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Guest
स्नेहा हँसती हुई मनु के कानो मे कही..... "बॉस, सेक्स ट्रिप के लिए कही थी, आप ये कौन सी ट्रिप पर ले जा रहे हो"
मनु.... धीरज रखो, और चुप-चाप मुझे फॉलो करो.
कुछ देर बाद प्लतेफोर्म पर एक ट्रेन आ कर रुकी. मनु, स्नेहा को अपने पिछे आने के लिए कहा.... स्नेहा ट्रेन को देख कर सोच मे पड़ गयी..... "ये देल्ही-मुंबई की ट्रेन मे, पता नही क्या करना चाह रहा है मनु.. इसका तो फ्यूज़ ही उड़ा हुआ है"
मनु के पिछे-पिछे स्नेहा चलती रही. कुछ देर बाद तो उसका दिमाग़ ही सुन्न पड़ गया....
स्नेहा.... मनु तुम सठिया गये हो, एक तो कब से मैं, नये एक्सिटमेंट का सोच-सोच कर जल रही हूँ, और तुम हो कि एक तो पहले रेलवे स्टेशन बुला लिया, उपर से ट्रेन से मुंबई जा रहे हो... और हद होती है अब ये जनरल कॉमपार्टमेंट....
मनु.... सीईईईईई...... चुप-चाप मेरे पिछे आओ.
गुस्से मे चेहरा लाल करती स्नेहा, मनु के पिछे-पिछे जा चुप-चाप जा कर उस जनरल कॉमपार्टमेंट मे बैठ गयी. स्नेहा विंडो सीट पर, और उसके बगल मे मनु बैठा.
स्नेहा गुस्सा दिखाती हुई मनु से कोई बात ना करते हुए चुप-चाप खिड़की के बाहर देखने लगी. मनु भी मॅगज़ीन उठाया और पढ़ने लगा. ट्रेन चली, धीरे-धीरे जनरल कॉमपार्टमेंट भरने लगा.... भीड़ इतनी हो गयी कि लोगों पर लोग चढ़े हुए थे.
स्नेहा विंडो सीट पर सिकुड़ी सी बैठी थी... आख़िर उसके सब्र का बाँध टूट गया....
स्नेहा.... मनु मैं अभी रिजाइन कर रही हूँ, मुझे तुम्हारे साथ कोई काम नही करना....
मनु... ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी...
स्नेहा... क्या???? ... मनु देखो ये ओवर हो रहा है... मुझे लगता है तुम्हारे दिमाग़ की नसें ढीली हो गयी हैं ... कोई फिजीशियन से इलाज करवाओ...
मनु हँसने लगा और स्नेहा की बातों का कोई जवाब नही दिया. कुछ देर बाद वो अपने बगल वाले से कुछ कहा और वो बंदा वहाँ से उठ कर चला गया...
मनु.... लो अब थोड़ी सी जगह बन गयी... आराम से बैठो...
स्नेहा.... हुहह !
ट्रेन चलती रही, और स्नेहा गुस्से मे खिड़की के बाहर देखती रही. धीरे-धीरे शाम भी होने लगी. सर्द हवाओं ने स्नेहा को हल्की ठंड का एहसास करवाया, वो थोड़ी सिकुड कर बैठ गयी....
मनु.... धीरज रखो, और चुप-चाप मुझे फॉलो करो.
कुछ देर बाद प्लतेफोर्म पर एक ट्रेन आ कर रुकी. मनु, स्नेहा को अपने पिछे आने के लिए कहा.... स्नेहा ट्रेन को देख कर सोच मे पड़ गयी..... "ये देल्ही-मुंबई की ट्रेन मे, पता नही क्या करना चाह रहा है मनु.. इसका तो फ्यूज़ ही उड़ा हुआ है"
मनु के पिछे-पिछे स्नेहा चलती रही. कुछ देर बाद तो उसका दिमाग़ ही सुन्न पड़ गया....
स्नेहा.... मनु तुम सठिया गये हो, एक तो कब से मैं, नये एक्सिटमेंट का सोच-सोच कर जल रही हूँ, और तुम हो कि एक तो पहले रेलवे स्टेशन बुला लिया, उपर से ट्रेन से मुंबई जा रहे हो... और हद होती है अब ये जनरल कॉमपार्टमेंट....
मनु.... सीईईईईई...... चुप-चाप मेरे पिछे आओ.
गुस्से मे चेहरा लाल करती स्नेहा, मनु के पिछे-पिछे जा चुप-चाप जा कर उस जनरल कॉमपार्टमेंट मे बैठ गयी. स्नेहा विंडो सीट पर, और उसके बगल मे मनु बैठा.
स्नेहा गुस्सा दिखाती हुई मनु से कोई बात ना करते हुए चुप-चाप खिड़की के बाहर देखने लगी. मनु भी मॅगज़ीन उठाया और पढ़ने लगा. ट्रेन चली, धीरे-धीरे जनरल कॉमपार्टमेंट भरने लगा.... भीड़ इतनी हो गयी कि लोगों पर लोग चढ़े हुए थे.
स्नेहा विंडो सीट पर सिकुड़ी सी बैठी थी... आख़िर उसके सब्र का बाँध टूट गया....
स्नेहा.... मनु मैं अभी रिजाइन कर रही हूँ, मुझे तुम्हारे साथ कोई काम नही करना....
मनु... ठीक है जैसी तुम्हारी मर्ज़ी...
स्नेहा... क्या???? ... मनु देखो ये ओवर हो रहा है... मुझे लगता है तुम्हारे दिमाग़ की नसें ढीली हो गयी हैं ... कोई फिजीशियन से इलाज करवाओ...
मनु हँसने लगा और स्नेहा की बातों का कोई जवाब नही दिया. कुछ देर बाद वो अपने बगल वाले से कुछ कहा और वो बंदा वहाँ से उठ कर चला गया...
मनु.... लो अब थोड़ी सी जगह बन गयी... आराम से बैठो...
स्नेहा.... हुहह !
ट्रेन चलती रही, और स्नेहा गुस्से मे खिड़की के बाहर देखती रही. धीरे-धीरे शाम भी होने लगी. सर्द हवाओं ने स्नेहा को हल्की ठंड का एहसास करवाया, वो थोड़ी सिकुड कर बैठ गयी....