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Adultery गुजारिश

#27

“शर्म तो बेच ही दी थी तूने अब यार भी बदलने लगी है , बेशर्म रांड कमसेकम इस पवित्र जगह पर तो अपना गंद मत फैला. और इतनी ही आग लगी है तो गाँव में गबरू बहुत है उनके निचे ही लेट जा , और इसे देख अबकी बार तो नया लौंडा पाला है तूने, ये तो तेरे झांटो तक भी नहीं पहुंच पायेगा. ”

उस उपहास भरी आवाज सुनकर हम दोनों अलग हो गए , मैंने देखा वो दो आदमी थे, जिसने मोना को ये असभ्य बाते कही थी वो शरीर में ठीक था , ऊँचा कद, सर पर केसरी पग बांधे .

“जुबान को लगाम दे, वर्ना खींच ली जाएगी ” मैंने उस से कहा

“नहीं देव, ” मोना ने मेरा हाथ पकड़ लिया .

“सही कह रही है ये रांड , लौंडे तेरी औकात नहीं जा भाग यहाँ से कहीं और जा, मेरा मूड आज अच्छा है वर्ना अब तक तो धरती पर गिरा होता तू, ”

मैं- जाना तो तुझे है , मोना से माफ़ी मांग ले , वर्ना तेरे अच्छे दिन को मैं ऐसा बुरा बना दूंगा की तू सोच कर कांप जायेगा

“देव, बात को आगे मत बढाओ , हम चलते है यहाँ से ” मोना ने कहा

मैं- बेशक हम चलेंगे पर पहले मैं इसे जरा तमीज सिखा दूँ

“मानना पड़ेगा तेरी हिम्मत को लौंडे, जब्बर के सामने बड़े बड़े मूत देते है और तू टकराने की सोच रहा है , ये तो शुक्र है की ये सतनाम बाउजी की लौंडिया है वर्ना कभी का इसे चोद देता मैं . ”

सटक , इसके आगे जब्बर कुछ नहीं बोल पाया , मैंने आगे बढ़ कर उसके चेहरे पर थप्पड़ जड़ दिया था . मैंने उसका कालर पकड़ लिया

“मैंने कहा था न , तेरी जुबान खींच लूँगा. तू होगा कुछ भी पर मोना के साथ मैं हूँ तेरी तो औकात ही क्या तेरा पूरा गाँव भी आ जाये तो इसका कुछ नहीं कर पायेगा. ” मैंने एक लात जब्बर के घुटने पर मारी और वो तिलमिला गया .

उसके साथ वाला आदमी भी भिड़ने लगा मुझे, पर मुझे भी गुस्सा चढ़ आया था .मामला गरम हो गया था , मेरी और जब्बर की हाथापाई बढ़ ही गयी थी की तभी वहां पर एक जीप आकर रुकी उसमे से कुछ आदमी उतरे और हम दोनों को अलग अलग किया .

“छोड़ मुझे इसका मैं क़त्ल कर दूंगा ” जब्बर ने गुस्से से कहा

मैं- आ साले , आ तो सही यही इसी जगह गाड दूंगा तुझे .

“शांत, दोनों शांत ” एक गहरी आवाज गूंजी . मैंने देखा गाड़ी से एक बुजुर्ग उतर कर हमारी तरफ आ रहा था .

उस आदमी ने एक नजर मुझ पर और मोना पर डाली और फिर जब्बर की तरफ चल दिया .

“कितनी बार कहा है , हर जगह मत उलझा कर अभी अभी जेल से आया है ऐश कर , सारी उम्र पड़ी है न ये सब करने की चल घर जा ” उसने कहा

जब्बर उसके कहते ही चल पड़ा , कुछ दूर जाकर रुका और मुझे देख कर बोला- तेरे दिन पुरे हो गए , तू कहीं भी जाकर छुप जा , तू मुझे देख ले तेरी मौत हु मैं

“दिनों की किसने गिनती की है , तू मर्द है तो आ अभी , इसी जगह , भागता क्यों है साले, देख लेते है कौन किसका क्या करता है , ” मैंने जवाब दिया .

वो बुजुर्ग मेरे पास आया मेरी आँखों में देखते हुए बोला- खून बहुत गर्म है तेरा, खून बड़ा कीमती होता है संभाल कर रख लौंडे, कही ऐसा न हो ऐसी कीमती चीज नालियों में बह कर बर्बाद हो जाये.

“ऐसे खून को बर्बाद हो जाना चाहिए जो एक नारी के सम्मान की रक्षा न कर सके, तेरा ये जब्बर मोना को कुछ कुछ कह रहा था , और मेरे सामने कोई मोना से ऐसा व्यवहार करे ये मैं बर्दाश्त नहीं करूँगा . ये जब्बर होगा कोई भी पर जो बात इसने कही है , माफ़ी लायक नहीं है ये ” मैंने कहा

जब्बर- बाउजी, ये इस लौंडे के साथ गंद फैला रही थी यहाँ , मैं बस इन्हें रोक रहा था ये नंगापन करने से

“ले जा छोरी इस लड़के को यहाँ से ” उस बुजुर्ग ने जैसे आदेश दिया .

मोना ने मेरा हाथ पकड़ लिया बोली- चलो यहाँ से , मेरे लिए

फिर आगे मैंने कुछ नहीं कहा , हम दोनों वापिस उसकी हवेली आ गए. मुझे गुस्सा बहुत था

“सब मेरी गलती है देव, ”मोना बोली

मैं- नहीं , गलती तो उस नीच की है

मोना- तुम्हे इन सब में नहीं पड़ना चाहिए

मैं-और मेरे सामने कोई तुमसे ऐसे बोल जाये .

मोना- जब्बर को मैंने ही सजा सुनाई थी ,

मैं- तो क्या .

मोना -जब्बर मेरे बाप का आदमी है वो बुजुर्ग जो वहां था कोई और नहीं मेरा बाप था , सतनाम मुडकी .

मोना की बात सुनकर मुझे कोई खास फर्क नहीं पड़ा.

मैं- फिर भी तेरे बाप ने उसका ही पक्ष लिया .

मोना- बेटियों का पक्ष कौन लेता है , और मेरा बाप इन्सान कहाँ है वो तो एक जीता जागता राक्षस है . उसने मुझे ऐसा घाव दिया है जो मेरे जीते जी तो भर नहीं सकता .

मैं- तुम जज हो , पेल दो इन सबको

मोना- इस शहर में जज होना , न होना बराबर ही है , मेरी औकात बस कोर्ट तक ही सिमित है उसके बाहर राज चलता है मेरे बाप का.

मैं- पर उसने तुम्हे रांड बोला ,

मोना- जब्बर की गन्दी नजर हमेशा ही थी मुझ पर , उसने मेरी सहेली का बलात्कार किया था , मैंने उसे सजा सुनाई थी पर जिस के लिए उसे सजा देना चाहती थी वो केस कभी किसी ठाणे में दर्ज ही नहीं हुआ

मोना की आंखो में आंसू भर आये, न चाहते हुए भी रोने लगी वो .

मैं- क्या हुआ था .

मोना- उसने मेरी जिन्दगी उजाड़ दी,
 
#28

मेरा दिल जोरो से धडकने लगा था , हम दोनों के बीच की जगह ख़ामोशी खड़ी हो गयी थी .

“मेरे पति का हत्यारा है जब्बर ,” मोना के कहे लफ्ज़ इतने तीखे थे की जैसे टूट कर बिखरा कांच .

“मैं कुछ नहीं कर पाई , कुछ भी नहीं कर पायी, ” मोना फूट फूट कर रोने लगी . मैंने उस अपने आगोश में भर लिया . अब कहता भी तो क्या उसे .

“तेज एक्साइज डिपार्टमेंट में था, मेरे बाप के सब काले धंधो का मालूम हो गया था उसे , बस उसी की कीमत चुकी उसने ”

मैं- पर तुम जज हो

मोना- मैंने कहा न मेरी औकात बस कोर्ट तक है , तेज ऐसे गायब हुआ जैसे कभी था ही नहीं , उसके साथ मेरी खुशिया भी ऐसी हो गयी जैसे कभी थी ही नहीं .

मैं- इसलिए ही तुमने घर छोड़ा न

मोना- हाँ ,

मैं- तुम्हे किसी से डरने की जरुरत नहीं मैं तुम्हारे साथ हूँ

मोना- नहीं देव, ये बहुत खतरनाक लोग है जो अपनी बेटी की जिन्दगी तबाह कर सकते है वो तुम्हारे साथ न जाने क्या करेंगे . ये मेरी परेशानी है

मैं- और तुम मेरी हो , मेरा मतलब मेरी दोस्त हो और जब दोस्ती की है तो दोस्त के साथ खड़ा हूँ चाहे जो भी हो .

मैंने मोना के गालो पर एक चुम्बन किया और उस से अलग हो गया . उसकी कहानी भी मेरे सी ही थी सब कुछ होकर भी कुछ भी नहीं था . मैं उठ कर बाहर आ गया , कुछ लम्हों के लिए बस खुद से बात करना चाहता था . मोना के इतर भी मेरी एक दुनिया थी और उस दुनिया में एक नाम था सुहासिनी, जो इसी गाँव की बेटी थी .

कुछ सोच कर मैं हवेली से बाहर निकल गया , दरबान को मैंने सख्त हिदायत दी की मोना से कुछ न कहे, एक बार मैं फिर मीरा के दरवाजे पर था , छप्पर के पास बैठी मीरा चूल्हे पर रोटिया सेक रही थी .

“भूख लगी है माई, दो रोटी मुझे भी मिलेंगी क्या ” मैंने अन्दर आते हुए कहा

मीरा ने मुझे देखा और बोली- गए नहीं तुम वापिस

मैं- बस एक दो रोज में .

मीरा- आ बैठ .

मीरा ने मुझे खाना परोसा, बाजरे की रोटिया, घी में सनी, लाल मिर्च का आचार और लस्सी का मग्गा भुना जीरा डालके. इस से बढ़िया और भला क्या होगा. , बड़े चाव से खाया मैंने .

“मेरी माँ होती तो वो भी ऐसी ही रोटी बनाती ” मैंने कहा

“बेशक, एक रोटी और ले ” मीरा ने मेरी थाली में रोटी रखी

मैं- माई, मेरी माँ का घर देखना चाहता हु मैं, माँ को तो कभी देख नहीं पाया. पर जिस घर में वो थी , जहाँ वो पली थी मैं उस घर की मिटटी को माथे से लगाना चाहता हूँ .

मीरा- ये मुमकिन नहीं

मैं- क्यों .

मीरा- अब कुछ नहीं बचा. सिवाय यादो के , यादे, जो बस दर्द दे सकती है , तू जितना अतीत तलाशेगा उतना दर्द मिलेगा तुझे .

मैं- मेरी माँ को जानती थी आप , न जाने कितनी बाते करती होंगी वो आपसे, मेरे लिए इतना कर दीजिये

मैंने हाथ जोड़ दिए .

मीरा- सुहासिनी की परवाह थी इसलिए कहती हूँ लौट जा यहाँ कुछ नहीं . अतीत को छोड़, आगे का देख, तेरा जो चला गया वो लौट कर तो आ नहीं सकता , सुलतान अक्सर कहता था की देव एक न एक दिन जूनागढ़ जरुर आएगा और मैं हमेशा दुआ करती थी की वो दिन कभी न आये, पर वो हरामजादी तुझे यहाँ ले आई . क्या वो जानती है सुहासिनी तेरी माँ है

मैं- अभी तो नहीं .

मीरा- मेरे बच्चे, मैं तेरे लिए कुछ नहीं कर सकती , शम्भू ही जाने , उसके पास जा , शम्भू सब देख रहा है तेरा भाग भी वो ही लिखेगा. मावस के सोम को जब बिजली राह दिखाए तो रक्त को रक्त पहचाने का , अँधेरे मेह में दो दिए जले तब चौखट खुले ,शम्भू तब पहचाने , तब आशिस दे.

मैं - क्या है ये .

मीरा- तेरी माँ के अंतिम शब्द वो धागा पहने रहना , तेरी हिफाजत करेगा

इसके बाद वो और कुछ न बोली, मैंने अपना खाना ख़त्म किया और वापिस हवेली की तरफ चल दिया. कहने को तो भरा पूरा गाँव था पर कुछ तो था ऐसा जो इन दीवारों, इन गलियारों में छुपा था . वापस मैं कुछ देर से आया तब तक हलकी हलकी शाम ढलने लगी थी .

मैंने पाया मोना मेरा ही इंतज़ार कर रही थी .

“कहाँ गायब थे, मुझे फ़िक्र होने लगी थी ,” मोना ने कहा

मैं- बस ऐसे ही ,

मोना- तैयार हो जाओ शादी में चलना है

मैं- हाँ

थोड़ी देर बाद मैं तैयार होकर आया , मोना भी कुछ देर बाद आ गयी . गहरी नीली साडी में बड़ी जंच रही थी वो . उसके कपडे पहनने की अंदाज से ही मालूम होता था की ऊँचे खानदान की है वो .

“जब तुम ऐसे देखते हो तो सीधा दिल में उतरती है ये नजर ” उसने कहा

मैं- जी करता है की देखता ही रहू, तुम्हे

मोना- मुझे देखने के लिए मुद्दत पड़ी है . पर फिलहाल शादी में चलते है .

मैंने हाँ में सर हिलाया. जल्दी ही गाडी शादी वाले फार्महाउस पर जा रही थी , ये जगह जूनागढ़ को पार करते हुए पहाड़ो से होते हुए थोडा आगे थी. मैंने गाड़ी में नोटिस किया की मोना बार बार कनखियों से मेरी तरफ ही देख रही थी . आपस में चुहल बाज़ी करते हुए करीब आधे घंटे में हम फार्महाउस पर पहुच गए.

अन्दर बड़ा शानदार नजारा था , ऐसी शादी मैंने कभी नहीं देखि थी , न जाने कितने लोग थे , कुछ रस्मे थी , मोना को शायद उसकी कुछ सहेलिया मिल गयी थी , मैंने उसे जाने दिया उसके पास. मैंने एक जूस लिया और अपने लिए एक कुर्सी तलाश ही रहा था की किसी ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा . मैंने मुड कर देखा................
 
#29

मैंने मुड कर देखा . सामने शकुन्तला थी . दरअसल मैं हैरान हुआ उसे यहाँ देख कर

“तुम यहाँ सेठानी ”

सेठानी- क्यों, मैं यहाँ नहीं होसकती

मैं- बिलकुल , वो मैंने सोचा नहीं था की यहाँ तुमसे मुलाकात होगी

सेठानी- ये मुलाकाते भी बड़ी अजीब होती है, न जाने कब कहाँ किस से हो जाये. मैंने भी कहाँ सोचा था की तुमसे यहाँ मिलूंगी, खैर तुम कैसे यहाँ

मैं- दोस्त के साथ आया हूँ,

“आओ बैठते है मैं भी बोर हो रही हूँ, , कुछ लोगे तुम ” शकुन्तला ने पूछा

मैं- नहीं ठीक है . वैसे मैं तुमसे कुछ पुछू

सेठानी- जरुर

मैं- देखो मेरे पास एक सुझाव है , तुम मेरे कुछ सवालो के जवाब दो बदले में मैं तुम्हे वो जमीन दूंगा जिसकी तुम्हे चाहत है , जब तुम कहोगी

शकुन्तला ने बड़ी गहरी नजरो से देखा और बोली- मैं जानती हु, तुम अपने अतीत को शिद्दत से खोजना चाहते हो पर जितना मुझे मालूम है मैं बता चुकी हूँ . बेशक मुझे वो जमीन चाहिए पर अब मैं भी पक्की व्यापारी हूँ सौदा बराबरी का तो करू, और तुम्हारे अतीत की कीमत उस जमीन के टुकड़े से कही ज्यादा है ,

मैं- कोई तो होगा जो मेरी मदद कर सकता है ,

सेठानी- जानते हो गाँव वाले, तुम्हारे अपने घर वाले सब कतराते क्यों है तुमसे.

मैं- तुम बताओ

सेठानी- ये दुनिया तुम्हे एक श्राप समझती है गाँव में रक्त की नदी या तो उस दिन बही थी जब वो सर्प तुम्हे लेकर आया था या फिर अब , पुरे अठरह साल बाद. गाँव वाले एक बार फिर खौफ में है .

मैं- कैसा श्राप , खुल कर बताओ मुझे

शकुन्तला कुछ कहने ही वाली थी की जब्बर हमारी तरफ ही आ रहा था तो वो चुप हो गयी .

“सेठानी, तू यहाँ है बाउजी तुझे बुला रहे है , वो जो लोग आने थे आ गए है ” जब्बर ने कहा

शकुन्तला- छोटे चौधरी, मुझे जाना होगा.

शकुन्तला आगे बढ़ गयी जब्बर ने उसकी गांड को देख कर मेरी तरफ गन्दा सा इशारा किया , जी तो किया इसकी गांड तोड़ दू पर दुसरो के घर तमाशा करना मेरी आदत नहीं थी . कुछ देर बाद मोना मेरे पास आई

“थोड़ी देर लग रही तुम्हे तो पता है की शादियों में कई लोगो से मिलना होता है , खाना मंगा लू ” उसने कहा

मैं- थोड़ी देर में ,

मोना- जानती हूँ मन नहीं लग रहा होगा तुम्हारा यहाँ , किसी को जानते जो नहीं

मैं- किसी को जानना चाहता हूँ , अगर वो चाहे तो

मैंने मोना की आँखों में देखते हुए कहा

“मुझे जानने के लिए पहले तुम्हे खुद को जानना होगा, तुम और मैं एक से ही है एक को जान लिया तो दूजे को भी पहचान लिया. ” उसने कहा

“वैसे इस शानदार माहौल में एक पेग लिया जाये , क्या कहते हो ” मोना ने मुझसे पूछा

मैंने हाँ में सर हिला दिया .

सर्दी की इस कम्प्कम्प्ती रात में जो ये कडवी दावा जिस्म में जा रही थी , अन्दर दारू की गर्मी की बात ही अलग थी .

“तुम्हारे साथ होती हूँ तो बड़ा अच्छा लगता है , जब तुम हाथ थामते हो तो लगता है की इस जहाँ में मेरा कोई अपना है ” मोना ने कहा

मैं- तुम भी तो मेरी अपनी ही हो .

मैं बेशक बाते मोना से कर रहा था पर न जाने मेरी निगाहों को किसकी तलाश थी . बार बार आँखे इधर उधर देख रही थी .

“ऐसा लगता है जैसे तुम्हारी दिलचस्पी मेरे अलावा भी किसी और में है किसे तलाश रही है ये गुस्ताख आँखे ” मोना ने पूछा

“आँखे है कब गुस्ताखी कर जाये, इनकी मर्जी है , मैं तो मुसाफिर हूँ , ये आँखे बस सफ़र देखती है ” मैंने कहा

मोना- मंजिल पास ही है , सोचो जरा, मैं थोड़ी देर में आती हूँ फिर खाना खायेंगे

मोना वापिस से मंडप की तरफ चली गयी . बीच में मुझे एक दो बार शकुन्तला और सतनाम दिखे , वो लोग किसी अलग ही उदेधबुन में थे , जैसे शादी से उन्हें कोई सरोकार ही नहीं था . मुझे भी बैठे बैठे कोफ़्त होने लगी थी ऊपर से दारू का सुरूर , इस सर्द रात में मेरी तन्हाई मुझ पर हावी होने लगी , मुझे किसी अपने की तलाश थी , हसरत थी जिसकी बाँहों में मैं खुद को पा सकू,

मेरा दिल बड़ी तेजी से धडक रहा था , मैं इधर उधर घूम रहा था की मेरे कानो में पायल की आवाज आई, शादी के इस शोर में भी मैंने उस आवाज को बड़ा साफ़ सुना, जैसे ही दूसरी बार वो झंकार मेरे कानो में आई, दिल झूम उठा . होंठो पर एक ही नाम आया . रूपा.

मैंने इधर उधर देखा पर वो न दिखी, भीड़ से बचते हुए मैं मंडप की तरफ जा ही रहा था की मुझे वो दिखी जिसका दीदार करना मेरे लिए किसी इबादत से कम नहीं था . कोई चार पांच लडकियों से घिरी रूपा खिल खिला आर हंस रही थी .

और मैं बस उसे ही देखे जा रहा था बस उसे ही , आसपास अब क्या हो रहा था किसे खबर थी ,मैं कुछ कदम और आगे बढ़ा . दिल तो किया की उसे अपनी बाँहों में भर लू पर ऐसा खुले आम भी तो नहीं कर सकता था , इंतज़ार था बस कब उसकी नजर मुझ पर पड़े. और जल्दी ही वो लम्हा भी आया .

जब चेहरे पर घिरी जुल्फों को बड़े इतराते हुए हटा कर उसने मुझे देखा. हमारी नजरे आपस में मिली. मैंने उसके दिल को अपने सीने में धडकते महसूस किया. उसकी नजरे मुझ पर जम गयी थी , मैं जानता था उसे यकीन नहीं हो रहा था की मैं भी यहाँ पर हूँ . मैं उसकी तरफ बढ़ा पर उसने इशारे से मुझे रोका .

मैं वही रुक गया , उसने पास में रखी ट्रे उठाई और मेरे पास आई .

“पानी ”

मैंने गिलास उठाया .

“रूपा, ” मैंने इतना कहा की उसने टोक दिया .

“अभी कुछ मत कहो , मैं जल्दी ही मिलती हूँ बाट देखना , ”

मैंने वापिस गिलास रखा वो चली गयी . पर मेरा दिल साथ ले गयी . अब किसका दिल लगना था यहाँ किसे परवाह थी .करीब घंटे भर बाद एक लड़का मेरे पास आया और एक पर्ची मेरे हाथ में दे गया . मैंने खोल कर देखा ,, “टेंट के दाई तरफ मिलो ”

मैं जान गया ये रूपा ने भेजा था . मैं उधर से निकल गया . बाहर घुप्प अँधेरा था और तेज हवा चल रही थी . अब मुझे किस तरफ जाना था क्योंकि मेरे पास लालटेन नहीं थी और रूपा भी नहीं दिख रही थी पर मेरे दिलबर की भी अदाए बड़ी थी. मुझे पायल से इशारा कर रही थी वो . झंकार सुनते सुनते मैं शादी की जगह से काफी दूर चला आया था . और फिर मैं एक ऐसी जगह पहुंचा जहा रौशनी थी ,ये एक अजीब सी ईमारत थी जहाँ फर्श और चार खम्बे थे ऊपर कोई छत नहीं थी बीच में अलाव जल रहा था . और अलाव के पार वो खड़ी थी ...........
 
#30

अलाव के पार वो खड़ी थी , खामोश आंच की लौ में उसका चमकता चेहरा . वो आग अलाव में नहीं बल्कि हम दोनों के सीने में जल रही थी , उस सांवले चेहरे में जो कशिश थी मैं बस पिघल जाता था . इस से पहले की वो कुछ भी कहती मैं आगे बढ़ा और अपनी दिलरुबा को आगोश में भर लिया. जैसे बरसो बाद मिली थी वो . मैंने अपने लबो को उन सुर्ख होंठो से जोड़ दिया.

प्यासे को जैसे बंजर में पानी का सोता मिल गया हो. रूपा ने अपने हाथ मेरी पीठ में डाले और जैसे मुझ में समां गयी हो. जब हमारा चुम्बन टुटा तो सांसो में साँस आई .

“एक पल तो मुझे यकीं ही नहीं हुआ तुम यहाँ हो ” हाँफते हुए उसने कहा

मैं- मेरी जान जहाँ है मैं तो वही रहूँगा न .

“मैंने तुमसे कहा था मेरे पीछे न आना , मेरी सुनते ही नहीं हो तुम मुसाफिर ” रूपा ने शिकायती लहजे में कहा

मैं- मुसाफिर का सफ़र उसकी मंजिल तक , अब मैं चाहे किधर भी चलू कदम बस तेरे दर पर ही ले आते है मेरी जान .

“यही मीठी बाते तो मुझे फंसा लेती है सरकार ” वो बोली

मैं- नजरे न जाने कबसे तुम्हे तलाश कर रही थी

रूपा- बच भी तो नहीं पायी मैं

मैं-सो तो है .

रूपा अलाव के पास बैठ कर हाथ सकने लगी. मैं भी पास बैठ गया .

“ये कौन सी जगह है रूपा ” मैंने पूछा

रूपा- तुम्हे याद नहीं .

मैं- मुझे कैसे याद होगा , मैं तो पहली बार आया हूँ यहाँ

रूपा- सो तो है मैं भूल गयी थी , दरअसल इस से पहले हम गाव में ही मिले है तो बस वो ही याद रहा . ये चरवाहों का तिबारा है . किसी ज़माने में लोग आते जाते यहाँ बैठ जाया करते थे .

“बढ़िया , हमारे यहाँ होने का बस यही कारन है ” मैंने कहा

रूपा--- इस से बेहतर क्या होगा. हमारी मुलाकात के लिए .इस वीराने में हम दोनों एक दूजे के संग और ये शानदार रात. मेरी खुशनसीबी है की मैं अपने यार के साथ हूँ,

मैंने रूपा का हाथ अपने हाथ में लिया.

“तुम किसके साथ आये यहाँ ” पूछा उसने

मैं- न्योता गया था , कोई और आया नहीं तो मैं ही चला आया

मैंने झूठ बोला रूपा से.

“कुछ परेशां लगते हो मुसाफिर , क्या बात है ” बोली वो

मैं- एक पहेली है , जिसे सुलझाने की कोशिश कर रहा हूँ

रूपा- मुझे भी बताओ,

मैं-मावस के सोम को जब बिजली राह दिखाए तो रक्त को रक्त पहचाने का , अँधेरे मेह में दो दिए जले तब चौखट खुले ,शम्भू तब पहचाने , तब आशिस दे. इसका क्या मतलब है .

“ये तो अजीब से शब्द है . किसने बताये तुम्हे. ”

मैं- बस ऐसे ही सुने मैंने तो होंठो पर रह गए तबसे

रूपा ने इस बार मुझे ऐसी नजरो से देखा जैसे वो नाप रही हो की मैं सच बोल रहा हूँ या झूठ .

रूपा- चल छोड़ इसे,और अपनी बता

मैं- तेरे बिना एक एक पल सदी सा लगे मुझे. तू जो नहीं तो लगे की एक हिस्सा नहीं इस जिस्म का

रूपा ने अपना सर मेरी गोद में रखा और लेट सी गयी .

“तू कहे तो विक्रम चाचा को भेजू तेरे बापू से बात करने को , ”

रूपा- जल्दी ही . देव, क्या तुझे मालूम है तेरी माँ इसी गाँव की थी

मैं- जानता हूँ

रूपा- तेरे मामा- नाना से मिला

मैं- नहीं. बरसो से वो कभी आये ही नहीं मुझसे मिलने , उनको शायद याद भी नहीं होगा. तो रहने दिया .वैसे भी गाँव वाले मुझे श्राप मानते है तो क्या मालूम यहाँ के लोग भी ऐसा ही सोचते होंगे तो

रूपा- किसने कहा तुमसे ऐसा.

मैं- सब कहते है

रूपा- दुनिया का क्या है कुछ भी बोलती है तुम ध्यान मत दो

मैं- रूपा, मैं अपने माँ-बाप के बारे में जानना चाहता हूँ और जानकारी कही मिलेगि तो यही जूनागढ़ में , पर मैं किसी को नहीं जानता, कौन यहाँ अपना है कौन पराया.

हम बाते कर ही रहे थे की तभी बादलो से चाँद निकल आया चांदनी धरती पर गिरने लगी .

“काफी देर हुई देव, मुझे जाना चाहिए , बापू ढूंढेगा मुझे , मैं जल्दी ही मिलूंगी ” रूपा ने अपना शाल ओढ़ते हुए कहा

मैं- हम्म

रूपा- पहले मैं जाउंगी तू फिर आना .

छम छम करती रूपा आगे बढ़ गयी कुछ देर बाद उसकी पायल की आवाज आणि बंद हो गयी, जैसे वो थी ही नहीं . मैं भी अंदाजे से वापिस चल पड़ा. पर क्या मेरा अंदाजा सही था, नहीं , बिलकुल नहीं कुछ दूर चलने के बाद ही मैं समझ गया था की रास्ता भटक गया हूँ मैं .

बेशक आसमान में चाँद की रौशनी थी पर फिर भी दूर दूर तक कुछ नहीं दिख रहा था सिवाय जंगल के .मैंने अपने कान केन्द्रित किये ताकि मैं जरनेटर की आवाज सुन सकू, क्योंकि टेंट की रौशनी दिख नहीं रही थी मुझे.

चलते चलते न जाने कितनी दूर आ गया था मैं . साँस थोड़ी फूलने लगी थी मेरी . काफी चलने के बाद मुझे पत्थरों से बनी कोई ईमारत सी दिखी तो मैं उधर ही चला गया . वहां जाकर मैंने देखा ये अजीब सी जगह थी आस पास कुछ पत्थरों की शिलाए थी . ऊपर को कपडा सा था जो हवा से हिल रहा था .

बीच में कुछ ऐसा था जिसे मैं समझने की कोशिश कर रहा था . जैसे किसी कुवे की मुंडेर पर रस्सी को गोल गोल करके रखा गया हो . . पास में एक डंडा सा था . मैंने जैसे ही डंडे को छुआ गजब हो गया . वो जो रस्सी सा था उसमे एकदम से पीली रौशनी हुई और अगले ही पल मेरे कानो को एक तेज चीख बेध गयी . चिंघाड़ती हुई चीख और वो पीली रौशनी इस से पहले मैं सम्झ्पाता मेरे सीने में तेज दर्द हुआ जैसे की अन्दर कुछ घुस गया हो .मैंने खुद को धरती पर गिरते महसूस किया.
 
#31

आँखे खुली तो मैंने खुद को हवेली में पाया. मेरे पास ही मोना बैठी थी , मैंने देखा बदन पर बहुत सी पट्टी बंधी है .

“मोना, यहाँ कैसे आया मैं ” पूछा मैंने

मोना- तुम टेंट के पीछे घायल मिले थे बर्तन साफ़ करने वालो को . ये छोड़ो पहले बताओ की अब ठीक हो , मेरा मतलब कैसा महसूस कर रहे हो .

मैं- ठीक हूँ बस बदन में दर्द है

मोना- मैं जानती हूँ , ये सब जब्बर ने किया है , मैंने गिरफ्तार करवा दिया है उसे, कड़ी कार्यवाही करवाती हु उसके खिलाफ.

मैं- वो निर्दोष है , उसे मत घसीटो . शिकायत वापिस ले लो

मोना- पर मैं जानती हूँ देव ये उसी ने किया है

मैं- कहा न , उसने नहीं किया . बेशक मेरा झगड़ा हुआ उस से पर ये हमला उसने नहीं किया .

मोना- तो तुम बताओ इतनी गहरी चोट किसने मारी तुम्हे

मैं- सवाल ये नहीं है , सवाल ये है की मैं टेंट के पास कैसे आया जबकि मैं वहां से दूर था .

मोना- तुम कहाँ दूर थे,

मैं- समझने की कोशिश करो एक मिनट, तुम मुझे चरवाहों के तिबारे पर एल चलो

मोना- कहाँ ले चलू.

मैं- चरवाहों के तिबारे पर

मैंने मोना के चेहरे पर हवाइया उड़ते देखि .

मैं- क्या हुआ

मोना- मुझे लगता है तुम्हारे दिमाग पर कुछ उल्टा असर हुआ है .

मैं- क्यों

मोना- क्योंकि ऐसी कोई जगह है ही नहीं

अब हैरान होने की मेरी बारी थी .

मैं- मोना झूठ मत बोलो

मोना- मैं भला क्यों झूठ बोलूंगी

मैं- गाड़ी तैयार करवाओ, हम अभी उसी जगह चल रहे है.

मोना को भी अब थोड़ी उत्सुकता होने लगी थी तो हम कुछ देर बाद मेरी बताई जगह की तरफ चल पड़े. ज़ख्म की वजह से जिस्म में दर्द था पर मोना उस जगह को झुठला रही थी जिसे मैंने खुद देखा था . जल्दी ही गाड़ी फार्महाउस के पास थी .

“अब किधर ” मोना ने पूछा

और मेरे पास कोई जवाब नहीं था क्योंकि रात के अँधेरे और दिन के उजाले में बहुत फर्क था और इस जंगल में उस चीज को कैसे ढूंडा जाये, सवाल ये था .

“बताता हूँ ” मैंने कहा

मैं गाड़ी से उतर कर उस तरफ गया जहाँ से मैं जंगल में गया था . मैंने मोना को पीछे आने को कहा . गाड़ी मेरे पीछे चलने लगी .चलते चलते हम काफी दूर आ गए थे . मैं पूरा ध्यान लगा रहा था की मैं चरवाहों के तिबारे को दिखा सकू मोना को .

जंगल के अन्दर एक ऐसी जगह भी आई जहाँ थोड़ी जगह सपाट-समतल थी .

“यही कही होना चाहिए उसे ” मैंने अपने आप से कहा . मोना भी गाड़ी से उतर आई . ड्राईवर ने व्हील चेयर पर बिठाया उसे और मेरे पास ले आया .

“यहाँ क्या है कुछ भी तो नहीं देव. ” उसने कहा

मैं- मेरा यकीन करो मोना , वो यही कहीं था . तिबारे के चार खम्बे थे ऊपर छत नहीं थी . चूँकि ठण्ड बहुत थी तो मैं बिलकुल अलाव के पास ही बैठा था . अलाव एक मिनट, मोना अलाव था तो राख भी रहेगी लकडियो की .

मैं तुरंत इधर उधर देखने लगा. करीब सौ मीटर आगे जाने पर मेरी आँखों में चमक आ गयी और होंठो पर मुस्कुराहट , क्योंकि मुझे राख मिली थी . मैंने राख को हाथ में लिया अभी भी गर्मी बाकी थी . पर एक आश्चर्य और था मेरे लिए. गर्म राख का होना साबित करता था की मैं यही था पर अब मेरी आँखे बता रही थी की यहाँ ऐसा कोई तिबारे नहीं था .

“देखो मोना ये राख अभी भी गर्म है , मैं यही था ” मैंने कहा

मोना- पर हालात तो कुछ और कहते है और फिर ये बस एक संभावना है हो सकता है की किसी और ने भी जलाई हो आग. अब जंगल पर बस तुम्हारा ही तो अधिकार नहीं .

मैं- हो सकता है .

मैं ड्राईवर के पास गया और बोला- बाबा , आप तो यही के है, आप तो न जाने कितनी बार इस जंगल में आये होंगे आप तो जानते होंगे चरवाहों के तिबारे के बारे में

ड्राईवर- हुकुम, मैंने भी ऐसी जगह के बारे में कभी नहीं सुना.

मोना- चलो इस तिबारे का चक्कर छोड़ो, मुद्दा ये है की तुम पर हमला किसने किया . तुम जब्बर को मना कर रहे हो तो फिर कौन, और उसके पास क्या वजह थी की वो तुम पर हमला करे , क्या हमला भी उसी तिबारे पर हुआ था .

मैं- नहीं तिबारे पर नहीं हुआ. वो जगह भी यही कही थी . अजीब सी जगह चार शिलाए, ऊपर कुछ झंडे सा लहरा रहा था , शिलाओ के बीच कुछ रस्सी सा पड़ा था और एक लम्बा सा डंडा था , चांदनी में म्मैने खूब देखा था उस जगह को .

“शम्भू का शिवाला ”अचानक से ड्राईवर बोल पड़ा .

मैं और मोना उसके मुह की तरफ देखने लगे.

“शम्भू का शिवाला मेमसाब , हुकुम शायद कल रात उधर ही चले गए थे ” ड्राईवर ने कहा .

मोना- तुम गाड़ी ले आओ हम वापिस हवेली चल रहे है

मैं- पर क्यों , हमें तो शिवाले पर जाना चाहिए.

मोना- मैंने कहा न नहीं मतलब नहीं

मैंने मोना का हाथ पकड़ा और बोला- कुछ छिपा रही हो मुझसे

मोना- देव, हमें चलना चाहिए

मैं- बेशक हम चलेंगे पर हवेली नहीं बल्कि शिवाले पर , मुझे वहां ले चलो मोना ले चलो

मोना- मेरी बाट समझते क्यों नहीं तुम ,

मैं- आखिर क्यों नहीं ले जाना चाहती तुम मुझे वहां , तुम्हे हमारी दोस्ती की कसम मुझे ले चलो वहां .

मोना-कसम देकर तुमने मुझे रुसवा किया देव. पर तुम्हारी दोस्ती मुझे सबसे प्यारी है मैं लेके चलूंगी तुम्हे. पर पहले ड्राईवर काका को फार्महाउस छोड़ आते है मैं नहीं चाहती की हमारे दरमियान कोई रहे. ड्राईवर को छोड़ने के बाद गाड़ी मैं चलाने लगा. करीब पंद्रह- बीस मिनट के बाद हम लोग एक ऐसी जगह पहुंचे जहा जाने की मैंने कल्पना भी नहीं की थी , मेरा मतलब ये जगह ये होगी ये मैंने नहीं सोचा था .

“ये तो . येतो ” मेरी बात जैसे गले में ही अटक गयी .

मोना- हाँ ये एक .......................
 
#32

“हाँ, ये एक शमशान है ” मोना ने कहा

कुछ देर बस मैं उसे देखता रहा .

“शमशान में शम्भू की मूर्ति ” मैंने सवाल किया .

मोना- शिव तो सब कही है ,

मैं- सो तो है पर शमशान में शम्भू साधना करते है , यहाँ मूर्ति का पूजन कैसे हो सकता है .

मोना- ये बड़ी गूढ़ बाते है देव, तुम्हे और मुझे समझने नहीं आने वाली, ये शमशान कच्येचे कलवो था काहिर शिवाला अब बीता दौर है

मैं- क्यों

मोना मुझे जवाब देती उस से पहले ही मेरी नजर एक काले साए पर पड़ी .

“ये तो मीरा है , ये यहाँ क्या कर रही है ” मैंने मोना को मीरा की तरफ इशारा करते हुए कहा

मोना- उस से ही पूछते है .

हम दोनों मीरा के पास गए. और वहां जाकर हमें एक और ही अजीब बात दिखी , मीरा एक जगह बैठी थी दीपक जला कर .

मैं- तुम यहाँ कैसे माई

मीरा- यही मैं तुमसे पूछना चाहती हूँ .

मैं- चला जाता अगर कल मुझ पर हमला नहीं होता ,

मैंने अपनी शर्ट उतारी और जख्म मीरा को दिखाया . खून से सनी पट्टिया देख कर मीरा की आँखे जैसे बाहर को आ गयी . बड़ी फुर्ती से उठी वो

एक झटके से पट्टी खींच ली उसने दर्द के मारे चीख पड़ा मैं .

“माई, क्या कर रही हो तुम ” मोना को गुस्स्सा आ गया .

मीरा- तू दूर खड़ी रह छोरी , मुझे देखने दे.

हंसली से लेकर पसलियों तक बड़ा गहरा चीरा था वो .

मीरा- कहाँ हुआ ये तूने देखा किसी को

मैं- हुआ तो यही था इन शिलाओ के पास . मैं वहां खड़ा था . मैंने इशारा किया . मैं वहां खड़ा था . बेशक चांदनी रात थी ,, पर फिर भी इधर अँधेरा था . यहाँ पर बहुत बड़ी रस्सी पड़ी थी मैंने बस उसे छुआ था और फिर अचानक से मुझे दर्द हुआ और मैं बेहोश हो गया .

“मैंने लाख कहा था सुलतान को तुझे कभी न भेजे यहाँ पर वो न जाने किस मिटटी का बना है इतना सब देखने के बाद भी उसका कलेजा नहीं भरा जा ये दिखा उसे ” मीरा की आँखों में आंसू भर आये.

मोना- आप बाबा को कैसे जानती है माई

मीरा- ठाकर की छोरी तू तो चुप ही रह, साथ लायी थी न इसे, फिर क्यों छोड़ा , कहीं तेरी साजिश तो नहीं थी ये

मोना- क्या बोल रही हो माई, मुझे मालूम ही नहीं कब ये शादी से गायब हो गया , मुझे अगर मालूम होता तो एक पल क्या मैं देव को लाती ही नहीं यहाँ .

मीरा- मुझे बिसबास नहीं तुझ पर छोरी , पर तू अगर हिमायती है इसकी तो इसे अभी सुलतान के पास लेजा . जख्म गहरा है ये पट्टिया कामयाब नहीं हफ्ते भर का टेम है बस ,ये छोरा अमानत है प्राण संकट में डाल दिए इसके , इसे लेजा अभी के अभी .

मोना- पर

मीरा- पर वर मत कर छोरी. सुलतान के पास जा और कहना की मीरा को शक्ल न दिखाए अपनी वो , जा चली जा .

मोना और मैं वापिस गाँव के लिए चल पड़े. रह गयी मीरा जो अब शम्भू की मूर्ति के पास खड़ी थी .

“तेरी लीला तू जाने, मैं तब चुप रही सोची तेरी मर्जी है तू जो करे ठीक करे सब्र कर लिया था मैंने. पर इस अभागे का के दोष है , ये न समझ तो भटकते हुए आ पहुंचा इधर, और कौन सा गुनाह किया इसने तेरे दर पर तो सब आवे है इन्सान, भुत पिसाच, नाग . तू तो सबका है तू जानता है वो सुहासिनी का अंश है और तेरे दरबार में सुहासिनी के अंश पर ये विपदा आन पड़ी शम्भू, कर कोई चमत्कार , मेरी खाली झोली में बस यो लड़का ही है , इसकी रक्षा कर मेरे मालिक ” मीरा ने अपने आंसू हथेली पर इकठ्ठा किये और शम्भू के चरणों में रख दिए.

हमें मेरे गाँव आने में करीब दो घंटे लग गए. हम सीधा मजार पर गए . मैंने देखा बाबा चिलम लगाये अपने ठिकाने पर बैठा है . हम गाड़ी से उतरे. मोना ने बाबा को आवाज दी . हमें देखते ही बाबा के होंठो पर मुस्कान आ गयी .

“आ मुसाफिर, तेरे बिना तो मन लगता ही नहीं आजा चा पीते है .” बाबा ने आवाज दी .

मैंने मोना को चेयर पर बिठाया और बाबा के पास गया .

मोना- बाबा मुसीबत आन पड़ी है , मीरा नाराज है तुमसे .

बाबा- आज की नाराज है क्या एक मुद्दत हुई अब तो

मोना- बाबा बात कुछ और है

मोना कुछ कहती उस से पहले ही मैंने शर्ट उतार दी . बाबा के हाथ से चिलम निचे गिर गयी . अफीम खाई आँखे और चौड़ी हो गयी . बाबा ने मेरे सीने के जख्म को देखा , कुछ सूंघा

“असंभव , ये मुमकिन नहीं ” बाबा ने कहा .

मैं- क्या मुमकिन नहीं .

“मुसाफिर, मुझे पूरी घटना बता कुछ छिपाना नहीं तुझे कसम है मेरी ” बाबा ने उत्तेजित स्वर में कहा .

मैंने बाबा को सारी घटना बताई. बाबा की पेशानी पर बल पड़ गया .

“कुछ तो बोल बाबा ” मैंने कहा

बाबा- रे छोरे यो के मुसीबत कमा लाया तू . सोची तो कुछ और थी बन कुछ और गयी . मैं के करू इब्ब.

मोना- राह दिखाओ बाबा. मीरा माई कह रही थी एक हफ्ते का समय है देव के पास.

बाबा- आज रात तुम यही रुको. आने वाले कुछ दिन बड़े भारी होने वाले है . पर एक बात खटक रही है चरवाहों का तिबारा तु खुद न देख सके . बेशक तू खास है पर मेरे जंचती नहीं ये बात

मोना- क्या है बाबा ये चरवाहों का तिबारा

बाबा- बताता हूँ ठाकर की छोरी , एक लम्बी कहानी है और छोटी जिंदगानी . हमारे कबीले के लोग पहले बहुत घूमते थे इधर उधर, कुछ खास सामान होता था , तो लूटपाट से बचने के लिए हम ने एक तिबारा बनाया था , अक्सर कुछ खास लोग वहां रात को रुक जाते थे . तुम लोगो को यकीं करने में थोड़ी मुश्किल होगी पर फिर हम उसे छुपा देते थे .

मैं- मतलब

बाबा- ये हमारी कुछ कलाए थी . पर एक मुद्दत से वो छुपा हुआ है यहाँ तक की हम भी उसे प्रकट नहीं कर सकते . इसलिए मुझे अचम्भा है , मुसाफिर उस रात तेरे साथ कोई और भी था , बता कौन था .
 
#33

“कोई नहीं था बाबा ” मैंने कहा

बाबा ने फिर कोई सवाल नहीं किया ,बस अपना इकतारा लिया और बजाने लगा. शायद वो भी जानते थे की मैं झूठ बोल रहा हूँ . और मैं नहीं चाहता था की मैं रूपा का जिक्र करू मोना के सामने . जैसे जैसे रात बढ़ रही थी दर्द बढ़ रहा था . मोना को मैंने कार में जाने को कहा उसे भी आराम की जरुरत थी .

मोना के जाने के बाद बाबा ने अपना ध्यान तोडा

“मुसफिरा, ये जो जख्म लाया हैं न तू ये तेरे जीवन और मरण का सम्बन्ध है , ये वार ने मुझे अचम्भे में डाल दिया , समझ नहीं आ रहा की तुझसे कहू तो क्या कहूँ उनीस साल बीत गए, सब राजी था . पर ये नहीं मालूम था की मौत घात लगाये है , मीरा का दिया डोरा क्यों न पहना तूने. ” बाबा ने कहा

मैं- साफ साफ बताओ बाबा , मैं सब जानना चाहता हूँ

बाबा- तो सुन , ये कोई मामूली जख्म नहीं है , ये वार अपने आप में अद्भुद है, जिस तलवार से ये वार किया गया है वो अपने आप में एक अजूबा है , किसी धातु की नहीं बल्कि पेड़ की टहनी की बनी तलवार ,

मैं- लकड़ी की तलवार

बाबा- हाँ लकड़ी की तलवार पर किसी साधारण पेड़ की लकड़ी नहीं कल्प व्रक्ष की लकड़ी , जिसकी मूठ रुद्राक्ष से बनी, वो रुद्राक्ष जो स्वयं शम्भू की बाहँ से टूट कर गिरा था . वो तलवार धरती पर मोजूद हर प्रजाति के रक्त से अभिषेक हुई . वो तलवार नागेश की है , नागेश नागशक्ति

ये नागेश का वार है ,

मैं- कौन नागेश और मेरा क्या लेना देना बाबा उस से

बाबा- ये दुनिया बस वैसी ही नहीं है जो तुझे तेरी आँखे दिखाती है ये दुनिया उसके आलावा भी बहुत कुछ है .

“और इस छिपी हुई दुनिया की क्या सच्चाई है बाबा ” मैंने थोडा उतावला होते हुए कहा .

बाबा- फिलहाल तो सच यही है की तुम्हारे सामने मौत खड़ी है . और इलाज नहीं है

मैं- जख्म है तो दवा भी होगी बाबा. कहीं तो होगी मैं ले आऊंगा

बाबा- ये नागेश का वार है मेरे बच्चे इस से बचना लगभग असंभव है . आज तक इसके वार से बस एक ही बच सका है कोई

मैं- कौन बाबा, और कौन है ये नागेश जिसका आप जिक्र कर रहे है पर बताते नहीं .

बाबा ने चिलम का कश लिया और बोले- नागेश वो है जिसके बारे में जितना कहा जाये कम है , नागेश वो है जिसने प्रकर्ति के अहम् नियम को मोड़ दिया था . नागेश वो है नागशक्ति है, नागेश वो छाया है जो सूरज को ढक ले. नागेश समूह में सबसे ऊँचा है , तंत्र और टोने के प्रथम चार संस्थापको में से एक . नागेश वो जिसने जादू का प्रयोग अलग दिशा में किया . नागेश जिसने खुद को इस काबिल बनाया की वो किसी भी योनी को आत्मसात कर सके .

“बाबा, इतने महान आदमी ने मुझ पर बिना किसी प्रयोजन के क्यों हमला किया ” मैंने पूछा

बाबा- यही पर तो मैं उलझा हूँ मुसाफिर , क्योंकि नागेश उन्नीस साल पहले जा चूका है , और जिस चीज़ ने मुझे उलझन में डाला अहि वो ये वार, क्योंकि इस तलवार को अगर कोई उठा सकता है तो है सुहासिनी ,और वो भी जा चुकी है .

मेरे लिए बाबा की बाते किसी गिरती बिजली से कम नहीं थी .

“मेरी माँ का क्या लेना देना था नागेश की तलवार से बाबा ” मैंने कहा

बाबा- तेरी माँ ने जीता था तलवार को .

मैं- मतलब

बाबा- मतलब ये की तेरी माँ ने नागेश को हरा दिया था . दुनिया आज भी विश्वास नहीं करती पर सच यही है की उस रात कुछ ऐसा हुआ था की सुहासिनी ने नागेश की तलवार जीत ली थी . बहुत से लोग मानते भी नहीं परन्तु उस रात के बाद से नागेश को कभी नहीं देखा गया . कभी नहीं सुना गया उसके बारे में . पर मेरा मानना है की उस रात दो नहीं बल्कि तीन लाशे थी. पर चूँकि तीसरी लाश की हालात बड़ी अजीब थी तो शंका है की वो नागेश था या नहीं .

मैं- तो क्या वो लौट आया बाबा. और उसने मेरे माता-पिता को क्यों मारा

बाबा- मुसाफिर, जैसा मैंने कहा ये दुनिया वैसी नहीं है जो हम देखते है , कुछ कहानिया हमारे सामने है और कुछ हमारे सामने होकर भी सामने नहीं है , तेरी कहानी भी ऐसी ही है .उस रात क्या हुआ ये असल में कोई नहीं जानता बस ये कुछ बाते है पर सवाल ये नहीं है की नागेश लौट आया या नहीं क्योंकि वो लौट आये तो भी तलवार को इस्तेमाल नहीं कर सकता क्योंकि हारी हुई तलवार मालिक का साथ छोड़ देती है .

मैं- तो क्या कोई और नहीं इस्तेमाल कर सकता तलवार को

बाबा- कर सकता है तलवार उसकी वफादार हो जाती है जो उसे जीतता है .

मैं- मेरी माँ.

बाबा- यही पर पेंच फंसता है क्योंकि वो जा चुकी है तलवार पर किसी का हक़ नहीं , बरसो से खोयी तलवार , छिपा हुआ तिबारा एकाएक सामने आते है और दोनों ही जगह पर तुम होते हो . मुझे समझ नहीं आ रहा की ये हो क्या रहा है .

“बाबा ऐसा भी हो सकता है की ये जख्म वैसा न हो जैसा आप समझ रहे है , मतलब उसके जैसा हो पर नागेश का न हो ” मैंने कहा

बाबा- मैं तेरी बात मान भी लू तो कौन हिमाकत करेगा शिवाले में ये दुस्साहस करने की . खैर, रात बहुत हुई थोड़ी देर आँख मींच ले तू भी .

मैं गाड़ी के पास आया , बैग से नयी पट्टिया निकाल कर लगाई मोना की आँख भी खुल गयी .

“सब ठीक है ” पूछा उसने .

मैं गाड़ी में अन्दर आते हुए- हाँ

मैंने गाड़ी स्टार्ट की .

“कहाँ जा रहे है ” कहा उसने

मैं- जहाँ सकूं है .

जल्दी ही हम उस कच्चे रस्ते पर थे जो मेरे खेतो की तरफ जाता था . पास में ही वो पीपल था जहाँ पर मैं पहली बार रूपा से मिला था , जहाँ पर पहली बार मैंने उस सर्प को देखा था . मैं मोना को अपनी झोपडी में ले आया .

मोना- क्या है ये .

मैं- मेरे हिस्से का सकून
 
#34

“बस एक यही जगह है जहाँ मुझे लगता है की शांति है , कहने को ये बस एक झोपडी है पर बस यही है जिसे मैं अपना समझता हूँ बाकि ये जमीने, गाँव का घर कुछ नहीं मेरे लिए ” मैंने कहा

मोना- समझती हूँ .

“कोई और मौका होता तो तुम्हे चाय पिलाता यहाँ बैठ कर चाय पीने का अपना ही सुख है ” मैंने अलाव जलाते हुए कहा .

अलाब से थोड़ी गर्मी हुई तो ठण्ड में राहत मिली .

“सब मेरी वजह से हुआ है मैं तुम्हे न्योता न देती तो ये घटना न ही होती , तुम्हे कुछ हो गया तो मैं कभी माफ़ नहीं कर पाऊँगी खुद को ” मोना ने हताश स्वर में कहा

मैं- तुम्हारा भला क्या दोष इसमें, नियति के लेख है ये तो अभी दुःख है सुख भी आएगा.

मोना- बाबा की बाते सुनकर दिल घबरा रहा है .

मैं- दिल को थाम लो .मुसाफिर की धड़कने अभी इतनी भी मंद नहीं हुई की तुम सुन न सको. और फिर तुम्हे छोड़कर इतनी जल्दी कैसे जाऊंगा मैं अभी अभी तो मिली हो , अभी तो कहानी शुरू होनी है .

मैंने मोना के हाथ पर हल्का सा चुम्बन लिया . उसके बदन में दौड़ती तरंग को महसूस किया मैंने .

मोना- कोई तो बात है जो हम दोनों को जोड़ रही है .

मैं- सो तो है , नसीब में तुमसे सुख लिखा तो सही है.

मोना- पर शिवाले में जो हुआ वो नहीं होना चाहिए था .

मैं- नसीब का हाल नसीब जाने मैं तो तुम्हारी जानू

मोना- इस मुश्किल घडी में भी कैसे हो बेफिक्रे तुम

मैं- तुम जो साथ हो ,फिर फ़िक्र कैसी

मोना थोडा और मेरे पास सरक आई. मैंने हम दोनों पर कम्बल डाल लिया.

“मैं सोच रहा हूँ की एक छोटा सा घर बना लू. एक ऐसी जगह जहाँ हम बेफिक्र होकर मिल सके, गाँव में मुझे कभी वो मकान घर नहीं लगा. ” मैंने कहा

मोना- मेरी हवेली तुम्हारी ही है . या फिर तुम चाहो तो सेसन हाउस आ जाओ .

मैं- तुम मेरी समझी नहीं , मैंने कहा एक घर चाहिए.

मोना- मैं मदद करुँगी तुम्हारी घर बनाने में

मैं- मदद करनी है तो बस इतना की जब घर बन जाये तुम रहने आना

मोना की आँखे झुक गयी मेरी बात सुनकर. उसने हलके से मेरे गालो पर किस किया. और मैंने जवाब देते हुए अपने होंठ उसके होंठो पर रख दिए. जैसे ढेर सारी ओस की बूंदे मेरे होंठो पर गिर गयी हो. मैं बस उसके होंठ चूसता रहा . जब तक की उसने मुझे खुद से अलग नहीं किया.

“आराम से , पैर पर इतना जोर मत तो ” उसने कहा तो मुझे ध्यान आया की मोना के पैर पर प्लास्टर लगा है . आँखों आँखों में बातो बातो में रात कट गयी , सुबह मैंने मोना को वापिस शहर भेजने की व्यवस्था की वो रुकना चाहती थी पर मैंने उसे जाने दिया . क्योंकि घर जाते ही सरोज को मेरी चोट के बारे में मालूम होता और वो उलझ जाती मोना से .

खैर, मैं घर आया. और सबसे पहले मुझे सरोज ही मिली. दौड़ कर अपने सीने से लगा लिया मुझे उसने, इतनी जोर से भींचा की मेरी आह निकल गयी .

“तुम्हारे बिना तो सब सुना हो गया था , जानते हो ये दो तीन दिन जैसे कई साल हो गए थे . ” सरोज ने जैसे उलाहना देते हुए कहा

मैं- इतना प्यार न करो मुझसे काकी.

सरोज- क्यों न करू, मेरे लिए करतार से भी पहले हो तुम ,जल्दी से हाथ- मुह धो लो मैं खाना लाती हु तुम्हारे लिए.

मैं- जी.

मैंने ठंडा सा जवाब दिया और आगे बढ़ गया .

मैं कमरे में आया तो देखा की करतार सो रहा था .जी तो किया की भाई से गले लग जाऊ पर फिर सोचा की सोने किया जाए. मैं जल्दी से नहाया और पट्टिया बदली. उसके बाद मैं निचे चला गया . सरोज ने खाना परोसा. मैंने एक दो निवाले ही लिए थे की काकी बोली- मुझे एक शिकायत है .

मैं- जी

काकी- मैंने कभी नहीं सोचा था की तुम मुझसे झूठ कहोगे, जूनागढ़ जाना था तो बता देते, मैं नहीं रोकती,पर जब दुसरो से मालूम होता है तो बुरा लगा.

मैं- सेठानी ने कहा

सरोज- क्या फर्क पड़ता है .

मैं- इसलिए नहीं बताया की फिर जाने नहीं देती.

सरोज- मैं कब तक रोक पाती कभी न कभी तो जाते ही वहां पर तुम . खैर मैं ज्यादा नहीं कहूँगी, थोड़ी देर बाद तुम ताऊ के घर चले जाना , शादी के बस कुछ दिन ही है . तुम्हारी ताई कई बार आ चुकी है तुमसे बात करने . उनको लगता है की मैंने मना किया है तुम्हे.

मैं-पर ऐसी तो कोई बात नहीं और तुम तो जानती हो मैं नहीं जाना चाहता .

सरोज- पर जाना होगा, मेरे लिए ही सही पर जाओ तुम.

अब सरोज को कैसे मना करता मैं ताऊ के घर की तरफ चल पड़ा. शादी की तैयारिया जोरो पर थी , घर में पुताई हो चुकी थी . मुझे देख कर सब खुश हो गयी .

“घर में शादी है और तुम बेटे, न जाने कहा घूम रहे हो ” ताऊ ने कहा

मैं- जी वो एक जरुरी काम था .

ताऊ- अब सब काम बाद में ,

मैंने हाँ में सर हिलाया. कुछ रिश्तेदार आये थे ताऊ ने मुझे मिलवाया सबसे. घूमते हुए मैंने देखा की घर में सब जगह रंग रोगन है बस एक कमरे पर ताला है . जो जंग खाया था लगता था की उसे बहुत समय से खोला नहीं गया .

मैं- वो कमरा कैसे रह गया ताउजी .

ताऊ- बस ऐसे ही बेटे, दरअसल वो तुम्हारे पिता का कमरा है , उसके जाने से ही बंद है . युद्ध जब घर छोड़ कर गया तो फिर वापिस कभी नहीं लौटा, पिताजी ने ताला लगवा दिया, कहते थे की युद्ध का सामान है जब गुस्सा शांत होगा तो अपने आप संभाल लेगा.

मैं- आपको ऐतराज न हो तो मैं इसे खोलना चाहूँगा. मैं देखना चाहता हूँ इसे

ताऊ- भला इसमें ऐतराज की क्या बात है ,सब तुम्हारा ही तो है .

ताऊ कुछ ही देर में चाबी ले आया. कांपते हाथो से मैंने ताला खोला . कमरे में धुल भरी थी . जाले लगे थे. उन्हें हटा कर मैं अन्दर पंहुचा सामने दिवार पर एक बड़ी सी तस्वीर लगी थी जिस पर धूल थी मैंने उसे साफ किया . .............वो मेरे पिता की तस्वीर थी, मेरी आँखों में न जाने क्यों पानी आ गया .
 
#35

मेरे सामने वो उस इंसान की तस्वीर थी जिसे मैं कभी जिंदा नहीं देख पाया था मेरे सामने युद्ध वीर सिंह की तस्वीर थी, जो बहुत कुछ मेरे जैसे ही दिखते थे. ऊंचा लंबा कद कांधे तक आते बाल, घोड़े पर बैठे हुए. मैंने तस्वीर को उतारा और सीने से लगा लिया. दिल भारी सा हो आया था. सामने एक अलमारी थी जो किताबों से भरी थी. पास ही एक संदूक था जिसमें कपड़े रखे थे. मैंने कुछ और तस्वीरे देखी जो किसी जंगल की थी.

आँखों मे एक दरिया था पर इस शादी वाले घर मे मैं तमाशा तो कर नहीं सकता था इसलिए कमरे से बाहर आया. शाम तक मैं वहां रहा. अचानक से सीने मे दर्द बढ़ने लगा तो मैं बाबा से मिलने चल प़डा पर बाबा मजार पर नहीं थे. जब और कुछ नहीं सूझा तो मैं खेतों की तरफ हो लिया.

गांव से बाहर निकलते ही ढलते दिन की छाया मे जोर पकड़ती ठंड को महसूस किया, हवा मे खामोशी थी, मैं उस पीपल के पास से गुजरा जहां पहली बार रूपा मिली थी मुझे, जहां पहली बार उस सर्प से सामना हुआ था मेरा. जैकेट के अंदर हाथ डाल कर मैंने देखा पट्टियों से रक्त रिसने लगा था

.

साँझ ढ़ल रही थी हल्का अंधेरा होने लगा था, झोपड़ी पर जाकर मैंने अलाव जलाया, घाव ने सारी पट्टी खराब कर दी थी, जी घबराने लगा था. बाबा ने सही कहा था ये घाव बड़ा दर्द देगा, मैंने रज़ाई अपने बदन पर डाली और आंखे बंद कर ली. पर चैन किसे था, करार किसे था. आंख बंद करते ही उस रात वाला किस्सा सामने आ जाता था.

चाहकर भी मैं उस हादसे को भुला नहीं पा रहा था, वो श्मशान साधारण नहीं था कोई तो राज छुपा था वहां, मुझे फिर जाना होगा वहाँ मैंने सोचा. एक के बाद एक मैं सभी बातों को जोड़ने की कोशिश कर ही रहा था कि मुझे बाहर रोशनी सी दिखी, इससे पहले कि मैं बिस्तर से उठ पाता, झोपड़ी का पल्ला खुला और मेरे सामने रूपा थी.

"वापिस लौटते ही सबसे पहले तुझसे मिलने चली आयी मेरे मुसाफिर " रूपा ने कंबल उतारते हुए कहा

उसे देखते ही दिल अपना दर्द भूल गया.

"मैं तुझे ही याद कर रहा था " मैंने कहा

रूपा - तभी मैं कहूँ ये हिचकियाँ पीछा क्यों नहीं

छोड़ती मेरा. बाकी बाते बाद मे खाना लायी हू चल उठ परोसती हूं

मैं - अभी नहीं

रूपा - मुझे भी भूख लगी है, तेरे साथ ही खाने का सोचा था, पर कोई ना थोड़ी देर और सही, चल परे को सरक, ठंड बहुत है

रुपा बिस्तर पर चढ़ आयी उसका बोझ मेरे सीने पर आया तो मेरी आह निकल गई

रूपा - क्या हुआ देव

मैं - कुछ नहीं सरकार,

रूपा - तो फिर आह क्यों भरी, क्या छिपा रहा है

रूपा ने मेरे ऊपर से रज़ाई हटा दी और उसकी आँखों के सामने मेरा छलनी सीना था,

"किसने किया ये " पूछा उसने

मैने कुछ नहीं कहा

"किसने किया ये, किसकी इतनी हिम्मत जो मेरे यार को चोट पहुंचाने की सोचे मुझे नाम बता उसका " रूपा बड़े गुस्से से बोली

मैं - शांत हो जा मेरी जान, छोटा सा ज़ख्म है कुछ दिनों मे भर जाएगा. और फिर मुझे भला क्या फिक्र मेरी जान मेरे पास है

रूपा - मामूली है ये ज़ख्म पूरा सीना चीर दिया है, अब तू मुझसे बाते भी छुपाने लगा है मेरे दिलदार

रूपा की आँखों मे आंसू भर् आए, सुबक कर रोने लगी वो. मैंने उसका हाथ थामा.

"कैसे हुआ ये " पूछा उसने

मैने उसे बताया कि कैसे उस रात मैं रास्ता भटक गया और शिवाले जा पहुंचा और ये हमला हुआ

"सब मेरी गलती है, मुझे डर था कि कोई तुझसे मिलते ना देख ले इसलिए मैंने तुझे वहां बुलाया, तुझे कुछ हो गया तो मैं किसके सहारे रहूंगी, मेरे यार मेरी गलती से ये क्या हो गया " रूपा रोने लगी

मैं - रोती क्यों है पगली, भाग मे दुख है तो दुख सही, चल अब आंसू पोंछ

मैंने रूपा के माथे को चूमा.

"मैंने सोचा है कि इधर ही कहीं नया मकान बना लू " मैंने कहा

रूपा - अच्छी बात है

मैं - बस तू कहे तो तेरे बापू से बात करू ब्याह की, अब दूर नहीं रहा जाता, तेरे आने से लगता है कि जिंदा हूं तू दुल्हन बनके आए तो घर, घर जैसा लगे

रूपा - इस बार फसल बढ़िया है, बापू कह रहा था सब ठीक रहा तो कर्जा चुक जाएगा, सावन तक नसीब ने चाहा तो हम एक होंगे.

मैं--जो तेरी मर्जी, मुझ तन्हा को तूने अपनाया मेरा नसीब है,

रूपा - अहसान तो तेरा है मेरे सरकार

मैंने उसे अपनी बाहों मे भर् लिया

"अब तो दो निवाले खा ले बड़े प्यार से बनाकर लाई हूं तेरे लिए " उसने कहा

रूपा ने डिब्बा खोला और खाना परोसा. एक दूसरे को देखते हुए हमने खाना खाया. बात करने की जरूरत ही नहीं थी निगाहें ही काफी थी.

"चल मैं चलती हूं, कल आऊंगी " उसने कहा

मैं - रुक जा ना यही

रूपा - आज नहीं फिर कभी

उसने मेरे माथे को चूमा और चली गई. मैं सोने की कोशिश करने लगा.

रात का अंतिम पहर था. सर्द हवा जैसे चीख रही थी, वेग इतना था कि जैसे आँधी आ गई हो, चांद भी बादलों की ओट मे छिपा हुआ था. पर एक साया था जो बेखौफ चले जा रहा था. क्रोध के मारे उसके कदम कांप रहे थे, आंखे जल रही थी. कोई तो बात थी जो उसकी आहट से शिवाले के कच्चे कलवे भी जा छुपे थे.

वो साया अब ठीक शंभू के सामने था, एक पल को तो वो मूर्ति भी जैसे उन क्रोधित आँखों का सामना नहीं कर पायी थी. उसने पास स्थापित दंड को उठाया और पल भर् मे उसके दो टुकड़े कर दिए. इस पर भी उसका क्रोध शांत नहीं हुआ तो उसने पास पडी शिला को उठाकर फेंक दिया.

"किस बात की सजा दे रहे हो मुझे किस बात की क्या दोष है मेरा जो हर खुशी छीन लेना चाहते हो मेरी. महत्व तो तुम्हारा बरसो पहले ही समाप्त हो गया था, पर अब मैं चुप नहीं हूं, तीन दिन मे मुझे तोड़ चाहिए, सुन रहे हो ना तुम बस तीन दिन, उसे यदि कुछ भी हुआ तो कसम तुम्हारी इस संसार को राख होते देर नहीं लगेगी, शुरू किसने किया मुझे परवाह नहीं समाप्त मेरे हाथो होगा. तीन दिन बस तीन दिन. "
 
#36

जिंदगी कुछ ऐसी उलझी थी कि सुबह और रातों मे कोई खास फर्क़ नहीं रह गया था. सुबह अंधेरे ही मैं उठ गया था पर बदन मे बड़ी कमजोरी थी, लालटेन की रोशनी मे मैने देखा बिस्तर पूरा सना था खून से. मैंने उसे साफ़ करने की कोशिश नहीं की ब्लकि बिस्तर को झोपड़ी से बाहर फेंक दिया.

इस बेहद मुश्किल रात के बाद मुझे अह्सास होने लगा था कि मैं किसी बड़ी मुसीबत मे हूं, फिलहाल मैं बस सोच सकता था, मैंने नागेश के बारे मे सोचा, मेरी माँ के बारे मे मुझे ऐसी बाते मालूम हुई जो आसानी से गले नहीं उतरने वाली थी.

"हो ना हो इस कहानी की जड़ जूनागढ मे ही है, मुझे फिर वहां जाना होगा " मैंने निर्णय किया और बाबा से मिलने चल प़डा. रास्ते मे मुझे सरोज काकी मिल गई,

"मैं खेतों पर ही आ रही थी, घर आने की फुर्सत ही नहीं तुझे तो, पहले कम से कम खाना तो समय से खा लेता था अब तो ना जाने क्या हुआ है " काकी ने एक साँस मे ढेर सारी बात कह दी

मैं - थोड़ी जल्दी मे हूं काकी, जल्दी ही आता हूं घर

काकी - क्या जल्दी क्या देर, तुझे मुझे बताना होगा किस उधेड बुन मे लगा है तू, रात रात भर गायब रहते हो, जबसे उस मजार वाले से संगति की है अपनेआप मे नही हो, देखना तुम कभी ना कभी लड़ बैठीं ना मैं उससे तो मत कहना

मैं - बाबा का कुछ लेनादेना नहीं काकी, मैं बस उस पेड़ के पास जाता हूँ

काकी - मुझे डर लगता है देव, हम पहले ही बहुत कुछ खो चुके है, तुम्हें नहीं खोना चाहते, तुम बस घर रहो तुम्हें जो चाहिए मैं दूंगी.

मैं - घर ही तो चाहिए मुझे.

काकी कुछ पलों के लिए चुप हो गई.

"वहाँ क्या हुआ था " पूछा काकी ने

मैं - कहाँ क्या हुआ

काकी - जहां तुम गए थे, कौन लड़की है वो मुझे बताओ, जैसा तुम चाहते हो वैसा ही होगा, हम ब्याह करवा देंगे उसी से, उसी बहाने कम-से-कम भटकना तो नहीं होगा तुम्हारा

मैं - ऐसी कोई बात नहीं है, ऐसा कुछ होता तो मैं तुम्हें बताता

काकी - रख मेरे सर पर हाथ

मैं - क्या काकी तुम भी छोटी मोटी बात को इतना तूल दे रही हो

काकी - मैं तूल दे रही हूँ मैं, जानते हो रात रात भर सो नहीं पाती हूँ, विक्रम को जबसे मालूम हुआ है तुम वहाँ गए थे कितना घबराए हुए है वो और तुम कहते हो कि मैं तूल दे रही हूँ

मैं समझ गया कि काकी का पारा चढ़ गया मैंने मैंने उसे मनाया और घर आ गया. बेशक मेरा बाबा से मिलना जरूरी था पर कुछ अनचाही मजबूरियाँ भी थी. मैं सरोज के साथ घर आया और सबसे पहले पट्टी बदली ताकि कुछ आराम मिले. मैं सरोज से हर हाल में इस ज़ख्म को छुपाना चाहता था. खैर पूरा दिन मैं काकी की नजरो मे ही रहा. पर रात को मैं मजार पर पहुंच गया.

बाबा वहाँ नहीं था पर मोना थी.

मैं - तुम कब आयी

मोना - कुछ देर पहले, मालूम था तुम यही मिलोगे तो आ गई.

मैं - नहीं आना था तुम्हारा पैर ठीक नहीं है

मोना - कैसे नहीं आती, तुम इस हालत मे हो मुझे चैन कैसे आएगा

मैं - हमे तुम्हारे गाँव जाना होगा अभी.

मोना - अभी पर क्यों

मैं - दर्द वहीं मिला तो इलाज भी उधर ही मिलेगा

मोना ने देर ना कि और हम जल्दी ही शिवाले पर खड़े थे, पर यहां जैसे तूफान आया था. सब अस्त व्यस्त था. आँधी आकर चली गई थी.

"किसने किया ये, अपशकुन है ये तो " मोना ने कहा

मैं - इस श्मशान की कहानी बताओ मुझे.

मोना - मैं कुछ खास नहीं जानती, पर गांव के पुजारी बाबा जरूर बता सकते है, कहो तो मिले उनसे

मैं - जरूर

मोना - कल सुबह सुबह मिलते है उनसे

फिर हम मोना की हवेली आ गए. एक बार फिर वो मेरे साथ थी, हालात चाहे जैसे भी थे पर उसका साथ होना एक एहसास था. हम दोनों एक बिस्तर पर लेटे हुए थे. कोई और लम्हा होता तो हम गुस्ताखी कर ही बैठते. पर सम्हालना अभी भी मुश्किल था

मोना के होंठो को पीते हुए मेरे हाथ उसके नर्म उभार मसल रहे थे, पर फिर उसने मुझे रोक दिया.

"ये ठीक समय नहीं है " उसने कहा तो हम अलग हो गए. सुबह मोना मुझे वहाँ ले गई जहां पुजारी था. एक छोटा सा मंदिर था बस पर पुराना था.

मोना - बाबा हमे थोड़ा समय चाहिए आपका

पुजारी - बिटिया अवश्य परंतु थोड़ा इंतजार करना होगा, आज अमावस है और हर अमावस को रानी साहिबा तर्पण देने आती है, उसके बाद मैं मिलता हूँ

"बाबा, हम एक बहुत जरूरी मामले मे आपके पास आए है " मैंने हाथ जोड़े

पुजारी - मेरे बच्चे, यहां से कोई खाली नहीं जाता तुम्हारी भी मुराद पूरी होगी.

बाबा ने मेरे कांधे पर हाथ रखा और अंदर चले गए. मैं मोना के साथ वहीं बैठ गया.

"कौन है ये रानी साहिबा " मैंने पूछा

मोना - मेरी दादी

मोना की दादी यानी मेरी नानी.

मैं - मिलना चाहता हूं मैं उनसे

मोना - कोशिश कर लो, थोड़ी देर मे जनता को खाना देंगी वो.

मैं - तुम मिलवा दो

मोना - मुमकिन नहीं. बरसों से कोई बात नहीं हुई हमारी.

मैं - मैं कोशिश करूंगा

मैंने कंबल ओढ़ा और जनता मे जाके बैठ गया. कुछ देर बाद वो मंदिर से बाहर आयी, उम्र के थपेड़ों ने बेशक शरीर को बुढ़ा कर दिया था पर फिर भी शॉन शौकत दिखती थी. उनके नौकरों ने सबको पत्तल दी. वो खुद खाना परोस रही थी.

"लो बेटा, प्रसाद, आज हमारी बेटी की बरसी है, उसकी आत्मा के लिए दुआ करना " नानी ने प्रसाद मेरी पत्तल मे रखते हुए कहा

"नानी, उसी बेटी की निशानी आपसे मिलने आयी है " मैंने कहा

रानी साहिबा के हाथ से खीर की कटोरी नीचे गिर गई, उन्होंने मुझे देखा, मैंने उनकी आँखों मे आंसू देखे.

"चौखट पर इंतजार करेंगे "उन्होंने कहा और आगे बढ़ गई.
 
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