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Adultery वासना की मारी औरत की दबी हुई वासना

रीमा सोच रही थी जब मरना ही है तो नदी में डूब कर मर जाऊँ वैसे भी अस्थियाँ तो नदी को ही आनी है, इन दरिंदों के हाँथो इस मांस हड्डी की दुर्गति क्यों करवाना और फिर ये ज़िंदा तो छोड़गे नहीं । इस समय उसके अंदर क्या चल रहा है ये समझ पाना ख़ुद उसके लिए बहुत मुश्किल था । वो सामने ख़ूँख़ार आदमों को देखकर भयभीत थी, उन्होंने उसके ऊपर तीर तान रखे थे, मतलब एक हरकत हुई नहीं और सारे तीर उसके गुलाबी बदन में धँसे होंगे ।

क्याँ करूँ क्या करूँ कुछ समझ नहीं आ रहा था । इसी बीच रीमा पानी की एक लहर में थोड़ा सा हिली, उसका बदन भी और अभी तक उसका जो शरीर गले के नीचे पानी में था उसकी एक झलक उन आदमों को मिली, आदम की नज़र रीमा के बायें हाथ पर लगे भाले की खरोंच के निशान पर पड़ी, उसको ऐसा लगा जैसे रीमा की हाथ पर रज रक्त मुक्ति का निशान बना है । इन आदमों की परंपरा में अगर किसी आदम को स्त्री के रक्त से जीवन मुक्ति मिलती है तो उसे ये रज रक्त मुक्ति बोलते है ।

रज रक्त मुक्ति का निशान ऐसा होता है जिसमे एक स्त्री के शरीर लाल रक्त के साथ मुक्त होता दिखायी देता है ।रीमा के घाव के चारो और रक्त निकलने और सूखने से काला निशान बन गया था और बीच में लालिमा थी तो उस बूढ़े को ये आभास हुआ की ये रज रक्त मुक्ति का निशान है ।

वो ये आवाज़ में कुछ गरजा जो रीमा को समझ नहीं आया । लेकिन सबके तीर नीचे हो गये । बूढ़ा आगे बढ़ा तो रीमा भी नदी के पानी के एक कदम पीछे हटी और बूढ़े की तरफ़ पानी उछाल दिया ।

बूढ़ा आदम - मूर्ख क्यों मृत्यु को आवाहन दे रही है ।

रीमा को उसकी भराई आवाज़ से सिर्फ़ मृत्यु समझ आया । इसी बीच रीमा नदी में अपने पैर टिकाने को सीधी हुई तो लहरों ने खेल कर दिया और रीमा के नाभि के ऊपर वाले भाग से आँख मिचौली खेल कर चली गई । रीमा के पानी में भीगे गुलाबी बदन के उन्नत नुकीली उठी गुलाबी मख़मली छातियों का हाहाकारी यौवन देख कुछ आदमों की भाव भंगिमाएँ बदल गई ।

एक बोला - मुक्ति ।

बूढ़ा आदम - धाप दु हिड उर्यूअउउउ भप मूर्ख ना' छिले ।

सभी आदम गंभीर हो गये । बूढ़ा आदम आगे बढ़ा और नदी के किनारे पानी की धारा से पहले खड़े होकर उनसे एक हाथ रीमा की तरफ़ बढ़ाया, जैसे वो उसे नदी से निकलना चाहता हो । रीमा दहशत और आश्चर्य से उसे देख रही थी । उसने ऊपर से नीचे तक कोई कपड़ा नहीं पहना था । उसके लंबे बाल एक दूसरे में चिपक कर जटाए बना रहे थे । चमड़ी बिलकुल सूखी हुई स्याह रंग की, ऐसा लगता था जैसे शरीर में खून हो हो नहीं ।

गले में कुछ हड़ियो की माला और हाथ में एक दंड और भाला । इस पूरे कांड में अभी तक रीमा ने जो नहीं देखा था वो की इन बिना खून वाले आदमखोर आदमों के लिंग सामान्य से बड़े थे । उसके हाहाकारी उठे हुए नंग्न वक्ष स्थल को देखकर भी एक दो को छोड़कर किसी की भी भाव भंगिमा नहीं बदली । ऐसा लगता था की वो स्त्री के यौवन के भावों और अनुभवों से अपरिचित थे या वो उस वासनाओं के पड़ाव से काफ़ी आगे निकल गये थे ।

बूढ़े आदम ने एक बार और रीमा को अपनी तरफ़ आने का इशारा किया । रीमा टस से मस न हुई, उसने बूढ़े आदम को देखा और फिर उसके पीछे खड़ी उसकी फ़ौज को, जो उसके एक इशारे पर उसके शरीर को तीरो से छलनी कर देगी ।

बूढ़े आदम ने रीमा ने दुविधा को समझने की कोशिश की और अपने आदमियों को और पीछे जाने का इशारा किया ।

बूढ़ा आदम - कौन हो तुम और यहाँ इस घनघोर जंगल में, बिना कपड़ों के नग्न क्या कर रही हो ।

रीमा - तुम लोग कौन हो ।

बूढ़ा आदम - ये इलाक़ा में अंग्रेज सरकार ने किसी को भी आने को मना किया है । अंतिम बार एक स्त्री इधर आयी थी, मुझे लगा वो हमारे लिए आयी है (अपने लिंग को हिलाते हुए) लेकिन वो तो व्यर्थ ही अपनी मृत्यु के मुँह में चली आयी। हमारी तपस्या में उसका कोई मूल्य ही नहीं था और हमारा समय भी ख़राब किया और फिर उसका मांस यहाँ के जंगली जानवरों ने बड़े प्रेम से खाया था ।

रीमा - अंग्रेज सरकार, कैसी तपस्या ।

बूढ़ा आदम - तुम अंग्रेज सरकार को नहीं जानती, कहाँ से आयी हो ।

रीमा - शहर से ।

बूढ़ा आदम - वहाँ का शासन कौन चलाता है ।

रीमा - तुम लोग मुझे मार के खा जावोगे है न ।

बूढ़ा आदम - तुम स्वयं मृत्यु के मुँह में आयी हो, यहाँ जो भी आया उसकी मृत्यु निश्चित है, जब अंग्रेज सरकार ने मना किया है तो क्यों आयी इधर, और तुमारे वस्त्र किधर है, एक तो तुम निषिद्ध जगल में घूम रही हो ऊपर से निर्वस्त्र । क्या बाहर ऐसा ही जीवन है ।

रीमा - बाहर जीवन , नहीं अग्रेज सरकार को बहुत पहले चली गई ।

बूढ़ा आदम - किस राजा का शासन है वहाँ ।

रीमा - तुम हो कौन और मैं बस भटक गई हूँ, मुझे मत मारो प्लीज़ , मैं जानभूझ कर यहाँ नहीं आयी हो । क़िस्मत की मारी बस कैसे एक मुसीबत से बचते पड़ते दूसरी मुसीबत में फँस जाती हूँ ।

रीमा - मैं यहाँ से चली जाऊँगी और फिर कभी वापस नहीं आऊँगी ।

इतना कहकर रीमा ख़ुद को आगे की तरफ़ लायी और जैसे ही वो आगे को बढ़ने लगी , पानी का आवरण उसके बदन पर से उतरने लगा और उसके उजले गुलाबी मांसल कंधे उजागर होने लगे । उसको भारी उरोजों से झुकी छातियाँ नुमाया हो गई , एक पल को वो पाई में संतुलन बनाने को ठिठक गई । फिर नीचे की तरफ़ देखा और रीमा के हाहाकारी गुलाबी गोलाकार बड़े बड़े उरोजों और उस पर विराजमान उन्नत नुकीली चोटियों नुमाया हो रही थी । रीमा थोड़ा झुक गई और उसके आधे उरोज पानी में डूब गये । आदमों में कुछ इतने से ही वासना ग्रस्त हो गये लेकिन बाक़ी की भाव भंगिमा नहीं बदली ।
 
इधर सबका ध्यान पहले वाले आदमों पर चला गया जो कल रात को रीमा को दूढ़ने निकले थे वे आदम वापस आ गये, वो कंबल नहीं ला पाये और फल चुराने के लिए रीमा को ज़िम्मेदार बताया । ये जानकार बूढ़ा आदम क्रोधित हो गया ।

बूढ़ा आदम - तुमने देवी साधना में विघ्न डाला है तुम्हें मृत्यु ही मिलेगी । पकड़ लो इस मादा को ।

रीमा गिड़गिड़ायी - मैंने जानबूझकर नहीं किया, मुझे बहुत भूख लगी थी, नहीं खाती तो भूख से मर जाती ।

बूढ़ा आदम - मृत्यु ही तो मुक्ति है उससे क्यों भयभीत हो ।

रीमा - मैं कुछ भी करने को तैयार हो लेकिन मुझे मारो मत ।

बूढ़ा आदम - मृत्यु से इतना भय, हमारी जिस देवी साधना को भंग किया है पता है हम वो साधना क्यों करते है, क्या चाहिए हमे,

मृत्यु चाहिए, ले चलो इसे, हमारी मुक्ति के राह में आने वाले हर किसी को मृत्यु ही मिलेगी ।

रीमा - मैंने कुछ भी जानभूझ कर नहीं किया है मुझे मत मारो, तुम जो कहोगे मैं करने को तैयार हूँ ।

बूढ़ा आदम पलटा - जो भी मैं कहूँगा करोगी ।

रीमा - हाँ हाँ करूँगी , बस मुझे मारना मत ।

बूढ़ा आदम - तो ठीक है ख़ुद को देवी को समर्पित कर दो ।

रीमा - हाँ जो कहोगे कर दूँगी बस मेरी जान बख्श दो ।

बूढ़ा आदम - अपनी बात से पीछे मत हटाना ।

रीमा - नहीं हटूँगी ।

बूढ़ा आदम - पानी से बाहर आ जावो, हमारा प्रवेश वर्जित है इसमें ।

रीमा - नहीं तुम लोग मुझे मार दोगे ।

बूढ़ा आदम - मर्ज़ी तुमारी, ये सब तुमारी भाषा नहीं समझते, पानी से बाहर आवों नहीं तो ये वैसे भी तुम्हें मार देगें ।

रीमा धीरे से आगे की तरफ़ बढ़ी, लेकिन इतनी देर में पहली बार उसे स्त्री लज्जा का अहसास हुआ, वो तो पूरी तरह नंगी है, अभी तक तो नदी ने उसके गुलाबी जिस्म पर आवरण डाल रखा था लेकिन पानी से निकलते ही वो तो सबके सामने नंगी हो जाएगी ।

रीमा - मुझे कपड़े चाहिए, मैं इतने लोगो के सामने नंग्न, मुझे लाज आती है ।

बूढ़े आदम ने इशारा किया और एक आदम दो बड़े बड़े पत्ते तोड़ लाया । जंगल में यही वस्त्र है लपेट लो ।

आदम पानी में जा नहीं सकते थे इसलिए रीमा को ही बाहर आना पड़ा, लेकिन वो दुविधा में थी, कैसे पानी के बाहर निकले, इतनी निगाहे और सब की सब उसी के गुलाबी बदन पर चिपकी हुई। नदी के लहरों में ख़ुद को बड़ी मुश्किल से संतुलित करते हुए उसने अपने दोनों हाथो से उन्नत गुलाबी उरोजों की नुकीली पहाड़ियाँ बमुश्किल ढकी और और आगे बढ़ने लगी । पहली बार वो मन ही मन अपने बड़े बड़े उन्नत स्तनों के छोटे होने की तमन्ना कर रही थी । जिन बड़े बड़े मम्मो पर हो फूली नहीं समाती थी, जिनके कारण उसके आस पास ही औरते उससे जलन खाती थी आज वो सोच रही थी काश ये छोटे होते तो शायद इनको ढकने को एक हाथ ही काफ़ी था । रीमा का मादक मांसल जिस्म शमशान में भी लोगों के तम्मनाये जगा दे थे ऐसे हुस्न की मल्लिका थी /

पानी में चलते हुए धीरे धीरे उसके कदम आगे बढ़ रहे थे और उसका गुलाबी बदन पानी के नीले आवरण को छोड़ नुमाया होने लगा था, जैसे कभी लहर के कारण उसके कदम लड़खड़ाते और वो ख़ुद को संतुलित करती उसके हाथ हिल जाते और उसका ख़ज़ाने की एक झलक आदमों को मिल जाती और वो बस उसे देखे जा रहे थे और देखे जा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे आँखो से ही चोद डालेंगें । नदी से बाहर निकलने तक के चार कदम भी सीधा पहाड़ चढ़ना जैसे लग रहे थे । रीमा ने धीरे से एक हाथ से दोनों उरोजो की नुकीली चोटियों को ढका और हाथ को कसकर छाती पर चिपका लिया ।

दूसरे हाथ को झट से अपने गुलाबी त्रिकोण पर लगा लिया । अब रीमा नंगी भी लेकिन उसके नंगे चुतड़ो के अलावा कुछ भी देख पाना मुश्किल था । हालाँकि जब औरत आपके सामने इस हद तक नंगी हो तो कल्पना करने को बहुत कम रह जाता है । रीमा झेपती शर्माती और सहमी सी आगे बढ़ी । उसका दिल जोरो से धड़क रहा था न जाने क्या होगा लेकिन कम से कम इतने सारे में लोगो में एक बूढ़ा था जिसकी नियत सही थी । पानी से बाहर आते आते रीमा के जिस्म का हर गुलाबी अंग नुमाया हो चुका था । एक भावहीन आदम ने रीमा को दो पत्ते आगे बढ़ा दिया ।

रीमा ने पत्ते लेने के लिए एक हाथ आगे बढ़ाया और जिस गुलाबी त्रिकोण की सिर्फ़ झलक मिल रही थी अब वो असल रूप में प्रकट था । आधे से ज़्यादा आदम की नजरे उसके जाँघो के गुलाबी चूत त्रिकोण पर ही टिकी थी

वो त्रिकोण जिसे हर सामान्य युवा मानव देखने और भोगने को आतुर है, जबकि उसका जन्म ही यही ये होता है । आदमी का चूत त्रिकोण का आकर्षण असल में उसके अस्तित्व से जुड़ा है इसलिए ये कभी ख़त्म नहीं हो सकता ।

रीमा अपने स्त्री लज्जा बोध को दिखाती पत्ते लपेट रही थी जो उसके भारी नितंबों पर नाकाफ़ी थी लेकिन और कोई चारा भी तो नहीं था । उन आदमों में वासना का भाव जाग्रत हो रहा था ये बात उस बूढ़े के लिए संतोषजनक और चिंतित करने दोनों तरफ़ से थी । इसकी दुविधा उसके चेहरे पर देखी जा सकती है । तभी एक आदम ने बढ़कर रीमा के बाये स्तन को मसल दिया, रीमा ने पत्ते छोड़ उसे मुक्का रसीद कर दिया और उसका भाला छीन लिया, इतना देखते ही बाक़ी आदम भी आक्रामक हो गये । रीमा ने झट से बूढ़े आदम की गर्दन पर भाला रख दिया ।

बूढ़ा आदम घूमा - ये क्या मूर्खता है, मृत्यु का भय नहीं ।

रीमा - अगर जरा भी हिले तो भाला गर्दन के पार होगा ।

बूढ़ा आदम ज़ोर से हँसा - हा हा हा मृत्यु , मृत्यु का भय दिखा रही हो वो भी हमको ।

रीमा को कुछ समझ न आया ये हंस क्यों रहा, पत्ते पता नहीं कहाँ गये , पूरा बदन नंगा, उसने एक बूढ़े आदमी पर भाला तान रखा है और उसके चारो ओर २० लोगो ने तीर से उस पर निशाना साध रखा । एक आदम आगे बढ़ा तो रीमा ने भाले पर ज़ोर बढ़ा दिया ।

बूढ़े आदम को अपने गले में दर्द का अहसास हुआ और एक बूँद रक्त की निकल आयी । ये कैसे संभव है, मैं तो रक्तहीन हूँ, त्वचा की संवेदना न्यून है फिर मुझे भाले की नोक से दर्द का अहसास हुआ और रक्त भी निकला । कुछ ठीक नहीं है, कुछ तो है जो मैं सुलझा नहीं पा रहा हूँ ।

बूढ़ा आदम अपनी मूल भाषा में - ठहरो ।

सभी अपनी अपनी जगह ठिठक गये । फिर उसने सबको पीछे हटने को कहा, एक बार में न सुनने पर वो दूसरी बार चिल्लाया । उसने रीमा को घूर कर देखा - कौन हो तुम ।

रीमा को लगा ये दांव काम कर गया - वो पानी की तरफ़ बढ़ने लगी, उसे पता ही नहीं था की वो २० आदमों के सामने सिर से लेकर पैर तक नंगी है । उसी के साथ साथ उसने बूढ़े को धमकाया - मेरे साथ साथ चलो वरना बुरा होगा ।

बूढ़ा आदम - तुम जैसा कहोगी वैसा ही करूँगा लेकिन मेरे प्रश्न का उत्तर दो , कौन हो तुम ।

रीमा - नदी के पानी में पहुँच गई, बूढ़ा भी बिना अपने शरीर की जलन की परवाह किए बिना उसके साथ नदी में चलता चला गया । पानी के संपर्क में आते ही उसको भयंकर पीड़ा होने लगी। उसको पीड़ा देख एक बार को रीमा का कलेजा काँप गया लेकिन करती भी क्या ।

रीमा - इनसे कहो हथियार फेंक दे ।

बूढ़ा आदम ने अपने लोगो से हथियार फेंकने को कह दिया - वे कर्तव्य विमूढ़ से उसके आदेश का पालन करने को विवश थे ।

बूढ़ा आदम - कौन हो तुम देवी ।

रीमा को अजीब लगा - ये मेरे को देवी क्यों कह रहा है, रीमा को लगा यही सही मौक़ा है बूढ़ा पानी के कारण जलन से मरा जा रहा है, उसने बूढ़े को लात मारी और भाला फेंक पानी में डुबकी लगा दी । बूढ़ा सर से पैर तक जलन का ताबूत बन गया लेकिन वो उसी पानी में खड़ा हुआ और उसने अपने कमर में बंधी एक बांस की छोटी नली निकाली और रीमा जिस पानी की धारा में लुप्त हुई थी उसी को गौर से देखता रहा और फिर उसने निशाना साध कर फूंक मारी । पानी के अंदर बहाव के साथ आगे को जाती रीमा की गर्दन में एक सुई जैसा चुभने का अहसास हुआ और इधर बूढ़ा धड़ाम से पानी में ही गिर पड़ा । उसके साथ के आदम बूढ़े को निकालने के लिए पानी में कूद पड़े, शरीर उनका भी जलता था लेकिन और करते भी क्या । बूढ़े को जैसे ही वो पानी से बाहर निकालने लगे वो कुछ बुदबुदाया और बाक़ी आदम आगे नदी की धारा की तरफ़ बढ़े । कुछ ही देर में उन्हें रीमा का पता चल गया और वो उसी का निशाना लगाकर उसको पानी से खींच कर बाहर ले आये ।
 
रीमा अर्ध मूर्छित अवस्था में थी और पानी से बाहर आते ही पूरी तरह बेहोश हो गई । उसके हाथ पाँव बांधकर उसको एक लकड़ी में लटकाकर आदम अपनी गुफा की और चल पड़े । शायद रीमा का अंत अब निकट आ गया था । पानी से विचलित बाक़ी आदम भी जैसे तैसे पीछे पीछे चलने लगे ।

बूढ़े आदम ने सबको सख़्त हिदायत दी की पूजा से पहले उस स्त्री के पास कोई नहीं जाएगा ।

तीन दिन की बेहोशी के बाद रीमा ने अपने आप को एक गुफा में पाया, उसके पैर और हाथ दोनों लताओ से बंधे थे ।

इधर रोहित सिक्युरिटी और वन विभाग शिकारी कुत्तो के साथ नदी के दूसरी तरफ़ की ख़ाक छानने लगे । तीन दिन खोजने के बाद रीमा का कंबल नदी के एक किनारे पर मिला । उस आदमी ने अपने कंबल को तुरंत पहचान लिया । अब रोहित की आँखों तले अंधेरा छाने लगा । इधर जंगल घूमते घूमते रोहित को नदी के दूसरी तरफ़ के सारे किसे भी सुनने को मिल गया थे इसलिए उधर जाने की तो कोई उम्मीद भी न थी । रोहित पूरी तरह टूट चुका था उसने अब माँ लिया था की रीमा शायद अब जीवित नहीं रही । वो शायद अब कभी नहीं लौटेगी। बस उसका रोना ही बाक़ी था । किसी तरह ख़ुद को सँभाले टूटे दिल के साथ वापस घर की ओर चल दिया ।

इधर रीमा को नियमित समय पर खाना मिलता और सारी सेवा हो रही थी लेकिन न तो उसके हाथ पाँव खोले गये और न ही उसको कही बाहर जाने की अनुमति थी । एक जंगली पत्तो की परत से उसका बदन ढका गया था । बाक़ी जो भी आदम पानी के प्रभाव में आये थे वो सारे इस समय मिट्टी स्नान कर रहे थे । रीमा इतना तो समझ गई थी इन सभी आदमों की उम्र अलग अलग है और जो कम उम्र के है उनका उसको देखने का नज़रिया अलग है बाक़ी उम्रदराज़ लोगो से । ऐसा लगता है उम्रदराज़ लोगो में न कोई भावना है न कोई संवेदना है । एक दिन रीमा ने एक आदम को अपना फल खाने को दिया लेकिन उसने लेने से मना कर दिया । तीन दिन बाद बूढ़ा आदम वापस आया । जिस दिन पूर्ण चंद्रमा होगा उस दिन पूजा है और फिर हम तुमारे रज रक्त की बलि देगें ।

रीमा - मुझे मारने से क्या मिलेगा ।

बूढ़ा आदम - अगर मृत्यु आवश्यक हुई तो वो भी करेगें ।

रीमा - लेकिन मुझे बिना मारे अगर तुमारा काम हो जाये तो ।

बूढ़ा आदम - मुक्ति इतनी आसान नहीं है ।

रीमा - मुक्ति तुम्हें चाहिए फिर मुझे क्यों मारना है ख़ुद को मारो ।

बूढ़ा आदम - तुम ही मुक्ति द्वार हो सकती हो, अब अगर तुमारे रज रक्त की बलि देवी ने स्वीकार कर ली और हेम मुक्ति दे दी तो हम तुम्हें नहीं मारेजें ।

रीमा को कुछ समझ नहीं आया । अब तक उसका डर भी काफ़ी हद तक निकल गया था । बूढ़ा आदम चलने को हुआ तो रीमा बोली - मुझे अगर यहाँ घूमने को मिल जाये, मैं यहाँ पड़े पड़े बोर हो जाती हूँ ।

बूढ़ा आदम - साधना इतनी आसान नहीं ।

रीमा - तो मुझे साधना कछ में ही बेज दो ।

बूढ़े आदम ने अपने एक युवा से कुछ मूल भाषा में कहा और चला गया ।

अगले दिन से रीमा को दो अलग अलग जगह पर आदम अपनी उपस्थिति में टहलाते थे । जिनमे से एक युवा आदम रीमा पर ज़्यादा ही आसक्त था । रीमा की सेवा में कोई कमी नहीं थी जैसा बकरे की बलि देने से पहले खिलाया पिलाया जाता है वैसे ही रीमा को भी सब कुछ खाने को उपलब्ध था । बस बाहर अकेले जाने की आज़ादी नहीं थी ।

अगले कुछ दिनो में रीमा ने उन आदम लोगो के बारे में काफ़ी कुछ जाना, लेकिन जितना वो जानती उतना ही वो रहस्यमयी प्रतीत होते । पहली बात जो उनसे जानी की ये आदमखोर नहीं है, असल में ये भोजन नहीं करते है, निद्रा भी इनकी न के बराबर है और ज़्यादातर साधना और तपस्या में लीन रहते है और इनकी साधना करने का कारण मुक्ति है । इन्हें मुक्ति चाहिए, सबको मुक्ति चाहिए । सब बस मरना चाहते है । लेकिन क्यों ये एक बड़ा सवाल था और इसका जवाब अभी रीमा के पास नहीं था ।

उसको ये तो पता चल गया था की अगर इनको मुक्ति न मिली तो ये ज़रूर रीमा को मार डालेगे, तो रीमा को ये तो समझ आ चुका था की बचने का एक ही रास्ता है वो है मुक्ति लेकिन कैसे । रीमा को उनकी साधना के तरीक़े अजीब लगते थे, ढेर सारी हड्डियाँ, जानवरो की बलि और रक्त को अग्नि में डालना और पता नहीं क्या क्या लेकिन एक बार जो उसे समझ आयी, यहाँ कामनाओ का कोई मूल्य नहीं है, सभी ऐसा लगता है जैसे वैरागी है । जबसे यहाँ आयी है उसके मन में भी सांसारिक विचार नहीं आये, कामना, भय, चिंता सब जैसे दूर हो गया हो सिर्फ़ उस मृत्यु के विचार को छोड़कर । उसे बस वही बात कभी कभार परेशान करती अन्यथा वो यहाँ गहरी मानसिक शांति में थी ।

यहाँ आकर उसे समझ आया की उसके नंग्न शरीर को देखकर भी ज़्यादातर आदमों की भाव भंगिमाये क्यों नहीं बदली । क्योंकि वे साधना रत होकर अब इससे ऊपर जा चुके थे जहां शरीर का आकर्षण शायद उन्हें प्रभावित नहीं करता था । बस कुछ थे जो शायद अभी इस सिद्धि से दूर थे और उनका मन अभी भी चंचल था । उन्हीं चंचल मन वाले आदम में से एक आदम रीमा की सेवा में लगा था । उसके आँखों में रीमा के लिए आकर्षण साफ़ नज़र आता था वो रीमा को निवस्त्र देखने की यथा संभव कोशिश भी करता और रीमा का शक सही था, एक दिन उसने उसी आदम को अपना लिंग मसलते देख लिया, पहले तो वो वहाँ से जाना चाहती थी लेकिन आँड़ लेकर उसने देखा की उसके पहने हुए पत्तों को सूंघकर वो अपना लिंग मसल रहा है, मतलब ये वासना मुक्त नहीं है लेकिन बड़ी कोशिश के बाद भी उसका लिंग में तनाव नहीं आया और कुछ देर बाद एक हल्का सफ़ेद द्रव्य निकला और वो शांत हो गया ।

रीमा का दिमाग़ घूम गया, ये क्या माजरा है, इनके लिंगों में कठोरता नहीं आती लेकिन स्खलन होता है । वैसे अच्छा है इनके लिंक कठोर नहीं होते नहीं तो ये तो स्त्रियों की योनि ही फाड़ डालते, रीमा ने जीतने भी आदम देखे थे सबके निर्जीव लिंग भी रोहित से दोगुने थे । वो सोच रही थी कौन से जीव है कौन सी मनुष्य की प्रजाति है न कुछ खाते है न सोते है और बाहर की दुनिया में इनके बारे में कितनी ग़लत अवधारणा फैली है की ये आदमखोर है ।

बहत से विचारों में घूमते घामते रीमा ख़ुद पर आ गई, मेरा क्या होगा । क्या ये मुझे मार डालेगे, अभी तो बहुत खिला पिला रहे है । लेकिन मारने से पहले मुझे ये पता करना होगा इनको मुक्ति क्यों चाहिए और ये सब ऐसे क्यों है, इनकी चमड़ी में कोई रौनक़ नहीं, शरीर हड्डियों का ढाँचा है लेकिन बल इतना की कुंतल भर का पत्थर अकेले उठा ले, ये है तो कोई मानव प्रजाति की ही शाखा लेकिन क्या है ये पता लगाना होगा, शायद मरने की नौबत न आये और मैं बच जाऊँ । वो आदम जब वहाँ से चला गया तो रीमा ने चुपके तो वो पत्ता जिस पर वो अपना वीर्य निकाल कर गया था उसको उठाकर छुपा दिया और बूढ़े आदम को दिखाने के लिए सही समय का इंतज़ार करने लगी ।

एक दो दिन और बीतते है लेकिन उस आदम की हरकत रीमा के लिए बदलती जा रही थी । अब वो रीमा को किसी न किसी बहाने स्पर्श करता था । रीमा चाहकर भी ज़्यादा कुछ कर नहीं सकती थी । उसकी भयानक शक्लों से ही अब उसे डर नहीं लगता क्या ये कम बड़ी बात थी । उसी दिन जब वो रीमा के भोजन की डालियाँ वापस ले जा रहा था तो उसने इशारा किया । उसने अपने लिंग को हाथ में पकड़कर रीमा को पकड़ने को कहाँ । रीमा पीछे हट गई । उसको भी जाना था इसलिए वो भी वहाँ से चला गया लेकिन उसका मन में जो कामनाये उमड़ रही थी वो तो ऐसे शांत नहीं होने वाली थी । वो रात में वापस आता है, रीमा तब तक सो चुकी थी, इसलिए वो रीमा को जगाता है और बड़े भी अनुनयी आँखों से अपना लिंग पकड़कर रीमा के हाथ में रखने लगता है ।

रीमा नीद के बोझ से लदी थी जब तक उसे समझ आता तब तक वो अपना फुट भर का लिंग रीमा के हाथ में रख चुका था, जिसे रीमा एक झटके में झटक देती है और ज़ोर से चिल्लाने को होती है इससे पहले वो रीमा का मुँह बंद कर देता है और रीमा की चीख मुँह में ही घुट जाती है । वो एक हाथ में बरछी लेकर रीमा को मारने की धमकी देता है, अगर रीमा चिल्लायी तो वो मार देगा । उसी तेज़ी से वो बरछी रीमा के गले पर लगाकर रीमा के मुँह में पास पड़े पत्ते भरकर उसका मुँह बांध देता है । फिर हाथ और पैर भी बांध देता है । रीमा के शरीर के पत्ते तार तार हो गये, उसे ये भी नहीं पता था की स्त्री के मैथुन कैसे करते है । रति क्रिया के ज्ञान से शायद वो अनभिज्ञ था । उसने रीमा को पलट दिया और उसके सबसे ज़्यादा मांसल हिस्से यानी उसके चुतड़ो पर अपना मूर्छित लिंग रगड़ने लगा जिसकी मूर्छा शायद ही दूर हो ।उसके लिंग रगड़ते रगड़ते रीमा के चुताड़ो की दरार में आ गया और फिर वो मांस का निर्जीव लोथड़ा उसकी चुतड़ो की दरार में अपनी घिसाई करने लगा । रीमा भयभीत हो गई, उनके लिंग आम आदमी से बिलकुल अलग थे, एक तो वो साइज में बड़े थे ऊपर से उनकी त्वचा भी वैसे ही सुखी सुखी, जैसे सुखी नरम लकड़ी, रीमा को ऐसा लग रहा था जैसे कोई रबड़ का सूखा डंडा उसके ऊपर रगड़ रहा हो । लेकिन रीमा निर्जीव सी नहीं पड़ी थी इसलिए रीमा के प्रतिरोध को भी उसे बार बार क़ाबू करना पड़ता था । रीमा के जिस्म की गर्मी का असर कहे या रीमा के शरीर का स्पर्श या रीमा के शरीर के घर्षण से हुए परमाणुओं के आदान प्रदान, उस आदम के लिंग में हल्की फुलकी कठोरता आने लगी थी ।

जैसे ही उसे अहसास हुआ की उसका लिंग कठोर हो रहा है , उसका जोश दोगुना हो गया, अब रीमा टस से मस नहीं हो सकती है । दुगनी घर्षण से वो रीमा के मांसल चुतड़ो पर अपना मुर्दा लिंग रगड़ने लगा । रीमा के जिस्म पर इतना दबाव था की उसका दम घुटने को आया, उसका मुँह पहले से ही बंद था और अब तो नाक से सांस लेना भी दूभर था ऊपर से उस आदम की बदबू, रीमा के लिए सब सा सब जानलेवा था, रीमा से अपनी पूरी ताक़त से ख़ुद को उसकी गिरफ़्त से छुड़ाने की कोशिश की और पैर फटके और इसी नूरा कुश्ती में उसका लिंग रीमा की पिछली गुलाबी सुरंग के मुहाने से टकराया ।

रीमा चीखी लेकिन वो चीख उसकी मुँह से न निकल सकी और आँखों से लालिमा और आंसू बनकर बह निकली । पहली टकराहट रीमा का उसके चंगुल से निकलने के प्रतिरोध में हुई थी और शायद इस क्षण ने उसे एक नया मंत्र दे दिया, उसका अर्ध तनाव वाला लिंग ने रीमा ने पिछले द्वार पर ज़ोरदार दस्तक दी । रीमा भीषण चीख से चीखी ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके चूतड़ फाड़ दिये हो, उसका मूसल खुरदुरा लिंग रीमा की गुलाबी गहराइयो में धँस गया और फिर जो हुआ तो चमत्कार से कम नहीं था, रीमा की चीख के आंसू अभी बस निकले ही थे की वो आदम भी चीख़ा और ज़ोर से चीख़ा । फिर पतझड़ शुरू हो गया । रीमा का दर्द एक सामान्य दर्द में बदल गया, उसने लिंग बाहर निकाल लिया और रीमा के चुतड़ो को सरोबार कर दिया।
 
रीमा चीखी लेकिन वो चीख उसकी मुँह से न निकल सकी और आँखों से लालिमा और आंसू बनकर बह निकली । पहली टकराहट रीमा का उसके चंगुल से निकलने के प्रतिरोध में हुई थी और शायद इस क्षण ने उसे एक नया मंत्र दे दिया, उसका अर्ध तनाव वाला लिंग ने रीमा ने पिछले द्वार पर ज़ोरदार दस्तक दी । रीमा भीषण चीख से चीखी ऐसा लगा जैसे किसी ने उसके चूतड़ फाड़ दिये हो, उसका मूसल खुरदुरा लिंग रीमा की गुलाबी गहराइयो में धँस गया और फिर जो हुआ तो चमत्कार से कम नहीं था, रीमा की चीख के आंसू अभी बस निकले ही थे की वो आदम भी चीख़ा और ज़ोर से चीख़ा । फिर पतझड़ शुरू हो गया । रीमा का दर्द एक सामान्य दर्द में बदल गया, उसने लिंग बाहर निकाल लिया और रीमा के चुतड़ो को सरोबार कर दिया।

रीमा के ऊपर से आदम लुढ़क गया और ज़ोर से खड़ा हो गया । वो अलग अलग मुद्रा में नृत्य करने लगा, रीमा अभी हुई नूरा कुश्ती से ज़मीन पर पस्त पड़ी थी । उसमे इतनी हिम्मत नहीं थी की वो आदम से आँख मिला सके, आख़िर उसने अपने पौरुष बल से उसका बलात्कार जो कर डाला था । रीमा की हिम्मत टूट चुकी थी, और शरीर भी, आख़िर एक स्त्री का शरीर इस दानव से कैसे लड़ता, वो अपने स्त्री होने दीनता पर रोने को थी, तभी उस आदम ने नाचते नाचते रीमा के पीछे बंधे हाथ खोल दिये । रीमा के आंसू, बेबसी, लाचारी सब एक साथ उठे झट से उसने अपने मुँह में को खोला और ज़ोर से चिल्लायी और फिर अपने पैर खोले । आदम को रीमा के चिल्लाने से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा । पड़ता भी क्यों, उसके लिंग में अजीब सा परिवर्तन आ गया था, उसका बाक़ी शरीर अभी भी उसकी काली रूखी त्वचा का था लेकिन लिंग का न केवल आकर सामान्य हो गया बल्कि अभी हुए स्खलन के बाद भी उसका तनाव ऐसा था, रक्त से भरा, रक्तिम रंगत लिए कठोर लिंग ।

उसके इस विजय का जुलूस तो अब रीमा निकालने वाली थी, अपने स्त्रीत्व को इस तरह लूटते पिटते देख, अपमानित होते देख उसने झट से पास पड़े एक त्रिशूल को उठा लिया, उस आदम के पीछे भागी और आदम आगे आगे और वो पीछे पीछे । आगे चलकर रीमा ने एक तलवार नुमा हथियार भी उठा लिया । इस समय रीमा का रौद्र रूप देख कोई नहीं कह सकता था की ये रीमा बेचारी वासना की मारी एक अबला नारी है । उसका एक ही लक्ष्य था इस आदम का सर और लिंग दोनों उसके शरीर से अलग करना । बलात् संभोग के कारण उसका चेहरा और आँखें हो पहले से ही लाल थी और बाक़ी कमी ग़ुस्से ने पूरी कर दी ।

गुफ़ावो में शोर सुनकर बाक़ी आदम भी अपनी साधना से जग गये, इसी बीच वही आदम जिसने रीमा का बलात् गुदा भंजन कर दिया था उसने एक हड्डियों की बनी माला रीमा के गले में डाल दी, इधर उसने रीमा के गले में माला डाली और उधर रीमा से तेज़ी से अपना दाहिना हाथ चलाया और आदम का सर धड़ से अलग हो गया । वो आदम माला पहनाने के बाद रीमा पर नीली भस्म डालने लगा । एक तरफ़ आदम का गिरता सर, उसके धड़ से निकलती रक्त की कुछ बूँदे, और रीमा के एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में रक्त रंजित तलवार, उसके रक्त की बूँदे रीमा के स्तन और अग्र बाग पर भी गिरी लेकिन वो उस नीली भभूत से पूरी तरह नहा गई । उसने दूसरे वार से उसका लिंग भी अलग कर दिया ।

ये सब जहां हुआ वही इस आदमों की कुल देवी की उपासना होती थी और वही पर एक आदम का मस्तक धड़ से अलग हो गया ।

आदमों ने ये देखा तो तेजी से सभी शस्त्र लेकर देवी की मूर्ति की तरफ़ बढ़े । उनके चेहरे वैसे भी भयानक थे अभी तो वो और भी भयानक लग रहे थे । सभी आदम तेज़ी से रीमा की तरफ़ बढ़े, रीमा चढ़कर तेज़ी से देवी के आसन की तरफ़ बढ़ गई । देवी का ऐसा ऐसा अपमान, एक स्त्री पूरी तरह से नग्न होकर देवी स्थान पर चढ़ जाये । सारे आदमों को त्योरियाँ तन गई । एक ही शब्द गूजने लगा - मृत्यु , मृत्यु मृत्यु ।

रीमा को अलग अब अंत निकट है, तभी एक आदम से रीमा पर भाला फेंका तो रीमा ने भी अपना त्रिशूल को फेंक दिया और हाथ में पकड़े आदम के सर को देवी की मूर्ति के आगे बने अंग्निकुण्ड की तरफ़ फेकने वाली थी । तभी बूढ़ा आदम आ गया ।

वो ज़ोर से चीखा - ये क्या किया तुमने, देवी स्थल को अपवित्र कर दिया ।

रीमा ने आदम के लिंग की तरफ़ इशारा करके - उधर देखो ।

इसने मेरे साथ बलात् काम किया है, क्या दंड है इसका, मृत्यु नहीं तो और क्या, उसके हंसते हुए सर को लहरा कर रीमा बोली ।

बूढ़ा आदम - मृत्यु, इसे मृत्यु नहीं आएगी, हम सब मृत्यु की ही तो राह देख रहे है मूर्ख स्त्री । ये क्या किया तुमने ।

तभी बाक़ी आदम चिल्ला उठे - मृत्यु मृत्यु मृत्यु । इसी के साथ जैसे वे देवी मंच की तरफ़ बढ़ने को हुए, तभी रीमा ने पीछे देवी के हथों में लगा त्रिशूल खींच लिया, और फिर आकाश में तेज बिजली कड़की, एकदम से बहुत तेज आँधी आ गई । सभी आदमों की आँखें बंद होने को हो गई, और देवी मंच पर खड़ी रीमा के बाल हवा में लहराने लगे । जिस हाथ में तलवार और आदम का सर पकड़े थी, वो एक की जगह दो दिखने लगे, पीछे आदमों की कुल देवी की प्रतिमा के आगे खड़ी रीमा की छवि ऐसी बनी की सभी चकरा गये । ऐसा लगा सच में देवी अपने रौद्र रूप में प्रकट हो गयी हो | लहराती जटाए, हाथ में कटा मुंड, हाथो में शस्त्र, रक्तिम आँखें और क्रोध से भरा चेहरा ।

बहु बहु भुजाये , शश्त्रो से लैस, अग्नि उगलते रंक्त रंजित नेत्र, रक्त को प्यासी जिव्हा, क्रोध से तमतमाता चेहरा उसे लगा जैसे सीधे कुल देवी ही अपने असली रौद्र रूप में प्रकट हो गयी हो | सबको देवी की मूर्ति के आगे नंग्न खाड़ी रीमा ऐसी ही दिखाई दे रही थी |

सभी घुटनों के बल बैठ गए, सभी ने हाथ जोड़ लिए, सभी के सर झुक गये । रीमा का डर से कांपता, अपनी आत्मरक्षा के लिए हत्या को तंत्पर और डर और भय से पीली पड़ी उसकी गुलाबी चमड़ी घनघोर आश्चर्य में पड़ गयी | ये आदमखोर जो मेरे प्राण लेने तो तत्पर थे अब उसके सामने हाथ क्यों जोड़ रहे है |

बूढ़ा आदम - ही जगत जननी, मुक्ति देवी, मुक्ति ..... आप ही निर्माता हो हो आप ही विनाशक हो, आप ही सृजन कर्ता हो आप ही मुक्तिदाता हो | मुक्ति दो हमें देवी मुक्ति दो | आप ही हमें इस श्राप से मुक्त कर सकती हो | हमारे पापों को अब माफ़ कर दो | हमें इन अनंत काल की कष्टों से मुक्त कर दो | हम अपनी दिव्य शक्तियों से, अपने दिव्य रज के पान से हमें हमारी इन्द्रियां वापस कर दो, हमे जीवन मृत्यु के चक्र में लौटा दो, ताकि हम मुक्त हो सके | हमें मृत्यु दे दो माई, हमें मृत्यु दे दो देवी |
 
उन सब आदमों के लिए लिए वो उनकी कुल देवी थी जो अस्त्रों शस्त्र से लैस अपने प्राकृतिक रूप में सभी पापियों को मुक्ति देने निकल पड़ी है जिनके क्रोध की ज्वाला में सभी चर अचराचर जीव भस्म हो कर मुक्ति पा जाएँगें | वो ऐसी भयानक अग्नि की ज्वाला प्रज्वल्लित करेगी की जिसमे सब नष्ट हो जायेगा | ये फल फूल पौधे नदी नाले, ये सारी प्रक्रति सब भस्म होकर राख हो जायेगा ऐसी असीमित उर्जा और शक्ति का साकार स्वरुप थी देवी, जो उन्हें नजर आ रही थी | नर मुंडो से खेलने वाली, रक्त का जलपान करने वाली, हड्डियों का आभूषण पहनने वाली, देवताओं मनुष्यों किन्नरों गन्धर्वो रीछो और असुरों का संहार करके प्रलय लाने वाली, जिनके क्रोध की ज्वाला से कला चक्र भी विचलित हो जाता है उनके सामने मनुष्य क्या देवता भी अपना सर नवाते है | ऐसी महा शक्ति को नमन कर उनसे मुक्ति की कामना करना तो सौभाग्यशाली के जीवन में होता है |

रीमा जितना डरी हुई थी उतनी ही हैरान थी बाकि आदम उसके चरणों में पड़े मुक्ति मुक्ति चिल्ला रहे थे | उसे समझ न आया क्या करे, वो वहां से भाग निकलने को हुई लेकिन उसका दिमाग चकरा गया शायद वहां तेज हवा के कारण हवन कुंड से उठते धुए के करना हुआ होगा । जैसे ही वो धुएँ को पार कर आगे मूर्ति के पास आयी रीमा को यक़ीन यकीन नहीं हुआ उसके सामने एक देवी प्रकट हुई | रीमा हैरान विस्मित फैली आँखों से देख रही | उसने एक बारगी आंखे बंद की फिर खोली | सामने सच में आदि शक्ति देवी स्वयं प्रकट थी | पता नहीं ये कौन से नशे का असर था या सच था या सपना था लेकिन जो कुछ भी था वो रीमा को सामने साफ़ साफ़ दिख रहा था । रीमा का मन बार बार ये मानने का यक़ीन नहीं करता था फिर जो आँखो के सामने है, प्रत्यक्ष है उसे कैसे झुठला दे । उसने मनोविज्ञान पढ़ा था और उसे ये भी मालूम था की व्यक्ति जिस बारे में ज़्यादा सोचता है अकसर वो उसके सामने प्रकट हो जाता है या मन उसी छवि को अंदर से गढ़कर इतना मज़बूत बना देता है की कल्पना भी यथार्थ लगने लगती है । रीमा से पिछले कई दिनों से जिस तरह की घटनायें हुई उसके बाद रीमा के कुछ भी असंभव नहीं था । फिर भी ये सच नहीं हो सकता, मेरे मन की कोई कोरी कल्पना है जो मेरे मन में उठे प्रश्नों का उत्तर दे रही है ।

प्रकट हुए देवी बोली - मुक्ति दे दो इन्हें, बहुत कष्ट सहे इन सब ने | अब इनकी मुक्ति का समय है |

रीमाकी घिघ्घी बंध गयी - मै मै .............. |

कुछ चीजे हमारी कल्पना से परे होती है, अप्रकट होती है, अद्रश्य होती है लेकिन होती है | इस संसार में बहुत सी अद्रश्य उर्जाये है बस कुछ ही उन्हें महसूस कर पाते है और कुछ ही उन्हें संभाल पाते है | वो ये उर्जाये ही है जो मनुष्य से असंभव काम करवा लेती है | तुमारा मानव शःरीर सीमित उर्जा का स्थान है लेकिन तुम इस असीमित उर्जा का आवाहन कर इस कार्य को पूर्ण करो | काल तुम्हे इसे सहन करने की शक्ति देगा |

रीमा उस शक्ति, या महा शक्ति के लावण्य आत्मीयता और सौंदर्य में खोयी मंत्र मुग्ध सी - काल ....... |

देवी - काल मतलब समय, इस मृत्यु लोक में सब काल ही तो नियंत्रित करता है | इतना कहकर उन्हें आंखे बंद कर ली और एक उर्जा का अहवान किया | पल भर में वहां आग की भयानक लपते उठने लगी | आग की तपिश असहनीय होती जा रही थी | लेकिन रीमा ने तो जैसे किलो भर चरस फूंक रखी हो | सभी आदम आग की तपिश से पीछे हटने लगे लेकिन रीमा तस से मस न हुई | उसका शरीर उस अग्नि के ताप से झुलसने लगा था फिर भी वो देवी के सौब्दर्य और आकर्षण में बंधी एक तक उन्हें निहारती रही | अग्नि ने का बवंडर रीमा के चारो तरफ मंडराने लगा, आदि शक्ति ने एक मंत्र पढ़ा और फिर सारी अग्नि उनके हाथ में पकडे चन्द्राकार भाले में समां गयी |

आदि शक्ति ने वो भाला रीमा के सर पर दे मारा | रीमा चीखी और एक भयानक विस्फोट हुआ | भाले से असीमित अग्नि उर्जा निकल कर रीमा के जिस्म में समाती चली गयी | रीमा वही पर लुढ़क गयी | उसके मूर्क्षित होते मनो मस्तिष्क में सिर्फ यही स्वर सुनाई पड़ा - इन्हें मुक्ति दे दो, सिर्फ तुम्ही दे सकती हो | तुमारा कल्याण हो हर मनोकामना पूरी हो | आदि शक्ति ब्रम्हांड के जिस जगह से आई थी वही को फिर रवाना हो गयी | जब रीमा मूर्क्षित हुई थी तो उसे लगा था उसके प्राण पखेरू उड़ जायेगे |

लेकिन कुछ ही पलो में सब फिर से वैसा हो गया | वो आदम डरते डरते रीमा के पास आये | रीमा की जैसे चेतना लौटी | खुद तो निवस्त्र देख उसने अपनी जांघे समेत ली और अपने हाथो से अपने स्तन ढक लिए | सारे आदम नंगे थे | बुढा आदम आगे बढ़कर जमीन पर दंडवत लेटकर रीमा को प्रणाम करता हुआ - हमें मुक्ति दे दो देवी | हमारे जीवन का कष्ट हर लो | मै उस मुर्ख के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | उसने जो भी किया अज्ञानता वस् किया | उसका आशय आपने शरीर का भोग करना कदापि नहीं था | वासना से वो ग्रसित हो गया था लेकिन उसे तो बस हम सबकी तरह मुक्ति चाहिए |

रीमा कुछ देर तक सबको घूरती रही, अब न उसके अंदर डर था न ही मरने का भय | सब दूर हो चूका था | वो अब इनके भयानक चेहरों से भयभीत नहीं थी |

रीमा - कौन हो तुम लोग, क्या चाहिए तुमे |

बुढा आदम - मुक्ति चाहिए देवी |

रीमा - मेरा मांस नोचकर खाओगे | मेरी बलि चढ़ावोगे |

बुढा आदम - नहीं देवी, हम सब काम वासना के शापित है, हमें वही मुक्ति दिला सकती है | हम किसी काल में अपने ही किसी देवी के काम वासना के कारण कोप का भाजन बने

रीमा - मतलब तुम सब, उनके गधे की साइज़ के लिंग की तरह इशारा करके, ये जानवर के साइज़ से मेरी दुर्गति करके मुक्ति मिलेगी | अभी जो इसने किया वही तुम सब करना चाहते हो |

बुढा आदम - नहीं देवी, आप गलत समझ रही है | ये हम सबमे सबसे छोटा है, जब हम शापित हुए थे तो ये केवल तेरह वर्ष का था | इसे तो स्त्री देह, उसकी गर्मी, वासना, योनि, सम्भोग, स्खलन कुछ नहीं पता | ये तो अबोध बालक जैसा था | इसने पिछली बार ४० साल पहले एक आदम को इसी तरह एक स्त्री के साथ करते देखा था तो मुक्ति की चाह में आपके भी .......... (एक लम्बी चुप्पी) मै उसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ | लेकिन इसी बहाने हमें ये तो पता चला की आप के स्पर्श से हम स्खलित हो सकते है | हम जीवन मृत्यु के उस चक्र में वापस लौट सकते है, जहां भूख है प्यास है, कामना है और मृत्यु भी। जीवन है तो संभोग है और फिर उस संभोग ने नवजीवन, यही जीवन प्रक्रिया है। आप हमने वो हाँड़ मांस का शरीर लौटा सकती हो, जिसका एक निश्चित समय है, उन निश्चित अवधि में इन मुर्दा लिंगो में फिर से रक्त संचार हो सकता है | इनमे फिर से तनाव आ सकता है | ये फिर से स्त्री का मर्दन कर सकते है मेरा आशय योनि मर्दन से था और मर्दन से स्खलन होगा और मुक्ति ।

रीमा - मै कुछ समझी नहीं तुम सब नपुंसक हो |

बुढा आदम - नहीं हम नपुंसक नहीं है लेकिन हमारा पुरुषत्व हमारी पुरुषत्व होने की सवेदना छीन ली गयी, हमारे लिंग सवेद्नाहीन कर दिए गए, रक्त संचार नहीं होता इनमे और न ही हम स्खलित होते है | जो उस बच्चे ने किया वो असली स्खलन है, जहां नवजीवन देने वाली कोशिकाएँ बनती है और बाहर निकलती है। 800 सालो से हम अपने तेज को संभाले ब्रम्चार्य का पालन करते हुए अपनी मुक्ति की राह देख रहे है |

रीमा - तुम 800 साल से जिन्दा हो |

बुढा आदम - इसमें आश्चर्य कैसा |

रीमा - इतने दिन कोई आदमी जिन्दा नहीं रह सकता |

बुढा आदम - आप जिस दुनिया से हो उसके लिए संभव है लेकिन हम इन जर्जर शरीरो में जीवित है यही सच है |

रीमा - कैसे |

बूढ़ा आदम - जब आप काल के चक्र में अपने परमाणुओं की गति को जितना धीमा कर देते हो, आपके शरीर की परिवर्तन की गति भी उतनी ही धीमी हो जाती है । इसलिए हम इतने सालो से जीवित है ।

बुढा आदम - हमें मृत्यु दे दो, मुक्ति मिल जाएगी |

रीमा - मै कैसे दे सकती हूँ |

बुढा आदम - आप के अलावा और कोई नहीं दे सकता | काल ने आपको ही नियुक्त किया है | आप ही हमे हमारे परमाणुओं की वो गति लौटा सकती हो ।

रीमा - मेरी कुछ समझ नहीं आ रहा है, मै कैसे तुम्हे मार सकती हूँ | मैंने आज तक किसी की हत्या नहीं की (मन ही मन में गिरधारी को छोड़कर )|

बुढा आदम - आपको मारना नहीं है बस हमें मुक्ति के लिए जो चाहिए वो दे दीजिये |

रीमा - क्या चाहिए ?

बुढा आदम - योनि |

रीमा आश्चर्य से - क्या ? क्यों ?

बुढा - आपकी योनि ?

रीमा - तुम पागल हो गए हो, तुम क्या कहना चाहते हो, मेरी चूत से तुम्हे कैसे मुक्ति मिल जाएगी | आपकी बात चलो मान लेती हूँ लेकिन चुदाई से सम्भोग से मुक्ति मिल जाएगी कैसे , एक औरत की चूत चोदकर आपको मोक्ष मिल जायेगा बात कुछ गले के नीचे उतरी नहीं ?

बुढा आदम - बहुत फर्क है देवी, भावना का फर्क है, लक्ष्य का फर्क है | क्या संतानोपत्ति के लिए किये गए सम्भोग और सामान्य वासना तृप्ति के सम्भोग में कोई अंतर नहीं | क्या गर्भ धारण करते समय दंपत्ति उत्तम संतान के समस्त ब्रम्हांड की सकारात्मक शक्तियों का, अपने पूज्य देवी देवताओं का अहवान नहीं करते | बहुत फर्क है देवी | भावना का फर्क है, कर्म का फर्क है और मिलने वाले कर्म फल का अंतर है |

बूढ़े के जवाब ने रीमा को निरुत्तर कर दिया |
 
रीमा - तुम पागल हो गए हो, तुम क्या कहना चाहते हो, मेरी चूत से तुम्हे कैसे मुक्ति मिल जाएगी | आपकी बात चलो मान लेती हूँ लेकिन चुदाई से सम्भोग से मुक्ति मिल जाएगी कैसे , एक औरत की चूत चोदकर आपको मोक्ष मिल जायेगा बात कुछ गले के नीचे उतरी नहीं ?

बुढा आदम - बहुत फर्क है देवी, भावना का फर्क है, लक्ष्य का फर्क है | क्या संतानोपत्ति के लिए किये गए सम्भोग और सामान्य वासना तृप्ति के सम्भोग में कोई अंतर नहीं | क्या गर्भ धारण करते समय दंपत्ति उत्तम संतान के समस्त ब्रम्हांड की सकारात्मक शक्तियों का, अपने पूज्य देवी देवताओं का अहवान नहीं करते | बहुत फर्क है देवी | भावना का फर्क है, कर्म का फर्क है और मिलने वाले कर्म फल का अंतर है |

बूढ़े के जवाब ने रीमा को निरुत्तर कर दिया |

रीमा - अभी भी मुझे भरोसा नहीं |

बुढा आदम - मेरी आखो में देखो, ये झुरियो से भरा चेहरा ये कंकाल शरीर, क्या लगता है क्या तुमारे कमनीय यौवन के रसपान का भूखा है | हम श्रापित है, हमें कोई कामना, कोई वासना की अभिलाषा नहीं है | हम करे भी तो उसे भोगने की इन्द्रियां शुन्य हो चुकी है | ये सब अपना विवेक चेतना विचार शक्ति रस गंध का भेद करने का ज्ञान, सब गँवा चुके है, ये पुरे वन आदम है आदि मानव की तरह | बस हममे से कुछ है जिन्होंने अपने आत्मबल और आत्मा की शुद्धता के कारन न केवल अपना अतीत याद रखा बल्कि सदियों से मुक्ति के लिए प्रयासरत रहे |

बुढा - देवी मानव जीवन की शुरुआत गर्भ से होती है और शिशु बालक योनि से इस दुनिया में आता है और मुक्ति भी योनि से ही मिलती है | बिना सम्भोग के किसे सहज मृत्यु आती है | आजीवन ब्रम्हचारी अपनी सजह मृत्यु कब मरते है, उन्हें मुक्ति किसी अन्य उपाय से ही मिलती है |

रीमा को बूढ़े की बात पर हँसी आ गयी थी - चुदाई से मुक्ति ।

बूढ़ा आदम - आप हंस सकती है क्योंकि आपको ये बात बहुत सतही लगेगी लेकिन सच यही है । हमे अपने शरीर के परमाणुओं की गति वापस पाने के लिए असल में आपके गर्भ में जाना चाहिए, लेकिन जन्म लिए मनुष्य का वापस गर्भ में जाना असंभव है इसलिए हम बस गर्भ मुख तक जायगें और वही से आप हमारे शरीर के परमाणु की गति को उलटा दिशा में पलट दोगी । आपने उस आदम का लिंग देखा है, जिसको रीमा ने काट डाला था, रीमा ने ज़मीन पर पड़े उस आदम के लिंग की तरफ नजर उठाई जो उसकी गाड़ को चीर कर अन्दर घुस गया था, उसके लिंग का साइज़ बिलकुल सामन्य था, सुघड़ चिकना और पूरी तरह से तना हुआ | वो शरीर से अलग होने के बाद भी न सिकुड़ा, न नरम हुआ, और बूढ़े आदम ने जाकर उसे फिर से उस आदम के शरीर में लगा दिया । रीमा हैरान रह गई, ये कैसे संभव है, जैसे ही बूढ़े आदम ने उस लिंग को सर कटे आदम को लगाया, उसने अपने हाथों से उसने कस कर जड़ से पकड़ कर मसलने लगा |

रीमा - ये कैसे संभव है, कैसे ।

बूढ़ा आदम - इसके परमाणुओं की स्थित अभी भी स्थिर है और वही है जो कटने के पहले थी, अगर ये भिन्न भिन्न अवस्था में पहुँच जाये तो लिंग का पुनः शरीर में अवस्थित होना असमभव था । ये बालक अभी भी उसी अवस्था में है जिस अवस्था में इसका सर विच्छेदन किया गया था इसलिए इसका चेहरा अभी भी प्रसन्नचित है ।

रीमा - फिर भी इसके लिंग में तनाव आने का कारण मुझे समझ नहीं आया, मेरे जिस्म में ऐसा क्या है ?

बूढ़ा आदम - तुमारे शरीर से उत्सर्जित होने वाली सूक्ष्म उर्जा की तरंगो (जो प्रकट रूप में परमाणु के अवयव है, अन्यथा ऊर्जा है ) ने वर्षो से सुसुप्त पड़े सवेदना धागों को सक्रीय कर दिया | इसलिए जब ये तुमारे शरीर के सपर्श में आकर इसने घर्षण किया तो इसके लिंग के सुसुप्त पड़े संवेदना तंतु के परमाणु उस सूक्ष्म ऊर्जा तरंगों से अपनी गति बदल कर सक्रीय हो उठे और लिंग में रक्त संचार बढ़ गया | ऐसा नहीं था की पहले रक्त संचार नहीं होता था लेकिन वो बस उतना था जितना उसे शरीर का हिस्सा बनाये रखने के लिए जरुरी था | रक्त भरने से लिंग में कठोरता आ गयी और आपस में संघर्ष करते दो शरीरो में ये समय भी आया जब सूखी लकड़ी जैसा खुदुरा, पूरी तरह से कठोर लिंग गुदा द्वार से जा टकराया और इसे तुमारा दुर्भाग्य कहूँगा और हम सबका सौभग्य की उस समय इतना भीषण दबाव् तुमारे गुदा द्वार पर पड़ा की लिंग गुदाद्वार को चीरता हुआ अन्दर घुस गया | तुमारी गुदा सुरंग रक्त रंजित हो गयी |

तुम भीषण दर्द से चीखी और उस चीख से तुमारे शरीर की सारी उर्जा तुमारी गुदा छिद्र में आकर एकत्रित हो गयी | घायल गुदा अपनी पूरी शक्ति से संकुचन करने लगी, इतना सख्त संकुचन और असीम उर्जा के इकट्ठे होने से ये लिंग इसे सहन नहीं कर पाया और स्खलन शुरू हो गया | तुमारे शरीर का गुदा रस, रक्त और आदम का वीर्य तीनो का समागम ही इसके लिंग को मानव स्वरूर में ले आया, कुछ तो तुमारे शरीर के परमाणुओं में जो वो संपर्क में आने की गति बदल देते है । ये शरीर इन्ही भौतिकी का नियमों का पालन करता है ।

रीमा - इसके परमाणु सक्रिय हुए हो या नहीं लेकिन मेरी तो दुर्गति हो गई, कितना भीषण दर्द हुआ ।

बूढ़ा आदम - स्त्री के लिए संभोग कई बार कष्ट कर होता है और स्त्री के पास इसे सहने की शक्ति भी होती है , इसलिए स्त्री विशेष है ।

रीमा - कुल अर्थ ये है बिना लिंग के योनि या गुदा में जाये ये समागम पूर्ण नहीं होगा और मुक्ति नहीं मिलेगी ।

बूढ़ा आदम - यही एक मुक्ति मार्ग है ।

रीमा - आप कुछ भी कहे लेकिन हमारी दुनिया में इसे चुदाई ही कहते है, एक ने किया तो ये हाल है ।

बूढ़ा आदम - क्या संभोग से गर्भ नहीं ठहरता।

रीमा - हाँ संतान भी होती है ।

बूढ़ा आदम - तो संभोग का उद्देश्य क्या है, आनंद, नहीं वो तो उस प्रक्रिया का एक कारक है, परिणाम तो नव जीवन की रचना ही है । अब सोचिए जो गर्भ नये परमाणु बनाकर नया जीवन दे सकता है वो दुनिया में मौजूद परमाणु की दिशा और गति बदल सकता है ।

रीमा - इसका मतलब तुम मेरी योनि में लिंग डालोगे और मुक्ति पा जावोगे, तुम्हें मुझे चोदने की ज़रूरत नहीं है ।
 
बूढ़ा आदम - नहीं देवी, मेरे शरीर के परमाणु तब तक उस अवस्था में नहीं लौटेगे जब तब उनका आपने शरीर के परमाणुवों से मिलन नहीं होता, इसलिए आपका रक्त, रज और मेरे वीर्य का मिलन होना आवश्यक है , फिर हम दोनों अपनी स्वास साधन क्रिया से उस त्रिशक्ति रस को पुनः लिंग के माध्यम से अपने शरीर में स्थापित कर देगें और वो ऊर्जा हमारे मूलाधार चक्र से होती हुई रक्त संचार के माध्यम से वो हमारे पूरे शरीर में फैल जाएगा और हम अपनी मृत्यु अवस्था में वापस आ जाएँगें, फिर आपको हमारे ऊर्जित रक्त की भेंट उस पत्थर मूर्ति की योनि पर चढ़ानी होगी, जिसकी वजह से हमको ये गति प्राप्त हुई है ।

रीमा - मेरे लिए ये सब नया है लेकिन तुम अपने लिंग से कैसे कोई चीज शरीर में वापस प्रवेश करा दोगे ।

बूढ़ा आदम - साँसो के अभ्यास से सब संभव है, उस संभोग के चरम पर हमारे शरीर का ताप इतना होगा की कोई भी तरल पदार्थ नष्ट हो जाएगा, इसलिए हमारे शरीर से वीर्य नहीं, बल्कि उसकी ऊर्जा ही बाहर निकलेगी और आपकी योनि से होते हुए गर्भ तक जाएगी और आप अपनी महाशक्ति से उस ऊर्जा को न केवल हमारे शरीर में प्रस्थापित कर देगी बल्कि एक साथ ही सातो चक्रो को सक्रिय कर देगी और हम समाधि अवस्था में चले जायेगें ।फिर आपको हमारे निष्प्राण शरीर को चीर कर जो भी रक्त आपको मिले, उसमे अपने रक्त की एक बूँद मिलकर उसे मूर्ति के योनि द्वार में डालना होगा और हमे पाप मुक्त कर इस लोक से हमेशा के लिए विदा कर दे । हो सकता है हमारे रक्त की बलि इस पाषाण बन ऋषि का श्राप झेल रही ऋषि पत्नी को भी श्राप से मुक्त कर दे ।

रीमा - ये पत्थर मूर्ति के बारे तुमने कुछ बताया ही नहीं ?

बूढ़ा आदम - इनके बारे में तो बताना ही भूल गया, इन्ही देवी के कारण हम ऋषि के कोप का भाजन बने और इतने सालो से यहाँ मुक्ति को तड़प रहे है । ये भी अपने जड़वत रूप में खुले आकाश ने नीचे सर्दी गर्मी बारिश सब कुछ भोग रही है, चलिए आपको वही पाषाण स्थल पर ही ले चलता हूँ ।

रीमा को बूढ़े आदम की बारे समझ आई तो उसके जीवन के सहज ज्ञान की कायल हो गयी | सच ही तो कह रहा था बुढा | आज के समय में भले ही चुदाई को लोग बुरा बना दिया गया हो लेकिन पुराने समय में ये सहज था | स्त्री पुरुष का संसर्ग करना एक सहज और प्राकृतिक क्रिया है |

पाषाण स्थल की तरफ़ जाते हुए - आप सब कुल कितने है यहाँ ।

बूढ़ा आदम - कुल हम ४०० थे लेकिन काल चक्र में सब टिक न सके, ३५० से ज़्यादा के शरीर नष्ट हो गये है, उनका मानव शरीर ही नहीं बचा और उन्हें मुक्ति भी नहीं मिली । कुल १० लोग ऐसे है जिनके शरीर स्थूल हो गये (पूर्णतः मिट्टी बन गये है), उनका मानव शरीर में लौटना संभव नहीं है । पता नहीं ऐसे लोगो को कैसे मुक्ति मिलेगी, मिलेगी या यू ही अनंत काल तक यहाँ भटकते रहेगें ।

रीमा - तुम ४० लोग हो जिन्हें मुक्ति चाहिए ।

बूढ़ा आदम - नहीं हम ३६ है और एक वो पाषाण प्रतिमा । ४ लोगों ने अग्नि स्नान कर लिया था, उसी काल में इससे उनके शरीर ऐसे हालत में पहुँच गये की उनका वापस लौटना अब संभव नहीं है ।

रीमा - क्या उन लोगो की आत्मायें भी संभोग करेगी ।

बूढ़ा आदम - नहीं आत्मा की अवस्था, अलग होती है, वो सिर्फ़ एक ऊर्जा है जिसे एक आयाम से दूसरे आयाम में जाना है, मुझे इसका ज्ञान नहीं वो क्या करेगी । मैं तो यथार्थ के लिए पुरुषार्थ कर रहा हूँ । हो सकता है पाषाण प्रतिमा के साथ उनको मुक्ति मिले ।

रीमा - आप बहुत गंभीर बात कर रहे है, आप मुझे जो मांग रहे है उसका मतलब जो मुझे समझ में आया की आप चुदाई मेरा मतलब सम्भोग से मुक्ति पा जायेगे ................. मेरा सवाल है कैसे ? मै भयभीत हूँ, आप सभी ३६ पुरुष मेरे साथ चुदाई मेरा मतलब सम्भोग करेगे और वो भी इस तरह के लिंग के साथ | मेरे प्राण एक दो लिंग सम्भालने में ही निकल जाएँगें ।

एक लम्बी ख़ामोशी छा गयी रीमा ने काफी देर बाद उस ख़ामोशी को तोडा - यानि तुम सब मिलकर मुझे चोदोगे | हर चुदाई के बाद तुम लोगो की मुक्ति के लिए मुझे अपना रक्त बहाना पड़ेगा |

बुढा आदम - नहीं देवी वो तो बस रक्त का एक परमाणु ही पर्याप्त है | आपनी गुदा भंजन में हुए घात के लिए मै उस बालक की तरफ से क्षमा प्रार्थी हूँ | आप के परमाणु अभी दिव्या शक्तियों से ओत प्रोत है ।

रीमा - फिर भी चालीस पुरुष एक स्त्री को चोदेगे, सिर्फ़ अपनी मुक्ति के लिए |

बुढा आदम - देवी आप इसे गलत दिशा से विचार कर रही है | यहाँ वासना जैसा कुछ नहीं है हमें आपके योवन का भोग नहीं करना है | हमें आपके अधरों का रस नहीं पीना है, हमें आपके स्तनों का दग्ध पान नहीं करना है | हमें आपकी योनि का मर्दन करके कामवासना का चरम सुख नहीं प्राप्त करना है |

रीमा आवेश में बोली - लेकिन उससे क्या बदल जायेगा, जायेगा तो लिंग ही मेरी चूत में, मेरा मतलब योनि में, चुदुंगी तो मै ही न | कोई फर्क है |

बुढा आदम - ऐसा नहीं है शरीर में ऊर्जा का प्रहाव होता रहता है । जिन शरीर के अंगो की बात आप कर रही है, युवा शरीर में उन अंगो की तरफ़ को ऊर्जा का प्रहाव होता है, और इसीलिए स्त्री पुरुष संसर्ग को व्याकुल रहते है । मस्तिष्क से ये पूरी ऊर्जा का नियंत्रण होता है । सामान्य मनुष्य के मस्तिष्क के नियंत्रण में ये ऊर्जा प्रवाह नहीं होता है इसलिए जब शरीर की ऊर्जा का प्रहाव योनि या लिंग की तरफ़ होता है तो वे मनुष्य काम पीड़ित हो जाते है ।

ये एक युवा सामान्य मानव शरीर के काम ऊर्जा का प्रहाव है । इस ऊर्जा के फल स्वरूप ही पुरुष में वीर्य का और स्त्रियों में रज रस का निर्माण होता है और इंसके मिलन से नया जीवन का निर्माण होता है, जो संभोग के बाद स्त्री के गर्भ में स्थापित हो जाता है। लेकिन हमारे ऋषियों मुनियो ने वर्षों की साधना तपस्या से जीवन के इन ऊर्जा प्रवाहों का पता लगाया और इन्हें संरक्षित करने का, नियंत्रित करने का मार्ग सुझाया ।

रीमा - मैं आपका आशय समझ नहीं पा रही हूँ ।

बूढ़ा आदम - पुरुष और स्त्री दोनों के शरीर में काम ऊर्जा का प्रवाह मस्तिष्क से निकल कर मेरु दंड से होता हुआ स्वाधिष्ठान चक्र तक जाता है और वहाँ से मनुष्य के जननांगों में । मनुष्य के शरीर में कुल सात चक्र होते है जिनका नाम- मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपुर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्ध चक्र, आज्ञा चक्र, सहस्त्रार चक्र है। यह सभी चक्र हमारे विचारों, भावनाओं, स्मृतियों, अनुभवों और कर्मों के कारक हैं।

एक व्यक्ति हठ योग के माध्यम से इन चक्रों को पूर्णतः जागृत कर सकता है। सबसे नीचे का चक्र है मूलाधार चक्र । मूलाधार चक्र सब चक्रो का आधार है, मूलाधार चक्र हमारे प्रजनन तंत्र को ऊर्जा देता है इसीलए मूलाधार चक्र में सातों चक्र से कई अधिक ऊर्जा है । अगला चक्र स्वाधिष्ठान चक्र रीढ़ की हड्डी पर मौजूद होता है और यह सामान्य बुद्धि का आभाव, अविश्वास, सर्वनाश, क्रूरता और अवहेलना जैसी निम्न भावनाओं को नियंत्रित करता है। इस चक्र से काम भावना और उन्नत भाव जन्म लेता है। ये दो चक्र संभोग अवस्था में सक्रिय रूप से भाग लेते है ।

सामान्यतः इन चक्र में अंतर्निहित ऊर्जा को जगाने के लिए योगी तपस्या करते है और इस विधि को कुण्डीलनी जागरण कहते है, योग और तप के ज़रिये मूलाधार चक्र से लेकर सहस्त्रार चक्र जब सभी चक्र जाग्रत हो जाते है तो ऐसे व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त हो जाती है । इसी सिद्धि को प्राप्त करने के लिए योगी कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते है और वीर्य का संरक्षण करते हुए उर्ध्वरेता बनने की कोशिश करते है । वीर्य के संरक्षण से बल बुद्धि और आरोग्यता आती है । इसी तरह स्त्री भी अपनी कुंडलिनी जागरण कर सकती है ।

रीमा - परंतु यौवन ढलने तक स्त्री तो नियमित रजस्वला रहती है, फिर वो कैसे ब्रह्मचर्य का पालन करेगी ।

बूढ़ा आदम मुस्कुराया - मुझे तुमारी जिज्ञासा से आश्चर्य नहीं हुआ ध्यान से सुनो

बूढ़ा आदम - महिलाएं रजस्वला होते हुए कोई भी पूरुष के साथ शारीरिक संबंध न बांध कर ब्रह्मचर्य का पालन कर सकती है। ब्रह्मचर्य एक अभ्यास से जुड़ा हुआ है । एक निश्चित अवधि के लिए या अपने शेष जीवन के लिए यौन गतिविधि से दूर रहने की औपचारिक प्रतिबद्धता को ही ब्रह्मचर्य कहते है ।गृहस्थ बनने से पहले तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए ऐसा ज्ञान हमारे पूर्वज हमे देकर गए ।

रीमा - जब ब्रह्मचर्य इतना तेजस्वी बना सकता है तो आपको मुक्ति भी दिला सकता है ।
 
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