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हिन्दी उपन्यास - कोठेवाली COMPLETE

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हिन्दी उपन्यास - कोठेवाली

ताहिरा के हिन्दू बाप की एक ही हिन्दू बीवी थी। लेकिन तब वो ताहिरा का बाप नहीं था, सिर्फ एक मुरीद था। बीबी बदरुन्निसा की आवाज का। वो भी अकेला नहीं, अनेकों में एक।

हर शनिवार रात के नौ बजे रेडिओ लाहौर से वह आवाज सुनाई देती। एक गजल सुनाती और सुनने वाले अटकल लगाते। कौन होगी? कैसी होगी? जितनी अटकलें, उतने चेहरे। कई–कई अजनबियों के साथ अलग–अलग पहचान कायम करती बेशुमार चेहरों वाली एक ही आवाज।

"मुझे तो लगता है कि मेरे ही हाथ की बनी ताजा नानखटाई खा कर गाती है।"

"नहीं मियाँ, इतनी कुरमुरी नहीं कि मुँह में डालते ही घुल जाये। ये तो मटके में रख कर ठंडाया हुआ जलजीरा है। चुस्कारे लेकर पीयो और देर तक जायका बना रहे।"

"मेरी मानो तो ऐसा कि बन्नो रानी सतरंगी लहरिये वाली चुन्नी का पल्ला उछालती तीजों की पींग का हुलारा लेने जाती हो,"

"मन्नू ते बादशाओ सुन के सबज रंग दीया कच्च दीयाँ चूड़िया दिस्स जाँदीया नें। ऐंज लगदा है कि जींवे कोई हल्की जई वीणी खनका के अख्खाँ अग्गों ओजल हो जाये।"

"भई हमने लोगों को गजल कहते भी देखा है और गजल गाते भी सुना है, लेकिन फकत आवाज में रंग, खुशबू और जायके का माहौल। यह हुनर तो बस बदरूनिसा को ही हासिल है।"

"शायरी और मौसिकी का क्या रिश्ता जोड़ा है इस आवाज ने? लगता है कि जैसे शायर की इजाजत लेकर उसका कलाम उसीको पेश करती हो।"

"शर्तिया कुँवारी होगी। आवाज से मासूमियत के तकाजे उभरते हैं, हसरतों के साये नहीं।"

"यकीनन कमसिन होगी।"

"हर कुँवारी कमसिन होती है, यार मेरे।"

"क्यों मियाँ? देखने को तरस गये हो क्या?"

"नहीं भई, यहाँ तो अब कुँवारे जिस्म के तसव्वुर से ही बदन चटख जाता है। उसके बाद घर में जो है, उसी से गुजर हो जाती है।"

••

गुजरात तहसील के रेडियो वाले घरों में शनिवार शाम को कुछ ज्यादा ही गहमा गहमी रहती। जिस मोहल्ले में जितने कम रेडियो, उतनी बड़ी रेडिओ मंडली। वकीलों, ठेकेदारों और सरकारी मुलाज़िमों के घरों में तो ज्यादातर घर के ही लोग होते, लेकिन रायसाहिब बदरीलाल के तिमंज़िले मकान की बैठक में जमा होने वाली रेडिओ मंडली पाँच–सात से शुरू होकर बीस–पचीस तक जा पहुँची थी। नीचे दूकान ऊपर मकान वाली ढक्की दरवाजा गली में शायद ही कोई घर ऐसा बचा हो जहाँ के मर्द शनिवार रात को बैठक न पहुँचते हों। मुनयारी, पसारी, लुहार, मोची, नाई, आढ़ती, दर्ज़ी, कसाई, सर्राफ सभी रहते थे उस गली में, सभी के पुश्तैनी मकान थे, तिमंज़िले तो सभी ने कर लिये थे। लेकिन किसी की मजाल न थी कि चौबारी छत भी अकेले कमरे से ढक ले।

"आस पास के मकानों को नंगा करना है क्या?" गली के बड्ढ़े बडेरे बरज देते।

पूरे शहर की गलियाँ तंग होने लगी थीं, जिस के पास चार पैसे आ जाते, वही अपना चबूतरा चौड़ा करवा लेता। लेकिन ढक्की दरवाजा गली उतनी ही चौड़ी थी जितनी किले वालों ने बनवाई थी। तीन–तीन घुड़सवार बतियाते हुए एक साथ गुजर सकते थे। गली की औरतों को बुरका सँभालते हुए नुक्कड़ तक जाकर ताँगों की चादर लगी पिछली सीट पर उचक नहीं चढ़ना पड़ता था। पूरा का पूरा ताँगा सीधे मकानों के आगे आन खड़ा होता था और बिना "बचो, बचो" कहे मुड़ जाता था। सपाट टीले पर सिपहसिलारों का किला था और ढलान के कदमों मे बिछी ढक्की दरवाजा गली थी। किले की बुर्जियों से पहरेदार गली में बसे अपने मुलाज़िमों पर नजर भी रख लेते थे और सौदा–सुलफ लेने उन्हें दूर भी नहीं जाना पड़ता था।

बुर्जियाँ गिर गईं। किला टूट बिखर कर खंडहर हो गया। सिपहसलारियाँ खत्म हुईं। लेकिन ढक्की दरवाजा गली में रहने वालों को खुद मुख्तयारी की आदत पड़ गई। जिसे जरूरत हो, उनके पास आये। उन्हें किसी की मोहताजी नहीं। जो कुछ कहीं और न मिले, उनके पास निकल ही आता। खरीद लो या उधार माँग लो। नकदी न हो तो किश्तों में चुका दो। लिखा पढ़ी न कर सको तो अँगूठा लगा दो।

ढक्की दरवाजा गली के रायसाहिब बदरीलाल की पास पड़ोस के कई मोहल्लों में अच्छी–खासी साख थी। हर शाम ढले और छुट्टी के दिन कोई न कोई सलाह–मशविरा करने आ ही जाता। बड़ी कचहरी के सरकारी वकील से रोज का मिलना–जुलना था। खुद वकालत नहीं पढ़ी थी लेकिन नामी–गरामी वकीलों को एकाध पोशीदा दाँव–पेंच सिखा ही सकते थे। जमीन–जायदाद और कर्ज़ा–कुड़की के मामलात में खास दखल था उनका। कानूनी कार्रवाहियों की मियाद घटाने–बढ़ाने के कई टोटके थे उनके पास। चाहते तो छोटी–मोटी हेरा–फेरियाँ करने में ही साहूकार हो जाते। लेकिन रायसाहिब को लालच नहीं था। बस जरा शौकीन तबीयत थे।

ढीली–ढाली चारखाना या धारीदार तहमदों के फेंटे खुले–आम कसते, मटमैली गंजी–बनयानों से पसीना पोंछते तुड़ी–मुड़ी नोकों वाली धूल से सनी गुरगाबियों की उतारते–पहनते मर्दों की गली में रायसाहिब की एक अलग सी लिबासी शख्सियत थी। घर के अन्दर जाकर मिलो तो झक–पक सफेद लठ्ठे की सलवार, सीपी के बटनों वाला पापलीन या बोस्की का बादामी कुरता और साफ–सुथरे नाखूनों वाले बिना गाँठों के पैरो में भठवारी चप्पलें। गली से गुजरें तो गर्मियों में भी सलवार कुरते के उपर चुस्त काली शेरवानी, चमचम करते पम्पशू, तिल्ले वाली टोपी पर कस के बँधा हुआ सफेद मलमल का तुर्रेदार साफा। लंबा कद, भखता हुआ खुला रंग, भूरी–नीली आँखें और तीखी नाक। पता नहीं क्या खाकर जना था कि पचास पार करने पर भी कद–काठी सरू के पेड़ जैसी तनी रहती थी। गली में रूक कर बात करते तो लगता कि जैसे कोई सरहदी पठान सैरी–तफरीह के लिए तराई में उतर आया हो।

पूरी ढक्की दरवाजा गली में बस रायसाहिब का ही एक ऐसा मकान था कि जिसकी निचली मंज़िल में दुकान नहीं थीं। ना ही उनके मकान के अगले चबूतरे पर टीन–कनस्तर, थैले–बोरे या भाँडे–कसोरे बिखरे रहते थे। निचली मंजिल के पिछले हिस्से में उन्होंने हमाम बनवा लिया था, अगले हिस्से में ऊदी–सलेटी चौकोर टाइलों का फर्श बिछवा कर उपर जाने वाली सीढ़ियों में संगमरमर लगवा दिया था। वैसे भी सिवाय उनके कोई भी तो उस गली में दो–दो घरों का मालिक नहीं था। पुश्तैनी घर था गली के बीचों–बीच। नुक्कड़ वाला मकान उन्होंने खरीद लिया था, नीचे की दोनों दुकानों समेत, वो भी अपने लिए नहीं। अपनी बेवा बहिन के लिए ताकि वह अपने बाल–बच्चों समेत उनकी नजरों के सामने और रिहाईश से कुछ हट कर रह सके। कुछ मौका ही ऐसा बना कि रायसाहिब के मन की हो गई।

नुक्कड़ वाले मकान की बे–औलाद मालकिन ने अपना तीस साल का रंडापा बड़े आराम से काटा था। जब तक जिंदा रही, किसी मुफ्तखोरे रिश्तेदार को पास फटकने नहीं दिया। दुकानों का किराया तो आता ही था, किरायेदार दुःख–सुख भी पूछ लेते थे। जब वो मरी, तो उसके कई वारिस पैदा हो गए। गाली–गलौज से शुरू होकर बात मुकदमे कचहरी तक पहुँचने को हुई।

मदरसों में उर्दू–तालीम पाकर अर्ज़ी–नफीस बने लाला हुकम चंद के इंटर पास मुंसिफ बेटे बदरीलाल ने बेऔलाद बेवा के किरायेदारों और दावेदारों से अलग–अलग बात की। सितर–मितर दोनों का पास रखा।

"नये मकान मालिक या तो तुमसे दुकानें खाली करवा लेंगे या किराया बढ़ा देंगे।" बदरीलाल ने किरायेदारों को समझाया।

"बँट–बटा कर आठ दस वारिसों के हिस्सों का फैसला कौन करेगा?" उसने दावेदारों से पूछा।

"बात एक बार मुकद्दमें बाज़ी तक पहुँची तो बरसों लटक जाएगी।"

वाजिब दाम चुका कर, बदरीलाल ने ही वारिसों से लिखा–पढ़ी की और दुकानों समेत मकान अपने नाम करवा लिया। नकदी उठाने के लिए पहले किरायेदारों से पेशगी वसूल की और फिर किराया कुछ कम कर के सूद अदा कर दिया। फिर भी पैसे कम पड़े तो बीवी का सतलड़ा हार और गोखड़ू का जोड़ा बेच दिया। कोई खानदानी जेवर तो थे नहीं कि बेचते हुए हाथ काँपते। दहेज में मिले थे, वो भी नए बनवा कर।

वैसे भी बदरीलाल के ससुरालवालों को क्या कमी थी? गुजराँवाला के जानेमाने ठेकेदार थे। साल में एकबार बदरीलाल की बीवी अपने दो बेटे और एक बकसा लेकर मायके जाती और ताँगा भर कर असबाब लदवा कर लौटती। साथ में कोई भाई–भतीजा आता और फल–तरकारी की टोकरियाँ ताज़ी बनवा कर हाथ जोड़ते हुए बदरीलाल को दे जाता। फिर कई दिन तक बदरीलाल की बीवी घर भर को सजाती सँवारती। सात कोनों वाली हाथी दाँत से नक्काशी की हुई तिपाई, सिंगर की मशीन, मरफी का रेडिओ, फूलों के डिजाइन की फर्शी दरी, बिजली का जमीन पर खड़ा होता पंखा, यूँ ही तो नहीं सिमटते थे रखने–बचाने के लिए घर में बैठक के अलावा भी कई कोने थे। लेकिन मायके की दी सौगात आए–गए को दिखाई तो दे

दरअसल बदरीलाल की रायसाहिबी भी उसकी बीवी के मायके वालों की सौगात ही थी। तब उसकी शादी को करीब पंद्रह बरस गुजर गये थे। पहली जंग खत्म हुए अरसा हो गया था। बरतानिया हुकूमत के लिए बदरीलाल की रेडिओ मंडली का रवैया जंग के फौजी कारवाइयों से कहीं दूर और इंकलाबियों के हथकंडों के बहुत करीब आ पहुँचा था। रेडिओ की खबर चाहे जैसे भी हो, रेडियो मंडली की बातें अंग्रेजों की माँ–बहिन, बहू–बेटियों के साथ अज़ीबो गरीब रिश्ता कायम किए बिना खत्म न होती थी। ढक्की दरवाजा गली तो क्या, पूरे गुजरात तहसील में किसी ने चलती फिरती मेम नहीं देखी थी। लेकिन जब भी रेडिओ से किसी गार्डन पार्टी या हुकूमती इजलास की खबर आती, ढक्की के मर्दों की नजरें दूर–दूर तक मेमों की तलाश में निकल पड़ती।

"सुना है नंगी टाँगों पर खुदरंग जुराबे पहन कर घूमती हैं।"

"हाथ मिला कर बात करती हैं"

"नहीं तो क्या गले मिलेंगी?"

"उसका भी इंतजाम हो जाता है। मर्द औरतें एक दूसरे को बुक में लपेट कर नाचते जो हैं।"

"कहते हैं पान सुपारी कभी नहीं खातीं लेकिन बुल्लियाँ रंग लेती हैं।"

"लाहौर वालों ने देखी हैं। एक सर्राफे में गवर्नर साहिब की घरवाली जेवर लेने गई थी। पूरा एक हफ्ता बाद तक गली में से खुशबू आती रही।"

सन १९३० की उस शाम को भी बदरीलाल की रेडिओ मंडली खबरें सुनती और खयाली पुलाव छौंकती बैठक में यहाँ वहाँ बिखरी हुई थी। कोई जमीन पर उकडू बैठा था, किसी ने गली की तरफ खुलते छज्जे की रेलिंग पर पीठ टिका रखी थी, कोई मूँज के मोढ़े पर कुहनी टिकाये फर्शी दरी पर पालथी मारे था। बैठक में करीने से सजे कीमख्वाब के गद्दों वाली कुर्सियाँ और सोफा खाली पड़ा था। खुद बदरीलाल रेडिओ के पास वाली बेंत की आराम कुर्सी में बैठा रेडिओ की आवाज ऊँची नीची कर रहा था। किरोशिये की मेजपोश से ढकी सातकोनी तिपाई पर रखा मरफी रेडिओ रात के आठ बजे वाली खबरें सुना रहा था।

"बरतानवी हुकूमत ने अपनी हिन्दोस्तानी रियाया को दस नए रायबहादुरी के खिताबों से नवाज़िश करने का ऐलान कर दिया है। अब आप खिताब पाने वालों के नाम और उनके काबिले तारीफ कारनामों का ब्योरा सुनिए।"

रायसाहिबी के नए खिताबियों के मालिक केदारनाथ का नाम सुनते ही बदरीलाल की चालीस इंच छाती चौड़ी होकर यकलख्त अड़तालीस हो गई। बेंत की कुर्सी की पीठ से टिकी उसकी गर्दन खुद–ब–खुद तन कर सीधी हो गई।

रेडिओ से ऐलान जारी रहा।

"दरयागंज के इलाके का मुआईना करके दिल्ली के पुलिस कमिश्नर टामस रैड़िंग अपनी जीप में सवार होने ही वाले थे कि अचानक फैज बाजार मे घूमते हुए लोगों ने एक इंकलाबी जुलूस की शक्ल अख्त्रियार कर ली। चारों तरफ से पुलिस कमिश्नर की जीप पर पत्थर बरसने लगे। असिस्टैंट सुपरिटेन्डैन्ट मलिक केदारनाथ ने निहायत मुस्तैदी से पुलिस कमिश्नर के जख्मी सिर को अपने सीने से लगा कर उनका सारा वजूद अपने आड़े ले लिया और एक ही हाथ से आँसू गैस के गोले उछाल कर भीड़ को तितर बितर किया। घुड़सवार पुलिस के मौका–ए–वारदात पर पहुँचने तक कुछ इंकलाबी सड़क पर लेटे लेटे मुँदी आँखों से ईंट पत्थर और जलती हुई चित्थियाँ जीप पर फैंकते रहे।"

मलिक केदारनाथ बदरीलाल की बीवी का छोटा भाई था। पिछली बार मायके से लौटने के बाद बदरीलाल की बीवी उसे लेकर काफी फिकरमंद थी। उसके मायके वालों को डर था कि कहीं उनके बारूतबा बेटे की नौकरी ही न छूट जाये। टामस रैड़िंग के जिस्म को उसने अपनी ओट में लेकर पत्थरों की मार से बचाया तो जरूर था। लेकिन आँसू गैस के कुछ गोले हाथ नीचा करके घुड़सवार पुलिस की तरफ भी फेंके थे ताकि इंकलाबियों को फैज बाजार की गलियों दुकानों में गुम हो जाने का थोड़ा सा वक्त मिल जाये।

बदरीलाल की रेडिओ मंडली को मलिक केदारनाथ की वतन–परस्ती का किस्सा तो किसी ने नहीं बताया उन्होंने खुद ही हस्ब–मामूल बहनोई की साले की रायसाहिबी में शामिल कर लिया।

"अब दिल्ली जाकर केदारनाथ को साला रायसाहिब कहना हमें कहाँ नसीब होगा? मगर किसी को रायसाहिब कह कर बुलाने से ही मुँह में मिश्री सी घुल जाती है।"

"भई कुछ भी कह लो। हमारे बदरीलाल के ठाठ–बाठ किसी से रायसाहिब से कम नहीं।"

"साडे वास्ते ते हुन तुसी रा–साब हो जी।"
 


बदरीलाल कुछ दिनों तक तो अपने नाम के आगे राय–साहिब लगाने से हिचके। बस कभी कभार किसी पुराने अखबार के पन्ने पर रा॰स॰बी॰एल॰ लिख कर फाड़ते फेंकते रहे। लेकिन जब कोई गली वाला वैसे मुखातिब करता तो बेझिझक कबूल कर लेते। बातचीत लंबी हो जाती और उनकी आवाज में एक नरमी सी आ जाती। अचकन की उपर वाली जेब में उन्होंने एक चेन वाली घड़ी रख ली थी। शाम को घूमने निकलते तो हाथ में चाँदी की मूँठवाली छड़ी लेकर, घर का सरनाँवा भी बदल डाला। पहले मकान नम्बर चौदह, ढक्की दरवाजा गली हुआ करता था। बदला तो फोर्टीन, फोर्ट लेन ऑन ढक्की हो गया।

सन १९३० में बदरीलाल ने रायसहिबी के अंदाज अपनाने शुरू किये तो सारी गली में इकलौता मरफी रेडिओ उन्हीं की बैठक में था। दूसरी जंग शुरू होने तक कई घरों में रेडिओ बजने लगे थे। बदरीलाल को रायसाहिबी की लत लग गयी थी। खुद सलाम करते तो हाथ उठाकर भवों के नीचे ही रोक लेते। किसी का आदाब कुबूल करते तो गर्दन जरा सी झुकाकर बस जे.रे–लब मुस्करा देते। मौका माहौल देखकर रेडिओ से शाया होने वाली खबरों पर तस्करा करते। अदबी महफिलों में उठते बैठते। अपने आस पास ऐसा माहौल बना लिया था उन्होंने कि शौकीन लोग अक्सर उनकी बैठक में आना पसंद करते। और उन्हीं की गली से नहीं, आसपास के मुहल्लों से भी। शनिवार शाम की महफिल तो खास उन्हीं की बैठक में जमती। बीबी बदरुन्निसा की गजल सुनने के लिए। रेडिओ वाले घरों से भी बदरुन्निसा के मुरीद बदरीलाल की बैठकी मजलिस में शामिल होने आते।

दिसम्बर १९३९ की उस गुलाबी शाम को साढ़े आठ बजे से बदरीलाल की बैठक में गहमा गहमी थी। पिछले शनिवार को रेडिओ लाहौर वालों ने कहा था कि अगले हफ्ते बीवी बदरुन्निसा एक नये अंदाज में मिर्ज़ा गालिब का कलाम पेश करेंगी। नौ बजते बजते कई अटकले लगीं, और फिर एक जानी पहचानी आवाज रेडिओ से उभरते ही सुनने वाले बिल्कुल खामोश हो गए।

"इबन–ए–मरियम हुआ करे कोई,

मेरे दुःख की दवा करे कोई।"

गाना खत्म हो गया मगर खामोशी बनी रही। रेडिओ के पासवाली आरामकुर्सी पर बैठे बदरीलाल ने हर किता को आँखें मूँद कर सुना था, सिर हिला कर सराहा था। आँखें खोलीं तो पूरी मजलिस को सिर हिलाते देखा। हाथ बढ़ा कर उन्होंने हुक्के की नाल खींची और लंबी साँस लेकर गुड़गुड़ा दिया। चिलम की राख थोड़ी सी शोख होकर फिर दुबक गई। धुएँ का एक गुबार उठा और छितर कर यहाँ वहाँ बिखर गया। खामोशी फिर जहाँ की तहाँ।

तख्तपोश के सफेद मसनद से टिके हुए ठेकेदार निसार अहमद ने अपनी खिजाब से रंगी मूछों की सफेद जड़ों पर हल्की सी अँगुली फेरी, छोटा सा खंखार लिया और खामोशी तोड़ दी।

"रश्क होता है असदुल्लाह खान गालिब के नसीब से, जिए तो एक नेकबख्त बीवी की वफा और एक कामिल गजलसरा की बेपनाह मोहब्बत पाई। मरे तो बीबी बदरुन्निसा नें जिला दिया।"

"सच मानिए तो यह इब्ने मरियम वाला किस्सा मेरी समझ में नहीं आया ठेकेदार जी।" नुक्कड़ वाले मकान के नीचे की बेकरी वाली दुकान के मालिक मियाँ बख्तियार ने अपने पहलवानी कंधे उचका दिये।

"परवरदिगार हमें गुस्ताखी की माफी दें मियाँ शायर का कहना है कि कोई मसीहा हो या पैगम्बर, हमें क्या? जब तक कोई हमारे दुःख कम न करे तो हमारा कौन?" ठेकेदार निसार अहमद ने अपनी अदबी और मजहबी सूझबूझ का सिक्का उछाल दिया।

सर्राफ जमाली कामकाज के सिलसिले में हर किस्म के लोगों से मिलते थे। खरी बात कहने में माहिर थे।

"मुकदी गल्ल ते ऐ हैगी ऐ बादशाओ कि रब्ब नाल गिला शिकवा कर के बंदा जाए ते कित्थे जाए? साढ़ी शिकायत ते रेडिओ वालियाँ नाल ऐ। असी एत्थे आने आ ते बदरूनिस्सा दीया नसा खिच्च के नशा करन वालीयां गजला सुनने वास्ते। पीरां पैगम्बरा दीयां नसीहताँ सुननिया होंदिया ते होर किदरे जान्दे।"

बैठक की रेडिओ मंडली सर्राफ जमाली से बिल्कुल मुत्तफक हो गई। फैसला हुआ कि कोई लाहौर जाकर रेडिओ वालों से मिले। हो सके तो मामले की जड़ तक पहुँचे। इबादत करने, मुजरा सुनने और कलाम कहने के मुकाम मुख्.तलिफ होते हैं। आवाजें. भी अलग अलग। बदरुन्निसा की आवाज में तो उन्हें इश्को–रूमान की गजलें ही सुनने को हैं जिनमें खुशबू हो, रंग हो, जायका हो। रेडिओ वाले न माने तो खुद बदरुन्निसा तक ही बात पहुँचे।

रेडिओ लाहौर वालो से मिलकर पसंजर गाड़ी में गुजरात लौटते हुए बदरीलाल नें फिर एक बार अपनी शेरवानी की ऊपरी जेब से वो परचा निकाला जिस पर उसने बदरुन्निसा का पता लिखा था।

दीनू ललारी

रंगरेजा बस्ती

गुजरात सरकारी कचहरी के पीछे

सरकारी कचहरी की इकमंजिला इमारत के पीछे गर्दो गुबार उड़ाता एक सपाट मैदान था। दूर दूर तक कोई बस्ती नजर नहीं आती थी। जब देखो, कुछ अधनंगे, सिर मुँडाए लड़के यहाँ वहाँ मटरगश्ती करते दिखाई देते थे।

कचहरी के पिछले बरामदे की चिक उठाकर बदरीलाल नें एक लड़के को इशारे से पास बुलाया।

"मैदान के उस पार क्या है?"

"गंदा नाला है।"

"और नाले के पार?"

"बस्ती है।"

"तू बस्ती में रहता है?"

लड़के ने हाथ उठाकर बदरीलाल से रुके रहने को कहा और भाग गया। लौटा तो उसके साथ एक और लड़का था।

"तू बस्ती में रहता है?"

नए लड़के ने ज़ोर ज़ोर से सिर हिला दिया

"अब्दुल्ला रहता है बस्ती में। मैं तो कुम्हारी टीले का हूँ।"

अब्दुल्ला काफी जानकार निकला।

"दीनू ललारी को मरे तो बरसों हो गए जी।"

तो बदरुन्निसा कुँवारी नहीं बेवा थी, बदरीलाल ने सोचा। रेडिओ मंडली की अटकलों में बेवा का तो कभी ज़िक्र ही नहीं हुआ था।

"और दीनू ललारी की बीवी?" उसने अब्दुल्ला से पूछा।

"वो भी मर गई जी, दोनों को उपर तल्ले हैजा हुआ था।"

यतीम बदरुन्निसा के लिए बदरीलाल को कुछ हमदर्दी तो हुई लेकिन गंदा नाला पार करने की बात मन में आते ही मन उचट गया।

अब्दुल्ला बोलता गया।

"दीनू लल्लारी की दोनों लड़कियाँ रहती हैं अपने मरे माँ–बाप के घर। कुम्हारी टीले पर उनके नानके हैं। वहाँ नहीं रहतीं, बस्ती में रहती हैं। कोई मरद नहीं है घर में, न कोई भाई न बड़ा। छोटी कुम्हारन है, बड़ी मरासन।"

गजलसरा बदरुन्निसा को मरासन बनाकर अब्दुल्ला तो चला गया। लेकिन बदरीलाल ने फैसला किया कि अपनी रेडिओ मंडली का भरम तोड़ना कोई जरूरी नहीं। लगने दो अटकलें, होनें दो चुहल।

अगले शनिवार रेडिओ लाहौर से बीबी बदरुन्निसा की आवाज ने सुनने वालों से मोमिन खाँ मोमिन का कलाम कहने की इजाजत चाही। फिर जो गाया तो सुनने वाले झूम झूम गए। हाथ उठा–उठा कर दाद दी। ग़ालिब और मोमिन के चुनींदा शेर दुहराए। एक दूसरे को मुखातिब करके ठेकेदार निसार अहमद, बेकरी वाला बख्तियार और सर्राफ जमाली एक ही शेर दुहरा कर मोमिन को सलाम करते रहे।

"रोया करेंगे आप भी पहरों इसी तरह,

अटका कहीं जो आप का भी दिल मेरी तरह।"

हुक्का गुड़गुड़ाते बदरीलाल से रहा नहीं गया।

"चाहो तो गाने वाली को खुद मिल कर दाद दे सकते हो। इसी शहर में रहती है।"

बस फिर क्या था? कतार सी लग गई। पहले कौन जाए? जब बदरीलाल ने पता बताया तो सब चुप हो गए।

ठेकेदार निसार अहमद ने छेड़खानी की।

"क्या बात है यारो? सोहनी कुम्हारन को मिलने के लिए एक शहजादा गड़रिया हो गया। शायरे आलम मिर्ज़ा ग़ालिब को गजलसरा डोमनी के घर जाने में कोई हिचक न हुई। आपको रंगरेजा बस्ती पहुँचने के लिए रास्ते में गंदा नाला पार करना पड़ा तो क्या हुआ?"

"आप ही क्यों नहीं हो आते, ठेकेदार साहिब?" बदरीलाल नें हुक्के की नाल निसार अहमद की तरफ बढ़ा कर कहा।

ठेकेदार निसार अहमद ने इत्मीनान से एक लंबा सा कश गुड़गड़ा दिया। शरारती नजरों से धुएँ के बादल को सिमटते बिखरते देखते रहे। फिर हल्की सी आँख मारकर बदरीलाल के हाथ में हुक्के की नाल लौटाते हुए आह भरी।

"रायसाहिब, रंगरेजा बस्ती सरकारी कचहरी के पीछे पड़ती है। पी.डब्ल्यू.डी. के दफ्तर के पिछवाड़े लगती तो बंदा जरूर बदरुन्निसा को सलाम करने हाज़िर हो जाता।"

"अच्छी बात है।" बदरीलाल ने घर के अन्दर की तरफ खुलते हुए बैठक के दरवाजे की तरफ एक नजर डाली। वहाँ चिक के पीछे कोई नहीं था।

"अपनी अपनी फरमाइश बता दें। मैं बीबी बदरुन्निसा तक पहुँचा दूँगा।"

ठेकेदार निसार अहमद कुछ ज़्यादा ही मूड में थे। हुक्के की नाल माँगने के लिए बदरीलाल की तरफ हाथ बढ़ाते हुए उन्होंने फिर आँख मारी, "फलहाल तो आप अपनी ही फरमाइश लेकर जाइये रायसाहिब। अगर उन्होंने रूबरू कलाम कह दिया तो फिर हम भी पहुँच जायेंगे किसी दिन।"

रंगरेजा बस्ती में दीनू ललारी के घर की साँकल खटका कर बदरीलाल एक तरफ खड़ा हो गया। एक चौदह पंद्रह बरस की गोल मटोल लड़की नें दरवाजा खोला और फ़ौरन उड़का दिया। फिर उड़के दरवाज़े की ओट से एक गंदमी चेहरा बाहिर निकला और बड़ी–बड़ी घनी पलकों वाली एक जोड़ी बेहद स्याह आँखें सवाल बन कर बदरीलाल के चेहरे पर टिक गईं। लड़की बोली कुछ नहीं।

अगर यही लड़की बदरुन्निसा है तो शायद हरफ उठाये है और अपनी आवाज सुनने और चेहरा देखने का मौका एक ही वक्त किसी अजनबी को नहीं देगी। मगर इतनी कम उम्र में ऐसी आवाज?

"क्या बीबी बदरुन्निसा यहीं रहती हैं?" बदरीलाल ने निहायत नरम आवाज में पूछा।

दरवाजा फिर बंद हो गया।

गंदा नाला पार करने से रंगरेजा बस्ती पहुँचने तक बदरीलाल के पीछे–आगे छोटे बड़े लड़कों का एक अच्छा खासा जुलूस इकठ्ठा हो गया था। मुँह बाए, सर खुजाते, ढीले झग्गों की आस्तीनों को खींचते अब वो सब के सब दीनू ललारी के घर के सामने मुस्तैदी से तैनात हो गए थे। ज्यों ही दरवाजा फिर खुला, भागते दौड़ते नजर आए।

गंदमी चेहरे वाली लड़की अपनी धारीदार चुन्नटों वाली चुन्नी का पल्ला सँभालती दरवाजा उड़का कर दहलीज पर खड़ी हो गई।

 


"आपा पूछती है यहाँ क्यों आए हो?"

"मैंने लाहौर जाकर रेडिओ वालों से यह पता हासिल किया है ताकि बीबी बदरुन्निसा को खुद बता सकूँ कि इसी शहर में कितने लोग उनकी गजलें शौक से सुनते हैं। अगर वह इजाजत देंगी तो फिर किसी दिन आ जाऊँगा।"

उढ़का दरवाजा किसी ने अन्दर से खोल दिया। नीचे दरवाज़े की ऊँची दहलीज पार करने में बदरीलाल को अपना साफ़ा बँधा सर काफ़ी झुका कर जाना पड़ा। एक बार अंदर गया तो काफ़ी देर बाद बाहर लौटा। जब लौटा तो बार–बार वापिस आने के लिए। कभी कचहरी के काम की जल्दी निबटा कर दिन ही दिन गया। कभी शाम की सैर को और लम्बा करके दिन ढलने पर गया। पहले कुछ महीने आगे पीछे नजर डालता, फिर एकदम बेबाक। बिना नागा हर इतवार, सिवाय उस इतवार के जब एकादशी हो।

एकादशी वाले दिन बदरीलाल की हिंदू बीवी तड़के ही नहा धोकर पति के हाथों से कुटी मूँग की दाल, चावल, घी और ताँबे के सिक्के मँसवा कर मिसरानी को दे देती। कुल पर आने वाली बलाएँ टालने के लिए हर महीने पहले चाँद की रात घर के मालिक के हाथों बिना अन्नजल ग्रहण किए दान कराने की रीत थी। बदरीलाल तो दान की थाली मँसवा कर खा लेता। लेकिन उसकी बीवी चाँद निकलने तक निर्जला व्रत रखती। चौबारे जाकर चाँद को अर्ध्य देकर उतरती तो रसोई में आकर बदरीलाल दो पत्तलों के दोने उसके हाथ में थमा देता। एक में ताजा मिठाई, दूसरे में ताज़े फूलों का गजरा। मिठाई मुँह में डालकर वह व्रत तोड़ती। गजरा कभी अपनी कलाई, कभी चोटी में लपेट लेती, और कभी किसी घड़े या सुराही की गर्दन को पहना देती।

मोगरे के फूलों का गूँथा हुआ गजरा वह चाहे कहीं भी लपेटे, उसकी महक कई दिनों तक बदरीलाल की बीवी के बदन से उठती रहती। एकादशी के कम से कम हफ्ता बाद तक वह इतराई सी फिरती। पंजों के भार खड़ी होकर कभी अपनी उचकी एड़ियों पर लगी मेहँदी को देखती। इधर उधर नजर डालकर कभी गर्दन के नीचे सिर झुकाती और अपनी कमीज के उभारों को सहारा देती। अधपके बालों की किसी लट को बल देकर माथे पर गिरा देती और किसी को सँवार कर कान के पीछे सरका देती। वक्त बेवक्त कुछ गुनगुनाती। फल तरकारी की टोकरी बनवा कर नुक्कड़ वाले मकान में बदरीलाल की बेवा बहन के पास भिजवाती। फिर थोड़ी देर बाद खुद बुरका पहन कर हम उमर ननद का दुःख सुख पूछने पहुँच जाती।

•••

बदरीलाल के ब्याह से हफ्ता पहले उसके घरवालों ने अपनी इकलौती बेटी की कुढमाई कर दी थी। बाद में करते तो गली मोहल्ला यही कहता कि दान–दहेज और शगुन में जो बेटे को मिला, वही बेटी को दे दिया। पाँच छः महीने बाद बेटी के ब्याह में वही सब काम तो आना ही था। लेकिन पहले से ही क्यों शरीकों को अँगुली उठाने का मौका देना? रिश्तेदारों से भरा शादी का घर था। औरतें भाई के लिए घोड़ियाँ और बहिन के लिए सुहाग गाती फिरती थीं। सत्रह बरस की गोरी चिट्टी, छरहरी लाजो के न पाँव थमते थे न गला रूकता था। रेशम की मुलायम कमीज उसके ठसे बदन से लिपट कर तन तन जाती। हवाई ननून की बाँकड़ी लगी चुन्नी उसके ठुमकते कंधों से सरक–सरक पड़ती। किंगरी लगे पौंचों वाली घेरेदार सलवार की उठती गिरती सलवटे थिरक–थिरक लहरातीं।

ताइयों, चाचियों, फूफियों, मासियों को हाथ पकड़–पकड़ नचाती लाजो तिमंज़िले घर के दोनों तल्लों पर कूद फाँद करती और चौबारी छत पर खड़ी होकर पड़ोसनों से गप्प मारती.। एक ही साँस में घर के बेटे और जमाई को नाप तोल देती और फिर अपने पे नाज करती।

"किक्कली कलीर दी, पग्ग मेरे वीर दी

दुपट्टा मेरे भाई दा, ते फिट्टे मुँह जवाई दा?

गई साँ मैं गंगा, चढ़ा ल्याई वंगा

असमानी मेरा घघरा।

मैं ऐस किल्ली टंगां

नी मैं ओस किल्ली टंगां।"

जब अपनी शादी के दिन पास आए तो रोज नया जोड़ा पहन कर घंटों आइना देखती और अपनी आँखों का काजल अपने ही कान के पीछे टिप्पी बनाकर लगाती। घर की औरतों ने बदरीलाल की नई ब्याहता को हँस कर समझाया।

"अपनी चुलबुली ज़ुबान नूँ सँभाल के रख्खीं वौटिये नईं ते फेरेयाँ बैठी नच्चन वास्ते उठ्ठ खलोवेगी।"

फेरों पर तो लाजो दुबकी सी गुड़िया बनी रही। ससुराल जाकर जब अपने गभरू जवान हवालदार लाड़े के साथ लौटी तो हँसते–हँसते दुहरी हो रही थी। कोने में ले जाकर घंटों बदरीलाल की बीवी से खुसरपुसर करती रही।

"मैं की कहाँ भरजाई? जिदे लड़ लग्गियाँ औ ते बत्ती बुझए बिना नेड़े नई आंदा। पर दो दो मुश्टंडे दयोर सारा दिन वेढ़े विच्च डंड बैठका कडदे रहंदे ने।"

लाजो के शांत तबीयत दूल्हा को न सिगरेट शराब का ऐब था, न जुए की लत, न शाम को अड्डेबाज़ी की आदत। नौकरी से निबट कर सीधा घर आता, खाना खाता और फिर चौबारे जा अकेले कमरे की बत्ती बुझाकर बदन कसमसाता। जब तक लाजो रसोई सँभाल कर ऊपर पहुँचती, उसके मरद की हर नस ऐसी तनी मिलती जैसे किसी तेज रफ्तार घोड़ी को काबू में लाने वाली चाबुक। महीने भर में ही छरहरी लाजो गदरा गई। चेहरा ऐसा चमका जैसे पालिशी हो, भूरी नीली आँखों में खुमारी का काजल जैसे कई रातों की अनींद्री हों। मायके लौटी तो ठुमकती कम, अलसाती ज्यादा।

बदरीलाल की बीवी ने छेड़ा तो भरपूर अँगड़ाई लेकर बोली,

"अद्दी रात मार पई,

कुट्ट सुट्टियाँ मलूक जहियाँ,

नाले सोहना मोती चुगदा

ते नाले पुच्छदा,

कित्थे, कित्थे लग्गियाँ।"

पाँच बरसों में तीन बार लाजो मायके जच्चगी के लिए आई। भरा पूरा बदन लिए आती और गोल गोल मटोल बच्चा गोद में लेकर लौट जाती। गदराऐ बदन के उतार चढ़ाव फिर वैसे के वैसे।

"क्यों नी लाजो? औरतें तो एक बच्चे के बाद ही चौड़ी हो जाती है। तू क्या सारी उमर ऐसी ही छमकछल्लो बनी रहेगी।"

"आहो भरजाई, कमर दा कमरा बन गया तो हवालदार जी को उपर नीचे चढ़ने उतरने में टंटा होगा। मैंने तो अपनी सास को कपड़े धोने से भी छुट्टी दे दी है। आप बैठ के रगड़ा सोटा मारती हूँ और खड़ी होकर एक एक कपड़ा बालटी से निचोड़ कर निकालती हूँ। कपड़े साफ, सास खुश और मेरी कमर वैसी की वैसी।"

हवलदारनी से थानेदारनी बनते ही लाजो की जुबान भी बदलने लगी थी। पुलिस महकमे के कारनामों के किस्से सुनाती। फरमाबरदारी और हरामजदगी जैसे अलफ़ाज इस्तेमाल करती। घर से बाहर निकलते थानेदार साहेब की पगड़ी और फीती की नजर उतारती। रात को दूध का गिलास देती तो बादाम डाल कर।

एक रात थानेदार ने दूध पीने से इंकार कर दिया। गले में दर्द था, सुबह तक हलक के उपर गिलटी फूल आई। ऐसी चारपाई पकड़ी कि दस दिन में बिना एक भी बात बोले सदा के लिए सो गया। उसकी स्यापा करती माँ ने अपनी छाती हाथों से पीटी और लाजो का माथा हथौड़े से तोड़ा।

"नचोड़ लया नी तूँ मेरे शेर जये पुत्तर नूँ। खसमखानिऐ हर वेले ओनू चमुट्टी रहंदी सैं। अपनी उमर खा के जांदा ते अपने पुत्तरा दी कमाई वी खांदा ते सानू वी अपनी पेंशन ख्वांदा। दफ़ा हो जा, साड़िया नजरा तो। तैनू वेख के तेरे हट्टे कट्टे जिसम विच मैनू अपने पुत्तर दा निच्चुड़या खून दिसदा ऐ।"

तीनों बेटों को लेकर लाजो मायके लौटी तो अपना जिस्म हर वक्त कस कर लपेटे रखती। बार बार नहाती जैसे कोई अनछूटा दाग धोती हो। छुआछूत करती। गदरया बदन पहला ढलका, फिर सलवटों से भरकर रूखा बबूल हो गया। न कोई उसे छुए, न करीब आये।

••

गंदे नाले के पार रंगरेजा बस्ती में बदरीलाल के बार–बार जाने की बात उड़ते–उड़ते सबसे पहले लाजो ने सुनी। बेकरी वाले बख्तियार की घरवाली से।

"रब्ब झूठ न बुलावाये बाजी।" जून की तपती दुपहरी में खस की पक्खी की हवा अपने चेहरे पर झुलाते हुए सिर हिला–हिला कर कहा उसने, "सुना है बात हँसी मखौल से शुरू हो कर बड़ी दूर चली गई है। अब तो दो साल ऊपर ही होने को आए। बिना नागा हर इतवार आपका भाई खुले आम गंदा नाला पार करके पहुँच जाता है वहाँ।"

लाजो को लगा कि उसका भाई कोई इंसान नहीं बल्कि किसी बड़े से पेड़ की कटी हुई टहनी है जिसे बख्तियार की घरवाली ढक्की दरवाजा गली से घसीट कर गंदे नाले के पार फेंक आई है। वह हड़बड़ा कर उठी और मुड़े तुड़े कपड़ों के ऊपर चादर से मुँह सिर लपेट कर शिखर दुपहरी में गली पकड़ ली। नुक्कड़ वाले मकान से बदरीलाल के घर हाँफती हुई पहुँची और सीधे बैठक मे जा घुसी। उसे देखते ही बैठक में उकडू बैठे दो तीन मिलनेवाले उठ खड़े हुए। लाजो उनके ज़ीना उतरने तक चुप रही।

फिर उसने अपनी चादर उतारकर तख्तपोश पर फेंकी और आरामकुर्सी से टिके बदरीलाल के सामने खड़ी होकर खुरदरी आवाज में पूछा।

"ये गंदे नाले पार वाली मरासन तेरी क्या लगती है भापा?"

बदरीलाल ने हुक्के की नाल अपने मुँह की तरफ खींची तो लाजो ने हुक्का अपने पैर से दूर सरका दिया। एक बार बकना शुरू हो गई तो बस नारियल की सूखी मूँज से जैसे गरम राख को जूठे पतीलों के काले तलों पर रगड़ती ही गई। बदरीलाल ने अपना चेहरा एक दिन पुराने अखबार की सुर्खियों में छुपा लिया। सन १९४२ के "हिन्दोस्तान छोड़ो" इन्कलाब का सनसनीखेज ब्योरा और हिटलर जैसों से बरतानिया सरकार की टक्कर लेने का हौसला अखबार के पहले ही सफ़े पर नुमाया था। अखबार कुछ कह रहा था, लाजो कुछ पढ़ रही थी। बोलते बोलते जब वह हाँफने लगी तो कोई भी लफ्ज़ उसका पूरा नहीं हुआ। बदरीलाल ने अखबार एक तरफ रख दिया। गीले कपड़े से लिपटी सुराही के पास ही रखे ताँबे के गिलास में पानी उँड़ेला और बहिन को पकड़ा दिया।

गटागट गिलास खाली कर लाजो बदरीलाल की आरामकुरसी से सिर टिका कर बैठ गई। भाई के बाजू पर हाथ रख कर जरा नरम आवाज में बोली, "गल्ली–मोहल्ला, पुरखे–शरीक तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकते, पर क्या तुझे भरजाई का भी कोई लिहाज नहीं? कुछ तो बोल भापा?"

बदरीलाल नें अपना एक हाथ लाजो के सिर पर रखकर बस एक बार उसके रूखे बालों को सहलाया और लंबी साँस लेकर बोला, "उसी का तो लिहाज है। वरना मैं बदरुन्निसा को मिलने उसके घर नहीं जाता। यहाँ इसी घर में ला कर रखता।"

लाजो तमक कर उठी और दोनो हाथों से अपना माथा पीट लिया। बीच बैठक में खड़ी होकर ज़ोर ज़ोर से स्यापा करने लगी- "तू सहक सहक के मरेगा भापा। ऐसी मौत मरेगा कि कोई पानी देने वाला न होगा। अपने हिस्से का तेरा स्यापा मैं आज ही कर लेती हूँ।"

 
बदरीलाल बैठक से निकल कर नीचे जाने वाली सीढ़ियों से उतर गया। उसके जाने के बाद भी लाजो अपने आप को पीटती ही रही। जब बदरीलाल की बीवी ने आकर उसका हाथ पकड़ा तो उसे अपने से लिपटा कर फफक उठी।

"मैं तो उजड़ी ही थी भरजाई क्योंकि थानेदार को उपर से बुलावा आ गया। पर तू मेरी बदनसीब शहजादी, तू तो आदमी के रहते उजड़ गई।"

बदरीलाल की बीवी गले से लिपटी ननद को बाहों के घेरे में लिए खामोशी से देर तक सुबकती रही। पीठ पर हाथ रख अपने से अलग किया तो तख्तपोश तक बाँह पकड़ कर ले गई। पास बैठा कर उसी की मैली कुचैली चुन्नी से पहले उसके आँसू पोंछे, फिर अपने।

"तूने सुना न लाजो, जो तेरे भापे ने कहा। जब तक मैं इस घर में हूँ, उसको मेरा लिहाज है। पुरखों के इस घर को अगर दूसरी से बचाना है तो मुझे यहाँ रहना ही पड़ेगा। इस घर की राक्खी करूँगी। यहाँ से निकलूँगी ही नहीं। तेरे घर भी नहीं आऊँगी, तू ही आती जाती रहना।"

"तू मुझ रब्ब की मारी का आसरा है भरजाई। पर मैं करमसड़ी तुझे क्या हौसला दूँगी। सर के बल चल कर आऊँगी। पर तू तो फिर भी इकल्ली की इकल्ली। तेरे आँखों के सामने घूमे फिरेगा भापा और तू उसके पास न फटकेगी। रब्ब की दी बदाँ सहले, पर अपनी मर्ज़ी की मार तुझे बिल्कुल इकल्ला कर देगी।"

"तू ही तो कहती है न लाजो, बेटों की माँएँ कभी अकेली नहीं होतीं।"

"बेटों को बाप की करतूत का पता है क्या?"

बदरीलाल की बीवी ने लंबी उसाँस ली।

"गोपाल तो मस्त मौला है। हन्ने बन्ने दोनों रख लेता है। इकबाल का कुछ पता नहीं। कब क्या कर बैठे?

साल भर पहले बी॰ ए॰ पास करके जब इकबाल बिजली पानी के महकमे में सरकारी मुलाजम हो गया तो बदरीलाल नें सारी गली में खालिस घी के केसरी लड्डू बाँटे थे। रात को जब कभी बाप बेटे इकठ्ठे रसोई में खाने आते तो अपनी थाली में ताजा फुलाया फुलका रखती हुई बीवी का हाथ रोक कर बदरीलाल कहता,

"पहले इकबाल को दे भलीमानस। सारा दिन काम करता है। गुपाल की तरह चटखोरा नहीं कि बाहर खा पीकर घर आ जाए।"

कई महीनों से इकबाल बाप के सामने पड़ने से कतरा रहा था। अगर कमी बाप–बेटा इकठ्ठे रसोई में खाने बैठ भी जाते तो दो फुलके खाकर ही इकबाल पीढ़ी सरका कर उठ खड़ा होता।

एक दिन बिना कुछ कहे सुने बिस्तर बोरिया बाँधते हुए माँ से बोला,

"भाबो मेरा तबादला जेहलम हो गया है। परसों चला जाऊँगा।"

"अपने भाईया जी से कह कर तबादला रूकवा ले पुत्तर। मेरी आँखों के सामने रह।" बदरीलाल की बीवी ने कहा।

"भाइये का नाम न ले भाबो। तू भी चल मेरे साथ। परसों नहीं चलती तो एक हफ्ता बाद आकर ले जाऊँगा। रहनें का इंतजाम करते ही आऊँगा। तू तैयार रहना।"

बदरीलाल की बीवी ने बेटे के कपड़े सँभालने में हाथ बँटाया और बोली,

"जरूर आऊँगी पुत्तर। जब तेरा ब्याह हो जाएगा। फिर तू कमाने जाना और हम सास–बहू रज्ज रज्ज के तेरी कमाई की बरकतें देखेंगी।"

"इस घर में कोई भलामानस तो अब अपनी बेटी देने से रहा।" इकबाल ने 'थूँ' कह कर कहा, "पर तेरे लिहाज से कोई राज़ी होता हो तो जल्दी ही बहू ले आ।"

"जरूर ले आऊँगी। पर तू कब आएगा? परसों का गया क्या अपनी लाड़ी लेने ही आएगा?

"बड़ी जल्दी आऊँगा भाबो, आता रहूँगा लेकिन इस घर में नहीं। मुझे इस घर में अब भाइया के कपड़ों से गंदे नाले की मुश्क आती है।"

•••

बदरीलाल ने जब पहली बार गंदा नाला पार किया तो उसे नाक पर रूमाल रखना पड़ा था। नाले के उस पार भी एक सपाट मैदान था जिसे हाजतमंद बेरोक टोक खुले आम इस्तेमाल करते थे। कुछ ही कदम चल कर बदरीलाल शशोपंज मे आ गया। अपने कदमों पर नजर रखने के लिए गरदन झुकाकर चलता तो खाया पीया मुँह को आता। बिना नीचे देखे कदम उठाता तो किसी सूखी या लिजलिजी ढेरी पर पाँव पड़ने का अंदेशा। ठिठक गया वो। आगे पीछे दोनो तरफ नजर डाली। मैदान के अगले छोर तक पहुँचने का रास्ता कम और लौटने का ज्यादा लगा। नाक मुँह ढक कर वह आगे बढ़ा। मैदान पार किया तो एक पगडंडी के मुहाने पर खड़ा था।

पगडंडी के एक तरफ दूर दूर तक काली सलेटी, गेरूआ, गाचनी माटी के बरतन खिलौने धूप सेक रहे थे। जमीन पर मुँह औंधाए छोटे बड़े मटके। गर्दन ऊँची उठाये एकमुठी, दोमुठी नक्काशी सुराहियाँ। मैदान की धूल से जरा सा सिर निकाल कर झाँकते हुए चपटे कसोटे। आजू बाजू तैनात लंबे चौड़े गमले। चौमुखे दीये और खील फुलियो की हट्टियाँ। हौदे वाले हाथी। सवार समेत घोड़े। और इस भरपूर बेजान सी दुनिया के उपर उमस भरी दुपहरी में भूले भटके हवा के झोंके को तरसती गुँधी गुँधाई माटी की महक।

कहीं से जरा भी आवारा बयार की लय फूँक उठती तो चिलमों और मटकी की महकती साँसें पगड़ंडी के दूसरे किनारे ठुमक कर पहुँच जातीं। वहाँ लंबे बाँसों से तान कर बँधी हुई रस्सियों में घिरा रंगों का डेरा था। कड़क कलफ और अकडू अबरक से तने हुए ऊदे, नीले, नसवारी, केसरी और गुलाबी साफ़े थे। फरोज़ी, बदली, फलसई, अंगूरी, जहरमोरे और चंपई दुपट्टे हल्की सी माँड ओढ़े, तने हुए साफ़ों से अपनी दूरी बनाए थे। साफ़ों और दुपट्टों की निगरानी में चुन्नटों से सिमटी सतरंगी लहरियों वाली चुन्नियाँ थीं।

एक ही पगडंड़ी के इस तरफ महक का गुबार और उस तरफ रंगों की शोखी।

रंगरेजा बस्ती पगडंडी का आखरी पड़ाव थी।

उसके बाद कुम्हारी टीले तक जाने के लिए कोई एक रास्ता नहीं था। जहाँ कदम मुड़े वहीं रहगुजर निकल आती। लिपेपुते बेतरतीब बिखरे घरों के जमघट में न कोई आगा था न पीछा। किसी के आगे तंदूर लगा सहन तो किसी का आगा मवेशियों का तबेला। किसी के बाज़ू में चारा काटने की रहट तो किसी के साथ जुड़ी दाने भुनाने की भट्टी। कुम्हारी टीले वाले पानी लेने रंगरेजा बस्ती के कुएँ पर आते। बस्ती वालों को अपने भाँडे–टींडे कलई करवाने टीले पर जाना होता। इतनी शादियाँ हुई थीं बस्ती टीले में कि कोई भी किसी की कुड़मों का पिंड कह देता।

पगडंड़ी पार कर के रंगरेजा बस्ती में जाते बदरीलाल के कदम रूक गए। एक खटका सा उठा। न जाने कौन छींटा कसी कर दे? कहाँ से आकर कोई कीचड़ उछाल दे? बचे खुचे रंगों के घोल की कोई कमी तो थी बस्तीवालों को।

गुंधी कीचड़ में सनी उँगली छिटक देने में क्या वक्त लग सकता था टीले वालों को?

लेकिन बस्ती टीले वालों की अपनी ही तहज़ीब थी। वह कीचड़ रौंधते थे तो ओसारे के चाक पर चढ़ा कर सँवारने के लिए। माटी का दोष तब न जब ओसारे से निकले बरतन खिलौने में तरेड़ मिले? वहा रंग घोले जाते थे अलग थलग रख कर पक्के करने के लिए। रंगों में खोट तब जब ललारी के हाथ से यूँ ही छिटक कर एक बूँद किसी दूसरे रंग के कपड़े पर जा गिरे? झक्ख सफ़ेदी पर दाग लगा दे।

•••

कुम्हारन माँ और रंगरेजा बाप की बेटी थी बदरुन्निसा। ओसारे में चाक पर चढ़ी माटी को उसने भी रौंधा था। माँड़ पकाते कढ़ाहों के नीचे सरकंडों की आग ऊँची करने के लिए धुएँ में उसने भी फूँकें मारी थीं। लेकिन उसका सा रूँधा और भर्राया गला और किसी का न हुआ। मुलठ्ठी और शहद की घुट्टी चाटी। बनफशे का काढ़ा पीया। गले में तरावट आई। लेकिन आवाज का धुँधलका न छूटा। बोल निकले तो गाढ़े। बातें बनी तो साज और सुर साधे तो तरन्नुम। पके मटकों पर मेहँदी लगे हाथों से थाप देकर गाती बिलकीस बस्ती टीले के हर मौके का बेज़ोड़ गहना बन गई।

टीले वालों के एक ब्याह में लाहौर से आए बदरू मामा बिलकीस को दो दिन के लिए अपने साथ ले गए। लौटे तो बदरुन्निसा को साथ लेकर। रेडिओ वालों ने बदरू मामा के नाम से जुड़ता नया नाम दे दिया बिलकीस को। साथ ही हर शनिवार उस की गायी एक गजल रेडिओ से सुनाने की दावत। गजलों की पसंद रेडिओ वालों की, आवाज बदरुन्निसा की। वह महीने में एक या दो बार लाहौर जाकर गजलें रिकार्ड करवा आती। बुरका उसका। आने जाने का रिक्शा और पसंजर गाड़ी का किराया, खर्चे पानी का बंदोबस्त, सब रेडिओ वालों का। बस आवाज बदरुन्निसा की।

••

"आपको मेरी आवाज यहाँ खींच लाई थी न मैं गाना बंद कर दूँ तो?" बदरुन्निसा ने पूछा।

अपने होठों से बदरुन्निसा के कुरते के बटन खोलता बदरीलाल कुछ नहीं बोला। उस लमहा सारी काईनात में उसके अहसास का एक ही मरकज था। वहाँ पहुँचने से पहले अगर वह साँस भी खींच कर ले लेता तो पूरी काईनात बिखर जाती। बस उसकी रंगों का पुरज़ोर उफान हर बाज़ू में आठ आठ हाथ बनकर बदरुन्निसा के गठीले बदन का हर उतार चढ़ाव सहलाता रहा, कचोटता रहा।

"यहाँ भी," बदरुन्निसा ने सिमट कर कहा।

"वहाँ भी," उसने बिखर कर खैरात माँगी।

"हाय अल्लाह, मैं मरी। मैं गई।" वह सिहर सिहर उठी।

"रूक जाइए न," उसने बदरीलाल की ढ़ीली पड़ती गिरफ्त को अपनी बाहों के घेरे में कसना चाहा।

"बस अब नहीं, कपड़े गीले हो जाते हैं।"

"घर में नहीं होते क्या?"

"वहाँ बदलने का इंतजाम है।"

"यहाँ भी हो सकता है"

"यह मेरा घर नहीं है।"

बदरुन्निसा नें उठ कर कोठरी के अंदर से लगी साँकल खोल दी। बदरीलाल को तख्तपोश पर बैठने के लिए गाव तकिया दिया। और मुंज के कानो का एक मोढ़ा खींच कर उससे कुछ दूर जा बैठी।

"आपकी घरवाली का नाम क्या है?"

"चाँद रानी।"

"बहुत खूबसूरत है?"

"हाँ।"

"आप से क्या क्या बातें करती है?"

"भाजी तरकारी की। नाते–रिश्तेदारों की।"

"और आप?"

"मैं सुन लेता हूँ।" बदरीलाल ने अब जूते पहनने शुरू कर दिये थे।

"मैं आप से बात करूँ?"

उठते उठते बदरीलाल बैठ गया। सिर से हुंकारा कर भर कर बोला,

"करो।"

"आपको पता है कि कचनार के फूल की कली उबाल कर डालने से घुले हुए रंग गाढ़े हो जाते हैं। लेकिन कचनार की डंडी की एक बूँद भी रंगे कपड़ों पर पड़ जाए तो दाग लग जाता है, कभी नहीं छूटता। कनेर के फूलों से . . ."

बदरीलाल अब सहन के दरवाज़े की ओर मुँह करके खड़ा था। बदरुन्निसा नें बढ़ कर बाहर के दरवाज़े की साँकल खोल दी। दहलीज के पार खड़ी होकर अपनी किंगरी वाली फरोज़ी चुन्नी का पल्ला मरोड़ती हुई बोली,

"अल्लाह मियाँ अगर हफ्ते में दो इतवार बना देता तो।"

••••

 


हर इतवार बिना नागा आनेवाला बदरीलाल उपर तल्ले दो इतवार नहीं आया। तीसरे इतवार तो पहले चाँद की रात थी, उसे आना भी नहीं था। लेकिन तड़के ही दीनू ललारी के बाहर वाले दरवाजे. की साँकल ऐसी बजी जैसे खटकाने वाला बहुत ही जल्दी में हों। बदरुन्निसा ने दौड़ कर दरवाजा खोला। ढीला ढीला कुरता और मटमैली तहमद पहने एक लंबा चौड़ा पहलवान सा काला धुत्त आदमी चौखट से लगा खड़ा था। बदरुन्निसा पर नजर पड़ते ही जहर आलूदा आवाज में बोला,

"बदरीलाल हर इतवार तेरे पास ही आता है?"

बदरुन्निसा को लगा कि अगर उसने सिर भी हिला दिया तो उसकी खैर नहीं। पता नहीं आने वाला किस इरादे से आया हो। उसने हाथ बढ़ाकर दरवाजा बंद करना चाहा। पहलवानिया आदमी ने धूल सनी गुरगाबी में से फूल कर उठता हुआ अपना एक गठीला पैर दहलीज पर टिका दिया,

"जाती कहाँ है बेहया? तू ही है न वो मरासन जो रेडिओ पर गाती है?"

"मैं बदरुन्निसा हूँ।" वह सहम कर बोली।

बेकरी वाले बख्तियार को अपनी आँखों पर यकीन न हुआ। रेडिओ मंडली में लगी एक भी अटकल उस औरत पे पूरी नहीं उतरती थी जो उसके सामने थी। मंझला कद, दुहरा बदन, कढ़ी हुई कम दूध वाली चाय जैसा रंग। जुड़ी हुई भवों वाला माथा। उमर कोई पचीस के उपर। और गर्दन ऐसी लंबी तनी जैसे कोई मगरूर परीजादी हो।

ढ़क्की दरवाजा गली की बाकी औरतों की तरह बदरीलाल की बीवी भी बाहर निकलते वक्त बुरका पहनती थी, बैठक से घर की तरफ खुलने वाले दरवाज़े की चिक के पीछे कभी कभार उसकी लंबी परछाई में छरहरी काठी ही बेकरी वाले बख्तियार ने देखी थी।

"हाथ लगाए मैली होती है जी।" बख्तियार की घरवाली ने बताया था, "माँ बाप ने सोच कर ही नाम चाँदरानी रखा है। दो जवान बेटों की माँ हो गई पर मजाल है कि जिस्म की मलाई उतरी हो। हाथ पैर कबूतर के परों जैसे कूले है। जब कभी जाओ, हँस कर मिलती है।"

"यहाँ क्यों आए हो?" बदरुन्निसा बड़ी बेरूखी से पूछ रही थी। उसकी जुड़ी भवों के उपर की शिकन और भी गहरी हो आई थी।

"तुझे यह बताने कि तेरी बद्दुआओं से बदरीलाल की नेक बख्त बीवी के पेट में रसौली फूटी है। घरवाले उसे पिंडी के बड़े अस्पताल ले गए हैं। तेरा यार जाती बार मुझे कह गया था कि तुझे बता दूँ।"

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चिता में लगाई आग को सन्न चेहरे से देखता बदरीलाल सकते में आ गया। बदरीलाल की बीवी के लाल जोड़े से सजे जिस्म के फूले हुए पेट से पानी की एक तेज धार फूटी और जलती हुई लपटों से ऊँची उठ गई। देखने वालों के हाथ खुद–ब–खु.द तौबा के लिए उठे और रहम की दुआ माँगने लगे।

"गम का गोला अंदर ही अंदर दबाये जीती थी। आज सब गमों से छूट गई।"

"अधमरी को मारने ले गया था अस्पताल में। उन्होंने चीरा देकर पेट खोला और जालिम कैंसर देख कर वहीं दुबारा सी दिया।"

"कैंसर से जालिम तो यह खुद निकला जी। घरवाली सहकती रही और यह मौजें करता रहा।"

"आँख की शरम होगी इसे तो अब उस मरासन के पास भी न फटकेगा।"

"कौन जाने उसी को खुदा का ख़ौफ आ जाए।"

"उसे कोई शरम–लिहाज होता तो यह चिता क्यों जलती?"

बदरुन्निसा रंगरेजा बस्ती छोड़कर ढक्की दरवाजा गली आ गई। बदरीलाल के साथ उसी के घर में रहने लगी। न निकाह न कोई कागज़ी कार्रवाही। बस रहने लगी। उसके आते ही रेडिओ मंडली पहले कुछ दिन सहमी रही। फिर इक्का दुक्का करके सभी लौटने लगे। न वो लाहौर जा कर गाती, न ही अब उसे लेकर कोई अटकल लगाता। बैठक की गहमा गहमी वैसी की वैसी।

बदरुन्निसा मिलने जुलने वालों के सामने बैठक में कभी न आती। चिक के उस पार गोपाल उससे कभी कभार बतिया लेता। बी॰ ए॰पास होने का नतीजा निकला तो गोपाल ने तफरीह के लिए काशमीर जाना चाहा। बदरुन्निसा ने अपना सोने का गुलूबंद तुड़वा कर पैसों का इंतजाम कर दिया तो गया वरना गोपाल के बाप ने तो मना ही कर दिया था।

"जवान जहान बेटा है। उसकी छोटी सी ख्वाहिश को क्यों मारते हो।" उसने गोपाल के बाप को समझाया।

गोपाल कश्मीर से लौटा तो बदरुन्निसा के लिए शाल लाया। सुर्ख रंग का शाल, उपर तिल्ले की आरी वाली कढ़ाई। बदरुन्निसा ने सँभाल कर रख दिया।

"तेरी दुल्हन को दूँगी।" उसने कहा।

लेकिन दुल्हन आई कहाँ? उससे पहिले तो बँटवारा आया। अपने बाप और छोटे भाई को इकबाल लिवाने आया और अपने साथ उधर ले गया। और बदरुन्निसा, वो ताहिरा की माँ बनने का इधर ही इंतजार करती रही।

बेकरी वाले बख्तियार की घरवाली ने सलाह दी।

"काफर की औलाद को इस मुसलमानों की गली में पैदा करोगी तो हम सब की खैर नहीं। दीवारें, छतें सभी जुड़ी हैं इस गली के घरों की। तुम्हारे घर में लगाई आग हम सब को जला देगी। लाहौर चली जाओ, बाद में कभी लौट आना।"

बदरुन्निसा ने छोटी बहिन जाहिदा को लेकर लाहौर जाने वाली खचाखच गाड़ी तो पकड़ी मगर उससे उतरी नहीं।

२२ जुलाई १९६९ की शाम चित्रा ने ताहिरा और करन के लिए एक दावत रखी थी। रसल स्क्वेयर के इंस्टीट्यूट आफ कामनवेल्थ स्टडीज से हैडन सैंट्रल वापिस आने में करन को कुछ देर हो गई थी। घर पहुँचा तो ताहिरा खिड़की से झाँकती मिली। पूरा दिन उसने कई जोड़े उतारे पहने थे। उसका जी चाहता था कि वह ऊदे रंग का शरारा–कुरती पहने ताकि जाहिदा खाला के हाथ का बना महीन कढ़ाई वाला भारी दुपट्टा ओढ़ सके। लेकिन करन कह गया था कि अंडरग्राउंड में जाना है, इसलिए गरारा या शरारा पहन कर सीढ़ियाँ उतरना चढ़ना मुश्किल होगा।

काशनी चूड़ीदार कुरते के साथ मुकैश लगा दुपट्टा पहन जब ताहिरा करन के साथ घर की सीढ़ियों से उतरी तो बुढ़ऊ मकान मालिक दरवाज़े के साथ ही जुड़ कर खड़ा था।

"खूबसूरत, बहुत ही खूबसूरत।" उसने अपनी दो सूखी सी उँगलियों से अपने होंठ चूम कर कहा, "लेकिन नहाते वक्त इतनी देर तक गरम पानी मत चलाया करो, मेरा खर्चा बढ़ जाता है।"

 


ताहिरा को लगा जैसे उसके खूबसूरत लिबास के नीचे एक गीला तौलिया उसे लपेट में लिए है जिसे जितना भी निचोड़ लो, उसकी गीलाहट नहीं जाती। तौलिया सूखे तब न जब उसे कहीं खुली हवा या धूप में फैलाया जाये लेकिन यह तौलिया तो धोने के बाद भी साफ नहीं होता था। बस हर रोज इस्तेमाल के बाद और गीला होकर चिपट ही जाता था।

हैडन सैंट्रल की उबड़ खाबड़ गोरों की गली के दोनों तरफ बिल्कुल एक जैसे एक दूसरे से सटे हुए गिरते ढहते से दिखाई देने वाले मकानों में रहनेवाले भी ढीले ढाले थे। ताहिरा जब कभी सौदा सुल्फ लेने अकेले गली में उतरती, तो उसे नुक्कड़ तक पहुँच कर ही साँस में साँस आती। "यू स्टिंकिंग पाकीज", कह कर एक बार किसी फटे हुए कोट और पजामानुमा पैंट वाले बुढ्ढ़े ने उस पर थूक दिया था। तभी से वह गली में अकेले आने से कतराती थी।

आज भी करन की कुहनी थामे गली से निकल जाने की उसे बहुत जल्दी थी। लेकिन चित्रा के घर पहुँचने में ताहिरा और करन को करीबन दो घंटे लग गये। हैडन सैंट्रल से कैसिंगहन स्ट्रीट का पूरा रास्ता अंडरग्राउंड़ में पैंतीस–चालीस मिनट का था। ताहिरा चारिंग क्रॉस पर ही उतर कर विंडोशापिंग में ऐसी लगी कि चलती कम और रुकती ज़्यादा। रीजंट स्ट्रीट, ब्रांड स्ट्रीट, आक्सफ़ोर्ड स्ट्रीट की साफ सुथरी बंद दुकानों की सजी धजी विंडोज। न कीमत पूछने की जरूरत, न दाम चुकाने की कैफयत का एहसास। मन ही मन उसने बहुत सा सामान खरीदा और बड़े सलीके से एक खूबसूरत सा घर सजा लिया। एक ऐसा घर जिसमें वह जितनी देर चाहे नहा सकती थी। जहाँ कई खिड़कियाँ थीं, दरवाज़े थे और जिसके फर्श पर कोई फटी हुई दरी नहीं थी। बांड स्ट्रीट की एक शो विंडो में सजाये फर्नीचर को उसने एक इरानी कालीन के आस पास रखना शुरू ही किया था कि करन ने उसे एक हल्का सा धक्का देकर कहा,

"तुम्हारे चलनें की रफतार अगर यही रही तो दुनिया का पहला आदमी चाँद पर पहले उतरेगा और हम चित्रा के घर बाद में पहुँचेंगे।"

"आदमी को चाँद पर तो गई रात ढले उतरना है ना, अभी तो सात भी नहीं बजे।" ताहिरा ने एक बार फिर दामास्क के हलके तरबूजी रंग के गद्दों वाले सोफ़े को हसरत भरी नजरों से देखा।

"चित्रा बड़ी स्मार्ट लड़की है ताहिरा। हमें शादी की मुबारक देने के लिए उसने आज का ही दिन चुना, यह महज इत्तफ़ाक नहीं है। तुम देखना, इस एक बनाए गए इत्तफ़ाक से और कितने इत्तफ़ाक निकल आयेंगे।"

"जैसे?" ताहिरा की नजरें अब शो विंड़ो से टंगे एक भूरे बादामी लेडीज कोट पर थी।

"जैसे कि डेविड हमारी शादी की मुबारक का जाम उठाते हुए कहेगा, "अगर इन्सान चाँद पर उतर के वहाँ चहल कदमी कर सकता है, और एक काश्मीरी ब्राह्मण नौजवान एक पाकिस्तानी मुस्लिम लड़की से शादी कर सकता है, तो दुनिया में क्या नहीं हो सकता? अब तो हम यह उम्मीद भी कर सकते हैं कि वह दिन दूर नहीं जब भारत और पाकिस्तान अपने आपसी भेद–भाव भुला कर तमाम दक्षिण एशिया की माली हालत सुधारने में साँझी जिम्मेदारी सँभाल लेंगे। "

ताहिरा ने शो विंडो से अपनी नजरें हटा ली। हल्की सी ताली बजाई और पूछा,

"यह तुम हमारे लिए दी जाने वाली दावत की बात कर रहे हो या फ़ेलोशिप खत्म होने पर किसी और ग्रांट के लिए अप्लाय करने का मजमून ढूँढ रहे हो।"

"मुझे डेविड की तरह किताबें लिखने पढ़ने का कोई शौक नहीं।"

"तो यहाँ क्यों आए थे?"

"इत्तफ़ाक से मौका मिला, आ गया वरना पापा जी के साथ काश्मीरी कालीन बेचता रहता।"

ताहिरा अब फिर रुक गई थी। औरतों के अंडरगार्मेंटस की एक बड़ी दुकान की शो विंडो के सामने। शीशे की बड़ी सी खिड़की में लेस और सिल्क की ब्रा और पैंटीज के बीच एक छोटे से कार्डबोर्ड के फट्टे पर काले रिबन से लिखा था "सेल्सगर्ल वान्टेड, फलेक्सिबल आवर्स।"

"देखो करन, लगता है मुझे भी इत्तफ़ाक से मौका मिल सकता है, मैं अप्लाय कर दूँ?"

"जी नहीं।"

"लेकिन क्यों?"

"इस बात पर जिरह करनें का यह कोई वक्त है क्या?" करन की आवाज में हल्की सी तल्ख़ी थी। "हमें पहले ही काफ़ी देर हो चुकी है।" फिर उसने जो ताहिरा का हाथ पकड़ कर चलना शुरू किया तो कैंसिगटन स्ट्रीट पहुँच कर ही रुका।

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चौड़े सलेटी पत्थरों की शानदार तिमंजली इमारत। हर मंजिल पर फर्श से उठ कर छत को छूती साफ सुथरे काँच की खिड़कियाँ, खिड़कियों के आगे चमकते हुए काले रेलिंग वाली बालकनियों में सजे बड़े बड़े गमलों से ऊँचे उठते हरे कचूच पौधे। पौधों से परे खिड़कियों के पार बादामी झालर वाले महीन परदों की अधखुली भीतों से झाँकते कंदील। पूरी इमारत में जाने के लिए एक मजबूत महागनी की चमचमाती लकड़ी का लंबा चौड़ा दरवाजा। दरवाज़े के दायीं तरफ दीवार पर औंधाए गमले जैसे शेड से ढँके दूधिया बल्ब की रोशनी में चमचम करती पीतल से लिखी रहनेवालों के नाम की फहरिस्त। ताहिरा ने फहरिस्त पढ़नी शुरू ही की थी कि करन ने सिर हिलाकर टोक दिया।

"हमें बेसमेंट में जाना है।"

बेसमेंट का दरवाजा डेविड ने खोला, अदब से ताहिरा की कोहनी थामी और एक हल्की सी सीटी बजाकर चुपचाप खड़ा हो गया। कमरे में जमी भीड़ से उठती आवाज़ें एकदम खामोश हो गई।

"लीजिए साहिबान, दुल्हन आ गयी। " डेविड ने कहा।

तालियों की बौछार हुई, और यकलख्त ताहिरा के जिस्म से लिपटा गीला तौलिया कहीं गायब हो गया। फर्श को छूते अपने मुकैश वाले दुपट्टे का पल्ला सँभालती वह करन के बाजू से घिरी दूधिया बल्बों की गुदगुदी रोशनी में नहा गई। एक के बाद एक नया अजनबी चेहरा, हर जुबान से नये अंदाज में मुबारकबादी, हर मिलने वाले हाथ में गरमजोशी, हर उठती हुई नजर में कहीं अनकही खुशामदीद।

"दुल्हनें तो सभी खूबसूरत होती हैं लेकिन इस दुल्हन की खूबसूरती? बिलकुल बेमिसाल है।" कहने वाले ने अपना नाम ह्यूम मोस्ले बताया। ताहिरा के साथ खड़े करन का चेहरा खिल उठा।

"आप आज यहाँ आने का वक्त निकाल पाये, सर, यह हमारे लिये बहुत बड़ी बात है। हम दोनों आपके बेहद मशकूर हैं।" करन बोला और फिर ताहिरा की तरफ देखकर कहा उसने जैसे कोई ताजा जीती ट्राफ़ी दिखा रहा हो।

"प्रोफ़ेसर मोस्ले इंस्टीट्यूट आफ कॉमनवेल्थ स्टडिज के डायरेक्टर हैं।"

ट्वीड का कोट ओर डार्क ग्रे पैंट के साथ हल्की स्लेटी कमीज और बरगंडी स्कार्फ पहने एक बरौब अजनबी अब ताहिरा से मिलने के लिए हाथ बढ़ाए खड़ा था।

डेवड ने परिचय कराया।

"डा॰रिचर्ड टेलर आर्ट हिस्टरी डिपार्टमेन्ट के हेड हैं। चित्रा इनके डिपार्टमेन्ट की स्नातक है।"

गरमजोशी से हाथ मिलाकर डा॰टेलर ने एक बाँह फैलायी और बिना छुऐ ताहिरा के कंधों को घेरे में ले लिया। फिर वैसे ही थामे पास की दीवार पर लगी एक ब्लैक अ‍ैंड व्हाइट तस्वीर दिखा कर बोले,

"मुझे पूरा यकीन है कि आज से पचास साल बाद भी आप और आपके पति साथ साथ इतने ही खुश होंगे जितने आप दोनों आज हैं।"

 


तस्वीर में एक जोड़े की पीठ थी। बाहें एक दूसरे की कमर में, सर एकदूसरे की तरफ झुकते हुए। गरम कोटों मे से झुके हुए काँधे, बालों की सफ़ेदी और हाथों की उभरी नसें सभी उनकी उम्र का अहसास दिला रही थीं। किसी पुल पर एक लैम्पपोस्ट के पास खड़े उनके न दिखने वाले चेहरे शाम के धुँधलके का नकाब ओढ़े थे।

"तुम इस जोड़ी को जानते हो क्या?" डॉ टेलर ने डेविड से पूछा,

"नहीं गर्मियों की छुट्टियों में चित्रा और मैं रोम गये थे, वहीं पर चित्रा ने इन दोनों को पुल पर ऐसा खड़ा देख कर यह तस्वीर ली थी, इनको बिना बताये। इनको एक कॉपी भेजने की इजाजत भी फ़ोटो लेने के बाद ही ली।"

"बहुत यादगार लम्हा कैमरे में उतारा है चित्रा ने। किसी आर्ट स्टूडेंट को कहना चाहिये कि वह फ़ोटोग्राफ़ी, एचिंग और आर्किटेक्चर के आपसी प्रभाव पर योरोपीय और एशियाई संदर्भ में कुछ और रिसर्च करे। तुम्हारा क्या ख्याल है डेविड? मुझे तो अब तक लगता है कि यूरोप और एशिया की परम्पराएँ उनके इतिहास से कम और भूगोल से ज्यादा प्रभावित है।"

खामोश खड़ी ताहिरा से अब एक और अजनबी हाथ मिला रहा था।

"मिसेस जुत्शी, मैं आज शाम की खास मेहमान से जल्दी जाने की इजाजत चाहूँगा। मुझे घर पहुँचने के लिये अभी मीलों का फ़ासला तय करना है। इन्सान को चांद पर पहला कदम रखते हुए देखने के लिए, मेरा परिवार मेरे साथ होगा।"

डेविड जाने वाले को दरवाजे तक छोड़ने गया, करन ने ताहिरा से कहा,

"वो डा॰टामसपेलिंग थे, स्कूल ऑफ ओरियंटल एैंड अफ़ीकन स्टडीज में साउथ ऐशिया प्रोग्राम के डाइरेक्टर है, डेविड के बॉस हैं।"

"तुम जानते हो अभी जाने से पहले टॉमस मुझे क्या कह कर गया है?" डेविड कह रहा था, "वह चाहता है कि किसी स्टूडेंट से कह कर कैम्पस जर्नल के आने वाले इश्यू में तुम दोनों को लेकर एक लेख छपाया जाये।"

करन को बड़े नाटकीय आवाज में अपनी टाई ठीक करते हुए देख कर डेविड मुस्करा दिया।

"अरे हाँ टॉमस यह भी कह रहा था कि तुम दोनों की जोड़ी इतनी खूबसूरत है कि कैमरा तो तुम्हें तलाश करेगा ही, देखने वाले भी एकबार देख लेंगे तो पूरा लेख पढ़ ही डालेंगे।"

करन और ताहिरा की शादी को लेकर रसल स्क्वेयर के हरे भरे अहाते में काफ़ी चर्चा थी।

इन्स्टीट्यूट आफ कामन वेल्थ स्टड़ीज और स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टड़ीज में अन्तर–जातीय, अन्तर–मजहबी या अन्तर–देशीय शादी होना कोई बड़ी बात नहीं थी। अन्तरदेशीय माहौल में रहकर ही तो इंसान मजहब, जाति और राष्ट्रीयता के संकुचित दायरों से उपर उठता है न इसीलिए तो कई कई परोपकारी दूर दूर से बिछड़े हुए देशों के स्नातकों को वज़ीफ़े देकर बाहर की दुनिया में पढ़ने–लिखने का मौका देते हैं। लेकिन करन तो ताहिरा से शादी करने के बाद ही लंदन आया था, और वह भी पहली बार। जम्मू कश्मीर युनिवर्सिटी से सेकन्ड डिवीजन में एम ए किया था उसने और ताहिरा लाहौर के किसी प्राइवेट कालिज में पढ़कर बी ए हुई थी।

स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टड़ीज में हिस्टरी आफ आर्ट की छात्रा चित्रा की एक सहपाठिन ने पूछा कि क्या वह ताहिरा और करन को जानती है।

"मेरे दादा ताहिरा के पिता थे।" चित्रा ने ऐसे सहज कहा जैसे कि "कुनबे के दरख्त" की किसी टहनी पर हाथ रख दिया हो।

बस फिर तो उत्सुक स्नातकों का ताँता सा लग गया चित्रा के आस पास।

"तुम्हारे दादा मुस्लिम थे क्या?"

"करन तो ऊँची जाती का हिंदू है ना? ब्राह्मण है?"

"एक भारतीय और एक पाकिस्तानी में शादी होना तो बड़ी सनसनी वाली वारदात रही होगी?"

"तुम्हारे यहाँ तो शादियाँ अरेंज होती है, इनका प्रेम विवाह हुआ होगा। मिले कहाँ होंगे यह दोनों? काश्मीर में मिले हो, ऐसा मुमकिन तो नहीं लगता।"

फतरतन कम बोलने वाली चित्रा ने डेविड को बताया,

"करन और ताहिरा के बारे में बातें करना मुझे अजीब सा लगता है। पता नहीं वह दोनों खुद पब्लिक में क्या कहना चाहते हैं?"

"तुम उन दोनो के लिये एक दावत दे सकती हो। कैम्पस वाले इस जोड़ी से एक बार खुद मिल लेंगे तो शायद एक दूसरे के आदी भी हो जायेंगे।" डेविड ने सलाह दी।

चित्रा ने करन से पूछा,

"तुम किस किसको न्योता देना चाहोगे?"

करन ने कुछ सीनियर फैकल्टी मेम्बरज के नाम गिना दिए जिन्हें वह एकाध बार मिल चुका था और जो शायद उसका नाम उसके चेहरे से जोड़ सकते थे। स्नातकों की फहरिस्त चित्रा और डेविड पर छोड़ दी।

रसल स्क्वेयर का अहाता लंदन के बीचो बीच पड़ता है। इंस्टीट्यूट ऑफ कामनवेल्थ स्टडीज और स्कूल आफ ओरियंटल ऐंड अफ़ीकन स्टडीज जैसी दो नामवर संस्थाएँ इसी अहाते में एक दूसरे से कुछ ही कदमों की दूरी पर हैं। वहां के सीनियर फैकल्टी मेम्बर्स इंग्लैंड में ही नहीं, दूसरे मुल्कों में भी आला तालीम, व्यापारी और सियासती मामलों में सलाह करते हैं, देते हैं। न जाने कौन, कब, किसकी नजर में पड़ जाये? कहाँ से कहाँ पहुँच जाये? वैसे भी करन यही मान कर चलता था कि अंग्रेज़ों ने ऐसा एम्पायर तो जरूर बनाया था जहाँ सूरज कभी डूबता नहीं, लेकिन जब वो टूट कर बिखरा तो काफ़ी मेस हो गई। उसे संभालने के लिए कुछ तो इमदाद चाहिए थी। वह तैयार था, बस बात उस पर किसी की नजर पड़ने की थी।

"नीली छतरीवाला अगर अंग्रेज है तो उपर से नीचे देखने वक्त मैं उसे एक बार बस दिखाई दे जाऊँ, बाकी मैं खुद सँभाल लूँगा।" उसने चित्रा से कहा, "फिर तुम्हारी पार्टी में तो ताहिरा भी मेरे साथ होगी। उसे देख कर नजर फेर लेना मुमकिन ही नहीं।"

सीनियर फैकल्टी मेम्बर्स जब तक पार्टी में रुके, बाकी मेहमान उन्हीं को घेरे रहे, उनके जाते ही पूरी पार्टी का नक्शा बदल गया। छोटी छोटी टोलियाँ बनीं और यहाँ वहाँ बिखर गई। कैंट, मार्लबरो और रॉथमैन सिगरेटों से उठते धुएँ की अलग–अलग महक कई–कई आवाज़ों से उठता बे–अल्फ़ाज शोर। खाली गिलासों को भरने के लिए कोने में रखी ड्रिंक्स की ट्रे की तरफ बढ़ते और वहाँ से लौटते कदमों की चहल पहल। करीनेवार बेतरतीबी का जीता जागता मेला। मेले में करन ताहिरा से कब जुदा हुआ, उसे पता नहीं चला।

दीवार से सटी बुक शेल्फ के पास खड़ी ताहिरा का जी चाहा कि वह एक नहीं, छः सात हो जाये। हर टोली में एक साथ शामिल हो, हर उठते हुए ठहाके पर खिलखिला के हँसे, और फिर किसी जादुई पिटारी में ताजा धुएँ की महक, उठती आवाजों का शोर, चलते फिरते कदमों की आहट को कैद कर ले। पिटारी इतनी छोटी हो कि आज तो उसके पर्स में आसानी से पूरी आ जाए। लेकिन हैडन सैंट्रल पहुँचनेपर फैल कर वो सारा कमरा भर दे जहाँ वह करन के जाने और लौटने के बीच बिल्कुल अकेली होती है। उस कमरे में न टी वी था, न रेडिओ न टेपरिकार्डर। उस कमरे की घड़ी भी टिक टिक नहीं करती थी। सड़क की तरफ खुलती एक खिड़की थी, गुसलखाने की तरफ जाते हुए गलियारे में एक दरवाजा। पचासी साल की स्पिंस्टर बहिन के मरने पर अस्सी साल के बिली को हैंडन सेन्ट्रल का मकान इकलौते वारिस की हैसियत से मुफ़्त मिला था। पिछले दस सालों में दो बीवियों को दफ़्न कर चुका था। अब एक बयासी साल की बेवा के चक्कर लगा रहता था। दो कमरों वाले मकान का एक कमरा किराये पर चढ़ा दिया था करन को। पूरे लंदन में करन को वहीं क्यों रहना पसंद आया, यह उसने ताहिरा को नहीं बताया। बस इतना ही कह दिया बिना ताहिरा के पूछे,

"थोड़ी सी परेशानी बर्दाश्त कर लो भाई। हाथ खुलते ही निकल जायेंगे यहाँ से।"

ताहिरा के कंधे पर एक मुलायम हाथ आ कर टिक गया।

"क्यों ताहिरा? यह फैसला नहीं कर पा रही हो कि किस खुशनसीब टोली में जाकर शामिल होना है आज?" चित्रा पूछ रही थी। डेविड उसके पास खड़ा था।

खुलते हुए गेहुए रंग और जहीन चेहरे वाली कली सी नाजुक चित्रा। मँझले कद का दुबला पतला लंबे भूरे बालों वाल डेविड। चित्रा अपने पाँव के नीचे आता एक कुशन उठाने को झुकी तो डेविड ने उसके माथे पर गिरते बालों की लट पीछे सरका दी। चित्रा ने हाथ बढ़ा कर ड्रिंक ट्रे से एक गिलास उठाया तो डेविड ने बोतल पकड़ कर उँड़ेलना शुरू कर दिया। गिलास उसके हाथों से लेकर पहले उसी के ओठों तक ले गया और उसके घूँट भरते ही खुद भी उसी गिलास से सिप करने लगा। अब चित्रा डेविड की बाँह के घेरे में थी और वह अपने ओठ उसके माथे पर रख कर लंबी साँस ले रहा था।

"हम यहीं अपनी एक छोटी सी टोली क्यों ना बना ले? कम से कम थोड़ी देर के लिये, सिर्फ हम तीनों?" डेविड ने कहा।

उसके खुले बालों में अँगुलियाँ घुमाती चित्रा हँस दी।

"मुझे लगता है कि डेविड को अपने बालों की पोनी टेल बाँधनी चाहिये। मुझसे कहीं घने बाल हैं इसके। तुम्हारा क्या ख्याल है ताहिरा?"

ताहिरा का मन अचानक करन से बिल्कुल सट कर बैठने को हुआ। उसने चारों तरफ नजर दौड़ाई।

"करन को देख रही हो न? वहाँ सोफ़े पर है।"

ताहिरा को अपनी तरफ आते देखकर करन के साथ सोफ़े पर बैठे दोनों अजनबी उठ खड़े हुए। करन ने दोनों को वापस बिठा दिया फिर अपनी जगह पर ताहिरा को बिठा, खुद उसके पास सोफ़े के बाजू पर बैठ गया।

"यह असलमबेग है, कराची से, और यह अयूमा ओवुली है नैरोबी से।" उसने परिचय कराया। "दोनों मेरी तरह इंस्टीट्यूट में फेलोज हैं।"

असलम नें ताहिरा को अपनी बातचीत में शामिल करते हुए कहा,

"हम लोग पीने वालों की जमातें बना रहे थे। एक वो जो बोतल देखकर कहते हैं : आज तू नहीं या मैं नहीं, दूसरे वो जो पीते कम और झूमते ज्यादा हैं।" वह रुका, भरपूर नजरों से पहले ताहिरा और फिर सामने से आती हुई चित्रा को देखा। फिर आह भर कर बोला,

"तीसरे वो जिन्हें अच्छी सूरत देखकर बिना पिये ही नशा हो जाता है।"

डेविड भी अब तक आ गया था और चित्रा के कंधे तक कटे बालों से छेड़खानी कर रहा था। चित्रा ने असलम की कही बात का तर्जुमा किया तो हँस कर बोला,

"अगर तुम चित्रा को निहारने से एक आध मिनट की फ़ुरसत ले सको असलम, तो मैं पूछना चाहता हूँ कि तुम्हारे लिये क्या ला सकता हूँ? मेरा मतलब है कि तुम्हारे पीने के लिये।"

 
असलम न मुस्कुराया, न कुछ बोला। जब डेविड ड्रिंक्स ट्रे की तरफ जाने को मुड़ा तो असलम ने उसे रोक लिया।

"एक बात बताओगे डेविड? ऐसा क्या है तुम गोरे आदमियों के पास कि हमारे यहाँ की आला उमदा लड़कियों को तुम फाँस लेते हो और हमारे हिस्से आती हैं तुम्हारी बेचारी तलछट। दफ्तरों में टाइप करने वालियाँ, डाकघरों के खतों को मोहरें लगाने वालियाँ, बसों और गाड़ियों के टिकट बेचने वालियाँ?"

ताहिरा ने असलम की तरफ देखा। वो न तो पी रहा था न ही उसकी आँखों में कोई हँसी मजाक की हल्की सी छाँव थी।

करन ने बात का रुख मोड़ा।

"यह सारा कुसूर मेरा है। न मैं ताहिरा को चित्रा समझता, न चित्रा डेविड से मिलती। मैं तो अपनी खूबसूरत बीवी को आज भी सेल्सगर्ल होते होते बचा लाया हूँ। क्या पता कौन खरीददार कभी दुकान की रसीद के साथ बेचनेवाली को भी बतौर तोहफ़ा पैक करवा लेनेकी ज़िद पकड़ ले।"

इस से पहले कि चित्रा करन की बात का तर्जुमा करे, असलम करन की तरफ देखकर बोला।

"तुम हिंदुओं की हीपोक्रसी का तो जवाब ही नहीं। यहाँ आते ही स्कर्ट पहनी हुई हर चीज के साथ लिपट जाने और जहाँ तहाँ जायका बदलने में तुम्हें कोई परहेज नहीं रहता। फिर वहाँ जा कर कुँवारी दुल्हनें ले आते हो जो तुम्हारे अलावा किसी को देख भी ले तो उनकी शामत।" न उसकी आवाज में कोई चुहल थी, न चेहरे पर कोई मुस्कराहट।

"अब बस भी करो असलम।" अभी तक खामोश बैठे अयुमा आवुलो ने ट्रूस की माँग करता हुआ हाथ उठा दिया। "तुम भी कैसा हरामीपना दिखाने पर उतर आये हो।"

अब असलम उठ कर खड़ा हो गया। अयूमा ओवुली के कंधों पर उसने दोनों हाथ रख दिये और मुस्करा कर कहा,

"तुम्हारी बात तो मैंने सुन ली, मेरे साँवले सलोने दोस्त, लेकिन अगर किसी गोरे हरामी ने मुझे माँ की गाली दी होती तो यकीनन उसी की माँ को ही खराब कर के उसकी बात रख लेता।"

ताहिरा ने डेविड को देखा। उसके चेहरे पर न गुस्सा था, न परेशानी। पास खड़ी चित्रा को देख उसका हाथ अपने हाथ में लेकर बड़े इत्मीनान से डेविड ने पूछा, "चल के देखें कि पॉट रोस्ट तैयार हो गया या नहीं? पक जाने की खुशबू तो आ रही है।"

जैसे किसी ने कुछ कहा ही नहीं, जैसे किसी ने कुछ सुना ही नहीं।

अपोलो ११ की चाँद के धरातल पर पहुँचती तस्वीर ज्योंही टी वी पर उभरी, डेविड ने एक एक करके कमरे के सारे लैंप बुझा दिये। उस घुप्प अँधेरे में पूरा कमरा भी आसमान हो गया। फिर जो बत्ती जलाई तो कमरे की छत पर छोटे छोटे टिमटिम करते नीले बल्बों का चंदोवा था, हल्के स्लेटी रंग की दीवारों पर टंगे छोटे बड़े कई पोस्टर धुँधले बादलों की टुकड़ियाँ थीं, वॉल टू वॉल फरशी दरी एक तिलस्मी कालीन थी, और उस पर जहाँ तहाँ बिखरी मेहमानों की टोलियाँ अपनी अँगुलियाँ क्रास किये टी वी पर नजरें एकटक गडाए थीं जैसे पलक झपकने पर तिलस्म टूटने का अंदेशा हो। स्पेस सूट पहने नील आर्मस्ट्रांग का पहला कदम जब चाँद के अछूते धरातल पर उतरने में सिर्फ जरा सा ठिठका तो ताहिरा ने पास बैठे करन का हाथ कस कर थाम लिया। दुनिया के हर इन्सान के लाखों मील दूर, अपोलो ११ में अपने दूसरे साथियों की पहुँच से बाहर, यह अकेला इंसान इस वक्त कितनी नजरों के दायरे में है? किसी एक अकेली जान को क्या कभी इतनी नजरों ने पहले भी एक साथ देखा है? देखेंगी?

तालियों की गड़गड़ाहट के साथ देखने वालों ने एक दूसरे को गले लगाया, शैम्पैन के ग्लास खनके। असलम अपना गिलास ताहिरा के गिलास से खनका कर करन से बोला,

"आज के बाद खूबसूरत चेहरों की तशबीह चाँद के देने वालों का क्या होगा यार, मगर आज के दिन मुझे जाम उठाने की इजाजत दे ही दो। एक ऐसी खूबसूरत औरत के नाम जिसकी मिसाल चाँद से हो ही नहीं सकती क्योंकि उसके सामने चाँद भी फीका लगता है... मैं अपना यह जाम तुम्हारी दुल्हन के नाम उठाता हूँ, करन।"

ताहिरा ने जाहिदा खाला को एक और खत लिखा,

खाला जान,

कल चित्रा ने हमारे लिए एक शानदार दावत दी। बहुत शहाना इलाके में रिहाइश है उसकी, लेकिन जमीन से ऊपर नहीं, जमीन के नीचे। यहाँ उसे बेसमेंट कहते हैं। दावत का सारा माहौल ही बिल्कुल तिलस्मी कर के रखा था उसने। मेहमान कह रहे थे कि मेरा काशनी मुकैश वाला दुपट्टा और चित्रा की बेसमेंट की नीची छत से टिमटिमाते छोटे छोटे नीले बल्बों की रोशनी में मुकाबला चल रहा है। किसके पास ज्यादा सितारे हैं?

चित्रा की तो मैं फूफी हूँ न खाला जान। उम्र में भी मुझसे कोई साल भर छोटी है वो लेकिन मेरा ऐसा दुलार करती है वो जैसे मेरी आपा हो। बड़ी ही प्यारी है और सँभली हुई भी।

मैंने उसे एक बार भी माथे पर तेवर डाले नहीं देखा है तो बड़ी कम–गो। पर हर बात इशारतन सँभाल लेती है। मुझे तो लगता है कि वो जो भी चाहे कर सकती है। चाँद पर भी उतरती तो वहाँ ऐसे घूमने निकल जाती जैसे कम्पनी बाग में सैर करने गई हो।

लाहौर से लंदन इतना दूर तो नहीं है न खाला जान जितना जमीन से चाँद आप यहाँ आतीं तो कितना अच्छा होता।

आपकी अपनी गुड़िया

ताहिरा

हाँ एक बात और। मुझे मेरा खत मिलते ही लंबा सा खत लिखियेगा। इतना लंबा कि उसे एक बार पढ़ने में ही मेरा पूरा दिन निकल जाये। रुक रुक पढ़ूँगी और पढ़ती पढ़ती आपसे बातें करूँगी। कितनी बातें बतानी है आपको।

ताहिरा

पूरा करने के बाद ताहिरा ने काफ़ी बार सोचा कि डेविड के बारे में कुछ लिखे। चित्रा उसी के साथ रहती है। दोनों कितने प्यारे लगते हैं। लेकिन लिखा कुछ नहीं।

डाक में ख़त छोड़ते ही ताहिरा जवाब का इंतज़ार करने लगी, एक हफ्ता पहुँचने में, एक हफ्ता जवाब में। ठीक पंद्रह दिन में जवाब आया। सिर्फ तीन जुमले, वो भी छोटे छोटे।

ताहिरा, मेरी जान

कैसी बड़ी बड़ी बातें करने लगी है तू? मैं तो हर वक्त तुझे ख़त लिखती रहती हूँ, मगर कलम से नहीं। अब भी आँखों में तेरी सूरत है और हाथ काँप रहा है।

फिर लिखूँगी, मेरी गुड़िया,

तुम्हारी ही ख़ाला

ख़त पढ़ते ही ताहिरा फिर लिखने बैठ गई।

"मेरी बहुत याद आती है न आपको खाला जान, लेकिन मुझसे ज़्यादा नहीं मैं भी आपकी उस गुड़िया को बहुत याद करती हूँ जिसे नींद से उठाने के लिए कोलोनी के मुर्गे की बाँग कभी सुनाई नहीं देती थी, जो सुबह की अँगीठी के धुएँ को दोनों हाथों में समेटकर उपर हवा में उछालती थी, जिसके दुपट्टे का पल्ला दूधवाले की साईकल में फँस कर फटते हुए कई बार बचा था। जिसके बालों में तेल लगा कर आप पहले धूप में बिठा देती थीं और फिर ख़ुद ही कहती थीं, "अब उठोगी भी या रंग मैला करने की कसम खा ली है। कितना लिखूँ ख़ाला जान कैसे कैसे कहकर लिखूँ? आप को तो बिना बताए मेरी बात समझने की आदत है न बस थोड़ा लिखा ज़्यादा जानें और मेहरबानी करके अगले ख़त से लिखें कि आप पिछला ख़त लिखने के बाद कितनी देर तक रोई थी?"

ख़त डाक में छोड़ कर जब ताहिरा अपनी गली में मुड़ी तो किसी ने पीछे से उसके कंधे पर हाथ रख दिया। मटमैले पैंट कोट वाला एक खुरदरा सा बुजुर्ग गोरा था। ताहिरा को अपनी तरफ देखते पाया तो उसकी गिजगिजी आँखों में लार उतर आई। खीसें निपोर कर बोला,

"तो तुम्हीं हो वो ख़ूबसूरत बला जो उस सुअर बिली की गंदगी के ढेर में रहती है?"

उसके मुँह खोलते ही मछली, बीयर और टमाटर सॉस से मिली तले हुए आलुओं की एक बासी भभक उठी। ताहिरा ने अपने दुपट्टे का पल्ला मुँह पर रखने के लिए हाथ उठाया तो भभकी ने एक हाथ से उसके हाथ को कस कर पकड़ा और अपनी छाती पर दबा दिया। अपना दूसरा हाथ उसने ताहिरा की कमर पर रखा और कूल्हों से चिपटी उसकी रेशमी सलवार को सहलाने लगा।

थर थर काँपती ताहिरा ने चारों तरफ नज़र दौड़ाई। भरी दुपहरी में कई लोग गली में आ जा रहे थे। कुछ ही हाथ की दूरी पर दो थुलथुली गोरी औरतें मलबे में फेंकने वाले काले रंग के थैले पकड़े बतिया रही थीं।

ताहिरा ने भभकी की गिरफ्त से छूटने की कोशिश करते हुए ज़ोर से चिल्ला दिया,

"छोड़ो मुझे, प्लीज़ जाने दो।" वह कहती गई और बड़ी आजिज़ी से थुलथुली औरतों को देखती गई। उनमें से एक ने अपने हाथ में पकड़ा काला थैला नीचे रखा, सुर्ख लिपस्टिक से सने ओठों को कानों तक खींच कर हँसी और पूछा,

"कोई मदद चाहिए हनी?"

ताहिरा की जान में जान आई और हलक में अटक कर रह गई। लिपस्टिकी औरत ताहिरा से नहीं, भभकी से बात कर रही थी। भभकी ने ताहिरा के कूल्हों पर फिरते अपने हाथ को ज़ोर से दबाया और बड़ी सी चुटकी भर के कहा,

"ऐसी कोई बात नहीं, मॅगी। मैं तो इस हूर परी से पूछ रहा हूँ कि क्या ये मुझे कहीं भी ज़रा सा छू कर देखना चाहती है कि मैं कितना ऊपर उठ सकता हूँ।"

अब वो ताहिरा के हाथ को अपनी कमीज़ के अंदर घुसेड़ता हुआ नीचे की तरफ ढकेल रहा था। पूरे ज़ोर से उसे धक्का देकर ताहिरा भागी। घर के दरवाज़े पर ही बिली दिखाई दिया। ताहिरा की हिम्मत न हुई कि उससे कुछ कहे या पूछे। क्या उसने वह देखा था जो ताहिरा के साथ हुआ? या वो बिली के लिए कोई देखने वाली वारदात ही न थी। वह करन को फोन करना चाहती थी, लेकिन उसके लिए बिली की इजाज़त लेनी पड़ती। फोन बिली के कमरे में ही था, ताहिरा कतरा गई।

अपने कमरे में पहुँच कर उसने दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसका जी चाह रहा था कि किसी रोशन जगह पर एक महफूज़ कोने में बैठ जाए और दहाड़ें मार कर रोए। लेकिन धूप से चौंधियाई उसकी आँखों को सारा कमरा घुप्प अँधेरे में खोया लगा। वैसे भी कमरे की छोटी सी खिड़की के आगे लगे भारी भरकम पुराने परदों की ओट से रोशनी अंदर आते हुए सहम जाती थी। ताहिरा ने खिड़की के पास जाकर एक परदा हटा दिया और उसी के साथ टंगी डोरी से बाँधना चाहा। तभी बाहर से फेंकी एक ईंट खिड़की के शीशे पर लगी और काँच के कई टुकड़ों समेत कमरे की दरी पर आकर टिक गई। हटाया हुआ परदा ताहिरा के हाथ से छूट कर फैल गया।

बुत सी बनी ताहिरा कुछ देर चुपचाप खिड़की के पास खड़ी रही। फिर हल्के अँधेरे को टटोलती हुई बिजली का स्विच जला कर वह कमरे के दरवाज़े के साथ पीठ टिका अपने आस पास देखने लगी। इस चौकोर कमरे का कौन सा कोना ऐसा महफूज़ है जहाँ वह अपने घुटनों पर सिर रख कर आँखें बंद कर ले?

अचानक ताहिरा के सारे बदन में एक ज़ोर से कँपकँपी उठी जैसे उसने कोई बिजली का नंगा तार छू लिया हो।

"हाँ," उसने लंबी सांस ली, "अब मुझे पता लग गया कि मैं करन के घर से जाने के बाद खिड़की के पास ही क्यों बैठ जाती हूँ," वह अब अपने आप से बात कर रही थी।

"मुझे खौफ लगा रहता है कि मेरे अकेले होते ही इस कमरे की कोई न कोई चीज़ अपना हुलिया बदल डालेगी। किसी न किसी बहाने मुझसे वह करवा देगी जो मुझे नहीं करना चाहिए।"

वह बोलती जा रही थी।

"नहीं कुछ करवाएगी नहीं, टोकेगी हाँ टोकेगी वह करने से जो मैं करती रहती हूँ।"

अब वो आँखें फाड़ फाड़ कर सारे कमरे को देखने लगी जैसे हर छिपे हुए जिन्न का सुराग ढूँढती हो।

छोटे से कमरे में ठूँस कर रखा हुआ तमाम फर्नीचर या तो बहुत बड़ा था या सालों के इस्तेमाल का मारा। भरकम फोर पोस्टर बेड के ऊपर उबड़ खाबड़ लिहाफों और पैबंद लगे सीले से कम्बलों का एक ढेर था जिसे तेज़ धूप और ताज़ी हवा की सख्त ज़रूरत थी।

छिलते हुए बदरंग गद्दों से ढकी, छुओ तो कराहती एक ही कुरसी थी जिसमें एक अकेला बैठे तो पीठ का सहारा देने में लुड़क जाए और दो जन बैठें तो साँस न ले सकें। कमरे के बीचो बीच टेड़ी मेड़ी टाँगों वाली एक गोल तिपाई के आस पास दो भारी लोहे के फ्रेम की कुर्सियाँ थीं जिन्हें खाना खाते वक्त ज़रा भी खींचना धकेलना पड़े तो नीचे बिछी बेरंग दरी का छेक और फैल जाए।

बुझी राख से भरी ठंडी फायरप्लेस को भुतहा बनाने के लिए अगर कोई कमी थी तो सिर्फ एकाध मकड़ी के जाले की, वरना उसके सामने पड़े पुराने ताँबे और लोहे के काले देगचे तो पहले ही आग फूँकने और बुझाने के हथियारों से लैस थे।

जो कभी फर्शी दरी रही होगी, अब वह एक बड़ा सा चिथड़ा था जिसे खींच तान कर उसके पैबंदों को फर्नीचर के नीचे छिपा दिया गया हो।

 


फोर पोस्टर बेड कई बार ताहिरा को अकेले पा कर फुसफुसा चुका था।

"मत सोया करो इसके साथ। यह तुम्हारे ऊपर सवार होकर तुम्हें कचोटेगा और तुम्हारा दम घोट कर खुद आराम से ख़र्राटे लेगा?"

शाम को करन के आने से पहले जब वह खाने वाली मेज़ पर प्लेटे सजाती तो कई बार मेज़ की टेड़ी मेड़ी टाँगें ताहिरा के टखनों या घुटनों से टकरा कर टोकतीं,

"क्यों रोज़ रोज़ उसके लिए ऐसा लज़ीज़ खाना पकाती हो वो तो तुम्हें रोज़ाना पिल्स ही खाने को कहता है न ताकि उसका मज़ा बना रहे और तुम अभी माँ न बन सको। तुम्हें क्या जल्दी है माँ बनने की अभी तो तुम्हें तेईसवाँ साल ही लगा है न मत फटकने दो उसे अपने पास पिल्स खाकर जो सारा दिन तुम्हारा मन भारी रहता है उसे पल दो पल के शौक से क्या बहलाना?"

दिन के गुमसुम हल्के उजाले में जब वह बेनागा फायरप्लेस के उपर वाली मैन्टलपीस की धूल झाड़ती, तो राख की ठंडी ढेरी नीचे से बुदबुदा कर इल्तजा करती।

"मेरी बात सुनो ताहिरा, कहीं से थोड़ी सी सूखी लकड़ी लाकर बस एक बार मुझे जलती आग की गरमी दे दो। फिर देखना, मैं किस होशियारी से इस सारे कमरे को फूँक कर अपने जैसा बना दूँगी।"

कमरे में इधर उधर जाते जब कभी किसी पैबंद पर उसका पाँव पड़ता तो पूरी की पूरी फर्शी दरी सिहर उठती।

"मेरी भी मजबूरी है, ऐ खूबसूरत शहज़ादी ऐसी जगह–जगह से छिदी हुई न होती तो तेरा तिलस्मी कालीन बन जाती। रोज़ दिन में उड़ाकर तुम्हें ज़ाहिदा ख़ाला के पास छोड़ती और शाम को लौटा लाती, करन के घर वापिस आने से पहले। मज़ाल थी किसी की जो गलत–सलत कह–छू कर तुम्हें परेशान करता?"

•••

ज़ाहिदा के लिए ताहिरा उस कुँवारी माँ की इकलौती औलाद थी जिसकी गोद तो भरी थी, मगर कोख नहीं।

एक हुनरमंद कहारन के पुश्तैनी ओसारे से तप कर निकला बेशकीमती तोहफा थी ताहिरा। गुँधती माटी में सर का एक छोटा सा बाल भी रह गया होता तो तोहफे में खोट रह जाता। किसी खानदानी ललारी के सधे हुए हाथों से रंगा सतलहरिया दुपट्टा थी ताहिरा। महीन चुन्नटों मे बँधा कोई रंग ज़रा सा भी फैल जाता तो दुपट्टे की लहरियाँ सैलाब बन जातीं। गुजरात से लाहौर जाती पैसंजर गाड़ी के हिचकोले खाती बीस–बाइस साल की ज़ाहिदा की गोद में पड़ी, मरी माँ के पेट से निकली, सतमासी पैदाइश का जिंदा करिश्मा ताहिरा। लाहौर की रिफ्यूजी कालोनी में एक कमरे वाले घर में रहने की दरख़ास्त लिखती ज़ाहिदा के कंधे से लगी फूल सी हल्की ताहिरा।

रिफ्यूजी कॉलोनी के शोरोगुल भरे अहाते में ज़मीन पर आगे पाँव पसारे बैठी हुई ज़ाहिदा के घुटनों और टख़नों के बीच मुँह के बल लिटाई, बादाम के तेल की मालिश करवाती, पटोले सी ढीली ढाली ताहिरा। आस पास के घरों की अँगीठियों पर मिट्टी का लेप करती उकडू बैठी ज़ाहिदा की पीठ से चिपटती, अपने पाँव पर खड़ा होना सीखती ताहिरा। रस्सी पर कढ़ाई किए पलंगपोश को लटकाती, हाथ उठाए खड़ी ज़ाहिदा की कमर को अपने सिर से छू कर खिल खिल करती गुड़िया सी गोल मटोल ताहिरा।

गोरी चिट्टी, भूरी नीली आँखों वाली ताहिरा।

घनी पलकों और घुँघराले बालों वाली ताहिरा।

नाजुक अंगुलियों और नर्म हाथ पैरों वाली ताहिरा।

स्कूल का बैग उठाए कॉलनी के नुक्कड़ से सड़क को मुड़ते हुए लौट लौट कर ख़ाला को हाथ हिलाकर देखती ताहिरा।

और फिर एक दिन अपने चेहरे को दोनों हाथों से थामे ज़ाहिदा के काँधों से कहीं उपर सिर निकालती, ज़रा सा झिझक कर पूछती ताहिरा।

"ख़ाला जान, मैं किस के जैसी दिखती हूँ? अम्मी जैसी?"

"आपा जैसे तो बस घने बाल और लंबी गर्दन है तेरी। कद–काठी, चेहरा–मोहरा, नैन–नक्श सब रायसाहिब के छोटे बेटे गोपाल जैसे हैं। बड़ा खूबरू था वो जब मैंने देखा था," ज़ाहिदा ने कहा और एक ठंडी साँस भरी।

बदरूनिसा से मिलने ज़ाहिदा कभी कभार ढक्की दरवाज़ा गली चली जाती थी। छुट्टी वाले दिन जाती तो कहीं न कहीं गोपाल दिखाई दे जाता। कभी घर में, कभी गली में। सीढ़ियाँ उतरते–चढ़ते एकाध बार ज़ाहिदा का दुपट्टा गोपाल की कमीज़ की कुहनी छू लेता।

"चाची, मैं पूछ रहा था," कहता हुआ गोपाल रसोई में गपशप करती बहनों को अपने आने से आगाह करता और फिर चाय या पानी की फरमाईश करते कुछ देर के लिए दहलीज़ पर टिका रहता।

पता नहीं किस रिश्ते से उसने बदरूनिसा को चाची कहना शुरू किया था। एक बार 'इविनिंग इन पेरिस' के अत्तर की दो छोटी छोटी नीली शीशियाँ ले आया और चाची की दे दीं।

"यह दो किस लिए?" बदरूनिसा ने पूछा,"एक तो आपके लिए है चाची। दूसरी आप ज़ाहिदा को दे दें न" कह कर वह दहलीज़ पर टिके बिना मुड़ गया। ज़ाहिदा ने शीशी लेने को हाथ बढ़ाया तो बदरूनिसा ने छोटी बहिन का हाथ अपने दोनों हाथों में ले लिया।

"मत कुबूल कर ये तोहफा, मेरी लाड़ो। जिस गली में रहना नहीं उसका पता पूछ कर क्या करेगी?"

बँटवारे के बाद गोपाल ने बदरूनिसा को एक ख़त लिखा जिसे अमृतसर से लाहौर पहुँचने में करीबन बीस बरस लग गए। दंगे फसादों के ख़ून–ख़राबे में कुछ डाक के थैले भी ज़ख्मी हुए थे। मारो काटो से लहू–लुहान एक मुसाफिर ने रात के अँधेरे में डाक गाड़ी के थैलों में पनाह ली थी और वहीं पर हमेशा के लिए सो गया था। उसके ज़ख्मों के निशान कुछ थैलों की उपरी परत से चिपटे ख़तों ने अपने उपर ले लिए थे। गोपाल के लिखे ख़त पर "बीवी बदरूनिसा, मकान नम्बर चौदह, ढ़लकी दरवाज़ा गली" बच गया, "गुजरात" धब्बा बन गया। ख़त शहरों शहरों भटका। "यहाँ नहीं है" के ठप्पे खा खाकर तुड़ा मुड़ा। जब गुजरात के एक पुराने डाकिये के हाथ पड़ा, तो अपने दोनों हाथ उपर उठा कर कहा,

"वाह री चिठ्ठी, इतने बरसों बाद तुझे अपना सिरनांवा मिला है तो ज़रूर ख़ुदा बिछड़ों को मिलाने की अपनी तज़वीज़ में मुझे शामिल करना चाहता है।"

चौदह नम्बर मकान के नए मालिक को वहाँ रहते दस बरस गुज़र चुके थे। डाकिए ने ख़त उसे नहीं, बेकरी वाले बख्तियार को दे दिया। बदरीलाल के नुक्कड़ वाले मकान में अब वही रहता था। जब तक उसकी घरवाली जीती थी, ज़ाहिदा के साथ ख़तो–ख़ताबत करती रही। एकाध बार लाहौर जाकर मिल भी आई थी।

गोपाल का ख़त ज़ाहिदा को मिल गया। उसने बार बार पढ़ा। ताहिरा को पढ़ाया।

अमृतसर

१ अक्तूबर १९४७

चाची,

भाइया जी को हम उनकी मर्ज़ी के ख़िलाफ अपने साथ लाए थे। वो अमृतसर नहीं पहुँचे। बॉर्डर पार करने से पहले ही खून ख़राबे में दम तोड़ दिया और अपनी ज़िद रख ली।

इकबाल भापा पुलिस में भरती हो गया है। मैं एल.एल.बी. में दाख़ला ले रहा हूँ।

आप लोगों की सलामती की दुआ करता हूँ। अपनी ख़ैरियत का ख़त अमृतसर पुलिस स्टेशन के मार्फत लिखेंगी तो हमें मिल जाएगा।

गोपाल

"जिन लोगों की सलामती माँगी है इस ख़त ने, उसमें तो तू और मैं भी आते हैं न?" ज़ाहिदा ने ताहिरा से पूछा। और ख़त का जवाब लिखवा भेजा। इकबाल की मार्फत गोपाल को।

लाहौर

५ जनवरी १९६८

गोपाल भाई जान को ताहिरा का सलाम।

अम्मी के नाम लिखा आप का ख़त मिल गया। वो भी अपनी मर्ज़ी के खिलाफ ही गुजरात से लाहौर जाने वाली गाड़ी में चढ़ी थी। मगर उतरी कभी नहीं।

ज़ाहिदा ख़ाला और मैं ख़ैरियत से हैं। मैंने इसी साल बी॰ए॰ किया है।

ख़ाला जान आप सबकी सलामती की दुआ के साथ अपना सलाम कहती है।

ख़त का जवाब आने में मुश्किल से एक महीना भी नहीं लगा।

दिल्ली

१० फरवरी १९६८

ताहिरा बीबी,

अपने भाई जान को लिखा तुम्हारा ख़त पढ़ कर हमें कितनी खुशी हुई है, इसका शायद ही तुम अंदाज़ लगा सको।

हमारी बेटी चित्रा, तुम्हारे भाई जान और मैं जल्द से जल्द तुम्हें और ज़ाहिदा को मिलना चाहते हैं। चित्रा इसी साल आर्ट हिस्टरी में एम॰ए॰ करने लंदन चली जाएगी। कितना ही अच्छा हो अगर उसके जाने से पहले आप दोनों कुछ दिन हम सब के साथ हमारे पास रहो।

चित्रा के जाने में अभी दो तीन महीने हैं। वो तुम्हें मिलने को बहुत उतावली हो रही है। तुम्हारा ख़त आते ही तुम्हारे यहाँ आने का इंतज़ाम तुम्हारे भाई जान कर देंगे। ज़ाहिदा को ज़रूर साथ लाना। और हम सब का सलाम कहना।

तुम्हारे भाई जान यहाँ मैजिस्ट्रेट हैं। मैं मोतीलाल नेहरू कालेज में हिस्टरी पढ़ाती हूँ।

तुम्हारे ख़त के इंतज़ार में बड़े प्यार से,

तुम्हारी भाभी

मालती

•••

मोतीलाल नेहरू कालेज में मालती के कलीग और इंग्लिश विभाग के हैड डाक्टर शिवनाथ जुत्शी अपने भतीजे करन को चित्रा से मिलवाना चाहते थे। जम्मू कश्मीर युनिवर्सिटी से पोलिटिकल साईंस में एम॰ए॰ करने के बाद वो एक साल के लिए कॉमनवेल्थ फेलोशिप लेकर लंदन जाने वाला था।

मोतीबाग में गोपाल मलिक के ग्राउंडफ़्लोअर वाले फ़्लैट में उस दिन सुबह से ही आना–जाना लगा था। छुट्टी का दिन था। मिलने वाले चित्रा को लंदन जाने की बधाई देने आते, और ताहिरा को मिल कर जाते। शाम को करन जब अपने चाचा के साथ पहुँचा तब भी चार पाँच लोग गोपाल और ताहिरा को घेरे बैठे थे। नए आने वालों का स्वागत करने के लिए गोपाल को उठते देख, करन ने दोनों हाथ जोड़ कर अपना माथा छुआ और फिर एक सरसरी नज़र आस पास दौड़ा कर कहा,

"मुझे खुद ही आप दोनों को पहचान लेने का मौका दीजिए, सर। आप मैजिस्ट्रेट गोपाल मलिक हैं, और जो आप के बायें हाथ बैठी हैं, वह आपकी बेटी चित्रा है।"

गोपाल उस से हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़े ही थे कि करन ने उन्हें बड़े ही नाटकीय तरीके से फौजी सलाम ठोका।

"मैं पूरी इमानदारी से कसम खा कर कहता हूँ, सर मैंने बाप–बेटी की ऐसी खूबसूरत हमशकल जुड़वाँ जोड़ी नहीं देखी।"

गोपाल मुस्करा दिए। करन के कंधे पर अपना हाथ रख कर पूछा, "तुम करन हो न तुम्हें तो अपने चारों तरफ खूबसूरती देखने की आदत होनी चाहिए भई। कश्मीर की वादी तो खूबसूरती की जन्नत है।"

"कश्मीर की वादी न सर मगर मैं तो दिल्ली की बात कर रहा हूँ। पिछले एक महीने में कनाट प्लेस के कई चक्कर लगा चुका हूँ। लगता है अच्छी सूरतें मोतीबाग से बाहर नहीं निकलतीं आजकल।"

गोपाल अब हँस दिए। ताहिरा के सिर पर अपना हाथ रखा और कहा,

"यह ताहिरा है। मेरी छोटी बहिन।"

"ताहिरा?" करन ने दुहराया।

"हाँ, परसों ही लाहौर से आई है।" गोपाल कुछ रूक कर बोले, "बँटवारे में गुम गई थी। अब मिली है।"

 


करन ने ताहिरा को उपर से नीचे तक बड़े गौर से देखा। थोड़ी देर चुप रहा और फिर बड़े ही तपाक से बोला।

"यह गुम कैसे हो सकती है सर? इन्हें देखकर तो देखने वालों के होश–हवास गुम हो सकते हैं। एक बार दिखाई दे जाएँ तो दुबारा देखने की उम्मीद में भूख–प्यास गुम हो सकती है।"

कमरे में बैठे हुए सभी लोग अपनी बातचीत छोड़ कर करन और गोपाल को ही देख रहे थे। एक पुरज़ोर ठहाके की आवाज़ हुई, जिसमें डाक्टर शिवनाथ जुत्शी भी शामिल थे। अब कहीं जाकर उन्हें गोपाल से हाथ मिलाने का मौका मिला।

"बड़ा हाज़िरजवाब और खुश मिज़ाज है आपका भतीजा, जुत्शी साहिब।" गोपाल ने कहा, "फ़े.लोशिप का टॉपिक जो भी हो, इसके हाथ लग कर दिलचस्प हो जाएगा।"

"कहता तो है कि पार्लियामेंट्री प्रणालियों और परंपराओं की जानकारी हासिल कर के किसी पोलीटिकल पार्टी में शामिल हो जाऊँगा।" डॉ॰जुत्शी बोले।

"यहाँ या वहाँ?" गोपाल ने करन को ज़रा छेड़ कर कहा।

"इस का फैसला तो मौका–माहौल देखकर ही

होगा न सर। इस वक्त तो बस यही तय किया है कि लंदन में रह कर अंग्रेज़ी बोलना सीखूँगा।"

"क्यों बर्खुरदार? अंग्रेज़ी तो तुम अब भी अच्छी ख़ासी बोलते हो। उसके लिए लंदन जाना? बात कुछ बनी नहीं।" गोपाल को करन से चुहल सी करने में लुत्फ आ रहा था।

"बात ही तो बनती है सर। कोई मामूली सी बात भी अगर ब्रिटिश एक्सेंट में अंग्रेज़ी बोल कर कहें, तो उसमें काफी वज़न आ जाता है।" करन ने कहा और फिर निहायत संजीदगी से बी बी सी वाले एक्सेंट की बखूबी नकल करते हुए बोला,

"आई कैन नौट से इट विद एब्सोल्यूट सरटेनिटी फ्रॉम दिस डिस्टेंस बट इट अपियर्स दैट विजय हज़ारे इज़ गोइंग टु बी डिक्लेयर्ड एल बी डब्ल्यू।"

कमरे में फिर एक खुला हुआ ठहाका उठा। गोपाल ने हँसते हुए करन की पीठ ठोकीं और बोले,

"बहुत खूब" फिर ड्राइंगरूम के अंदर की तरफ खुलते हुए दरवाज़े की ओर बढ़ते हुए कहा,

"मैं चित्रा को बुलाकर लाता हूँ। तुम उससे मिलना चाहते थे न?"

करन ने गोपाल का रास्ता रोक लिया।

"एक मिनट रूक जाइए सर, मुझे आपसे कुछ पूछना है।"

गोपाल ने सिर हिलाकर हामी भर दी। करन अब ताहिरा की तरफ बढ़ा, फिर जिस कुरसी पर वो बैठी थी, उसके पास खड़ा हो गया।

"मैं पूछना चाहता हूँ सर कि आपकी बहिन बोल तो लेती है न?"

गोपाल दरवाज़े की तरफ जाते जाते मुड़ आए।

"ताहिरा, अगर तुम कहो तो इस बातूनी के लिए तुम्हारी तरफ से मैं कुछ कह दूँ?"

"कहिए न भाई जान।" ताहिरा बड़े अदब से बोली और कुर्सी से उठ कर गोपाल के पास खड़ी हो गई।

"तुम्हारी अम्मी कभी कभी एक गज़ल गुनगुनाया करती थी। उसी का एक शेर याद आ रहा है," गोपाल ने ताहिरा की पीठ पर अपना हाथ रख कर कहा और करन की तरफ देखा।

"प्लीज़ सर इनकी तरफ से कहिए तो कुछ भी कह दीजिए," करन बोला। "मैं ही नहीं, यहाँ बैठे सभी लोग सुनना चाहेंगे।"

"अच्छी बात है। सुनिए, शेर ग़ालिब का है। ताहिरा की अम्मी उनकी ग़ज़लें अक्सर अपने रेडिओ प्रोग्राम में गाती थीं।" वह बोलते बोलते रूक गए जैसे कुछ और याद आ गया हो।

"हमारे साथ रहना शुरू किया तो गाना छोड़ दिया पर गुनगुना देती थी कभी कभी।"

कमरे में एकदम ख़ामोशी छा गई। गोपाल ने शेर कहा,

"है कुछ ऐसी ही बात कि चुप हूँ

वरना क्या बात कर नहीं आती।"

ताहिरा ने बाहर से फेंकी जाने वाली ईंट की बात करन को बताई तो वह तमक उठा। सवालों की बौछार कर दी।

"ईंट तुम्हें कहीं लगी?"

"नहीं।"

"तुमने खिड़की से बाहर किसी को खड़े या भागते देखा?"

"नहीं।"

"और वह काँच? उसका कोई टुकड़ा तुम पर गिरा?"

"नहीं।"

ताहिरा को इंतज़ार था कि करन अब उसे बाहों में लेकर कहेगा कि शुक्र है तुम ठीक हो, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ।

"वो ईंट कहाँ है?" करन ने पूछा जैसे उसे शक हो कहीं ताहिरा ने खुद ही खिड़की का शीशा तोड़ा है।

ताहिरा ने सारा दिन दम साधे करन के लौटने की राह देखी थी। चाहा था कि उसकी बाज़ुओं में सिमट कर पहले जी भर के रो ले और फिर जब वो अपने ओठों से ताहिरा के आँसू पोछे तो सिसक–सिसक कर कहे,

"हमें यहाँ नहीं रहना, करन।"

लेकिन करन था कि उसी की जवाबतलबी पर लगा था। ऐसे सुबूत इकठ्ठे कर रहा था जैसे कोई पेशावर वकील किसी मुवक्किल के नए मुकदमे की पैरवी करने की तैयारी में हो।

"वो ईंट कहाँ है ताहिरा?" करन ने फिर पूछा।

ताहिरा ने खिड़की के नीचे वाली दीवार की तरफ इशारा कर दिया। करन ने जेब से रूमाल निकाला। उसे ईंट पर रखा और फिर ईंट को ऐसे सँभाल कर कमरे के बीच वाली मेज़ पर रखा जैसे कोई ताज़े फूलों का गुलदस्ता सजा रहा हो।

ताहिरा के लिए अपनी उमड़ती रूलाई रोकना मुश्किल हो रहा था।

करन अब खिड़की के पास खड़ा परदा उठाकर पूछ रहा था,

"यह काँच तो बुरी तरह से चूर चूर हुआ है।"

ताहिरा हुमक कर फ़ायरप्लेस की तरफ बढ़ी, दीवार से टिका कर रखा एक दुहरा ब्राउन बैग उठाया और करन की तरफ बढ़ा दिया। बैग भारी था, उसे दोनों हाथो में लेने के लिए ताहिरा ने ज्योंही अपना दूसरा हाथ बैग के मुहाने पर रखा, करन ने उसके हाथों से बैग थामना चाहा। और इसी पकड़ धकड़ में बैग में से झाँकता एक नुकीला बड़ा सा काँच ताहिरा की हथेली में चुभ गया।

खून की एक बड़ी सी बूँद निकली और धार बन कर ताहिरा की हथेली से उसकी कलाई तक फैल गई। सन्न सी खड़ी ताहिरा ने अपनी ज़ख्मी हथेली को दूसरे हाथ में पकड़ा और बहते खून पर अपना अँगूठा दबा दिया।

करन काच वाले बैग को ईंट के पास मेज़. पर रख के चुपचाप ताहिरा को देख रहा था। उसको अपने अँगूठे से हथेली दबाते देखा तो बड़ी रूखाई से बोला, "इतनी ज़ोर से मत दबाओ, यहाँ आओ में देखता हूँ।"

ताहिरा अपनी जगह से नहीं हिली तो करन ने पास आकर उसका अँगूठा उसकी हथेली से हटा दिया। कलाई पकड़ कर उसकी हथेली का रुख फर्श की तरफ किया। पहले तेज़ तेज़ कदमों से चला कर ताहिरा को खिड़की के पास ले गया। फिर वैसे ही चला कर कमरे के दरवाज़े तक कई बार ताहिरा की हथेली से छूटे खून के कतरे अब तक कमरे की मटमैली फ़र्शी दरी पर यहाँ वहाँ गिर चुके थे। वह समझ नहीं पा रही थी कि करन क्या करना चाहता है। इससे पहले कि वह पूछे, करन ने उसे अपनी बाहों में थाम लिया।

"चलो ताहिरा, वहाँ कुर्सी पर बैठो। मैं तुम्हारा हाथ धोकर बैंडेज कर देता हूँ।" उसकी आवाज़ में अब नरमी थी और आँखों में फ़िक्र। कुरसी पर बैठते ही ताहिरा फफक कर रो दी।

अगले दिन करन ताहिरा को अपने साथ रसल स्क्वेयर ले गया। जहाँ कहीं कोई जान पहचान वाला दिखाई दिया, वहीं करन ने रुक कर बात की। खुद बड़ी गरमजोशी से हाथ मिलाया और ताहिरा की तरफ़ देख कर कहा।

"माफ़ी चाहता हूँ। ताहिरा आज आप से हाथ नहीं मिला पाएगी। कल शाम हमारे साथ एक अजीब हादसा हो गया था।"

कुछ करन की नक्शेबाज़ी, कुछ लिखने वाले की कलम की करामात, कुछ कश्मीर से जुड़ी हर नई खबर में इंस्टीट्यूट ऑफ़ कॉमनवेल्थ स्टडीज़ और स्कूल ऑफ़ ओरिएंटल अ‍ॅण्ड आफ्रिकन स्टडीज़् की गहरी दिलचस्पी। कैम्पस जरनल में करन और ताहिरा के बारे में लिखा लेख छपते ही रसल स्क्वेयर ही नहीं, आस पास के कई इलाकों में सनसनी बन गया।

दो सफ़े के लेख में चार रंगीन तस्वीरें थी। पहले सफ़े के बीचों-बीच चित्रा की दी गई पार्टी में लिया बड़ा सा फ़ोटो। काशनी मुकैश वाले दुपट्टे में फ़िल्म स्टार जैसी खूबसूरत ताहिरा के साथ सट कर मुस्कुराता हुआ नेहरू जैकेट वाले सूट में राजकुमारों जैसी शख्सियत वाला करन। दूसरे सफ़े पर एक तस्वीर में टूटे हुए काँच के आगे से खिड़की का परदा हटाता हुआ घबराया सा करन, दूसरी तस्वीर में परेशान सी, सहमी सी ताहिरा की पट्टी बँधी हथेली को फूँक से सहलाता फ़िक्रमंद करन। और पूरे दूसरे सफ़े के ठीक उपर एक कोने से दूसरे कोने तक चढ़ते सूरज की सुर्ख सुनहरी धूप में झिलमिलाती डल लेक में फूलों से लदे शिकारों की तस्वीर।

"खूबसूरती की पैदाइश पर बदनुमा हमला" उनवान था लेख का पहले जुमले में ही ऐसा समाँ बाँधा गया था कि पढ़ने वाला पूरे दो सफ़े पढ़े बिना छोड़ न पाए।

"शहज़ादे जैसा कश्मीरी ब्राह्मण करन हाथ में ताज़ा गुलाबों का गुलदस्ता लिए हेंडन सेन्ट्रल पहुँचने की जल्दी में था। पाकिस्तानी ताहिरा के साथ उसकी शादी को उस दिन छह महीने हो गए थे। वह वक्त से पहले पहुँच कर अपनी नई नवेली दुल्हन को चौंका देगा, ऐसा सोचकर जब उसने घर के अन्दर कदम रखा तो क्या देखा? बेपनाह हुस्न की मालकिन ताहिरा के नाज़ुक हाथ खून से रँगे हैं। और वह ज़र्द चेहरा लिए दरवाज़े और खिड़की के बीच चक्कर लगा रही है।"

उसे कश्मीर के एक जाने माने सेक्युलर हिन्दू परिवार की लाखों की जायदाद और कालीनों के व्यापार का लाड़ला वारिस करार करते हुए, लिखने वाले ने करन के कई किताबी जुमले बखूबी दुहराए थे।

"खूबसूरती का कोई मज़हब नहीं होता।" करन कहता है

"मुल्कों की सरहदें इन्सानी रिश्तों के बीच दीवारें नहीं उठा सकतीं।" यह करन की उम्मीद नहीं, बल्कि उसका अपना तजुर्बा है।

 
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