• Hello Friends You can Register on the Forum and by posting you can earn money too.

स्वाहा

तब इन्द्रजीत ने अपनी बंद मुट्ठी उसके सामने की और मुट्ठी खोल दी, बोला- "यह तो नहीं...?"

वह अंगूठी इन्द्रजीत की हथेली पर थी। नयना चहकी, "यही तो है। यह पास कैसे आ गई। जादू!" वह जैसे सब समझ गई थी..." आह तुम कितने बड़े जादूगर हो...?"

"यह अंगूठी अगूठी तुमने अब तक पहनी क्यों नहीं...?" इन्द्रजीत ने किसी सोच के वशीभूत पूछा था।

"जब तुमने मुझे अगूंठी लौटाई थी तो तभी मेरे दिल में यह ख्वाहिश मचली थी कि काश ! मेरे हाथ पर रखने की बजाय तुम यह अंगूठी मुझे पहना देते।" नयना ने निसंकोच कहा था।

"उस वक्त मेरे दिल में भी एक खाहिश जागी थी।" इन्द्रजीत भी कहे बिना नहीं रह सका।

"वह क्या...?" नयना ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा था।

"मैंने सोचा था कि काश ! यह अंगूठी में हमेशा के लिए गायब कर सकता। "

"ऐसा हो सकता है।" नयना भावावेश में बोली- "यह अगूठी हमेशा के लिए गायब खै सकती है। "

"वह कैसे ?" इन्द्रजीत की बेताबी भी देखने अली थी।

"वह ऐसे... देखो यूं... यह कहकर नयना ने अंगूठी नहर के बहते पानी में उछाल दी जो फौरन डुब गई।

"यह... यह तुमने क्या किया?” ईन्द्रजीत परेशान हो उठा।

"कुछ नहीं...। मैं इस अंगूठी की कैद से आजाद हो गई हूँ।"

इन्द्रजीत उसका आशय समझ रहा था, वह कुछके क्षण उसकी आंखों में झांकता रहा, फिर पूछा उसने, "कहीं तुमने जल्दबाजी से काम तो नहीं लिया...?"

"मुझे नहीं मालूम।" नयना बड़ी मासूमियत से बोली-"जो हुआ है, बेअख्तयार बरबस ही हुआ है। यह दिल का मामल है दिल ही जाने...।"

" नयना जी ! यह दिल भी कितनी अजीब चीज है। कौन जाने, कब, कहा, किस पर आ जाए।"

"हाय...! तुम्हारे मेरा नाम लिया। जस फिर से लेना।" नयना का स्वर हसरतों भरा था।

"नयना...! इन्द्रजीत ने भी जैसे मंत्र-मुग्ध ही नाम दोहराया था।

" इन्द्रजीत .... मेरे इन्द्रजीत ...!" नयना ने जवाब मे उसका नाम इस कदर चाहत से लिया कि इन्द्रजीत को पहली बार अपने माम पर गर्व हुआ।

"अच्छा नयना...। यह बताओ इस वक्त गुम क्कं से आ रही ही?" कुछ सोचकर पूछा था, इन्द्रजीत ने ।

"बहराम नगर से और दिल्ली जा रही हूँ। तीन दिन बाद बापस आऊंगी। इसी वक्त यही इसी पुल पर मेरा इन्तजाम करना। मेरा इंतजार करोगे, इन्द्र !" नयना ने बेकरारी से पूछा ।

"हा, क्यों नहीं। मैं तुम्हारा इंतजार जरूर करूंगा।" दिल्ली अ नाम सुनकर इन्द्रजीत की मनोस्थिति अजीब ही गई।

उसे यूं लगा जैसे किसी ने अचानक धूल से सने आईनें को झाड़कर उसके सामने कर दिया हो ।

दिल... जहां वह पैदा हुआ, जहा उसका घर था, जहा उसके पापा थे। उसकी प्यारी सी मां थी। यह तो उसकी जिन्दगी के सारे ही जख्म हरे हो गए थे। उसके दिल में टीस सी उठने लगी थी ।

“क्या हुआ इन्द्र ? यह अचानक तुम्हें क्या हो गया है?" इन्द्रजीत की हालत बदलते देखकर नयना ने पूछा।

"कुछ नहीं। जब तुम दिल्ली से वापस आओगी तो मैं सब कुछ बताऊंगा...।" अभी वे बातें ही कर रहे थे कि उन्हें
 
अपनी तरफ आता दिखाई दिया।

""वह आ रहा है। अब तुम जाओ। मै तुम्हारा इंतजार करूंगा।" इन्द्रजीत बोला।

राजकुमारी नयना तीन दिन के बाद भुलाकात का वायदा करके चली गई।

तीन दिन बाद जब वह तोटी और नहर के पुल पर पहुंची तो इन्द्रजीत उसका प्रतीक्षक था। और इस मिलन पर इन्द्रजीत ने उसे अपने बारे में सब कुछ बता दिया |

नयना को जब यह मालूम हुआ कि इन्द्रजीत, राजू मदारी का बेटा नहीं, बल्कि वह दिल्ली की एक प्रसिद्ध हस्ती कृष्णकांत की औलाद है और सावनपुर के रमाकांत का भतीजा है तो उसकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा । वह चकित थी इतने बड़े घराने और बाप का बेटा अपना घर-बार छोड़कर इन बीहड़ों में क्यों और किस तरह जिन्दगी गुजार रहा है।

वास्तव में नयना जादू-टोने के प्रभाव व मंत्र शक्ति से अनजान थी। इसलिए आश्चर्यचकित थी। ये अविश्वसनीय क्रिया-कलाप जादू तो अच्छे भले आदमी की मत मार देता है। इन्द्रजीत तो उस वक्त बच्चा था। कथन है कि जिस तरह लोहे को लोहा काटता है, जहर को जहर मारता है उसकी तरह जादू-टोने का इलाज भी जादू से ही जा सकता था। पर नयना का जादू तांत्रिक राजू मदारी के जादू से क्या टकरा सकता था?

राजकुमारी नयना को अपने रूप-यौवन के जादू पर बड़ा भरोसा था। उसे पूरा विश्वास था कि वह शीघ्र ही अपना जादू वह इन्द्रजीत को अपना कैदी बना लेगी। इन्द्रजीत स्वयं भी और दिल से उसका कैदी बनने को तैयार था।

वक्त बीतता रहा।

नयना और इन्द्रजीत के बीच इन मुलाकातों को तीन माह बीत गए। तीन माह किसी मामले को सुलझाने के लिए बहुत होते हैं। मामला धीरे-धीरे सुलझता जा रहा था। नयना की मुहब्बत की शक्ति, उसका आकर्षण, उसका जादू दिन-प्रतिदिन इन्द्रजीत को अपनी गिरफ्त में लिये जाता था।

नयना की चाहत में वह सब कुछ भूलता जा रहा था। राजू मदारी ने अपनी तात्रिक शक्तियों से इन्द्रजीत के प्रियजनों को उसके दिल से निकाल दिया था और इन्द्रजीत इस बस्ती का होकर रह गया था। वह अकेला कहीं निकल भी जाता तो मंत्र- पाश की वजह से कहीं दूर नहीं जा सकता था। ऐसी कोई सोच दिमाग में आते ही उसका दिल यूं घबराने लगता कि मन चाहता कि वह शीघ्र अति शीघ्र बस्ती वापस पहुंच जाए...राजू मदारी और कटारी के पास उनके घर में और फिर उसे बस्ती में उनके पास ही पहुंचकर सुकून मिलता था।

पर अब नयना का जादू भी अपना प्रभाव दिखा रहा था। नयना के प्यार में खोकर इन्द्रजीत अपने आप को भूलता जा रहा था।

इस बीच नयना भी सच्चाई से अवगत हो गई थी जान गई थी कि वह भी इन्द्रजीत को राजू मदारी के जादू ने इस तरह जकड़ा हुआ है कि वह अपने मां-बाप को भी भूल चुका है। उनकी मुहब्बत उसके दिल से निकल गई है। यहां तक कि अपने चाचा रमाकात से इंतकाम लेने की उग्र भावना भी उसके दिल में न रही थी। बस केवल राजू मदारी ही याद रह गया कि वही अब उसका सब कुछ है।

अब नयना जब भी उससे मिलती, वह उससे उसके शहर की बात करती, उसके मां-बाप की चर्चा करती और उसके

चाचा रमाकांत का जिक्र करती, जिसने उसके कत्न की साजिश की और उनकी जमीन जायदाद पर कब्जा कर

लिया था। इन्द्रजीत इन बालों को भूला नहीं था। लेकिन ये सब बातें अपना प्रभाच खत्म कर चुकी थीं। उसे अपने घर

की- अपने घरवालों की, किसी की कोई परवाह न रही थी। लेकिन नयना ने उसके दिल और उसकी भावनाओं के

आईने से गर्द साफ करनी शुरू की थी, इन्द्रजीत को अपना तेहरा धुंधला-धुथला नजर आने लगा था।

लेकिन यह धुंधलाहट भी अस्थाई और क्षणिक थी। इन बातों के संदर्भ में वह जब तक नयना के करीब उसके सामने रहता उसकी हां में हां मिलाता पर फिर उससे जैसे ही दूर होता और राज मदारी का चेहरा देखता तो फिर सब कुछ भूल जाता और राजू मदारी का जादू उसके सिर पर चढ़कर बालने लगता।

वो जो सिर चढ़कर बोले। राजू मदारी जब उसकी आंखों में आंखें डालकर यह पूछ लेता कि कैसा है रे, तु
 
स्वाहा इन्द्रजीत? तने कोई कष्ट तो ना है? तो इन्द्रजीत के जहन में उठने वाले यादों के भंवर झाग की तरह बैठ जाते। राजू मदारी का जादू कोई जादू नहीं था। रात के शहशाह, उल्लू के पंजे से बनाया हुआ शर्बत उसने इन्द्रजीत को पिलाया था और उसके इस जादू-टोने का तोड़ अच्छे-अच्छे के पास नहीं था।

नयना उसे याद दिला दिलाकर समझा-समझाकर थक गई थी। लेकिन इन्द्रजीत राजू मदारी की दिमागी गुलामी से मुक्त नहीं हो पा रहा था। इन्द्रजीत उसके सामने होता तो उसकी हां में हां मिलाता रहता। दिल्ली अपने मां-बाप के पास जाने का इरादा बांध लेता। लेकिन बस्ती में पहुंचते ही वह अपने बाप कृष्णकांत को भूलकर राजू मदारी का बेटा बन जाता।

इस तरह से वह इस पहुंचे हुए तांत्रिक का कैदी था। लेकिन ऐसा कैदी था जिसके पांवों में पड़ी बेड़ी किसी को नजर न आती थी। स्थिति यूं बनी कि राजकुमारी नयना इस सिलसिले में बेहद संजीदा हो गइ थी। वह इन्द्रजीत पर मर-मिटी थी और उसकी खातिर सबको प्रिंटा देना चाहती थी।

तब नयना ने अपने हमराज ड्राईवर रघुबीर सिंह से बात की। उसने एक दिन बहराम नगर जाते हुए रास्ते में उससे पूछा- "रघुवीर सिंह क्या तुम्हारी नजर में कोई ऐसा आदमी है जो जादू-टोन का तोड़ जानती हो? कोई आमिल... कोई तांत्रिक वांत्रिक?"

प्रौढ़ रघुबीर सिंह ने सोचपूर्ण खामोशी के बाद र्हा जवाब दिया था-"हां, एक तो ऐसा बंदा राजकुमारी जी पर उससे

बात करनी होगी। किस पर हुआ है जादू-टोना- अब यह बता दें?"

"वह अपन जादूगर इन्द्रजीत है ना, उन पर। "

इन्द्रजीत का नाम सुनकर ड्राईवर हंस ही तो दिया था। "आप भी क्या बात कर रही हैं, राजकुमारी जी...?"

"क्यों...? ऐसा मैंने क्या कह...?".

"आप भी कमाल करती हैं राजकुमारी जी इन्द्रजीत जी तो खुद इतने बड़े जादूगर हैं कि उन पर भला किसका जादू

चलेगा?"

"बस, रघुवीर सिंह। यही तो सारी समस्या है। बेशक वो बड़े जादूगर हैं लेकिन उन पर उनसे भी बड़े एक जादूगर ने जादू कर रखा है। उसने इन्द्रजीत को कैद कर रखा है। तुम्हें याद नहीं जब वह राक दिन हमारे साथ बलराम नगर आ रहे थे तो रास्ते में उनकी तबियत कैसी खराब हो गई थी। वह बार-बार यही कह रहे थे कि मुझे वापस मेरी बस्ती में ले चलो... मेरा दिल कोई मुट्ठी में जकड़ रहा है। फिर हमें मजबूरन उन्हें उनकी बस्ती में छोड़कर आना पड़ा था।

और फिर अपनी बस्ती के करीब पहुचकर वह बिल्कुल भले-चंगे हो गये थे। जैसे कुछ हुआ ही न था। याद आया ना तुम्हें?" नयना ने उसे याद दिलाया।

"हा! तो उस दिन कुछ ऐसी ही बात थी?" ड्राईवर सहमकर बोला- "लेकिन किसने कैद कर रखा है?"

"राजू मदारी ने। " नयना ने बताया ।

"तो क्या... क्या इन्द्रजीत उसके बेटे नहीं हैं?" रघुवीर सिंह को हैरत ने आ घेरा ।

"नहीं। वह तो एक बहुत अमीर बाप के बेटे हैं। बस, किसी तरह राजू मदारी के चुंगल में फंस गए हैं।"

"ओह! फिर तो उनके लिए कुछ करना पड़ेगा। अजीब किस्सा है, मैं कल ही योगी दयाल से बात करता हूँ।"

"लेकिन रघुवीर सिंह वो तो एक सपेरा है। वह जादू-टोने के मामले में क्या कर सकेगा।" नयना ने शंका व्यक्त की ।

"दयाल कोई ऐसा-वैसा सपेरा नहीं है।" रघुवीर ने जवाब दिया- "ये सपेरे भी जादू-टोना जानी हैं। ये सब लोग एक ही थाली के चट्टे-बट्टे हैं राजकुमारी जी शैतान के चेले।" वह हंसा और फिर आगे बोला- "अगर उसके बस की बात न हुई तो फिर किसी तंत्र-मंत्र जानने वाले तांत्रिक को हूँढेंगे।"

"ठीक है, फिर शाम को आकर मुझे बताना और देखो एक बात का ख्याल रखना - राजा साहब को इस बात का पता न चले...।"

स्वा

"आप बेफिक्र रहें, राजकुमारी जी।" हाईवर रघुवीर ने विश्वास दिलाया।
 
ड्राईवर रघुवीर बड़े काम और बड़े विश्वास का आदमी था। उसी की हिम्मत थी कि उसने जान हथेली पर रखकर नयना को इन्द्रजीत से मिला दिया था। यह भी वह अच्छी तरह जानता था कि जिस दिन भी राजा साहब को यह ! मालूम हो गया कि उनकी बेटी को उसने मदारियों की बस्ती पहुंचा दिया है तो वह उसकी जिन्दगी का आखिरी दिन होगा।

राजकुमारी नयना ने जब पहली बार इन्द्रजीत से मुलाकात की ख्याहिश की थी तो रघुवीर सिंह ने उसे दबे शब्दों में समझाने की कोशिश की थी, लेकिन नयना तो इन्द्रजीत के लिए पागल हो रही थी। वह भला कहां मानने वाली थी। नयना ने बड़े दृढ़ शब्दों में उससे कहा था कि अगर वो उसके साथ न गया तो वह अकेली ही उससे मिलने चली जाएगी और फिर लोटकर भी नहीं आएगी। नयना की इस धमकी पर ही वो उसका साथ देने को मजबूर हो गया था क्योंकि वह जानता था कि अगर ऐसा हो गया तो राजा साहब जिन्दा ही मर जायेंगे। नयना उनकी इकलौती संतान थी। और जिस तरह किसी देव की जान किसी तोते में होती है वैसे ही राजा साहब की जान नयना में थी।

ड्राईवर सुधीर ने दूसरे ही दिन सवेरे दयाल से मुलाकात की। वह रघुवीर को अच्छी तरह जानता था कि वह राजा साहब के बुलावे पर कई बार हवेली आ चुका था और हर बार रघुवीर ही उसे गाड़ी में लेकर आता और फिर छोड़कर आता था। दरअसल, मदारियों के खेल-तमाशों के साथ ही राजा साहब को सांप नेवले की लड़ाई देखने का भी बहुत शौक था।

उस दिन सुबह ही सुबह जब योगी दयाल ने को अपने दरवाजे पर देखा तो उसकी बांछे खिल गई। उसने समझा था

'कि राजा साहब का बुलावा आया है।

उसने रघुवीर को अपने पलंग पर बिठाते हुए पूछा- "सब खैरियत है ना रघुवीर बाबा ?”

"प्रभु कृपा है सब, दयाल! एक काम है तुमसे।" रघुवीर ने सीधे मतलब बात की थी।

" आज्ञा करो, बाबा । "

"तुम यह जादू-टोने का तोड़ भी जानते हो या सिर्फ सपेरे ही हो...?"

" अरे बाबा! सपेरे तो हम खानदानी हैं पर काला इल्म भी जानते हैं। यह तंत्र-मंत्र हमने एक बड़े और पहुंचे हुए संन्यासी से सीखा है। आज्ञा दो क्या करना है?"

"टोने का तोड़ करना है दयाल ! और कुछ नहीं करना है। जो बोलोगे वह मिल जाएगा। खर्च की बिल्कुल फिक्र न

करना।" "ठीक है बाबा । किस पर हुआ है टोना ?"

"क्या उसे बन्दे को यहां लाना होगा?" रघुवीर ने पूछा।

"हां, बाबा ।"

" पर योगी दयाल वह यहां नहीं आ सकते...।"

"वह क्यों बाबा?" योगी दयाल की आंखें सिकुड़ गई।

"उसे तंत्र-मंत्र के जरिये बांध दिया गया है, वह चाहने और कोशिश के बावजूद भी अपने इलाके से नहीं निकल सकता। निकलता है तो उसका दिल घबराने लगता है। तुरन्त तबियत खराब हो जाती है।" रघुवीर ने उसे बताया।

" फिर तो कोई जबरदस्त बंदा है उसके पीछे कोई पहुंचा हुआ तांत्रिक। "

"बस, डर गये योगी महाराज।" रघुवीर ने उसे 'महाराज' का सम्बोधन दिया और चैलेप्न भी।

"योगी दयाल ने डरना नहीं सीखा बाबा ।" योगी दयाल अपनी पर आ गया "हम चलेंगे तुम्हारे साथ पर जाना कहां होगा...?"
 
"यहां से तीन-चार घन्टे का सफर है। वह मदारियों की बस्ती कहलाती है।"

"ठीक है हम चलेंगे। वो मदारी हम योगी खूब मुकाबला होगा।"

ड्राईवर रघुवीर ने योगी दयाल से अपनी मुलाकत की बाबत आकर राजकुमारी नयना को बताया तो नयना ने उसे अगले ही दिन सवेरे दयाल के साथ मदारियों की बस्ती में जाने की हिदायत कर दी। वह अब यह मामला शीघ्र, अति शीघ्र निपटा देना चाहती थी।

रघुवीर ने उसके आदेश का पालन किया वह योगी दयाल के साथ बस्ती में पहुंचा और दयाल को नहर के पुल के

निकट बैठाकर खुद बस्ती में इन्द्रजीत को बुलाने चला गया।

इन्द्रजीत घर पर ही था।

दरवाजे पर ड्राईवर रघुवीर को देखकर कटारी का माथा ठनका। रघुवीर दो-तीन माह अन्दर कई चक्कर बस्ती के लगा चुका था। आज भी जब इन्द्रजीत उसके साथ जाने के लिए तैयार हुआ तो कटारी ने उसे टोका-

" कहा जा रहे हो?"

"राजा साहब का ड्राईवर आया है वो शायद राजा साहब का कोई सन्देशा लाया है। उसके साथ जा रहा हूँ।" इन्द्रजीत ने लापरवाही से जवाब दिया।

"यह ड्राईवर कुछ ज्यादा ही आने लगा है।" कटरी ने तुनककर कहा।

"यह असल में मेरा दोस्त बन गया है। दिल्ली आते-जाते मुझसे मिलने चला आता है।" इन्द्रजीत ने बात बनाई। "अच्छा, पर जल्दी आ जाना, मैं कहीं राह ही न देखती रहूँ...।”

"तुझे मुझसे कोई काम है, कटारी ?”

"मुझे तुमसे कोई काम नहीं है।" कटारी ने बड़ी अदा से हाथ जोड़ते हुए कहा- "बस, जल्दी आ जाना। "

"ठीक है जो हुक्म ! " इन्द्रजीत ने भी शोखी से कहा और बाहर निकल आया ।

इन्द्रजीत और रघुवीर चुपचाप चलते बस्ती से बाहर आ गए। बस्ती से निकलते ही रघुवीर ने उसे बताया- "मैं अपने साथ एक तांत्रिक को लेकर आया हू।"

" तांत्रिक को..?" इन्द्रजीत कुछ समझा नहीं था "वह क्यों आया है?"

"उसे जी ने भेजा है और कहा है कि आपको इस योगी तात्रिक की हिरायत पर अमल करना होगा।"

"कहां है वो योगी ?"

"मैं उसे पुल से जरा आगे एक पेड़ के नीचे बैठाकर आया हूँ।"

और फिर जब वे पुल के उस पार ढ़लान पर उतरकर पहुंचे तो योगी दयाल उनका प्रतीक्षक था। यह एक ऐसी जगह थी जहा किसी की निगाह मुश्किल ही से पड़ सकती थी। सपेरे दयाल ने इन्द्रजीत को बड़े गौर से देखा और फिर उसे अपने सामने बैठने का इशारा किया। इन्द्रजीत बैठ गया तो दयाल ने उसकी आंखों में आंखें डाल दीं। कुछ देर तक उसने कोई मंत्र पढ़ा, फिर बोला-

" अपने मन में किसी पक्षी का नाम सोच लो।"

"सोच लिया...।" इन्द्रजीत ने फौरन कहा।

"अपनी आंखें बन्द कर लो।"
 
" कर ली।" इन्द्रजीत अपनी आंखें बन्द करते बोला ।

योगी दयाल ने अपनी एक हथेली उसकी बंद आंखों के सामने की और बोला- आंखें मत खोलना। आंखें खोले बिना ही मेरी बात का जवाब देना...। क्या तुम्हें मेरा हाथ नजर आ रहा है?"

"नहीं।" इन्द्रजीत ने जवाब दिया।

योगी दयाल ने फिर कोई मंत्र पढ़ा- फिर पूछा- "अब कुछ नजर आ रहा है?"

"जो परिन्दा मैंने सोचा था वह सामने बैठा नजर आ रहा है।" इन्द्रजीत का जवाब था।

"ठीक... अभी आंखें मत खोलना। अभी तुम्हें मेरा हाथ भी नजर आएगा।" कहते हुए दयाल ने फिर एक मंत्र पड़ा, और कहा- " अब देखो...।"

वह परिन्दा गायब हो गया। अब अन्धेरा है अन्धेरा चुभने लगा और अब मैं तुम्हारा हाथ देख सकता हूँ।"

" शुक्र है, मौला । " दयाल ने एक गहरी सांस ली. "अब मेरी हथेली में गौर से देखो।"

इन्द्रजीत की आंखें बंद थी। बंद आंखों से ही वह देयाल की हथेली को गौर से देख रहा था।

पहले तो हथेली में हाथ की लकीरों के सिवाय दिखाई नहीं दिया लेकिन फिर फौरन ही वे लकीरें धुंधला गई और एक स्पष्ट तस्वीर सामने आ गई।

यह एक जीते-जागते सांप की तस्वीर थी। वह कुण्डली मारे और फन फैलाये झूम रहा था।

"कुछ नजर आया, नौजवान ?" योगी दयाल ने पूछा।

"एक सांप नजर आ रहा है जो फन फैलाये लहरा रहा है।" इन्द्रजीत ने जो देखा वह बताया।"

" किस रंग का सांप है?" योगी दयाल ने पूछा।

"एकदम कोला है और चमकीला...।" इन्द्रजीत सम्मोहित सा बोला।

" इसके फन को गौर से देखो...।"

"ठीक है। देख रहा हूँ।"

"क्या इसके फन पर किसी किस्म का निशान है?"

"ऐ... हां... एक दायरा-सा है।"

"गौर से देखो, यह दायरा क्या किसी पक्षी की आंख जैसा है?"

"हां, है तो।"

" बिल्कुल उसी पक्षी की आंख जैसा जो तुमने सोचा था?"

"हा बिल्कुल । "

"क्या इस परिन्दे का नाम उल्लू है ?"

"हां योगी जी।"

"क्या तुम्हें वह सांप अब भी नजर आ रहा है?"
 
"नहीं।"

"मेरा हाथ दिखाई दे रहा है?"

"वह भी नहीं।"

"ठीक है अब तुम अपनी आंखें खोल लो...।"

इन्द्रजीत ने अपनी आंखें खोलीं तो उसे कुछ देर तक कुछ नजर न आया। थोड़ी देर तक वह आंखे खोलता और बन्द

करता रहा। तब जाकर उसकी आंखों की रोशनी बहाल हुई।

"जाओ नौजवान ! अब तुम जाओ ।" योगी दयाल ने उससे कहा।

इन्द्रजीत फौरन खड़ा हो गया। वह खड़ा हुआ तो उसे चक्कर से आ गये। उसने फौरन ड्राईदर रघुवीर का हाथ पकड़ लिया।

"क्या हुआ?" रघुवीर ने चिन्तित स्वर में पूछा।

"कुछ नहीं ऐसे ही सिर घूम गया था।" इनन्द्रजीत ने मुस्कराते हुए कहा।

"अच्छा, योगी महाराज...!" रघुवीर दयाल से बोला- "आप यहीं बैठें मैं इन्हें बस्ती तक छोड़कर आता हूँ।"

"ठीक है, जाओ। पर जल्दी आना। हमें वापस भी जाना है।" योगी दयाल बोला। वे दोनों जाने लगे तो योगी दयाल को जैसे अचानक कुछ याद आया उसने पुकारा, सुनो, बाबा !

"हां क्या योगी महाराज?" रघुवीर ने पलटकर पूछा।

"इससे पूछो यह यहां से निकलना भी चाहता है या नहीं....?"

"क्यों इन्द्रजीत, साहब! क्या इच्छा है आपकी?"

“हा, योगी जी ! मैं यहां से भाग जाना चाहता हूँ। फरार हो जाना चाहता हूँ।" इन्द्रजीत ने अपने मन की कही ।

" रघुवीर ने बताया था कि और राजू मदारी अपने गले में कोई चीज लटकाये रहता है। किसी परिन्दे का पंजा वंजा?" योगी दयाल ने सवालिया अंदाज में पूछा।

"हां योगी जी ।" इन्द्रजीत ने जैसे पुष्टि की।

"उसके गले में उल्लू का पंजा होतो है।" " और क्या तुम वह पंजा उसके गले से उतार सकते हो?" योगी दयाल ने पूछा।

इन्द्रजीत ने सोचपूर्ण स्वर में जवाब दिया- "काम है तो मुश्किल फिर भी मैं कोशिश करूंगा....।"

"शाबाश अगर तुमने उसके गले से पंजा काट लिया तो मेरा काम आधा रह जाएगा। उसकी शक्ति आधी रह जाएगी। मुझे उसे पछाड़ने में आसानी रहेगी।" योगी बोला ।

"देखो, में करता हूँ कोशिश।" इन्द्रजीत ने जवाब बइया - " आओ, रघुवीर बाबा । "

फिर वे दोनों साथ-साथ चलते पुल पर आए। रास्ते में रघुवीर ने इन्द्रजीत को बताया कि राजकुमारी नयना अगले दिन ही दिल्ली जाते वक्त उससे मिलने आएंगी। उसने कहा-

"तुम कल नहर के पुल पर हमारा इंतजार करना । "

"किस वक्त...?" इन्द्रजीत ने पूछा। नयना से मिलने की इंतजार उसे भी तो बेचैनी-सी रहती थी।
 
"शाम तो हो ही जाएगी।"

"ठीक है। मैं पुल पर इंतजार करता मिलूंगा।"

ईन्द्रजीत को बस्ती के करीब छोड़ ड्राईवर रघुवीर ने आकर योगी दयाल को गाड़ी में बैठाया और उसे भी उसके डेरे पर छोड़ा वह जब राजा साहब की हेवली पर पहुंचा तो राजकुमानी नयना को अपना प्रतीक्षक पाया।

रघुवीर ने नयना को इन्द्रजीत और योगी दयाल की मुलाकात और वहां जो कुछ भी हुआ था, सब सविस्तार कह सुनाया।

राजकुमारी ने पूर्ण एकाग्रता के साथ सब सुना और फिर पूछा- "अब तुम्हारे इस योगी महाराज का क्या प्रोग्राम है?"

"प्रोग्राम क्या राजकुमारी जी...।"

"इंद्रजीत को जादू के प्रभाव से मुक्त कराने का कैसा प्रोग्राम है...?"

"वह बता रहा था कि इन्द्रजीत जिस ताकत के कब्जे में है उसकी तोड़ के लिए सख्त मेहनत करनी होगी। उसे कई रातें जंगल में रहकर जाप करना होगा। उसके बाद सांप अपना काम दिखाएगा। यह सांप वही होगा, जो इन्द्रजीत जी को, योगी के हाथ में नजर आया था। योगी दयाल के अमल के बाद वह जंगल मे से प्रकट होगा और योगी उसे पकड़कर पिटारी में बंद करेगा, और उसे लेकर वह राजू मदारी के धर की तरफ रवाना हो जाएगा। वह सांप वहां क्या करेगा, यह योगी ने नहीं बताया। बस इतना ही कहा है कि उसके बाद इन्द्रजीत जी आजाद हो जाएंगे।"

"भगवान करे, ऐसा ही हो।" नयना ने आंखें मूंद, हाथ जोड़ दुआ मांगी, फिर पूछा- "कितनी रकम मांगता है? "

"वो कहता है कि जो मिल जाएगा लें लेगा...।"

"तुमने उसे यह तो नहीं बताया कि यह काम कौन करवाना चाहता है ?"

"नही! मैं भला आपका नाम लूंगा क्या?" रघुवीर बोला "वैसे योगी महाराज को भी इससे गर्ज नही है कि कौन है जो इन्द्रजीत को इस जादुई कैद से मुक्ति दिलाना चाहता है, उसे तो बस पैसे से मतलब है।"

"ठीक है, काम हो जाये, हम भी उसे मायूस न करेंगे। और अगर चाहो तो तुम कुछ रकम उसे पहले ही दे आओ।"

"हां, राजकुमारी जी। कुछ रकम पेशगी दे दी जाए तो अच्छा है। उसकी दिलचस्पी बढ़ जाएगी।" "ठीक है।" नयना ने अपना पर्स खोला और कुछ नोट निकालकर रघुवीर की तरफ बढ़ा दिये।

ये पाच-पाच सौ के दस नोट थे।

ड्राईवर रघुवीर सिंह ने राशि योगी दयाल तक पहुंचा दी। पांच हजार रुपये देखकर योगी दयाल के चेहरे पर रंग आ गया और उसके साथ ही उसे जब रघुवीर ने यह बताया कि काम हो जाने पर उसे और रुपया भी मिलेगा तो उसकी खुशी की कोई सीमा न रही।

वह बहुत देर तक रघुवीर से उस जादू के तोड़ के बारे में बातें करता रहा।
 
और फिर...!

राजकुमारी नयना अपने वायदे के अनुसार अगले दिन शाम को पुल पर पहुच गई। इन्द्रजीत वहां पहले से ही मौजूद था। दोनों पुल के दूसरे किनारे पर पहुंचकर ढ़लान पर उतर गए और पेड़ों में गायब हो गये।

ड्राईवर रघुवीर पुल पर खड़ा होकर बहते पानी में डूबते सूरज का नजारा करने लगा।

अभी शाम गहराई नहीं थी, लेकिन पेड़ों में गहरा अन्धेरा फैल चुका था। इतना कि सूरतें भी ठीक से दिखाई नहीं दे रही थीं।

एकान्त पाते ही नयना ने इन्द्रजीत का हाथ अपने हाथ में लिया और जज्वाती स्वर में बोली- "कैसे हो इन्द्र ?"

"मैं ठीक। "

"मैंने तुम्हारी मुक्ति का प्रबन्ध कर दिया है। वह योगी दयाल भी इन तात्रिकों आलिमों की बिरादरी का है। वो चार दिन बाद इधर आएगा। यहां जंगल में रहेगा। अमल करेगा और फिर अमावस्या की रात तुम्हें उस मंत्र पाश से मुक्ति मिल जाएगी जिसने तुम्हें विवश कर रखा है इन्द्र, सोचो वह सुबह कितनी हसीन होगी जब तुम आज की तरह बेबस न रहोगे और कहीं भी जाने के लिए आजाद होगे।"

"मैं तुम्हारे इस अहसान को कभी नहीं भूलूंगा।"

"मुझे भूल जाओगे।" नयना ने हंसकर कहा।

"यह तुमने क्या कह दिया ?" इन्द्र को सुनकर पीड़ा हुई थी जैसे ।

"आजादी ऐसी ही चीज है।"

इन्द्र शोखी पर उतर आया, बोला- "पर मैं आजाद कहां होऊंगा। एक कैद से निकलकर दूसरी कैद में चला जाऊंगा।"

"किसकी कैद में...?"

"अरे, भूल गई क्या? तुमने पहली मुलाकात में क्या कहा था। "

"क्या कहा था...?" नयना बदस्तूर उसकी सूरत देखती रही।

"यही कहा था कि बेचिन्त हो जाओ में इस कैद से निकालकर तुम्हें अपना कैदी बना लूंगी यही कहा था ना। " नयना के होठों पर मुस्कान तैर आई "क्या तुम मेरे कैदी बनने के लिए तैयार हो...?" उसने पूछा।

"पहले भी इकरार किया था अब भी इकरार करता हूँ। तुम्हारा कैदी बनकर मुझे खुशी होगी।"

"क्या तुम अपनी इस कैद से निकलकर मेरे साथ बहराम नगर चलोगे?"

"जरूर चलूंगा। यह बतलाओ राजा साहब की हवेली के दरवाजे पर खुल जाएंगे...?" इन्द्रजीत ने अपनी आशंका जाहिर की।

"मेरे होते हुए तुम्हारे लिए वहां के दरवाजे कोन बंद कर सकता है। नयना है मेरा नाम और में कोई छुई-मुई, कायर

लड़की नहीं हूँ। मैंने अपने पिताश्री को बता दिया है कि मैं कुंवर बलराज से शादी नहीं करुगी । "

इन्द्रजीत के लिए यह रहस्योद्घाटन किसी विस्फोट से कम नहीं था। उसने धड़कते दिल के साथ पूछा - "फिर... फिर उन्होंने क्या कहा?"

"मेरे पिता जी मुझे बेहद चाहते हैं। उन्हें मेरे इंकार का अफसोस तो हुआ, लेकिन उन्होंने एक दकियानूसी रवायती बाप की तरह मेरे इंकार को अपनी आन की समस्या नहीं बनाई। उन्होंने कहा कि जिस वजह से तुम इंकार कर रही .
 
हो-वह वजह मेरे सामने लाओ। बस, अब तुम्हे बहराम नगर ले जाकर अपने पिताश्री के सामने खड़ा कर दूंगी और कह दूंगी कि यह है वह वजह " नयना बदस्तूर शोखी बोली।

"फिर जानती हो उसके बाद क्या होगा?"

"क्या होगा, इन्द्रजीत जी।"

" धाय... धांय... दो गोलियां चलेंगी और इन्द्रजीत जी जमीन पर गिरे तड़प रहे होंगे।"

"अगर ऐसा हुआ तो पहली गोली मैं अपने सीने पर खाऊंगी...।" नयना ने संजीदा होते, दृढ़ शब्दों में कहा ।

"सच कहती हो?" इन्द्रजीत को जैसे यकीन नहीं आया।

"झूठ और सच का फैसला तो आने वाला वक्त करेगा।" नयना अपने प्रेमी के गले का हार बन गई।

वह मिलन के इन क्षणों को अन्देशों की भेंट नहीं चढ़ाना चाहती थी। पर मिलने के क्षण भी कितने छोटे होते हैं कि हसरतें मिटती नहीं बल्कि बढ़ जाती हैं। नयना को दिल्ली जाने की भी जल्दी थी। वह अपनी प्यासी हसरतों के साथ अगली मुलाकात का प्रोग्राम तय करने भविष्य के सुनहरे सपने देखती दिल्ली चली गई। इन्द्रजीत देर तक खड़ा उसकी गाड़ी की लाल 'टेल लाईट' को देखता रहा, जी न जाने कब की दिखाई देनी बंद हो गई थी। लेकिन वह कल्पना में ही उस सुख बिन्दुओं को देखे जा रहा था।

अन्धेरा गहरा हो चुका था दूर बस्ती में कहीं-कहीं रोशनी नजर आ रही थी। शेष तीनों तरफ ही सन्नाटा व्याप्त था। इन्द्रजीत बस्ती लौट चलने की सोच ही रहा था, कि तभी अचानक किसी ने उसके कंधे पर हाथ रख दिया। हाथ का दबाब महसूस करते ही वह एकदम सहम गया।

यह एक नर्म-कोमल दबाव था।

इस हरारत भरे कोमल दबाव ने उसे भीतर तक दहला दिया था। वह समझ गया कि आने वाला कौन है, लेकिन यही

समझ में नहीं आ रहा था कि आने वाला यहां क्यों आया है।

"यहां क्यों खड़े हो, इन्द्र ?" उगने वाले ने पूछा।

"बस ऐसे ही... यूं ही.... नजर के बहते पानी को देख रहा था । "

"ऐसे अन्धेरे में।" शंकापूर्ण, हैरत भरे स्वर में पूछा गया।

" अंधेरा तो अब हुआ है।" इन्द्रजीत ने सफाई दी, फिर उसके सवालों से ही बचने के लेए तेजी से पूछा- "तुम यहां क्यों आई हो कटारी ?"

आने वाली कटारी थी। वह बोली- "तुम्हें बाबा न बुलाया है।"

"उन्हें कैसे मालूम कि मैं यहां पुल पर हूँ।" इन्द्र ने पूछा। उसका दिल धड़कने लगा था।

"उसे मैंने बताया कि तम पुल पर होवोगे। तुम अक्सर शाम को यहां आकर खड़े हो जोते हो ना।"

"उसने क्यों बुलाया है।" इन्द्रजीत ने फिर विषय बदल दिया।

'मुझे नहीं मालूम चलकर पूछ लेना...!"

"चलो।"

कटारी ने उसका हाथ थामकर चलना चाहा। लेकिन इन्द्रजीत ने बड़ी नर्मी से उससे अपना हाथ छुड़ा लिया और तेज-तेज चलने लगा।
 
Back
Top