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Adultery गुजारिश

#10

दो नंगे जिस्म एक दुसरे से इस सर्द मौसम में लिपटे हुए जिस्म की भड़की आग को शांत करने की कोशिश कर रहे थे , न जाने कब मैं सरोज के ऊपर आ चूका था , सरोज ने किस करते करते ही मेरे लंड को अपनी चूत के छेद पर रगड़ना शुरू कर दिया था, बदन में एक अलग तरह की ही फीलिंग आ रही थी . सरोज ने मेरे कुल्हो पर हाथो से दवाब बनाया और मुझे अपने अन्दर खींचने लगी. जिन्दगी में पहली बार मैं चूत मारने जा रहा था , सरोज की चूत के पानी से सना लंड , चूत की फांको को चौड़ी करते हुए अन्दर घुस रहा था .

जैसे कोई सांप किसी बिल में घुसता है ठीक वैसे ही मेरा लंड उस छेद में घुस गया था जिसके पीछे हर मर्द पागल रहता था , मेरे गर्म लंड को अपनी गुफा में महसूस करके सरोज जैसे पागल हो गयी थी उसने और जोरो से होंठ चूसने शुरू कर दिए मेरे कुल्हो को सहलाने लगी, मेरी जिदंगी का पहला सम्भोग मेरी माँ सामान काकी के साथ होना ही लिखा था .

“धीरे धीरे धक्के मार ”

“कैसे ” मैंने कहा

“इसे आगे पीछे कर ” बोली वो

ऐसा नहीं था की मुझे मालूम नहीं था क्या करना है , पर उत्तेजित नारी के मुह से ऐसी अश्लील बात सुन कर उत्तेजना और बढ़ जाती है , ठीक जैसा मैंने उन किताबो में पढ़ा था . सबकुछ वैसा ही हो रहा था . मैंने अपनी कमर आगे पीछे करनी शुरू की सरोज भी कुछ देर बात अपने चूतड उछालने लगी. उसके नाखून मेरी गर्दन के पिछले हिस्से , मेरी पीठ पर रगड़ खा रहे थे . एक ऐसा मजा जिसके बारे में बस पढ़ा ही था मैं महसूस कर रहा था . मेरे हर धक्के के बाद ऐसा लग रहा था की जैसे मैं सरोज के जिस्म में थोडा थोडा करके घुसता जा रहा था .

कमरे में दो तरह की आवाजे गूँज रही थी एक तो हमारी सांसो की और दूसरा सरोज की चूत पर मेरे लंड के धक्को की रजाई हमारे जिस्मो से उतर कर गिर चुकी थी पर अब किसी को सर्दी नहीं लग रही थी . आवेश में हम दोनों एक दुसरे के पुरेचेहरे को चूम रहे थे ,

“आह आह आह ” सरोज की मीठी आहे बेशक बाहर तूफान की आवाज में दब गयी हो पर मैं अपने अन्दर तक उनको सुन पा रहा था ,न जाने कितनी देर बाद मुझे ऐसा अहसास हुआ की शरीर में कुछ हो रहा था , बदन बहुत हल्का हो गया था , बहुत हल्का, सरोज ने अपने पैरो को मेरी कमर पर लपेट लिया और , मुझे कस लिया अपनी बाँहों में , उसकी चूत का दवाब बहुत बढ़ गया था .

और फिर वो चीखते हुए झड़ने लगी, उसने बुरी तरह जकड़ लिया मुझे और ठीक उसी लम्हे में मैंने भी अपना आपा खो दिया. मेरे वीर्य की पिच्करिया उसकी योनी के अन्दर गिरने लगी. मेरा बदन झटका खाता रहा . सारी दुनिया भूल कर मैं काकी के ऊपर ही लद गया . कमरे में चुदाई का तूफ़ान आकर गुजर गया था, बाहर अभी भी बरसात हो रही थी .

कुछ देर बाद सरोज उठी, और नंगी ही बाहर चली गई , मैं भी पीछे गया वो मूत रही थी , मैंने भी मूतना शुरू कर दिया. थोड़ी देर बाद हम दोनों चारपाई पर नंगे ही बैठे थे , न वो कुछ बोल रही थी न मैं अँधेरा जैसे हमें खा रहा था , हम दोनों जानते थे की ये एक बहुत बड़ी भूल कर दी है हमने, पर दिल बहलाने का ख्याल इतना ही था की हम दोनों जानते थे की मर्जी से हुआ था ये .

मैंने सरोज का हाथ अपने हाथ में लिया और धीरे धीरे उसे सहलाने लगा. उसने कोई प्रतिकिर्या नहीं दी. पर कब तक ऐसे ही बैठे रहते ठण्ड लगने लगी थी तो रजाई ओढ़ ली. उस रात एक बार और हमारी चुदाई हुई. सुबह जब आँख खुली तो मैंने देखा बारिश अभी भी हलकी हलकी हो रही थी सरोज मेरी बाँहों में ही सो रही थी , आहिस्ता से उठा मैं और अपने कपडे पहने अभी भी सीले ही थे.

मैं कमरे से बाहर आया. दूर दूर तक खेतो में पानी भर गया था . फसल को नुक्सान हुआ या नहीं बाद की बात थी पर काकी से आँखे मिलाने की हिमत नहीं बची थी मेरे अन्दर , मैं पैदल ही घर की तरफ चल पड़ा. जगह जगह कीचड़ था , घर आके मैं ठन्डे पानी से ही नहाया और बिस्तर में घुस गया .

दोपहर में करतार ने मुझे जगाया

“भाई , माँ बुला रही है खाने के लिए ”

मैं- तू चल थोड़ी देर में आता हु

कट्टु- साथ ही चलो, पापा भी है बोले की साथ ही खाना खायेंगे

मैं करतार के साथ घर पहुंचा , विक्रम चाचा सब तयारी करके बैठे थे , जल्दी ही सरोज काकी भी आ गयी, गहरे नीली साड़ी में बला की खूबसूरत लग रही थी. व्यवहार हमेशा जैसा ही , ऐसा लगता था की कल रात की चुदाई जैसे हुई ही नहीं .

हम सब खाना खाने लगे, बाते होने लगी,

विक्रम- मैं मिस्त्री को भेज दूंगा ट्रेक्टर को देख लेगा.

मैं- जी

विक्रम- वैसे तुमने सही फैसला किया जो वही रुक गए , तूफ़ान से बहुत नुक्सान हुआ है कितने ही पेड़ उखड़ गए, बारिश से शहर जाने वाली सडक का एक हिस्सा भी टुटा है,

“थोड़ी दाल और लो ” काकी ने मुझे परोसते हुए कहा,

मैंने हाँ में गर्दन हिलाई.

खाने के बाद विक्रम ने बताया की शहर में कुछ बड़े होटल हमारी सब्जिया खरीदना चाहते है क्योंकि आजकल देसी खाद की सब्जिया बहुत पसंद करते है लोग

मैं- ठीक है पर हम इतनी डिमांड पूरी कर पाएंगे

विक्रम- मैं देख लूँगा वो सब

मैं- ठीक है फिर

विक्रम- मुझे अभी शहर के लिए निकलना पड़ेगा क्योंकि मौसम को देखते हुए लगता है फिर खराब होगा.

करतार- पापा, मुझे भी ले चलो साथ मैं कभी बड़े होटल नहीं गया .

चाचा उसे नहीं ले जाना चाहते थे पर करतार ने जिद की और चला गया जाते जाते चाचा ने मुझसे कहा की मैं यही सो जाऊ रात को , सरोज अकेला महूसस नहीं करेगी , मैंने सर हिला दिया .

वो लोग शहर के लिए निकल गए मैं भी सरोज की नजरो से बच कर बाहर जा रहा था की काकी ने मुझे आवाज दी .

“देव, रुको जरा. ”
 
#11

काकी की आवाज से जैसे मैं जम गया ठण्ड में , मैंने पलट कर देखा .

काकी- शाम को जल्दी घर आ जाना और बनिए की दूकान से कुछ सामान लाना है मैं बता देती हु , लेते आना

मैंने सर हिलाया, कुछ बोल ही नहीं पाया. घर से निकल मैं मैं सीधा बनिए की दुकान पर गया उसको पैसे दिए , सामान तुलवाया और कहा की रख ले मैं शाम को लेता जाऊंगा. घूमते घूमते मैं मजार की तरफ चला गया , पगलेट बाबा आज भी नहीं था न जाने कहाँ गुम था वो . मैंने एक चाय ली और बैठ गया.

मैं जब जब इस पेड़ के साथ होता लगता था की मेरी माँ के आंचल तले ही हूँ मैं , जैसे मेरी माँ की गोद हो ये. पर इस दो पल की ख़ुशी के साथ उम्र भर की बदनसीबी भी मेरा सच थी , की मैं अनाथ था . मैंने एक नजर आसमान पर डाली लगता था की बरसात किसी भी बक्त शुरू होने वाली थी .

मुझे बड़ी कोफ़्त होती थी इन बे मौसम की बारिशो से , कुछ ही देर में हलकी हलकी बूंदे गिरने लगी तो मैंने साइकिल उठाई और गाँव की तरफ चल दिया पर किस्मत देखो, गाँव का रास्ता जैसे दूर हो गया . कहते हैं न की शिद्दत से किसी चीज की चाह करो तो तकदीर भी साथ देती है . सामने से रूपा चली आ रही थी .

एक पल तो मुझे यकीन ही नहीं हुआ पर वो ही थी , उसने भी मुझे देख लिया था वो मेरे पास आकर रुकी

“और मुसाफिर कैसे हो ” पूछा उसने

मैं- अब बहुत अच्छा हूँ

वो मुस्कुरा पड़ी .

“लगता है तेज तूफान आएगा ” बोली रूपा

मैं- आ चूका है .

“पर मुझे तो तुम्हारी आँखों में कुछ और दिखता है ” कहा उसने

मैं- क्या दीखता है

रूपा- तन्हाई, तन्हाई और ज़माने भर का दुःख

“तो क्या हुआ, अब सबका जीवन खुशियों से भरा हो ऐसा मुमकिन तो नहीं ” मैंने कहा

रूपा- सो तो है .

बारिश अब तेज होने लगी थी .

रूपा- मेह तेज हो रहा है चलना चाहिए

मैं- रुक जा थोड़ी देर , तू साथ होती है तो लगता है कोई अपना साथ है

रूपा- ये बाते अच्छी है , दिल बहलाने को पर एक जवान लड़के और लड़की का यु साथ रहना क्या ठीक है कोई देखेगा तो बाते बनाएगा

मैं- बातो से डरती है क्या तू

रूपा- चल छोड़ इन बातो को आ मेरे साथ चाय पिलाती हु तुझे

रूपा मेरी साइकिल के पीछे बैठ गई बोली- चल

मैं- कहा

वो- वही जहाँ हम पहली बार मिले थे. उसने अपना एक हाथ मेरे कंधे पर रखा . दिल साला प्रसन्नता से झूम गया . ये बेईमान मौसम और साथ दिलरुबा, कमसेकम मैं तो उसे दिलरुबा मान ही चूका था . जिंदगी में पहली बार लगा था की बारिशो से बढ़िया कोई मौसम हो ही नहीं सकता .

भीगते हुए हम दोनों मेरी झोपडी में आये . अन्दर आने के बाद थोड़ी राहत मिली, मैंने अलाव जलाया तब तक रूपा ने चूल्हा सुलगा दिया था . आंच की रौशनी में चूल्हे में फूंक मारती रूपा कसम से कोई दिल क्यों न हार जाये. जल्दी ही चाय की सौंधी खुशबु पूरी झोपडी में फ़ैल गयी

“लो ” उसने चाय का कप मेरे हाथ में दिया .

मैं- तूम भी लो

वो- मुझे दूध पसंद है

उसने अपने गिलास में दूध भरा और झोले से एक छोटा डिब्बा निकाला

“रोटी ” उसने कहा

मैंने डब्बे से एक रोटी ली, घी से चुपड़ी हुई रोटी मसाले से लिपटी हुई

“मिरचो का आचार है ” उसने कहा

मैं- बढ़िया .

बेशक वो रोटी सुबह की बनी होगी पर इस समय गर्म चाय की चुस्कियो के साथ बड़ी लजीज लग रही थी .

“अभी बस ये ही थी झोले में , कभी तेरे लिए बढ़िया खाना भी लाऊंगी ”

“इस से बढ़िया और क्या होगा. ” मैंने कहा

“तू बड़ा जमींदार है मुसफिरा , तू कहाँ ये सूखे टूक खाता होगा. मेरा दिल रखने को बेशक तू कहे ”रूपा ने कहा

मैं- बड़ा जमींदार, हा हा, बड़ा जमींदार, एक काम करते है तू रख ले मेरा सब कुछ , जो भी मेरे पास है तू ले ले , अरे पगली मेरे पास है ही क्या सिवा एक खाली मकान के . कहने को सब कुछ है पर हकीकत में हाथ खाली है , जानती है दिन रात बस क्यों भटकता रहता हु क्योंकि वो घर , घर नहीं है कान तरस गए है वहां मेरे सिवा किसी और की आवाज सुनने को .

मैंने खाली कप पास में रखा

रूपा- सुना मैंने तेरे बारे में , समझती हूँ .

मैं- तो फिर ऐसी बात क्यों कही

रूपा- पर हकीकत तो यही हैं न

“फिलहाल तो हकीकत मेरे सामने बैठी है , और इस हकीकत को देखते रहने की मेरी इच्छा है ” मैंने कहा

रूपा बुरी तरह शर्मा गयी. पर वो मेरे पास आई बहुत पास उसने खाट से एक कम्बल उतारा और मुझे ओढा कर खुद भी सरक आई, रूपा ने अपना सर मेरे कंधे पर रख दिया. बहुत करार मिला मुझे, बस कुछ ही मुलाकातों में कोई किसी के इतना करीब आ जाये बड़ी बात थी .

“देख तेरे चक्कर में फंस गयी मैं रात घिर आयी और बारिश भी तेज अब कैसे जाउंगी मैं घर ” रूपा बोली

मैं- ये भी तेरा ही तो घर है .

रूपा- तेरी बाते मेरे कलेजे में उतरती है

मैं- तो इस मुसाफिर को अपने दिल में ठिकाना दे दे, बहुत थका है ये मुसाफिर, बहुत अकेला है ये मुसाफिर, इसे पनाह दे, इस मुसाफिर की साथी बन जा रूपा.

रूपा ने अपनी उंगलिया मेरी उंगलियों में फंसाई और बोली- साथी हूँ तभी तो यहाँ हु. पर अभी कुछ न बोल, थोड़ी देर सुस्ताने दे मुझे, थक गयी हूँ मैं. उसने अपनी आँखे बंद कर ली. मैंने भी वैसा ही किया.

सुबह जब मैं जागा तो मैं अकेला चारपाई पर सोया था , रूपा श्याद चली गयी थी . मैं गाँव की तरफ चल पड़ा .बहुत भीड़ लगी थी वहां पर

“क्या हुआ ” मैंने एक आदमी से पूछा
 
#12

उसने बोला कुछ नहीं , बस सामने की तरफ इशारा कर दिया. सामने कुछ लाशे पड़ी थी , कुछ नहीं बल्कि बहुत सारी लाशे, कम से कम पन्द्रह-बीस लाशे, मालूम हुआ की ये सब लाला महिपाल के आदमी थे, कल रात किसी ने महिपाल के काफिले पर हमला किया. लाला को भी गहरी चोटे लगी थी पर जान बच गयी थी, बाकि ये आदमी मारे गए थे .

गाँव के लिए ये घटना किसी बड़े हमले जैसे ही थी, क्योंकि गाँव बहुत शांतिप्रिय था यहाँ तो आपस में भी किसी की तू तू मैं मैं भी नहीं होती थी तो ऐसा हमला शक पैदा करने वाला ही था .

मेरा जी घबराने लगा था तो मैं वहां से अपने घर की तरफ चल पड़ा. पर मेरे मन में एक सवाल और आ गया था की इस घटना और लाला के मुनीम की मौत दोनों का आपस में सम्बन्ध जरुर था . सोचते सोचते मैं घर पहुंचा तो पाया की सरोज काकी मेरे घर पर ही थी . काकी को देखते ही मैं सब कुछ भूल गया . हमारी नजरे मिली. काकी ने बेशक सिम्पल घाघरा चोली पहनी थी पर वो कमाल लग रही थी .

“देव, कहाँ थे तुम , मैंने कितनी बार कहा है की ऐसे बिना बताये गायब न हुआ करो, परेशान हो जाती हु मैं ” सरोज बोली

मैं- माफ़ करना मैं कल समय से घर नहीं आ पाया, बारिश ने फंस गया था .

काकी- कोई बात नहीं पर जमाना ख़राब है , कमसे कम रात को तो घर पर रह सकते हो न .

काकी जब बोल रही थी तो उसका सीना जोरो से ऊपर निचे हो रहा था . मेरा मन बेईमान होने लगा , पर मैं अपने अपराध बोध से घबरा रहा था , ऐसा नहीं था की मैं सरोज को दुबारा नही चोद सकता था , एक बार चुदाई होने के बाद बार बार भी हो सकती थी , पर मेरे पास परिवार के नाम पर ये लोग ही तो थे, मैंने कभी अपनी माँ को नहीं देखा था , पर माँ के रूप में सरोज को जरुर देखा था .

बस इस अपराधबोध के कारन ही मैं काकी से नजरे नहीं मिला पा रहा था

“तुम सुन रहे हो न मैं क्या कह रही हूँ ” काकी थोडा जोर से बोली

मैं- हाँ काकी.

सरोज- क्या काकी, करनी तो तुम्हे अपने मन की ही हैं .

मैं- ऐसी बात नहीं है काकी, वो दरअसल परसों रात खेत में जो हुआ .............

मैंने जान बुझ कर अपनी बात अधूरी छोड़ दी, दरअसल मैं नहीं चाहता था की हम दोनों में से कोई भी शर्मिंदा हो . पर ये भी सच था की इस सच को अब ज्यादा देर तक हम दोनों ही झुठला नहीं सकते थे.

सरोज- क्या हुआ था , कुछ नहीं हुआ था . वो रात थी बीत गयी , और बीती बातो को दिल पर नहीं लिया करते देव.

मैं- तो क्या आप मुझसे नाराज नहीं है

सरोज- किसलिए नाराजगी होगी मुझे, मेरा मतलब वो कुछ कमजोर लम्हे थे , तुम्हे इतना सोचने की जरुरत नहीं है बस इतना रहे की ये बात हम दोनों के बीच ही रहे.

मैंने सर हाँ में हिलाया. सरोज मेरे पास आकर बैठी और मेरे गाल को हलके से चूम लिया. उसके नर्म होंठो को अपने गाल पर महसूस करते ही मेरे तन में जैसे बिजली दौड़ गयी .

“याद रखना मेरी बात ” उसने कहा और उठने लगी , पर मैंने उसका हाथ पकड़ लिया, थोडा सा जोर लगाया तो वो मेरी गोद में आ गिरी. मैंने उसे अपने आगोश में थाम लिया. सरोज ने आँखे मूँद ली, उसका ऊपर निचे होता सीना किसी धौंकनी सा चल रहा था. कुछ तो कशिश थी उसके बदन में , मैंने अपना चेहरा निचे किया और सरोज के लबो को चूम लिया.

उसने कोई प्रतिकार नहीं किया, मक्खन से होंठ उसके , मेरे मुह में अपनी चिकनाई घोलने लगे थे, मेरे हाथ अपने आप उसकी छातियो को मसलने लगे थे. ,स सारी दुनिया भूलकर हम दोनों एक दुसरे में खो ही गए थे अगर निचे से वो आवाज नहीं आई होती. एक झटके से हम वापिस धरातल पर आये.

वो करतार की आवाज थी . “भाई भाई ”

“ऊपर आजा करतार ” मैंने उसे बुलाया तब तक सरोज भी अपने कपडे ठीक कर चुकी थी .

“भाई , ” कट्टु बोला

मैं- हाँ आगे भी बोल यार

कट्टु- भाई, तुम्हारे ताऊ मिले थे अभी जब मैं आ रहा था ,

मैं- तो

वो- उसने कहा की तुम्हे बता दू आज शाम ६ बजे वो तुम्हारा इंतज़ार करेंगे नदी की पुलिया पर .

मैं- मेरा इंतज़ार किसलिए

कट्टु- मालूम नहीं , पर मुझे वो जगह ठीक नहीं लगी तो मैंने कह दिया की मजार पर आके मिले, और मैं साथ रहूँगा तुम्हारे

मैं- ठीक है , पर तुम्हे ये कहना चाहिए था की यहाँ आकर मिले. आखिर उनके भाई का घर है .

सरोज- पर इस मुलाकात की क्या जरुरत पड़ी, कहीं शादी के लिए तो नहीं

मैं- नहीं काकी, मामला कुछ और है, वर्ना इतने सालो में अचानक अपना कैसे लगने लगा उनको मैं.

मैंने सरोज को चाय के बहाने निचे भेजा और करतार से बोला- सारी बाते छोड़, ये बता लाला पर हमला किसने किया .

कट्टु- मालूम नहीं भाई, पर जिसने भी किया साला चुतिया था पेल ही देता लाला को

मैं- बात तो सही है पर कौन,ये जानना जरुरी है , मुझे लगता है मुनीम की मौत भी इसी कड़ी का हिस्सा है .

कट्टु- पर उसे तो हार्ट अटैक आया था .

मैं- शायद उसने कुछ ऐसा देखा था की कमजोर जिस्म सह नहीं पाया.

कट्टु- तुम भी तो थे तब वहां तुमने देखा कुछ .

मैं- नहीं रे, धुंध बहुत थी वहां , मैं थोडा पीछे था और वो दूसरी तरफ से आ रहा था .

कट्टु- धुंध नहीं होती तो उसी दिन मालूम हो जाता , वैसे कल कालेज चल रहे हो न ,

मैं- हाँ चलेंगे ,

उसके बाद हमने चाय पी , फिर करतार सरोज के साथ अपने घर चला गया , मैंने कपडे बदले और घर से बाहर निकल गया. बस शाम होने का इंतज़ार था . ६ बजने में थोड़ी देर पहले मैं मजार की तरफ निकल गया. बारिश की वजह से मौसम काफी मस्त हो गया था. कच्चे रस्ते पर कीचड था पर किसे परवाह थी,

जब मैं वहां पहुंचा तो ताऊ पहले से ही था . मैंने नमस्ते किया उसने सर हिलाया पर बोला कुछ नहीं , बस मेरे हाथ में एक चाबी रख दी. एक चाबी, छोटी सी, जंग खाई हुई, ....................
 
#13

मेरे हाथ में एक जंग खाई बेहद पुराणी चाबी थी, मैं ताऊ की तरफ देखू वो मेरी तरफ

“किस चीज़ की चाबी है ताउजी ये ” मैंने पूछा

ताऊ- तुम्हारे पिता के जाने से कुछ दिन पहले वो मेरे पास आया था और मुझे ये देकर बोला की जब मेरा बेटा समझदार हो जाये तो इसे दे देना , वो समझ जायेगा .

मैं- बस

ताऊ- हाँ बस इतना ही .

मैं- ताउजी , आप मुझे बहुत कुछ बता सकते है मेरे माँ-बाप के बारे में, आपने तो देखा था उन्हें, मैंने नहीं देखा, मुझे तो मालूम भी नहीं की वो कैसे दिखते थे , गाँव में कोई भी उनके बारे में नहीं बताता,

ताऊ- क्या बताऊ मैं, बरसो पहले वो घर छोड़ गया था , फिर वापिस नहीं लौटा वो , उसकी राह देखते देखते हमारे बापू-माँ गुजर गए पर वो नहीं लौटा . सबको भुला दिया उसने और फिर एक रात वो आया तुम्हे लेके .

मैं- फिर

ताऊ- वो थोडा परेशां था, हमने परेशानी की वजह पूछी पर उसने कुछ नहीं बताया , बस ये चाबी दे गया .

मैं- आप चाहते तो मुझे अपना सकते थे , आपका अपना खून आपकी आँखों के सामने बेसहारा पला, आप का कलेजा नहीं पसीजा कभी , लोग तो गली के कुत्ते को भी दो रोटी डाल देते है आप जानवर समझ कर ही पाल लेते. जैसा भी था आप का ही खून था न ताउजी

ताऊ ने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया. बस वो मुड कर चल पड़ा, पर मैंने उसे अपनी आस्तीन से आँख के आंसू पोंछते जरुर देख लिया था . कुछ तो ऐसा था जो मुझसे छुपा था , कुछ तो ऐसा था को मैं जानने लायक हो गया था , सवाल बहुत थे पर जवाब कौन दे मुझे.

“मुसाफिर , मेरे बच्चे की सोचदा है ओत्थे खड़े खड़े , आ पास जरा ”

मैंने देखा बाबा लौट आया था . उन्हें देखते ही मेरे चहरे पर रौनक आ गयी . मैं दौड़ कर बाबा से लिपट गया .

“बाबा , कहाँ थे तुम, मैं कितना इंतजार किया तुम्हारा ” मैंने शिकायत करते हुए कहा .

बाबा- ओ यारा, एक काम सी, ओह ही करने गया था , वापसी में थोड़ी देर हुई . ले मिठाई खा तेरे लिए लाया हूँ .

बाबा ने एक पोटली मेरे हाथ में रख दी झोले से निकाल के .

मैंने पोटली खोली बर्फिया थी उसमे, मैंने एक डली खाई, और फिर खाता चला गया .

“तेरे बापू नु भी ये बर्फिया बड़ी पसंद थी यारा, बल्ली हलवाई के यहाँ रोज ही गेडा लगा दिया करता था वो ” बाबा ने चबूतरे पर बैठते हुए कहा

मैं- आप उनके बारे में बताएँगे मूझे .

बाबा- क्या बताऊ मुसफिरा तुझे उसके बारे में , उस जैसा कोई नहीं हुआ फिर ,वो ख़ाली साहब का बेटा नहीं था , युधवीर गोकुल्गढ़ के हर घर का बेटा था , गाँव के हर चूल्हे में उसके नाम की दो रोटी जरुर बनती थी, वो था ही ऐसा, जात-पात क्या थी जानता ही नहीं था , खेत में मजदुर के साथ भी खा लेता था , तो नाली साफ करने वाले के साथ भी , किसान का बैल बन कर हल में जुत जाता था तो गाँव की लडकियों की लाज का रखवाला भी था वो .

बाबा जैसे खो सा गया था .

“तो फिर सबने क्यों भुला दिया उन्हें ” मैंने सवाल पूछा

बाबा ने अपनी आँखे मूँद ली .

मैंने फिर पूछा - तो फिर क्यों भुला दिया सबने उनको

बाबा- किसी ने नहीं भुलाया उसे सिवाय वक्त के , उसके जाने के बाद तेरे दादा ने ढेर लगा दिया था गाँव में लाशो का , न जाने कैसी जवाला थी साहब के सीने में गोकुल्गढ़ जल गया उसमे. तेरे बाप के रुतबे को देखना है तुझे तो कभी किसी दोपहर पेड़ तले बैठे किसी किसान के पास जाना, किसी काकी- ताई जो सर पर चारा ला रही हो उसके पास जाना , तू जान जायेगा मुसफिरा, तू किसका खून है .

“पर आप नहीं बताएँगे कुछ भी मुझे ” मैंने कहा

बाबा- अँधेरा गहरा हुआ, तू घर जा , हवा आजकल ठीक नहीं है तुझे अँधेरे में नहीं घूमना चाहिए. जा घर जा

बाबा ने हाथ के इशारे से मुझे लौटने को कहा, बस यही बात मुझे समझ नहीं आती थी बाबा कभी कुछ कहता था कभी कुछ . पर फिर भी मैंने लौटने का सोचा . और गाँव की तरफ साइकिल मोड़ दी. दिमाग में बस वो चाबी घूम रही थी .

रात को मैं और करतार खाना खाने के बाद लेट रहे थे , करतार के पास अश्लील कहानियो वाली किताब थी ,

करतार- भाई एक बात पुछु

मैं- हाँ

करतार- ये कौन चाची भाभिया होती है इन कहानियो में जो इतनी प्यासी होती है

उसकी बात सुनकर मुझे समझ नहीं आया की मैं कैसे रियेक्ट करू. मेरे दिमाग में सरोज, और कौशल्या की तस्वीर आ गयी .

मैं- होती हैं कुछ औरते ,

करतार- भाई, काश अपनी किस्मत में भी कोई ऐसी आ जाये तो कसम से मजा आ जाये.

मैं- तुझे लेनी है

करतार- दिला दे भाई, तेरे पाँव धोके पियूँगा

मैं-एक हफ्ते में तेरा काम हो जायेगा

करतार- पक्का न

मैं- पक्का यार.

करतार- कोई हैं नजर में

मैं - है तो सही

करतार- कौन

मैं- शकुन्तला

करतार के हाथ से किताब निचे गिर गयी

वो- लाला की घरवाली शकुन्तला

मैं- हाँ वही

करतार- भाई, डाका भी डालने की सोच रहे हो तो कहाँ

मैं- डाका वहीँ डाला जाता है जहाँ माल हो, और तू ही बता कितनी मस्त तो है वो

करतार- सही कहा भाई .

मैं- चल अब बत्ती बुझा और सो जा . सुबह कालेज चलना है

हमने बत्ती बुझाई और सो गए. रात को न जाने कब मेरी आँख खुल गई , रजाई में पसीना पसीना हुआ पड़ा था मैं , उठ कर मैंने पानी पिया . एक बेचैनी सी हो रही थी मुझे, मैं उठ कर घर से बाहर आया और पैदल ही चल पड़ा. गाँव के बाहर मैं शहर को जाने वाली पक्की सड़क पर चल रहा था , चलते चलते मैं बहुत आगे निकल आया . तभी मुझे कुछ पेड़ो के पास रौशनी दिखाई दी , किसी गाडी की रौशनी ..................... मैं उधर गया और मैंने देखा ...............
 
#14

मैंने देखा एक गाड़ी थी जिसे टक्कर मारी गयी थी गाडी काफी क्षतिग्रस्त थी , अन्दर रौशनी थी मैंने देखा एक औरत लहू लुहान अवस्था में बेहोश पड़ी थी . मैंने दरवाजा तोड़कर उसे बाहर निकाला, साँसे अभी चल रही थी , उसे हॉस्पिटल की सख्त जरुरत थी पर इस समय बिना किसी साधन के कैसे ले जाऊ और इस हालत में उसे बेसहारा मैं छोड़ नहीं सकता था .

एक इन्सान जो मेरी आँखों के सामने मौत और जिन्दगी के बीच झूल रही थी , कुछ भी हो मदद करना मेरा फ़र्ज़ बनता था , मैंने उसे अपने कंधे पर लादा और गाँव के बैध के घर पर ले चला, उसका बदन थोडा भारी था , कुछ सर्द रात, जल्दी ही मेरी सांस फूलने लगी पर जैसे भी हो अब इस औरत को वैध के घर पहुँचाना ही था .

कुछ देर बाद मैं वैध के घर पहुंचा , वैध का दरवाजा पीटने लगा . “वैध दादा वैद दादा ”

“कौन है इस वक्त ” अन्दर से अलसाई आवाज आई

“मैं हु देव चौधरी ” मैंने जवाब दिया

दरवाजा खोलते ही मैं अन्दर आया. और औरत को लिटा दिया.

“दादा, ये मुझे घायल मिली , इलाज की जरुरत है इसे ” मैंने एक सांस में कहा

वैद ने भी मामले की गंभीरता समझी, और तुरंत उसे देखने लगा.

“खून बहुत बहा है बेटा, और पाँव की हड्डी टूटी है , शहर के हॉस्पिटल ले जाना होगा , मैंने फौरी जांच की है पर बड़े हॉस्पिटल में ही वो सुविधा है जो इसे चाहिए ” वैध ने कहा

मैं- पर बाबा, इतनी रात को कैसे ले जाऊ इसे, घर से गाड़ी लाने में मुझे थोडा समय लगेगा , इतने तो थाम लोगे न इसे

बैध- मेरी गाड़ी ले जाओ,

वैध ने मुझे चाबी लाकर दी ,

“करतार को सुबह खबर कर देना की शहर में मिले, पैसे ले आये, सबसे पहला जो भी हॉस्पिटल आएगा उसमे मिलूँगा. ”

मैं तुरंत शहर के लिए निकल गया , उसे इमरजेंसी में भर्ती करवाया, पैसे मैंने सुबह जमा करवाने का वादा किया. मैं एक कुर्सी पर बैठ गया और इंतज़ार करने लगा . कुछ ही देर में पुलिस के बहुत से लोग वहां पर पहुँच गए और पूछताछ करने लगे ,एक अफसर मेरे पास आया.

“तू लेके आया मैडम को यहाँ ” उसने पूछा मुझसे

मैंने हाँ में सर हिलाया, और उसे पूरा किस्सा बताया . अफसर ने मेरा ब्यान एक कागज पर लिखा और वहीँ मेरे पास बैठ गया . आस पास और पुलिस वाले तैनात हो गए, वो बार बार मैडम कह रहे थे तो मैं समझ गया था की कोई बड़ी रसूखदार है ये औरत

“कौन है ये मैडम जी, ” मैंने पुलिस वाले से पूछा

“ये मोना सिंह है , जज अपने शहर की ” उसने कहा

मैं- ओह .

“बड़ी फेमस जज है , सतनाम मुडकी की बेटी है , अपने जूनागढ़ वाले नेताजी, इसने अपने ही भाई को सजा सुना दी थी एक केस में, बड़ा बवाल हुआ था , बाप से अलग हो गयी फिर उसके बाद. ” अफसर ने बताया

सतनाम मुदकी का जिक्र आते ही मुझे कालेज का वो बदतमीज लड़का याद आ गया . पर पुलिस वाले के आगे मैं चुप रहा . करीब दो घंटे बाद डॉक्टर बाहर आया और बोला- हालत काबू में है , सर पर चोट है , पांव टुटा है कुछ अंदरूनी घाव होश आ जायेगा कुछ घंटो बाद.

चूँकि पुलिस वाले ने मेरा नाम लिख लिया था उसने कहा मैं चाहू तो जा सकता हूँ पर मैंने रुकने का सोचा , मैं एक पल उसे होश में आया देख कर जाना चाहता था .

कुर्सी पर बैठे बैठे मेरी नींद सी लग गयी , मैं उठा तो दिन निकल आया था , पुलिस वाले ने मुझे चाय पिलाई, मालूम हुआ मोना सिंह को होश आ गया है, मैंने मिलने को कहा तो कुछ देर बाद मुझे अन्दर बुलाया गया .

मैंने देखा जज साहिबा के बदन पर पलस्तर था पट्टिया थी , नसों में नलकिया लगी थी जो ऊपर टंगी बोतलों से जुडी थी . मैंने नमस्ते कहा वो मुस्कुराई,

“अब कैसी है तबियत, आपकी ” मैंने कहा

मोना-बेहतर, तुमने बचा लिया.

मैं- बस पहुँच गया मैं उधर उस समय

मोना- नाम क्या है तुम्हारा

मैं- दुनिया मुसाफिर कहती है .

मोना- मुसाफिर, इंट्रेस्टिंग , मेरे पास आओ जरा

मैं उसके पास गया .

मोना- मेरी गाड़ी के पास जाओ तुरंत, पिछली सीट के निचे एक काले रंग का छोटा सा बैग है उसे अपने पास रखना . कुछ दिनों बाद मैं ठीक हो जाउंगी तो जज हाउस आना. अभी बस इतना करो मेरे लिए. मैं शुक्रिया तुम्हे बाद में कहूँगी.

मैंने सर हिलाया और बाहर आया तो देखा करतार आ पंहुचा था हम पैसे लेके काउंटर पर गए तो उन्होंने मना कर दिया , जज का इलाज सरकार का मामला था , हम बाहर आये.

मैं और करतार एक नाश्ते की दुकान पर जाके बैठ गए मैंने उसे पूरी बात बताई,

“आजकल भाई तुम, अलग ही मामलो में उलझ रहे हो , क्या नसीब कोई और दिशा में ले जा रहा है , ” पूछा उसने

मैं- रब्ब जाने .

हमने नाश्ता किया और मैं वैध की गाड़ी से ,करतार अपनी गाड़ी से वापिस चल दिए. दिन निकल आया था पर धुंध बड़ी शबनमी थी . सर्द हवा जैसे अपने सामने आने वाली हर चीज को चीर देना चाहती थी . मैं मैडम की गाड़ी के पास पहुंचा और सीट के निचे मुझे वोछोटा बैग मिला. गाड़ी में और भी बहुत कुछ था ,

एक सूटकेस जिसमे नोट भरे थे ,एक पिस्टल . अब मेरी जिज्ञासा जागी , मोना ने मुझे पैसो या पिस्टल का जिक्र तक नहीं किया, मतलब उस छोटे बैग में कुछ बेहद खास था , मैंने ठण्ड से कांपते हाथो से उस बैग को खोला और मैं हैरान हो गया , मेरी जगह कोई भी होता हैरान हो जाता.
 
#15

बैग में एक ब्लैक एंड वाइट तस्वीर थी जो काफी पुरानी लगती थी , पर चूँकि उसे सहेज कर रखा गया था तो हालत ठीक थी , वो तस्वीर शायद किसी रात में खींची गयी थी , आसमान में बादल थे , चाँद था, और एक काली स्याह हवेली थी . मैंने कहा तस्वीर खींची गयी थी , नहीं वो तस्वीर कैमरा की नहीं नहीं थी, उसे किस चित्रकार ने बनाया होगा, हाँ ऐसा ही था वो बनाई गयी तस्वीर थी .

“कुछ तो खास बात है इस तस्वीर में ” मैंने अपने आप से सवाल किया क्योंकि गाड़ी में पैसे भी थे पर मोना को फ़िक्र थी इस तस्वीर की . फिलहाल के लिए तो मैंने तस्वीर को वापिस बैग में डाला और गाँव की तरफ चल दिया. वैध जी को गाड़ी वापिस की कुछ पैसे दिए और मैं घर के लिए मुड गया .

रस्ते में मुझे कौशल्या मिल गयी .

मैं- कहा से आ रही हो काकी

काकी- लाला के घर से .

मैं- हम्म, सुन काकी तेरे से एक बहुत जरुरी काम है तू आज रात खेत पर मिल सकती है क्या .

मेरी बात सुन कर कौशल्या की आँखों में चमक आ गयी .

कौशल्या- तू रहने दे लला , तू फिर गच्चा दे जायेगा. मेरे अरमानो की आग बुझा नहीं सकता तो उसमे घी भी मत डाल .

मैं- तेरी चूत को आज अपने लंड के पानी से सींच दूंगा आ तो सही , पर चूत के आलावा मूझे एक काम और है

कौशल्या- बता तो सही

मैं- वहीँ बताऊंगा , तू वहां पहुँच जाना

कौशल्या- पक्का

मैंने कौशल्या से करार किया और फिर घर आया, रात की नींद तो थी ही कुछ देर के लिए सो गया . शाम से कुछ पहले मैं फिर सरोज के घर गया , मुझे देखते ही उसके गालो पर लाली आ गयी .

“करतार कहाँ है ” मैंने पूछा

सरोज- खेलने गया है

मैं- चाचा

सरोज- मंडी

इतना सुनते ही न जाने मुझे क्यों ख़ुशी सी हुई. मैंने सरोज से एक कप चाय बनाने को कहा और खुद बाहर जाकर दरवाजा बंद कर आया. फिर मैं रसोई में गया . सरोज की पीठ मेरी तरफ थी मैंने जाते ही सरोज को पीछे से अपनी बाँहों में भर लिया, पर वो चौंकी नहीं शायद उसे भी अहसास था .

जैसे ही उसके नितम्ब मेरे अगले हिस्से से छुए , मेरे लंड में उत्तेजना का ज्वार चढने लगा. सरोज खड़ी थी मैं निचे बैठा उसके लहंगे को उठाया और उसकी कच्छी को पैरो के निचे सरका दिया. सरोज के मस्त कुल्हे मेरी आँखों के सामने थे , मैंने बड़े प्यार से उनको सहलाया और अपने होंठ सरोज की चूत पर लगा दिए. सरोज ने अपनी गांड को पीछे की तरफ कर लिया और अपने हाथो को स्लैब पर रख कर सामने को झुक गयी .

मुझे नहीं लगता की झुकी औरत से ज्यादा सेक्सी कोई और पोजीशन होगी , मैंने थोडा और फैलाया उसके चूतडो को और अपनी जीभ को चूत से लेकर गांड के छोटे से छेद तक फेरा .स

“सीईई ” सरोज ने एक आह सी भरी . रुई के गुब्बारों से नितम्बो को मसलते हुए मैं उसकी चूत चाटने लगा था . सरोज बहुत प्यासी औरत थी और फिर अक्सर बड़ी उम्र की औरते छोटे लडको से सेक्स करते समय ज्यादा ही उत्तेजित हो जाती है तो सरोज भी आहे भरने लगी थी .

जब जब मेरी जीभ उसकी गांड के छेद पर रगड़ खाती सरोज की टांगो में बहुत तेज कम्पन होता, कुछ देर उसके दोनों छेद चूसने के बाद मैंने अपनी चेन खोली और लंड पर थूक लगाकर सरोज की एक टांग को फैलाया और लंड को चूत के गीले छेद पर टिका दिया. पुच की आवाज आई और सरोज का बदन एक पल को अकड़ गया

दो झटको में ही मैंने लंड चूत के अन्दर सरका दिया था ब्लाउज के ऊपर से उसकी चुचियो को दबाते, मसलते हुए मैं सरोज को चोदने लगा, कुछ ही पलो में हम दोनों चुदाई के आसमान में उड़ान भरने लगे थे , मैं उसका ब्लाउज खोलना चाहता था पर उसने मना किया. फच फच की आवाज रसोई के हर कोने में गूँज रही थी .

सरोज अब स्लैब से हट कर रसोई के बीचो बीच अपने घुटनों पर हाथ टिकाये झुकी हुई थी , सरपट सरपट लंड चूत में अन्दर बाहर हो रहा था किसी भी पल हम दोनों अपने अपने सुख को पा सकते थे पर तभी बीच में भांजी मार दी नसीब ने

बाहर से बिक्रम चाचा की आवाज आई तो हम दोनों के होश उड़ गए , सरोज ने जल्दी से मुझे अलग किया और अपनी कच्छी को जांघो पर चढाते हुए बाहर दरवाजे की तरफ भागी, मैंने भी अपनी हालत ठीक की और रसोई से बाहर आकर बैठ गया .

“बिल्ली दो चार दिन से अन्दर घुस जाती है तो दरवाजा बंद करना पड़ा, ” सरोज ने विक्रम चाचा को बताया और उसके लिए भी चाय बनाने रसोई में चली गयी . विक्रम मेरे पास चला गया .

मैं- आजकल शहर के बहुत दौरे हो रहे है .

विक्रम-बेटा, धंधा फैला रहे है , बड़े होटलों में आजकल देसी सब्जी की बड़ी डिमांड है तो अपन लोग सप्लाई दे रहे है .

मैं- आपको ठीक लगे तो सब्जिया ही उगा लेते है जमीन के एक बड़े हिस्से में ,

विक्रम- मेरा भी यही ख्याल है , मैं दो चार दिन में किसान केंद्र जाऊंगा वहां से मदद लूँगा किस प्रकार हम बढ़िया पैदावार कर सकते है .

मैं- चाचा आपको जो ठीक लगे आप कर लिया करो . वैसे वो मोटर साईकिल के बारे में क्या सोचा आपने

विक्रम- देखो बेटा मैं अपना फैसला तुम्हे बता चूका हूँ, मुझे बड़ा डर लगता है , कभी कभी तुम और करतार गाड़ी चलाते हो तभी मेरा जी घबरा जाता है , तुम्हे चाहे पैसे को आग लगानी है तुम लगा दो, जो करना है करो सब तुम्हारा ही है , पर मोटर साईकिल के बारे में मेरा फैसला नहीं बदलेगा. मैं अपने बेटो को मौत का साधन नहीं खरीद कर दूंगा.

मैं- कोई न चाचा मैं तो बस ऐसे ही पूछ रहा था .

फिर रात को खाने तक हम बाते करते रहे, सरोज की आँखों में मैंने अधूरी चुदाई की कसक देखि पर विक्रम और करतार के आगे थोड़ी न हम कुछ कर सकते थे . खाना खाने के बाद मैंने अपना कम्बल ओढा और घर वालो को बता कर की मैं खेत पर जा रहा हूँ मैं चल पड़ा. पर किस्मत मेरी या कौशल्या की बदकिस्मती गाँव से बाहर पीपल के पास आते ही मैं जान गया की एक बार फिर कौशल्या मेरा इंतज़ार करते ही रह जायेगी. .....................
 
#16

बेशक सर्द हवा ने मुझे कम्बल को और कसने को मजबूर कर दिया था , पर सामने से आती उस सूरत को देख कर मुझे कम्बल की जरुरत रह नहीं गयी थी . मैंने लालटेन की लौ और थोड़ी तेज कर दी, अँधेरी रात में एक लौ लालटेन की थी और एक उस चेहरे का नूर था जिसने मुझे मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया था .

“तू जब देखो मुझे रास्तो में मिल ही जाता है ” रूपा ने सवाल किया

मैं- यही बात तुझसे भी कह सकता हु मैं

रूपा- हाँ बिलकुल कह सकते हो .

मैं- कहाँ इतने अँधेरे

रूपा- अरे आज सोमबार है , आज दिन में दिया जलाने नहीं जा पायी तो सोचा हो आती हूँ

मैं- तुझे कितनी बार कहा है अकेले मत निकला कर खासकर रात को ,

रूपा- मेरी आड़ मेरे साथ है तो क्या फ़िक्र मुझे

उसकी हंसी सीधा कलेजे में उतरती थी मेरे .

मैं- फिर भी ध्यान रखा कर

वो- जैसा तू कहे

मैं और रूपा मजार वाले रस्ते हो लिए.

“जाड़े की राते भी बड़ी लम्बी होती है मुसाफिर ” बोली रूपा

मैं- सो तो है , और बता सब ठीक ठाक

रूपा- बस गुजारा हो रहा है

मैं- मेरी बात पर विचार किया तूने

रूपा- तुझसे पैसे नहीं ले सकती मैं

मैं- क्या मैं तेरे लिए इतना भी नहीं कर सकता

रूपा- जहाँ पैसा बीच में आ जाता हैं न फिर उस रिश्ते की मिठास कम हो जाती है मुसाफिर

मैं- चल छोड़ फिर इस बात को ,

रूपा- छोड़ना ही बेहतर

मै- कभी आ जा मेरे घर , बरसो से मेरे सिवा कोई और आया नहीं वहां

रूपा - तेरा घर गाँव के बीच में है ,ऐसे अकेली आउंगी तो लोग क्या कहेंगे

मैं- तो बता तू, तुझे कैसे ले चलू मेरे घर ,

रूपा- चल उदास मत हो , कभी उधर से गुजरूंगी तो पक्का आउंगी .

मैं मुस्कुरा दिया . बाते करते करते हम मजार तक आ पहुचे , इक्का दुक्का लोग ही थे अब बाबा भी नहीं था .

“चल दिया जलाते है ” रूपा ने कहा

मैं- तू जला

रूपा- अरे आ न , मैंने सुना है जोड़े से मांगी दुआ जल्दी ही कबूल होती है

मैं- और कहीं मैं दुआ में तेरा जोड़ा ही न मांग बैठू

रूपा-वो तेरा नसीब मुसाफिर . रूपा का भाग तो बस मजदूरी, गरीबी में बीत रहा है , भाग में तेरा साथ हुआ तो वो भी देखूंगी पर अभी तो दुआ मांगते है .

रूपा ने अपने सर पर चुन्नी ओढ़ी, और इबादत में बैठ गई, मैंने उसके साथ दिया जलाया. दिल जैसे उड़ने लगा था . बहुत बेहतर लगने लगा था , फिर हम बाहर आकर बैठ गए. मेरी माँ के पेड़ के निचे . रूपा ने अपना झोला खोला और एक डिब्बे से कुछ बलुस्याही निकाली

“ले खा ” बोली वो

मैंने एक टुकड़ा तोडा.

मैं- जानती है ये पेड़ किसका है

रूपा- हाँ , ये पेड़ सुहासिनी ठकुराइन ने लगाया था ऐसा मेरा बाबा कहते है , जानता है इस पेड़ की खास बात क्या है

मैं- नहीं तू बता

रूपा- आजतक चाहे जो मौसम रहे , ये पेड़ हरा ही है , वैसे एक खास बात और है

मैं- जानता हु , ये मेरी माँ का पेड़ है .

रूपा बस हलके से मुस्कुराई, उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- मैं जानती हूँ मैं समझती हूँ तेरे मन की बात तुझे कहने की कोई जरुरत नहीं तेरे दिल को अपने सीने में महसूस करती हु मैं .

मैंने अपना कम्बल और टाइट कर लिया .

“मैं अपने माँ-बाप के बारे में जानना चाहता हु रूपा, पर कोई भी मुझे बताता नहीं है न जाने क्यों ”

रूपा- तो मालूम कर ,अपने लोगो से जुड़, तेरे परिवार काका- ताऊ से मेल झोल कर तुझे कुछ तो जरुर मालूम होगा . लोग कहते है एक ज़माने में तेरे दादा का सिक्का चलता था , पर तेरे बाकि परिवार वाले उतने रुतबेदार नहीं निकले, मेरे बाबा कहते है की सुहासिनी ठकुराइन बहुत भली थी , कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था उनके यहाँ से मेरे बाबा की बहुत मदद की थी उन्होंने,

“तेरे जन्म के कुछ समय बाद ही उनकी हत्या हो गयी थी , किसने की, किसलिए की सब बाते बस राज बनकर रह गयी , पर ऐसा कहते है लोग की तेरे पिता की मौत से पहले बाप-बेटे का खूब झगड़ा हुआ था . ” रूपा ने कहा

मैं- सुना मैंने भी , पर रूपा मुझे इसलिए भी डर लगता है की कहीं गड़े मुर्दे उखाड़ने के चक्कर में आने वाला कल न उलझ जाये .

रूपा- सब तक़दीर के लेख है मुसाफिर, लिखे हुए को कौन मिटा सके है .

मैंने रूपा का हाथ पकड़ा , सर्दी में ठंडा हुआ पड़ा था

“तू देगी साथ मेरा ” मैंने पूछा

रूपा- हाँ पर मेरी भी कुछ मजबुरिया है मेरे कंधे पर बुजुर्ग बाप की जिमीदारी है

मैं- तो मेरी बात क्यों नहीं मान लेती, तेरा कर्जा मैं उतार देता हु न

रूपा- मेरे कंधे बेशक गरीबी से झुके है पर जमीर है मुझमे , तुझसे पैसे ले लुंगी न तो ये दोस्ती फिर लालच वाली हो जाएगी, पर हाँ जब भी मुझे मदद चाहिए होगी मैं सबसे पहले तेरे दर पर आउंगी. चल अब समय हुआ चलते है .

चलते चलते हम उसी मोड़ पर आये जहाँ से हमारी राहे जुदा होती थी ,

मैं- घर तक छोड़ आऊ तुझे ,

रूपा मेरे पास आई और बोली- घर पर ले चलना .......

उसने हौले से मेरे गाल को चूमा और अपने रास्ते पर चल पड़ी. मैं खड़ा रह गया उसी मोड़ पर . फिर मुझे याद आया की कौशल्या मेरी राह देख रही होगी तो मैं तेज कदमो से खेत की तरफ चल पड़ा.
 
#17

मैंने देखा कौशल्या रजाई ओढ़े सोयी पड़ी थी मैंने उसे जगाया .

“मैंने तो सोच लिया था आज फिर धोखा दे गया लड़का ” कौशल्या ने अंगड़ाई लेते हुए कहा .

मैं- काकी, तेरी चूत लेने नहीं बुलाया तुझे कम से कम आज तो नहीं ले रहा मैं तेरी

कौशल्या- तो फिर किसलिए बुलाया मुझे

मैं- तुझसे एक बात करनी थी , देख मेरे कुछ काम है तू वो कर बदले में मैं तेरे कर्जे की जितनी भी रकम है लाला महिपाल को चूका दूंगा

काकी- क्या करवाना चाहता है मुझसे तू

मैं- बस थोडा मजा और थोड़ी जानकारी जो तू लाकर देगी मुझे

काकी- समझी नहीं मैं

मैं- सुन ध्यान से , सबसे पहले तो मुझे शकुन्तला के पल पल की खबर चाहिए वो क्या करती है , कहाँ आती जाती है , कौन दोस्त है कौन दुश्मन है उसके .

काकी- तुझे क्या करना है ये जानकार

मैं- वो तेरा मतलब नहीं .

काकी- और दूसरा काम

मैं- तुझे सोना पड़ेगा करतार के साथ ,

काकी- बावला हुआ है क्या

मैं- मेरे साथ सो सकती है उसके साथ नहीं , देख मैं जानता हु तुझे लंड की बहुत जरुरत है , करतार को दे, ये दोनों काम कर मैं महिपाल से बात करूँगा , ,मैं जानता हु तेरी चूत में बहुत आग है करतार संग लग जा .

काकी- सोचती हूँ

मैं- सोचने का समय नहीं है

काकी पर आज तो कर ले मेरे साथ , देख इतना तो तू भी कर ही सकता है मेरे लिए.

मैंने कुछ सोच कर कौशल्या से हाँ कह दी ,

चुदाई के बाद नींद सी आ गई , सुबह मैं करतार के साथ कालेज गया . दो तीन क्लास लेने के बाद मैं चंदू के पास चला गया .

चंदू- और भाई कैसे हो

मैं- बढ़िया कुछ खिला दे यार .

चंदू कुछ समोसे और चाय ले आया .

चंदू- भाई , रोज नहीं आते तुम

मैं- बस ऐसे ही पढाई में मन नहीं है करतार के साथ आ जाता हूँबस

फिर मुझे कुछ याद आया तो मैंने चंदू से पूछा - यार ये मुड्कियो की थोड़ी डिटेल चाहिए मुझे

चंदू ने घुर कर देखा मुझे और बोला- जानते हो न कितने खतरनाक है वो

मैं- अपने दोस्त के लिए इतना नहीं करेगा तू

चंदू- दोस्ती की है निभानी तो पड़ेगी ही . अभी परसों की बात है तुम नहीं आये थे उस दिन छोटे मुडकी ने कालेज में एक लड़के को इतना पीटा , उसका पाँव तोड़ दिया .

मैं - किसलिए

चंदू- मुदकी ने लड़के से कहा की उसके जूते को जीभ से चाटे , उसने मना किया तो उसका ऐसा हाल किया.. कोई रोकने टोकने वाला तो हैं नहीं . बाप के खौफ का पूरा फायदा उठाता है ये .

मैं- इसकी बहन जज है न

चंदू- हाँ , अपने इधर ही है कचहरी में, पर वो इन जैसी नहीं है बहुत अलग और सज्जन है , बल्कि वो काफी समय से अलग ही रहती है , उसने अपने भाई को ही सजा सुना दी थी .

मैं- तू जानता है उसे

चंदू- नहीं भाई, अपना क्या संपर्क बड़े लोगो से बस मैंने भी खबरे सुन ली लोगो से

मैं - और बता क्या चल रहा है

चंदू- क्या बताऊ बड़ी मुश्किल है भाई , सोचता हूँ कोई छोटी मोटी नौकरी मिल जाये तो अच्छा रहे, कहने को तो मैं और मेरी माँ ही है परिवार में पर दो समय की रोटियों के भी लाले पड़े है .

मैं- तेरा भाई किसलिए है फिर , मुझे बताना था न फिर .

मैंने जेब से पैसे निकाले और चंदू को दिए.

चंदू- अरे नहीं यार, ये सब नहीं

मैं- छोटा भाई है मेरा ,बड़े भाई के नाते दे रहा हूँ रख ले .

शाम को मैं गाँव पहुंचा तब तक अँधेरा घिर चूका था , मैंने हाथ पांव धोये ही थे की सरोज आ गयी.

सरोज- तुमने कुछ किया क्या, कुछ हुआ तुमसे

मैं- नहीं तो ,क्या हुआ

सरोज- आज एक पुलिसवाला आया था , कह गया की तुम्हे सेसन हाउस बुलाया है

मैं- अच्छा

सरोज- सेसन हाउस क्या होता है थाने को अंग्रेजी में कहते है क्या, देव सच बताओ मुझे .

मैं - ऐसा कुछ नहीं है , मेरा एक दोस्त बना है उसके पिता बड़े अधिकारी है वो पुलिसवाला उनका सुरक्षा गार्ड है तो उसके हाथ संदेस भेजा होगा .

सरोज- मुझे फ़िक्र रहती है तुम्हारी

मैं- समझता हूँ

मोना सिंह ने बुलवाया था मुझे , मैंने कल जाने का सोचा. मैं मजार की तरफ चल पड़ा. दरसल मजार तो अब बहाना थी मेरा मकसद रूपा का दीदार होता था . बस कुछ ही मुलाकातों में अपनी लगने लगी थी वो , उसके साथ दो सूखी रोटिया भी पकवानों से बेहतर लगती थी मुझे.

रूपा के बारे में सोचते हुए मैं बेफिक्र चला जा रहा था , की मोड़ पर मैंने कुछ ऐसा देखा की मेरा कलेजा जैसे सीने से बाहर आने को हो गया . ऐसी चीज़ बल्कि यु कहू ऐसा द्रश्य मैंने तो क्या किसी ने भी नहीं देखा होगा.

कच्ची सड़क के बीचो बीच , एक बड़े से सांप ने नीलगाय को जकड़ा हुआ था , नीलगाय तड़प रही थी , कितना बड़ा सांप था वो कम से कम दस फूट से ऊपर का , रहा होगा, उसकी मोटाई भी बड़ी ज्यादा था , अँधेरे में इतना साफ़ नहीं दिख रहा था पर आँखे उसे देख पा रही थी .

नीलगाय बड़ी तकलीफ में थी , मैंने सड़क से कुछ पत्थर उठाये और सांप के ऊपर फेंके, कुछ असर नहीं हुआ अबकी बार मैंने कुछ बड़े पत्थर उठाये और फिर से फेंके, इस बार शायद मेरा पत्थर उसे जोर से लगा. एक अजीब सी चीख मैंने सुनी,

और फिर मैंने उस सांप को पलटते हुए देखा, चीखते हुए वो मेरी तरफ पलटा ........

और जब वो ऊपर उठा तो मेरी बारी थी चीखने की , पर मेरी आवाज मेरे गले में ही घुट गयी , घुटने कांप गए वो सांप, वो सांप.............
 
#18

क्या वो मेरी नजरो का धोखा था या सच था , ये जो भी था मेरी आँखे देख रही थी पर दिल मान नहीं रहा था , मैंने देखा उसका धड बड़े सांप का था और ऊपर का तन इन्सान का , लम्बे बाल जो खून से लथपथ थे, अँधेरे में चेहरा नहीं दिख रहा था पर उसकी पीली आँखे जुगनू सी चमक रही थी .

अजीब सी आवाज करते हुए उसने अपनी पूँछ मेरी तरफ पटकी, जैसे किसी भारी पत्थर ने मुझे ठोकर मारी हो , मैं दर्द के मारे जमीं पर गिर गया , चिंघाड़ते हुए वो जीव मेरे पास आया , उसके बालो से टपकता खून मेरे जिस्म पर गिरने लगा. मैं जैसे बुत बन गया था , वो साया मेरे ऊपर झुकते जा रहा था किसी भी पल वो मुझे खा सकता था, वार कर सकता था , डर के मारे मेरी आँखे बंद होने लगी . पर कुछ देर बाद मुझे अहसास हुआ ख़ामोशी का .

मैंने आँखे खोली, कुछ नहीं था , सिवाय मेरे और उस नीलगाय की लाश के जो सबूत थी की मैंने अभी अभी कुछ ऐसा देखा था जो देख कर भी अनदेखा था . थोडा समय लगा उखड़ी साँसों को सँभालने में , मैं भागते हुए सीधा मजार पर गया और बाबा को सारी बात बताई , बाबा के माथे पर बल पड़ गए.

बाबा- कितनी बार तुझे समझाया है अंधेरो में मत घुमा कर पर तू सुनता नहीं, ये दुनिया बड़ी जालिम है मुसफिरा, यहाँ आईने है , हकीकते है , छलावे है , ऐसे ही किसी छलावे को देख आया है तू. ये धरती अपने अन्दर न जाने कितने राज छुपाये हुए बैठी है , ये रेत न जाने कितनी कहानियो का हिस्सा रह चुकी है .

मैं- बाबा, पर वो था क्या

बाबा- एक बुरा ख्वाब . पर तू भूल नहीं सकता उस खवाब को ,

बाबा ने ऊपर आसमान की तरफ देखा और बोले- तेरा नसीब गोते खा रहा है , ख़ुशी तेरी दहलीज पर खड़ी है पर ........

बाबा ने बात अधूरी छोड़ दी .

मैं- पर क्या बाबा

बाबा- मैंने कहा था न मौसम बदल रहा है तेरी आँखों में इश्क देखता हु मैं

मैं-नहीं बाबा . ऐसा कुछ नहीं

बाबा- मुझसे झूठ बोल सकता है नसीब से नहीं .

बाबा ने फिर कुछ नहीं बोला. बस अपना इकतारा बजाने लगा. मैं वापिस जाने को हुआ पर उसने मुझे वही रहने का इशारा किया . रात भर वो इकतारा बजाता रहा मैं उसके पास बैठा रहा .

अगले दिन कालेज के बाद मैं सीधा सेशन हाउस गया. मोना सिंह से मिलने. मुझे देखते ही उसके चेहरे पर जैसे ख़ुशी आ गयी .

“देव, कैसे हो तुम ” पूछा उसने

मैं- आप कैसी है , तबियत ठीक है

मोना- बेहतर हु, पैर टुटा है तो टाइम लगेगा ठीक होने में , खैर ये बताओ क्या लोग चाय, काफी, ठंडा , कहना क्या मैं मंगवा ही लेती हु .

कुछ ही देर में नाशता आ गया . मैंने थोडा सा खाया

मैं- सीधा काम की बात पर आते है .

मोना ने सर हिलाया

मैंने वो बैग मोना के सामने रखा उसने वो तस्वीर देखि और बैग को अपने पास रख लिया.

मोना- थैंक्स, इसकी हिफाजत करने के लिए.

मैं- कुछ ख़ास है इस तस्वीर में क्या , मैंने देखा आपको पैसे की फ़िक्र नहीं थी बस इस तस्वीर की थी .

मोना- ये किसी की अमानत है देव,

मैं- कीमती है क्या ये तस्वीर

मोना- नहीं , दरअसल ये किसी का घर है पर ये हैं कहाँ ये कोई नहीं जानता , ऐसी कहानी है की इसे छुपाया गया है .

मैं- ऐसा हो सकता है .

मोना-मैं भी ये जानना चाहती हु,

मैं- आप जज है , काफी पढ़ी लिखी हैं आप इन बातो पर विश्वास करती है ,

मोना- मैं जहाँ से हूँ न देव, वहां पर हर कोई विश्वास करता है , तुमने जूनागढ़ का नाम सुना है

मैं- हाँ सुना है ,

मोना- वो खिड़की से परदे हटाओ जरा .

मैंने वैसा किया.

मोना- किसी ने तुम्हे बताया की जूनागढ़ और तुम्हारे गाँव का क्या सम्बन्ध है .

मैं- मालूम नहीं ,

मोना- बरसो पहले तुम्हारे गाँव का एक लड़का , जूनागढ़ की लड़की को भगा ले गया था मंडप से,

मैं- तो

मोना- उस घटना ने दोनों गाँवों के भाईचारे को समाप्त कर दिया.

मैं- मुझे क्यों बता रही है .
 
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