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#10
दो नंगे जिस्म एक दुसरे से इस सर्द मौसम में लिपटे हुए जिस्म की भड़की आग को शांत करने की कोशिश कर रहे थे , न जाने कब मैं सरोज के ऊपर आ चूका था , सरोज ने किस करते करते ही मेरे लंड को अपनी चूत के छेद पर रगड़ना शुरू कर दिया था, बदन में एक अलग तरह की ही फीलिंग आ रही थी . सरोज ने मेरे कुल्हो पर हाथो से दवाब बनाया और मुझे अपने अन्दर खींचने लगी. जिन्दगी में पहली बार मैं चूत मारने जा रहा था , सरोज की चूत के पानी से सना लंड , चूत की फांको को चौड़ी करते हुए अन्दर घुस रहा था .
जैसे कोई सांप किसी बिल में घुसता है ठीक वैसे ही मेरा लंड उस छेद में घुस गया था जिसके पीछे हर मर्द पागल रहता था , मेरे गर्म लंड को अपनी गुफा में महसूस करके सरोज जैसे पागल हो गयी थी उसने और जोरो से होंठ चूसने शुरू कर दिए मेरे कुल्हो को सहलाने लगी, मेरी जिदंगी का पहला सम्भोग मेरी माँ सामान काकी के साथ होना ही लिखा था .
“धीरे धीरे धक्के मार ”
“कैसे ” मैंने कहा
“इसे आगे पीछे कर ” बोली वो
ऐसा नहीं था की मुझे मालूम नहीं था क्या करना है , पर उत्तेजित नारी के मुह से ऐसी अश्लील बात सुन कर उत्तेजना और बढ़ जाती है , ठीक जैसा मैंने उन किताबो में पढ़ा था . सबकुछ वैसा ही हो रहा था . मैंने अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू की सरोज भी कुछ देर बात अपने चूतड उछालने लगी. उसके नाखून मेरी गर्दन के पिछले हिस्से , मेरी पीठ पर रगड़ खा रहे थे . एक ऐसा मजा जिसके बारे में बस पढ़ा ही था मैं महसूस कर रहा था . मेरे हर धक्के के बाद ऐसा लग रहा था की जैसे मैं सरोज के जिस्म में थोडा थोडा करके घुसता जा रहा था .
कमरे में दो तरह की आवाजे गूँज रही थी एक तो हमारी सांसो की और दूसरा सरोज की चूत पर मेरे लंड के धक्को की रजाई हमारे जिस्मो से उतर कर गिर चुकी थी पर अब किसी को सर्दी नहीं लग रही थी . आवेश में हम दोनों एक दुसरे के पुरेचेहरे को चूम रहे थे ,
“आह आह आह ” सरोज की मीठी आहे बेशक बाहर तूफान की आवाज में दब गयी हो पर मैं अपने अन्दर तक उनको सुन पा रहा था ,न जाने कितनी देर बाद मुझे ऐसा अहसास हुआ की शरीर में कुछ हो रहा था , बदन बहुत हल्का हो गया था , बहुत हल्का, सरोज ने अपने पैरो को मेरी कमर पर लपेट लिया और , मुझे कस लिया अपनी बाँहों में , उसकी चूत का दवाब बहुत बढ़ गया था .
और फिर वो चीखते हुए झड़ने लगी, उसने बुरी तरह जकड़ लिया मुझे और ठीक उसी लम्हे में मैंने भी अपना आपा खो दिया. मेरे वीर्य की पिच्करिया उसकी योनी के अन्दर गिरने लगी. मेरा बदन झटका खाता रहा . सारी दुनिया भूल कर मैं काकी के ऊपर ही लद गया . कमरे में चुदाई का तूफ़ान आकर गुजर गया था, बाहर अभी भी बरसात हो रही थी .
कुछ देर बाद सरोज उठी, और नंगी ही बाहर चली गई , मैं भी पीछे गया वो मूत रही थी , मैंने भी मूतना शुरू कर दिया. थोड़ी देर बाद हम दोनों चारपाई पर नंगे ही बैठे थे , न वो कुछ बोल रही थी न मैं अँधेरा जैसे हमें खा रहा था , हम दोनों जानते थे की ये एक बहुत बड़ी भूल कर दी है हमने, पर दिल बहलाने का ख्याल इतना ही था की हम दोनों जानते थे की मर्जी से हुआ था ये .
मैंने सरोज का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे धीरे उसे सहलाने लगा. उसने कोई प्रतिकिर्या नहीं दी. पर कब तक ऐसे ही बैठे रहते ठण्ड लगने लगी थी तो रजाई ओढ़ ली. उस रात एक बार और हमारी चुदाई हुई. सुबह जब आँख खुली तो मैंने देखा बारिश अभी भी हलकी हलकी हो रही थी सरोज मेरी बाँहों में ही सो रही थी , आहिस्ता से उठा मैं और अपने कपडे पहने अभी भी सीले ही थे.
मैं कमरे से बाहर आया. दूर दूर तक खेतो में पानी भर गया था . फसल को नुक्सान हुआ या नहीं बाद की बात थी पर काकी से आँखे मिलाने की हिमत नहीं बची थी मेरे अन्दर , मैं पैदल ही घर की तरफ चल पड़ा. जगह जगह कीचड़ था , घर आके मैं ठन्डे पानी से ही नहाया और बिस्तर में घुस गया .
दोपहर में करतार ने मुझे जगाया
“भाई , माँ बुला रही है खाने के लिए ”
मैं- तू चल थोड़ी देर में आता हु
कट्टु- साथ ही चलो, पापा भी है बोले की साथ ही खाना खायेंगे
मैं करतार के साथ घर पहुंचा , विक्रम चाचा सब तयारी करके बैठे थे , जल्दी ही सरोज काकी भी आ गयी, गहरे नीली साड़ी में बला की खूबसूरत लग रही थी. व्यवहार हमेशा जैसा ही , ऐसा लगता था की कल रात की चुदाई जैसे हुई ही नहीं .
हम सब खाना खाने लगे, बाते होने लगी,
विक्रम- मैं मिस्त्री को भेज दूंगा ट्रेक्टर को देख लेगा.
मैं- जी
विक्रम- वैसे तुमने सही फैसला किया जो वही रुक गए , तूफ़ान से बहुत नुक्सान हुआ है कितने ही पेड़ उखड़ गए, बारिश से शहर जाने वाली सडक का एक हिस्सा भी टुटा है,
“थोड़ी दाल और लो ” काकी ने मुझे परोसते हुए कहा,
मैंने हाँ में गर्दन हिलाई.
खाने के बाद विक्रम ने बताया की शहर में कुछ बड़े होटल हमारी सब्जिया खरीदना चाहते है क्योंकि आजकल देसी खाद की सब्जिया बहुत पसंद करते है लोग
मैं- ठीक है पर हम इतनी डिमांड पूरी कर पाएंगे
विक्रम- मैं देख लूँगा वो सब
मैं- ठीक है फिर
विक्रम- मुझे अभी शहर के लिए निकलना पड़ेगा क्योंकि मौसम को देखते हुए लगता है फिर खराब होगा.
करतार- पापा, मुझे भी ले चलो साथ मैं कभी बड़े होटल नहीं गया .
चाचा उसे नहीं ले जाना चाहते थे पर करतार ने जिद की और चला गया जाते जाते चाचा ने मुझसे कहा की मैं यही सो जाऊ रात को , सरोज अकेला महूसस नहीं करेगी , मैंने सर हिला दिया .
वो लोग शहर के लिए निकल गए मैं भी सरोज की नजरो से बच कर बाहर जा रहा था की काकी ने मुझे आवाज दी .
“देव, रुको जरा. ”
दो नंगे जिस्म एक दुसरे से इस सर्द मौसम में लिपटे हुए जिस्म की भड़की आग को शांत करने की कोशिश कर रहे थे , न जाने कब मैं सरोज के ऊपर आ चूका था , सरोज ने किस करते करते ही मेरे लंड को अपनी चूत के छेद पर रगड़ना शुरू कर दिया था, बदन में एक अलग तरह की ही फीलिंग आ रही थी . सरोज ने मेरे कुल्हो पर हाथो से दवाब बनाया और मुझे अपने अन्दर खींचने लगी. जिन्दगी में पहली बार मैं चूत मारने जा रहा था , सरोज की चूत के पानी से सना लंड , चूत की फांको को चौड़ी करते हुए अन्दर घुस रहा था .
जैसे कोई सांप किसी बिल में घुसता है ठीक वैसे ही मेरा लंड उस छेद में घुस गया था जिसके पीछे हर मर्द पागल रहता था , मेरे गर्म लंड को अपनी गुफा में महसूस करके सरोज जैसे पागल हो गयी थी उसने और जोरो से होंठ चूसने शुरू कर दिए मेरे कुल्हो को सहलाने लगी, मेरी जिदंगी का पहला सम्भोग मेरी माँ सामान काकी के साथ होना ही लिखा था .
“धीरे धीरे धक्के मार ”
“कैसे ” मैंने कहा
“इसे आगे पीछे कर ” बोली वो
ऐसा नहीं था की मुझे मालूम नहीं था क्या करना है , पर उत्तेजित नारी के मुह से ऐसी अश्लील बात सुन कर उत्तेजना और बढ़ जाती है , ठीक जैसा मैंने उन किताबो में पढ़ा था . सबकुछ वैसा ही हो रहा था . मैंने अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू की सरोज भी कुछ देर बात अपने चूतड उछालने लगी. उसके नाखून मेरी गर्दन के पिछले हिस्से , मेरी पीठ पर रगड़ खा रहे थे . एक ऐसा मजा जिसके बारे में बस पढ़ा ही था मैं महसूस कर रहा था . मेरे हर धक्के के बाद ऐसा लग रहा था की जैसे मैं सरोज के जिस्म में थोडा थोडा करके घुसता जा रहा था .
कमरे में दो तरह की आवाजे गूँज रही थी एक तो हमारी सांसो की और दूसरा सरोज की चूत पर मेरे लंड के धक्को की रजाई हमारे जिस्मो से उतर कर गिर चुकी थी पर अब किसी को सर्दी नहीं लग रही थी . आवेश में हम दोनों एक दुसरे के पुरेचेहरे को चूम रहे थे ,
“आह आह आह ” सरोज की मीठी आहे बेशक बाहर तूफान की आवाज में दब गयी हो पर मैं अपने अन्दर तक उनको सुन पा रहा था ,न जाने कितनी देर बाद मुझे ऐसा अहसास हुआ की शरीर में कुछ हो रहा था , बदन बहुत हल्का हो गया था , बहुत हल्का, सरोज ने अपने पैरो को मेरी कमर पर लपेट लिया और , मुझे कस लिया अपनी बाँहों में , उसकी चूत का दवाब बहुत बढ़ गया था .
और फिर वो चीखते हुए झड़ने लगी, उसने बुरी तरह जकड़ लिया मुझे और ठीक उसी लम्हे में मैंने भी अपना आपा खो दिया. मेरे वीर्य की पिच्करिया उसकी योनी के अन्दर गिरने लगी. मेरा बदन झटका खाता रहा . सारी दुनिया भूल कर मैं काकी के ऊपर ही लद गया . कमरे में चुदाई का तूफ़ान आकर गुजर गया था, बाहर अभी भी बरसात हो रही थी .
कुछ देर बाद सरोज उठी, और नंगी ही बाहर चली गई , मैं भी पीछे गया वो मूत रही थी , मैंने भी मूतना शुरू कर दिया. थोड़ी देर बाद हम दोनों चारपाई पर नंगे ही बैठे थे , न वो कुछ बोल रही थी न मैं अँधेरा जैसे हमें खा रहा था , हम दोनों जानते थे की ये एक बहुत बड़ी भूल कर दी है हमने, पर दिल बहलाने का ख्याल इतना ही था की हम दोनों जानते थे की मर्जी से हुआ था ये .
मैंने सरोज का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे धीरे उसे सहलाने लगा. उसने कोई प्रतिकिर्या नहीं दी. पर कब तक ऐसे ही बैठे रहते ठण्ड लगने लगी थी तो रजाई ओढ़ ली. उस रात एक बार और हमारी चुदाई हुई. सुबह जब आँख खुली तो मैंने देखा बारिश अभी भी हलकी हलकी हो रही थी सरोज मेरी बाँहों में ही सो रही थी , आहिस्ता से उठा मैं और अपने कपडे पहने अभी भी सीले ही थे.
मैं कमरे से बाहर आया. दूर दूर तक खेतो में पानी भर गया था . फसल को नुक्सान हुआ या नहीं बाद की बात थी पर काकी से आँखे मिलाने की हिमत नहीं बची थी मेरे अन्दर , मैं पैदल ही घर की तरफ चल पड़ा. जगह जगह कीचड़ था , घर आके मैं ठन्डे पानी से ही नहाया और बिस्तर में घुस गया .
दोपहर में करतार ने मुझे जगाया
“भाई , माँ बुला रही है खाने के लिए ”
मैं- तू चल थोड़ी देर में आता हु
कट्टु- साथ ही चलो, पापा भी है बोले की साथ ही खाना खायेंगे
मैं करतार के साथ घर पहुंचा , विक्रम चाचा सब तयारी करके बैठे थे , जल्दी ही सरोज काकी भी आ गयी, गहरे नीली साड़ी में बला की खूबसूरत लग रही थी. व्यवहार हमेशा जैसा ही , ऐसा लगता था की कल रात की चुदाई जैसे हुई ही नहीं .
हम सब खाना खाने लगे, बाते होने लगी,
विक्रम- मैं मिस्त्री को भेज दूंगा ट्रेक्टर को देख लेगा.
मैं- जी
विक्रम- वैसे तुमने सही फैसला किया जो वही रुक गए , तूफ़ान से बहुत नुक्सान हुआ है कितने ही पेड़ उखड़ गए, बारिश से शहर जाने वाली सडक का एक हिस्सा भी टुटा है,
“थोड़ी दाल और लो ” काकी ने मुझे परोसते हुए कहा,
मैंने हाँ में गर्दन हिलाई.
खाने के बाद विक्रम ने बताया की शहर में कुछ बड़े होटल हमारी सब्जिया खरीदना चाहते है क्योंकि आजकल देसी खाद की सब्जिया बहुत पसंद करते है लोग
मैं- ठीक है पर हम इतनी डिमांड पूरी कर पाएंगे
विक्रम- मैं देख लूँगा वो सब
मैं- ठीक है फिर
विक्रम- मुझे अभी शहर के लिए निकलना पड़ेगा क्योंकि मौसम को देखते हुए लगता है फिर खराब होगा.
करतार- पापा, मुझे भी ले चलो साथ मैं कभी बड़े होटल नहीं गया .
चाचा उसे नहीं ले जाना चाहते थे पर करतार ने जिद की और चला गया जाते जाते चाचा ने मुझसे कहा की मैं यही सो जाऊ रात को , सरोज अकेला महूसस नहीं करेगी , मैंने सर हिला दिया .
वो लोग शहर के लिए निकल गए मैं भी सरोज की नजरो से बच कर बाहर जा रहा था की काकी ने मुझे आवाज दी .
“देव, रुको जरा. ”