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सूनी आंखो में उदासी complete

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कविता पापा के साथ लगी हुयी बहुत देर तक रोती रही,मन से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था जैसे ! इश्क़ मुहब्बत सब अपनी जगह है लेकिन एक लड़की के लिये उसके पिता से बड़ा कोई भरोसा कुछ नहीं होता ! कविता का आधा दर्द पापा के गले लगकर खत्म हो गया था और इधर पापा खुद को कोस रहे थे ..

“ मुझे माफ कर दे बिटिया ! मैंने तुझे किस हाल में अकेला छोड़ दिया था..क्या हाल बना लिया है तुने अपना..” पापा कविता को देखकर बहुत दुखी हुये थे !

“आप आ गये ना पापा,अब ठीक हो जाउंगी”कविता रोती हुयी आंखो से मुस्कुरा उठी ! थोड़ी दूर पर राकेश आता हुआ दिख रहा था..पापा के गले लगे हुये कविता राकेश को आता देखती रही !

शाम के 4 बज गये थे ..सुबह ही पापा और राकेश ने मिलकर कविता को पास के एक क्लिनीक में एडमिट करवा दिया था..पापा ने बताया उसे की पड़ोस में रहने वाली रेखा से विरेन्दर की बहन का नम्बर लिया था मम्मी ने और फिर उसने ही उनका ये वाला एड्रेस बताया था ! विरेंदर के बारे में कविता ने पापा से कुछ नहीं कहा था,पर पापा इतना समझ चुके थे की सबकुछ ठीक नहीं है..कविता ने संक्षेप में बस यही बताया था की विरेन्दर ऑफीस के काम से बंगलोर गया हुआ है, वो अपनी खुशी के लिये एक स्कूल में पढ़ाती है ! राकेश उसी स्कूल का एक अध्यापक है जो उनका पड़ोसी भी है ! बाकी का समय वो पापा से मम्मी और घर की बातें करती रही थी..मम्मी से बात भी की उसने लेकिन उन्हे ये नहीं बताया की वो हॉस्पिटल में है ! राकेश पूरे दिन कविता के वार्ड के बाहर ही रहा था..कविता के पापा के लिये खाना ले आया था और जो भी दवा चाहिये थी सब वो जाकर ले आया था ! कविता के मन में कहीं ना कहीं एक सम्मान और आदर का रिश्ता पनप रहा था राकेश के लिये ! बिना किसी स्वार्थ के और बिना कुछ पुछे कुछ कहे वो उसके लिये सब कुछ किये जा रहा था !

कविता ने एक दो बार फिर विरेंदर का फोन ट्राई किया था लेकिन अब फोन बंद आ रहा था ! कविता बहुत दुखी थी विरेंदर के इस रवैये से ! वो एकदम से ही उसे भूल गया था ! किंतु वो किसी भी हाल में पापा को इन सबकी भनक नहीं लगने देना चाहती थी..कैसे कहती की शायद एक गलत इंसान के लिये वो अपने प्यारे पापा को छोड़ आई थी ! जब अपना फैसला गलत हो जाये तो कभी कभी पर्दा डालना मज्बूरी हो जाती है !

पापा ने एक दो बार पुछा विरेंदर के बारे में पर कविता ने ज्यादा कुछ कहा नहीं..शाम के 5 बजे के आस पास कविता का फोन बज उठा ..विरेंदर का फोन था..कविता ने फोन हाथ में लिया ,लाख कोशिस के बावजूद उसकी आंखें भर आयीं..वो कॉल रीसीव नहीं कर सकी..पापा पास में ही बैठे थे..वो फोन उठाकर कुछ बोलती तो शायद खुद पर कंट्रोल ना कर पाती..पापा ने उसकी ओर देखा और शायद वो समझ गये उसके मन की बात..

“मैं अभी चाय पीकर आता हूं बेटा...”उसके सर पर हाथ फेरते हुये वो कमरे से बाहर निकल गये..राकेश उनके साथ चल दिया !

एक बार फिर से कविता का फोन बज रहा था..उसने मोबाइल कान से लगा लिया-

“हेल्लो !”बड़ी मुश्किल से बोली वो

“हेल्लो..कविता !! ..कैसी हो जान !तुम ठीक हो ना..”राकेश की आवाज़ में बहुत बेचैनी थी !

“ठीक हूं मैं,आप ठीक हैं..??? ”कविता अपने होठों की सिसकियों को दबाये हुये थी !

“हां..मेरा फोन खो गया था..अभी अभी नया फोन लिया है और नम्बर अभी चालू हुआ है...श्वेता से तुम्हारा नम्बर लिया और फिर कॉल कर रहा हू...मन बहुत घबरा रहा था..तुम ठीक हो ना.बोलो..” कविता कुछ समझ नहीं पा रही थी..विरेंदर की आवाज़ में आज फिर से वही पहले वाली दीवानगी थी..वो झूठ बोल रहा था या सच..उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था !

“मेरा..वो आप परेशान मत होइयेगा..मैं हॉस्पिटल में हूं..”इस बार कविता की आवाज़ भीग गयी थी !

“क्या...तुम हॉस्पिटल में..??..क्या हुआ तुम्हें..तुम ठीक हो ना...बोलो मेरी कसम बताओ.”

“जी मैं ठीक हूं...वो एक छोटा सा एक्सीडेंट हो गया था...आप परेशान मत होइये...अभी ठीक हूं...”कविता इतनी ही मासूम थी..विरेंदर को परेशान देखती तो सारे शिकवे गिले ,सारे सितम भूल जाती थी...

“तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ है...??..मुझे पता तक नहीं...कितना गिरा हुआ इंसान हूं मैं ....आई एम सोरी जान...माफ कर दो मुझे...कुछ ज्यादा ही बिजी हो गया था मैं.. कविता ! मेरे पास तुम्हारे सिवा है ही क्या??..मैं अभी आ रहा हूं जान !” विरेंदर जैसे तड़प उठा था कविता की बात सुनकर और कविता की आँखे बरसती जा रही थीं !

“आप आराम से आ जाइयेगा विरेंदर..मैं ठीक हूं..और पता है..पापा आये हैं..आज ही...वो भी साथ में हैं !”

“मैं आ रहा हूं जान !..ख्याल रखना अपना...बस अभी आ रहा हूं..आई लव यू..बहुत प्यार करता हूं मैं तुमसे..अभी निकलता हूं मैं..”विरेंदर दीवानों की तरह बड़बड़ाये जा रहा था और फोन कट गया !

कविता के दिल मे सुकून उतर आया था ! विरेन्दर आज भी वही विरेन्दर था और अब तो पापा भी वापस आ गये थे..सब कुछ ठीक होने वाला था..थोड़े से दर्द के बदले कितनी ढेर सारी खुशियां मिल रहीं थी उसको ! कविता के आंखो खुशी के जुगनुओं से जगमगा उठीं थीं !

कविता को डॉक्टर ने 2-3 दिन एड्मिट करने को बोला था..वीकनेस बहोत ज्यादा थी,तेज बुखार था और सर की चोट भी और बिगड़ गयी थी....पापा ने खास जोर देकर कविता को एडमिट रहने को कहा था !...कविता के पापा दिल के मरीज थे कविता ने जबर्दस्ती करके उनको राकेश के साथ घर पहुंचवा दिया था और राकेश वापस आकर कविता के वार्ड के बाहर बैठा था ! फ्लाइट से बंग्लोर से मुम्बई पहुंचने के बाद , रात के कोई 2 बजे विरेंदर कविता के पास पहुंचा था ! राकेश को बाहर बैठा देखकर उसे अच्छा नहीं लगा , विरेंदर कि वही एक सबसे बड़ी कमी शायद फिर उसके रिश्ते के आड़े आने वाली थी !

………………………….

 


राकेश को वहाँ बैठा देखकर विरेंदर के चेहरे पर अजीब सी सख्ती आ गयी थी,पर उसने कुछ कहा नहीं..उसे देखकर राकेश खड़ा हो गया ! विरेंदर एक पल को ठीठका उसके पास और फिर अंदर रूम में चला गया ! विरेंदर के अंदर आते ही कविता पलटी..उसके सिर पर पट्टी बंधी थी..राकेश तेजी से उसके ओर बढ़ा और उसको गले से लगा लिया....

“आई एम सोरी जान...तुम्हें क्या हो गया है ये..?” विरेंदर उसे गले से लगाये उसके बालों को सहला रहा था..कविता को बहुत रोना आ रहा था लेकिन उसने खुद को सम्भाले रखा...विरेंदर की इस दिवानगी की ही तो दीवानी थी वो ! विरेंदर सबकुछ छोड़कर भागा चला आया था उसके पास..उसका इश्क़ आजमायिश का एक और मुकाम पार कर गया था ! सबकुछ भूलकर कविता खुस हो गयी थी..”कल जब पापा इनसे मिलेंगे तो सबकुछ कितना अच्छ हो जायेगा.”..वो मन ही मन बहुत कुछ सोच रही थी ! विरेंदर ने इतनी जल्दी वापस आकर उसकी मुहब्बत का मान रख लिया था नहीं तो क्या कहती पापा से..जिसके लिये प्यारे पापा को छोड़ आयी थी आज वही उसके पास नहीं था ,लेकिन अब ऐसा नहीं था !

“तुम्हें कुछ हो गया तो मैं मर जाउंगा कवी..तुम्हारी कसम !” विरेंदर का यूं टूटकर इजहार करना कविता को बहुत अच्छ लगता था ! चंद पलों में वो सारी पुरानी बातें सरे शिकवे गिले भूल चुकी थी !

“आपके होते मुझे क्या हो सकता है भला ?” उसने बड़े प्यार से कहा !विरेंदर ने उसका माथा चूम लिया..दरवाज़े के बाहर खड़ा राकेश उन्हे देखता रहा और फिर चुपचाप रात के अंधेरे में गायब हो गया !

सारी रात विरेंदर कविता के पास बैठा रहा..कविता बिच में सोती जागती रहती थी और हर बार विरेंदर को पास पाकर उसके दिल में सुकून उतर जाता था ! उसने विरेंदर को सारी बात बता दी थी..बस ये नहीं बताया की राकेश उसे अपने घर ले गया था ! शायद इसलिये क्युंकी उसे पता था की विरेंदर को बात पसंद नहीं आयेगी..रिश्तों में जब बातें छुपानी पडं जायें तो दिलों में कुछ कुछ ना कुछ दूरी आ ही जाती है !

सुबह के 9 बज गये थे और कविता की हालत काफी हद तक ठीक भी थी पर डॉक्टर के कहने पर विरेंदर ने उसे आज का दिन और हॉस्पिटल में रखने का सोचा था..कविता विरेंदर के सहारे बैठी हुयी चाय पी रही थी ! उसके पापा दरवाजे पर खडे थे...विरेंदर ने उन्हे देखा और सर झुका लिया...फिर झिझकता हुआ आगे बढ़ा और उनके पैर छू लिये...कविता के पापा ने हाथ उठाकर आशिर्वाद दिया पर कुछ बोले नहीं !..वो आगे बढ़े और कविता के पास जाकर बैठ गये..विरेन्दर थोड़ी दूर पर खड़ा रहा..

“अब तबियत कैसी है बेटा !” पापा ने उसके सर पर हाथ फेरते हुये पुछा !

“अब ठीक हूं पापा !” कविता ने हल्के से मुस्कुरा के कहा !

थोड़ी देर बाद राकेश कुछ नाश्ता लेकर आ गया....विरेन्दर गहरी नज़र से उसे देखता रहा....राकेश ने उसके पास लाकर पोलीथीन रख दी..

“ये डॉकटर ने कहा है की कुछ खाकर दवा लेनी है तो मैं लेता आया......”राकेश ने कहा !

“खा लो बेटा..” पापा ने कहा तो कविता विरेंदर की ओर देखने लगि.. कविता विरेंदर के नेचर को जानती थी...पर वो आगे बढा और बरतन में से नाश्ता निकालने लगा ..कविता उसके चेहरे को ही देखती जा रही थी..शायद अंदाजा लगाने की कोशिस कर रही थी की उसे बुरा तो नहीं लग रहा...! खैर, कविता नाश्ता करने लगी और विरेंदर राकेश के साथ बाहर आ गया..

“आपको पता है वो कौन था जो गाड़ी चला रहा था उस दिन ?” विरेंदर ने एक बार भी थैंक्यू ,शुक्रिया कुछ नहीं बोला था राकेश को,बस यही पुछा !

“जी..पक्का तो नहीं कह सकता पर शायद हमारी कॉलोनी के लास्ट में जो घर है वहां किराये पे रहते हैं वो लोग..शायद वही थी..”

“ इंसान को इंसान नहीं समझते साले..” विरेंदर के चेहरे पर अजीब सी सख्ती छायी हुयी थी..उसने और कुछ नहीं कहा और वापस कविता की ओर चल दिया..राकेश थोडी देर खड़ा उसे देखता रहा फिर अपने घर की ओर चल दिया !

दो दिन बीत गये थे..कविता अब लगभग ठीक हो चुकी थी और घर आ गयी थी....विरेंदर की और पापा की हल्की फुल्की बातचित भी होने लगी थी...पापा को कविता ने जाने नहीं दिया था..लेकिन आज शाम को पापा वापस जा रहे थे..विरेंदर बाहर गया था कुछ सामान लेने मार्केट गया था...तभी राकेश चला आया...कविता के पापा से बातें करता हुआ वो चाय पी रहा था...कविता किचन में पापा के रास्ते के लिये सब्जी पूरी बना रही थी..अचानक से उसे चक्कर आया और वो गिर गयी..आवाज़ सुनकर राकेश और उसके पापा दोनों लोग अंदर दौड़े..2 मिनट ही बीते थे की विरेन्दर भी घर पहुंचा..कविता को गोद मे उठाये राकेश सोफे की ओर बढ़ रहा था और पिछे पिछे कविता के पापा पानी का जार लिये, विरेंदर की नज़र कभी कविता के चहरे पर तो कभी राकेश की ओर..उसकी कमजोरी फिर से उसपे हावी होने लगी थी..!

7-8 मिनट बाद कविता ने आंखें खोली इस बिच विरेंदर सिर्फ दूर खड़ा उसे देखता रहा था..कविता ने सबकी ओर देखा..राकेश उसके पास बैठा था..पापा भी पास ही थी पर विरेंदर अभी भी दूर ही खड़ा रहा था और उसकी आंखो का वो सूनापन कविता को बहुत कुछ समझा गया था....एक चिरपरिचित सा सवाल था उसकी आँखों में...वो झट से उठकर बैठ गयी ..

“ठीक हो बेटी??”

“जी पापा ! वो बस थोड़ा सा चक्कर आ गय था..”कविता ने कहा और खड़ी होने लगी..

“लेटे रहिये आप..” राकेश के मुंह से निकल गया..!

कविता ने विरेंदर की ओर देखा और सर झुका लिया..विरेंदर की नज़र क्यूं उसे हर बार शक के घेरे में घेर लेती थी.? अपने ही पापा के सामने वो शर्मिंदा हो रही थी...क्या समझेंगे विरेंदर के इस बर्ताव से वो ?? क्यूं विरेंदर एक पल में उसे मुजरिम समझ लेता था और क्यूं इतना कमजोर पड़ जाता था उसका यकीन ?

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रात के दस बज रहे थे..कविता के पापा उसे विरेंदर के साथ घर आने कर बोल कर वापस जा चुके थे ! विरेंदर और कविता ने डिनर जल्दी ही कर लिया था और इस वक़्त विरेंदर कविता के लिये चाय बना रहा था..वो चाय लेकर बेडरूम में आया जहाँ कविता लेटी हुयी थी...

“दवा खा ली थी ना ? चलो उठ जाओ चाय पी लो...” विरेंदर ने कहा तो कविता उठकर बैठ गयी !

“आप इस तरह से चले आये जल्दी में..ऑफीस में प्रॉब्लम होगी ना अब ??” कविता ने उसकी ओर प्यार से देखते हुये पुछा !

“तुमसे ज्यादा जरुरि तो नहीं है ना नौकरी..” विरेंदर ने भी फीकी से मुस्कान के साथ कहा !

“आपको हम समझ क्यूं नहीं पाते विरेन..जैसे आप हमें चाहते हो ऐसी चाहत तो हर लडकी का सपना होता है लेकिन फिर आपका यकीन हमपर इतना कमजोर क्यूं है...हमने सबकुछ आपके लिये ही तो छोड दिया,अब भी अगर आपको हम पर यकीन नहीं है तो बहुत अभागे हैं हम..” कविता के लहजे में उदासी उतरती चली गयी !

“मैं तुम्हें खोकर जी नहीं पाउंगा कविता....तुम्हे खोने से डर लगता है...बस और कोई जवाब नहिं है मेरे पास !” विरेंदर की आंखो में अजीब सा पागलपन था जब उसने ये बात कही थी ! कविता सहम सी गयी थी कुछ

पलो के लिये !

“मैं क्यूं जाउंगी आपसे दूर? लेकिन जब आप मुझे शक कि नज़र से देखते हो तो बहुत तक्लीफ होती है..? “

“उस राकेश से दूर रहा करो..मुझे वो अच्छा नहीं लगता..” विरेंदर ने कहा !

कविता को उसकी बात का कोइ जवाब नहीं दिया था विरेंदर ने ..राकेश के नाम पर कविता पता नहीं क्यूं चिढ़ गयी..

“आपके ऑफ्फिस में भी तो लडकियाँ काम करती हैं ना..मैने तो नहीं कहा कभी..”कविता जाने कसिए बोल गयी थी..

“हाँ लेकिन वो घर नहीं आती ना..!” विरेंदर ने कहा और बेडरूम से बाहर निकल गया ..कविता उसे जाते देखती रही और फिर जो कुछ कह दिया थ उसे सोचने लगी..

विरेंदर ऐसा ही हो गया था..कविता को प्यार तो वो शायद पहले से भी ज्यादा करने लगा था लेकिन एक इनसेक्योरिटी बस गयी थी उसके मन में..कविता को खो देने की ! कविता वैसे तो बहुत सुलझी रहने वाली लड़की थी लेकिन विरेंदर के बर्ताव से कभी कभी बहुत इर्रिटेट हो जाती थी..!

कविता विरेंदर जानती थी विरेंदर दिल का बुरा नहीं है..अगर वो कुछ गलत कर देत है तो बच्चों के जैसा आकर माफी भी मांग लेता था ! वो बेड से उतरी और विरेंदर को आवाज़ देती बाहर आयी..विरेंदर घर मे कहीं नहीं था ! कविता को दुख होने लगा उसने ऐसा कहा ही क्यूं !!

रात के करीब 2 बजे विरेंदर घर लौटा..कविता की आंख लग गयी थी..दरवाज़े पर दस्तक सुनकर वो जगी और जल्दी से उठकर दरवाजा खोला...

“कहां चले गये थे आप??..ऐसे कोई गुस्सा होता है क्या इतनी सी बात पर..” दरवाज़े पर ही कविता रुआंसी हो गयी थी !

“गुस्सा नहीं था..सो जाओ तुम..”विरेंदर जल्दी से अंदर आ गया..अंदर आते ही कविता ने लाइट ऑन कर दी...और अवाक रह गयी.विरेंदर के शर्ट पर कयी जगह खून के छिंटे थे...

“ये क्या है विरेन??..कैसे हो गया..?..आआप्प्प...ठीक तो हो ना...कैसे चोट लग गयी..दिखाओ मुझे...”कविता उसके शर्ट पर खून देखकर बौखला गयी थी..

“मैं ठीक हूँ..तुम जाओ मैं अभी आता हूँ...जाओ तुम...”

“क्या हुआ है ये..बताइये प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़....किसी ने मारा आपको..हाँ जान ?? ..बताओ....” कविता उस से लिपट गयी...और रोने लगी !

“नहीं बाबू..मुझे किसी ने नहीं मारा, ठीक हूँ मैं सो जाओ आप....:विरेंदर उसे बहलाते हुये बोला!

“फिर ये खून..कैसे लगा ये...”

“ ये खून किसी और का है...जिसने आपका खून बहाया था उसे दर्द का अहसास करवाने गया था मैं..” विरेंदर की सख्त आवाज़ पर कविता झट से उस से अलग हुयी और बेयकीनी से उसे देखने लगी !!

“मार दिया आपने ??” उसक चेहरा सफेद हो गया था एकदम से..

“नहीं....!!बस ये अहसास हो गया है उनको की दर्द क्या होता है...”

कविता बेयकीनी से उसे देखती रही..विरेंदर ने उसे अपने गले से लगा लिया..

“उन्हे माफ नहीं कर सकता था..आपको कितना दर्द हुआ था ना जान..” विरेंदर कविता के चेहरे को चूम रहा था और कविता अभी भी सकते में थी..उसे विरेंदर से डर लगने लगा था !

रात के 4 बज गये थे ..कविता की आखों से नींद कोसो दूर थी जबकी उस से लिपटा विरेंदर सुकून से सो रहा था..विरेंदर की दीवानगी जिसपे कभी कविता जान छिड़्कती थी आज उसे पागलपन लगने लगी थी !

उसने विरेंदर को झिंझोड़ कर जगा दिया...

“क्या हुआ सोने दो ना..” विरेंदर की नींद मे अल्सायी हुयी आवाज़ पर उसे गुस्सा आ गया..

“उठिये आप..मुझे अभी बात करनी है..अभी!”कविता गुस्से मे बोली..विरेंदर किसी सीधे साधे बच्चे के जैसा उठ्कर बैठ गया..

“बोलिये मल्लिका ए तरन्नुम्म... अब इतनी रात को क्या खता हो गयी बंदे से....आव्व्व...मुझे तो बहुत नींद आ रही है...” वो फिर से उसकी गोद मे लेटते हुये बोला !

“विरेन उठिये आप..”

“क्या हो गया इतने गुस्से में क्यूं हो..चला जाउंगा कल से ऑफीस..नहीं कुछ कहुंगा राकेश के बारे में...गुस्सा भी नहीं करुंगा..अब सो जाउं??” उसने अपना सर कविता के कंधे पर रखते हुये कहा !

“हमें आपसे डर लगने लगा है विरेन?” कविता की आवज़ मे कुछ ऐसा था की एक पल मे विरेंदर की सारी नींद हवा हो गयी..

“क्याय्य्य्य???..डर और मुझसे..क्यूं..??” विरेंदर निर्दोस बच्चे की तरह उसकी आंखों मे देख रहा था..एकदम से उसका चेहरा उतर गया था..!

कविता कुछ नहीं बोली बस आंखो से आंसू बहने लगे...

“क्या हुआ बताओ तो..तुम रो क्यूं रही हो..?” विरेंदर बेबस से उस से पुछ रहा था !

“आप को नहीं पता??..जो आपने किया...?” कविता रोते हुये बोली !

“ओह्ह्ह..तो तुम्हे लगता है मैं पागल हो गया हूं..और इसलिये तुम्हे मुझसे डर लगता है..है ना? ” विरेंदर ने उसकी आंखो में देखते हुये पुछा !

विरेंदर कविता से थोड दूर हटकर बैठ गया..

“मैं पागल नहीं हूँ कविता..मुझे सब याद है..मम्मी पापा के मौत कि डेट..अपनी बहन की शादी कि डेट..जब तुम्हें पहली बार लेटर दिया था वो डेट..तुम्हारे साथ जीने मरने की कसमें खायी थीं..वो कॉलेज जहां तुम पढ़ती थी..तुम्हरे घर का नम्बर..तुम्हारे घर का अड्रेस..जिस रात हमने पहली बार घंटो बाते की थी..जब तुम मुझसे पूरे 3 दिन नाराज़ रही थी..और जब तुम चोरी से मेरे घर आयी थी जब मुझे मलेरिया हुआ था ...मुझे सबकुछ याद है जान !!!..सबकुछ... !!”

“तुमसे जुड़ी हर बात, हर पल याद है मुझे..पर मैं तुम्हें पागल लगता हुं जानती हो क्यूं ??” कविता उसे देख रही थी..बस देखे जा रही थी चुपचाप..हर पागल यही कहता है की मैं पागल नहीं हूँ..शायद यही सोच रही थी..लेकिन विरेंदर पागल नहीं था..उसने जो कहा सुनकर कविता का दिल और भी ज्यादा तड़प उठा..

“मैं तुम्हें पागल लगता हुं..क्यूंकी मैं तुमसे इतनी मोहब्बत करता हूँ जितना शायद तुम सोच भी नहीं सकती और ना मैं बता पाउंगा..बस कभी वक़्त आया तो आजमा लेना..” विरेंदर के हर शब्द में जुनून था इश्क़ का !

“तुम्हें इतनी चोटें आयी..मैं किस्मत वाला था की तुम अभी भी मेरे पास हो..लेकिन अगर तुम्हे कुछ हो जाता तो..?..उन कुत्तों की छोटी सी लापरवाही मुझसे मेरी ज़िंदगी छिन लेती..और तुम्हें मुझसे कोई छीन लेने की सोच भी ले तो मै उसे माफ नहीं करुंगा..चाहे फिर वो कोई भी हो..मैंने उन्हे उनके इसी जुर्म की सजा दी है..अगर ये पागलपन है तो हां शायद मैं पागल हूं !” विरेंदर कह्कर चुप हो गया !

कविता उसे ऐसे देख रही थी जैसे वो कोई अजूबा हो...उसे समझ में नहीं आ रहा था की क्या कहे और क्या करे..

“मैं अबसे ऐसा कुछ नहीं करुंगा जिस से तुम्हें दुख हो..माफ कर दो..सोरी..” विरेंदर ने सर झुकाकर कहा !

कविता बैठी उसे देखती रही थी और विरेंदर माफी की उम्मीद में कुछ और उदास होता जा रहा था !

हद से ज्यादा की गयी मुहब्बत गले की फांस बन जाये तो कोई नई बात नहीं ! क्या सचमुच विरेंदर की आशिकी पागलपन का रूप ले रही ही..??

…………………………………………..

 
विरेंदर कुछ देर तक बैठा रहा और जब कविता ने कुछ नहीं कह तो वो उठा और बाहर चला गया ! बाहर से वाक करके आया तो देखा कविता सो रही थी..विरेंदर ने उसे जगाया नहीं..रेडी हुआ और 9 बजे के आस पास विरेंदर ऑफीस चला गया !

वक़्त बीतने लगा और सबकुछ फिर से नॉर्मल लगने लगा था ! कुछ चीजें थीं जो बदल गयी थीं..विरेंदर अब चुप रहने लगा था..ऑफीस आता जाता..नॉर्मली बात करता और कविता के साथ भी बहुत अच्छे से रहता था..लेकिन पहले जैसा तो नहीं था..कभी घर आता और कविता नहीं होती तो भी नहीं पुछता था की कहाँ थी?..कोई शिकायत नहीं कोई शिकवा नहीं ! शायद खुद को पागल होने से रोक लिया था उसने या फिर शायद कविता की नज़रों में पागल ना हो जाये ये कोसिश कर रहा था , लेकिन ये कोसिश उन्हे एकदुसरे से दूर ले जा रही थी और दोनों मे से किसी ने भी इस बढ़ती दूरी को कम करने की कोसिश नहीं की थी !

राकेश कविता के घर नहीं आता था..लेकिन कविता स्कूल में उसे मिल जाती थी..अपनी तरफ से उसने कभी कोई बदसलूकी नहीं की थी लेकिन कविता को ये अह्सास था की राकेश उसे पसंद करता है..और राकेश ने उसके लिये किया भी बहुत था..! वो उसे पसंद ना सही लेकिन उस से सलीके से बातचित कर लेती थी !

इधर विरेंदर कविता के साथ होकर भी बहुत अकेला महसूस करने लगा था..मन में एक डर बैठ गया था..”अगर मैं ये करुंगा तो क्या कविता मुझे पागल समझेगी?” हर काम करने से पहले वो एक बार ये जरूर सोचता था ! जिसे अपनी ज़िंदगी से बढ़कर चाहा था अगर वो कह दे – “मुझे तुमसे डर लगता है”- तो मायुसी का दिल में बस जाना बड़ी बात नहीं थी !

2 महीने बीत गये और काफी हद तक विरेंदर ने सबकुछ नॉर्मल कर लिया था..वक़्त रहते उसने खुद को सम्भाल लिया और कविता के हिसाब से खुद को ढाल लिया था..जिसके लिये सबकुछ छोड़ा था उसके लिये कुछ आदतें बदल लेना इतना भी मुश्किल नहीं था ! और कविता के खो देने का डर ऐसा था जिसके लिये विरेंदर कुछ भी कर सकता था ..कुछ भी !

नम्बर का महिना शुरु हो चुका था..दिसम्बर में पापा आने वाले थे कविता को घर ले जाने !सर्दी की छुट्टीयों में जब स्कूल बंद होने थे तभी ! कविता बहुत खुश थी ! विरेंदर की मेह्नत ने ऑफीस में उसकी एक अच्छी इमेज बना दी थी..उसको प्रमोट करके टीम लीडर बना दिया गया था..सेलरी भी ठीक ठाक हो गयी थी ! विरेंदर को एक बार फिर से बंगलोर जान पड़ा था इस बार 10 दिन के लिए ! और आज वो 8वें दिन ही वापस आ रहा था ! काम जल्दी निपट गया था तो विरेंदर कविता को सरप्राइज़ देने की सोच कर उसे बिना बताये ही आ रहा था ...

शाम के साढ़े आठ बज रहे थे विरेंदर घर पहुंचा..विरेंदर पिछ्ले कुछ दिनों से उन दोनों के बीच जो दूरी हो गयी थी उसे दूर करने के लिये सोच कर आया था...कविता के लिये कपड़े ,एक नेकलेस और ढेर सारी उसकी खाने की फेवरेट चिजें लेकर घर पहुंचा था एक नयी शुरुआत करने की उम्मीद में ! कविता घर पर नहीं थी ! कविता के मोबाइल पे कॉल किया तो मोबाइल आस पास ही बजता मिला..वो मोबाइल घर पर ही छोड़्कर गयी थी ! विरेंदर बुझ सा गया ! जुते उतारे उसने और ऐसे ही लेट कर कविता का इंत्जार करने लगा..रात के 10 बज गये लेकिन कविता नहीं आयी..अब विरेंदर परेसान होने लगा ! मन मे अजीब से शंकाये आने लगीं..वो उठा और राकेश के घर की ओर चल दिया !

राकेश के दरवाजे पर पहुंचा तो अंदर से कविता की आवाज़ सुनाई दी..विरेंदर के दिल में जैसे सुई सी चुभी दी थी किसी ने..वो दरवाजे को पैर से ठोकर मारता वो गुस्से में अंदर घुस गया..राकेश कविता के कंधे पर सर रख कर बैठा हुआ था...विरेंदर जैसे पागल हो गया..बिना कुछ पुछे कुछ कहे वो राकेश पर टूट पड़ा..कविता को एक तरफ झट्क दिया उसने और राकेश को लात घुंसो से मारने लगा...कविता बार बार उसे कुछ समझाने की कोशिस कर रही थी लेकिन विरेंदर जैसे होश में ही नहीं था..राकेश भी कोशिस कर रहा था विरेंदर को रोकने की लेकिन कोई फायदा नही..विरेंदर रुका तब जब कविता का एक जोरदार चाटा उसके गाल पर पड़ा..विरेंदर जैसे सन्न हो गया..फटी फटी आंखों से वो कविता को देख रहा था...कविता ने उसका हाथ पकड़ा और बाहर निकल गयी..विरेंदर उसके पिछे चलता रहा जैसे कोई मदहोश शराबी चल रहा हो !

“आप इंसान नहीं जानवर हो जानवर !!! ..” कविता घर में आकर दरवाज़ा बंद करते हुये पलटी और विरेदर को नफरत से देखते हुये गुस्से में चिल्लाकर बोली..विरेंदर अभी भी सिर्फ उसे देख रहा था...!

“तुम आज से पहले भी उसके घर कभी गयी थी?” विरेंदर ने पत्थर से लहजे में पुछा !

“मेरी पूरी बात सुन लो एक बार..? पप्लीज़ विरेंदर..”

“बताओ..? तुम्हें मेरी मुहब्बत की कसम..झूठ बोला तुमने तो समझ लेना मैं मर गया आज से तुम्हारे लिये..? “ विरेंदर ने कहा और कविता के पैर कांप गये..इतनी बड़ी कसम..वो मासूम क्या करती भला..

“मेरि बात सुन लो प्लीज़...” कविता गिड़्गिड़ाते हुये बोली !

“हां या ना ? “ विरेंदर का गुस्सा उसकी मुहब्बत पे हावी हो गया था !

“जब आप नहीं थे उस बार मेरा अक्सीडेंट हुआ था तब राकेश जी ही वहां पर थे..मैं बेहोश थी तभी वो ले गये थे पर मैं होश में आते ही वापस आ गई थी..प्लीज़ मेरा यकीन करो विरेन..प्लीज़..आज मैं वहां इस्लिये गयी थी क्युंकी.....”

“मैं उसे मार दुंगा...जान से !! तुम्हें मार नहीं सकता..इतनी हिम्मत नहीं है मुझमें ,लेकिन उसे नहीं छोडूंगा..” उसकी बात को काटते हुये कहा विरेंदर ने !

विरेंदर की सर्द आवाज़ कविता को बहुत खतरनाक लग रही थी..उसके बाद विरेंदर एक पल वहां नहीं रुका ..कविता चिल्लाती रही पर विरेंदर आन्धी तूफान के जैसे बाहर निकल गया..कविता उसके पिछे भागी लेकिन तबतक विरेंदर तेज कदमों से चलता हुआ गली के मोड़ तक पहुंच गया था और कविता के आंखों के सामने ही एक ऑटो में बैठकर ओझल हो गया !

कविता उसे बुलाती रही पर विरेंदर जा चुका था..कविता भागती हुई राकेश के घर पहुंची !

“राकेश जी , आई एम रियली सोरी ! विरेंदर बहुत गुस्से में है अभी..प्लीज आप कुछ दिनों के लिये यहां से चले जाओ प्लीज़...” कविता विरेंदर को सम्झाती रही पर वो भी कहां मानने वाला था..!

“मैने कभी आपके साथ कोई बुरा सुलूक नहीं किया कविता जी ..इंकार नहीं है मुझे...आपको पसंद करता हूं और हमेसा करता रहुंगा लेकिन आपके लिये मन में कभी गलत ख्याल नहीं आये..मैंने कभी आपको पाने की चाहत नहीं रखी..बस जब मुझे लगा की आपको मदद कि जरूरत है और मैं आपके लिये कुछ कर सकता हूं तो मैंने किया ! क्या गलत किया मैंने..?? ” राकेश भी बहुत दुखी थी और कविता को वो कहीं से गलत नहीं लग रहा था..उसकी बात सच थी..कविता के साथ उसने कभी कोई ओछी हरकत नहीं की थी .!

“मैं जानती हूं राकेश जी ..लेकिन विरेंदर गुस्से में पागल हो जाते हैं..मुझे यहां देखकर वो बौखला गये हैं इसलिये कह रही हूँ..प्लीज़...”

“कविता जी,मैं कमजोर नहीं हूं..मैं जवाब दे सकता हूं.आप आयीं शुक्रिया ! अभी अभी अपनी बहन को खोया है मैंने , कमजोर पड़ गया हूँ ! कुछ वक़्त दिजिये आपको भी भुला दुंगा और कभी आपके सामने नहीं आउंगा...” राकेश की आंख भर आई कहते कहते..उसने हाथ जोड़े और अंदर जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया ! कविता की आंख भी भर आयी..वो तो राकेश को एक दोस्त की तरह सहारा देने आयी थी,लेकिन उसकी वजह से राकेश का दर्द कुछ और बढ गया था..कविता को विरेंदर से नफरत हो रही थी ! थकी हारी मासूम कविता अपने आंसुयों को पोंछते हुये बोझल कदमों से वापस आ गयी !

रात भर कविता रोती रही और विरेंदर की राह देखती रही..जाने क्यूं मन के किसी कोने में यकीन का एक दिया अभी भी जल रहा था ”मेरा विरेंदर किसी का खून नहीं कर सकता” ! लेकिन सुबह हुई और सूरज की पहली किरन के साथ उम्मीद का वो दिया भी बुझ गया ! पुलिस की गाडी की आवाज़ पर कविता का दिल धक्क से कर गया.. वो ग़ेट खोलकर बाहर निकली..राकेश के घर के सामने भीड़ लगी थी और पुलिस की गाड़ी वहीं जाकर रुकी..कविता का दिल दहल उठा ! नहीं..ये नहीं हो सकता..! खुद से बडबड़ाती अपने कदमों को घसीटती वो राकेश के घर की ओर बढ़ती जा रही थी...आंखो मे आंसू भर आये थे और दिल भारी हो रहा था !

 


कविता की सारी मन्नतें सारी दुहाइयां बेकार साबित हुयी थीं..मोहब्बत पर उसका एतबार चकनाचूर हो गया था ! राकेश मर चुका था ! सफेद कपड़े में लिपटी उसकी लाश बाहर लायी जा रही थी ! खून अभी भी बह रहा था और उस सफेद कपड़े को लाल कर गयी थी..ढेर सारे लोग जुट गये थे और कविता एक ओर खड़ी सदमें की हालत मे उसके शव को देखे जा रही थी..उसका चेहरा जैसे पत्थर हो गया था !

“ तो आप उनके भाई हैं ??..ओके !!! ..आपको किसी पे शक..?” थोड़ी देर पहले आये एक शख्स से एक पुलिस वाला पुछ रहा था !

“नहीं सर !” 21-22 साल के उस लड़के ने कहा !

कविता बेयकीनी की हालत में आगे बढ़ी....

“सर ! मुझे पता है ये खून किसने किया है...”

“जी ??” पुलिस इंस्पेक्टर ने उसकी ओर देखते हुये आश्चर्य से कहा !

“मेरे पति विरेंदर ने “ कविता जैसे पत्थर की मूरत बन गयी थी ! आंखो से आंसू बह रहे थे लेकिन जिस्म जैसे जम सा गया था ! एक झटके में उसने अपने माथे का सिंदूर पोंछ दिया ! और पागलों की तरह चिल्ला चिल्ला कर रोने लगी !

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कविता को साथ लेकर पुलिस विरेंदर कि तलाश में जुट गयी ..4 - 5 घन्टे की मसक्कत के बाद एक छोटे से पार्क में विरेंदर लेटा हुआ मिला ! उसके जिस्म पर चोट के निशान थे और माथे से खून बहकर चेहरे पर सूख गया था..उसकी आंखें एकदम लाल हुयी थी और वो कुछ होश और कुछ बेहोशी की हालत में था..दो पुलिसवालों ने उसे पकड़्कर उठाया....

“साहब ! पी रखी है साले ने”

“ले आओ साले को !! ..हुलिया देखकर ही लग रहा है साले ने खून किया है “ इंस्पेक्टर ने कहा जबकी उसके साथ खड़ी कविता विषबुझी नागिन के जैसे उसे घूर रही थी..विरेंदर के चेहरे पर दर्द के असीम लकीरें खिंची हुयी थी !.साफ पता चल रहा था की वो रात भर सोया नहीं है..कपड़े फटे हुये थे कयी जगह से और बहुत चोट लगी थी उसे !

पुलिसवाले उसे घसीटते हुये जीप तक ले जा रहा थे..कविता एकदम खामोश थी और विरेंदर धीरे धीरे होश में आ रहा था ..जीप में चढाते हुये एक पुलिसवाले ने उसे धक्का दिया तो उसने आंखें खोली..जीप में बिना कुछ पुछे, कुछ कहे वो बैठ गया और फिर नज़र पड़ी कविता पर..कविता के चेहरे पर जाकर विरेंदर की नज़र ठहर गयी !

विरेंदर की आंखे जैसे उबल रही थीं..लाल लाल आंखों मे ढेर सारा , गुस्सा, नफरत और तैरते हुये आंसुओं की बाढ़ ! कविता ने नफरत से मुंह फेर लिया ! वो जीप आगे चल दी और दुसरी जीप मे कविता बैठ गयी ! जहां तक कविता दिखती रही विरेंदर सिर्फ उसे ही देखता रहा ! और फिर एक तिराहे पर कविता को उतार कर वो जीप भी ओझल हो गयी !

शाम के 5 बज गये थे और कविता पुलिस स्टेशन पहुंची ...इंस्पेक्टर बाहर ही मिल गया ..

“हेल्लो कविता जी..बहुत बड़ी मदद की आपने कानून की..एक खूनी को पकड़वाकर..और वो भी तब जब खूनी खुद का पति हो..सेल्युट है आपको..” इंस्पेक्टर ने कहा !

“बताया उसने ?’ कविता के ल्फ्जों मे बहुत नफरत थी विरेंदर के लिये !

“अभी तो नहीं !! तब से यही कह रहा है मैंने किसी का खून नहीं किया है...लेकिन जल्दी ही कबूल कर लेगा और फिर आपके बयान के बाद साफ है ..उसने ही धमकी दी थी मारने कि और वजह थी उसके पास ! रात में जब हम अपने रंग मे आयेंगे तो साला मुर्दा कबूल कर ले वो तो फिर भी ज़िदा आदमी है...”

“जी !..”

कविता आई तो विरेंदर से मिलने थी..क्यूंकी उसे लगा था की विरेंदर आसानी से मान लेगा की उसे ने मारा है राकेश को लेकिन अब उसे विरेंदर पर और गुस्सा आ रहा था ! विरेंदर कि शक्ल में अब उसे एक शातिर खूनी नज़र आ रहा था जो खून करने के बाद साफ बच जाना चाहता था ! अपने गुस्से को अपने अंदर ही दबा कर वो वापस चली गयी !

 


सुबह के 9 बजे फिर से कविता थाने में थी..इस बार विरेंदर के सामने..लॉक-अप मे पड़ा हुआ विरेंदर उसे बड़ा डरावना लगा था..जमीन पर गिरा हुआ..जिस्म पर एक फटी हुयी सी हाल्फ़ पैंट और पुरे जिस्म पर चोटों के अनगिनत निशान..कयी जग से खून निकल रहा था और की जगह जिस्म नीला पड गया था !

“बड़ा ढीठ है साला..सारे पैंतरे आजमा लिये लेकिन टूटा नहीं..अभी भी कबूल नहीं किया इसने इतनी मार खा कर भी ! खैर,देखता हूं कब तक बर्दाश्त करता है ये ! मिल लीजिये आप..कल से इससे कोई नहीं मिल पायेगा” इंस्पेक्टर कहते हुये बाहर चला गया !कविता कुछ दूरी पर खड़ी उसे घूरती रही..उसने सर उठाकर कविता की तरफ देखा और बड़ी ही दर्द भरी मुस्कान तैर गयी उसके होठों पर..खड़े होने की कोसिस की तो खड़ा नहीं हो पाया..खुद को घसीटता हुआ वो सलाखों के पास पहुंचा और उन्हें पकड़्कर खड़ा हुआ !

“मैंने नहीं मारा उसे..” उसके होठों से बस इतना ही निकला !

“कितनी बड़ी गल्ती कर दी तुम्हें पहचानने मे मैंने..तुम जैसे क्रिमिनल से इतना प्यार किया मैंने..छी !..अरे अब तो अपने गुनाहों का प्रायश्चित कर लो..अब तो मान लो..” कविता बेहद नफरत से बोल रही थी !

“कल घर से निकलकर मैंने ज़िंदगी में पहली बार इतनी शराब पी...इतनी पी की सबकुछ भूल जाउं..लेकिन फिर भी भूल नहीं पाया...एक पार्क मे जाकर बैठ गया और अपनी बर्बादी और तुम्हारी बेवफाई पर रोता रहा..कुछ गुंडे जैसे लोग आये आधी रात के बाद..मुझे मारा और मेरे पैसे छिन लिये ! मैं वहीं पड़ा रहा रात भर ! ना नींद आयी ना मौत, और फिर तुम आई ! सच कहूं तो मैं तुम्हें माफ नहीं कर पाता कभी..लेकिन मैं तुम्हारी ज़िंदगी से चला जाता..”

“वाह! अब मुहब्बत दिखा रहे हो..खुद को निर्दोश बता रहे हो ??? तुम्हरे अंदर एक खूनी था जो बाहर आ गया..पहले उन लड़कों को मारा अब राकेश को..चाहे कुछ भी हो जाये मैं तुम्हें सजा दिलवाकर रहुंगी..एक मासूम इंसान की इस बेरहमी से जान ले ली तुमने..खूनी हो तुम..”

“मुझे अब इस ज़िंदगी मे कोई दिल्चस्पी नहीं है..जो तुमने किया उसके बात तो बिल्कुल नहीं...लेकिन..” विरेंदर ने कहा ,कविता उसकी बात काट कर चिल्ला पड़ी-

“क्या किया मैंने?? मैने कुछ नहीं किया..दोस्ती का रिश्ता था मेरा राकेश के साथ..जिसे तुम जैसा घटिया इंसान कभी समझ नहीं सकता...एक दोस्त के नाते उसने मेरी हेल्प की थी और उसकी बहन की एक्सीडेंट की खबर सुनकर मैं उसके घर गयी थी..उसे सांत्वना देने..लेकिन तुम क्या सम्झोगे..तुम एक बहुत नेगटिव किस्म के इंसेक्योर ,खुद्गर्ज़ और बुज़दिल इंसान हो..जिसे खुद पर भरोसा ना हो वो दुसरो पर क्या भरोसा करेगा..हो?? ” कविता का एक एक शब्द विष बुझा तीर था जैसे ! विरेंदर चुप रहा...

“तुम्हारे खुद के रहें होंगे सम्बंध दुसरी औरतों से..इस्लिये मुझे भी खुद के जैसा समझा..मैंने भी कई बार तुम्हारे आस पास लड़्कियों की आवाज़े सुनी थीं..तुम्हारे रूम में..लेकिन मैंने तो कभी नहीं पुछा.. अय्याश ...तुम थे ” कविता जो मन में आ रहा था सब बोले जा रही थी !

“अगर तुम पुछती तो मुझे अच्छा लगा होता और इस दुनिया की कोई एक लड़की भी कह दे मैंने कभी देखा भी हो बुरी नज़र से ,तो तुम्हारी कसम फांसी चढ़ जाउंगा ! जाओ पता कर लो जहां चाहो..तुम पहली और आखरी थी कविता ! और रही बात मेरी सजा की, तो मुझे खुद को नहीं पता था की मैं इतना दर्द बर्दाश्त कर लुंगा जितना कल रात से हो रहा है मुझे ! बहुत कुछ किया इन लोगो ने मेरे साथ..लेकिन अब तो बस एक जिद हो गई है..”

कविता उसे देख रही थी..उसी गुस्से से..हा विरेंदर की एक भी बात का यकीन नहीं था उसे !

“एक बात बताउं तुम्हें..लोग कहते हैं मुहब्बत में बड़ी ताकत होती है,लेकिन नफरत में शायद उससे कई गुना ज्यादा ताकत होती है..अगर पुलिस ने मुझे पकड़ा होता और वो कहते की कबूल करो की तुमने खून किया है..तो मैं कब का हां बोल चुका होता है....तुम्हारे बाद वैसे भी ज़िंदगी से कोई प्यार नहीं है मुझे...लेकिन अब जबकी तुमने कहा है की मैंने खून किया है, एक अंजान के लिये मुझपर इल्जाम लगा दिया जिसने तुम्हे दुनिया में सबसे ज्यादा प्यार किया उस पर ; सिर्फ इसलिये तो अब चाहे ये लोग मुझे ये जान से मार दें, लेकिन ये बात मैं अब कभी कबूल नहीं करुंगा..!! और अगर मैंने राकेश का खून किया है तब भी नहीं मानूंगा ! साबित करने दे कानून को..और साबित करो तुम..!! ये मेरी मुहब्बत और नफरत दोनों की इन्तेहाँ है कविता ” विरेंदर ने कहा और फिर वही दर्द भरी मुस्कुराहट फैल गयी उसके लबों पे !

कविता तालियां बजाते हुये उसके करीब पहुची.. “ वाह !! तो आखिर तुमने मान लिया ना की तुमने किया है राकेश का खून..??”

“तुम जो चाहो समझलो ! ..अब तुम्हे क्या सफाई दूं !! तुम तो सरकारी गवाह हो अब,मेरी कविता तो नहीं हो !! कल वो इंस्पेक्टर ताने दे रहा था..कह रहा था “साले ! तेरी बीवी ने अपने यार के क्तल के जुर्म मे तेरे खिल्लाफ गवाही दी है..अबे नामर्द तो नहीं है ना तू...” ये सबकुछ बर्दाश्त करके भी ज़िंदा हूँ मैं...अब जाओ फांसी चढ़्वाने की कोसिस करे मुझे..इतना प्यार किया था तुम्हें ,सजा तो मिलनी चाहिये ना...जाओ किया है मैंने राकेश का खून..बोलो अपने कानून से साबित करे...लेकिन मैं ये कभी कबूल नहीं करुंगा, कभी नहीं.. !! ” राकेश का चेहरा चट्टान के जैसा सख्त हो गया था !

“ जानती हूं मैं तुमने ही मारा है उस निर्दोष को.. और अगर आज शाम तक तुमने ये कबूल नहीं किया..? “ कविता सर्द आवाज़ में कुछ ऐसे बोल रही थी की विरेंदर एकट्क उसकी ओर देखता रहा !

“तो क्या? नहीं कबूल करुंगा कभी नहीं..” वो चिल्ला उठा !

“तो मैं खुद को खत्म कर लुंगी..और मेरे साथ मेरी कोख में पल रहा ये तुम्हारा अंश भी खत्म हो जायेगा..” कविता किसी बदला लेने वाली नागिन जैसे फुंफकारते हुये बोली थी !

विरेंदर का चेहरा एकदम से फक्क पड़ गया ! वो एकटक कविता को देखता रहा जो पत्थर बनी रही...उसकी आंखो के सूख चुके आंसू फिर से बहने लगे..जैसे पागल हो गया वो.. अपना सर इधर उधर दीवार पर और सलाखों पर मारने लगा और चिल्लाने लगा...

“नहीं..ऐसा मत करना..प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़..ऐसा मत करना...मैं तुम्हारे पैर पडता हूँ...हाँ-हाँ मैने मारा है राकेश को !!! मुझे कबूल है..मैंने मारा है उसे..मेरे बच्चे को कुछ मत करना..खुद को भी कुछ मत करना कविता..मैं सब कबूल कर लुंगा..अदालत में भी बोल दुंगा...मेरे बच्चे को कुछ मत करना..खुद को मत मारना कविता..प्लीज़्ज़....प्लीज़्ज़्ज़....” विरेदर रो रहा था ,चिल्ला रहा था से उधर भाग रहा था, और कविता !!! वो तो अपनी बात खत्म करके कब की जा चुकी थी !

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कभी कभी ज़िंदगी में सिर्फ एक गल्ती इतनी बड़ी होती है की सारी ज़िंदगी उस एक गल्ती को ठीक करने के लिये कम पड जाती है ! नफरत एक ऐसा दीमक है जो इंसान की खुशियों को चाट जाता है ,कविता की खुशियां भी उसकी नफरत की भेंन्ट चढ़ गयीं ! 21 साल बीत गये ,कविता ने कभी पलट कर नहीं देखा , मुहब्बत शिद्द्त वाली थी, नफरत उस से भी गहरी हो गयी थी !

कविता अपने मम्मी पापा के घर ही अपने पापा के साथ रहती थी ! वो एक स्कूल में पढ़ाती थी, मम्मी 3 साल पहले चल बसी थीं, इक्लौता भाई अमेरिका जाकर सबको भूल गया था और पापा 4-5 दिन के लिये कहीं बाहर गये थे ! घर के पोर्च मे आकर बुलेट रुकी ! बुलेट को स्टैन्ड पर खड़ी करते हुये हेल्मेट उतारती एक खुब्सूरत सी लड़की पीठ पर बैग लटकाये अंदर चली गयी !

“मॉम ? क्यूं किया आपने ऐसा...?” उसके चेहरे पर दुख और गुस्से कि लकीरें फैली हुयी थीं ! कविता किताबों से नज़रे हटाते हुये उसकी ओर देखने लगी !

“अब क्या हो गया?” उसने पुछा !

“मुझे क्यूं कभी नहीं मिलने दिया उस से जिसने आपकी ज़िंदगी बर्बाद कर दी..” उस लडकी ने कहा ! कविता का चेहरा गम्भीर हो गया !

“तुम आज फिर से शुरु हो गयी..जाओ अपने कमरे में..कितनी बार कहा है तुम्हारा किसी से कोइ वास्ता नहीं ! तुम सिर्फ मेरी बेटी हो..और कोई नहीं है हम दोनों का..! "

“एक बार तो उस इंसान से मिलना है जिसने आपकी ज़िंद्गी खराब की , जिसने मुझे पैदा होने से पहले ही अनाथ होने का अभिशाप दे दिया..और मैं अब आपकी बात नहीं मानुंगी...” उसकी बड़ी बड़ी खूबसूरत आंखों में इंतकाम की झलक थी !

“ऐसा कुछ करने की जरूरत नहीं है..जाओ तुम अपने कमरे में” कविता ने सख्ती से कहा ! लड़की कुछ देर तक उसे देखती रही और फिर चुपचाप अंदर चली गयी !

कविता और विरेंदर की बेटी गरिमा !! उन दोनों के ही स्वभाओं के ठीक विपरीत दबंग टाइप की थी ! कॉलेज में कोई सेक्शन ऐसा नहीं था जहां उसकी मर्जी ना चलती हो..गलत के साथ गलत और सही के साथ सही करने की हिम्मत रखने वाली ,कभी खुद के साथ जो गलत हुआ था उसके लिये कुछ नहीं कर पायी थी और इस बात को लेकर वो अंदर ही अंदर घुटती थी !

उसके पापा दुनिया के किसी कोने में तो थे लेकिन कहां ये उसे पता नहीं था ! एक दो बार अपनी नानी के मुंह से सुना था उसने के वो अपने पापा के जैसी लगती है और ये बात सुनकर उसे बहुत गुस्सा आ जाता था..दिल में एक कसक थी की एक बार तो उस शख्स से मिल सकूं जिसने उसकी मां कि ज़िंदगी खराब कर दी थी ! उसे जो भी पता था कविता ने ही बताया था ! खैर, 3 साल की मेहनत के बाद आज उसे कामयाबी मिली थी ! आज उसे पता चल गया था की उसकी मां का मुजरिम ,उसका बाप कहां है !

सुबह हुयी और कविता को गरिमा के कमरे में उसे जगाने पहुंची तो उसे एक चिठ्ठी मिली, लिखा था- “सॉरी मम्मा ! एक अधूरा हिसाब चुकता करके जल्दी ही वापस आ जाउंगी, लव यू !”

कविता ने चिट्ठी फाड़कर डस्ट्बीन में फेंक दी,उसे गरिमा पर बहुत गुस्सा आ रहा था ! विरेंदर से दूर होने के बाद भी उसे हमेशा लगा था की गरिमा उसकी बेटी कम और विरेंदर की ज्यादा है ! विरेंदर की झलक थी उसमें और कविता चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती थी, खुद को विरेंदर से अलग कर लिया था उसने,कभी पलट कर नहीं देखा उसकी ओर..लेकिन फिर भी विरेंदर का कुछ तो बाकी रह गया था उसके साथ, गरिमा के रूप में !

वो परेशान होने लगी..जाने कहां जायेगी गरिमा ? पता ही क्या है उसे ??

शाम के 5 बजे, कश्मीर के एक जिले में कपड़े की एक फैक्ट्री का पता हाथ में लिये गरिमा इस समय उसी फैक्ट्री के ग़ेट पर खड़ी थी ! लेदर की ब्लैक जैकेट,पैरों में ब्लैक शूज़,और गलें में वूलेन स्कार्फ,कंधे पर एक लेदर का ही साइड बैग..शानों पे बिखरे हुये घूंघराले बाल..किसी मॉडल के जैसी खूब्सूरत गरिमा को देखकर चौकिदार दौड़ता हुआ आया..

“एक आदमी से मिलना है..” गरिमा ने उदासीन भाव से कहा !

“मैडम 8 बजे के बाद ही मिल सकती हैं..” चौकीदार ने कहा !

“ठीक है..एक काम कर सकते हो..पता लगा सकते हो की विरेंदर शर्मा नाम का कोई वर्कर आज आयें हैं की नहीं..”

“जी आया है..सुबह मिला था...अभी अंदर ही है ”

“मुझे मिलवा सकते हो..?? ”

“जी जरुर..”

गरिमा वहीं थोडी दूर पर बैठ गयी और 8 बजने का इंत्जार करने लगी..!

अप्रैल का महिना था फिर भी कश्मीर में जबर्दस्त ठंड थी ! रात के 8 बजते बजते ठंड और बढ़ गयी थी लेकिन गरिमा के दिल में ज्वार उठा था जैसे..एक तूफान चल रहा था उसके मन के भीतर.! 21 साल ! कम वक़्त नहीं होता..बिना बाप के साये के बिताये थे उसने ये एक इक्कीस साल ! उस हर कमी का ,उस खालिपन का हिसाब करना था उसे आज !

8 बज गये और सारे मजदूर फैक्ट्री से बाहर आने लगी..गरिमा बेचैनी से टहल रही थी की अचानक चौकिदार ने एक आदमी की ओर हाथ उठाते हुये इशारा किया..

“वही है विरेंदर”

गरिमा की नज़र उस शख्स की ओर उठ गयी...मां के अल्बम से चुरायी हुयी एक फोटो थी उसके पास अपने पापा की लेकिन उस फोटो वाले शख्स में और इस मज्दूर में 21 वर्षों के लम्बे समय की दूरी थी !

सफेद गंदी शर्ट और नीले रंग की पैंट , बढी हुयी दाढ़ी और बिखरे हुये बाल ! साथ के एक आदमी की बात में हूं हाँ करते हुये उस इंसान की मुस्कुराहट भी इतनी उदास थी की गरिमा की आंख मे आंसू आ गये..उसके दिल में आया दौड़ कर जाये और उसके गले लग जाये , लेकिन सिर्फ चंद पल ही ये ख्याल उसके मन में रहे और फिर बरसों से मन में पल रही नफरत हावी हो गई ! गरिमा चुपचाप उसके पिछे चल दी !

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विरेंदर के पिछे पिछे गरिमा एक गली के मोड़ तक पहुंच गयी..विरेंदर गली के एक कोने में रोड्लाइट के निचे बैठे सब्जी के ठेले वाले के पास जाकर रुका..2-3 मिनट तक उस से कुछ बातें करता रहा ,कुछ सब्जी ली और फिर मुडकर दुसरी गली की ओर चल दिया..ग़रिमा उसके जाते ही उस सब्जी वाले के पास पहुंची...

“ये कौन है” उसने सब्जी वाले से पुछा !

“जी??..नाम विरेंदर है..यहीं रहता है गली की दुसरे छोर पे..कौनो बात है क्या..??” सब्जी वाला थोड़ा परेशान होते हुये बोला !

“कब से जानते हो उन्हें..कैसा आदमी है..?” गरिमा ने फिर पुछा ! सब्जी वाले को लगा कोई पुलिस वाली है शायद!

“5 साल से जानते हैं उसको..बहुत सीधा आदमी है..कौनो बात है क्या..”

“और कौन कौन है घर में उसके..” गरिमा को पता नहिं क्या हुआ था !

“जब से हम देख रहे हैं तब से अकेले ही रहता है..आज पहली बार कोई पुछ रहा उसके बारे में..” सब्जी वाले ने कहा ! गरिमा कुछ सोचने लगी और फिर उसी ओर बढ गयी जिधर विरेंदर गया था..रात के धुंधलके में कुछ दूर पर वो जाता हुआ दिखा !

एक कमरे का छोटा सा घर जिसके उपर लकडी का बना हुआ एक और कमरा,कश्मीर में ऐसे घर बहुत होते हैं ! निचे वाले कमरे मे ताला बंद था, बगल में अलग से एक छोटा सा रूम और था जिसमे एक लकड़ी का पतला सा दरवाज़ा लगा था , शायद बाथरूम ! निचे से उपर की ओर लगी हुयी लोहे की सीढ़ियाँ चढ़ता हुआ विरेंदर बहुत थका थका सा लग रहा था ! गरिमा अजीब सी दुविधा में फंस गयी थी..ये सच है की किसी को देखकर उसके चरित्र का पता लगाना मुश्किल होता है लेकिन ये भी सच है की आंखो से छलकता दर्द मिथ्या नहीं होता !

अंदर जाकर विरेंदर ने दरवाज़ा बंद किया और बाहर खड़ी गरिमा सोचती रही..एक एक करके वो सीढ़ियाँ चढ़ने लगी और फिर हिम्मत करके दरवाज़ा खटखटा दिया..

विरेंदर नीचे बिछी दरी पर औंधे मुह लेटा था..दरवाजे पर दस्तक सुनकर उठ कर बैठ गया..रात के पौने नौ..इतनी रात को कौन आ सकता है..पांच साल में पहली बार..शायद मकान मालिक होगा..पर 8 दिन पहले ही तो किराया दिया था और इतनी रात को तो कभी नहीं आते वो..विरेंदर खुद से पुछता उधेड़ बुन में दरवाज़े की ओर बढ़ गया..दरवाज़ा खोला तो सामने एक लडकी ..इतनी रात को ,हैरत से उसकी ओर देखता रहा..

“आप क्या रास्ता भटक गयी हैं?” उसे समझ मे नहीं आया और क्या कहे !

गरिमा उसे देख रही थी..नानी ठीक कहती थीं..उसकी नाक और ललाट तो एकदम विरेंदर के जैसा था..विरेंदर के आगे के कुछ बाल सफेद हो गये थे,वही कपड़े पहन रखे थे उसने जो फैकट्री से निकलते समय पहना था ! उसकी आंखे बहुत उदास थीं और परेशान भी ! खुद को बहुत मज्बूत समझने वाली गरिमा अपने एमोशंस को कंन्ट्रोल नहीं कर पा रही थी !

“आप कौन हैं?..यहां कैसे..शायद रास्ता भटक गयी हैं?” विरेंन्दर ने उसे गुम देखा तो फिर से बोला !

“ मैं रास्ता नहीं भटक गयी हूँ..मेरी मंज़िल ही खो गयी है..”गरिमा ने कहा !

“क्या..?” विरेंदर अजीब दुविधा मे फंस गया !

“मेरी मम्मी का नाम कविता है..और आप बाप हैं मेरे ” गरिमा ने खुद को स्म्भालते हुये एकदम सपाट लहजे में कहा और विरेंदर की आंखे ऐसे फैल गयीं जैसे अपने सामने दुनिया के आठवें अजूबे को देख रहा हो ! अपने कानों पे यकीन नहीं हुआ उसे..लड़खड़ा कर गिरने लगा तो दरवाज़े को थाम लिया !गरिमा खड़ी रही ,चुपचाप !

“इतनी देर क्यूं लगा दी आने में बेटा !”21 सालों का दर्द आंखों से फूट पड़ा..गरिमा शांत चुपचाप खडी उसे देख रही थी..विरेंदर आगे बढ़ा और उसे गले से लगाकर रोने लगा ! आज 21 सालों मे पहली बार कमजोर पड़ा था वो..पहली बार टूटा था !

विरेंदर अपनी बेटी को देखकर ये भी भूल गया था की वो भी उसे मुजरिम ही मानती है लेकिन कुछ पल के बाद ही एहसास हो गया उसे ! गरिमा को कोई भी खुशी हुयी थी ऐसा लगा नहीं..विरेंदर उसे दुलार करता रहा जैसे वो कोई छोटी बच्ची हो...लेकिन जल्दी ही समझ गया की उसकी सजा अभी खत्म नहीं हुयी है..गरिमा का हाथ पकड कर अंदर ले आया..!

गरिमा ने एक नज़र चारो ओर कमरे में डाली..कुछ भी तो नहीं था उस कमरे में..एक ओर कुछ बर्तन रखे थे,एक स्टोव ,2-3 कम्बल और एक छोटा सा बख्सा ! बक्से के उपर उसकी मां की एक फोटोफ्रेम तस्वीर रखी थी और तस्वीर के निचे लिखा था “सॉरी ” !

“बैठो बिटिया !” विरेंदर ने बड़े दुलार से कहा तो कविता वहीं दरी पर बैठ गयी !

गरिमा कुछ बोल नहीं रही थी और विरेंदर उसको पाकर जैसे बावला हो गया था ,खुश था,उदास भी !

“ तुम्हारा नाम क्या है..कविता कैसी है..? ठीक है ना..?..मुझे तो भूल गयी..” विरेंदर कहते कहते चुप हो गया !

“गरिमा नाम है मेरा..माँ ठीक है मेरी..” उसने सपाट लहजे में कहा !

“ सब लोग अब तक नाराज़ हैं मुझसे??..कविता भी? तुम भी नाराज़ हो बिटिया ??”

विरेंदर की आंख मे आंसू थे ! गरिमा ने मुंह फेर लिया ! विरेंदर ने फिर कुछ नहीं पुछा !

“!गरिमा!!.. वाह बहुत अच्छा नाम है.. !! कुछ है नहीं बिटिया..क्या खिलाउं तुम्हे..थोडी देर रुक जाओ..खाना बनाता हूं” विरेंदर ने गरिमा के सामने कुछ छुहारे रख दिये और पानी का ग्लास !

गरिमा एकदम से ही उदासीन भाव से बैठी रहि..विरेंदर के हाथों पैरों मे जैसे नयी ताकत आ गयी थी ..वो जल्दि जल्दी सारे काम निपटा रहा और गरिमा से कुछ कुछ बात भी कर रहा था ! गरिमा खुद को सम्भाले हुये हां ना में जवाब दे रही थी ! रात के 10 बज गये थे और विरेंदर ने खाना बना लिया और गरिमा के साथ खाने बैठ गया !

दाल,चावल,चपाती और आलू-प्याज की सब्जी..जो कुछ भी था घर में सब बना दिया था विरेंदर ने..

“तुम्हारी माँ तो बहुत अच्छा खाना बनाती है,मैं वैसा नहीं बना पाता..” विरेंदर ने हल्के से मुस्कुराते हुये कहा ...गरिमा उसे देखती रही!

विरेंदर प्यार से उसके प्लेट में सब ज्यादा ज्यादा निकालकर रख रहा था...

“खाओ बिटिया” उसे खोया खोया सा देखकर विरेंदर ने कहा !

“आपने ऐसा क्यूं किया..?? ” गरिमा ने ठोस लहजे में पुछा और प्लेट एक ओर सरका दिया !

“ मैंने कुछ नहीं किया बेटा ! सब बताउंगा..तुम्हारा तो हक है जानने का..खाना खा लो...प्लीज़..” वो उसे दुलराते हुये बोला !

गरिमा उसे देखे जा रही थी..

“प्लीज़ खा लो..जानता हूं तुम्हारा मुजरिम हूं..”

“आप मेरी माँ के मुजरिम हैं”

“खा लो गुड़िया प्लीज़..,सब कुछ बताउंगा..मैंने तो कविता के सिवा कभी कुछ चाहा ही नहीं..और तुम तो जान हो मेरी !! ..गल्तियां की मैंने सजा भुगत रहा हूँ..लेकिन ये सजा मत दो..खा लो प्लीज़..” विरेंदर उसे दुलार रहा था और गरिमा पिघल रही थी..वो भी तो इतने साल बाप के इस दुलार के लिये तरसी थी !

बेमन से ही सही उसने खाना शुरु किया..भूख तो लगी ही थी..और विरेंदर को जैसे मन की मुराद मिल गयी..वो खुशी खुशी उसकी प्लेट में कुछ कुछ डालता जा रहा था ! गरिमा की आंख में आंसू आ गये !

खाना खाने के बाद गरिमा के सामने बैठा विरेंदर अपनी बेगुनाही की कहानी सुनाने को तैयार था..आजतक कभी उसका मन नहीं किया था किसी से कुछ कहने का लेकिन आज वो सबकुछ कह देना चाहता था..

“बिटिया ! 21 साल हो गये..मैने कभी किसी से कुछ नहिं कहा..क्यूंकि तुम्हारे मां के अलावा इस दुनिया में कोई मेरे बारे में क्या सोचता है मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था ! लेकिन आज तुम मेरे पास हो तो तुम्हें सबकुछ बता देने को मन कर रहा है..”

“कहिये !” गरिमा ने कहा !

“तुम यहां कैसे पहुंची ??”

“आपकी दीदी के थ्रू ..बहुत मुश्किल से उनका पता लगाया..हम पहले म.प में रहते थे..फिर नानी की डेथ हो गयी तो मॉम नानू के पास आ गयी और फिर मुझे पता चलने लगा की आपका घर भी वहीं था ..नानी ने भी एक दो बार बताया था आपके बारे में..और फिर बहुत मुश्किल से आपकी सिस्टर का फोन नम्बर मिला और फिर उनसे आपका अड्रेस !” गरिमा ने अपने लम्बे संघर्ष को छोटा करके बता दिया !

“ह्म्म..कविता ने नहीं बताया कुछ मेरे बारे में..?” विरेंदर ने कहा !

“सिर्फ ये की आप खूनी हो और हमारा आपसे कोई रिश्ता नहीं.” गरिमा बोल गयी !

विरेंदर चुपचाप उसे देखता रहा !

“ये सिर्फ आधा सच है गुड़िया..!!” विरेंदर ने बड़े उदास लहजे में कहा !

“जानती हो मेरा कसूर क्या था..बस इतना की मैं कविता से हद से ज्यादा प्यार करता था..डरता था की कोई उसे मुझसे छिन ना ले..लेकिन कविता की कोई गल्ती नहीं है..मेरी चाहत पागलपन बन गयी और उस पागलपन ने मुझे अंधा कर दिया..” विरेंदर अपनी कहानी अपनी बेटी को सुनाने लगा..हर बीतते घंटे के साथ गरिमा के आंसू और तेज होते जा रहे थे !

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भोर के चार बज गये थे ! जैसे कोई तूफान आकर गुज़र गया था ! सबकुछ शांत ! गरिमा विरेंदर को ऐसे देख रहि थी जैसे किसी अजूबे को देख रही हो !

“इतना सबकुछ आप कैसे बर्दाश्त कर गये पापा !” गरिमा की रुंधी हुयी आवाज़ कानों में पड़ी और विरेंदर जैसे किसी सपने से जाग गया ! “पापा” कानों में पड़कर जैसे नयी ज़िंदगी घोल गया था ये शब्द !

“एक बार और बोल गुड़िया..बोल ना..अरे मुझे तो लगा था ये शब्द सुने बिना है मैं मर जाउंगा.

बोल ना ‘पापा’ ..” विरेंदर की आंखो से आंसू बह रहे थे और होठ थरथरा रहे थे !

गरिमा झट से उसके गले लग गयी...”ऐसे मत कहिये पापा..प्लीज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़्ज़...” दोनों बाप बेटी आंसुओं की बारिश में भीग रहे थे ! बहुत देर तक दोनों रोते रहे!

“मम्मी ने आपके साथ बहुत गलत किया पापा..बहुत गलत.” गरिमा को आजतक अपना बाप गलत लगता था ,और आज मां गलत लग रही थी !

“नहीं बेटा..तुम्हारी मां गलत नहीं थी..गलत तो मैं ही था..मैं जो उसे दुनिया मे सबसे ज्यादा प्यार करने का दावा करता था ,उसपर यकीन नहीं कर पाया..शक ऐसा कीड़ा है जो रिश्तों को दीमक की तरह चाट जाता है..मैंने कविता से प्यार बहुत किया लेकिन उस प्यार में विश्वास कम पड़ गया..जो हालत बने उसका जिम्मेदार सिर्फ मैं था,कविता के फैसले का जिम्मेदार भी मैं ही था..आज अपने अतीत में झांकता हूं तो ज़िंदगी एक सजा लगती है..सिर्फ मेरी वजह से !” विरेंदर के चेहरे पर पछ्तावा था..सिर्फ पछ्तावा !

गरिमा उसे देखती रही..शायद अभी भी सोच रही थी की इन सबका जिम्मेदार कौन था !

“पापा..मैं आपको मम्मी के पास ले चलुंगी..चलेंगे ना आप?”

विरेंदर उसे देखता रहा..चेहरा और उदास हो गया..”नहीं गुड़िया ! तुम्हारी माँ मुझे भूल चुकी है और उसके सामने आकर मैं फिर से उसे और दुखी नहीं करुंगा..तुमने बता दिया सबकुछ ,बस और क्या चाहिये मुझे..वो खुश रहे !” विरेंदर खोये खोये से अंदाज़ में बोला !

“पापा ! मैं ज्यादा तो नहीं जानती..लेकिन कई बार कुछ ऐसी बातें होती हैं जो हम जानते हैं लेकिन मानना नहीं चाहते ! आपने जो सब कुछ मुझे बताया उसके बाद मैं मानती हूं की मम्मी ने आपके साथ ज्यादती की है..लेकिन इतनों सालों में मैंने अपनी मां को कभी खुश नहीं देखा ,कभी खुल के हँसते नहीं देखा..वो हमेशा यही दिखाती रहीं कि वो आपसे बहुत नफरत करती हैं,लेकिन आज मुझे लगता है के आप दोनों एकदुसरे के बिन अधूरे हो ! पापा जो टाइम बीत गया उसे हम वापस तो नहीं ला सकते,लेकिन आने वाले टाइम को कुछ और खुशनुमा तो बना सकते हैं ना...पप्लीज़्ज़....” गरिमा बरसों से बिखरे अपने रिश्ते समेटने में लग गयी थी ! विरेंदर ने चुपचाप सर झुका लिया !

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3 दिन बाद –

“मां कब तक नाराज़ रहोगी..जानती हूं मैं आप पापा के बारे में जानना चाहती हो,लेकिन कह नहीं रही..” गरिमा वापस अपने मां के पास लौट आयी थी !

“अगर मैंने जानना चाहा होता तो इतना मुश्किल भी नहीं था जानना” कविता ने संछिप्त सा जवाब दिया !

“आप झूठ बोल रही हैं मॉम..” गरिमा ने कहा ! कविता चुप रही ! गरिमा उसकी झुकी हुयी आंखो की ओर तकती रही !

“मॉम !!..वो इंसान गलत कैसे हो सकता है जो बेकसूर होते हुये भी सिर्फ एक रिश्ते को ज़िंदा रखने के लिये अपनी जवानी के 14 साल जेल की काल कोठरी में बिता दे !” गरिमा ने उदास लहजे में कहा ! कविता ने सर उठा कर देखा ..

“आपके दोस्त को पापा ने नहीं मारा था मॉम..आपको सच पता नहीं है..” गरिमा ने कहा ,कविता बेयकीनी से उसे देखती रहि फिर मुह फेर लिया..

“मॉम..पापा आज भी आपसे बहुत प्यार करते हैं और मेरा यकीन किजिये..सच जान जायेंगी तो खुद से नज़रें नहीं मिला पायेंगी आप..”

“कौन सा सच..” आखिर कविता ने कहा !

“उसके लिये आपको मेरी पूरी बात सुननी पड़ेगी..और बात खत्म होने से पहले आप कुछ नहीं बोलेंगी..ओके..?” गरिमा ने कहा !

“नहीं सुनना मुझे..” कविता दोराहे पर खड़ी थी..आजतक जिसे सच समझते आयी थी अब इस उमर में उसे झूठ मानने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी ! वो उठकर जाने लगी..पिछे से गरिमा चीखी...“खुदगर्ज़ और बुज़्दिल हैं आप..”

कविता ने पलटकर देखा ,गरिमा रो रही थी !

“14 साल कि सजा कानून ने दी उन्हें.. 21 साल की आपने ! अब बाकी की ज़िंदगी भी वो सजा ही भुगतते रहेंगे ??? क्यूं.......??” गरिमा गुस्से में चीख रही थी !

“बताओ क्या कहना है..”कविता उसके पास आकर बैठ गयी !

गरिमा उसे देखती रही...फिर बोलना सुरु हुयी...

“बहुत हिम्मत चाहिये मम्मा वो सबकुछ सुनने के लिये...”

“अकेले जीने से ज्यादा हिम्मत किसी काम के लिये नहीं चाहिये होती..कहो जो कहना है..” कविता ने कहा !

गरिमा ने वो सबकुछ बताना सुरु किया जो उसे विरेंदर ने बताया था...

“मॉम,पापा ने जैसे मुझे बताया वैसे ही आपको बता रही हूं..प्लीज़ एक बार न्युट्रल होकर पापा की बात पर यकीन करना...”गरिमा ने कहा और बताने लगा...

(विरेंदर के शब्दों में-) “ मैं कविता से बहुत प्यार करता था..इतना की कोई उसकी ओर गंदी नज़र से देख भी लेता तो मैं गुस्से में पागल हो जाता..और मेरी यही कम्जोरी मेरी बर्बादी की वजह बन गयी...हमारे पड़ोस में रहने वाले राकेश के स्कूल में पढ़ाती थी वो लेकिन मैंने जब भी देखा राकेश उसे अजीब से नजरों से देखता था या शायद उसे पसंद भी करता था..मुझे ये बात बर्दाश्त नहीं होती थी ! और एक दो बार राकेश को कविता के करीब भी देखा मैंने..फिर एक दिन मैंने देखा कविता को थामे हुये था राकेश..उसको कविता के करीब देख्कर मैं पागल हो गया और कविता से लड़ाई हो गयी..इसी सब के बीच कविता ने बताया की राकेश एक दिन उसे अपने घर भी ले गया था जब वो बीमार थी ! कविता ने ये बात पहले मुझे नहीं बताई थी..शायद वो जानती थी की मुझे गुस्सा आ जायेगा..मैंने उसके और खुद के बीच अविश्वास और शक की ऐसी दीवार बना दी थी की वो मज्बूर हो गयी थी मुझसे ये सब बातें छुपाने के लिये..उस समय मुझे ये सब समझ नहीं आता था लेकिन जेल की चार दीवारी में बैठकर जब सोचता था तो हर जगह खुद को ही गलत पाता था !

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