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Adultery गुजारिश

#47

मेरे सामने दूसरी मंजिल थी ही नहीं. सीढिया जैसे खत्म हो गयी थी . अब ये नया चुतियापा था क्योंकि मैं अच्छे से जानता था की हवेली तीन मंजिला थी और थोड़ी देर पहले ही तो मैं यहाँ दूसरी मंजिल पर आया था . बाबा सुलतान कुछ तो ऐसा कर गया था जिसे वो मुझसे हर हाल में छुपाना चाहता था . इन दुसरे लोगो की दुनिया में मैं खुद को बड़ा असहाय महसूस करता था इन हरकतों को देखते हुए.

मैं निचे आकर कुर्सी पर बैठ गया और सोचने लगा. मोना का अचानक से इस्तीफा देना , और गायब हो जाना , कुछ तो हुआ था उसके साथ . उसके बारे में सोच सोच कर मेरा हाल बुरा हो गया था . उसकी बड़ी फ़िक्र हो रही थी मुझे और होती भी क्यों नहीं मेरी दोस्त थी वो . सोचते सोचते मुझे ख्याल आया और मैंने खुद को कोसा की ये ख्याल मुझे पहले क्यों नहीं आया.

मुझे अब रूपा से मिलना था . बल्कि मुझे सबसे पहले रूपा से ही मिलना चाहिए था . मैं हवेली से निकल कर सीधा रूपा के घर की तरफ चल पड़ा . रूपा ही अब मेरे सवालो का जवाब दे सकती थी . रूपा मुझे घर पर ही मिली.

रूपा- मुसाफिर

मैं- कैसी हो .

रूपा- पहले तो न जाने कैसी थी पर अब बहुत ठीक हूँ .बैठो तुम्हारे लिए चाय बनाती हूँ .

मैं- नहीं चाय नहीं . मुझे बस तुमसे बात करनी है .

रूपा- जी, सरकार.

मैं- वो नागिन और तुम्हारा क्या रिश्ता है . बाबा ने मेरा जख्म भरने के लिए तुमसे क्या माँगा था . मुझे तुम्हारे और उस नागिन के बारे में सब जानना है .

रूपा- बताती हूँ , मेरा और उस नागिन का रिश्ता अहंकार का रिश्ता है , नफरत का रिश्ता है ,उसे अभिमान है की वो श्रेस्ठ है मुझे भान है की मैं निम्न हूँ .उसे लगता है की शम्भू के कंठ पर वास मिलने से वो महत्वपूर्ण है , उसकी अपने विचार है मेरे अलग विचार है .

मैं- और तुम कौन हो .

रूपा- मैं , मैं कौन हूँ . मैं वो माटी हूँ जिसे तुम्हे तराश कर गुलिस्तान बना दिया. मैं वो धुल हूँ जिसे तुमने माथे से लगा कर मोल बढ़ा दिया. मैं वो मजबूर हूँ जो आसमान में उड़ना चाहती है पर पाँव में बाप के कर्ज की बेडिया है. मैं वो आइना हूँ जो रोज तुम्हे देखती है .

मैं- तुमने उस रात क्या किया था जो जख्म ऐसे गायब हुआ जैसे था ही नहीं .

रूपा- जानते हो मुसाफिर , इस दुनिया में सबसे बड़ी कोई शक्ति है तो वो प्रेम है , ये प्रेम ही था जो वो जख्म मैं भर पायी. मुझे कुछ खास तरह की चिकित्सा करने का हुनर मिला है . मैंने बस सी दिया उस जख्म को

मैं- सच बताओ रूपा , मुझसे तो न छुपाओ .

रूपा- सच अपने आप में अजीब होता है मुसाफिर. दरअसल ये सामने वाले पर निर्भर करता है क्या सच है क्या झूठ, सब परिस्तिथिया होती है . पर चूँकि आज तुम जानना ही चाहते हो तो मुझे बताना हो गा, इसलिए नहीं की तुम्हे जानना है बल्कि इसलिए ताकि तुम्हारे और मेरे रिश्ते में जो विश्वास है वो बना रहे. मैंने तुम्हे अपनी खाल दी. तुम्हारे सीने का जख्म उतारना बड़ा जरुरी था . बेशक तुम्हे उस दर्द को झेलना होगा पर कम से कम मैं इतना ही कर सकती थी.

रूपा ने लालटेन की लौ को तेज कर दिया और मेरी तरफ पीठ करके अपना ब्लाउज उतार दिया. उसकी नंगी पीठ पर बड़ा घाव था . अन्दर का मांस तक झलक रहा था . मेरे लिए कितना कुछ कर गयी थी वो . आँखों से आंसू गिरने लगे. मैंने उसे बाँहों में भर लिया .

“तुझे ये करने की जरुरत नहीं थी मेरी जान ” रुंधे गले से मैंने कहा .

रूपा-मेरी खुशनसीबी है जो तेरे काम आ सकी.

रूपा ने अपने होंठ मेरे होंठो पर रख दिए. और मुझसे लिपट गयी. उसके होंठो का दबाव मेरे होंठो पर जो पड़ा मैंने हलके से मुह खोला और वो दीवानों जैसे मुझे चूमने लगी.

हम दोनों की ही आँखों से आंसू गिर रहे थे पर ये ख़ुशी के आंसू थे उस ख़ुशी के जो हमारे रिश्ते की नींव रख रही थी . बड़ी देर बाद वो मुझसे अलग हुई.

रूपा- अब जा तू. रात बहुत हुई.

मैं- जाता हूँ , कब मिलेगी ये करार कर.

रूपा- जब तू चाहेगा

मैं- एक बात और

रूपा- मेरी माँ जादूगरनी थी , इसलिए मुझे ये चिकित्सा आती है .

मेरे बिना कहे ही रूपा ने कह दिया था . वैसे तो ये अनोखी बाट थी पर अब मुझे आदत सी हो चली थी .

मैं- फर्क नहीं पड़ता. मुझे उस नागिन का नाम जानना है .

रूपा- कुछ लोगो के नाम नहीं होते , बस दुनिया उन्हें अपने हिसाब से पुकार लेती है .

मैं- ठीक है चलता हूँ .

रूपा हमेशा की तरह मुझे देख कर मुस्कुराई. उसकी बड़ी बड़ी आँखों में जैसे दिल डूब गया मेरा. रात न जाने कितनी बीती कितनी बाकी थी . मैं गाँव की तरफ बढ़ रहा था . दिमाग में बस एक बात थी की कैसे भी करके उस नागिन से मुलाकात करनी है . उस से बाते करनी है . सोचते सोचते मैं घर तक आ पहुंचा. मैं दबे पाँव कमरे में जा ही रहा था की सरोज की आवाज से मेरे कदम रुक गए.

सरोज- तो फुर्सत मिल गयी घर आने की बरखुरदार

मैं-थोड़ी देर हो गयी .

सरोज- देर कहाँ हुई रात के दो ही तो बजे है और वैसे भी तुम्हे क्या कहना कबसे लापता हो याद भी है .

मैं- कुछ काम था .

सरोज- जानती हूँ तुम्हारा काम , जल्दी ही उस लड़की से शादी करवा दूंगी तुम्हारे, उसके बहाने ही सही घर पर तो रहोगे.

मैं- करतार सो गया .

सरोज- हाँ ,

मैं- चाचा.

सरोज- बाग़ में है , उनके कुछ दोस्त आये है तो वही दारू-मीट का प्रोग्राम है .

“और तुम्हारा क्या प्रोग्राम है ” मैंने सरोज की छाती पर नजर गडाते हुए कहा.

सरोज- मेरी कहाँ फ़िक्र है तुम्हे .

मैंने सरोज को उसी समय गोदी में उठा लिया और बोला- तुम्हारी ही फ़िक्र तो है मुझे. उसने अपनी बाहे मेरे गले में डाल दी और मैं उसे उसके कमरे में ले चला.
 
#48

सरोज के साथ चुदाई करके मैंने अपने तन की प्यास तो मिटा ली थी पर मेरा मन बेचैन था . बेशक अब मुझे नींद की जरुरत थी पर मोना की वजह से मैं बेचैनी महसूस कर रहा था . वो किस हाल में होगी, क्या हुआ उसके साथ .तमाम सवाल मुझे पागल कर रहे थे . दोपहर के खाने के बाद मैं सरोज के साथ बैठा बाते कर रहा था .

सरोज- लाला की मौत ने शकुन्तला को तोड़ कर रख दिया है बुरा हाल है उसका.

मैं- पति मर गया गम तो होगा ही .

सरोज- पर लाला की मौत से कुछ बाते भी उड़ रही है गाँव में

मैं- कैसी बाते

सरोज- लाला की लाश में एक बूँद खून भी नहीं था . जिसने भी उसे देखा यही कहा ऐसा लगता था की जैसे किसी ने सारा खून निचोड़ लिया हो.

मैं- लाला कौन सा भला था , उसने भी तो गाँव वालो का खून पिया था .

सरोज- सो तो है पर ऐसे कोई क्यों करेगा, ऐसी दरिंदगी

मैं- ये दुनिया बड़ी जालिम है , लाला का कोई दुश्मन रहा होगा जिसने पेल दिया उस को . अब इतने लोगो की आत्मा सताई है अंत ऐसा ही होना था .

सरोज- शकुन्तला कहती है की सर्प ने मारा है लाला को .

मैं- सर्प खून नहीं पीते वो डसते है लोगो को ये मामला अलग ही है .

सरोज- गाँव में भय का माहौल है अँधेरा होने के बाद आजकल कोई निकलता नहीं घर से बाहर बस तुम लोग ही हो जो घूमते रहते हो .

मैं- पर हमारा किसी से क्या लेना देना है

सरोज- बेशक, पर फ़िक्र तो होती है न .

मैं- अब इतनी भी फ़िक्र न किया करो. खैर, मैं आता हूँ थोड़ी देर में

सरोज- कहाँ चले

मैं- खेतो पर चक्कर लगा कर आता हूँ .

दरअसल मेरे सीने में दर्द होने लगा था . मैं ये बात घरवालो से छुपाना चाहता था . मैंने साइकिल उठाई और खेतो पर पहुंचा . ऐसा लगता था की छाती फट जाएगी. अन्दर किसी ने आग लगा दी हो . झोपडी में पड़े पड़े मैंने दर्द के उस दौर को झेला . मुझे गुस्सा आ रहा था उस नागेश पर जिसकी वजह से बिना किसी बात मुझे ये समस्या मिल गयी थी .

जीवन में आये इन परिवर्तनों के कारन मैं सब कुछ भूल बैठा था ये खेत खलिहान . मैंने खेतो में कुछ चक्कर लगाये.सरसों काफी बड़ी हो चुकी थी . पीले फूल बड़े अच्छे लग रहे थे . मैं ऐसे ही किसी डोले पर बैठ गया और खुद को इस परिवेश के हवाले कर दिया. दो पल के लिए ही सही मुझे सकून तो मिला.

पर इस सकून की क्या कीमत थी ये कोई नहीं जानता था . शाम होते होते मैं वापिस घर चला गया . मजार पर जाने का मेरा मन ही नहीं हुआ. चाय पर हम सब बैठे हुए थे की सरोज काकी ने अचानक से ऐसा विषय छेड़ दिया जिसकी मुझे उम्मीद नहीं थी.

“हमें अब देव के ब्याह के बारे में सोचना चाहिए, घर में बहु आ जाएगी तो कम से कम रसोई से तो आजादी मिलेगी मुझे , घर और बाहर का इतना काम हो जाता है की मेरे बस का नहीं है अब ” काकी ने चाचा से कहा .

चाचा ने बड़े गौर से सुनी ये बात और बोले- विचार तो ठीक है तुम्हारा पर देव क्या कहता है .

सरोज- देव क्या कहेगा. ब्याह तो सभी करते है बस किसी का थोड़ी जड़ी तो किसी का देर से हो जाता है .

विक्रम- ठीक कहती हो , मैं देखता हूँ . आज ही अपने लोगो में जिक्र करता हूँ कोई ठीक लड़की मिली तो बात आगे बढ़ा लेंगे.

मैं और करतार बस उनकी बाते सुनते रहे . कुछ देर बाद विक्रम चाचा उठे और बोले- भई, मैं शहर जा रहा हूँ. एक सेठ है जो अपनी जूस फक्ट्री के लिए हमारे बागो से फल खरीदना चाहता है तो मीटिंग है .

करतार- पापा. मुझे भी शहर छोड़ देना

विकर्म-तू क्या करेगा

करतार- मेरे दोस्त चंदू का जन्मदिन है तो उसके लिए

विक्रम- हाँ ठीक है .

करतार- भई तुम भी चलो. चंदू बहुत याद करता है तुम्हे.

मैं- तुझे तो मालूम है मुझे ये दिखावे पसंद नहीं . पर चंदू के लिए कुछ अच्छे कपडे खरीदना मेरी तरफ से और अपनी तरफ से जो तुम्हे ठीक लगे.

कुछ देर बाद वो दोनों चले गए और रह गए मैं और सरोज. सरोज मेरी तरफ सेक्सी अदाओ से देखने लगी. वो दरवाजा बंद करके आई तब तक मैंने अपनी पेंट उतार दी थी . सरोज मेरे सामने आई और मुझे अपना लंड सहलाते हुए देख कर आहे भरने लगी. उसने भी तुरंत अपने कपडे उतार फेंके और मटकते हुए मेरे पास आ गयी.

मैं कुर्सी पर बैठा था सरोज घुटनों के बल बैठी और मेरे लंड को अपने हाथो में थाम लिया. उसकी नर्म उंगलियों ने जैसे ही उसे सहलाया मेरी आँखों में मस्ती छाने लगी. सरोज ने मेरे सुपाडे की खाल को निचे सरकाया और अपने होंठ वहां पर रख दिए. कसम से मेरा पूरा बदन झनझनाना गया . कुछ देर तक वो होंठ रगडती रही फिर उसने अपना मुह खोला और आधे से ज्यादा लिंग को मुह में भर लिया.

उसकी खुरदुरी जीभ मेरे सुपाडे पर गोल गोल घूम रही थी ऐसा लग रहा था की मैं हवा में उड़ने लगा हूँ .सरोज मेरे अन्डकोशो को सहला रही थी उसके होंठो से गिरता थूक अन्डकोशो को चिकने कर रहा था .सरोज ने बड़े दिन बाद मेरा लुंड चूसा था और जब हम अकेले थे वो इस मौके को कैसे हाथ से जाने दे सकती थी .

अब पूरा लंड उसके मुह में भरा था जिसे वो बहार नहीं निकाल रही थी . मैं उसके सर को बार बार निचे को दबा रहा था . मैं लंड को उसके गले तक डाल देना चाहता था . कुछ देर बाद वो उठ गयी और लम्बे सांस लेने लगी . मैंने उसे सोफे पर आने को कहा . सरोज अब घोड़ी बन गयी थी .

किसी भी औरत की खूबसूरती उसके चेहरे से नहीं बल्कि जब वो घोड़ी बनती है तो उसकी गांड के उभार से मालूम होती है .

“तेरी गांड बड़ी प्यारी है काकी, ” मैंने उसके गांड के छेद को ऊँगली से कुरेदते हुए कहा . वो कुछ नहीं बोली बस चुतड हिलाने लगी जो संकेत था की वो चुदने को तैयार है . मैंने उसकी चूत को थोडा सा खोला और अपना मुह वहां पर लगा दिया.
 
#49

पर मेरे नसीब में वो सुख नहीं था जिसकी मुझे तलब थी , इस से पहले की एक बार और मैं और सरोज एक हो जाते दरवाजा जोरो से पीटा जाने लगा. हमने जल्दी से कपडे पहने और निचे आये तो देखा की शकुन्तला दरवाजे पर थी . मुझे देखते ही उसके अन्दर का गुबार फूट पड़ा.

“मैंने तुमसे कहा था की उसे समझा लो पर तुमने मेरी नहीं मानी ” वो जोर जोर से चिलाने लगी.

मैं- ये क्या तमाशा कर रही हो अपने घर जाओ .

“चली जाउंगी, मैं बस तुम्हे ये बताने आई हूँ की दुश्मनी की आग में तुम भी झुल्सोगे, आज मैं रो रही हूँ, कल तुम्हारी बारी है तुम्हारी आँखों के सामने मैं उसे मार दूंगी. आग जो मेरे कलेजे में लगी है उसमे तुम्हे न जला दूंगी तब तक चैन नहीं आएगा मुझे ” शकुन्तला ने कहा

सरोज- सेठानी, औकात से ज्यादा बोल रही हो , ये मत भूलो की देव अकेला नहीं है .

शकुन्तला- तू तो चुप रह सरोज, तुझे नहीं मालूम तेरे इस देव ने क्या किया है . मेरी मांग का सिंदूर इसकी वजह से मिटा है इसके उस सांप ने मारा है मेरे पति को . मैं कसम खाती हूँ उस सांप को इसकी आँखों के सामने मारूंगी

सरोज- मार दे , चाहे जो कर हमें क्या लेना देना बस मेरे बच्चे को इसमें मत घसीट वैसे भी तेरा पति दूध का धुला नहीं था , तू भी जानती है , मेरे बच्चे को अगर खरोंच भी आई तो मैं खाल उतार लुंगी तेरी .

शकुन्तला- अपने पर आई तो कैसे बिलबिला गयी तू, इस से कह की उस सान्प को मेरे सामने ले आये. मैं बात खत्म कर दूंगी.

मैं- सेठानी मैं तेरे दुःख को समझता हूँ पर तेरे इस पागलपन को नहीं, तू जा यहाँ से , कोई फायदा नहीं है दुनिया को तमाशा दिखाने का .

शकुन्तला- जा रही हूँ पर दिन गिनने शुरू कर दे. और तूने जो उसे बचाने की कोशिश की तो पहला वार तुझ पर ही होगा.

मैं- तेरी यही इच्छा है तो ठीक है तू कर अपनी कोशिश , पर इतना याद रखना दुश्मनी की आग में तुझे ही झुलसना है . रही बात उस सांप की तो तू कोशिश करके देख ले . तेरा अंजाम तेरे सामने होगा.

शकुन्तला- तू ये मत समझना मैं अकेली हूँ मेरे साथ और भी लोग है .

मैं- जिसके लंड पर उछालना है उछल ले . पर मेरी बात याद रखना मेरे इस घर के किसी भी सदस्य को जरा भी खरोंच आई तो मैं क्या करूँगा सोच भी नहीं सकती तू.

शकुन्तला- भुगतेगा तू जल्दी ही .

वो तो चली गयी थी पर हमारे घर में कलेश कर गयी थी .सरोज काकी चढ़ गयी थी मुझ पर .

सरोज- ये क्या कांड कर दिया है तुमने ऐसा क्या किया है जो मुझसे छुपाया है , तुम्हे सब बताना होगा मुझे.

“तेरे सर की कसम काकी, लाला की मौत से मेरा कोई लेना देना नहीं है ” मैंने कहा .

सरोज- तू घर पर ही रहेगा कहीं नहीं जाएगा आगे से तू इस रांड का कोई भरोसा नहीं

मैं- तू घबरा न काकी. मैं देख लूँगा सेठानी को .

सरोज कुछ कहना चाहती थी पर उसने खुद को रोक लिया. शाम को सीधा मजार पर पहुंचा. बाबा धूनी सुलगा रहा था मुझे देख कर वो खुश हो गया .

मैं- लाला की घरवाली को लगता है की मैंने नागिन को कहकर लाला को मरवाया है . मुझ पर आरोप लगाया उसने .

बाबा- पर लाला को नागिन ने नहीं मारा .

मैं- मैं जानता हु इस बात को पर दुनिया नहीं मानती .

बाबा- दुनिया की दुनिया जाने.

मैं- शकुन्तला ने कसम खायी है नागिन को मारने की.

बाबा- कसम खायी है तो कर लेगी पूरी , उसकी वो जाने

मैं- नागिन से मिलना है मुझे

बाबा- मिल जाएगी

मैं- कब

बाबा- जब उसका मन होगा .

मैं-समझते क्यों नहीं बाबा.

बाबा- तुम नहीं समझते मुसाफिर , तुम नहीं समझते. ये नयी दुनिया जिसमे तुम आये हो ये कुछ नहीं है महज एक छलावे के . इसके रहस्य इतने गूढ़ है की तुम कभी नहीं समझ पाओगे. नागिन ने लाला के काफिलो पर हमला किया था वो लाला को मार ही देना चाहती थी पर वो बच गया . लाला से अपना बदला लेना चाहती थी वो .

“कैसा बदला बाबा ” मैंने कहा .

बाबा- बरसो पहले शिवाले में एक जोड़ा रहता था . मंदिर की साफ सफाई करते, भजन करते पूजा करते. मंदिर में बड़ी बरकत थी और धन भी था . मंदिर में शिवजी को सोने का छत्र था . लाला और उसके दोस्तों ने मंदिर में चोरी की . और इल्जाम उन भले मानसों पर लगा दिया. उनकी किसी ने नहीं सुनी . ये जो अपना पीपल है न यही पर होता था वो मंदिर . इसी पीपल पर फांसी लगा दी गयी उन दोनों भक्तो को .

मैं- ये तो अनर्थ हुआ बाबा. किसी ने विरोध नहीं किया . क्या सब मर गए थे , पंचायत भी खामोश रही .

बाबा- कुछ ऐसा ही समझ लो. उस समय तुम्हारे पिता कही बाहर थे जब वो लौटे और इस काण्ड का उन्हें मालूम हुआ तो गाँव का माहौल बहुत बिगड़ गया . युद्धवीर ने लाला और उसके दोस्तों के खिलाफ तलवार उठा ली. तब तुम्हारे दादा बीच में आये. चूँकि लाला और उसके दोस्तों के खिलाफ कोई ठोस सबूत नहीं था तो पंचायत भी कुछ न कर सकी. युधवीर बहुत मानता था भोले को . उसे इस बात का क्रोध था की खुद भोले के दरबार के ये अनर्थ हुआ तो और कहाँ न्याय मिलेगा. युद्ध की नजर जब उस जोड़े की बच्ची पर पड़ी. तो उसका मन बहुत व्याकुल हो गया . हमेशा सबका भला करने वाले, सबसे मिलकर चलने वाले युधवीर ने मंदिर तोड़ दिया. तुम्हारे दादा और युद्ध के बीच वैसे ही किसी बाट को लेकर अनबन थी उन दिनों बस उन्होंने युद्ध को घर से निकल जाने को कहा . और फरमान भी सुना दिया की परिवार का कोई भी सदस्य उस से रिश्ता न रखे.

बाबा की बाते सुनकर मेरे दिल में एक तीस उठ गयी .

मैं- तो वो बच्ची ही ये नागिन है

बाबा- हाँ ,

मैं- मैं उसे कुछ नहीं होने दूंगा. उसकी रक्षा करूँगा. बाबा मुझे मिलवा दो उस से

बाबा- हर पूर्णमासी की रात को वो पीपल के पास आती है .

बाबा ने कहा और चिलम सुलगाने लगे.

मैं अपनी माँ के पेड़ के पास आकार बैठ गया और सोचने लगा. मुझे ध्यान आया की चांदरात को ही तो मैंने उसे पहली बार देखा था . कुछ देर बाद मैं अपनी झोपडी की तरफ चल दिया. आधे रस्ते में पहुंचा ही था की मेरे सामने चार पांच गाड़िया आकर रुक गयी . गाड़ी में से जो सख्स सबसे पहले उतरा उसे देख कर मेरे मुह से निकला “तू यहाँ .”
 
#50

मेरी आँखों के सामने सतनाम का छोटा लड़का खड़ा था .

“मुझे तो आना ही था . तूने क्या सोचा था की तू मेरी बहन के मजे लेगा और मैं चुप रहूँगा. तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरी बहन की तरफ देखने की , ” उसने मुझे गुस्से से घूरते हुए कहा .

“मोना का नाम भी तू मत ले अपनी जुबान से, और किस रिश्ते की बाट करता है तू , कभी याद भी किया तूने उसको . उसके नाम की आड़ मत ले , वैसे भी मेरी हिम्मत का जिक्र करने लायक नहीं तू , शेर के शिकार के लिए कुत्तो के झुण्ड की जरुरत नहीं पड़ती . मैं वैसे ही मोना को लेकर बहुत परेशान हूँ , जा किसी और दिन मुह लगना ” मैंने उस से कहा और आगे बढ़ने लगा.

पर उसकी मंशा कुछ और थी . उसने मेरे कंधे पर हाथ रखा और बोला- ऐसे कैसे चला जायेगा. मेरे बाप को हमारे घर आकर धमकी दी तूने.

मैं- तो अब तू क्या चाहता है मैं तेरी गांड तोड़ दू.

मेरी बात सुनकर सतनाम का लड़का हसने लगा.

“पहली बार ऐसा इन्सान देखा जिसे मौत का खौफ नहीं है ” उसने कहा

मैं- मेरी मौत तेरे हाथो नहीं लिखी , जा लौट जा मैं बात को आई गयी कर दूंगा.

“पर तू आज अभी मरेगा. ” उसने कहा और मेरे पेट में लात मारी. मैं थोडा पीछे को हुआ. और मैंने उसके कान पर थप्पड़ दिया. उसके साथ के और लोग भी जुट गए. मार पिट शुरू हो गयी . मेरे हाथ एक लकड़ी लग गयी जिससे मैंने उनको पेलना शुरू किया पर वो लोग काफी ज्यादा थे तो एक समय के बाद वो भारी पड़ने लगे.

“मैंने कहा था न , अब दिखा तेरा जोश बड़ा शेर बन रहा था , अच्छे अच्छे हमारे सामने घुटने टेक गए. तेरी तो औकात ही क्या . इसे गाड़ी के पीछे बांधो . घसीट कर ले चलेंगे इसे , दुनिया को मालूम होना चाहिए की मुद्कियो से पंगा लेने का क्या अंजाम होता है . इसे मरना तो है ही पर इसकी मौत शानदार होनी चाहिए . ”

वो लोग मुझे मार ही रहे थे की अचानक से वातावरण के गर्मी बढ़ गयी. एक तेज फुफकार ने मुझे जैसे ज़माने भर की राहत दी हो. मैंने अँधेरे में उन दो पीली आँखों को चमकते देखा. अगले ही पल दो लड़के हवा में उछले और गाड़ी के बोनट पर आ गिरे.

“कौन है ” छोटा मुडकी चिल्लाया पर उसकी चीख जैसे गले में दब गयी . जैसे को बड़ा पत्थर टकराया हो एक गाडी चकनाचूर हो गयी. मैंने मौके का फायदा उठाया और बाजी अपने हाथ में ले ली. पर मुझे कुछ करने की ज्यादा जरुरत नहीं पड़ी . जल्दी ही सब कुछ ऐसे शांत हो गया जैसे कुछ हुआ ही नहीं.

रह गया मैं अकेला और ये ख़ामोशी जो किसी बम से कम नहीं थी. वे लोग जिन्दा थे या मर गए थे मुझे घंटा फ़िक्र नहीं थी . मुझे फ़िक्र थी उस नागिन की जिस से मैं मिलना चाहता था . पर तभी उस चूतिये मुडकी ने बन्दूक चला दी.

“नहीं मैं चीखा ” और नागिन की तरफ भागा . मुझे लगा की उसे गोली न लग जाए. मैंने बस एक झलक उसकी दूर जाते देखी. और मैं सुध बुध भूल कर उसकी तरफ भागा.

“रुको, रुक जाओ मुझे बात करनी है तुमसे ” मैं चीख रहा था पर भला मेरी कौन सुनता . वो बड़ी तेजी से रेंग रही थी , कभी कभी मुझे उसकी झलक दिखती तो कभी लगता की वो गायब हो गयी है . पर मैंने भी ठान ली थी की आज मुझे इस मौके को नहीं छोड़ना है . भागते भागते मैं उसी पीपल के पेड़ के पास आ गया . पर यहाँ कुछ नहीं था .

“मैं जानता हूँ तुम यही कही हो. तुम चाहे लाख कोशिश कर लो पर आज तुम्हे मुझसे मिलना होगा तुम ऐसे मुझे छोड़ कर नहीं जा सकती . मुझसे बात करनी ही होगी तुम्हे. . ”मैं चिल्ला रहा था पर कोई सुनने वाला नहीं था . पर आज मुझे कुछ भी करके नागिन से मिलना ही था . पीपल पर एक दिया जल रहा था मैंने उसे उठाया और उसकी रौशनी में नागिन के खोज तलाशने लगा. और मुझे कामयाबी भी मिली. पीपल के पास से एक संकरी पगडण्डी जाती थी . मैं उसी पर चल दिया. करीब आधा किलोमीटर जाने के बाद जैसे एक और हैरानी मेरा इंतजार कर रही थी .

मैं रूपा के घर की पिछली तरफ खड़ा था . घर यहाँ से महज कुछ कदम की दुरी पर था . अब मेरा दिमाग हद से ज्यादा बेकाबू हो गया था . मैं घर की तरफ बढ़ा. रौशनी थी मतलब रूपा जागी हुई थी . मैंने देखा दरवाजा खुला था मैं अन्दर पहुंचा और मैंने देखा रूपा की पीठ मेरी तरफ थी वो कुछ कर रही थी .

“रूपा ” मैंने उसे पुकारा .वो झटके से मेरी तरफ पलटी

“तुम, डरा ही दिया था मुझे , ये कोई वक्त है आने का ” उसने कहा .

मैंने उस पर नजर डाली. उसके कपडे से कुछ टपक रहा था मैंने देखा वो खून था , सुर्ख खून .

“ये खून कैसा रूपा. ” मैंने कहा

रूपा- अरे कुछ नहीं . मामूली सा जख्म है इसकी ही सिलाई कर रह थी की तुम आ गए. बैठो बस दो मिनट. फिर बाते करते है .

रूपा अपने जख्म को साफ़ करके उसे सिलने लगी.

“कैसे लगा ये जख्म ” मैंने पूछा

रूपा- कहा न कुछ नहीं . बस ऐसे ही

मैं- मैंने पूछा कैसे लगा ये जख्म तुझे .

रूपा ने गौर से देखा मुझे और बोली- क्या बात है , क्यों संजीदा हो रहा है इस छोटे से जख्म के पीछे. वो खेतो पर तार बंदी हुई है मुझे मालूम नहीं था तो बस उसी धोखे में लग गया. यकीं न हो तो तार दिखा आऊं

और तू अपनी बता ये क्या हालत बनाई हुई है . किसी से झगडा हुआ क्या तेरा.

मैंने उसे मुडकी के लड़के वाली बात बताई.

रूपा- दूर रहा कर इन सब पचड़ो से नहा ले . मैं पानी गर्म कर देती हूँ.

मैंने हाँ में सर हिलाया .पर वो खून मुझे पागल कर रहा था क्योंकि वो खून अजीब सा था , मैंने उसे हाथ में लिया और मैं जान गया की वो खून इतना अजीब क्यों था .
 
#51

ये ही खून हवेली में बिखरा हुआ था . और ये ही रूपा के घर में . रूपा मुझसे झूठ बोल रही थी , मुझसे झूठ . इस बात से मेरे दिल को बहुत ठेस पहुंची थी . मेरी जान , मेरी होने वाली पत्नी . मेरी सरकार मुझसे झूठ बोल रही थी . बेशक जिंदगी से कोई खास ख़ुशी मिली नहीं थी पर फिर भी रूपा एक ऐसी लहर बनकर आई थी जो मुझे सकून देती थी . पर उसका ये झूठ , ये बाते छिपाने की कला अब मुझसे सही नहीं जाती थी .

मैं घर से बाहर आया और उसकी दहलीज पर दिवार का सहारा लेकर बैठ गया . कुछ लम्हों के लिए मैंने अपनी आँखे मूँद ली .

“अरे, यहाँ क्यों बैठा है तुझे ठण्ड लग जानी है , पानी बस गर्म हुआ ही .ले तब तक चाय पी ले. ” रूपा मेरे पास चाय का कप लिए खड़ी थी .

“इच्छा नहीं है मेरी ” मैंने कहा

रूपा- ये तो पहली बार हुआ मेरे सरकार चाय के लिए मना कर रहे है , क्या बात है .

मैं- तू मुझसे कितना प्यार करती है , कितना चाहती है मुझे.

रूपा- ये कैसा सवाल है देव

मैं- बता मुझे कितना चाहती है तू

रूपा मेरे पास बैठी और बोली- तू बता तुझे कैसे लगेगा की मैं तुझे कितना चाहती हूँ . तू पैमाना ला जो तुझे तसल्ली दे की मैं तुझे कितना चाहती हूँ .

रूपा ने मेरा हाथ कसकर पकड लिया.

रूपा- मेरी मोहब्बत के बारे में मुझसे ना पूछ सनम, तेरे दिल से पूछ . वो बता देगा .

मैं- मैं परेशां हूँ रूपा

रूपा- समझती हूँ ,

मैं- क्या वो नागिन तेरे पास आई थी .

रूपा- मेरे पास क्यों आएगी, तुझे तो मालूम है उस दिन मजार में हमारा झगड़ा हुआ था .

मैं- जानता हु पर तू चिकित्सक भी है यदि वो यहाँ इलाज करवाने आई हो .

रूपा- ऐसा मुमकिन नहीं .

मैं- क्यों

रूपा- वो श्रेष्ट है , उसे मेरी जरुरत नहीं

मैं- तो फिर ये खून किसका है इन्सान का तो नहीं है . इस रक्त को मैंने पहले भी देखा है .

रूपा- अच्छा तो इसलिए परेशां है तू, तू भी न देव, ये तो नीलगाय का रक्त है , इसमें कुछ दुर्लभ गुण होते है . कुछ कामो में इसका रक्त उपयोग किया जाता है . ये जो मेरी पीठ पर जख्म है उसमे इस रक्त और कुछ जड़ी बूटियों को मिलाकर एक लेप बनाते है जो मुझे आराम देता है और जल्दी ही त्वचा पहले सी हो जाएगी.

रूपा ने मेरे गाल पर हल्का सा किस किया और बोली- मैं जानती हूँ तेरे लिए ये सब अजीब है , पर तुझे आदत हो जाएगी. ये दुनिया अपने आप में रंगीली है , इसमें सब कुछ है .फ़िलहाल तो बीच में है तो परेशां है . मैं- क्या तू भी तेरी माँ जैसी जादूगरनी है .

रूपा मेरी बात सुनकर जोर जोर से हंसने लगी .

“तू भी न , अगर मैं जादूगरनी होती तो क्या मेरा ये हाल होता ” उसने मुझसे पूछा.

मैं- ठीक है मैं चलता हूँ रात बहुत हुई.

रूपा- चाहे तो रुक जा मेरे संग

मैं- फिर कभी .

मैं उठा और वहां से चल दिया. कुछ कदम ही चला था की रूपा ने मुझे आवाज दी.

“देव रुक जरा. ”

मैं रुक गया . वो मेरे पास आई .

“तू चाहे मुझ पर लाख शक करना पर मेरी मोहब्बत पर कभी शक न करना. सारी दुनिया के ताने सुन सकती हु, पर तेरी टेढ़ी नजर नहीं सह पाऊँगी. ये नूर मुझ पर तूने चढ़ाया है इसे उतरने न देना . ” बस इतना कह कर वो वापिस हो गयी. मेरे जवाब का इंतज़ार नहीं किया उसने.

और मैं उसे जवाब भी देता तो क्या मैं खुद एक चुतियापे में जी रहा था . रूपा के यहाँ से तो चल पड़ा था पर मैं घर नहीं गया मैं मजार पर गया . मैं बस उस पेड़ से लिपट कर रोता रहा . ऐसा लगा जैसे मेरी माँ ने मुझे अपने आंचल तले छुपा लिया हो.

“कभी कभी ऐसे रो भी लेना चाहिए, मन हल्का हो जाता है ” बाबा ने मुझे आवाज देते हुए कहा.

मैं बाबा के पास गया.

मैं- बाबा, मेरे पिता ने जो मंदिर तोडा था मैं उसे दुबारा बनवाना चाहता हूँ .

बाबा ने मुझे बैठने का इशारा किआ.

बाबा- बेशक तुम बनवा दोगे . पर उसका मान कहाँ से लाओगे . वहां जो पाप हुआ था उसके बदले का पुन्य कहाँ से लाओगे . बड़ी मुश्किल से उस मासूम ने खुद को संभाला है तुम मंदिर तो बनवा दोगे पर वो जब जब उसे देखेगी उसका मन रोयेगा. विचार करो .

मैं- तो क्या करू मैं.

बाबा- उसे उसके हाल पर छोड़ दो . फिलहाल मेरी प्राथमिकता तुम्हारी सुरक्षा है . एक तो तुम कहना नहीं मानते हो . दिन रात बस भटकते रहते हो . ये राते ठीक नहीं है , एक बार तुम बड़ी मुश्किल से बचे हो हर बार किस्मत साथ नहीं देगी. कुछ दिनों के लिए तुम तुम्हारी माँ की हवेली में क्यों नहीं चले जाते, तुम्हारी हर जरुरत की व्यवस्था मैं कर दूंगा.

“पर ऐसा क्या हुआ बाबा, जो आप इतने चिंतित है ” मैंने कहा

बाबा- समय बदल रहा है मुसाफिर. ये राते अब खामोश नहीं है . चरवाहों के तिबारे पर हमला हुआ है , उसे तहस नहस कर दिया गया है .

मैं- किसने किया और क्यों .

बाबा- पड़ताल जारी है .

मैं- मेरा क्या लेना देना बाबा तिबारे से

बाबा- सब तुझसे ही है मेरे बच्चे, सब तुझसे ही है .

मैं- क्या बाबा

बाबा- मुझे लगता था की तू जादूगर बनेगा. पर अभी तक लक्षण दिखे नहीं . इसी बात ने मुझे हैरान किया हुआ है.

मैं- क्या ये जरुरी है बाबा

बाबा- नहीं जरुरी नहीं , पर बस मुझे लगा था . खैर, कल तू हवेली चलेगा मेरे साथ

मैं- एक शर्त पर

बाबा- क्या

मैं- आप दूसरी मंजिल को खोल देंगे.

बाबा ने एक गहरी सांस ली और बोले- वहां कुछ नहीं है

मैं- कुछ नहीं है तो फिर कैसा ताला,

बाबा - कल शाम हम वहां चलेंगे .

मैंने हाँ में सर हिला दिया.

मैं वापिस मुड लिया था . अपने आप में खोया हुआ मैं खेत में बनी झोपडी की तरफ जा रहा था की रौशनी ने मेरा ध्यान खींच लिया. झोपडी में हुई रौशनी दूर से ही मुझे दिख रही थी . यहाँ कौन हो सकता है , शायद करतार होगा. मैंने सोचा .और झोपडी की तरफ बढ़ लिया. मैंने हलके से परदे को खोला और जो देखा............... देखता ही रह गया.
 
#52

मेरे बिस्तर पर चुदाई चल रही थी शकुन्तला पर विक्रम चाचा चढ़े हुए थे . सारे जहाँ को भूल कर दोनों एक दुसरे में खोये हुए थे . एक औरत जिसका पति बस कुछ दिन पहले ही मरा था , वो दुसरे मर्द की बाँहों में थी . पर मुझे परवाह नहीं थी . मुझे हैरानी थी की मेरी झोपडी में ये दोनों कर क्या रहे है क्योंकि चाचा चाहता तो उसे बाग़ पर भी ले जा सकता था . खैर, मुझे चुदाई में कोई इंटरेस्ट नहीं था. मैं बस उनकी बाते सुनना चाहता था . इसलिए घूम कर मैं झोपडी की पिछली तरफ चला गया. जल्दी ही दोनों की बाते शुरू हो गयी तो मैं समझ गया की चुदाई खत्म हुई.

विक्रम- तुमने देव से झगडा करके मामला बिगाड़ दिया है ,

सेठानी- अब जो हुआ वो हुआ, वैसे भी वो बहुत ही बदतमीज है , कुछ ही मुलाकातों में उसने बता दिया था की मेरी लेना चाहता है वो.

विक्रम- इस बारे में अपनी बात हो तो गई थी , और एक दो बार चढ़ लेता तो क्या घिस जाता तुम्हारा.

सेठानी- मैं गयी थी उसके पास. मैं तैयार थी बदले में मैं लाला की जान की हिफाजत ही तो चाहती थी .

विक्रम- हम्म

सेठानी- पर जो हुआ वो हुआ.

विक्रम- पर मामला बिगड़ गया है .

सेठानी- उडती उडती खबर है की वो किसी लड़की के साथ घूमता है

विक्रम- सतनाम की लड़की है वो. न जाने कहा से ये टकरा गया उस से . मुझे लगता है की देव प्यार में है उस से, सतनाम को उसके घर जाके धमकी दे आया.

सेठानी- सच में, खैर, डरने वालो में से तो नहीं है वो . बिलकुल अपने बाप पर गया है.

विक्रम- पर युद्ध नहीं है वो.

सेठानी- तो क्या सोचा तुमने , कैसे करना है ये सब

विक्रम- सतनाम देख लेगा.

सेठानी- वो सांप पागल हुए घूम रहा है , हमारे आदमियों को मार रहा है .कुछ करते क्यों नहीं उसका.

विक्रम- मैंने सोचा है उसके बारे में इस पूनम को एक तांत्रिक सपेरा बुलाया है मैंने उमीद तो है काम कर देगा वो .

सेठानी- पर उसे मारूंगी मैं .

विक्रम- क्यों हाथ गंदे करती हो .

सेठानी- तुम तो चुप ही रहो . खुद जैसे दूध के धुले हो. इस कहानी के तीसरे सूत्रधार तुम ही तो हो.

विक्रम- श्ह्ह्हह्ह, ऐसी बाते नहीं करते , आजकल हवाओ में उडती है बाते

शकुन्तला- पर मुझे आजतक ये समझ नहीं आया की तुमने देव को क्यों रखा अपने घर जब की उसके अपनों ने ठुकरा दिया उसे.

विक्रम- ऐसा करना जरुरी था , उस घटना के बाद गाँव में छवि बिगड़ गयी थी तो उसे सुधारने का इस से अच्छा क्या मौका था . दूसरा नागेश का हुक्म था . तीसरा, बेशक ठाकुर साहब ने देव को कभी मन से अपना पोता नहीं माना था पर युद्ध की मौत के बाद उन्होंने मुझे बहुत सी जमीन दी. पैसे दिए इसे पालने को . और आज देखो मैं कहा हूँ .

सेठानी- और वो सोना-चांदी कहाँ गया .

विक्रम- मुझे नहीं मालूम

सेठानी- झूठ मत बोलो, कम से कम मुझे तो बता दो.

विक्रम- सतनाम ने छुपाये है कहीं पर वो . पर मुझे लगता है की उसने बेच खाए होंगे.

सेठानी- कभी पूछा नहीं तुमने

विक्रम- पूछा था , पर हर बार वही जवाब .

सेठानी- तो देव का क्या होगा. खबर है की नागेश लौट आया है.

विक्रम- अभी पक्की नहीं हुई है खबर. पर सुलतान जिस हिसाब से भागदौड़ कर रहा है कुछ तो बात लगती है .

सेठानी- देव की मौत का दुःख होगा तुम्हे .

विक्रम- दुःख तो मुझ को युद्ध की मौत का भी नहीं हुआ था .

ये ऐसी बाते थी जो मर दिल तोड़ गयी थी . साला इस दुनिया में हर कोई मतलब परस्त ही था . सब एक दुसरे को इस्तेमाल कर रहे थे ,कितने काले मन के थे ये लोग . दिल किया की अभी इस वक्त इनकी गांड तोड़ दू, पर फिर खुद को रोक लिया . अभी और सुननी थी इनकी बाते. देखना था कितना जहर था दुनिया में.

विक्रम- वैसे हालात अभी और बिगड़ेंगे, देव सतनाम को धमका आया , मोना कुछ दिनों से गायब है नौकरी भी छोड़ दी उसने, देव को लगता है की मोना के गायब होने में सतनाम का हाथ है .

सेठानी- तुमने सतनाम से बात की .

विक्रम- वो चाहता तो मोना को कभी का मरवा देता ,वो कभी ऐसा नहीं करेगा. छोड़ इन बातो को , मैं तुझे बताना तो भूल ही गया . सतनाम अपने छोटे बेटे की शादी कर रहा है इसी महीने .

सेठानी- बताया नहीं उसने मुझे .

विक्रम- अचानक से ही हुआ सब .

सेठानी- मोना तो जाएगी नहीं, आरती कौन करेगा

विक्रम- सोचने वाली बात है . मुझे लगता है पाली आएगी

सेठानी- मुश्किल है , मुझे नहीं लगता वो आएगी.

विक्रम- छोड़ न तू भी क्या लेके बैठ गयी , ये रात बड़ी मुश्किल से मिली है जब तुम मेरी बाँहों में हो सोचा था दो तीन बार लूँगा पर तुम टाइम पास कर रही हो .

शकुन्तला- अच्छा जी , ये बात है तो आओ मैदान में .

वो दोनों फिर से शुरू हो गए. मेरा दिल किया की अभी फूंक दू इस झोपडी को . पर मैं अपने गुस्से को पीते हुए वहां से चल दिया. ये रात साली बड़ी लम्बी हो गयी थी ख़त्म ही नहीं हो रही थी . पर मैंने अपना फैसला ले लिया था की सुबह मैं अपना रास्ता चुन लूँगा, वो रास्ता जिस पर मुझे अब अकेले चलना था .
 
फिलहाल मेरी प्राथमिकता थी तांत्रिक से नागिन को बचाना. पूनम की रात ठीक दो दिन बाद थी इस रात के, मुझे जो करना था इसी समय में करना था . मैं समझ गया था की मंदिर के तीन चोर कौन कौन थे, सतनाम, लाला और विक्रम . विक्रम जिसे मैं अपने बाप सा समझता था वो मुझे सिर्फ मेरी दौलत के लिए पाल रहा था . वो दौलत जिसके बारे में मैंने कभी सोचा भी नहीं था .

दिल साला बुझ सा गया था . जी चाहता था की मैं खूब रोऊ पर नहीं . इन आंसुओ को पीना था मुझे. मोना, नागिन, नागेश, रूपा . और ये तीन दुश्मन इनके बारे में सोचते सोचते मेरा जी घबराने लगा था . मुझे चक्कर आने लगा था .पर इस से पहले की मैं बिखर कर गिर जाता किसी की बाँहों ने थाम लिया मुझे.............................

#53

“खामोश रातो में यु अकेले नहीं भटका करते मुसाफिर ”

मैंने देखा ये रूपा थी.

“तुम यहाँ ,इस समय ” मैंने कहा

रूपा- तुम भी तो हो यहाँ, इस समय .

मैं- मेरा क्या है , मैं तो मुसाफिर हूँ भला मेरा क्या ठिकाना और वैसे भी इस जहाँ से बेगाना हु ,

रूपा- पर ऐसे कैसे फिरता है तू, क्या हाल है तेरा, मैं अगर थाम न लेती तो गिर जाता .

मैं- अच्छा होता जो गिर जाता

रूपा- क्या हुआ

मैं- जाने दे, ये गम भी मेरा ये तन्हाई भी मेरी

रूपा- मैं भी तो तेरी ही हूँ .

मैंने रूपा को सारी बात बताई की कैसे विक्रम मुझे अपने लालच के लिए पाल रहा था .

“तुझे किसी बात से घबराने की जरुरत नहीं है तेरे साथ मैं खड़ी हूँ , मेरे होते तुझे कुछ नहीं होगा. सावित्री जैसे सत्यवान के लिए यमराज के सामने खड़ी थी , तेरे और तेरे दुश्मनों के बीच एक दिवार है , उस दिवार का नाम रूपा है . ” रूपा ने कहा था .

“सावित्री पत्नी थी सत्यवान की ” मैंने कहा .

रूपा ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- चल मेरे साथ .

मैं- कहाँ

रूपा- चल तो सही .

मुझे लेकर रूपा मजार पर आ गयी.

“अब यहाँ क्यों ले आई . ”मैंने कहा

रूपा ने जलते दिए को अपनी हथेली पर रखा और बोली- पीर साहब को साक्षी मानकर मैं तुझे वचन देती हूँ की मेरी मांग में तेरा सिंदूर होगा. मैं तुझे वचन देती हूँ की तू दिल है तो मैं धड़कन बनूँगी, मैं हर कदम तेरे साथ चलूंगी . आज मेरे हाथ में ये दिया है , कुछ दिन बाद इसी अग्नि के सामने मैं तेरे संग फेरे लुंगी. आज से पंद्रह दिन बाद तू मेरे घर आना , मेरे पिता से मेरा हाथ मांगना. मैं इंतज़ार करुँगी. मुसाफिर तेरे सफ़र की मंजिल तेरे सामने खड़ी है “

रूपा ने मुझे अपनी बाँहों में भर लिया.

“तैयारिया कर ले मुसाफिर, ” उसने मेरे कान में कहा.

इस से पहले मैं उसे जवाब दे पाता बाबा की आवाज आई- इबादत की जगह है ये ,

मैं- इश्क से बड़ी क्या इबादत भला .

बाबा- सो तो है , इतनी सुबह सुबह कैसे.

रूपा- हम जैसो की क्या रात और क्या सुबह बाबा . मैं तो इसी समय आती हु,

बाबा- मैंने इस से पूछा था

बाबा ने मेरी तरफ इशारा करते हुए कहा.

मैं- बाबा , मैं मकान बनाना चाहता हूँ

बाबा- अच्छी बात है पर समय ठीक नहीं है . और तुम्हारे पास घर तो है ही .

बाबा का इशारा हवेली की तरफ था.

“रूपा, चा बना ला जरा ” बाबा ने रूपा को वहां से भेजा

बाबा- फिजा में एक गर्मी सी है , वक्त करवट ले रहा है मुसाफिर, जल्दी न कर .

मैंने देखा बाबा के झोले में कुछ फडफडा रहा था,

मैं- क्या है झोले में

बाबा- कुछ नहीं , तू तैयार रहना आज शाम हम चलेंगे हवेली .

मैंने हां में सर हिला दिया. तब तक रूपा चाय ले आई, सर्दी में गर्म चाय ने थोडा आराम दिया पर दिमाग में अभी भी विक्रम चाचा और शकुन्तला की बाते घूम रही थी . मैंने देखा रूपा भी बड़े गौर से बाबा के झोले को घुर रही थी .

एक मन किया की तांत्रिक वाली बात बता दू इन दोनों को पर फिर खुद को रोक लिया. क्योंकि मेरे दिमाग में एक बात और थी .

मैं- बाबा, अब जबकि मैं जानता हूँ की मंदिर के असली चोर कौन कौन थे तो क्यों न पंचायत बुलाई जाये और भूल सुधारी जाए.

बाबा- गड़े मुर्दे उखाड़ने का कोई फायदा नहीं और वैसे भी तुम्हारे पास क्या सबूत है वो लोग साफ़ मना कर देंगे फिर क्या करोगे तुम. बताओ

बाबा की बात सही थी.

मैं- तो क्या करू मैं .

बाबा- फ़िलहाल तो शांत रहो . अभी जाओ तुम दोनों

रूपा- मैं रुकुंगी, सफाई करके जाउंगी.

मैं-मैं जाता हूँ , रूपा दो मिनट आना जरा .

मैं रूपा को बाहर लाया.

रूपा- क्या हुआ.

मैं- क्या तू मालूम कर सकती है बाबा के झोले में क्या है .

रूपा- नहीं .

मैं- ठीक है चलता हूँ फिर.

मैं घर की तरफ चल पड़ा. सरोज शायद थोड़ी देर पहले उठी ही थी .

“कहाँ थे तुम रात भर ” पूछा उसने.

मैं- क्या मालूम कहाँ था , बस अपना कुछ सामान लेने आया हूँ . मैं इस घर को छोड़ कर जा रहा हूँ .
 
मेरी बात ने जैसे सरोज को सुन्न सा कर दिया था . कुछ पलो के लिए उसे समझ ही नहीं आया की मैंने क्या कह दिया उसने.

“क्या कहा तूने , घर छोड़ कर जा रहा है ” उसका गला जैसे रुंध सा गया .

मैं-मुझे कही जाना है और मैं वापिस शयद नहीं लौट पाउँगा.

सरोज-पर ऐसा क्या हुआ, ये तुम्हारा अपना घर है .

मैं-फिर कभी बताऊंगा.

मैं अपने कमरे में आया जितना सामान मुझे चाहिए था मैंने दो बैग में भर लिया . और वहां से वापिस हो गया. सरोज रोकती रह गयी पर मैं रुका नहीं . उसने रो रोकर पूछा पर मैं चाह कर भी उसे उसके पति की करतूतों के बारे में बता न सका.

बैग मैंने गाडी में डाले और जूनागढ़ पहुँच गया , मोना अभी तक नहीं वापिस आई थी. मेरे लिए बड़ी चिंता की बात थी ये.

“कुछ तो मालूम होगा, ” मैंने नौकर से कहा .

नौकर- हुकुम, बड़ी रानी सा भी दो तीन बार मेमसाहब के बारे में पूछ गयी

मैं- सतनाम के घर में क्या हाल है .

नौकर- शादी की तैयारिया चल रही है ,

मैं- ऐसी कोई तो जगह होगी जहाँ मोना अक्सर जाया करती थी . उसके कोई तो दोस्त होंगे,

नौकर- सबसे पड़ताल कर ली है सबका एक ही जवाब हमारे यहाँ नहीं आई.

मैं- नानी क्यों आई थी यहाँ पर .

नौकर- छोटे साहब की शादी है तो रस्मो में आरती का हक़ मेमसाहब है , बड़ी रानी चाहती है की शादी के बहाने परिवार के शिकवे दूर हो जाये.

मैं- सुन एक काम कर, नानी को संदेसा दे की मैं मिलना चाहता हूँ उनसे, वो हाँ कहे तो यहाँ ले आ उनको .

नौकर चला गया . मैं सोचने बैठ गया की दूसरी तरफ से क्या जवाब आएगा. करीब बीस मिनट बाद नौकर वापिस आया , उसके साथ नानी तो नहीं थी पर कोई और था , जिसके आने की मैंने कभी नहीं सोची थी .
 
#54

दरवाजे पर जब्बर था . उसे देखते ही मेरे माथे पर बल पड़ गए . जब्बर का यहाँ होना भला कैसा संकेत था .

“तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की ” मैंने कहा

जब्बर- ठण्ड रख ओये, मैं बस तुझसे मिलने आया हु दो बात करूँगा फिर चला जाऊंगा. माना की अपने बीच मामला थोडा टेढ़ा है फिर भी ....

मैं- ठीक है , बता क्या बात है .

जब्बर- तुझे मालूम तो है ही की लाला महिपाल की मौत हो गयी है , शकुन्तला से मेरे कुछ निजी तालुकात है , और जैसा की तुझे सब मालूम हो ही गया है की विक्रम भी तेरा इस्तेमाल कर रहा था

मैं- तो

जब्बर- मुझे तेरी मौत की सुपारी मिली है

मैं- हाँ तो ठीक है , मार दे मुझे खत्म कर बात को

जब्बर- बात ये नहीं है , दरअसल मुझे मोना की फ़िक्र है ,

मैं- उसकी फ़िक्र और तुझे,

जब्बर- चाहे मैं कैसा भी हूँ पर मैं चाहता हु उसे

मैं- चाहता तो उसे तलाश करता , उसके बारे में पता लगाता , सतनाम ने ही उसे गायब किया है .

जब्बर- नहीं , ऐसा नहीं है बाउजी का मोना के गायब होने से कुछ लेना देना नहीं है बल्कि वो तो खुद दिन रात एक किये हुए है , छोटे मुडकी की शादी में कुछ ही दिन बाकि है , बाउजी चाहते थे की मोना आरती करे , शादी के बहाने परिवार पुराने गिले शिकवे भूल कर एक हो जाये.

मैं- अगर तेरी नियत नेक है तो मेरी मदद कर मोना को ढूंढने में , पर मैं कैसे विश्वास करू तेरा.

जब्बर- मैं जानता हु, ये मुश्किल है अगर मैं अपना दिल निकाल के रख दू तो भी तुझे यकीन दिलाना मुश्किल है . तू चाहे मेरा विश्वास कर या न कर पर सच यही है की मुझे फ़िक्र है मोना की .

मैं- तो यकीन दिला मुझे , कर मदद उसे तलाशने में

जब्बर- मैंने अपने स्तर पर भी कोशिश की पर उसे किसी ने भी कही से भी आते जाते नहीं देखा, उसकी कार भी सरकारी यही है , जबकि उसके पैर में पलस्तर था . तो अकेले कैसे वो आ जा सकती है .

मैं- यही बात तो मुझे खटक रही है.

जब्बर-एक बात और कहना चाहता हूँ , तू बेफिक्र रह तुझे कोई हाथ भी नहीं लगा पायेगा, जब तक मैं हूँ

“और इस मेहरबानी की वजह ” मैंने पूछा

जब्बर- मेहरबानी तो सुहासिनी बुआ की थी , मैं तो जिन्दा ही उनकी बजह से हूँ , वो न होती तो मैं बचपन में ही मर जाता, मुझे जबसे मालूम हुआ की तू उनका बेटा है मैं मिलना चाहता था तुझसे पर समझ नहीं आ रहा था की कैसे मिलु.

मैं- अब तो मिल लिया न, छोड़ पुरानी बातो को , वैसे किसने सुपारी दी थी मुझे मारने को .

जब्बर- छोड़ न क्या फर्क पड़ता है वैसे भी तेरे चारो तरफ तो दुश्मन ही दुश्मन है

मैं- फिर भी बता दे

जब्बर- सुनना चाहता है तो सुन , तेरी काकी सरोज ने

एक पल को लगा की जैसे मैंने कुछ गलत सुन लिया हो .

मैं- क्या कहा तूने

जब्बर- मैं जानता हु तेरे लिए विश्वास करना बड़ा मुश्किल है , पर मेरा यकीन कर मैंने जो कहा वो सही है , तेरे घर छोड़ने के बाद सरोज मेरे पास आई थी , उसने मुझे १ लाख रूपये दिए ताकि मैं तुझे मार दू, तेरा विश्वास करना मुश्किल है पर मैं ये बाट साबित कर सकता हूँ ,

मैं- कैसे

जब्बर- मैं उसे बुला लूँगा तू आस पास छिपे रहना , हमारे बीच जो भी बाते होंगी तू सुन लेना फिर तुझे यकीन होगा.

जब्बर जिस तरीके से कह रहा था ऐसा लगता था की वो सच कहता है , पर मैं किसकी बात को सच मानु इस जब्बर की जो कुछ देर पहले मेरा दुश्मन था या फिर उस काकी की जिसने मुझे बचपन से पाला था .

“कुछ देर मैं अकेला रहना चाहता हूँ ” मैंने जब्बर से कहा तो वो चला गया .

मैं अपना माथा पकड़ कर बैठ गया , जिन्दगी मुझे क्या क्या दिखा रही थी . सरोज मुझे मरवाना चाहती थी , मेरे आसपास जो भी लोग थे रहस्य से भरे थे , सबके मन में कुछ न कुछ राज दफ़न था . और जिस जिस पर मैं बिश्वास कर रहा था वो ही छल रहे थे मुझे. सोचते सोचते न जाने कितना समय हो गया मुझे, न जाने कितनी शराब पी गया मैं . दो चार दिन बड़ी मुश्किल से निकले मेरे, हाल ऐसा था की मैं कहूँ तो क्या करू तो क्या . मोना की हवेली में जैसे कैद कर लिया मैंने खुद को .

दुनिया से जैसे नफरत सी हो गयी थी . पर मैं कहाँ जानता था की अभी तो मुझे बहुत कुछ देखा बाकी था . शयद वो पांचवा दिन था , आज ही वो तांत्रिक आने वाला था जो शकुन्तला ने बुलवाया था . खामोश रात में जब बस हवा का शोर था , मैं छुपा हुआ बस इंतजार कर रहा था की कब वो तांत्रिक आये , मैं बिलकुल नहीं चाहता था की वो कुछ भी उल्टा सीधा करे नागिन के साथ .

उस रात पीपल के निचे शकुन्तला, विक्रम दोनों मोजूद थे, मेरा दिल कर रहा था की अभी के अभी इन दोनों को मार दू. पर अभी इंतज़ार करना था , रात के करीब ११ बजे वहां एक गाड़ी और आई और उसमे से जो उतरा वो , वो शक्श था जिसे आज यहाँ नहीं होना था . विक्रम उस से कुछ बाते करने लगा. और फिर वो शकुन्तला को लेकर चला गया .

तांत्रिक के साथ दो और आदमी थे, उन्होंने अपना सामान लगाया और अपनी तयारी करने लगे.

मैं थोडा और आगे को चला ताकि बाते सुन सकू.

तांत्रिक- चेलो, आज तुम्हे ऐसी चीज दिखाऊंगा जो जिन्दगी में कभी कभी ही देखने को मिलता है ,

चेला- जी बाबा,

तांत्रिक ने अग्नि जलाई और उसमे कुछ सामान डाल कर अपनी पूजा करने लगा. हवा में अग्नि की लपटे जोर जोर से फडफडा रही थी , फिर उसने अपने झोले से एक बीन निकाली जो बहुत बड़ी थी , उस पर सितारे जड़े थे जो अग्नि की रौशनी में चमक रहे थे . तांत्रिक ने बीन अपने होंठो से लगाई और वातावरण में अजीब सी धुन गूंजने लगी , सब कुछ जैसे शिथिल होने लगा. करीब आधा घंटा बीता, पर उसका साँस नहीं टुटा वो बस बीन बजाता रहा और फिर माहौल जैसे बदल गया , दूर से ही फुफकार की आवाज आने लगी , वो आ गयी थी .
 
#55

“आजा , सामने आ मुझे तेरा ही इंतज़ार था ,आज तुझे पाकर ही रहूँगा ” तांत्रिक ने अट्टहास करते हुए कहा.

सामने से एक गहरी फुफकार आई , हवा में जहर फ़ैल गया , पर तांत्रिक ने फौरन ही कोई मन्त्र पढ़ा .

“नागिन, तेरा मुझ से पाला पड़ा है , तूने बहुत मासूम लोगो को अपना शिकार बना लिया है पर अब तेरा समय बीता. तेरे पास दो रस्ते है या तो मेरी शरण में आजा या मौत के ” तांत्रिक ने कहा.

मामला गंभीर हो चला था . तांत्रिक मुझे बहुत पहुंचा हुआ लगता था . उसने अपने आस पास एक राख का घेरा बनाया हुआ था ,

“सामने आ ” उसने चीखते हुए कहा और बीन दुबारा से बजाने लगा. इस बार त्रीवता और जोर की थी उसके चेले भी उसका साथ दे रहे थे . और फिर मैंने वो होते देखा जो नहीं होना था . आग की लपटों में मैंने नागिन को लहरा कर आते हुए देखा, पर वो वैसी बिलकुल नहीं थी जैसा मैंने उसको देखा था , वो कमजोर थी बहुत कमजोर . शायद कुछ हुआ था उसे . मैंने पहली बार अपने माथे पर पसीना बहते हुए महसूस किया.

“बड़ी तमन्ना थी की मौका मिलेकिसी विलक्ष्ण नागिन का शिकार करने का पर तू तो कमजोर निकली . ”तांत्रिक ने कहा

“तेरा अंत कर सकू अभी इतनी जान बाकी है ” नागिन ने शांत आवाज में कहा

तांत्रिक- उफ़ ये अहंकार, ये गुरुर , अच्छा लगा मजा आयेगा तुझसे खेलने में .

तांत्रिक ने बीन पर कोई मन्त्र पढ़ा और अपनी कार्यवाही करने लगा. नागिन बेकाबू होने लगी , शिथिल होने लगी . वो लगातार उस पर कुछ फेक रहा था जिस से नागिन तिलमिला रही थी उसकी त्वचा से रक्त बहने लगा था , दर्द से बिलबिलाने लगी थी वो . अब मेरे बर्दाश्त से बाहर था ये सब . मैं नागिन की तरफ दौड़ पड़ा .

“तांत्रिक , रोक दे अपने जतन को वर्ना तेरे टुकड़े कर दूंगा मैं ” मैंने उसके और नागिन के बीच में आते हुए कहा .

तांत्रिक ने मुझे देखा और कहा- कौन है तू मुर्ख और यहाँ आने की गुस्ताखी कैसे की तूने,

मैं- मेरे बारे में उस से जाके पूछना जिसने तुझे यहाँ भेजा है . ये नागिन मेरी है , और मेरे रहते तू तो का साक्षात् यमराज भी अगर आ जाये तो इस से पहले मैं खड़ा हूँ , तेरे और नागिन के बीच में मैं वो दिवार हूँ जिसे तुझे बेधना होगा.

तांत्रिक- जो तेरी इच्छा, पहले तेरा रक्त पान करता हूँ .

तांत्रिक ने अपनी मुट्ठी में कुछ लिया और मेरी तरफ फेका. बदन में जैसे आग लग गयी हो पर अगले ही पल मैं ठीक हो गया. तांत्रिक की आँखे फटी रह गयी .

“असंभव , ये मुमकिन नहीं, कौन है तू ” उसने कहा .

मैं- तेरी मौत.

मैंने पास पड़ी लकड़ी का टुकड़ा उठाया और तांत्रिक की तरफ बढ़ चला , उसके चेले मेरे सामने आ गए , तांत्रिक अग्नि के पास गया और बैठकर मन्त्र पढने लगा. नागिन तड़पने लगी. मुझे और गुस्सा आने लगा था . दोनों चेलो को धर लिया मैंने और पीटने लगा उन्हें. छीना झपटी में मैंने एक का सर फोड़ दिया.

जैसे ही वो गिरा . मैंने दुसरे को धक्का दिया और तांत्रिक की तरफ बढ़ा. पास में ही त्रिशूल खड़ा था मैंने उसे लिया और तांत्रिक के कंधे में घोंप दिया. वो चीख पड़ा . मैंने अग्नि में रेत फेंकी और तांत्रिक को धर लिया. वो लगातार अब भी मन्त्र बुदबुदा रहा था , नागिन मीमिया रही थी .

मैंने उसके अन्डकोशो पर वार किया तो वो तिलमिला गया .

“हरामजादे, मैंने तुझसे कहा था न की मैं तेरी मौत हूँ अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूँ , ” मैंने तांत्रिक का हाथ तोड़ दिया .

“आह्ह्ह्हह्ह ” चीखा वो . पर अब उसे चीखते ही रहना था , क्योंकि उसे सामना करना था मेरे गुस्से का. मैंने पास में पड़ी कटार उठाई और उसे काटने लगा. जैसे कोई कसाई बकरे को काटता है . तांत्रिक की चीखे दूर दूर तक गूँज रही थी पर मेरे मन में कोई रहम नहीं था . जब तक मेरा मन शांत नहीं हुआ मैं उसके टुकड़े करते रहा . उसके चेले भाग गए.

फिर मैं नागिन की तरफ गया . वो बेहाल पड़ी थी . मैंने उसे अपनी बाँहों में लिया .

“कुछ नहीं होगा तुझे , मैं हूँ न कुछ नहीं होगा तुझे. ” मैंने कहा

उसकी पीली आँखों से मैंने आंसू गिरते देखे.

ऐसा असहनीय दर्द मैंने तो महसूस किया था , समझ नहीं आ रहा था की क्या करू . कहाँ ले जाऊ इसे. पर तभी जैसे चमत्कार सा हुआ. मेरे सर पर जो लगी थी , खून की बूंदे नागिन के बदन पर पड़ी तो उसे राहत मिली. जहाँ मेरा खून गिरा था वहां उसके जख्म भरने लगे.

मैंने कटार उठाई और अपनी हथेली को काटा. रक्त धारा बहने लगी. मैं रक्त उसके शरीर पर मलने लगा. उसके जख्मो में सुधार होने लगा. पर तभी उसने मुझे दूर धकेल दिया.

“मत कर ” धीमी आवाज में बोली वो .

मैं- मेरे खून से अगर तुझे राहत मिलती है तो मेरी बूँद बूँद तेरी है .

नागिन- मैंने कहा न मत कर .तू जा यहाँ से , चला जा .

मैं- नहीं जाऊंगा , और तुझे भी नहीं जाने दूंगा. आजतक तू हमेशा मेरी ढाल बनके रही है , मुझ पर आने वाली हर मुशीबत को परे ही रोका है तूने आज जब मेरी बारी है तो मैं कैसे पीछे हट सकता हूँ.

नागिन- मानता क्यों नहीं मेरी बात चला जा , दूर रह मुझसे, मुझे कमजोर मत कर . मुश्किल से संभाला है खुद को , इस से पहले की बिखर जाऊ चला जा यहाँ से , चला जा , मेरी जरा भी परवाह है तुझे तो चला जा यहाँ से

मैं- ठीक है चला जाऊंगा, तेरी नजरो से दूर हो जाऊंगा पर जाने से पहले इतना बता जब दूर ही करना था तो आई क्यों . ठुकराना ही था तो अपनाया क्यो मुझे. जा रहा हूँ पर जाने से पहले मैं तेरा कर्ज चुकाना चाहता हूँ .और तू मना नहीं करेगी मुझे

मैंने अपना हाथ आगे कर दिया , वो मेरे पास आई और अपने दांत मेरी कलाई में गडा दिए.
 
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