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स्वाहा

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रेखा ने नाश्ता, गंगा मौसी के साथ ही किया।

और आज नाश्ते पर रेखा ने मोसी से 'रूहों' के बारे में विचार-विमर्श किया, मौसी दिलचस्पी लेते हुए बोली-

"आत्माओं के वारे में मैं कोई बात पूर्ण विश्वास से नहीं कह सकती। लेकिन प्रायः यह सुनने में आया है कि मरने के बाद मृतक की रुह घर के प्राणियों को दिखाई दी है। मेरा अपना ख्याल यह है जो लोग अकाल- आकस्मिक मौत मारे जाते हैं और जिनका मोह अपने पीछे रह जाने वालों से बना रहता है उनकी आत्मा भटकती रहती है। ऐसे लोग जो दुर्घटनावश मर जाते हैं और उनकी तीव्र कामना मौत के कारण से अधूरी रह जाती है, उनकी आत्माएं संसार से नाता बनाए रहती हैं। फिर यह भी मान्यता है कि मरने वाले, की आत्मा तेरह दिनों तक तो अपने प्रियजनों के करीब ही कहीं रहती है। पर आज तू यह चर्चा क्यों ले बैठी है?" मौसी ने शंकित भाव से पूछा था।"

"मौसी ! मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरे पापा की आत्मा भी अभी यहीं चक्कर लगा रही है।"

"यह... यह... अहसास तुम्हें कैसे हुआ? क्या वह तुम्हें सपने में नजर आए ?"

"सपने में नजर आते तो अच्छा होता। मैं उनसे बात भी कर लेती। मैंने तो उन्हें जागती आंखों से देखा है, मौसी !"

"हायं! वह कब ?" मौसी घबरा सी गई।

"अगर मैं आपको बताऊं तो डरेंगी तो नहीं?"

"नही, ऐसी बातों से मैं कभी नहीं डरती।"

तब रेखा ने रात की सारी बातें सविस्तार ही गंगा मौसी को सुना दीं, लेकिन उसने उतना ही बताया जितना गंगा मोसी को बताया जा सकता था और यह सब सुनकर गंगा मौसी बोली-

"इसका मतलब है कि हमारी मुहब्बत और यह संसारिक मोह उन्हें भटका रहा है। किसी आत्मा का यूं भटकना

अच्छा नहीं होता, बेटी!"

"मौसी !" रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा- "क्या कोई ऐसी युक्ति नही है कि पापा को यूं भटकने से और दुनिया में आने से रोका जा सके।"

"मैं ऐसी कोई युक्ति नहीं जानती। यह सब तो कोई 'आमिल' ही बता सकता है।"

"काश! दादा हरि ओम जिन्दा होते।" रेखा बोली- "वही इस बारे में हमारे मददगार साबित हो सकते थे। हमें रास्ता दिखा सकते थे।"

"देखो, जरा माया को आवाज देकर पूछो कि अमर है या नहीं। वैसे वह होगा। मुझसे मिले बिना वह कभी ऑफिस नहीं जाता।"

"माया...!" रेखा ने आवाज दी।

"जी बीबी जी," माया दोड़ी हुई आई।

"भाई क्या कर रहे हैं?"

"नहा रहे है जी वह। मैं उनका नाश्ता तैयार कर रही हूँ..।"

"वह नहाकर निकलें तो कहना बड़ी बीबी बुला रही हैं।" गंगा, मौसी ने आदेश दिया।

और फिर माया ने अमर को बाथरूम से निकलता देखकर ही गंगा मौसी का हुक्म सुना दिया था और अमर भी आज्ञाकारी बालक की तरह तोलिये स सिर पोंछता हुआ मौसी के सामने आ खड़ा हुआ।

"जी, मौसी!"
 
"ओहो क्या बाथरूम से सीधे इधर ही चले आए हो। ऐसी तो कोई एमरजेन्सी नहीं थी...।" "मेरे ख्याल में माया ने कहा ही कुछ ऐसे अंदाज से होगा।" रेखा ने मुस्कराते हुए कहा ।

"ऐसा कोई अर्जेन्ट काम नहीं है, तुम कपड़े पहनकर और तैयार होकर आओ।" मौसी बोली "मैं तुम्हारा नाश्ता यहीं

मंगवाए लेती हूँ।"

ठीक है मौसी। मैं बस दो मिनट में आया।" अमर पलट गया।

अमर लौटकर आया तो तभी माया भी नाश्ता ले आई थी। माया नाश्ता रखकर चली गई तो गंगा मौसी ने बात छेड़ी- " अमर वह 'आमिल' रोशन अली कहां है?"

तांत्रिक रोशन अली का नाम सुनकर अमर के कान खड़े हो गए। वह एकाएक फिक्रमंद नजर आने लगा। वह बोला-

"खैरियत तो है मौसी ! क्या फिर कुछ हो गया?"

"नहीं, ऐसा कुछ नहीं हुआ। रेखा का उनकी जरूरत आन पड़ी है।"

"किस सिलसिले में...?" अमर ने रेखा की तरफ देखा ।

"रेखा, भैया, को पूरी बात बताओं ।"

तब रेखा ने अपने पापा से सम्बन्धित घटना दोहरा दो।

अमर सारी डिटेल सुनकर सोच में पड़ गया। यह बात उसके गले से नहीं उतर रही थी कि रेखा ने अपने बाप की आत्मा को देखा था । अमर इस बात को रेखा का समझ रहा था। लेकिन रेखा ने सारा वाक्या कुछ इस यकीन से सुनाया था कि वह कोई बहस नहीं कर सका। उसने बस इतना ही कहा-

"रोशन अली तो अलीगढ़ चले गए हैं। वह रिटायर्ड हो गए थे ना।"

"ओह! हां, याद आया खैर इतने बड़े शहर में वह एक रोशन अली ही तो आमिल नहीं था। किसी और आमिल के बारे में मालूम कर लो।" मौसी बोली।

अमर ने कुछ कहने को मुंह खोला ही था कि तभी फोन की घन्टी बजी। रेखा फोन के ज्यादा निकट थी, उसी ने हाथ बढ़ाकर रिसीवर उठा लिया।

"हैलो!" वह बोली ।

"रेखा, मैं बलदेव राज बोल रहा हूँ...।" रेखा की आवाज पहचान उधर से बलदेव राज बोला था।

"बलदेव अंकल, आप कैसे हैं?"

"मैं ठीक हूँ। रात को मैंने ख्वाब में कई बार तुम्हारे पापा को देखा...।"

"क्या कह रहे थे।" रेखा ने पूछा।

"कहा तो उन्होंने कुछ नहीं, जब नजर आये तो बड़े बेताब तथा बेकरार से दिख रहे थे...।"

"आपने उन्हें बिल्कुल सही देखा। वह वाकई बड़े बेकरार हैं।"

''क्या मतलब? क्या तुमने भी उन्हें ख्वाब में देखा है, बेटी?" बलदेव राज ने तेजी से पूछा था। नहीं अंकल ! वह यहां आये थे शायद मुझे देखने। मैंने उन्हें जागती आंखो से देखा है। "
 
'जागती आखों से वह किस तरह?" बलदेव राज की समझ में नहीं आया था।

और तब रेखा ने अपने पापा को जिस तरह देखा था वह सब सुना टिया, लेकिन उल्लू का हमला और डायरी वाली लिखत का जिक्र गोल कर गई। यह बात उसने मौसी और अमर को भी नहीं बताई थी।

• इसका मतलब है कि वह तुम्हारे लिए अब भी चिन्तित हैं। "

"काश! मैं उनको किसी तरह समझा सकती...।" रेखा बोली- "उनकी आत्मा की शान्ति का पाठ चल रहा "होता पंडित जी से कहना, वह पाठ के दौरान उनकी पुण्यात्मा को समझाएं।

तुम्हारे ख्याल में क्या इससे कोई फर्क पड़ेगा।"

"मैं नहीं जानती। आप ऐसा करके तो देखें।"

रेखा वाकई कुछ नहीं जानती थी। यह ख्याल तो बस वैसे ही उसके जहन में आ गया था और उसने कह दिया था।

"ठीक है। मैं पंडित जी से बात करूंगा।"

"जरूर कीजियेगा, अंकल । "

"रेखा, तुम जरा अपना ख्याल रखना। घर से अकेली मत निकलना। "

"क्यों? खैरियत ? कोई नई प्रॉब्लम...।"

"तुम्हारे बार में एक फोन आया था, फोन वर्षा ने उठाया तो फोन करन वाले ने तुम्हारे बोरे में पूछा कि कहां हो। वर्षा ने जवाब देने की बजाय पलटकर सवाल किया कि वह कौन बोल रहा है। तो उसने जवाब दिया कि में उनके वकील का जूनियर बोल रहा हूँ। कुछ कागजात पर उनके साईन कराने थे। वर्षा ने उसे बताया कि रेखा इस वक्त घर पर नहीं है। जब आयेगी तो आपको फोन कर लेगी। इस बाबत वर्षा ने मुझे बताया, गृझे बड़ी हैरत हुई कि ऐसे कौन से कागजात हैं, जिन पर इतनी एमरजेन्सी में दस्तखत होने हैं। मैंने वकील को फोन किया तो हुआ कि उसकी तरफ से कोई फोन नहीं किया गया है। जाहिर है यह सब तुम्हारे बारे में सुराग लगाने की एक शातिराना कोशिश थी । "

"मैं समझ गई अंकल । आप फिक्र न करें। किसी का मुझ तक पहुंचना इतना आसान नहीं।"

"फिर भी एहतियात की जरूरत है। "

"ठीक है अंकल ! मैं सतर्क रहूँगी।"

कहने को तो उसने कह दिया था कि वह सतर्क रहेगी। नैकिन इस शब्द से ही उसे चिढ़ हो गई थी। जब से वह पैदा हुई थी, उस वक्त से ह यह शब्द किसी जौंक की तरह उसकी जिन्दगी से लिपटा हुआ था। अब तो इस शब्द को सुनते ही उस पर इसकी तीव्र प्रतिक्रिया होती थी। उसका जी चाहता था कि वह सारी सतर्कता, सारी एहतियात छोड़छाड़ कर मैदान में आ जाए।

सच भी तो था कि रेखा की जिन्दगी ही बड़े अनिश्चितता के रंग में बीत रही थी। जो वह करना चाहती थी वह नहीं कर पा रही थी और जो नहीं करना चाहती थी वह करने पर मजबूत थी। वह कैद में नहीं थी लेकिन उसे अदृश्य दीवार हर वक्त अपने गिर्द खड़ी महसूस होती थीं। उसे किस कदर हुई सुई बना दिया गया था ।

वह पूरा दिन रेखा ऐसी क सोचा का शिकार रही थी। रात को भी वह बेचैन और उलझी रही। सोते-सोते अचानक ही उसकी आंख खुल जाती। उसे यूं महसूस होता जैसे उसके पापा उसके पास ही हैं। पापा उसे नजर ता नहीं आते थे, लेकिन उनके साये, उनकी छाया का एक अहसास बदस्तूर बना रहता था।

इस तरह सोते-जागते वह लगभग चार बजे गहरी नींद में चली गई।

और तब उसने बड़े दादा हरि ओम को ख्वाब में देखा। उनका दिव्य, आलौकिक व शांतमय चेहरा देखकर रेखा के दिल को करार-सा आ गया।
 
दादा हरि ओम किसी घने पेड़ के नीचे बैठे थे। रेखा पानी की तलाश में कई फटे से इस रेगिस्तान में भटक रही थी। प्यास की शिद्दत से उसके कंठ में काट से चुभ रहे थे। भटकते-भटकते ही एकाएक दादा हरि ओम सामने आ गाए । दादा हरि ओम ने उसे इशारे से अपने पास बुलाया। पास रखी सुराही से मिट्टी के प्याले में पानी उड़ेलकर उसे दिया। यह बड़ा ही राहत बख्श तथा मीठा पानी था। पानी पीकर रेखा की आत्मा तृप्त हो गई थी।

चुपचाप वह बड़े आदर से उनके सामने बैठ गई थी।

तब दादा हरि आम ने अपनी, गम्भीर और तसल्ली देती आवाज में कहा था-

"धबराओ मत। बहुत हौंसले से काम लेने की जरूरत है। आगे आने वाला वक्त बहुत सख्त होगा।" इतना कहकर दादा हरि ओम ने उसे कुछ पढ़न को बताया, यह एक मंत्र था और शांति-शांति-शांति का पाठ, "इसे पढ़ते ही तुम्हारे पापा तुम्हारी मुहब्बत की गिरफ्त से आजाद हो जायेंगे। उन्हें शान्ति मिल जायेगी।"

इसके साथ ही रेखा की आंख खुल गई थीं। दादा हरि ओम कों ख्ताव में देखकर जो सुकून की अनुभूति हुई थी वह अभी भी वनी हुई थी और वह मंत्र जो उन्होने उसे पढ़न का बताया था, वह भी उसके जहन में ताजा था।

वह फौरन उठकर बैठ गई।

वह मंत्र जो उसे दादा जी ने पढ़ने को बताया था, वह उसे संध्या पाठ पढ़ने के वाद तीन दिन तक पढ़ना था। यह शान्ति पाठ उसे प्रतिदिन पांच बार पढ़ना था ।

रेखा ने दादा हरि ओम के कह का अनुसरण किया।

तीन दिन के इस शान्ति पाठ के बांद रेखा ने दादा हरि आम के बताए हुये पूर्ण आकृति के तौर पर एक गिलास पानी पर सात बार फूंकें मारी और उस पानी को गुलाब के पौधे के गमलों में डाल दिया। अब उसे किसी से बात नहीं करनी थी। सीधे अपने बिस्तर पर जाकर सो जाना था।

तीसरे दिन का यह मंत्र - पाठ उसने देर से शुरू किया था ताकि सोने का वक्त हो जाए और वह किसी से कोई बात किए बिना सो जाए। रेखा हालांकि देर से सोने की आदी थी और नींद भी उसे करवटें बदलकर आती थी लेकिन आज ऐसा न हुआ। बिस्तर पर लेटने के दस-एक मिनट के अन्दर ही अन्दर उसे नींद ने अपनी आगोश में ले लिया ।
 
रेखा उस वक्त गहरी नींद में थी, जब कोई दरवाजे पर निरन्तर दस्तक दे रहा था।

दस्तक की इस निरन्तर आवाज पर रेखा की आंख मुश्किल से खुली। उसने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली। सात बज रहे थो।

वह फौरन उठकर खड़ी हो गई। दरवाजे पर यकीनन काला चिराग होगा उसने सोचा ।

. आगन्तुक काला चिराग ही था। अपने वायदे के अनुसार वह दिन निकलते ही आ पहुंचा था। रेखा की आंखें नींद से बोझिल हो रही थीं। आंखों में लाल डोरे पड़े हुए थे जो उसकी आंखों को और भी आकर्षक बना रहे थे। खूबसूरत नशीली आंखें। काला चिराग उसकी आंखों में झांकने लगा।

उसकी आंखों की तख न लाकर, रेखा ने जुम्हाई ली और बोली- "रात मैं एक पल भी नहीं सो सकी हूँ।"

"जानवरों की आवाजों से डरती रही?" काले चिराग ने पूछा।

"जानवरों को उतवाजों से इतना नहीं, जितना चमगादड़ों से...।"

"क्या मतलब?" वह एकदम चौक गया।

"मुझे जब भी नींद आती एक भयानक ख्वाब देखने लगती। जैसे में किसी खण्डहर में पत्थर पर लेटी हुई हू और बड़ी-बड़ी चमगादड़ें इधर-उधर उड़ती फिर रही हैं। एक-दो मेरी तरफ भी लपकती महसूस होती।" रेखा ने बताया ।

"ओह!" काले चिराग ने अपना सिर पकड़ लिया- "वास्तव में गलती मुझसे हुई, मुझे इस बात का ख्याल ही नहीं रहा।"

"कैसी गलती ? किस बात का ख्याल ?" रेखा उलझकर रह गई थी।

"बस हो गई एक गलती ।" काले चिराग ने टालने के अन्दाज में लापरवाही से कहा- "आज की रात तुम्हें यह ख्वाब

बिल्कुल दिखाई नहीं देगा।" "ठीक है।' रेखा ने गहरी सांस ली और बहस न करना ही उचित समझा।

"अब तुम जाकर मुंह-हाथ धो लो मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लेकर आता हूँ। फिर इत्मीनन से बैठकर करेंगे...।" यह कहकर काला चिराग उठ गया और भीतरी दरवाजे से बाहर निकल गया।

उसके जाने के बाद रेखा ने खिड़की से पर्दा हटाकर बाहर झांका। सब कुछ वैसा ही था। वह हमाम में चली गई। इत्मीनान से हाथ मुंह धोया और बाहर आ गई।

रेखा अभी आकर कुर्सी पर बैठी ही थी काला चिराग तश्तरी उठाए अन्दर दाखिल हुआ। उसने तश्तरी मेज पर रख दी जो नाश्ते के व्यंजनों से भरी हुई थी।

"मुझे बड़ी शर्मिन्दगी होती है कि आप मेरे लिए ट्रे उठाकर लाते हैं। क्या इस महलनुमा भवन में कोई भी सेवक नहीं

है?" रेखा ने पूछा।

"यहां बहुत से लोग हैं लेकिन ऐसा कोई भी नहीं जो यह काम कर सके। तुम्हें शर्मिन्दा होने की कोई जरुरत नहीं, नाश्ता करो..।" काले चिराग ने गोल-मोल सा जवाब दिया।

"आप समझ में न आने वाली बातें बहुत करते है। क्या आपको दूसरे को उलझाकर बहुत मजा आता?"

"मैं किसी को क्या उलझाऊंगा मैं तो स्वयं एक लम्बी अवधि से उलझा हुआ हूँ।"

"आपको किसने उलझाया?" रेखा ने टोस्ट पर मक्खन लगाते हुए पूछा।

"बकाल ने...।"
 
रेखा चौकी, उसने तेजी से पूछा- "यह बकाल आखिर क्या बला है? आपने कल भी इसका जिक्र किया था।" "उसे बला न कहो मैं उस पर मरता हूँ।"

"मरता हूँ...?" रेखा तनिक सम्भलकर गई।

"हां मरता हूँ। मगर अफसोस कि वह किसी और पर मरती है...।"

"किस पर...?"

"तुम्हारे भाई इन्द्रजीत पर...।"

रेखा उलझती जा रही थी, उसने काले चिराग का आशय समझते हुए "यह कैसा मरना है कि वह उस पर मरती भी हैं। और उसे कैद भी रखा है?"

"यही तो रहस्य है और मैं यही सब बताने के लिए तुम्हें यहां पर लाया हूँ।" "तो फिर बताइये। मैं सुनने के लिए व्यग्र हूँ।"

काला चिराग कुछ क्षण खामोश रहा और फिर इस सोचत खामोशी को तोड़ते पूछा- "तुम अपने भाई इन्द्रजीत के बारे में कितना जानती हो?"

"सिर्फ इतना ही मेरे भाई इन्द्रजीत को जब वह बारह-तेरह वर्ष तरह चौदह बरस के थे तो मेरे चाचा रमाकांत ने जब वह शिकार करने गए थे उसका अपहरण करवा लिया था और फिर उन्हें जान से मरवा दिया था। मेरे पापा कृष्णकांत की हत्या करने से पहले रमाकांत ने यही बताया था कि वह इन्द्रजीत को कत्ल करवा चुका है। लेकिन मेरा भाई तो जिन्दा है। इसका मतलब है कि रमाकात को कोई गलतफहमी हुई।"

"नहीं, गलतफहमी नहीं हुई। उसे उसके लोगों ने यही बताया था कि वे उसके आदेशानुसार इन्द्रजीत को कत्ल कर

आएं हैं। उसके लोगों ने इन्द्रजीत की लाश के टुकड़े देखे थे। "

"मेरे भाई की लाश के टुकड़े...।" रेखा ने घबराकर पूछा।

"हां, तुम्हारे भाई की लाश के टुकड़े जो एक-एक करके उन लोगों के सामने गिरे।"

"फिर मेरा भाई जीवित कैसे है?" रेखा बौखला सी गई- "क्या उस झोपड़ी में मेरे भाई के अलावा कोई और भी है।" "कोई और नहीं वह तुम्हारा अपना सगा भाई इन्द्रजीत ही है। ठहरो, मैं तुम्हें शुरू से बताता हू।" काले चिराग ने गहरा सांस लेकर कहा, फिर शून्य में निहारते आगे सुनाया-

"तुम्हारा भाई दिल्ली में एक बहुत अच्छा पब्लिक स्कूल में शिक्षा प्राप्त कर रहा था। उस वक्त वह आठवीं या नौवीं क्लास में था। वह एक कुशाग्र-बुद्धि और तेज तर्रार लड़का था। छोटी सी उम्र में ही उसने बहुत कुछ सीख लिया था। गांव की जिन्दगी से उसे प्यार था और शिकार का शोक तो उसे जुनून की हद तक था। उसका निशाना बहुत अच्छा था। उसके पास इटली की बनी दोनाली बन्दूक थी। इस बन्दूक का लाईसेन्स तो तुम्हारे पिता के नाम था लेकिन इसका प्रयोग अधिकतर इन्द्रजीत ही करता था। वह बन्दूक की हवेली में ही रखी रहती थी। तुम्हारे चाचा रमाकांत काँ छोटा बेटा विजय हालांकि इन्द्रजीत से उम्र में बड़ा था, लेकिन इन्द्रजीत से उसकी दोस्ती और घनिष्टता ज्यादा थी। सावनपुर में वे दोनों हर जगह साथ-साथ रहते थे।"

"आखिरी बार इन्द्रजीत सावनपुर आया तो रमाकांत ने उसके लिए जाल बुन रखा था। इन्द्रजीत उसके लिए खतरा बनता जा रहा था। बेचार बाप ने तो भाई से कभी हिसाब न मांगा था लेकिन बेटा हिसाब मांगने लगा था। सो रमाकांत सोच लिया था कि इस बार इन्द्रजीत का पूरा हिसाब साफ कर देगा। तुम्हारा भाई इन्द्रजीत जब भी सावनपुर आता तो उसके साथ दो अंगरक्षक रहते थे। और इन अंगरक्षकों की मौजूदगी में कोई भी खेल खेलना आसान नहीं था। सो तुम्हारे चाचा रमाकात ने इन्द्रजीत के लिऐ जंगल में फंदा तैयार करवाया। इन्द्रजीत को शिकार का शोक था ही, सो इस बार जब रमाकांत ने उसे यह सूचना दी कि सावनपुर के जंगल में हिरण देखे गए हैं तो यह इन्द्रजीत दीवाना गया।
 
उसने अब तक तीतर का शिकार किया था। किसी बड़े जानवर का शिकार नहीं किया था। उसने दिन ही शिकार का प्रोग्राम बना लिया। सुबह-सवेरे ही वह और नौकरों के साथ शिकार पर जाने को तैयार गये। इस प्रोग्राम के लिए दो जीपों का इन्तजाम नाम किया गया था प्रोग्राम अनुसार सभी तैयार हो जीपों में बैठ चुके थे तुम्हारे भाई के बॉडीगार्डो का इंतजार था। फिर किसी ने आकर बताया कि वे दोनों तो नशे में गहरी नींद सो रहे हैं। और उठाए नहीं उठ रहे हैं। फिर एक मुलाजिम ने तुम्हारे भाई को बताया कि वे दोनों तो देर तक शराब पीते और ताश खेलते रहे हैं। इन्द्रजीत को जंगल में उनकी जरूरत नहीं थी। वह उन दोनों को छोड़कर विजय के साथ शिकार पर निकल लिया।"

." रमाकांत का यह बेटा विजय अपने बाप के साथ इस साजिश में शामिल था। वह इन्द्रजीत को जंगल में उन्हीं रास्तों पर ले गया, जहां रमाकांत के गुंडे डाकुओं के भेष में छिपे हुए थे। फिर जैसे ही विजय और तुम्हारा भाई इन्द्रजीत उनकी पहुंच में आए, वे डाकू घोड़े दौड़ाते बाहर निकल आए और एक डाकू ने इन्द्र को उठाकर अपने घोड़े पर लाद लिया। वे चारों डाकू तुम्हारे भाई इन्द्रजीत को ले उड़े। यूं अपहरण का यह खेल पूरा हुआ। बाद में यही खबर लेकर विजय क्त बड़ा भाई सूरज दिल्ली तुम्हारे बाप के पास पहुंच गया जिसे सुनकर तुम्हारे पिता दीवाने हा गए।"

उधर हुआ ये था कि वे कथित डाकू जंगल में काफी अन्दर जाने के बाद एक जगह ठहर गए थे। एक ने इन्द्रजीत को घोड़े से उतारा और एक वृक्ष के तने से बाधं दिया। इन्द्रजीत की सिट्टी-पिट्टी गुम थी। उसे मामले की गम्भीरता का अहसास हो चुका था। अब वह पछता रहा था कि उसने अपने बाप के कहे पर अमल न करके कितनी बड़ी गलती की है। कृष्णकांत ने उसे हिदायत दी थी कि अपने अंगरक्षकों के बिना कहीं न जाना कि अगर इस मौके पर भी उसके बॉडीगार्ड उसके साथ होते तो इतनी आसानी से उसका अपहरण सम्भव न था ।

"तुम लोग कौन हो? क्या चाहते हो?" उसने उन डाकुओं से पूछा था।

"हम लोग तुम्हारी मौत हैं- तुम्हें यहां कत्ल करने के लिए लाए हैं।" उस डाकू ने हसकर जवाब दिया था जो उसे अपने घोड़े पर लादकर लाया था।

"मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है? तुम लोग मुझे कत्ल क्यों करना चाहते हो? देखो, क्या ऐसा नही हो सकता कि तुम

मेरी जान बख्श दो इसके बदले में में तुम्हें एक मोटी रकम अपने बाबा से दिलवा सकता।"

" रकम ती हम ले चुके।" दूसरा डाकू बोला- " और यह रकम हमने तुम्हारी जान लेने के लिए ली है। हम अपने किये हुए सौदे से कभी नहीं फिरते। अब यह तुम्हारी किस्मत की जान लेने का सौदा पहले हो गया...।"

"वे चार थे। डाकुओं की तरह ही चारों के चेहरों पर कपड़ा बंधा इआ था। उनमें से दो इस हक में थे कि इन्द्रजीत को फौरन गोलियों से छलनी कर दिया जाए। एक का ख्याल था कि उसकी जान लेने की बजाए उसे यूं ही बंधा छोड़ दिया जाए कि इस वीरान जंगल में वह भूख-प्यास से खुद ही मर जाएगा। इस बाबत चौथा डाकू डावांडोल था वह कभी सोचता कि उसे तत्काल गोली मारकर किस्सा निपटा दिया जाए-कभी उसे इन्द्रजीत की किशोर अवस्था पर रहम आ जाता और वह अपने उस साथी का हमख्याल बन जाता जिसका ख्याल था कि इन्द्रजीत को बंधा छोड़कर ही चल दिया जाए।"

उन चारों में इस समस्या पर विवाद चल ही रहा था कि इन्द्रजीत बोला- "मेरी बात सुनो...।" वे चारों दूर खड़े थे। उसकी आवाज सुनकर एक उसके नजदीक चला गया और बोला- "हा, बोलो...।"

"अब जब कि मुझे कत्ल करना ही चाहते हो तो क्या मरने वाले की आखरी ख्वाहिश नहीं पूछोगे?" वह डाकू हंस

दिया हंसते हुए ही बोला “हां... हां, क्यों नहीं पूछेंगे। बताओ तुम्हारी आखिरी ख्लाहिश क्या है?"

"मैं उस शख्स का नाम इनना चाहता हूँ-जिसने तुम्हें इस काम पर लगाया है?" इन्द्रजीत पूछा । "बस इतनी सी बात ।" डाकू हंसा, और उसने बताया- "उसक नाम है रमाकांत ।

"ओह! मेरे चच्चा।" इन्द्रजीत को जैसे विश्वास ही न 'आया। उसने एक ठण्डी सांस ली। "हे प्रभु! तू ही इंसाफ करने वाला है।"

डाकू अपने शिकार की विवशता पर हंसता हुआ दूर खड़े अपने साथियों के पास लौट गया।

"क्या पूछा था?" एक ने सवाल किया।
 
" अपने नाम की सुपारी देने वाले का नाम पूछ रहा था।"

"क्या बुने बता दिया?"

"हा- मैंने बता दिया। यह मरने वाले की आखिरी ख्वाहिश थी मैंने पूरी कर दी।" उसने कहकहा उगला।

उसके साथी भी हंसे, फिर एक बोला- "चलो अब जब उसकी आखिरी ख्याहिश भी पूरी हो गई फांसी की तैयारी करो। "

"पहली गोली कौन चलाएगा?" दूसरे ने पूछा।

"मैं चलाऊंगा।" पहले वाला बोला।

"और गोली कौन चलाएगा?"

"दूसरे में चलाऊंगा।" दूसरा बोला।

" और तीसरी?" पहले ने पूछा।

"यार दो गोलियां बहुत हैं-क्यों अपनी गोली जाया करते हो।" तीसरे ने राय दी।

"यार तुम क्या कहते हो?" पहले वाले ने चौथे से पूछा ।

वह जैसे असहाय सा बोला- "यार, मुझसे इस पर गोली नहीं चलाई जाएगी चौथे ने साफ जवाब दिया। चौथा वही

था जो उसे मारने की बजाये यूं ही बंधा छोड़ जाने के हक में था । "

"ओये, हटो बुजदिलो।" पहले ने तीसरे और चौथे शख्स को अपने सामने से हटाया, अपने कन्धे से राईफल उतारी-नाल खोलकर कारतूस चैक किया। कारतूस मौजूद था। नाल बंद करके उसने घोड़ा चढ़ाया और बन्दूक सीधी करके उसने इन्द्रजीत के दिल का निशाना लिया और बोला-

"पहली गोली मैं चलाता हूँ और यह आखिरी भी होगी। इसी गोली से इसका काम तमाम हो जाएगा।"

निशाना लेकर उसने अभी ट्रेगर पर उंगली धरी ही थी और वो उसे दबाना ही चाहता था कि चीखती हुई आवाज उभरी-

"गोली मत चलाओ।"

चारों ने एक साथ पीछे मुड़कर देखा और देखते ही रह गये।

आने वाला बड़ा अजीब व्यक्ति था। वह एक पेड़ की ओट से अचानक ही बाहर आया था। वह जाने उत पेड़ के पीछे कब से खड़ा था। वो एक मोटा ताजा शख्त था। ऊपर का धड़ नंगा था। नीचे उसने एक मटियाली-सी धोती बांध रखी थी। उसका बदन घने बालों से भरा हुआ था। गले में उल्लू का पंजा ताबीज की तरह लटका हुआ था। बड़ी-बड़ी खौफनाक मूंछे, सिर मुडा हुआ और चमकता हुआ, जैसे सिर पर तेल चुपड़ रखा हो। कन्धे पर सुर्ख मुंह वाला बन्दर बैठा हुआ था। बन्दर ने अपने दोनों हाथ उसके सिर पर रखे हुए थे। उस शख्स के हाथों में एक मजबूत लट्ठ था। उसे- देखकर यह अनुमान लगाना कठिन था कि वह कौन है और इस जंगल में क्या कर रहा है।

"यार, यह वनमानुप कहां से आ गया। क्या ख्याल है पहले इसी पर गोली चला दू?" पहले वाले ने अपने बराबर खड़े

साथी से पूछा।

"बिना वजह अपने सिर खून लेने से क्या फायदा इसे नजदीक आने दो पता तो चले कि यह आखिर है कौन?" दूसरे ने राय दी।

इतने में वो इन चारों के करीब आ गया। उसके अंदाज में जरा सा भी डर खौफ नहीं था। वो इत्मीनान से चलता हुआ उस डाकू के सामने पहुंच गया, जो इन्द्रजीत पर गोली चलाने वाला था।.
 
"क्यों मार रहे हो इस बालक को?" उसकी आवाज उसके व्यक्तित्व की तरह भारी थी।

"तुम कौन हो और इस जंगल में क्या कर रहे हो?"

"हम अपने जानवरों के साथ जंगल मा फिरने आएं हैं। सब म्हारे को राजू मदारी कबे (कहे) हैं।" उस बेढब से शख्स ने अपना परिचय दिया।

"ओह! तो मदारी हो। चलो, फिर इधर जो तमाशा हो रहा है वह देख लो। तुम भी क्या याद रखोगे।"

"लो, यह भी कोई खेल हो रिया है। बन्दूक चला के मानस की जान ले ली। कहो तो हम दिखाएं तमाशा "

"तुम क्या तमाशा दिखाओगेय" एक डाकू व्यंगपूर्ण लहजे में बोला- "क्या तुम इस लड़के को हाथ लगाए बिना, छुरी, चाकू गोली चलाए, खत्म कर सकते हो?"

"हां, कर सकूं सू- ।" राजू मदारी विश्वासपूर्ण दृढ़ लहजे मे बोला "हाथ लगाए बिना इस बालक के टोटे-टोटे कर

सकूं हूँ।"

“टोटे-टोटे हाथ लगाए बिना ?" उनमें से एक दिलचस्पी दर्शाते हुए पूछा, फिर बोला- "यह कैसे मुमकिन है ?" " देख लेना अपनी आंखों से।" राजू मदारी तेजी से बोला- “आगिया (आज्ञा) हो तो फिर दिखा दे तमाशा शुरू करें खेल ।" वह अपने बन्दर के सिर पर हाथ फेरने लगा।

"वक्त क्यों जाया कर रहे हो यार।" दूसरे वाला डाकू बोला- "अपना काम निपटाओ और निकल लो।"

"इतनी जल्दी भी क्या है? इसने दावा किया है कि यह हाथ लगाए बिना इसके टोटे टोटे कर देगा। जरा हम भी तो देख लें इसका तमाशा हां, मदारी अगर नाकाम रहे तो फिर क्या होगा?"

बोलने वाले के स्वर में धमकी थी।

" फिर कै (क्या होगा, तुम्हारी दम्यूक (बन्दुक) होगी और राजू मदारी का सीना समझ गए ना ?"

"हां, समझ गए। चलो फिर हो गई बात। दिखाओ अपना जलवा।”

"अभी लो।" राजू मदारी खुश होकर बोला। उसने बन्दर का हाथ पकड़कर उसे जमीन पर उतारा।

बन्दर खामोशी से एक जगह बैठ गया मानो वह भी तमाशा देखने को उत्सुक हो रहा हो। राजू मदारी ने अपनी लाठी से एक बड़ा दायरा खींचा और उन चारो से बोला- "इस चक्कर के भीतर पांव न रखना।" "ठीक है...।" चारों ने इकरार किया।

और फिर वह बेढब सा मदारी उस दायरे के एक तरफ बैठ गया। आलती- पालतों मारकर, उसने साधुओं की तरह आसन जमाया। उसने अपनी बड़ी-बड़ी सुर्ख आंखों से उन चारी की तरफ देखा और फिर अपने लट्ठ को एक तरफ फेंक दिया। वह लाठी जमीन पर गिरते ही लहरा गई। वह लाठी मोटी रस्सी का रूप अख्तयार कर गई थी, और धीरे-धीरे शून्य में ऊपर की तरफ बुलन्द होती जा रही थी।

और फिर देखते ही देखते वह इतनी बुलन्द हो गई कि उसका ऊपर का सिरा आंखों में ओझल हो गया।

राजू मदारी के इस तमाशे ने ही उन चारों को हैरान कर दिया था। पर अभी आगे भी तो बहुत कुछ होना था।

राजू मदारी ने इशारे से कहा- "छोरे को बुलाओ...।"

"अच्छा!" पहला डाकू बोला "क्या उसे खोलकर लाना होगा....।" राजू मदारी ने इशारे में जवाब दिया "हा फुर्ती । दिखाओ।"
 
उस डाकू ने अपने एक साथी को इशारा किया कि वह इन्द्रजीत को खोलकर ले आए और खुद उसने राजू मदारी की तरफ बन्दूक तान ली कि अगर कोई गड़बड़ होती नजर आए तो इस बेढब इन्सान को गोली मार दे। हकीकतन वे अव इस मदारी से कुछ-कुछ खौफजदा हो उठे थे।

राजू मदारी ने उसे बन्दूक तानते देखा, लेकिन कोई परवाह नहीं की कि उसे निशाने पर ले लिया गया है। वह पूर्ण निश्चिन्तता के साथ पड़ता रहा। वह डाकू जब इन्द्रजीत को खोल लाया और वे राजू मदारी के खींचे दायरे के पास आ गए तो राजू मदारी ने इन्द्रजीत को धेरै के अन्दर आने ख इशारा किया। इन्द्रजीत हैरान-परेशान उस दायरे के • अन्दर आ गया।

अब राजू मदारी ने इन्द्रजीत ने अपने करीब बुलाकर कुछ समझाया और फिर उसे वापस अपनी जगह जाने को

कहा।

"बालक क्या नाम से तेरा?" राजू मदारी ने ऊंची आवाज मे पूछा।

"इन्द्रजीत...!"

"इस रस्सी पर चढ़ सकें है क्या तू?"

"हां, क्यों नहीं। बड़ी आसानी से।"

"तो फिर चढ जा...।"

"राजू मदारी। पहले वाले डाकू एकदम बोला- "एक बात का ख्याल रखना अगर तुमने कोई होशियारी की तो जान से जाओगे।" राजू मदारी ने उसकी बात सुनी-अनसुनी कर दी और वह इन्द्रजीत से बोला- “सुना नही तुमने। रस्सी पकड़ो और

ऊपर चलो।"

इन्द्रजीत को कोई दिक्कत नहीं आ रही थी। वह रस्सी पकड़े, हाथ व पैरों के जरिये ऊपर ही ऊपर चढ़ता चला गया -यहां तक कि वह नजरो से गायव हो गया।

"इन्द्रजीत!" मदारी ने पुकार- "ऊपर पहुच गया रे?"

"हां, पहुच गया। " ऊपर से आवान आई लेकिन वह दिखाई नहीं दिया।

वे चारों दम साये रस्सी के ऊपरी सिरे को देख रहे थे। जहां पहुंचकर इन्द्रजीत मायव हो नया था।

"अपनी कमीज उतारकर नीचे फेंक।" राजू मदारी ने हुक्म दिया।

और कुछ ही क्षणों बाद एक कमीज ऊपर से लहराती हुई नीचे जमीन पर आ गिरी। वह इन्द्रजीत की कमीज थी। "चल अब बनियान भी उतार...।"

यह आदेश मिलते ही बनियान मी लहराती हुई नीचे जमीन पर गिरी। यूं राजू मदारी ने एक-एक करके इन्द्रजीत के सारे कपड़े नीचे मंगवा लिए।

"इव (अब) तेरे बदन पर क्या है रे बालक?"

"कुछ नहीं...।" ऊपर से इन्द्रजीत की आवाज आई।

"ठीक हैं।" राजू मदारी निश्चन्त सा बोला और फिर वह उन चारो की तरफ देखते उनसे सम्बोधित हुआ। अब असली तमासे शुरू होते है। जरा हौसले से देखना तम्मू (तुम) भी कहोगे कि क्या चीज देखने को मिली।"

यह कहते हुए उसने अपनी धोती का पट खेलकर उसमें लिपटा हुआ चाकू और धोती फिर कसकर बांध ली। छ: इंच
 
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