लाश के चेहरे जैसा लग रहा था ।

गनीमत यह थी कि 'रामू' ने पलटकर दरवाजा बन्द करने की कोशिश नहीं की…अगर वह ऐसी कोशिश करता तो दीपा पर उसकी नजर पड़ने से भगवान भी नहीं रोक सकता था, मगर वह चोरों की तरह दबे पांव दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे की तरफ़ बढ़ रहा था ।

दीपा का दिमाग जड़ होकर रह गया ।

इसके अलावा उसे कुछ ऩ सूझा कि यहीं से फौरन भागं जाना चाहिए-रामू ने अगर पलटकर देख लिया तो सारा प्लान, सारी स्कीम धरी रह जाएगी ।

दरवाजा खुला था, वह किवाड़ के पीछे ।

दीपा हिली ।।

दरवाजे की तरफ बढ़ रहे रामू पर दहशत में डूबी अपनी आंखे चिपकाए, बिल्ली के मानिन्द कदम बढ़ाया-एक-दो फिर तीसरा और चौथे कदम में वह सुई गिरने जैसी आहट भी किए विना गेलरी में थी ।।

कमरे के अन्दर से अब रामू उसे नहीं देख सकता था ।

उसने काफी देर से रुकी सांस छोड़ी--दिमाग की मशीन थोड़ी देर रुकने के बाद जैसे पुन: काम करने लगो-अब उसकी समझ में आ रहा था कि रामू ,शायद दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे से कान सटाकर बाते सुनना चाहता है और इस विचार ने पुन: उसके होश फाख्ता कर दिए-------उसी दरवाजे पर तो उसे दस्तक देनी थी, वह मुख्य द्वार के स्थान पर उस दरवाजे से बातें सुनने की कोशिश कर रहा है और यदि उसने बाते सुन ली तो?

सोचकर दीपा कांप उठी ।।

दिमाग में विचार उठा---"क्या मुझे मुख्य द्वार पर सांकेतिक दस्तक देनी चाहिए ?"

उस वक्त कर्नल भगतसिंह द्वारा बताई जा रही सुरक्षा-व्यवस्था अन्तिम दौर में थी और उसने वही सव वताया था, जो देव टेप के जरिए पहले ही जान चुका था । उसके चुप होने पर देव अगला सवाल करना ही चाहता था कि दरवाजे पर हल्की-सी दस्तक हुई ।

इस दस्तक को सुनने के लिए देव के कान हर पल चौंकन्ने थे ।

तीन बार, वही सांकेतिक अबाज ।

परन्तु यह दस्तक दोनों कमरों के ब्रीच वाले दरवाजे पर नहीं, बल्कि मुख्य द्वार पर हुई थी और इसी वज़ह से वह थोडा भ्रमित हो गया ।

बुद्धि चकरा गई ।

दिमाग मैं सवाल उठा कि यदि यह दस्तक दीपा ने दी होती तो दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे पर दी जानी चाहिए थी-मगर, उसी सांकेतिक अन्दाज में किसी अन्य के द्वारा दस्तक दिए जाने का तो सवाल ही नहीं उठता था ।

दस्तक दीपा ने ही दो होगी-मुख्य द्वार पर क्यों?

देव ठीक से कुछ सोच न सका और ज्यादा देर तक सोचते रहने के हालात न थे । अत वह तेजी से घूमा, मुख्य द्वार के नजदीक पहुंचा --- चिटकनी गिराने के बाद एक झटके से दरवाजा खोलकर गैलरी में पहुचा, परन्तु वहाँ दीपा को देखकर बुद्धि उलट गयी ।

दरवाजा भिडाया ।

दीपा के चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थी, धीमे-सै उसके कान में फुसफुसाई-"रामू मां के कमरे में है, दोनो कमरों के बीच वाले दरवाजे से बाते सुन रहा है!"

" व-वह वहां कैसे पहुच गया?"

"बात करने का समय नहीं है, उसे सम्भालो?" कहने के बाद दीपा दवे पाव किन्तु तेजी-से शायद छुपने के लिए गैलरी के एक थम्ब की तरफ़ बढ गई।

देव कुछ समझा, कुछ न समझा।

मगर पूरी बात समझने का समय न था, तभी कमरे के अदर से भगतसिंह ने ऊची आवाज में पूछा---"क्या बात है देव, कौन वहां?”

"कोई नहीं, आप वहीं रहे बावूजी-मै अभी आया " कहने के साथ ही उसने इस कमरे का डंडाला बाहर से लगाया----तेज कदमों के साथ खुले पड़े मां के कमरे में दाखिल हो गया और दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे से कान सटाए खडे रामू को . देखा ।

"रामू!" मुंह से गुर्राहट निकाली ।

वह इस तरह उछल पड़ा जैसे अचानक बिच्छू ने डंक मारा हो।

अपने पीछे खड़े देव को देखते ही उसके रौगटें खड़े हो गए…कोशिश के बावजुद उसके मुंह से कोई आवाज न निकल सकी जबकि देव ने पूछा-"इस वक्त यहाँ क्या कर रहे हो ?"

"क-कुछ भी नहीं साहब ।"

"इधर आओ ।" देल ने उसे अपने नजदीक अाने का संकेत दिया ।

हवका-बक्का वह देव के नजदीक पहुचा ।

देव जानता था कि भले ही चाहे जो हो जाए, किन्तु अपनी समझ में रामू किसी भी हालत में उसे यह पता नहीं लगने देगा कि वह नौकर नहीं जासूस है और इसी वजह से अंतिम समय तक भी वह एक सामान्य नौकर जैसा ही व्यवहार करता रहेगा-इसी 'समझ' से प्रेरित देव ने झपटकर रामू का गिरेबान पकड़ लिया, दांत पीसते सवाल किया-"इस तरह छूपकर तुम हमारी बाते क्यों सुन रहे थे?"

"म-मैँ बाते कहां सुन रहा था साहब?"

" झूठ मत बोलो !" गुर्राते हुये देव ने उस पर कुछ और ज्यादा हावी होने की गर्ज से गिरेबान छोड़कर बाल पकडे----इसी पल, उसे याद अाया कि इस जासूस ने कमांडो ट्रेनिगभी की हुई हे…अभी, यदि वह खुल जाए-इय बात को भूला दे कि यहां वह "नौकर'" है तो इसी वक्त मेरी हड्डियों का सुरमा बना सकता है ।

सोचकर भीतर-ही-भीतर कांप उठा देव ।

 


मगर मन से यह विश्वास रखकर गुर्राया---- कि फिलहाल वह खुद को नौकर से ज्यादा कुछ न दर्शाएगा, "सीधी तरह बताओ कि हमारी बाते तुम किसके इशारे पर सुन रहे थे?"

"क-किसी के नहीं!"

" फिर?"

"'म……मैं अाप लोगों की बातें नहीं सुन रहा था, बल्कि एक जरुरी काम से यहाँ आया था ।"

"किससे काम था ?"'

"व-बड़े साहब से!"

"अगर बाबूजी से काम था तो मां के कमरे में क्या कर रहे थे, उस दरवाजे पर कान क्यो लगा रखे थे?"

"रामू चुप रहा।

प्रत्पक्षतः उसके पास इस सवाल का कोई जवाब न था--हां, मन-ही-मन सोच जरूर रहा था कि काश. . .चीफ की तरफ से उसे नौकर की एक्टिंग करते रहने के सख्त निर्देश न होते-काश, वह देव को बता सकता कि वह कौन है और छूपकर उनकी बाते क्यों सुन रहा था?

इधर, देव को या चिन्ता -थी कि कहीं बाबूजी कमरे के अंदर से ही ऊंची आवाज में बोल न पड़े, अत: उसे खुले दरवाजे की तरफ़ खींचता हुआ बोला--- "अगर खैरियत चाहते हो तो इस वत्त यहाँ से चले जाओ, तुम्हारा फैसला सुबह करूंगा!"

रामू ने सोचा जान बची तो लाखों पाए ।

वह वापस जाने के लिए गैलरी में मुड़ा ही था किं-कर्नल भगतसिंह ने अंदर से दरवाजा भड़भड़ाया साथ ही ऊंची अबाज में पूछा-"कोन-हैं देव, किससे लड़ रहे हो?"

रामू ठिठक गया ।

देव बोला-----" अभी अाकर बताता हूं बाबूजी, अाप फिक्र न. ।"

"दरवाजा खोलो, इसे तुमने बाहर से की क्यों कर दिया ।"

उस तरफ़ कोई ध्यान दिए विना देव 'रामू' पर गुर्राया---"अव यहाँ क्यों खड़ा है, खैरियत चाहता है तो चला जा यहाँ से ।"

वेचारा रामू !नौकर की एक्टिग करने के लिए विवश ।

उसे ऐसी एक्टिग करनी थी, जैसी हालत थी रंगे हाथों चोरी करते पकड़े जाने पर सामान्य नौकर की होती है है । अत: मुंह से एक भी लफ्ज निकले विना वहां से सरक लिया।

देव तब तक अपने स्थान पर खड़ा उसे आग्नेय नेत्रों से घूरता रहा, जव तक कि मोड़ पार करके वह आंखों से ओझल न हो गया-----उधर अंदर से दरवाजा भड़भड़ा रहा कर्नल भगतसिंह जाने क्या-क्या पूछता रहा-देव ने एक नजर उस थम्ब की तरफ़ डाली, जिसके पीछे दीपा के छुपे होने की सम्भावना थी, मगर उंसके जिस्म का कोई हिस्सा देव को चमका नहीं।

आगे बढ़कर देव ने डंडाला सरका दिया ।

"क्या बात थी ।" कर्नल भगतसिंह ने पुछा---"किससे लड़ ऱहे थे तुम?"

"रामू था!"

" रामू ?"

" हां , मां के कमरे में खड़ा वह हमारी बातें सुन रहा था ।"

"ओह अच्छा!" कर्नल भगतसिंह खुलकर 'हंस पड़ा, जासूस है न, अपनी जासूसी झाड़ रहा होगा…सोच रहा होगा कि कहीं तुम मुझे किसी चक्कर में तो नहीं फंसा रहे हो?"

यह सोचकर देव अंदर-ही-अंदर कांप उठा कि टेबलेट के प्रभाव में सिर्फ सच बोल रहे बाबूजी ने अगर यही वाक्य 'रामू' के सामने कह दिया होता तो क्या होता कि प्रत्यक्ष नाराजगी-भरे स्वर में बोला----"' अगर यह जासूस है बाबूजी तो , इसका मतलब ये तो नहीं कि घर के सदस्यों की ही जासूसी करता फिरे…उनकी बाते सुने, क्या बाप-बेटे स्वच्छन्द रूप बात भी नहीं कर सकते?"

"मैं उनसे कहूंगा कि भविष्य में इस तरह की हरकत न करें !"

"चलिए!" कहंने के साथ ही वह पुन: अन्दर दाखिल हो गया । कुछ देर बाद बेड पर बैठा लह पूछ रहा था-"वह चाबी कहां है बाबूजी , जिससे प्राईवेट रूम का दरवाजा खुलता है?"

" हमेशा मेरे गले में पड़ी रहती है!"

देव ने अादेश-सा दिया---" मुझे दिखाइए!"

कर्नल भगतसिंह ने बेहिचक से एक ताबीज उतारा । ताबीज क्या रेशम के एक थागे में चाबी पिरी हुई थी, जिसका पिछला हिस्सा ‘रबर' का बना था । टेबलेट के चमत्कारी प्रभाव को दाद देते हुए देव ने ताबीज लिया- भगतसिंह के सामने ही उसने जेब से 'साबुन स्लाईस' निकाली और चाबी को उनके बीच में लगाकर बाकायदा उसकी 'छाप' ली ।

"ये क्या कर रहे हो?" भगतसिंह ने पूछा ।

"छाप ले रहा हूं " बड़े ही मोहक ढंग से मुस्कराते हुए देवं ने साफ़ कहा ।

भगतसिंह ने मूर्खोॉ की तरह पूछा…"क्यों?"

"चाबिर्यों की डुप्लीकेट भी तो होनी चाहिए ताकि अगर एकं सेट खो जाए तो कम-से-कम दूसरे की मदद से आप एम. एक्स, ट्रिपल फाइव तक पहुंच तो सकें ?"

कर्नल ने सहमति में गर्दन हिलाई । "तो लाइए वह चाबी, जिससे हाल क्लॉक में चाबी भरी जाती है ।"

भगतसिंह ने विना किसी हुज्जत के वह चाबी भी उसे सौप दी । उसकी छाप लेते हुए देव ने पूछा-"तहखाने का दरवाजा खोलने के लिए इस चाबी के कितने राउंड देने पड़ते हैं?"

"सात ।" देव ने एक कागज पर लिख लिया । और इस तरह, देव ने न सिर्फ हर आवश्यक चाबी की छाप ले ती बल्कि अलमारी के दोनो लॉंक नम्बर भी नोट कर लिए । यह भी पूछ लिया कि कृत्रिम दरिया किस तरह पार किया जाएगा-गर्ज यह कि अपने मतलब की पूरी जानकारी लेने के बाद उसने कहा…"अब आप थक गए होंगे बाबूजी, आराम से सो जाइए!"

भगतसिंह और अंजली "बेड टी'' साथ ही लेते थे और नियमानुसार चाय देने के बाद बंसी चुपचाप चला जाता था, किन्तु आज वह गया नहीं बल्कि वेड के समीप चुपचाप खड़ा हो गया ।

उसे उस मुद्रा में देखकर भगतसिंह ने पूछा…"क्या बात है बंसी, कुछ कहना चाहते हो क्या?"

"जी !"

" बोलो ?"

"क्या रात छोटे साहब ने रामू के बारे में कोई शिकायत की थी ?"

"रात...नही तो, रात तो वह हमारे पास आया ही नहीं!"

 


कर्नल भगतसिंह के इस सफेद झूठ पर बंसी उछल पड़ा । हैरत है उनका चेहरा देखता हुआ बोला----"' क्या बात कर रहे हैं साहव, रात तो उन्होनें आपसे कम-से-कम डेढ घंटे बात की है ------बहूरानी भी उनके साथ थी!"

"क्या बकवास कर रहे हो?" भगतसिंह गुर्रा उठा----" रात हम खाना खाते ही सो गए थे और उसके बाद हमने किसी से कोई वात नहीं की!"

हैरत के कारण बंसी का बुरा हाल हो गया…"आपको क्या हो गया है साहब, इस बात का तो मैं चश्मदीद गवाह हूं, रामू भी,, शायद छोटे साहव और वहूरानी-भी न मुकर सकें---- मैं उनके मुंह से कहलवा सकता हूं कि रात करीब साढ़े नौ बजे वे यहाँ अाए और ग्यारह बजे लौटे ---- बीच के सारे समय आपसे बाते करते रहे हैं!"

भगतसिंह के रोबीले चेहरे के ज़रें-जरें पर आश्चर्य के कण नजर आने लगे, बोले----"रात तुमने कोई ख्वाब तो नहीं देखा है ?"

"अाप कैसी बात कर रहे हैं साहब, रात तो यहाँ रामू और छोटे साहब के बीच झड़प भी हुई हैे----मैँ उसी सम्बन्ध में पूछ रहा था कि उन्होंने कोई शिकायत तो नहीं की?"

"झड़प-वह किसलिए?"

"कमाल है,-आपको तो कुछ भी याद नहीं!" बंसी की समझ में नहीं आ रहा था कि कर्नल भगतसिंह क्यों "मुकर" रहा है, जबकि भगतसिंह स्वयं उससे कहीं अधिक चकित नजर आ रहा था, बोला-"रामू, देव और दीपा भी तुम्हारे गवाह हैं?"

"जी ।"

"तीनों को इसी वक्त बुलाकर यहाँ लाओ?"

आश्चर्य के सागर में डूबा बंसी कमरे से बाहर चला गया, समीप बैठी अंजली ने कहा----""ये सब क्या चवकर है?"

"पता नहीं क्या बक रहा है?" असमंजस में फंसे भगतसिंह ने कहा…"हमे अच्छी तरह याद है कि खाना खाने के बाद किसी से कोई बात नहीं की---बंसी के जाते ही दरवाजा बन्द करके हम सो गए थे और ये बेवकूफ कहता है कि देव और --दीपा यहाँ अाए-उन्होंने डेढ घंटे हमसे बाते की ।"

"अजीब बात है!"

वे इसी तरह की बाते कर रहे थे कि बंसी तीनों को लेकर यहाँ अा गया ।

उन तीनों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रही थी । जाहिर था कि बंसी उसे यह बात बता चुका है कि कर्नल साहब रात की हर बात से अनभिज्ञता प्रकट कर रहे हैं, सो-कमरे में दाखिल होते ही देव ने वम्हा-"ये बंसी क्या कह रहा है बाबुजी, क्या आपको याद नहीं कि रात मैं और दीपा यहाँ जाए थे."

उसके इस वाक्य पर भगतसिंह के मुहं से कोई बोल न फूटा, मुखों की तरह गर्दन उठाए वह उन चारों को सिर्फ देखता रहा-अंजली उलझन का शिकार थी, जव कमरे में खामोशी छाए काफी देर हो गई तो देव ने पूछा…"इस तरह क्या देख रहे हैं, आप-बोलते क्यों नहीं बाबूजी?"

"बोलू क्या खाक ?" सस्पेंस में फंसा वह कह उठा---"कमरे में घुसते ही तुमने भी यही वात कही है जो बंसी कह रहा है और रामू----दीपा के चेहरे पर भी मैं तुम्हारे सवाल का ज़वाब पाने की जिज्ञासा देख रहा हूं--जाहिर है कि तम चारों एक ही बात कह रहे हो, वह भी ऐसी कि जिसे में कभी सच नहीं मान सकता ।"

टेबलेट की करामात ने देव को मन-ही-मन दंग करके रख दिया । जबकि दीपा ने पूछा----"क्या सचमुच आपको रात की कोई बात याद नहीं है बाबूजी !"

"खामोश!" अचानक इतनी जोर से दहाड़ता हुआ कर्नल भगतसिंह एक झटके से खड़ा हो गया कि अंजली सहित पांचों कांपकर रह गए, गुर्राया-----" क्या बकवास लगा रखी है ये----हर व्यक्ति एक ही सवाल कर रहा है, क्या तुम चारों मिलकर मुझे

पागल सावित कर देना चाहते हो-ये कहना चाहते हो कि मेरी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है, क्या उद्देश्य है तुम्हारा?"

देव और दीपा में से किसी का बोल न् फूटा, जबकि बंसी बोला-"कैसी बात कर रहे हैं सर , अाप तो अच्छी तरह जानते है कि मैं और रामू क्या हैं-क्या हम किसी से मिलकर अापके विरूद्ध साजिश कर सकते हैं, प्लीज-हमारे बारे में गौर से सोचिये ।"



छुपे अन्दाज मे उसने जो कुछ कहा था उसे देव और दीपा भी समझते थे-भगतसिंह तो खैर समझ ही रहा था । अपने दिमाग को नियंत्रित करके ब्रोला---खैर...पहले तुममे से कोई भी एक व्यक्ति मुझे रात की पूरी वारदात बताए!"

“मैं और दीपा करीब-साढे नौ बजे अपके पास अाए, तव तक आप अपने कमरे का दरवाजा अन्दर से बद कर. चुके थे जिसे हमारे अाने पर पुन: खोला…उसके बाद करीब डेढ घंटे हमने आपसे बाते की!" .

"क्या ?"

"मै अपनी बैक की सर्विस के बारे में आपसे बातचीत करने आया था!"

"बैक के बोरे में क्या?"

"हद हो गई, आपको तो कुछ याद नहीं हेै ।" इस जुमले के बाद देव ने अपना पूर्व निर्धारित बयान जारी कर दिया…"मैं अपनी सर्विस से सन्तुष्ट नहीं हूं , यही बात मैंने आपसे कही थी----------

 


सुनकर अाप भावुक हो गए, कहने लगे कि यह बात तो आपको भी पसन्द नहीं है कि एक कर्नल का बेटा ऐसी विना एडवेंचर भरी नौकरी करे-आपने यह भी कहा कि ये बात केवल आप मेरे जिद्दी स्वभाव को ध्यान में रखकर दिल में' छपाए हुए थे, वर्ना चाहते तो ये हैं कि मैं भी मिलिट्री ज्वाइन करके अपने देश की सेवा करता-ज्यादातर भावुक्ता में डूबे अाप यही बताते रहे कि अपने मन में अापने मुझसे क्या-क्या अपेक्षाएं की है तब, मैंने कहा कि मेरा उद्देश्य भी मिलिट्री ज्योंइन करके देश के लिए कुछ कर दिखाना है-अन्त में आपने आश्वासन दिया कि किसी तरह मुझे मिलिट्री में सर्विस दिलाएंगे!"

"कमाल है, हमें कुछ भी याद नहीं है----खेर, लेकिन इस ही रामू से तुम्हारी झड़प कैसे और कहां हो गई?"

"जब मैं और अाप बाते कर रहे थे तब बीच में हल्की-सी आहट से मुझे लगा क्रि कोई छुपकर हमारी बाते सुन रहा है… जानने के लिए मैं गैलरी में पहुचा, वहां कोई न था, किन्तु मां के कमरे का दरवाजा खुला पड़ा था और देखता क्या हूं कि दोनों कमरों के बीच वाले दरवाजे से कान लगाए रामू हमारो बातें सुनने की कोशिश कर रहा है---एक नौकर की इतनी मजाल देखकर मैं गुस्से से पागल हो गया और आपसे शिकायत करने तथा इस बारे में सुबह बात करने की धमकी देकर इसे यहाँ से भगा द्रिया-बस, इतनी झड़प हुई थी!"

"क्या इस बीच हमने कुछ नहीं किया या कहा?"

"कमरे के अन्दर से अाप पूछते रहे कि कौन है, मैं किससे झगड़ रहा हूं मगर गुस्से की ज्यादती के कारण उस वक्त मैंने अापके सबालों का जवाब नहीं दिया-बाद में जब मैंने रामू की हरकत के बारे में आपको बताया तो अाप भी वहुत नाराज हुए और कहा कि सुबह होते ही उसे नौकरी से निकाल देगे!"

"मगर हम कमरे से बाहर क्यों नहीं अाए?"

"अाते तो तब ही न सर, जबकि इन्होंने आपको बाहर अाने लायक छोड़ा होता?"

."क्या मतलब ?"

रामू ने कहा----गैलरी में अाते ही इन्होंने आपके कमरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया था?"

" बह क्यो ?"

" इन्हीं से पुछिए ।"

भगतसिंह ने देब से मुखातिब होकर पूछा'…'"क्यों देव, तुमने दरवाजा बाहर से बन्द क्यों किया?"

"वह केवल बेख्याली में हो गया था, दरवाजा बंद करने के बाद मुझे डंडाला सरका देने की आदत है!"

"ये झूठ बोल रहे हैं साहब, अगर इन्हें ऐसी आदत है तो जब ग्यारह बजे यहाँ से गए तब बेख्याली में दरवाजा बाहर से वन्द क्यों नहीं कर गए थे?"

"जाते वक्त ये पहले और मैं कमरे से बाद में निक्ली थ्री!" दीपा ने हक अदा कर दिया ।

"ये सब झूठ है साहब, हकीकत ये है कि उस वक्त ये मेरा और आपका आमना-सामना ही नहीं होने देना चाहते थे!" '

" क्यों ?"

"मुझे लगता है कि ये लोग कोई षडृयन्त्र रच रहे है!"

"ष-षडृयन्त्र?" देव भड़क उठा-"कैसा षडृयन्त्र.. अपने ही घर में भला कोई क्या षडृयन्त्र रच सकता है---किसके बिरूद्ध रचेगा-क्या अपने ही मा-बाप के---आपको क्या हो गया है बाबूजी नौकरों के मुंह से मुझें अाप क्या कहलवा रहे हेै-इनकी ये मजाल कि…कि... ।"

देव ने गुस्से के कारण वाक्य पूरा न कर पाने की खूबसूरत एक्टिग की, जबकि भगतसिंह ने कहा…"तुम लोग मुझे रात की घटनाएं याद दिला रहे हो या आपस में लड़ रहे हो?"

एक पल के लिए दोनों ग्रुप शांत रहे।

फिर बंसी ने पूछा----"क्या अापको बहूरानी द्वारा बनाया गया हलवा याद है साहब?"

"हां, तुम खाने के साथ लाए थे!"

"कहीं आपने उसमें से कुछ खाया तो नहीं था ?" बंसी की अांखें चमक उठी ।

" एक ज़र्रा भी नहीं!"

" त----तो फिर… धोखा देकर किसी अन्य चीज में कोई और चीज मिलाई होगी?"

"क्या मतलब?"

"अापको खाने से पहले की सब बातें, अच्छी तरह याद है, यह भी कि हलवे के सम्बन्ध में हमारी क्या बाते थीं-अगर आपको याद नहीं है तो सिर्फ खाने के बाद की क्या इसका ये मतलब नहीं निकलता साहब कि खाने के साथ आपने कुछ ऐसा खाया, जिसके प्रभाव के दौरान की गई कोई भी वात याद नहीं है ----और ऐसा केवल कल पहली बार हुआ-संयोग से कल पहली बार ही बहुरानी ने किचन में कदम रखा था ।”

दीपा दहाड उठी…"क्या तुम यह कहना चाहते हो कि बाबूजी को मैंने कुछ खिला दिया?"

" तुम खामोश रहो ?" एकाएक भगतसिंह उस पर हिंसक पशु के समान गुर्रा उठा-"पूरा न सही मगर मामला कुछ-कूछ हमारी समझ में आ रहा है…इस बात की छानबीन तो बाद में की जाएगी कि रात वास्तव में यहां हुआ क्या था---सबसे प्रमुख बात ये है कि जो कुछ हुआ वह हमें याद क्यों नहीं है, जरूर हमे ऐसी कोई चीज दी गई थी ।"

' "आप इन नौकरों की बातों में अा रहे हैं बाबूजी, दुनिया में ऐसी कोई चीज है ही नहीं, जिसके प्रभाव में की बातें आदमी सुबह तक भूल जाए!"

" है !"

देव ने धड़कते दिल से पूछा…"क्या?"

"शराब ।"

"शराब ?"

"हां शराब ।" कर्नल भगतसिंह ने उसे खा जाने वाली नजरों से घूरते हुए कहा----'"शराब एक ऐसी चीज है, जिसे व्यक्ति अगर जरूरत से ज्यादा पी ले तो नशे के दोरान की गई बाते या हरकतें नशा उतरने के बाद याद नहीं आतीं और अगर अाती भी हैं तो

धूमिल-धूमिल-----हम शराब लेते जरूर हैं, दो पैग से ज्यादा कभी नहीं और रात भी सिर्फ दो ही पैग लिए हैं जाहिर है कि यह चाहे जिसने दी हो, मगर ऐसी कोई चीज दी गई, जिससे हम इतने नशे में हो गए कि हमेँ कुछ भी याद नहीं-अब ये पता लगाना हमारा काम है कि नशे की यह चीज हमे किसने किस उद्देश्य से दी?" कहते वक्त वे लगातार दीपा को घूर रहे थे ।

दीपा की हालत बैरंग ।

 


कर्नल भगतसिंह की पूरी बात सुनने के बाद मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के चीफ ने कहा---" ज़व आपको कुछ भी याद नहीं तो जाहिर है कि कोई नशीली चीज दी गई, उधर-हलवां बनाने के दौरान दीपा की हरकते संदिग्ध थी…सम्भावना ये है कि वह नशीली चीज शायद उसी ने आपकी दी हो?"

"मुझें दरअसल यह डर खाए जा रहा है कि नशे के दोरान मैं मैं एम.एक्स. ट्रिपल फाइव की सुरक्षा व्यवस्था न बक गया होऊं?"

बड़ीं पारी मुस्कराहट के साथ चीफ बोला----"एकदम से कूदकर एम. एक्स. ट्रिपल फाईव पर नहीं पहुच जाना चाहिए।"

"क्या मतलब?"

"एसा एक्स ट्रिपल फाइव के अस्तित्व के राज से केवल तीन व्यक्ति परिचित हैं---मैं , अाप और जनरल साहब-इन तीन हस्तियों में से एक भी ऐसी नहीं है, जो इस राज को लीक करेगी, अत: पहले तो इसकी सूचना ही दुश्मन को होने की सम्भावना नगण्य जितनी है और यदि हो भी जाए तो सुरक्षा-व्यवस्थाएं इतनी कडी हैं कि हमे व्यर्थ ही चिन्तित होने की जरूरत नहीं है!"

"मगर हमारे साथ ऐसा हुआ क्यों?"

"आप कर्नल है, कोई अन्य फौजी राज जानने की कल्पना भी दुश्मन् कर सकता है!"

कर्नल भगतसिंह अभी कुछ कहना ही चाहता था कि मेज पर रखे फोन की घंटी घनघना उठी, चीफ़ ने रिसीवर उठाया----कुछ देर वात की और फोन रखता हुआ बोला-"घटनाएं एक नया और दिलचस्प मोड़ लेती महसूस हो रही हैं कर्नल साब!",

"क्या हुआ"

. "लेव से रिपोर्ट अाई है कि हलवे में किसी नशीली दवा का कोई अंश नहीं पाया गया!"

"आप देव और दीपा को गिरफ्तार करके उनसे पूछताछ क्यों नहीं करते?"

"क्योंकि इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है!"

"क्या मतलब?"

"अगर देव और दीपा किसी मकसद से आपकी कोठी में रह रहे है और कर रहे है तो जाहिर है कि उनके पीछे कुछ और लोग हैं-वे केवल 'मोहरे' हैं, जड़ कहीं और है-हमें जड़ तक पहुचना है कर्नल साहब, जानना है कि दुश्मन का 'मिशन' क्या है-इसकै लिए जरूरी ये है कि मोहरों को छेडा न जाए, जबिक सिर्फ वॉच किया जाए!"

" यानी अाप उन पर कडी नजर रखना चहते है?"

"यकीनन" चीफ ने प्रभावशाली स्वर में कहा----"आज से चौबीस घंटे कोठी से बाहर भी उन पर कड़ी नजर रखी जाएगी, हाथ तब डाला जाएगा जब वे हाथ जड़ तक पहुचेंगे---आपको फिक्र करने की कोई जरुरत नहीं है-एम. एक्स. ट्रिपल फाइव की

सुरक्षा हमारे विभाग के सुपुर्द है और हम यकीन दिलाकर कह सकते हैं कि दुश्मन वहां तक नहीं पहुंच सकता!"

दस दिन गुजर गए।

घर में किसी ने भी पुन: उस रात की घटना का जिक्र न किया और यही बात देव और दीपा को अन्दर-ही-अन्दर कचोट रही थी । उनकी समझ में न आ रहा था कि बाबूजी और जासूसों ने मिलकर उन घटनाओं का क्या निष्कर्ष निकाला है?

वे सन्देह के दायरे में हैं या नहीं?

उधर, मुश्ताक ने भी उनसे कोई सम्पर्क स्थापित नहीं किया था, जबकि देव नियमपूर्वक बैक जा रहा था-सारे मामले पर ऐसी खामोशी छा गई थी जैसे कुछ हो ही न रहा हो किन्तु देव को लग रहा था कि यह खामोशी वैसी ही है, जैसी तूफान के आाने से पहले अक्सर छा जाया करती है ।।

कर्नल भगतसिंह की पूरी बात सुनने के बाद मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के चीफ ने कहा---" ज़व आपको कुछ भी याद नहीं तो जाहिर है कि कोई नशीली चीज दी गई, उधर-हलवां बनाने के दौरान दीपा की हरकते संदिग्ध थी…सम्भावना ये है कि वह नशीली चीज शायद उसी ने आपकी दी हो?"

"मुझें दरअसल यह डर खाए जा रहा है कि नशे के दोरान मैं मैं एम.एक्स. ट्रिपल फाइव की सुरक्षा व्यवस्था न बक गया होऊं?"

बड़ीं पारी मुस्कराहट के साथ चीफ बोला----"एकदम से कूदकर एम. एक्स. ट्रिपल फाईव पर नहीं पहुच जाना चाहिए।"

"क्या मतलब?"

"एसा एक्स ट्रिपल फाइव के अस्तित्व के राज से केवल तीन व्यक्ति परिचित हैं---मैं , अाप और जनरल साहब-इन तीन हस्तियों में से एक भी ऐसी नहीं है, जो इस राज को लीक करेगी, अत: पहले तो इसकी सूचना ही दुश्मन को होने की सम्भावना नगण्य जितनी है और यदि हो भी जाए तो सुरक्षा-व्यवस्थाएं इतनी कडी हैं कि हमे व्यर्थ ही चिन्तित होने की जरूरत नहीं है!"

"मगर हमारे साथ ऐसा हुआ क्यों?"

"आप कर्नल है, कोई अन्य फौजी राज जानने की कल्पना भी दुश्मन् कर सकता है!"

कर्नल भगतसिंह अभी कुछ कहना ही चाहता था कि मेज पर रखे फोन की घंटी घनघना उठी, चीफ़ ने रिसीवर उठाया----कुछ देर वात की और फोन रखता हुआ बोला-"घटनाएं एक नया और दिलचस्प मोड़ लेती महसूस हो रही हैं कर्नल साब!",

"क्या हुआ"

. "लेव से रिपोर्ट अाई है कि हलवे में किसी नशीली दवा का कोई अंश नहीं पाया गया!"

"आप देव और दीपा को गिरफ्तार करके उनसे पूछताछ क्यों नहीं करते?"

"क्योंकि इससे कोई लाभ होने वाला नहीं है!"

"क्या मतलब?"

"अगर देव और दीपा किसी मकसद से आपकी कोठी में रह रहे है और कर रहे है तो जाहिर है कि उनके पीछे कुछ और लोग हैं-वे केवल 'मोहरे' हैं, जड़ कहीं और है-हमें जड़ तक पहुचना है कर्नल साहब, जानना है कि दुश्मन का 'मिशन' क्या है-इसकै लिए जरूरी ये है कि मोहरों को छेडा न जाए, जबिक सिर्फ वॉच किया जाए!"

" यानी अाप उन पर कडी नजर रखना चहते है?"

"यकीनन" चीफ ने प्रभावशाली स्वर में कहा----"आज से चौबीस घंटे कोठी से बाहर भी उन पर कड़ी नजर रखी जाएगी, हाथ तब डाला जाएगा जब वे हाथ जड़ तक पहुचेंगे---आपको फिक्र करने की कोई जरुरत नहीं है-एम. एक्स. ट्रिपल फाइव की

सुरक्षा हमारे विभाग के सुपुर्द है और हम यकीन दिलाकर कह सकते हैं कि दुश्मन वहां तक नहीं पहुंच सकता!"

दस दिन गुजर गए।

 


घर में किसी ने भी पुन: उस रात की घटना का जिक्र न किया और यही बात देव और दीपा को अन्दर-ही-अन्दर कचोट रही थी । उनकी समझ में न आ रहा था कि बाबूजी और जासूसों ने मिलकर उन घटनाओं का क्या निष्कर्ष निकाला है?

वे सन्देह के दायरे में हैं या नहीं?

उधर, मुश्ताक ने भी उनसे कोई सम्पर्क स्थापित नहीं किया था, जबकि देव नियमपूर्वक बैक जा रहा था-सारे मामले पर ऐसी खामोशी छा गई थी जैसे कुछ हो ही न रहा हो किन्तु देव को लग रहा था कि यह खामोशी वैसी ही है, जैसी तूफान के आाने से पहले अक्सर छा जाया करती है ।।।

ग्यारहवें दिन !

सुबह ग्यारह बजे ।

अन्य ग्राहकों की तरह एक विदेशी ग्राहक उसके काउन्टर पर आया । पास कराने के लिए चेक दिया-बैंक रुटीन के मुताबिक ग्राहक तो उसके पास जाते ही रहते थे, किन्तु इस विशेष ग्राहक का जिक्र यहां इसलिए किया गया है कि इस ग्राहक ने नाक खुजलाते हुए चेैक के साथ एक चिट्ठी पकड़ाई ।

चिट्ठी देव ने टॉयलेट में जाकर पढ़ी, विना किसी सम्बोधन के लिखा था-'"पिछले दस दिन से हम तुम्हारे चारों तरफ़ ऐसे अनेक शख्स देख रहे हैं, जो तुम पर, तुम्हारी हर एक्टीविटी पर कड़ी नजर रखे हुए हैं-मतलब साफ कि तुमने कोई 'बेवकूफी’ की हेै------हमारे ख्याल से इन लोगों का सम्बन्ध किसी भारतीय खुफिया विभाग से होना चाहिए,,मगर इन शब्दों को पढ़कर आतंकित होने की जरूरत नहीं है-हमारे रहते ये तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचा सकते----: तुमने चाबियों की 'छाप' ले ली हो तो कल बैंक में इन्हें अपने साथ लाना…कल किसी समय बैक में नीले सूट पर सफेद टाई लगाए अधेड़ आयु का एक व्यक्ति अाएगा----उसके आने पर 'टायलेट' जाओगे और 'छाप' वाली स्लाईस वहां रख आओगे--तुम्हारे टॉयलेट से निकलते ही हमारा आदमी वहाँ जाएगा और उन्हें कलेक्ट कर लेगा-इससे अागे की कार्यवाही बाद में बताई जाएगी ।।

याद रहे, अपने सारे काम अाम रुटीन से ही करते रहता है----यह भी पता लगाने की कोशिश न करना कि तुम पर कौन लोग किस माध्यम से नजर रखे हुए हैं, क्योंकि तुम पता लगाने में कामयाब हो पाओ या नहीं, किन्तु वे लोग यह जरूर समझ जाएंगे कि तुम्हें उनकी मौजूदगी की सूचना मिल गई है और यह घातक होगा, अत: अपनी बेहतरी के लिए यह भूलकर 'आम रुटीन' में लगे रहो कि तुम्हें कुछ लोग वॉच कर हैं।

इस कागज को जलाकर राख में बदल देना तुम्हारे हित में होगा!

पढकर देव के जिस्म में अजीब-सी सनसनी दौड़ गई, इस जानकारी ने सचमुच उसके होश उड़़ा ड़ाले थे कि जासूस उसे वॉच कर रहे हैं-अब वह समझ गया कि बाबूजी, बंसी और रामू की खामोशी का राज़ क्या है-----मतलब ये कि उनका शक बरकरार है, किंन्तु अभी इस निष्कर्ष पर नहीं पहुच पाए हैं कि मैं किस चक्कर में हूं ---- शायद यही पता लगाने के लिए मुझ पर गुप्त रूप से नजर जा रही है ।

नजर रखने वाले जासूस---मिलिट्री सीक्रेट सर्विस के होंगे ।

कागज उसने वास्तव में वहीं जलाकर राख कर दिया----उसी रात, जब दीपा ने उससे पूछा कि क्या आज भी मुश्ताक ने उससे सम्बन्थ स्थापित करने की कोई कोशिश नहीं की तो उसने दीपा को बता दिया कि कल 'छाप' वाले साबुन के 'स्लाईस' उस बैक के टॉयलेट में रख देने हैं, जिन्हें मुश्ताक का साथी कलेक्ट कर लेगा----पत्र में लिखे जासूसों के सम्बन्थ में देव ने उससे कोई जिक्र न किया-शयद इस ड़र से कि दीपा पुन: इस काम से हाथ खींच लेने की जिद करेगी ।

अगले दिन ।

उसने-अपनी दिनचर्या सामान्य ही रखी ।

योजना के मुताबिक नीले सूट और सफेद टाई वाला अधेड़ व्यक्ति टॉयलेट से स्लाईस ले गया-कहीं कोई गड़बड़ न हुई ।सब कुछ सामान्य चलता -रहा ।

सचमुच देव ने यह जानने ही कोशिश नहीं की कि कौन लोग उसे कहां से वॉच कर रहे हैे…पांचवे दिन, उसके काउन्टर पर आने बालों में एक बूढा ग्राहक ऐसा भी था जिसने उसे चेक के साथ एक लिफाफा दिया ।

देव ने टॉयलेट में जाकर धड़कते दिल से लिफाफा खोला, लिखा था-----"साथ के लिफाफे में वे सभी चाबियां मोजूद हैं जिनकी छाप तुमने दी थी-लॉक नम्बर्स और दरिया को पार करने की ट्रिक मालूम ही है------कुत्तों के इन्तजाम के लिए लिफाफे में एक छोटी सी पुड़िया है, जिसका इस्तेमाल इस कागज को अन्त तक

पढ़ने पर तुम्हरे जेहन में स्पष्ट हो जाएगा-----अतः तुम ठीक उसी

तरह एम. एक्स. ट्रिपल फाइव तक पहुच सकते हो जिस तरह 'कर्नल' पहुंचता होगा-दिक्कत सिर्फ कर्नल और कोठी में मौजूद दो जासूस खडी कर सकते हैं, यानी उनकी मौजूदगी में तुम्हारा प्राईवेट रूम में घुसना असम्भव है सो, हमने इसका पुरा

इन्तजाम कर लिया है-पूरी स्कीम नीचे लिख रहे हैं, ध्यान से पढने और एक-एक प्योंइंट को दिमाग में बैठा लेने के बाद इस कागज को खत्म कर दो!"

स्कीम पढ़ते वक्त देव का दिल बुरी तरह धड़क रहा था, परन्तु कागज पूरा पढ़ने के बाद उसके चेहरे पर संतुष्टि की गहरी छाप थी । जाहिर था कि स्कीम से लह पूरी तरह सन्तुष्ट है ।

देव ने रिस्टवॉच पर नजर डाली, शाम के आठ बजने में केवल पांच मिनट कम थे…टाइम देखते ही उसके दिलो-दिमाग पर सवार उत्तेजना कुछ और ज्यादा बढ़ गई, बोला----"केवल बीस मिनट बाकी बचे है दीपा, ठीक सवा आठ बजे ये सारा इलाका गोलियों की आवाज से गूंज उठेगा----अपना काम तुम्हें ठीक से याद है न?"

"ह-हां ।" एक एकमात्र लफ्ज दीपा के मुंह से वड़ी मुश्किल से निकल सका------मारे आतंक के उसका चेहरा पीला नजर, आ रहा था---स्पष्ट लग रहा था कि सवा आठ बजे से शुरू होने वाला घटनाचक्र उसे आतंकित किए था, बोली----"अं-अब भी मान जाओं देव, इस भयानक कांड में शामिल होने से इंकार कर । दो !"

"किससे?"

इस सवाल पर यह केवल देव का चेहरा ताकती रह गई, कहने के लिए उसे कुछ सूझा नहीं, जबकि देव कहता चला गया…"अव ऐसा कोई जरिया नहीं है, जिसके द्वारा मैं उस खून -खराबे को रोक संकू जो ठीक सवा आठ बने मुश्ताक के खरीदे गए किराए के गुण्डे यहां शुरू कर देंगे------सारा मामला तय हो चुका है, खून-खराबा तब भी होगा जब हम अपना काम न करें----मेरे कदम खींच लेने से आखिर होगा क्या?"

"तुम पहले ही इस योजना में शामिल क्यों हुये, मुश्ताक से कह क्यों नही दिया कि यह सब ठीक नहीं हैं ।"

"जो हो चुका है अब उसके लिए रोने का समय नहीं है दीपा?"

धोड़े खिन्न स्वर में देव ने जल्दी से कहा----"दुश्मनों के षडृयंत्र का पर्दाफाश करने के लिए फिलहाल उनकी स्कीम पर काम करने के अलावा और कोई चारा नहीं है----------प्लीज, बहस छोडो------------ये बताओं कि ऐन वक्त पर तुम फ्यूज उड़ा दोगी न?"

दीपा ने स्वीकृति में गर्दन हिलाई।

"जैसे ही बंसी और रामू फायरिंग बाले स्पॉट की तरफ जाते नजर अाएं, पन्द्रह वॉट के फ्यूज लाल बल्ब के साथ प्राइवेट रूम के दरबाजे पर पहुचोगी ---- उसके मस्तक पर लगा बल्ब बदल देना एक महत्वपूर्ण काम है!"

" मै समझ चुकी हूं !"

"इसके-बाद सवा दस बजे तक तुम्हारा काम सिर्फ उन सव को वॉच करते रहना है, जो कोठी में हों---कुछ करना या कहना नहीं है, ठीक सवा दस बजे छोटा हैण्ड ग्रेनेड जो मुश्ताक ने हमें दिया है---तुम खिडकी से लॉन में उछाल दोगी-यह मेरा प्राइवेट रूम से बाहर अाने का टाइम होगा!"

दीपा चुप रही ।

"अगर कोई जासूस तुम्हें ऐसी मुसीबत में---फंसाने की कोशिश करे, जिससे का कोई रास्ता ही सुझाई न देती क्या करोगी?"

दीपा ने सूखे हलक से कहा---म-म-मेरे पास रिवाल्वर है!"

"और वह भी साईलेंसर युक्त ।" देव बोला----"उसका इस्तेमाल केवल तब करना है जब अन्य कोई चारा ही न बचे, कभी-कभी महान् काम के लिए देशभक्तों का खून भी बहाना पड़ता है दीपा?"

दीपा चुप ही थी…चेहरे के भाव बता रहे थे कि यह सव उसे पसन्द न था ।

देव शायद उसे अभी कोई और हिदायतें देना चाहता था कि एकाएक कमरे में बंसी ने प्रवेश किया, उसे देखते ही जहां देव के होश उड़ गए वहीं दीपा बेचारी तो पूरी-की-पूऱी कांप उठी , देव ने सम्भलकर पूछा----"क्या बात है?"

"आपसे कोई मिलने अाया है?"

"म--मुझसे --- कौन ?"

" पुलिस ।"

"प-पुलिस ? रोकने की लाख चेष्टा के वावजूद देव के हलक से चीख-सी निकल गई और दीपा ने तो खुद को बड़ी मुश्किल से धराशायी होने से बचाया था ।

गहरा सच्चाटा छा गया वहां ।

 


उन दोनों पर गिरी बिजली का असर उनके चेहरों पर देखता हुआ बंसी कुछ समझने की कोशिश कर ही रहा था र्कि देव ने पूछा-"म--मुझसे भला पुलिस क्यों मिलने अाई है?"

"उन्होंने बताया कि ट्रेजरी में पड़ी डकैती के सम्बन्थ में आपसे कुछ बाते करनी हैं!"

देव और दीपा जड़ होकर रह गए ।

जैसे किसी देव्र-ऋषि के श्राप से मिट्टी की मूर्तियों में तबदील हो गए हों ।।

बंसी उनकी हालत का अध्ययन कर रहा था, देव ने सम्भलकर पूछा---"ट्रैजरी में पड़ी डकैती का हमसे क्या सम्बन्ध ?"

"मैं क्या जानू-"'

"ओह !"

"वे लोग ड्राइंग हॉल में बैठे हैं, क्या कह दूं साहब?"

"क-कह दो कि मैं अा रहा हु!"

बंसी विना कुछ कहे मुडा और चला गया-देव ने लपककर चेक किया कि वह वास्तव में कमरे से दूर चला गया है या नहीं----संतुष्ट होकर घूमा, उसके अपने दिमाग पर इस वक्त बौखलाहट पुरी तरह सवार थी-उधर दीपा तो खड़ी थी जैसे अभी तक हाड़-मांस की पुतली में न बदली हो, देव ने आगे बढकर उसे झंझोड़।

"'दीपा-----दीपा !"

"अां ! " वह चौकी।

"प-प्लीज, होश में आओ !"

उसने सम्भलकर कहा---'"म-मैं ठीक हूं ।"

"य-ये पुलिस वाले कम्बख्त क्यों अाए और फिर-अाने के लिए क्या इन हरामजादों को यही टाइम मिला था-उफ-केबल पन्द्रह मिनट बाकी रह गए हैं, कहीं इनकी मौजूदगी सारी योजना पर पानी न फेर दे?"

दीपा के मुह से बोल न फूटा।

"दीपा!“ बुरी तरह डरे हुए देव ने झुंझलाकर उसे झंझोड़ा---" बोलती क्यों नहीं?"

उसने मूर्खों की तरह कहा…"क्या बोलूं?"

"पुलिस वाले यहाँ क्यों अाए हैं, ट्रेजरी में पड्री डकैती के सम्बन्ध में वे मुझसे क्या बाते करना चाहते हैं…क्या उनके हाथ कोई सुराग लग गया है?"

"म-मैं क्या कह सकती हूं ?"

" उफ. .तुम मेरी कोई मदद नहीं कर सकती, खैर-मैं जा रहा हूं , सवा आठ बजने से पहले पुलिस को यहाँ से टरका देना जरूरी ठीक सवा अाठ बजे फायरिंग शुरू हो जाएगी मैं यहाँ लौटूं या नहीं-तुम्हें अपना काम शुरू कर देना है !" कहने के बाद वह तेजी से बाहर निकल गया, जबकि किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में दीपा खडी रह गई थी ।।

उधर, ड्राइंग हॉल की तरफ़ बढ़ते हुए देव का बुरा हाल था---हजारों शंकाएं उसे अतांकित किए हुए थीं---पहली बात तो ये कि वह यही कल्पना नहीं कर पा रहा था कि पुलिस ने ट्रेजरी , में पडी डकैती से इस हद तक उसका सम्बन्ध जोड़ लिया कि पूछताछ करने यहां तक चले अाए, और फिर आने के लिए क्या उसे यही समय मिला था, जबकि एम. एक्स. ट्रिपल फाइव की चोरी की स्कीम क्रार्यान्वित होने बाली है ।

ड्राइंग हाल में कदम रखते ही संभलने की लाख चेष्टा के बाद भी उसकी टांगे कांप गई और ऐसा नागर पर दृष्टि पड़ने के कारण हुआ था-वही नागर, जिसने उप-पुलिस अधीक्षक की मर्जी के खिलाफ़ लॉन के गड्डे को चेैक करके ही दम लिया था।

वहुत कांइयां इंस्पेक्टर था वह ।

नागर के साथ दो कांस्टेबल और एक अन्य इंस्पेक्टर था--उस पर नजर पड़ते ही देव कीं रीढ़ की हड्डी में सिहरन-सी दौडती चली गई । यह वह इंस्पेक्टर था, जिसे जवार के साथ उसने चेकपोस्ट पर देखा था।"

"आइए मिस्टर देव!" उसके घुसते ही नागर के साथ पूरी पुलिस टीम सोफों से उठकर खड्री गई । नागर से हाथ मिलाते वक्त देव ने स्वयं को बडी़ मुश्कि्ल से नियन्त्रण में रखते हुए सवाल किया----"यहां कैसे अाना हुआ !"

"हम जब्बार के बारे में जानने अाए हैं!"

"ज-जब्बार !" उऩके पहले ही वाक्य ने देव की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी ।

कड्री दृष्टि से घूरते हुए नागर ने बड़े प्यार से कहा----"जी हां, हम सब-इंस्पेक्टर जब्बार की बात कर रहे है----क्या अाप उसे नहीं जानते है ।"

"ज--जानता क्यो नहीं हूं---उस दिन वह भी आपके साथ!"

" हम उस दिन से पहले कि बात कर रहे हे, क्या आप ओऱ जब्बार पूर्व-परिचित नहीं थे?" दूसरे इंस्पेक्टर की मौजूदगी को ध्यान में रखते हुए देव ने कहा…"ज-जरूर परिचित थे--मैं-- मेरी पत्नी और जब्बार एक ही कालेज के स्टुडेट रहे थे!"

"यह बात शायद आप इनकी मौजूदगी के कारण कह रहे हैं?"

"न-नहीं तो?"

 


उसका वाक्य बीच में ही काटकर नागर ने सख्त स्वर में सवाल किया-----'' तुमने उस दिन यह परिचय क्यों छुपाया था, जब हम फोन पर मिली इंफॉरमेशन के कारण अापके घर अाये थे, कोई बहाना न बनाइएगा मिस्टर देव-उस दिन तुमने ही नहीं, बल्कि जब्बार ने भी तुम्हरे आपस के परिचय को हम लोगों से छुपाया था हम जानना चाहते है…क्यों?"

देव को हॉल में ही तारे नजर आगए।

" इस सवाल का जवाब तो अाप जब्बार ही से पूछ लेते । "

"तभी न, जव जवाब देने के लिए उसे छोड़ा गया हो ?"

"क----क्या मतलब?"

उसे कच्चा चबा जाने की इसी मुद्रा में नागर गुर्राया-"नदी से उसके कपडे और मोटर साइकिल बरामद होचुकी है-जाहिर है कि या तो उसकी हत्या कर दी गई है या किसी ने कैद कर रखा है!"

"किसने?"

"तुमने!" नागर ने एक झटके से कहा ।

"म-मैंने?" देव की खोपडी नाच गई ।

"जी हां, आपने मिस्टर देव!" दांत भींचता हुया नागर उसके अत्यन्त समीप आ गया और एक-एक शब्द को चबाता हुआ बोला--"मेरे पास आपकी गिरफ्तारी का वारंट है?

"व--वारंट?" एक झटके से देव के जिस्म का समूचा खून पानी में तब्दील हो गया, आंखों के सामने अंधेरा छा गया, जबकि नागर लगातार गुर्रा रहा था----तुम्हारे खिलाफ़ मैं इतने सबूत जुटा चुका हूं कि वारंट हासिल करने में जरा भी कठिनाई पेश नहीं आई---अतः न तुम्हारी कोई चालाकी काम अाएगी न झूठ-सीधी तरह बताओं कि जब्बार कहाँ है?"

"म-मुझे क्या मालूम?" इसके अलावा देव कह भी क्या सकता था !

इस बार नागर ने झपटकर दोनों हाथों से उसका गिरेबान ही जो पकड़ लिया, अत्यन्त गुस्से में गुर्राया-------"मैँने उस कार का पता लगा लिया है, जिसके टायरों के निशान जंगल में खड़ी मेटाडोऱ के नज़दीक से मिले थे-वह तुम्हारे दोस्त की कार है और उस दिन उससे तुमने इस बहाने के साथ ली थी कि अपना मैंरीज-ड़े शहर से पूर मनाना चाहते हो, बोलो----इस बहाने के साथ गाड़ी ली थी या नहीं?"

" ल---ली थी!"

"उस कार को तुम मेटाडोर के नजदीक ले गए या नहीं-----वहां से कार में रखकर लूट का दस लाख रुपमा लाए थे या नहीं?"

"न न -नही।”

"वको मत ।" नागर गर्जा---"जितने सबूत मेरे पास हैं, उनके आधार पर दावे के साथ कह सकता हूं कि लूट का रुपया लाए-चैकपोस्ट पर जब्बार ने उसे देखा भी है मगर शायद वह भी लालच में फंस गया था----सो उसने-वहाँ तुम्हारा रहस्य नहीं खोला-----वाद में वह तुमसे मिला होगा, बंटबारे को लेकर मुजरिमों में अक्सर झगड़ा हो जाता है उसी झगडे के परिणामस्वरूप या तो तुमने जब्बार की हत्या कर दी या !"

"य-ये झूठ हैे-----बकवास हैे!" देव हिस्टीरियाई अंदाज में चीख उठा…"मैंने कुछ नहीं किया…लूट की दौलत से तो मेरा दूर दूर तक का वास्ता नहीं है!"

'" तो फिर मैटाडोर के नजदीक तुम्हारी काऱ के निशान और जब्बार से अपना परिचय हम लोगों सामने छुपाने के पीछे क्या भावना थीी?"

"आप सिर्फ उन बातों का जिक्र कर रहे हैं, जिनसे मैं सन्देह के दायरे में फंसता हूं --ये क्यों नहीं सोचते कि यदि मेरे पास दौलत थी तो तलाशी में मिली क्यों नहीं?"

"ऐसे ढेर सारे सवालों का जवाब थाने चलकर तुम खुद दोगे?"

"क्या मतलब?"

"मतलब ये मिस्टर देव कि इंस्पेक्टर नागर की धाक मुजरिमों से रहस्य उगलवाने के मामले में सबसे जयादा है-र्दार्चर चेयर पर बैठाकर जव तुम्हें करेंट के झटके दिए जाएंगे-जिस्म से खून, ऊंगलियों से नाखून और सिर से बाल नोचे जाएगे तो उन सवालों का जवाब तुम खुद-ब-खुद दोंगे, जिन्हें खड़ा करके मुझे चकमा देना चाहते हो!"

देव की रूह तक कांप गई । कि वह जानता था कि टॉर्चर के सामने टिके रहेने की शक्ति उसमें नहीं है । दिमाग में दो शब्द उभरे---खेल--खात्म !"

एम. एक्स. ट्रिपल फाइव को चुराने की स्कीम कार्यान्वित होने से पहले ही धराशायी हो गई…देव के सपनों का ताजमहल उसकी आंखों के सामने टूट-टूटकऱ बिखरने लगा और अभी वह कछ बोल भी नहीं पाया था कि हाल में प्रविष्ट होता हुआ कर्नल भगतसिंह चौंकने वाले स्वर में बोला, 'धीरे, क्या हुआ-तुमने देव को इस तरह क्यों पकड़ रखा है इंस्पेक्टर, क्या किया है इसने?"

"सुनकर शायद आपकी दुख हो कर्नल साहब कि आपका लड़का डाकू ही नहीं, बल्कि एक पुलिस सब-इंस्पेक्टऱ का सम्भावित हत्यारा भी है!"

"क्या बक...?" मगर, वाक्य पूरा न हो सका । कोठी के बाहर अचानक जबरदस्त फायरिंग की आवाज गूंजने लगी थी ।

बडी तेज रफ्तार के साथ दो जीपें आई…ठीक सवा आठ बजे ब्रेकों की जबरदस्त चीख-पुकार के साथ कर्नल की कोठी के ठीक सामने रूकी…द्वार पर तैनात सेनिक अभी सम्भल भी न पाए थे जीपों से गोलियों की पूरी एक बाढ़ उन पर झपटी ।

सारा इलाका गोलियों की आवाज से थर्रा उठा ।

इधर, चीखते हुए सेनिक लुढ़के उधर दोनों जीपों से आठ सशस्त्र व्यक्ति कूद कोठी में दाखिल हो गए-कोठी के लॉन में चारों तरफ़ सैनिक द्वार की तरफ लपके ।

उन पर भी गोलियां झपटी ।

एकाध मरा-कुछ घायल हुए बाकी, तुरन्त पोजीशन ले गए ।

इधर, दरवाजे के अास-पास हथियारों से लेस व्यक्तियों ने भी पोजीशन ले ली थी ।

धात लगाकर दोनों तरफ़ से गोलिय चलने लगी ।

 


अचानक गोलियों की आवाज सुनकर सभी चोंक पड़े और सबसे पहले जेब से रिवॉल्वर निकालकर हॉल से बाहर जम्प लगाने वाला कर्नल भगतसिंह था----नागर और देव आदि ने उसके पीछे वंसी को झपटते देखा----------मौके की नजाकत को ताड़कर नागर ने भी देव को छोड़ा, होलस्टर से रिवॉल्वर निकालता हुआ बंसी के पीछे लपका।।

बाकी पुलिस वालों ने भी उसका अनुसरण किया ।

हॉल के खाली होते ही देव के दिमाग एक मात्र यह विचार कौंधा कि अब किसी का भी ध्यान मेरी तरफ नहीं है अत: मुझे अपने मिशन पर निकल जाना चाहिए।

वह वापस अन्दर की तरफ दोड़ा ।

बाहर लगातार फायरिंग चल रही थी ।

बहादुरी दिखाता हुआ कर्नल भगतसिंह लगातार आगे बढ़ रहा था, बंसी उसके पीछे था और इस वक्त उसके हाथ में भी एक रिवॉल्वर चमक रहा था…नागर और उसके साथी वरांडे में पोजीशन लिए हुए थे-कर्नल भगतसिंह लॉन की घास पर रेगतां चला जा रहा था कि एक दीवार की आड़ से एक हाथ ने उसे पड़कर बडी फुर्ती से खींच लिया।

बंसी ने उधर फायर किया ।

जवाब में उधर से गोली चली, जिसने बंसी के सिर को खील-खील करके बिखेर डाला, कर्नल का रिवॉल्वर लॉन में ही पड़ा रह गया था, जबकि दीवार की बैक से एक गुर्राहट उभरी-----"भगतसिंह के हिमायती गौर से सुन ले-----कर्नल मेरे कब्जे में है, अगर किसी ने भी जरूरत से ज्यादा बहादुरी दिखाने की कोशिश ही तो मैं इसे शूट कर दूगा?"

एकाएक हर तरफ़ सन्नाटा छा गया और अभी इस सन्नटे से कोई उभर भी न पाया था कि एकाएक समूची कोठी की लाइट गुल हो गई ।

घुप्प अंधेरा । किसी को पता-नहीं कि कौन किधर है?

फिर भी रूक-रुककर ही सही मगर, गोलियां चल रही थी-अंधेरा छाने के करीब पांच मिनट वाद वहां एक आबाज----" कर्नल का लड़का मेरे कब्जे में है बॉस ।"

"वेरी गुड ।" नागर ने गोली इस आवाज परं दागी, किन्तु चीख न उभरी----गेली एक थम्ब से टकराई थी, जेर्रे चारों तरफ बिखर गए ।

कोठी के अन्दर अफरा-तफरी फेैल गई ।

नौकर इधर-उधर भाग रहे थे, मगर एक थम्ब के पीछे खडी दीपा को उस गेलरी से रामू के गुजरने के गुजरने का इंतजार था…हालांकि

उसका चेहरा इस वक्त उस कागज के मानिन्द नजर आ रहा था, जिस पर कुछ लिखा न गया हो ।

बाहर से फायरिंग और चीखों की आवाज अा रही थी ।

एकाएक उसने बदहवास हालत में अंजली को गेलरी से भागकर ड्राइंग हाल की तरफ़ जाते देखा----दीपा जानती थी फि उधर खतरा है, दिल में अंजली को रोक लेने की भावना उठी, किन्तु देव की हिदायतें याद अाते ही वह मुर्झा गई ।

एक मिनट बाद उसने रामू को गैलरी में दौड़ते देखा ।

थम्ब के पीछे से निकलकर वह भी दोड्री, रामू के हाथ में रिवॉल्वर देखकर बुरी तरह कांप गई वह, किन्तु वह हड़बड़ाहट का अभिनय करती बोली, " ये सव क्या हो रहा है रामू?"

"मुझे क्या मालूम?" वह रूका नहीं ।

दीपा चीख पड़ी…"मांजी बाहर गई हैं रामू ।" पता नहीं उसने सुना या नहीं-----दीपा अपने कमरे की तरफ लपकी-दरवाजे नजदीक रखी फोल्डिंग टेबल उठाकर प्राइवेट रूम की तरफ दौड्री---दरवाजे के नजदीक पहुंचकर टेबल खोली---उस पर चढ़कर अभी दीपा ने लाल बल्ब उतारा ही था कि दोड़ता हुआ देव वहां पहुंचा, उखड्री हुई सांसो को नियंत्रित करने की केशिश करता हुआ बोला-"जल्दी करो दीपा, तुम वहुत लेट हो !"

दीपा ने उस होल्डर में फ्यूज बल्न लगा दिया।

'रबर' के हेडिंल वाली चाबी दरवाजा खोलने का प्रयास करते हुए देव ने कहा----"यहां का काम खत्म करते ही सिक्के का इस्तेमाल जल्दी करो!"

विना कुछ बोले दीपा ने फोल्डिंग टेबल गैलरी में लगे एक अन्य बल्ब के नीचे रखी, जेब से रूमाल निकालकर बल्ब निकाला और उसके पिछले भाग में सिक्का लगाकर पुन: बल्ब होल्डर में लगाते ही सारी केठी की लाइट उड़ गई ।

दीपा ने बल्व होल्डर्स से निकलकर सिक्का अलग किया और बल्ब को पुन: लगाने का प्रयास करने लगी, किन्तु अंधेरे के कारण यह काम पहले जैसी फुर्ती के साथ न कर सकी।

रूक-रुककर फायरिंग चलती रहीं ।

पांच मिनट बाद एक जीप स्टार्ट होकर सड़क पर दौड़ गई। नागर और सेैनिक चौंके-अभी वे कुछ निश्चय न कर पाए थे कि चार…पांच साए दरवाजे से निकलने का प्रयास करते नजर आए ।

गोलियां चारों तरफ से उन पर झपटी ।

चीखों के साथ वे वहीं ढेर हो गए और इस सफ़लता के अति-उत्साह में एक सेनिक अपने छुपे हुए स्थान से निकलकर दरवाजे की तरफ दोड़ा। "

एक गन गर्ज उठी ।

सेनिक कटे वृक्ष-सा गिरा । पुन: सन्नाटा छा गया ।

पोजीशन लिए हर व्यक्ति अंधेंरे मेॉ आंखें गड़ा-गड़ाकर अपने शिकार को तलाश रहा था । आंखें अव अंधेरे की अभ्यस्त हो गई थीं----नगर को लग रहा था फि कुछ बदमाश जीप में भाग गए है------दरवाजे के पार दो जीपें और खडी थी--एक बदमाशों की, दूसरी खुद पुलिस की।

 
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