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हो जाए अगर दिल दीवाना

राज—“अब तुम खुद ही अपने दिमाग में उल्टा–सीधा सोचो, उसका तो कोई ईलाज नहीं हैं. मैनें पहले भी बताया हैं, मुझे किसी भी तरह का नशा बिल्कुल पसन्द नहीं हैं, लेकिन दूसरों के नशा करने से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. क्योंकि सबको नशे से होने वाले नुकसान पता होते हैं. अब उनको जानबुझकर मरना हैं, तो मरे.”

डॉली—“एम सॉरी, यार ! लेकिन मैं क्या करूँ ? रंगीला से धोखा खाने के बाद मेरी जीने की इच्छा ही खतम हो गई.”

राज—“यहीं तो गलती हैं तुम्हारी. धोखा उसने दिया और जीने की इच्छा तुम्हारी खतम हो गई. सबक सिखाओ उसे. उसको भी वहीं तकलीफ दो, जो तुम्हें हुई हैं.”

डॉली—“अब मैं क्या सबक सिखाऊँ उसे ? वो लड़का हैं, मैं लड़की हूँ. अगर मैनें उसे धोखा दिया होता, तब भी लोग मुझे बेकार बोलते. अब उसके धोखे के बारे में किसी को बताऊँ, तब भी बेकार मैं ही कहलाऊँगी. और मुझे तो पहले से ही सब बिगड़ैल बोलते हैं.”

राज—“तुम मुझे अपना दोस्त मानती हो ?”

डॉली—“तुम्हें शक हैं ?”

राज—“शक नहीं हैं, लेकिन अगर दोस्त मानती हो, तो फिर एक प्रोमिस करो, तुम रोओगी नहीं. मैं जो पूछ रहा हूँ, रोये बिना बताओगी.”

डॉली—“ऐसा क्या पूछ रहे हो ?”

राज—“पहले प्रोमिस.”

डॉली—“प्रोमिस. नहीं रोऊँगी. अब बताओ."

राज—“तुम्हारा बॉयफ्रैंड रंगीला, उसे तुमसे पैसे लेने की क्या जरूरत पड़ गई ? तुम बता रही थी, तुम उसे पैसे की मदद भी करती थी.”

डॉली—“वो अपने पापा के साथ ही, उनके बिजनेस में हेल्प करता हैं. उसने कई बार हिसाब में गड़बड़ करके अपने पापा के पैसे चुराए हैं. तो कई बार उसके पापा ने उसका ऑफ़िस जाना और उसको पैसे देना बन्द कर दिया. तब मैं उसे पैसे देती थी.”

राज—“अच्छा, तुम्हारे पास उसके कोई मैसेज, कोई फोटो वगैरह हैं, जिससे ये पता चलता हो, वो तुम्हारा बॉयफ्रैंड था और उसने तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए हैं.”

डॉली—“फेसबुक पर बहुत मैसेज हैं, वॉट्सऐप पर मैसेज हैं. कुछ उसके साथ ली हुई सेल्फी हैं. बस और तो कुछ नहीं हैं.”

राज—“और वो तुम्हारे साथ उस टाइप की बातें करता था ?”

डॉली मुस्कुराते हुए आँखें ऊपर करके बोली—“किस टाइप की ?”

राज—“अरे, वो………तुम समझ जाओ ना.”

डॉली—“हाँ, करता था. बॉयफ्रैंड बनने के बाद वो ज्यादातर वैसी ही बातें करता था.”

राज—“और तुम ?”

डॉली—“मैं भी करती थी.”

डॉली ने सिगरेट बाहर फेंककर अपना मोबाइल उठाते हुए कहा—“एक मिनट रूको.”

डॉली ने मोबाइल में नेटऑन करके फेसबुक लॉग–इन की. फेसबुक पर रंगीला के मैसेज निकालकर मोबाइल राज को देते हुए कहा—“अब उसने मुझे ब्लॉक कर रखा हैं. ये उसके मैसेज हैं, तुम देख लो.”

राज ने मोबाइल लिया और डॉली की फेसबुक में डॉली और रंगीला के मैसेज पढ़ने लगा.

डॉली ने कहा—“ये मैसेंजर में देख लो ना. बार–बार क्लिक नहीं करना पड़ेगा.”

राज ने कहा—“इसमें तो बहुत सारे मैसेज हैं. अगर तुम बुरा ना मानो तो दो–चार दिन के लिए तुम्हारा मोबाइल मुझे दे सकती हो ?”

डॉली—“हाँ, ले लो. बस एक सिम–कार्ड निकाल दो. वो मॉम–डेड कॉल करते हैं ना, इसलिए.”

राज ने मोबाइल डॉली को देते हुए कहा—“लो तुम खुद निकाल लो.”

डॉली ने मोबाइल लेकर खोला और उसमें से एक सिम निकालकर मोबाइल राज को वापस दे देते हुए कहा—“अब जितने मरजी दिन रख लो.”

राज ने मोबाइल लेकर मोबाइल को वापस बन्द(मोबाइल का ढक्कन लगाकर) करके अपनी जेब में डाल लिया.

डॉली ने गाड़ी के ड्रोअर में से एक पुराना मोबाइल निकालकर राज को दिये मोबाइल में से निकाली हुई सिम पुराने मोबाइल में डालकर पुराना मोबाइल ऑन करके सामने छोड़ दिया.

राज ने कहा—“अच्छा, एक बात बताओ ? तुमने कोई सवाल–जवाब किये बिना अपना मोबाइल दे दिया. अगर मैनें मोबाइल में से तुम्हारा कोई सीक्रेट निकालकर तुम्हारे लिए कोई प्रोब्लम कर दी तो ?”

डॉली ने हँसकर कहा—“कोई बात नहीं, यार ! इस बहाने शराब पीने का एक और बहाना मिल जाएगा. मरूँगी तो शराब से ही, खुदखुशी तो नहीं करूँगी.”

राज—“अरे, मजाक कर रहा हूँ. मैं कोई प्रोब्लम नहीं करूँगा. मुझे तुम्हारी ये मरने वाली बातें बहुत बुरी लगती हैं. तुम ऐसे मत बोला करो.”

डॉली ने मुस्कुराते हुए कहा—“लेकिन अभी तो तुमने कहा, जिनको जानबुझकर मरना हैं, मरे.”

राज ने नाराज होते हुए कहा—“ओहो, अब मैं चलता हूँ. तुम भी अपने घर जाओ.”

राज गाड़ी से उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोलने लगा.

डॉली ने राज का बाजू पकड़कर कहा—“एम सॉरी, यार.”

राज ने गाड़ी का दरवाजा छोड़कर डॉली का हाथ हटाकर कहा—“अब सॉरी क्यों बोल रही हो ? तुम्हें मरना हैं ना, मरो.”

डॉली ने स्टैरिंग पर हाथ रखकर मुँह नीचे कर लिया. डॉली की आँखें भीग गई.

राज ने डॉली के आँशू निकलते देखकर कहा—“अब रोने क्यों बैठ गई ?”

डॉली ने आँशू पोंछ लिए, लेकिन मुँह से कुछ बोली नहीं.

राज ने मन में कहा कि क्या हैं यार ये. जब देखो, रोने लग जाती हैं.

राज ने डॉली का बाजू पकड़कर कहा—“तुम एक बात बताओ, अब कोई दोस्त मरने की बात करे, तो बुरा नहीं लगता क्या ? मैनें तो तुम्हारे साथ थोड़ा हँसने के लिए मजाक में कहा. तुम बोलती हो, शराब पीकर ही मरूँगी. उस रात की तरह ये भी तो बोल सकती थी, सर फोड़ूगी, फिर तेरा.”

डॉली—“वो तुम्हें थोड़े ही कहा था. वो तो नशे में तुम्हें रंगीला समझकर कहा था. मुझे तो याद भी नहीं, तुमने ही बताया.”

राज—“मेरा मतलब तुम खुद के बारे में बुरा मत बोला करो और तुम रोज रात को बारह–एक बजे बाद घर जाती हो. आज तो हम सुबह नौ बजे से साथ घूम रहे हैं. आज तो जल्दी घर जाओ.”

डॉली—“ठीक हैं. चलो पहले तुम्हें छोड़ देती हूँ.”

राज—“हाँ, चलो.”

डॉली ने गाड़ी स्टार्ट की और आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ी.

सताईस दिन बाद दस जून, शनिवार को रात के दस बजे डॉली गाड़ी चलाते हुए राज को ऑफिस से घर लेकर आ रही थी.

राज—“आज वहाँ नारायण की दुकान पर गाड़ी चलना. जहाँ तुमने एक बार संडे को मेरे बारे में पूछा था.”

डॉली—“वहाँ क्यों ?”

राज—“तुम चलो तो, कोई प्रोब्लम हैं क्या वहाँ चलने में ?”

डॉली—“मुझे कोई प्रोब्लम नहीं हैं. लेकिन उस रात जब तुम मुझे बिल्डिंग में ले गए थे, तब तुमने ही तो कहा था, आप यहाँ से चली जाओ. अगर किसी ने देख लिया, तो गलत मतलब निकालेगें. इसलिए तो मैं यहाँ बिल्डिंग से दूर चौराहे पर गाड़ी रोकती हूँ.”

राज ने हँसकर कहा—“अरे, वो छः महिने पुरानी बात हो गई. अब तो लोगों ने गलत मतलब निकाल भी लिए.”

डॉली ने हैरान होकर कहा—“क्या गलत मतलब निकाल लिए ?”

राज—“वहीं मतलब, जो एक लड़के और एक लड़की को साथ देखकर अक्सर लोग निकालते हैं. कॉलोनी में मुझे जानने वाले आधे से ज्यादा लोगों को पता हैं. पिछले दो महिने से तुम मुझे सुबह घर से ऑफ़िस और शाम को ऑफ़िस से घर छोड़कर जाती हो. हम घंटों गाड़ी में बैठे बातें करते हैं.”

डॉली—“ओह…लेकिन सबको पता कैसे चला ?”

राज—“किसी ने देख लिया होगा. गाड़ी में बैठते या गाड़ी से उतरते. फिर एक ने दो को बताया होगा, दो ने चार को बताया होगा, चार ने दस को बताया होगा. बस ऐसे ही फैलती हैं बातें. अब सब यहीं सोचते हैं, इस बिल्डिंग में रहने वाले राज का उस गाड़ी वाली लड़की के साथ चक्कर चल रहा हैं. चार–पाँच दिन पहले सुबह–सुबह पड़ौस का एक आदमी हँस–हँसकर मुझे बोल रहा था, कल रात गाड़ी में क्या हो रहा था ? बारह बजे से एक बजे तक गाड़ी जोर–जोर से हिल रही थी.”

डॉली हैरान होकर बोली—“गाड़ी कब हिल रही थी ?”

राज ने हँसकर कहा—“गाड़ी नहीं हिल रही थी. उसका दिमाग हिला हुआ हैं. गलत सोचने वाले तो गलत सोचते ही हैं.”

डॉली—“तो अभी दुकान पर किसलिए जा रहे हैं ?”

राज—“अरे, वो तो दुकानवाला नारायण और अंकित, जो तुम्हें ऑटो से फ्री में घर छोड़कर आया था. उन दोनों के पास चल रहे हैं. इन दोनों को तुम्हारे बारे में सब पता हैं. ये दोनों बहुत अच्छे लोग हैं.”

डॉली—“अच्छा.”

डॉली ने नारायण की दुकान के सामने गाड़ी साइड में खड़ी करके रोककर बन्द कर दी. राज और डॉली अपनी–अपनी तरफ से गाड़ी के गेट खोलकर गाड़ी से उतरे और गेट वापस बन्द करके नारायण की दुकान पर चल पड़े.

नारायण की दुकान के आगे बनी चौकी पर अंकित के साथ बैठा नारायण खड़ा होकर दुकान के अन्दर गया. राज अंकित के पास चौकी पर बैठ गया. नारायण दो कुर्सी लेकर दुकान से बाहर आया और एक कुर्सी डॉली को देकर दूसरी कुर्सी पर खुद बैठ गया. एक कुर्सी पर डॉली बैठ गई.

राज ने जेब से डॉली का मोबाइल निकालकर कहा—“मैनें पिछले बीस दिनों में डॉली और रंगीला के बीच फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के सारे मैसेज पढ़कर देखे हैं और सभी मैसेज के स्क्रीन–शॉट निकालकर सारे स्क्रीन–शॉट मेरी आईडी से डॉली की आईडी में मैसेज कर दिये हैं.”

अंकित—“बस फिर अब डॉली जी को बोल दे, फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए.”

नारायण—“पहले देख तो लो, कौनसे मैसेज करने हैं और कौनसे मैसेज नहीं करने.”

राज—“सभी मैसेज पोस्ट किये जा सकते हैं. बस उन चार लड़कियों के नाम को मिटा देगें. बाकि बहुत सारे मैसेज में वो लड़का अपनी करतूत खुद ही डॉली को बता रहा हैं. और सबसे खास बात. डॉली ने उसे कभी कोई गलत या गन्दी बात नहीं कहीं. डॉली ने सिर्फ उसकी गन्दी बातों के जवाब दिये हैं. इसके इलावा डॉली ने उसको बहुत बार कहा हैं, कि मुझे ऐसी बातें करना पसन्द नहीं हैं. वो ही हर बार गन्दी–गन्दी बातें करता था.”

डॉली हैरान होकर इधर–उधर देखते हुए सबकी बातें सुनने के बाद बोली—“कोई मुझे भी बताएगा, क्या बात हो रही हैं ?”

राज, अंकित और नारायण तीनों हँस पड़े.

राज—“हाँ, तुम्हें ही तो सब कुछ करना हैं. हमने तो बस सोचा हैं.”

डॉली—“क्या ?”

राज—“तुम उस लड़के रंगीला के बारे में सब कुछ, उसकी एक–एक घटिया बात फेसबुक पर पोस्ट करो. वो कैसे लड़कियों को पटाता हैं ? लड़कियों को पटाने के लिए क्या–क्या नाटकबाजी करता हैं ? पटाने के बाद लड़की को बिस्तर तक लाने के लिए क्या–क्या करता हैं ? लड़कियों के साथ कितनी घटिया और गन्दी बातें करता हैं. उसके घरवाले उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी किस तरह हर बार उसको बचाते हैं ? और जब लड़की से उसका मन भर जाता हैं, फिर वो किस तरह दुत्कार कर घटिया–घटिया और गन्दी–गन्दी बातें बोलकर लड़की को छोड़ देता हैं ? ये सभी बातें पूरी डिटेल के साथ पोस्ट करो.”

डॉली—“लेकिन इससे होगा क्या ?”

राज—“उसके बारे में सबको सब कुछ पता चल जाएगा. हो सकता हैं, वो घबराकर तुमसे शादी कर ले.”

डॉली—“अरे, लेकिन पता चलने से क्या होगा ? सब यहीं कहेंगे, मैनें ही उसे फँसाया होगा.”

राज—“ये सब अनुमान हम पहले से ही लगा चुके हैं. पिछले एक–डेढ़ महिने से रोज सुबह एक–दो घंटे हम तीनों तुम्हारे बारे में ही बात करते हैं. उस लड़के को सबक सिखाने का सिर्फ एक यहीं तरीका हैं. क्योंकि उसने तुम्हारे साथ सब कुछ तुम्हारी मरजी से ही किया हैं. मैनें तुम्हारी उससे दोस्ती की शुरुआत से लेकर उसके ब्लॉक करने तक का एक–एक मैसेज पढ़ा हैं, पहले तुम्हें गर्लफ्रैंड बनाने के लिए भी वहीं हाथ धोकर तुम्हारे पीछे पड़ा था और गर्लफ्रैंड बनाने के बाद रिलेशन बनाने के लिए भी वहीं तुम्हारे पीछे पड़ा था. और मैसेज पढ़कर लगता हैं, जब उसने पहली बार तुम्हारे साथ रिलेशन बनाए, तब यकिनन उसने ड्रिंक में कुछ ऐसा मिलाया था, जिससे तुम उसे रोक ना सको. वरना ड्रिंक तो तुम रोज करती हो, लेकिन मेरे साथ तो तुमने कभी कोई ऐसी–वैसी बात नहीं की. और हाँ, इस तरीके से तुम उसे शादी के लिए मजबुर भी कर सकती हो, उसने शादी के वादे भी तो किये थे, सबूत के तौर पर ये मैसेज हैं.”
 
डॉली को कुछ समझ नहीं आया और डॉली सोच में पड़ गई कि अब क्या बोलूँ ?

अंकित ने डॉली को सोच में डूबी देखकर कहा—“डॉली जी, ऐसे लोगों के खिलाफ़ कुछ करेंगे नहीं, तो ये लोग कभी नहीं सुधरेंगे.”

डॉली—“लेकिन मैं तो खुद बिगड़ैलों में गिनी जाती हूँ. मैं उसको क्या सुधारू ?”

नारायण—“देखो, बाई(बहन). हमें आपके बारे में सब पता हैं. हमें तो आप कहीं से भी बिगड़ी हुई नहीं लगती. हाँ, शराब पीना आपकी गलत आदत हैं. वो आप जल्दी से जल्दी छोड़ दो, तो बहुत अच्छी बात हैं.”

राज—“और बिगड़ैल और बेकार वो होते हैं, जो दूसरों का बुरा करते हैं. जो दूसरों को दुःख देते हैं. तुमने गलत रास्ते पर चलकर सिर्फ खुद को नुकसान पहुँचाया हैं और पहुँचा रही हो, तुम गलत रास्ते पर चल रही हो. लेकिन तुम बेकार या तुम खुद को जितनी बुरी बोलती हो, तुम उतनी बुरी नहीं हो.”

अंकित—“और रही बात रात को घर से बाहर घूमने की. तो ये भी कोई गलत या बुरी बात नहीं हैं. हाँ, बढ़ते क्राइम को देखते हुए ये बहुत खतरनाक जरूर हैं. और खतरा तो सभी को होता हैं, आदमी भी अगर रात को बाहर निकले, तो आदमी के साथ भी लुटपाट, किडनैपिंग जैसे क्राइम हो सकते हैं. इसलिए खतरों से सावधान रहना बहुत जरूरी हैं.”

डॉली—“आप सबकी बातें सही हैं. लेकिन सभी लोग आप लोगों की तरह नहीं सोचते ना. मैं खुद भी उसे सबक सिखाना चाहती हूँ. उसके कारण बहुत दुःख झेले मैनें. वो साथ था, तब भी और अब जब उसने मुझे छोड़ दिया, तब भी. लेकिन अगर मैं पोस्ट करूँगी, तो मेरे मॉम–डेड की भी बदनामी होगी. वो पहले से ही मेरे कारण बहुत दुःखी रहते हैं.”

राज—“एम सॉरी, डॉली. लेकिन क्या अब तक तुम अपने मॉम–डेड का नाम रोशन कर रही थी ? जब उस लड़के के साथ तुम रिलेशन बना रही थी, तब क्या तुम्हारे मॉम–डेड की इज्जत बढ़ रही थी ? अब तुम्हें उस धोखेबाज का कमीनापन फेसबुक पर पोस्ट करने के लिए कह रहे हैं, तब तुम्हें अपने मॉम–डेड की बदनामी की चिन्ता हो रही हैं.”

डॉली—“लेकिन तुम मेरे मॉम–डेड को नहीं जानते.”

नारायण—“बाई, लड़कियों के माँ–बाप ऐसे ही होते हैं और इसी बात का तो गलत लड़के और गलत आदमी फायदा उठाते हैं. गलत लोगों को मालूम होता हैं, लड़की बदनामी के डर से कुछ नहीं बोलेगी और अगर बोलेगी भी तो बदनामी तो लड़की की ही होनी हैं. इसलिए बिना किसी डर के वो अपनी मनमानी करते हैं.”

अंकित—“और शर्म–लिहाज के कारण लड़कियाँ और औरतें ऐसी बातें छुपाती हैं. लेकिन लड़के और आदमी गर्व से बताते हैं, मैनें इतनी लड़कियाँ पटाई हैं, मैनें इतनी औरतों के साथ रिलेशन बनाए हैं. ऐसा सिर्फ इसलिए होता हैं, क्योंकि गलती हो या ना हो, लड़कियाँ और औरतें खुद शर्मिन्दगी महसुस करती हैं.”

राज—“और मैनें तुम्हें बहुत बार अच्छी तरह समझाया हैं, कि तुमने धोखा दिया नहीं हैं, तुमने धोखा खाया हैं. अब तुम्हें सारी शर्म–लिहाज छोड़कर उस धोखेबाज के बारे में सबको बताना हैं. जब तुमने गलती करते वक्त शर्म नहीं की, फिर अब अपनी गलती मानकर, गलती क्यों और कैसे हुई ? ये बताने में शर्म, बदनामी की बातें क्यों कर रही हो ?”

डॉली—“लेकिन जिस तरह पोस्ट करने के लिए तुम कह रहे हो ? उसके गन्दे–गन्दे मैसेज दिखाकर सबको बताना. ऐसे पोस्ट पढ़कर लोग मेरे बारे में भी गलत बातें करेंगे.”

राज—“क्या गलत बातें करेगें ? यहीं ना, देखो कितनी बेशर्म लड़की हैं. लड़का इसको गन्दे–गन्दे मैसेज करता था और ये उसे जवाब देती थी. लड़का इसको हफ्ते में कितनी बार बुलाता था ? लड़का क्या–क्या करता था ? ऐसी बातें बता रही हैं.”

डॉली—“हाँ.”

राज—“हाँ, तो पोस्ट में अपनी इन गलतियों को मान लेना. पोस्ट में लिख देना, ऐसे मैसेज का जवाब देना मेरी गलती थी. वो मुझे बुलाता था, उसके पास जाना मेरी गलती थी. मैं प्यार में अंधी हो गई थी. मुझे हवस और प्यार का अन्तर मालूम नहीं था.”

डॉली—“इससे बुरी तो सिर्फ मैं ही बनूँगी ना.”

अंकित—“आप अकैले कैसे बुरी बनोगी ? दोस्ती होने के बाद वो कैसे आपके पीछा पड़ा हुआ था, आपको गर्लफ्रैंड बनाने के लिए. गर्लफ्रैंड बनाने के बाद आपके साथ रिलेशन बनाने के लिए उसने क्या–क्या किया ? वो सब भी तो लिखना हैं.”

नारायण—“हाँ, आप अपनी गलतियों को दूसरों की तरह प्यार का नाम देकर सही ठहराने की कोशिश मत करना. अपनी गलती को गलती मानकर उस लड़के की हर घटिया बात इन स्क्रीन–शॉट के साथ फेसबुक पर पोस्ट करके बताओ. इससे उसको और उसके घरवालों को भी शर्मिन्दगी झेलनी पड़ेगी.”

डॉली—“ठीक हैं, लेकिन धोखा तो सिर्फ उसने दिया. फिर उसके घरवालों के बारे में पोस्ट करना सही होगा ?”

राज ने सख्त होकर कहा—“बिल्कुल सही होगा. एक धोखेबाज को बचाने वाले, उसकी गलतियों पर परदा डालने वाले, सब के सब बराबर के अपराधी होते हैं. इन अपराधियों के हमदर्दों को तो अपराधियों से भी बड़ी सजा मिलनी चाहिए. इन बचाने वालों के दम पर ही तो ये अपराधी बिना किसी डर के बड़े से बड़ा अपराध कर देते हैं.”

डॉली—“तो आप सबके हिसाब से मुझे उस धोखेबाज के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करने चाहिए.”

राज, अंकित और नारायण ने एक साथ कहा—“हाँ, डॉली जी.”

अंकित—“और फेसबुक तो ऐसा साधन हैं, जहाँ किसी का असली चेहरा सामने लाने के लिए हमें किसी का सहारा लेने की भी जरूरत नहीं हैं. बस हमारी बात सच होनी चाहिए.”

राज—“हाँ.”

डॉली—“ठीक हैं, फिर कल सुबह ही एक पोस्ट करूँगी. जो होगा, देखा जाएगा.”

राज—“सिर्फ कल एक पोस्ट नहीं करना हैं. ये सारे स्क्रीन–शॉट हर रोज दो–दो, चार–चार पोस्ट करने हैं. उस धोखेबाज को इन पोस्ट से परेशानी होनी चाहिए. चाहे बार–बार रिपीट पोस्ट करने पड़ जाए.”

डॉली—“हाँ, समझ गई.”

राज, अंकित और नारायण ने एक साथ कहा—“ऑल–द–बेस्ट.”

डॉली—“थैक्यू, वैसे एक बात पूछू ?”

राज—“हाँ, जरूर.”

डॉली—“राज तो मेरा दोस्त हैं, इसलिए मेरे बारे में इतना सोचता हैं. लेकिन आप दोनों…? अगर मैं उस लड़के को सबक सिखाने में कामयाब होती हूँ, तो इससे आप दोनों को क्या फायदा होगा ?”

नारायण ने मुस्कुराकर कहा—“देखिये, दोस्ती में फायदा–नुकसान नहीं देखा जाता. दोस्त अगर गलत रास्ते पर चल रहा हो, तो दोस्त को समझाकर रोकना चाहिए और अगर दोस्त सही रास्ते पर चल रहा हो, तब दोस्त का साथ देना चाहिए. हम बस एक बेकार लड़के का कमीनापन सबको बताने के लिए कह रहे हैं. मेरी भी एक बेटी हैं, कल को वो भी बड़ी होगी. बड़ी होने के बाद वो स्कूल भी जाएगी, कॉलेज भी जाएगी, बाजार भी जाएगी. ना तो मैं उसको घर में कैद करके रख सकता हूँ और ना मैं चौबीस घंटे उसके साथ रह सकता हूँ. आज जो आपके साथ हुआ हैं, कल को मेरी बेटी के साथ भी हो सकता हैं.”

अंकित—“और फिर डॉली जी आप राज की दोस्त हैं और राज हमारा दोस्त हैं. दोस्त की दोस्त, दोस्त ही होती हैं ना.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“हम्म…”

राज—“अच्छा, अब तुम घर जाओ.”

डॉली ने कुर्सी से खड़ी होकर कहा—“हाँ, ठीक हैं. कल सुबह से करूँगी, उस कमीने के बारे फेसबुक पर पोस्ट.”

राज ने खड़े होकर कहा—“हाँ, कर देना. तुम्हारा ये मोबाइल मेरे पास ही हैं.”

डॉली—“कोई बात नहीं. मैं चलती हूँ अब. बाऐं.”

राज ने डॉली का मोबाइल वापस जेब में डालते हुए कहा—“टेक केयर, फिर मिलेगें.”

डॉली अपनी गाड़ी की तरफ चल पड़ी.

राज ने अंकित और नारायण से कहा—“मैं भी चलता हूँ.”

अंकित और नारायण ने कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

राज अपनी बिल्डिंग की तरफ़ चल पड़ा और डॉली गाड़ी में बैठकर गाड़ी स्टार्ट करके गाड़ी चलाते हुए चली गई.

अगले दिन ग्यारह जून, रविवार को रात के सवा दस बजे राज ने जयशर्मा के घर से बाहर आकर अपने जूते पहने और जयशर्मा के घर के मुख्य दरवाजे से बाहर आकर हर रोज की तरह डॉली की गाड़ी की तरफ चल पड़ा.

डॉली की गाड़ी के पास आकर राज ने गाड़ी का दरवाजा खोला और गाड़ी में बैठकर गाड़ी दरवाजा वापस बन्द कर लिया.

डॉली ने गाड़ी स्टार्ट की और आगे चल पड़ी.

डॉली ने ड्राईविंग करते हुए गाड़ी में सामने रखा अपना मोबाइल उठाकर राज को देते हुए कहा—“ये देख लो, आज सुबह दो स्क्रीन–शॉट के साथ मैनें ये पोस्ट किया. इस पर मेरे किसी फ्रैंड ने तो ध्यान भी नहीं दिया. दो–चार लोगों ने हमदर्दी भरे कॉमेन्ट किये. लेकिन बाकि सब लड़कों ने मेरे बारे में कितने घटिया कॉमेन्ट किये हैं.”

राज ने मोबाइल लिया और सारे कॉमेन्ट पढ़ने के बाद कहा—“कोई बात नहीं, तुम इन घटिया कॉमेन्ट करने वालों को कुछ गलत मत बोलना. इनकी हर बात का सही और अच्छे शब्दों में जवाब दो. तुम लिखो, बात लड़के और लड़कियों की नहीं हैं. बात सही–गलत और अच्छे–बुरे की हैं. अगर कोई लड़का मेरी(राज की तरह) तरह रात को ग्यारह–बारह बजे सुनसान सड़क पर पैदल आ रहा हो और चार लड़कियाँ उसके साथ मारपीट करके उसके पैसे छीनकर भाग जाए, तो गलती किसकी हैं ? लड़का रात को ऑफ़िस में ऑवर–टाइम करके आ रहा हो, उसकी गलती हैं या उन लूटपाट करने वाली लड़कियों की ? यहीं बात जब उल्टी हो, मतलब ऐसा किसी लड़की के साथ हो, तब हम सारी गलती लड़की की क्यों बता देते हैं ? गलत को गलत कहने की जगह लड़का–लड़की का राग क्यों अलापते हैं ? हाँ, ये ठीक हैं. माहौल खतरे से भरा हैं, अपराध बहुत हो रहे हैं. अपराधियों के खतरे से सावधान रहना चाहिए. लेकिन अगर अपराध हो जाए, तो हम अपराधी को सही क्यों बताने लगते हैं ?”

डॉली—“अरे, इन लोगों पर कोई असर नहीं होगा.”

राज—“मत होने दो, लेकिन तुम अपनी तरफ़ से अगले पोस्ट में इस तरीके से जवाब दे देना.”

डॉली—“ठीक हैं.”

राज—“और तुम इन गन्दे कॉमेन्ट करने वालों से बहस मत करना. ऐसे लोगों को इंग्नोर करना चाहिए, और इनके लिए अलग से पोस्ट कर देना बस.”

डॉली—“हाँ, देखो ना. बिना सर–पैर के कॉमेन्ट करने लगे. लड़कियाँ छोटे कपड़े क्यों पहनती हैं ? रात को बाहर क्यों निकलती हो ?”

राज ने हँसकर कहा—“अरे, ये घटिया और गन्दे लोग हैं. ये इस तरह ज्ञान देने वाले लोग खुद लड़कियों और महिलाओं के साथ घटिया और गन्दी हरकते करते रहते हैं. इसलिए जब कोई ऐसी बातें पोस्ट करता हैं या करती हैं, तो इनके तन–बदन में आग लग जाती हैं. अब ये तो बोल नहीं सकते, कि हम घटिया हैं, हम गन्दे हैं. इसलिए दूसरों को गलत बोलने लगते हैं.”

डॉली—“हम्म…लेकिन इनको बोले क्या ? सबसे ज्यादा यहीं लोग कॉमेन्ट करते हैं.”

राज—“ये फालतू बातें करने वाले, ये बिना वजह लड़कियों और महिलाओं के साथ बहस करने वाले, ये सब हवस के भूखे जानवर होते हैं, तुम्हारे बॉयफ्रैंड की तरह. इनको जवाब देना हैं, तो इनको बुरी तरह बैईज्जत करो. अगर इनको बैईज्जत नहीं कर सकती तो इनके कॉमेन्ट का कोई रिप्लॉय मत करो. सिर्फ पोस्ट करो.”

डॉली—“और पोस्ट में इनके लिए लिखूँ क्या ?”

राज—“लिख दो, लड़कियों के कपड़ों से लड़के काबू में नहीं रहते, तो लड़कों को घर में बैठना चाहिए, घर से बाहर ही नहीं निकलना चाहिए. लड़कियाँ चाहे कुछ भी पहने, लड़कों को लड़कियों से छेड़छाड़ और बदतमीजी करने का अधिकार किसने दिया ? अगर कोई लड़का दाढ़ी–मूँछ रखता हैं और लड़कियाँ उनकी दाढ़ी–मूँछ का मजाक उड़ाए. जैसे लड़के लड़कियों को गन्दी–गन्दी बातें बोलते हैं, उसी तरह लड़कियाँ दाढ़ी–मूँछ के कारण लड़कों को जंगली या आदिमानव कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा ? महिलाएँ अगर पजामें–चोले और धोती–कुरतें के कारण पुरुषों को ओल्ड फैशन या ग्वार कहने लगे, तो पुरुषों को कैसा लगेगा ? लड़कियाँ अगर घूटने से फटी हुई जींस और अजीब–अजीब हेयर–कटिंग करने वाले लड़कों को भिखारी, लंगूर, बन्दर या जोकर कहने लगे, तो लड़कों को कैसा लगेगा ?”

डॉली ने हँसकर कहा—“ये सब लिख दूँ ?”

राज—“हाँ, बिल्कुल.”

डॉली—“लेकिन अंकित, नारायण जी और तुम्हारे जैसे अच्छे लोगों को बुरा लगा तो ?”

राज—“अच्छे लोगों को क्यों बुरा लगेगा ? जो लोग कोई गलत काम नहीं करते, उनको गलत बातों के विरोध से क्यों प्रोब्लम होगी ? प्रोब्लम या परेशानी सिर्फ उन लोगों को होगी, जो गलत काम करते हैं. अब मैनें कभी किसी लड़की या किसी महिला के साथ कोई गलत हरकत नहीं की, तो मेरे बारे में कोई लड़की या कोई महिला कुछ गलत क्यों बोलेगी ?”

डॉली—“हाँ, ये तो हैं.”

राज—“हाँ, तुम खुद ही सोच लिया करो. लड़कों और पुरुषों को अपने हिसाब से सजने–सँवरने और जीने का अधिकार हैं, तो फिर ये अधिकार लड़कियों और महिलाओं से क्यों छिना जाता हैं ? तुम इस टाइप के पोस्ट करके इन घटिया और गन्दे कॉमेन्ट करने वालों को जवाब दो. लेकिन कॉमेन्ट में बहसबाजी मत करना.”

डॉली—“ठीक हैं, कल से एक पोस्ट इनके लिए भी किया करूँगी.”

राज—“हम्म…और इस बात का ध्यान रखना. हमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष वाला कॉम्पीटिशन नहीं करना. जो गलत हैं, वो गलत हैं. चाहे कोई भी हो. तुम्हें सिर्फ एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबको बतानी हैं.”

डॉली—“हाँ, सभी लोग एक जैसे नहीं होते. कुछ लड़कियाँ और महिलाएँ भी गलत होती हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“यहीं तो बात हैं. इन गलत लोगों के कारण अच्छे लोगों का जीना हराम हो गया हैं. अब सभी लड़के लड़कियाँ थोड़ी छेड़ते हैं, लेकिन इन घटिया लड़कों के कारण लोग अच्छे लड़कों को भी शक की नजर से देखा जाता हैं.”

डॉली—“हम्म…सही बात हैं.”

गाड़ी में ड्राईविंग करती डॉली के साथ राज की बातचीत चलती रही और गाड़ी आगे चलती गई.

पाँच दिन बाद सोलह जून, शुक्रवार को रात के दस बजे राज को ऑफ़िस से रिसींव करके डॉली गाड़ी चलाते हुए आ रही थी.

डॉली के मोबाइल पर कॉल आया. डॉली ने मोबाइल उठाकर देखा तो रंगीला का कॉल था.

राज—“किसका कॉल हैं ?”

डॉली—“रंगीला का.”

राज—“तो फिर रिसींव करो और बात करो.”

डॉली ने गाड़ी साइड में रोककर कॉल रिसीव करके मोबाइल कान से लगाया.

उम्र में तीस(30) साल का रंगीला कॉल पर पहले गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालने के बाद बोला—“साली, ये क्या नाटक शुरू किया हैं, तूने ?”

डॉली गुस्से में बोली—“ओए, मुँह संभालकर बात कर, समझा ना.”

रंगीला—“अरे, तू इसी लायक हैं. ये फेसबुक पर मेरे बारे में क्या लिख रही हैं ? हमारे बीच में जो कुछ भी हुआ, सब दोनों की मरजी से हुआ, समझी. मैनें कोई ब्लात्कार नहीं किया तेरा.”

डॉली—“हाँ, सब मरजी से हुआ और मैनें लिखा भी यहीं हैं. सब हम दोनों की मरजी से हुआ. लेकिन तूने प्यार और शादी के वादे किये थे, इसलिए मैं तेरे साथ सब कुछ करने के लिए तैयार हुई. वरना मुझे कोई शौक नहीं चढ़ा था, तेरे साथ बिस्तर पर सोने का.”

रंगीला—“लेकिन तेरी मरजी तो थी ना. फिर अब क्यों तिलमिला रही हैं ? उस वक्त तो तू भी बहुत लव यू–लव यू बोलकर मुझसे लिपटती थी. अब सारी गलती मेरी बता रही हैं.”

डॉली—“मैं तेरी बातें सुनकर, तेरे नाटक देखकर, तुझसे प्यार कर बैठी थी. इसलिए तेरी खुशी के लिए तुझसे लिपटती थी. समझा.”

राज ने डॉली के हाथ से मोबाइल छीनकर अपने कान पर लगाया.

रंगीला—“हाँ, मेरी खुशी के लिए. जैसे तूने तो मजे लिए ही नहीं. अब कान खोलकर मेरी बात सुन. ये सारे पोस्ट डिलेट कर और दूबारा तेरे किसी पोस्ट में मेरा नाम नहीं आना चाहिए. वरना उस रात तो तुझे जिन्दा छोड़ दिया था. इस बार बचेगी नहीं.”

राज—“उस रात मुझे भी मालूम नहीं था, तू इतना घटिया और कमीना इन्सान हैं. वरना आज तेरी उस करतूत का वीडियो भी देख रहे होते लोग. और कान खोलकर तू सुन. ना तो कोई पोस्ट डिलेट होगा और ना पोस्ट में तेरा नाम आना बन्द होगा.”

रंगीला—“तू कौन हैं ?”

राज—“मैं कोई भी हूँ, उससे तुझे मतलब नहीं हैं.”

रंगीला—“समझ गया………तो डॉली नया यार बना कर, नये यार के दम पर उछल रही हैं. साली ने गजब का मस्त नशीला खूबसूरत बदन पाया हैं, किसी को भी.”

राज बीच में बोला—“मुझे पता था, गन्दा इन्सान, गन्दी बात ही सोचेगा. मैं डॉली का यार भी हूँ, तब भी तेरे से तो अच्छा ही हूँ. और तू इतना घबरा क्यों रहा हैं ? डॉली के साथ फेसबुक और वॉट्सऐप पर हुई बातों के मैसेज तो तेरे पास भी होगे. अगर डॉली के पोस्ट में कोई बात झूठ हैं, तो पुलिस के पास चला जा.”

रंगीला ने चार–पाँच गन्दी–गन्दी गालियाँ निकालकर कहा—“तू रूक जा. तुझे तो मैं फुरसत से बताता हूँ, मैं कहाँ–कहाँ जा सकता हूँ ?”

रंगीला ने आखिर में एक और गन्दी गाली निकालकर कॉल काट दिया. राज ने मोबाइल डॉली को वापस दिया.

डॉली ने मोबाइल लेकर सामने रखते हुए राज से कहा—“क्या बोल रहा था ?”

राज—“क्या बोलेगा ? जिनके पास कुछ बोलने के लिए नहीं होता, वो लोग गाली निकालते हैं. वहीं निकाल रहा था.”

डॉली—“तुम्हें उसके साथ बात नहीं करनी थी. उसके साथ उसके जैसे और भी बहुत लड़के हैं. सब के सब मारपीट करने वाले, गुंडे टाइप.”

राज—“तुम चिन्ता मत करो. अभी नारायण की दुकान पर चलकर इसका ईलाज करते हैं.”
 
डॉली ने गाड़ी चलाते हुए गाड़ी आगे बढ़ाई और आम्रपाली सर्किल पर आकर डॉली ने गाड़ी नारायण की दुकान की तरफ मोड़कर रोज की तरह नारायण की दुकान के सामने लाकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

नारायण की दुकान के बाहर नारायण और अंकित बैठकर बातें कर रहे थे. राज और डॉली गाड़ी से उतरकर रोज की तरह अंकित और नारायण के पास आकर बैठे.

राज ने अंकित से कहा—“यार, आज इसके मोबाइल पर अभी कुछ देर पहले उस लड़के का कॉल आया.”

नारायण—“ले भाई, अंकित. अब पड़ गी तेरी जरूरत.”

अंकित—“कोई बात नहीं, क्या बोल रहा था ?”

राज—“बोलना क्या हैं ? बस गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था.”

डॉली—“उसके बहुत कॉन्टेक्ट हैं, शहर में.”

नारायण—“देख लेते हैं, उसके कॉन्टेक्ट.”

अंकित—“डॉली जी, आप डरो मत. आप तो बस उसका नम्बर बताओ.”

डॉली ने अंकित को अपना मोबाइल देते हुए कहा—“लास्ट कॉल उसी का हैं.”

अंकित ने डॉली से मोबाइल लेकर अपनी जेब से खुद का मोबाइल निकाला और फोनबुक में से गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाया.

उम्र में छत्तीस(36) साल के गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसीव करके कहा—“हाँ, अंकित बेटा.”

अंकित—“राम–राम काका(चाचा) जी.”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम.”

अंकित—“वो मैनें आपको मेरे दोस्त राज और डॉली के बारे में बताया था ना.”

गोविन्द बिशनोई—“हाँ.”

अंकित—“तो आज वो लड़का, जिसने डॉली को गर्लफ्रैंड बना रखा था और एक रात अपने दो दोस्तों के साथ डॉली की पिटाई करके डॉली को सड़क पर छोड़कर भाग गया था. वो लड़का अभी थोड़ी देर पहले डॉली के मोबाइल पर कॉल करके राज और डॉली को गालियाँ निकालकर धमकी दे रहा था.”

गोविन्द बिशनोई—“अच्छा बेटा, तू उसका मोबाइल नम्बर और उसका कोई फोटो हैं तो मुझे वॉट्सऐप पर मैसेज कर. और राज और उस लड़की को बोल दें, डरने या घबराने की कोई जरूरत हैं. राज के पास तो मेरा नम्बर हैं ही. उस लड़की को भी मेरा नम्बर दे देना और बोलना, दूबारा कभी उस लड़के का कोई फोन, कोई रास्ता रोकना, कोई भी ऐसी–वैसी बात हो, तो मुझे मिसकॉल कर दें. फिर मैं सब देख लूँगा.”

अंकित—“ठीक हैं, काका.”

गोविन्द बिशनोई—“और कोई समस्या ?”

अंकित—“नहीं, काका. और तो सब आपकी दया हैं.”

गोविन्द बिशनोई—“दया तो सब मालिक की हैं. अच्छा, मैं रखता हूँ.”

अंकित—“ठीक हैं, काका जी. राम–राम.”

गोविन्द बिशनोई—“राम–राम, बेटा.”

गोविन्द बिशनोई के कॉल काटने के बाद अंकित ने डॉली के मोबाइल में से रंगीला का नम्बर और फोटो निकालकर गोविन्द बिशनोई को मैसेज कर दिया.

अंकित ने डॉली को मोबाइल वापस देते हुए कहा—“लो, डॉली जी. अब दूबारा कभी उस लड़के का कोई कॉल या मैसेज आ जाए, तो मेरा नाम बदल देना.”

डॉली ने मुस्कुराकर पूछा—“कौन हैं, तुम्हारे काका जी ?”

नारायण ने हँसकर कहा—“इसके काका जी, शहर के सारे भाई लोगों के दादा जी हैं.”

डॉली हैरान होते हुए बोली—“भाई लोगों के दादा जी, मतलब ?”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“भाई लोग मतलब, जो गुंडे–बदमाश होते हैं ना.”

डॉली—“मतलब इसके काका जी भी गुंडे–बदमाश हैं ?”

राज—“नहीं–नहीं, गोविन्द जी बहुत अच्छे आदमी हैं.”

नारायण—“बाई………सीधी और साफ़ बात. गलत और बेकार लोगों के लिए गोविन्द जी गुंडे–बदमाश हैं और आपके–हमारे जैसे लोगों के लिए मददगार. अब देखो, किसी लड़की को कोई लड़का परेशान करता हो और वो लड़की अगर पुलिस के पास मदद माँगने जाती हैं, तो पुलिस उस लड़के को वॉर्निग, चैतावनी देकर छोड़ देती हैं. फिर वो लड़का अपने साथ पाँच–सात लड़कों को लेकर लड़की के घर आता हैं और लड़की और लड़की के घरवालों की बुरी तरह पिटाई करके चला जाता हैं. लेकिन अगर लड़की गोविन्द जी से मदद माँगें, तो गोविन्द जी उस लड़के को ऐसा सबक सिखाते हैं, फिर वो लड़का अपनी घरवाली को छेड़ने से भी डरता हैं.”

डॉली हँसकर बोली—“अच्छा.”

अंकित—“हाँ, एक बार शहर के बाहर एक गांव में गरीब लोगों के घरों पर कब्जा करने के लिए सत्तर–अस्सी गुंडे गए. उन गुंडों ने सारे गांववालों को लाठी–डंडों से बुरी तरह पीटा. औरतों को, बच्चों को, बुढ़ों को, किसी को भी नहीं छोड़ा. तीन–चार दिन तक सारे गांव में मातम सा छाया रहा. लोगों को समझ नहीं आ रहा था, कि अब क्या करें ? बड़े नेताओं का दवाब था, इसलिए पुलिस भी कुछ नहीं कर रही थी. फिर गांव के किसी आदमी ने यहाँ रहने वाले अपने रिश्तेदार को सारी बात बताई. उस रिश्तेदार ने गोविन्द काका से कहा. फिर बस. सात–आठ दिन के अन्दर–अन्दर गांव के जितने घर तोड़े थे, सारे घर उन तोड़ने वालों से ही दूबारा बनवाए. वो भी पहले से बढ़िया.”

डॉली—“हम्म…फिर तो बहुत अच्छे आदमी हैं. गरीब और मजबुर लोगों की मदद करते हैं.”

नारायण—“नहीं–नहीं, अमीर–गरीब, जाँत–पाँत से उनको मतलब नहीं हैं. वो बैकसूर और मासूम लोगों की मदद करते हैं.”

अंकित—“हाँ, मैनें आपके बारे में सब कुछ उनको बताया था. उन्होंने कहा, जो हो गया, उसको तो छोड़. अब दूबारा कोई ऐसी–वैसी बात हो, तो बस मिसकॉल कर देना.”

डॉली—“ओके, थैक्यू सॉ मच.”

राज—“अच्छा, अब तुम घर जाओ. देर हो रही हैं.”

डॉली कुर्सी से खड़ी होकर बोली—“हाँ, ठीक हैं.”

राज—“ध्यान से जाना और गाड़ी धिरे चलाना.”

डॉली ने जाते हुए मुड़कर कहा—“हाँ, यार. रोज जाती हूँ ना.”

डॉली मुस्कुराते हुए अपनी गाड़ी में जाकर बैठी और गाड़ी स्टार्ट करके चली गई.

छः दिन बाद बाईस जून, गुरुवार को रात के साढ़े दस बजे जयशर्मा और मिनी फर्श पर बिछाए हुए कालीन पर बैठकर अपने तीनों बच्चों उम्र में तैईस(23) साल की सृष्टी, उम्र में बीस(20) साल का अंकुश, उम्र में सोलह(16) साल का संयम और राज के साथ खाना खाते हुए सबके साथ टीवी में न्यूज देख रहे थे.

टीवी में न्यूज ऐंकर बोल रहा था—“राजस्थान के जाने–माने बिजनेसमैन सेठ साँवरमल बागड़ी की बेटी डॉली बागड़ी ने पिछले कुछ दिनों में फेसबुक पर एक के बाद एक बहुत से पोस्ट करके अपने धोखेबाज बॉयफ्रैंड रंगीला के बारे में कई खुलासें किये. अपनी बातों की सच्चाई साबित करने के लिए डॉली ने बाकायदा रंगीला के फेसबुक और वॉट्सऐप पर किये गए बहुत से मैसेज के स्क्रीन–शॉट अपडेट किये हैं. इन सभी स्क्रीन–शॉट में रंगीला खुद बड़ी बेशर्मी से अपनी करतूतें कबूल कर रहा हैं.

तीस साल का रंगीला शहर के बड़े कारोबारी किशन गंगवानी का छोटा बेटा हैं. रंगीला ने डॉली से पहले भी कई लड़कियों को अपने प्यार के जाल में फँसाकर उन लड़कियों से संबंध बनाए और मन भर जाने के बाद गन्दी–गन्दी बातें, जो हम यहाँ आपको बता भी नहीं सकते. ऐसी बातें बोलकर उन लड़कियों को छोड़ दिया. डॉली के फेसबुक पोस्ट से प्रेरणा लेकर उनमें से एक लड़की ने हिम्मत दिखाई और उसने भी रंगीला के बारे में सोशल साइट्स पर पोस्ट करके कई खुलासे किये हैं.

आप यकिन नहीं करेंगे, जब लड़की को अपने प्यार के जाल में फँसाना हो, तब ये रंगीला इतनी अच्छी–अच्छी और इतनी मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें करता हैं, जैसे ये दुनिया का सबसे अच्छा लड़का हैं. रंगीला की नोटंकी भरी बातें आप पढ़ेगें, तो हैरान रह जाएँगे. कभी वो सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र बन जाता हैं. कभी ऐसे दिखाता हैं, जैसे दुनिया का सबसे परेशान और दुःखी आदमी हैं. लड़कियाँ रंगीला की इसी नाटकबाजी से प्रभावित होकर रंगीला के प्रेमजाल में फँस जाती हैं.

बहरहाल, डॉली ने रंगीला के खिलाफ कोई पुलिसकेस नहीं किया हैं. डॉली ने अपने फेसबुक पोस्ट में कहा हैं, कि वो सिर्फ इस लड़के की सच्चाई सबको बताना चाहती हैं. उसका अब रंगीला से शादी करने का भी कोई इरादा नहीं हैं.

डॉली ने न सिर्फ रंगीला के बारे में लिखा हैं, बल्कि ये भी बताया, कि रंगीला के घरवालें रंगीला के बारे में सब कुछ जानते हुए भी किस तरह हर बार रंगीला को बचा लेते हैं और रंगीला को भोला–भाला और मासूम बताकर रंगीला की शिकार बन चुकी लड़कियों और महिलाओं को ही चरित्रहीन साबित कर देते हैं.

इसके इलावा डॉली ने कई ऐसे सवालों के जवाब भी दिये हैं, जो अक्सर लड़कियों पर उठाए जाते हैं.

डॉली खुद शराब पीने और रात–रातभर घर से बाहर घूमने के लिए बदनाम हैं. डॉली ने अपने कुछ पोस्ट में स्वीकार किया, शराब पीना बहुत गलत बात हैं. वो खुद अब धिरे–धिरे शराब पीना छोड़ रही हैं. शराब के आदी हो चुके लोगों को शराब छोड़ने के लिए कहना या शराब पीने से रोकना बहुत अच्छी बात हैं. लेकिन अगर कोई शराब पीने वाला या शराब पीने वाली किसी दूसरे के साथ कुछ बुरा नहीं करें, तो उस शराब पीने वाले के साथ कुछ गलत करना सही नहीं ठहराया जा सकता.

रात को बाहर घूमने के बारे में डॉली ने लिखा, रात को घर से बाहर निकलना गलत नहीं हैं. लेकिन बढ़ते अपराध को देखते हुए बहुत खतरनाक हैं और खतरनाक सिर्फ लड़कियों और महिलाओं के लिए ही नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए भी हैं. बहुत से पुरुषों के साथ लूटपाट और गुंडे–मवालियों के साथ मारपीट की घटनाएँ होती हैं. ऐसा सिर्फ रात में ही नहीं, सुनसान जगहों पर दिन में भी होता हैं. इसलिए लड़का हो या लड़की, नारी हो या पुरुष, हम सबको इन खतरों से सावधान रहना चाहिए. कुछ लोग रात में नौकरी करते हैं, तो उनको रात के समय ही घर से बाहर निकलना पड़ेगा. कभी घर में अचानक रात के समय किसी की तबीयत खराब हो जाए, तो वो डॉक्टर के पास जाने के लिए सुबह होने का इंतजार नहीं कर सकते. ऐसे में अगर उनके साथ कुछ गलत लोग कुछ बुरा कर देते हैं, तो गलत बुरा करने वाले होते हैं. जिनके साथ बुरा हुआ हैं, वो गलत नहीं होते.

इसके इलावा लड़कियों के कपड़ों, लड़कियों के नौकरी करने पर सवाल उठाने वालों को भी डॉली तो बहुत सटीक जवाब देकर उनसे पूछा हैं कि लड़की अगर सलवार–सूट या साड़ी पहनती हैं तो लड़कियों को बहन जी या अन्टी जी बोलकर चिढ़ाया जाता हैं, उनका मजाक उड़ाया जाता हैं. लड़कियों और महिलाओं को बोला जाता कि लड़कियों और महिलाओं को क्या पता ? पैसे कैसे कमाए जाते हैं ? और अगर लड़कियाँ और महिलाएँ फैशन के हिसाब से कपड़े पहने, नौकरी करें तो उनको बेशर्म बोलते हैं. आखिर लड़कियाँ और महिलाएँ अपनी मरजी से क्यों नहीं जी सकती ?

डॉली ने अपने कुछ पोस्ट में शादी के वादे पर भरोसा करके प्यार के नाम पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए राजी होने वाली लड़कियों को भी सलाह देते हुए लिखा, जिस लड़के को शादी करनी हैं, वो शादी से पहले शारीरिक संबंध बनाने की जिद क्यों करेगा ? शादी के बाद शारीरिक संबंध तो बनाने ही हैं, शादी के बाद बच्चे भी होगें. जो लड़के कहते हैं, मैं अभी शादी नहीं कर सकता, लेकिन प्यार के बिना नहीं रह सकता. ऐसे लड़के असल में हवस के भूखे जानवर होते हैं, वो अपनी हवस को प्यार का नाम देते हैं. ऐसी बातें करने वाले लड़के भरोसे के लायक नहीं होते, इनको जहाँ कोई खूबसूरत लड़की या कोई खूबसूरत महिला दिखती हैं, ये वहीं फिसल जाते हैं. इसलिए लड़कियों को अगर खुशहाल शादीशुदा जिन्दगी बितानी हो, तो ऐसे लड़कों से तुरन्त दूर हो जाना चाहिए.

अब डॉली की ये सलाह कितनी लड़कियाँ मानती हैं ? ये तो लड़कियों पर ही निर्भर करता हैं.

सुनने में आया हैं, डॉली ने ये पोस्ट वैशाली नगर के आम्रपाली इलाके में रहने वाले कुछ लड़कों की सलाह पर किये हैं. उनमें से एक लड़के का नाम राज बताया जा रहा हैं, जो शहर के बड़े व्यवसायी जयशर्मा के ऑफ़िस में नौकरी करता हैं. डॉली राज को जनवरी की शुरुआत में एक रात नशे की हालत में सड़क पर पड़ी मिली थी, जहाँ डॉली का बॉयफ्रैंड अपने कुछ दोस्तों के साथ डॉली को पीटने के बाद छोड़कर भाग गया था. राज ने पुलिस के चक्कर में पड़ने से बचने के लिए पुलिस को तो कुछ नहीं बताया, लेकिन डॉली को अपने घर ले गया.

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“क्या बात हैं, राज. तुम तो छा गए.”

राज खाना खाते हुए मुस्कुरा दिया.

मिनी ने हँसकर कहा—“और इसके साथ आपका नाम भी टीवी पर आया.”

सृष्टी—“लेकिन पापा, अगर इस लड़के को सजा मिलती तो और भी अच्छा होता. फेसबुक पर पोस्ट करने से इसे क्या फर्क पड़ेगा ?”

जयशर्मा—“सजा मिलनी तो चाहिए. लेकिन डॉली ने इतना कर दिया वहीं बहुत हैं. वरना लड़कियाँ और महिलाएँ ऐसी बातें बोलती कहाँ हैं ? अब कम से कम हर कोई इसके बारे में जान तो गया. सब कुछ जानने के बाद कोई जान–बुझकर कुँए में गिरना चाहे, उसका कोई ईलाज नहीं हैं.”

राज अपना खाना खतम करके उठा और हाथ–मुँह धोकर कहा—“अच्छा सेठ जी. मैं चलता हूँ.”

जयशर्मा—“हाँ, ठीक हैं.”

अँकुश ने दरवाजे की तरफ मुड़ते राज से कहा—“भईया, अब डॉली के साथ सुबह–शाम आना–जाना छोड़ दो.”

राज ने रूककर कहा—“क्यों ? क्या हुआ ?”

अँकुश—“मेरा मतलब, डॉली से शादी करके हमेशा डॉली के साथ ही रहो ना.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“बेवकूफ, ऐसा कुछ नहीं हैं. मैं सिर्फ उसे दोस्त मानता हूँ.”

सृष्टी—“बस–बस, ज्यादा बनो मत. हमें सब पता हैं.”

मिनी—“अरे…क्यों छेड़ रहे हो, भईया को ? राज, तुम जाओ. ये तो दोनों तो बस मजाक कर रहे हैं.”

राज मुस्कुराते हुए मुड़कर दरवाजें की तरफ आकर दरवाजा खोलकर घर से बाहर आया और अपने जूते पहनकर मुख्य दरवाजे से बाहर आकर मुख्य दरवाजा बन्द करते हुए कुर्सी पर बैठे बहादुर से बोला—“कैसे हो, बहादुर जी ?”

बहादुर—“अच्छा हूँ. खाना खा लिया सबने ?”

राज—“हाँ, मैनें तो खा लिया. बाकि सब अभी खा रहे हैं. ठीक हैं फिर, चलते हैं.”

राज चलते हुए डॉली की गाड़ी के पास आकर गाड़ी का दरवाजा खोलकर गाड़ी में बैठा और गाड़ी का दरवाजा वापस बन्द करके बोला—“कॉन्ग्राचुलेशन, अभी सेठ जी के घर टीवी में तुम्हारे फेसबुक पोस्ट की न्यूज देखकर आ रहा हूँ. अब तो न्यूज देखने वाले सभी लोग उस लड़के के कमीनेपन के बारे में जान जाएगें.”

डॉली—“हम्म…चलो, अंकित और नारायण जी को भी बताते हैं.”

राज—“हाँ, चलो.”

डॉली गाड़ी स्टार्ट करके चल पड़ी और नारायण की दुकान के सामने आकर गाड़ी रोककर बन्द कर दी.

राज और डॉली गाड़ी के दरवाजे खोलकर गाड़ी से उतरे और दरवाजे बन्द करके नारायण की दुकान पर आए.

अंकित के साथ चौकी पर बैठा नारायण चौकी से उठकर दुकान के अन्दर गया और दो कुर्सियाँ लाकर बाहर रख दी. राज और डॉली कुर्सियों पर बैठ गए. नारायण वापस अंकित के पास चौकी पर बैठ गया.

राज कुर्सी पर बैठकर बोला—“आज तो डॉली के पोस्ट न्यूज में भी आ गए. न्यूज में उसका नाम सुना धोखेबाज बॉयफ्रैंड रंगीला.”

नारायण—“हम तो सुबह से ही देख रहे हैं.”

अंकित—“ये अब देखकर आया होगा.”

राज ने डॉली से कहा—“तुम चुप क्यों हो ?”

डॉली—“मुझे तुमसे एक बात पूछनी थी



राज—“हाँ, तो पूछ लो. सोच क्या रही हो ?”

डॉली राज से बोली—“मुझे रंगीला पर गुस्सा आता हैं, मुझे उससे चिढ़ होती हैं. क्योंकि उसने मुझे धोखा दिया. लेकिन तुम उससे इतनी नफ़रत क्यों करते हो ? उसको बुरा तो नारायण जी और अंकित भी बोलते हैं. लेकिन उसके लिए तुम्हारा गुस्सा………रंगीला के लिए तुम्हारा गुस्सा देखकर कभी–कभी बहुत हैरानी होती हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“मुझे हर धोखेबाज से नफरत हैं. धोखा चाहे प्यार के नाम पर दिया गया हो या रुपये–पैसे लुटने के लिए किसी को मुर्ख बनाया हो. बस चिढ़ हैं मुझे, धोखेबाजों से.”

डॉली—“लेकिन इतनी चिढ़ ? इतनी चिढ़ तो उसी को हो सकती हैं, जिसके साथ कोई ना कोई बड़ा धोखा हुआ हो.”
 
राज ने मुस्कुराकर कहा—“ये बात अंकित और नारायण भी मुझसे कई बार पूछ चुके हैं. चलो, आज तुम तीनों को बता ही देता हूँ.”

अंकित—“हाँ, बता भाई.”

नारायण—“आज राज से परदा उठा ही दें.”

राज—“हाँ, तो सुनो. अखबारों और टीवी में कुछ ऐड(विज्ञापन) तो तुम सबने पढ़े और देखे ही होंगे. पाँच दिन में काले से गोरे हो जाओ, दस दिन में मोटे से पतले हो जाओ, पन्द्रह दिन में दुबले–पतले से बॉडी–बिल्डर बन जाओ. इसके इलावा ये यंत्र रखने या पहनने से कष्ट दूर हो जाएगे. वो यंत्र रखने से लक्ष्मी माता प्रसन्न हो जाएगी. हमारी मालाएँ पहनने से भगवान खुश हो जाएगे, हमारे ताबिज पहनने से अल्लाह खुश हो जाएगा. इस तरीके से औरत वश में आ जाती हैं, उस तरीके से संतान–सुख मिलेगा. प्रेम–समस्या, गृह–क्लेश, सौतन से छुटकारा वगैरह–वगैरह. इस तरह के बहुत सारे विज्ञापन अखबारों में और आजकल तो कई टीवी चैनलों में भी आते रहते हैं.”

नारायण—“हाँ, भाई. भोत(बहुत) आवे.”

अंकित—“और बहुत सारे लोग ये ऐड और विज्ञापन पढ़कर लूट भी जाते हैं.”

राज—“हम्म………अब से साढ़े चार साल पहले मैनें भी अखबार में ऐसे ही एेड पढ़े. घर बैठे बीस हजार कमाओ, घर बैठे तीस हजार कमाओ, घर बैठे पचास हजार कमाओ. उन विज्ञापनों में से एक विज्ञापन पढ़कर एक दिन मैनें एक जगह कॉल किया. उन लोगों ने बहुत प्यार और अपनेपन से बहुत इज्जत देकर बात की और कहा कि आप आ जाओ. आपको बहुत बढ़िया सी नौकरी दे देगें. ये कर देगें, वो कर देंगे, वगैरह–वगैरह. मिठ्ठी–मिठ्ठी बातें की.”

डॉली—“फिर ?”

राज—“फिर मैनें सोचा इतने बढ़िया तरीके से प्यार और अपनेपन से बात कर रहे हैं. ये लोग तो बहुत अच्छे हैं. मुझे जरूर कोई बढ़िया सी नौकरी दिला देगें.”

नारायण—“फिर तू यहाँ आ गया.”

राज—“हाँ, फिर मैं खुशी–खुशी यहाँ आने के लिए तैयार हो गया. मेरे घरवालों ने मुझे बहुत मना किया, लेकिन मैनें उनकी एक नहीं सुनी. मैनें सोचा, ये तो ऐसे ही जाहिल लोग हैं. इनको क्या पता, नौकरी के बारे में ?” अखबार के ऐड झूठे तो हो नहीं सकते.”

डॉली—“फिर तुमने क्या किया ?”

राज—“फिर मेरे घरवालों ने मुझे पैसे देने से मना कर दिया और मेरे खुद के पैसे भी मुझसे छीन लिए. मैनें अपने पाँच दोस्तों से एक–एक हजार करके पाँच हजार रुपये उधार लिए और अपने मम्मी–पापा और भाई–भाभी को बहुत भला–बुरा बोलकर, बहुत बातें सुनाकर घर से निकल आया.”

नारायण—“ये तो तूने गलत किया, तेरे घरवाले तेरे भले की बात कर रहे थे.”

राज—“हाँ, ये बात मुझे बाद में समझ आई.”

अंकित—“फिर यहाँ आने के बाद क्या हुआ ?”

राज—“यहाँ आने के बाद मैनें उन नौकरी देने वालों को कॉल किया, उन लोगों ने पता–ढिकाना बता दिया. ये गुलाब गैस एेजेन्सी के पास उनका ऑफ़िस था. मैं यहाँ उनके ऑफ़िस आया, ऑफ़िस में साड़ी और सुट पहने हुए चार–पाँच लड़कियाँ और महिलाएँ थी. कोट–पेन्ट पहने हुए चार–पाँच लड़के और आदमी थे. सबसे पहले तो उन लोगों ने पाँच सौ रुपये कोई रजिस्ट्रेशन करने के माँग लिए.”

डॉली—“फिर तुमने दे दिये ?”

राज—“पहले मैनें उन लोगों से कहा, आपने तो कहा था, कोई पैसे नहीं लगेगे. उन लोगों ने कहा, लेकिन फार्म भरने और रजिस्ट्रेशन के पैसे तो देने पड़ेगें. मैनें पाँच सौ रुपये रजिस्ट्रेशन के और पन्द्रह सौ रुपये कोई फार्म भरने के दे दिये. उन लोगों ने कौनसा रजिस्ट्रेशन किया और कौनसा फार्म भरा, मुझे आज तक नहीं पता. मैनें सोचा, चलो दस–बीस हजार की नौकरी के लिए दो हजार खर्च करने में क्या बुराई हैं ?”

अंकित—“फिर.”

राज—“फिर उन लोगों कहा, पाँच हजार और जमा करवा दो और तुम भिवाड़ी चले जाओ. वहाँ तुम्हें दस हजार की नौकरी मिल जाएगी.”

नारायण—“हाँ, ये लोग फ्रोड होवे. फेर के होयो ?”

राज—“फिर मैनें कहा, कौनसी नौकरी मिलेगी ? मुझे करना क्या होगा ? इसके बारे में तो कुछ बताओ ? तो उन्होंने कहा, ये सब वो भिवाड़ी वाले ही बताएगें. मैनें कहा, ये तो सरासर धोखा हैं. पहले बोलते हो, कोई पैसा नहीं लगेगा. अब बात–बात पर रुपये माँग रहे हो.”

डॉली—“फिर क्या कहा, उन लोगों ने ?”

राज—“वो लोग बोले, पैसे हैं, तो भिवाड़ी चले जाओ. वरना भागो यहाँ से.”

अंकित—“तुझे जूता निकालकर मारना था उन सबको.”

राज—“मैं पहली बार आया था, यार. वो भी घरवालों को गालियाँ निकालकर.”

नारायण—“हाँ, समझ गया. पूरी बात बता, फेर आगे क्या हुआ ?”

राज—“फिर मैनें कहा, लाओ मेरे दो हजार वापस करो. मुझे नहीं करनी नौकरी. उन लोगों ने कहा, ये अब नहीं मिलेगें.”

अंकित—“फिर ?”

राज—“फिर मैं उनसे झगड़ा करने लगा तो मुझे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया. मैनें मन में सोचा, घरवालों को इतना भला–बुरा बोलकर आया हूँ. अब तो वो लोग मुझे घर में घूसने भी नहीं देगें. वापस गया तो दोस्त लोग भी अपने पैसे माँगेगें. इस तरह की बातें सोचकर मैनें उन लोगों के पास जाकर हाथ जोड़कर कहा, मैं कोई पैसे वाला नहीं हूँ. मेरा बड़ा भाई घर पर एक छोटी सी दुकान करके सारा घर चलाता हैं. मेरे पास पैसे नहीं हैं. मेरे ऊपर दया करो.”

अंकित—“फिर ?”

राज—“फिर वो सब गालियाँ निकालकर बोले, पैसे नहीं हैं तो भाग जा. जा पुलिस में रिपोर्ट लिखा दे हमारे खिलाफ़.”

डॉली—“ओह…फिर ?”

राज—“फिर मैनें हजार रुपये अपने पास रख लिए और उनको दो हजार देकर कहा, मेरे पास इतने ही हैं. उन लोगों ने कहा, इतने में तो पाँच हजार वाली नौकरी मिलेगी.”

डॉली—“फिर दिलवाई उन लोगों ने नौकरी.”

नारायण—“कौनसी नौकरी ? बाई… चार हजार डकार लिए होगे.”

अंकित—“पहले पूरी बात तो सुन लो, यार.”

नारायण—“हाँ, बता भाई. पहले पूरी बात बता.”

राज—“फिर मैनें उनसे कहा, वो पाँच हजार वाली नौकरी ही दिला दो. मैनें सोचा, चलो चार हजार रुपये देकर पाँच हजार रुपये महिने की नौकरी मिल रही हैं. दो महिने नौकरी करके दस हजार लेकर घर चले जाएगें. पैसे देखकर शायद घरवालें घर में घूसा ले.”

अंकित—“फिर ?”

राज—“फिर ये सोचकर मैं भिवाड़ी चला गया. शाम को वहाँ दो पच्चीस–तीस(25–30) साल के बिल्कुल नशेड़ी लड़के मुझे रिसींव करने आए. पता नहीं कौनसा नशा करते थे, एक दम नशेड़ी थे काले–पीले रंग के. वो दोनों मुझे एक मौहल्ले में ले गए. उस मौहल्ले में सब उन लड़कों की तरह नशेड़ी, सब के सब नशे में दिखाई दे रहे थे. उस मौहल्ले में एक खण्डर जैसा घर, फर्श टूटा–फूटा कंकर बिखरे हुए. दीवारें पुरानी सी, दीवारों को देखकर लग रहा था, जैसे अभी गिरेगी. छत टूटी हुई सी. उस घर में ले जाकर उन लड़कों ने मुझे कहा. ये तेरे रात को रहने की जगह हैं.”

डॉली—“ओह…बहुत ही कमीने लोग निकले वो.”

राज—“अभी आगे तो सुनो, मेरी हालत क्या हुई ?”

डॉली—“हाँ, बताओ ?”

राज—“मैनें वो घर देखकर कहा, मैं इन्सान हूँ, भूत नहीं हूँ. मैं यहाँ नहीं रह सकता. उन लड़कों ने मुझे धक्का देकर कहा, रहना तो यहीं पड़ेगा. एक महिने से पहले तू कहीं नहीं जा सकता.”

अंकित—“फिर ?”

राज—“फिर मैं डरकर बूरी तरह घबरा गया और चुपचाप बैठ गया. रात को एक लड़का खाना लेकर आया. एक दम बेकार खाना आया, दो–तीन दिन की सुखी रोटियाँ और सड़ी–गली बासी हुई सब्जी. मैनें कहा, ये मैं नहीं खा सकता. वो लड़का बोला, यहाँ तो यहीं मिलता हैं. खाना हैं, तो खा. मैं बिना खाना खाए ही सो गया.”

डॉली—“फिर ?”

डॉली—“फिर रात को मेरे सोने के बाद उन लोगों ने मेरे पैसे भी निकाल लिए. वो तो अच्छा हुआ मैनें पाँच सौ रुपये अलग से छुपाकर रखे हुए थे, इसलिए वहाँ से आ सका. दूसरे दिन मुझसे एक फैक्टरी में कचरा और गन्दगी साफ़ करवाई, जो कचरा जम जाता हैं, काले रंग का वो.”

नारायण—“फेर ?”

राज—“फिर मैं रात को दो–तीन बजे चोरी–छुपे अपना बैग उठाकर चलते–चलते बहुत दूर तक आकर एक ऑटो स्टैण्ड पर आया और छुपकर बैठ गया. सुबह होने के बाद एक ऑटो में बैठकर वहाँ से दूसरी जगह आया. फिर वहाँ से बस पकड़कर गुड़गांव आया. फिर गुड़गांव से वापस इस शहर में आकर उनके ऑफ़िस गया तो देखा, उनके ऑफ़िस पर तो ताला लगा हुआ था. आस–पास के लोगों से उनके बारे में पूछा, तो पता चला. उन लोगों एक महिने के लिए वो ऑफ़िस किराये पर लिया था और सात–आठ दिन बाद ही गायब हो गए.”

नारायण—“ऐसे लोगों का यहीं धंधा हैं. सीधे–साधे, भोले–भाले लोगों को लालच देकर ठगना.”

राज—“हाँ, उस दिन मैं इतने गुस्से में था. अगर वो लोग मिल जाते, तो या मैं उन लोगों को मार डालता या फिर वो लोग मुझे मार डालते. लेकिन मेरे वापस आने से पहले ही वो सब भाग गए.”

डॉली—“फिर तुमने क्या किया ?”

राज—“मैं क्या करता ? घरवालों को इतना ज्यादा भला–बुरा बोलकर आया था, जिसके कारण घर वापस जाने की और घरवालों को अपना हाल बताने की हिम्मत नहीं थी. वहाँ भिवाड़ी में गन्दा काला कचरा साफ़ करने के कारण मेरे कपड़े पूरी तरह खराब थे और मेरे पास सिर्फ पचास रुपये बचे थे. उन पचास रुपयों से मैनें पहले दिन तो खाना खा लिया. फिर अगले तीन दिन तक भूख से बूरी तरह तड़पा. चौथे दिन एक सब्जीमंडी में खड़ा था. मेरी हालत इतनी ज्यादा खराब थी, कोई मुझे अपने पास खड़ा भी नहीं होने दे रहा था. सब दुत्कार कर दूर भगा रहे थे. चल हट, हूड़, भाग यहाँ से. रात के ग्यारह बजे बाद सब्जीमंडी के सारे सब्जी वाले अपनी सड़ी–गली बची हुई फल–सब्जियाँ नीचे कचरे में फेंककर चले गए. सबके जाने के बाद जब वहाँ कोई नहीं था, तब भूख से तड़पते हुए मैनें रोते–रोते कचरे में से चीकू, आम, केले, संतरे वगैरह उठाए और एक मन्दिर के आगे लगे पानी के नल से धोकर वो सड़े–गले फलों से अपनी भूख मिटाई. अगले तीन दिन में मैनें दो बार उस सब्जीमंडी के कचरे में से फल उठाकर धोकर खाए थे.”

अंकित—“अरे, यार………”

राज—“एक और बात, दिन में तो मुझे मन्दिर के पास भी खड़ा नहीं होने देते थे. इतनी खराब हालत हो गई थी मेरी.”

डॉली—“फिर क्या हुआ ?”

राज—“फिर मैं जैसे तुम खुद को कोस–कोस कर गाड़ी में रोती थी, मैं भी उसी तरह रोते हुए खुद को कोसता रहता था. आठवें दिन सुबह–सुबह मैं एक दुकान की सीढ़ियों पर बैठा रोते हुए सोच रहा था, ये घर बैठे बीस–तीस, पचास हजार कमाने वाले विज्ञापन पढ़कर बीस–तीस, पचास हजार की नौकरी के चक्कर में घर में मम्मी–पापा और भाई–भाभी सबको बैईज्जत करके आया और यहाँ आकर क्या हालत हो गई ? उसी वक्त वहाँ से मिनी मैडम अपनी गाड़ी से गुजरी. उनकी नजर मुझ पर पड़ गई. मुझे रोते देखकर उन्होंने गाड़ी रोकी और गाड़ी से उतरकर मेरे पास आकर मेरे रोने कारण पूछा. उनको लगा, कोई भिखारी भूख से तड़पकर रो रहा होगा. मैनें रोते हुए अपनी आपबीती उनको सुनाई. मेरी पूरी बात सुनने के बाद मिनी मैडम ने मेरे आँशू पोंछकर कहा, रोना बन्द करो. चलो उठो, गाड़ी में बैठो और मेरे साथ चलो. वो मुझे गाड़ी बिठाकर अपने घर ले आई और सेठ जी के कपड़े देकर नहाने के लिए बोली. नहाने के बाद मैडम ने मुझे खाना खिलाया और नीचे सेठ जी के पास ले जाकर सेठ जी को सारी बात बताई. सेठ ने मुझसे मेरे बारे में पूछा और कहा, नौकरी तो तुम हमारे पास कर लो. मैं दो–चार दिन में कोई किराये का कमरा दिलवा दूँगा. तब तक एक बार दो–चार दिन के लिए हमारे घर रूक जाओ. मैनें तो मिनी मैडम और सेठ जी के पैर पकड़ लिए और कहा, अगर आप लोग मेरी मदद नहीं करते, तो पता नहीं मेरा क्या हाल होता ?” शाम को मैडम और सेठ जी मुझे बाजार ले जाकर दो जोड़ी कपड़े भी दिलवा लाए. मेरे घर पर फोन करके मेरे घरवालों को भी सारी बात बताई और कहा, अब राज हमारे पास हैं. आप बिल्कुल भी चिन्ता मत करो. तब से साढ़े चार साल से ज्यादा टाइम हो गया. मैं सेठ जी के पास ही नौकरी कर रहा हूँ. हौली–दिवाली–रक्षाबन्धन और कोई काम हो, तो बस दो–चार दिन के लिए घर जाता हूँ. बाकि टाइम यहीं नौकरी करता हूँ.”

डॉली—“हम्म………रियली तुम्हारे सेठ जी और मिनी मैडम तो बहुत भले लोग हैं.”

अंकित—“हाँ, ऐसे लोग तो आजकल मिलते ही नहीं हैं.”

नारायण—“वाह…भाई. लोग हो तो तेरे सेठ जी और मैडम जैसे.”

राज—“हाँ, मिनी मैडम और सेठ जी की तो जितनी तारीफ़ करूँ, उतनी कम लगती हैं. जब सब मुझे दुत्कार कर दूर भगा रहे थे, उस वक्त मिनी मैडम मेरे आँशू पोंछकर मुझे अपने घर ले आई और सेठ जी ने अपने पास नौकरी दे दी.”

डॉली—“सही बात हैं.”

राज—“लेकिन वो धोखेबाज लोग आज भी मुझे खटकते हैं, जिनके कारण मेरी वो हालत हुई थी. मैं उन लोगों का तो कुछ नहीं बिगाड़ पाया. लेकिन मुझे हर धोखेबाज में वहीं लोग नजर आते हैं. जब भी किसी धोखेबाज के बारे में सुनता हूँ, तो मेरा खून खोलने लगता हैं. मुझे यहाँ बुलाकर मेरी वो हालत करने वालों में लड़कियाँ और महिलाएँ भी थी. इसलिए मैनें तुमसे कहा था, अपने को लड़का–लड़की या नारी–पुरुष का कॉम्पीटिशन नहीं करना. अपने को एक धोखेबाज की धोखेबाजी सबको बतानी हैं.”

डॉली—“अब जो लोग गलत हैं, वो तो गलत ही हैं. इसमें लड़का–लड़की और नारी–पुरुष क्या करना ?”

अंकित—“तो इसलिए तुझे डॉली जी से हमदर्दी और उस लड़के से नफ़रत हो गई.”

राज—“हाँ, धोखे अलग–अलग हैं, लेकिन हम दोनों का दर्द एक जैसा ही था. मैं जब भी डॉली को रोते हुए देखता था, तो मुझे अपनी हालत याद आ जाती थी. मैं पैसे के लालच में खुद ही मुर्ख बनने यहाँ आया था और डॉली प्यार के लालच में उसकी बातों के जाल में फँस गई.”

नारायण—“सब ऐसे ही फँसते हैं. फर्क सिर्फ इतना हैं, जिसने खुद दुःख–दर्द देखे हैं, वो दूसरों के दुःख–दर्द समझता हैं. बाकि लोग बस मजाक उड़ाते हैं, बातें करते हैं.”

राज—“मेरा तो ये मानना हैं, जब तक अपराधी के मन में डर नहीं होगा, तब तक वो अपराध करता रहेगा. इसलिए हर अपराधी को बुरी से बुरी सजा मिलना बहुत जरूरी हैं. अपराधी दो तरह के होते हैं, एक तो अन्जाने में या मजबुरी में अपराध करने वाले. दूसरे सोच–समझकर जान–बुझकर अपराध करने वाले. इन सोच–समझकर जान–बुझकर अपराध करने वालों को किसी भी हालत में माफ़ नहीं करना चाहिए. ये लड़की छेड़ने वाले, महिलाओं से बदतमीजी करने वाले, प्यार के चक्कर में फँसाने वाले, ऐसे घटिया लोगों की कोई मजबुरी नहीं होती. इन लोगों को अच्छी तरह पता होता हैं, ये गलत कर रहे हैं. इनको तो किसी भी हालत में छोड़ना नहीं चाहिए. लेकिन इसके उस बॉयफ्रैंड को सजा दिलाने का तो कोई रास्ता नजर आया नहीं. क्योंकि डॉली ने सब कुछ अपनी मरजी से किया था. इसलिए मैनें सोचा, सजा नहीं तो कम से कम उसकी धोखेबाजी तो सबके सामने आए.”

अंकित—“चलो, ये काम तो हो गया. उस लड़के के बारे में इतना सब जानने के बाद. अब शायद ही कोई लड़की उससे शादी करेगी.”

नारायण—“नहीं, शादी तो उसकी हो जाएगी. अब नहीं, तो कुछ साल बाद हो जाएगी.”

अंकित—“उसके बारे में सब कुछ जानने के बाद भी कौनसी लड़की उससे शादी करना चाहेगी ?”

नारायण—“दुनिया में लालची, मुर्ख और महान लड़कियाँ बहुत हैं. वो बहुत पैसे वाला हैं, इसलिए कोई पैसे की लालची लड़की उससे शादी कर सकती हैं. कुछ मुर्ख लड़कियों को लड़के के गलत करमों के बारे में सब कुछ मालूम होता हैं, फिर भी वो मुर्ख लड़कियाँ सोचती हैं, अब आगे भविष्य में लड़का कोई गलत काम नहीं करेगा और कुछ महान लड़कियाँ होती हैं, जो गलत, बेकार, घटिया और गन्दे लड़कों को प्यार और अपनेपन से सुधारने के नाम पर किसी घटिया लड़के से शादी कर लेती हैं. इस लड़के को भी देर–सवेर कोई ना कोई ऐसी लालची, मुर्ख या महान लड़की मिल जाएगी.”

राज—“बस इसलिए तो दुनिया में गलत लोगों का बोलबाला हैं. और सबसे ज्यादा गुस्सा तो इन महान लोगों पर आता हैं. क्योंकि लालची और मुर्ख लड़कियाँ तो एक से बचेगी, तो दूसरे का शिकार बन जाएगी. दूसरे से बचेगी, तो तीसरे या चौथे का शिकार बन जाएगी. लेकिन ये महान लड़कियाँ सब कुछ जानते हुए भी अच्छे लोगों को ठोकर मारकर घटिया लोगों को प्यार और अपनापन देती हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“इनमें से मैं कौनसी कैटेगरी में आती हूँ ?”
 
राज—“तुम मुर्ख लड़कियों वाली कैटेगरी में आती हो और मैं लालची लोगों वाली कैटेगरी में आता हूँ. क्योंकि मैं भी साढ़े चार साल पहले पैसे के लालच में धोखा खाने के लिए खुद चलकर गलत लोगों के पास आया था.”

अंकित—“कोई बात नहीं, भाई. अब भूल जाओ, सारी पुरानी बात.”

राज—“हाँ, अब तो भूल ही गए हैं.”

नारायण—“अब जो हो गया, उसको बदल तो सकते नहीं. इसलिए भूलने में भी फायदा हैं.”

राज ने डॉली से कहा—“हाँ, तुम भी सब कुछ भूल जाओ और इसके बारे में और जितनी बातें रह गई हैं. वो सब पोस्ट कर दो. फिर अपने फ्यूचर(भविष्य) के बारे में सोचो.”

डॉली—“अब कैसा फ्यूचर ? मेरे मॉम–डेड के बारे में तो तुम्हें बताया ही हैं. घर में मॉम–डेड, बाहर ये रंगीला जैसे लोग. अच्छा, अब मैं चलती हूँ. जब से मैनें फेसबुक पर पोस्ट करने शुरू किये हैं, मॉम–डेड दोनों बहुत नाराज हैं.”

राज—“तुम चिन्ता मत करो. मैं मेरे सेठ जी और मैडम से इस बारे में बात करूँगा. वो तुम्हारे मम्मी–पापा को जानते भी हैं, वो जरूर तुम्हारी मदद कर देगें.”

डॉली कुर्सी से खड़ी होकर बोली—“चलो, बाद में सोचेगें इस बारे. अभी मैं चलती हूँ.”

राज—“हाँ, ठीक हैं.”

डॉली—“बाऐं नारायण जी, बाऐं अंकित.”

डॉली गाड़ी की तरफ जाने लगी.

नारायण—“ध्यान से जाना, गाड़ी धिरे चलाकर.”

डॉली ने अपनी गाड़ी का दरवाजा खोलकर कहा—“अरे, क्यों इतनी चिन्ता करते हो ? अब तो मैनें ड्रिंक करके गाड़ी चलाना भी छोड़ दिया.”

नारायण—“ये तो बहुत अच्छी बात हैं. धिरे–धिरे शराब बिल्कुल बन्द कर दो.”

डॉली गाड़ी में बैठकर गाड़ी का दरवाजा बन्द करके गाड़ी स्टार्ट करते हुए बोली—“जल्दी ही आपको ये न्यूज भी सुना दूँगी.”

नारायण—“हम इंतजार करेगें.”

डॉली—“अच्छा, अब चलती हूँ. कल मिलते हैं.”

डॉली गाड़ी चलाते हुए चली गई.

अगले दिन तैईस जून, शुक्रवार को सुबह के सात बजे उम्र में उनसठ(59) साल के सेठ साँवरमल बागड़ी अपने से दो साल छोटी उम्र में सत्तावन(57) साल की पत्नी राजलक्ष्मी के साथ घर के हॉल में सोफे पर बैठे बातें कर रहे थे.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब पाणी सिर उ ऊपर चल ग्यो. छोरी हैं–छोरी हैं बोल ग घणो ही सहन कृयो, पर आ छोरी तो नई माने.”(हिन्दी अनुवाद : अब पानी सर से ऊपर चला गया. लड़की हैं–लड़की हैं बोल कर बहुत ही सहन किया, लेकिन ये लड़की तो नहीं सुधरी.)

राजलक्ष्मी—“बेरो नी कुणसा ईसा करम कृआ हा, झक्को आ टिंगरी पल्ले पड़ी. चयार लुगाया म जाण जोगी कोनी छोडी.”(हिन्दी अनुवाद : मालूम नहीं कौनसे ऐसे करम किये थे, जो ये लड़की किस्मत में आई. चार औरतों में जाने लायक नहीं छोड़ा.)

सेठ साँवरमल बागड़ी—“हाँ, की समझ म कोनी आवे, कढ़े गलती होई ? जित्ती इने सीधा रस्ता पर घालणा गी कोशिश करी, आ तो बित्ता ही ज्यादा उल्टा रस्ता पकड़या.”(हिन्दी अनुवाद : हाँ, कुछ भी समझ में नहीं आता, कहाँ गलती हुई ? जितना इसको सीधे रस्ते पर चलाने की कोशिश की, इसने तो उतने ही ज्यादा गलत रास्ते पकड़े.)

राजलक्ष्मी—“म तो क्योउ हूँ, अब ईंगो घर उ बारे आणो–जाणो पूरी तरिया बन्द कर द्यो. नई तो फेर आपा न मरनो पड़अगो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तो कहती हूँ, अब इसका घर से बाहर आना–जाना पूरी तरह बन्द कर दो. वरना फिर हमें मरना पड़ेगा.)

डॉली ऊपर अपने कमरे का दरवाजा खोलकर कमरे से बाहर निकली और सीढिया उतरते हुए नीचे आकर बाहर की तरफ जाने लगी.

सेठ साँवरमल बागड़ी ने खड़े होकर गरजते हुए कहा—“ऐ छोरी, इने आ.”(हिन्दी अनुवाद : ऐ लड़की, इधर आ.)

पिता की आवाज़ सुनते ही डॉली के पैर जहाँ थे वहीं जम गए. राजलक्ष्मी भी सोफे से खड़ी हो गई. डॉली मुड़कर अपने माता–पिता के सामने आकर खड़ी हुई.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब तू सीदो–सीदो ओ बता, तू के चावे हैं ? म्हाने मारनो हैं, तो बिय्या ही मार–मूर दें.”(हिन्दी अनुवाद : अब तू सीधे–सीधे ये बता, तू क्या चाहती हैं ? हमें मारना हैं, तो वैसे ही मार–मूर दें.)

डॉली—“अब म के कृओ हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : अब मैनें क्या किया हैं ?)

सेठ साँवरमल बागड़ी ने डॉली के गाल पर चांटा मारकर कहा—“बताउ, तने के कृओ हैं ? अबी भी बूझे हैं. जाऊँ बढ़े, लोग हांस–हांस ग देखे. के ओ हैं, बी कुलछणी गो बाप हर ओजू मने ही बूझे, म के कृओ हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : बताऊँ, तुझे क्या किया हैं ? अभी भी पूछ रही हैं. जहाँ जाता हूँ, लोग हँस–हँसकर देखते हैं. कि ये हैं, उस कुलछिणी का बाप और अभी मुझसे ही पूछ रही हैं, मैनें क्या किया हैं ?)

डॉली लड़खड़ाने के बाद सम्भलते हुए बोली—“ईया थाप मारना उ म कोनी मरूँ. इती ही खारी लागू, तो गळो घोंट द्यो मेरो.”(हिन्दी अनुवाद : ऐसे थप्पड़ मारने से मैं नहीं मरूँगी. इतनी ही बुरी लगती हूँ, तो गला घोंट दो मेरा.)

सेठ साँवरमल बागड़ी—“म सोचू, अब जुआन छोरी पर हाथ उठाणो ठीक कोनी. पर तू ईया कोनी माने.”(हिन्दी अनुवाद : मैं सोचता हूँ, अब जवाँन लड़की पर हाथ उठाना सही नहीं हैं. लेकिन तू ऐसे नहीं मानेगी.)

सेठ साँवरमल बागड़ी डॉली का बाजू पकड़कर डॉली को लेकर सीढ़िया चढ़ते हुए डॉली के कमरे की तरफ चल पड़े. राजलक्ष्मी भी उनके पीछे–पीछे चल पड़ी. चलते–चलते सेठ साँवरमल बागड़ी ने दीवार के पास पड़ा एक डंडा उठा लिया. सेठ साँवरमल बागड़ी ने डॉली को कमरे में लाकर धकेला और डॉली को डंडे से पीटने लगे.

राजलक्ष्मी ने सेठ साँवरमल बागड़ी को रोकते हुए कहा—“के कृरो हो ? जमा ही पागल होग्या के ?”(हिन्दी अनुवाद : क्या कर रहे हो ? बिल्कुल ही पागल हो गए क्या ?)

सेठ साँवरमल बागड़ी ने डंडा फेंक कर कहा—“पागल नई होवा तो और के कृरा ? आ तो सामू जवाब देण लाग गी अब ? ईतो सब कर दियो, फेर ही मुंडा पर शर्म नाम गी चीज ही कोनी. ऊपर उ आपगा कारनामा सोशल साईटा पर बतावे और हैं.”(हिन्दी अनुवाद : पागल नहीं होए तो और क्या करे ? ये तो सामने जवाब देने लगी अब. इतना सब कर दिया, फिर भी मुँह पर शर्म नाम की चीज ही नहीं हैं. उस पर अपने कारनामें सोशल साइट्स पर और बता रही हैं.)

राजलक्ष्मी—“थे चालो, बारे चालो. आज उ ईगो ई कमरा उ बारे आणो बन्द. पड़ी रेण द्यो अठेई.”(हिन्दी अनुवाद : आप चलो, बाहर चलो. आज से इसका इस कमरे से बाहर आना बन्द. पड़ी रहने दो यहीं.)

राजलक्ष्मी ने सेठ साँवरमल बागड़ी को समझा–बुझाकर कमरे से बाहर भेजा और डॉली से मोबाइल छीनकर बोली—“तेरो डोळ देखअर तेर खातर कोई छोरो बी कोनी मिले. नई तो सासरे घाल अर गेल छुटा लेता.”(हिन्दी अनुवाद : तेरे बिगड़ैल होने के कारण, तेरे लिए कोई लड़का भी नहीं मिलता. वरना ससुराल भेजकर पीछा छुड़ा लेते.)

राजलक्ष्मी कमरे से बाहर गई और कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द करके डॉली को अन्दर बन्द कर दिया.

डॉली चुपचाप हाथ की कोहनी पर लगे डंडे की चोट सहलाते हुए गंभीर मुद्रा में खड़ी थी. कमरा बाहर से बन्द होने के कुछ देर बाद डॉली पीछे होते हुए दीवार से पीठ लगाकर नीचे बैठकर अपने घुटनों पर सर रखकर बैठ गई.

सुबह के नौ बजे आम्रपाली सर्किल पर खड़ा राज डॉली का इंतजार करते हुए जेब से मोबाइल निकालकर मोबाइल में टाइम देखकर बोला—“नौ बज गए, आज डॉली क्यों नहीं आई ? कॉल करके देखता हूँ.”

राज ने डॉली का नम्बर लगाकर मोबाइल कान से लगाया. डॉली का मोबाइल स्वीच–ऑफ था. राज ने मोबाइल जेब में रखते हुए मन में बोला कि ये आज कहाँ रह गई ?

साढ़े नौ बजे तक इंतजार करने के बाद राज ने मन में कहा कि साढ़े नौ बज गए. अब ऑफ़िस चलते हैं. शाम को आकर देखेगें.

राज पैदल ही डॉली के बारे में सोचते हुए धिरे–धिरे ऑफ़िस की तरफ चलने लगा.

दस बजकर तीस मिनट पर राज ने जयशर्मा के घर पहुँचकर जयशर्मा के घर का मुख्य दरवाजा खोला और अन्दर दाखिल होकर घर के बाहर जूते निकालकर घर का दरवाजा खोलकर सीढ़िया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर अपने टेबल की कुर्सी पर बैठ गया.

ऑफ़िस में स्टाफ के सभी लोग आज राज से पहले आकर अपने–अपने टेबल की कुर्सी पर बैठे थे.

जयशर्मा केबिन के शीशे से राज को देखकर अपनी चेयर से उठे और केबिन का दरवाजा खोलकर बोले—“राज.”

राज ने जयशर्मा की तरफ देखकर कहा—“हाँ, सेठ जी.”

जयशर्मा राज को अन्दर आने के इशारा करके वापस जाकर अपनी चेयर पर बैठ गए. राज खड़ा होकर केबिन में आकर जयशर्मा के सामने खड़ा हुआ.

जयशर्मा—“क्या बात हैं ? आज लेट कैसे हो गया ? तुम तो हमेशा टाइम से पहले आते हो.”

राज—“आज डॉली नहीं आई, इसलिए पैदल आया हूँ. उसके साथ गाड़ी में आने की आदत पड़ गई. इसलिए पहले पैंतीस–पैंतालिस मिनट में पहुँचता था. आज घंटा लग गया.”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर कहा—“कोई बात नहीं, तुम आज पहली बार लेट हुए, इसलिए पूछा. वो ब्रेसलेट के लॉक चैक करने हैं. वो ले जाओ.”

राज ने कारपेट लगे फर्श पर नीचे रखे ब्रेसलेट उठाए और केबिन से बाहर आकर अपने काम में लग गया.

राज आज उदास मन से अपना काम कर रहा था. आस–पास बैठे स्टाफ के अन्य लोगों से भी बात नहीं की.

शाम के साढ़े छः बजे राज के इलावा स्टाफ के सभी लोग जा चुके थे. केबिन में जयशर्मा और मिनी अपनी–अपनी चेयर पर बैठे अपना–अपना काम कर रहे थे.

राज ने खड़े होकर अपने टेबल से सामान उठाकर केबिन में लाकर रखा और मुड़कर बोला—“सेठ जी, आज मैं जल्दी चला जाऊँ ?”

जयशर्मा ने राज की तरफ देखकर कहा—“डॉली नहीं आई, इसलिए परेशान हैं क्या ? अरे यार, कोई तबीयत वगैरह खराब हो गई होगी. कॉल करके पूछ लेता.”

राज—“उसका मोबाइल ही बन्द बता रहा हैं. सुबह से कई बार कर लिया.”

मिनी—“ओह…घर में कोई काम हो गया होगा और मोबाइल में प्रोब्लम हो गई होगी. तुम परेशान मत हो. कल आए जब पूछ लेना, आज क्यों नहीं आई ?”

राज—“वो तो ठीक हैं, मैडम. लेकिन आज मन भी नहीं लग रहा काम में.”

जयशर्मा—“चलो, कोई बात नहीं. आज जल्दी चले जाओ.”

राज—“थैक्यू, सेठ जी.”

जयशर्मा—“कल सुबह आ जाना, टाइम पर.”

राज—“ठीक हैं, सेठ जी.”

मिनी ने निराश मुद्रा में मुड़ते हुए राज से कहा—“खाना खा लेना, टाइम से. आज दिन में भी तुमने सिर्फ दो ही रोटी खाई थी.”

राज—“हाँ, मैडम खा लूँगा.”

मिनी—“ठीक हैं, जाओ.”

राज केबिन से बाहर आकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया और घर से बाहर आकर अपने जूते पहनकर डॉली से मिलने की जगह(जयशर्मा के घर से थोड़ी दूर जहाँ रोज डॉली गाड़ी में बैठकर राज का इंतजार करती हैं) चल पड़ा.

राज को डॉली का इंतजार करते–करते आठ बज गए. राज मन में सोचने लगा कि डेढ़ घंटे से उसका इंतजार कर रहा हूँ. डॉली हर रोज शाम को कभी छः बजे, कभी सात बजे, कभी आठ बजे यहाँ आकर गाड़ी लगाती हैं. वो हर रोज इतनी देर कैसे इंतजार कर लेती हैं ? मैं तो समझता था, उसका क्या हैं ? गाड़ी में चाहे जितनी मरजी देर तक बैठे रहो. लेकिन आज पता चल रहा हैं, इंतजार करना कितना मुश्किल हैं ? और हैरानी की बात ये, उसने तो कभी शिकायत भी नहीं की.

रात के नौ बजे डॉली के कमरे का दरवाजा खुला और राजलक्ष्मी डॉली के लिए थाली में खाना लेकर कमरे में आई. डॉली घूटनों पर सर रखे बैड पर बैठी थी.

राजलक्ष्मी ने बैड पर थाली रखकर कहा—“ल, रोट गिट ल.”(हिन्दी अनुवाद : लो, खाना खालो.)

डॉली ने मुँह फेरकर गुस्से में कहा—“पाछो ले जा. मन कोनी खाणो.”(हिन्दी अनुवाद : वापस ले जाओ. मुझे नहीं खाना.)

राजलक्ष्मी ने गुस्से से उबलकर कहा—“तू क्यू कृह हैं ईय्या ? ईसो म्हे के बिगाड़ दियो तेरो ? क्यागो बदलो काडन लाग री हैं म्हारा उ………?”(हिन्दी अनुवाद : तुम क्यों कर रही हो ऐसा ? ऐसा हमने क्या बिगाड़ दिया तेरा ? किस बात का बदला ले रही हो हमसे………?)

डॉली—“म कोई बदलो ल्योउ नी. थे मन कमरा म बन्द कर दियो. म कि केयो के ? अब मन ऐकली छोड़ द्यो.”(हिन्दी अनुवाद : मैं कोई बदला नहीं ले रही हूँ. आप लोगों ने मुझे कमरे में बन्द कर दिया, मैनें कुछ कहा क्या ? अब मुझे अकैली छोड़ दो.)

राजलक्ष्मी ने डॉली को चांटा मारकर कहा—“चुल्ला म पड़. गिटणी हैं तो गिट ल, नई तो मर जा कढई जार. पतो नी कद गेल छोडःगी ?”(हिन्दी अनुवाद : भाड़ में जाओ. खाना हैं तो खा, नहीं तो मर जा कहीं जाकर. पता नहीं कब पीछा छोड़ेगी ?)

राजलक्ष्मी खाने की थाली छोड़कर कमरे से बाहर चली गई और कमरे का दरवाजा बाहर से बन्द कर दिया.

डॉली ने खाने की थाली की तरफ देखा और मुस्कुराकर मन में कहा कि मैं तो खुद ही जीना नहीं चाहती, माँ. बस खुदखुशी करने की हिम्मत नहीं हुई. वरना बहुत पहले आपका और पापा का पीछा छोड़ देती.

राज ने रात के दस बजे तक परेशान होते हुए डॉली का इंतजार करने के बाद मन में खुद से कहा कि लगता हैं, आज नहीं आएगी. चल चलते हैं. कल सुबह मिलते ही गुस्से से बरस पड़ेगें. कम से कम बता तो देती, क्यों नहीं आई ?

राज अपने रास्ते पर चलने लगा. पौने ग्यारह बजे राज नारायण की दुकान पर पहुँचा. नारायण की दुकान भी बन्द हो चुकी थी.

राज ने मन में कहा कि आज ये भी टाइम से पहले ही दुकान बन्द कर गया. रोज तो ग्यारह बजे तक बैठा रहता हैं. चल कोई बात नहीं. कल देखेगें सबको.

राज अपनी बिल्डिंग की तरफ चल पड़ा.

रात के दो बजे राज बैड पर पीठ के बल सीधा लेटा हुआ था. आज डॉली के बारे में सोच–सोचकर राज को भूख का तो एहसास भी नहीं हुआ. राज थोड़ी–थोड़ी देर बाद करवट बदलते हुए सोने की कोशिश करता रहा, लेकिन डॉली की याद उसे सोने नहीं दे रही थी.

रात के तीन बजे डॉली अपने कमरे में बैड पर पत्थर की मूरत बनी बैठी थी. खाने की थाली अभी तक ज्यों की त्यों पड़ी थी.

डॉली के दिमाग में विचार चल रहे थे कि ना तो मैं अपने माँ–पापा से खुश हूँ, ना माँ–पापा मुझसे खुश हैं. समझ में नहीं आता, मैं क्या करूँ ? लेकिन कुछ भी हो, अब माँ–पापा और मेरे बीच इतनी दूरियाँ आ गई हैं, जो कभी खतम नहीं हो सकती. माँ ठीक कह रही थी, अब मुझे यहाँ से चले जाना चाहिए.

डॉली बैड से उठकर खड़ी हुई और इधर–उधर कुछ ढूंढने लगी. अलमारी के ऊपर उसे एक हथोड़ा मिल गया. डॉली ने हथोड़ा उठाया और अपनी सैंडल पहनकर कमरे की खिड़की की तरफ आकर हथोड़े से खिड़की की जाली तोड़ने लगी.

हथोड़े की आवाज सुनकर सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी जाग गए. दोनों उठकर अपने कमरे से बाहर निकलकर डॉली के कमरे की तरफ दौड़े.

डॉली ने खिड़की की जाली पूरी तरह तोड़ने के बाद हथोड़ा फेंका और खिड़की से बाहर कूद गई. सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी ने डॉली के कमरे का दरवाजा खोलकर अन्दर आकर देखा, खिड़की टूटी हुई हैं और डॉली गायब हैं.

डॉली दो मंजिल से जमींन पर आकर गिरी और उसे हाथ–पैर और सर में चोट लग गई. लेकिन डॉली अपनी चोटों की परवाह ना करके खड़ी होकर भाग गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी डॉली के कमरे से बाहर आकर घर के नौकरों और चौकीदारों को आवाज़ देते हुए सीढिया उतरकर नीचे आए और घर के दो नौकरों और दो चौकीदारों के साथ घर से बाहर आकर डॉली को ढूंढने लगे.
 
डॉली भागते–भागते अपने घर से चौथी गली में एक घर के सामने आकर रूक गई. डॉली ने इधर–उधर देखने के बाद अपनी सैंडल निकालकर हाथों में ली और धिरे से आवाज़ किये बिना घर की दीवार कूद कर घर के अन्दर दीवार के पास ही छूपकर बैठ गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी आस–पास किसी को डॉली के घर से भागने के बारे मालूम ना चल जाए, इसलिए किसी से कुछ पूछताछ किये बिना नौकरों और चौकीदारों के साथ सुबह के साढ़े चार बजे तक डॉली को ढूंढते रहे, लेकिन डॉली के नहीं मिलने पर निराश होकर घर वापस आ गए.

सुबह के पाँच बजे डॉली घर की दीवार के पास बैठी–बैठी सोच रही थी कि यार…मोबाइल माँ ने लिया और क्रेडिट कार्ड, पैसे वगैरह सब गाड़ी में पड़े हैं. पैसे के नाम पर एक रुपया नहीं हैं. अब कहाँ जाऊँगी और कैसे जाऊँगी ? और तो और तुझे पैसे देने वाला भी कोई नहीं हैं. घर वापस गई तो दूबारा घर से निकलने का मौका नहीं मिलेगा………चल अब सुबह होने वाली हैं. यहाँ से निकल पहले.

डॉली खड़ी होकर दीवार कूदकर घर से बाहर आ गई और अपनी सैंडल पहनकर पैदल ही चल पड़ी.

सुबह के सात बजे राज जागते हुए बिस्तर पर लेटा हुआ था. सारी रात जागने के बाद राज बिस्तर से उठा और नहाकर तैयार होने के बाद बिल्डिंग लॉक करके आम्रपाली सर्किल पर आकर डॉली के इंतजार में टहलने लगा.

सुबह के दस बजे तक इंतजार करने के बाद राज ने अपनी जेब से मोबाइल निकालकर जयशर्मा को कॉल किया.

जयशर्मा कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर लगाकर बोले—“हाँ, राज.”

राज—“सेठ जी, मैं आज बारह बजे बाद आऊँगा.”

जयशर्मा—“क्यों ? क्या हुआ ?”

राज—“आज फिर डॉली नहीं आई और उसका मोबाइल अभी तक बन्द हैं. मैं उसके घर जा रहा हूँ.”

जयशर्मा—“अरे, ऐसे अचानक घर जाएगा, डॉली के घरवाले क्या सोचेगें ? डॉली तुझे जानती हैं, उसके माँ–बाप थोड़े ही जानते हैं.”

राज—“तो क्या हुआ, सेठ जी ? मैं कौनसा उसे घर से भगाने के लिए जा रहा हूँ ? मैं तो बस उसका हाल–चाल पूछने जा रहा हूँ.”

जयशर्मा—“अरे लेकिन………”

राज—“नहीं, सेठ जी. एक बार उससे मिलकर तो जरूर आऊँगा. मेरा मन नहीं मान रहा.”

जयशर्मा—“अच्छा, ठीक हैं जा. और सुन, कोई प्रोब्लम हो तो मुझे कॉल कर देना.”

राज—“ठीक हैं, सेठ जी.”

जयशर्मा—“ठीक हैं.”

जयशर्मा के कॉल काटने के बाद राज ने मोबाइल जेब में डाला और बस स्टॉप पर आकर खड़ा हो गया. कुछ देर बाद बस आई. राज बस स्टॉप पर खड़े लोगों के साथ बस में चढ़ गया और बस आगे चल पड़ी.

डॉली के घर के पास बस स्टॉप पर बस से उतरकर राज ने सोचा कि सेठ जी ठीक कह रहे थे. डॉली के माँ–बाप मुझे नहीं जानते, पहले डॉली के घर के पास उस दुकानवाले से डॉली के बारे में पूछकर देखते हैं.

राज चलकर डॉली के घर के पास वाली दुकान पर आया और दुकान से एक सेन्टर फ्रैश च्यूंगम खरीदकर च्यूंगम का रेपर उतारकर च्यूंगम मुँह में डालकर दुकानदार से पूछा—“भाई साहब, आपने साँवरमल जी की लड़की को आते–जाते देखा हैं ?”

दुकानदार—“नहीं, कल से नहीं देखा. वरना तो रोज सुबह सात बजे के आस–पास गाड़ी लेकर यहीं से निकलती हैं. मुझे तो लगता हैं, वो घर छोड़कर चली गई या फिर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाल दिया.”

राज—“क्यों, आपको ऐसा क्यों लगता हैं ? हो सकता हैं, उसकी तबीयत खराब हो. आजकल शराब पीना बहुत कम कर दिया ना उसने.”

दुकानदार—“अब क्या कम करेगी ? सब कुछ तो कर लिया उसने. कल–परसो टीवी पर भी उसके किस्से बता रहे थे. आजकल बिगड़ैल लड़कियाँ तो और भी बहुत हैं, लेकिन इसके जैसी बेशर्म और घटिया लड़की नहीं देखी. खुद ही फेसबुक पर पोस्ट करके अपने और उस लड़के के बारे में सब कुछ बता रही हैं.”

राज को डॉली के बारे में दुकानदार की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया, लेकिन राज ने अपने गुस्से को दबाकर कर कहा—“भाई साहब, एक बात बताओ. मैं ढ़ाई–तीन महिने पहले जब पहली बार आपकी दुकान पर आया था. तब आपने बताया, कि कुछ लोग दो–चार महिने तक नगद में सामान खरीदते हैं. फिर दस–बीस रुपये की उधार से उधार का सिलसिला शुरू करते हैं और आगे चलकर सौ–पचास से होते हुए हजार–पाँच सौ रुपये तक पहुँच जाते हैं. आखिर में एक–डेढ़ साल बाद या दो साल बाद पाँच हजार या दस हजार का चूना लगाकर चले जाते हैं. कुछ लोग तो बीस हजार–तीस हजार तक खाकर मुकर जाते हैं. फिर आप उनसे अपने उधार दिये हुए सामान के पैसे माँगते हो, तो गालियाँ देते हैं, लड़ाई–झगड़े करने पर उतर जाते हैं.”

दुकानकार—“हाँ, आपको बताया तो था, कई लोग मेरे एक–डेढ़ लाख रुपये खा गए इस तरीके से.”

राज—“अब अगर मैं कहूँ, आप घटिया हो, आपने उन लोगों को उधार सामान क्यों दिया ? आपके रुपये तो खाने ही चाहिए. आप उधार देते हो, इसलिए सारी गलती आपकी ही हैं. वो आपके पैसे खाने वाले तो सीधे–साधे, शरीफ लोग हैं. उनको बदनाम मत करो. तो मेरी ये बात सुनकर आपको कैसा लगेगा ?”

दुकानदार ने राज की तरफ़ देखकर कहा—“ये तो आप भी अच्छी तरह जानते हो, कैसा लगेगा ?”

राज—“बिल्कुल मैं जानता भी हूँ और समझता भी हूँ. उन धोखेबाजों ने पहले अच्छा व्यवहार करके आपका विश्वास जीत लिया और विश्वास जीतकर आपके पैसे लूट लिए. अब मैं उन धोखा देने वालों को घटिया कहने की जगह आपको बुरा बताऊँ, तो यकिनन आपको बुरा लगेगा. आप कहेगें, एक तो मेरे साथ धोखा हुआ, उस पर मुझे ही घटिया बोला जा रहा हैं.”

दुकानदार—“हाँ, अब कोई जानबुझ कर तो धोखा खाता नहीं हैं.”

राज—“तो क्या इस लड़की ने जानबुझ कर धोखा खाया होगा ? यहीं सब इस डॉली के साथ हुआ. पहले उस रंगीला नाम के लड़के ने प्यार और अपनापन दिखाकर डॉली का विश्वास जीता. फिर प्यार और शादी के वादे किये. फिर जिस तरह आप अपनी मरजी से उधार सामान दे रहे थे, बिल्कुल उसी तरह डॉली ने भी अपनी मरजी से उस लड़के के साथ वो रिश्ते बना लिए, जो शादी के बाद बनाने चाहिए. और मतलब पूरा होने के बाद उस लड़के ने बिल्कुल उसी तरह लड़की को अपनी जिन्दगी से निकालकर फेंक दिया, जैसे आपकी उधार देने की लिमिट खतम होने के बाद धोखेबाज ग्राहकों ने आपकी दुकान छोड़ दी. डॉली जब उस लड़के से शादी की बात करती, तो वो लड़का उसी तरह डॉली को गालियाँ निकालकर डॉली के साथ मारपीट करने लगा, जैसे आपके पैसे खाने वाले पैसे माँगने पर आपको गालियाँ निकालकर आपसे लड़ाई–झगड़ा करने पर उतारू हो जाते हैं.”

दुकानदार सोच में पड़ गया.

राज—“क्या हुआ ? आपने धोखेबाजों को अपनी दुकान से खाने–पीने का सामान अपनी मरजी से खुशी–खुशी खिलाया और डॉली ने एक धोखेबाज के सामने खुद को पेश कर दिया. पैसे तो दुबारा कमाए जा सकते हैं, फिर भी आप उन धोखेबाज ग्राहकों को कई सालों बाद भी कोस रहे हो और उनकी धोखेबाजी के बारे में सबको बताते भी रहते हो. लेकिन इज्जत दुबारा वापस नहीं मिलती, फिर भी डॉली का उस धोखेबाज की धोखेबाजी के बारे में सबको बताना घटिया बात हैं. कई तरह के धोखें अलग–अलग तरीके से बहुत सारे लोगों के साथ होते रहते हैं. अब कोई धोखेबाज अपने गलत इरादों में कामयाब हो जाए, तो क्या करें ? धोखेबाज को सजा देने की जगह धोखा खाने वाले को घटिया और बेकार बताएँ ?”

दुकानदार—“हम्म………ये तो गलत हैं.”

राज—“चलिए, कोई बात नहीं. उम्मीद हैं, आप आगे से घटिया लोगों को ही घटिया कहेंगे. घटिया लोगों के शिकार हो चुके लोगों को घटिया नहीं कहेंगे.”

दुकानदार—“हाँ, भाई. अब बात समझ में आ गई.”

राज—“वैसे डॉली सच में घर छोड़कर चली गई हैं ?”

दुकानदार—“हाँ, कल से देखा तो नहीं. अगर घर में होती, तो बाहर जरूर आती.”

राज—“लेकिन अगर वो घर छोड़कर जाती, तो उसके माँ–बाप उसे ढूंढने की कोशिश तो करते ?”

दुकानदार—“अब पूरी बात तो पता नहीं. साँवरमल जी और उनकी पत्नी डॉली के बारे में घर से बाहर कोई बात नहीं करते. लेकिन घर में होते हुए, वो घर में टिकने वाली लड़की नहीं हैं.”

राज ने मन में सोचा कि डॉली अचानक घर छोड़कर क्यों जाएँगी ? और अगर साँवरमल जी ने उसे घर से निकाला होता, तो वो मेरे पास आ जाती. अब जब वो घर पर ही नहीं हैं, तो उसके घर जाकर क्या करूँगा ?

राज दुकान से चलकर बस स्टॉप पर आया और जेब से मोबाइल निकालकर अंकित को कॉल लगाया.

अंकित ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, भाई.”

राज—“यार कल से डॉली घर पर नहीं हैं. कुछ समझ नहीं आ रहा, ऐसे अचानक कहाँ जा सकती हैं ?”

अंकित—“तू टेन्शन मत ले, तू कहाँ हैं ? मैं अभी आता हूँ, फिर देखते हैं.”

राज—“मैं डॉली के घर के पास वाले बस स्टॉप पर बैठा हूँ.”

अंकित—“मैं आधे घंटे में पहुँचता हूँ.”

अंकित का कॉल कटने के बाद राज ने मोबाइल जेब में डाला और बस स्टॉप पर टहलते हुए अंकित का इंतजार करने लगा.

पौने घंटे बाद अंकित ने बस स्टॉप पर खड़े राज के सामने ऑटो लाकर रोका.

राज ऑटो में पीछे बैठा. अंकित ने ऑटो आगे बढ़ाकर साइड में खड़ा किया.

अंकित ने पीछे मुड़कर कहा—“अब बता, क्या बात हैं ?”

राज—“मैनें डॉली के घर के पास वाली दुकान पर पूछा था. उसने बताया, कल से डॉली घर से निकली ही नहीं. मतलब परसो रात वो अपने पास से घर के लिए चली थी, उसके बाद से उसका कुछ पता नहीं हैं.”

अंकित—“कल और परसो टीवी पर डॉली की न्यूज भी चल रही थी. कहीं उस लड़के ने तो कोई गड़बड़ नहीं की ?”

राज—“हो भी सकता हैं.”

अंकित—“रूक फिर, इसकी तो आज अच्छी तरह खबर लेते हैं.”

अंकित ने जेब से मोबाइल निकालकर गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाकर मोबाइल कान से लगाया.

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा.”

अंकित—“काका, कल से वो लड़की घर से गायब हैं. हमें लगता हैं, टीवी में न्यूज आने के बाद उस लड़के ने ही कोई पंगा किया हैं. परसो रात तो वो सही–सलामत हमारे पास से घर के लिए निकली थी.”

गोविन्द बिशनोई—“तू चिन्ता मत कर. मैं अभी उस लड़के के घर जाता हूँ. अगर उस लड़के ने कुछ किया हैं, तो तोते की तरह उगल देगा.”

अंकित—“ठीक हैं, काका जी. मैं भी पहुँचता हूँ.”

अंकित ने कॉल काटकर मोबाइल जेब में डाला और ऑटो चलाकर रंगीला के घर की तरफ चल पड़ा.

राज—“क्या हुआ ?”

अंकित—“उस लड़के के घर चल रहे हैं. गोविन्द काका भी वहीं आ रहा हैं. अगर उसने कुछ किया हैं, तो सब उगलवा लेगें.”

अंकित ने ऑटो रंगीला के घर के पास लाकर रोककर बन्द किया. राज और अंकित ऑटो से उतरकर रंगीला के घर की तरफ चल पड़े.

गोविन्द बिशनोई पहले से रंगीला के घर के सामने खड़ी गाड़ी के अन्दर ड्राईवर के पास वाली सीट पर बैठे हुए थे. गाड़ी के सामने गोविन्द बिशनोई के उम्र में पच्चीस(25) साल से पैंतीस(35) साल तक के पाँच आदमी रंगीला को बुरी तरह पीट रहे थे. रंगीला के घर के आगे वाले कमरे में बन्द रंगीला की माँ, छोटी बहन और बड़ा भाई कमरे की खिड़की में से रो–रोकर रंगीला को छोड़ने के लिए कह रहे थे.

अंकित और राज चलते हुए गोविन्द बिशनोई के पास आए.

अंकित ने गोविन्द बिशनोई के पैर छूकर कहा—“राम–राम, काका जी. कुछ बताया इसने, डॉली के बारे में ?”

गोविन्द बिशनोई ने मुस्कुराकर कहा—“अभी तक पूछा ही नहीं मैनें. इतने महान काम किये हैं, पहले अच्छी तरह खातिरदारी तो कर दें.”

रंगीला को पीट–पीटकर अधमरा करने के बाद गोविन्द बिशनोई के आदमियों ने उसे छोड़ा. गोविन्द बिशनोई गाड़ी से उतरकर जमींन पर पड़े रंगीला के पास आने लगे. राज और अंकित गोविन्द बिशनोई के पीछे–पीछे आए.

गोविन्द बिशनोई रंगीला के पास नीचे बैठकर बोले—“सुना हैं, बहुत कॉन्टेक्ट हैं तेरे. बड़े–बड़े पॉवरफूल लोगों में उठना–बैठना हैं, जिनके दम पर एक बार जो लड़की या जो औरत तुझे पसन्द आ गई, उसे किसी भी तरह से हासिल करके छोड़ता हैं. न्यूज में तेरी सिर्फ पाँच गर्लफ्रैंड के बारे में बताया हैं. लेकिन असल में तू अब तक छब्बीस(26) लड़कियों और औरतों को अपनी हवस का शिकार बना चुका हैं, उनमें से आठ लड़कियाँ और औरतें तो बेकार हैं. उनके तेरे इलावा भी कई लोगों से चक्कर हैं. लेकिन बाकि अठारह में से पाँच को तूने प्यार के नाम पर बेवकूफ बनाया, जिनके बारे में अब सबको पता हैं. चार शादीशुदा औरतों को तूने ब्लैकमेल करके अपना शिकार बनाया. नौ लड़कियों को डरा–धमकाकर और जोर–जबरदस्ती से तूने अपना शिकार बनाया. इन अठारह बेकसूर और मासूम लड़कियों और औरतों को शिकार बनाने के कारण ही मैनें तेरी ये हालत की हैं.”

रंगीला ने गोविन्द बिशनोई के पैर पकड़कर लड़खड़ाती आवाज़ में कहा—“मुझे माफ़ कर दो.”

गोविन्द बिशनोई ने रंगीला को थप्पड़ मारकर कहा—“माफ़, महान लोग करते हैं. जिनको घटिया लोगों से प्यार होता हैं. मैं तो घटिया लोगों को ऐसी दर्दनाक सजा देता हूँ, कि दूबारा कोई घटिया काम करने के बारे में सोचते ही उनकी रूह काँप जाए. महिनेभर पहले तेरे बारे पता चला. मैनें तेरी डिटेल निकाली और सोचा, पहले बच्चे अपना हिसाब कर ले. फिर मैं तो कभी भी तुमसे मिल सकता हूँ. लेकिन मेरे फोन पर समझाने के बाद भी तू नहीं समझा. चल बता, डॉली कहाँ हैं ?”

रंगीला—“मुझे नहीं पता.”

गोविन्द बिशनोई ने चार–पाँच थप्पड़ मारकर कहा—“देख मुझे गुस्सा मत दिला, सीधे–सीधे बता दें.”

रंगीला फूट–फूटकर रोते हुए कहने लगा—“मुझे सच में नहीं पता, अब आप चाहे मेरी जान लेलो. जब मुझे मालूम ही नहीं तो कैसे बताऊँ ? हाँ, मैनें उसे मारने का सोचा था. लेकिन फिर मुझे लगा, अगर अभी मैनें उसे मार दिया. तो सीधा शक मेरे ऊपर ही आएगा. लेकिन मैनें बस अपने दोस्तों से इस बारे में बात ही की थी. कुछ किया नहीं.”
 
रंगीला की बात सुनकर राज को बहुत गुस्सा आया और राज रंगीला को लाते मारने हुए बोला—“डॉली को मारेगा तू. अब ये सोच कि तू जिन्दा कैसे बचेगा ? बहुत शौक हैं तुझे लड़कियों और औरतों का.”

राज ने रंगीला का हाथ मरोड़ते हुए कहा—“इन्हीं हाथों से तू लड़कियों और औरतों को पकड़ता हैं ना. याद कर, इसी हाथ से तूने डॉली के बाल पकड़कर उसे सड़क पर फेंका था ना. बोल डॉली कहाँ हैं ?”

रंगीला की दर्द के मारे जान निकलने लगी.

गोविन्द बिशनोई ने राज को पकड़कर रंगीला से दूर करके कहा—“इसको सच में नहीं पता. बोलने वाले की आवाज़ सुनकर पता चल जाता हैं, कौनसी बात सच हैं ? और कौनसी बात झूठ ? अंकित, ले जा इसको.”

अंकित राज के पास आकर राज को पकड़कर रंगीला से दूर ले आया.

गोविन्द बिशनोई ने राज से कहा—“तुम चिन्ता मत करो. डॉली को आज नहीं तो कल मैं ढूंढ लूँगा.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने एक आदमी से कहा—“जा, उनको खोल दे.”

गोविन्द बिशनोई का आदमी रंगीला के घर में गया और रंगीला के घर के बाहर वाले जिस कमरे में रंगीला के घरवाले बन्द थे, उस कमरे का दरवाजा खोल दिया.

रंगीला के घरवाले रोते–बिलखते दौड़कर सड़क पर अधमरी हालत में पड़े रंगीला के पास आए और रंगीला को उठाकर घर के अन्दर ले जाने लगे.

गोविन्द बिशनोई ने कहा—“सुनो, हालत तो तुम सबकी भी यहीं करनी चाहिए. तुम लोगों को इसकी हर करतूत अच्छी तरह पता थी, लेकिन फिर भी दूसरों पर इल्जाम लगाकर हर बार इसे बचाते रहे. वो लड़की ही बेकार हैं, वो औरत ही घटिया हैं. उसी ने फँसाया हैं, हमारे भोले–भाले, मासूम बच्चे को.”

रंगीला के घरवालें हाथ जोड़कर माफ़ी माँगते हुए बोले—“हमसे गलती हो गई. हम बस अपना घर देखने के चक्कर में सही–गलत सब भूल गए.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने आदमियों से कहा—“चलो.”

राज अंकित के साथ अंकित के ऑटो की तरफ चल पड़ा.

गोविन्द बिशनोई ड्राईवर के पास वाली सीट पर, गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर ड्राईविंग सीट पर और गोविन्द बिशनोई के बाकि चार आदमी गाड़ी में पीछे बैठ गए.

गोविन्द बिशनोई के ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट की.

गोविन्द बिशनोई ने रंगीला को लेकर घर के अन्दर दाखिल होते रंगीला के घरवालों से कहा—“और सुनो, पुलिस के पास जाकर मेरे खिलाफ़ रिपोर्ट भले ही लिखवाओ. लेकिन इतना ध्यान रखना, इस लड़के के बाकि पच्चीस लड़कियों और औरतों के साथ किये कारनामें और तुम बाकि घरवालों के अब तक छुपे हुए सारे काले कारनामें भी शहर का बच्चा–बच्चा जान जाएगा. अगर पुलिस मेरे पास आई तो.”

गोविन्द बिशनोई ने अपने ड्राईवर से कहा—“अब चलो.”

गोविन्द बिशनोई का ड्राईवर गाड़ी चलाकर ले गया.

अंकित ऑटो में ड्राईविंग सीट पर और राज ऑटो में पीछे बैठ गया. अंकित ने ऑटो स्टार्ट किया और चल पड़ा.

अंकित ने ऑटो चलाते हुए कहा—“तू टेन्शन मत ले, यार. मिल जाएगी, डॉली. आजकल में ढूंढ लेगें.”

राज—“लेकिन कहाँ ढूंढें, यार ? कहाँ गई होगी ?”

अंकित—“देखते हैं, चल पहले कुछ खा लेते हैं. भूख लग गई.”

राज—“मेरी तो कल से भूख ही मर गई. कल दोपहर को मिनी मैडम ने खाने के लिए कहा था, बस उस वक्त दो रोटी खाई थी.”

अंकित—“अरे, यार………ऐसे थोड़ी चलता हैं. चल पहले घर चलते हैं.”

राज चुपचाप डॉली के बारे में सोचने लगा.

अंकित—“वैसे एक बात बता, तुझे तो इस लड़की में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी. तू तो उस धोखेबाज लड़के की धोखेबाजी सबके सामने लाना चाहता था. वो तो अब सबके सामने आ गई. सब कुछ न्यूज में भी आ गया. आज उसको छः–आठ महिने के लिए हॉस्पीटल भी भेज दिया. फिर अब इस लड़की के लिए इतना परेशान क्यों हो रहा हैं ?”

राज—“इन्सानियत के नाते. पिछले ढ़ाई–तीन महिने से रोज मिलती हैं. अब कल से अचानक गायब. तो परेशान तो होना ही था.”

अंकित—“नहीं, भाई. तूने जिस तरह डॉली को मारने की बात सुनते ही उस लड़के को मारा. उससे साफ़ पता चलता हैं. अब बात कुछ और हैं. अगर गोविन्द काका तुझे नहीं पकड़ता तो तू उसे मार ही डालता.”

राज—“तू यू ही सोच रहा हैं. ऐसी कोई बात नहीं हैं.”

अंकित—“चल ठीक हैं.”

अंकित ऑटो चलाते हुए सिंधी केम्प बस स्टैण्ड के सामने से गुजरा. राज की नजर बस स्टैण्ड के वैटिंग रूम पर पड़ी और वैटिंग रूम में किसी को देखकर उसे डॉली के बैठी होने का एहसास हुआ.

राज—“अरे, रोक–रोक.”

अंकित—“क्या हुआ ?”

राज—“मुझे बस स्टैण्ड के अन्दर वाले वैटिंग रूम में डॉली दिखी.”

अंकित ने साइड में ले जाकर ऑटो रोककर कहा—“वो यहाँ कहाँ होगी ?”

राज ने ऑटो से उतरकर जाते हुए कहा—“चलकर देखेगें, तभी तो पता चलेगा.”

अंकित ऑटो बन्द करके राज के पीछे–पीछे आया. दोनों दौड़कर वैटिंग रूम की तरफ आए.

अंकित—“हाँ, यार. डॉली ही हैं.”

वैटिंग रूम में डॉली दोनों हाथ चेहरे पर रखे एक कुर्सी पर बैठी थी. राज और अंकित वैटिंग रूम के अन्दर आकर डॉली के पास आए.

राज—“डॉली, यहाँ क्या कर रही हो ?”

डॉली अपने चेहरे से हाथ हटाकर चेहरा ऊपर करके सामने राज और अंकित को देखकर खड़ी होते हुए बोली—“तुम दोनों ?”

राज—“हम तो तुम्हें ही ढूंढ रहे हैं. कल से तुम्हारा मोबाइल भी बन्द हैं. आज सुबह तुम्हारे घर पास जाकर उस दुकानवाले से पूछा, उसने बताया, तुम कल से घर से बाहर नहीं निकली. या तो तुम छोड़कर भाग गई हो या फिर तुम्हारे पापा ने तुम्हें घर से निकाल दिया हैं.”

डॉली—“किसी ने घर से निकाला नहीं हैं. मैं खुद ही घर छोड़कर आ गई. मॉम–डेड को बहुत परेशान कर लिया. सोचा, अब उन्हें चैन से रहने दूँ.”

राज—“ऐसे क्यों सोच रही हो ? अचानक ऐसा क्या हो गया और सर पर ये चोट कैसे लगी ?”

डॉली—“कुछ नहीं, यार. तुम मुझे चार–पाँच हजार रुपये दे सकते हो ? मैं ये शहर छोड़कर कहीं ओर जाना चाहती हूँ.”

राज—“कहाँ जाना चाहती हो ?”

डॉली—“कहीं भी, यहाँ से दूर.”

राज—“तुम मेरे साथ चलो. घर बैठकर बात करते हैं.”

डॉली—“नहीं यार, मुझे अब कहीं नहीं जाना. चार–पाँच हजार नहीं दे सकते तो, हजार–दो हजार ही दे दो. मैं बाद में वापस दे दूँगी.”

राज—“ओहो…पैसे की बात नहीं हैं, चाहे दस हजार ले लेना. लेकिन अभी मेरे साथ चलो. मैं तुम्हारा दोस्त हूँ ना, तो मेरी बात नहीं मान सकती क्या ?”

डॉली कुछ नहीं बोली.

राज ने डॉली का बाजू पकड़कर कहा—“चलो मेरे साथ. फिर आराम से बताना, क्या हुआ ?”

राज डॉली का बाजू पकड़कर डॉली को साथ लेकर चलने लगा. अंकित भी उनके पीछे–पीछे चल पड़ा.

ऑटो के पास आकर अंकित ड्राईवर की सीट पर बैठा और राज डॉली को ऑटो में बिठाकर खुद भी ऑटो में बैठ गया.

अंकित ने जेब से मोबाइल निकालकर गोविन्द बिशनोई को कॉल लगाया.

गोविन्द बिशनोई ने कॉल रिसींव करके कहा—“हाँ, बेटा.”

अंकित—“काका, वो डॉली मिल गई. आप अब मत ढूंढना उसको.”

गोविन्द बिशनोई—“कहाँ मिली ? सब ठीक तो हैं ना ?”

अंकित—“हाँ, सब ठीक हैं. यहीं सिंधी केम्प बस स्टैण्ड पर बैठी थी. डॉली के फेसबुक पोस्ट न्यूज में आने के कारण घरवालों ने डांट दिया, इसलिए नाराज होकर आ गई थी.”

गोविन्द बिशनोई—“उफ्फ………ये लड़कियों के घरवाले भी अजीब होते हैं. जो लड़की घटिया लोगों के खिलाफ बोलना चाहती हैं, उसको बोलने नहीं देते. चल अब क्या कर सकते हैं ? समझा–बुझाकर घर भेज देना.”

अंकित—“हाँ, काका जी.”

गोविन्द बिशनोई के कॉल काटने के बाद अंकित ने मोबाइल जेब में डाला और राज से कहा—“पहले इनको डॉक्टर के पास लेकर चले क्या ? सर में सूजन आई हुई हैं. हाथ की कोहनी से चमड़ी छिली हुई हैं.”

डॉली—“अरे नहीं, ये तो अपने आप ठीक हो जाएगी.”

राज—“तुम चुप करो. तू चल यार, वो डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक चल. वो मिनी मैडम की सहैली हैं.”

अंकित ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाने लगा.

राज ने चलते हुए ऑटो में डॉली से पूरी बात पूछना शुरू किया. डॉली ने अपने पीठ पर और हाथ पर डंडे के निशान दिखाकर राज को सारी बातें बताई.

अंकित ऑटो चलाते हुए क्लीनिक ले आया और डॉ. सुशीला सहारण के क्लीनिक के सामने साइड में लगाकर ऑटो बन्द किया.

राज और अंकित डॉली को साथ लेकर डॉ. सुशीला के क्लीनिक में आए और डॉली की चोट पर मरहम पट्टी करवाने के बाद डॉली के लिए दवाई लेकर वापस डॉली के साथ ऑटो में आकर बैठे.

अंकित ऑटो स्टार्ट करके ऑटो चलाते हुए राज की बिल्डिंग के सामने आकर रूका. डॉली और राज ऑटो से उतरे.

अंकित—“ठीक हैं, भाई. चलता हूँ.

राज—“हाँ, ठीक हैं.”

अंकित ऑटो चलाते हुए चला गया.

राज बिल्डिंग के दरवाजे का ताला खोलकर डॉली के साथ बिल्डिंग में आया और सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आकर फ्लेट का ताला खोलकर फ्लेट में आकर डॉली के साथ कमरे में आया.

राज—“अब तुम आराम कर लो. मैं कुछ खाने के लिए लेकर आता हूँ.”

डॉली—“नहीं, रहने दो. मुझे भूख नहीं हैं.”

राज—“मुझे तो हैं. मैनें कल दोपहर बाद से कुछ नहीं खाया.”

डॉली—“लेकिन क्यों ?”

राज—“अब ये भी बताना पड़ेगा ?”

डॉली—“हाँ.”

राज—“मतलब खाना ना खाऊँ, पहले तुम्हें बताऊँ ?”

डॉली—“ओह………सॉरी. ठीक जाओ, पहले खाना खाओ.”

राज ने छत के पंखे का बटन दबाकर कहा—“हम्म…तुम आराम करो. मैं बस कुछ ही देर में आया.”

डॉली ने बैड के पास जाकर अपनी सैंडल उतारी और बैड पर लेट गई.

राज कमरे से बाहर आकर सीढिया उतरते हुए नीचे आकर बिल्डिंग से बाहर आया और आम्रपाली सर्किल की तरफ चल पड़ा.

नारायण ने राज को अपनी दुकान के सामने से जाते देखकर कहा—“राज, के होयो ? आज काम पर कोनी ग्यो के ?(हिन्दी अनुवाद : राज, क्या हुआ ? आज काम पर नहीं गया क्या ?)

राज ने दुकान पर आकर नारायण को सारी बात बताकर कहा—“बिन बिल्डिंग म सुआ ग आयो हूँ. अब कोई होटल पर उ खाणो ले ग आऊँ. मैं भी खा ल्यूगा, बा बी खा ल गी.”(हिन्दी अनुवाद : उसको बिल्डिंग में सुलाकर आया हूँ. अब किसी होटल से खाना लेकर आ रहा हूँ. मैं भी खा लूँगा, वो भी खा लेगी.)

नारायण ने कहा—“खाणो म मणूवा द्यू, यार. तू बैठ. तेरी भाभी न क्योउ, रोटी मणाण बई.”(हिन्दी अनुवाद : खाना मैं बनवा देता हूँ, यार. तुम बैठो. तुम्हारी भाभी से कहता हूँ, खाना बनाने के लिए.)

राज—“तू क्यू परेशान होवे ?”(हिन्दी अनुवाद : तुम क्यों परेशान होते हो ?)

नारायण—“इमे परेशानी के हैं ? रोटी मणना म के टेम लागे, बार रोटी मणी.”(हिन्दी अनुवाद : इसमें परेशानी क्या हैं ? खाना बनने में कितना टाइम लगता हैं, कुछ ही देर में खाना बन जाएँगा.)

नारायण दुकान के पिछले दरवाजे से घर के अन्दर गया और उम्र में उनतीस(29) साल की पत्नी को राज और डॉली के लिए खाना बनाने का बोलकर दुकान में वापस आकर राज से बातें करने लगा.

कुछ देर बाद राज का मोबाइल बजने लगा. राज ने जेब से मोबाइल निकालकर देखा तो मिनी मैडम का कॉल था.

राज ने कॉल रिसींव करके मोबाइल कान पर रखकर कहा—“हैलो, मैडम.”

मिनी—“हाँ, अभी मेरी वो डॉक्टर फ्रैंड सुशीला का कॉल आया था. उसने बताया, तुम डॉली को लेकर गए थे.”

राज ने सारी बातें एक–एक करके मिनी को बताई.

मिनी ने सारी बातें सुनने के बाद कहा—“उफ्फ ! समझ में नहीं आता, कुछ लोग इतनी सी बात क्यों नहीं समझते, बुरे लोगों से धोखा खाने के बाद चुप रहने से बुराई को बढ़ावा मिलता हैं.”

राज—“हाँ, मैडम. लेकिन अब नहीं समझते तो क्या कर सकते हैं ?”

मिनी—“हम्म…अच्छा तुमने खाना खा लिया ?”

राज—“नहीं, मैं नारायण की दुकान पर बैठा हूँ. ये बनवा रहा हैं खाना.”

मिनी—“अच्छा, ठीक हैं. और कोई प्रोब्लम हो, तो मुझे या तुम्हारे सेठ जी को कॉल कर लेना.”

राज—“हाँ, मैडम.”

मिनी—“कल ऑफ़िस आ जाना. मैं इनको बता दूँगी.”

राज—“ठीक हैं, मैडम.”

मिनी के कॉल काटने के बाद राज ने मोबाइल जेब में डाला और नारायण के साथ बातों में लग गया.

कुछ देर बाद नारायण की पत्नी ने एक बरतन में सब्जी और एक बरतन में रोटी डालकर घर के दरवाजे से बाहर आकर राज को दी.

राज ने खाना लेते हुए कहा—“धन्यवाद, भाभी. माफ़ करियो, आज थाने परेशान करवायो ई खातर.”(हिन्दी अनुवाद : धन्यवाद भाभी. माफ़ कीजिएगा, आज आपको परेशान करवाया इसलिए.)

नारायण की पत्नी—“इमे परेशानी गी के बात हैं ? थे भी तो म्हाने कोई काम वास्ते कदी नटो कोनी. फेर पड़ौसी ही पड़ौसी ग काम आवे.”(हिन्दी अनुवाद : इसमें परेशानी की क्या बात हैं ? आप भी तो हमें कोई काम के लिए मना नहीं करते. फिर पड़ौसी ही पड़ौसी के काम आते हैं.)

राज—“हाँ, वो तो हैं. ठीक हैं, नारायण भाई. ये बरतन–भांडा म काल दे जाऊँगा.”

नारायण—“कोई दिक्कत कोनी.”

राज खाना लेकर चलने लगा.

नारायण ने खड़े होकर कहा—“अरे सुण, खावेगो क्या म ? तेर खन तो बरतन–भांडा ही कोनी.”(हिन्दी अनुवाद : अरे सुन, खाएगा किसमें ? तेरे पास तो बरतन ही नहीं हैं.)

राज रूका और मुड़कर नारायण की तरफ देखकर मुस्कुराने लगा.

नारायण ने हँसकर अपनी पत्नी से कहा—“टाबरिया न थाळी–कौली देर भेज दे, सागे.”(हिन्दी अनुवाद : बच्चे को थाली और कटोरिया देकर इसके साथ भेज दो.)
 
नारायण की पत्नी ने घर के अन्दर जाकर अपने उम्र में चार(4) साल के बेटे को दो थाली, दो कटोरी, दो चम्मच देकर कहा—“जा, राज काका ग सागे चल जा.”(हिन्दी अनुवाद : जाओ, राज चाचा के साथ चले जाओ.)

नारायण का लड़का हाथों में बरतन लिए घर से बाहर आया और राज के साथ चल पड़ा.

राज खाना लेकर बच्चे के साथ बिल्डिंग में आकर सीढिया चढ़ते हुए फ्लेट में आया और किचन में आकर खाना रखकर बच्चे से बरतन लेकर रख दिये.

बच्चे ने कहा—“अब म जाऊँ ?”

राज—“हाँ, जा.”

बच्चा चला गया और राज ने कमरे में आकर देखा डॉली सो रही थी.

राज ने सोचा कि लगता हैं, दवाई और इंजेक्शन के कारण नींद आ गई. मैं भी खाना बाद में इसके साथ ही खा लूँगा.

राज छत पर आकर खड़ा हो गया.

डॉली शाम को आठ बजे नींद से जागी और बिस्तर से उठकर अपनी सैंडल पहनकर कमरे से बाहर आई.

डॉली ने सोचा कि ये राज कहाँ रह गया. अभी तक आया नहीं. मुझे इसके साथ नहीं आना था, बेकार में ही मेरे कारण ये परेशान होगा.

डॉली फ्लेट से बाहर आई तो देखा कि ऊपर छत पर जाने का दरवाजा खुला हुआ हैं. डॉली ऊपर छत पर आ गई. राज सामने खड़ा शहर को देख रहा था.

डॉली—“तुम खाना खाकर आ गए ?”

राज ने मुड़कर कहा—“उठ गई तुम. बस तुम्हारे जागने का ही इंतजार कर रहा था. खाना तो नारायण ने बनवा दिया था. मैनें सोचा, तुम हॉस्पीटल से दवाईयाँ लेकर और इंजेक्शन लगवाकर आई हो. तुम्हें थोड़ी देर सोने देना चाहिए.”

डॉली—“चलो, फिर अब तो खाना खालो.”

राज—“हाँ, चलो.”

राज और डॉली छत से नीचे आने लगे. राज ने छत का दरवाजा बन्द करके ताला लगाया और फ्लेट में आकर राज अपने जूते और डॉली अपनी सैंडल निकालकर दोनों हाथ–मुँह धोने के बाद किचन में आए.

राज ने रोटी और सब्जी वाले बरतन उठाकर कहा—“तुम ये थाली और कटोरी उठालो. कमरे में बैठकर खाना खाते हैं.”

राज कमरे में जाने लगा. डॉली बरतन उठाकर राज के पीछे–पीछे कमरे में आ गई. राज और डॉली खाना बैड पर रखकर दोनों बैड पर आमने–सामने बैठ गए. राज ने एक थाली और एक कटोरी डॉली के सामने रखकर एक थाली और एक कटोरी खुद के सामने रख ली.

राज ने दोनों की कटोरी में सब्जी डालकर रोटियाँ रखने के बाद कहा—“अब शुरू करें.”

डॉली—“हम्म………”

राज—“अरे…पानी तो रह ही गया. मैं लेकर आता हूँ.”

राज उठकर किचन में गया और एक जग में पानी भरकर ले आया.

पानी से भरा जग नीचे रखकर राज वापस बैड पर बैठकर बोला—“अब शुरू करो.”

डॉली और राज खाना खाने लगे.

डॉली खाना खाते हुए राज की तरफ देखकर सोचने लगी कि काश राज पहले मिल गया होता, तो शायद मैं इतनी नहीं बिगड़ती.

डॉली के आँखें भीग गई.

राज डॉली की आँखों में आँशू देखकर बोला—“अरे, क्या हुआ ? तुम रोने क्यों लगी ? अब देखो, गरीब लोग तो ऐसा ही खाना बनाते हैं. थोड़ा–बहुत एडजस्ट तो करना पड़ेगा.”

डॉली आँखें पोंछकर बोली—“अरे नहीं, खाना तो बहुत अच्छा हैं. ये आँशू तो मेरे कारण तुम्हें परेशान देखकर निकल आए.”

राज—“ओहो…मैं कोई परेशान नहीं हूँ. अब रोये बिना चुपचाप खाना खाओ.”

डॉली अपनी आखें पोंछकर मुस्कुराते हुए खाना खाने लगी.

रात को पौने ग्यारह बजे राज और डॉली बैड पर बैठे बातें कर रहे थे.

राज—“अच्छा, तो अब सोया जाए ?”

डॉली—“हाँ ठीक हैं.”

राज—“फिर सो जाओ, तुमने दवाई भी ली हैं.”

डॉली बैड पर लेट गई.

राज बैड से उठकर कमरे से बाहर आया और किचन में से एक चटाई लाकर फर्श पर बिछाई. राज बैड से एक तकिया उठाकर फर्श पर बिछी चटाई पर लेटने लगा.

बैड पर लेटी हुई डॉली बैठकर बोली—“तुम वहाँ क्यों सो रहे हो ?”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“अब तुम्हारे साथ एक बिस्तर पर तो नहीं सो सकता ना.”

डॉली—“क्यों ?”

राज—“अब ये भी बताना पड़ेगा.”

डॉली—“हाँ, पहले भी तो सोये थे. फिर आज क्या प्रोब्लम हैं ?”

राज—“उस वक्त सर्दी थी. इसलिए मजबुरी में सोया. अब तो गर्मी हैं, अगर यहाँ चोरों का खतरा ना हो तो छत पर जाकर भी सो सकता हूँ.”

डॉली—“कोई जरूरत नहीं हैं. तुम यहाँ बैड पर सो जाओ.”

राज—“लेकिन………”

डॉली—“लेकिन क्या ? जिनको गलत सोचना हैं, वो तो तुम नीचे सोओगे, तब भी गलत ही सोचेगे. दिखावे के लिए अलग–अलग बिस्तर लगाए हैं, रात को एक साथ सो जाते होगे. और रही बात हमारे एक बिस्तर पर सोने से हमारे बीच कुछ हो ना जाए ? तो जब उस सर्दी की रात में नशे की हालत में कुछ नहीं हुआ, तो अब तो मैं होश में हूँ. और फिर दिल और दिमाग साफ़ होना चाहिए. जिनके दिमाग में गन्दगी भरी हो, वो तो अलग–अलग कमरों में सो कर भी मौका देखकर एक कमरे में आ जाते हैं.”

राज—“तुम्हारी बातें पहले से बहुत अलग हो गई हैं.”

डॉली ने मुस्कुराकर कहा—“तुमने ही ये सब बताया था. भूल गए क्या ?”

राज—“मैनें ही बताया था क्या ?”

डॉली बैड से उतरते हुए बोली—“अच्छा, ठीक हैं. अगर तुम्हें प्रोब्लम हैं, तो मैं नीचे सो जाती हूँ. तुम यहाँ आ जाओ.”

राज—“अरे, रूको–रूको. मैं भी वहीं सो जाता हूँ.”

राज ने खड़े होकर तकिया बैड पर रखा और चढ़ाई समेटकर बैड पर आकर पीठ के बल सीधा होकर लेट गया.

राज—“अब ठीक हैं.”

डॉली ने मुस्कुराकर राज की तरफ मुँह करके बैड पर लेटते हुए कहा—“हाँ, ठीक हैं.”

राज ने मजाक करते हुए कहा—“अब रात को कुछ हो जाए, तो ब्लात्कार का इल्जाम मत लगा देना. आजकल की लड़कियाँ भी धोखा देने में कम नहीं हैं.”

डॉली ने हँसकर कहा—“नहीं लगाऊँगी.”

राज—“वैसे घबराना मत. कुछ नहीं होगा.”

डॉली—“मालूम हैं.”

राज और डॉली मुस्कुराते हुए अपनी लिमिट को ध्यान में रखते हुए अपने बीच दूरी रखकर सो गए.

अगले दिन पच्चीस जून, रविवार की सुबह छः बजे राज जाग गया. डॉली अभी तक सो रही थी. राज ने डॉली के चेहरे की तरफ देखा और मुस्कुराकर बैड से उठकर नहाने के लिए चला गया.

नहाते हुए राज ने सोचा कि डॉली ने आजकल सुबह–सुबह शराब की जगह चाय पीने की आदत डाली हैं और अपने को ना चाय बनानी आती हैं, ना अपने पास चाय बनाने का सामान हैं. चल जल्दी से नहा ले, फिर चौक वाली चाय की दुकान से चाय लेकर आते हैं.

राज नहाकर कपड़े पहनने के बाद कमरे में आया. डॉली को अभी तक सोती देखकर राज चाय लाने चला गया.

पौने सात बजे डॉली की नींद खुल गई. डॉली ने बैड से उठकर कमरे से बाहर आकर राज को ना पाकर कहा—“अब ये सुबह–सुबह कहाँ चला गया ?”

डॉली वापस कमरे में आकर बैड पर बैठ गई और राज का इंतजार करने लगी.

पन्द्रह मिनट बाद एक हाथ में थैली में डली चाय और दूसरे हाथ में चार डिस्पोजल कप लिए राज फ्लेट में आकर किचन में जाकर डिस्पोजल में चाय डालने लगा.

डॉली बैड से उठकर कमरे से बाहर आकर बोली—“सुबह–सुबह कहाँ चले गए थे ?”

राज दोनों हाथों में चाय से भरे डिस्पोजल कप लेकर किचन से बाहर आते हुए बोला—“तुम्हारे लिए चाय लेने गया था.”

डॉली—“तुम खाने–पीने का सामान और बरतन वगैरह ले आओ ना. हम यहीं बना लेगें.”

राज एक डिस्पोजल कप डॉली को देते हुए बोला—“तुम्हें बताया तो था, मुझे चाय–खाना कुछ भी बनाना नहीं आता.”

डॉली एक डिस्पोजल कप लेकर बोली—“अरे, मैं बना लूँगी. मुझे तो बनाना आता हैं.”

राज ने हँसकर कहा—“तुम मेरी बीवी थोड़े ही हो, जो मेरे लिए चाय–खाना बनाओगी. और फिर इस बिल्डिंग के मालिक से भी पूछना पड़ेगा, वो तुम्हें यहाँ रहने देगा या नहीं ?”

डॉली—“अगर उसने मुझे यहाँ रहने से मना कर दिया तो ?”

राज—“तो दूसरी जगह देख लेगें. चलो, अन्दर बैठकर चाय पिलो. फिर नहाना हो तो नहा लेना. कपड़े तो एक बार यहीं पहनने पड़ेगें. हाँ, अगर मेरे कपड़े पहनना चाहो, तो पहन सकती हो. लेकिन मेरे पास बस ऐसे सिम्पल पेन्ट–शर्ट ही हैं, जींस वगैरह तो मैं पहनता नहीं.”

डॉली कमरे के अन्दर आकर बैड पर बैठकर बोली—“तुम्हारे कपड़े मुझे आ जाएगें ?”

राज कमरे के दरवाजे के पास खड़ा होकर बोला—“शरीर में तो हम दोनों एक जैसे ही हैं. बस हाईट में तुम डेढ़–दो इंच छोटी हो.”

डॉली ने हँसकर कहा—“चलो, ठीक हैं. ट्राई करके देख लूँगी.”

राज ने एक अलमारी की तरफ इशारा करके मुस्कुराकर कहा—“उसमें मेरे आठ जोड़ी कपड़े पड़े हैं, जो पसन्द आए, पहन लेना.”

डॉली—“ठीक हैं, मैं दिन में नहा लूँगी. मुझे तो सारा दिन घर पर ही रहना हैं.”

राज ने डॉली की चाय खतम होती देखकर कहा—“जैसे तुम्हारी मरजी. चाय और हैं, किचन में.”

डॉली—“नहीं–नहीं, तुम लेलो.”

राज—“अरे नहीं–नहीं क्या ? मैं तो वैसे भी रोज ऑफ़िस में जाकर चाय पीता हूँ, तुम पिलो.”

डॉली—“ठीक हैं.”

डॉली उठकर चाय लेने के लिए किचन में चली गई.

सुबह नौ बजे राज ने डॉली से कहा—“अच्छा, मैं अब ऑफ़िस जा रहा हूँ. आज शाम को जल्दी आ जाऊँगा. तुम अपना और बिल्डिंग का ख्याल रखना. किसी को अन्दर मत घुसने देना और कुछ चाहिए हो, तो ये पास में नारायण की दुकान से ले आना. पैसे मैं दे दूँगा उसको.”

डॉली—“ठीक हैं.”

राज कमरे से निकलकर फ्लेट से बाहर जाकर सीढिया उतरते हुए चला गया.

बैड पर बैठी हुई डॉली को रंगीला की कहीं हुई बातें याद आने लगी. डॉली की आँखें नम होने लगी. डॉली ने मन में सोचा कि काश मैं तुम्हारी बीवी बनकर तुम्हारे लिए खाना बनाने के लायक होती. लेकिन मैं तो उस कमीने पर भरोसा करके किसी की बीवी बनने लायक रही ही नहीं. मेरे जैसी शादी किये बिना प्यार के नाम पर सब कुछ करने वाली लड़कियाँ सिर्फ मजे लेने के लिए होती हैं, शादी करने के लिए नहीं होती.

शाम के पाँच बजे राज जयशर्मा का दिया हुआ काम पूरा करके कुर्सी से उठते हुए कुर्सी पीछे सरकाकर खड़ा हुआ और अपने टेबल पर रखा सामान उठाकर जयशर्मा के केबिन में रखकर सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया.

सोफे पर बैठी सृष्टी पढ़ रही थी.

राज—“सृष्टी, पापा कहाँ हैं ?”

सृष्टी बूक रखकर खड़ी होते हुए बोली—“अभी बुलाती हूँ.”

सृष्टी दूसरी मंजिल पर जाती सीढियों के पास आकर जोर से बोली—“पापा, राज भईया बुला रहे हैं.”

सृष्टी वापस सोफे पर आकर अपनी बुक लेकर बैठ गई. जयशर्मा सीढिया उतरते हुए नीचे आए.

जयशर्मा—“हाँ, वो हो गया क्या ?”

राज—“हाँ, सारे नेकलेस कड़ी लगाकर केबिन में रख दिये.”

जयशर्मा ने बेसमेंट की सीढियों की तरफ मुड़ते हुए कहा—“चल फिर दूसरा काम देता हूँ.”

राज—“सेठ जी.”

जयशर्मा रूककर राज की तरफ मुड़कर बोले—“हाँ.”

राज—“आज मैं जल्दी चला जाऊँ ?”

जयशर्मा—“लेकिन अभी तो पाँच ही बजे हैं.”

राज—“सेठ जी, वो डॉली अकैली होगी ना.”

जयशर्मा राज की तरफ देखकर मुस्कुराते हुए बोले—“अरे यार, तू तो शादी से पहले ही पत्नीवर्ता बन रहा हैं. पहले शादी तो कर ले.”

राज ने शर्माकर मुस्कुराते हुए कहा—“नहीं, सेठ जी. ऐसी कोई बात नहीं हैं. बस वो जिन्दगी में परेशान हैं, इसलिए थोड़ी हमदर्दी हैं.”

जयशर्मा—“कोई बात नहीं, ठीक हैं. जा.”

राज ने मुड़कर घर का दरवाजा खोला.

जयशर्मा—“अरे सुन.”

राज रूककर जयशर्मा की तरफ देखकर बोला—“हाँ, सेठ जी.”

जयशर्मा—“तू उसके साथ रह तो रहा हैं, लेकिन अपनी लिमिट का ध्यान रखना. वो तो उसके माँ–बाप गलत हैं, वरना मैं तुझे उसके साथ रहने नहीं देता. इसलिए ये बात हमेशा याद रखना, उससे तेरी शादी नहीं हुई हैं.”

राज—“मैं सब समझता हूँ, सेठ जी. मैं हर बात हमेशा ध्यान में रखता हूँ.”

जयशर्मा—“बहुत अच्छी बात हैं. अब जाओ.”

राज घर से बाहर चला गया.

सोफे पर बैठी सृष्टी ने बुक से हटाकर चेहरा ऊपर करके कहा—“पापा, आपसे एक बात पूछू ?”

जयशर्मा सृष्टी की तरफ मुड़कर बोले—“हाँ, पूछो.”

सृष्टी—“पापा, राज भईया उस लड़की के साथ रहते–रहते उसके साथ रिलेशन बना लेते हैं, तो क्या ये गलत होगा ? क्योंकि राज भईया को तो हम सब बहुत अच्छी तरह जानते हैं. राज भईया उस लड़के रंगीला की तरह डॉली को धोखा तो बिल्कुल नहीं देगें.”

जयशर्मा सृष्टी के पास सोफे पर बैठकर सृष्टी के कंधे पर हाथ रखकर बोले—“बेटा, ये सोच–समझकर विचार करने वाली बात हैं. राज ने तो उस लड़की को इसलिए अपने साथ रखा हैं, क्योंकि उस लड़की के माँ–बाप ने उसकी मदद करने की जगह उसके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया. वो लड़की राज से चार–पाँच हजार रुपये माँगकर इस शहर को छोड़कर जा रही थी. अब आजकल टाइम कितना खराब हैं, ये तो तुम भी जानती हो. इसलिए राज का उसको अपने पास रखना सही हैं. लेकिन अगर कोई लड़का राज के देखा–देखी, कि राज लड़की को अपने साथ रख रहा हैं, तो मैं भी किसी लड़की को अपने साथ रख लेता हूँ. तब उस लड़के का लड़की को अपने साथ रखना सही हैं या गलत ?”

सृष्टी—“हम्म………शायद नहीं.”

जयशर्मा—“लगता हैं, तुम्हें समझ नहीं आया. देखो, पहली बात तो ये हैं, कि राज ऐसा कुछ करेगा ही नहीं. लेकिन अगर राज उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो हमें पता हैं, राज उस लड़की को धोखा नहीं देगा और आज नहीं तो कल लड़की से शादी कर लेगा. लेकिन इस बात का फायदा उस रंगीला नाम के लड़के जैसे गलत लोग उठा सकते हैं. फोर एग्जामपल राज के आस–पास रहने वाला कोई गलत लड़का राज का उदाहरण देकर कहे, कि देखो राज शादी किये बिना एक लड़की के साथ रिलेशन में हैं, तो हम क्यों नहीं रह सकते ? अब जो लड़की हमारी तरह राज को जानती हैं, वो क्या सोचेगी ? कि राज जैसा अच्छा लड़का शादी किये बिना रिलेशन में रह रहा हैं, तो इसमें कुछ गलत नहीं होगा. मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड के साथ रह लेती हूँ. जैसे राज बाद में शादी करेगा, उसी तरह मैं भी मेरे बॉयफ्रैंड से बाद में शादी कर लूँगी.”

सृष्टी—“और बॉयफ्रैंड अपना मतलब पूरा होने के बाद पलट जाता हैं. लड़की ने एक अच्छे लड़के को फोलो किया, लेकिन पूरी बात जाने और समझे बिना गलत लड़के को चुन लिया.”

जयशर्मा ने सृष्टी के कंधे से हाथ हटाकर कहा—“हाँ, अब तुमने सही कहा. तुम्हें ये तो पता ही हैं, तुम्हारी मम्मी से पहले मेरी शादी किसी ओर से हो गई थी. बाद में उससे अलग होने के बाद मेरी शादी तुम्हारी मम्मी से हुई. अब कोई मेरा उदाहरण देकर अपनी पत्नी को छोड़कर किसी ओर से शादी करे, तो क्या ये सही होगा ?”

सृष्टी—“लेकिन आपकी शादी तो दादाजी और उसके(पहली पत्नी के) घरवालों ने जबरदस्ती की थी. और आपने उससे शादी करने के बाद भी उसे अपनी पत्नी माना ही नहीं था. आप तो मम्मी को ही अपनी पत्नी मानते थे.”

जयशर्मा—“हाँ, लेकिन गलत लोग सारी बात नहीं बताएँगें. गलत लोग सिर्फ आधी–अधुरी बात बताएँगें और अपनी गलत मनमानी को सही साबित करने की कोशिश करेंगे. अगर कोई आदमी एक बार किसी नारी को अपनी पत्नी मानकर अपना ले, फिर उस आदमी का अपनी पत्नी को छोड़ देना, पूरी तरह से गलत हैं. या तो किसी को जीवनसाथी बनाओ मत और अगर किसी को जीवनसाथी बना लिया तो फिर पूरी ईमानदारी रिश्ता निभाओ.”

सृष्टी—“हम्म………मतलब राज भईया उस लड़की के साथ रिलेशन बनाए तो गलत नहीं हैं, क्योंकि राज भईया उसे धोखा नहीं देगें. लेकिन कहीं मैं राज भईया को फोलो करके बिना किसी मजबुरी के किसी गलत लड़के के चक्कर में फँस गई और अपनी मनमानी करने लगी. तब गलत हो जाएगा.”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“हाँ बेटी, हर माँ–बाप के मन में यहीं डर रहता हैं.”

सृष्टी जयशर्मा के गले लगकर बोली—“डॉन्ट वैरि पापा, मैं ऐसा कुछ नहीं करूँगी. अगर मेरी जिन्दगी में कोई लड़का आया भी तो मैं सबसे पहले उसे आपसे और मम्मी से मिलवाऊँगी. अगर वो आप दोनों को पसन्द आया, तो ठीक हैं. वरना वहीं लव का द एंड कर दूँगी.”

जयशर्मा ने मुस्कुराकर सृष्टी को गले लगाकर कहा—“आई एम प्राउड ऑफ यू.”
 
शाम के छः बजे राज बिल्डिंग की छत पर खड़ा डॉली के साथ बातें कर रहा था. राज ने नीचे की तरफ देखा, बिल्डिंग के मालिक राज किशोर की गाड़ी बिल्डिंग के सामने आकर रूकी.

उम्र में बयालिस(42) साल के राज किशोर गाड़ी बन्द करके गाड़ी का गेट खोलकर गाड़ी से उतरे और गाड़ी का गेट बन्द करके ऊपर देखकर राज को नीचे आने का इशारा किया.

राज ने छत से नीचे जाने लगा. डॉली भी राज के पीछे–पीछे चल पड़ी.

राज ने सीढिया उतरते हुए मन में सोचा कि ये आज अचानक कैसे आया हैं ?

नीचे आकर बिल्डिंग से बाहर आते हुए राज ने कहा—“राम–राम, अंकल जी. आज अचानक कैसे आना हुआ ?”

राज किशोर—“क्यों, मेरी बिल्डिंग में आने के लिए तुमसे इजाज़त लेनी पड़ेगी क्या ?”

डॉली नीचे आकर बिल्डिंग के दरवाजे पर खड़ी होकर राज और राज किशोर की बातें सुनने लगी.

राज—“नहीं–नहीं, आप तो बुरा मान गए. मैं तो वैसे ही पूछ रहा था. असल में मैं खुद भी आपसे मिलने आने वाला था.”

राज किशोर—“अब तूने काम ही ऐसा कर दिया, बुरा तो लगना ही था. मैनें ये बिल्डिंग सस्ते किराये में तुझे रहने के लिए इसलिए दी थी, क्योंकि बिजी होने के कारण मेरा इस साइड चक्कर कम लगता हैं. तू यहाँ रहेगा, तो बिल्डिंग की देखभाल होती रहेगी. लेकिन तू तो लड़की लाकर मेरी बिल्डिंग को अय्याशी करने का अड्डा बना रहा हैं.”

राज—“अंकल, मैं यहाँ कोई कॉलगर्ल लेकर नहीं आया और ना ही किसी को जबरदस्ती उठाकर लाया हूँ. ये सेठ साँवरमल जी की बेटी हैं और मैं इसके साथ कोई अय्याशी नहीं कर रहा हूँ.”

राज किशोर—“हाँ, मुझे भी पता हैं, ये किसकी बेटी हैं. इसके तो अब गली–गली में चर्चें हो रहे हैं. तू इसके साथ कुछ भी कर, लेकिन मेरी बिल्डिंग से बाहर.”

राज—“कौनसे चर्चें हो रहे हैं ? एक लड़के ने प्यार और शादी के वादे करके इसको धोखा दिया, इसने उस लड़के के बारे में फेसबुक पर पोस्ट करके सबको बताया. उस लड़के का कमीनापन सबके सामने आ गया. अब जो उस लड़के जैसे घटिया लोग हैं, वो तो चर्चा करेगें ही. उनको डर लग रहा होगा, कल को कोई लड़की डॉली की तरह उनकी पोल ना खोल दें.”

राज किशोर—“मुझे तेरे साथ कोई बहस नहीं करनी. तू तो बस अभी के अभी इस लड़की को मेरी बिल्डिंग से बाहर निकाल या फिर तू खुद भी इसके साथ निकल जा.”

राज—“ठीक हैं, मैं दो–चार दिन में कोई दूसरी जगह देख लेता हूँ. फिर आपकी बिल्डिंग खाली कर दूँगा.”

राज किशोर—“मुझे कोई दो–चार दिन नहीं देखने. तू अभी निकल यहाँ से.”

राज—“लेकिन अभी अचानक हम कहाँ जाएगें ?”

राज किशोर—“वो मुझे क्या पता, भाई ? मेरे भाहे सड़क पर रह. मैं बिल्डिंग को ताला लगाकर जा रहा हूँ. पच्चीस दिन का किराया देकर अपना सामान निकालकर ले जाना.”

राज—“रूकिये ! मैं एटीएम से पैसे निकालकर लाता हूँ. अभी सामान निकाल रहा हूँ.”

राज किशोर—“हाँ, तो निकाल जल्दी.”

डॉली चलकर राज के पास आकर बोली—“मैं चली जाती हूँ ना. तुम क्यों परेशान हो रहे हो ?”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“तुम टेन्शन मत लो. सामान नारायण के घर छोड़कर दो–चार दिन किसी होटल में रह लेगें.”

डॉली—“लेकिन…”

राज—“बस अब सामान निकालने दो. वरना ये ताला लगाकर चले जाएगें.”

राज ने चलकर गाड़ी के सामने आकर चौराहे पर खड़े होकर बातें कर रहे उम्र में चौदह(14) साल से अठारह(18) साल तक के पाँच लड़कों को आवाज़ लगाकर कहा—“करन ! इन चारों को लेकर इधर आ, यार.”

पाँचों लड़के राज के पास आए.

राज ने पाँचों लड़कों से कहा—“तुम सब डॉली के साथ ऊपर सबसे ऊपर वाले फ्लेट में जाओ और वहाँ से मेरा जितना भी सामान हैं, मेरे कपड़े, घड़ा, बिस्तर, बैड, प्रेस सब नीचे लाकर वहाँ नारायण की दुकान के सामने रख दो. ठीक हैं, रखवा दोगे ना ?”

एक लड़का बोला—“हाँ–हाँ, भईया. अभी रख देते हैं. आप चिन्ता मत करो.”

राज—“ठीक हैं. फिर रखवा दो. मैं इनको किराया देने के लिए एटीएम से पैसे लेकर आ रहा हूँ.”

राज ने डॉली की तरफ़ देखकर कहा—“डॉली, तुम इनके साथ ऊपर जाओ. देख लेना, कुछ रह ना जाए.”

डॉली पाँचों लड़कों को लेकर बिल्डिंग में ऊपर चली गई. राज आम्रपाली सर्किल की तरफ एटीएम से पैसे लाने चल पड़ा.

राज ने नारायण की दुकान के सामने आकर कहा—“नारायण भाय जी, बे छोरा मेरो समान ले ग आवे. थे अठे थारे घृहे रखवा ल्यो एक बारी. बो बिल्डिंग गो मालिक क्योवे, अभी के अभी बिल्डिंग खाली कर. मैं बिन किरोयो देण वास्ते एटीएम उ पिसा ले ग आऊँ.”(हिन्दी अनुवाद : नारायण भाई जी, वो लड़के मेरा सामान लेकर आ रहे हैं. आप यहाँ आपके घर में रखवा लो, एक बार. वो बिल्डिंग का मालिक कह रहा हैं, अभी के अभी बिल्डिंग खाली कर. मैं उसको किराया देने के लिए एटीएम से पैसे लेकर आ रहा हूँ.)

नारायण—“क्यों ? इसी के बात होई ?”(हिन्दी अनुवाद : क्यों ? ऐसी क्या बात हो गई ?)

राज—“बस ईया ई, डॉली ग कारण क्योवे ?”(हिन्दी अनुवाद : बस ऐसे ही, डॉली के कारण बोल रहा हैं.)

नारायण—“कित्तो किरायो बाकि हैं ?”(हिन्दी अनुवाद : कितना किराया बाकि हैं ?)

राज—“मैं तो दो हजार पूरा ही पकड़ा द्यूगा. हिसाब–हुसुब कोनी लगाऊँ म.”(हिन्दी अनुवाद : मैं तो दो हजार पूरे ही पकड़ा दूँगा. हिसाब–हुसुब नहीं लगाता मैं.)

नारायण ने अपनी जेब से दो हजार रुपये निकालकर कहा—“ल तो पकड़ाया फेर. तू मन दे दई बाद म.”(हिन्दी अनुवाद : लो तो पकड़ा दो फिर. तुम मुझे दे देना बाद में.)

राज—“ये भी सही हैं.”

राज ने नारायण से दो हजार रुपये लिए और वापस आकर राज किशोर को पैसे और बिल्डिंग की चाबियाँ देकर पाँचों लड़कों और डॉली के साथ मिलकर अपना सारा सामान बिल्डिंग से निकालकर नीचे रखने लगा.

राज किशोर बिल्डिंग में आकर पूरी बिल्डिंग चैक करने लगा.

राज के डॉली और पाँचों लड़कों के साथ मिलकर सारा सामान बिल्डिंग से बाहर निकालने के बाद राज किशोर बिल्डिंग से बाहर आकर बिल्डिंग को ताला लगाकर अपनी गाड़ी में बैठकर चले गये.

राज डॉली और पाँचों लड़कों के सहयोग से अपना सामान नारायण के घर में रखने लगा.

राज ने सारा सामान नारायण के घर में रखने के बाद नारायण से कहा—“अच्छा, म्हे जावा अब.”(हिन्दी अनुवाद : अच्छा, हम जा रहे हैं अब.)

नारायण—“कढ़े ?”(हिन्दी अनुवाद : कहाँ ?)

राज—“दो–चार दिन कोई नई जगह नई मिले, इत्ते कोई होटल म ठहरा गा.”(हिन्दी अनुवाद : दो–चार दिन कोई नई जगह नहीं मिलती, तब तक किसी होटल में रूक जाएगें.)

नारायण—“अरे होटल म क्यू जावे ? अठे मेर खन रे ले.”(हिन्दी अनुवाद : अरे होटल में क्यों जा रहा हैं ? यहाँ मेरे पास रह ले.)

राज—“नई यार, तन दिक्कत होवेगी. फेर नयो घर मिलना म के बेरो, कित्तो क टैम लागे ?”(हिन्दी अनुवाद : नहीं यार, तुझे प्रोब्लम होगी. फिर नया घर मिलने में क्या पता, कितना टाइम लगे ?)

नारायण—“कि दिक्कत कोनी होवे, चार दिन म. कोई रिश्तेदार आवे, जद बी तो धिकावा ही हाँ. आपणे मायने दो कमरा हैं, एक म आ बाई हर तेरी भाभी सो ज गी. दूसरा म आपा दोनों भाई सो जा गा.”(हिन्दी अनुवाद : कोई प्रोब्लम नहीं होगी, चार दिन में. जब कोई रिश्तेदार आते हैं, तब भी तो एडजस्ट या मैनेज करते ही हैं. अपने अन्दर दो कमरे हैं, एक में तेरी भाभी और ये बहन सो जाएगी. दूसरे में हम दोनों भाई सो जाएगें.)

राज—“लेकिन यार…”

नारायण—“यार–यूर की कोनी, तू होटल–हाटल छोड़. अठेई टिक जा. आपणा खन बडो घर कोनी, तो के होयो ? आपणो दिल घणो ही बडो हैं.(हिन्दी अनुवाद : यार–यूर कुछ नहीं, तुम होटल–वोटल को छोड़ो. यहीं टिक जाओ. अपने पास बड़ा घर नहीं हैं, तो क्या हुआ ? अपना दिल बहुत बड़ा हैं.)

राज ने मुस्कुराकर कहा—“ये भी सही हैं.”

रात को दस बजे राज और डॉली ने नारायण के परिवार के साथ बैठकर हँसते–खिलखिलाते बातें करते हुए खाना खाया.

रात के ग्यारह बजे राज नारायण के साथ अलग कमरे में सो गया और डॉली नारायण की पत्नी के साथ अलग कमरे में सो गई.

अगले दिन छब्बीस जून, सोमवार की सुबह पौने दस बजे फर्श पर बिछे कालीन पर बैठकर जयशर्मा और मिनी अपने तीनों बच्चों के साथ नाश्ता कर रहे थे.

राज दरवाजा खोलकर घर के अन्दर आया.

सृष्टी खड़ी होते हुए बोली—“राज भईया आ गए, मैं उनके लिए थाली लेकर आती हूँ.”

राज—“नहीं, आज मैं नाश्ता करके आया हूँ.”

सृष्टी वापस बैठ गई और अपना नाश्ता करने लगी.

जयशर्मा—“बैठ जा फिर. मैं नाश्ता कर लूँ, फिर नीचे चलते हैं.”

राज ने आगे आकर सोफे पर बैठकर कहा—“सेठ जी, कोई किराये का कमरा या एक–दो कमरो वाला कोई किराये का घर हैं क्या आपके ध्यान में ?”

जयशर्मा—“किसलिए ?”

राज—“मेरे रहने के लिए.”

जयशर्मा—“वो बिल्डिंग के फ्लेट को क्या हुआ ?”

राज—“वो कल शाम को मेरे यहाँ से जाने के बाद बिल्डिंग के मालिक राज किशोर जी आए थे. उन्होंने खाली करवा लिया.”

जयशर्मा ने हैरान होकर कहा—“अचानक कैसे खाली करवा लिया ?”

राज—“मैनें डॉली को अपने साथ रख लिया इसलिए.”

जयशर्मा—“फिर क्या हो गया ? बोल देता, तेरी दोस्त हैं. कुछ दिन तेरे साथ रहेगी.”

राज—“कहा था, लेकिन वो नहीं माने. उन्होंने कहा, या तो डॉली को अभी बाहर निकाल या फिर तू भी निकल जा.”

जयशर्मा अपना नाश्ता खतम करके खड़े होकर हाथ धोने जाते हुए बोले—“हाँ, तो फिर टाइम तो माँगता. बोल देता, एक तारीख को खाली कर दूँगा.”

राज—“कहा था, सेठ जी. लेकिन वो बोले, मैं तो ताला लगाकर जा रहा हूँ. पच्चीस दिन का किराया देकर अपना सामान ले जाना.”

मिनी—“फिर कल रात को कहाँ सोए ?”

राज—“बिल्डिंग के पास वो दुकानवाला नारायण हैं ना. मैं तो सामान उसके घर छोड़कर किसी होटल में जा रहा था. लेकिन नारायण ने कहा, जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती, मेरे घर रूक जा. फिर कल रात को मैं और डॉली उसके घर सोए थे.”

जयशर्मा हाथ धोकर तौलिए से हाथ–मुँह पोंछते हुए बोले—“तो तुम मुझे फोन कर देते. तुम्हें बोला हुआ हैं ना, ऐसी कोई बात हो तो मुझे या मैडम को फोन कर दिया करो. फ्लेट उसने किराये पर दिया हैं, कोई फ्री में तो दिया नहीं हैं और किराया तुम हमेशा टाइम पर देते हो. फिर ऐसे अचानक कैसे निकाल सकता हैं ? यू ही सामान उठाकर निकल गया.”

मिनी अपना नाश्ता खतम करके हाथ धोने आई. जयशर्मा हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में गए और ऑफ़िस की चाबी लेकर वापस आए.

जयशर्मा ने राज को चाबी देते हुए कहा—“चल ऑफ़िस खोल, मैं कपड़े बदलकर आता हूँ.”
 
राज चाबी लेकर सीढिया उतरते हुए नीचे चला गया. मिनी तौलिए से हाथ–मुँह पोंछकर बैडरूम में आकर बैड पर बैठ गई.

मिनी ने आईने के सामने खड़े होकर शर्ट के बटन लगा रहे जयशर्मा से कहा—“जय, एक बात कहूँ ?”

जयशर्मा—“बोलो.”

मिनी—“वो डॉली कोई आवारा लड़की तो हैं नहीं और राज बता रहा था, अब उसने शराब पीना भी बहुत कम कर दिया हैं. तो जब तक राज को दूसरी जगह नहीं मिलती, तब तक राज और डॉली को हम अपने घर रख ले ?”

जयशर्मा ने मुड़कर कहा—“मैं तो खुद यहीं सोच रहा था. वो बेचारा नारायण, उसके घर में दो कमरे हैं. फिर भी वो इनकी मदद कर रहा हैं. हमारे घर में तो एक कमरा खाली पड़ा हैं.”

मिनी—“तो फिर कहा क्यों नहीं ?”

जयशर्मा—“मुझे लगा, शायद डॉली को अपने घर में रखने के लिए तुम ना मानो.”

मिनी—“मैं क्यू नहीं मानूँगी ? जब वो गलत रास्ता छोड़कर, सही रास्ते पर आना चाहती हैं, तो हमें उसकी मदद करनी चाहिए.”

जयशर्मा ने दीवार पर टंगा हुआ अपना कोट हाथ में लेकर पहनते हुए कहा—“हाँ, ये तो सही बात हैं.”

जयशर्मा ने कोट पहनकर नाश्ता करने के बाद सोफे पर बैठे संयम से कहा—“संयम बेटा, नीचे से राज भईया को बुलाना.”

संयम ने सोफे से उठकर दरवाजे के पास आकर आवाज़ लगाई—“राज भईया, पापा बुला रहे हैं.”

संयम वापस सोफे पर आकर बैठ गया. राज सीढिया चढ़ते हुए ऊपर आया.

जयशर्मा ने बैडरूम से बाहर आकर कहा—“अरे, वो डॉली ने शराब पीनी छोड़ दी क्या ?”

राज—“पूरी तरह तो नहीं छोड़ी. लेकिन घर से आने के बाद अभी तक एक बार भी नहीं पी. वो पहले ज्यादा पीती थी, इसलिए कभी–कभी शराब के लिए बैचेन हो जाती हैं. तब मैं उसे कोल्ड ड्रिंक पिला देता हूँ.”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“कोल्ड ड्रिंक पीने से शराब की बैचेनी दूर हो जाती हैं क्या ?”

राज—“पता नहीं, लेकिन ज्यादातर बेवड़े खाना खाने से पहले भूखे पेट शराब पीते हैं. मैनें सोचा, जब पेट भर जाएगा तो शराब के लिए जगह ही नहीं रहेगी. इसलिए कोल्ड ड्रिंक लाकर पिला देता हूँ.”

जयशर्मा—“अच्छा, तुम तो जानता हो, अपने घर में शराब और नॉनवेज नहीं चलता. इसलिए पूछा.”

राज—“नहीं सेठ जी, बस उसमें ये शराब पीने की गलत आदत हैं और इसे भी वो अब छोड़ रही हैं. बाकि वो हर तरह से बहुत अच्छी लड़की हैं और नॉनवेज भी नहीं खाते वो लोग.”

जयशर्मा—“ठीक हैं, फिर तुम ऐसा करो. तेरा बाकि सामान तो नारायण के घर पड़ा रहने दे. जब दूसरी जगह मिल जाएगी, तब नारायण के घर से उठा लेना. तेरे कपड़े लेकर डॉली को यहाँ अपने घर ले आ. जब तक दूसरी जगह नहीं मिलती तुम दोनों यहाँ रह लो. तुम तो ये सामने वाले कमरे में सो जाना. डॉली ऊपर सृष्टी के पास सो जाएगी.”

राज—“लेकिन सेठ जी, आपको प्रोब्लम नहीं होगी ?”

जयशर्मा—“अरे, प्रोब्लम क्या होगी ? तुम ले आओ.”

संयम ने राज से कहा—“और अगर डॉली अकैली सोना चाहे, तो आप मेरे कमरे में सो जाना.”

राज ने मुस्कुराकर कहा—“ठीक हैं.”

राज नीचे जाने लगा.

जयशर्मा—“नीचे कहाँ जा रहा हैं ?”

राज—“थोड़ा काम.”

जयशर्मा—“काम आकर कर लेना. पहले ले आ उसको. फिर सारा दिन काम ही करना हैं.”

राज—“ये भी सही हैं.”

राज मुड़कर घर का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया.

जयशर्मा ने सोफे पर बैठी सृष्टी से कहा—“कोई प्रोब्लम तो नहीं हैं ना, डॉली तुम्हारे कमरे में सोए तो ?”

सृष्टी—“नहीं–नहीं, कोई प्रोब्लम नहीं हैं.”

जयशर्मा—“चलो, फिर ठीक हैं.”

जयशर्मा सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चले गए.

दो दिन बाद अठाईस जून, बुधवार को शाम के सात बजे जयशर्मा के घर के सामने सेठ साँवरमल बागड़ी की गाड़ी आकर रूकी. सेठ साँवरमल बागड़ी गाड़ी से उतरकर घर का मुख्य दरवाजा खोलकर राजलक्ष्मी के साथ अन्दर आए और घर के दरवाजे पर आकर बेल बजाई.

सोफे पर बैठकर टीवी देखते हुए हाथ में प्लेट लिए काँटे से चाउमीन खा रही सृष्टी ने चाउमीन की प्लेट सोफे पर रखकर सोफे से उठी और चलकर दरवाजे के पास आकर दरवाजा खोला.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“जयशर्मा जी घर पर हैं ?”

सृष्टी—“हाँ, आप अन्दर आईये. मैं उनको बुलाती हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी राजलक्ष्मी के साथ अन्दर आए. सृष्टी ने सोफे से चाउमीन की प्लेट उठाकर उन्हें सोफे पर बिठाया और चाउमीन की प्लेट हाथ में लिए सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में आकर केबिन में आई.

जयशर्मा अपनी चेयर पर बैठे सामने रखे कम्प्यूटर में कुछ काम कर रहे थे. मिनी और डॉली कारपेट लगे फर्श पर नीचे बैठकर ज्वैलरी पैक कर रही थी. केबिन के बाहर राज कुर्सी पर बैठा अपने टेबल पर लैम्प जलाकर स्टोन चैक कर रहा था.

सृष्टी—“पापा, डॉली दीदी के मम्मी–पापा आए हैं. मैनें उनको सोफे पर बिठा दिया.”

जयशर्मा कम्प्यूटर से नजर हटाकर बोले—“चाय–नाश्ता तैयार करो फिर उनके लिए. मैं आता हूँ.”

सृष्टी मुड़कर वापस चली गई.

डॉली ने कहा—“अंकल, अगर वो मुझे लेने आए हैं, तो आप उनसे साफ़–साफ़ कह देना. मुझे उनके साथ नहीं जाना. मैं यहाँ आपके पास जॉब करके बहुत खुश हूँ.”

जयशर्मा—“ऐसे नहीं बोलते, बेटी. पहले उनसे बात तो करे, क्या कहते हैं वो ?”

डॉली—“उनकी बातें मुझे पता हैं. उनके साथ रहकर ना मैं खुश रहती हूँ, ना वो खुश रहते हैं. इससे अच्छा, मैं उनसे अलग ही रहूँ.”

मिनी—“अलग रहना कोई सोल्यूशन नहीं होता, डॉली. अब हम बात करते हैं उनसे. फिर देखते हैं, तुम्हारे और उनके बीच की प्रोब्लम का क्या सोल्यूशन हैं ?”

डॉली—“कोई सोल्यूशन नहीं हैं, अन्टी.”

जयशर्मा मुस्कुराकर बोले—“और अगर कोई सोल्यूशन निकल आया तो ?”

डॉली—“अंकल, जब एक बार कोई धागा टूट जाता हैं, फिर वो दूबारा जुड़ता भी हैं, तो एक गाँठ के साथ. जो बार–बार कहीं ना कहीं अटकती रहती हैं.”

जयशर्मा—“तुम चिन्ता मत करो, हम वो अटकने वाली गाँठ नहीं रहने देगे.”

डॉली कुछ नहीं बोली और उदास हो गई.

जयशर्मा ने डॉली को उदास होते देखकर कहा—“देखो, कभी–कभी माँ–बाप भी अन्जाने में अपने बच्चों के साथ कुछ गलत कर देते हैं. हम उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं, शायद वो समझ जाए. लेकिन अगर हम कोशिश ही नहीं करेंगें. तब तो वो बिल्कुल नहीं समझेंगे. इसलिए कोशिश करना बहुत जरूरी हैं.”

मिनी—“आप ऊपर जाओ, वो लोग इंतजार कर रहे होगे. डॉली को मैं समझाती हूँ.”

जयशर्मा चेयर से उठते हुए बोले—“ठीक हैं.”

जयशर्मा केबिन से बाहर आकर सीढ़िया चढ़ते हुए ऊपर आकर सोफे पर बैठे सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की तरफ आते हुए हाथ जोड़कर मुस्कुराते हुए बोले—“राम–राम, साँवरमल जी. कहिये, क्या सेवा करे आपकी ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी हाथ जोड़कर सोफे से खड़े हुए.

सेठ साँवरमल बागड़ी—“राम–राम, जयशर्मा जी.”

जयशर्मा—“अरे, आप लोग खड़े क्यों हो गए ? बेठिये–बेठिये. (सृष्टी को आवाज़ देकर) सृष्टी, चाय बनी नहीं अभी तक ?”

किचन में से सृष्टी की आवाज़ आई—“बस पापा, बन रही हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“चाय रहने दीजिये. हम तो बस डॉली को लेने आए हैं. मुझे पता चला, वो आपके पास जॉब करने वाले किसी लड़के के साथ रह रही थी और अब आपके घर पर हैं. उसे बुला दीजिये.”

जयशर्मा ने सोफे पर बैठकर कहा—“अब हम लोग इतने भी बुरे नहीं हैं, जो आप हमारे घर की चाय नहीं पी सकते. आपकी बेटी डॉली हमारे घर पर हैं. बिल्कुल सही सलामत हैं. उसकी चिन्ता मत कीजिये.”

राजलक्ष्मी—“आप भी अजीब बात करते हैं, जयशर्मा जी. जिनकी बेटी पाँच दिन से गायब हैं. उनको बोल रहे हैं, चिन्ता मत करो.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“पिछले पाँच दिनों से हमारी क्या हालत हैं ? ये हम ही जानते हैं. ऊपर से उसके करम ऐसे हैं, पुलिस में जाकर शिकायत भी नहीं कर सकते.”

जयशर्मा—“मैं सब समझता हूँ, साँवरमल जी.”

राजलक्ष्मी—“अब रहने दीजिये, जयशर्मा जी. ये झूठी हमदर्दी मत दिखाईए. अगर आप सब समझते, तो डॉली आपके पास नौकरी करने वाले लड़के के साथ हैं, ये बात जानते हुए भी हमसे छुपाते नहीं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“छोड़ो, किर्ती(डॉली को घर पर किर्ती कहते हैं) की माँ. जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो दूसरों से क्या शिकायत करनी.”

सेठ साँवरमल बागड़ी ने जयशर्मा से कहा—“आप तो डॉली की बुला दीजिये, हम जाना चाहेंगे.”

जयशर्मा—“डॉली को मैं बुला दूँगा. वो नीचे मिसेज(पत्नी) के साथ हैं. लेकिन पहले तो हाथ जोड़कर आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें डॉली के बारे में आपको बताया नहीं इसलिए. फिर डॉली के बारे में ही आपसे कुछ बातें करनी हैं. लीजिये, पहले चाय पीजिये. चाय आ गई.”

सृष्टी ट्रे में तीन कप चाय और तीन प्लेट में नाश्ता रखकर ले आई.

जयशर्मा ने खड़े होकर सृष्टी से ट्रे लेकर बोले—“बेटा, वो टेबल यहाँ खिसका लो.”

सृष्टी ने टेबल खिसका कर सोफे के आगे कर दिया.

जयशर्मा ने टेबल पर ट्रे रखकर कहा—“लीजिए, चाय लीजिए.”

सृष्टी—“मैं जाऊँ, पापा ?”

जयशर्मा—“हाँ, जाओ.”

सृष्टी सीढिया उतरते हुए नीचे बेसमेंट में चली गई.

सेठ साँवरमल बागड़ी, राजलक्ष्मी और जयशर्मा ने चाय का एक–एक कप उठा लिया.

जयशर्मा—“हाँ, तो मैं कह रहा था. सबसे पहले तो मैं आपसे माफ़ी चाहूँगा, मैनें डॉली के बारे में बताया नहीं इसलिए.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“कोई बात नहीं, अब जाने दीजिए. बार–बार माफ़ी माँगकर शर्मिन्दा ना करें. हमारी सड़कों पर आवारा घूमने वाली बिगड़ैल बेटी शहर के एक बहुत इज्जतदार घर में हैं, यहीं बहुत हैं.”

जयशर्मा—“इज्जत तो आप सब बड़ों के आशिर्वाद से हैं. जहाँ तक बात हैं, डॉली के बिगड़ैल होने की. तो पहले हम भी डॉली को बिगड़ैल ही समझते थे. लेकिन पिछले ढ़ाई–तीन महिने में डॉली ने अपनी बहुत से बातें मेरे पास जॉब करने वाले राज को बताई और राज ने हमें बताई. डॉली की सारी बातें जानने के बाद हमें पता चला, वो बिगड़ैल नहीं हैं, वो भटकी हुई हैं. बिगड़ैल लोगों में और भटके हुए लोगों में बहुत फर्क होता हैं. बिगड़ैल होते हैं, डॉली को चीट करने वाले उस लड़के जैसे लोग. जो दूसरों की जिन्दगी खराब करते हैं और भटके हुए होते हैं, डॉली जैसे लोग. जो खुद की जिन्दगी खराब करते हैं.”

राजलक्ष्मी—“अब जो भी कहिये, हमें तो उसने कहीं मुँह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. शर्म के कारण कई सालों से हम दोनों ने कहीं आना–जाना भी बन्द कर रखा हैं.”

जयशर्मा—“इसी के बारे में तो आप लोगों से बात करना चाहता हूँ, ताकि इस समस्या का हल निकले.”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“अब क्या हल निकलेगा, जयशर्मा जी ? बहुत कोशिश की इस लड़की को सही रास्ते पर लाने की. लेकिन ये तो दिन ब दिन पहले से ज्यादा बिगड़ती गई.”

जयशर्मा—“अब तक क्या–क्या कोशिशे की हैं आप लोगों ने ?”

राजलक्ष्मी—“क्या नहीं किया हमने उसके लिए ? बड़ी मिन्नतो के बाद ये पैदा हुई थी, हमने कहा, चलो बेटा ना सही, बेटी ही सही. लक्ष्मी का रूप हैं. उसे जो चाहिए, उसके माँगने से पहले उसे लाकर दिया. अच्छी से अच्छी एज्यूकेशन दिलाई. किसी भी तरह के गलत रास्ते पर चलने से हमेशा उसे रोका. कॉलेज में आई तो उसने कहा, मुझे गाड़ी चाहिए. उसे गाड़ी दिला दी. सोचा था, इकलौती बेटी हैं, इसे किसी चीज के लिए मना करेंगे, तो कहीं भटक कर गलत रास्ते ना पकड़ ले. लेकिन किस्मत फूटी हो तो कोई क्या करे ? उसने तो ऐसे उल्टे रास्ते पकड़े, हमें कहीं का नहीं छोड़ा. इससे अच्छा तो बेऔलाद रहते. कम से कम ये तो कहते, हमारी कोई औलाद ही नहीं हैं.”

जयशर्मा—“एकबार आप लोग ठंडे दिमाग से सोचकर देखो, इतना सब करने के बाद भी आखिर ऐसी क्या वजह रही, जो आज आपको ये बात कहनी पड़ रही हैं ?”

सेठ साँवरमल बागड़ी—“वजह क्या रहनी हैं, सब किस्मत की बात हैं. जब किस्मत में बच्चों के दुःख लिखे हो तो कौन रोक सकता हैं ?”

जयशर्मा—“ऐसी बात नहीं हैं. मुझे नहीं मालूम, आपको पता हैं या नहीं पता ? लेकिन डॉली ने अब शराब पीना छोड़ दिया हैं.”

सेठ साँवरमल बागड़ी हैरान होकर बोले—“उसने शराब पीना छोड़ दिया हैं ? इस पर तो विश्वास करना मुश्किल हैं. हम तो हार गए, उसकी शराब छुड़ाने की कोशिश करते–करते.”

जयशर्मा—“लेकिन ये सच हैं. वो परसो से हमारे घर हैं. पहले ज्यादा शराब पीती थी, इसलिए कल उसको शराब नहीं पीने के कारण बहुत बैचेनी सी हो रही थी. लेकिन उसने शराब नहीं पी. मिसेज उसको डॉक्टर के पास लेकर गई, अब वो शराब पूरी तरह छोड़ने के लिए दवाई ले रही हैं.”

राजलक्ष्मी—“अगर ये बात सच हैं. फिर तो ये हमारे लिए बहुत खुशी की बात हैं. ये खुशखबरी सुनाकर तो आपने हमारी सारी नाराजगी दूर कर दी. वरना हम आपसे बहुत नाराज थे.”

जयशर्मा—“आप रूकिये तो सही, धिरे–धिरे आपकी सारी नाराजगी दूर करके ही आपको यहाँ से भेजेगें. आप लोग डॉली की शराब इसलिए नहीं छुड़ा पाए, क्योंकि पहले डॉली शराब नहीं छोड़ना चाहती थी. लेकिन अब वो खुद इस ज़हर को अपनी जिन्दगी से दूर करना चाहती हैं. हम सबको बस उसकी मदद करने की जरूरत हैं. और एक बात ये भी हैं, परसो से वो मेरे ऑफ़िस में काम भी कर रही हैं. और कहती हैं, अंकल, अब मैं नौकरी करके सेल्फ डिपेन्ड होकर अपने खुद के पैसों से एक गाड़ी खरीदना चाहती हूँ.”

सेठ साँवरमल बागड़ी हैरान होकर बोले—“ये बात डॉली कह रही थी या आप हमारे साथ मजाक कर रहे हो ?”

जयशर्मा ने हँसकर कहा—“जी नहीं, ये मजाक नहीं हैं. बिल्कुल सौ प्रतिशत सच हैं.”

राजलक्ष्मी—“लेकिन अचानक पाँच दिन में ये बदलाव आया कैसे ? वो भी इतना ज्यादा, कि एकदम से इतनी बदल गई.”

जयशर्मा—“जी हाँ, सोचने और विचार करने वाली बात यहीं हैं. कि पिछले दो–ढ़ाई महिने में ऐसा क्या हुआ, जो वो इतना बदल गई ? अभी तक मैनें आपको अच्छी बातें बताई, लेकिन अब मैं आपके बारे में कुछ कड़वी बातें बता रहा हूँ. डॉली हमारे घर पर हैं, फिर भी मैनें आपको इसलिए नहीं बताया, क्योंकि मैं सोच रहा था, कुछ दिन आप लोग डॉली से दूर रहोगे तो आपको डॉली की बुराईयों के साथ–साथ उसका भोलापन, उसकी मासूमियत, उसकी नादानियाँ, उसका बचपना, उसकी बचपन की शरारतें, ये सब बातें भी याद आएँगी. वो क्या हैं, जब कोई हमारे पास होता हैं, तब हमें उसकी कमियाँ ज्यादा नजर आती हैं. लेकिन जब कोई हमसे दूर हो जाए, तो लाख बुराईयाँ होने पर भी हमें उसकी अच्छाई ज्यादा नजर आती हैं. तो बताईए, इन पाँच दिनों में आपको डॉली की कौनसी बातें ज्यादा याद आई ? डॉली की बुराईयाँ या…”

सेठ साँवरमल बागड़ी और राजलक्ष्मी की आँखें भीग गई. दोनों ने चाय के कप टेबल पर रखी हुई ट्रे में रख दिये.
 
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