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हवस की रंगीन दुनियाँ complete

सर ने मेरे चेहरे के नीचे एक तकिया दिया और अपने घुटने मेरे बदन के दोनों ओर टेक कर बैठ गये. "अब अपने चूतड़ पकड़ और खोल, तुझे भी आसानी होगी और मुझे भी. और एक बात है बेटे, गुदा ढीला छोड़ना नहीं तो तुझे ही दर्द होगा. समझ ले कि तू लड़की है और अपने सैंया के लिये चूत खोल रही है, ठीक है ना?"

मैंने अपने हाथ से अपने चूतड़ पकड़कर फ़ैलाये. सर ने मेरे गुदा पर लंड जमाया और पेलने लगे "ढीला छोड़ अनिल, जल्दी!"

मैंने अपनी गांड का छेद ढीला किया और अगले ही पल सर का सुपाड़ा पक्क से अंदर हो गया. मेरी चीख निकलते निकलते रह गयी. मैंने मुंह में भरी चप्पल दांतों तले दबा ली और किसी तरह चीख निकलने नहीं दी. बहुत दर्द हो रहा था.

सर ने मुझे शाबासी दी "बस बेटे बस, अब दर्द नहीं होगा. बस पड़ा रह चुपचाप" और एक हाथ से मेरे चूतड़ सहलाने लगे. दूसरा हाथ उन्होंने मेरे बदन के नीचे डाल कर मेरा लंड पकड़ लिया और उसे आगे पीछे करने लगे.

दो मिनिट में जब दर्द कम हुआ तो मेरा कसा हुआ बदन कुछ ढीला पड़ा और मैंने जोर से सांस ली. सर समझ गये. झुक कर मेरे बाल चूमे और बोले "बस , अब धीरे धीरे अंदर डालता हूं. एक बार तू पूरा ले ले, फ़िर तुझे समझ में आयेगा कि इस लेसन में कितना आनंद आता है" फ़िर वे हौले हौले लंड मेरे चूतड़ों के बीच पेलने लगे. दो तीन इंच बाद जब मैं फ़िर से थोड़ा तड़पा तो वे रुक गये. मैं जब संभला तो फ़िर शुरू हो गये.

पांच मिनिट बाद उनका पूरा लंड मेरी गांड में था. गांड ऐसे दुख रही थी जैसे किसीने हथौड़े से अंदर से ठोकी हो. सर की झांटें मेरे चूतड़ों से भिड़ गयी थीं. सर अब मुझ पर लेट कर मुझे चूमने लगे. उनके हाथ मेरे बदन के इर्द गिर्द बंधे थे और मेरे निपलों को हौले हौले मसल रहै थे.

सर बोले "दर्द कम हुआ बेटे?"

मैंने मुंडी हिलाकर हां कहा. सर बोले "अब तुझे प्यार करूंगा, मर्दों वाला प्यार. थोड़ा दर्द भले हो पर सह लेना, देख मजा आयेगा" और वे धीरे धीरे मेरी गांड मारने लगे. मेरे चूतड़ों के बीच उनका लंड अंदर बाहर होना शुरू हुआ और एक अजीब सी मस्ती मेरी नस नस में भर गयी. दर्द हो रहा था पर गांड में अंदर तक बड़ी मीठी कसक हो रही थी.

एक दो मिनिट धीरे धीरे लंड अंदर बाहर करने के बाद मेरी गांड में से ’सप’ ’सप’ ’सप’ की आवाज निकलने लगी. तेल पूरा मेरे छेद को चिकना कर चुका था. मैं कसमसा कर अपनी कमर हिलाने लगा. चौधरी सर हंसने लगे "देखा, आ गया रास्ते पर. मजा आ रहा है ना? अब देख आगे मजा" फ़िर वे कस के लंड पेलने लगे. सटा सट सटा सट लंड अंदर बाहर होने लगा. दर्द हुआ तो मैंने फ़िर से मैडम की चप्पल चबा ली पर फ़िर अपने चूतड़ उछाल कर सर का साथ देने लगा.

. बता .... आनंद आया या नहीं?"

"हां ....सर ... आप का ... लेकर बहुत .... मजा .... आ .... रहा .... है ...." सर के धक्के झेलता हुआ मैं बोला " सर .... आप ... को .... कैसा .... लगा .... सर?"

"अरे राजा तेरी मखमली गांड के आगे तो गुलाब भी नहीं टिकेगा. ये तो जन्नत है जन्नत मेरे लिये ... ले ... ले ... और जोर .... से करूं ...." वे बोले.

"हां .... सर ... जोर से .... मारिये .... सर .... बहुत .... अच्छा लग ... रहा है .... सर"

सर मेरी पांच मिनिट मारते रहै और मुझे बेतहाशा चूमते रहै. कभी मेरे बाल चूमते, कभी गर्दन और कभी मेरा चेहरा मोड कर अपनी ओर करते और मेरे होंठ चूमने लगते. फ़िर वे रुक गये.

मैंने अपने चूतड़ उछालते हुए शिकायत की "मारिये ना सर ... प्लीज़"

"अब दूसरा आसन. भूल गया कि ये लेसन है? ये तो था गांड मारने का सबसे सीदा सादा और मजेदार आसन. अब दूसरा दिखाता हूं. चल उठ और ये सोफ़े को पकड़कर झुक कर खड़ा हो जा" सर ने मुझे बड़ी सावधानी से उठाया कि लंड मेरी गांड से बाहर न निकल जाये और मुझे सोफ़े को पकड़कर खड़ा कर दिया. "झुक , ऐसे सीधे नहीं, अब समझ कि तू कुतिया है .... या घोड़ी है ... और मैं पीछे से तेरी मारूंगा"

मैं झुक कर सोफ़े के सहारे खड़ा हो गया. सर मेरे पीछे खड़े होकर मेरी कमर पकड़कर फ़िर पेलने लगे. आगे पीछे आगे पीछे. सामने आइने में दिख रहा था कि कैसे उनका लंड मेरी गांड में अंदर बाहर हो रहा था. देख कर मेरा और जोर से खड़ा हो गया. मस्ती में आकर मैंने एक हाथ सोफ़े से उठाया और लंड पकड़ लिया. सर पीछे से पेल रहै थे, धक्के से मैं गिरते गिरते बचा.

"चल.. जल्दी हाथ हटा और सोफ़ा पकड़ नहीं तो तमाचा मारूंगा" सर चिल्लाये.

"सर ... प्लीज़... रहा नहीं जाता ..... मुठ्ठ मारने का मन .... होता है" मैं बोला.

"अरे मेरे राजा मुन्ना, यही तो मजा है, ऐसी जल्दबाजी न कर, पूरा लुत्फ़ उठा. ये भी इस लेसन का एक भाग है" सर प्यार से बोले. "और अपने लंड को कह कि सब्र कर, बाद में बहुत मजा आयेगा उसे"

सर ने खड़े खड़े मेरी दस मिनिट तक मारी. उनका लंड एकदम सख्त था. मुझे अचरज हो रहा था कि कैसे वे झड़े नहीं. बीच में वे रुक जाते और फ़िर कस के लंड पेलते. मेरी गांड में से ’फ़च’ ’फ़च’ ’फ़च’ की आवाज आ रही थी.

फ़िर सर रुक गये. बोले "थक गया बेटे? चल थोड़ा सुस्ता ले, आ मेरी गोद में बैठ जा. ये है तीसरा आसन ,आराम से प्यार से चूमाचाटी करते हुए करने वाला" कहकर वे मुझे गोद में लेकर सोफ़े पर बैठ गये. लंड अब भी मेरी गांड में धंसा था.

मुझे बांहों में लेकर सर चूमा चाटी करने लगे. मैं भी मस्ती में था, उनके गले में बांहें डाल कर उनका मुंह चूमने लगा और जीभ चूसने लगा. सर धीरे धीरे ऊपर नीचे होकर अपना लंड नीचे से मेरी गांड में अंदर बाहर करने लगे.

पांच मिनिट आराम करके सर बोले "चल अनिल, अब मुझसे भी नहीं रहा जाता, क्या करूं, तेरी गांड है ही इतनी लाजवाब, देख कैसे प्यार से मेरे लंड को कस के जकड़े हुए है, आ जा, इसे अब खुश कर दूं, बेचारी मरवाने को बेताब हो रहा है, है ना?"

मैं बोला "हां सर" मेरी गांड अपने आप बार बार सिकुड़ कर सर के लंड को गाय के थन जैसा दुह रही थी.

"चलो, उस दीवार से सट कर खड़े हो जाओ" सर मुझे चला कर दीवार तक ले गये. चलते समय उनका लंड मेरी गांड में रोल हो रहा था. मुझे दीवार से सटा कर सर ने खड़े खड़े मेरी मारना शुरू कर दी. अब वे अच्छे लंबे स्ट्रोक लगा रहै थे, दे दनादन दे दनादन उनका लंड मेरे चूतड़ों के बीच अंदर बाहर हो रहा था.

 
थोड़ी देर में उनकी सांस जोर से चलने लगी. उन्होंने अपने हाथ मेरे कंधे पर जमा दिये और मुझे दीवार पर दबा कर कस कस के मेरी गांड चोदने लगे. मेरी गांड अब ’पचाक’ पचाक’ ’पचाक’ की आवाज कर रही थी. दीवार पर बदन दबने से मुझे दर्द हो रहा था पर सर को इतना मजा आ रहा था कि मैंने मुंह बंद रखा और चुपचाप मरवाता रहा. चौधरी सर एकाएक झड़ गये और ’ओह ... ओह ... अं ... आह ...." करते हुए मुझसे चिपट गये. उनका लंड किसी जानवर जैसा मेरी गांड में उछल रहा था. सर हांफ़ते हांफ़ते खड़े रहै और मुझपर टिक कर मेरे बाल चूमने लगे.

पूरा झड़ कर जब लंड सिकुड़ गया तो सर ने लंड बाहर निकाला. फ़िर मुझे खींच कर बिस्तर तक लाये और मुझे बांहों में लेकर लेट गये और चूमने लगे " बेटे, बहुत सुख दिया तूने आज मुझे, बहुत दिनों में मुझे इतनी मतवाली कुवारी गांड मारने मिली है, आज तो दावत हो गयी मेरे लिये. मेरा आशिर्वाद है तुझे कि तू हमेशा सुख पायेगा, इस क्रिया में मेरे से ज्यादा आगे जायेगा. तुझे मजा आया? दर्द तो नहीं हुआ ज्यादा?"

सर के लाड़ से मेरा मन गदगद हो गया. मैं उनसे चिपट कर बोला "सर .... बहुत मजा आया सर .... दर्द हुआ .... आप का बहुत बड़ा है सर ... लग रहा था कि गांड फ़ट जायेगी ... फ़िर भी बहुत मजा आ रहा था सर"

सर उठ कर रचना को पलंग पर लेते हुए बोले "क्यों नहीं, आ जा रचना बेटी, अभी चोद देता हूं, तेरे भाई को चोदा, अब तुझे चोद कर तेरी प्यास बुझा देता हूं. पर झड़ूंगा नहीं रचना "

रचना सी सी करती रही, कुछ बोली नहीं. उसका चेहरा तमतमा गया था, आंखें चमक रही थीं. सर ने उसकी टांगें फ़ैला कर उसकी बुर में लंड डाला और शुरू हो गये. रचना ऐसे सर को चिपकी जैसे बंदर का बच्चा अपनी मां को जकड़ लेता है, अपने हाथों और पैरों से सर के बदन को बांध कर कमर हिलाने लगी "सर ... चोदिये सर .... प्लीज़ सर ... जोर से सर ... आह .... ओह"

सर कस के रचना को चोद रहै थे, अंदर तक लंड पेल रहै थे. रचना अपने हाथों से उनके पीठ को नोंच रही थी. फ़िर रचना चीखी और लस्त हो गयी. पर सर ने उसे नहीं छोड़ा. मेरी ओर मुड़कर बोले " यहां ध्यान दो, ये आसन ध्यान से देखो" उन्होंने रचना के पैर मोड़कर उसकी टांगें रचना के सिर के इर्द गिर्द कर दीं और फ़िर उसे चोदने लगे.

"देखा? ऐसे मोड़ कर मस्त चोदा जा सकता है, फ़िर छेद कोई भी हो, समझे ना? चाहै चूत में डाल दो या गांड में, आसन यही रहता है. और आगे से मस्त चुम्मे ले लेकर प्यार करते हुए गांड भी चोद सकते हैं."

मैं बोला "हां सर"

रचना कसमसा रही थी "बस सर ... हो गया .... अब नहीं ... प्लीज़ .... छोड़िये ना .... मत कीजिये सर ...... प्लीज़ ...... मैं झड गयी सर.... बस...." पर सर चोदते रहै. "अरे रचना रानी, ऐसे हथियार नहीं डालते. अब चुदा रही हो तो पूरा चुदाओ" रचना हल्के हल्के चीखने लगी तो सर ने उसका मुंह अपने मुंह से बंद कर दिया.

पांच मिनिट में रचना निश्चल होकर लुढ़क गयी. सर ने लंड बाहर निकाला "लो, ये तो गयी काम से. वैसे बड़ी प्यारी बच्ची है, काफ़ी रसिक है, इसकी चूत क्या गीली थी

मैं रचना के बाजू में पेट के बल लेटने लगा तो सर बोले "अरे वो आसन तो हो गया, अब सामने वाला, बिलकुल जैसे तेरी रचना को चोदा ना, वैसे. इसलिये तो तुझे देखने को कहा था मूरख, भूल गया? सीधा लेटो. तू भूल जायेगा कि तेरी गांड मार रहा हूं, तुझे भी यही लगेगा कि तेरी चूत चोद रहा हूं. ये अपने पैर मोड़ो बेटे, और ऊपर ... उठा लो ऊपर ... और ऊपर .... अपने सिर तक .... हां अब ठीक है"

 
मैंने टांगें उठाईं. सर ने उन्हें मोड कर मेरे टखने मेरे कानों के इर्द गिर्द जमा दिये. कमर दुख रही थी. "अब इन्हें पकड़ो और मुझे अपना काम करने दो" कहकर सर मेरे सामने बैठ गये और लंड मेरी पूरी खुली गांड पर रखकर पेलने लगे. पक्क से लंड आधा अंदर गया. मैंने सिर्फ़ जरा सा सी सी किया, और कुछ नहीं बोला.

"शाबास बेटे, अब तू पूरा तैयार हो गया है, देखा जरा सा भी नहीं चिल्लाया मेरा लंड लेने में. कमर दुखती है क्या ऐसे टांगें मोड़ कर?"

"हां सर" मैंने कबूल किया.

"पहली बार है ना! आदत हो जायेगी. ये आसन बड़ा अच्छा है कमर के लिये, योगासन जैसा ही है. तेरी कमर लड़कियों से ज्यादा लचीली हो जायेगी देखना. अब ये ले पूरा ...." कहकर उन्होंने सधा हुआ जोर लगाया और लंड जड़ तक मेरे चूतड़ों के बीच उतार दिया. एक दो बार वैसे ही उन्होंने लंड अंदर बाहर किया और फ़िर सामने से मेरे ऊपर लेट गये.

मैंने थोड़ा ऊपर उठकर सर की पीठ को बांहों में भींच लिया और अपने पैर उनकी कमर के इर्द गिर्द लपेट लिये. बहुत अच्छा लग रहा था सर के सुडौल बदन से ऐसे आगे से चिपटकर. मेरा लंड उनके पेट और मेरे पेट के बीच दब गया था.

सर ने प्यार से मुझे चूमा और चोदने लगे. "अच्छा लग रहा है ? या तुझे थोड़ी देर को समझ ले कि तू लड़की है और चूत चुदा रही है" फ़िर मेरे गाल और आंखें चूमने लगे. वे मुझे हौले हौले चोद रहै थे, बस दो तीन इंच लंड बाहर निकालते और फ़िर अंदर पेलते.

कुछ देर मैं पड़ा पड़ा चुपचाप गांड चुदवाता रहा. फ़िर कमर का दर्द कम हुआ और मेरी गांड ऐसी खिल उठी जैसे मस्ती में पागल कोई चूत. गांड के अंदर मुझे बड़ी मीठी मीठी कसक हो रही थी. जब सर का सुपाड़ा मेरी गांड की नली को घिसता तो मेरी नस नस में सिहरन दौड़ उठती. मेरा लंड भी मस्ती में था, बहुत मीठी मीठी चुभन हो रही थी. मुझे लगा कि लड़कियों के क्लिट में कुछ ऐसा ही लगता होगा.

सर पर मुझे खूब प्यार आने लगा वैसा ही जैसे किसी लड़की को अपने आशिक से चुदवाने में आता होगा. मैंने उन्हें जम के अपनी बांहों में भींचा और बेतहाशा उन्हें चूमने लगा "सर .... मेरे अच्छे सर .... बहुत अच्छा लग रहा है सर..... चोदिये ना .... कस के चोदिये ना .... फ़ाड दीजिये मेरी गां .... चूत .... मेरी चूत को ढीला कर दीजिये सर ..... ओह सर ... आप अब जो कहेंगे मैं ... करूंगा सर .... आप .... आप मेरे भगवान हैं सर ....सर मैं आप को बहुत प्यार करता हूं सर .... सर .... आप को मैं अच्छा लगता हूं ना सर" और कमर उछाल उछाल कर मैं अपनी गांड में सर के लंड को जितना हो सकता है उतना लेने की कोशिश करने लगा.

सर ने मुझे खूब देर चोदा. हचक हचक कर धक्के लगाये और मेरी कमर करीब करीब तोड़ दी.

पाल सर से गांड मराने के बाद मुझे गांड मरवाने की तलब उठने लगी में ऐसे किसी लड़के की तलाश में जुट गया जिसे मेरी तरह गांड मारने और मरवाने का शोक हो ईस चक्कर में मुझे ढेर सारे नए दोस्त बने , उनमे से एक लड़का 'वरुण' मेरी तरह लोकल था , शहर में उसके पापा का गैराज था | |

एक दिन 11 बजे के करीब कालेज में वरुण ने मुझे क्लास बंक करके अपने घर चलने के लिए बोला क्योंकि उसकी माँ दो घंटे के लिए अपनी किसी सहैली के यहाँ जाने वाली थी | उसका घर कालेज से नजदीक है इसलिए एक क्लास ही बंक करना पड़ता अन्यथा मेरे घर पर जाने पर तो पुरे दिन की छुट्टी हो जाता इसलिए मौक़ा मिलने पर हम वरुण के घर ही जाते साथ ही उसका घर सुरक्षित भी था क्योंकि घर का मुख्य दरवाजा औटोमटिक लॉक था इसलिए गलती से खुला छुट जाने पर भी सिर्फ भिड़ा देने पर भी अपने आप बंद हो जाता और फिर चाभी से ही अन्दर या बाहर से खुलता | इसलिए हम उसके घर पहुंचकर वरुण के कमरे में निश्चिन्त होकर अपने काम में जुट गए …कमरा बंद करने की जरुरत भी नहीं समझा ....पहले धीरे धीरे फिर काम ने तेजी पकड़ लिया …

मै तूफानी गति से वरुण की गांड मार रहा था …बस कुछ क्षणों में ही मै झड़ने वाला था की एक आवाज ने मुझे जडवत कर दिया …..है ..भगवान् ! ……ये क्या हो रहा है …..छि.. छि ………………..वरुण ने अपनी माँ की आवाज पहचानते ही तुरंत मेरे नीचे से छिटककर बिस्तर के दूसरी तरफ कूद गया और इधर मेरा लंड ...फ …..क …..की आवाज के साथ वरुण की गांड से बाहर निकला और सांप की तरह हवा में एक बार लहराया मैंने उसे पकड़कर अपनी मुठ्ठी में भींच लिया क्योंकि विस्फोट तो हो चुका था और लावा बस ज्वालामुखी द्वार से बाहर निकलने को बेताब था …..मेरा दिमाग बिलकुल काम करना बंद कर दिया था ….मैं बस स्खलित होना चाहता था …..इसलिए मै अपना लंड दबाते हुए अपने आनंद के शत्रु उस आगंतुक की तरफ मुड़ा …..और तभी विस्फोट का लावा एक मोटी धार की शक्ल ले आगंतुक के गर्दन …छाती ….बांह …और …पेट …को तर कर दिया ……….अपनी माँ की ये स्थिति देख वरुण अपना पैंट समेटते हुए कमरे से बाहर की तरफ भागा ….

 
इ ….स ….स ….है …..भ ..ग वा …न …. सा ..ले …ने ….मुझे ….भी …गंदा ….कर दिया ….छि .....छि........ह.रा मी …..कहीं …का …..उसकी माँ ने मुझे गालियाँ निकाली …..तब मुझे एहसास हुआ की वस्तुतः हुआ क्या …….और सारा माजरा समझते ही मैंने अपना पैंट उठाया और नंगे ही वरुण के पीछे पीछे कमरे से बाहर भागा और कमरे से बाहर आकर मैंने पैंट पहना तब तक वरुण अपना पैंट पहनकर तेजी से मुख्य द्वार को भड़ाक से खींचते हुए घर से बाहर भागा ……और जब मै बाहर भागने के लिए मुख्य द्वार को खींचा तो वो खुला ही नहीं …तब मुझे याद आया की ये तो ऑटोमेटिक लॉक है और ये चाभी के बिना नहीं खुल सकता ..और इसकी चाभी अभी या तो वरुण के पास थी या उसकी माँ के पास ..वरुण तो भाग चुका था और आंटी के सामने जाने की हिम्मत मुझमे नहीं थी ….साले वरुण ने डर और जल्दबाजी में मुझे फंसा दिया था।

मै वहीँ कोरिडोर में कोने में खडा हो गया और सोंचने लगा क्या करूँ | इस तरह वहां खडा भी तो नहीं रह सकता था क्योंकि एक -डेढ़ घंटे बाद वरुण के पापा खाना खाने के लिए आते और मुझे वहां देखते तो स्थिति और बिगड़ जाता | हल तो एक ही दिखाई दे रहा था कि किसी तरह आंटी के पास जाकर उनसे माफ़ी मांगू ...उनके पैर पकडूँ....और किसी तरह उनसे चाभी लेकर दरवाजा खोलूं और फिर दुबारा इस घर में नजर न आऊं....|

इसलिए मन को समझाते हुए की इसके सिवा और कोई चारा nahi है , मै किसी तरह हिम्मत जुटाकर आंटी के पास जाने का फैसला किया | मै धीरे धीरे बोझिल कदमो से वरुण के कमरे की खिड़की तक पहुंचा और वहीँ से उचककर एक बार अन्दर झांका …..झांकते ही मेरे बढ़ते कदमो को ब्रेक लग गया …….अन्दर आंटी के साडी का पल्लू गिरा हुआ था और ब्लाउज के सारे बटन खुले हुए थे ….फिर मेरे देखते ही देखते उन्होंने अपना ब्लाउज निकाला और सफ़ेद ब्रा के हुक को भी हाथ पीछे ले जाकर खोल दिया ….और जैसे ही उन्होंने ब्रा को भी निकाला …उनके ये बड़े बड़े कबूतर आजाद हो गए …..मै पहली बार इतना बड़ा पर्वत सरीखे चुचियों को अपनी आँखों से देख रहा था जिसके बीच में ताना हुआ चुचक पर्वत शिखर जैसा प्रतीत हो रहा था और जिसकी घाटी में ‘मेरा लावा ’ अभी तक बह रहा था ….फिर आंटी ने बिस्तर पर पड़े टॉवेल से अपने शरीर को पोंछना शुरू कर दिया ….

मै देखता और सोंचता रहा की अब क्या करूँ ?.... इस समय उनके सामने जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था ….. वहां पर खड़े खड़े आंटी द्वारा देख लिए जाने का भी भय था ….इसलिए मै उलटे पाँव वापस मुख्या द्वार के कारीडोर में आ गया …थोड़ी देर बाद आंटी वरुण के कमरे से निकली …साडी से उनका बदन ढंका हुआ था और उनके हाथ में ब्लाउज और ब्रा नजर आ रहा था …..शायद उन्होंने अपने नंगे जिस्म के ऊपर साडी वैसे ही लपेट लिया था ……पता नहीं किस भावनावश मै तुरंत कारीडोर के खम्भे की ओट में आ गया …जबकि मुझे वहीँ पर खडा रहना चाहिए था , कम से कम आंटी मुझे देख तो लेती कि मै अभी तक वहीँ हूँ ….फिर किसी तरह गिड़गिडाकर उनसे दरवाजा खुलवाता और फिर स्वतंत्र हो जाता ….परन्तु कहते है न -‘विनाशकाले बिपरीत बुध्धी’……आंटी कारीडोर तक आयी और दूर से दरवाजा देखकर वापस बाथरूम में घुस गयी ….परन्तु जब उन्हें बाथरूम में देर लगने लगा तो मै बेचैन होने लगा ….फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि आंटी चाभी तो बाथरूम में लेकर नहीं गयी होगी , चाभी जरुर उनके कमरे में ही होगी ……शायद …पर्स में ….मेरे दिमाग में बस एक ही बात आ रहा था कि किसी तरह चाभी मुझे मिल जाए और मै फुर्र हो जाऊं … मुझे क्या पता था कि मेरी ये सोंच एक और नयी मुसीबत पैदा करने वाली है …..

 
आंटी कारीडोर तक आयी और दूर से दरवाजा देखकर वापस बाथरूम में घुस गयी ….परन्तु जब उन्हें बाथरूम में देर लगने लगा तो मै बेचैन होने लगा ….फिर मेरे मन में एक ख्याल आया कि आंटी चाभी तो बाथरूम में लेकर नहीं गयी होगी , चाभी जरुर उनके कमरे में ही होगी ……शायद …पर्स में ….मेरे दिमाग में बस एक ही बात आ रहा था कि किसी तरह चाभी मुझे मिल जाए और मै फुर्र हो जाऊं … मुझे क्या पता था कि मेरी ये सोंच एक और नयी मुसीबत पैदा करने वाली है …..

किसी तरह हिम्मत जुटाकर मै आंटी के कमरे की तरफ जाने लगा | रास्ते में मुझे बाथरूम से आंटी के नहाने और पानी गिरने की आवाज आ रही थी | तभी मुझे ख़याल आया कि मैंने अभी तक आंटी को पूर्णतः नग्न तो देखा ही नहीं है, सिर्फ उनकी बड़ी बड़ी चुंचियां ही देखा था और उनकी चूत और गांड देखने का इससे बढ़िया मौक़ा मुझे नहीं मिल सकता था , इसी भावनावश मै बाथरूम के पास जाकर कोई छेद ढूढने लगा परन्तु दरवाजा हैंडल से बंद और खुलने वाला था इसलिए उसमे कोई की-होल भी नहीं था , मै बेसब्र होकर किसी तरह अन्दर देखने की कोशिश करने लगा |

तभी कहते है ना - जहां चाह , वहां राह | मुझे लकड़ी के दरवाजे के दो पाटो के बीच हल्का सा गैप मिला , वही से मै आँख सटाकर अन्दर देखने लगा ...आ..ह ...क्या नजारा था .... आंटी के बड़े बड़े भाड़ी भड़कम चुतर पानी डालने के क्रम में ऊपर नीचे हो रहै थे | आंटी के गोल गोल गांड को देखकर मेरे लंड ने सलामी दी | परन्तु काफी कोशिश के बाद भी मै उनका बुर देखने में कामयाब नहीं हो सका ...बस बुर के उभार का हल्का झलक सा मिला |

मैंने अपना लंड निकालकर उसे मुठीयाने लगा ..लंड चिपचिपा सा लगा ..देखा तो जेली अभी तक चमक रहा था जो मैंने वरुण की गांड मारने के लिए लगाया था , मैंने रुमाल निकालकर उसे अच्छी तरह से साफ़ किया और फिर आँख दरार से सटाकर आंटी के नग्न बदन को देखते हुए अपने लंड को उमेठने लगा |थोड़ी देर बाद आंटी जब झुकी तब पीछे से आंटी के चूत के दरारों के दर्शन हुए .. मै धन्य हो गया ..आंटी अपने बदन पर साबुन मल रही थी और अपनी चूत कस कसकर रगड़ रही थी ...मै थोड़ी देर देखता रहा फिर ध्यान आया मुझे देर हो रहा है और अगर चूत के चक्कर में थोड़ी देर और रहा तो या तो पिटूंगा या जेल जाउंगा |

तब मैंने खड़े लंड को अपने पैंट में ठूंसते हुए चाभी सर्च करने आंटी के कमरे की तरफ चल पडा | कमरा काफी साफ़ सुथरा था ..बिस्तर भी करीने से सजा था , मैंने तकिये की तरफ देखा क्योंकि प्रायः तकिये के पास ही चाभी रक्खी जाती है परन्तु वहां पर एक छोटा टॉवेल के अलावा कुछ नहीं पडा था, फिर मैंने आलमारी की तरफ देखा जो कि खुला ही था परन्तु उसमे भी पर्स जैसा कुछ नहीं दिखा जिसमे मै चाभी ढूंढ़ सकूँ | फिर मैंने कमरे में नजर दौडाया ....बिस्तर के बिलकुल बगल में कमरे के दरवाजे के ठीक सामने ड्रेसिंग टेबल था और बिस्तर के दूसरी तरफ खिड़की के पास एक मेज था, सबसे पहले मैंने ड्रेसिंग टेबल पर नजर दौडाया ,फिर उसका ड्रावर खोलकर देखा परन्तु मुझे चाभी कहीं नहीं मिली | फिर मै बिस्तर के दूसरी तरफ कोने में रखे मेज के पास गया और वहाँ चाभी ढूंढने लगा

लेकिन हाय रे मेरी किस्मत ... चाभी वहाँ भी नहीं मिला | फिर मै सोंचने लगा कि कहाँ हो सकता है ? मुझे पर्स भी नहीं दिखाई दे रहा था | फिर मुझे ध्यान आया कि आंटी तो सीधा बाहर से आकर वरुण के कमरे में गयी थी , तो शायद...... आंटी का पर्स वरुण के कमरे में ही होगा | यह ध्यान में आते ही मै अपने आप को कोसने लगा कि अगर थोड़ा भी दिमाग लगाया होता तो इस मुसीबत से निजात पा वरुण के घर से बाहर होता | अतः समय नष्ट ना करते हुए मै तुरंत वहाँ से निकलने को उदृत हुआ ही था कि बाथरूम का दरवाजा बंद होने और आंटी के कदमो कि आहट सुनकर मेरे पैरो को ब्रेक लग गए | कमरे से बाहर निकलने के प्रयास में ही पकड़ा जाता | मेरा दिमाग एकदम सुन्न हो गया ...दिल डर से बैठने लगा | क्या करूँ ? बेड के नीचे भी घुस नहीं सकता था क्योकि बेड बहुत नीचा था |

 
तभी आंटी ने कमरे में प्रवेश किया ....बिलकुल नग्न ....वो शायद बाथरूम में पहनने वाले कपडे ले ही नहीं गयी थी .....मै मूर्तिवत जहां खडा था ..वहीँ खिड़की के परदे और मेज के कोने में जडवत हो गया | आंटी सामान्य ढंग से चलते हुए बेड पर पड़े छोटे टावेल से शरीर पोंछा और ड्रेसिंग टेबल के पास आकर अपनी सुन्दरता को निहारने लगी...आंटी वास्तव में खुबसूरत थी ...हाँ शरीर पर थोड़ा चर्बी जरुर चढ़ गया था जो पेट के निचले हिस्से के रूप में लटक रहा था लेकिन वो भी बड़ी बड़ी चुंचियों और मांसल पुष्ट जाँघों के साथ मिलकर उनके इस उम्र में भी गदरायेपन का ही एहसास दिला रही थी |

आंटी मुझे अभी तक देख नहीं पाई थी खिड़की से आने वाली रौशनी सीधे उनके शरीर पर पड़ रहा था और मै परदे के बगल में थोड़े अँधेरे में था |मै अब अपना डर भूलकर आंटी की नग्न सुन्दरता को निहारने लगा ...आ..ह... इस उमर में भी क्या गदराई थी वो . ..बड़ी बड़ी चुंचिया ...गोल मटोल तरबूज सरीखे चुतर ...और जांघो के जोड़ो के बीच में पाँवरोटी के समान फूली हुई बुर ....वास्तव में आंटी अभी भी चोदने लायक माल थी | जब आंटी ने खड़े खड़े अपना एक पैर उठाकर बिस्तर पर रखा और ड्रेसिंग टेबल से पाउडर का डब्बा उठाकर पाउडर का पफ पहले अपनी चूंचियों और फिर अपनी मखमली फूली हुई चूत पर लगाया तो उनकी चूत जो हलकी कालिमा लिए थी , परदे से छनकर आती हुई हलकी रौशनी में भी दूर से ही चमक उठी |

चमकते चूत को देखते ही मेरे लंड ने सलामी दी , मैंने बाएं हाथ से लंड को कसकर पकड़ा | तभी आंटी चौकन्नी हुई और परदे की तरफ गौर से देखने लगी , शायद मेरे लंड उमेठने के कारण हुई हलचल के कारण उनका ध्यान परदे की तरफ गया था | फिर उन्होंने जैसे ही मुझे देखा और पहचाना ...उ..ई माँ ..कहते हुए नंगी ही बाथरूम की तरफ भागी | पीछे पीछे मै भी कमरे से निकलने के लिए भागा , इस क्रम में भागने के कारण आंटी के मटकते गांड के दर्शन कुछ क्षण और हो गए | मै सीधा फिर कारीडोर में ही जाकर रुका |

थोड़ी देर बाद बाथरूम से आंटी चिल्लाई - वरुण ....वरुण... कहाँ हो तुम ? बोलते क्यों नहीं ?वरुण ....वरुण..

तब मैंने बाथरूम के पास आकर जबाब दिया - आंटी ...वरुण घर पर नहीं है ?

घर पर नहीं है का क्या मतलब ....तुम अन्दर कैसे आये ? आंटी बाथरूम से चिल्लाई -है भगवान् .....अब मै बाथरूम से बाहर कैसे आऊं? थोड़ी देर शांत रहने के बाद फिर चिल्लाई - राजन ! मुझे कोई नाइटी मेरे कबर्ड से निकालकर दो |

मै उनके कहै अनुसार एक नाइटी कबर्ड से निकालकर बाथरूम के दरवाजे के पास आकर पुकारा - आंटीजी अपनी नाइटी ले लीजिये | फिर जब आंटी ने थोड़ा सा दरवाजा खोलकर हाथ बाहर निकालकर मेरे हाथ से नाइटी ले लिया, तब आखरी बार हाथ , कंधे और चूंचियों के उपरी मांसल हिस्से का क्षण भर ही सही , दर्शन हुए | थोड़ी देर बाद आंटी नाइटी पहनकर बाथरूम से बाहर निकली और निकलते ही सवाल दाग दिया -तुम यहाँ क्या कर रहै हो? और अपने कमरे में जाने लगी |

मै भी उनके पीछे पीछे उनके कमरे के दरवाजे तक गया | फिर वो बेड पर पैर नीचे लटकाकर बैठ गयी और तेज स्वर में बोली - तुमने जबाब नहीं दिया -वरुण कहाँ है और क्या कर रहा है ? तुम अन्दर कैसे आये ? तुम मेरे कमरे में क्या कर रहै थे ? जरुर उसने तुम्हे चाभी दी होगी .... लेकिन क्यों ? वो खुद कहाँ है ??
 
मै भी उनके पीछे पीछे उनके कमरे के दरवाजे तक गया | फिर वो बेड पर पैर नीचे लटकाकर बैठ गयी और तेज स्वर में बोली - तुमने जबाब नहीं दिया -वरुण कहाँ है और क्या कर रहा है ? तुम अन्दर कैसे आये ? तुम मेरे कमरे में क्या कर रहै थे ? जरुर उसने तुम्हे चाभी दी होगी .... लेकिन क्यों ? वो खुद कहाँ है ??

इतने सारे सवालों को एकसाथ सुनकर मै घबरा गया | मैंने धीरे से बोला - चाभी ही तो नहीं है |

आंटी ने तब पूछा - क्या मतलब ? तब मैंने शर्मिन्दा होते हुए धीरे धीरे रुक रुक कर बताया की कैसे वरुण हडबडाहट में दरवाजा खींचकर भाग गया और मै अन्दर फंस गया हूँ...

तो तुम प्रारम्भ से यहीं थे , बाहर गए ही नहीं ...आंटी शुष्क स्वर में बोली ...और मेरे कमरे में चाभी ढूंढ़ रहै थे |

फिर वही हुआ जिससे मैं बचना चाहता था - आंटी का लेक्चर शुरू हो गया - तुम लोगो को शर्म नहीं आती ऐसा काम करते हुए ? पढ़ लिख कर भी ऐसा काम करते हो ? क्या तुम्हे पता नहीं है कि इससे बीमारियाँ होती है ...होती क्या है , तुम्हे तो बीमारी लग चुकी है ...मरोगे और क्या ??

आंटी लगातार बोले जा रही थी और मै सर झुकाकर सुन रहा था | अंत में मै आहिस्ते से बोला - आंटीजी प्लीज ! दरवाजा खोल दीजिये ,मै बाहर जाना चाहता हूँ |

परन्तु आंटी शायद मुझे बख्शने के मुड में नहीं थी , उन्होंने मेरे ऊपर इल्जामो कि झड़ी लगा दी - कितना अच्छा था मेरा बेटा ..तुमने उसे बर्बाद कर दिया ..छिः कितनी गन्दी आदत डाल दी है उसे ..है भगवान् कहीं उसे भी बीमारी न लग जाए ...भगवान् तुम्हे कभी माफ़ नहीं करेगा ...बोलो क्यों किया ऐसा ?

अपने ऊपर सीधा इल्जाम आते देख मै तिलमिला उठा , फिर मैंने सच्चे और सीधे शब्दों में अपना सफाई देने लगा - वरुण को आदत मैंने नहीं लगाया ..वो तो पिछले दो सालों से इसका अभ्यस्त है , जब वह 'यादव' सर के यहाँ शाम को अकेले ट्यूशन पढने जाता था , उन्होंने ही उसे यह लत लगाया और ऐसा लगाया कि--- वह लौज के सारे सीनियरो का चहैता हो गया था , यहाँ तक कि वह छुट्टियों में उनके चले जाने पर लौज में ही रिक्शेवाले को बुलाकर .........

'प्लीज! चुप हो जाओ '-आंटी अपने कानो को हाथों से ढकते हुए बोली | फिर थोड़ी देर सोंचने के बाद धीरे से बोली - सच कह रहै हो ?आंटी को थोड़ा नरम पड़ते देख मेरा आत्मविश्वास बढ़ा , मै फिर बोला -बिलकुल सच आंटीजी ! कसम से !! बल्कि मेरे संपर्क में आने के बाद वरुण ने तो किसी और के पास जाना भी बंद कर दिया है ...अब वह सिर्फ मेरे पास ही आता है |

यही तो मै नहीं चाहती राजन ! कि वो तुम्हारे इस ढंग से संसर्ग में रहै ....तुम अन्दर आओ , मै तुम्हे समझाती हूँ

(मै अभी तक दरवाजे पर ही खडा था )उनके बुलाने पर मै बिस्तर के पास जाकर उनके सामने सर झुकाकर खडा हो गया (आँख मिलाने का हिम्मत कहाँ था , मुझमे )| फिर आंटी ने मुझे समझाना शुरू किया - देखो बेटा ! ये अच्छी बात नहीं है , तुमलोग सब कुछ भूलकर अपनी पढ़ाई -लिखाई पर ध्यान दो ...सबकुछ अपने आप ठीक हो जाएगा | तुम्हे एक सच्ची सलाह देती हूँ कि जाकर किसी अच्छे डॉक्टर से अपना चेक-अप कराओ , सही इलाज से तुम्हारी बीमारी ठीक हो जायेगी |

मै अब चौंका , आंटी ने बीमारी की बात पहले भी दो तीन बार बोली थी परन्तु मैंने उसे उनका गुस्सा समझा था , लेकिन अभी तो बिलकुल शान्ति से समझा रही थी | मैंने डर और उत्सुकता से पूछा- आंटी मुझे हुआ क्या है और कौन सी बीमारी के इलाज का सलाह दे रहीं है ?

 


आंटी थोड़ी देर शांत रही फिर थोड़ी हिचकिचाते हुए बोली - बेटा ! तुम लोग जो करते हो वो अप्राकृतिक मैथुन है और इसी से इस प्रकार की बीमारियाँ लगती है |

लेकिन आंटी मै समझ नहीं पा रहा हूँ कि मुझे हुआ क्या है ?

आंटी बोली - मुझे लगता है तुम्हे कोई यौन रोग हुआ है |

मै घबराया - आपको कैसे और कब पता चला कि मुझे ऐसा कोई रोग हो गया है ?

आंटी थोड़ा अटकती हुई बोली - देखो बेटा ! इस प्रकार के रोग में लिंग में सूजन हो जाता है और दबाने पर दर्द भी करता है , दर्द का तो मुझे पता नहीं पर तुम्हारे लिंग में सूजन जरूर है ....मै ठीक कह रही हूँ न ? कोई बात नहीं , किसी अच्छे डॉक्टर से दिखाओ ..सब ठीक हो जाएगा |

मैंने प्रतिवाद किया - नहीं आंटी ! मेरे लिंग में कोई सूजन नहीं है ( क्योंकि आजतक न तो बुआ ने ऐसा कहा था और न ही दीदी ने, जिन दोनों को मै अच्छी तरह से चोद चुका था )| हाँ मेरा लिंग मेरे दोस्तों से बड़ा और थोड़ा मोटा है , लेकिन कुल मिलाकर सामान्य है |

किसने कहा कि तुम्हारा लिंग सामान्य है -आंटी ने ताना मारा, मै फिर कहती हूँ कि तुम किसी को दिखा लो |

मै बड़े असमंजस कि अवस्था में था - क्योंकि मुझे लग रहा था कि मुझे कुछ भी नहीं हुआ है और आंटी थी कि पुरे निश्चय के साथ मुझे यौन रोगी ठहरा रही थी |मै थोड़ी देर उहापोह कि स्थिति में रहा फिर हिम्मत करके मैंने आंटी से कहा - देखिये आंटीजी ! तब आपने कुछ क्षणों के लिए ही मेरा लिंग देखा था, शायद ठीक से ना देख पाने के कारण कोई भ्रम हो सकता है ....अगर आपको आपत्ति न हो तो ..........कहते कहते मै रुक गया

' तो क्या ' - आंटी ने पूछा

मेरी मदद कीजिये ......प्लीज एक बार दुबारा देख लीजिये , अगर आपको तब भी लगता है कि कोई गड़बड़ है तो मै डॉक्टर को दिखा लूंगा - मै गिड़गिड़ाया

आंटी ने लम्बी सांस लेकर कहा- चलो दिखाओ

मैंने पैंट कि जिप खोलकर अपना लिंग बाहर निकाला ...वह लिंग जो अभी थोड़ी देर पहले उछल कूद मचा रहा था , रोग का नाम सुनकर ही मुरझाया हुआ था | पैंट के बाहर आधे निकले मुरझाये लिंग को देखकर आंटी ने कहा - ऐसे में क्या पता चलेगा ?....पैंट तो उतारो |

तब मैंने पैंट निकालकर वहीँ ड्रेसिंग टेबल कि कुर्सी पर रख दिया और अपना कच्छा नीचे जाँघों तक सरकाकर अपने लटके लिंग को दिखाते हुए आंटी से कहा - देखिये कहाँ सूजन है ...ठीक तो है, बस थोड़ा बड़ा है |

आंटी गौर से देखते हुए बोली - ये तुम्हे थोड़ा बड़ा लगता है ....जितना तुम्हारा साधारण अवस्था में है ......इतना लंबा और मोटा तो प्रायः लोगो का उत्तेजित होने के बाद होता है ....यहाँ थोड़ा मेरे पास आओ ....मै देखना चाहती हूँ कि उतेज्जित अवस्था में इसमें कितना सूजन आता है ....थोड़ा इसे खडा करो ....

मैंने शर्माते हुए कहा - आपके सामने कैसे खडा होगा ....नहीं हो पायेगा

खडा तो हो जाएगा ....आंटी बोली ...शायद अभी तुरंत ..........कहते हुए आंटी ने अपना एक उठाकर मोड़े पर बैठने के आसन में बिस्तर पर रखा जिससे नाइटी ऊपर घुटनों तक चढ़ जाने के कारण मुझे उनके जांघो का झलक मिलने लगा और तुरंत मेरा नाग अपना फन उठाने लगा | मेरे नाग को जागते देख आंटी ने आहिस्ते से अपने हाथों से उसका सर सहलाया , तुरंत आवेश का एक तरंग मेरे शारीर में दौड़ गया ......ज्यों ज्यों आंटी उसे सहला रही थी त्यों त्यों 'वो' अपना आकार बढ़ा रहा था ....धीरे धीरे 'उसने' पूरी मुठ्ठी का आकार ले लिया | ........

 
खडा तो हो जाएगा ....आंटी बोली ...शायद अभी तुरंत ..........कहते हुए आंटी ने अपना एक उठाकर मोड़े पर बैठने के आसन में बिस्तर पर रखा जिससे नाइटी ऊपर घुटनों तक चढ़ जाने के कारण मुझे उनके जांघो का झलक मिलने लगा और तुरंत मेरा नाग अपना फन उठाने लगा | मेरे नाग को जागते देख आंटी ने आहिस्ते से अपने हाथों से उसका सर सहलाया , तुरंत आवेश का एक तरंग मेरे शारीर में दौड़ गया ......ज्यों ज्यों आंटी उसे सहला रही थी त्यों त्यों 'वो' अपना आकार बढ़ा रहा था ....धीरे धीरे 'उसने' पूरी मुठ्ठी का आकार ले लिया | ........

अब आंटी के चेहरे का रंग बदल रहा था , उनके कान सुर्ख होने लगे थे ....औरतों के इस रंग से तो थोड़ा बहुत मेरा परिचय हो चुका था |फिर जब आंटी ने मेरे 'नाग' को अपनी मुठ्ठी में लेकर भींचा तो .....इ..ई..स..स.. मेरा सिसकी निकल गया | आंटी ने अपना चेहरा ऊपर उठाकर मुझसे पूछा - दर्द हो रहा है ना ? मैंने आंटी की आँखों में झाँक कर देखा तो उसमे लाल डोरे तैर रहै थे | मैंने आँखों में देखते हुए कहा - नहीं आंटी ! मजा आ रहा है | तब आंटी ने मेरे 'नाग' को कसकर मरोड़ते हुए लरजते हुए धीमे स्वर में कहा - राजन! तुम मेरे बेटे को छोड़ दो , बदले में तुम जो मांगोगे ...दूंगी | मैंने कहा - दीजिएगा बाद में ....पहले ले लीजिये | मैंने देखा आंटी वासना भरी प्रश्नवाचक दृष्टि से मुझे देख रही थी |

मैंने आंटी के सर पर दोनों हांथो को रखकर बालों में हाथ फिराने लगा | आंटी के हलके गीले रेशमी बालों में हाथ फिराने में मुझे बहुत मजा आ रहा था , परन्तु आंटी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि लेना क्या है ? आखिरकार उन्होंने पूछ ही लिया - क्या लूँ ? तब मैंने आंटी के सर को पकड़कर उनके गर्दन के पास लहराते नाग से उनके कोमल मुख को सटा दिया ...हालांकि उन्हें एहसास हो गया था तभी वह सर को पीछे की तरफ खींचना चाहा परन्तु मैंने भी हांथो के जोर से अपना लंड उनके मुह में पेल ही दिया ....आंटी गुं..गुं ..गुं ....करने लगी लेकिन मै और अन्दर पेलने के लिए जोर लगाता गया ... अंत में उन्हें यह एहसास हो गया की मै अपना लंड चुस्वाये बिना नहीं मानूंगा , तब बड़े प्यार से मेरा लंड चूसने लगी .....जब वो अपना जीभ मेरे सुपाडे पर फिराती तो मेरे पुरे शरीर में सनसनी दौड़ जाता | इस मामले में आंटी दीदी से ज्यादा एक्सपर्ट थी क्योंकि दीदी प्रायः पुरे लंड को चूसने के बजाय निगलने की कोशिश करती थी जबकि आंटी मस्त जीभचालक थी ....वो जीभ से लंड के सम्बेदनशील हिस्सों को छेड़ रही थी और अप्रतीम आनंद दे रही थी ... मैंने अपना कमर जोर जोर से चलाना शुरू किया क्योंकि मै आंटी के मुंह में ही झाड़ना चाहता था ....परन्तु आंटी ने थक के मेरा लंड अपने मुंह से निकाल दिया और सीधे बिस्तर पर चित होकर लेट गयी .

...इशारा साफ़ था ..अब आंटी चुदना चाहती थी ....परन्तु मै एकायक मजे में व्यवधान उत्पन्न होने के कारण थोड़ा खिन्न हो गया क्योंकि मै अभी और खेलना चाहता था ...फिर मै आंटी के ऊपर लेटकर उनका चेहरा , गाल और अंत में उनके होंटों को चूमने चाटने लगा ...फिर मैंने उनकी नाइटी ऊपर गर्दन तक सरकाकर उनकी चुन्चियों को भींचना प्रारंभ कर दिया .....इधर आंटी मेरे लंड को अपने हांथो से पकड़कर अपने बुर से सटा रही थी ...जब उनसे रहा नहीं गया तो वो लडखडाते स्वर में बोली - रा..ज..न........ब..स.. ...एक ..बार...मु..झे.. ......चो....द ........लो ......फि....र ..कुछ ..और..करते र...ह....ना..आ...| फिर मैंने आंटी की हालत समझते हुए उनके शारीर से उतरा और उनके मोटे मोटे जांघो को जैसे ही फैलाया , चुदने की आस में मस्ती की ओस से लिजलिजाती झांटों भरी बुर चमक उठी .....आंटी की मस्त बुर को इतने नजदीक से देखने का यह मेरा पहला अवसर था ...मै उसमे उंगली करना चाहता था ...लेकिन आंटी ने अपने हाथों से मेरा लंड पकड़कर बुर की छेड़ से भिड़ा दिया ....मैंने भी समय न गंवाते हुए अपना लंड जोर लगाते हुए आंटी की पुए मालपुए जैसी फूली बुर में चांपा.....इधर आंटी की मस्ती भरी सिसकी निकली ..उधर दरवाजे के बेल की ट्रिन...ट्रिन .....हम दोनों सकते में थे कि इस समय कौन आ गया .........

 
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