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Adultery गुजारिश

मोना- क्योंकि तुमने मेरी मदद की , तुम्हे मेरे बारे में जानना चाहिए

मैं- वो इसलिए की इन्सान ही इन्सान के काम आता है , मुझे तो मालूम भी नहीं था की आप कौन हो , क्या हो, कहाँ की हो .

मोना- इसलिए मैं प्रभावित हुई हु, तुमसे ,

मैं मुस्कुरा दिया.

मोना- देव, कभी कोई काम हो तो मुझे कह सकते हो .

मैं- जी, शुक्रिया

मोना- कभी भी किसी भी समय तुम मुझसे मिलने आ सकते हो , बस मैं कोर्ट में न रहू उस समय

मैंने सर हिला दिया .

मैं वापिस जाने को उठा की मुझे कुछ याद आया

मैं- एक बात पुछू

मोना- हाँ

मैं- वो हवेली किसकी है वैसे

मोना- एक मुसाफिर की .

मोना की बात सुनकर मैं फिर मुस्कुरा पड़ा

मोना- क्या हुआ .

मैं- जी कुछ नहीं .

मोना से विदा लेकर मैं वापिस अपने गाँव की बस में बैठ गया . रस्ते भर मैं उस तस्वीर के बारे में सोचता रहा , किसी मुसाफिर की थी वो हवेली और एक मुसाफिर मैं भी था , क्या वो मेरी थी , एक मिनट ताऊ ने मुझे जो चाबी दी, क्या वो उस हवेली की ही थी . सोचते सोचते मेरे सर में दर्द होने लगा.

मैं सीधा अपने खेत पर गया . तो देखा की रूपा वहां पहले से मोजूद थी .

रूपा- तेरा ही इंतज़ार कर रही थी मैं

मैं- किसलिए

रूपा- किसलिए का क्या मतलब , क्या मैं तेरा इंतजार नहीं कर सकती

मैं- अरे नाराज क्यों होती है बस ऐसे ही पूछा मैंने

रूपा- आज हलवा बनाया था मैंने तो तेरे लिए लायी हु

मैं- एक मिनट मैं हाथ पाँव धो लू जरा

मैं वापिस आया तब तक रूपा ने चूल्हा जला दिया था .

रूपा- ठण्ड बहुत है चाय बस बनी ही

मैंने डिब्बा उठाया और हलवा खाने लगा. कसम से रूपा बड़ा स्वादिष्ट खाना बनाती थी .

“ले चाय ” उसने मुझे कप दिया.

मैं- तू नहीं पीयेगी

रूपा- कितनी बार बताऊ, दूध पसंद है मुझे ,

उसने अपने कप में दूध भरते हुए कहा

मैं हंस पड़ा

रूपा- तू ऐसे बेमतलब मत हंसा कर

मैंने चाय की चुस्की भरी

रूपा- ये बताने आई थी की कुछ दिन मिल नहीं पाऊँगी तुझे

मैं- क्यों भला सब राजी ख़ुशी तो है

रूपा- मैं जूनागढ़ जा रही हूँ,

मैं- क्यों

रूपा-शादी में

मैं- अपनी रिश्तेदारी है उधर

रूपा- नहीं

मैं- तो कैसे

रूपा- तू क्या करेगा ये जानकार , हर बात बतानी जरुरी तो नहीं

मैं- क्या बात है रूपा , क्या बताना नहीं चाहती तू मुझे

रूपा- क्या बताऊ तुझे , बापू के किसी जान पहचान वाले की शादी है इसलिए जा रहे है बस अब और मत पूछना

मुझे लगा की कुछ तो छुपा रही है रूपा पर मैंने बात को टाल दिया.

मैं- रूपा तू किसी हवेली के बारे में जानती है जो खो गयी .

रूपा के हाथ से कप निचे गिर गया .
 
#19

“माफ़ करना मेरा ध्यान भटका , क्या कह रहे थे तुम ” बोली रूपा

मैं- तूने किसी खोयी हुई हवेली के बारे में सुना है क्या

रूपा जोर जोर से हंसने लगी, इतना जोर जोर से की उसने अपना पेट पकड़ लिया.

“वाह रे, मजाक करना कोई तुमसे सीखे, जानता भी है हवेलिया कितनी बड़ी होती है , कोई छोटा मोटा सामान है क्या जो खो जाये ” रूपा बोली

मैं- ले ले मजे पर किसी ने मुझे बताया की एक हवेली खो गयी

रूपा- तो बताने वाले को जाके कह की खोयी चीज की रपट दर्ज करवाए थाने में .

इस बार मैं भी मुस्कुरा दिया.

रूपा- बहुत भोला है रे तु, जो भी तुझे बता दे मान लेता है मुझे डर लगता है कही तेरे इस सरल स्वभाव का फायदा दुनिया न उठाये.

“मेरी दुनिया तू है , उठा ले फायदा ” मैंने कहा

रूपा- इतना आगे मत बढ़ मुसाफिर , की पीछे लौट न सके

मैं- डरती है तू मेरे साथ सफ़र करने में

रूपा- डरती हूँ नसीब से,मुसाफिरों के नसीब में बस सफ़र होता है , मंजिले नहीं , मुसाफिर सफ़र करते है हमसफर नहीं बनते . और फिर मेरे चाहने न चाहने से क्या होता है , तू आसमान का तारा मैं धरती की रेत ,

मैं- इस रेत में पानी की बूँद बन कर घुलना चाहता हु मैं , माना की नसीब में सफ़र है पर हमसफर भी तो हैं .

रूपा- फिर कभी करेंगे ये बाते , मैं चलती हु देर हो रही है .

मैं- यही रुक जा न .

रूपा- आजकल बस तेरे साथ ही वक्त गुजर रहा है मेरा, मेरा काम रह जाता है तेरे चक्कर में

मैं- तुझे काम करने की कोई जरुरत नहीं , मेरा सब कुछ तेरा ही तो है

रूपा- जानती हु , पर हम इस बारे में बात कर चुके है ,

मैं- तेरी ये खुद्दारी

रूपा- गरीब के पास होता ही क्या है खुद्दारी के सिवा.

मैंने रूपा का हाथ पकड़ा और बोला- ऐसी बाते न किया कर, तू जानती है मेरा दिल कितना दुखता है , तेरे हाथो के ये छाले जब देखता हूँ न तो कलेजे में आग लगती है .

रूपा- क्या चाहता है तू

मैं- तुझे अपनी बनाना,

रूपा- आशकी में सब ऐसा कहते है

मैं- ब्याह करना चाहता हूँ तुझसे , तुझे अपना बनाना चाहता हु, मेरे पास एक मकान है उसे घर बनाना चाहता हु, आजतक बस अकेल्रा ही रहा हूँ अब तेरे साथ जीना चाहता हूँ .

रूपा के चेहरे पर एक फीकी मुस्कान आ गयी .

रूपा- देर हो रही है मुझे

मैं- रुक जा न

रूपा- फिर कभी रुक जाउंगी जाने दे मुझे

रूपा उठी और झोपडी से बाहर आई, आसमान से ओस बरस रही थी , ठण्ड बहुत ज्यादा थी , रूपा ने अपनी लालटेन जलाई . रौशनी में उसका सांवला चेहरा जैसे सुबह खिलता कोई ताजा फूल हो .

रूपा- चलती हु, शादी में से आके ही मिलूंगी अब

मैं- तेरी याद आएगी .

रूपा- यादो का क्या करना कुछ दिन में मैं खुद ही आ जाउंगी.

रूपा ने कदम आगे बढ़ाये और अपने रस्ते पर चल पड़ी. कुछ दूर जाकर वो पलटी, मेरी तरफ देखा उसने

मैं दौड़ कर गया उसके पास, बेशक दो चार कदम की दुरी थी पर साँस फूल गयी थी .

“न रोक सरकार , जाने दे मुझे जाना जरुरी है ” रूपा कांपते हुए बोली

मैं अब उसके सामने था , उसके करीब , इतना करीब की हमारी सांसे आपस में उलझने लगी थी , चाँद रात और दिलबर साथ . मैंने देखा रूपा के हाथ में लालटेन कांपने लगी थी .

मैंने रूपा की कमर में हाथ डाला और थोडा सा खींचा , वो मेरी बाँहों में झूल गयी , उसके होंठ मेरे गालो से टकराए.

“जाने दे मुझे ” आधी ख़ामोशी से बोली वो

मैं- तू अकेली नहीं जायेगी मेरी जान भी तो साथ ले जा रही है .

रूपा- ऐसी बाते मत कर, पिघलने लगी हूँ मैं परवाने

मैं- तो फिर जला दे मुझे शम्मा बनकर

रूपा- मज़बूरी समझ मेरी

मैं- अकेलापन समझ मेरा,

मेरे होंठ थोडा सा रूपा के होंठो से टकराए, मुझे ऐसे लगा की बर्फ चख ली मैंने पर उसने मुझे खुद से दूर कर लिया और बोली- जा रही हु मैं .

इस बार उसने मुड कर नहीं देखा , बस चली गयी .पर वो ऐसे ही नहीं गयी थी अपने साथ मेरा दिल भी ले गयी थी.

मैं वापिस आकर बिस्तर पर लेट गया . आँखों में न नींद थी न दिल में करार, खुली आँखों से मैं सपने देखने लगा था , ऐसे सपने जहाँ बस मैं था रूपा थी , पेडो पर डाले झूले में झूलते रूपा, पास बैठा उसे देखता मैं . नजाने कब मुझे नींद आई .

सुबह आँख खुली ,मै बाहर आया तो देखा की कौशल्या चली आ रही है .

मैं- इतनी सुबह कैसे,

कौशल्या- दस बज रहे है

मैं- बड़ी देर तक सोया मैं .

काकी- जाने दे सुन , शकुन्तला खुद तुझसे मिलना चाहती है , बातो बातो में उसने बताया मुझे

मैं- मुझसे पर क्यों

काकी- बड़ी परेशां है वो किसी बात को लेकर, मैंने पूछा पर उसने वो बात बताई नहीं

मैं- कब मिल सकते है

काकी- देख,तू ऐसा कर लाला का हाल पूछने के बहाने उसके घर जा

मैं- पर लाला तो हॉस्पिटल में है

काकी- तभी तो कह रही हूँ, हाल चाल पूछने के बहाने घर जा सकता है तू , और घर से बढ़िया जगह कहाँ रहेगी मिलने को

मैं- ठीक है कल जाता हु

काकी- मेरे कर्जे का क्या हुआ .

मैं- एक दो दिन में पैसे लाकर देता हु तुझे

काकी- ठीक है . और ..

मैं- और क्या

काकी- चोदेगा कब

मैं- दो चार दिन में

काकी-जैसी तेरी मर्जी और सुन बताना भूल गयी सरोज बोल रही थी तुझे, कल सुबह से गायब है तू, चिंता कर रही थी वो घर चले जाना

मैं- ठीक है , वो करतार के बारे में क्या सोचा

काकी- रिझाना शुरू कर दिया है , अभी सीधा टांगे खोल दूंगी तो अच्छा नहीं लगेगा न

मैं- ठीक है .

कौशल्या के जाने में बाद मैं सोचता रहा की शकुन्तला की कौन सी मज़बूरी है जो वो लालायित है मुझसे मिलने को , पर जबसे उसे मूतते देखा था मैंने भी तो सोच लिया था की उसकी चूत लेनी ही हैं मुझे, मेरा दिल तो उसी दिन आ गया था उस पर . सोचते सोचते मैं घर की तरफ चल पड़ा.
 
#20

दिमाग में सवाल इतने थे की सोचते सोचते सरदर्द होने लगा था . मैं सीधा जाकर नहाया और फिर सरोज के पास गया , पीली साडी में सरोज बड़ी कातिल लग रही थी, मुझे देखते ही वो शुरू हो गयी .

सरोज- कहाँ थे तुम , आजकल न जाने क्या हुआ है न दिन की फ़िक्र है न रात की , बीते महीने से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था की तुमने खाना छोड़ा हो, कोई कमी है तो बताओ , मैं तुम्हारी पसंद का खाना बनाती हु फिर भी .

मैं- माफ़ी चाहता हूँ बस मैं आ नहीं पाया रात को , थका हुआ था तो वहीँ पर सो गया .

देखो - ये जानते हुए भी की खेतो पर अकेले सोना खतरनाक है ,फिर भी मैंने तुम्हे रोका नहीं पर अब जब आस पास ऐसी घटनाये हो रही है मुझे फ़िक्र है तुम्हारी, बेशक मैं सो चुकी हु तुम्हारे साथ फिर भी तुम बेटे हो मेरे .

मैंने सरोज की नजरो में अपार ममता देखि .

मैं- कैसी घटनाये

सरोज- तुम्हे नहीं मालूम, लोग कहते है की लाला के मुनीम को दिल का दौरा नहीं पड़ा था उसे किसी सांप ने काटा था . उसके बाद जुम्मन की भैंस को भी कोई जानवर खा गया , और तो और परसों पीपल वाले रस्ते पर एक आधी खाई नील गाय मिली है . फिर लाला पर हुआ हमला . मेरा जी बड़ा घबराता है जब तुम लोग बे टाइम घर से बाहर रहते हो. न तुम सुनते हो न करतार और न तुम्हारे चाचा .

मैं- ध्यान रखूँगा और कोशिश करूँगा समय से घर आने का .

सरोज- मुझे तो लगता है कोई साया है तुम पर , गाँव वाले बताते है रात रात भर तुम मजार पर उस पागल संग रहते हो. मुझे डर है कहीं वो मेरे बेटे को कुछ खिला पिला न दे.

मैं- अरे काकी, पागल नहीं है वो , मैं अपनी सुना देता हु उसे वो मुझे सुना देता है , मैं मजार पर जाता हु मेरी माँ के पेड़ की वजह से , उसके पास बैठता हु तो लगता है की माँ के आँचल तले हु, इसलिए चला जाता हु .

सरोज फिर आगे कुछ न बोली ,सिवाय इसके की खाना आ रही है वो .

ख़ामोशी से मैंने खाना खाया, मैं थोड़ी देर सोना चाहता था तो करतार के पलंग पर जाके लेट गया . सरोज भी अपना काम करने लगी . मेरा ध्यान दो बातो पर था शकुन्तला से मिलने पर , मोना सिंह की वो तस्वीर और रूपा के साथ घर बसाने को . पर चूँकि रूपा कुछ दिनों के लिए बाहर थी तो मैंने अपने ध्यान फिलहाल के लिए शकुन्तला पर लगाया.

कुछ सोचने के बाद मैं उठा और सीधा अपनी साइकिल लेकर उस जमीं पर आया जिसको खरीदने की ख्वाहिश लाला महिपाल की थी , आखिर इस टुकड़े में क्या ख़ास बात थी , नहर नजदीक थी , सड़क नजदीक थी और महिपाल अपना रकबा बढ़ा सकता था . इस जमीन से हम दो फसल ही लेते थे बाजरा और सरसों या गेहू,

मैंने अनुमान लगाना शुरू किया और कुछ सोचा, मुझे वापिस आते आते शाम के चार पांच बज गए थे , जब मैं लौट रहा था तो रस्ते में मैंने देखा मेरी ताई अपने घर के बाहर ही खड़ी थी , न जाने क्या हुआ मुझे मैं साइकिल से उतर गया और पैदल ही गहर के सामने से गुजरने लगा . ताई ने मुझे देखा और आवाज दी, - देव, बेटे.

मेरी जिन्दगी में ये पहली बार था जब मेरे अपनों ने मुझे आवाज दी थी . मैं रुक गया

“जी, ताईजी ”

ताई- कैसा है मेरा बेटा

मैं- जी ठीक हूँ

ताई- वहां क्यों खड़ा है अन्दर चल तेरा ही घर तो है बेटा

मैं- फिर कभी आऊंगा

ताई- तेरी झिझक समझती हूँ बेटा दोष हमारा ही अपने खून को , अपनी औलाद को आँखों के सामने परायो के जैसे पलता जो देखते रहे,

मैं- वो बात नहीं है ताईजी , मैं आता हु फिर कभी

ताई- तेरी दीदी की शादी है तुझे मालूम तो होगा ही ,आना है तुझे, आना ही क्या रस्मे, शादी के काम सँभालने है , कितने दिनों बाद परिवार में कोई शुभ दिन आ रहा है

मैं- जी बिलकुल, ये भी कोई कहने की बात है

मैंने कहा और अपना रास्ता पकड़ लिया. परिवार, जब भी कोई परिवार की बाते करता था मुझे बड़ी हंसी आती थी , घर आकर भी मेरे पास क्या था करने को , ये खाली चारदीवारी मेरा मजाक उडाती थी , हंसती थी मुझ पर , मेरी बदकिस्मती पर. और मैं हमेशा की तरह मन मसोस कर रह जाता था .

मेरे पास एक चाबी थी , मोना के पास एक तस्वीर थी , एक खोयी हुई हवेली की, उस हवेली और मेरी खुशियों में एक समानता तो थी दोनों ही खोयी हुई थी . मैंने एक कागज लिया और जो तस्वीर मैंने देखि थी वो बनाने लगा. वैसी तो नहीं बनी पर उस जैसी कह सकते है .

अब बस मुझे उस आदमी की तलाश करनी थी जो उस हवेली के बारे में जानता हो . चौपाल पर बैठे कुछ बुजुर्गो से मैंने पूछा पर कुछ ने आना कानी की कुछ ने गर्दन न में हिला दी. दरअसल ये हमेशा से ही था , गाँव के लोग मुझसे दूर ही रहते थे , बाबा ने भी कहा था की मैं लोगो से जुडु पर ये लोग मुझसे ऐसे भागते थे जैसे की मैं कोई संक्रमित जीव होऊ .

खैर मैं घर आया तो मैंने देखा सरोज काकी और करतार में किसी बात को लेकर बात हो रही थी .

मैं- क्या हुआ,

कट्टु- देखो न भाई , माँ हमेशा मुझे ही काम के लिए कहती रहती है

सरोज- तो छोटा कौन है , वो ही करेगा काम

मैं- क्या काम है ऐसा

सरोज- रामेशवर जी की लड़की की शादी है , कन्यादान के लिए कहा है इसे दे आने को पर ये जा नहीं रहा

कट्टु- भाई, रामेश्वर ने अपना मकान नहर पार खेतो में बनाया हुआ है अब तुम ही बताओ कौन जायेगा इतनी दूर, थोडा सा जीमने के लिए मैं तो न जाऊ इतनी दूर .

मैं- बस इतनी सी बात मैं चला जाता हूँ उसमे क्या है

कट्टु और सरोज दोनों ने ही घुर कर मेरी तरफ देखा .

मैं- क्या -

सरोज- आजतक किसी के यहाँ तुम गए भी हो

मैं तो आज चला जाता हूँ उसमे क्या है . करतार मेरे नए कपडे निकाल ला. जरा.

नए कपडे पहन के मैं रामेश्वर की लड़की की शादी में जा पहुंचा, सर्दियों की रात में शादी होना भी बड़ा गजब होता है , मैंने सबसे पहले कन्यादान किया सरोज ने जो जेवर, साड़ी दी थी वो दी, खाना खाया इन सब में मुझे रात के तक़रीबन दस बज गए थे, किसी ने बताया की बारात दरवाजे पर आ पहुंची मैं देखने लगा. थोडा समय और गुजर गया . पर मुझे लौटना था तो मैं चल पड़ा बस नहर की पुलिया के पास पहुंचा तो मैंने देखा की ......................
 
#21

मैंने दो शांत पीली आँखे देखि , पुलिया के बीचो बीच , बेशक अँधेरा घना था पर वो आँखे जुगनू सी चमक रही थी , मेरे पैर उसे देखते ही थम गए, और इस बार मुझे पक्का यकीन हो गया ये जो भी था इतना जरुर था की मेरा भ्रम नहीं था . पर एक चीज और थी जिस पर मेरा ध्यान अभी नहीं गया था और जब गया तो मैंने अपनी पेंट में गीलापन महसूस किया.

पुलिया के पास चार पांच कटी फटी लाशें पड़ी थी , ठीक उसी तरह से जैसे वो नीलगाय का हाल था इन लाशो का हाल था पर एक बात और थी वो सांप वैसा बिलकुल नहीं था जैसा मैंने उस दिन देखा था बेशक बड़ा इतना ही था पर ये पूरा सांप था , मतलब इसका मुह सांप जैसा था बेशक उसके और मेरे बीच थोड़ी दुरी थी पर इतना जरुर था की वो सांप शायद सो रहा था .

कायदा तो ये था की मुझे रास्ता बदल लेना चाहिए था , मेरा कुछ भी लेना देना नहीं था और पिछली मुलाकात भी कुछ ठीक नहीं थी , पर कहते है न की इन्सान में चुल होती है और यही चुल उस से खुराफात करवाती है . मेरा हाल भी ऐसा ही था , मैं दबे पाँव आगे बढ़ा उस सांप की तरफ, मेरे कुछ कदमो ने हमारे बीच की दुरी और घटा दी थी , और आगे बढ़ते हुए मैं इतना तो जान गया था की ये सांप सो ही रहा था , बस उसकी आँखे खुली थी .

पर वो कहते है न शिकारी अगर सोया भी हो तो घात में सोता है , मेरे पैरो की हलकी सी आवाज हुई और मैंने बस उस बड़े से फन को अपने तरफ आते देखा, वो फन बड़ी जोर से मेरे सीने से टकराया , जैसे किसी पहाड़ की चट्टान आ गिरी हो मुझ पर , चीखते हुए मैं जमीन पर गिर पड़ा.

मेरे कानो ने वो ही तेज चीख सुनी जो मैंने उस दिन सुनी थी , जमीं पर पड़े पड़े ही मैंने महसूस किया की सांप की पूँछ मुझे जकड रही है , मेरे शारीर पर उसका दबाव बढ़ रहा था , और फिर उसने मुझे ऊपर हवा में उठा लिया , मैं अब उन पीली आँखों के सामने था , वो आँखे बड़े गौर से घुर रही थी मुझे ,जकड़ के मारे हड्डिया कद्कड़ाने लगी थी ,

फन से एक लम्बी सी जीभ मेरी तरफ लपलापाई , मेरा चेहरा जैसे किसी गाढे लिजलिजे द्रव से नहा गया , बड़ी गन्दी बदबू थी वो , मेरा सर चकराने लगा. बेहोशी सी छाने लगी , आँखे बंद होने लगी, फिर जैसे सब शांत हो गया . जैसे कुछ हुआ ही न हो.

जब मुझे होश आया तो मैं खुद को संभाल नहीं पाया बहुत देर तक तो मुझे समझ ही नहीं आया की मैं हु कहाँ , बदन दर्द से तड़प रहा था होश फाख्ता थे, क्या समय था मालूम नहीं था भोर का पहला पहर था शायद , ठण्ड बहुत तेज थी ,

मैंने आस पास का जायजा लिया ,दिमाग पर जैसे बहुत बोझ था , मैं वही पुलिया पर पड़ा था उन लाशो के बीच , जैसे तैसे मैं अपने खेत पर पहुंचा और पानी उडेला खुद पर . दो बार मेरा सामना ऐसे जीव से हुआ था जो लोगो को मार रहा था , पर उसने मुझे नहीं मारा . ये सवाल किसी हथोड़े की तरह मेरे दिल पर चोट कर रहा था .

क्या उस सांप का मुझ से कोई रिश्ता था ? पर कैसे ? कम्बल ओढ़े अलाव को ताकते हुए मैं बस यही सोच रहा था , मैं देव चौधरी, जिसके पास न कोई अतीत था और न कोई भविष्य . न जाने क्यों मुझे डर लगने लगा था , ऐसा डर जो मेरी रीढ़ की हड्डी में बैठ रहा था . छोटी सी हलचल मुझे लगती थी की वो सांप मेरे आसपास है .

कुछ और न सूझा तो मैं मजार वाले बाबा के पास चल दिया. पर वहां जाकर मैंने कुछ और ही देखा. व्हील चेयर पर बैठी मोना मजार पर थी , अपनी आँखे मूंदे जैसे कोई दुआ मांग रही हो वो. और उसका वहां होना मुझे बड़ा अच्छा लगा. मैं बस उसे देखता रहा . कुछ देर बाद उसने आँखे खोली

“देव, तुम यहाँ ” पूछा उसने

मैं- आप भी यहाँ

मोना- इबादत का कहाँ कोई समय होता है

मैं- सो तो है ,

मोना- जूनागढ़ जा रही थी एक शादी के सिलसिले में तो सोचा इधर होती चलू , बड़े दिन बीते इधर से आना ही नहीं हुआ

मैं- अच्छा किया इसी बहाने अपनी मुलाकात हो गयी .

मोना- मुलाकाते तो होती ही रहनी है , और बताओ

मैं- आप बताओ तबियत कैसी है अब

मोना- देख ही रहे हो. अभी तो इस चेयर के सहारे हु, पर जल्दी ही प्लास्टर खुल जायेगा.

मैं- जल्दी से ठीक हो जाओ आप.

मोना- कोशिश तो है .

मोना कोई ३२-३३ साल की औरत थी , शादी नहीं की थी उसने, पर यौवन से भरपूर, एक दम गुलाबी रंगत लिए और इस ठण्ड में वो और गुलाब लग रही थी . जैसे मैं एक पल को उसके रूप में खो ही गया था .

“अब इतनी शिद्दत से मत देखो मुझे देव, ” उसने मुस्कुराते हुए कहा

मैं उसकी बात सुनकर झेंप सा गया . वो मुस्कुराई

मैं- घर चलते है , चाय पियेंगे

मोना- जरुर, पर आज नहीं फिर कभी अभी मुझे निकलना है जूनागढ़ के लिए ,वैसे तुम एक काम क्यों नहीं करते , आ जाओ उधर, मेरा घर है , छुट्टिया भी हैं मेरी, इसी बहाने तुम्हारा एक ट्रिप भी हो जायेगा और मैं भी थोडा टाइम अपने नए दोस्त के साथ बिता सकुंगी.

मैं- पर मैं कैसे ...........

मोना- कैसे, क्या, अब एक दोस्त क्या दुसरे दोस्त के घर नहीं आ सकता क्या

मैं- क्यों नहीं आ सकता .

मोना- तो फिर आ जाओ, मैं परसों गाडी भेज दूंगी तुम्हे लेने .

मैंने सर हिला दिया.

मोना ने मुझे अपने पास बुलाया. मैं उसके पास गया और घुटनों पर बैठ गया उसने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- दुनिया में सब कुछ मिल जाता है बस अच्छे दोस्त बड़ी मुश्किल से मिलते है , दुनिया के लिए मैं अफसर हु पर तुम्हारे लिए बस मोना, तुम्हारी दोस्त मोना.

मैं- शुक्रिया .

मैंने खुद मोना की चेयर को गाडी तक छोड़ा .

मोना- परसों

मैं- पक्का.

बेशक ये कुछ मिनट की मुलाक़ात थी पर इसने दिमाग को हल्का कर दिया था , मेरी तक़दीर के मोहरे अपनी चाल चल रहे थे , मैं जूनागढ़ जाने वाला था , मैं कहा जनता था की नसीब का लेख मुझे वहां बुला रहा है , मैं तो ये सोच कर खुश था की रूपा भी होगी वहां .
 
#22

“आज बड़ी सुबह सुबह आ गया मुसाफिरा,माथे पर कुछ परेशानी लिखी लगती है तेरे ” बाबा ने मेरी तरफ आते हुए कहा

“बाबा, ” मैंने कहा

बाबा- की होया यारा,

मैं- बाबा, मुझे वो सांप दुबारा दिखा ,

बाबा- मालूम हुआ मुझे, नहरी पुलिया पर कुछ बाराती की हत्या हुई

मैं- बाबा एक जानवर लोगो को मार रहा है और गाँव में कोई चर्चा नहीं , लोग कुछ करते क्यों नहीं .

“लोग क्या करेंगे , लोगो को कहाँ फुर्सत है कुछ करने की , तेरे ताऊ का लड़का सरपंच है तू जाके बता उसको ” बाबा ने कहा

मैं- मुझे क्या लेना देना उस से

बाबा- तो फिर लोगो का भी क्या लेना देना

बाबा की से मुझे मेरी गलती का अहसास हुआ .

बाबा- सबका अपना नसीब है , सबकी डोर इसके हाथ में है ये जब खींचे तब खींचे तू इतना न सोच

बाबा ने मजार की तरफ इशारा करते हुए कहा .

मैं- बाबा मैं जूनागढ़ जाने का सोच रहा हु .

बाबा ने अपनी चिलम सुलगाई और कुछ कश लेने के बाद बोला- जहाँ तेरा नसीब ले जाये जा वहां जाकर मीरा की दूकान पर जाना , बर्फिया बड़ी बढ़िया बनाती है वो .

मैं- जी.

बाबा- और बता मुसाफिरा, क्या चल रहा है

मैं- बस बाबा, कभी कालेज तो कभी खेत पर

बाबा- तू जानता है मैं क्या पूछ रहा हु तुझसे

मैं- जब जानते हो तो पूछते क्यों हो .

बाबा- सवाल अच्छा है पूछते क्यों हो . सुहासिनी भी ऐसा ही कहती थी ,

मैं- आप मुझे बताते नहीं मेरे माँ- बाप के बारे में मैं जानना चाहता हूँ उनके बारे में

बाबा- मैं भी जानना चाहता हूँ मालूम होगा तो बताऊंगा मेरे बच्चे . अपने घर जा , तेरा इंतज़ार वहां खत्म होगा

मैं- घर तो रोज जाता हु मैं

बाबा- मैंने कहा तेरे घर , जहाँ तू रहता है वो तेरा घर नहीं है , वहां तो बस तुझे छोड़ दिया था , तलाश अपने घर को , अपनी सकशियत को. अपने आप को. तुझे मुसाफिर इसलिए ही कहता हु ताकि तू अपने आप को जान सके, अपने सफ़र को मंजिल की तरफ मोड़ सके.

“तुम्हारी ये बाते समझ नहीं आती मुझे बाबा. ” मैंने कहा

बाबा- अक्सर मुझे भी .

बाबा ने चिलम होंठो से लगाई और आँखे मूँद ली , ये उनका तरीका था मुझे बताने का की अब मैं चल दू वहां से . मेरे दिल में सवालो का दरिया था बस कोई पार करवाने वाला नहीं था , खैर मैं घर की तरफ चल पड़ा तो था पर अभी पहुँचने में जरा देर लगने वाली थी .

पीपल के पास मुझे शकुन्तला की गाडी दिखी तो मैं रुक गया . वो पीपल वाले चबूतरे निचे बैठी थी .

“रामराम सेठानी ” मैंने कहा

“छोटे चौधरी , क्या हाल चाल ” सेठानी ने जवाब दिया

मैं- बस बढ़िया तुम बताओ, लालाजी कैसे है अब

शकुन्तला- डॉक्टर कहते है ठीक है पर मुझे तो फर्क दीखता नहीं

मैं- मालूम हुआ किसने किया हमला

सेठानी- नहीं , कुछ नहीं आओ बैठो पास

मैं चबूतरे पर बैठ गया .

सेठानी- मैं मिलना चाहती थी तुम से और देखो इत्तेफाक से तुम ऐसे मौके पर मिले हो हम खुलकर बात कर सकते है .

मैं- जमीन के सौदे के आलावा तुम जो चाहे बात कर सकती हो

सेठानी ने अजीब नजरो से देखा मुझे, और बोली- लालाजी और मुझमे फर्क है , मैं बस एक बात पूछना चाहती हूँ .

मैं- बेशक

सेठानी- उस रात जब मुनीम मरा तो उसके सबसे पास तुम थे , मैं जानना चाहती हु किसने मारा था उसे

मै एक पल को हैरान रह गया सेठानी के सवाल से पर मैंने खुद को संभाला और बोला- वो तो हार्ट अटैक से मरा था न

सेठानी- छोटे चौधरी, ये बात तुम भी जानते हो मैं भी जानती हु की मुनीम की मौत कैसे हुई, किसने मारा बस मेरी दिलचस्पी इसमें है .

मैं- कातिल की तलाश है तो फिर मौत पर पर्दा क्यों डाला, पुलिस में रपट दर्ज क्यों नहीं करवाई, दरोगा अपने आप तलाश लेता कातिल को .

सेठानी- छोटी उम्र में बड़े खेल खेलने सीख गए हो , वैसे तुम्हे मालूम तो होगा न गाँव में एक सांप घूम रहा है जो लोगो को मार रहा है .

मैं- अब मैं कोई सपेरा तो हूँ नहीं , और सांप रखने का शौक नहीं मुझे

सेठानी- मेरा वो मतलब नहीं था , मैं बस कुछ अनुमान लगाने की कोशिश कर रही हूँ .

मैं- कैसा अनुमान

सेठानी- यही की मुनीम को भी उसी सांप ने मारा होगा.

मैं- हो सकता है , दरअसल उस रात धुंध बहुत गहरी थी ऊपर से अँधेरा बिजली गुल थी तो अंदाजा लगाना बड़ा मुश्किल है . पर तुम्हारे अनुमान क्या है

सेठानी- लालाजी के काफिले पर भी एक सांप ने हमला किया था . और वो कोई मामूली सर्प नहीं था , करीब पंद्रह फूट से भी ज्यादा बड़ा था . हमारी तीन गाडियों का नाश कर दिया उसने, लालाजी की जान बड़ी मुश्किल से बची है हमले के बाद से एक शब्द नहीं बोला है उन्होंने बस शून्य में घूरते रहते है , मेरे लिए मेरा पति सब कुछ है .उसके लिए मैं कुछ भी कर जाउंगी

मैं- सो तो है , पर मुझसे क्या चाहिए इस मामले में .

सेठानी- बस इतना की मेरा परिवार सुरक्षित रहे, मेरे सुहाग पर कोई आंच न आये.

मैं- मैं कैसे तुम्हे ये आश्वाशन दे सकता हु ,

सेठानी- और कौन रोकेगा उसे, तुम्हारे सिवा आखिर वो तुम्हारा सर्प है ,

सेठानी ने जैसे मुझ पर बम सा फोड़ दिया था मेरा सांप

मैं- होश में तो हो न , भला कोई सर्प मेरा कैसे हो सकता है . कुछ नशा वगैरह किया है क्या तुमने

सेठानी- झूठ मत बोलो छोटे चौधरी, सारा गाँव जानता है की वो सर्प खुद तुम्हे तुम्हारे घर की दहलीज पर छोड़ कर गया था , और अब पुरे १८ साल बाद वो लौट आया है . तुम्हे याद नहीं बेशक, पर तुम घायल अवस्था में थे , तुम्हारे घरवाले तुम्हे तभी मार देना चाहते थे पर उसने रक्षा की थी तुम्हारी और तुम्हारे दादा , उनकी हत्या भी तो उसी ने की थी .
 
शकुन्तला ने एक के बाद एक धमाके कर दिए थे मेरे सामने, मेरे अस्तित्व के लिए एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया गया था की मैं कहू ही क्या .

मैं- चलो मान लिया, पर लालाजी ने भी कुछ तो ऐसा किया होगा जो सर्प ने उन पर हमला किया .

शकुन्तला- वो भला क्या करेंगे.

मैं- लालाजी की छवि के बारे में तो सबको मालूम ही है , और यदि उन्होंने कुछ भी ऐसा किया होगा या किया है जिस से मेरे जीवन पर जरा भी फर्क पड़ा होगा तो सेठानी मेरी कही बात याद रखना .....

सेठानी- देव, तुम मेरी बात समझ नहीं रहे हो . हम सबको फ़िक्र है तुम्हारी . हमें परवाह है तुम्हारी पर मेरे सिंदूर का भी तो सवाल है .मैं बस तुमसे ये गारंटी चाहती हूँ .

मैं-चलो मान लिया की मैं जैसे तैसे तुम्हे ये गारंटी दे भी दू तो बदले में मुझे क्या मिलेगा.

शकुन्तला के सीने को घूरते हुए मैंने कहा .
 
#23

“तुम्हे क्या चाहिए ” शकुन्तला ने पूछा

मैं- क्या दे सकती हो तुम

शकुन्तला- जो तुम सोच रहे हो वो मुमकिन नहीं

मैं- पर मैंने तो कुछ सोचा ही नहीं

शकुन्तला- कच्ची गोटिया नहीं खेली मैंने छोटे चौधरी, जितनी तुम्हारी उम्र है उस से जायदा साल मुझे चुदते हुए हो गए,

मैं- तो एक बार और चुदने में क्या हर्ज है

शकुन्तला- मैंने कहा न ये मुमकिन नहीं .

अब मैं उसे ये नहीं बताना चाहता था की मैं उतावला हूँ उसे चोदने को और औरत के आगे जितना मर्जी खुशामद करो उतना ही उसके नखरे बढ़ते है , तो मैं बिना उसका जबाब सुने वहां से चल दिया. घर आकर मैंने कपडे बदलने चाहे तो देखा की जिस्म पर गहरे नीले घाव थे, बदन में कही भी कोई दर्द नहीं था पर पुरे सीने, पेट पैरो पर ये नीले निशान थे, ये एक और अजीब बात थी .

मैंने रजाई ओढ़ी और आँखे बंद कर ली, दिमाग में शकुन्तला की कही बाते घूम रही थी ,मेरा उस सर्प से क्या रिश्ता था , और सबसे बड़ी बात शकुन्तला समझ गयी थी की मैं उसकी चूत लेना चाहता था , मेरे परिवार के इतिहास में कुछ तो ऐसे राज़ दफन थे , जिन पर समय की धुल जम चुकी थी मुझे कुछ भी करके उस धुल को साफ़ करना था .

जो भी था या नहीं था , फिलहाल इतना जरुर था की मैंने एक सपना देखा था , उस सपने में एक खेत था सरसों का लहलहाता और आंचल लहराती रूपा , मैं खेत के डोले पर बैठे उसे देख रहा था , पीली सरसों में नीला सूट पहने रूपा बाहें फैलाये मुझे अपनी तरफ बुला रही थी , मैं बस रूपा के साथ जीना चाहता था . मेरे अकेलेपन को अगर कोई भर सकती थी वो थी रूपा.

और किस्मत देखो , मैं भी जूनागढ़ जा रहा था जहाँ वो भी गयी हुई थी . रूपा का ख्याल आते ही होंठो पर एक ऐसी मुस्कान आ गयी जिसे बस आशिक लोग ही समझ सकते है . मैं उठा और खिड़की खोली, बिजली आ रही थी, डेक चलाया और गाने लगा दिए. दिल न जाने क्यों झूम रहा था .

शाम को मैं सरोज काकी के घर गया तो सबसे पहले वो चाय ले आई.

सरोज- पुरे दिन सेआये नहीं खाना भी नहीं खाया.

मैं- भूख -प्यास अब लगती नहीं मुझे

काकी- वो क्यों भला.

मैं- क्या मालूम

काकी- तो किस चीज की चाह है

मैं- मालूम नहीं , दिल ही जाने

काकी- अच्छा तो बात दिलो तक पहुँच गयी , मुझे बताओ कौन है वो , मैं करती हु तुम्हारे चाचा से बात , मैं भी थक जाती हु घर के कामो में कोई आएगी तो मेरा हाथ भी हल्का रहेगा.

मैं- बड़ी दूर तक पहुंच गयी काकी, ऐसा भी कुछ नहीं है वो तो मैं बस यु ही फिरकी ले रहा था .

काकी- मुझसे झूठ नहीं बोल पाओगे, ये जो चेहरे पर गुलाबी रंगत आई है समझती हु मैं .

मैंने चाय का कप निचे रखा और सरोज के पास जाकर बोला- इस रंगत का कारण तुम हो . जब से तुम्हे देखा है , तुम्हे पाया है एक नयी दुनिया देखि है,

मैंने सरोज की चूची पर हाथ रखा और उसे दबाने लगा.

सरोज- अभी नहीं , करतार बस दूकान तक गया है आता ही होगा. जल्दी ही करती हु तुम्हारे लिए कुछ .

मैं- ठीक है .

सरोज- क्या ख़ाक ठीक है , घर पर रहोगे जब कुछ होगा न, मै देना भी चाहू तो तुम रहते ही नहीं , पहले तो केवल रातो में गुम रहते थे अब दिन में भी गायब . क्या करू मैं तुम्हारा.

मैं- कभी कभी बस हो जाता है .

काकी- खैर, तुम कल दरजी के पास हो आओ, शादी के लिए नए कपडे सिलवा लो

मैं- मैं नहीं जा रहा शादी में

काकी- क्यों देव, ये अच्छा मौका है परिवार से जुड़ने का .

मैं- दरअसल मुझे कही और जाना है और समय पर लौट आया तो पक्का जाऊंगा.

काकी- कहाँ जाना है तुम्हे

मैं- बस यही शहर में

काकी- मुझे बताओ पूरी बात

मैं- कालेज में एक दोस्त बना है बस उसके साथ ही थोडा घुमने जा रहा हु मैं

काकी- जो करना है वो करना ही है तुम्हे , मेरी फ़िक्र क्या मायने रखती है तुम्हारे लिए ,

मैं- इसीलिए तो कह रहा हूँ बस दो चार रोज में आ जाऊंगा वापिस.

काकी- मैं जाने से नहीं रोक रही बस ये पूछ रही हूँ की जा कहाँ रहे हो .

मैं- बताया न दोस्त के साथ उसके गाँव वाले घर पर .

काकी- तुम लाख झूठ बोल लो पर जितना मैं तुम्हे जानती हूँ तुम्हारे हर झूठ को पकड़ ही लुंगी

मैं- सो तो है मेरी सरकार , पर मैं तुमसे कुछ पूछना चाहता हूँ

काकी- बेशक

मैं- क्या कोई सांप मुझे यहाँ छोड़ कर गया था बचपन में

मेरी बात सुनकर सरोज के चेहरे के भाव बदल गए .

“किसने कहा तुमसे ऐसा ” सरोज काकी गुस्से से बोली

मैं- किसी ने नहीं बस मुझे मालूम हो गया .

“मैं जानती हूँ कौन लगा रही है ये आग, जरुर ये लाला की रांड ने तुम्हे कहा होगा. उसके सिवा कोई नहीं करेगा ऐसा, उस हरामजादी की चोटी उखाड़ दूंगी मैं तू देखना ” सरोज का पारा आसमान पर चढ़ गया था .

मैं- तो ये सच बात है .

काकी- देव मेरे बच्चे, तू समझने की कोशिश कर दुनिया वैसी नहीं है जैसी तुम समझते हो . , तू वादा कर उस रांड से दूर रहेगा, उसकी किसी भी बात पर विश्वास नहीं करेगा.

मैं- आप कहती हो तो नहीं करूँगा, पर शकुन्तला ने सच ही तो कहा .

काकी- कुछ नहीं पता उस चूतिया की बच्ची को . वो सांप बस इत्तेफाक से वहां पर था जब तुम्हारे दादा को तुम मिले थे .

मैं- और दादा को भी उसी ने मारा था .

काकी- हे भगबान क्या क्या सुन आये हो तुम

मैं- अभी तो तुमसे ही सुनना चाहता हूँ

काकी- तुम्हारे दादा को तुम कभी पसंद नहीं थे,वो तुम्हे तुम्हारे पिता का हत्यारा मानते थे .......

काकी के शब्दों ने बहुत गहरी चोट की थी मुझ पर

“मुझे, मुझे तो याद भी नहीं की मेरे माता-पिता कौन थे , कैसे दीखते थे फिर मैं कैसे ” मैंने कहा

काकी- मैं कहाँ ऐसा कह रही हूँ बस तुम्हारे दादा की सोच थी ये . क्योंकि तुम्हारे जन्म के कुछ महीनो बाद ही उनकी हत्या हो गयी थी , और आज तक कातिल का कोई पता नहीं मिला.

“क्या मेरी माँ जूनागढ़ की थी ” मैंने पूछा ......
 
#24

“अब कोई फर्क नहीं पड़ता है की सुहासिनी कहाँ की थी , अब वो नहीं है न ” सरोज काकी ने कहा

मैं- फर्क पड़ता है बहुत फर्क पड़ता है मैं अपनी माँ के बारे में जानना चाहता हूँ , कभी उसे देख तो नहीं पाया पर उसकी यादो को महूसस करना चाहता हु

“यादे तुम्हे कुछ नहीं देंगी सिवाय दर्द के , रुसवाई के सुहासिनी कभी नहीं चाहती की तुम्हे अतीत मालूम हो ” सरोज ने कहा

मैं- ऐसा क्या था अतीत में , जिसने मेरे आज को बदल दिया .

सरोज- मैं नहीं जानती , क्योंकि वो दोनों गाँव छोड़कर चले गए थे , फिर कभी नहीं लौटे, अगर कुछ लौटा तो वो तुम थे , उनकी एकमात्र निशानी , वो तुम थे जिसे अभिशप्त समझा जाता है , वो तुम थे जिसे सबने ठुकरा दिया .

सरोज की बातो ने मेरे दिल को और दुखा दिया पर वो भी वही सब बोल रही थी जो श्याद हुआ होगा.

“तो मैं जाऊ अपने दोस्त के साथ घुमने , दो चार रोज में लौट आऊंगा ” मैंने फिर से कहा

सरोज- ठीक है , पर ऐसा वैसा कुछ न करना जिससे तुम्हे परेशानी हो

मैंने हाँ में सर हिला दिया और वापिस आ गया . मैंने कुछ जोड़ी कपड़े बैग में रख लिए, रूपये रखे और किसी चीज की मुझे जरुरत नहीं थी . बस इंतज़ार था सुबह का जब मन जूनागढ़ जाने वाला था . पूरी रात मैं खूब सोया बाबा के पास भी नहीं गया , सुबह सुबह ही मैं वहां पहुँच गया जहाँ मोना गाड़ी भेजने वाली थी , ठण्ड की सुबह पूरी धुंध से भरी थी और तेज चलती हवा, मौसम श्याद आज फिर बिगड़ने वाला था .

वैसे तो जूनागढ़ की दुरी कोई पंद्रह-बीस कोस ही रही होगी पर फिर भी समय लग गया .

जब मैं वहां पहुंचा तो दिन का उजाला ठीक ठाक हो गया था , बड़ा ही सुन्दर गाँव था , सड़क के दोनों तरफ खेत, फिर कुछ इलाका जंगल जैसा और फिर गाँव, जो बड़े पहाड़ो से घिरा था , मैंने देखा गाँव में ज्यादातर मकान अभी भी पुराने ज़माने के थे , बेशक खेतो में किसी जमींदार ने नयी कोठिया बना ली थी पर फिर अंचल ग्रामीण ही था .

गाँव थोडा सा ही शुरू हुआ था की ड्राईवर ने गाड़ी कच्ची सडक पर ले ली .

मैं- गाँव तो उस तरफ रह गया .

ड्राईवर- साहब, इसी तरफ रहती है ,

कच्चे रस्ते पर दोनों तरफ बड़े पेड़ थे, छायादार इलाका था वो , करीब बीस मिनट बाद मैं एक किले जैसी ईमारत के सामने था , पहली नजर में ही मालूम होता था की किसी ज़माने में बड़ी भव्य रही होगी ये इमारत.

“स्वागत है तुम्हारा देव ” मोना ने मुझसे कहा

मैंने सर हिला कर उसका अभिवादन किया , मोना ने साडी पहनी हुई थी बड़ी दिलकश लग रही थी वो , उसकी तारीफ किये बिना रहा नहीं गया मुझसे

“हुजुर, एक तो ये मौसम बेईमान और एक आप , समझ नहीं आता दो दो बिजलिया कैसे कोई बर्दाश्त करे ” मैंने कहा

मोना- तुम भी न , आओ अन्दर चले.

मैंने नौकर से हटने को कहा और मोना की चेयर को धकाते हुए अन्दर आ गया .

“बड़ी अमीर हो तुम ” मैंने साज सज्जा देखते हुए कहा

मोना- अरे कुछ नहीं , बस पुरखो का मकान है

मैं मुस्कुरा दिया . जल्दी ही खाना आ गया .

“मैंने भी सुबह से कुछ नहीं खाया , तुम्हारा ही इंतज़ार था ” कहा उसने .

मैं- शुक्रिया

बेहद लजीज खाने के बाद मैं और मोना बाते करने लगे.

मोना- मुझे उम्मीद है तुम्हे अच्छा लगेगा यहाँ , तुम साथ हो तो मुझे भी अकेलापन नहीं लगेगा.

मैं- गाँव खूबसूरत है देखना चाहूँगा मैं

मोना- क्यों नहीं , शाम को चलते है , मेरा पैर ठीक होता तो और बेहतर होता.

मैं- कोई नहीं मैं हूँ न सँभालने के लिए .

मोना हंस पड़ी .

मैं- तो तुम बड़े घराने से ताल्लुक रखती हो

मोना-अब तुम्हे तो पता है ही .

मैं- बाकि परिवार कहाँ रहता है,

मोना- गाँव वाले नए घर में, एक घर शहर में भी है पर कही भी रहे मुझे क्या लेना देना , मैं तो अलग हु उनसे

मैं- समझता हु .

हम बाते कर ही रहे थे की नौकरानी मोना की दवाई और पैर में लगाने को कोई मलहम ले आई.

मैंने उस से वो सामान लिया और उसे जाने को कहा

मैंने मोना को दवाई दी . और मलहम हाथ में लिया .

मैं- मैं लगा देता हु

मोना- अरे नहीं तुम मेहमान हो हमारे

मैं- मैं सिर्फ दोस्त हूँ और अपने दोस्त के लिए इतना तो करने का हक़ है ही मुझे

मोना ने मुझे बिस्तर पर लेटाने को कहा .

मैं- पैर में तो ये प्लास्टर है मलहम किधर लगाना है फिर

मोना- बुद्धू ही हो तुम , कमर पर और पीठ पर

मैंने मोना को एडजस्ट किया और उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना ने अपना ब्लाउज खोल दिया मेरे सामने वो बस गुलाबी ब्रा में थी . पर मैंने ध्यान नहीं दिया. मैं बस उसकी पीठ पर मलहम लगाने लगा. मोना का मादक, मुलायम बदन मेरी कठोर उंगलियों की तान पर नाचने लगा.

“आराम मिल रहा है ” पूछा मैंने

मोना- बहुत बेहतर.

कुछ देर बाद मैं उसकी कमर को मसलने लगा. मोना औंधी सी हुई पड़ी थी तो मैंने उसके कुल्हो में होती थिरकन को साफ़ महसूस किया . दिन बड़ी जल्दी बीत गया शाम को हम दोनों गाँव की सैर के लिए निकल पड़े.

वो मुझे गाँव के बाजार ले गयी .

“बर्फिया बड़ी मशुर है यहाँ की ” मोना ने बताया मुझे तो बाबा की बात याद आई .

मैं- मीरा की दूकान पर ले चलो मुझे .

मोना ने हैरानी से देखा मुझे और बोली- मीरा ने बरसो से मिठाई नहीं बनाई है .

मैं- मैंने सुना की मीरा की बर्फिया बड़ी स्वाद है , मिठाई न सही मिल तो सकते है .

मोना- क्यों नहीं

जल्दी ही हम एक पुराणी की झोपडी के सामने थे , आँगन में एक बुढिया बैठी थी .

मोना- यही है मीरा

मैंने देखा मीरा को ७५-८० साल कु बुजुर्ग औरत थी , मैं उसके पास गया

“रामराम माई ”

मीरा ने मेरा अभिवादन स्वीकार किया

मैं- माई बर्फी चाहिए

मीरा- दूकान बंद किये जमाना हुआ बेटा बाजार जा यहाँ कुछ नहीं

मैं- बड़ी तारीफ सुनी है आपकी बनाई बर्फी की

मीरा- मैंने कहा न बाजार जा

मैं- सुहासिनी को तो कभी बाजार नहीं भेजा , उसके लिए तो बहुत चाव से बर्फिया बनाती थी माई तुम

मेरी बात सुनकर मीरा चौंक गयी . और मोना भी

मीरा- तू कैसे जाने है उसे .

मैं- ........................
 
#25

“किसने भेजा है तुझे मेरे पास ” मीरा ने सवाल किया

मैं- कौन भेजेगा मुझे मैं तो मुसाफिर हूँ बस इस ओर आ निकला , किसी ने बताया तो आपके यहाँ आ पहुंचा

मीरा- वापिस ले जा मोना इसे ,

मैं-बेशक लौट जाऊंगा , मेरे बाबा कहते है की पुरे जूनागढ़ में आप से बढ़कर कोई नहीं

मैंने उसे मजार वाले बाबा के बारे में बताया , यक़ीनन मीरा उसे जानती थी .

“सुन लड़के, उसकी बातो का कम ही विश्वास करना वो न जाने क्या क्या बडबडाता रहता है ” मीरा ने कहा

मैं- सुहासिनी का तो विश्वास कर सकता हूँ न मैं

मीरा- वो चली गयी , छोड़ गयी हमें , तू भी लौट जा

मोना ने मुझे इशारा किया तो हम वापिस हो लिए.

“सुहासिनी को कैसे जानते हो तुम ” मोना ने पूछा

मैं- हमारे गाँव में ब्याही थी वो तो जिक्र सुना उनका

मोना- आओ तुम्हे कुछ ऐसा दिखाती हूँ जो तुमने पहले कभी नहीं देखा होगा. पर उस से पहले कुछ खा लेते है बाजार में

हमने हल्का सा नाशता किया गाँव के बाजार में फिर मोना मुझे जंगल की तरफ ले आई, जैसे जैसे वो बताती रही मैं गाड़ी घुमाता रहा , हम जंगल में काफी अन्दर तक आ गए थे, फिर एक जगह उसने मुझे रुकने का इशारा किया .हम गाड़ी से उतरे

चूँकि सर्दियों का समय था शाम ढलने लगी थी कुछ हम पेड़ो में थे तो अँधेरा लगने लगा था .

“ये जगह बड़ी खास है देव, ”

मैंने देखा वहां पर कुछ भी खास नहीं था पहली नजर में तो बिलकुल नहीं , पर जल्दी ही मैं मोना का मतलब समझ गया . किसी ज़माने में ये कोई बगीचा रहा होगा पर अभी बस ये सूख गया था , पुरे जंगल में हरियाली थी बस यही नहीं थी , हमसे कुछ दूर एक छोटी सी पानी की खेली थी जो खाली पड़ी थी .

“कहते है किसी ज़माने में इस से खूबसूरत बगीचा कही नहीं था , ”

मैं- पर ये ऐसा कैसे हुआ

मोना- इसके बारे में एक कहानी है , कहते है की करीब १८-१९ साल पहले यहाँ पर कुछ ऐसा हुआ था की फिर ये जमीन बंजर हो गयी , ये खेली सूख गयी , मैंने बहुत कोशिश की पर फिर कभी इसमें पानी नहीं आया.

मैं- क्या हुआ था

मोना- ठीक से तो कोई नहीं जानता बस सुनी सुनाई बाते है की एक बाढ़ आई थी खून की बाढ़

मेरे लिए ये बड़ी हैरान करने वाली बात थी .

“ये दुनिया बस ऐसी ही नहीं है देव जो हम जी रहे है इसके परे भी कुछ ऐसा है जो हैं भी और नहीं भी, सबकुछ सामने होते हुए भी ओझल है ” मोना ने कहा

मैं- समझा नहीं

मोना- मैं भी कहा समझी .

मैंने मोना का हाथ पकड़ा , ठण्ड में उसका गर्म स्पर्श बड़ा सकून भरा लगा.

मैं- हम दोनों कोशिश करे तो समझ सकते है

मोना- क्या तुम समाज की बनाई लकीर को मानते हो

मैं- नहीं, मुझे क्या लेना देना समाज से , खासकर उस समाज से जिसने मुझे कभी अपनाया नहीं ,तुम नहीं जानती , मैं कैसे जिया हूँ , अकेलेपन के साथ नजाने कितनी राते मैंने बस बेख्याली में, तो कभी रोते हुए गुज़ार दी .

मोना- हम दोनों की कहानी भी एक सी ही है , मुझे देखो परिवार होते हुए भी अकेली हूँ , दरअसल हम दोनों ही मुसाफिर है .

मैं- सो तो है पर तुमने घर क्यों छोड़ा

मोना- बस सतनाम मुडकी की बेटी होने की सजा है , मेरे बाप के बारे में तो तुम्हे मालूम होगा ही .

मैं - बस इतना ही की वो बड़े नेता है

मोना- खैर जाने दो , हम अपनी बात करते है , ठण्ड बढ़ने लगी है घर चले

मैं- थोड़ी देर और बैठना चाहता हूँ

मोना- जब तुम्हे देखती हूँ तो लगता है की कोई तो है अपना इस जहाँ में

मैं- मुसाफिर को पनाह देना ठीक नहीं

मोना- पर उसके सफ़र का हिस्सा होना तो ठीक है न .

“रहे अलग है , मंजिले अलग है तुम आसमान हो मैं धरती , तुम्हारा एक मकाम है मैं आवारा ”

मोना- फिर भी हम दोस्त है , हैं न

मैं- हमेशा

मोना- वापिस चले, कल शादी में भी चलना है

मैं- हाँ

मैंने मोना को गाड़ी में बिठाया और हम वापिस उसकी हवेली की तरफ चल पड़े. अँधेरा खूब हो चूका था , मैंने गाड़ी की लाइट चालू कर दी . मोना ने अपना हाथ मेरे हाथ पर रख दिया . मैं मुस्कुराया

मोना- ये ठण्ड का मौसम भी न अपने आप में अजीब है इसमें मिलन है जुदाई है

मैं- क्या फर्क पड़ता है हर मौसम की तरह ये भी बीत जाता है .

बाते करते करते हम लोग मोना वापिस आये, थोड़ी देर में ही खाना लग गया . मैं थोडा थका हुआ था तो सीधा बिस्तर में घुस गया . फिर जब पानी पीने को मेरी आँख खुली तो मैंने पाया की मेरी खिड़की खुली है , मैं उसे बंद कर ही रहा था की मैंने देखा सामने सड़क पर एक काला साया था लालटेन लिए जो मेरी तरफ देख रहा था .

मुझे बड़ा अजीब सा लगा. मैं छज्जे पर आया . वो साया अभी भी उस तरफ ही था . उसने मुझे देख लिया था , लालटेन हिला कर उसने मुझे निचे आने का इशारा किया .एक अजनबी साया पराये गाँव में मुझे बुला रहा था वो भी रात को .

क्या मेरा जाना ठीक रहेगा , ये गाँव मुझे उलझा हुआ तो लग रहा था पर अब यकीं सा हो रहा था , तीसरी बार जब इशारा हुआ तो मैं अन्दर आया, अपनी जैकेट पहनी और निचे चल दिया.

“जी हुकुम, किसी चीज की जरुरत थी , ” दरवाजे पर बैठे गार्ड ने पूछा मुझसे

मैं- नहीं , दरवाजा खोलो मुझे बाहर जाना है

गार्ड - इतनी रात को , मेरा मतलब है की रात को सुरक्षित नहीं है बाहर जाना

मैं- मेरी तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही , थोडा घूम लूँगा तो बेहतर महसूस करूँगा.

गार्ड- मैं साथ चलू हुकुम

मैं- अरे नहीं, बस मैं सामने सड़क पर ही दो चार चक्कर लगा कर आता हूँ

मैं हवेली से बाहर आया, और जहाँ वो साया खड़ा था उधर गया . अब सड़क पर पूरी तरह अँधेरा था , लालटेन शायद बुझा दी गयी थी,

“कहाँ हो तुम ” मैंने आवाज दी .

“बायीं तरफ चलो , चलते रहो ” जवाब आया .
 
#26

मैं सड़क से बायीं तरफ उतर गया , घुप्प अँधेरे में बस मैं चलता रहा , सर्द हवा मेरी जैकेट को चीर कर मेरे सीने पर दस्तक देना चाहती थी , ऐसा लग रहा था की चलते चलते बहुत देर हो गयी .

“बस यही ” आवाज आई

मैंने मुड कर देखा साए ने लालटेन जला ली थी मद्धम लौ में मैंने देखा वो और कोई नहीं मीरा थी

“माई तुम ” मैंने कहा

मीरा- हाँ मेरे बच्चे मैं ही हूँ

मैं- पर यहाँ इस तरह क्यों बुलाया

“बताती हूँ पर पहले जरा जी भर कर देख लेने दे , मेरी सुहासिनी का वारिस कितना बड़ा हो गया है , मुझे मालूम था तू जरुर आएगा सुलतान ने मुझे बता दिया था पर वो मुडकी की छोरी के सामने मैं तुझसे खुलकर बात नहीं कर सकती थी , इसलिए तुझे यहाँ बुलाया . ” मीरा ने कहा

मैं- मोना मेरे विश्वास की है

मीरा- तू नहीं जानता बेटा इन जालिमो को , मुझे तो हैरत बड़ी थी खैर जाने दे, ख़ुशी इस बात की है तू आ गया .

मीरा ने एक पोटली मेरी तरफ करी.

मैं- क्या है इसमें

मीरा- तोहफा मेरी तरफ से .

मैंने पोटली खोली , बर्फिया ही बर्फिया थी .

मीरा- तेरी माँ को बड़ी पसंद थी , अक्सर आती थी मेरे पास. बड़ा मानती थी वो मुझे

मैं- मुझे बताओ उनके बारे में .

मीरा- मैं क्या बताऊ बेटा गाँव के चप्पे चप्पे पर उसके निशान है वो नहीं है पर फिर भी वो है हमारी यादो में , उसके जैसी सरल, दयावान कोई नहीं हुई, उसके दर से कभी कोई खाली नहीं लौटा.

“उनकी मौत कैसे हुई ” मैंने पूछा

मीरा- ये राज़ भी उसके साथ ही चला गया , न जाने उस रात क्या हुआ था कोई नहीं जानता बस इतना मालूम है की दो लाशे मिली थी और खून की बाढ़ ,

मैं- किसकी दुश्मनी थी मेरी माँ के साथ

मीरा- किसी की नहीं, कोई सोच भी नहीं सकता था उस फूल से नफ्रत करने के बारे में .

मीरा ने अपनी कमीज की जेब से कुछ निकाला और मेरे हाथ में रख दिया .

“तुम्हारी अमानत , ये कंगन डोरा तेरी माँ छोड़ गयी थी मेरे पास, कह गयी थी की एक दिन तुम आओगे तब दू ”

मैंने उस धागे को देखा , बस एक पतला सा काला धागा था . मैंने से रख लिया.

“मेरे बच्चे ये गाँव तुम्हारे लिए ठीक नहीं है , तुम सुबह होते ही चले जाना यहाँ से और वापिस मत आना , उस मुडकी की छोरी का साथ न करना ” मीरा ने कहा और वापिस मुड गयी .

मैं- माई , मेरे सवाल अभी खत्म नहीं हुए

मीरा- जवाब तुझे तेरी तक़दीर देगी , तलाश ले उसे

लालटेन के बुझते ही घुप्प अँधेरा हो गया . काला आसमान जैसे मुझे लील जाना चाहता था . मैंने पोटली को संभाला और वापिस हवेली की तरफ चल पड़ा मैंने देखा गार्ड सड़क पर ही खड़ा था मुझे देख कर उसकी साँस में साँस आई .

“सब ठीक ” मैंने पूछा

गार्ड - मेमसाब इंतज़ार कर रही है

मैं-तुमने बता दिया उनको , मैंने कहा था न बस थोड़ी देर में आ जाऊंगा

गार्ड- बात वो नहीं है आप अन्दर चलिए

मैं सीधा अन्दर आया तो देखा की मोना सर पर हाथ रखे बैठी थी .

मैं- क्या हुआ

मोना- देव कहाँ थे मुझे फ़िक्र हो गयी थी तुम्हारी

मैं- बस यही बाहर था क्या बात हुई .

मोना- किसी ने मुझ पर हमला करने की कोशिश की

मोना की बात ने मुझ पर जैसे बम गिरा दिया . “”

“”क्या , किसने , सुरक्षा के बाद भी “

मोना- आओ मेरे साथ

मैं मोना के साथ उसके कमरे में आया , देखा की दीवारों पर लाल लगा था कुछ , बिस्तर पर चाकू पड़ा था .

मैं- कौन था वो ,

मोना- नहीं जानती कौन दुश्मन हुआ पड़ा है पहले तुम्हारे गाँव में और अब यहाँ

मैं- कोई घाव तो नहीं तुम्हे, मेरा मतलब ठीक हो न

मोना- हाँ , बस कलाई में दर्द है थोडा .

मैं- हवेली की दीवारे ऊँची है बिना दरवाजा खुले कोई अन्दर नहीं आ सकता, एक मिनट शयद जब मैं बाहर गया अँधेरे का फायदा उठा कर तभी कोई अन्दर घुसा होगा. मेरी ही गलती है तुम्हे कुछ हो जाता तो .

मोना- तुम गए कहा थे .

मैंने उसे बात बताई

“अजीब है मीरा का ऐसे आना, मिलना था तो हवेली में आ सकती थी उसे कौन रोकता ” मोना ने कहा

मैं- मुझे भी संदेह सा लगा उसके व्यवहार पर , पर मेरी पहली प्राथमिकता तुम्हारी सुरक्षा है , तुम बेफिक्र रहो , आराम करो मैं अब जागा रहूँगा .

मैंने नौकर से बिस्तर सही करने को कहा और खुद के लिए एक चाय मंगवाई.

मोना- चलो कोई तो है जिसे फ़िक्र है मेरी

मैं- तुम्हारे सिवा कौन है मेरा, मेरी दोस्त नहीं हो परिवार का एक हिस्सा हो तुम

मोना- तभी तो फ़िक्र नहीं मुझे तुम जो साथ हो .

मैंने मोना को बिस्तर पर लिटाया और पास वाली कुर्सी पर बैठ गया . चाय के साथ मैंने बर्फी भी ले ली

“बात तो है इनमे ” मैंने कहा

मोना- खुशनसीब हो , एक जमाना था जब दूकान पर कतार लगा करती थी . पर अब सब बदल गया .

मैं- किस कारण से .

मोना- मेरे काम की वजह से और दुश्मन तो अब है ही .

मैं- जब तक मैं हूँ कोई छू भी नहीं पायेगा तुम्हे

मैंने चाय का एक घूँट और लिया , मोना सोने की कोशिश करने लगी. चुसकिया लेते हुए मैं सोच रहा था की जिन्दगी ने जो शतरंज की बिसात बिछाई है उस पर मोहरे कैसे चल रहे है , पर कोई न कोई तो डोर थी जो मुझे मोना से जोड़ रही थी ..

सुबह मोना मुझे एक ऐसी जगह लेकर आई जो होगी मैंने कभी सोचा नहीं था , पहाड़ो की तली में उस से खूबसूरत नजारा हो ही नही सकता था . ठण्ड की धुप ने उसकी खूबसूरती और बढ़ा दी थी .

“खूबसूरत , इस से खूबसूरत अगर कुछ है तो बस तुम ” मैंने कहा

मोना- सो तो है . जरा हाथ देना

मैंने हाथ दिया मोना ने चेयर छोड़ दी मैंने उसे थाम लिया अपनी बाँहों में .

“एक तरफ ये समां एक तरफ बाँहों में हुस्न ” मैंने कहा

मोना हौले से मेरे सीने लग गयी , वो मेरे करीब थी उसने बोला कुछ नहीं बस अपने होंठ मेरे होंठो से जोड़ दिए.

ठण्ड के मौसम में जैसे आग लग गयी थी , मैंने अपनी पकड़ उसकी कमर पर और मजबूत कर दी, ओस मोना के होंठो पर गिरने लगी. हम दोनों जैसे उस चुम्बन में डूब गए थे की ....................
 
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