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रेखा ने नाश्ता, गंगा मौसी के साथ ही किया।
और आज नाश्ते पर रेखा ने मोसी से 'रूहों' के बारे में विचार-विमर्श किया, मौसी दिलचस्पी लेते हुए बोली-
"आत्माओं के वारे में मैं कोई बात पूर्ण विश्वास से नहीं कह सकती। लेकिन प्रायः यह सुनने में आया है कि मरने के बाद मृतक की रुह घर के प्राणियों को दिखाई दी है। मेरा अपना ख्याल यह है जो लोग अकाल- आकस्मिक मौत मारे जाते हैं और जिनका मोह अपने पीछे रह जाने वालों से बना रहता है उनकी आत्मा भटकती रहती है। ऐसे लोग जो दुर्घटनावश मर जाते हैं और उनकी तीव्र कामना मौत के कारण से अधूरी रह जाती है, उनकी आत्माएं संसार से नाता बनाए रहती हैं। फिर यह भी मान्यता है कि मरने वाले, की आत्मा तेरह दिनों तक तो अपने प्रियजनों के करीब ही कहीं रहती है। पर आज तू यह चर्चा क्यों ले बैठी है?" मौसी ने शंकित भाव से पूछा था।"
"मौसी ! मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरे पापा की आत्मा भी अभी यहीं चक्कर लगा रही है।"
"यह... यह... अहसास तुम्हें कैसे हुआ? क्या वह तुम्हें सपने में नजर आए ?"
"सपने में नजर आते तो अच्छा होता। मैं उनसे बात भी कर लेती। मैंने तो उन्हें जागती आंखों से देखा है, मौसी !"
"हायं! वह कब ?" मौसी घबरा सी गई।
"अगर मैं आपको बताऊं तो डरेंगी तो नहीं?"
"नही, ऐसी बातों से मैं कभी नहीं डरती।"
तब रेखा ने रात की सारी बातें सविस्तार ही गंगा मौसी को सुना दीं, लेकिन उसने उतना ही बताया जितना गंगा मोसी को बताया जा सकता था और यह सब सुनकर गंगा मौसी बोली-
"इसका मतलब है कि हमारी मुहब्बत और यह संसारिक मोह उन्हें भटका रहा है। किसी आत्मा का यूं भटकना
अच्छा नहीं होता, बेटी!"
"मौसी !" रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा- "क्या कोई ऐसी युक्ति नही है कि पापा को यूं भटकने से और दुनिया में आने से रोका जा सके।"
"मैं ऐसी कोई युक्ति नहीं जानती। यह सब तो कोई 'आमिल' ही बता सकता है।"
"काश! दादा हरि ओम जिन्दा होते।" रेखा बोली- "वही इस बारे में हमारे मददगार साबित हो सकते थे। हमें रास्ता दिखा सकते थे।"
"देखो, जरा माया को आवाज देकर पूछो कि अमर है या नहीं। वैसे वह होगा। मुझसे मिले बिना वह कभी ऑफिस नहीं जाता।"
"माया...!" रेखा ने आवाज दी।
"जी बीबी जी," माया दोड़ी हुई आई।
"भाई क्या कर रहे हैं?"
"नहा रहे है जी वह। मैं उनका नाश्ता तैयार कर रही हूँ..।"
"वह नहाकर निकलें तो कहना बड़ी बीबी बुला रही हैं।" गंगा, मौसी ने आदेश दिया।
और फिर माया ने अमर को बाथरूम से निकलता देखकर ही गंगा मौसी का हुक्म सुना दिया था और अमर भी आज्ञाकारी बालक की तरह तोलिये स सिर पोंछता हुआ मौसी के सामने आ खड़ा हुआ।
"जी, मौसी!"
और आज नाश्ते पर रेखा ने मोसी से 'रूहों' के बारे में विचार-विमर्श किया, मौसी दिलचस्पी लेते हुए बोली-
"आत्माओं के वारे में मैं कोई बात पूर्ण विश्वास से नहीं कह सकती। लेकिन प्रायः यह सुनने में आया है कि मरने के बाद मृतक की रुह घर के प्राणियों को दिखाई दी है। मेरा अपना ख्याल यह है जो लोग अकाल- आकस्मिक मौत मारे जाते हैं और जिनका मोह अपने पीछे रह जाने वालों से बना रहता है उनकी आत्मा भटकती रहती है। ऐसे लोग जो दुर्घटनावश मर जाते हैं और उनकी तीव्र कामना मौत के कारण से अधूरी रह जाती है, उनकी आत्माएं संसार से नाता बनाए रहती हैं। फिर यह भी मान्यता है कि मरने वाले, की आत्मा तेरह दिनों तक तो अपने प्रियजनों के करीब ही कहीं रहती है। पर आज तू यह चर्चा क्यों ले बैठी है?" मौसी ने शंकित भाव से पूछा था।"
"मौसी ! मुझे ऐसा महसूस होता है कि मेरे पापा की आत्मा भी अभी यहीं चक्कर लगा रही है।"
"यह... यह... अहसास तुम्हें कैसे हुआ? क्या वह तुम्हें सपने में नजर आए ?"
"सपने में नजर आते तो अच्छा होता। मैं उनसे बात भी कर लेती। मैंने तो उन्हें जागती आंखों से देखा है, मौसी !"
"हायं! वह कब ?" मौसी घबरा सी गई।
"अगर मैं आपको बताऊं तो डरेंगी तो नहीं?"
"नही, ऐसी बातों से मैं कभी नहीं डरती।"
तब रेखा ने रात की सारी बातें सविस्तार ही गंगा मौसी को सुना दीं, लेकिन उसने उतना ही बताया जितना गंगा मोसी को बताया जा सकता था और यह सब सुनकर गंगा मौसी बोली-
"इसका मतलब है कि हमारी मुहब्बत और यह संसारिक मोह उन्हें भटका रहा है। किसी आत्मा का यूं भटकना
अच्छा नहीं होता, बेटी!"
"मौसी !" रेखा ने कुछ सोचते हुए पूछा- "क्या कोई ऐसी युक्ति नही है कि पापा को यूं भटकने से और दुनिया में आने से रोका जा सके।"
"मैं ऐसी कोई युक्ति नहीं जानती। यह सब तो कोई 'आमिल' ही बता सकता है।"
"काश! दादा हरि ओम जिन्दा होते।" रेखा बोली- "वही इस बारे में हमारे मददगार साबित हो सकते थे। हमें रास्ता दिखा सकते थे।"
"देखो, जरा माया को आवाज देकर पूछो कि अमर है या नहीं। वैसे वह होगा। मुझसे मिले बिना वह कभी ऑफिस नहीं जाता।"
"माया...!" रेखा ने आवाज दी।
"जी बीबी जी," माया दोड़ी हुई आई।
"भाई क्या कर रहे हैं?"
"नहा रहे है जी वह। मैं उनका नाश्ता तैयार कर रही हूँ..।"
"वह नहाकर निकलें तो कहना बड़ी बीबी बुला रही हैं।" गंगा, मौसी ने आदेश दिया।
और फिर माया ने अमर को बाथरूम से निकलता देखकर ही गंगा मौसी का हुक्म सुना दिया था और अमर भी आज्ञाकारी बालक की तरह तोलिये स सिर पोंछता हुआ मौसी के सामने आ खड़ा हुआ।
"जी, मौसी!"