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यही सब सोचते उसने गैस अॉन करकेउस पर कढ़ाई रख दी -- स्पून से थोड़ी सूजी कढ़ाई में डाली और उसे भूनने लगी --- बंसी उसके ठीक सिर पर खड़ा था, दीपा ने कनखियों से थाली की तरफ़ देखा…थाली उससे केवल दो फुट दुर थी यानी हाथ बडाकर आराम से छू सकती थी, मगर मौका मिले तब न ?
अचानक उसके दिमाग में एक ख्याल अाया, कढ़ाई में घी डालती हुई बोली…"तुम किसी वर्तन में पानी लेकर उसमें दो चम्मच चीनी गोल लो बंसी?"
"वह किसलिए?"
"अच्छी तरह भूनने के बाद सूजी उसी में तो डाली जाएगी"
"बंसी हंसने लगा, बोला…"आपको सूजी का हलवा बनाना आता भी है बहूरानी?"
"क्या मतलब?"
"पानी में चीनी तब डलती है जब वह उबलने लगता है!"
"ये वहुत घिसी-पिटी तरकीब है और ऐसा करने पर कई बार चीनी के दाने 'दानों' की ही शक्ल में रह जाते हैं, जब वे मुंह में जाते हैं तो खाने वाले का सारा मजा किरकिरा हो जाता है!" दीपा कहती चली गई…"आज मैं तुम्हें बिल्कुल नए पैटर्न से हलवा बनाना सिखऊंगी---किसी बर्तन में थोड़ा-सा पानी लेकर दो चम्मच चीनी उसमें अच्छी तरह फेंट लो-ठीक उसी तरह जैसे आमलेट के लिए अंडों को फेंटा जाता है!"
कंधे उचकाकर बंसी ने एक डोंगा उठाया और 'वाशवैशन' की तरफ मुड़ा ही था कि दीपा ने बायां हाथ अपने वक्ष-स्थल में डालकर टेबलेट निकाल ली---उधर बंसी ने नल खोला----उस वक्त दीपा की तरफ उसकी पीठ थी, जब उसने पूरी फूर्ती के साथ टेबलेट उस कटोरी में डाल दी, जिसमें 'रेशेदार' सब्जी थी ।
टेबलेट डूब गई ।
"देखना बहूरानी, क्या इतना पानी वाकी रहेगा?"
दीपा ने पलटकर देखा जरूर मगर बिना सोचे-समझे कह दिया--- ठीक रहेगा?"
अब उसे इस बात की परवाह कहां थी कि हलवा स्वादिष्ट ही बनना चाहिए ?
दीपा ने जो कुछ बताया उसे सुनकर हालांकि देव के दिमाग पर थोडी घबराहट हावी हुई थी, शीघ्र ही खुद को संयत करके बोला---"खैर-विपरीत हालातों के बाद तुमने काम पूरा कर दिया, इसी बात की खुशी है-जव यह सारा ड्रामा देशवासीयों के सामने अाएगा,लोगों को पता चलेगा कि दुश्मनों के पडृयन्त्र को चकनाचूर करने के लिए हमने किन-किन हालातों में क्या-क्या किया तो लोग हमारी प्रशंसा करते न थकेंगे!"
"अब तो बस वर्तन लेकर बंसी के लौटने की इन्तजार है!" दीपा ने कहा----"हां तुम श्योर हो न देव कि मांजी अपने कमरे का ताला लगाकर गई हैं?"
"हां हंडरेड परसेट श्योर ।"
"इस तरह, साढे नौ तक वे फुसफुसाकर बाते करते रहे-ये बाते वे अपने कमरे में नहीं, बल्कि एक ऐसे स्यान पर छुपे खड़े कर रहे थे, जहाँ से बंसी को कर्नल के कमरे से लोटता आराम से देख सकते थे।
एकाएक दीपा ने विषय बदला-"क्या बात है, बंसी अभी तक नहीं लोटा ?"
"लो!" गैलरी में नजर गडाए देव के मुंह से निकला---" शायद तुम्हारे कहने ही की देर थी, वह जा रहा है!"
इन वाक्यों के पांच मिनट बाद वे कर्नल भगतसिंह के कमरे की तरफ -जा रहे थे-प्राइवेट रुप के सामने से गुजरते वक्त सम्भालने की लाख चेष्टा के बावजूद वे कांप गए, चूंकि जानते
थे कि इस वक्त वे प्राइवेट रूम की निगरानी कर रहे जासूस की निगाह मे हैं ।
अंजली और भगतसि'ह के कमरों के नजदीक पहुचे ।
पलटकर एक वार पीछे देखा-----मोड़ तक गेलरी सुनसान पड़ी थी, देव का इशारा मिलते ही दीपा विजली से चलने वाली गुड़िया की तरह आहिस्ता से अंजली के कमरे का 'डंडाला' हटाकर अन्दर गुम हो गई ।
बाहर से देव ने डंडाला पुन: लगा दिया ।
गेैलरी अब तक सुनसान पड़ी थी, देव ने धड़कते दिल से भगतसिंह के कमरे के बंद दरवाजे पर दस्तक दी, पहली ही दस्तक पर अन्दर से पूछा गया-"कौन है?"
"मैं देव है बाबूजी, जरा दरवाजा खोलिए!"
"क्या बात है!"
"जरा काम है, आपसे कुछ जरूरी बाते करनी हैं?"
"अब मूड नहीं है, सुबह बात करेगे देव, तुम जाओ ।"
देव के रोंगटे खड़े हो गए, पहली बात तो ये कि अगर बाबूजी जिद पर अड़ गए तो किसी भी सूरत में दरवाजा न खोलेंगे । दूसरे अचानक ही उसके दिमाग पर यह आतंक हावी होने लगा था कि यदि ठीक इस वक्त कोई जासूस इधर निकल अाए तो उसे अकेला देखकर क्या चौंक नहीं पडेगा?"
हिम्मत करके देय ने कहा…"सुबह को सब होते हैं बाबूजी, जबकि मुझे आपसे अकेले में बाते करनी हैं, प्लीज…केवल पांच मिनट के लिए दरवाजा दीजिए ।"
"ओफ्फो...अच्छा ठहरो, खोलते हैं!" इस वाक्य ने जहां देव को शांति प्रदान की वहीं मस्तिष्क में एक नया सवाल यह उत्पन्न कर दिया कि बाबूजी टेबलेट के प्रभाव में हैं भी या नहीं?
क्या वास्तव में टेबलेट में मुश्ताक द्वारा बताए गए सब गुण है ?
कहीं ऐसा तो नहीं कि मुश्ताक ने उसे किसी झमेले में फंसा दिया हो, वह बाबूजी से बात शुरू करे और वावूजी बिना अाब-ताव देखे उसे शूट कर दें?
अभी वह यही सोच रहा था कि दरवाजा खुल गया ।
नाईट सूट पहने बाबूजी सामने थे और उनकी तरफ देखता दुखता हुआ देव यह पता लगाने की कोशिश करता रहा था कि वे करामाती गोली के प्रभाव में हैं या नहीं?
"अन्दर आओ!” कर्नल भगतसिंह ने कहा ।
देव ने एक नजर मोड़ तक सूनी पड़ी गेलरी पर डाली और कमरे में दाखिल हो गया-उस वक्त भगतसिंह बैड की तरफ़ लौट रहा था जव देव ने घूमकर चटक्नी चढ़ा दी।
भगतसिंह ने उसे बैड पर बैठाया, स्वयं लगभग लेटते हुए बोले----"कहो !"
एक बार फिर उनके हाव-भाव का निरीक्षण करके देव ने यह पता लगाने की नाकाम कोशिश की कि उन पर गोली का असर है या नहीं, बोला…"आपने हलवा खाया?"
भफ्तसिंह ठहाका लगाकर हंस पड़ा ।
देव की बुद्धि चकरा गई, जबकि भगतसिंह ने कहा, "क्या तुम ये बात करने यहां आएँ हो?"
"न-नहीं तो?"
"किर?"
"ऐसे ही पूछ लिया, दीपा ने आपके लिए कोई चीज पहली बार बनाई थी न?"
"नहीं खाया!"
थोड़ा चौंकते हुए देव ने पूछा---"क्यों?"
"बंसी मना करने लगा, कहने लगा कि दुश्मनों की जासूस हो सकती है-उसने अस्वाभाविक जिद करके हलवा बनाया है ---------
-मुमकिन है उसमें कुछ मिलाया हो----कल सुलह वह उसे लेब में भेजेगा टेस्ट के बाद पता लगेगा कि उसका सन्देह कितना गलत या सही है?"
देव उछल पड़ा ।