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स्वाहा

बस्ती का रास्ता उसका देखा-भाला था, सो वह अन्धेरा भी कोई रुकावट पैदा नहीं कर रहा था। बरसों हो गए थे उसे इन रास्तों पर चलते हुए।

"इन्द्र...।" कटारी जो पीछे रह गई थी उसने उसे आवाज दी।

"हां कहो, क्या हुआ?" इन्द्रजीत चलते-चलते रुक गया।

कटारी कदम बढ़ा उसकी बगल में आ गई। उसने अजीब से ठण्डे लहजे में पूछा- "एक बात पूछूं। सच-सच बताओगे?"

"कटारी कोई ऐसी-वैसी बात न पूछ लेना कि मैं चाहूँ भी तो सच न बोल सकूं।" इन्द्रजीत अनजाने खौफ का शिकार था, लेकिन वह सहज भाव से ही बोला था "अगर तुम कुछ जानती हो तो बेहतर होगा कि उसे एक डरावना सपना समझकर भूल जाओ।"

"तुम कितने कठोर हो, इन्द्र...।" कटौरी सिसक ही तो उठी।

इन्द्रजीत ने जवाब में नहीं कहा बस उसका हाथ पकड़ लिया और उसे बस्ती में ले आया।

अपने प्रति कटारी की भावनाओं से इन्द्रजीत अनजान नहीं था और अब इन्द्र को इस बात का भी अहसास हो चला

था कि कटारी, उसकी और नयना की मुलाकातों से अनजान नहीं है। जाहिर है, जब कोई किसी से प्यार करता है तो फिर उससे गाफिल कैसे रह सकता है। कटारी ने आज तक उससे खुलकर बात नहीं की थी। अपनी चाहत उसने उस, इशारों ही इशारों में दर्शाई थी उसने ।

इन्द्रजीत ने उसके इशारे को समझते हुए भी उसके किसी इशारे का जवाब नहीं दिया था।

रास्ते में इन्द्रजीत ने यह भी सोचा कि हो सकता है कि कटारी, नयना के बारे में कुछ न जानती हो और अपने हवाले

से कोई सच उगलवाना चाहती हो...खुद ही किसी नतीजे या फैसले पर पहुंचना चाहती हो। लेकिन अब कुछ नहीं हो

सकता था। इन्द्रजीत ने उसकी बात खुद ही उड़ा दी थी और अब खुद ही उसे छेड़ना उचित न था ।

इन्द्रजीत घर के मन में दाखिल हुआ तो राजू मदारी सामने ही मूंढे पर बैठा हुआ था।

उसके दांए हाथ पर अपने दो पांवों पर रीछ बैठा हुआ था और बांए हाथ पर बंदर खड़ा हुआ था। राजू मदारी के दोनों हाथ इन जानवरों के सिरों पर रखे हुए थे। उसके पीछे दीवार में गड़ी कील में लालटेन लटकी हुई थी और पीछे से पड़ रही लालटेन की रोशनी में वे तीनों बड़े अजीबो-गरीब दिखाई दे रहे थे। अत्याधिक रहस्यमय और भयभीत कर देने वाले।

"यो तुझे कहां मिला रे कटारी?" राजू मदारी ने इन्द्रजीत को घूरते हुए अपनी बेटी से पूछा ।

"वहीं बाबा, जहां मैंने बताया था...।" करारी ने सादगी से जवाब दिया।

"नहर वाले पुल पर ?" राजू मदारी ने तस्वीक चाही ।

"हां बाबा!" कटारी की मुंडी भी हिली थी।

"ओ, रसिया!" और अब राजू मदारी अपने बंदर से सम्बोधित हुआ। बंदर अपना नाम सुनते ही उसकी गोद में आ बैठा और रीछ अपने दोनों पांवों पर उठकर खड़ा हो गया।

"अरे, यह तू मेरी गोद में क्यों चढ़ गया रे रसिया ! जा मेरा चाकू तो लेकर आ रे...।" चाकू का नाम सुनकर इन्द्रजीत की सिट्टी गुम हो गई।

राजू मदारी का हुक्य सुनकर रसिया उसकी गोद से कूदा और छलांग लगाता हुआ अन्दर कमरे में चला गया।

और फिर जब कुछेक क्षणों बाद वह वापस आया तो उसके मुंह में चाकू दबा हुआ था। वह मदारी के करीब आकर
 
अपने पिछले पैरों पर खड़ा हो गया और अगले दोनों पांव अपने सीने पर बांध लिए और अपना मुंह उठा दिया।

राजू मदारी ने उसके मुंह से चाकू लेकर खोला तो उसका छः इन्च से भी लम्बा फल लालटेन की धुंधली रोशनी के बावजूद चमक उठा।

इन्द्रजीत खुले हुए चाकू को देखकर सहम गया। उसे यही लगा जैसे घूसट मदारी यह चाकू फेंककर उसे मार गिरायेगा। वह दो कदम पीछे हटकर फौरन कटारी की ओट में हो गया।

""इधर आ रे छोकरे!" राजू मदारी ने उसे अपने करीब आने का इशारा किया।

कटारी उसके सामने से हट गई। इन्द्रजीत आगे बढ़ा और के मदारी निकट पहुंचकर खामोशी तक्ख्फ्यट्ट गया ।

"देख मन्त्रे (मैंने) तुझे बहुत से खेल सिखाए हैं-ईब (अब) तुझे बह खेल सिखाता हू रे, जिसकी वजह से तेरी जान बची।" राजू मदारी चाकू की धार पर उंगली फिराते बोला।

यह सुनकर इन्द्रजीत की जान में जान आई। वह तो यही समझ रहा था कि नयना से उसकी मुलाकातों का भेद खुल गया है और अब उसे सजा मिलने वाली।

उसने एक गहरी और ठण्डी सांस लेते कहा- "हां, बाबा! सिखाओ...।"

"सात दिन बाद आमावस की रात है। यह अमल आज से शुरु होगा और आमावस की रात को पूरा होगा। आमावस की रात तू जंगल में होगा- डर मत, में भी रहूँगा तेरे साथ। ठीक आधी रात के वक्त एक खास अमल करना पड़ेगा और उसके बाद यह सिद्धि पाकर तू एक बड़ा जादूगर बन जाएगा। पर मन्ने एक बात बता" वह कुछेक क्षण इन्द्रजीत को पूरता रहा और फिर पूछा - "बड़ा जादूगर बनकर तू मौहे (मुझे छोड़कर तो नही चला जाएगा।"

"कैसी बात करते बाबा । " इन्द्रजीत जल्दी से बोला- "मैं तुम्हें छोड़कर कहां और क्यों कर जाऊंगा?"

"तुम्हारा क्या भरोसा, इन्द्र?" कटारी उसके करीब आकर धीरे से बोली। इतने धीरे कि राजू मदारी भी न सुन पाया।

"ला अपना हाथ ओगे बढ़ा...।" राजू मदारी बोला- "और तू...कटारी तू पीछे हट जा....।" "यह ले बाबा...।" कटारी पीछे हटते हुए बोली- "हर कोई मुझे पीछे हटाता है।"

राजू मदारी ने कटारी की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया, लेकिन इन्द्रजीत ने मुड़कर उसे जरूर देखा। राजू मदारी ने इन्द्रजीत का हाथ थाम लिया था और अब उसने उसके अंगूठे पर तेज धार चाकू की नोक से एक हल्का-सा चीरा लगाया। चाकू की धार बहुत तेज थी फौरन ही खून उबल आया ।

उसने अपने गले से उल्लू का पंजा निकाला और कोई मंत्र पढ़ते हुए इस पंजे की एक-एक उंगली पर खून

लगाया फिर इस खून आलूदा पंने को इन्द्रजीत के माथे पर फरा, उसके माथे पर खून की लकीरें बन गई।

"बस, जा इन्द्र-कमरे में जा। अब तन्ने (तूने) कमरे से सूरज निकलने से पहले नहीं निकलना है। समझ गया ना, मेरी बात। चाहे तन्ने कोई कितना ही पुकारे देख, अगर उसकी पुकार पर तू बाहर निकल गया तो इतना जान ले कि अंधा हो जाएगा।"

“ठीक है, बाबा! मैं अन्दर जा रहा हूँ अब सुबह ही बाहर निकलूंगा।" इन्द्रजीत धीमे मे बोला ।

राजू मदारी फितरत से ही अम्बार था। यह सारा चक्कर उसने इन्द्र को जादू सिखाने के लिए नहीं चलाया था। यह अमल तो उसने इन्द्र को पूर्णतः अपना गुलाम और आज्ञाकारी बनाने के लिए चलाया था।

हकीकत यही थी कि कटारी ने इन्द्रजीत को राजकुमारी नयना से मिलते हुए देख लिया था और यह इत्तला उसने अपने बाप राजू मदारी को भी दे दी थी। राजू मदारी ने दुनिया देखी थी -

काले इल्म का भी माहिर था। उसने अंदाजा लगा लिया था कि ये तोता कुछ ही दिनों में उड़ने लायक हो जाएगा। सो, उसने न केवल इन्द्रजीत के पर काटने बल्कि उसे एक बड़े पिंजरे में बंद करने का बन्दोबस्त कर लिया था।
 
हालात संजीदा हो चले थे।

इधर - राजू मदारी इन्द्रजीत को और अधिक कैद में रखने की कोशिश कर रहा था तो उधर योगी दयाल ने उसे मंत्र- पाश से मुक्त कराने का अमत शरू कर दिया था।

योगी दयाल ने बाजार से एक मीटर काला कपड़ा, एक नया उस्तरा, एक कोरी मिट्टी की हंडिया खर्रोदी। फिर रात में उसने अपनी बस्ती से निकलकर एक पीपल की जड़ में छोटा-सा गड्डा खोदा, इंडिया को उसमें रखकर देखा। हंडिया . उसमें पूरी तरह नहीं आई। उसने गड्ढे को थोड़ा-सा और बड़ा किया। जब इंडिया पूरी तरह से गड्ढे में बैठ गई तो वह गड्ढे को वैसे ही खुला छोड़कर हंडिया को अपने साथ ले आया।

घर में आकर उसने दरवाजा अन्दर से बंद किया। जलती लालटेन को जमीन पर रखा और फिर हंडिया, उस्तरा और काले कपड़े को लेकर वह जमीन पर आसन जमाकर बैठ गया। हंडिया को औधा करके उसने कुछ पढ़ना शुरू

किया। वह रुक-रुक कर उस्तरे को भी हंडिया पर मारता जाता था।

फिर उसने हंडिया को सीधा किया... काले कपड़े को अपने कंधे पर डाला। उस्तरा हाथ में पकड़ा और फिर दूसरे हाथ से लालटेन की चिमनी उठाकर उसमें फूंक मारी। जलती लालटेन भड़ककर बुझ गई। कमरे में पूर्ण अन्धकार छा गया।

इस अन्धेरे में ही योगी दयाल ने अपने कंधे से काला कपड़ा उतारा और तेज उस्तरे से काटकर उसके तीन टुकड़े कर दिए । फिर इस काले कपड़े के दो टुकड़ों को और उस्तरे को इंडिया में डाल दिया और तीसरे टुकड़े को हंडिया के मुंह पर बांध दिया।

और फिर... 1

अन्धेरे में ही हंडिया को दोनों हाथों में उठाकर घर से निकल पड़ा।

वह कुछ पड़ता जा रहा था और हडिया पर फूंकता जाता था। यहां तक कि वह बस्ती से बाहर उस पीपल के नीचे पहुंच गया जहां उसने कुछ देर पहले हंडिया के आकार के बराबर गड्ढा खोदा था।

योगी दयाल ने हडिया को उस गडूढे में उतारने से पहले अपने बांए हाथ से गड्ढे को टटोला, गड्ढे में पानी भरा हुआ

था। गड्ढा पानी से भरा महसूस करके उसे बड़ी खुशी हुई। यह प्रमाण था इस बात का कि उसका अमल सफलता की तरफ अग्रसर है।

योगी दयाल ने खुशी हो इंडिया उस गड्ढे में रख दी। काफी पानी उस हंडिया में चला गया। और अब उसने उस गड्ढे

को मिट्टी से अच्छी तरह पाट दिया।

गड्ढे में मिट्टी डालने के बाद उसने मिट्टी में अपनी एक उंगली घुसेड़ी और फिर लगभग आधे घन्टे तक उकडूं बैठा मंत्र पढ़ता रहा। और फिर वह उठकर अपने घर आ गया और आराम से सो गया।

उसने इन्द्रजीत को मंत्र- पाश से मुक्ति का अमल कर दिया था।
 
और फिर अगले दिन...।

प्रातः इन्द्रजीत उठा तो वह प्रफुल्ल और प्रसन्नचित था। वह कमरे से बाहर आया। आंगन में चारपाई पर बैठी कटारी सब्जी काट रही थी। राजू मदारी अभी अपने कमरे में पड़ा सो रहा था।

इन्द्रजीत कटारी के पास आकर बैठ गया। कटारी का माथा ठनका। आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ था । कटारी के करीब बैठना तो दूर की बात वह कटारी को नजर भरकर देखता भी नहीं था।

सपेरे योगी दयाल ने इन्द्रजीत को हिदायत की थी कि वह किसी भी तरह राजू मदारी के गले से वह उल्लू का पंजा निकाल ले, जो राजू मदारी के तोर पर अपने गले में पहने रहता था। यह काम इन्द्र स्वयं नहीं कर सकता था। रात को उसे ख्याल आया था कि वह यह काम कटारी से करवाने की कोशिश क्यों न करे कि अगर वह कटारी पर थोड़ी-सी तवज्जो दे दे... उस पर यह जाहिर करे कि उसे उससे मुहब्बत होती जा रही है और फिर वह कटारी के सामने उल्लू का पंजा अपने गले में डालने की इच्छा जाहिर करे तो कटारी यकीनन उसे खुश करने के लिए अपने बाप के गले से वह पंजा निकालकर उसके हवाले कर देगी।

यही सब सोचकर वह आज कटारी के निकट चारपाई पर आ बैठा था। नहीं जानता था कि वह जिन लोगों को फरेब देने चला है वो कैसे शातिर लोग हैं। उन्होंने तो पहले ही उसके गिर्द जाल फैला रखा था और अपने बाप के आश्वासन के सदके ही कटारी के सपनों में रंग भर आए थे। उसे विश्वास था कि वह वक्त ज्यादा दूर नहीं जब इन्द्रजीत अपना अतीत भूल जाएगा । उसकी याददाश्त जादू की मूल-भुलैया में गुम हो जाएगी। फिर इन्द्रजीत उसका होगा और कोई उसे उससे न छीन पाएगा।

बहरहाल, इन्द्रजीत चारपाई पर उसके बेहद करीब आ बैठा तो करारी का ध्यान टूट गया और दरांती से साग काटते हुए उसका हाथ बहक गया उसकी उंगली कट गई। "सी...sss!" करके उसने साग परात में डाल दिया और अपनी उंगली पकड़कर देखने लगी जिससे झल-झल खून

बहे जा रहा था।

"अरे, यह तुमने क्या किया...।" इन्द्रजीत ने फौरन उसका हाथ थाम लिया और अपने अंगूठे से उसके जख्य को दबा

दिया। इस प्यार भरे व्यवहार ने कटारी पर नशा कर दिया। वह अपनी पीड़ा भूल गई। उसने अपनी आंखें बंद कर लीं।

उसका जी चाहा कि इन्द्रजीत यूं ही सदियों तक उसका घाव दबाए बैठा रहे ।

" अरे यह तो बहे जा रहा है।" इन्द्रजीत ने अंगूठा हटाकर देखा "ठहरी मैं अन्दर से कोई कपड़ा लाता हूँ। पानी में भिगोकर बांध दूंगा तो खून बहना बंद हो जाएगा।"

"तुम मत उठना इन्द्र...बहने दो खून थोड़ा-सा खून बह जाएगा तो क्या हो जाएगा। खून मेरे अन्दर बहुत है...!" कटारी ने अपनी आंखें खोलकर कहा।

"पागल हुई हो।" वह उठने लगा।

"इन्द्र, एक बात बताओ।" कटारी ने उसे उठने नहीं दिया।

"हां, बोलो...।"

"देख, सच-सच बताना।" कटारी ने इकरार करवाया।

"चलो, ठीक है-सच-सच बताऊंगा।" इन्द्रजीत ने इकरार किया।

"तुमने कभी प्यार किया' है?" कटारी ने पूछा।

“हा, किया है।" इन्द्रजीत ने उसे प्यार भरी नजरों से देखते हुए कहा- "लेकिन यह मत पूछना किससे ?"
 
"नहीं यह नहीं पूछूंगी.... मैं जानती हूँ।" वह अर्थपूर्ण लहजे में बोली। "तुम जानती हो?" इन्द्रजीत घबराया।

"न सिर्फ जानती हूँ, बल्कि पहचानती भी हूँ।" वह मंद-मंद मुस्कराई।

"जब जानती हो तो फिर पूछती क्यों हो?"

• यह जानने के लिए कि तुम कितना सब बोलते हो। खैर यह बात छोड़ो। मुझे यह बताओ कि प्यार कहते किसे हैं?" कटारी ने बातचीत का रूख बदन दिया।

"प्यार, उम्रकैद का दूसरा नाम है। ऐसी कैद जिसे इंसान अपनी खुशी से कबूल करता है।" " और नफरत ? " कटारी की मुस्कान किंचित गहरा गई थी।

"नफरत मुहब्बत का दूसरा रुख है।" इन्द्रजीत तुरन्त बोला- "एक ऐसा रूक्ष जिसे पलटते देर नहीं लगती...." और कटारी ने सोचपूर्ण लहजे में कहा- "तुम क्या यह कहना चाहते हो कि यह दोनों एक ही सिक्के के दो रुख ...1"

"हां, बिल्कुल... । वास्तव में ये दोनों एक ही हैं, नफरत मुहब्बत- नफरत, और शायद यही जिन्दगी है ।" इन्द्रजीत ने अपने तोर पर जवाब दिया था।

कटारी कुछ समझी....कुछ न समझी।

" तभी अन्दर से खांसने की आवाज आई। इन्द्रजीत ने फौरन उसका हाथ छोड़ा। फिर वह अंदर गया और एक पट्टी ले

आया । और उसे पानी में भिगोकर कटारी की उंगली पर लपेट दिया।

"कटारी...ओ, कटारी! कहां है तू बेटी " राजू मदारी ने पुकारा ।

मैं बाहर हूँ बाबा।"

"ओह, जरा म्हारा हुक्का तो ता (सुलगा) जाकर।"

"अच्छा, बाबा।"

"तू रहने दे मैं देता हूँ हुक्का ताजा करके।" इन्द्रजीत बोला। कटारी की आंखों से अनुराग छलकने लगा।

यूं नाटक शुरु हो गए थे। राजू मदारी अपने काले इल्म की कार्रवाईयां में लगा रहा, उधर योगी दयाल अपने मंत्र पढ़कर फूंकता रहा। इस तरह तीन दिन बीत गए। तीन दिन बाद आमावस की रात थी।

योगी सपेरा दयाल पीपल के पेड़ के नीचे दबाई अपनी इंडिया निकालकर इधर जंगल में आ गया था। ड्राईवर रघुवीर. ने उसके लिए खाने-पीने का सामान उपलब्ध करा दिया था इतना सामान कि अगर वह जंगल में सप्ताह-दस दिन भी अपनी साधना और अनुष्ठान में लगा रहता तब भी वह सामान खत्म न होता। योगी दयाल ने एक घने पेड़ के नीचे अपना छोटा-सा खेमा लगा लिया था। सांपों की कई पिटारियां वह अपने साथ लाया था। इन पिटारियों में विभिन्न प्रजातियों और किस्म-किस्म के सांप बंद थे। इनमें एक सांप बहुत खतरनाक था इतना खतरनाक कि अगर महज फुंकार मार तो घास जेल जाती थी।

आमावस की रात शनिवार व रविवार के बीच की रात थी। शनिवार को इन्द्रजीत जंगल का चक्कर लगा गया था। उसने योगी दयाल को बताया था कि दो राजू मदारी के गले से उल्लू का पंजा प्राप्त करने में नाकाम रहा है। योगी दयाल नं उसे तसल्ली दी कि वह फिक्र न करे-राजू मदारी अब उसका कुछ न बिगाड़ सकेगा।
 
योगी दयाल ने राजू मदारी का इस्तेमाल किया कपड़ा मंगवाया था। इन्द्रजीत उसकी एक धोती उठा लाया था और यह धोती उसने योगी दयाल के हवाले का दी थी।

इन्द्रजीत ने उसे राजू भदारी की कार्रवाहियों से अवगत कराते हुए यह भी बताया था कि आमावस की रात को वह

और राजू मदारी भी जंगल में होंगे। यह सुनकर योगी खुश हो गया था और उसे अपनी कामयाबी का शत-प्रतिस्पश

विश्वास हो गया था।

उधर राजकुमारी नयना एक-एक दिन गिनकर बिता रही थी। उसे इन्द्रजीत की मुक्ति की बेचैनी से प्रतीक्षा थी। तय

यह हुआ था कि वह रविवार की शाम को इन्द्रजीत को लेने के लिए आएगी। उसने इन्द्रजीत से कहलवाया था कि वो

अपना जरूरी सामान साथ लाए और निश्चित समय पर और पुल के निकट निश्चित स्थान पर पहुंच जाए। जहां से नयना उसे फौरन बहराम नगर ले आएगी। और फिर उसकी नई और खुशहाल जिन्दगी की शुरूआत होगी। उधर कटारी को भी आमावस को रात का इन्तजार कम बेचैनी से न था। उसे पूरा यकीन था कि इस आमावास की रात के बीतते ही इन्द्रजीत उसके ललाट पर झूमर बनकर सज जाएगा और फिर एक बहारों भरे और रंगीन सफर की

शुरूआत होगी।

यूं हर व्यक्ति ही अपने अपने दाव पर लगा हा था। आशाएं व कामनाएं मचल रही थीं और वक्त की धारा बह रही थी।

पर यह अटल सच भी अपनी जगह था कि आदमी सोचता कुछ है और होता है। इंसान जो सोचे, अगर वह हो जाए

तो फिर भाग्य अपना खेल कैसे दिखाए। सब अपने-अपने खेलों में लगे हुए थे और तकदीर जैसे दूर बैठी अपना ही

जाल बुन रही थी।

आमावस की रात... अन्धेरी और काली रात... जंगल का हौलनाक सन्नाटा... योगी दयाल व राजू मदारी एक-दूसरे से बेगाने... अपने-अपने कलापों में व्यस्त। योगी सपेरे दयाल नेए निश्चित वक्त पर हंडिया का मुंह खोला। अन्दर से काले कपड़े के दोनों टुकड़े निकाले, उन्हें

धरती पर कुछ इस तरह रखा कि वे सलीव का रूप अख्तयार कर गये, यूं समझो कि आदमी का ढांचा बन गया।

इसके बाद योगी दयाल ने उस्तरा खोलकर उस कपड़े पर उस्तरे के वार किये और यूं कपड़े को चीरकर उसी जगह

जमीन में गाड़ दिया। और फिर उस्तरे पर हंडिया औधी रख दी।

वह यह अनुष्ठान बड़ी निष्ठा और एकाग्रता के साथ कर रहा था। उसके हिलते होंठ इस बात का प्रमाण थे कि वह कोई मंत्र भी पढ़ रहा है। यह सब करने के बाद उसने वह काला नाग पिटारी से निकाला जिसकी फुंकार से ही घास जल जाती थी।

यह काला नाग पिटारी से ही निकलते ही, फन फैलाकर योगी दयाल के सामने खड़ा हो गया। योगी दयाल ने राजू मदारी की धोती अपने हाथ में पकड़कर उसके सामने लहराई। काले नाग ने धोती देखते ही उस पर फन मारा। धोती पर फौरन ही एक काला धब्बा पड़ गया।

योगी दयाल ने कोई मंत्र पढ़ते हुए यह अमल तीन बार दोहराया और फिर यह धोती सामने की तरफ उछाल दी। वह काला नाग फौरन ही उस धोती की तरफ लपका और फिर जंगल की जमीन पर बड़ी तेजी से फैलने लगा....।

मंत्र- पाश से बंधा काला नाग अच्छी तरह जानता था कि उसने क्या करना है और किधर जाना है।

और यह बात तो राजू मदारी भी अच्छी तरह जानता था कि उसे क्या करना है। इन्द्रजीत को पूर्णतः अपने अधीन रखने के लिए छः दिन पहले उसने जो अमल प्रारम्भ किया था उसे आज रात पूरा हो जाना था।

राजू मदारी रीछ की खाल पर बैठा काले जादू के किसी मंत्र का जाप कर रहा था। इन्द्रजीत उससे करीब पांच कदम फासले पर एक बड़े से पत्थर पर बैठा था। चारों तरफ अंधेरा था। इन्द्रजीत शकोच सोच से ही प्रसन्न और आत्म-विभोर था कि आज की रात उसकी इस कैद की आखिरी रात है और आने वाली सुबह इन अदृश्य के कटने की खबर लेकर आएगी। एक तरफ वह स्वतन्त्र हो जाएगा और दूसरी तरफ राजू मदारी अपनी जिन्दगी का सबसे कीमती जादू उसे सिखा देगा। इन्द्रजीत को अब बहुत से जादू आते थे लेकिन इस अविश्वसनीय जादू का महत्व कुछ और ही था।

आकाश कटकर गिरते मानव अंग और देखकर लोग सांस लेना तक भूल जाया करते थे और इस खेल के बाद उनपर
 
नोटों की बारिश हो जाती थी। वैसे, इन्द्रजीत को धन-दौलत की क्या परवाह थी। वह करोड़ों की जायदाद का मालिक था। पर इन जादुओं और सिद्धियों में भी उसकी दिलचस्पी बढ़ती ही रही थी। उसने बहुत कुछ सीखा था और बहुत कुछ सिखने की चाह थी। और अब तो वह पिछली कई रातों से अपनी मुक्ति के और राजकुमारी नयना के साथ दिल्ली अपने पिता के पास

पहुंच चुके होने सपने देखता रहा था।

उस बेचारे को क्या मालूम था कि आगे क्या होने वाला है? काश! उसे मालूम होता कि जिस कैद से मुक्ति के वह ख्वाब देख रहा है वह उससे भी कहीं बदतर और यातनामय कैद में चला जाएगा।

पत्थर पर बैठे-बैठे और सुहाने सपने देखते-देखते उसे ऊंध-सी आ गई।

उसी क्षण कुछ हुआ... और जो कुछ हुआ... वह उसका होश खड़ा देने के लिए काफी था।

राजू मदारी अचानक ही, किसी जानवर की तरह डकारा था जैसे किसी ने उसकी गर्दन पर धुरी फेर दी हो। इन्द्रजीत चौका और उसने आंखें फाड़कर राजू मदारी की तरफ देखा, मगर उसे कुछ नजर नहीं आया। रीछ की खाल ... फिर उस पर बैठा राजू मदारी खुद रीछ जैसा...पीछे काले पेड़ घना घनघोर अन्धेरा... ऐसे में भला क्या नजर आता।

"क्या हुआ, बाबा?" वह पत्थर से उठकर खड़ा हो गया।

"जल्दी कर, इन्द्र...। मेरे पास आ रे छोरे !" वह पीड़ा की तीव्रता से कराहते हुए बोला।

इन्द्रजीत को इतना अंदाजा तो था कि राजू मदारी कहां बैठा है उनके बीच महज पांच कदम का फासला था लेकिन

इन्द्र की समझ में नहीं आ रहा था कि राजू मदारी के साथ हुआ क्या है। शायद मंत्र उल्टा पड़ गया है। बहरहाल, वह जब अन्दाजे से राजू मदारी के करीब पहुंचा तो उसके पांव की ठोकर इन्द्र के सिर को लगी और राजू मदारी ने फौरन ही उसका पांव घसीटकर उसे अपने ऊपर गिरा लिया और उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बड़ी

कठिनाई से कहा-

"देवा मदद... देवा आह...।"

"क्या हुआ बाबा, कुछ बोलो तो...।" उसने अपना हाथ छुड़ाकर राजू मदारी के जिस्म को टटोलकर देखना चाहा लेकिन राजू मदारी की गिरफ्त मजबूत थी। उसने इन्द्रजीत का हाथ न छोड़ा।

"देवा मदद... देवा आ...।" उसने फिर कहना शुरू किया।

"बाबा, ओ बाबा! कुछ बताओ तो...।"

"अब का (क्या) बताऊं रे लोमड़ी के बच्चे... तन्त्रे खूब धोखा दिया रे...!"

"यह क्या कह रहे हो बाबा! में भला तुम्हे क्यों धोखा दूंगा। तुम ही तो मुझे यहां लाए हो... इस जंगल....।" इन्द्रजीत समझ में वास्तव में ही कुछ न आ रहा था।

"और वो जो तेरा बाप उधर बैठा है...रे...। उसे कौन लाया इधर सब जाण गया सूं मैं देवा की सौगन्ध सब जैणि गया सूं मैं पर याद रख तन्ने में आजाद नई होगे दूंगा...। देवा... ओ देवा...मदद।" राजू मदारी ने फिर जैसे किसी को मदद के लिए पुकारा था ।

राजू मदारी ने उसका हाथ बड़ी मजबूती से पकड़ लिया था और रह-रह कर बस यही बात दोहराये जा रहा था।

"देवा आ... देवा मदद...!"

राजू मदारी का हाथ काफी बड़ा था। बहुत सख्त था। उससे हाथ मिलाते वक्त यही अहसास होता था कोई पत्थर का टुकड़ा पकड़ लिया हो। पर अब इस वक्त... वो जैसे-जैसे देवा को मदद के लिए पुकारता जाता था उसका हाथ नर्म पड़ता जाता था।
 
"देवा काली... देवा मदद... देवा आ...।" राजू मदारी निरन्तर बोले जा रहा था। उसकी आवाज में बला की पीड़ी थी... दिल दहला देने वाली व्यथा थी।

और फिर... कुछ ही देर बाद इन्द्रजीत को महसूस हुआ जैसे उसका हाथ किसी औरत के हाथ में आ गया हो। वह एक बहुत ही नर्म हाथ था मांसल व रेशमी ।

राजू मदारी पीड़ा भरी आवाज आ रही थी "देवा... अब यह तेरे हवाले। मैं जाता हूँ मैं जाता।" 'राजू मदारी की आवाज धीरे-धीर दूर होती जा रही थी। यहां तक कि बिल्कुल ही धीमी पड़ गई।

फिर एक झटका सा लगा। वह नर्म, मुलायम और मांसल हाथ इन्द्रजीत के हाथ से छूट गया। राजू मदारी अपने साथ लालटेन लाया था। उसने कहा था कि जब अनुष्ठान और जाप खत्म हो जाएगा और इन्द्रजीत को जादू आ जाएगा तब लालटेन रास्ता दिखाने के काम आएगी।

इन्द्रजीत ने आंखें फाड़कर और हाथों से टटोलकर लालटेन तलाश की। जेब से माचिस निकालकर लालटेन जलाई। फिर उसने लालटेन अपने हाथ में पकड़कर जो जरा-सी ऊंची की और लालटेन की मध्यम रोशनी में उसे जो कुछ नजर आया वह उसके होश उड़ा देने के लिए काफी था।

उसके सामने राजू मदारी की लाश थी। वह बड़ी वीभत्स और भयानक लाश। उसकी लाश पिंघल चुकी थी... पिघल रही थी । लाश के गिर्द खून फैला हुआ था। इन्द्रजीत ने अनुमान लगा लिया कि उसे किसी बेहद जहरीले और खतरनाक साप ने काटा है।

सांप का ख्याल आते ही वह फौरन लाश से पीछे हट गया। उसने लालटेन की मध्यम रोशनी में ही इधर-उधर नजरें दौडाई | आस-पास किसी सांप का अस्तित्व नहीं था। अब उसने यहां ठहरना उचित न समझा।

वह लालटेन हाथ में ले योगी सपेरे दयाल के खेमे की तरफ चल दिया।
 
योगी दयाल का खेमा वहां से अधिक फासले पर नहीं था।

इन्द्रजीत लगभग आधे घन्टे बाद ही योगी दयाल के खेमे में पहुंच गया। उसके छोटे से खेमे का पर्दा गिरा ना था और अन्दर से मध्यम- मध्यम रोशनी बाहर निकल रही थी। खेमे के अन्दर से किसी किस्म की कोई आवाज नहीं आ रही थी। यही लगता था जैसे कोई भीतर नहीं है।

इन्द्रजीत ने खेमे का पर्दा हटा, झुककर भीतर देखा तो योगी दयाल उसके भीतर धूनी रमाये बैठा नजर आया। उसके सामने काले कपड़े का एक पुतला सा बना आ था जिसके बीचों-बीच एक उस्तरा पैवस्त था और उस्तरे पर एक हांडी आँधी रखी हुई थी। दाई तरफ एक खुली पिटारी रखी थी-योगी दयाल की गोद में एक बीन पड़ी थी। उसकी आंखें बन्द थीं।

इन्द्रजीत ने जैसे ही खेमे का पर्दा हटाया। योगी दयाल ने अपनी आंखें खोल दीं।

दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कराए।

"कहो क्या खबर लाए हो?" योगी सपेरे ने पूछा।

"राजू मदारी चल बसा...।" इन्द्रजीत ने खवर सुनाई।

'बधाई हो... आजादी मुबारक हो।' योगी दयाल अपनी खुशी दबा नहीं पाया था।

"क्या मैं आजाद हो गया? मैं जहां चाहूँ जा सकता हूँ। अब तो कोई मेरा कलेजा नहीं पकड़ेगा?" तेजी से ही पूछा था इन्द्रजीत ने

"हां, तुम मंत्रपाश से मुक्त हो गए हो। तुम्हारे ऊपर से जादू का असर खत्म हो गया है। इस काम के लिए मुझे बड़ी

मेहनत करनी पड़ी है। इसके अलावा मुझे अपने एक कीमती नाग से भी हाथ धोना पड़ा है।"

"वह कैसे?"

"राजू मदारी को ठिकाने लगाने की कीमत चुकानी पड़ी है।"

"क्या मतलब...?"

"इस काम के बदले में उसने आजादी मांगी थी जो मुझे देनी पड़ी। मजबूरी थी। राजू मदारी को ठिकाने लगरने का काम कोई और कर भी रहीं सकता था उस नाग के अलावा।”

"इसका मतलब है किए मेरा ख्याल सही निकला।"

बोला- "उसे वाकई किसी नाग ने इसा था?"

"हां और नाग भी ऐसा जिसका इसा पानी मांगना तो दूर की बात है खुद पानी-पानी हो जाए। तुमने उसकी लाश तो देख ली होगी?"

"बहुत बुरी हालत थी लाश की मुझसे तो देखी ही नहीं गई।" इन्द्रजीत ने एक झुरझुरी-सी ली।

और इस पर योगी दयाल बड़े ही शुष्क स्वर में बोला- "उसने जुल्म किया था। एक मानस पर जबरदस्ती कब्जा जमा रखा था। उसे उसके इस काम की सजा तो मिलनी ही थी। "

"योगी महाराज !" इन्द्रजीत ने हाथ जोड़ दिये- "मैं आपका बड़ा आभारी हूँ।"

"मैंने तुम पर कोई अहसान नहीं किया। मैंने इस काम का भरपूर मेहनताना लिया है।" योगी लापरवाही से बोला ।

इसमें कोई शक नहीं कि योगी दयाल को उसके इस काम के एवज में मोटी रकम मिली थी और उसकी यह मेहनत व्यर्थ नहीं गई थी। मामूली-सी गफलत से यह मामला उल्टा भी पड़ सकता था। अगर राजू मदारी को सांप के आने
 
का आभास कुछेक मिनट ही पहले हो जाता तो राजू मदारी की जगह इस खेमे में योगी दयाल की लाश पड़ी होती ।

राजू मदारी कोई मामूली चीज न था। वह अपने घमण्ड में मारा गया। उसके दिमाग में यह घमण्ड आ गया था कि इस वक्त दूर-दूर तक उससे बड़ा तांत्रिक कोई नहीं जो उसके मुकाबले पर आ सके। उसके किए जादू को तोड़ सके। लेकिन कभी-कभी यूं भी होता है कि हाथी को चींटी पछाड़ जाती है।

और फिर सूरतेहाल ऐसी सहज कहां थी जैसी योगी दयाल और इन्द्रजीत समझ रहे थे।

राजू मदारी इस दुनिया से चला तो गया था लेकिन जाते-जाते भी एक करतब दिखा गया था। वह मदारी जो था। उसने देवा काली दाह को पुकार लिया था। इस तरह इन्द्रजीत आकाश से गिरकर खजूर में आ अटका था, बल्कि सीधा पाताल में चला गया था और यह बात उसे मालूम थी न योगी दयाल को ।

बहरहाल, वह रात इन्द्रजीत ने योगी दयाल के साथ उसके खेमे में ही गुजारी ड्राईवर रघुवीर को सुबह वहीं आना था

और फिर शाम राजकुमारी नयना को इन्द्रजीत से मिलने नहर के पुल पर आना था। नयना ने इन्द्रजीत से कहा था कि

वह अपना सामान लेकर और बस्ती को अलविदा कहकर आए क्योंकि नयना उसे अपने साथ बहराम नगर लेकर

जाना चाहती थी। सुबह... निश्चित समय पर ही ड्राईवर रघुवीर आ पहुंचा। उसने उन दोनों को इकट्ठे देखा तो खुशी से झूम उठा। उसे शायद इन्द्रजीत के यहा मिलने की आशा नही थी।

"साहब जी...।" वह इन्द्रजीत से बोला- "आपको यहां देखकर बहुत खुशी हुई। इसका मतलब है कि योगी महाराज ने अपना चमत्कार दिखा दिया है...।"

"हां, रघुवीर ! उस जालिम का खात्मा हो चुका है।" इन्द्रजीत ने बताया ।

"वह है कहां?"

"जंगल में पड़ा है और अब तक तो शायद उसकी लाश पानी हो चुकी होगी।"

"फिर तो आपको यहां रुकने की जरूरत ही नहीं है। आप इसी वक्त मेरे साथ चलिये। योगी महराज को इनकी बस्ती में छोड़कर हम बहराम नगर हवेली में चले जाएंगे। राजकुमारी जी वहां प्रतीक्षक बैठी हैं। आपको साथ देखेंगी तो वह हर चिन्ता से मुक्त हो जाएंगी।" रघुवीर ने सुझाव दिया, जिसे इन्द्रजीत ने फौरन मान लिया।

यूं भी इन्द्रजीत का दिल बहुत घबरा रहा था वह इस इलाके से दूर निकल जाना चाहता था।

योगी दयाल ने जल्दी-जल्दी अपना सामान समेटा उसे जीप में डाला और यूं वे तीनों तुरन्त ही बहराम नगर की तरफ रवाना हो गए।

वे दोपहर तक बहराम नगर गये। योगी दयाल को उसकी बस्ती में छोड़ा और सुधीर इन्द्रजीत के साथ बहराम नगर राजा की हवेली में पहुंचा।

इस हवेली को देखकर इन्द्रजीत को अपनी सावनपुर वाली हवेली याद आ गई और उसके अपने चाचा रमाकात का

ख्याल तो आना ही था।

उसके चाचा रमाकांत ने उसे कक्त करवाने की कोशिश की थी। और इस वाक्य को गुजरे कई साल हो गये थे। यानी कि रमाकांत अब तक मुतमूईन और आश्वस्त हो चुका होगा कि अब उसकी राह में कोई काटा नहीं रहा। उस शैतान ने जाने उसकी गुमशुदगी के बारे में उसके मां-बाप को क्या कहानी सुनाई होगी। वे बचार तो परेशान हो गये होंगे।

रमाकांत के प्रति रोष की एक लहर, आज बरसों बाद इन्द्रजीत को उत्तेजित कर गई थी।

उसने सोचा अब कोई समस्या नहीं है। वह अब बच्चा नहीं रहा है... ज्यादा मजबूत, ज्यादा ताकतवर और ज्यादा अनुभवी हो चुका है। वह एक-एक को देख लेगा। पर...।

फिलहाल तो राजकुमारी नयना उसके सामने खड़ी थी उसे अभी तो उसे देखना था ।
 
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