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Adultery हादसा

लोकेश ने सुरभि के नितंब पर थप्पड़ मारा और कहा, "तुम्हारे पति का छोटा है ... हैं ना?"

सुरभि जानती थी कि लोकेश विजय को अपमानित करने की कोशिश कर रहा है, इसलिए वो चुप रही.

"भाभी अगर तुम मेरे शेरू को अपनी गां...ड में लेना चाहती हो तो जवाब दो मुझे,” लोकेश ने कहा और फिर से उसके नितंब पर एक जोरदार थप्पड़ मार दिया.

“हाँ... विजय का छोटा है..."

"कितना छोटा?"

"बहुत छोटा..."

"पर चिंता की कोई बात नहीं है भाभी... मैं हूँ ना. जब भी तुम्हें बड़े औजार की जरुरत महसूस हो मुझे फोन करना... मैं आ जाऊँगा तुम्हारी अधूरी इच्छा पूरी करने...” लोकेश ने अपने मोटे हथियार को उसके नितंब की दरार में रगड़ते हुए कहा.

"ठीक है..." सुरभि ने विजय की आँखों में देखते हुए कहा. वो अपमानित महसूस नहीं कर रहा था. वास्तव में, लोकेश जिस तरह से सुरभि के साथ व्यवहार कर रहा था, वो उसका आनंद ले रहा था. वह किस तरह का आदमी था? अब सुरभि को पूरा यकीन हो गया था कि वो भी उसकी तरह डोमिनेट होना पसंद करता था.

लोकेश ने सुरभि के बाल पकड़ लिए और अपने हथियार का सिर उसकी गुदा पर रख दिया. "विजय, करीब आओ और अपना छोटा सा पेनिस इसके मुंह में डाल दो ..." लोकेश ने आदेश दिया.

"इसे ये पसंद नहीं है," विजय ने कहा.

"हाँ... मुझे ये पसंद नहीं है, ”सुरभि ने कहा.

“तुम दोनों को अपनी सेक्स लाइफ रंगीन बनानी है कि नहीं. जैसा कहा है वैसा करो...” लोकेश ने कहा और एक बार फिर से थप्पड़ जड़ दिया सुरभि ने नितंब पर.

“ठीक है मैं तैयार हूँ...”

“ये हुई ना बात भाभी...”

विजय सुरभि के सामने आया और अपना औजार उसके होठों पर रख दिया.

सुरभि को याद आया कि विजय ने कितनी लगन से उसकी गुदा को चाटा था कितनी लगन से जीभ को अंदर धेकेला था. उसे भी तो उसके लिए कुछ करना चाहिए... आखिर वो उसका पति था. सुरभि ने ये सब सोचते हुए अपना मुँह खोला और विजय के हथियार को अपने होंठों के बीच दबा लिया.

विजय तुरंत काम उत्तेजना से काँप उठा और सुरभि का चेहरा अपने हाथ में पकड़ कर बोला, “मैं हमेशा से अपना पेनिस तुम्हारे खूबसूरत मुँह में डालना चाहता था. आज जाकर मुझे यह मौका मिला है." विजय ने ये बोल कर अपना पेनिस उसके मुँह मेंअंदर बाहर करना शुरू कर दिया.

"मेरा धन्यवाद करो," लोकेश ने कहा. “मेरे कारण मिला है तुम्हें ये मौका.”

"धन्यवाद, लोकेश," विजय ने मुस्कुराते हुए कहा.

सुरभि के बाल पकड़कर, लोकेश ने बड़ी ताकत के साथ उसकी गुदा में अपने मोटे हथियार को धकेल दिया.

सुरभि कामुक आनंद में सिसक पड़ी. अब दो आदमियों द्वारा उसके दो छिद्रों का एक साथ उपयोग किया जा रहा था. विजय उसके मुंह का इस्तेमाल कर रहा था और लोकेश उसकी गुदा का इस्तेमाल कर रहा था.

सुरभि इस पल का भरपूर आनंद ले रही थी और सोच रही थी कि उसने पहले विजय का क्यों नहीं चूसा.

कमरा सेक्स की आवाजों से भर गया. दोनों आदमी उसके साथ बहुत जोश और गर्मी के साथ सेक्स कर रहे थे.

कुछ ही देर बाद सुरभि ने खुद को आनंद के शिखर की ओर बढ़ते हुए पाया और जब वो वहाँ पहुँची तो वो जोर से चीखना चाहती थी लेकिन चूँकि उसके पति का पेनिस उसके मुँह में था, इसलिए वो नहीं चीख पाई.

लोकेश सुरभि के नितंब लगातार ठोकता रहा. विजय भी उसके मुँह में अपना लिंग पेलता रहा.

अचानक लोकेश ने अपनी गति बढ़ाई और चिल्लाया, "चलो इसे और जोर से ठोकते हैं."

विजय ने लोकेश की बात का पालन किया और बड़ी तेजी से सुरभि के मुँह को ठोकने लगा.

"कैसा लग रहा है विजय?" लोकेश ने जोर से पूछा.

"मुझे बहुत मज़ा आ रहा है."

"क्या तुम झड़ने वाले हो..." लोकेश ने पूछा.

"हाँ..."

"चलो साथ झड़ते हैं..." लोकेश ने कहा और अपनी गति और बढ़ा दी. विजय ने भी ऐसा ही किया.

एक मिनट के बाद, दोनों आदमी एक साथ झडे. लोकेश ने सुरभि की गुदा को अपने गर्म गर्म वीर्य से भर दिया और विजय ने अपने गर्म रस से उसके मुँह को भर दिया, जिसे उसने तुरंत निगल लिया.

इस समय सभी की सांसें जोर-जोर से चल रही थीं. इतनी तेज कि उनकी सांसों की आवाज कमरे में गूँज रही थी.

"अब तक का बेस्ट सेक्स था ये मेरे लिए ..." लोकेश ने कहा.

"मेरे लिए भी..." विजय बोला.

वे कुछ सेकंड के लिए एक दूसरे से चिपके रहे. फिर लोकेश ने खुद को दूर खींच लिया. उसका मोटा हथियार सुरभि की गुदा से एक कामुक आवाज के साथ फिसल कर बाहर निकला.

विजय ने भी ऐसा ही किया और अपने आप को दूर खींच लिया, उसके वीर्य की बूंदें उसके पेनिस के सिरे से लटकी हुई थीं.

"सेक्सी गां...ड," लोकेश ने कहा और सुरभि के नितंब पर थप्पड़ मार कर वाशरूम में चला गया.

लोकेश के जाने के बाद, सुरभि बेड से उतरी धीरे से. जैसे ही वो खड़ी हुई उसने महसूस किया कि लोकेश का वीर्य उसकी गुदा से रिस रहा है और उसकी जांघों के पिछले हिस्से से होते हुए नीचे जा रहा है.

विजय सुरभि से कुछ फीट की दूरी पर खड़ा होकर उसे गौर से देख रहा था.

"कैसा लगा?" विजय ने कहा.

"अच्छा," सुरभि ने शरमाते हुए कहा.

"मुझे भी. लोकेश ने हमें बिल्कुल अलग अनुभव दिया है... हैं ना?"

"हाँ..."

"मुझे ब्लो जॉब देने के लिए धन्यवाद."

"मुझे धन्यवाद मत दो...” सुरभि शरमाते हुए बोली.

तभी लोकेश वॉशरूम से बाहर आया और सीधा सुरभि के पास आकर खड़ा हो गया. उसकी कुंवारे नितंब को लूटने के बाद, उसका हथियार थोडा सिकुड़ गया था पर अभी भी वो विजय के खड़े पेनिस से बड़ा लग रहा था.

"नीचे बैठो भाभी," लोकेश ने कहा और अपने दोनों हाथों को उसके कंधों पर रख दिया.

सुरभि बिना संकोच के लोकेश के सामने बैठ गई.

"अब मेरे शेरू को चूसो..."

"क्या हमें कुछ मिनट का ब्रेक नहीं लेना चाहिए," सुरभि ने कहा.

"अभी नहीं..." लोकेश ने कहा.

"क्या यह साफ है?" सुरभि ने पूछा.

"मैंने इसे धो लिया है, भाभी. ये बिलकुल साफ है. अपना मुँह खोलो..."

सुरभि ने अपना मुँह खोला और लोकेश को मोटे हथियार को अपने होठों में ले लिया.

"गुड गर्ल.. अब इसे चूसो..." लोकेश ने उसके बाल पकड़ते हुए कहा.

सुरभि बेझिझक लोकेश का मोटा हथियार चूसने लगी और लयबद्ध ढंग से अपना मुँह आगे-पीछे करने लगी. कुछ ही सेकंड में लोकेश का पेनिस उसके मुँह में बढ़ने लगा. कुछ ही समय में उसने अपना पूर्ण रूप धारण कर लिया और सुरभि का मुँह भर लिया.

"यस... चूसो अपने पति के दोस्त के लं...ड को... अच्छे से चूसो," लोकेश ने उसके बाल खींचते हुए कहा.
 
सुरभि ने विजय की ओर एक नज़र डाली. वो उन्हें प्यासे व्यक्ति की तरह देख रहा था. ऐसा लग रहा था जैसे कि वो भी अपना पेनिस उसके मुँह में डालने को तरस रहा हो. जब सुरभि ने उसकी टांगो के बीच देखा तो उसका अंदाजा सही निकला. पूरा तना हुआ था विजय का.

लोकेश ने अपना मोटा हथियार सुरभि के मुँह से बाहर निकाला और बोला, "अब मेरे अंडों को चूसो..."

लोकेश के बड़े पेनिस को अपने हाथ में पकड़कर वो उसले अंडों को चाटने लगी.

"बहुत बढ़िया भाभी... बहुत बढ़िया... ऐसे ही चाटो मेरे अंडों को...” लोकेश ने सुरभि का मुँह अपने क्रॉच पर दबाते हुए कहा.

सुरभि लोकेश के अंडों को चाटती रही.... बीच-बीच में वो उन्हें चूसती भी रही. ये सब उसे एक अलग ही आनंद दे रहा था.

"बोलो लोगे अपनी बीवी की गां...ड?" लोकेश ने विजय से पूछा.

"अगर तुम्हारी इजाज़त होगी तो ... जरुर लूँगा" विजय ने तुरंत कहा.

सुरभि हैरान थी विजय के जवाब पर. विजय उसका पति था और फिर भी वो उसके साथ गुदा मैथुन करने के लिए लोकेश की अनुमति मांग रहा था. उसे बिना किसी अनुमति के ये काम करना चाहिए था. लेकिन वो जानती थी कि इसके पीछे एक बड़ी वजह थी. वे दोनों इस समय लोकेश की कठपुतली थे और स्वतंत्र नहीं थे कुछ भी करने के लिए. उन्हें वही करना था जो उसने आदेश दिया था. और कुछ नहीं. पर वो ये भी जानती थी कि उन दोनों को लोकेश का आदेश मानने में अजीब सा आनंद मिल रहा था और दोनों इस आनंद को खोना नहीं चाहते थे.

"आगे बढ़ो और इसे इत्मीनान से ठोको ..." लोकेश ने आदेश दिया.

विजय सुरभि के पीछे गया और बोला, "सुरभि ... पहले की तरह घोड़ी बन जाओ..."

सुरभि ने लोकेश के अंडों से मुँह हटा कर उसकी आँखों में देखा उसकी उसकी अनुमति लेने के लिए.

"जैसा विजय ने कहा है, वैसा ही करो," लोकेश ने आज्ञा दी.

सुरभि तुरंत घोड़ी बन गई फ़र्स पर लोकेश के सामने. घोड़ी बनते ही उसने लोकेश के मोटे हथियार को पकड़ा और उसे चाटने लगी.

विजय सुरभि के पीछे आया और उसके नितंबों को पकड़ कर एक झटके में अपना पूरा पेनिस उसकी गुदा में डाल दिया.

सुरभि मजे में सिसक पड़ी और जोश से लोकेश के पेनिस को चाटने लगी.

"अब इसे मुँह में लो भाभी..." लोकेश ने कहा और अपना पूरा हथियार उसके मुँह में ठूंस दिया.

एक बार फिर सुरभि के दो छिद्रों में एक साथ दो पेनिस थे, एक मुँह में और एक नितंब में.

क्योंकि लोकेश ने बहुत अच्छे से खोल दिया था सुरभि की गुदा को, विजय का पेनिस बिना किसी प्रतिरोध के आराम से अंदर बाहर हो रहा था.

दोनों आदमी पुरे जोश से सुरभि के साथ मस्ती करते रहे. विजय का लिंग छोटा था पर फिर भी सुरभि को खूब मजा आ रहा था. उसने कब चरम को छू लिया उसे पता ही नहीं चला. उसे चरम पर पहुंचा कर भी वो दोनों नहीं रुके और लगातार उसके साथ मस्ती करते रहे.

अचानक लोकेश ने अपना लिंग बाहर खींच लिया और बोला, "तुम इसी पोजीशन में रहना. हिलना मत... मैं तुम्हारे नीचे आ रहा हूँ..."

सुरभि समझ गई कि वो क्या करने वाला था. हे भगवान क्या अब वो दो आदमियों के साथ एक साथ संभोग करेगी... आगे से भी और पीछे से भी? अपने विचारों के कारण सुरभि उत्तेजना में काँप उठी.

लोकेश फ़र्स पर फिसलते हुए सुरभि के नीचे आ गया. इस बीच विजय लगातार उसकी गां...ड ठोकता रहा.”

“विजय चल डीपी करते हैं... मजा आएगा... तू एक मिनट रुक मुझे इसकी चू...त में डालने दे...”

“ठीक है...” विजय बोला.

“आज तो मेरा कचूमर बना दोगे तुम दोनों लगता है...” सुरभि बोली.

“मजा आएगा तुम्हें भाभी... चिंता मत करो...” लोकेश बोला.

जैसे ही विजय रुका, लोकेश ने सुरभि की योनी में नीचे से अपना लिंग डाल दिया और बोला, “मैंने घुसा दिया है... चल अब साथ में लेते हैं इसकी...”

सुरभि मजे में सिसक पड़ी. यह पूरी तरह से एक नया एहसास था उसके लिए. दो आदमी एक साथ उसमें घुस गए थे. एक उसकी गुदा में था और एक योनी में.

“हे भगवान ... यह अद्भुत है... मजेदार है फैंटास्टिक है ऊऊह्ह्ह्ह,” सुरभि जोर से बोली.

लोकेश ने अपने मोटे हथियार को सुरभि की योनी में पेलना शुरू कर दिया. पीछे से विजय भी शुरू हो गया तुरंत.

सुरभि के सामने आनंद के सितारे नाचने लगे. उसके लिए ये पल असहनीय था. बहुत ज्यादा मजा मिल रहा था उसे इस पल में. वो तुरंत झड गई.

"बहुत हॉट हो तुम भाभी," लोकेश ने कहा.

“तुम भी कम नहीं हो लोकेश... इ लव यू...” सुरभि बोली.

“ऐसा मत बोलो... विजय बेचारा परेशान होगा...”

“नहीं मुझे कोई परेशानी नहीं है... यू डीजरव हर लव...”

“चलो अच्छी बात है…”

दोनों मर्द बिना रुके सुरभि को पलते रहे. कोई भी रुकने का नाम नहीं ले रहा था. सुरभि बार बार झड रही थी चिल्ला कर. क्या करती... मजा ही इतना आ रहा था कि पूछो मत.

अचानक दोनों मर्द जोर से चीखे और उन्होंने सुरभि की योनी और गुदा को अपने गर्म वीर्य से भरना शुरू कर दिया. कुछ और धक्के मारे उन्होंने झड़ते हुए और फिर थक कर रुक गए. सुरभि निढाल हो कर लोकेश से चिपक गई और विजय उसके ऊपर चिपक गया. तीनों थके हुए थे और उनकी साँसे तेज चल रही थी.

अचानक सुरभि की नज़र खिड़की पर गई. हल्का सा पर्दा हटा हुआ था और बाहर से कोई झाँक रहा था. “ओह गॉड… बालकनी में कोई है…” सुरभि काँपती आवाज़ में बोली.

विजय ने तुरंत अपना लिंग निकाला और बालकनी की तरफ़ दौड़ा. लोकेश ने भी सुरभि को अपने ऊपर से हटाया और वो भी नंगा ही बालकनी की तरफ़ लपका.
 
विजय ने तुरंत अपना लिंग निकाला और बालकनी की तरफ़ दौड़ा. लोकेश ने भी सुरभि को अपने ऊपर से हटाया और वो भी नंगा ही बालकनी की तरफ़ लपका.

“अबे रूक!” विजय चिल्लाया.

“पकड़ साले को,” लोकेश चिल्लाया.

कुछ देर बाद धड़ाम की आवाज़ हुई.

सुरभि ने आनन फ़ानन में अपने कपड़े पहने.

कुछ देर बाद दोनों विजय और लोकेश अंदर आए और अपने कपड़े पहनने लगे.

“कहीं वो मर तो नहीं गया?” विजय बोला.

“कुछ कह नहीं सकते… पर वो हिल नहीं रहा था…”

“कौन था बाहर?” सुरभि बोली.

“विक्की…” विजय बोला.

“वही जो सामने रहता है?” सुरभि बोली.

“हाँ…”

“हे भगवान…”

कपड़े पहन कर दोनों बाहर गए वापस और दो मिनट बाद वापस लौटे.

“शायद वो मर गया है…” विजय बोला.

“मुझे भी ऐसा ही लगता है… ऐसा करता हूँ मैं अपना आइफ़ोन नीचे गिरा देता हूँ ताकि सबको ये लगे कि वो यहाँ आइफ़ोन चुराने आया था…” विजय बोला.

“गुड आइडिया…” लोकेश बोला.
 
सुरभि, विजय और लोकेश की बातें सुन कर मनोहर बोला, “तो तुम लगों के अनुसार ये हादसा था?”

“जी सर… ये महज़ एक हादसा था…” विजय बोला.’

“हाँ सर ये हादसा ही था. हम उसे क्यों मारेंगे भला…” सुरभि शर्माते हुए बोली.

“कोई बात नहीं सुरभि जी आप किसी बात की चिंता ना करें… मैं हूँ ना. मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगा…” मनोहर बोला.

सुरभि ने ग़ौर किया कि मनोहर की पैंट में तनाव था. उनकी आप बीती सुन कर उसका तन गया था. तभी ऐसी हालत हो रखी थी उसकी.

“थैंक यू सर…” सुरभि प्यार से बोली.

“थैंक यू आराम से लेंगे आप से सुरभि जी… इतनी भी क्या जल्दी है…”

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दोस्तों कहानी का पहला भाग यहीं समाप्त होता है. कहानी के इस भाग में हमने देखा कि कैसे विक्की की मौत हुई. पर क्या ये सच था कि विक्की की मौत गिरने से ही हुई थी या इसमें अभी कुछ और भी राज है.

और क्या मनोहर सुरभि, विजय और लोकेश को छोड़ देगा उनकी कहानी सुनने के बाद… कहीं वो भी सुरभि को पाने का ख़्याल तो नहीं पाल लेगा. अगर मनोहर ने सुरभि को पा लिया तो चमन का क्या होगा? उसका भी तो मन करेगा. इन सब बातों पर अगले भाग में ग़ौर करेंगे.

अभी के लिए अलविदा.
 
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