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बस्ती का रास्ता उसका देखा-भाला था, सो वह अन्धेरा भी कोई रुकावट पैदा नहीं कर रहा था। बरसों हो गए थे उसे इन रास्तों पर चलते हुए।
"इन्द्र...।" कटारी जो पीछे रह गई थी उसने उसे आवाज दी।
"हां कहो, क्या हुआ?" इन्द्रजीत चलते-चलते रुक गया।
कटारी कदम बढ़ा उसकी बगल में आ गई। उसने अजीब से ठण्डे लहजे में पूछा- "एक बात पूछूं। सच-सच बताओगे?"
"कटारी कोई ऐसी-वैसी बात न पूछ लेना कि मैं चाहूँ भी तो सच न बोल सकूं।" इन्द्रजीत अनजाने खौफ का शिकार था, लेकिन वह सहज भाव से ही बोला था "अगर तुम कुछ जानती हो तो बेहतर होगा कि उसे एक डरावना सपना समझकर भूल जाओ।"
"तुम कितने कठोर हो, इन्द्र...।" कटौरी सिसक ही तो उठी।
इन्द्रजीत ने जवाब में नहीं कहा बस उसका हाथ पकड़ लिया और उसे बस्ती में ले आया।
अपने प्रति कटारी की भावनाओं से इन्द्रजीत अनजान नहीं था और अब इन्द्र को इस बात का भी अहसास हो चला
था कि कटारी, उसकी और नयना की मुलाकातों से अनजान नहीं है। जाहिर है, जब कोई किसी से प्यार करता है तो फिर उससे गाफिल कैसे रह सकता है। कटारी ने आज तक उससे खुलकर बात नहीं की थी। अपनी चाहत उसने उस, इशारों ही इशारों में दर्शाई थी उसने ।
इन्द्रजीत ने उसके इशारे को समझते हुए भी उसके किसी इशारे का जवाब नहीं दिया था।
रास्ते में इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि हो सकता है कि कटारी, नयना के बारे में कुछ न जानती हो और अपने हवाले
से कोई सच उगलवाना चाहती हो...खुद ही किसी नतीजे या फैसले पर पहुंचना चाहती हो। लेकिन अब कुछ नहीं हो
सकता था। इन्द्रजीत ने उसकी बात खुद ही उड़ा दी थी और अब खुद ही उसे छेड़ना उचित न था ।
इन्द्रजीत घर के मन में दाखिल हुआ तो राजू मदारी सामने ही मूंढे पर बैठा हुआ था।
उसके दांए हाथ पर अपने दो पांवों पर रीछ बैठा हुआ था और बांए हाथ पर बंदर खड़ा हुआ था। राजू मदारी के दोनों हाथ इन जानवरों के सिरों पर रखे हुए थे। उसके पीछे दीवार में गड़ी कील में लालटेन लटकी हुई थी और पीछे से पड़ रही लालटेन की रोशनी में वे तीनों बड़े अजीबो-गरीब दिखाई दे रहे थे। अत्याधिक रहस्यमय और भयभीत कर देने वाले।
"यो तुझे कहां मिला रे कटारी?" राजू मदारी ने इन्द्रजीत को घूरते हुए अपनी बेटी से पूछा ।
"वहीं बाबा, जहां मैंने बताया था...।" करारी ने सादगी से जवाब दिया।
"नहर वाले पुल पर ?" राजू मदारी ने तस्वीक चाही ।
"हां बाबा!" कटारी की मुंडी भी हिली थी।
"ओ, रसिया!" और अब राजू मदारी अपने बंदर से सम्बोधित हुआ। बंदर अपना नाम सुनते ही उसकी गोद में आ बैठा और रीछ अपने दोनों पांवों पर उठकर खड़ा हो गया।
"अरे, यह तू मेरी गोद में क्यों चढ़ गया रे रसिया ! जा मेरा चाकू तो लेकर आ रे...।" चाकू का नाम सुनकर इन्द्रजीत की सिट्टी गुम हो गई।
राजू मदारी का हुक्य सुनकर रसिया उसकी गोद से कूदा और छलांग लगाता हुआ अन्दर कमरे में चला गया।
और फिर जब कुछेक क्षणों बाद वह वापस आया तो उसके मुंह में चाकू दबा हुआ था। वह मदारी के करीब आकर
"इन्द्र...।" कटारी जो पीछे रह गई थी उसने उसे आवाज दी।
"हां कहो, क्या हुआ?" इन्द्रजीत चलते-चलते रुक गया।
कटारी कदम बढ़ा उसकी बगल में आ गई। उसने अजीब से ठण्डे लहजे में पूछा- "एक बात पूछूं। सच-सच बताओगे?"
"कटारी कोई ऐसी-वैसी बात न पूछ लेना कि मैं चाहूँ भी तो सच न बोल सकूं।" इन्द्रजीत अनजाने खौफ का शिकार था, लेकिन वह सहज भाव से ही बोला था "अगर तुम कुछ जानती हो तो बेहतर होगा कि उसे एक डरावना सपना समझकर भूल जाओ।"
"तुम कितने कठोर हो, इन्द्र...।" कटौरी सिसक ही तो उठी।
इन्द्रजीत ने जवाब में नहीं कहा बस उसका हाथ पकड़ लिया और उसे बस्ती में ले आया।
अपने प्रति कटारी की भावनाओं से इन्द्रजीत अनजान नहीं था और अब इन्द्र को इस बात का भी अहसास हो चला
था कि कटारी, उसकी और नयना की मुलाकातों से अनजान नहीं है। जाहिर है, जब कोई किसी से प्यार करता है तो फिर उससे गाफिल कैसे रह सकता है। कटारी ने आज तक उससे खुलकर बात नहीं की थी। अपनी चाहत उसने उस, इशारों ही इशारों में दर्शाई थी उसने ।
इन्द्रजीत ने उसके इशारे को समझते हुए भी उसके किसी इशारे का जवाब नहीं दिया था।
रास्ते में इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि हो सकता है कि कटारी, नयना के बारे में कुछ न जानती हो और अपने हवाले
से कोई सच उगलवाना चाहती हो...खुद ही किसी नतीजे या फैसले पर पहुंचना चाहती हो। लेकिन अब कुछ नहीं हो
सकता था। इन्द्रजीत ने उसकी बात खुद ही उड़ा दी थी और अब खुद ही उसे छेड़ना उचित न था ।
इन्द्रजीत घर के मन में दाखिल हुआ तो राजू मदारी सामने ही मूंढे पर बैठा हुआ था।
उसके दांए हाथ पर अपने दो पांवों पर रीछ बैठा हुआ था और बांए हाथ पर बंदर खड़ा हुआ था। राजू मदारी के दोनों हाथ इन जानवरों के सिरों पर रखे हुए थे। उसके पीछे दीवार में गड़ी कील में लालटेन लटकी हुई थी और पीछे से पड़ रही लालटेन की रोशनी में वे तीनों बड़े अजीबो-गरीब दिखाई दे रहे थे। अत्याधिक रहस्यमय और भयभीत कर देने वाले।
"यो तुझे कहां मिला रे कटारी?" राजू मदारी ने इन्द्रजीत को घूरते हुए अपनी बेटी से पूछा ।
"वहीं बाबा, जहां मैंने बताया था...।" करारी ने सादगी से जवाब दिया।
"नहर वाले पुल पर ?" राजू मदारी ने तस्वीक चाही ।
"हां बाबा!" कटारी की मुंडी भी हिली थी।
"ओ, रसिया!" और अब राजू मदारी अपने बंदर से सम्बोधित हुआ। बंदर अपना नाम सुनते ही उसकी गोद में आ बैठा और रीछ अपने दोनों पांवों पर उठकर खड़ा हो गया।
"अरे, यह तू मेरी गोद में क्यों चढ़ गया रे रसिया ! जा मेरा चाकू तो लेकर आ रे...।" चाकू का नाम सुनकर इन्द्रजीत की सिट्टी गुम हो गई।
राजू मदारी का हुक्य सुनकर रसिया उसकी गोद से कूदा और छलांग लगाता हुआ अन्दर कमरे में चला गया।
और फिर जब कुछेक क्षणों बाद वह वापस आया तो उसके मुंह में चाकू दबा हुआ था। वह मदारी के करीब आकर