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हो जाए अगर दिल दीवाना

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हो जाए अगर दिल दीवाना

चार जनवरी, बुधवार की रात को एक बजे उम्र में पच्चीस(25) साल का क्लीन शेव चेहरे वाला स्मार्ट और हैंडसम राज ऑफ़िस में कुर्सी पर बैठा टेबल पर ऑवर टाइम में काम करते हुए चाँदी की ईयर रिंग चैक कर रहा था.

रात के सवा एक बजे राज सभी ईयर रिंग चैक करके उठते हुए अपनी कुर्सी पीछे सरकाकर खड़ा हुआ और टेबल पर रखा सामान गिनकर बेसमेंट से सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आया.

सामने सोफे पर उम्र में पैंतालिस(45) साल के क्लीन शेव चेहरे वाले बहुत ही स्मार्ट और हैंडसम जयशर्मा अपने से चार साल बड़ी उम्र में उनचास(49) साल की बहुत ही सुन्दर पत्नी मिनी के साथ बैठे बातें कर रहे थे.

राज ने कहा—“सेठ जी, सभी ईयर रिंग लॉक लगाने के बाद चैक कर ली. अब बस पैक करना बाकि हैं. आप एक बार आकर देख लो.”

जयशर्मा—“अब सुबह देखेंगे, यार. सारा काम टेबल पर छोड़ दो और ऊपर कपड़ा डाल देना. एक से ऊपर टाइम हो गया. अब तुम भी जाओ.”

राज—“ये भी सही हैं.”

राज ने सीढ़िया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर सारा सामान टेबल से उठाकर जयशर्मा के केबिन में कपड़े से ढककर रख दिया और केबिन लॉक करके सीढ़िया चढ़ते हुए वापस ऊपर आकर ऑफ़िस के दरवाजे पर ताला लगाने लगा.

जयशर्मा और मिनी सोफे से उठकर खड़े हुए. मिनी चलकर राज के पास आई. राज ने मिनी को ऑफ़िस की चाबी दी और घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया. मिनी ने घर का दरवाजा अन्दर से बन्द किया और मुड़कर बैडरूम की तरफ आने लगी.

मिनी के पास आते ही बैडरूम के दरवाजे के पास खड़े जयशर्मा ने एक हाथ मिनी के गले में डालकर कंधे पर रखते हुए दूसरे हाथ से बैडरूम के दरवाजे को खोला. दोनों पति–पत्नी बैडरूम के अन्दर चले गए और जयशर्मा ने बैडरूम का दरवाजा अन्दर से बन्द कर लिया.

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पूरी तरह सुनसान प्रिंस रोड़ पर बहुत ठंड भरी रात में घना कोहरा छाया हुआ था. थोड़ी–थोड़ी दूर पर सड़क किनारे लगे खम्बों पर लाईटें जल रही थी. थरथराती सर्दी में डरावनी आवाजें निकालती हुई सन–सन करती ठंडी–ठंडी हवाएँ चल रही थी.

राज हर रोज की तरह अपने दोनों हाथ पेन्ट की जेबों में डाले कड़ाके की सर्दी से काँपते हुए प्रिंस रोड़ पर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ जा रहा था.

राज चलते–चलते ठंड से काँपता हुआ मन में बोला कि सेठ जी के घर और ऑफ़िस में तो सर्दी का पता ही नहीं चलता. वहाँ अन्दर तो ऐसा लग रहा था, जैसे मार्च–अप्रेल का महीना हो और बाहर आते ही पूरा शरीर काँपने लगा.

राज चलते हुए अभी पन्द्रह मिनट दूर आया, तभी उसने देखा कि सड़क पर आगे एक गाड़ी खड़ी हैं और गाड़ी के पास एक लड़के और एक लड़की के बीच मारपीट हो रही हैं. दो अन्य लड़के उनके पास खड़े हैं. राज चलते–चलते रुक गया और दूर खड़ा रहकर उनको देखने लगा.

लड़का और लड़की लड़ते–लड़ते एक–दूसरे के बाल खिंचते हुए सड़क पर नीचे गिरे और एक–दूसरे के ऊपर–नीचे होते हुए सड़क पर लोट–पोट होने लगे. लड़की लड़के पर भारी पड़ने लगी और लड़की ने लड़के को दबोच लिया. इसी बीच पास खड़े दोनों लड़कों ने लड़की को पकड़कर लड़के को लड़की के हाथो से छुड़ाया और लड़की को लड़के से दूर किया.

लड़की दोनों लड़कों से छुटने के लिए छटपटा रही थी. सड़क पर गिरा लड़का उठा और लड़की को घूसे(मुक्के) और लातें मारने लगा. कुछ देर लड़की को पीटने के बाद लड़के ने लड़की के बाल पकड़े. दोनों अन्य लड़के लड़की को छोड़कर पीछे हट गए. लड़की के बाल पकड़ने वाले लड़के ने लड़की को सड़क किनारे गिरा दिया और गिराने के बाद चार–पाँच लातें मारकर पास खड़े दोनों लड़कों की तरफ आया.

तीनों लड़के गाड़ी के पास जाकर कुछ देर खड़े रहे. फिर लड़की को वहीं छोड़कर तीनों लड़के गाड़ी में बैठकर चले गए.

राज घबराकर सोचने लगा कि आगे जाऊँ या रास्ता बदल लूँ ? पता नहीं, क्या चक्कर हैं ? छोड़ यार ! क्यों मुसीबत को गले लगाना ? इन लड़कियों में भी अक्ल तो होती नहीं हैं. बेकार लोगों से प्यार, फिर ये हाल. वैसे भी आजकल टाइम बहुत खराब हैं. मैं मदद करने जाऊँ और ब्लात्कार या मर्डर के इल्जाम में खुद ही अन्दर हो जाऊँ. रहने दे, गोली मार.

राज ने अपना रास्ता बदल लिया और दूसरे रास्ते से जाने लगा. चलते–चलते राज ने कुछ याद करके खुद से कहा कि भूल गया क्या, राज ? कभी तू भूख से तड़पकर कचरे में से सड़े–गले फल उठाकर खा रहा था. उस वक्त तुझे रोता देखकर एक देवी जैसी नारी तेरे पास आई और तेरे आँशू पोंछकर तुझे अपने घर ले गई. जरा सोच अगर वो नारी भी तेरी तरह मुँह फेरकर चली जाती, तो फिर तेरा क्या हाल होता ? इतनी ठंड में बेचारी लड़की सड़क पर पड़ी हैं. वो लड़के उसे कितनी बुरी तरह मारकर गये हैं और तू उसकी मदद करने की जगह रास्ता बदलकर जा रहा हैं. कहीं मर गई तो ? नहीं यार ! कम से कम एक बार जाकर देख तो सही उसको. जो होगा देखा जाएगा.

राज तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस प्रिन्स रोड़ पर आकर उसी तरफ चलने लगा. लड़की अभी तक वहीं सड़क किनारे पड़ी हुई दिखाई दी. राज धिरे–धिरे उसके पास आया.

बटन वाला घूटने तक आता हुआ कुर्ता और जींस पहने, दिखने में बहुत ही खूबसूरत उम्र में सताईस(27) साल की लड़की शराब के नशे में पूरी तरह धुत थी. उसे बिल्कुल भी होश नहीं था. लड़की के कपड़े अस्त–वयस्त और सर के बाल बिखरे हुए थे. लड़की सड़क किनारे पड़ी–पड़ी कुछ बड़बड़ा रही थी.

राज ने लड़की के पास बैठकर कहा—“आपका घर कहाँ हैं ? आपके घर का कोई नम्बर बता दो, मैं आपके घर से किसी को बुला लेता हूँ.”

राज की आवाज़ सुनकर लड़की ने राज की तरफ देखा और अपना हाथ राज की तरफ किया. राज ने लड़की का हाथ पकड़कर उसको सहारा देकर खड़ी किया.

लड़की खड़ी होने के बाद राज का कॉलर पकड़कर बोली—“साले कमीने, मुझे धोखा देता हैं. छोड़ूगी नहीं तुझे.”

राज मन में बोला कि अरे, ये क्या हो रहा हैं ?

राज अपना कॉलर छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोला—“मैं तो आपकी मदद के लिए आया हूँ.”

लड़की राज को धक्का देकर लड़खड़ाखड़ाते हुए बोली—“मैनें तुझे कितना प्यार किया. तेरे लिए अपने मॉम–डेड से झगड़े किये और तू एक साल मजे लेने के बाद कहता हैं, तेरे जैसी बहुत मिलती हैं. किस–किस से शादी करूँ ?”

राज टेन्शन में आकर मन में सोचने लगा कि लगता हैं, उस लड़के ने शादी का वादा करके टाइमपास किया और छोड़ दिया. अब ये शराब के नशे में मुझे वहीं धोखेबाज लड़का समझ रही हैं.

लड़की हाँफते हुए इधर–उधर देखकर एक पत्थर उठाकर बोली—“अब कहाँ जाएँगा बचकर ? आ सामने ! बताती हूँ तुझे, मैं कितनी बेकार हूँ.”

लड़की को पत्थर मारते देखकर राज पीछे हटते हुए बोला—“अरे…क्या कर रही हो ? लग जाएगी.”

लड़की आँखों से गुस्सा दिखाते हुए बोली—“साले, आगे आ. पीछे क्यों हट रहा हैं ? सर फोड़ूँगी आज तेरा.”

लड़की ने राज की तरफ पत्थर फेंका.

राज खुद को पत्थर लगने से बचाकर लड़की के पास आया और लड़की को पकड़कर बोला—“देवी जी, मेरे ऊपर रहम करो. मैनें आपको धोखा नहीं दिया.”

लड़की खुद को राज से छुड़ाने की कोशिश करते हुए बोली—“छोड़ कमीने, इतनी आसानी से तुझे जाने नहीं दूँगी.”

राज ने लड़की को समझाने की कोशिश की, लेकिन लड़की राज की बात सुनने की जगह गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हुए राज पर हाथ–पैर चलाने लगी.

जब लड़की राज के काबू में नहीं आई तो राज मन में बोला कि इन बेवड़ों का एक ही ईलाज हैं.

राज ने लड़की के दोनों गालों पर एक के बाद एक पाँच जोरदार चांटे(थप्पड़) जड़ दिये. राज के चान्टों से लड़की के दोनों गाल लाल हो गए. लड़की सड़क पर गिर पड़ी और लड़की ने रोना शुरू कर दिया.

राज घबराकर मन में बोला कि लगता हैं ज्यादा हो गया.

राज लड़की के पास आया और नीचे बैठकर लड़की को बिठाते हुए बोला—“एम सॉरी, प्लीज रोईये मत.”

लड़की सड़क पर बैठकर बच्चों की तरह रोते–रोते बोली—“यार ! क्या हो गया तुझे ? मेरे प्यार में क्या कमी रह गई ? तेरे लिए क्या नहीं किया मैनें ? जब तू प्रोब्लम में था, तो तुझे पैसे दिये. तेरी खुशी के लिए तेरे साथ बिस्तर पर भी सो गई. तूने जो–जो कहा, मैनें सब किया. तेरे मतलब पूरे हो गए, तो अब तू मुझे मार रहा हैं. तू चाहे जितना मरजी मार ले. लेकिन मुझे छोड़कर मत जा. मैं तेरे बिना जी नहीं सकती. प्लीज यार ! तू एकदम से इतना कैसे बदल गया ? आई लव यू, यार. लव यू सॉ मच.”

लड़की को रो–रोकर गिड़गिड़ाते हुए देखकर राज को दया आने लगी.

लड़की राज के पैर पकड़कर बोली—“प्लीज यार ! मैं तेरे पैर पकड़ती हूँ. तू जो बोलेगा, वो सब करूँगी. बस तू मुझे छोड़कर मत जा.”
 


राज लड़की के हाथ पकड़कर अपने पैर छुड़ाते हुए बोला—“अरे, क्या कर रही हो ? आप उठो पहले.”

लड़की गरदन हिलाते हुए बोली—“नहीं, पहले तू बोल. तू मुझे छोड़कर नहीं जाएगा.”

राज को कुछ समझ नहीं आया और वो लड़की को खड़ी करते हुए बोला—“अब क्या करें ? हाँ–हाँ, मैं कहीं नहीं जाऊँगा. आप उठो तो सही.”

राज ने रोती हुई लड़की को खड़ी करके लड़की के कपड़े ठीक किये और लड़की के बिखरे हुए सर के बाल ठीक करता हुआ लड़की को बहलाकर चुप करवाने की कोशिश करते हुए उसे पास के बस स्टॉप पर ले आया.

राज ने लड़की को बस स्टॉप की कुर्सी पर बिठाकर मन में कहा कि इसको संभालना अपने बस की बात नहीं हैं. बस स्टॉप पर बिठा दिया हैं. अब आगे इसकी किस्मत.

राज बस स्टॉप से नीचे उतरकर अपने रास्ते जाने लगा.

लड़की ने राज को जाते देखकर छोटी बच्ची की तरह कहा—“तू मुझे छोड़कर क्यों जा रहा हैं ?”

राज जल्दी–जल्दी चलने लगा.

लड़की बस स्टॉप की कुर्सी से उठकर राज के पीछे–पीछे आते हुए गाना गाने लगी—

“छोड़के ना जा…

छोड़के ना जा…

तेरे बिना मर जाऊँगी,

मैं…मर जाऊँगी,

प्यार बहुत हैं, दिल में मेरे,

समझता नहीं क्यूँ, दिलबर मेरे,

चला हैं कहाँ तू ? छोड़कर मुझे,

तेरे साथ जीने के सपने हैं मेरे,”

राज चलते–चलते मन में कहने लगा कि कहाँ फँस गया, यार ! ये तो मेरे ही पीछे ही पड़ गई.

इस बीच रात में गश्त लगाने वाली पुलिसवेन सायरन बजाते हुए प्रिंस रोड़ पर आई.

पुलिसवेन देखते ही लड़की बोली—“मुझे छोड़के जाएगा ? अब देख ! तुझे पुलिस में देती हूँ. केस करूँगी तुझ पर मोहब्बत का.”

पुलिसवेन का सायरन सुनकर राज भी रुककर मुड़ा और पुलिसवेन की तरफ देखते हुए मन में बोला कि हत तेरे की. इनको भी अभी आना था. जब वो लड़के इस लड़की की पिटाई कर रहे थे, तब नहीं आए.

लड़की सड़क के बीच में आकर पुलिसवेन के सामने खड़ी हो गई. पुलिसवेन लड़की के पास आकर रुककर बन्द(बन्द मतलब इंजन बन्द कर दिया ड्राईवर ने) हो गई.

पुलिसवेन रुकते ही लड़की ड्राइवर के पास बैठे उम्र में लगभग सैंतालिस(47) साल के पुलिसवाले के पास जाकर हाथ जोड़ते हुए छोटे बच्चों की तरह बोली—“पुलिसवाले अंकल ! देखो ना, वो मुझे छोड़कर जा रहा हैं. उसको समझाओ ना, मुझे छोड़कर ना जाए. मैं उससे बहुत प्यार करती हूँ. मैं मर जाऊँगी, उसके बिना.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने अपनी नाक पर हाथ रखकर कहा—“पीछे खड़ी हो. कितनी दारू पी रखी हैं.”

पुलिसवेन में पीछे की तरफ बैठा उम्र में लगभग बावन(52) साल का पुलिसवाला पुलिसवेन से बाहर निकलकर गरजते हुए बोला—“कौण हैं रे, इस बेवड़ी के साथ ?”

राज पुलिसवेन से थोड़ा आगे खड़ा सोचने लगा कि अगर मैनें कहा, मैं इस लड़की को नहीं जानता, तीन लड़के इसकी पिटाई करके, इसको यहाँ छोड़कर भाग गए. तो पुलिस स्टेशन, लड़की का नशा उतरने का इंतजार, उन लड़कों को पहचानों, ये मुझे बॉयफ्रैंड क्यों बोल रही हैं ? बहुत सारे सवाल. फिर जब उन लड़कों को पकड़ा जाएगा, खुद को बचाने के लिए वो मुझे लपेटने लगे तो ? और फिर इन बिस्तर पर सोने वाली लड़कियों का कोई भरौसा नहीं होता. ये बॉयफ्रैंड के लिए सब कुछ भूल जाती हैं. बॉयफ्रैंड के लिए मुझे ही झूठा साबित कर दिया तो ? नहीं यार, इस झमेले में नहीं पड़ना. ये तुझे अपना बॉयफ्रैंड तो समझ ही रही हैं. एक बार जान छुड़ाने के लिए बोल दें, ये तेरी गर्लफ्रैंड हैं.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने हाथ से इशारा करके राज को बुलाया—“ओए ! इने(इधर) आ.”

राज पुलिसवेन के पास आकर पुलिसवाले से थोड़ा दूर खड़ा हुआ.

पुलिसवेन से बाहर खड़ा पुलिसवाला बोला—“अरे, आगे आजा. इन्वीटेशन दे ग बुलाऊ के तने ?”

राज पुलिसवाले के पास आया.

पुलिसवाले ने राज को देखकर कहा—“के चक्कर हैं ? क्यों आधी रात न रौळो(हंगामा) मचा राख्यो हैं ?”

राज ने भोला–भाला बनकर मासूमियत से कहा—“रौळो म मचा राख्यो हैं ? आ देखो थे इने, दारू पीर किया बावळी हो री हैं. तो म गुस्सा म आर केयो, के म तो तन छोड़ अर जाऊ अब. बस ई बात पर आ रोण लाग गी.”(हिन्दी अनुवाद : हंगामा मैनें मचा रखा हैं ? ये देखो आप इसको, शराब पीकर कैसे पागल हो रही हैं. तो मैनें गुस्से में आकर कहा कि मैं तो अब तुझे छोड़कर जा रहा हूँ. बस इस बात पर ये रोने लगी.)

सभी पुलिसवाले राज की बात सुनकर हँसने लगे.

पुलिसवेन में ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला बोला—“झाभर जी, देख ल्यो. जमानो कित्तो बदल ग्यो. पैली आदमी दारू पीर बावळो होर घूमतो, हर लुगाई कैवती, तू दारू पीये, म तो जाऊ छोड़ अर. अब छोरी दारू पीर ड्रामा करे और छोरो केवे, तू दारू पीये ई वास्ते तन छोड़ अर जाऊँ.”(हिन्दी अनुवाद : झाभर जी, देख लो. जमाना कितना बदल गया. पहले आदमी शराब पीकर पागल होकर घूमता था और औरत कहती थी, तू तो शराब पीता हैं, मैं तो जा रही हूँ तुझे छोड़कर. अब लड़की शराब पीकर ड्रामा करती हैं और लड़का कहता हैं कि तू शराब पीती हैं, इसलिए तुझे छोड़कर जा रहा हूँ.)

पुलिसवेन में पीछे बैठा उम्र में लगभग पचास(50) साल का एक पुलिसवाला बोला—“चालो, अब आपणा बस गी बात थोड़ी हैं. आने नीबेड़ो जल्दी.”(हिन्दी अनुवाद : चलो, अब अपने बस की बात नहीं हैं. इनको निपटाओ जल्दी.)

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“हाँ, घर कठे हैं तेरो ?”

राज—“आम्रपाली कॉलोनी म.”

ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला—“ई छोरी न जाणे हैं नी तू ?”

राज ने हाँ में सर हिला दिया.

पुलिसवेन के बाहर खड़े पुलिसवाले ने अपनी जेब से अपना स्मार्टफोन निकालकर पुलिसवेन के सामने खड़े होने का इशारा करते हुए कहा—“इने आओ दोन्यू जणा.”(हिन्दी अनुवाद : इधर आओ दोनों जने.)

पुलिसवेन के बाहर खड़े पुलिसवाले ने लड़की और राज को पुलिसवेन के सामने ले जाकर पुलिसवेन की आगे की लाइट की रोशनी में एक साथ खड़ा किया और उनकी फोटो निकाली.

पुलिसवेन से बाहर खड़ा पुलिसवाला राज से बोला—“बे लारे बैठ्या हैं, बांग खन जा हर बे पूछे जको, सच्ची–सच्ची बता दई.”(हिन्दी अनुवाद : वो पीछे बैठे हैं. उनके पास जा और वो जो पूछे, सच–सच बता देना.)

राज पुलिसवेन में पीछे बैठे पुलिसवालों के पास आया. पुलिसवेन में पीछे बैठे उम्र में लगभग छत्तीस(36) साल और उम्र में चालीस(40) साल के दो पुलिसवाले राज से पूछताछ करने लगे.

पुलिसवालों को बातचीत करने के बाद राज अच्छा लड़का लगा. पुलिसवालों ने उसे ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास जाने के लिए कहा. राज ड्राईवर के पास बैठे पुलिसवाले के पास आकर खड़ा हो गया.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले ने लड़की से पूछा—“ए छोरी ! तेरो के नाम हैं ?”

लड़की शराब के नशे में मुस्कुराकर बोली—“मेरो नाम प्रेम–दीवानी हैं.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“छोरी, घरबार गो पतो–ढिकाणो बूझा. सावळ बता दें.”(हिन्दी अनुवाद : लड़की, घरबार का पता–ढिकाना पूछ रहे हैं. ठीक से बताओ.)

लड़की—“मेरो घर इंगो दिल हैं, अंकल जी. ओ अब दिल उ काडणा चावे मने. थे बताओ, म के करूँ ?”(हिन्दी अनुवाद : मेरा घर इसका दिल हैं, अंकल जी. ये अब दिल से निकालना चाहता हैं मुझे. आप बताओ, मैं क्या करूँ ?)

ड्राइवर के पास बैठा पुलिसवाला बोला—“कुँआ म पड़.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने राज को पास बुलाया और राज से राज का नाम, पता और मोबाइल नम्बर लिखवाकर कहा—“अब सीधा घर चल्या जाओ. ई छोरी न तो होश कोनी, ई वास्ते खाली तेरो नाम, पतो लिख्यो हैं. कोई गड़बड़ होई, तो हिसाब लगा लई.” (हिन्दी अनुवाद : अब सीधे घर चले जाओ. ये लड़की तो होश में नहीं हैं, इसलिए सिर्फ तुम्हारा नाम–पता लिखा हैं. कोई गड़बड़ हुई, तो हिसाब लगा लेना.)

राज ने हाथ जोड़कर कहा—“पर साब, म इन जबरदस्ती चग ग थोड़ी ले जाण लाग रेयो हूँ. फेर मेरो नाम पतो क्यों ?” (हिन्दी अनुवाद : लेकिन साहब, मैं इसको जबरदस्ती उठाकर थोड़े ही ले जा रहा हूँ. फिर मेरा नाम–पता क्यों ?)

पुलिसवेन के बाहर खड़ा पुलिसवाला—“अरे, चिन्ता आळी बात कोनी. बस म्हारी फॉर्मेलटी वास्ते लिख्यो हैं. बो भी तू ठीक छोरो लाग्यो जद. नई तो चाल बैठ म्हारे सागे. फेर सारी रात बैठ्यो रेयी जैळ म. सवेरे घरगा ही आर छुड़ावला.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, चिन्ता करने वाली कोई बात नहीं हैं. बस हमारी फॉर्मेलिटी के लिए लिखा हैं. वो भी तुम अच्छे लड़के लग रहे हो, इसलिए. वरना चलो बैठो हमारे साथ. फिर सारी बैठे रहना जैल में. सुबह घरवाले ही आकर छुड़वाएँगें.)

राज—“नहीं–नहीं, साब. ठीक हैं. घणो–घणो धन्यवाद थारो. म्हे चाला अब.”

ड्राइवर के पास बैठे पुलिसवाले ने कहा—“ठीक हैं.”

पुलिसवेन के ड्राइवर ने पुलिसवेन स्टार्ट की.

राज ने लड़की के बाजू पकड़कर पीछे हटते हुए लड़की को पुलिसवेन से दूर किया.

पुलिसवेन से बाहर खड़े पुलिसवाले के वापस पुलिसवेन के पिछली साइड में बैठने के बाद पुलिसवेन चल पड़ी और गश्त करते हुए आगे निकल गई.

राज ने लड़की के बाजू छोड़कर लड़की की तरफ देखा. लड़की शराब के नशे में मदहोश राज की तरफ देखकर मुस्कुराने लगी.

राज ने हाथ जोड़कर कहा—“अब चलो, देवी जी.”

लड़की राज के गले लगकर बोली—“आई लव यू, यार.”

राज ने लड़की को खुद से दूर करके कहा—“अरे, ठीक से चलो. पुलिस दूबारा आ गई तो प्रोब्लम हो जाएगी.”

लड़की हँसकर बोली—“तू पुलिस से डरने लगा. तू तो बोलता था, जब प्यार किया तो डरना क्या.”

राज ने सख्त होकर कहा—“अब तुम चल रही हो या फिर मैं जाऊँ ?”

लड़की मुँह पर उँगली रखकर चुपचाप राज के साथ चलने लगी.

राज चलते हुए मन में कहने लगा कि ऊपरवाले मेरे मन में कुछ गलत नहीं हैं. मेरे साथ कुछ गलत मत कर देना.

लड़की ने अब पहले की तरह बोलना बन्द कर दिया और शान्त होकर चल रही थी. लड़की पैदल चलते–चलते थक गई और उसे नींद आने लगी. राज ने लड़की को लड़खड़ाते देखकर लड़की को कमर से पकड़कर संभाला और लड़की का एक हाथ अपने कंधे पर रखकर चलने लगा.

राज ने चलते–चलते मन में सोचा कि अभी तो गली सुनसान होगी. इसे बिल्डिंग में साथ ले जाता हूँ. सुबह उजाला होने से पहले इसे जाने के लिए कह दूँगा. बस इसका नशा उतर जाए.

राज एक चार मंजिल की तीन–तीन बैडरूम के चार फ्लेट वाली बिल्डिंग में सबसे ऊपर वाले फ्लेट में किराये पर रहता हैं. बाकि तीन फ्लेट खाली हैं, इसलिए बिल्डिंग के मालिक ने पूरी बिल्डिंग राज को ही संभालने के लिए दे रखी हैं.

बीस मिनट पैदल चलने के बाद राज की बिल्डिंग आ गई. राज ने बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़े होकर लड़की से कहा—“मैं ताला खोलता हूँ. फिर अन्दर चलते हैं.”

राज ने लड़की का हाथ अपने कंधे से हटाया. लड़की दीवार से पीठ लगाकर दीवार के सहारे खड़ी हो गई.

राज ने बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर लड़की को सहारा देते हुए सीढ़िया से चढ़कर सबसे ऊपर वाले फ्लेट के दरवाजे पर आकर फ्लेट का ताला खोला और लड़की को फ्लेट के अन्दर लाकर फ्लेट में लाईट जलाई.

राज के फ्लेट में बस एक सिंगल बैड ही था, जो एक कमरे में लगा हुआ था और ओढ़ने–बिछाने के लिए राज के पास एक गद्दा, एक रजाई और एक कम्बल था.

राज ने लड़की को बैड वाले कमरे में लाकर अपने बैड पर सुला दिया और कमरे में लाइट जलाकर लड़की के सैंडल निकालकर उसे रजाई ओढ़ा दी.

 
राज बिल्डिंग के मुख्य दरवाजे पर ताला लगाने के लिए सीढ़िया उतरते हुए वापस नीचे आया. मुख्य दरवाजे पर ताला लगाकर बिल्डिंग के मालिक के आदेशानुसार और चोरों के खतरे को ध्यान में रखते हुए राज रोज की तरह सोने से पहले पूरी बिल्डिंग के सारे खिड़की–दरवाजें और ताले चैक करते हुए वापस सीढिया चढ़ते हुए सबसे ऊपर वाले फ्लेट में आया.

राज ने फ्लेट का दरवाजा अन्दर से बन्द करके बाहर की लाईट बन्द की और कमरे में आकर कमरे की लाईट जलती छोड़कर बैड पर बैठ गया.

राज सोचने लगा कि अब मैं कहाँ सोऊँ ? गर्मी होती, तो फर्श पर ही सो जाते. लेकिन इतनी ठंड में फर्श पर सोया तो सुबह तक मेरी कुल्फी जम जाएगी.

राज ने कुछ देर तक सोचने के बाद ठंड से कम्पकपी बढ़ती देखकर अपने जूते निकाले और कम्बल लेकर बैड पर ही लड़की से दूरी बनाकर पीठ के बल सीधा होकर कम्बल ओढ़ते हुए लेट गया.

रात के चार बज गए, लेकिन राज को नींद नहीं आई. इस बीच लड़की नींद में राज के पास आकर राज के सीने से लिपट गई. राज चौककर थोड़ा दूर हुआ और लड़की को वापस पीछे करके ठीक से सुला दिया.

कुछ देर बाद फिर से यहीं हुआ. ऐसा तीन–चार बार होने के बाद राज ने बैड से खड़े होकर मन में कहा कि अब समझ में आया, पराई लड़की के साथ क्यों नहीं सोना चाहिए. लेकिन अब इतनी सर्दी में कहाँ जाऊँ ? मैनें तो रजाई भी तुझे दे दी. कम से कम कम्बल में तो सोने दे.

राज कुछ देर खड़े रहने के बाद वापस बैड पर आकर बैठ गया. राज बैठे–बैठे लड़की के चेहरे की तरफ देखकर मन में सोचने लगा कि कितनी मासूम लड़की हैं. समझ में नहीं आता, इतनी प्यारी लड़की को इतनी बुरी तरह मारते हुए, उन लड़कों के हाथ क्यों नहीं काँपे ? चल तू भी सोजा, यार. सिर्फ साथ में सोने से कुछ नहीं होता. जब दिल और दिमाग में गन्दगी हो, तब कुछ होता हैं. मन चंगा, तो कटोती में गंगा.

राज ने फिर से पीठ के बल सीधा लेटकर कम्बल ओढ़ लिया.

राज को सड़क पर कहीं हुई लड़की की बातें याद आने लगी. पत्थर उठाकर मारना, आई लव यू बोलना, बच्चों की तरह रो–रोकर गिड़गिड़ाना, गाना गाकर मनाना, पुलिसवालों से समझाने के लिए कहना, प्यार से गले लगना.

इसी बीच लड़की फिर से राज की तरफ आकर राज के सीने से लग गई. इस बार राज ने उसे दूर नहीं किया. लड़की के सर पर हाथ फेरते हुए राज मन में बोला कि अगर ये बेवड़ी ना होती तो कितना अच्छा होता. समझ में नहीं आता, ये लोग अपनी मासूमियत में नशा क्यों मिला रहे हैं ? खैर, क्या कर सकते हैं ?

राज ने लड़की को ओढ़ाई हुई रजाई अपने ऊपर भी डाल ली और लड़की को सीने से लगाए लेटा रहा. सुबह के पाँच बजे बाद राज की भी आँख लग गई.

सुबह के पौने छः बजे राज जाग गया. लड़की अभी तक राज के सीने से लगकर राज की बाहों में ही सो रही थी. राज ने लड़की को साइड में सुलाया और बैड से खड़ा होकर लड़की को जगाने लगा.

लड़की ने आँखें खोलकर सामने राज को देखा और चौककर बोली—“तुम कौन हो ? और मैं यहाँ कैसे ?”

राज पीछे हटकर बोला—“मेरा नाम राज हैं. रात को आप शराब के नशे में सड़क पर गिर गई थी, तो मैं आपको यहाँ ले आया.”

लड़की रजाई हटाकर बैड से उठी और अपनी सैंडल पहनकर कमरे से बाहर आई. राज भी चप्पल पहनकर लड़की के पीछे–पीछे कमरे से बाहर आया.

लड़की ने इधर–उधर देखा और एक हाथ सर पर हाथ रखकर बोली—“लेकिन मैं तो रंगीला के साथ थी. फिर सड़क पर कैसे गिर गई ?”

राज—“वो सब मुझे नहीं पता. मैं बस इन्सानियत के नाते आपको यहाँ ले आया. वरना इतनी ठंड में सड़क पर पता नहीं क्या हाल होता आपका ?”

लड़की घुटनों के बल नीचे बैठी और दोनों हाथ सर पर रखकर बोली—“ओह गॉड, इसका मतलब मैं रात भर तुम्हारे साथ सो रही थी ?”

राज लड़की के पास आकर बैठा और बोला—“एम सॉरी, मैं यहाँ किराये पर रहता हूँ. मेरे पास बस एक सिंगल बैड और एक रजाई–गद्दा हैं. अब ठंड बहुत ज्यादा हैं, इसलिए कम्बल ओढ़कर मैं आपके पास ही लेट गया. लेकिन मेरा यकिन करो, मेरे मन में कुछ गलत नहीं था और ना ही मैनें आपके साथ कुछ किया हैं. मैं बस सोया ही था.”

लड़की सर से हाथ हटाकर मुँह ऊपर करके बोली—“अरे, कोई बात नहीं यार… कुछ कर भी लेते तो क्या फर्क पड़ जाता ? मैं तो वैसे भी एक कमीने का खिलौना बनकर बेवकूफों की तरह सब करवा चुकी हूँ.”

राज बिना कुछ बोले खड़ा होकर पीछे हो गया. लड़की ने खुद के हाथ की तरफ देखा, तो लड़की के हाथ की कोहनी पर चोट लगी हुई थी.

लड़की ने कहा—“मैं तुम्हें मिली कहाँ थी ?”

राज—“ये प्रिस रोड़ पर चित्रकूट के मोड़ से थोड़ा आगे. मैं अपने ऑफ़िस से आ रहा था. तो मैनें देखा, आपकी एक लड़के के साथ बुरी तरह हाथापाई हो रही थी. उसी मारपीट में उस लड़के ने आपको सड़क पर गिरा दिया और फिर आपको लातें मारी. ये चोट शायद तभी लगी होगी.”

लड़की चेहरा गंभीर करके गुस्से में बोली—“साला कमीना. फिर क्या हुआ ?”

राज—“उसके साथ दो लड़के और भी थे. आपको वहीं छोड़कर वो तीनों गाड़ी में बैठकर चले गए. फिर मैं आपके पास आया. आप बहुत नशे में थी और नशे में आपने मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझ लिया. तभी वहाँ पुलिस आ गई. अब अगर मैं पुलिस को ये बोलता कि मैं आपको नहीं जानता. आपको तीन लड़के यहाँ छोड़कर भाग गए, तो पुलिस मुझसे सवाल–जवाब करती. शायद पुलिस स्टेशन भी ले जाती. मुझे पुलिस से बहुत डर लगता हैं. इसलिए मैनें पुलिसवालों को बोल दिया कि आप मेरी गर्लफ्रैंड हो और आपको यहाँ ले आया.”

लड़की मुस्कुराकर बोली—“थैक्स.”

राज—“इसमें थैक्स की कोई बात नहीं हैं. लेकिन एम सॉ सॉरी. अब आप यहाँ से चली जाईए. अगर आस–पड़ौस में किसी ने देख लिया, तो लोग गलत मतलब निकालेगे और इस बिल्डिंग का मालिक मुझे इस बिल्डिंग से निकालेगा.”

लड़की ने हँसकर कहा—“ओके, कोई बात नहीं.”

लड़की खड़ी होकर दरवाजे की तरफ जाने लगी.

राज ने कहा—“रूको.”

राज कमरे में जाकर चप्पल निकालकर जूते पहनने के बाद बैड पर पड़ा कम्बल उठाकर लाया और लड़की को कम्बल देते हुए बोला—“इसे ओढ़ लो, सर्दी बहुत ज्यादा हैं.”

लड़की ने कहा—“नहीं–नहीं, रहने दो. इसकी कोई जरूरत नहीं हैं.”

राज—“जरूरत कैसे नहीं हैं ? इसे तो ओढ़ना ही पड़ेगा. देखो, कैसे काँप रही हो ?”

राज ने खुद ही लड़की के कंधों पर कम्बल डाल दिया. लड़की ने कम्बल को ठीक से लपेटकर ओढ़ लिया.

राज ने दरवाजा खोलकर कहा—“अब चलो.”

लड़की के बाहर आने के बाद राज ने अपनी जेब से चाबी निकालकर फ्लेट को ताला लगाया और सीढ़ियों से नीचे आने लगा. लड़की भी राज के पीछे–पीछे नीचे आने लगी. राज नीचे आकर बिल्डिंग के मुख्य दरवाजें को खोलकर लड़की के साथ बाहर आया और बिल्डिंग का दरवाजा वापस लॉक करके लड़की के साथ आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

सुबह के छः बज चुके थे, अभी तक अंधेरा और ठंड ज्यादा होने के कारण घना कोहरा छाया हुआ था.

राज ने चलते–चलते पूछा—“आपका नाम जान सकता हूँ ?”

लड़की—“डॉली.”

(नोट— यहाँ से आगे लड़की को ‘डॉली’ सम्बोधित किया जाएँगा.)

राज—“तो डॉली जी, अब कहाँ जाएँगी आप ? मेरा मतलब आप कहाँ रहती हैं ?”

डॉली—“मानसरोवर.”

राज—“फिर तो बहुत दूर जाना हैं आपको. अब इतनी सुबह कोई साधन भी पता नहीं, मिलेगा या नहीं ?”

डॉली—“कोई बात नहीं, तुम चिन्ता मत करो. मैं थोड़ा इंतजार कर लूँगी.”

राज—“हाँ, वो तो करना ही पड़ेगा.”

कुछ देर बाद आम्रपाली सर्किल आ गया और दोनों किसी ऑटो का इंतजार करने लगे. पन्द्रह मिनट इंतजार करने के बाद भी कोई ऑटो नहीं आया. राज ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर ऑटो चलाने वाले अपने एक दोस्त अंकित को फोन किया.

अंकित चारपाई पर रजाई में मुँह ढककर अपने कमरे में सोया हुआ था. अंकित के सिरहाने पड़ा अंकित का मोबाइल बजने लगा.

अंकित ने रजाई में मुँह ढके हुए अपना हाथ तकिए के पास लाकर मोबाइल रजाई के अन्दर लेकर कॉल रिसींव करके कहा—“हैलो.”

राज—“गुदड़ों(बिस्तर) से बाहर आ गया या अभी गुदड़ों में ही पड़ा हैं ?”

अंकित—“हाँ, बोल. सुबह–सुबह कैसे याद किया ?”

राज—“आम्रपाली चौराहे पर आजा जल्दी.”

अंकित—“अभी आया. बस दस मिनट रूक.”

उम्र में तैईस(23) साल का अंकित कॉल काटकर बिस्तर से बाहर निकला और दीवार पर टंगा कोट(सर्दी में पहनने वाला टोपी लगा हुआ) पहनकर कमरे से बाहर आया.

अंकित ने थरथराती सर्दी महसुस करके मुँह धोना कैंसल किया और घर से बाहर आकर ऑटो स्टार्ट करके ऑटो लेकर आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

अंकित ने राज के सामने ऑटो रोककर कहा—“हाँ, बोल.”

राज ऑटो के पास आकर बोला—“यार ! इस लड़की को मानसरोवर जाना हैं.”

अंकित ने लड़की की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए राज को धिरे से कहा—“इतनी स्मार्ट लड़की. कौन हैं ?”

राज—“अपनी दोस्त ही समझ ले. बस घर छोड़कर आना हैं. अब ज्यादा डिटेल पूछकर क्या करेगा ?”

अंकित—“अरे मजाक कर रहा था, यार. (डॉली से)आओ मैडम, बैठो.”

डॉली ऑटो की तरफ आते हुए कम्बल निकालने लगी.

राज ने डॉली से कहा—“कम्बल क्यों निकाल रहे हो ? ठंड लग जाएँगी.”

डॉली—“अरे, लेकिन कम्बल तो तुम्हारा हैं ना.”

राज—“आप जहाँ उतरो, वहाँ उतरकर कम्बल इसको दे देना. ये मुझे दे देगा.”

डॉली मुस्कुराकर बोली—“ओके, थैक्यू सॉ मच. बाऐं.”

राज—“टेक केयर.”

राज ने अंकित से कहा—“ठीक से घर छोड़ देना इनको."

अंकित—“नो टेन्शन यार.”

अंकित ऑटो चलाते हुए चला गया और राज वापस अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा.

बिल्डिंग पर आकर राज ताला खोलकर बिल्डिंग के अन्दर आया और बिल्डिंग के दरवाजे पर ताला लगाकर सीढिया चढ़ते हुए फ्लेट में आकर सोचा कि ऑफ़िस तो दस बजे जाना हैं. थोड़ा और सो लेता हूँ. नौ बजे उठ जाएँगें.

राज कमरे में आकर बैड पर बैठा और अपने जूते निकालकर रजाई ओढ़कर सो गया.

तीन महिने बाद चार अप्रेल, मंगलवार को शाम के पाँच बजे राज मानसरोवर इलाके में एक बस सटॉप पर खड़ा बस का इंतजार कर रहा था.

राज के सामने एक गाड़ी आकर रूकी. जब गाड़ी के गेट का शीशा नीचे हुआ, तो राज ने देखा कि सामने ड्राईविंग सीट पर हल्के ब्राउन कलर का चश्मा पहने डॉली थी.

डॉली ने चश्मा निकालकर आँखें ऊपर करके मुस्कुराते हुए कहा—“पहचाना ?”

राज ने गाड़ी के पास आकर कहा—“पहचानेगें क्यों नहीं ?”

डॉली—“मुझे लगा, शायद भूल गए होगे. शराब पीकर आधी रात को सड़कों पर मारपीट करने वाली एक बिगड़ैल शराबी लड़की को क्या याद रखना ?”

राज—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हैं. अगर मैं ऐसा सोचता, तो आपको अपने साथ क्यों ले जाता ?”

डॉली—“अोके, यहाँ कैसे ?”

राज—“यहाँ एक दोस्त की बहन की शादी हैं, वहीं आया था. शादी हो गई, कुछ देर बाद बारात चली जाएगी. अब वापस जा रहा हूँ. आप यहाँ ?”

डॉली—“मैं यहीं रहती हूँ. इससे पीछे वाली गली में ही हमारा घर हैं. तुम सेठ साँवरमल बागड़ी जी को जानते हो ?”

राज—“हाँ, उनका नाम सुना हैं.”

डॉली—“वो मेरे पापा हैं.”

राज हैरान होकर बोला—“आप साँवरमल जी बेटी हो ?”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, तुम कहाँ जा रहे हो ?”

राज—“घर.”

डॉली—“कहाँ आम्रपाली ?”

राज—“हाँ.”

डॉली—“चलो आओ फिर, मैं छोड़ देती हूँ.”

राज—“नहीं–नहीं, मैं बस से चला जाऊँगा.”

डॉली—“अरे, बैठ जाओ. मैं वहीं से जाऊँगी. रास्ते में तुम्हें उतर दूँगी.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

राज ने गाड़ी का गेट खोला और गाड़ी में बैठकर गेट वापस बन्द कर लिया. डॉली अपना चश्मा पहनकर गाड़ी आगे चलाने लगी.

डॉली ने ड्राईविंग करते हुए कहा—“तुम्हारा नाम क्या हैं ? उस दिन नाम पूछना तो भूल ही गई.”

राज—“उस दिन सुबह उठकर सबसे पहले आपने यहीं पूछा था और मैनें बता भी दिया था. मेरा नाम राज हैं.”

डॉली—“ओह ! सॉरी, मैं भूल गई.”

राज—“कोई बात नहीं.”

डॉली—“तुम करते क्या हो ?”

राज—“चित्रकूट में जयशर्मा जी हैं, उनका जेम्स एण्ड ज्वैलरी का बिजनेस हैं. उनके पास जॉब करता हूँ.”

डॉली—“तो रात को इतनी देर तक क्या करते हो ? ऑफ़िस तो पाँच–छः बजे ऑफ हो जाता होगा. ज्यादा से ज्यादा सात बज जाते होगे.”

राज—“ऑफ़िस छः बजे ऑफ होता हैं. लेकिन मैं रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर टाइम करता हूँ. उस रात काम बहुत ज्यादा था, इसलिए एक बज गए थे.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“और बदकिस्मती से मैं मिल गई.”

राज—“आप खुद के बारे में बार–बार ऐसे क्यों बोलती हो ?”

डॉली—“अरे, तुम्हें बहुत प्रोब्लम हुई होगी ना. तुमने बताया था, वहाँ पुलिस भी आ गई थी.”

राज—“पुलिस के आने के कारण थोड़ा टेन्शन में आया था, लेकिन इसमें बदकिस्मती वाली कोई बात नहीं हैं.”

डॉली—“ओके.”

 
राज ड्राइविंग करती हुई डॉली को देखते हुए सोचने लगा कि परी जैसी खूबसूरत और गुडिया जैसी मासूम, छोटे बच्चों जैसी खिलखिलाहट और फूलों जैसी सादगी. आज तो लग ही नहीं रहा, ये लड़की बेवड़ी हैं. उस रात सड़क पर तो इससे दूर भागने का मन कर रहा था और आज लग रहा हैं, हमेशा पास ही रहें तो…(मन में मुस्कुराकर) छोड़ यार. तू भी क्या–क्या सोचने लगता हैं ? पता नहीं क्या–क्या कर चुकी हैं ?”

डॉली राज को मुस्कुराते देखकर बोली—“क्या हुआ ?”

राज—“नहीं. कुछ नहीं.”

डॉली—“कुछ याद आ गया क्या, जो मन में हँस रहे हो ?”

राज—“असल में, मैं उस रात के बारे में ही सोच रहा था.”

डॉली—“अरे, उसके लिए एम सॉ सॉरी. ड्रिंक तो मैं रोज करती हूँ, लेकिन उस रात मेरे बॉयफ्रेंड ने ड्रिंक में कुछ मिला दिया था. अब पता नहीं, उसने क्या मिलाया ? दस–ग्यारह बजे तक तो मैं उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी. उसके बाद क्या–क्या हुआ, मुझे ठीक से याद नहीं. सुबह उठी तो सामने तुम थे.”

राज—“कोई बात नहीं.”

राज मन में सोचने लगा कि कितनी अजीब बात हैं. प्यार के नाम पर गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ करवा लिया और कोई शर्म–शर्मिन्दगी जैसा कुछ भी नहीं.

डॉली ने पूछा—“अच्छा, तुम्हारे घर में कौन–कौन हैं ?”

राज—“घर में मम्मी–पापा हैं, भाई–भाभी हैं, एक बड़ी बहन हैं, बहन की भी शादी हो चुकी हैं. भाई तो घर में ही एक छोटी सी दुकान करता हैं. मैं यहाँ जॉब करता हूँ.”

डॉली—“और तुम्हारे पापा, वो क्या करते हैं ?”

राज—“वो जमींदार हैं, अब तो सब भाई के साथ दुकान चलाते हैं.”

डॉली—“ओके.”

राज—“आपसे एक बात पूछूँ, अगर आप बुरा ना माने तो ?”

डॉली—“हाँ, पूछो.”

राज—“आप खुद को बिगड़ैल बोलती हैं. जब आपको पता हैं, आप बिगड़ैल क्यों हैं ? तो उन बातों से दूर क्यों नहीं रहती ? मेरा मतलब ये शराब पीना छोड़ दीजिए.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“अब मुझे बिगड़ैल कहलाना अच्छा लगता हैं.”

राज—“ये भी सही हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“सही ही हैं, यार ! जब बिना गलती के सजा मिलती हैं. तब यहीं लगता हैं, इससे अच्छा तो गलती कर ही लो.”

राज—“अब मुझे आपकी जिन्दगी के बारे में कुछ मालूम तो नहीं हैं. लेकिन उस रात आपने जो बातें कहीं, उस तरीके से प्यार के नाम पर बेवकूफ बनना तो पूरी तरह से महामुर्खता हैं. आप शायद ये समझती हो, आपने तो सच्चा प्यार किया था. लेकिन वो लड़का धोखा देकर चला गया. अब लोग आपके सच्चे प्यार को समझ नहीं सकते और बिना गलती के सजा देते हैं, मतलब आपको गलत बोलते हैं. अब प्यार के नाम पर गलत रास्ते पर चलेंगे, तो गलत ही कहलाएगें. प्यार का ये मतलब थोड़े ही हैं, हम प्यार के नाम पर कुछ भी मनमानी करें. मुझे तो ये सब करने वाली लड़कियाँ बहुत बेकार लगती हैं.”

राज की बात सुनकर डॉली का खिला हुआ चेहरा गंभीर होकर तनावग्रस्त हो गया. डॉली गाड़ी की स्पीड बढ़ाने लगी.

राज गाड़ी की स्पीड बढ़ती देखकर डॉली की तरफ देखते हुए मन में बोलने लगा कि क्या कर रहा हैं ? भूल गया, उस रात हाथ में पत्थर लेकर कैसे शेरनी की तरह दहाड़ रही थी ? अब तू नागिन की पूँछ पर पैर क्यों रख रहा हैं ?

राज ने मासूमियत भरी आवाज़ बनाकर डॉली से कहा—“डॉली जी, मैं इतनी जल्दी मरना नहीं चाहता. अभी तो मेरी शादी भी नहीं हुई, कोई गर्लफ्रैंड भी नहीं बनाई. प्लीज ! गाड़ी धिरे चलाईए.”

डॉली ने गाड़ी की स्पीड कम करते हुए कहा—“ओह ! एम सॉ सॉरी. एम रियली वैरि सॉरी.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, इतना सॉरी बोलने की जरूरत नहीं हैं.”

डॉली मुँह से कुछ बोले बिना चुपचाप गाड़ी की स्पीड कम करके गाड़ी चलाती रही.

राज मन में कहने लगा कि कुछ भी हो, हमें दूसरों की भावनाओं का ध्यान रखना चाहिए. मुझे पूरी बात जाने बिना इस तरह ज्ञान नहीं बाँटना चाहिए.

इसके बाद डॉली पूरे रास्ते कुछ नहीं बोली.

आम्रपाली कॉलोनी नजदीक आते ही राज ने हाथ से आम्रपाली सर्किल की तरफ इशारा करके कहा—“मुझे वहाँ उतार देना.”

डॉली ने राज की बताई जगह पर गाड़ी रोक दी.

राज ने कहा—“एम सॉरी, मुझे माफ़ कर दीजिये.”

डॉली—“अरे, तुम क्यों सॉरी बोल रहे हो ? तुमने तो ठीक ही कहा, गलती तो मुझसे हुई हैं.”

राज—“फिर भी, मुझे सोच–समझकर बोलना चाहिए. कोई भी इन्सान जान–बुझकर खुद का नुकसान नहीं करता, खुद का नुकसान तो गलती से, अन्जाने में या मजबुरी में ही करता हैं.”

डॉली—“अब छोड़ो, यार ! मुझे तुम्हारी बात का बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा.”

राज—“थैक्यू, वैसे मेरे सॉरी बोलने की एक वजह और भी हैं.”

डॉली—“क्या ?”

राज—“उस रात मैनें भी आपको चांटे मार दिये थे.”

डॉली खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“अच्छा.”

राज हैरान होकर बोला—“आप हँस रही हैं ?”

डॉली—“मुझे हँसी इसलिए आई. क्योंकि तुम पहले इन्सान हो, जिसने मुझे चांटे मारने के बाद माफ़ी माँगी हैं. वरना मैं तो बचपन से बहुत चांटे खा चुकी हूँ.”

राज—“अच्छा, लेकिन ऐसा क्यों ?”

डॉली—“बस ऐसे ही. कभी मम्मी–पापा से, कभी स्कूल टीचर से, कभी फ्रैंड्स से और कभी–कभी आप जैसे दोस्तों से. वो क्या हैं, मैं बचपन में शरारती बहुत थी और कॉलेज में आने के बाद बहुत बिगड़ गई. इसलिए डांट और चांटे खाने की आदत हैं.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“बचपन में शरारतें बहुत लोग करते हैं.”

डॉली—“हाँ, लेकिन मैं कुछ ज्यादा ही करती थी और उस रात भी मैनें कुछ ना कुछ ऐसा किया होगा, जिसके कारण तुम्हें हाथ उठाना पड़ा होगा. बताओ, क्या किया था मैनें ?”

राज—“हम्म…अगर दूबारा मुलाकात हुई, तो बताऊँगा. अभी मैं चलता हूँ.”

डॉली—“ठीक हैं.”

राज गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरा और गेट बन्द करके गाड़ी के गेट के शीशे नीचे की हुई खिड़की में से कहा—“अच्छा, फिर मिलेंगे.”

डॉली—“हाँ, जरूर. तुम वहाँ किराये पर रहते हो ना ?”

राज—“हाँ, मैं हनुमानगढ़ का रहने वाला हूँ. साढ़े चार साल से यहाँ जॉब कर रहा हूँ. पहले दो साल तक तो हर चार–छः महिने में किराये के कमरे बदलता रहा. फिर एक जान–पहचान वाले ने इस बिल्डिंग के मालिक से मिलाया. इस बिल्डिंग के मालिक ने कहा, मेरी इस बिल्डिंग में चार फ्लेट हैं. जब तक चारों फ्लेट बिक नहीं जाते, तब तक आराम से रहो. किराये के दो हजार रुपये दे देना, आपका किराया कम लगेगा और मेरे पूरी बिल्डिंग की देखभाल हो जाएगी. तब से दो साल हो गए, यहीं रहता हूँ.”

डॉली—“ओके, मैं अक्सर इधर से गुजरती हूँ. अब पहचान तो हो ही गई हैं. अगर कभी आते–जाते मिल जाएँ, तो हाल–चाल तो पूछ ही सकते हैं.”

राज—“हाँ–हाँ, बिल्कुल. अच्छा अब मैं चलता हूँ.”

डॉली—“ठीक हैं.”

राज गाड़ी से दूर हुआ और डॉली गाड़ी के गेट का शीशा ऊपर करके गाड़ी चलाकर आगे चली गई.

राज मुस्कुराता हुआ अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चला गया.

चार दिन बाद आठ अप्रेल, शनिवार की रात को पौने आठ बजे जयशर्मा केबिन में अपनी चेयर पर बैठे सामने रखे कम्प्यूटर में कुछ काम पूरा करने के बाद अपनी चेयर से उठकर केबिन से बाहर आए.

राज अपने टेबल की कुर्सी पर बैठा स्टोन(नगीने या किमती पत्थर) चैक कर रहा था.

जयशर्मा—“राज, मैं ऊपर जा रहा हूँ. तुम ये काम कर लेना.”

राज—“ठीक हैं.”

जयशर्मा बेसमेंट से सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आए. किचन में मिनी खाना बनाने की तैयारी कर रही थी.

जयशर्मा ने किचन में आकर मिनी के पीछे खड़े होकर मिनी की कमर पर हाथ डालते हुए मिनी को पेट से पकड़ के अपने पास खींचा और मिनी के गाल पर अपना गाल मलते हुए मुस्कुराकर कहा—“क्या बना रही हो ?”

मिनी अपना गाल दूर करके मुस्कुराकर डांटते हुए बोली—“कुछ तो शर्म करो. बच्चे तीन दिन के लिए घर पर नहीं हैं, लेकिन नीचे राज बैठा हैं. वो पहले भी कई बार हमें देख चुका हैं. पता नहीं, क्या सोचता होगा, हमारे बारे में ?”

जयशर्मा मिनी का गाल चूमकर बोले—“क्या सोचता होगा ? यहीं सोचता होगा, शादी के चौबीस(24) साल बाद भी सेठ जी और मैडम एक–दूसरे से बहुत प्यार करते हैं. और फिर अपनी पत्नी से प्यार करने में कैसी शर्म ?”

मिनी खुद को जयशर्मा से छुड़ाकर जयशर्मा को पीछे करते हुए बोली—“हाँ, ठीक हैं. लेकिन अभी बाहर जाओ.”

जयशर्मा—“अरे–अरे.”

मिनी ने मुड़कर जयशर्मा को किचन से बाहर धकेलते हुए कहा—“अरे–अरे, कुछ नहीं. अभी बाहर बैठो और मुझे खाना बनाने दो. राज के जाने के बाद बैडरूम में जितना मरजी प्यार करना.”

जयशर्मा सोफे की तरफ जाते हुए बोले—“कोई बात नहीं. बना लो खाना. बैडरूम में आओ, फिर देखता हूँ तुम्हें.”

मिनी मुस्कुराकर अपने किचन के काम में लग गई.

जयशर्मा सोफे पर आकर बैठे और दो मिनट बाद खड़े होकर वापस किचन की तरफ आए.

जयशर्मा किचन के दरवाजे पर खड़े होकर बोले—“अभी खाना बनाना शुरू थोड़े ही किया हैं ?”

मिनी अपने किचन के काम में लगी हुई बोली—“क्या हुआ ? तुम्हारा कुछ खाने का मन हैं, तो बता दो. वहीं बना दूँगी.”

जयशर्मा—“कुछ नहीं, खाना बनाना रहने दो. आज खाना बाहर खाते हैं.”

मिनी ने हैरान होकर मुड़ते हुए कहा—“ये अचानक बाहर खाने का ख्याल कैसे आया ?”

जयशर्मा—“अब आ गया तो आ गया. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. मैं राज को भेज देता हूँ.”

जयशर्मा सीढ़िया उतरकर नीचे बेसमेंट में आए और राज को बोले—“राज, ये कल कर लेना. यार ! आज हम खाने के लिए बाहर जा रहे हैं.”

राज—“ठीक हैं.”

राज खड़ा होकर टेबल पर रखा सामान समेटने लगा.

जयशर्मा ने देर होती देखकर राज से कहा—“ये सब टेबल पर ही पड़ा रहने दो. कल आकर कर लेना.”

राज ने टेबल का सामान छोड़कर कहा—“ये भी सही हैं.”

जयशर्मा ने अपना केबिन लॉक करके राज को चाबी देकर कहा—“सारी लाईट बन्द करके ऑफ़िस लॉक कर दो.”

जयशर्मा सीढ़िया चढ़कर ऊपर चले गए.

राज सारी लाईटें बन्द करके सीढ़िया चढ़कर ऊपर आया और ऑफ़िस लॉक करके सोफे पर बैठे जयशर्मा के पास आकर जयशर्मा को चाबी दी.

राज से चाबी लेकर जयशर्मा ने कहा—“थोड़ी देर बैठ जाओ. मैडम तैयार होकर आ रही हैं, फिर साथ ही चलते हैं. तुम्हें छोड़ दूँगा.”

राज जयशर्मा के पास सोफे पर बैठ गया.

दस मिनट बाद बैडरूम का दरवाजा खोलकर मिनी गले में दुप्पटा लपेटे हुए बन्द गले की घूटनों तक आने वाली कुरती और चूड़ीदार लेगिंग पहनकर बैडरूम से बाहर आई.

मिनी को देखकर राज के मन में ख्याल आया कि अगर डॉली भी ऐसी होती तो कितना अच्छा होता. लेकिन वो तो बेवड़ी(शराबी) हैं. ऊपर से एक साल तक गर्लफ्रैंड बनकर सब कुछ कर चुकी हैं. छोड़ यार, अपने को क्या ? जिसके साथ उसकी शादी होगी, उसकी किस्मत फूटेगी.

जयशर्मा और राज सोफे से उठकर खड़े हुए.

जयशर्मा आहे भरकर बोले—“हाए…क्या लग रही हो. बाहर जाना कैन्सल करके बैडरूम में चले ?”

मिनी सांस भरकर मुँह फुलाते हुए बोली—“अरे, राज खड़ा हैं. बोलने से पहले आस–पास देखकर सोच तो लिया करो, क्या बोल रहे हो और कहाँ बोल रहे हो ?”

जयशर्मा ने राज के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे यार… अच्छा राज तुम बताओ. मैनें कुछ गलत कहा ?”

राज मुँह से कुछ बोले बिना सिर्फ मुस्कुरा दिया.

जयशर्मा—“लड़कियों की तरह शर्मा क्यों रहा हैं ? शर्माना छोड़कर बता, इतनी सुन्दर नारी सामने हो तो उसके साथ बैडरूम में जाने का मन करता हैं या नहीं करता ?”

मिनी चलकर जयशर्मा और राज के पास आई और राज के कंधे से जयशर्मा का हाथ हटाकर खुद राज के कंधे पर हाथ रखकर बोली—“चलो दूर हटो इससे. राज में शर्म–लिहाज नाम की चीज हैं. इसे अपनी तरह बेशर्म मत बनाओ.”

जयशर्मा हँसकर बोले—“इसमें बेशर्मी क्या हैं ? मैं अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाने की बात कर रहा हूँ. किसी पराई नारी के साथ बैडरूम में जाने की बात थोड़े ही कही हैं. तुम तो ऐसे बोलकर रही हो, जैसे ये तो शादी के बाद अपनी पत्नी के साथ बैडरूम में जाएगा ही नहीं.”

मिनी राज के कंधे से हाथ हटाकर दोनों हाथ अपनी कमर पर रखते हुए बोली—“अब चलना हैं या यहाँ खड़े–खड़े बैडरूम–बैडरूम ही करोगे ?”

जयशर्मा—“हाँ–हाँ, चलना क्यों नहीं हैं ?”

मिनी—“हाँ तो चलिए ना फिर.”

मिनी, राज और जयशर्मा घर से बाहर आए.

मिनी ने अपने सैंडल पहनकर राज से कहा—“राज, तुम आ जाओ. वो लॉक कर देगें.”

राज ने अपने जूते पहने और मिनी के साथ चलते हुए बाहर गली में जाने लगा. गाड़ी में ड्राइवर के पास वाली अगली सीट पर मिनी बैठ गई और गाड़ी की पिछली सीट पर राज बैठ गया.

मिनी ने कहा—“इनकी बातों पर ध्यान मत दिया करो. ये तो ऐसे ही मजाक में बोलते रहते हैं.”

जयशर्मा ने घर के दरवाजे पर ताला लगाकर अपने जूते पहनकर घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑफ किया और घर के मुख्य दरवाजे को बन्द करके गाड़ी की ड्राइविंग सीट पर आकर बैठ गए. जयशर्मा गाड़ी स्टार्ट करके राज को छोड़ने के लिए पहले आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़े.

जयशर्मा गाड़ी चलाते हुए अपना बचपन याद करके बोले—“मिनी, मैनें तो आठ–दस साल की उम्र में ही तुमसे शादी करने का मन बना लिया था.”

मिनी हँसकर बोली—“झूठे, इतना मत फेंको. पीछे बैठा राज सुनेगा, तो हँसेगा. आठ–दस साल की उम्र में शादी की समझ थी तुम्हें, जो शादी करने का मन बना लिया था ?”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“शादी की समझ नहीं थी. लेकिन फिल्मों और टीवी सीरियल में सुनता था, पति ने सारी रात बहुत तंग किया. पति रात भर सोने नहीं देता.”

मिनी—“हाँ, तो ?”

जयशर्मा—“तो तुम्हें याद होगा. बचपन में खेलते–खेलते हम बहुत बार एक–दूसरे के साथ लड़ते थे. तुम हर बार मुझे पीट देती थी और मैं रोने लगता था.”

मिनी हँसकर बोली—“हाँ, लेकिन बाद में तुमसे सॉरी बोलकर तुम्हें मनाती भी तो थी और तुम हजार नखरे करने के बाद मानते थे.”

जयशर्मा हँसकर बोले—“हाँ, बाबा, मनाती थी. तुम मनाती थी, तभी तो तुम्हारे जाने के बाद तुम्हारी बहुत याद आती थी और एक–एक दिन गिनकर मैं तुम्हारे वापस आने का इंतजार करता था. कई बार तुम्हारी बुआ और तुम्हारे भाईयों(बुआ के दो बेटे) से पूछता था, मिनी कब आएँगी ? इस बार मिनी आई क्यों नहीं ?”

मिनी मुस्कुराते हुए बोली—“हम्म…मेरा भी यहीं हाल था. फिर ?”

जयशर्मा—“फिर मैनें कई लोगों से पूछा, ये पति सारी रात पत्नी को तंग करते हैं, परेशान करते हैं. पति को कोई रोकता क्यों नहीं ? तो सबने कहा, पति को कोई नहीं रोक सकता. पति चाहे पत्नी को कितना भी परेशान करे, कितना भी तंग करे. और रात को तो बिल्कुल भी नहीं रोक सकते.”

मिनी ने कहा—“फिर तुमने क्या सोचा ?”

जयशर्मा—“ये बातें सुनकर उस वक्त आठ–दस साल की उम्र में मैनें सोचा. जैसे तुम मुझसे बड़ी हो, इसलिए मेरी पिटाई कर देती हो. इसी तरह सभी लड़के बचपन में किसी ना किसी लड़की से पिटते होगे. क्योंकि पति को कोई रोक नहीं सकता, इसलिए लड़के बड़े होकर शादी करके पति बन जाते हैं और फिर सारी रात पत्नी को तंग करके, पत्नी को परेशान करके बचपन की पिटाई का बदला लेते हैं. हमारे आस–पड़ौस के कई घरों में भी पति अपनी पत्नी की पिटाई करते थे, उनको देखकर मैं यहीं सोचता था, ये लोग अपने बचपन की पिटाई का बदला ले रहे हैं. लेकिन उस बचपन में पीटने वाली लड़की की शादी तो लड़के से पहले हो जाती हैं, इसलिए उसका बदला किसी दूसरी लड़की से लेते हैं. सभी लोग बहुत गलत करते हैं. पिटाई कोई और लड़की करती हैं और बदला किसी और लड़की से लेते हैं. शायद सब के सब अपने से बड़ी लड़की से डरते हैं. मैं ऐसा नहीं करुँगा. मैं तो मिनी से ही शादी करुँगा और मिनी से ही बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करुँगा.”

मिनी खिलखिलाकर हँस पड़ी और अपनी हँसी रोककर बोली—“और आखिर तुमने मुझसे शादी कर ही ली. बचपन की पिटाई का हिसाब बराबर करने के लिए.”

जयशर्मा—“अब तुम्हें तंग करके हिसाब तो बराबर करना ही था. ये तो तुम्हें पता ही हैं, मैं हिसाब का कितना पक्का हूँ.”

मिनी—“हम्म…तुम वापस घर आओ आज. फिर मैं बताती हूँ तुम्हें, तंग करना किसको कहते हैं ?”

जयशर्मा मुस्कुराते हुए बोले—“फिर तो आज बहुत मजा आएँगा. गिन–गिनकर एक–एक बात का हिसाब करेंगे.”

मिनी मुस्कुराकर बोली—“चुप करो ! अभी तुम गाड़ी चलाओ चुपचाप.”

जयशर्मा और मिनी के बीच बातचीत करते हुए एक–दूसरे को छेड़ना–चिढ़ाना चलता रहा. कभी–कभी मिनी भी राज की परवाह छोड़कर जयशर्मा को छेड़ने और चिढ़ाने लगती. गाड़ी में पिछली सीट पर बैठा राज चुपचाप जयशर्मा और मिनी की बातें सुनता रहा.

 
आम्रपाली सर्किल पर आकर जयशर्मा ने गाड़ी रोकी.

राज ने गाड़ी का लेफ्ट साइड वाला दरवाजा खोला और गाड़ी से निकलकर बोला—“ठीक हैं, सेठ जी.”

जयशर्मा—“हाँ, ठीक हैं. कल आराम से आ जाना, बारह–एक बजे तक.”

राज—“ये भी सही हैं.”

राज अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और मुस्कुराते हुए मन में कहने लगा कि सेठ जी और मैडम के हाव–भाव देखकर लग रहा हैं, सेठ जी और मैडम आज सारी रात जागेगें और कल सुबह दोपहर तक सोयेगें. वरना हमेशा तो कहते हैं, सुबह जल्दी आना. और आज कह रहे हैं, बारह–एक बजे तक आराम से आना. ये भी सही हैं. सेठ जी ना मोटे, ना पतले, गोरे रंग के स्मार्ट और हैंडसम बिना दाढ़ी–मूँछ के क्लीन शेव चेहरे वाले अच्छे शरीर के मालिक और मैडम कसावट भरे गोल–मटोल सेहतमंद और तंदरुस्त अच्छे खूबसूरत शरीर की मालकिन. मैडम के चेहरे पर ऐसी रौनक और ऐसा तेज हैं, जैसे कोई देवी हो. सेठ जी और मैडम की शादी भी बहुत मुश्किल से हुई थी. जब रिश्ता मुश्किल से बनता हैं, तो उस रिश्ते की कदर भी ज्यादा होती हैं. और फिर इनको भी खुश होने का पूरा अधिकार हैं. आखिर दोनों पति–पत्नी हैं, कुछ गलत थोड़े ही कर रहे हैं.

जयशर्मा गाड़ी आगे चलाने लगे, तभी मिनी ने कहा—“अरे, रूको.”

जयशर्मा गाड़ी रोककर बोले—“क्या हुआ ?”

मिनी—“राज चार साल से हमारे पास काम कर रहा हैं. लड़का भी बहुत अच्छा हैं. रात को देर तक ऑफ़िस में काम करता हैं. संडे को छुट्टी के दिन भी आता हैं. हमारे किसी काम के लिए कभी मना नहीं करता. तो कभी तुम भी उसके बारे में सोच लिया करो.”

जयशर्मा—“काम के बदले पैसे देता तो हूँ. रात के ऑवर–टाइम के अलग से पैसे देता हूँ, संडे के अलग से पैसे देता हूँ. अब और क्या सोचूँ ?”

मिनी—“उफ्फ ! अरे, कल छुट्टी दे देते ना उसे. वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा. उसका भी मन बहल जाएगा. यहाँ अकेला रहता हैं. बस हमारा ऑफ़िस और घर. पता नहीं, मन कैसे लगता हैं उसका ?”

जयशर्मा—“अरे, ये बात हैं क्या ? तो इसमें क्या प्रोब्लम हैं ? बोल देते हैं, कल मत आना.”

जयशर्मा ने गाड़ी आगे बढ़ाई और सड़क पर जा रहे राज के पास लाकर रोक दी. राज जयशर्मा की गाड़ी देखकर रूक गया.

मिनी ने राज से कहा—“राज, इधर आना.”

राज गाड़ी के पास आया.

जयशर्मा ने कहा—“अरे, भई ! तुम्हारी मैडम कह रही हैं, राज यहाँ अकेला रहता हैं. कभी उसके बारे में भी सोच लिया करो. कल उसे छुट्टी दे दो, वो भी थोड़ा घूम–फिर लेगा, उसका भी मन बहल जाएगा. तो कल तुम मत आना. परसो सोमवार को ही आ जाना.”

राज—“ठीक हैं, सेठ जी.”

राज जाने लगा.

मिनी बोली—“राज, रूको तो.”

राज ने मुड़कर कहा—“जी, मैडम.”

मिनी ने जयशर्मा से कहा—“इसे कुछ दे तो दो.”

जयशर्मा—“क्या दूँ ?”

मिनी—“ओहो ! अपना पर्स दो.”

जयशर्मा ने अपनी जेब से अपना पर्स निकाल कर मिनी को दिया और मिनी ने पर्स में से एक पाँच सौ का नोट निकालकर राज से कहा—“इधर आना.”

राज आगे आया.

मिनी ने राज को पाँच सौ रुपये का नोट देते हुए कहा—“ये लो. कल कहीं घूम–फिर लेना, कुछ खा–पी लेना. ठीक हैं.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन ये पैसे देने की क्या जरूरत हैं ? सेठ जी सैलरी देते तो हैं.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“सेठ जी का हिसाब सेठ जी के साथ. ये मेरी तरफ से हैं. अगर तुम्हारी माँ तुम्हें जेबखर्च के लिए पैसे देती तो तुम मना करते क्या ?”

राज ने जयशर्मा की तरफ देखा. जयशर्मा ने मुस्कुराकर अपनी पलकें झपकाई. राज ने मिनी की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए पैसे ले लिए.

जयशर्मा ने मिनी से कहा—“अब चले.”

मिनी—“हाँ, चलिए.”

जयशर्मा गाड़ी चलाते हुए चल पड़े.

राज उनकी जाती हुई गाड़ी को देखते हुए मुस्कुराकर मन में बोला कि ये मैडम भी यार………कभी–कभी इमोशनल कर देती हैं. इतने प्यार से बोलती हैं, कि जहर खाने को बोले, तब भी मना करना मुश्किल हैं. बहुत किस्मत वाले हो, सेठ जी. खूबसूरत पत्नी तो बहुत सारे लोगों को मिलती हैं. लेकिन आपकी पत्नी का दिल उनकी खूबसूरती से भी ज्यादा खूबसूरत हैं. मैडम की खूबसूरती के साथ–साथ कभी मैडम के खूबसूरत दिल की भी तारीफ कर दिया करो. लेकिन चलो, आप कम से कम मैडम की बुराई तो नहीं करते. वरना सौ(100) में से निनन्यानवे(99) पति अपनी पत्नी की बुराई ही करते हैं और उन निनन्यानवे(99) में से नब्बे(90) पति झूठी बुराई करते हैं. समझ में नहीं आता, ये लोग हमेशा अपनी पत्नी को कोसते क्यों हैं ? पहले तो नारियों के पीछे भागते हैं, फिर वहीं नारी जब मिल जाती हैं, तो बुराई करते हैं. बेकार लोग. खैर, इन्सान के पास जो होता हैं, इन्सान उसकी कदर नहीं करता. लेकिन सेठ जी तो मैडम की इज्जत बहुत करते हैं.

जयशर्मा की गाड़ी नजरों से ओझल होने के बाद राज अपनी बिल्डिंग की तरफ चला गया.

गाड़ी चलाते हुए जयशर्मा ने मिनी से कहा—“तुम्हें राज को पाँच सौ रुपये देने की क्या जरूरत थी ? नहीं देते तो भी चल जाता. फिर भी अगर देने ही थे, तो सौ–पचास दे देती, वो भी बहुत थे.”

मिनी—“ओहो, बहुत दिनों बाद तुमने आज बाहर डिनर के लिए कहा. हम दोनों इतने खुश हैं. खुशी में मैनें उसे पाँच सौ रुपये दे दिये, तो कौनसा बड़ा नुकसान हो गया ?”

जयशर्मा—“अरे, तुम गलत समझ रही हो. नुकसान कुछ नहीं हुआ, मगर ऐसे पैसे देने से आदत पड़ जाती हैं. अब कल को मैं खुश होकर उसे सौ–पचास रुपये दूँगा, तो वो पाँच सौ की उम्मीद करेगा. मैडम ने तो पाँच सौ रुपये दिये थे, सेठ जी सौ–पचास रुपये से ऊपर ही नहीं उठते.”

मिनी ने हँसकर कहा—“तुम भी ना. हर बात में बिजनेस करना नहीं छोड़ते. खुश होकर पैसे भी हिसाब लगाकर देते हो, फिर बोलते हो, लोग मुझे कन्जुस क्यों कहते हैं ?”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“चलो, हम कन्जुस ही सही. तुम पाँच सौ–पाँच सौ देकर तारीफ बटोरती रहो. लोग दानवीर कर्ण की जगह दानवीर मिनी बोलने लगेगे.”

मिनी ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा—“तो तुम्हें मेरी तारीफ से जलन क्यों हो रही हैं ?”

जयशर्मा—“जलन तो होगी ही. कहीं तुमने खुद की तारीफें सुनकर मुझे भाव देना बन्द कर दिया तो ?”

मिनी—“फिर तो अगली बार राज को हजार रुपये दूँगी. तुम्हें और ज्यादा जलाने के लिए.”

जयशर्मा—“हाँ, देती रहो. वसूल भी तुमसे ही करुँगा, वो भी सूत समेत.”

मिनी—“हाँ, मैं भी देखती हूँ. कैसे वसूल करते हो ?”

जयशर्मा मुस्कुराकर बोले—“अभी डिनर के बाद घर वापस आकर देख लेना. जब हमेशा की तरह तुम्हें सारी रात सोने नहीं दूँगा.”

मिनी ने मुस्कुराकर कहा—“ओह…ये तो डिनर के बाद घर आकर ही देखेगे. हमेशा की तरह कौन, किसको सोने नहीं देगा ?”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“अच्छा…ये बात हैं.”

मिनी मुस्कुराते हुए बोली—“हम्म………इसलिए तो राज को कल छुट्टी दिलवाई हैं. ताकि हम दोनों प्यार करते हुए डिस्टर्ब ना हो.”

जयशर्मा—“ओहो…ये तो मैनें सोचा ही नहीं.”

मिनी—“तुम्हीं तो हर वक्त मौका ढूंढते रहते हो. मैनें सोचा, बच्चे तो मन्डे को शाम तक आएँगे. राज को छुट्टी दे देते हैं. वो भी एक दिन घूम–फिर लेगा और मैं भी देखती हूँ, तुम कैसे बचपन का हिसाब बराबर करते हो ?”

जयशर्मा—“तुमने तो दिल की बेकरारी और ज्यादा बढ़ा दी.”

मिनी खिलखिलाकर हँसते हुए बोली—“हाँ, लेकिन अभी सामने देखकर गाड़ी चलाओ.”

जयशर्मा ने एक हाथ मिनी के हाथ पर रखकर कहा—“आई लव यू, मिनी.”

मिनी ने अपना दूसरा हाथ जयशर्मा के हाथ पर रखकर कहा—“लव यू टू, जय.”

जयशर्मा और मिनी दोनों मुस्कुराते हुए सामने देखने लगे. जयशर्मा अपना हाथ मिनी के हाथ से हटाकर वापस गाड़ी के हैंडल पर ले आए और गाड़ी चलाते हुए जयशर्मा ने एक रेस्टोरेन्ट की पार्किंग में आकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

जयशर्मा और मिनी गाड़ी से उतरकर रेस्टोंरेन्ट में आए और एक टेबल पर बैठ गए.

जयशर्मा ने कहा—“तो बताओ, क्या खाओगी ?”

मिनी—“जो तुम खिलाना चाहो. तुम डिनर पर लाए हो, इसलिए आज तुम्हारी पसन्द.”

जयशर्मा—“अच्छा, आज मेरी पसन्द ?”

मिनी—“हाँ, तुम भी क्या याद करोगे ? तुम्हें तुम्हारी पसन्द से चलने वाली घरवाली मिली हैं.”

जयशर्मा—“और हर वक्त जो तुम मुझ पर ऑर्डर चलाती हो वो ?”

मिनी हँसकर बोली—“अब प्यार में इतना अधिकार तो होता ही हैं.”

जयशर्मा ने मुस्कुराते हुए कहा—“चलो, जब बात प्यार की हैं, तो ठीक हैं.”

दो वेटर जयशर्मा और मिनी के पास ऑर्डर लेने के लिए आए.

जयशर्मा ने मिनी की पसन्द से खाने का ऑर्डर दिया.

पाँच मिनट बाद तीन वेटर खाना ले आए और टेबल पर लगा दिया.

जयशर्मा और मिनी मुस्कुराते हुए खाना खाने लगे.

जयशर्मा खाना खाते हुए रोमांटिक होकर मिनी के साथ बातें करते हुए मिनी को छेड़कर चिढ़ाने लगे. मिनी भी रोमांटिक होकर खुलकर जयशर्मा की हर बात का जवाब देने लगी.

खाना खाने के पन्द्रह मिनट बाद जयशर्मा ने मिनी की पसन्द से दो आइसक्रीम मँगाई.

आइसक्रीम खाने के बाद जयशर्मा ने वेटर को बुलाकर बिल मँगाया.

बिल देकर जयशर्मा और मिनी टेबल से उठे और रेस्टोंरेन्ट से बाहर आकर एक–दूसरे के हाथों में हाथ डाले रोड़ पर घूमते हुए रोमांस की बातें करने लगे.

रात के साढ़े दस बजे मिनी ने कहा—“अब घर चले, बहुत हो गया सड़क पर रोमांस.”

जयशर्मा—“चलते हैं, इतनी भी क्या जल्दी हैं ? देखो तो सही, आज मौसम भी कितना रोमांटिक हैं.”

मिनी—“हाँ, दिख रहा हैं. लेकिन अब आस–पास सिर्फ यंगस्टर रह गए हैं. हमारी उम्र के सब कपल अपने–अपने घर चले गए.”

जयशर्मा—“तो क्या हुआ ? जब तुम गाड़ी में बोल रही थी, तुम वापस घर आओ आज. फिर बताती हूँ, तंग करना किसको कहते हैं ? उस वक्त गाड़ी में पीछे बैठा राज यंगस्टर नहीं था क्या ?”

मिनी—“अरे, राज की बात अलग हैं. वो बहुत अच्छा और समझदार लड़का हैं. उसे पता हैं, हम पति–पत्नी हैं और वो हमारे प्यार को भी समझता हैं.”

जयशर्मा—“हम्म…और ये बाकि सब बेवकूफ हैं ?”

मिनी ने हँसकर कहा—“इतना तो मुझे नहीं पता. लेकिन राज हमारी बहुत इज्जत करता हैं. वो हमारे बारे में कुछ भी ऐसा–वैसा नहीं सोचेगा. अब इन सबका हमें क्या पता ? कौन कैसा हैं ? कौन क्या सोच रहा हैं ?”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ–हाँ, मैं सब समझता हूँ. इसलिए तो मैं राज के इलावा स्टाफ में किसी और को ज्यादा मुँह नहीं लगाता. मुझे राज के सिवा बाकि लोगों से काम के इलावा कोई दूसरी बात करते देखा हैं तुमने ?”

मिनी—“नहीं.”

जयशर्मा—“अच्छा, चलो चलते हैं. अब यहाँ सिर्फ शराब पीने वाले ही घूम रहे हैं.”

मिनी ने हँसकर कहा—“हाँ, चलिए. इसलिए तो कहा मैनें. कहीं हमें भी राज की तरह साँवरमल जी की बेटी जैसी कोई प्रेम–दीवानी या कोई प्रेम–दीवाना ना मिल जाए.”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“हाँ, चलो.”

जयशर्मा और मिनी वापस रेस्टोरेन्ट की पार्किंग की तरफ चल पड़े और गाड़ी में आकर बैठे. जयशर्मा ने गाड़ी स्टार्ट करके पार्किंग से निकाली और अपने घर की तरफ़ चल पड़े.

रात के सवा ग्यारह बजे जयशर्मा ने गाड़ी अपने घर के सामने लाकर रोककर बन्द कर दी.

जयशर्मा ने रात के समय घर की निगरानी के लिए बहादुर नाम का एक नेपाली चौकीदार रखा हुआ हैं. बहादुर रात को दस बजे आता हैं और सुबह छः बजे तक घर की पहरेदारी करता हैं.

जयशर्मा की गाड़ी रूकते ही उम्र में चालीस(40) साल का बहादुर अपनी कुर्सी से उठा और उसने घर का मुख्य दरवाजा खोला. जयशर्मा और मिनी गाड़ी से उतरकर आए. बहादुर ने उनको सल्यूट किया.

जयशर्मा—“और बहादुर, सब ठीक हैं ?”

बहादुर—“हाँ, शाब.”

जयशर्मा और मिनी अन्दर आए और जयशर्मा घर के अन्दर की लाइट का स्वीच ऑन करके ताला खोलने लगे. बहादुर ने बाहर का मुख्य गेट बन्द किया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया.

जयशर्मा घर का दरवाजा खोलकर अन्दर आए और अपने जूते निकालने लगे. मिनी दरवाजा अन्दर से बन्द करने लगी. जयशर्मा दरवाजे के पास जूते निकालकर बैडरूम में आए. जयशर्मा ने अपना कोट(ऑफ़िस में पहनने वाला) उतारकर दीवार में लगी खूँटी पर टांग दिया और अपनी जेबो से मोबाइल, पर्स वगैरह निकालकर बैड के पास रखे हुए टेबल पर रखकर बॉथरूम में चले गए.

मिनी दरवाजे के पास अपनी सैंडल निकालकर हॉल की लाइट बन्द करके बैडरूम में आई और अपना दुपट्टा निकालकर आईने के पास टांग कर बैड पर बैठ गई.

जयशर्मा बॉथरूम से बाहर आए और तौलिए से हाथ–मुँह पोंछने लगे. मिनी बैड से उठकर बॉथरूम में चली गई.

जयशर्मा हाथ–मुँह पोंछकर तौलिया रखकर बैडरूम में रखे म्यूजिक प्लेयर के पास आए और म्यूजिक प्लेयर ऑन करके गाने सलेक्ट करने लगे.

मिनी बॉथरूम से बाहर आई और तौलिया उठाकर आईने के सामने खड़ी होकर हाथ–मुँह पोंछने लगी.

जयशर्मा ने कई रोमांटिक गाने सुनकर सलेक्ट करने के बाद रोमांटिक गानों का एक नया फोल्डर बनाकर मध्यम आवाज़ में गाने चला दिये.

 
गाना शुरू होने के बाद जयशर्मा बैड पर आकर बैठ गए और बैड की तरफ पीठ करके आईने के सामने खड़ी होकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछ रही मिनी को प्यार भरी हसरत से निहारने लगे.

म्यूजिक प्लेयर में गाना बजने लगा.

चन्दन सा बदन, चंचल चितवन,

धीरे से तेरा ये मुस्काना,

मुझे दोष न देना जगवालों,

हो जाऊं अगर मैं दीवाना,

(हो जाए अगर दिल दीवाना)

ये काम कमान भंवे तेरी,

पलकों के किनारे कजरारे,

माथे पर सिंदूरी सूरज,

होंठों पे दहकते अंगारे,

साया भी जो तेरा पड़ जाए,

आबाद हो दिल का वीराना,

चन्दन सा बदन...

तन भी सुन्दर, मन भी सुन्दर,

तू सुन्दरता की मूरत हैं,

किसी और को शायद कम होगी,

मुझे तेरी बहुत जरुरत हैं,

पहले भी बहुत मैं तरसा हूँ,

(दिल तरसा हैं)

तू और ना दिल को तरसाना,

चन्दन सा बदन...

ये विशाल नयन, जैसे नील गगन,

पंछी की तरह खो जाऊ मैं,

सिरहाना जो हो तेरी बाहों का,

अंगारों पे सो जाऊं मैं,

मेरा बैरागी मन डोल गया,

देखी जो अदा तेरी मस्ताना,

चन्दन सा बदन...

मिनी ने हाथ–मुँह पोंछने के बाद तौलिया साइड में रखा और अपने हाथों से चूड़ियाँ, कानों से ईयर रिंग और गले से मंगलसुत्र निकालकर आईने के सामने रखकर अपने सर के बाल खोलते हुए मुड़कर जयशर्मा के सामने आकर खड़ी हुई. जयशर्मा ने बैड से खड़े होकर अपनी शर्ट और बनियान निकालकर बैड के कोने पर डाल दी.

मिनी और जयशर्मा एक–दूसरे की तरफ बढ़े और आमने–सामने खड़े होकर एक–दूसरे को निहारने लगे. जयशर्मा के हाथ मिनी के कंधो से होते हुए मिनी की कमर पर गए और मिनी के हाथ जयशर्मा के कंधों पर चले गए.

जयशर्मा मिनी की आँखों में देखते हुए प्यार भरी मुस्कुराहट के साथ बोले—“हाँ, तो रास्ते में क्या कह रही थी ? अब देखते हैं, कौन, किसको सोने नहीं देता ?”

मिनी जयशर्मा की नजरों से नजर मिलाकर प्यार से मुस्कुराते हुए बोली—“हाँ, बिल्कुल. आज और कल सो कर दिखाओ, तो जानू ?”

जयशर्मा बेकाबू होते हुए बोले—“इन हसींन रातों में जागकर तुमसे प्यार करने की जगह सो कैसे जाऊँ ? मैं तो तुम्हें कल दिन में भी नहीं छोड़ने वाला.”

मिनी बेसब्र होते हुए बोली—“तो मैं कौनसी तुम्हें छोड़ने वाली हूँ. शादी के चौबीस साल बाद भी तुम्हारे लिए उतनी ही दीवानी हूँ.”

जयशर्मा मदहोश होते हुए बोले—“तुम्हारे लिए मेरा पागलपन भी बिल्कुल वैसा ही हैं और हो भी क्यों ना ? भूल गई. बहुत मुश्किलों से तुम्हें पाया था.”

मिनी भावूक होकर बोली—“मुझे सब याद हैं. मैं भी बहुत तड़पी थी, तुम्हें पाने के लिए. मेरी तो सारी उम्मीद ही टूट गई थी, जब तुम किसी और के हो गए थे.”

जयशर्मा जज़्बाती होकर बोले—“मैं भी बहुत रोया था, तुम्हारे लिए. जब तुम मुझे झूठा, धोखेबाज, फरेबी, बेवफा बोलकर गई थी.”

मिनी अफ़सोस जताते हुए बोली—“एम सॉरी, जय. मुझे माफ़ कर दो. उस वक्त तुम्हारा दूर जाना, मैं सहन नहीं कर पाई. मैं टूटकर बिखर गई थी.”

जयशर्मा ने कहा—“नहीं मिनी, तुम माफ़ी मत माँगो. अगर तुम वो सब नहीं कहती, तो शायद हम कभी मिल नहीं पाते.”

मिनी—“हमारा प्यार सच्चा हैं, जय. जब प्यार में सच्चाई और गहराई हो, तो प्यार करने वालों का मिलन जरूर होता हैं.”

जयशर्मा—“सही कहा, तुमने. आखिर में हमारा मिलन भी हो ही गया.”

मिनी ने जयशर्मा के गाल पर हाथ रखकर मुस्कुराते हुए कहा—“हाँ, अब आओ. आज फिर एक–दूसरे में मिलकर प्यार में डूब जाए.”

जयशर्मा मिनी को अपने करीब लाते हुए मुस्कुराकर बोले—“हाँ आओ, एक–दूसरे में समाकर प्यार के सिवा हमारे बीच कुछ भी बाकि ना रहने दें.”

जयशर्मा और मिनी ने एक–दूसरे को अपनी तरफ खींचा और एक–दूसरे के होंठो को अपने होंठो में दबाकर एक–दूसरे से लिपटकर दोनों चुम्बनमगन होकर एक–दूसरे के होठों का रसपान करने लगे.

म्यूजिक प्लेयर में अगला गाना शुरू हो गया.

नारी—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,

तुझे चाहना, मेरा काम हैं,

तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,

तुझे चाहना, मेरा काम हैं,

तेरे प्यार मे पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—ये रात सोयी, हैं खोयी खोयी,

अरमान मेरे, हैं जागे जागे,

ये क्या मुझे हो गया…

पुरुष—जुल्फों के साए, चिलमन बनाए,

आ मैं दीवानी, इनको हटा दूँ,

देखूँ तेरा चेहरा…

नारी—दीवानगी, का जाम हैं,

तू इश्क का, इनाम हैं,

पुरुष—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—ठंडी हवाएँ, जादू जगायें,

मेरी निगाहें, हैं प्यासी प्यासी,

छाने लगा हैं नशा…

पुरुष—ये गोरी बाहें, तुझको बुलायें,

आजा मिटा दूँ, दूरी ज़रा सी,

हो न कोई फासला…

नारी—दिल का यहीं, पैगाम हैं,

तू चैन हैं, आराम हैं,

पुरुष—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम,

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

पुरुष—“जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—होटों पे बस, तेरा नाम हैं,

पुरुष—तुझे चाहना, मेरा काम हैं,

नारी–पुरुष का सम्मिलित स्वर—तेरे प्यार में पागल हूँ मैं सुभ-ओ-श्याम…

नारी—जानम आई लव यू, यू लव मी....

पुरुष—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

नारी—जानम ! आई लव यू, यू लव मी.

जयशर्मा कामात्तुर होकर एक हाथ मिनी के गाल पर रखकर मिनी के दूसरे गाल पर अपना गाल मलते हुए बोले—“आई लव यू, मिनी.”

मिनी कामात्तुर होकर एक हाथ से जयशर्मा के सर के बाल पकड़कर जयशर्मा की सांसों से सांस मिलाते हुए बोली—“लव यू टू, जय.”

मिनी और जयशर्मा एक–दूसरे को अपनी बाहों में भरकर कसते हुए दोनों आलिंगनबद्ध अवस्था में धिरे–धिरे बैड पर आ गए. दोनों के बीच प्यार भरी कुश्ती शुरू हो गई. तन के कपड़े एक–एक करके तन से अलग होकर फर्श पर गिर गए. एक–दूसरे के चुम्बन और आलिंगन से दोनों के जिस्मों में गर्माहट बढ़ने लगी. एक–दूसरे के शरीर को सहलाते हुए दोनों के मुँह से कभी सिसकियाँ और कभी आहें निकलने लगी. दोनों पर छाए चाहत के मौसम में दोनों के प्यार भरे मिलन में शरीर से शरीर टकराने की आवाज बार–बार बैडरूम में गुँजने लगी. दोनों की बढ़ी हुई धड़कनों के साथ इश्क की बिखरती खुशबू में दोनों की सांसें तेज–तेज चलने लगी. दोनों पर बरस रही मोहब्बत की मूसलाधार बरसात ने एयरकंडीशर बैडरूम में भी दोनों को पसीने से भीगो दिया.

मिनी और जयशर्मा बैडरूम के संगीतमय वातावरण में एक–दूसरे का साथ निभाते हुए एक–दूसरे को पति–पत्नी के मधुर मिलन का असीम प्रेम–आनन्द देने के लिए रुक–रुककर मिनी और जयशर्मा बार–बार एक–दूसरे में उलझकर प्यार के समुन्दर में डूबकियाँ लगाते रहें.

म्यूजिक प्लेयर में जयशर्मा के लगाए हुए रोमाटिंक गाने एक के बाद एक बजते रहे.

यार को मैनें, मुझे यार ने,

सोने ना दिया,

यार को मैनें, मुझे यार ने,

सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया, प्यार ने सोने ना दिया,

उसकी चूड़ियों की खनक उसकी,

वो बिंदिया की चमक.

उसकी चूड़ियों की खनक उसकी,

वो बिंदिया की चमक.

हाय कजरे की गजब धार ने,

सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया, प्यार ने सोने ना दिया,

यार को मैनें, मुझे यार ने,

सोने ना दिया,

उसकी अंगड़ाई ने, क्या–क्या क्यामत ढाई,

धड़कन की बढ़ी रफ्तार ने सोने ना दिया,

प्यार ही प्यार किया ओ…

प्यार ही प्यार किया ओ…

प्यार ने सोने ना दिया,

यार को मैनें, मुझे यार ने सोने ना दिया…

सारी रात जयशर्मा ने मिनी को सोने नहीं दिया और मिनी ने जयशर्मा को सोने नहीं दिया. एक–दूसरे में समाकर सारी रात मिनी और जयशर्मा ने एक–दूसरे से बेशुमार प्यार किया.

सुबह के साढ़े चार बजे एक–दूसरे से तन का भरपूर सुख पाकर एक–दूसरे को पूरी तरह संतुष्ट करके शान्त होने के बाद मिनी के ऊपर लेटे हुए जयशर्मा के पैरों में अपने पैर उलझाए मिनी जयशर्मा के आगोश में मिनी जयशर्मा को अपनी बाहों में समेटकर सीने से लगाए हुए मिनी जयशर्मा की पीठ पर हाथ डाले जयशर्मा के नीचे लेटी हुई मिनी के होंठो से लगे हुए जयशर्मा के होंठो के बीच चुम्बन चल रहा था.

म्यूजिक प्लेयर में गाना चल रहा था.

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए…

ना हो तू उदास, तेरे पास पास,

मैं रहूँगा ज़िन्दगी भर.

सारे संसार का प्यार मैने तुझी में पाया,

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए

हा तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

चंदा तुझे, ओ…ओ…ओह देखने को निकला करता हैं,

आइना भी, ओ…ओ…ओह दीदार को तरसा करता हैं

इतनी हँसीं कोई नहीं,

इतनी हँसीं कोई नहीं,

हुस्न दोनों जहाँ का एक तुझ में सिमट के आया,

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

डार्लिंग, एवरी ब्रेथ यू टेक,

एवरी मूव यू मेक,

आई विल बे देयर विथ यू,

वॉट विल आई डू विथआउट यू,

आई वेंट टू लव यू,

फोरेवर एंड एवर एंड एवर,

प्यार कभी, हो…हो…हो मरता नहीं, हम तुम मरते हैं,

होते हैं वो, हो…हो…हो लोग अमर प्यार जो करते हैं,

जितनी अदा, उतनी वफ़ा…

एक नज़र प्यार से देख लो फिर से जिंदा कर दो,

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

हा तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

ना हो तू उदास, तेरे पास पास

मैं रहूँगी ज़िन्दगी भर.

ना हो तू उदास, तेरे पास पास मैं रहूँगा ज़िन्दगी भर.

सारे संसार का प्यार मैनें तुझी में पाया,

तुम मिले, दिल खिले,

और जीने को क्या चाहिए,

मिनी के होंठ जयशर्मा के होंठ से अलग हुए.

 
जयशर्मा मिनी के गाल पर अपना गाल रखकर संतुष्टीपूर्ण ठंडी आह भरते हुए बोले—“तुमसे प्यार करके मेरी आत्मा तृप्त हो जाती हैं. मिनी, आई लव यू.”

मिनी अपना एक हाथ जयशर्मा के सर पर ले जाकर जयशर्मा के बालो में ऊँगलियाँ फिराते हुए सुकून भरी आवाज़ में बोली—“लव यू टू, जय. मेरी आत्मा तो सिर्फ तुमसे प्यार करके ही तृप्त होती हैं.”

मिनी और जयशर्मा मुस्कुराते हुए एक–दूसरे का चेहरा निहारने लगे. दोनों के प्यारभरे अनुपम मिलन के बाद दोनों के चेहरों पर पहले से भी ज्यादा अदभूत रौनक आ गई. एक–दूसरे को प्यार करके असीम प्रेम–सुख अनुभव करते हुए दोनों के चेहरों का तेज अद्वितीय हो गया.

मिनी जयशर्मा के चेहरे को निहारती हुई मुस्कुराकर जयशर्मा के माथे को चूमकर मुस्कुराई. जयशर्मा ने मुस्कुराकर अपने होंठ मिनी के होंठ से लगा दिये. मिनी और जयशर्मा एक–दूसरे से लिपटे हुए करवट बदलकर आमने–सामने होकर बराबर में लेटे और एक–दूसरे में समाकर सो गए.

सुबह के साढ़े पाँच बजे रविवार का सूरज निकल आया.

राज रोज सुबह सात बजे से आठ बजे के बीच उठता हैं. लेकिन आज सुबह छः बजे जागकर भी, ऑफ़िस नहीं जाना था, इसलिए सुबह के नौ बजे तक बिस्तर में ही लेटा हुआ था. राज को बार–बार डॉली याद आ रही थी.

सुबह के नौ बजे राज बिस्तर से निकला और नहा–धोकर तैयार होने के बाद छोटे आईने(दस–बारह इंच वाला) के सामने खड़ा होकर बाल बाते हुए सोचने लगा कि ऑफ़िस से तो मैडम ने आज की छुट्टी दिलवा दी. पाँच सौ रुपये देकर नुकसान भी नहीं होने दिया. अब घूमने–फिरने कहाँ जाए ? हम्म………(मुस्कुराकर) डॉली से मिलकर आते, लेकिन नम्बर तो लिया नहीं. लेकिन चल घर तो पता ही हैं. उसके घर के पास चलते हैं. घर से अन्दर–बाहर आते–जाते मिल जाएगी.

राज ने बाल बा कर कंगा रखकर जूते पहने और फ्लेट से बाहर आकर फ्लेट लॉक करके सीढ़िया उतरते हुए नीचे आकर बिल्डिंग लॉक करके पैदल चलते हुए बस स्टॉप पर आया. कुछ देर बाद बस आकर रूकी. राज बस में चढ़ गया और बस चल पड़ी.

डॉली सुबह के दस बजे अपने घर की छत पर खड़ी राज के साथ हुई दोनों मुलाकात याद करके सोच रही थी कि ये लड़का मुझे क्यों इतना याद आ रहा हैं ? जिससे प्यार किया, उसने दिल बहलाकर छोड़ दिया. दूसरे फ्रैंड मुझसे मिलना तो दूर बात तक नहीं करते. ये लड़का ठीक ही तो कह रहा था, प्यार के नाम पर महामुर्ख ही तो बनी हूँ मैं. रंगीला एक साल तक मुझसे खेलता रहा और मैं खुशी–खुशी उसे खेलने दे रही थी. उस रात भी मैं उसे शादी के लिए मनाने गई थी. उसके साथ बैठकर ड्रिंक कर रही थी. रंगीला ने मेरी ड्रिंक में कुछ मिलाया, जिससे मैं अपने होश खोकर एक बार फिर उसकी हवस की भूख मिटाने लगी. अपनी भूख मिटाकर रंगीला जाने लगा, मैं उसके पीछे–पीछे गई. रंगीला ने मुझे गाड़ी में बिठा लिया. गाड़ी में मैनें शादी की बात की. फिर हमारा झगड़ा शुरू हुआ. प्रिंस रोड़ पर गाड़ी रोककर रंगीला मुझे गाड़ी से उतारकर पीटने लगा. मैं भी उसे मारने लगी. फिर उसके दोस्त बीच में आ गए और वो तीनों मेरी पिटाई करने के बाद मुझे वहीं सड़क पर छोड़कर चले गए. फिर वहाँ राज आ गया और मैं नशे में पागल राज को रंगीला समझ बैठी. कहाँ वो हवस का भूखा जानवर रंगीला और कहाँ ये सीधा–साधा राज. बेचारे को उस रात मैनें कितना परेशान किया, मुझे ठीक से कुछ याद भी नहीं हैं…………………………आज संडे हैं, राज घर पर ही होगा. उससे मिलकर आती हूँ. लेकिन वो क्या सोचेगा ? ये शराबी और बिगड़ैल लड़की मुझसे मिलने क्यों आई हैं ? कहीं अब मुझे फँसाने तो नहीं आई ? सोचने दें, अब तू जैसी हैं, वैसा ही तो सोचेगा. और फिर मैं कौनसा उसे बॉयफ्रैंड बनाने जा रही हूँ. कुछ देर बाद वापस आ जाऊँगी. सारा दिन गाड़ी में अकैली पड़ी रहती हूँ. इस बहाने कुछ देर किसी का साथ मिल जाएगा.

डॉली छत से नीचे आई और सीढिया उतरते हुए घर से बाहर आकर गाड़ी लेकर निकल गई.

डॉली गाड़ी चलाते हुए गाड़ी राज की बिल्डिंग के सामने लेकर आई और रोककर बन्द कर दी. डॉली गाड़ी से उतरकर बिल्डिंग की तरफ आई और उसकी नजर गेट पर लगे ताले पर पड़ी.

डॉली ने खुद से कहा—“ओह नो ! यार, तेरी किस्मत ही खराब हैं. आज संडे के दिन ये कहाँ गया होगा ?”

इधर–उधर देखते हुए डॉली की नजर बिल्डिंग से कुछ दूर नारायण की दुकान(प्रचून या किरयाना की दुकान) पर पड़ी.

डॉली ने मन में कहा कि वहाँ पूछकर देखती हूँ.

डॉली ने गाड़ी में बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके आगे बढ़ाई और नारायण की दुकान के सामने रोककर दुकान में कुर्सी पर बैठकर टीवी देख रहे उम्र में तीस(30) साल के नारायण से पूछा—“भईया, उस बिल्डिंग में एक राज नाम का लड़का रहता हैं. वो कहाँ गया हैं ?”

नारायण ने कुर्सी से खड़े होकर कहा—“वो जहाँ काम करता हैं, वहाँ मिलेगा. संडे को छुट्टी नी(नहीं) करता वो.”

डॉली ने मन में सोचा कि उसने बताया था, वो रात को दस–ग्यारह बजे तक ऑवर–टाइम करता हैं.

डॉली नारायण से बोली—“वो आज भी देर से आएगा या जल्दी आ जाएगा ?”

नारायण—“ये तो पता नहीं. मेरे पास तो जब भी आता हैं, सुबह–सुबह आता हैं. नौ बजे से पहले–पहले. महिने में कभी–कभार ऐसा होता हैं, जब वो रात को आकर कुछ देर बैठता हैं.”

डॉली—“ओके, थैक्यू भईया.”

नारायण—“कोई जरूरी काम हैं, तो उसके ऑफ़िस चले जाओ. नई(नहीं) तो फोन कर लो.”

डॉली—“नहीं, कोई जरूरी काम नहीं हैं. थैक्यू.”

डॉली गाड़ी चलाकर आगे चली गई और नारायण वापस अपनी कुर्सी पर बैठकर टीवी देखने लगा.

राज दोपहर के एक बजे तक सेठ साँवरमल बागड़ी के घर के आस–पास घूमता रहा, लेकिन डॉली नजर नहीं आई. आखिरकार राज उसी बस स्टॉप पर आकर बैठ गया, जहाँ मंगलवार की शाम डॉली गाड़ी लेकर आई थी.

राज मन में सोचने लगा कि उसका नम्बर माँग लेता तो अच्छा होता. बात तो बहुत अच्छी तरह कर रही थी. शायद नम्बर के लिए इन्कार नहीं करती. लेकिन अब क्या कर सकते हैं ?

राज का डॉली से मिले बिना वापस जाने का मन नहीं कर रहा था. थोड़ी देर और देखता हूँ–थोड़ी देर और देखता हूँ, करते–करते शाम के पाँच बजे तक राज कभी डॉली के घर की तरफ चक्कर लगाता, कभी बस स्टॉप पर आकर बैठ जाता. लेकिन डॉली कहीं नहीं दिखी.

आखिर में राज ने सोचा कि किसी से पूछकर देखता हूँ.

राज सेठ साँवरमल बागड़ी के घर से थोड़ी दूर एक दुकान पर गया. उम्र में लगभग चालीस–बयालिस(40–42) साल का दुकानदार दुकान के बाहर कुर्सी पर बैठा था.

राज ने दुकानदार को एक पाँच रुपये का सिक्का देते हुए कहा—“पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम देना.”

दुकानदार ने पाँच रुपये लेकर अपनी जेब में डालते हुए कहा—“ले लो, उसमें से.”

राज ने पाँच सेन्टर फ्रैश च्यूंगम निकालकर चार पेन्ट की जेब में डाल ली और एक का रेपर निकालकर मुँह में रख ली.

दुकानवाला कुर्सी पर बैठा–बैठा बड़बड़ा रहा था—“आजकल तो किसी पर विश्वास करना ही महापाप हैं.”

राज ने खड़े–खड़े च्यूंगम चबाते हुए कहा—“ऐसा क्या हो गया ?”

दुकानदार—“कुछ नहीं, यहाँ पास में डेढ़ साल पहले एक आदमी रहने के लिए आया. शुरू–शुरू में एक–दो महिने तक नगद सामान लेता था. एक बार उसने एक सौ दस रुपये का सामान लेने के बाद कहा, दस का सामान कम कर दो. मेरे पास सौ ही रुपये हैं. मैनें कहा, कोई बात नहीं, दस रुपये बाद में दे देना. फिर धिरे–धिरे दस–बीस रुपये से उधार का सिलसिला शुरू हुआ, जो सौ–पचास रुपये से होते हुए हजार–पाँच सौ तक पहुँच गया. वो आदमी पहले वाली उधार के पैसे दे जाता और नई उधार के पैसे लिखवा जाता. उसका व्यवहार बहुत अच्छा था, इसलिए मैं भी खुशी–खुशी उसको उधार दे रहा था. अब छः महिने पहले उस पर आठ हजार की उधार हो गई. पिछले चार महिने से मुँह ही नहीं दिखाता. मैं पैसे माँगने उसके घर जाता हूँ, तो गालियाँ निकालते हैं, मारपीट करने पर उतर आते हैं.”

राज—“धोखेबाजों का तो यहीं काम हैं. पहले अच्छा व्यवहार करके विश्वास जीतते हैं. विश्वास जीतकर अपना मतलब(स्वार्थ) पूरा करते हैं. मतलब पूरा होने के बाद अपना असली रंग दिखाते हैं.”

दुकानदार—“हाँ, इस तरीके से लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए, जो अब वापस नहीं आएँगें. कोई लड़ाई–झगड़े करने वाले तो अपने पैसे निकलवा लेते हैं. लेकिन हम अब दुकानदार आदमी. दुकानदारी करें या लड़ाई–झगड़े करें ?”

राज कुछ देर तक दुकानदार के साथ इधर–उधर की बातें करते हुए दुकानदार की बातें सुनता रहा. फिर अपने मतलब पर आकर पहले सेठ साँवरमल बागड़ी और फिर सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी डॉली के बारे में बात करने लगा.

दुकानदार ने बताया—“साँवरमल जी तो बहुत अच्छे आदमी हैं और उनकी पत्नी भी बहुत भली लुगाई(नारी, महिला या औरत) हैं. लेकिन बेटी तो उफ्फ………एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल. सारी–सारी रात घर से बाहर घूमती फिरती हैं. एक लड़के के साथ उसका चक्कर भी चल रहा था. उसके माँ–बाप ने बहुत बार गली में सबके सामने उसको थप्पड़ मारे हैं. लेकिन उस लड़की पर तो थोड़ा सा भी असर नहीं होता. बहुत ही अड़ियल, जिद्दी और बेकार लड़की हैं. वो तो गई इनके हाथ से. बाकि मैं किसी की बुराई नहीं करता.”

राज ने डॉली के बारे में दुकानदार की बात सुनकर कहा—“अच्छा, जी. अब घर को चलते हैं.”

राज वापस बस स्टॉप पर आकर बस स्टॉप की कुर्सी पर बैठकर मन में कहने लगा कि छोड़ यार, तू भी कहाँ एक बेवड़ी को तलाश करने आ गया. ये तो बहुत ही खराब लड़की निकली. चल घर चलते हैं. सारा दिन खराब हो गया इसके चक्कर में.

कुछ देर बाद बस आकर बस स्टॉप पर रूकी. राज बस में चढ़ गया और बस चल पड़ी.

शाम के आठ बजे राज बिल्डिंग से निकलकर नारायण की दुकान पर आया.

राज को देखते ही नारायण बोला—“किया भाई, तू भी लाग ग्यो छोरियाँ ग चक्करा म ?” (हिन्दी अनुवाद : क्या भाई, तू भी पड़ गया लड़कियों के चक्कर में ?)

राज हैरान होकर मन में सोचने लगा कि इसको कैसे पता चल गया ? आज मैं लड़की के चक्कर में घूम रहा था. मैनें तो उस बेवड़ी के घर की तरफ जाने का सोचा भी आज सुबह ही था.

राज—“किसी छोरी ? भायजी.” (हिन्दी अनुवाद : कौनसी लड़की ? भाई जी.)

नारायण—“ओई तो म तन पूछू हूँ.” (हिन्दी अनुवाद : यहीं तो मैं तुमसे पूछ रहा हूँ.)

राज—“बात थे काडया हो और पूछो मनै हो ?”(हिन्दी अनुवाद : बात आपने निकाली हैं और पूछ मुझे रहे हो ?)

नारायण ने हँसकर कहा—“तेरी सकल गो रंग तो ईया उडयो हैं, जाणा सच्ची म कोई छोरी गो चक्कर हैं.” (हिन्दी अनुवाद : तुम्हारे चेहरे का रंग तो ऐसे उड़ा हैं, जैसे सच में किसी लड़की का चक्कर हैं.)

राज—“मेरो थाने पतो कोनी के ? हौळी–दयाळी हर कोई तीज–त्यौहार ग इलावा मेरो सेठ खुद आप छुट्टी दयोवे जद तो म छुट्टी करूँ. मेर खन आ फालतू कामा वास्ते टैम खठे हैं ?” (हिन्दी अनुवाद : मेरे बारे में आपको पता नहीं क्या ? हौली–दिवाली और कोई तीज–त्यौहार के इलावा मेरे बॉस खुद मुझे छुट्टी देते हैं, तब तो मैं छुट्टी करता हूँ. मेरे पास इन फालतू कामों के लिए टाइम कहाँ हैं ?)

नारायण—“अरे, मन सब ठा हैं. म तो मजाक करो हो. आज सवेरे एक छोरी आई ही, गाडी लेर. बा तेरो बूझी ही. जद म तन पूछू.”(हिन्दी अनुवाद : अरे, मुझे सब पता हैं. मैं तो मजाक कर रहा था. आज सुबह एक लड़की आई थी, गाड़ी लेकर. वो तुम्हारे बारे में पूछ रही थी. इसलिए मैनें तुमसे पूछा.)

राज—“छोरी ! नाम कोनी बतायो के ?”(हिन्दी अनुवाद : लड़की ! नाम नहीं बताया क्या ?)

नारायण—“ना, नाम तो कोनी बतायो.”(हिन्दी अनुवाद : नहीं, नाम तो नहीं बताया.)

राज—“दिखणा म किसी क ही ?”(हिन्दी अनुवाद : दिखने में कैसी थी ?)

नारायण—“दिखणा म तो हाई–फाई छोरी ही. चश्मो पेर राख्यो हो. गौरी भी भोत ही.”(हिन्दी अनुवाद : दिखने में तो हाई–फाई लड़की थी. चश्मा पहन रखा था. गौरी भी बहुत थी.)

राज—“समझ ग्यो. बा थाने बताई ही नी. एक बार रात न दारू पीर छोरा सागे लड़े ही. बे तीन छोरा बिन कूट अर भाग ग्या. बा होणी.”(हिन्दी अनुवाद : समझ गया. वो आपको बताया था ना. एक बार रात को शराब पीकर लड़के के साथ लड़ रही थी. वो तीन लड़के उसकी पिटाई करके भाग गए. वो होगी.)

नारायण—“अच्छया, तो अाज के लेण आई ही ?”(हिन्दी अनुवाद : अच्छा, तो आज क्या लेने आई थी ?)

राज—“के बेरो अब ? मिलसी, जद पूछा गा. फेर थाने भी बता द्या गा. अबार तो थोड़ी पेट–पूजा कर ल्या. आज सवेरे गी रोटी कोनी खाएड़ी.”(हिन्दी अनुवाद : क्या मालूम अब ? मिलेगी, जब पूछेगें. फिर आपको भी बता देगे. अभी तो थोड़ी पेट–पूजा कर ले. आज सुबह से खाना नहीं खाया.)

नारायण—“तो रोटी मेर खन खा ले आज.”(हिन्दी अनुवाद : तो खाना मेरे पास खाले आज.)

राज—“नई–नई, थे पाईया भुजिया दे द्यो. आपणे इत्तो भोत हैं.(हिन्दी अनुवाद : नहीं–नहीं, आप तो दो सौ पचास ग्राम भुजिया दे दो. अपने को इतना बहुत हैं.)

नारायण—“भुजिया उ पेट भरे हैं के ? चाल आजा, रोटी मणन लाग री हैं.”(हिन्दी अनुवाद : भुजिये से पेट भरता हैं क्या ? चल आजा, खाना बन रहा हैं.)

राज—“ठीक हैं, फेर म बिल्डिंग ग ताळो लगायाउ.”(हिन्दी अनुवाद : ठीक हैं, फिर मैं बिल्डिंग को ताला लगाकर आता हूँ.)

राज बिल्डिंग के गेट पर ताला लगाने बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा.

राज नारायण के घर खाना खाने के बाद नारायण की दुकान के बाहर बैठा नारायण के साथ बातें करता रहा.

रात के साढ़े दस बजे राज ने खड़े होते हुए कहा—“अच्छा, भाई. अब सोवा.”

नारायण—“हाँ, ठीक हैं.”

 
राज अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और नारायण कुर्सियाँ उठाकर दुकान में रखने के बाद दुकान बन्द करके घर के अन्दर चला गया.

राज रात को बैड पर लेटा सोचने लगा कि ये डॉली आज क्यों आई थी ? मैं सारा दिन उसके घर के आस–पास घूमता रहा और वो यहाँ आ गई. लेकिन वो नशेड़ी और अय्याश हैं. हाँ, अगर वो नशे से दूर होती और उसने बॉयफ्रैंड ना बनाया होता. छोड़ यार, तब भी तू क्या कर लेता ? वो सेठ साँवरमल बागड़ी जी की बेटी हैं. उसके सपने मत देख. सोजा चुपचाप.

राज ने करवट बदली और सो गया.

अगले दिन दस अप्रेल, सोमवार को सुबह सवा सात बजे उठने के बाद राज ने नहाकर तैयार होकर सुबह नौ बजे फ्लेट से बाहर आकर फ्लेट को ताला लगाया और बिल्डिंग के सभी खिड़कियाँ–दरवाजे चैक करते हुए सीढ़िया उतरकर नीचे आया. बिल्डिंग का दरवाजा लॉक करके ताला लगाकर चाबी जेब में डालकर ऑफ़िस जाने के लिए रोज की तरह पैदल चल पड़ा.

राज आम्रपाली सर्किल तक आया तो देखा कि डॉली चश्मा पहने अपनी गाड़ी में ड्राईविंग सीट पर बैठी राज की तरफ देखकर मुस्करा रही हैं.

राज डॉली के पास आकर बोला—“आप यहाँ ?”

डॉली—“मैं तुम्हारा ही इंतजार कर रही थी. मैं कल भी आई थी, लेकिन तुम्हारी बिल्डिंग के पास वो दुकानवाले ने बताया, तुम संडे को भी ऑफ़िस जाते हो और सुबह नौ बजे से पहले–पहले चले जाते हो. इसलिए आज मैं पौने नौ बजे ही यहाँ आ गई.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“लेकिन क्यों ?”

डॉली—“पता नहीं, बस तुमसे मिलने का मन था.”

राज—“लेकिन अभी तो मैं ऑफ़िस जा रहा हूँ और सेठ जी ने जल्दी भेज दिया तो ठीक हैं. वरना रात को दस–ग्यारह बजे बाद ही आऊँगा.”

डॉली—“हाँ, तो कोई बात नहीं. गाड़ी में बैठ जाओ. मैं तुम्हें ऑफ़िस छोड़ दूँगी. इस बहाने थोड़ी देर तुमसे बात हो जाएगी.”

राज—“ये भी सही हैं. चलो.”

राज दूसरी साइड आया और गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठ गया. डॉली ने गाड़ी स्टार्ट की और राज के ऑफ़िस की तरफ चल पड़ी.

डॉली ड्राईविंग करते हुए बोली—“अब बताओ, उस रात मैनें क्या किया था, जिसके कारण तुमने मुझे चांटे मारे ?”

राज मुस्कुराकर बोला—“तो आप ये जानने के लिए कल आयी थी और आज पौने नौ बजे से इंतजार कर रही हैं ?”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“ऐसा ही समझ लो.”

राज—“चलिए, फिर बता ही देता हूँ. आप मुझे अपना बॉयफ्रैंड समझकर गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालते हुए मुझ पर हाथ–पैर चला रही थी. मैनें आपको समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन आप मेरी बात सुन ही नहीं रही थी. इसलिए आपसे बचने का मुझे यही रास्ता नजर आया.”

डॉली—“ओह…सच में बहुत बेकार हूँ मैं. बहुत अच्छा किया तुमने मुझे चांटे मारकर. मैं इसी लायक हूँ.”

राज—“आप बेकार तो नहीं लगती. हाँ, आपके अन्दर गलत आदते बहुत हैं. आप इन गलत आदतों को छोड़कर अपनी अच्छी बातों पर ध्यान दीजिए.”

डॉली—“मेरे अन्दर अच्छी बातें कौनसी नजर आई तुम्हें ?”

राज—“अभी तक नजर तो नहीं आई. लेकिन हर इन्सान में कुछ ना कुछ बुरी बातें और कुछ ना कुछ अच्छी बातें जरूर होती हैं.”

डॉली—“लेकिन मेरे अन्दर तो सिर्फ बुरी बातें ही हैं. अच्छी बात कुछ भी नहीं.”

राज—“एक अच्छी बात तो मैं बता देता हूँ. आप जब नशे में नहीं होती, तब बहुत अच्छी तरह बात करती हैं.”

डॉली मुस्कुराकर बोली—“अच्छा, फिर तो ये इत्तेफ़ाक अच्छा हुआ. जब पिछले हफ्ते मैं तुमसे मिली, तब मेरे पास शराब खतम हो गई थी और आज भी खतम हो गई. वरना सुबह उठते ही सबसे पहले दो घूट शराब गले में उतारती हूँ.”

राज—“ये भी सही हैं. हर किसी का जिन्दगी जीने का अपना ढंग होता हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“तुम तो शायद नहीं पीते होगे ?”

राज—“नहीं, मैं नशे और नशे करने वालों को बिल्कुल पसन्द नहीं करता.”

डॉली—“हम्म…फिर तुम्हें मुझपर गुस्सा नहीं आया, सुबह–सुबह एक शराबी लड़की को अपने रास्ते में खड़ी देखकर ?”

राज—“पसन्द नहीं करना और गुस्सा आना. इन दोनों में फर्क होता हैं. मेरे सेठ जी और मैडम को भी सभी तरह नशा और नशा करने वाले बिल्कुल पसन्द नहीं हैं, लेकिन अभी हमारे ऑफ़िस में मेरे इलावा आठ(8) लोग हैं, दो शादीशुदा और दो कुँवारी, चार लेडिज और तीन शादीशुदा और एक कुँवारा आदमी. उनमें से एक लड़की और तीन आदमी शराब पीते हैं. जो शादीशुदा आदमी शराब नहीं पीता, वो भी गुटखा, सिगरेट इन सबका नशा करता हैं. फिर भी मेरे बॉस ने उनको नौकरी पर रख रखा हैं. हाँ, ये वॉर्निंग(चैतावनी) जरूर दे रखी हैं, कि किसी भी तरह का नशा करके कोई भी घर(ऑफ़िस घर के अन्दर ही नीचे बेसमेंट में हैं) के अन्दर नहीं आएगा. अब आपकी तरह बहुत सारे लोग नशा करते हैं. किसी के कहने से कोई नहीं छोड़ता. फिर आपने मेरा क्या बिगाड़ा हैं, जो आप पर गुस्सा करूँ ? उल्टा आप तो मुझे ऑफ़िस छोड़ रहे हो, वरना रोज की तरह पैदल ही जाता.”

डॉली ने ड्राईविंग करते हुए हैरान होकर कहा—“इतनी दूर तुम रोज पैदल जाते हो ? मुझे तो कोई दस–पन्द्रह मिनट चलने के लिए कहे, तो ये सुनकर ही मेरे पैरों में दर्द होने लगता हैं.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“अपनी–अपनी जिन्दगी हैं. सबकी जिन्दगी अलग–अलग होती हैं.”

डॉली—“हम्म…ये तो हैं.”

राज के साथ बातें करते हुए डॉली गाड़ी चित्रकूट ले आई.

राज ने चित्रकूट आते ही कहा—“वहाँ गाड़ी रोक देना.”

डॉली ने राज की बताई जगह पर गाड़ी रोक दी.

राज ने कहा—“आज तो आप आधा घंटा जल्दी ऑफ़िस ले आयी. अभी तो साढ़े नौ ही बजे हैं.”

डॉली ने गाड़ी बन्द करके कहा—“तो अब आधे घंटे क्या करोगे ?”

राज—“आपको कहीं जाना हैं ?”

डॉली—“नहीं, मैं तो यू ही गाड़ी लेकर सारा दिन सारे शहर में घूमती रहती हूँ और मेरे बाप के पैसे उड़ाती हूँ.”

राज ने मन में सोचा कि बाप के पैसे उड़ाती हूँ. पिताजी, पापा, डेडी कुछ नहीं, सीधा बाप. लेकिन ये भी सही हैं. अपने कहने से कौनसी सुधर जाएगी ? इसके बाप के पास पैसे हैं, इसलिए उड़ाती हैं. अपने बाप के पास पैसे नहीं हैं, इसलिए उल्लू की तरह कमाते हैं.

राज ने डॉली से कहा—“चलो फिर दस बजे तक आपसे बात ही कर लेते हैं.”

राज और डॉली में दस बजे तक बातें चलती रही.

दस बजते ही राज ने कहा—“अच्छा, अब चलता हूँ. आपका बहुत–बहुत धन्यवाद. आज आप आराम से गाड़ी में ले आयी. वरना रोज तो पैदल आते हुए पौने दस और दस के बीच ही यहाँ पहुँचता हूँ.”

डॉली—“इसमें धन्यवाद की क्या बात हैं ? जहाँ सारा दिन फालतू घूमती हूँ, वहाँ थोड़ी देर आपके काम आ गई.”

राज ने मुस्कुराते हुए कहा—“ये भी सही हैं.”

राज गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी से बाहर निकला और दरवाजा बन्द करके दरवाजे की खिड़की में से बोला—“अच्छा, फिर मिलेगें.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“हाँ, जरूर. तुमसे बातें करके बहुत अच्छा लगा.”

राज—“मुझे भी आपसे बात करके बहुत अच्छा लगा. अब मैं चलता हूँ.”

डॉली—“तुम दोपहर को खाना खाने कब आते हो ?”

राज—“खाना मुझे सेठ जी खिला देते हैं.”

डॉली हैरान होकर बोली—“दोनों वक्त ?”

राज—“हाँ, सेठ जी और मैडम बहुत भले लोग हैं. सुबह चाय–नाश्ता भी यहीं आकर करता हूँ. दोपहर का खाना, फिर शाम की चाय, फिर रात का खाना सब यहीं करता हूँ. बस जिस दिन मैं ऑफ़िस नहीं आता या रात को जल्दी चला आता हूँ, सिर्फ उस दिन किसी होटल में खाना खाता हूँ. वरना सेठ जी और मैडम खाना खाए बिना आने ही नहीं देते. बाकि वहाँ बिल्डिंग में तो बस रात को सोता हूँ और सुबह तैयार होकर ऑफ़िस आ जाता हूँ.”

डॉली—“फिर तो तुम्हारे सेठ जी और मैडम बहुत अच्छे लोग हैं.”

राज—“हाँ, इनके जैसे लोग तो दुनिया में बस इक्का–दुक्का गिने–चुने ही होते हैं. सेठ जी और मैडम तो कहते हैं, हमारे घर पर ही रह लो. लेकिन मैनें सोचा, अच्छे लोगों की अच्छाई का जरूरत से ज्यादा फायदा उठाना ठीक नहीं हैं. मेरे लिए इतना करते हैं, जितना कोई किसी अपने के लिए भी नहीं करता.”

डॉली—“अच्छा, अब तुम्हें देर हो रही होगी.”

राज—“हाँ, मैं चलता हूँ.”

राज जयशर्मा के घर की तरफ चल पड़ा.

डॉली गाड़ी में बैठी राज को जाते हुए देखकर सोचने लगी कि इसके सेठ जी और मैडम इसके लिए इतना करते हैं. अगर कभी–कभी मैं भी इसे घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर छोड़ दूँ, तो इसमें क्या बुराई हैं ? वैसे भी मैं सुबह से रात तक यहाँ–वहाँ फालतू घूमती रहती हूँ. इस बहाने मेरे कुछ पाप कम हो जाएगें.

डॉली ने मुस्कुराकर अपनी गाड़ी स्टार्ट की और राज के मोड़ मुड़ने के बाद गाड़ी चलाकर आगे निकल गई.

एक महिने बाद दस मई, बुधवार को रात के पौने ग्यारह बजे डॉली ने आम्रपाली सर्किल पर आकर गाड़ी साइड में करके रोककर बन्द कर दी.

डॉली मुस्कुराते हुए राज की तरफ देखकर बोली—“लो आ गई तुम्हारी मंजिल.”

राज—“हाँ, मेरी मंजिल तो आ गई. लेकिन तुमसे एक बात पूछू ?”

डॉली—“हाँ, पूछो.”

राज—“तुमने तो कहा था, कभी–कभी तुम मुझे घर से ऑफ़िस और ऑफ़िस से घर छोड़ दोगी, तो इसमें क्या बुराई हैं ? लेकिन तुम तो पिछले एक महिने से हर रोज सुबह मुझे यहाँ से ऑफ़िस छोड़ती हो. फिर रात को जब तक मैं ना आऊँ, मेरा इंतजार करती हो और मुझे ऑफ़िस से घर छोड़ती हो. खुद अपने घर रात के बारह–एक बजे बाद पहुँचती हो. तुम ये सब क्यों करती हो ? आखिर मिलेगा क्या तुम्हें ?”

डॉली हँसकर बोली—“पता नहीं. सुबह उठते ही दो घूट लगाकर गाड़ी लेकर निकल जाती हूँ. दिन में अगर नींद आती हैं, तो कहीं गाड़ी पार्क करके गाड़ी में ही सो लेती हूँ. कोई बात करने वाला या कोई मिलने वाला तो हैं नहीं. एक रंगीला था, मतलब पूरा होने के बाद वो भी अपने रास्ते निकल गया. इसलिए सुबह–शाम कुछ वक्त तुम्हारे साथ बिता लेती हूँ.”

राज—“लेकिन तुम्हारे और फ्रैंड्स नहीं हैं ? धोखा तो सिर्फ बॉयफ्रैंड ने ही दिया हैं, बाकि फ्रैंड्स कहाँ गए ?”

डॉली—“बाकि फ्रैंड्स………बाकि फ्रैंड्स में लड़कों के बारे में तो तुम्हें भी पता ही होगा. लड़कों को लड़की की बस एक चीज में दिलचस्पी होती हैं. इसलिए किसी से बात करने या मिलने का मन ही नहीं करता. और जो थोड़े–बहुत अच्छे लड़के हैं, वो एक बिगड़ी हुई लड़की से क्यों बात करेंगे ?”

राज—“और लड़कियों के साथ दोस्ती नहीं हैं तुम्हारी ?”

डॉली—“लड़कियों से दोस्ती हैं, लेकिन वहीं बात, मैं शराब पीकर रात–रातभर घर से बाहर भटकती हूँ. कुछ लड़कियों को मुझसे हमदर्दी हैं, लेकिन उन लड़कियों के घरवाले उन लड़कियों को कहते हैं, ये डॉली बेकार लड़की हैं. इसके साथ रहोगी तो तुम भी इसकी तरह बिगड़ जाओगी. इसलिए इससे दूर रहो.”

राज ने मन में सोचा कि अब तुमसे क्या कहूँ ? बात तो सबकी ठीक ही हैं. तुम्हें सुधरने के लिए कहूँगा, तो तुम तो सुधरोगी नहीं.

राज को सोच में खोया देखकर डॉली ने कहा—“क्या हुआ ? तुम ये बार–बार सोच में क्यों डूब जाते हो ? कुछ कहना हो, तो बोल दिया करो. जैसे मैं बोलती हूँ. अगर तुम्हें भी मुझसे मिलना अच्छा नहीं लगता, तो मैं कल से नहीं आऊँगी.”

राज—“नहीं–नहीं, ऐसी कोई बात नहीं हैं.”

डॉली—“फिर क्या सोच रहे हो ?”

राज—“मैं सोच रहा था, तुम ये शराब पीना छोड़ क्यों नहीं देती ? आखिर इससे तुम्हें कोई फायदा तो मिल नहीं रहा. हेल्थ को तो नुकसान हो ही रहा हैं, उस पर तुम बहुत अच्छी लड़की होकर भी सिर्फ इस शराब के कारण बदनाम हो.”

डॉली—“अरे, क्या अच्छी लड़की यार. जब शराब नहीं पीती थी, तब कौनसी मेरी तारीफ होती थी ? कोई गलती ना होते हुए भी मुझे बातें सुननी पड़ती थी. बिना गलती के मेरी पिटाई होती थी. अब कम से कम इस बात का सुकून हैं. मैं गलत हूँ, इसलिए बदनाम हूँ.”

राज—“बिना गलती मतलब ?”

डॉली—“बिना गलती मतलब. जब मैं स्कूल में थी, तो एक बार मेरी क्लास में एक लड़का–लड़की आपस में बातें कर रहे थे. तभी टीचर ने पूछा, ये कौन बोल रहा हैं क्लास में ? तो सबने मुझसे बदला लेने के लिए मेरा नाम लगा दिया. टीचर ने मुझे बुलाकर आठ–दस थप्पड़ मारे. मैनें टीचर से कहा, मैम, मैं बेकसूर हूँ. आपने मुझे बिना गलती के मारा हैं. तो टीचर चिढ़ गई. वो मुझे पकड़कर प्रिंसिपल सर के पास ले गई और बोली, मैनें उनको गाली निकाली हैं. क्लास के सब स्टूडेंटस ने भी मुझे सजा दिलाने के लिए टीचर की हाँ में हाँ मिला दी. फिर प्रिंसिपल सर ने मेरे मॉम–डेड को बुलाया और घर आने के बाद मॉम–डेड ने मेरी धुलाई कर दी. ऐसा मेरे साथ एक–दो बार नहीं, बहुत बार हुआ.”

राज—“लेकिन सब के सब तुमसे बदला किस बात का ले रहे थे ?”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“वो मैं बचपन में बहुत शरारती थी. अलग–अलग तरीके से सबको बहुत परेशान करती थी. अब यू तो मैं किसी के ताबे(काबू में) आई नहीं, तो वो लोग बिना गलती के झूठी शिकायतें करके मुझसे बदला लेते थे.”

राज—“कमाल हैं. चलो वो सब तो तुम्हारी तरह बच्चे थे, लेकिन टीचर को तो अक्ल होनी चाहिए. सजा देने से पहले ये तो देखना था, गलती की भी हैं या नहीं ?”

डॉली—“अरे, इतना कौन सोचता हैं यार ? जब मॉम–डेड ही नहीं समझते, तो दूसरों से क्या शिकायत ?”

राज—“हम्म………कभी–कभी माँ–बाप भी गलती कर देते हैं. उनको पहले तुम्हारी बात सुननी चाहिए थी.”

डॉली—“गलती नहीं, मेरे मॉम–डेड की तो आदत हैं, मुझे पीटना. जब मैं कॉलेज में थी, तो कॉलेज में एक लड़की के साथ मेरा झगड़ा हुआ. जब मेरे सामने उस लड़की की दाल नहीं गली. तो उसने अपने फ्रैंड्स के साथ मिलकर मेरे मॉम–डेड के सामने ये बात फैला दी, मेरा किसी लड़के के साथ चक्कर चल रहा हैं. मैनें मेरे मॉम–डेड को बहुत समझाया, लेकिन उनको तो बस मुझे पीटना था. हफ्ते तक मुझे बातें सुना–सुनाकर पीटते रहे. जबकि मेरी लाइफ़ में रंगीला के सिवा कभी कोई नहीं आया. ऐसी और भी बहुत सारी बातें हैं, क्या–क्या बताऊँ ?”

राज—“ये भी बड़ी प्रोब्लम हैं. शायद तुम्हारे मम्मी–पापा तुम्हें गलत रास्ते पर चलने से रोकने के चक्कर में जरूरत से ज्यादा सख्ती कर बैठे और उनकी इस जरूरत से ज्यादा सख्ती के कारण तुम दुःखी होकर शराब पीने लगी.”

डॉली—“अब जो भी हो. जो कुछ हैं, तुम्हें बता रही हूँ. शराब पीना मैनें कॉलेज में शुरू किया था. कॉलेज में मेरे कुछ फ्रैंड्स शराब पीते थे, उनके साथ मैं भी पीने लगी और धिरे–धिरे उन सबसे ज्यादा बिगड़ैल बन गई.”

राज—“और तुम्हारा वो बॉयफ्रैंड ?”

डॉली—“वो तीन साल पहले मिला था. मुझसे पहले उसका चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था.”

राज—“चार गर्लफ्रैंड से ब्रेकअप हो चुका था, ये जानते हुए भी तुमने उसे अपना बॉयफ्रैंड बना लिया. हद होती हैं, मुर्खता की. पहले जान–बुझकर मुर्खता की, अब हर रोज उसके लिए आँशू बहाती हो.”

डॉली—“यार…वो कहता था, लड़कियों ने उसको धोखा दिया हैं.”

राज—“उसने कहा और तुमने मान लिया. इसे महामुर्खता कहते हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“अब यार सच तो यहीं हैं. मैं महामुर्ख हूँ.”

राज—“और बॉयफ्रैंड बनाया तो बनाया, रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने की क्या जरूरत थी ?”

डॉली सर झूकाकर भावूक होते हुए बोली—“मैनें कोई एकदम से रिलेशन थोड़े ही बनाए थे. तुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे मैं रिलेशन बनाने के लिए मरे जा रही थी.”

राज—“फिर भी तुम्हें सोचना चाहिए था. उसने तुम्हें गर्लफ्रैंड बनने के लिए कहा और तुमने बिना सोचे–समझे उसे बॉयफ्रैंड बना लिया.”

डॉली—“नहीं, मैनें उसे एकदम से बॉयफ्रैंड भी नहीं बनाया. दोस्ती होने के चार–पाँच महिने बाद अब से ढ़ाई साल पहले उसने मुझे प्रपोज किया. उस वक्त मैनें मना कर दिया था, लेकिन उससे दोस्ती बनाए रखी.”

राज—“फिर दोस्त से बॉयफ्रैंड कैसे बनाया ?”

 
डॉली ने उदासी भरी आवाज़ में कहा—“वो बहुत रोता था. अपने दुःख और परेशानियों की बातें सुनाता रहता था. कहता था, मैं बहुत अकेला हूँ. मुझे कोई नहीं समझता. सब मुझसे दूर चले जाते हैं. तू भी मुझे नहीं समझती. मेरे प्यार को नहीं समझती, मेरे जज़्बात तुझे झूठ लगते हैं. ऐसी बहुत सारी बातें बोलता था. मैं खुद अपनी लाइफ़ में परेशान और दुःखी थी. उसकी बातें सुनकर, उसको दुःखी देखकर मुझे उससे हमदर्दी हो गई. मैनें सोचा, हम दोनों मिलकर एक–दूसरे का सुख–दुःख बाँट लेगें. फिर धिरे–धिरे हमदर्दी प्यार में बदल गई और मैं उसकी गर्लफ्रैंड बन गई. गर्लफ्रैंड बनने के बाद उसने कई बार मुझे रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने के लिए कहा. शुरू में हर बार मैनें मना कर दिया. लेकिन एक रात हम दोनों साथ बैठकर ड्रिंक कर रहे थे, तो हम दोनों को ज्यादा हो गई और फिर नशे में सब हो गया. कुछ दिनों तक मुझे बहुत बुरा लगा. खुद पर बहुत गुस्सा आया. फिर रंगीला ने समझाया, हमें शादी तो करनी ही हैं. अगर शादी से पहले रिलेशन बना रहे हैं, तो इसमें क्या बुराई हैं ? एक–दूसरे करीब होकर हमारे बीच के सारे फासले मिट जाते हैं. हमारा प्यार इतना कमजोर हैं क्या, जो शादी के बंधन में बधे बिना हम प्यार नहीं कर सकते ? और भी बहुत सारी बड़ी–बड़ी बातें करता था. लेकिन अब पिछले साल जब मैं उसे शादी के लिए कहने लगी, तब समझ में आया. वो सब उसका ड्रामा था, दुःखी होना, परेशान होना, दुःख–दर्द वाली बातें, ये सब वो लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए जान–बुझकर करता हैं. एक साल बाद मेरे साथ सब कुछ करने के बाद मुझे कहता हैं, जो लड़की शादी किये बिना सब कुछ करती हैं, वो सिर्फ मजे लेने के लिए होती हैं. शादी करने के लिए नहीं होती. तेरे जैसी तो रोज बहुत मिलती हैं. किस–किस से शादी करूँ ? मुझे उसकी बातें याद करके बहुत रोना आता हैं. मन करता हैं, खुद को खतम कर लूँ.”

राज ने नरम होकर कहा—“तुमने गलती तो की हैं. लेकिन तुमने उसे धोखा नहीं दिया, उसने तुम्हें धोखा दिया हैं. तुम्हारी परेशान हालत और दुःख का गलत फायदा उठाकर. फिर तुम ऐसी बातें क्यों सोचती हो ? और तुम बिगड़ैल और बेकार नहीं हो. भटक गई हो. मैनें तुम्हारे बारे में सेठ जी और मैडम को भी सब कुछ बताया हैं, वो भी यहीं कह रहे थे. तुम भटक कर गलत रास्ते पर चली गई और उस गलत लड़के ने इस बात का फायदा उठा लिया. तुम्हें खुद के बारे में सोचने–विचारने की जरूरत हैं.”

डॉली—“क्या सोचू–विचारू यार. उसके साथ रात–रात भर रूकती थी, अगले दिन मॉम–डेड से मार खाती थी. और वो बोलता हैं, तू तो इतनी मस्त लड़की हैं, तेरे बाप के पास पैसे भी बहुत हैं. तू तो किसी को भी पटा सकती हैं. फिर मेरे गले क्यों पड़ रही हैं ?”

डॉली की आँखों से आँशू निकल आए. वो गाड़ी के हैंडल पर सर रखकर फूट–फूटकर रोने लगी.

राज ने डॉली के कंधे पर हाथ रखकर कहा—“अरे, रो क्यों रही हो ? वो बहुत ही घटिया लड़का हैं और घटिया लड़के तो यहीं करते हैं.”

डॉली रोते हुए कहा—“तुम्हें नहीं पता, उसने क्या–क्या बोला मुझे ?”

राज—“अब देखो, जो हो गया हैं, तुम्हारे रोने से वो बदल नहीं जाएगा. इसलिए जो हो गया, उसे भूल जाओ. और आगे के लिए ध्यान रखो, जिसको शादी करनी होगी, वो शादी से पहले रिलेशन(शारीरिक संबंध) क्यों बनाएगा ? रिलेशन तो शादी के बाद बनते ही हैं.”

डॉली ने गाड़ी के हैंडल से सर उठाकर आँखों से आँशू टपकाते हुए कहा—“अब क्या ध्यान रखूँ ? अब उसकी बातें याद करके तो ऐसा लगता हैं, कॉलगर्ल औरतें भी मुझसे अच्छी हैं. वो पैसे के लिए मजबुरी में लोगों को मजे देती हैं. मेरी तो कोई मजबुरी नहीं थी, फिर भी एक साल तक उसकी हवस की भूख मिटाती रही.”

राज ने डॉली के कंधे से हाथ हटाकर कहा—“अरे, ये क्या सोचने लगी तुम ? तुमने जो किया, वो नासमझी थी. एक गलत फैसला. एक गलत इन्सान को पहचानने में गलती. अब आगे की जिन्दगी के बारे में सोचो. अतीत पर रोने से अतीत बदलता नहीं हैं.”

डॉली वापस गाड़ी के हैंडल पर सर रखकर रोने लगी. डॉली को बिलख–बिलखकर रोते देखकर राज की आँखों में भी नमी आ गई.

राज मन में खुद से बोलने लगा कि तू भी गधा हैं यार. बिना मतलब ये फालतू बातें पूछने लगा. तुझे पता हैं, ये रोने लग जाती हैं. फिर भी हर दूसरे–तीसरे दिन तू इसके जख्मों को कुरेदने लगता हैं. और तू क्या इस बेचारी को बार–बार मुर्ख–महामुर्ख बोलता रहता हैं. तू खुद भी तो कभी मुर्ख बना था. इसको तो उस लड़के ने अपने जाल में फँसाया हैं. लेकिन तू तो खुद चलकर आया था, मुर्ख बनने के लिए. तू बार–बार क्यों भूल जाता हैं ? कभी तू खुद भी इस लड़की की तरह रो रहा था.

राज ने डॉली का बाजू पकड़कर कहा—“प्लीज ! चुप हो जाओ. मुझे अच्छा नहीं लग रहा, तुम्हें रोते देखकर.”

डॉली रोना बन्द करके सिसकती रही, उसके आँशू रूक नहीं रहे थे.

डॉली दस मिनट बाद अपनी आँखें पोंछकर बोली—“एम सॉरी, यार. तुम्हें बहुत देर हो गई. अब तुम घर जाओ. तुम सारा दिन ऑफ़िस में काम करके थके हुए आते हो और मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“एक तरफ तो तुमने मुझे अपना दोस्त बना लिया. फिर कहती हो, मैं अपना रोना लेकर बैठ जाती हूँ. दोस्त होते किसलिए हैं ? लवर से धोखा खाए हुए दोस्तों का रोना–धोना सुनने के लिए.”

राज हँसने लगा. राज को हँसते देखकर डॉली को भी हल्की हँसी आ गई.

डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा—“अच्छा, अब तुम जाओ. बाकि रोना–धोना कल करूँगी.”

राज—“तुम ठीक हो.”

डॉली—“हाँ.”

राज—“घर चली जाओगी.”

डॉली—“हाँ, यार ! रोज जाती हूँ ना.”

राज—“अच्छा, ठीक हैं. अपना ख्याल रखना और गाड़ी ध्यान से चलाना. तेज मत चलाना.”

डॉली—“हम्म…”

राज गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरा और डॉली से कहा—“फिर मिलेगें. टेक केयर.”

डॉली—“यू टू.”

राज गाड़ी का गेट बन्द करके गाड़ी से दूर हुआ. डॉली ने गाड़ी स्टार्ट की और गाड़ी चलाकर चली गई.

राज अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा और चलते–चलते राज ने सोचा कि डॉली बहुत अपसेट होकर रोते हुए गई हैं. उस दिन मानसरोवर से आते टाइम उसने कैसे गाड़ी की स्पीड बढ़ा दी थी. पिछले हफ्ते भी वो इसी तरह रोते हुए गई थी और दूसरे दिन एक्सीडेंट करके सर में चोट खाई हुई मिली थी. कहीं वो आज फिर से कोई एक्सीडेंट ना कर ले.

राज ने अपनी जेब से अपना मोबाइल निकाला और डॉली को कॉल किया.

गाड़ी चलाती हुई डॉली को लगा कि माँ–पापा का कॉल होगा. इसलिए डॉली ने कॉल रिसींव नहीं किया.

राज ने अपनी बिल्डिंग तक आते–आते डॉली को चार बार कॉल किये, लेकिन डॉली ने रिसींव नहीं किये. जब पाँचवा कॉल आया तो डॉली ने मोबाइल उठाया और गुस्से में नम्बर देखे बिना ही मोबाइल स्वीच–ऑफ कर दिया.

राज ने छटी बार कॉल किया तो नम्बर स्वीच–ऑफ सुनकर राज टेन्शन में आ गया और मुड़कर तेज–तेज कदमों से चलता हुआ वापस आम्रपाली सर्किल तक आया.

राज सोचने लगा कि डॉली ने कॉल रिसींव क्यों नहीं किया ? कहीं कोई प्रोब्लम तो नहीं हो गई ?

कुछ देर बाद राज को ख्याल आया कि शायद मोबाइल साइलेंट हो या बैटरी खतम हो गई हो.

दस मिनट तक परेशान खड़ा रहने के बाद राज वापस अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा.

रात के एक बजे राज बिस्तर पर लेटा हुआ था, आज उसे नींद नहीं आ रही थी. थोड़ी–थोड़ी देर बाद राज डॉली को कॉल करता रहा, लेकिन डॉली का मोबाइल बन्द था. राज सारी रात डॉली के बारे में सोच–सोचकर परेशान होता रहा. सुबह के चार बजे बाद उसे नींद आई.

सुबह छः बजे उठने के बाद राज उदास मन से रोज की तरह ऑफ़िस जाने के लिए तैयार होकर बिल्डिंग लॉक करके चल पड़ा. आम्रपाली सर्किल पर आकर उसने डॉली की गाड़ी देखी, तो राज की जान में जान आई.

राज गाड़ी के पास आकर गाड़ी में बैठने के बाद नाराज होते हुए बोला—“तुमने कल रात कॉल रिसींव क्यों नहीं किया. मैं सारी रात परेशान रहा, सोया भी नहीं.”

डॉली हँसकर बोली—“ओह………वो तुम्हारा कॉल था क्या ? एम सॉ सॉरी, मुझे लगा मॉम–डेड का कॉल हैं, तो मैनें कॉल देखे बिना ही मोबाइल बन्द कर दिया था.”

राज—“अरे, कॉल किसी का भी हो. रिसींव करके जवाब तो देना चाहिए ना. अगर टाइम ना हो, तो फ्री होने के बाद भी जवाब दिया जा सकता हैं.”

डॉली—“एम सॉरी यार, आगे से ऐसा नहीं करूँगी.”

राज—“कोई बात नहीं.”

डॉली—“लेकिन तुम इतना क्यों परेशान हो गए ?”

राज—“अरे, मैं परेशान नहीं हो सकता क्या ? तुम्हारा बॉयफ्रैंड नहीं हूँ, तो क्या हुआ ? कम से कम दोस्त तो हूँ ही.”

डॉली ने मुस्कुराकर गाड़ी स्टार्ट करते हुए कहा—“अब लाइफ़ में बस एक तुम ही तो दोस्त हो.”

डॉली रोज की तरह राज के साथ बातें करते हुए गाड़ी चलाकर जयशर्मा के घर की तरफ़ ले गई.

तीन दिन बाद चौदह मई, रविवार की सुबह छः बजे नारायण की दुकान के बाहर बनी चौकी(कई दुकानदार ग्राहकों के बैठने के लिए दुकान के आगे तीन–चार लोगों के बैठने लायक जो ट्रेन की लम्बी सीट नुमा आकृति बनवाते हैं) पर बैठे राज और अंकित के सामने कुर्सी पर बैठे नारायण के बीच बातचीत चल रही थी.

अंकित ने राज से कहा—“भाई, उस लड़की को तेरे से प्यार हो गया हैं. रोज सुबह घर से ऑफ़िस छोड़कर आती हैं. फिर रात को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती हैं. बिना मतलब वो ऐसे क्यों आएगी ? वो भी एक लड़की.”

राज—“अरे, प्यार–व्यार कुछ नहीं. कोई बात करने वाला, कोई मिलने–जुलने वाला नहीं हैं उसके पास. इसलिए आ जाती हैं.”

नाराणय—“ना भाई, जद सारो दिन निकल जावे. तो ये सुबह–शाम के दो–चार घंटे काडणा(निकालना) म के दिक्कत हैं ?”

अंकित—“हाँ, वहीं तो बात हैं.”

राज—“नहीं यार… और वैसे भी मुझे उसमें बिल्कुल भी दिलचस्पी नहीं हैं. एक तो वो झान की(बहुत ज्यादा) दारू पीती हैं. दूसरा मुझे ये गर्लफ्रैंड बनकर रिलेशन बनाने वाली लड़कियाँ बिल्कुल पसन्द नहीं हैं. हाँ, रोज मिलती हैं. अपने पास आकर अपना दुखड़ा सुनाती हैं, इसलिए उससे थोड़ी हमदर्दी हो गई हैं.”

अंकित—“देख भाई, दारू तो छुड़ाई जा सकती हैं. और रही बात रिलेशन की. तो आज के टाइम में सती–सावित्री मिलना तो लगभग नामुनकिन हैं. कोई स्कूल में सैट होती हैं, कोई कॉलेज में सैट होती हैं, कोई जहाँ नौकरी करती हैं, वहाँ किसी के साथ सैट होती हैं और जो घर से बाहर नहीं आती, उसको कोई आस–पड़ौस वाला पटा लेता हैं. ये लड़के और आदमी चील और गिद्ध की तरह नजर रखते हैं, लड़कियों और औरतों पर. मौका मिलते ही, झपटकर दबोच लेते हैं. किसी को प्यार के नाम पर, किसी को कोई लालच देकर, किसी की मजबुरी का फायदा उठाकर और जो गुंडे–मवाली या ताकतवर लोग हैं, वो जबरदस्ती उठाकर ले जाते हैं.”
 
राज—“ये जबरदस्ती और मजबुरी वाले मामलों में लड़कियों और औरतों की गलती नहीं हैं. लेकिन बाकि सब में तो देख, अगर मैं लालची हूँ, तो गलत लोग मेरे लालची होने का फायदा जरूर उठाएँगें. अगर मैं प्यार के नाम पर मुर्ख बनने वाला हूँ, तो गलत लोग मेरी मुर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें.”

नारायण ने राज से पूछा—“मतलब, आ छोरी मुर्ख हैं ?”

राज—“मुर्ख ही हैं, और क्या हैं ?”

अंकित ने राज से पूछा—“फिर तू उसके लिए परेशान क्यों हो रहा हैं ?”

राज—“बता तो दिया, उसको रोते देखकर अच्छा नहीं लगता.”

नारायण ने राज से कहा—“तो के(कह) दे, मत आया कर यहाँ गाड़ी लेकर. ना वो आवेगी, ना तू उसको रोता देखेगा.”

राज ने मुस्कुराते हुए कहा—“अरे यार, ऐसे अच्छा नहीं लगता. बेचारी रोज आती हैं, मुझे ऑफ़िस छोड़कर आती हैं, घर लेकर आती हैं. अब अचानक कहूँगा, मत आया कर. तो पहले से दुःखी हैं, और ज्यादा दुःखी हो जाएँगी.”

अंकित ने राज से कहा—“ओ रेन(रहने) दे, भाई. तुझे खुद उसकी गाड़ी में आने–जाने की आदत हो गई हैं.”

नारायण ने अंकित का साथ देते हुए कहा—“और उसके साथ बातें करने की भी.”

राज मुस्कुराकर बोला—“यार, अब वो खुद ही आती हैं. मैं तो कभी उसके पास गया नहीं.”

नारायण और अंकित हँसने लगे.

नारायण—“अच्छा–अच्छा, ठीक हैं.”

राज ने गंभीरता से कहा—“लेकिन इस लड़की के लिए कुछ बताओ तो सही. उस लड़के के कारण बहुत रोती हैं. उस पर बेचारी की बात सुनने और समझने वाला भी कोई नहीं हैं.”

अंकित—“तू हैं तो सही.”

राज—“इसलिए तो बता रहा हूँ.”

नारायण ने मजाकियाँ लहजे में राज से कहा—“अभी तो तू बोल्यो, वो मुर्ख हैं. गलत लोग मुर्ख की मुर्खता का फायदा जरूर उठाएँगें.”

राज ने तिलमिलाते हुए कहा—“मुर्ख तो हैं, लेकिन इसका मतलब ये थोड़े ही हैं, कि मुर्ख की मुर्खता का फायदा उठाने वाले लोग सही हैं. उस धोखेबाज बेकार लड़के के होश तो ठिकाने लगाने ही चाहिए.”

नारायण ने गंभीर होकर राज से कहा—“यार, एक बात बता. तुझे इस लड़की में कोई खास दिलचस्पी नहीं हैं. तू इस लड़की को मुर्ख भी मानता हैं. फिर तुझे उस लड़के से इतनी चिढ़ क्यों हैं ?”

अंकित ने राज से पूछा—“हाँ, भाई. उस लड़के का जिक्र होते ही तेरी आँखों से आग बरसने लगती हैं. इसका क्या कारण हैं ?”

राज ने शान्त होते हुए कहा—“हैं, कोई कारण. फिर कभी बताऊँगा. अभी तो बस इतना समझ लो, मुर्ख बनकर धोखा खाने का दर्द, मुर्ख बनकर धोखा खा चुके लोग ही समझते हैं.”

अंकित ने राज से पूछा—“मतलब तूने भी धोखा खाया हैं ?”

राज—हाँ, लेकिन अभी उस लड़के को सबक सिखाने का कोई तरीका हैं, तो बताओ ?”

अंकित—“उस लड़के ने इस लड़की से शादी करने से मना कर दिया, इसलिए ये इतनी ज्यादा दुःखी हैं ना ?”

राज—“हाँ, पहले प्यार–मोहब्बत और शादी के सपने दिखाकर रिलेशन बनाए. फिर घटिया–घटिया, गन्दी–गन्दी बातें बोलकर छोड़ दिया.”

अंकित—“तो अगर वो लड़का इससे शादी करले, फिर ये खुश हो जाएगी ?”

राज—“ये खुश हो या ना हो. लेकिन मैं चाहता हूँ, वो लड़का भी तड़प–तड़पकर रोए और उसे अफसोस हो, कि उसने धोखा क्यों दिया ?”

अंकित—“अगर ऐसी ही बात हैं, तो मेरी गोविन्द बिशनोई से बहुत अच्छी बनती हैं. उस लड़के को तो दो मिनट में सीधा कर सकते हैं. गोविन्द बिशनोई को वैसे भी घटिया लोगों से चिढ़ हैं. बस खाली बताना ही हैं, इस लड़के के बारे में.”

राज—“जब वक्त आएगा, तब इसके बारे में भी सोचेगें. अभी तो उसकी धोखेबाजी सबके सामने लाने का कोई तरीका हैं, तो बता ?”

अंकित—“ये तो बहुत आसान हैं.”

राज—“बता फिर ?”

अंकित—“इस लड़की की फेसबुक आईडी तो जरूर होगी ?”

राज—“हाँ, हैं. डॉली बागड़ी नाम से और आठ सौ से ज्यादा फ्रैंड भी हैं. लेकिन ब्रेकअप के बाद से वो फेसबुक ज्यादा नहीं चलाती.”

अंकित—“हाँ, तो कोई बात नहीं. अब चला लेगी. उसको बोल उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करें. इससे उस लड़के के बारे में सबको पता चल जाएगा.”

नारायण—“फ्लॉप हैं, तेरो तरीको.”

अंकित—“क्यों ? वो इतने बड़े सेठ साँवरमल जी की बेटी हैं. लोग उसके पोस्ट पर ध्यान तो जरूर देगें.”

नारायण—“पर बदनामी ज्यादा छोरी गी ही होवेगी. शहर में जितने लोगों को साँवरमल जी की बेटी के बारे में पता हैं, वो सब जानते हैं. ये लड़की रात–रात भर बाहर घूमती हैं. दारू में टली रहती हैं. उल्टो असर होवेगो.”

राज—“नारायण भाई की बात सही हैं. सबको पता हैं, ये एक नम्बर की बेवड़ी और बिगड़ैल हैं. इससे डॉली के लिए प्रोब्लम बढ़ जाएगी.”

अंकित ने राज की तरफ देखकर कहा—“तू एक बात बता, तेरे साथ उसने कोई गलत हरकत की ?”

राज—“नहीं.”

अंकित—“तो फिर शराब पीना गलत बात हैं, लेकिन बिगड़ैल कैसे हुई ?”

राज—“अरे, अब मैं महिने से उससे रोज मिलता हूँ, उसकी बातें सुन रहा हूँ, इसलिए मुझे उसके बारे में सारी बातें मालूम हैं. मैनें तुम लोगों को बता दिया, इसलिए तुम दोनों को पता हैं. लेकिन सारे शहर को थोड़े ही पता हैं, वो कैसे बिगड़ी ?”

नारायण—“यहीं तो बात हैं. ये समझ नहीं रहा.”

अंकित—“अरे यार, जैसे उसने तुझे बताया. वैसे वो उस लड़के के बारे में सबको बताएगी, तभी तो सबको पता चलेगा. और भले ही लड़के को ज्यादा फर्क ना पड़े. लेकिन उसके माँ–बाप को तो फर्क पड़ेगा ना. जब लोग कहेगें, तुम्हारा लड़का लड़कियों के साथ ऐसे करता हैं. तुम लोगों ने उसे यहीं सिखाया हैं.”

राज ने अंकित से कहा—“क्या बात कर रहा हैं ? यार ! सब बोलेगें, उस बिगड़ैल लड़की ने ही फँसाया होगा. जवाँन लड़का हैं, फिसल गया. अब जब लड़के को समझ आई, तो डॉली लड़की होने का फायदा उठाकर उस भोले–भाले मासूम लड़के को बदनाम कर रही हैं.”

नारायण—“हाँ, डॉली को कोई शादी करने वाला मिल नहीं रहा, इसलिए उसे मजबुर करके उससे शादी करना चाहती हैं. ये बोलेगें सब.”

अंकित ने हँसकर राज से कहा—“लेकिन तू तो बता रहा था, उस लड़के ने डॉली से पहले भी चार लड़कियों को गर्लफ्रैंड बनाकर रिलेशन(शारीरिक संबंध) बनाने के बाद छोड़ दिया.”

राज—“हाँ, तो ?”

अंकित—“तो क्या ? भोले–भाले मासूम लड़के एक के बाद एक बार–बार फिसलते हैं क्या ? ऐसी कौनसी उसमें स्पेशल जवाँनी आ गई ? हम भी तो जवाँन हैं. मेरे ऑटो में एक से एक खूबसूरत लड़कियाँ और औरतें बैठती हैं. मैनें तो कभी किसी को नहीं छेड़ा.”

नारायण—“ऑटोवालों के बारे में म्हाने बेरो(मालूम) हैं. एक बार म रात न आण लाग रयो. स्टेशन पर पेड़या खन खड़ा होर छोरया अर लुगाया न सुणा–सुणा ग ओछा गाणा गावा हा.”(हिन्दी अनुवाद : ऑटोवालों के बारे में हमें मालूम हैं. एक बार मैं रात को आ रहा था. स्टेशन पर सीढ़ियों के पास खड़े होकर लड़कियों और औरतों को सुना–सुनाकर गन्दे गाने गा रहे थे.)

अंकित ने नारायण से कहा—“अब भाई जी, मैं दूसरों की गारन्टी कैसे ले सकता हूँ ? आपने कभी मुझे कोई गलत हरकत करते देखा हैं, तो बताओ ?”

नारायण ने अंकित से कहा—“नहीं–नहीं, मैं तो उनकी ही बात बताई हैं. तेरे बारे में थोड़ी कहा हैं. मेरे कहने का मतलब, तू भी ऑटोवाला हैं और वो भी ऑटोवाले हैं. लेकिन तू बा सबसे अलग हैं.”

अंकित—“अच्छा, अब बताओ, उस लड़के का ? उसके बारे में फेसबुक पर ये चार लड़कियों वाली बात लिख सकते हैं ना ?”

राज ने अंकित से कहा—“क्या खाक बताऊँ ? तू डॉली को जैल भिजवाने वाले रास्ते बता रहा हैं.”

अंकित ने हैरान होकर कहा—“डॉली जैल कैसे जाएँगी ?”

राज—“जब डॉली फेसबुक पर पोस्ट करेगी, रंगीला ने इन चार लड़कियों के साथ भी प्यार के नाम पर रिलेशन बनाए थे. तब वो चारों लड़कियाँ कहेगी, नहीं, हमारे साथ तो कुछ नहीं हुआ. हम तो सती–सावित्री हैं. ये डॉली अपने मतलब के लिए हमें बदनाम कर रही हैं. तब डॉली पर चार लड़कियों को बदनाम करने का पुलिसकेस नहीं बनेगा क्या ?”

अंकित—“तो उन लड़कियों का नाम लिखे बिना पोस्ट कर देगी.”

नारायण—“फिर वो रंगीला कहेगा, बता कौनसी चार लड़कियों को धोखा दिया मैनें ?”

अंकित—“ओह…ये तो मेरे दिमाग में नहीं आया.”

नारायण ने अंकित से कहा—“तो ही तो मैं बोल्यो, फ्लॉप हैं, तेरो तरीको.”

राज ने अंकित को समझाते हुए कहा—“अब देख, अपने तो सिर्फ डॉली को जानते हैं. डॉली के बारे में अपने को मालूम हैं, डॉली प्यार के नाम पर बेवकूफ बनी हैं. लेकिन उन बाकि चार लड़कियों के बारे में तो अपने को कुछ नहीं पता ना. क्या पता उन लड़कियों ने सब कुछ जानते और समझते हुए सिर्फ इंजॉय करने के लिए रिलेशन बनाए हो ?”

नारायण—“बेवकूफ बनी हो, तब भी. उनमें सबके सामने बताने की हिम्मत हो, ना हो ?”

अंकित—“हाँ………लेकिन अगर डॉली के पास कोई सबूत होता, तब शायद काम बन जाता.”

राज—“तब भी शायद वो दूसरी लड़कियों के बारे में नहीं लिख सकती.”

नारायण—“नहीं, तब लिख सकती हैं. बस उन लड़कियों की पहचान नहीं बता सकती.”

राज ने नारायण से पूछा—“दूसरी लड़कियों के बारे में वो कैसे लिख सकती हैं ?”

नारायण—“अगर उसके पास इस बात का सबूत हो, कि उस लड़के ने डॉली समेत पाँच लड़कियों को प्यार के चक्कर में फँसाकर उनके साथ रिलेशन बनाए हैं. तब डॉली उन लड़कियों की पहचान उजागर किये बिना लिख सकती हैं. ऐसी हालत में ये तो साफ़ हो जाएगा, उस लड़के ने डॉली समेत पाँच लड़कियों के साथ रिलेशन बनाए हैं. लेकिन वो बाकि चार लड़कियाँ कौन हैं ? ये पता नहीं चलेगा. अब अगर वो लड़का डॉली पर खुद को बदनाम करने का केस करता हैं, तो डॉली के पास उसके खिलाफ़ सबूत होने जरूरी हैं.”

राज—“अब सबूत तो डॉली से पूछना पड़ेगा.”

अंकित—“हाँ, तो फिर उससे पूछ ले और उसको बोल फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए. जैसे ही लोगों को पता चलेगा, साँवरमल जी की बेटी ने पोस्ट किये हैं. तो हर कोई इस मामले को जानने में दिलचस्पी लेगा. फिर उस लड़के और उसके घरवालों पर कुछ तो असर जरूर पड़ेगा.”

राज ने अंकित से कहा—“चल मान ले, फेसबुक पर पोस्ट करने से उस लड़के और उसके घरवालों पर असर हो गया. लेकिन फिर भी उस लड़के को तकलीफ और परेशानी होगी, इसकी क्या गारन्टी हैं ?”

अंकित—“तुका(चान्स लेकर देखना) मारकर देख लेते हैं. कभी–कभी फिल्मी फंडे भी हिट हो जाते हैं.”

राज—“चल फिर ठीक हैं. मैं डॉली से पूछता हूँ. अगर उसके पास कोई ऐसे सबूत हैं, जिससे इस लड़के की धोखेबाजी साबित हो जाए, तो डॉली से पोस्ट जरूर करवाएँगें.”

नारायण—“हाँ, वो लड़की ये साबित कर सकती हैं, कि उस लड़के ने ये सब किया हैं. फिर अंकित की बात सच हो भी सकती हैं. क्योंकि थोड़ी बहुत बदनामी तो लड़के की भी होती हैं.”

अंकित ने नारायण ने पूछा—“अच्छा भाई जी, ये पहचान उजागर वाली बात में एक बात बताओ ?”

नारायण—“पूछ.”

अंकित—“किसी लड़की या औरत के साथ ब्लात्कार हो जाए, तो उस लड़की या औरत की पहचान छुपाई जाती हैं. लेकिन उस लड़की या औरत के आस–पड़ौस वालों को, परिवार और रिश्तेदारी के लोगों को तो कैसे ना कैसे पता चल ही जाता हैं. फिर ये पहचान किससे छुपाई जाती हैं ? मान लो, दिल्ली में किसी के साथ ब्लात्कार हो गया. अब अपने को उसके बारे में पता चल भी जाए, तो अपने कौनसा दिल्ली जाकर उसको परेशान करने वाले हैं ? परेशान तो आस–पास पड़ौस वाले और रिश्तेदार करते हैं और उनको सब पता चल ही जाता हैं.”

नारायण—“अरे, अब इतना तो मुझे भी पता नहीं हैं. टीवी पर खबरा म देखेड़ो बताऊँ म तो. और मेरी किसी वकालत करेड़ी हैं ?”

राज ने मुस्कुराकर खड़े होते हुए कहा—“अजीब कानून हैं. अच्छा, मैं तो चलता हूँ. फिर मिलेगें.”

नारायण—“ठीक हैं, भाई.”

अंकित खड़ा होकर बोला—“मैं भी चलता हूँ.”

नारायण—“ठीक हैं, भाई. तू भी कर कमाई.”

राज अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चला गया और अंकित ऑटो में बैठकर ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाते हुए आम्रपाली सर्किल की तरफ चला गया.

सुबह नौ बजे राज बिल्डिंग के मुख्य दरवाजे पर ताला लगाकर चलते हुए आम्रपाली सर्किल पर आया.

कुछ देर बाद डॉली की गाड़ी आकर रूकी. राज गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठ गया. डॉली ने गाड़ी आगे बढ़ाई.

राज गाड़ी चलने के बाद बोला—“आज ऑफ़िस नहीं जाना.”

डॉली—“क्यों, तुम तो संडे को भी ऑफ़िस जाते हो ना.”

राज—“हाँ, लेकिन आज सेठ जी ने नहीं बुलाया.”

डॉली ने खुश होते हुए कहा—“हम्म…तो फिर आज कहाँ चले ?”

राज ने मुस्कुराते हुए कहा—“जहाँ तुम ले जाना चाहो.”

डॉली—“तो आज तुम्हें पूरा दिन शहर घूमाऊँ ? अगर तुम्हें कोई प्रोब्लम ना हो तो ?”

राज—“हाँ, जरूर. वैसे भी इस शहर में साढ़े चार साल से ज्यादा टाइम हो गया. लेकिन कुछ देखा ही नहीं. बस चार–पाँच दोस्त हैं, आज की तरह जब छुट्टी मिलती हैं, तो कभी–कभी उनके घर चला जाता हूँ.”

डॉली—“चलो, फिर आज तुम्हें पूरा गुलाबी नगर दिखाती हूँ.”

डॉली ने गाड़ी में म्यूजिंक ऑन करके गाना चलाया.

रिमझिम घिरे सावन,

उलझ–उलझ जाए मन,

भीगे आज इस मौसम में,

लगी कैसी ये अगन,

डॉली सारा दिन जगह–जगह गाड़ी रोककर राज को कुछ ना कुछ खिलाते–पिलाते हुए छोटी–चोपड़, बड़ी–चोपड़, आमेर, जलमहल, सांगानेर बहुत सारी जगह लेकर गई.

शाम के आठ बजे डॉली ने गाड़ी प्रिंस रोड़ पर लाकर साइड में खड़ी करके बन्द कर दी और एक सिगरेट निकालकर मुँह में रखकर लाइटर से सिगरेट जलाने लगी.

राज ने डॉली की तरफ देखकर मन में कहा कि हत तेरे की. आज सारा दिन नशे से दूर रहकर चहकती–खिलखिलाती हुई कितनी अच्छी लग रही थी. शाम होते–होते एक सिगरेट तो जला ही ली.

डॉली ने गाड़ी के बाहर मुँह से धुँआ निकाला और राज की तरफ देखकर कहा—“तुम भी सोचते होगे. पता नहीं क्यों ये नशेड़ी लड़की मेरे पीछे पड़ गई ?”

राज—“नहीं तो, ऐसा मैनें कब कहा ?”

डॉली—“तुमने नहीं कहा, लेकिन मन में सोचते तो होगे ?”
 
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