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स्वाहा

मौसी ने भी वही सोचा था, जो रेखा का ख्याल था- "मेरा भी ख्याल है कि वह हमारी मॉडल टाऊन वाली कोठी पर

होंगे। पर वहां का फोन नम्बर कैसे मालूम हो?" नम्बर...।"

"बलदेव अंकल के घर फोन करो शायद वर्षा या उसकी मम्मी घर पर हों। उनसे मालूम हो जाएगा फोन

"गुड आइडिया...।" रेखा बोली और उसने फोन उठाकर सोफे पर रख लिया और नम्बर लगाने लगी। नम्बर तुरन्त ही लग गया। दो घंटिया बजने के बाद उधर किसी ने रिसीवर उठाकर कहा- "हैलो!"

"रेखा ने वर्षा की आवाज फौरन पहचान ली, वह चहकी- "वर्षा... मैं रेखा बोल रही?"

"कैसी हो रेखा...?"

"मैं ठीक मै यह बताओ अंकल कहां हैं?"

"मॉडल टाऊन! वह तो सुबह के गये हुए हैं। ड्राईवर गाड़ी लेकर वापस आने वाला हैं। मैं और मम्मी जाने वाले हैं। "

" फिर तुम एक काम करो, मॉडल टाऊन पहुंचकर अंकल से कहना कि मुझे फौरन फोन करें। और हां, क्या तुम्हारे पास वहां का फोन नम्बर है?"

"हां है, तुम्हें चाहिये?"

"हां, लिखा दो ।"

" अच्छा ठहरो, डायरी में देखकर बताती हूँ।" कुछ क्षणों बाद ही वह फिर बोली- "लिखो।" रेखा ने साईड टेबिल पर रखा हुआ अखबार और बॉलपेन उठा लिया था, बोली- "हां, बोली।" वर्षा का बताया हुआ नम्बर उसने अखबार के हाशिये पर लिख लिया और फिर इधर-उधर दो चार बातें करने के बाद

उसने रिसीवर रख दिया। अब उसे अंकल बलदेव की फोन कॉल का बेचैनी से इंतजार था।

फिर.... कोई डेढ़ घन्टे बाद फोन की घंटी बजी। रेखा ने झपटकर रिसीवर उठा लिया, बोली- "हेलो।"

"हां, रेखा! मैं बलदेव राज बोल रहा हूँ।"

" आप कहां से फोन कर रहे हैं अंकल?"

"मैं एक सेफ जगह से फोन कर रहा हूँ...।" अंकल बलदेव उसका आशय समझकर बोले- कोठी से तो बात नहीं कर सकता था ना।"

"अंकल मुझे आपको एक इम्पोर्टेन्ट जानकारी देनी है।" "हां मै कहो।"

"क्या पुलिस ने घर के नौकर घनश्याम और उसकी बीवी को अपनी इन्वेस्टीगेशन में रखा हुआ है?"

"हां, इन्सपेक्टर ने उसका ब्यान लिखा था। मेरे सामने की बात है। पुलिस इस किस्म की वारदात में सबसे पहले घर के नौकर-चाकरों पर ही शक करती है।"

"और ऐसा पुलिस बिल्कुल ठीक ही करती है, अंकल ।" रेखा उत्तेजित सी बोली।

" धनश्याम को मैं वरसों से जानता हूँ। वह कृष्णकांत की पूजा करता था, बेटी! वह तुम्हारे पापा का वफादार था। "

"अंकल ! मेरा दिल कहता है कि यह घनश्याम कातिल से अच्छी तरह वाकिफ है।"

"यह.... यह इम कैसे कह सकती हो?"

" आप सिर्फ इतना कर कि अपने तोर पर यह मालूम करा लें कि उसकी बेटी का एक्सीडेन्ट हुआ था या नहीं।"
 
"यह तो कोई ऐसा मुश्किल काम नहीं। मैं अभी किसी को उसकी बेटी के यहां यह मालूम करने भेज देता हूँ।"

" और जब यह मालूम हो जाए कि उनकी बेटी का कोई एक्सीडेन्ट नहीं हुआ तो फिर घनश्याम को छोडियेगा नहीं । पुलिस के जरिये थाने में ड्रिलिंगरूम की सैर करवा दीजिएगा। फिर वह खुद ही हत्यारे रमाकांत का नाम उगल देगा...।"

" पर तुम्हें घनश्याम जैसे वफादार पर यह शक क्यों कर हुआ ?"

"इस शक की वजह है में आपको बताऊंगी आप शायद यकीन नहीं करेंगे। आप बस वह करके देख लीजिए जो मैंने आपसे कहा है। हकीकत सामने आ जाएगी। अंकल... !”

"अच्छी बात है। मैं अपने तोर पर एक्सीडेन्ट की तस्वीक करवाये लेता हूँ। तुम बेफिक्र हो जाओ। मैं रात को घर से तुम्हें फोन करूंगा। बॉय...।"

"बॉय...!" रेखा ने रिसीवर रखकर एक गहरा और ठण्डा सांस लिया और सोचा अब जरूर कुछ न कुछ हो जाएगा।

और वाकई कुछ न कुछ हो गया।
 
लेकिन इस होनी के लिए रेखा को दस बजे तक इंतजार करना पड़ा।

रात दस बजे अंकल बलदेव राज का फोन आया। रेखा गंगा मौसी के कमरे में बैठी थी। फोन भी उसी ने उठाया।

"हैलो!. वह बोली ।

"हां, रेखा। यह मैं हूँ बलदेव राज.....।"

""क्या हुआ अंकल?" रेखा ने बेताबी से पूछा- “आपन मालूम करवाया ?"

"तुम्हारा शक ठीक निकला रेखा घनश्याम र्का बेटी का कोई एक्सीडेन्ट नहीं हुआ। उस दिन वह घर से निकली ही नहीं तो एक्सीडेन्ट कहां से होता ।" बलदेव राज ने बताया ।

"ये लोग अपनी बेटी के पास रहे भी थे या वहां सिरे से गए ही नहीं?" रेखा ने पूछा।

"नहीं गए थे और रात को वहीं रहे थे। "

"अब बताएं अंकल ! मेरा शक ठीक था ना?" रेखा ने दाद चाही।

"तुम्हें बहुत दूर की सूझी रेखा।" बलराज को दाद देनी पड़ी थी- "मैं हैरान हूँ । काश! यह बात मेरे दिमाग में भी आ जाती। "

"मुझे पूरी डिटेल बताएं अंकल।"

"घर में पाठ रखना था। बहुत से लोग आए हुए थे। तुम्हारे चाचा तो कल ही अपनी फैमिली के साथ जा चुके थे। लेकिन आज उनका एक बेटा दीपक पहुंचा हुआ था। वह भी अजनबियों की तरह बैठा रहा फिर पाठ शुरू होते ही मुझसे मिले बिना निकल गया। दिन ढलने तक कोठी मेहमानों से खाली हो गई। वर्षा और उसकी मां को भी मैने घर भेज दिया। बस, कोठी में में अकेला रह गया था फिर घनश्याम और उसकी बीवी मौजूद थे जो कोठी के काम समेटते फिर रहे थे। मैं वैठक में बैठा उस लड़के का इन्तजार कर रहा था जिसे मैंने खोजबीन के लिए घनश्याम की बेटी के घर भेजा था।"

"आपने लड़के को देर से भेजा।" आप तो कह रहे थे कि में अभी किसी को भेजे देता हूँ।"

"हा, मैंने देर सं भेजा ।" बलदेव राज ने कबूला--"कोठी में पाठ रखने की व्यस्तता थी दूसरे जिस लड़के को मैं इस मिशन पर भेजना चाहता था, उसे मैंने और भी कई काम-धन्धे सौंपे हुए थे। वह खाली होते ही शाहदरा चला गया और अब उसे गये हुए काफी देर हो गई थी और मैं उसी के इन्तजार में बैठा था । "

"खैर, फिर...?"

"वह लड़का करीब आठ बजे वापस आया। उसने बताया कि घनश्याम की बेटी भली-चंगी है। उसके हाथ की कोई हड्डी बड्डी नहीं टूटी। ना ही उसके हाथ पर किसी किस्म का बेन्डेज था। धनश्याम की बेटी पुप्पा दस्तक देने पर खुद ही दरवाजे पर आई थी। लड़के ने उसका जायजा लेते हुए पूछा- "क्या तुम ही पुध्या हो धनश्याम की बंटी ?" उसने हां कहा तो लड़के ने जैसा कि मैंने उसे समझाकर भेजा था जेब से सौ का नोट निकालकर उसकी तरफ बढ़ाया और. कहा- "यह सौ का नोट तुम्हारे बाप ने भेजा है कहा है कि इन्तेक्शन खरीद कर फौरन लगवा लें वरना हाथ की हड्डी जुड़ने में देर लगेगी।" वैसे यह तो बताएं कि आपके कौन से हाथ की हड्डी टूटी है। इस पर वह घबराकर बोली- "भगवान न करे मेरे हाथ की कोई हड्डी टूटे, तुम यह कैसी बातें कर रहे हो।" लड़के ने पूछा- "कल तुम्हारा एक्सीडेन्ट नहीं हुआ?" वह सुनकर परेशान हो गई हे राम! तुम क्या कह रहे हो। भगवान न करे कि मेरा एक्सीडेन्ट हो मैं तो कल घर से ही नहीं निकली- तुम्हें जरूर कोई गलतफहमी हुई है।"

"ओह, फिर?" रेखा की उत्तेजना बढ़ती जा रही थी।

"फिर क्या? लड़के ने भी हैरत दिखाते हुए पूछा, क्या तुम्हारे बाबा का नाम घनश्याम नहीं है?" वो बोली- “हा, मेरे. बाबा का नाम घनश्याम ही हैं। वह कल ही तो एक रात रहकर यहां से गए हैं।" तो लड़के ने पूछा- "तो क्या तुमने
 
स्वाहा फोन करके उन्हें नहीं बुलाया था?" उसने जवाब दिया- "नहीं, मां और बाबा खुद ही आए थे। उन्हें मेरी याद आ रही थी। मुझसे मिलने आए थे।" लड़के की सन्तुष्टि हो गई थी। वह खुद को हैरान-परेशान दिखता वहां से लौट आया था।

" यानी कि तवक हो गई कि पापा के इस वफादार नौकर ने एक नाटक ही किया था।"

"हां" बलदेव राज ने एक दुःख भरी सांस ली. "कलयुग है बेटी!

"अंकल तो क्या आपने पुलिस को इस बाबत बताया।" रेखा अंजाम जानने को बेचैन हो उठी थी ।

"उस लड़के ने आकर मुझे यह सब बताया तो मैने सोचा कि घनश्याम से पूछताछ करू सो मैंने उस लड़के को ही सर्वेन्ट क्वार्टर से घनश्याम को बुलाने भेज दिया। लड़के के जाने के बाद मैने सोचा कि घनश्याग को आने में कुछ देर लगेगी, क्यों न पुलिस को फोन करके इंस्पेक्टर से बात कर लू। फोन लाउन्ज में था ।

लाउज में आकर थाने फोन किया। आई० ओ० इंस्पेक्टर यादव थाने में मौजूद था। मैंने अपना परिचय देते हुए कहा कि मेरे हाथ में एक महत्वपूर्ण क्लू है और अगर वह फौरन कोठी पर आ जाएं तो कातिल तक पहुंचना आसान हो जाएगा। मेरी बात सुनकर उसने कहा- "ठीक है मैं पहुंच रहा हूँ। उधर से सन्तुष्ट होकर मैंने रिसीवर रखा तो वह लड़का कमरे में दाखिल हुआ। वह बेहद घवराया हुआ था। उसके चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं। वह हड़बड़ाकर बोला- सर, वह क्वार्टर! जल्दी चलिए...।" मैं फौरन उस लड़के के साथ हो लिया। लड़के को हालत अजीब हो रही थी। उससे चला नहीं जा रहा था। मैंने उसे सीढ़ियों पर बैठने को कहा और धड़कते दिन के साथ सर्वेन्ट क्वार्टर की तरफ बढ़ गया।

"फिर...?" अंकल बलदेव राज का लहजा ऐसा हो रहा था कि रेखा का दिल भी वे अख्तयार हो धड़कने लगा।

"क्वार्टर का दरवाजा खुला हुआ था मैं क्वार्टर के अन्दर घुसता चला गया और अन्दर जाकर मैने जो मंजर देखा उसे देखकर सोचना मुश्किल न था कि उस लड़के की हालत सही खस्ता हो रही थी। अन्दर का यह मंजर ही ऐसा था कि मजबूत से मजबूत दिल का इन्सान भी कांप कर रह जाए।" बलदेव राज यह कहकर खामोश हो गया। शायद वह मंजर उनकी निगाहों में धूम गया था।

"क्या हुआ अंकल? क्या वो दोनों अपना सामान समेटकर फरार हो चुके थे? " रेखा ने पूछा।

"नहीं, रेखा। कमरे में दोनों की लाशें पड़ी थी। किसी तेज धार हथियार से उन दोनों की गर्दनें काट दी गई थी। फर्श पर खून का तलाब सा नजर आ रहा था।"

"ओह! माई गॉड!" रेखा दिल थामकर रह गई।

"क्या हुआ, रेखा! खैर तो है?" गंगा मौसी ने घबराकर पूछा।

"अभी बताती हूँ मौसी !" रेखा ने रिसीवर पर हाथ रखकर कहा- "फिर वह हाथ हटाते हुए अंकल बलदेव से सम्बन्धित हुई।" अंकल यह तो बहुत बुरा हुआ। लेकिन हैरत की बात है कि कातिल आनन-फानन में कत्न करके निकल गए और आपको पता भी नहीं चल सका। जबकि आप वहीं कोठी में मौजूद थे। क्या वे लोग चीखे-चिल्लाये भी नहीं? उनके क्वार्टर से कोई आवाज नहीं आई।

"मैं तो बैठक में बैठा-लड़के का इन्तजार कर रहा था। मुझे तो यह भी नही मालूम कि वे अपने क्वार्टर में कब चले गए। ऐसा लगता है कि कातिल पहले से ही क्वार्टर में घुसे बैठे है। यह वारदात एक बन्दे के बस की बात नहीं। वे कम से कम दो थे । घनश्याम और उनकी बीवी जैसे ही क्वार्टर में पहुंचे उन्हें रिवॉल्वर दिखाकर काबू कर लिया गया। दोनों के ही हाथ पीठ पर बंधे थे और मुंह में कपड़ा ठूसा हुआ था। मेरा ख्याल है कि उन्हे यूं बेबस करने के बाद किसी तेज धार हथियार से उनके गले काट दिये गए। यूं उन्हें चीखने का भी मौका नहीं मिला होगा। "

रेखा कुछ देर खामोश रही, फिर उसने पूछा- "पुलिस क्या कहती है ?"

“पुलिस कं पास फिलहाल कुछ भी कहने को नहीं है। आई० ओ० खान तो इस निष्कर्ष पर पहुंचा लगता है कि तुम्हारे पापा कृष्णकांत की हत्या नौकर घनश्याम ने की थी और जिसके इशारे पर उसने हत्या की उसी ने भेद खुल • जाने के पहले ही अपने बन्दों से घनश्याम और उसकी बीवी का कत्ल करवा दिया।"
 
"नानसेन्स रेखा फुंफकसि "लगता है पुलिस पैसा खा गई है और हकीकत का अनदेखा करके उल्टे-सीधे निष्कर्ष निकाले जा रही है। अंकल मैं आपको बताऊं-पापा का मर्डर मेरे चाचा रमाकांत ने र्हा किया है और उसी ने धनश्याम और उसकी बीवी को भी हमेशा के लिए खामोश कर दिया है। उन्हें मरवा दिया है। ताकि पकड़े जाने पर उनके खिलाफ गवाही न दे सकें। आप जानते ही हैं कि रमाकांत कैसा शातिर इन्सान है। उसका कोई कुछ न बिगाड़ सकेगा। उसने आई० ओ० की जेब भर दी होगी।"

"कांश ! धनश्याम जिन्दा रहता । "

"मेरा जी चाहता है अंकल कि दिल्ली पहुंचू और अपने चाचा के खिलाफ नम जद रिपोर्ट लिखवा दूं।"

"एफ0आई0आर0 तो किसी न किसी तरह दर्ज हो ही जाएगी।" बलदेव राज चिन्तित स्वर में बोला "लेकिन सबूत कहां से आएंगे। किसी को कातिल साबित करने के लिए ठोस सबूत या आई विटनैस की जरूरत होती है। वह हम कहां से लायेंगे?"

"यही तो प्रॉब्लम है।" रेखा गहरी सांस लेते हुए बोली - "घनश्याम और उसकी बीवी की गवाही ही उस शैतान को फांसी के फंन्दे तक पहुंचा सकती थी। खैर, कोई बात नहीं। भगवान तो सब कुछ देख रहा है। उसके यहां देर है अन्धेर नहीं। भगवान ने चाहा तो यह शैतान भी एक दिन अपने भयानक अंजाम को पहुंचेगा और उसके अंजाम को दुनिया देखेगी... | M

"तुम चिन्तित मत होवो रेखा । तुम ठीक कहती हो। वह बक्त दूर नहीं जब रमाकांत अपने अंजाम को पहुंचेगा।" बलदेव राज ने रेखा से सहमति दर्शाई, फिर बाला- “पर रेखा बेटी! भगवान के वास्ते तुम आवेश में आकर दिल्ली का रूख नहीं करना । "

"जी अंकल । मैं सब समझती हूँ।"

"हा, बेटी! तुम्हें अपनी जिन्दगी की हर हालत में हिफाजत करनी है। तुम न रही तो फिर उस शैतान के अंजाम को

देखकर खुश कौन होगा?"

रेखा अजीव सी हंसी हंसी, बोली- अंकल मैं इतनी आसानी से मरने वाली नहीं अगर मरी भी ता चाचा रमाकांत को साथ लेकर मरूंगी। अभी तो मुझे अपने भाई इन्द्र को तलाश करना है। में जानती हूँ कि मेरे इन्द्र भैया जिन्दा हैं और भगवान ने चाहा तो मैं बहुत जल उन तक पहुंच जाऊंगी। इसका मुझे पूरा विश्वास है।"

"भगवान करे कि तुम्हारा विश्वास सही निकले। कोई ऐसा चमत्कार हो जाए कि इन्द्र हमसे आ मिले।" बलदेव राज संजीदगी के साथ बोले थे- "तुम्हारे पापा कृष्णकांत भी कहा करते थे कि मुझे यूं विश्वास होता है जैसे मेरा बेटा जिन्दा है और एकदम अचानक मेरे सामने आ जाएगा।"

"हां, अंकल । पापा को तो मरते दम तक यकीन था, वना यह सावनपुर वाली जायदाद उनके नाम नहीं करते।

"कल से एक दिन पहले वह रेस्तरां में बैठे बहुत देर तक इन्द्रजीत की बातें करते रहे थे और उसी दिन उन्होंने मुझे अपनी वसीयत की डिटेल बताई थी, शायद उन्हें अपने इस दुनिया से उठने का अहसास हो गया था। "

रेखा के लहजे में उदास हसरतें भर आई, वह बोली- "कितने बदनसीव थे पापा, अंकल! वह अपनी औलाद का सुख नहीं देख सके। एक औलाद को तकदीर ने उनसे जुदा कर दिया और दूसरी औलाद की उन्होंने खुद तकदीर बना कर अपने आप से दूर कर दिया और फिर खुद वक्त के हाथों शिकस्त खा गए। और अंकल ! में कौन-सी खुशनसीब हूँ। दर-दर भटकती रही। अपना बाप होते हुए भी किसी दूसरे को बाप समझती और कहती रही हूँ। असली बाप मिला भी तो उनके साथ रह न सकी। उन्हें जी भर कर देख न सकी, कैसी भाग्यहीन हूँ मैं...।" यह कहते कहते जैसे समुद्र के जज्वात में ज्वार-भाटा-सा आ गया। जब्त संयम का बांध टूट गया।

वह बेचारी तो अपने बाप के शव से लिपट कर रो भी नहीं सकी थी। बाप का शव देखकर उसके संयम का बांध टूटा भी तो उस शैतान ने उसका हाथ पकड़ लिया था और उसका गम अचानक गुस्से में बदल गया था। दिल का गम दिल में ही रह गया था।

अब जो बाप की चर्चा हुई उसके आभावों व मजबूरियों का ख्याल आया तो रेखा अपने आप को रोक न सकी।
 
अख्तयार ही औसू बह निकले। भावावेश से उसकी हिचकियां बंध गई।

गंगा मौसी ने रिसीवर उसके हाथ से ले लिया और बोली- "बलदेव राज, अब फिर बात कर लेना । वह अब इस योग्य नहीं रही है कि और बात कर सके। मैं उसे सम्भालती हूँ...।"

"हां, गंगा! उसे समझाओ, उसे सम्भालों । उसे बताओ कि जाने वाला जा चुका है और अब उसे धैर्य धीरज से काम लेना है।"

"ठीक है। मैं समझाती हूँ उसे आप सुबह फोन कर लें। अच्छा, नमस्कार।" गंगा मौसी ने बलेदव राज के जवाब का भी इन्तजार नहीं किया और रिसीवर रख दिया।

रेखा बैड पर आँधी लेटी थी। गंगा मौसी ने उसका सिर तकिये से उठाकर अपनी गोद में ले लिया और उसके बालों को सहलाने लगी। मौसी कुछ नहीं बोली और बस यूं ही उसके सिर पर ममता भरा हाथ फेरती रही। अपने दुपट्टे से रेखा के आंसू पोंछती रही। उसे प्यार करती रही और रेखा उनसे लिपट लिपट कर रोती रही।

रेखा शायद जिन्दगी में पहली बार इतना रोई थी। गंगा मौसी ने उसे रोने दिया था, तसल्ली सांत्वना का एक शब्द भी उन्होंने रेखा से न कहा था, क्योंकि वह जानती थी कि रेखा की तसल्ली रोने में ही है.... तसल्ली भरी बातों में नहीं।

दिल पर जो गुब्बार था वह आंसूओं से धुल गया। यूं रेखा के दिल को करार आ गया। रेखा रोते-रोते, गंगा मौसी की गोद में सिर रखे ही सो गई किसी अबोध बच्ची की तरह।
 
रेखा लगभग आधा घन्टा यूं ही सोती रही।

आधे घन्टे बाद 'अचानक हों उसकी आंख खुल गई। पहले तो उसकी समझ में ही नही आया कि वह कहां है? गगा मौसी की गोद में अपना सिर देखकर उसे पहला ख्याल यही आया था कि वह शायद बीमार है। लेकिन जब विवेक थोड़ा और जागा तो उसे याद आया किए वह रात-रोते सो गई थी।

रेखा को एकाएक शर्मिन्दगी का अहसास हुआ कि जाने वो कब से यूं ही सोती रही है और मौसी उसकी वजह से यूं . बैठी रही है। मौसी के घुटनों में वैसे ही तकलीफ रहती है। यह सोचकर रेखा हडबड़ाकर उठने लगी तो गंगा मौसी ने उसे उठने नहीं दिया। वह रेखा का माथा चूमते हुए बोला- "क्या हुआ रेखा ? लेटी रही, मुझे अच्छा लग रहा है।"

रेखा उठते-उठते दोबारा उनकी गोद में लेट गई। उसे खुद गंगा मौसी की गोद में लेटना अच्छा लग रहा था।

फिर कोई साढ़े ग्यारह बजे बाहर गाड़ी के हॉर्न की आवाज आई। अमर आया था।

माया ने जाकर गेट खोला अमर ने गाड़ी अन्दर खड़ी की गाड़ी से निकला और उसे लीक करते हुए पूछा।

"माया ! मौसी सो गई क्या?"

"नहीं, जाग रहीं हैं। रेखा बीबी भी उनके पास है।"

"अच्छा....।" अमर अपने कमरे में जाने की बजाए सीधा गंगा मौसी के कमरे में चला गया।

उसने रेखा को मौसी की गोद में लेटा देखा तो दरवाजे पर ही ठिठक गया।

"कुशलता तो है। मैं अन्दर आ सकता हूँ।"

"हां, अमर आ जाओ।" मौसी बोली।

रेखा फौरन उठकर बैठ गई। वह अभी तक निढाल और बुझी बुझी सी नजर आ रही थी।

"क्या हुआ?" अमर रेखा को ही घूरते हुए बोला था। "एक ओर बुरी खबर आई है दिल्ली से ।" "रेखा के पापा की मौत के बाद अब और क्या बुरी खबर हो सकती है?"

"कृष्णकांत जी के घरेलू नौकर घनश्याम और उसकी बीवी को किसी न गला काटकर मार डाला है।" मौसी ने बताया।

"और, वह कैसे हुआ?"

पूरी बात तो गंगा मौसी को भी मालूम न थी और अमर सुबह का निकला अब घर लौटा था। रेखा को ही उन्हें सब कुछ डिटेल से बताना पड़ा।

विवरण जान अमर को भी दुःख हुआ। नौकर घनश्याम की गिरफ्तारी के बाद कातिल तक पहुंचना मुश्किल न था। लेकिन कातिल ने गवाह ही खत्म कर दिए थे।

वे लगभग एक बजे तक बेठे बातें करते रही। अमर ने खाना भी वहीं बैठकर खाया था। अमर को नींद आ रही थी।

वह उठ खड़ा हुआ तो रेखा भी उठ खड़ी हुई। उन्होंने मौसी से गुड नाईट कहा और अपने-अपने कमरे का रुख

किया।

रेखा सीढ़ियां चढ़कर ऊपर पहुंची तो उसने अपने कमरे का दरवाजा छूता पाया और रेखा की तो यह आदत थी कि वह जब भी कमरे से निकलती थी तो दरवाजा हमेशा बन्द करके ही निकलती थी। दरवाजा पूरा खुला देखकर उसे अजीब सा अहसास हुआ-जैसे कोई उसके कमरे मे गया हो। फिर उसने सोचा कि हो सकता है कि वही दरवाजा खुला छोड़ गई हो। कमरे की लाईट जल रही थी।
 
रेखा कमरे के सामने पहुंची तो एक क्षण के लिए ठिठक गई।

खुले दरवाजे के ऐन सामने उसे कुर्सी पर अपने पापा बैठे नजर आए। उनके होठों पर स्नेहिल मुस्कराहट थी। "पापा! आप कब आए?" रखा के मुंह से बेअख्तयार निकला और वह तेजी से उनकी तरफ बड़ी ।

लेकिन वहां तो कुछ नहीं था। कुर्सी खाली पड़ी थी। वह परेशान हो गई। यह क्या था? क्या यह महज उसका भ्रम था या फिर नजर का फरेब । लेकिन नजर का फरेब और वहम तो उस सूरत में होता है कि आदमी पहले से सोचता आया हो कि वह ऊपर पहुंचेगा तो वहां किसी को पाएगा। ऐसे में सोच या कल्पना सजीव और साकार नजर आ सकती है,

लेकिन रेखा की कल्पनाओं में ऐसा कुछ तो था नहीं, फिर.... । रेखा तो दरवाजा खुला मिलने पर भी उलझन का शिकार हो गई थी। और फिर उसने खुले दरवाजे से जो कुछ देखा था वह इस कदर वास्तविक था कि वह बरवस ही पूछ बैठी थी-

"पापा! आप कब आए?"

रेखा लपककर ही कुर्सी के निकट पहुंची थी। उसने गद्दी पर अपने दोनों हाथ रख दिये। गद्दी गर्म हो रही थी जैसे उस पर से कोई अभी उठकर गया हो। वह उसी कुर्सी पर बैठ गई और फिर कमरे में चारों तरफ निगाह घुमाई ।

कमरे में सन्नाटा था। बाहर कहीं झींगरों के बोलने की आवाज आ रही थी।

अजीब खटराग था। रेखा ने उठकर दरवाजा बन्द किया। लाईट जली छोड़ दी और अपने बैड पर आकर लेट गई और आंखें छत पर जमाए सोचने लगी।

आज वह किस कदर रोई थी। अपने जले नासीब पर, अपने पापा की बदनसीबियों पर क्या पापा से मेरा रोना

बर्दाश्त नहीं हुआ था कि वह मुझे देखने आ गए थे। उनके चेहरे पर कैसी आकर्षक अपनत्वपूर्ण मुस्कराहट थी। क्या

वह वाकई मेरे पापा थे? क्या आत्माएं इस तरह आ निकलती हैं? इस तरह नजर आ सकती हैं?

सोचते-सोचते उसकी पथराई हुई आंखें बन्द होने लगीं। दिमाग निष्क्रय हो चला। उसे लगे जैसे वह रुई के "गालों" में धंसी जा रही है। उसकी आंखों में नींद उतर आई थी। यूं कुछ ही क्षणों बाद वह बेसुध सो गई।

और फिर वह प्रकट हुए। वह और कोई नहीं कृष्णकांत !

उन्होंने कुर्सी का रुख साई हुई रेखा की तरफ घुमाया और आराम से कुर्सी पर बैठ गए और रेखा को बड़े प्यार से निहारने लगे।

रेखा उनकी बहुत प्यारी बच्ची थी। अपनी हम बेटी की जीवन रक्षा के लिए उन्होंने बड़े कार भोगे थे, रेखा गहरी नींद

में थी और ऐसे प्यारे अंदाज में सो रहा थी कि उस पर से उनकी नजरें हट ही नहीं रही थीं।

आज रेखा उन्हें ही याद करके किस कद्र रोई थी। उसके चेहरे पर अभी तक उदासी छाई हुई थी। उनका जी चाहा कि वह उठकर अपनी बेटी का माथा चूम लें पर फिर यही सोचकर रुक गए कि रेखा अगर उठ गई तो उन्हे देखकर परेशान हो जाएगी।

'वह' तो रेखा की, अपनी बेटी की मुहब्बत से मजबूर होकर आ गार थे वर्ना अब उन्हे इस मनहूस दुनिया से कोई दिलचस्पी न थी।

'वह' तो जहां चले गए थे, वहां सुख ही सुख था। वहां वह हर गम हर चिन्ता से मुक्त हो गए थे।

'उन्हें' अभी रेखा के कमरे में बैठे अधिक देर न हुई थी कि 'वो' बाहर के एक करीबी पेड़ पर से उड़ा। पंखों की तेज फड़फड़ाहट वातावरण में उमरी थी। पेड़ पर एक उल्लू ही था। इस उल्लू ने उसके घर के सात चक्कर लगाए।

रेखा बेखबर सो रही थी और उसके पापा कुर्सी पर बैठे निर्निमेष ही बड़े प्यार से देखे जा रहे थे। सातवें चक्कर के बाद वह उल्लू रेखा के कमरे की छत पर आ बैठा और इसके साथ ही रेखा को सहसा महसूस
 
हुआ जैसे कोई भारी पक्षी उसके सीने पर आ बैठा हो । रेखा बुरी तरह चौंक गई। उसका दिल बुरी तरह से धड़क रहा

था। वह तो अभी उस खौफ से ही नहीं निकली थी कि एक पक्षी उसके सीने पर आकर बैठ गया था।

रेखा की सहमी-सहमी निगाहें पूर्वी और उसने कमरे में बड़ा विचित्र नजारा देखा। इस नजारे ने उसे और भी दहला

दिया।

रेखा ने देखा कि एक बड़ा-सा पक्षी जो यकीनन उल्लू था उसके पापा पर झपट रहा है। उसके पापा जो कुर्सी पर बैठे थे और उनका चेहरा रेखा की तरफ ही था इस आकस्मिक विपदा से घबराकर हाथ-पांव चला रहे थे। उस उल्लू का हमला इस कदर तीव्र और तेज था कि पापा उससे अपने आप को बचाने के लिए अपना सन्तुरलन बनाए नहीं रख सके। उनकी कुर्सी पीछे की तरफ उलट गई।

रेखा घबराकर चीखी- "नहीं...sss!"

उसी यह विक्षिप्त चींख पूरे कमरे में गूंज गई। उसके नही कहते ही कमरे का नजारा तक्षण बदल गया। वहां अब कुछ

भी अनूठा नहीं था।

ना उसके पापा थे ना हमलावर उल्लू!

और रेखा की समझ में नहीं आ रहा था कि यह उसने कोई भयानक ख्वाब देखा था या वास्तव में ही वह सब कुछ हुआ था।

रेखा अव पूर्णत: सजग थी।

उसने साईड टेबिल से जग उठाकर पानी पिया। उसका गला बुरी तरह सूख रहा था और दिल की धड़कन अभी तक काबू में न थीं।

वह शायद ख्वाब देख रही थी क्योंकि सोने से पहले उसने अपने पापा कृष्णकांत को कुर्सी पर बैठा हुआ महसूस

किया था और वह उन्हीं के बारे मे सोचते-सोचते सो गई थी। शायद इसीलिए पापा उसके ख्वाब में आ गए थे।

यह ख्वाब क्या है?

अधूरी कामनाओं व हसरतों की दुनिया। रेखा की इस दुनिया से तो बड़ा भयानक ख्वाब बरामद हुआ था। वह सोचने लगी यह कैसा ख्वाब था। उस उल्लू का इस बुरी तरह उसके पापा पर हमला करना क्या अर्थ रखता है? यह मनहूस पक्षी उसके पीछे क्यों लग गया है?

क्या यहा वही उल्लू है जिसका खून हुआ था और बाद में दर घायल उल्लू अमर के हाथ से यूं उड़ गया था जैसे बहन मृत या न पाया। यह उल्लू 'काला चिराग' एक रहस्यम व्यक्ति गया था और फिर दूसरे ही दिन यह काला चिराग उसे वापस लेने भी आया था। उल्लू ता उड़ चुका था सो वह खाली पिंजरा ही लेकर चला गया था। जाते-जाते यह कह गया था वह

'वो' आजाद हो गया है और यह कोई अच्छी बात नहीं...।"

"वो कौन?"

"और वो आजाद कैसे हो गया? और यह बुरी बात क्यों थी ?"

यह 'वो' काले वन्द कमरे का लंगड़ा प्रेत था तो 'वो' तो अपनी मुक्ति पर बहुत खुश था और उसने तो कृतज्ञ और खुश होकर रेखा को एरक चमत्कारी डायरी से नवाजा था, वही चमत्कारी डायरी जो रेखा की खाहिश पर उसकी जिन्दगी के रहस्य खोल देती थी। रेखा की उलझन का हल बता देती थी, हर गुत्थी को सुलझा देती थी।

सोच में फसी रेखा की नजरें सहसा कुर्सी पर पड़ी थी "जो अब पीछे की तरक उल्टी पड़ी थी।"

"अरे, यह कैसे उलट गई। अगर वह ख्वाब था तो फिर यह कर्मी कौन उल्टा गया। नहीं, वह सब कोई खाब नहीं था उसने जो कुछ देखा था एक हकीकत थी। सच था। वह फिर सोचने लगी, "पापा सचमुच ही यहां मौजूद थे।
 
जरूर मुझे ही देखने आए थे। अगर वह मुझे देखने आए थे तो इससे किसी और को क्या परेशानी हो सकती है। उफ उनकी जिन्दगी में तो चाचा ने उन्हें चैन नहीं लेने दिया था अब मर कर उन्होंने सुकून पाया और अपनी चाहत से मजबूर होकर पापा मुझे देखने चले आए तो...तो यह कौन बीच में आ गया?

क्या पापा मरकर भी सुकून नहीं पा सक हैं? अपनी बेटी के लिए तड़प रहे है। अब उनकी राह में आने वाला कौन है? रेखा बैड से उठी। उसने उठकर कुर्सी सीधी की दरवाजे की तरफ देखा, दरवाजा बन्द था। दरवाजे के ऊपर ही वॉल क्लांक लगी हुई थी। दो बजकर बत्तीस मिनट हो रहे थे।

रेखा बाथरूम में जा घुसी फ्रैश होकर बाहर अनई और फिर बैड पर बैठ गई। वह अब पूरी तरह जागी हुई थी। अपने हवास में थी। उसने सोचा न जाने वह कितने जोर से चींखी थी। उसकी आवाज जान कहा गई होगी? उसके कमरे के ठीक नीचे

अमर का कमरा था। अगर अमर के कमरे तक उसकी चींख की आवाज गई होती तो वह कब का ऊपर आ चुका

होता।

हालात पहेली बन रहे थे। सोचें उलझ रही थीं।

सहसा उसे ख्याल आया कि वह डायरी निकालकर देखें। शायद कुछ लिखा नमुदार हो गया हो।

उसने बैड से उठकर कैसेटों के बीच से डायरी खींची और उसे देखते हुए बैड पर आ गई। इत्मीनान से बैठकर ही वह

एक-एक पेज पलटकर देखने लगी। वह हर पेज इस आशा पर पलट रही था कि शायद अगले पेज पर उसे कुछ लिखा हुआ नजर आ जाएगा। पेज

पलटते-पलटते जब वह निरारा होने लगी और पृष्ठ भी कुछेक ही रह गए तो आशा की किरण अचानक चमकी।

वह पेज उलटते- उलटते रह गई। इस पृष्ठ पर मात्र कुछेक पंक्तियां लिखी थी। वह पढ़ने लगी। लिखा था--

"देखा, अपने पापा की समझाओ। इस दुनिया से अब उनका कोई वास्ता नहीं रहा है तो यह क्यों परेशान हो रहे हैं। उन्हें अब इस दुनिया से अपने सम्बन्ध विच्छेद करने होंगे। इतनी चाहत, ऐसा मोह, अच्छा नहीं होता। अच्छा, हम चलते हैं। हमें गया वक्त न समझना हम फिर आयेंगे।"

रेखा ने पढ़ा और पहले की तरह आखिरी शब्द पढ़ते ही शब्द धुंधने पड़ने लगे। मिटने की क्रिया शुरू हो गई और

देखते ही देखते वे शब्द उस पेज से लुप्त हो गए।

उग्र ने डायरी बन्द करके तकिये के नीचे रखी और लेट गई।

यदि किस्म की चेतावनी थी। चेतावनी थी या मशविरा था। और यह उसे कैसी हिदायत दी गई थी। वह एक ऐसे आदमी को कैसे समझा सकती थी जिसका कोई अस्तित्व ही न हो। जिसकी काया जलकर राख हो चुकी हो और जो अब महज एक आत्मा रह गया हो। डायरी की तहरीर से इतना तो स्पष्ट था कि उसके पापा कृष्णकांत उसकी मुहब्बत भटक रहे थे। मरणोपरांत भी उन्होंने इस दुनिया से नाता नहा तोड़ा था। वह बार-बार उसके पास आ रहे थे।

लेकिन... लेकिन यह चाहत भी अब उनके हक में बेहतर न थी ।

रेखा की उलझनें बढ़ती जा रही थीं।

सवाल यह था कि वह अपने पापा को समझाए भी तो कैसे?

वह बहुत देर तक जागती रही और साचती रही यहां तक कि प्रातः के आसार दिखाई देने लगे। नींद तो उड़ चुकी थी। वह उस वक्त तक सोचो में ही फंसी रही जब तक माया उमसे नाश्ते के बारे में पूछने न आई।
 
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