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कविता पापा के साथ लगी हुयी बहुत देर तक रोती रही,मन से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया था जैसे ! इश्क़ मुहब्बत सब अपनी जगह है लेकिन एक लड़की के लिये उसके पिता से बड़ा कोई भरोसा कुछ नहीं होता ! कविता का आधा दर्द पापा के गले लगकर खत्म हो गया था और इधर पापा खुद को कोस रहे थे ..
“ मुझे माफ कर दे बिटिया ! मैंने तुझे किस हाल में अकेला छोड़ दिया था..क्या हाल बना लिया है तुने अपना..” पापा कविता को देखकर बहुत दुखी हुये थे !
“आप आ गये ना पापा,अब ठीक हो जाउंगी”कविता रोती हुयी आंखो से मुस्कुरा उठी ! थोड़ी दूर पर राकेश आता हुआ दिख रहा था..पापा के गले लगे हुये कविता राकेश को आता देखती रही !
शाम के 4 बज गये थे ..सुबह ही पापा और राकेश ने मिलकर कविता को पास के एक क्लिनीक में एडमिट करवा दिया था..पापा ने बताया उसे की पड़ोस में रहने वाली रेखा से विरेन्दर की बहन का नम्बर लिया था मम्मी ने और फिर उसने ही उनका ये वाला एड्रेस बताया था ! विरेंदर के बारे में कविता ने पापा से कुछ नहीं कहा था,पर पापा इतना समझ चुके थे की सबकुछ ठीक नहीं है..कविता ने संक्षेप में बस यही बताया था की विरेन्दर ऑफीस के काम से बंगलोर गया हुआ है, वो अपनी खुशी के लिये एक स्कूल में पढ़ाती है ! राकेश उसी स्कूल का एक अध्यापक है जो उनका पड़ोसी भी है ! बाकी का समय वो पापा से मम्मी और घर की बातें करती रही थी..मम्मी से बात भी की उसने लेकिन उन्हे ये नहीं बताया की वो हॉस्पिटल में है ! राकेश पूरे दिन कविता के वार्ड के बाहर ही रहा था..कविता के पापा के लिये खाना ले आया था और जो भी दवा चाहिये थी सब वो जाकर ले आया था ! कविता के मन में कहीं ना कहीं एक सम्मान और आदर का रिश्ता पनप रहा था राकेश के लिये ! बिना किसी स्वार्थ के और बिना कुछ पुछे कुछ कहे वो उसके लिये सब कुछ किये जा रहा था !
कविता ने एक दो बार फिर विरेंदर का फोन ट्राई किया था लेकिन अब फोन बंद आ रहा था ! कविता बहुत दुखी थी विरेंदर के इस रवैये से ! वो एकदम से ही उसे भूल गया था ! किंतु वो किसी भी हाल में पापा को इन सबकी भनक नहीं लगने देना चाहती थी..कैसे कहती की शायद एक गलत इंसान के लिये वो अपने प्यारे पापा को छोड़ आई थी ! जब अपना फैसला गलत हो जाये तो कभी कभी पर्दा डालना मज्बूरी हो जाती है !
पापा ने एक दो बार पुछा विरेंदर के बारे में पर कविता ने ज्यादा कुछ कहा नहीं..शाम के 5 बजे के आस पास कविता का फोन बज उठा ..विरेंदर का फोन था..कविता ने फोन हाथ में लिया ,लाख कोशिस के बावजूद उसकी आंखें भर आयीं..वो कॉल रीसीव नहीं कर सकी..पापा पास में ही बैठे थे..वो फोन उठाकर कुछ बोलती तो शायद खुद पर कंट्रोल ना कर पाती..पापा ने उसकी ओर देखा और शायद वो समझ गये उसके मन की बात..
“मैं अभी चाय पीकर आता हूं बेटा...”उसके सर पर हाथ फेरते हुये वो कमरे से बाहर निकल गये..राकेश उनके साथ चल दिया !
एक बार फिर से कविता का फोन बज रहा था..उसने मोबाइल कान से लगा लिया-
“हेल्लो !”बड़ी मुश्किल से बोली वो
“हेल्लो..कविता !! ..कैसी हो जान !तुम ठीक हो ना..”राकेश की आवाज़ में बहुत बेचैनी थी !
“ठीक हूं मैं,आप ठीक हैं..??? ”कविता अपने होठों की सिसकियों को दबाये हुये थी !
“हां..मेरा फोन खो गया था..अभी अभी नया फोन लिया है और नम्बर अभी चालू हुआ है...श्वेता से तुम्हारा नम्बर लिया और फिर कॉल कर रहा हू...मन बहुत घबरा रहा था..तुम ठीक हो ना.बोलो..” कविता कुछ समझ नहीं पा रही थी..विरेंदर की आवाज़ में आज फिर से वही पहले वाली दीवानगी थी..वो झूठ बोल रहा था या सच..उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था !
“मेरा..वो आप परेशान मत होइयेगा..मैं हॉस्पिटल में हूं..”इस बार कविता की आवाज़ भीग गयी थी !
“क्या...तुम हॉस्पिटल में..??..क्या हुआ तुम्हें..तुम ठीक हो ना...बोलो मेरी कसम बताओ.”
“जी मैं ठीक हूं...वो एक छोटा सा एक्सीडेंट हो गया था...आप परेशान मत होइये...अभी ठीक हूं...”कविता इतनी ही मासूम थी..विरेंदर को परेशान देखती तो सारे शिकवे गिले ,सारे सितम भूल जाती थी...
“तुम्हारा एक्सीडेंट हुआ है...??..मुझे पता तक नहीं...कितना गिरा हुआ इंसान हूं मैं ....आई एम सोरी जान...माफ कर दो मुझे...कुछ ज्यादा ही बिजी हो गया था मैं.. कविता ! मेरे पास तुम्हारे सिवा है ही क्या??..मैं अभी आ रहा हूं जान !” विरेंदर जैसे तड़प उठा था कविता की बात सुनकर और कविता की आँखे बरसती जा रही थीं !
“आप आराम से आ जाइयेगा विरेंदर..मैं ठीक हूं..और पता है..पापा आये हैं..आज ही...वो भी साथ में हैं !”
“मैं आ रहा हूं जान !..ख्याल रखना अपना...बस अभी आ रहा हूं..आई लव यू..बहुत प्यार करता हूं मैं तुमसे..अभी निकलता हूं मैं..”विरेंदर दीवानों की तरह बड़बड़ाये जा रहा था और फोन कट गया !
कविता के दिल मे सुकून उतर आया था ! विरेन्दर आज भी वही विरेन्दर था और अब तो पापा भी वापस आ गये थे..सब कुछ ठीक होने वाला था..थोड़े से दर्द के बदले कितनी ढेर सारी खुशियां मिल रहीं थी उसको ! कविता के आंखो खुशी के जुगनुओं से जगमगा उठीं थीं !
कविता को डॉक्टर ने 2-3 दिन एड्मिट करने को बोला था..वीकनेस बहोत ज्यादा थी,तेज बुखार था और सर की चोट भी और बिगड़ गयी थी....पापा ने खास जोर देकर कविता को एडमिट रहने को कहा था !...कविता के पापा दिल के मरीज थे कविता ने जबर्दस्ती करके उनको राकेश के साथ घर पहुंचवा दिया था और राकेश वापस आकर कविता के वार्ड के बाहर बैठा था ! फ्लाइट से बंग्लोर से मुम्बई पहुंचने के बाद , रात के कोई 2 बजे विरेंदर कविता के पास पहुंचा था ! राकेश को बाहर बैठा देखकर उसे अच्छा नहीं लगा , विरेंदर कि वही एक सबसे बड़ी कमी शायद फिर उसके रिश्ते के आड़े आने वाली थी !
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