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Adultery गुजारिश

#55

“आजा , सामने आ मुझे तेरा ही इंतज़ार था ,आज तुझे पाकर ही रहूँगा ” तांत्रिक ने अट्टहास करते हुए कहा.

सामने से एक गहरी फुफकार आई , हवा में जहर फ़ैल गया , पर तांत्रिक ने फौरन ही कोई मन्त्र पढ़ा .

“नागिन, तेरा मुझ से पाला पड़ा है , तूने बहुत मासूम लोगो को अपना शिकार बना लिया है पर अब तेरा समय बीता. तेरे पास दो रस्ते है या तो मेरी शरण में आजा या मौत के ” तांत्रिक ने कहा.

मामला गंभीर हो चला था . तांत्रिक मुझे बहुत पहुंचा हुआ लगता था . उसने अपने आस पास एक राख का घेरा बनाया हुआ था ,

“सामने आ ” उसने चीखते हुए कहा और बीन दुबारा से बजाने लगा. इस बार त्रीवता और जोर की थी उसके चेले भी उसका साथ दे रहे थे . और फिर मैंने वो होते देखा जो नहीं होना था . आग की लपटों में मैंने नागिन को लहरा कर आते हुए देखा, पर वो वैसी बिलकुल नहीं थी जैसा मैंने उसको देखा था , वो कमजोर थी बहुत कमजोर . शायद कुछ हुआ था उसे . मैंने पहली बार अपने माथे पर पसीना बहते हुए महसूस किया.

“बड़ी तमन्ना थी की मौका मिलेकिसी विलक्ष्ण नागिन का शिकार करने का पर तू तो कमजोर निकली . ”तांत्रिक ने कहा

“तेरा अंत कर सकू अभी इतनी जान बाकी है ” नागिन ने शांत आवाज में कहा

तांत्रिक- उफ़ ये अहंकार, ये गुरुर , अच्छा लगा मजा आयेगा तुझसे खेलने में .

तांत्रिक ने बीन पर कोई मन्त्र पढ़ा और अपनी कार्यवाही करने लगा. नागिन बेकाबू होने लगी , शिथिल होने लगी . वो लगातार उस पर कुछ फेक रहा था जिस से नागिन तिलमिला रही थी उसकी त्वचा से रक्त बहने लगा था , दर्द से बिलबिलाने लगी थी वो . अब मेरे बर्दाश्त से बाहर था ये सब . मैं नागिन की तरफ दौड़ पड़ा .

“तांत्रिक , रोक दे अपने जतन को वर्ना तेरे टुकड़े कर दूंगा मैं ” मैंने उसके और नागिन के बीच में आते हुए कहा .

तांत्रिक ने मुझे देखा और कहा- कौन है तू मुर्ख और यहाँ आने की गुस्ताखी कैसे की तूने,

मैं- मेरे बारे में उस से जाके पूछना जिसने तुझे यहाँ भेजा है . ये नागिन मेरी है , और मेरे रहते तू तो का साक्षात् यमराज भी अगर आ जाये तो इस से पहले मैं खड़ा हूँ , तेरे और नागिन के बीच में मैं वो दिवार हूँ जिसे तुझे बेधना होगा.

तांत्रिक- जो तेरी इच्छा, पहले तेरा रक्त पान करता हूँ .

तांत्रिक ने अपनी मुट्ठी में कुछ लिया और मेरी तरफ फेका. बदन में जैसे आग लग गयी हो पर अगले ही पल मैं ठीक हो गया. तांत्रिक की आँखे फटी रह गयी .

“असंभव , ये मुमकिन नहीं, कौन है तू ” उसने कहा .

मैं- तेरी मौत.

मैंने पास पड़ी लकड़ी का टुकड़ा उठाया और तांत्रिक की तरफ बढ़ चला , उसके चेले मेरे सामने आ गए , तांत्रिक अग्नि के पास गया और बैठकर मन्त्र पढने लगा. नागिन तड़पने लगी. मुझे और गुस्सा आने लगा था . दोनों चेलो को धर लिया मैंने और पीटने लगा उन्हें. छीना झपटी में मैंने एक का सर फोड़ दिया.

जैसे ही वो गिरा . मैंने दुसरे को धक्का दिया और तांत्रिक की तरफ बढ़ा. पास में ही त्रिशूल खड़ा था मैंने उसे लिया और तांत्रिक के कंधे में घोंप दिया. वो चीख पड़ा . मैंने अग्नि में रेत फेंकी और तांत्रिक को धर लिया. वो लगातार अब भी मन्त्र बुदबुदा रहा था , नागिन मीमिया रही थी .

मैंने उसके अन्डकोशो पर वार किया तो वो तिलमिला गया .

“हरामजादे, मैंने तुझसे कहा था न की मैं तेरी मौत हूँ अब देख मैं तेरा क्या हाल करता हूँ , ” मैंने तांत्रिक का हाथ तोड़ दिया .

“आह्ह्ह्हह्ह ” चीखा वो . पर अब उसे चीखते ही रहना था , क्योंकि उसे सामना करना था मेरे गुस्से का. मैंने पास में पड़ी कटार उठाई और उसे काटने लगा. जैसे कोई कसाई बकरे को काटता है . तांत्रिक की चीखे दूर दूर तक गूँज रही थी पर मेरे मन में कोई रहम नहीं था . जब तक मेरा मन शांत नहीं हुआ मैं उसके टुकड़े करते रहा . उसके चेले भाग गए.

फिर मैं नागिन की तरफ गया . वो बेहाल पड़ी थी . मैंने उसे अपनी बाँहों में लिया .

“कुछ नहीं होगा तुझे , मैं हूँ न कुछ नहीं होगा तुझे. ” मैंने कहा

उसकी पीली आँखों से मैंने आंसू गिरते देखे.

ऐसा असहनीय दर्द मैंने तो महसूस किया था , समझ नहीं आ रहा था की क्या करू . कहाँ ले जाऊ इसे. पर तभी जैसे चमत्कार सा हुआ. मेरे सर पर जो लगी थी , खून की बूंदे नागिन के बदन पर पड़ी तो उसे राहत मिली. जहाँ मेरा खून गिरा था वहां उसके जख्म भरने लगे.

मैंने कटार उठाई और अपनी हथेली को काटा. रक्त धारा बहने लगी. मैं रक्त उसके शरीर पर मलने लगा. उसके जख्मो में सुधार होने लगा. पर तभी उसने मुझे दूर धकेल दिया.

“मत कर ” धीमी आवाज में बोली वो .

मैं- मेरे खून से अगर तुझे राहत मिलती है तो मेरी बूँद बूँद तेरी है .

नागिन- मैंने कहा न मत कर .तू जा यहाँ से , चला जा .

मैं- नहीं जाऊंगा , और तुझे भी नहीं जाने दूंगा. आजतक तू हमेशा मेरी ढाल बनके रही है , मुझ पर आने वाली हर मुशीबत को परे ही रोका है तूने आज जब मेरी बारी है तो मैं कैसे पीछे हट सकता हूँ.

नागिन- मानता क्यों नहीं मेरी बात चला जा , दूर रह मुझसे, मुझे कमजोर मत कर . मुश्किल से संभाला है खुद को , इस से पहले की बिखर जाऊ चला जा यहाँ से , चला जा , मेरी जरा भी परवाह है तुझे तो चला जा यहाँ से

मैं- ठीक है चला जाऊंगा, तेरी नजरो से दूर हो जाऊंगा पर जाने से पहले इतना बता जब दूर ही करना था तो आई क्यों . ठुकराना ही था तो अपनाया क्यो मुझे. जा रहा हूँ पर जाने से पहले मैं तेरा कर्ज चुकाना चाहता हूँ .और तू मना नहीं करेगी मुझे

मैंने अपना हाथ आगे कर दिया , वो मेरे पास आई और अपने दांत मेरी कलाई में गडा दिए.
 
#57

किसी ने मुझे पुकारा, “देव ”

खेतो से एक साया निकल कर मेरे पास आया , मैंने देखा ये सरोज थी .

“तुम यहाँ कैसे ” मैंने कहा

सरोज- तुम्हे ढूंढते ढूंढते आ गयी , मुझे तुमसे बेहद जरुरी बात करनी थी .

मैं- जब्बर को मेरी मौत की सुपारी देने से ज्यादा जरुरी क्या बात है अब .

सरोज- मैं जानती थी ऐसा ही होगा. ये सब एक साजिश है हम दोनों के बीच दरार डालने की देव, मुझे मालूम हो गया है तुमने घर क्यों छोड़ा विक्रम उस शकुन्तला के साथ मिल कर जो भी कर रहा है उसमे मेरा उसका कोई साथ नहीं है देव, और जब्बर तो उनका ही मोहरा है .

मैं- जो भी हो मैं इस हालात में नहीं हूँ की किसी पर भी भरोसा कर सकू. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दो.

सरोज- तुम्हे मेरी बात सुननी ही होगी,

मैं- मैंने कहा न जाओ तुम यहाँ से.

सरोज- इतना कठोर मत बनो देव, मुझ पर भरोसा नहीं कर सकते और मेरे पास ऐसा कोई सबूत नहीं है जो तुम्हे भरोसा दिला सके. बस मेरी जान है जो तुम ले लो शायद तब तुम्हे यकीन आये.

मैं- मैंने कहा न मेरे हालात ऐसे नहीं है , और तुम्हे अगर मेरी फ़िक्र है तो फिर मत आना मेरे पास.

मैंने कहा और आगे बढ़ गया . सरोज मुझे आवाज देती रह गयी .समझ नहीं आ रहा था की क्या करू क्या न करू. रिश्तो की ऐसी भूलभुलैया में उलझा था मैं की अपने पराये सच्चे झूठे का भेद समाप्त हो गया था .

रूपा के घर जब तक मैं पंहुचा , वो मेरी ही राह देख रही थी .

रूपा- बड़ी देर लगाई कब से राह देख रही हूँ मैं .

मैं- बस देर हो गयी .

रूपा- ये कैसा बक्सा है हाथ में .

मैं- रख ले तेरे पास , मुझे भूख लगी है बाद में देखेंगे इसे , हिफाजत से रख दे.

रूपा- जो हुकुम सरकार.

रूपा खाना बनाने लगी मैं वही दिवार का सहारा लेकर बैठ गया .

मैं- तू जादू करना जानती है

रूपा- कितनी बार तुझे बताऊ ,

मैं- कोई ऐसी तरकीब है की मैं अतीत देख पाउँगा

रूपा- बाबा सुलतान से पूछ , वैसे जादू में ऐसा होता है कुछ जादूगर अपनी यादो को कही छुपा देते है . वैसे तुझे किसका अतीत देखना है .

मैं- नागेश का

रूपा- जानता है तू क्या कह रहा है .

मैं- तू शायद जानती नहीं पर मुझे लगता है उसका मुझसे कोई नाता है .

रूपा- नागेश किवंदिती के सिवा कुछ भी नहीं . उसे मरे जमाना हुआ .

मैं- बाबा को लगता है की वो लौट आया है . चरवाहों का तिबारा शायद उसने ही तोडा है .

रूपा- नहीं ऐसा नहीं है .

मैं- क्यों

रूपा- वो तिबारा मैंने तोडा है .

मुझे जैसे रूपा ने झटका सा दिया.

मैं- पर क्यों

रूपा- जब तुझे चोट लगी तो मेरा दिमाग भन्ना सा गया था . मैं इलाज के लिए उपचार तलाश कर रही थी , तुझे मालूम नहीं उसे चरवाहों का तिबारा क्यों कहा जाता था क्योंकि वहां पर ये जादूगर लोग अपने सफ़र के दौरान अक्सर रुकते थे , एक तरह का गुप्त ठिकाना था ये लोगो को मालूम न हो की जादूगर है तो वो चरवाहों का भेस ले लेते थे .

मैं- पर तूने तोडा क्यों

रूपा- बता तो रही हूँ , उस रात जब मैं वहां पर पहुंची . तो मुझे कटोरे की तलाश थी जो मन्नते पूरी करता था .

मैं- कैसा कटोरा .

रूपा- तिबारे में हमेशा से एक कटोरा रखा होता था जिसमे से जो मांगो मिल जाता था , मतलब कुछ जरुरत की चीजे .

मैं- तो तुझे क्या जरुरत थी

रूपा- कितने सवाल करता है तू

मैं- बस उत्सुकता .

रूपा- मैं प्रतिकृति पत्थर को तलाश रही थी .

मैं- क्या होता है ये .

रूपा- एक तरह का छलावा .

मैं- समझा नहीं

रूपा- तेरा घाव तेरे कलेजे को खा रहा था , यदि जल्दी से उपचार न होता तो जहर तेरे कलेजे को भेद देता. चूँकि मुझे उपचारों का ज्ञान है तो मैंने एक रिस्क लेने का सोचा, मैं तेरे कलेजे की नकल बनाती और उस तंत्र वार के असर को उस पर उतार लेती बाद में कलेजा वापिस कर देती.

पर ये पत्थर मिलना दुर्लभ है तो बस मैं अपनी हताशा को रोक नहीं पाई.

मैं- मैं कैसे ठीक हुआ तुमने उस रात क्या किया था .

रूपा- कुछ भी नहीं किया मैंने .

मैं- रूपा, मुझे सच बता तुझे मेरी कसम है सच बता.

रूपा- मैंने कुछ नहीं किया सिवाय तेरे जख्म को सिलने के. जो किया उस नागिन ने किया उसने ....

रूपा ने एक आह भरी

मैं- क्या किया था उसने बताती क्यों नहीं .

रूपा- उसने तेरी जान के बदले खुद की जान रख दी. वो कोई मामूली नागिन नहीं है वो अलग है , हम सब जानते थे की नागेश के वार का कोई भी तोड़ नहीं है . तो उसने एक ऐसा फैसला किया जो बस काम कर गया . उसने तेरी जान के बदले अपनी जान रख दी. नागो की अपनी शक्तिया होती है , उसने रक्तभ्स्म तुझे दी .

मैं- क्या होती है ये .

रूपा- जैसे इंसानों के लिए शरीर में रक्त जरुरी होता है , नागो के लिए रक्त्भास्म होती है . वार उतारने के कुछ नियम होते है हर चीज का मूल्य होता है उसने तेरे कलेजे के बदले अपना कलेजा रख दिया. उसने सोचा था की उसका जहर नागेश के वार को झेल लेगा पर ऐसा हुआ नहीं .

मैं- मतलब

रूपा- मतलब ये की नागिन पल पल मर रही है , उसके पास समय बहुत कम है इस श्राप ने हम तीनो को आपस में जोड़ दिया है . उसका कलेजा गल रहा है , हर रात तेरी भारी होगी दर्द से, और मेरी पीठ का ये जख्म सदा ताजा रहेगा कभी भरेगा नहीं .

मैं- तू सब जानती थी तो तूने क्यों किया ऐसा.

रूपा- आशिकी इम्तेहान लेती है मेरे सरकार. और जब तुझसे नाता जोड़ा है तो फिर मैं कैसे कदम पीछे हटाती, जब सुख में तेरी साथी हूँ तो तेरा दर्द भी मेरा हुआ न .

मैं- पर नागिन ने मेरे लिए अपनी जान की बाजी क्यों लगाई,

रूपा- मुझे भी इंतजार है इस सवाल के जवाब का .

हम दोनों के दरमियान कुछ देर के लिए एक ख़ामोशी छा गयी. जिसे मैं इतना भला बुरा कह आया था वो मौत के करीब थी सिर्फ मेरी वजह से सिर्फ मेरी वजह से. अब मुझे समझ आया की मेरे खून से उसकी हालात क्यों ठीक हो रही थी क्योंकि मेरे खून में रक्त भस्म भी थी .

“रक्त भस्म कहा मिलेगी रूपा ” मैंने पूछा

रूपा- परचून की दुकान पर तो नहीं मिलेगी.

मैं- बता न .

रूपा- मैं नागो के बारे में गहराई से नहीं जानती मुसाफिर, बाबा से पूछ .

मैं- ठीक है उनके पास ही जाता हूँ ,

रूपा- खाना तो खा ले पहले

मैं- मुझे जाना होगा.

रूपा- बेशक पर पहले खाना खा, बड़ा सकून होता है जब मैं तेरे साथ रोटी खाती हूँ , इस थोड़े से सुख पर तो मेरा अधिकार रहने दे सरकार.

रूपा ने साग, चूरमा परोसा मुझे . और कुछ पालो के लिए मैं सब कुछ भूल गया . खाने के बाद मैं वहां से निकल कर चल दिया मुझे मालूम था की कहाँ जाना है , आधे रस्ते में मुझे सुलतान बाबा मिल गए.

बाबा- कहाँ था तू, तुझे ही तलाश रहा था मैं .

मैं- मैं भी तुम्हारे पास ही रहा था बाबा , मुझे मालूम हो गया इस झोले में क्या है

बाबा के चेहरे पर हवाइया उड़ने लगी.
 
#58

बाबा के चेहरे पर हवाइया उड़ रही थी .

“झोला दिखाओ मुझे बाबा ” मैंने कहा

बाबा- तेरे मतलब का सामान नहीं है इसमें

मैं- कब तक छुपाओगे बाबा ,

बाबा कुछ नहीं बोला. मैंने हाथ आगे बढाकर झोला ले लिया और खोला पर उसमे वो नहीं था जो मैंने सोचा था बल्कि कुछ ऐसा था जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी .झोले में एक जिंदा दिल फडफडा रहा था . किसी कटे कबूतर जैसा .

“ये तो दिल है बाबा , मैंने सोचा था आपने झोले में नागिन छुपाई है ” मैंने कहा

बाबा- उसे छुपाने की जरुरत नहीं ,

मैं- तो इस दिल का क्या करेंगे, किसका है ये .

बाबा- ये प्रतिकृति है , मुझे लगता है ये कारगर होगा.

मैं- असली उपाय क्या है , नागिन को कैसे रक्तभ्स्म दी जाये.

बाबा- गूढ़ है रक्त्भास्म प्राप्त करना . नागो के नियम जादू के नियम से अलग होते है

मैं- मुझे बस ये जानना है कैसे मिलेगी वो भस्म क्योंकि वही नागिन को प्राणदान दे सकती है .

बाबा- उत्सुकता ठीक है परन्तु अधुरा ज्ञान सदैव हानिकारक होता है मुसाफिर .

मैं- मतलब

बाबा- मतलब ये की मैं आजतक समझ नहीं पाया हूँ की तुम कौन हो अस्तित्व क्या है तुम्हारा, तुम साधारण होकर भी असाधारन हो , तुम्हारे अन्दर जादू नहीं है पर कुछ तो ऐसा है जो असामान्य है , तुम्हारे रक्त को पीकर नागिन के जख्म भरे, वो बेहतर हुई ये बड़ी हैरानी की बात है .

मैं- क्योंकि रक्तभ्स्म मेरे शरीर में है .

बाबा- और क्या ये तुम्हे साधारण लगता है . आखिर क्यों बड़ी आसानी से उस दिव्य भस्म को आत्मसात कर लिया तुमने , कभी सोचा .

मैं- मुझे लगा ऐसा ही होता होगा.

बाबा- रक्त भस्म इसलिए दिव्य है की स्वयं शम्भू के तन पर मली जाती है , शमशान की राख जब महादेव का अभिषेक करती है , तो वो उसका अंग हो जाती है , जिसे स्वयं शम्भू अपने बदन पर स्थान दे तो उसके गुण दिव्य होते है , एक खास वंश के नाग ही उसका तेज झेल पाते है .

मैं- तो क्या मैं नाग हूँ

बाबा- निसंदेह नहीं और यही बात मुझे खटक रही है .

मैं- पर मेरी प्राथमिकता नागिन को बचाना है

बाबा- सीधे शब्दों में मैं कहूँ तो हर दस दिन में यदि वो तुम्हारा खून पीती रहे तो उसे कुछ नहीं होगा.

मैं- पर ये हमेशा का उपाय नहीं है .

बाबा- तो फिर रक्त भस्म ले आओ ,

मैं- कहाँ मिलेगी ये तो बताओ

बाबा- मुझे क्या मालूम , मैं अपनी कोशिश करूँगा तुम अपनी करो . मैं प्रतिकृति को असली की जगह स्थापित करके छलावा कामयाब करने की कोशिश करूँगा.

मैंने झोला वापिस बाबा को दिया. बाबा चला गया और कुछ नए सवाल में उलझा गया मुझे, उसने तो मेरे अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिए थे . मुझे आज मेरी माँ की बड़ी कमी महसूस हो रही थी काश वो होती तो मेरी समस्या यु सुलझा देती . पर वो नहीं थी, दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति होती है माँ, और माँ से मुझे घर की याद आई, नागिन का घर था वो मंदिर जो तोड़ दिया गया था .

“उसे वापिस खोदना होगा. ” मैंने अपने आप से कहा . घर किसी के लिए भी सबसे सुरक्षित होता है , अक्सर घर में ही सबसे चाहती वस्तुए रखी जाती है पर क्या वो हवेली मेरा घर नहीं थी . मेरी माँ सुहासिनी एक बड़ी जादूगरनी थी तो क्या ये मुमकिन नहीं था की मुझे हवेली में कुछ न कुछ मिले जो मेरे काम आ सके. बेशक मैंने वहां न जाने की कसम खाई थी पर नागिन के प्राणों के आगे मेरा अहंकार बहुत तुच्छ था . मैं तुरंत हवेली की तरफ चल दिया.

ये हवेली बाहर से जितना खामोश थी अपने अन्दर उतने ही तूफ़ान छुपाये हुई थी , जितनी बार भी मैं आता था यहाँ पर इसका स्वरूप हर बार बदला हुआ होता था . इस बार यहाँ पर सिर्फ एक ही मंजिल थी . तमाम मोमबतिया बुझी थी , बस एक जल रही थी उस बड़ी सी मेज के ऊपर . मैंने अपनी जैकेट उतारी और वहां गया . हमेशा की तरह गर्म चाय मेरा इंतजार कर रही थी .

“ये मेरा घर है और यहाँ जो भी जादुई अहसास है उसे मेरी बात जरुर माननी होगी ” मैंने सोचा .

मैं- मैं चाहता हूँ की थोड़ी और रौशनी हो जाये.

और तुरंत ही मोमबतिया जल गयी .

मैंने बस हवा में तीर मारा था पर वो तुक्का सही लगा था .

“मैं पहली मंजिल पर जाना चाहता हूँ ” मैंने कहा और सीढिया खुल गयी .

“दूसरी मंजिल ” मैंने कहा . पर इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. ये बड़ी हैरानी की बात थी . मैंने फिर दोहराया पर कुछ नहीं हुआ.

“मैं सुहासिनी के कमरे में जाना चाहता हूँ ” इस बार भी कुछ नहीं हुआ.

मैं- मैं मोना के कमरे में जाना चाहता हूँ,

कुछ देर ख़ामोशी छाई रही फिर चर्र्रर्र्र की एक जोर से आवाज आयी मेरी दाई तरफ वाला एक दरवाजा थोडा सा खुल गया था. मुझे बड़ी उत्सुकता हुई दौड़ता हुआ मैं उस कमरे में गया . छोटा सा कमरा था , कुछ खास नहीं था वहां पर दिवार पर कुछ कपडे टंगे थे, दो बैग पड़े थे और मैं जानता था की ये सामान मोना का था . मतलब मोना गायब होने से पहले यहाँ आई थी जरुर. कुछ और खास नहीं मिला तो मैं वापिस आकर कुर्सी पर बैठ गया . मेरे दिमाग में बहुत सवाल थे.

“नागिन क्या तुम यहाँ पर हो , अगर हो तो सामने आओ, हम बात कर सकते है ” मैंने कहा . पर कोई जवाब नहीं आया. शायद वो यहाँ नहीं थी. अचानक से मेरे सीने में दर्द होने लगा. अब तो मुझे आदत सी हो चली थी इसकी पर दर्द तो बस दर्द होता है. न चाहते हुए भी मैं अपनी चीखो पर काबू नहीं रख पाया. मैं कुर्सी से गिर गया और फर्श पर तड़पने लगा. अभी इस दर्द से फारिग हुआ भी नहीं था की दरवाजे पर ऐसी तेज आवाज हुई जैसे की किसी ने कोई बड़ा पत्थर दे मारा हो .

खुद को सँभालते हुए मैं दरवाजे के पास गया उसे खोला और मेरे सामने एक लाश आ गिरी. वो लाश ............. .
 
#59

वो लाश जब्बर की थी . दरअसल मुझे इस बात ने नहीं चौंकाया था की लाश जब्बर की थी , मेरा ध्यान इस बात पर था की लाश की हालत ठीक वैसी ही थी जैसी की लाला महिपाल की लाश थी , बिलकुल सफ़ेद, जैसे किसी ने सारा खून चूस लिया हो . पर कातिल ने इसे यहाँ पर क्यों फेंका. क्या कातिल को भी हवेली के बारे में पता था .

मेरे आस पास ये जो भी लोग थे एक एक करके मौत के मुह में जा रहे थे , कौन मार रहा था क्यों मार रहा था किसी को कुछ नहीं मालूम था . मैंने दरवाजा बंद किया और वापिस हवेली के अन्दर आ गया. जब्बर की मौत से कुछ समीकरण बदल जाने थे . पर फिलहाल मुझे इंतजार था सुबह होने का . मैं एक कमरे में गया और सोने की कोशिश करने लगा. बिस्तर आरामदेह था . मालूम नहीं मैं नींद में था या सपने में था . पर ऐसा लगा की कोई तो है मेरे साथ .

मैंने हलके से आँखे खोली कमरे में घुप्प अँधेरा था . जबकि मैं सोया तब रौशनी थी , मुझे लगा की कमरे में दो लोगो की सांसे चल रही थी . कौन हो सकता है इस समय. आँखे जब अँधेरे की आदी हुई तो मैंने देखा , कुर्सी पर एक साया था जो शायद आराम कर रहा था , क्योंकि वो हलचल नहीं कर रहा था . मेरे सिवा इस हवेली में कौन हो सकता था .

“मोना क्या ये तुम हो ” मैंने आवाज दी.

साये की आँखे एक झटके से खुल गयी .और वो तेजी से बाहर की तरफ भागा मैं भी उसके पीछे भागा. पर मेरा पैर चादर में उलझ गया जब तक मैं बाहर आया वहां कोई नहीं था .

“सामने क्यों नहीं आते, क्यों सता रहे हो तुम अपनी पहचान उजागर क्यों नहीं करते तुम.” मैं चीख पड़ा.

कलाई में बंधी घडी पर नजर पड़ी तो देखा तीन पच्चीस हो रहे थे . मैं निचे आया थोडा पानी पिया और हवेली से बाहर जाने के लिए सीढियों से उतरा .न जाने क्यों मेरे दिल को ऐसा लग रहा था की वो मेरे आसपास ही है, यही कही है , दूर होकर भी मेरे पास है . इतनी शिद्दत पहले कभी नहीं हुई थी . पर वो जब पास थी तो ये दुरी क्यों थी. क्यों छिप रही थी मुझसे.

सुबह होते ही मैंने कुछ मशीन और मजदुर बुलवाए और मंदिर की खुदाई शुरू करवा दी. शकुन्तला ने भरपूर विरोध किया पर गाँव की पंचायत ने मेरा साथ दिया. गाँव वालो को भी लगता था की मंदिर का दुबारा से निर्माण होना चाहिए. दिन भर धुल मिटटी में बीत गया. शाम को मैं चाय पि रहा था की मैंने बाबा सुलतान को आते देखा.

बाबा- एक बार जो सोच लिया फिर रुकता नहीं तू.

मैं- बरसो से उपेक्षित मंदिर की शान दुबारा लौट आये तो बुरा क्या है .

बाबा- पर तेरे मनसूबे तो कुछ और है .

मैं- क्या फर्क पड़ता है .

बाबा- बेकार है तुझसे कुछ भी कहना अब , खैर तेरी बात सही है इसी बहाने हम भी शम्भू के दर्शन कर लेंगे.

बाबा मुस्कुराने लगे.

मैं- एक बात और कहनी थी .

बाबा- हाँ

मैं- मैं ब्याह करना चाहता हूँ

बाबा- बेशक, सब करते है तू भी कर ले

मैं- मैं चाहता हूँ आप लड़की के बाप से बात करे. ब्याह की तारीख आप पक्की करे.

बाबा- पर मैं कैसे.

मैं- मेरा कौन है आपके सिवा.

बाबा- मुझे लगता है तू तेरे ताऊ के पास जा

मैं- मैंने कहा न आप ही करेंगे ये काम.

बाबा- ठीक है मुसाफिर , अब तेरी मर्जी के आगे मेरी क्या , तू मुझे पता दे उसका मैं चला जाऊंगा.

मैंने बाबा को एक पर्ची लिख कर दी. बस रूपा का नाम नहीं लिखा मैं बाबा को देखना चाहता था जब वो वहां रूपा को पाएंगे. बाबा ने पर्ची झोले में रख ली . हम खुदाई देखते रहे. शाम को मजदूरो के जाने के बाद बाबा मुझे खंडित ईमारत में ले गए.

“जैसे बस कल ही की बात हो ” बाबा ने गहरी साँस ली .

मैंने पहली बार बाबा की आँखों में पानी देखा. उन आँखों में पानी था , उन होंठो पर मुस्कान थी , रमता जोगी अपने आप में जैसे खो गया था , बाबा को मेरा होना न होना जैसे एक ही था उस समय. कभी इस टूटी दिवार के पास जाते वो कभी उस दिवार से लिपट जाते. इतना तो मैं समझ गया था की बाबा का बड़ा गहरा नाता रहा हो गा इस जगह से.

वो बस अपने अतीत में खो गए थे, क्या कहा मैंने अपने अतीत में, पर बाबा का क्या लेना देना था यहाँ से ,कही बाबा नागिन के पिता तो नहीं जो शायद किसी तरह से बच गए थे . मैंने सोचा. शायद हो भी सकता है क्योंकि नागिन को उनसे बेहतर कोई नहीं जानता था . अब सीधा सीधा तो मेरी हिम्मत नहीं थी उनसे पूछने की पर इस बात को पुख्ता करने का मैंने निर्णय ले लिया था.

“इधर आ बेटे, ” बाबा ने मुझे पुकारा .

मैं दौड़ कर उनके पास गया .

बाबा- ये मिटटी हटाने में मदद कर मेरी .

मैं- सुबह मजदुर हटा देंगे न

बाबा- तुझसे कहा न मैंने

मैं- ठीक है , आप रौशनी करो मैं मशीन चालू करता हूँ

बाबा के कहे अनुसार मैंने मिटटी हटाना शुरू किया करीब पंद्रह मिनट बाद मुझे वो दिखने लगा जो बाबा देखना चाहते थे . वो एक टूटा कमरा था शायद मंदिर का मुख्य कमरा रहा होगा. क्योंकि पास में एक टूटा जलपात्र पड़ा था. एक नंदी की छोटी मूर्ति थी . बाबा ने उसे अपने सीने से लगा लिया और जोर जोर से रोने लगे.

पर जिस चीज ने मेरा ध्यान खींचा था वो ये था की शिव की मूर्ति नहीं थी वहां पर.

“मूर्ति कहाँ है बाबा ” मैंने सवाल किया .

पर बाबा को जैसे कोई सरोकार नहीं था. बाबा मूझे न जाने क्या बता रहे थे , अपने अतीत की बाते, यहाँ ये होता था यहाँ वो होता था आदी, ऐसे ही काफी समय बीत गया अचानक से बाबा की तबियत कुछ ख़राब सी होने लगी . बाबा असहज होने लगे.

मैं- क्या हुआ बाबा,

बाबा ने कोई जवाब नहीं दिया , अपना झोला लिया और लगभग वहां से दौड़ पड़े मैं आवाज देता रह गया . और मेरे साथ रह गयी ये ख़ामोशी. ये तन्हाई. मैंने नंदी की मूर्ति को उठाया और साफ़ करके एक तरफ रख दिया. तभी मेरे पैरो के निचे कुछ आ गया . मैंने मिटटी हटाई तो देखा की......................
 
#६०

मैंने पाया ये एक संदूक था , कुछ कपडे भरे थे उसमे , एक तस्वीर थी जिसमे तीन लोग थे. और एक बीन थी . हैरानी इस बात थी की नाग अपने सामान में बीन क्यों रखेंगे. क्या खिचड़ी बिखरी पड़ी थी यहाँ पर. मैंने वो तस्वीर अपनी जेब में रख ली.

मैं सोचने लगा की बाबा ऐसे अचानक से क्यों भागा, क्या देखा था उसने .खैर, रात थी बीत गयी अगला दिन भी मेरा मंदिर में ही लगा रहा . मुझे उम्मीद थी की बाबा आएगा पर वो नहीं आया. आज बड़ी सावधानी से काम करवाया पर कुछ खास नहीं मिला. शाम को मैं रूपा से मिलने गया पर वो वहां नहीं थी . ऐसे ही कुछ दिन बीत गए. एक तरफ मेरे घर का काम चल रहा था दूसरी तरफ मंदिर का निर्माण भी हो रहा था . मैं दोनों जगह ही उलझा था . उस रात मैं थोडा बेचैन सा था तो मैं मजार पर चला गया .

“बड़े सही समय पर आया है तू मुसाफिर , मैं सोच ही रहा था मुलाकात को ” बाबा ने कहा .

मैं- आप तो आते नहीं सो मैं ही आ गया .

बाबा- मैं तो फक्कड हूँ जाने किस ओर निकल जाऊ. बात ये है की न्योता आया है जूनागढ़ से तो चलेंगे जीमने .

मैं- सतनाम के लड़के की शादी है मालूम है मुझे आप ही जाना वैसे भी वो लोग मुझे क्यों बुलाने लगे.

बाबा- ऐसी बात नहीं है तेरा भी न्योता है

मैं- फिर भी मेरा मन नहीं करता

बाबा- चल तो सही मुसाफिर. कभी कभी ब्याह शादियों में भी चक्कर लगा लेना चाहिए

मैं- बाबा, आप तो जानते है की मोना जबसे लापता हुई है मेरा मन कही नहीं लगता ,

बाबा- मन का क्या है मन तो बावरा है , अब तू ही देख दो नावो की सवारी कर रहा है ब्याह तू रूपा संग करना चाहता है मन में तेरे मोना है .

मैं- दारू पियोगे बाबा

बाबा- नहीं रे, अपन तो अपनी चिलम के साथ ही ठीक है . वैसे भी दारू मुझे झिलती नहीं नशे में काबू रहता नहीं मेरा

मैं- क्या बाबा तुम भी नशा और तुम्हे , किसी और को बनाना

बाबा- रहने दे मुसाफिर, नशे में मेरे पुराने जख्म हरे हो जाते है , बीता हुआ कल सबसे ज्यादा दुःख देता है.

मैं- लोग कहते है बाँटने से कम हो जाते है दुःख

बाबा- काश ऐसा होता. खैर, हम चलेंगे ब्याह में .

मैं- ठीक है पर रूपा के बाप से कब बात करने जाओगे.

बाबा- जूनागढ़ से आने के बाद.

मैं- क्या नागेश सच में लौट आया है

बाबा- संकेत है बस , हो सकता है की उसका कोई अनुयायी उसके नाम से दहशत फैला रहा हो .

मैं- पर वो ऐसा क्यों करेगा

बाबा -ये दुनिया मादरचोद है ,लोग कुछ भी करते रहते है

मैं- पर वो तिबारा नागेश ने नहीं तोडा था .

बाबा- जानता हूँ वो किसी और की करतूत थी

मैं- तो अपने बात की उस से

बाबा- अब क्या कहना क्या सुनना,हमारा किस पर जोर है

मैं- आपने इश्क किया कभी बाबा

बाबा- तुझे क्या लगता है

मैं- दीवाने लगते हो

बाबा- नहीं मुसाफिर नहीं . देर हो रही है मैं चलता हूँ भूख लगे तो आ जाना आज खास चीज़ होगी खाने में

मैं- आ जाऊंगा घंटे भर में

बाबा- ठीक है तो फिर चलेंगे जूनागढ़

मैं-जैसी आपकी मर्जी.

बाबा के जाने के बाद मैं बस बैठा ही था की शकुन्तला को आते देखा .

मैं- तू इस वक्त

सेठानी- तुझे क्या दिक्कत है

मैं - मुझे क्या दिक्कत है जहाँ चाहे वहां गांड मरवा

सेठानी- तमीज से बात कर देव

मैं- तमीज की तो तू बात ही न कर , सब जानता हूँ कितने यार है तेरे विक्रम, जब्बर, सतनाम

सेठानी- तुझे जो समझना है समझ मुझे झांट का फर्क भी नहीं पड़ता

मैं- पर मुझे पड़ता है , तांत्रिक को बुलाकर जो तूने तेरी औकात दिखाई है न

सेठानी- उस सर्प को तो मैं मार कर रहूंगी, मैंने कसम खाई है .

मैं- कोशिश कर के देख ले जबतक मैं हूँ तू कुछ नहीं कर सकती

सेठानी- गुमान तो रावन का भी नहीं चला था तेरा क्या रहेगा देव, आज नहीं तो कल मैं उसे मार दूंगी उसके टुकड़े भेजूंगी तुझे. और तू क्या ये मंदिर के गड़े मुर्दे खोद रहा है कुछ नहीं मिलेगा तुझे.

मैं- सकूं मिलेगा मुझे, जो पाप तेरे पति और तेरे यारो ने किया था उसका फल इसी जन्म में मिलेगा तुम सबको पति तो गया, तेरे यार भी जायेंगे, उनसे जाके कह मंदिर की अमानत लौटा दे वापिस .

सेठानी- तू मेरा पति वापिस लौटा सकता है क्या

मैं- उसने गलती की थी सजा मिली उसे , मंदिर में रहने वाले दो गरीबो को मारा था उसने .

सेठानी- चल एक सौदा करते है तू मुझे उस सांप की लाश लाकर दे मैं तुझे मंदिर का लुटा हुआ सामान लाकर दूंगी.

मैं- चुतिया की बच्ची ये खेल किसी और के संग खेलना , मैं जानता हु की तुझे और विक्रम दोनों को ही नहीं मालूम की वो लूट का सामान कहा है .

मेरी बात सुनकर शकुन्तला के चेहरे पर हवाई उड़ने लगी.

मैं- जब्बर की मौत का तो तुझे मालूम ही होगा. रही बात तेरे यहाँ आने की तो यहाँ भी तू कुछ तलाशने ही आई होगी, जा कर ले जो तू कर सकती है . बस इतना याद रखना दुश्मनी की आग में सबको झुलसना ही पड़ता है तू नागिन से माफ़ी मांग ले और बढ़िया जीवन जी सब कुछ है तेरे पास , विचार कर .

सेठानी- मैंने अपना रास्ता चुन लिया है आग सीने में लगी है दुनिया में लगा दूंगी , मैं झुलस रही हु तो तुम भी महसूस करोगे इस आग को .

मैं- वो तेरी मर्जी है

मैं वहां से उठा और मजार की तरफ चल दिया. बाबा ने मुर्गा पकाया था छक कर खाना खाया और वही सो गया. अगले दिन हमें जूनागढ़ जाना था . एक बेहतर कल की उम्मीद लिए मैं आँखे बंद किये हुए था पर मैं कहाँ जानता था की आने वाला कल क्या लाने वाला था अपने साथ.

दोपहर होते होते मैं बाबा के साथ जूनागढ़ के लिए निकल गया . सतनाम ने बड़ी बढ़िया दावत दी थी . मैं नानी से मिला उन्होंने पूछा मोना के बारे में और मेरे पास देने को कोई जवाब नहीं था. भोज के बाद हमें निकलना ही था पर नानी ने हमें रोक लिया ये कहकर की प्रोग्राम में ठहरो . बाबा न जाने कहा रमता राम हो गया था . शाम हो रही थी पर दिल में बेचैनी सी थी . मोना की याद आ रही थी .

मैं बस वहां से खिसक ही जाना चाहता था , की नानी मुझे अपने साथ अन्दर ले गयी और अन्दर जाते ही मैंने जो देखा मेरी आँखों ने उसे मानने से इनकार कर दिया. दिल ने बस इतना कहा ये नहीं हो सकता.
 
#61

सीढियों से रूपा उतर रही थी , हाथो में थाली लिए. एक पल को उसे देख कर मैं भूल गया सब कुछ दिल में बस इतना याद रहा की जिस दिन मेरी शादी होगी उस से ठीक ऐसी ही लगेगी वो पर अगले ही पल ख्यालो को हकीकत ने धरातल पर ला पटका. रूपा यहाँ क्या कर रही थी .

“पाली दीदी ” मेरे पास से गुजरती एक लड़की ने आवाज दी उसे. और रूपा ने मेरी तरफ देखा.

देखा क्या देखती ही रह गयी . हमारी नजरे मिली.उसने थाली लड़की को दी और बोली- मुसाफिर

मैं- तुम यहाँ कैसे

रूपा- तक़दीर मुसाफिर

मैं- बातो में न उलझा मुझे बस इतना बता तू यहाँ कैसे , तेरे हाथ में आरती की थाली , आरती की थाली तो .

“आरती की थाली तो बस दुल्हे की बहन के हाथ में हो सकती है ” रूपा ने कहा

बस उसे आगे कुछ कहने की जरुरत नहीं थी, उसका सच आज सामने आ गया था . या यु कहूँ की आज पर्दा उठ गया था .

“मैं रुपाली , इस घर की सबसे छोटी बेटी ” रूपा ने कहा.

मैं- बस कुछ कहने की जरुरत नहीं तुझे, बहुत बढ़िया किया

मैं बस इतना ही कह पाया एक दम से दुनिया बदल गयी थी ,सब उल्त्पुल्ट हो गया था मेरे लिए. रूपा ने इतना बड़ा राज़ मुझसे छुपाया था .

“किसी ने सच ही कहा है ये दुनिया बड़ी जालिम है , तू भी औरो सी ही निकली ” मैंने कहा

रूपा- मेरी बात सुन हम बात करते है

मैं- अब बचा ही क्या बात करने को .

रूपा- मेरी बात सुन तो सही मुसाफिर

मैं बस मुस्कुरा दिया. और करता भी तो क्या दिल साला एक बार और टुटा था और इस बार तोड़ने वाली कोई और नहीं बल्कि वो थी जिसने इसे धडकना सिखाया था . मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था रूपा की हकीकत ने सब बदल दिया था . हर एक बात अब बदल गयी थी . मैंने पास की मेज पर रखी बोतल उठाई और एक साँस में आधी गटक गया . कलेजा जल गया

रूपा- ये क्या कर रहा है तू , देख सब देख रहे है ,स अबके सामने मुझे रुसवा न कर.

मैं- मुझे किसी से कोई फर्क नहीं पड़ता , पर तुझसे पड़ता है

रूपा- मेरे साथ आ मैं तुझे सब बताती हूँ

मैं- नहीं रूपा नहीं , अब कुछ नहीं कहना मुझे कुछ नहीं सुनना, तेरी महफ़िल तुझे मुबारक हमारा क्या है मुसाफिर था मुसाफिर हूँ बस मैं भूल गया था की मुसाफिरों के नसीब में मंजिले नहीं होती. जा रहा हूँ मैं , तुझे रुसवाई दू ये तो मेरी मोहब्बत की नाकामी होगी .

मैंने रूपा की तरफ पीठ मोदी और जाने के लिए चल दिया , कुछ कदम ही चला था की वो दौड़ कर मेरे पास आई और लिपट गयी मुझसे.

“तमाशा न कर यहाँ , सब तेरे ही है मेरा क्या होना सबकी नजरे तुझसे सवाल करेंगी ” मैंने कहा

रूपा- आग लगे दुनिया को मुझे बस तू चाहिए

मैं- मेरी होती तो ये सच न छिपाती मुझसे.

रूपा- काश तू मेरी मज़बूरी समझे

मैं- मज़बूरी का नाम देकर तू उस सच को नहीं बदल सकती

रूपा- मुझे एक मौका दे मैं तुझे सब बताती हूँ मेरे क्या हालत थे , मेरा क्या अतीत था मैं तुझे सब बताती हूँ .

मैं- सच तेरे रूप में मेरे सामने खड़ा है

मैंने रूपा को खुद से दूर किया

रूपा- मैं भी तेरे साथ चलूंगी, मुझे अगर मालूम होता की यहाँ ये सब होगा तो मैं अपनी कसम तोड़ कर कभी नहीं आती यहाँ

मैं-तूने तो दिल तोड़ दिया

न चाहते हुए भी मैं रो पड़ा. आंसू उसकी आँखों में भी थे अब साला यहाँ रुकना मुश्किल था . जिंदगी तो ले ही रही थी उस से ज्यादा मोहब्बत ने ली थी . टूटे दिल के बिखरे टुकडो को संभाले मैं वहां से चल तो दिया था पर कुछ समझ नहीं आ रहा था की जाऊ कहा, कहाँ थी ऐसी जगह जो यहाँ से दूर थी.

आखिर गाड़ी रोकी मैंने, दिल में बड़ा गुस्सा भरा था . जब और कुछ नहीं सुझा तो बोतल खोल ली मैंने. आधी बोतल पि थी की मुझे अहसास हुआ की मेरे आसपास कोई और है और जल्दी ही मैं समझ गया ये कौन थी .

“क्यों छिपी खड़ी है तू भी आजा , तू भी तमाशा देख मेरा ” मैंने कहा

हवा में फिर सरसराहट हुई और नागिन को मैंने अपने पास आते देखा .

“इसे पीने से मन हल्का नहीं होगा तुम्हारा, ”उसने कहा

मैं- मेरे मन की तू तो सोच ही मत

नागिन- फिर कौन सोचेगा

मैं- देख, मैं परेशां हूँ दिल टूटा है मेरा मैं कुछ उल्टा सीधा बोल दूंगा तू जा

नागिन- कैसे तेरा टूटा दिल तोड़ दू मैं

मैं- दिल चाहे सबके दिल तोड़ दू मैं

नागिन- खुद से नफरत से क्या मिलेगा

मैं- सकून

नागिन- सब नसीबो की बात होती है

मैं- तू जा यहाँ से तू भी इस दुनिया जैसी है

नागिन- बेशक चली जाउंगी सबको जाना है

मैं- तू क्या समझे क्या बीत रही है मेरे दिल पर काश तू समझ सकती

नागिन- मैं तो सब समझती हूँ बस तक़दीर है जो कुछ नहीं समझती .

मैं- सही कहा तक़दीर , तक़दीर ही तो है जो ये खेल खिलाती है .

नागिन- फिर तक़दीर को दोष दे खुद को क्यों दोष देता है

मैं- तक़दीर भी तो मेरी ही है

नागिन- तेरी है तो तुझे मिलेगी फिर क्यों करता है ये सब

मैं- काश तू समझ सकती मैंने क्या खोया है

नागिन - समझती हूँ

मैं- नहीं तू नहीं समझती

नागिन- समझती हूँ क्योंकि मैंने भी सब कुछ खोया है .

नागिन का गला भर आया उसकी पीली आँखों से पानी गिरते देखा मैंने.

“दर्द तेरे सीने में भी है , दर्द मेरे सीने में भी है तो क्या करे इस दर्द का ” मैंने कहा

नागिन- तेरी हालत ठीक नहीं है तू चल मेरे साथ

मैं- नहीं रे, अब किसी का साथ नहीं करना ये दुनिया बड़ी जालिम है सब साथ छोड़ जाते है

नागिन- मैं नहीं छोडूंगी तेरा साथ

मैं- तू ही तो गयी थी छोड़कर ,
 
#62

"मैं तो कही नहीं गयी थी , पर अभी तुझे मेरे साथ चलना होगा " उसने कहा

मैं- कही नहीं जाना मुझे और क्या फर्क पड़ता है अब मुझे

नागिन- तमाशा करना कोई तुझसे सीखे

मैं- तमाशा तो तूने देखा नहीं, तमाशा तो तब होता जब उस महफ़िल को सुलगा देता जहाँ मेरा दिल टूटा पर कहे भी तो क्या महफ़िल भी बेगानी थी .

लहराते हुए वो मेरे और पास आई . उसकी पीली आँखे मेरी आँखों में झाँकने लगी .

“जानता है , ये उलझन बड़ी अजीब होती है , तू इसलिए दुखी है की तूने दुनिया को तेरे नजरिये से देखा है और फिर किसने कहा की प्रेम केवल पाना है त्याग भी तो है प्रेम ” नागिन ने कहा

मैं- सच्चाई भी तो है प्रेम. मेरा प्रेम साचा है तो हकीकत बताने में भला क्या हर्ज़

नागिन- झूठ भी तो नहीं कहा

मैं- तू किसकी बात कर रही है उसकी या तेरी

नागिन- क्या फर्क पड़ता है

मैं- फर्क पड़ता है मुझे पड़ता है

मैंने कडवे पानी के कुछ घूँट और भरे . बार बार आँखों के सामने तमाम वो लहमे गुजर रहे थे जो मैंने अपने इश्क में जिए थे, वो इश्क जिसको रूपा के एक सच ने बिखरा दिया था . मैंने गाड़ी के टायर से पीठ टिकाई और बैठ गया .

“काश तू मोहब्बत समझती तो तुझे महसूस होता कितना तकलीफ देती है ”मैंने कहा

“काश तू मेरी तकलीफ समझता ” वो धीरे से बोली.

मैं- न जाने कब गुजरेगी ये रात

नागिन- वक्त है गुजर जायेगा . तेरा नशा जब उतरेगा तो तू समझ जायेगा

मैं- नशा तो उतर जायेगा पर ये रंग जो मुझ पर चढ़ा है ये कैसे उतरेगा.

नागिन- मैं क्या जानू

मुझे हंसी आ गयी . मैंने एक पेग और लिया .

“क्या हुआ तुझे “ पूछा उसने

मैं- खुद से क्यों नहीं पूछती की क्या हुआ है मुझे .

नागिन- भला मैं क्या जानू

मैं- तू नहीं जानती तो कौन जानेगा

नागिन- क्या पहेलियाँ बुझा रहा है तू

मैं- मेरा एक काम करेगी, एक अहसान करेगी मुझ पर

नागिन- बता क्या करू.

मैं- मुझे अपने आगोश में ले ले कुछ लम्हों के लिए. मैं रोना चाहता हूँ मुझे थाम ले जरा .

नागिन- रोना कमजोरो की निशानी होती है

मैं- कमजोर ही सही

मैंने अपनी बाहे फैला दी . और वो लिपट गयी मुझसे उसका सर मेरे काँधे पर था . उसके आगोश को मैंने दिल में उतरते महसूस किया

“तरस गया था मैं मेरी जान ” जो बात मैं नहीं बोलना चाहता था वो मेरे होंठो पर ठहर नहीं पायी .उसने घूर कर देखा मुझे और झटके से मुझसे अलग हो गयी .

“कब तक भागेगी , बस बहुत हुआ अब रुक जा ” मैंने कहा

“देर बहुत हुई , मुझे जाना होगा. ” उसने कहा

मैं- जाना तो सबको है , जा मैं रोकूंगा नहीं बस इतना बता कब तक भागेगी, तू लाख कोशिश कर ले . लाख परदे लगा ले पर इन धडकनों को तू कैसे रोक पायेगी जो मेरे सीने में धडक रही है .

नागिन- तू क्या बात कर रहा है , नशे में पागल हो गया है तू. होश कर देख मैं रूपा नहीं हूँ .

मैं- तू ये भी तो नहीं है

नागिन- मैं तुझे समझाने आई थी पर अभी तू समझने लायक नहीं है .

मैं- बस ऐसे ही थामे रख मुझे बरसो तडपा हूँ मैं

“मत छेड़ मुझको आ होश में . ” उसने कहा

मैं- होश में आकर भी क्या फायदा ,

नागिन- दुनिया में जीना वही जानता है जो झूठ-सच को जानता है

मैं- बस मर जाना चाहता हूँ

“मरना तो है सबको मगर पर ओ बेखबर तू क्या जाने क्या है तेरा अंजाम ” उसने कहा

मैं- मुसाफिर का कोई अंजाम नहीं .

नागिन- टूटे दिल का कोई जोड़ नहीं समझता क्यों नहीं क्यों जिद लिए बैठा है .

मैं- तू हाँ कहे तो ये जिद छोड़ दू मैं

“ ये तो नसीबो की बात है , किस दिल पर लिखा किसका नाम कौन जाने दिलजला है फिर भी दिल्लगी चढ़ी है तेरा कुछ नहीं सो सकता .” उसने कहा

मैंने दूसरी बोतल खोल दी.

नागिन ने मुझसे पीठ मोड़ी और चल पड़ी .

“ऐसे नजरे छिपा कर नहीं जा सकती तुम ” मैंने कहा

नागिन- रुक भी तो नहीं सकती

मैं- रोकू तो भी नहीं रुकेगी तू क्यों हैं न

नागिन- मेरी भला क्या चाहत

मैं- ठीक है जा पर एक वादा करना फिर मुझे कभी ऐसे न मिलना जब भी मिले तो वैसे मिलना जैसे मैंने तुझे मेरी नजरो से देखा था .

“मुझे क्या मालूम तेरी नजरे कैसे देखती है ” उसने कहा और लहरा पड़ी .

“मेरी नजरे तुम्हे देखती है , तुम्हे देखती है , बस तुम्हे देखती है जज साहिबा मेरी नजरे मेरी मोना को देखती है बहुत हुआ ये खेल . मैंने पहचान लिया है , तुम लाख कोशिश कर लो पर दोस्त हूँ तुम्हारा मैं सब जान गया हूँ , रूप बदल लो सरकार ” मैंने कहा

मेरी बात जैसे ही उसके कानो में पड़ी वो जम सी गयी . जैसे उसमे जान ही न हो .

“मैं नहीं रोकूंगा तुम्हे पर इस से पहले की मैं मर जाऊ मोना , अपनी मोना को सीने से लगाना चाहता हूँ मैं ” मैंने कहा

“कौन मोना, क्या बोल रहा है तू ,अपने आपे में नहीं है तू ” उसने कहा

मैं- हाँ नहीं हूँ अपने आपे में ये सारी दुनिया झूठ बोल सकती है , मैं झूठ बोल सकता हूँ पर मेरे सीने में धडकता तेरा दिल तो झूठा नहीं है न . बस एक बार मैं मोना को देखना चाहता हूँ

नागिन- काश मैं तेरी इच्छा पूरी कर पाती .

इस बार वो चली और मैं बोलता रह गया . उसने मुड कर नहीं देखा.

तब भी नहीं जब दूर से एक गोली चली और मैंने खुद को गिरते देखा.
 
#63

बड़ी जोर से लगी थी मुझे .

“कौन है बहनचोद ” मैं चीख पड़ा.

पर कोई जवाब नहीं आया , आई तो एक और आवाज मैंने एक बार फिर से अपने जिस्म में कुछ उतरते महसूस किया. ये दूसरी गोली थी जो मुझे घायल कर गयी थी .

“कौन है बे सामने क्यों नहीं आते , कायरो जैसे छिपकर वार करते हो , सामने आओ ” मैंने खुद को सँभालते हुए कहा .

“सामने से धोखा तो तुमने भी नहीं दिया ” करतार ने मेरे पास आते हुए कहा .

“करतार तू, मेरे भाई तूने मुझ पर गोली चलाई ” अविश्वास से उसे देखते हुए कहा .

करतार- इस गन्दी जुबान से मुझे भाई मत कहो . तुमने जो किया है ,हर रिश्ते को तोड़ दिया तुमने . भाई कहने का कोई हक़ नहीं है तुम्हे जबकि उसी भाई की माँ को बिस्तर पर ले लिया तुमने. बहुत दिनों से भरा बैठा था मैं आज मौका मिला है . आज तुम्हे मार कर इस किस्से को खत्म कर दूंगा. आज मेरे कलेजे की आग ठंडी होगी.

तो करतार को मेरे और सरोज के जिस्मानी रिश्ते के बारे में मालूम हो गया था .

“तो फिर देर किस बात की , बन्दूक तेरे हाथ में है उतार दे सारी गोलिया मेरे सीने में और बात ख़त्म कर . ” मैंने कहा

करतार- बात तो खत्म होनी है , पर इतनी भी क्या जल्दी है तिल तिल करके मारूंगा तुम्हे. मैंने कभी सोचा नहीं था की मेरे घर में रह कर तुम मेरी ही माँ के साथ ऐसा करोगे.

मैं- तू इस बात को कभी नहीं समझ पायेगा. अभी तेरी आँखों पर क्रोध की पट्टी पड़ी है . कुछ चीजो पर किसी का बस नहीं होता वो बस हो जाता है .

करतार- तो फिर तुम भी ये समझ लेना की आज तुम्हारी मौत भी बस हो ही गयी है .

“जो तेरी मर्जी , मेरी तो खुशकिस्मती है की मेरा भाई मुझे मार रहा है . ” मैंने कहा

करतार ने बन्दूक मेरी तरफ तान दी . पर इस से पहले की वो फायर कर पाता. किसी ने उसे उठा कर बेरहमी से पटक दिया. और अगले ही पल करतार की आँखे खौफ से फट पड़ी. उसने वो देखा जो वो कभी सोच भी नहीं सकता था . नागिन ने उसे अपने पाश में जकड लिया था . मैंने उन पीली आँखों में वोक्रोध देखा , वो बेरहमी देखि.

“नहीं, मोना नहीईईइ. ” मैं चीख भी नहीं पाया उसे रोक भी नहीं पाया . नागिन ने अपने दांत करतार के गले में गडा दिए. और कुछ ही लम्हों में वो हो गया जो नहीं होना चाहिए था .

“ये तूने क्या कर दिया , क्या कर दिया ये तूने वो भाई था मेरा ” अपने जिस्म को घसीटते हु मैं करतार के पास ले जाने लगा. मेरी आँखों के सामने मेरी जान मेरा छोटा भाई करतार बेजान पड़ा था .

“भाई था वो मेरा ” मैंने कहा

“वो तुझे मार देता ” उसने कहा

मैं- तो क्या होता . मेरे मरने से वो तो चैन से जी लेता.

“मेरे होते कोई तेरी तरफ आंख भी नहीं उठा कर देख सकता, और फिर तेरी जिंदगानी बस तेरी ही तो नहीं ,” उसने कहा.

मैं- ये नहीं होना चाहिए था

नागिन ने मुझे थामा और हवेली ले आई .

“घायल है तू, खून काफी बहा है ” उसने कहा .

मैं कुछ नहीं बोला.

नागिन- जिंदगी अब इतनी आसान भी नहीं होती .

मैं- मुझे मेरे हाल पर छोड़ दे.

नागिन- कैसे छोड़ दू तुझे.

मैं- तो मत छोड़ . पर साथ रहना है तो ऐसे नहीं मेरी मोना के रूप में

मुझे तेरे नहीं मेरी मोना की जरुरत है , वो मोना किसकी बाँहों में मेरा जहाँ है . वैसे भी अब फर्क नहीं पड़ता मुझे

कुछ पल वो मुझे देखती रही और फिर उसका रूप बदल गया . मेरे सामने मेरी मोना खड़ी थी . वो मोना जिसने मुझे जीना सिखाया था . वो मोना जो बस मेरी थी .

“क्या जरूरत थी तुझे ये सब करने की , चुपचाप मुझे बता नहीं सकती थी क्या ” मैंने शिकायत की

मोना- क्या बताती मैं, था ही क्या मेरे पास बताने को और ये एक ऐसा सच है जिस पर कोई कैसे विश्वास करे.

मैं- और तूने सोच लिया की तू छिपा लेगी.

मैंने मेरी जेब से वो पुराणी तस्वीर निकाल कर उसके हाथ में रख दी.

मोना- मुझे गोली निकालने दे तेरी.

मोना ने न जाने क्या क्या कुछ ही देर में मैं ठीक था .

मोना- रात बहुत हुई थोड़ी देर सो जा तू, सुबह मिलती हूँ .

मैं- सो जाऊंगा पर इन बाँहों में .

मोना- बस इसलिए ही मैं तुझसे दूर हूँ.

मैं- पर दूर हो तो नहीं पायी.

मोना- पास भी तो नहीं आ सकती

मैं- किस बात की सजा दे रही है तू मुझे . ऐसी कौन सी गुस्ताखी हुई मुझसे जो इतना दूर हो गयी .

मोना- छोड़ इन बातो को मुसाफिर. क्या रहा है इन कच्ची बातो में

मैं- न बताती है न ठीक से छिपा पाती है , आज तुझे बताना होगा की आखिर क्यों दूर हुई है तू मुझसे.

मोना- बस इतना समझ ले तेरा मेरा साथ यही तक था .मैं जल्दी ही यहाँ से दूर चली जाउंगी. वक्त सब के घाव भर देता है , तू भी भूल जायेगा मुझे .

मैं- मैं तुझे भूल जाऊ ये हो नहीं सकता, और तू मुझे भूले ये मैं होने नहीं दूंगा. तू जहाँ भी जाएगी मैं तो तेरे दिल में मोजूद रहूँगा. मुझसे तो भाग लेगी तू पर खुद को कैसे समझाएगी.

मोना- तू समझता क्यों नहीं .

मैं- देख मोना, ये सियासत मत कर मेरे साथ वक्त ठीक नहीं है मेरा दिल टूटा है , भाई मर है मेरा और ऊपर से तू ऐसी बाते बोल रही है . कितना दुःख सहूंगा मैं .

रूपा- दुःख ही तो नहीं देना चाहती मैं तुझे.

मैं- तो फिर बताती क्यों नहीं आखिर कौन सी वो दिवार है जो तेरे मेरे बिच आकर खड़ी हो गयी है . जिसने मुझे तुझसे जुदा कर दिया है .

“रुपाली, रुपाली नाम है उस दिवार का ” उसने कहा .
 
#64

मैंने मोना से फिर एक शब्द नहीं कहा . ऐसे उलझे थे हम उनसे की अब करे तो क्या करे. बचपन से मैं जिस अकलेपन से जूझ रहा था शायद वही मेरी नियति था. दिल में मेरे बहुत कुछ था जो मैं इस दुनिया से कह देना चाहता था पर अफ़सोस की ये दुनिया बड़ी घटिया थी .

“एक बार बस तुझे गले लगाने की हसरत है .बस एक बार मेरे सीने से उसी तरह लग जा जैसे तू पहली बार लगी थी ” मैंने कहा

मोंना- तेरी ये बाते भी न

मैं- तेरी मर्जी जाना. मुसाफिर जान गया है की उसके नसीब में मंजिले नहीं बस सफ़र है . तो ठीक है , तेरी चोखट से जा रहे है . तमन्ना थी के आँखे बस तुझे देखे , देख लिया अब मालूम है तू ठीक है , तू आबाद रहे ये दुआ है .सोचा था की कुछ देर और करेंगे दीदार तेरा पर ये कमबख्त रात भी न कुछ ज्यादा ही लम्बी हो गयी है . पर उम्मीद है जब उजाला आएगा तो कुछ अच्छा साथ लायेगा. कहा सुना माफ़ करना .

इसके आगे मैं कुछ नहीं कह पाया क्योंकि कदम हवेली से बाहर चल पड़े थे. धड़कने मंदी थी , कुछ कह रही थी पर सुना नहीं फिर मैंने . उनको . एक बार भी मुड कर उस चोखट को नहीं देखा जहाँ पर दिल का एक टुकड़ा रख आया था . जिंदगी ने आज एक चीज़ और सिखाई थी मुझे की कभी दिल न लगाना. दिल्लगी के इम्तिहान नहीं दिए जा सकते. और सबसे बड़ा मजाक तो तक़दीर ने किया था .

“मेरे ही हाथो में तक़दीर मेरी और , मेरी तक़दीर पर मेरा बस नहीं चलता ” हाथो की लकीरों को देखते हुए मैंने खुद से कहा .

एक ऐसे मोड़ पर आकर खड़ा हुआ था मैं जहा मेरा कोई नहीं था, मैंने सब कुछ खो दिया था .मोना, रूपा, करतार . सब का साथ छुट गया था था. मुसाफिर फिर अकेला था . अगले कुछ रोज बस मैं ये सोचता रहा की कैसे मैं खुद को मिटा दू. करतार की मौत की खबर आग की तरह फ़ैल गयी थी . मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया. कुछ नहीं कर पाया.

पर कहते है न जैसा भी हो वक्त बीत ही जाता है , ये वक्त भी बीत गया था . पुरे चार महीने गुजर गए थे गर्मियों की शुरआत हो गयी थी . इन चार महीनो में मैंने एक बार भी सुलतान बाबा, मोना या रूपा से मुलाकात नहीं की थी और न ही उनमे से कोई मेरे पास आया. बस ख़ुशी की बात ये थी की मेरा घर बन गया था . घर क्या था पहले छोटा कैदखाना था अब मैं बड़े कैदखाने में रहता था .

ज्यादातर समय इसी चारदीवारी में बीत जाता था , कहने को करने को कुछ नहीं था मेरे पास. खेती में भी दिल नहीं लगता था . खेत खाली पड़े थे . अक्सर रात रात भर नींद नहीं आती थी , आँख लगा भी तो इस आस में जाग जाता था की कभी तो वो आएगी. पर मेरी वीरान चोखट के नसीब में ज़माने भर का इंतज़ार लिखा था .

ऐसा लगता था की वक़्त ने सब भुला दिया था पर वो दोपहर शायद अपने साथ ताजी हवा का झोंका लायी थी .उस दोपहर मैं नहा कर बस आया ही था की घर की ख़ामोशी को उस जानी पहचानी पायल के शोर ने तोड़ दिया. एक बार तो मुझे यकीन नहीं हुआ पर अगले ही पल मैं जान गया की ये वही थी .सामने दरवाजे के बीचो बीच वो खड़ी थी . दिल थोडा खुश हुआ पर अगले ही पल फिर से मायूसी ने घेर लिया उसे.

“तुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था ” मैंने कहा

“मुझे लगा था की तू ये पूछेगा की इतनी देर क्यों लगाई आने में , खैर, ये मेरा भी घर है और तू रोक नहीं सकता मुझे ” रूपा ने थोड़ी शिकायत से कहा

मैं- तू जाने तेरे ये फ़साने ,

रूपा-जानती हूँ तेरी शिकायते है , बेरुखी है पर एक बार बात तो की होती, भरी महफ़िल में रुसवा करके छोड़ आया.

मैं- और तूने जो किया, तू ये सब पहले भी बता सकती थी न मुझे.

रूपा- एक होता है सच जिसकी कोई अहमियत नहीं होती एक होता है भ्रम बस तू सच और भ्रम के बीच फर्क नहीं कर पाया.

मैं- तो तोड़ क्यों नहीं देती इस भ्रम को दिखा मुझे सच का आइना . मोहब्बतों में कुछ सच नहीं होता , कुछ झूठ नहीं होता. कुछ होता है तो बस समर्पण एक दुसरे के प्रति ,एक विश्वास

रूपा- तेरे मुह से ये बाते अच्छी नहीं लगती.

मैं- बेशक

रूपा- सोचा था इतने दिन बाद मुझे देखेगा तो दौड़ कर बाँहों में भर लेगा अपनी रूपा को . पर तेरी शिकायते ही खत्म नहीं होती. तुझे तेरा दुःख तो दीखता है पर कभी मेरे बारे में सोचा तूने , पलट कर मैं भी सवाल करू तो क्या जवाब देगा तू

मैं- किस बारे में सवाल है तेरा. मैंने क्या छुपाया तुझसे

“मेरा ही अक्स मुझसे खुदगर्जी कर रहा है , आइना देखो चेहरे से झूठ बोल रहा है , मैं उस रिश्ते की बात कर रही हूँ जो मुझसे छुपाया, तेरा और मोना का रिश्ता, मैं ये तो जानती थी की वो संरक्षक है तेरी पर मुसाफिर मुझे ये बता की ये कैसी मोहब्बत है जो तूने बाँट दी है , आग और पानी के बीच तूने क्यों खुद को खड़ा कर लिया. माना की मैं गलत हूँ पर तू कौन सा ठीक है , बता मेरा इंसाफ कैसे करेगा तू. सब मेरी मोहब्बत किसी और के आंचल में बाँध दी है तूने. ” रूपा जैसे चीख पड़ी.

हम दोनों के बीच कहने को कुछ नहीं था फिर भी इस सवाल का कोई जवाब नहीं था मेरे पास.

“बोलता क्यों नहीं मुसाफिर, बड़ी बड़ी बातो से जिन्दगी नहीं चलती, जिन्दगी का बोझ धोना कहाँ आसान है , तुझे बस तेरे दर्द दीखते है ,किसी और के जलते कलेजे को महूसस करके देख. ये दुनिया उतनी भी बुरी नहीं जितना तूने समझा है . प्यार वफ़ा ये सब किताबी बाते है जब जिन्दगी की सच्चाई का सामना होता है तो हर ख्वाहिसों का कत्ल खुद करना पड़ता है , खैर चलती हूँ ” उसने कहा

मैं- रुक जरा, बैठ पास मेरे

रूपा- नहीं रे, मन खट्टा कर दिया तूने. आई तो ये सोच कर थी की चल मैं ही मना लेती हूँ , पर कोई बात नहीं . ये भी एक दौर है बीत जायेगा.

रूपा ने अपना झोला मेरी चारपाई पर रखा और दरवाजे से बाहर चली गयी. मैं चाह कर भी उसे रोक न पाया. मैंने झोला खोला उसमे एक जोड़ा था और एक पायल. एक टूटा आइना .
 
#65

चारो तरफ से ऐसा उलझा था की अब लगता नहीं था की सुलझ पाउँगा. अतीत की भुल्बुलैया में अब मोना और रूपा ने मेरे वर्तमान को भी उलझा कर रख दिया था . और जिस तरह से बाबा सुलतान ने भी दुरी बनाई हुई थी , अजीब था मेरे लिए पर जिंदगी से ज्यादा क्या अजीब हो . पर अब सोचने से क्या फायदा इस भंवर से निकलना कहाँ आसान था जितना मैं अतीत को तलाशने की कोशिश करता उतना ही मेरा आज उलझे जाता था .

कुछ दिन और बीत गए थे, ऐसा लगता था की जैसे दुनिया ने भुला दिया है मुझे. ले देकर दो चार लोग ही तो थे जो अब नहीं थे . ऐसे ही एक शाम मैं तालाब किनारे बैठा था .हवा के संग चलती हिलोर मेरे टखने तक डूबे पैरो को भिगो रही थी की मैंने दुसरे किनारे पर बाबा को देखा हाथो में कुछ लिए वो मुझे इशारा कर रहे थे . थोड़ी देर में मैं उनके पास पहुंचा

“बाबा , यहाँ इस तरफ कैसे ” पूछा मैंने.

बाबा- किसी काम से बाहर था लौट ही रहा था की तुम दिख गए

मैं- कहाँ गए थे .

बाबा- कहीं दूर

मैं- यही बात तो ठीक नहीं लगती मुझे, हमेशा आधी अधूरी बात ही करते हो .

बाबा- ऐसी बात नहीं है , देखो क्या मिला है मुझे

बाबा ने झोले से एक शीशी निकाली जिसमे कुछ अजीब सा था .

“क्या ये धुंध है बाबा ” मैंने पूछा

बाबा- नहीं , ये उस से कहीं ज्यादा है , तुम्हे थोडा अजीब लगेगा पर ये कुछ ऐसा है जिसे तुम देख कर हैरान रह जाओगे, इसका तुम से सम्बन्ध है

मैं- पहेलियाँ क्यों बुझाते हो बाबा. बताओ न ये क्या है

बाबा- ये एक दुर्लभ जादू है , इसमें कोई जादूगर अपनी जिन्दगी का थोडा हिस्सा रख देता है .

मैं- समझा नहीं .

बाबा- देखो ये ऐसा है जैसे की कोई अपनी जिन्दगी का एक टुकड़ा या कोई विशेष बात जैसे की कोई याद किसी के लिए छोड़ दे .

मैं- ओह, पर ये किसकी याद है .

बाबा- मुझे लगता है की ये तुम्हारी याद है .

मुझे थोड़ी हैरानी सी हुई- “मेरी याद , और मुझे ही इसके बारे में पता नहीं ” मैंने थोड़े व्यंग्य से कहा

बाबा- जैसा मैंने कहा, ये थोडा जटिल है समझने में .तुम इसे देख पाते यदि यादो का दर्पण उपलब्ध होता , पर अफ़सोस वो बरसो पहले टूट गया. पर मुझे यकीं है की कोई और रास्ता भी होगा .

मैं- पर इसमें ऐसा क्या है

बाबा- कुछ तो खास होगा इसमें क्योंकि ये शीशी जहाँ मुझे मिली हिया वहां इसके मिलने की बिलकुल उम्मीद नहीं थी .

मैं- कहाँ मिली ये शीशी

बाबा- जादूगरों के शमशान में

मैं- जादूगरों का शमशान , अब ये क्या बला है .

बाबा- तुम इतना तो समझते हो न की जादूगरों की दुनिया इस दुनिया से थोड़ी अलग है

मैं- वो तो है

बाबा- जादूगरों के शमशान की खास बात है की वहां पर हर जादूगर की वसीयत रखी होती है जिसे केवल उसका सच्चा वारिस ही पढ़ सकता है . और अपने लिए छोड़ी गयी चीज को प्राप्त कर सकता है

मैं- मोना ने बताया मुझे वसीयत के बारे में .

बाबा- पर क्या तुमने पढ़ी वो वसीयत

मैं- जरुरत नहीं पड़ी .

बाबा- क्या तुम्हे ये अजीब नहीं लगता की तुम्हारी माँ जो एक जादूगरनी थी उसने अपनी इकलौती औलाद के लिए कुछ नहीं छोड़ा .

मैं- मेरे लिए इतनी जमीन ज्यदाद , पैसा तो छोड़ गए है वो .

बाबा- मैं तुम्हारी असली जायदाद के बारे में बात कर रहा हूँ .

मैं- हवेली में मोना रहती है और वैसे भी हवेली में मुझे इंटरेस्ट नहीं हैं .

बा- मुर्ख होतुम

मैं- सही कहा .

बाबा- क्या तुम्हे लगता है की सुहासिनी को अपने बेटे की परवाह नहीं थी , क्या तुम्हे लगता है की वो अपने बेटे के लिए कुछ ऐसा नहीं छोड़ कर जाएगी जो उसे उसकी वास्तविकता का आभास करवाएगा.

मैं- और क्या है मेरी वास्तविकता सिवाय इसके की मैं एक महान जादूगरनी का बेटा हूँ, जिसका जादू से कोई लेना देना नहीं है

बाबा- तुम समझ नहीं रहे हो . तुम विलक्ष्ण हो .

मैं- बार बार ये बात करने का कोई फायदा नहीं है .

बाबा- ठीक है तो फिर मैं चलता हूँ . ये शीशी रखो तुम .

बाबा ने शीशी मेरे हाथ में रख दी और वहां से चला गया . मैंने शीशी देखि उस पर कागज से मेरा नाम लिखा था देव. मैंने ढक्कन खोला अन्दर सफेद गाढ़ी धुंध जैसा धुआं था मैं सोचने लगा की ये मेरी याद कैसे हो सकती है .

सच कहूँ तो मैं हैरान था की मेरे आस पास इतना कुछ छिपा था और जो मुझे ये सब बता सकते थे वो सब छिपाने में लगे थे . बाबा, रूपा और मोना ये सब सामान्य थोड़ी न थे. तालाब से चल कर मैं पक्की सड़क पर पहुंचा ही था की मेरे सामने एक गाड़ी आई , मैंने देखा उसमे शकुन्तला थी .मुझे देख कर उसने गाडी रोक दी.

“घर तक छोड़ दूँ ” उसने शीशा निचे करते हुए कहा.

मैं- नहीं मैं चला जाऊंगा

सेठानी- आ जाओ.

उसने दरवाजा खोला और न चाहते हुए भी मैं अन्दर बैठ गया .

“कैसे हो तुम ” पूछा उसने

मैं- बस कट रही है तुम बताओ

वो - मेरी भी बस कट रही है .सुना है नए दोस्तों ने छोड़ दिया है तुम्हे

मै- ऐसी तो कोई बात नहीं बस कुछ और कामो में व्यस्त हूँ मैं

सेठानी- गाँव में वापिस लौट आओ, क्यों पड़े हो उधर बियाबान में अभी भी मौका है एक नयी शुरुआत कर सकते हो . मैंने पहले भी कहा था उन लोगो की सांगत ठीक नहीं है अब भी कहती हूँ ,

मैं- शुक्रिया, इस सलाह के लिए . वैसे तुम मेरी माँ को अच्छे से जानती थी तो क्या कभी उन्होंने तुमसे किसी वसीयत का जिक्र किया था या कुछ ऐसा जो वो मेरे लिए छोड़ गयी हो.

शकुन्तला ने गाड़ी रोक दी और गाड़ी में रखी बोतल से कुछ घूँट पानी पिया फिर बोली- उस चूतिये सुल्तान ने तुम्हे नहीं बताया क्या तुम्हे

मैं- तुम जानती हो न इस बारे में .

सेठानी- वो तुम्हारे लिए तीन चीज़े छोड़ कर गयी थी . पहली उसकी तलवार, दूसरी एक ख्वाहिश और तीसरी ................

उसने बात अधूरी छोड़ दी .

मैं- तीसरी क्या

सेठानी- तीसरी तुम्हारी मौत.
 
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