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तब इन्द्रजीत ने अपनी बंद मुट्ठी उसके सामने की और मुट्ठी खोल दी, बोला- "यह तो नहीं...?"
वह अंगूठी इन्द्रजीत की हथेली पर थी। नयना चहकी, "यही तो है। यह पास कैसे आ गई। जादू!" वह जैसे सब समझ गई थी..." आह तुम कितने बड़े जादूगर हो...?"
"यह अंगूठी अगूठी तुमने अब तक पहनी क्यों नहीं...?" इन्द्रजीत ने किसी सोच के वशीभूत पूछा था।
"जब तुमने मुझे अगूंठी लौटाई थी तो तभी मेरे दिल में यह ख्वाहिश मचली थी कि काश ! मेरे हाथ पर रखने की बजाय तुम यह अंगूठी मुझे पहना देते।" नयना ने निसंकोच कहा था।
"उस वक्त मेरे दिल में भी एक खाहिश जागी थी।" इन्द्रजीत भी कहे बिना नहीं रह सका।
"वह क्या...?" नयना ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा था।
"मैंने सोचा था कि काश ! यह अंगूठी में हमेशा के लिए गायब कर सकता। "
"ऐसा हो सकता है।" नयना भावावेश में बोली- "यह अगूठी हमेशा के लिए गायब खै सकती है। "
"वह कैसे ?" इन्द्रजीत की बेताबी भी देखने अली थी।
"वह ऐसे... देखो यूं... यह कहकर नयना ने अंगूठी नहर के बहते पानी में उछाल दी जो फौरन डुब गई।
"यह... यह तुमने क्या किया?” ईन्द्रजीत परेशान हो उठा।
"कुछ नहीं...। मैं इस अंगूठी की कैद से आजाद हो गई हूँ।"
इन्द्रजीत उसका आशय समझ रहा था, वह कुछके क्षण उसकी आंखों में झांकता रहा, फिर पूछा उसने, "कहीं तुमने जल्दबाजी से काम तो नहीं लिया...?"
"मुझे नहीं मालूम।" नयना बड़ी मासूमियत से बोली-"जो हुआ है, बेअख्तयार बरबस ही हुआ है। यह दिल का मामल है दिल ही जाने...।"
" नयना जी ! यह दिल भी कितनी अजीब चीज है। कौन जाने, कब, कहा, किस पर आ जाए।"
"हाय...! तुम्हारे मेरा नाम लिया। जस फिर से लेना।" नयना का स्वर हसरतों भरा था।
"नयना...! इन्द्रजीत ने भी जैसे मंत्र-मुग्ध ही नाम दोहराया था।
" इन्द्रजीत .... मेरे इन्द्रजीत ...!" नयना ने जवाब मे उसका नाम इस कदर चाहत से लिया कि इन्द्रजीत को पहली बार अपने माम पर गर्व हुआ।
"अच्छा नयना...। यह बताओ इस वक्त गुम क्कं से आ रही ही?" कुछ सोचकर पूछा था, इन्द्रजीत ने ।
"बहराम नगर से और दिल्ली जा रही हूँ। तीन दिन बाद बापस आऊंगी। इसी वक्त यही इसी पुल पर मेरा इन्तजाम करना। मेरा इंतजार करोगे, इन्द्र !" नयना ने बेकरारी से पूछा ।
"हा, क्यों नहीं। मैं तुम्हारा इंतजार जरूर करूंगा।" दिल्ली अ नाम सुनकर इन्द्रजीत की मनोस्थिति अजीब ही गई।
उसे यूं लगा जैसे किसी ने अचानक धूल से सने आईनें को झाड़कर उसके सामने कर दिया हो ।
दिल... जहां वह पैदा हुआ, जहा उसका घर था, जहा उसके पापा थे। उसकी प्यारी सी मां थी। यह तो उसकी जिन्दगी के सारे ही जख्म हरे हो गए थे। उसके दिल में टीस सी उठने लगी थी ।
“क्या हुआ इन्द्र ? यह अचानक तुम्हें क्या हो गया है?" इन्द्रजीत की हालत बदलते देखकर नयना ने पूछा।
"कुछ नहीं। जब तुम दिल्ली से वापस आओगी तो मैं सब कुछ बताऊंगा...।" अभी वे बातें ही कर रहे थे कि उन्हें
वह अंगूठी इन्द्रजीत की हथेली पर थी। नयना चहकी, "यही तो है। यह पास कैसे आ गई। जादू!" वह जैसे सब समझ गई थी..." आह तुम कितने बड़े जादूगर हो...?"
"यह अंगूठी अगूठी तुमने अब तक पहनी क्यों नहीं...?" इन्द्रजीत ने किसी सोच के वशीभूत पूछा था।
"जब तुमने मुझे अगूंठी लौटाई थी तो तभी मेरे दिल में यह ख्वाहिश मचली थी कि काश ! मेरे हाथ पर रखने की बजाय तुम यह अंगूठी मुझे पहना देते।" नयना ने निसंकोच कहा था।
"उस वक्त मेरे दिल में भी एक खाहिश जागी थी।" इन्द्रजीत भी कहे बिना नहीं रह सका।
"वह क्या...?" नयना ने उसकी आंखों में झांकते हुए पूछा था।
"मैंने सोचा था कि काश ! यह अंगूठी में हमेशा के लिए गायब कर सकता। "
"ऐसा हो सकता है।" नयना भावावेश में बोली- "यह अगूठी हमेशा के लिए गायब खै सकती है। "
"वह कैसे ?" इन्द्रजीत की बेताबी भी देखने अली थी।
"वह ऐसे... देखो यूं... यह कहकर नयना ने अंगूठी नहर के बहते पानी में उछाल दी जो फौरन डुब गई।
"यह... यह तुमने क्या किया?” ईन्द्रजीत परेशान हो उठा।
"कुछ नहीं...। मैं इस अंगूठी की कैद से आजाद हो गई हूँ।"
इन्द्रजीत उसका आशय समझ रहा था, वह कुछके क्षण उसकी आंखों में झांकता रहा, फिर पूछा उसने, "कहीं तुमने जल्दबाजी से काम तो नहीं लिया...?"
"मुझे नहीं मालूम।" नयना बड़ी मासूमियत से बोली-"जो हुआ है, बेअख्तयार बरबस ही हुआ है। यह दिल का मामल है दिल ही जाने...।"
" नयना जी ! यह दिल भी कितनी अजीब चीज है। कौन जाने, कब, कहा, किस पर आ जाए।"
"हाय...! तुम्हारे मेरा नाम लिया। जस फिर से लेना।" नयना का स्वर हसरतों भरा था।
"नयना...! इन्द्रजीत ने भी जैसे मंत्र-मुग्ध ही नाम दोहराया था।
" इन्द्रजीत .... मेरे इन्द्रजीत ...!" नयना ने जवाब मे उसका नाम इस कदर चाहत से लिया कि इन्द्रजीत को पहली बार अपने माम पर गर्व हुआ।
"अच्छा नयना...। यह बताओ इस वक्त गुम क्कं से आ रही ही?" कुछ सोचकर पूछा था, इन्द्रजीत ने ।
"बहराम नगर से और दिल्ली जा रही हूँ। तीन दिन बाद बापस आऊंगी। इसी वक्त यही इसी पुल पर मेरा इन्तजाम करना। मेरा इंतजार करोगे, इन्द्र !" नयना ने बेकरारी से पूछा ।
"हा, क्यों नहीं। मैं तुम्हारा इंतजार जरूर करूंगा।" दिल्ली अ नाम सुनकर इन्द्रजीत की मनोस्थिति अजीब ही गई।
उसे यूं लगा जैसे किसी ने अचानक धूल से सने आईनें को झाड़कर उसके सामने कर दिया हो ।
दिल... जहां वह पैदा हुआ, जहा उसका घर था, जहा उसके पापा थे। उसकी प्यारी सी मां थी। यह तो उसकी जिन्दगी के सारे ही जख्म हरे हो गए थे। उसके दिल में टीस सी उठने लगी थी ।
“क्या हुआ इन्द्र ? यह अचानक तुम्हें क्या हो गया है?" इन्द्रजीत की हालत बदलते देखकर नयना ने पूछा।
"कुछ नहीं। जब तुम दिल्ली से वापस आओगी तो मैं सब कुछ बताऊंगा...।" अभी वे बातें ही कर रहे थे कि उन्हें